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विनोबा भावे: प्रथम सत्याग्रही—दो

सामान्य

सर्वोदय की ओर

स्वाधीनता संग्राम को तेज करने के लिए ढेर सारे सत्याग्रही आंदोलनकारियों की आवश्यकता थी. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध उस संघर्ष में सफलता जनता के सहयोग और लोगों द्वारा कंधे से कंधा मिलाकर समर में उतरे बिना असंभव थी. मगर स्वाधीनता के लिए एकजुट होना, कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष के लिए आगे आना तब तक असंभव था, जब तक लोगों के मन में जाति-पांत की भावना और धार्मिक संकीर्णता हो. जातिगत ऊंचनीच की भावना शताब्दियों से इस देश को कमजोर करती आ रही थी. वर्गीय स्तरीकरण के आधार पर जन्मना श्रेष्ठता का दावा करते हुए समाज के मुट्ठी-भर लोग, पीढ़ी दर पीढ़ी संसाधनों पर कुंडली मारे बैठे रहते थे. वर्णव्यवस्था के समर्थक हालांकि यही कहते आए थे कि यह एक खुली व्यवस्था थी. वह जन्मना न होकर कर्मणा थी. कोई भी व्यक्ति अपने गुण और योग्यता के आधार पर एक वर्ग से दूसरे वर्ग में अंतरण कर सकता है. ब्राह्मण होने के लिए ‘फलां-फलां’ शर्त है. अपने तर्क के समर्थन में उनके पास चंद उदाहरण भी होते थे. ‘गिने-चुने’ और गढ़े गए उदाहरण. वे ऐसा एक भी उदाहरण देने में असमर्थ रहते थे, जिनमें किसी ब्राह्मण ने अपने मूर्ख और स्वार्थी बेटे को ब्राह्मणत्व से अपदस्थ किया हो. यही जाति सम्मोहन चार पन्नो की पोथी रटने वाले को विद्वान शिरोमणि ब्राह्मण देवता की उपाधि देता गया. जाति और वर्ण के नाम पर शीर्षस्थ वर्ग शताब्दियों से जनसाधारण का शोषण-उत्पीड़न करता रहा. इस कारण समाज के उत्पीड़ित वर्ग में गहरा असंतोष था.

     अंग्रेजी शिक्षा और समाज में ज्योतिबा फुले के समय से चले आ रहे अस्मितावादी आंदोलनों ने इस असंतोष को और भी हवा दी थी. सामंत और राजे-महाराजे तो श्रीहीन हो ही चुके थे. गांधी के नेतृत्व में आंदोलनरत कांग्रेस के कार्यक्रमों में उनका योगदान यूं भी नगण्य ही था. कांग्रेस के सिपाही जनसाधारण थे. उभरते जनांदोलन को कमजोर करने के लिए अंग्रेजों के पास एक ही रास्ता था, लोगों को जाति, धर्म, संप्रदाय आदि पर आधारित ऊंच-नीच की भावना का शिकार बनाया जाए. भारतीय समाज की फूट का लाभ उठाकर अंग्रेज सत्ता सुंदरी को येन-केन-प्रकारेण अपने पाश्र्व में बनाए रखना चाहते थे. लगभग पौने दो सौ वर्षों से उन्होंने इसी नीति से देश पर राज किया था. उनका हाथ समाज के अंत्यजों और अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों पर था, जिनके पूर्वजों ने इस देश पर शताब्दियों तक राज किया था और उनमें से अधिकांश अब भी स्वयं को दिल्ली की गद्दी का वास्तविक उत्तराधिकारी समझते थे. अनेक हिंदू और मुस्लिम नेता स्वार्थवश उनके साथ थे. दोनों ही एक-दूसरे को ढकेलकर केंद्रीय सत्ता का निकटतम स्थान प्राप्त करना चाहते थे. ऐसे में स्वाधीनता संग्राम का संचालन कर रहे गांधी तथा समर्थकों के आगे बड़ी चुनौती थी, समाज को एक रखना. जनशक्ति को बंटने से रोकना, तथा जनता की ताकत का उपयोग अपने आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए करना. अंग्रेज समाज को जातीय आधार पर बांट न पाएं, इसलिए समाज को जातीय आधार पर एक रखने की जरूरत थी. इसके लिए आवश्यक था कि सभी देवालय समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए समानरूप से खुले हों. लोगों में आपसी भाईचारा और धार्मिक-सामाजिक एकजुटता हो. जातिवादी आग्रहों की खाई को पाटकर पूरे समाज को एक राष्ट्र की आत्मा के साथ एकीकृत करना, उनका लक्ष्या था.

     दक्षिण भारत के कई मंदिरों में हरिजनों के प्रवेश की मनाही थी. गांधी जी पहले ही कह चुके थे कि अश्पृश्यता हिंदू समाज के माथे पर कलंक है. उनके इसी वक्तव्य को मंत्र मानते हुए विनोबा ने हिंदू समाज में व्याप्त अश्पृश्यता और जात-पांति के विरुद्ध कई लेख अपनी पत्रिका में लिखे थे. विनोबा की निष्ठा और समर्पण भाव को देखते हुए 1925 में गांधी जी ने उन्हें केरल के वाइकोन नामक स्थान पर एक आंदोलन का नेतृत्व करने का दायित्व सौंपा. आंदोलन हरिजनों की अस्मिता और उनके मंदिर-प्रवेश के अधिकार को लेकर था. विनोबा ने उस आंदोलन का सफलतापूर्वक नेतृत्व कर गांधी जी के भरोसे को पूरा किया. 1932 में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए सरकार बिनोवा से फिर नाराज हो गई. उन्हें छह महीने की सजा सुनाई गई. धुलिया जेल में सजा काटते हुए विनोबा ने अपने रचनात्मक कार्यक्रमों पर निरंतर काम करते रहे. लगातार परिश्रम और जेल के प्रतिकूल वातावरण का प्रभाव विनोबा की सेहत पर पड़ा था. वे दिनोंदिन कमजोर होते जा रहे थे. 1938 में उन्हें गंभीर बीमारी ने आ घेरा, तब गांधी जी ने उन्हें कुछ दिन आराम करने की सलाह दी.

     ‘ठीक है, बापू. आपकी आज्ञा है तो मैं आराम अवश्य करूंगा.’ विनोबा ने आश्वासन दिया.

     पवनार में जमनालाल बजाज का बंगला खाली पड़ा हुआ था. गांधी जी स्वयं चाहते थे कि वर्धा में भी साबरमती जैसा आश्रम स्थापित किया जाए, ताकि स्वाधीनता आंदोलन को गतिमान बनाया जा सके. वर्धा की जलवायु भी अनुकूल थी. गांधी जी का आग्रह विनोबा के लिए आदेश ही था. उन्होंने वर्धा जाने की सहमति दे दी. एक दिन गांधी जी से अनुमति ले उन्होंने पवनार के लिए प्रस्थान कर दिया. आगे चलकर वही उनकी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना. वहीं रहते हुए उन्होंने अनेक सत्याग्रह आंदोलनों का नेतृत्व किया. वहीं से राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की.

     इधर देश में राजनीतिक गतिविधियां तेज होती जा रही थीं. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी माहौल गर्मा रहा था. इसी बीच दूसरा विश्वयुद्ध छिड़ने से मामला और भी बिगड़ गया. गांधी जी को भरोसा था कि दूसरे  विश्वयुद्ध के पश्चात अंग्रेज भारत को अधिक स्वायत्तता सौंप देंगे, इसलिए उन्होंने युद्ध में औपनिवेशिक सरकार का साथ देने का निर्णय लिया था. अंग्रेजों के पक्ष में हजारों भारतीय सैनिकों ने उस युद्ध में हिस्सा लिया. विजय मित्र देशों की हुई. मगर गांधीजी का आकलन गलत निकला. अंग्रेज इतनी आसानी से हिंदुस्तान छोड़ने वाले न थे. उधर लगातार संघर्ष के पश्चात भारतीय जनता में स्वाधीनता की चाहत बढ़ चुकी थी. उसकी उपेक्षा कर पाना गांधी जी और कांग्रेस के लिए भी संभव न था. अतएव अंग्रेज सरकार के विरुद्ध व्यापक स्तर पर जनांदोलन छेड़ने की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी थी. आजादी की मुहिम को और तेज करते हुए गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया और अंग्रेजों के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष छेड़ने की घोषणा कर दी.

     आजादी की यह लड़ाई अहिंसक तरीके से लड़ी जाने वाली थी. गांधी जी उसके माध्यम से एक ऐसा संदेश दुनिया को देना चाहते थे कि भारत अपनी स्वाधीनता के प्रति प्रतिबद्ध है. अंग्रेजों की धारणा के उलट वह एक-राष्ट्र है. सांस्कृतिक एकता और इच्छाशक्ति पूरे भारत को आपस में जोड़ती है. संगठित जनशक्ति की इच्छा का अब और दमन असंभव है. यदि ऐसा हुआ तो पूरा देश अंग्रेजों के विरुद्ध उठ खड़ा हो सकता है. मगर जनसाधारण को आजादी की लड़ाई में उतार पाना तभी संभव था जब उन्हें यह संदेश जाए कि गुलामी उनकी अस्मिता और सम्मान के लिए खतरा है और वे उनकी एकजुटता ही उन्हें इसके पार ले जा सकती है.

     जनता और सरकार दोनों को सही संदेह जाए, इसके लिए आंदोलन का जोरदार शुभारंभ महत्त्वपूर्ण था. उसके लिए ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जिसकी गांधी जी के नैतिक सिद्धांतों में न केवल पूरी आस्था हो, बल्कि उसका अपना प्रभामंडल भी कम देदीप्यमान न हो. जनता का उसपर अटूट विश्वास हो. इसके लिए गांधी जी के दिमाग में सिर्फ एक व्यक्ति का नाम था. वे थे विनोबा भावे, जिन्हें लोग प्यार से आचार्य विनोबा भावे कहने लगे थे. गांधी जी की अनुशंसा पर विनोबा को 1940 में प्रथम सत्याग्रही चुना गया. उस समय तक बहुत से लोगों नहीं जानते थे कि विनोबा नामक यह शख्स कौन-सा है, जिसपर गांधी जी ने इतना बड़ा भरोसा किया है. लोग प्रथम सत्याग्रही के बारे में जानने को उत्सुक थे. लोगों की जिज्ञासा शांत करने के लिए स्वयं गांधी जी ने विनोबा का परिचय कराते हुए लिखा कि—

     ‘विनोबा भारतीय स्वाधीनता में विश्वास करते हैं. वे इतिहास के विद्धान हैं. लेकिन उनका मानना है कि भारत के गांवों की वास्तविक आजादी बिना रचनात्मक कार्यक्रमों के असंभव है, और यह रचनात्मक कार्यक्रम खादी है.’

     प्रथम सत्याग्रही चुने जाने और गांधी द्वारा परिचय कराए जाने के बाद विनोबा की ख्याति पूरे देश में फैल गई. विनोबा भी ने बापू के विश्वास की रक्षा की. अंग्रेज सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह आंदोलन का शुभारंभ उन्होंने नागपुर से किया गया. आंदोलन पूरी तरह कामयाब रहा. देश गांधी की भांति विनोबा पर भी  भरोसा करने लगा. उसके बाद तो एक के बाद एक कई सत्याग्रह आंदोलनों में हिस्सा लेते हुए विनोबा को 1940 से 1941 के बीच तीन बार जेल जाना पड़ा. पहली बार तीन महीने के लिए. दूसरी बार छह महीने और तीसरी बार एक वर्ष के लिए. 1942 में गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया तो अहिंसा के प्रशिक्षित सैनिक की तरह विनोबा भावे फिर उस आंदोलन में कूद पड़े. तब तक अंगे्रज सरकार उनके पीछे पड़ चुकी थी. परिणाम यह हुआ कि वे पकड़ लिए गए. इस बार उन्हें तीन वर्ष तक वैलूर और सियोनी जेलों में रखा गया. हमेशा की तरह इस बार भी कारावास की अवधि का उपयोग उन्होंने अध्ययन और लेखन के लिए किया. गीता के अनुवाद-कर्म को आरंभ किए वर्षों बीत चुके थे. अंततः वैलूर जेल में सजा काटते हुए वह अवसर आया जब विनोबा ने ‘गीताई’ को अंतिम रूप दिया. विनोबा का यह जेल प्रवास अनेक रचनात्मक उपलब्धियों से भरा हुआ था.

     वैलूर जेल में देश के विभिन्न प्रांतों से आए हुए कैदी थे. आपस में संवाद के लिए वे प्रायः अंग्रेजी का प्रयोग करते. विनोबा को यह बहुत बुरा लगता. जिन अंग्रेजों से वे स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे हैं, आपसी संवाद के लिए उनकी भाषा पर निर्भरता क्यों हो! लोगों को यह संदेश देने के लिए कि वे एक-दूसरे की भाषाएं सीखें, उन्होंने जेल प्रवास के दौरान तमिल, तेलुगु, कन्नड और मलयालम भाषाएं सीखीं. उनके अध्ययन-पाठन को आसान बनाने के लिए उन्होंने ‘लोकनागरी लिपि’ का आविष्कार भी किया, जिसमें वे चारों भाषाएं सफलतापूर्वक लिखी जा सकती हैं. उर्दू वे सेवाग्राम में रहते हुए न केवल सीख चुके थे, बल्कि प्रवीणता भी प्राप्त कर चुके थे. विनोबा की उर्दू प्रवीणता को दर्शाने वाली एक दिलचस्प घटना है.

     सेवाग्राम में, गांधी जी की सेवा का व्रत लेकर एक मुस्लिम युवक भर्ती हुआ. आश्रम की नीति सर्व-धर्म समभाव की थी. उसके अनुसार मुस्लिम किशोर को अरबी भाषा सिखाना जरूरी था. लेकिन संयोग से वहां ऐसा कोई व्यक्ति न था जो अरबी के अध्यापन की जिम्मेदारी संभाल सके. इस समस्या के निदान के लिए विनोबा ने अरबी सीखना आरंभ कर दिया. कुरआन शरीफ की आयतों के सही उच्चारण के लिए वे नियमित रूप से उनका रेडियो प्रसारण सुनते. एक दिन उनके ज्ञान की परीक्षा की घड़ी भी आ गई. आश्रम में मौलाना अबुल कलाम आजाद आए हुए थे. वे अरबी-फारसी के विद्वान थे. गांधी जी ने उनसे विनोबा के अरबी भाषा के ज्ञान की परीक्षा लेने को कहा. परीक्षा के उपरांत मौलाना आजाद ने गांधी जी से कहा—

     ‘बापू, आपका विनोबा तो हाफिज हो गया है.’

     अरबी भाषा में में ‘हाफिज’ होना धर्म की परीक्षा में प्रवीणता प्राप्त कर लेना है. विनोबा द्वारा धर्म, दर्शन पर लिखी गई पुस्तकें अनेक भाषाओं में प्रकाशित हुईं और उन्हें एक आध्यात्मिक संत की पहचान मिलने लगी. देश-भर में अंग्रेज विरोध की लहर बढ़ती ही जा रही थी. गांधी के नेतृत्व में उनकी पूरी अहिंसक सेना आंदोलन में हिस्सा ले रही थी. विनोबा भी उसमें सम्मिलित थे. गांधी द्वारा सौंपे गए दायित्वों को सफलतापूर्वक पूरा करते हुए. साथ में बढ़ रही थी, उनकी ख्याति. अहिंसा और सत्याग्रह के प्रति उनकी निष्ठा. यदि किसी देश की प्रजा समझ जाए कि वह गुलाम है, और ठान ले कि आजाद होना है, तो फिर उसकी स्वाधीनता को लंबे समय तक टाला नहीं जाता. जागरूक जनता अपनी आजादी, अपने अधिकार किसी न किसी रूप में छीन ही लेती है. भारतवर्ष में भी यही हुआ.

अगस्त 1947 को देश स्वाधीन हुआ. आजादी के बाद देश के पुनः निर्माण की आवश्यकता थी. अब अलग चुनौतियां थीं. पहले से अलग और कई मायने में उनसे बड़ी भी. बिखरे हुए को समेटते हुए देश की ऊर्जा को रचनात्मक मोड़ देना था. इस बारे में गांधी जी का सोच पूरी तरह साफ था. उन्होंने पहले ही कह दिया था कि कांग्रेस और उनके कार्यकर्ताओं का काम आजादी मिलने मात्र से पूरा नहीं होगा. नई भूमिका के लिए वे चाहते थे कि आजादी के बाद कांग्रेस भंग कर दी जाए तथा उसके कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर रचनात्मक कार्यक्रमों का संचालन करें. वे गांवों को आत्मनिर्भर देखना चाहते थे. गांधी जी के सपने को ही अपना दायित्व मानते हुए विनोबा ने कई रचनात्मक कार्यक्रमों की शुरुआत की. उन्होंने बैलों की सहायता के बिना खेती का प्रारूप देश के सामने रखा. जाते-जाते अंग्रेज इस देश को बांटकर गए थे. आजादी के बाद देश में दंगे भड़क उठे. लोग भारत-पाकिस्तान में बंटने लगे. समस्या थी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को बसाने की. विनोबा इसमें भी जी जान से जुटे रहे. भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान हुए दंगों के बाद शांति-स्थापना के कार्य में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर योगदान किया.

     आजादी के बाद देश को जवाहर लाल नेहरू जैसा कल्पनाशील प्रधानमंत्री मिला था. स्वाधीनता संग्राम के दौरान जवाहरलाल ने गांधीजी का स्नेह और विश्वास प्राप्त करने में सर्वाधिक सफल सिद्ध हुए थे. वे विद्वान प्रधानमंत्री थे, लेकिन उनके निर्णयों में प्रशासनिक ढुलमुलपन था; साथ में कूटनीतिक चातुर्य की कमी भी. दूसरे उनके इर्द-गिर्द एक चमचा-मंडली जन्म ले चुकी थी. यह सब गांधी जी की पैनी निगाह से छिपा न था. उन्हें रहा था कि प्रशासनिक व्यवस्था में आजादी के बाद जो जिन आमूल परिवर्तनों की आवश्यकता थी, वे नहीं हो पा रहे हैं. वे उसमें बदलाव चाहते थे. इसके लिए विनोबा की भूमिका अवश्य उनके मन में रही होगी. लेकिन कोढ़ में खाज यह कि 30 जनवरी 1948 को एक सिरफिरे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी. विनोबा सकते में रह गए. अहिंसा के पुजारी की गोली मारकर हत्या. उन्हें लगा कि उनसे इस देश के मानस को पहचानने में चूक हुई है.

     महात्मा गांधी की हत्या के पश्चात उनके देश-भर में फैले गांधीवादी कार्यकर्ताओं को नेतृत्व की तलाश थी. विनोबा गांधी के स्वाभाविक उत्तराधिकारी थे. गांधी स्वयं यह कह चुके थे कि विनोबा ने उनके विचारों को उनसे भी अधिक गहराई से समझा है. इसका प्रमाण भी था. विनोबा की गांधीवाद संबंधी अवधारणाएं अपेक्षाकृत स्पष्ट थीं. इसलिए उनके समक्ष नेतृत्व का प्रस्ताव आया. मगर विनोबा की नेतृत्व के लिए तैयार न थे. महात्मा गांधी की हत्या से वे बुरी तरह टूट चुके थे. बार-बार उन्हें वह दिन याद आ रहा था, जब उन्होंने परमसत्य को पाने की चाहत में घर छोड़ा था. मुंबई जाने के लिए घर से निकले थे, मगर जा पहुंचे थे काशी. वहीं गांधी जी को पहली बार सुना था. उन्हीं से प्रभावित होकर वे स्वाधीनता आंदोलन में उतरे थे. अब आजादी का लक्ष्य पूरा हो चुका था. विनोबा को लग रहा था कि अपनी पुरानी खोज को, सत्य की खोज को नए सिरे से आरंभ करने का समय आ चुका है. इसलिए वे दिनोंदिन आत्मोन्मुखी होते जा रहे थे. उनका मन अध्यात्म और आश्रम की दिनचर्या में रमता. दिमाग निरंतर भविष्य के कार्यक्रम बनाता रहता.

     उधर नेतृत्व की आस लेकर आए कार्यकर्ताओं को तसल्ली भी देनी ही थी. सो उनसे विनोबा ने वही कहा, जो गांधी जी चाहते थे. आजादी के लाभ को जन-जन तक पहुंचाना. प्रत्येक नागरिक को यह एहसास दिलाना कि वह आजाद है. स्वतंत्रता भी केवल राजनीतिक सीमाओं में कैद नहीं है. राजनीति के साथ-साथ उसमें आर्थिक और सामाजिक आजादी के सभी मूल्य अंतर्निहित हैं. इसलिए मार्गदर्शन की उम्मीद लेकर आए कार्यकर्ताओं से विनोबा ने कहा कि वे अविलंब लोककल्याण के कार्यों में जुट जाएं. ‘भारत स्वराज प्राप्त कर चुका है. अब एक ही लक्ष्य बाकी है, जन-जन का कल्याण, स्वाधीनता का लाभ देश के प्रत्येक नागरिक, अमीर-गरीब और हर छोटे-बड़े तक पहुंचाना.

     सभी का कल्याण यानी ‘सर्वोदय’(Universal Awakening). यह नया मंत्र था. विनोबा का सुझाव सबको पसंद आया. कार्यकर्ताओं को विनोबा के रूप में एक और गांधी मिल गया. सर्वोदय के संकल्प को साधने के लिए ‘सर्व-सेवा-संघ’ नामक संगठन की स्थापना की गई. गांधी जी के सपनों को कार्यरूप देने के लिए जितने भी कार्यकर्ता और संगठन उन दिनों देशभर में कार्यरत थे, उन सबका ‘सर्व-सेवा-संघ’ के अंतर्गत विलय कर दिया गया. सर्वोदय को गांधीजी के सपनों की अभिव्यक्ति मान लिया गया. विनोबा ही गांधीजी के सच्चे उत्तराधिकारी हैं, यह एक बार फिर सिद्ध हुआ. लोगों द्वारा यह स्वीकार भी लिया गया. विनोबा व्यक्तिगत मान-प्रतिष्ठा से हमेशा ही ऊपर थे. देश के पुनर्निर्माण में उनका वास्तविक अवदान अब भी बाकी था. नियति उन्हें उसी ओर लिए जा रही थी.

     मार्च 1948 में गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने के लिए उनके अनुयायियों ने सेवाग्राम में एक सम्मेलन की योजना बनाई. विनोबा ने उसमें आत्मनिर्भर गांव की एक छवि प्रस्तुत की. सम्मेलन के दौरान सर्वोदय समाज की योजनाओं को सर्वसम्मिति से स्वीकार लिया गया. परिणामस्वरूप उनकी व्यस्तता और भी बढ़ गई. रचनात्मक कार्यों को अंजाम देने के लिए संसाधनों की आवश्यकता थी. देश के अधिकांश लोग गरीब थे. उनसे उम्मीद रखना उचित न था. इसलिए विनोबा ने देश के संपन्न लोगों से अपील की कि वे लोककल्याण के लिए अपने सारे मतभेद भुलाकर आगे आए. स्त्रियों से प्रार्थना की कि वे लोककल्याण के लिए अपने रत्नाभूषणों का दान कर दें. अपील पर गांधीजी का असर था.

     विनोबा की हृदयग्राही अपील का व्यापक असर हुआ. सर्वोदय कार्यक्रम चल निकला. बावजूद इसके विनोबा को लग रहा था कि आजादी के बाद से देश के पुनःनिर्माण के कार्यों को जितनी तेजी से चलाया जाना चाहिए था, उनकी तेजी से वे नहीं चला पा रहे हैं. परिणास्वरूप आजादी का जो लाभ जनता को मिलना चाहिए था, जो सपने उसको आजादी के आंदोलन के दौरान दिखाए गए थे, वे दूर छिटकते जा रहे हैं. गांधी जी की नीतियां और उनके विचार जो अंग्रजों के विरुद्ध जंग में हथियार बने थे, सरकार उनकी उपेक्षा करती जा रही है. ऐसे में उनका उदास होना स्वाभाविक था. उनके मन में हलचल थी. पवनार आश्रम की रचनात्मक गतिविधियों के नेतृत्व के साथ-साथ उस हलचल के पार जाने की कोशिशें भी निरंतर जारी थीं. वे भविष्य के आंदोलन की रूप रेखा गढ़ने की कोशिश कर रहे थे कि एक परिवर्तनकामी अवसर एकाएक सामने आ गया, उससे वह क्रांति संभव हो सकी, जिसके लिए दूसरे देशों में हिंसा और सैन्यबल का सहारा लेना पड़ा था. भारत में यह क्रांति पूरी तरह अहिंसक और जनसहयोग से संपन्न हुई थी, इसलिए भारत एक बार फिर दूसरों के लिए मिसाल बन गया.

भूदान आंदोलन

15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिली. जनता उससे बड़ी आस लगाए बैठी थी. लोगों को उम्मीद थी कि अब उनकी सरकार है, इसलिए न्याय स्वयं उनके द्वार तक चलकर आएगा. उनमें खासकर वे लोग थे जो शताब्दियों से भू-सामंतों और जागीरदारों के उत्पीड़न का शिकार रहे थे. जिनके पास जीविका का माध्यम मात्र उनकी देह थी. पेट था, इसलिए भूख भी लगती थी. भूख के दबाव में ही वे देह बेचकर बंधुआगिरी करने को बाध्य थे. इसके बावजूद उन्हें अपमान और अत्याचार दोनों का सामना करना पड़ता था. आजादी से उन्हें उम्मीद थी. उन्हें भरोसा था कि अपना निजाम होगा तो उनकी समस्याओं की सुनवाई भी हो सकेगी. सोचते थे कि अपने राज्य में बंधुआगिरी से मुक्त होगी. वे भी आजादी की हवा में सांस ले सकेंगे. इसी उम्मीद के साथ वे आजादी के आंदोलन में कूदे थे. गांधी जी आह्वान पर. बिना कोई विरोध किए लाठियां खाई थीं. अहिंसक सत्याग्रह में हिस्सा लिया था. गांधी जी के आंदोलन की सफलता का रहस्य ही इसमें था कि वे सत्याग्रह को व्यापक जनांदोलन का रूप देने में कामयाब रहे थे. लेकिन आजादी के बाद भू-सामंत जब सत्ता के गलियारों से संपर्क गांठकर प्रत्यक्ष या परोक्षरूप में दुबारा उनपर शासन करने लगे तो उनका भड़क जाना स्वाभाविक ही था. रूस और चीन की क्रांति की खबरें उनको प्रेरणा दे रही थीं. अफ्रीकी महाद्वीप से भी साम्यवादी क्रांति की खबरें आ रही थीं.

     हैदराबाद के पास का एक क्षेत्र तेलुगू भाषियों का है. इस कारण वह तेलंगाना कहलाता है. वहां की भू-संपत्ति का बंटवारा बड़े ही असामान्य ढंग से हुआ है. एक ओर वहां पचासियों हजार एकड़ के अनेक जमींदार थे, तो दूसरी ओर हजारों-लाखों की संख्या में बेघर, बे जमीन लोग. वे विलासी और कठोर, अत्याचारी जमींदारों, भू-सामंतों के यहां मजदूरी करते, बंधुआ रहकर चाकरी बजाते. यदि किसी प्राकृतिक आपदा के कारण फसल नष्ट हो जाए तो उनके अत्याचार-उत्पीड़न सहते थे. ऊपर से लगान वसूली के लिए सरकार और जमींदार का तानाशाही भरा रवैया. आजादी से उन्हें उम्मीद थी. आजादी मिली, परंतु उनकी समस्या ज्यों की त्यों थी. इसलिए नक्सली और साम्यवादी विचारधारा के नेता उन इलाकों में अपना प्रभाव जमाते जा रहे थे, जो रूस की भांति भारत में भी सशस्त्र क्रांति का सपना देख रहे थे. उन्हें उन गरीब, साधनहीन लोगों का समर्थन था, जिनके सपने देश की राजनीतिक आजादी प्राप्त होने के बाद भंग हुए थे. और वे अब अपनी तरह से बदलाव चाहते थे.

     तेलंगाना के तीन हजार से ऊपर गांवों पर नक्सलवादियों का प्रभाव था. स्थानीय प्रशासन उनके आगे बेबस था. कारण यह था कि उग्रपंथियों को स्थानीय जनता का समर्थन प्राप्त था. वर्षों से उपेक्षित-उत्पीड़ित लोग उनका साथ भी दे रहे थे. तेलंगाना की हालत अत्यंत चिंताजनक थी. लग रहा था कि वह कभी भी भारत की झोली से छिटक सकता है. स्थिति जब नियंत्रण से बाहर जाने लगी तो वह इलाका सेना को सौंप दिया गया. मगर अपने ही देशवासियों के बीच समस्या के समाधान के लिए सेना का उपयोग, किसी भी देश के लिए अच्छी बात न थी. विशेषकर भारत के लिए, जहां कुछ ही महीने पहले गणतांत्रिक व्यवस्था लागू की गई थी, जिसमें लोगों को यह भरोसा दिलाया गया था कि नई व्यवस्था में जाति-धर्म-वर्गीय पहचान से परे अमीर-गरीब सबके लिए विकास के एकसमान अवसर प्राप्त होंगे. सेना के उपयोग से अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में बदनामी का पूरा-पूरा खतरा था.

     विनोबा को निमंत्रण मिला था कि वे तेलंगाना जाकर आंदोलनरत किसानों को समझाएं. उन्हीं दिनों शिवराम पल्ली में ‘अखिल भारतीय सर्वोदय सम्मेलन’ की योजना बनी. सर्वोदय सम्मेलन की स्थापना विनोबा के कहने पर ही की गई थी. अब ऐसे सम्मेलन में विनोबा न जाएं यह संभव न था. वे उन दिनों वर्धा में थे, जो शिवरामपल्ली, हैदराबाद से तीन सौ मील अर्थात लगभग चार सौ अस्सी किलोमीटर की दूरी पर था. अंततः विनोबा ने सम्मेलन में जाने की सहमति दे दी. लेकिन उन्होंने ठान लिया कि वे उस सम्मेलन में हिस्सेदारी के लिए पैदल चलकर पहुंचेंगे.

     ‘ठीक है, मैं पहुंचूंगा, मगर पैदल चलकर’.

     विनोबा ने घोषणा की थी. मानो नियति ही उनके मुंह से यह कहलवा रही थी. देश के पटल पर विनोबा की विशिष्ट भूमिका अभी लिखी जानी बाकी थी. गांधी जी के रहते तो वे वहीं करते रहे थे, जो गांधी जी चाहते थे. जिसकी गांधी जी की ओर से आज्ञा प्राप्त होती थी. अब गांधी जी नहीं थे. उनकी अनुपस्थिति में विनोबा को अपनी आंतरिक प्रेरणा के आधार पर अपने रचनात्मक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना था. 7 मार्च 1951 को गांधी जी की कुटिया को नमन करते हुए विनोबा ने उस यात्रा की शुरुआत की. वह एक अचर्चित यात्रा थी. समाचारपत्रों में उसका खास उल्लेख भी नहीं हुआ. मगर उस समय कोई नहीं जानता था कि आने वाले कई वर्षों में समस्त अखबार उस यात्रा की कामयाबियों से रंगे होंगे. बाद में एक कवि ने उस यात्रा पर लिखा—

     ‘धर्मचक्र फिरते पड़ता एकाकी पाउले.’

     ‘वह एकाकी जैसे ही आगे बढ़ा, धर्मचक्र में प्रवत्र्तन होने लगा.’

     सर्वोदय सम्मेलन ठीक-ठाक संपन्न हो गया. अब तेलंगाना की यात्रा की बारी थी, जो वहां से थोड़ी ही दूरी पर था. मगर वहां के हालात बिगड़े हुए थे. विनोबा के हितैषियों ने उनके पुलिस की मदद लेने को कहा. लेकिन विनोबा ने तत्काल मना कर दिया. अहिंसा के सिपाही को हथियारबंद सिपाहियों की क्या आवश्यकता. तेलंगाना यात्रा आरंभ हुई. यात्रा में वे पीड़ित किसानों से मिलते. उनसे उनकी समस्याओं पर बात करते. साम्यवादी नेता भी उनके संपर्क में आते, वही समझाते कि समस्या का निदान बिना हथियारों के प्रयोग के असंभव है. बिना आर्थिक समानता और स्वतंत्रता के संविधान जिसे लागू हुए बस कुछ ही महीने हुए थे, के सपने को भी सच नहीं किया जा सकता. इसमें यदि कोताही हुई तो लोग उखड़ेंगे ही. एक तेलंगाना की समस्या का समाधान यदि समय रहते नहीं खोजा गया तो ऐसे तेलंगाना पूरे देश में जगह-जगह होंगे. क्योंकि असमानता और असमान भूवितरण केवल हैदराबाद की समस्या नहीं है. यह तो पूरे देश में है. देश अमीरी और गरीबी में पूरी तरह बंटा है. विनोबा भी समझ रहे थे कि देश को राजनीतिक आजादी मिल चुकी है. अब बारी आम जन के लिए उसकी सामाजिक-आर्थिक स्वतंत्रता मुहैया कराना है.

     विनोबा को समस्या का केवल एक ही हल सुझाई देता. भूमिहीनों को भूमि दे जी जाए. ताकि उनकी जीविका का साधन हो सके. पर भूमि देगा कौन. विनोबा को महाभारत की कहानी रह-रह कर याद आती. दुर्योधन ने पांडवों के मांगने पर पांच गांव देने से इंकार कर दिया था, तो महाभारत हुआ, जिसमें पूरा कौरव-कुल तबाह हो गया. तेलंगाना की समस्या का समाधान न हुआ तो ऐसे महाभारत पूरे देश में जगह-जगह होंगे. मगर समस्या थी कि जमींदारों को जमीन देने के लिए तैयार कैसे किया जाए. सरकार इसमें कुछ सार्थक भूमिका निभा सकती थी, मगर सरकार तो अपना वायदा बिसरा ही चुकी थी. लोकसेवा का व्रत लेकर राजनीति में आए नेता प्रण भूलकर अपना घर भरने में लगे थे. अंग्रेज साहबों की जगह भारतीय बाबुओं ने ले ली थी. विनोबा रात-दिन सोचते, बेचैन रहते. मगर निदान नहीं था. उधर समस्या इतनी विकराल कि निदान तत्काल चाहती थी. सर्वोदय सम्मेलन के अंतिम दिन विनोबा ने तेलंगाना के उपद्रव-ग्रस्त क्षेत्रों में शांति संदेश ले जाने का निर्णय लिया. 17 अप्रैल को अपनी यात्रा के दूसरे दिन विनोबा ने अनुभव किया कि ग्रामीण दुहरे आतंक के शिकार हैं. एक और पुलिस उन्हें परेशान करती है, दूसरी और कम्युनिस्ट आंदोलनकारी उनपर दबाव डालते रहते हैं. तेलंगाना क्षेत्र के गांव के गांव वर्गीय आधार पर विभाजित थे.

     और फिर वह दिन आ ही गया जिस दिन वास्तविक क्रांति की शुरुआत हुई. 18 अप्रैल, 1951 का दिन था. विनोबा का डेरा पोचमपल्ली गांव में जमा था. लगभग सात सौ परिवारों का गांव था पोचमपल्ली जिसमें दो-तिहाई आबादी भूमिहीनों की थी. गांव में विनोबा का जोरदार स्वागत किया गया. गांव की हरिजन बस्ती में प्रार्थना सभा हुई. दोपहर बाद का समय था. लोग विनोबा का प्रवचन सुनने के लिए उनके आसपास जुटने लगे. विनोबा ने सदा ही तरह गीता और वेंदात से बात आरंभ की. लोगों को मिलजुलकर रहने का उपदेश दिया. लोग तन्मय होकर सुनते रहे. उस सभा में भूमिहीन हरिजन भी थे. सबके सब विनोबा के पास उम्मीद भरी नजरों से देख रहे थे. उनकी निगाह में विनोबा की पैठ सरकार में सीधे प्रधानमंत्री तक थी. इसलिए प्रवचन के पश्चात जब चर्चा का दौर आरंभ हुआ तो हरिजनों की ओर से जमीन की मांग की गई—

     ‘हमारे पास न तो जमीन है, न दूसरा कोई रोजगार, थोड़ी-सी जमीन भी होती तो हम उसपर मेहनत करके अपना गुजारा कर लेते.’

     ‘जमीन चाहिए, पर कितनी?’ विनोबा ने सवाल किया.

     ‘हमारे कुल चालीस परिवार है. सो कुल चालीस एकड़ सिंचाईयुक्त और चालीस एकड़ सूखे की जमीन मिल जाए तो हमारे लिए पर्याप्त होगी.’

     ‘आपको जमीन मिल जाए तो सब मिलकर खेती तो करोगे न!’

     ‘जी, हम सब मिलकर आपका एहसान भी मानेंगे.’

     ‘ठीक है, लिखकर दीजिए, मैं आपका प्रार्थनापत्र सरकार को भिजवा दूंगा.’ उस समय विनोबा के पास उन हरिजनों को सांत्वना देने का यही एक उपाय था कि उनकी फरियाद सरकार तक पहुंचा दी जाए. हरिजन लिखकर देने की तैयारी करने लगे. तभी विनोबा को न जाने क्या सूझा उन्होंने वहां बैठे लोगों का आवाहन करते हुए कहा—

     ‘अगर किसी कारण सरकार इन्हें जमीन देने में असफल होती है तो क्या आप गांववाले मिलकर इनकी मदद करने को तैयार हैं?’

     उस सभा में गांव के ही किसान रामचंद्र रेड्डी भी उपस्थित थे. उदारमना, बाकी भू-सामंतों से बिलकुल अलग. विनोबा की ख्याति सुनकर प्रवचन सुनने चले आए थे. हरिजनों की बात सुनी तो विनोबा के प्रवचन का असर उनपर था ही. हरिजनों की बात सुनते ही तत्काल बोल पड़े—‘मैं देता हूं सौ एकड़ जमीन.’ जिसने भी सुना वही अवाक रह गया. इसे जादू कहें या चमत्कार. विनोबा हैरान थे. जितनी जमीन चाहिए थी, उससे ज्यादा जमीन उन्हें मिल रही है. वह भी बिना मांगे. शाम की प्रार्थना सभा में रामचंद्र रेड्डी फिर उपस्थित हुए. उन्होंने अपने निर्णय पर दुबारा सहमति की मुहर लगा दी. अनायास ही एक नए आंदोलन का जन्म हो चुका था.

     विनोबा के लिए वह पवित्र अनुष्ठान था. यज्ञ था. तेलांगाना की समस्या से जूझने, उसके पार जाने का रास्ता उन्हें मिल चुका था. ईश्वर में उनकी आस्था थी. विनोबा ने उस उपलब्धि को भी ईश्वर का आशीर्वाद ही माना. विनोबा की पदयात्रा वहां से आगे बढ़ने लगी. वे जहां भी जाते, सीधे ग्रामीणों, किसानों से सीधे संवाद करते. महाभारत की कहानी का हवाला देकर पूछते कि पांडव कितने भाई थे?

     ‘पांच!’ तत्काल उत्तर मिलता.

     ‘नहीं छह, कर्ण छठा पांडव था. पांडवों ने उसको अपने साथ मिलाने से इंकार कर दिया तो वह कौरवों में जा मिला. नतीजा भाई-भाई के बीच युद्ध हुआ. आप भी अपने क्षेत्र में शांति चाहते हैं, पूरे देश और समाज का कल्याण चाहते हैं तो अपने भूमिहीन भाइयों को अपना लीजिए. उन्हें उनका अधिकार दे दीजिए.’

     कहीं वे कहते कि मैं दरिद्र नारायण का प्रतिनिधि बनकर आया हूं. आप पांच भाई हैं तो मुझे छठा मानकर मेरा हिस्सा मुझे दे दीजिए. विनोबा की अपील का जादुई असर होता. तेलंगाना की उस पदयात्रा में विनोबा को प्रतिदिन औसतरूप में लगभग 200 एकड़ जमीन प्राप्त हुई. वह एक चमत्कार ही था. दान में जमीन. जिस देश में एक-एक इंच जमीन के लिए झगड़े होते हों, मामूली टुकड़े के लिए भाई-भाई की गर्दन तराश देता हो, जहां की जनता ने शताब्दियों तक सामंतवाद का दमन सहा हो, वहां दान में जमीन मिलना अनूठी घटना थी. मगर वह हो रहा था और पूरी दुनिया के सामने हो रहा था. हालांकि कुछ मतिमंद आलोचक बैठे-ठाले दूसरों को संदेह की नजर से देखने वाले विनोबा के अभियान पर भी सवाल खड़े कर कर रहे थे. चूंकि जमीन का मिलना तो झुठलाया नहीं जा सकता था. जमीन न केवल मिल रही थी, बल्कि हाथोंहाथ बंट रही थी. जिन इलाकों से विनोबा गुजर जाते, वह इलाका अप्रत्याशित रूप से शांत हो जाता. इसके बावजूद आलोचकों ने कहना आरंभ कर दिया कि तेलंगाना में जमींदार कम्युनिस्टों से डरकर जमीन दान कर रहे हैं. हैदराबाद से बाहर जाते ही भूदान आंदोलन ठप्प पड़ जाएगा. मगर विनोबा को अपने आप में विश्वास था. अपने ईश्वर में विश्वास था और उससे भी अधिक जनता जनार्दन में विश्वास था. और विश्वास था कि सच्चे मन से आरंभ किए गए अभियान में असफलता की संभावना न्यूनतम होती है.

     तेलांगाना से बाहर विनोबा को लगभग तीन सौ एकड़ प्रतिदिन जमीन प्राप्त हुई. इससे स्वयं विनोबा भी हैरान रह गए. यह तेलंगाना में प्रतिदिन के औसत से लगभग डेढ़ गुनी थी. इससे उनके आलोचकों को मौन हो जाना पड़ा. मध्यप्रदेश की घटना है. दिन का समय था. विनोबा उस समय कुछ पढ़ रहे थे. तभी एक किसान चुपके से सामने आकर बैठ गया. विनोबा ने पूछा तो उसने कहा—

     ‘आज प्रातःकाल पूजापाठ के उपरांत ही मिलने के लिए चल पड़ा था. अब पहुंचा हूं.’ विनोबा के कारण पूछने पर उसने अंटी में से जमीन दान करने के कागज निकाले और विनोबा की ओर बढ़ाते हुए बोला—‘ये पचीस एकड़ मेरी ओर से?’

     ‘आपके पास कुल कितनी जमीन है?’ विनोबा ने मुस्कराते हुए प्रश्न किया.

     ‘छह सौ एकड़…’ किसान ने बताया.

     ‘और आप भाई कितने हैं?’

     ‘दो!’

     ‘तो मैं हुआ आपका तीसरा भाई. मेरा हिस्सा हिस्सा मुझे दे दीजिए.’

दान हमेशा दाता की मर्जी पर निर्भर रहता है. मगर यहां दान लेने वाला स्वयं दान की निर्धारित कर रहा था. मगर देने वाला जानता था कि वह संत अपने लिए कुछ नहीं रखने वाला. वह किसान शाम तक आश्रम में रुका. अंततः दो सौ एकड़ का दान पत्र विनोबा भूदान समिति के नाम लिख गया. जब से आंदोलन की शुरुआत हुई थी, विनोबा के पास दूर-दूर से लोग आते थे. आगंतुकों को कोई परेशानी न हो, इसलिए आश्रम का एक न एक कार्यकर्ता रात को जागा रहता था.

     एक बार मुंह-अंधेरे एक अंधा किसान बैलगाड़ी में सवार होकर विनोबा का पता पूछता-पूछता उनके शिविर में पहुंचा. रात का समय था, विनोबा समेत शिविर में सभी लोग सोए हुए थे. गाड़ीवान के सहारे से वह किसान नीचे उतरा. कार्यकर्ता विनोबा को जगाने चला तो उसने रोक दिया, बोला—

     ‘बहुत दूर से आना हुआ. गाड़ीवान अंधेरे में रास्ता भी ठीक से नहीं पहचान पाया. इसलिए देर हो गई. मेरे छोटे-से दान के लिए बाबा को जगाने के लिए जरूरत नहीं है. सुबह जब वे उठें तो यह दानपात्र उन्हें थमा देना.’

     इतना कहकर वह अंधा किसान गाड़ी में सवार हो जैसा आया वैसा ही लौट गया. सुबह जब लोगों ने सुना तो सब उस अंधे भूदानी की चर्चा करने लगे. विनोबा के मुंह से निकला—

     ‘स्वयं भगवान मुझे दर्शन देने आए थे. मैं ही अवसर चूक गया.’

     कुछ लोगों को संदेह था कि जमीन गरीब लोगों तक नहीं पहुंच पाएगी. जमीन सही लोगों तक पहुंचे इसके लिए कई सुझाव आए. विनोबा सब पर विचार करते. अंततः तय हुआ कि जमीन गांव में सबसे अधिक गरीब लोगों में बांटी जाएगी. उनमें से एक-तिहाई लोग दलित होंगे. भूदान की सफलता से उल्लसित विनोबा के कार्यकर्ता भूमिहीनों की सूची आमतौर पर पहले ही बना लेते थे. फिर उनके लिए गांव वालों से जमीन मांगी जाती. बैठक में ही सरकारी पटवारी भी तैनात रहता. दान में मिली जमीन का बैनामा तत्काल जरूरतमंदों के नाम कर दिया जाता. बैठक में कई बार भावुक अवसर भी आते जब आंखें छलछला जातीं. नियम के अनुसार जहां जमीन मिलती, वहीं के भूमिहीनों में बांट दी जाती.

     एक बार विनोबा एक गांव में थे. गांव में जरूरतमंदों की सूची बनाई गई. कुल बारह व्यक्ति थे, जिन्हें जमीन की आवश्यकता थी. मगर जब भूदान आरंभ हुआ तो जरूरत की आधी जमीन ही मिल पाई. कार्यकर्ता असंमजस में पड़ गए. लेकिन किया क्या जा सकता था. जो जमीन प्राप्त हुई थी उसी को प्रभु की अनुकंपा मानकर विनोबा जमीन बांटने लगे. बुराई बुराई को, अच्छाई अच्छाई को और त्याग त्याग को आमंत्रित करता है. कम जमीन जरूरतमंदों के बीच कैसे बांटी जाए कि उनका गुजारा हो सके, इस समस्या को लेकर विनोबा सहित सभी भूदानी असमंजस में थे. इसपर उनमें से एक व्यक्ति बोल पड़ा कि जमीन दूसरे व्यक्ति को दे दी जाए.

     ‘क्यों, तुम्हें जमीन नहीं चाहिए?’ विनोबा ने सहजभाव से पूछा.

     ‘मेरे बच्चे बड़े हैं, कहीं भी मेहनत-मजदूरी करके अपना पेट भर लेंगे. उसके बच्चे छोटे हैं. उसे ज्यादा जरूरत है.’ उसकी बात सुनकर विनोबा की आंखें भर आईं. उन्होंने तब बैठक में हिस्सा लेने आए लोगों को संबोधित करके कहा, ‘जब यह व्यक्ति इतना त्याग कर सकता है, तो आप क्यों पीछे रहते हैं.’ उस सभा में एक व्यक्ति पाकिस्तान से आया था. कुछ अपनी मेहनत से और कुछ पीछे की कमाई से जोड़-जाड़कर उसने जमीन का जुगाड़ किया गया था. विनोबा को असमंजस में देख उससे न रहा गया. उसने खड़े होकर कहा—

     ‘मेरी बारह एकड़ जमीन भी लिख लीजिए. मैं तो किसी तरह खा-कमा ही लूंगा.’

     इसपर दान में मिली जमीन का खाता चढ़ा रहे पटवारी से न रहा गया.

     ‘मेरे पास कुछ ढाई एकड़ जमीन है. मुझे तो सरकार से गुजारे लायक मिल ही जाता है. जमीन से किसी का परिवार पल सकता है तो उसको ले लीजिए.’

     ऐसे अवसर भूदान के दौरान अक्सर आते. एक बार एक मुसलमान जमीन दान करने के लिए विनोबा के पास पहुंचा. वह दस एकड़ के कागजात बनवाकर लाया था. विनोबा ने उससे उसकी कुल जमीन के बारे में पूछा—

     ‘आप भाई कितने हैं?’

     ‘पांच.’

     ‘तो छठा मुझे मानकर मेरा हिस्सा मुझे दे दीजिए.’ हमेशा की तरह विनोबा ने कहा.

     ‘इस्लाम में लड़कियों का भी पिता की जायदाद में हिस्सा होता है. मेरे तीन बहने भी हैं.’

     आगंतुक ने बताया. इसके बाद वह विनोबा को अपनी जमीन का नौ वां हिस्सा दान कर गया. विनोबा के आंदोलन से तेलंगाना आंदोलन में नरमी आई थी. केवल सात सप्ताह के भीतर विनोबा 12000 एकड़ जमीन प्राप्त कर चुके थे, जो एक चमत्कार था. इस बीच स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं की पूरी फौज सम्मिलित हो चुकी थी. वे विनोबा के नाम पर भूदान मांग रहे थे और लोग खुशी-खुशी उनका मनोरथ साध रहे थे. विनोबा ने जब दक्षिण छोड़ा उस समय तक उन्हें एक लाख एकड़ से अधिक जमीन प्राप्त हो चुकी थी. वे तेलंगाना के दो सौ से अधिक गांवों में भूदान के लिए गए. इससे सभी प्रभावित थे.

     जिन दिनों विनोबा दक्षिण में थे, तभी उन्हें जवाहर लाल नेहरू का दिल्ली आने का निमंत्रण प्राप्त हुआ था. वे भूदान आंदोलन की सफलता से अभिभूत थे और पंचवर्षीय योजना में उसको एक आंदोलन के रूप में सम्मिलित करना चाहते थे. विनोबा ने दिल्ली पहुंचने की सहमति दी. लेकिन अपनी पदयात्रा की शर्त जड़ दी. पवनार से दिल्ली की तरफ बढ़ते हुए विनोबा को प्रतिदिन तीन सौ एकड़ जमीन प्राप्त हुई. इससे उनके आलोचकों का मुंह बंद हो गया, जो यह कह रहे थे कि हैदराबाद और उसके आसपास सटे क्षेत्रों में लोगों ने कम्युनिस्टों के डर से जमीन दान में दी है. सरकार ने भूदान आंदोलन को पंचवर्षीय योजना में शामिल किया. दिल्ली से विनोबा ने उत्तरप्रदेश का रुख किया.

     जैसे ही दिल्ली से विनोबा ने उत्तरप्रदेश के लिए कूंच किया, गांव-गांव में समाचार फैलने लगा कि विनोबा आ रहे. भूमिहीनों की उम्मीद बलवती होने लगी. जिस गांव में भी विनोबा कदम रखते वहां उनका बड़े जोरदार तरीके से स्वागत किया जाता. पवनार से दिल्ली तक आते-आते प्रतिदिन औसतन तीन सौ एकड़ भूमि दान में प्राप्त हुई थी. उत्तरप्रदेश राम और कृष्ण की भूमि थी. विनोबा को वहां भी सफलता की पूरी-पूरी उम्मीद थी. और हुआ भी ऐसा ही. कुछ ही महीने के भीतर विनोबा उत्तरप्रदेश में सवा तीन लाख एकड़ जमीन दान में प्राप्त कर चुके थे. उनका कहना था कि दलितों और अंतज्यों के प्रति केवल करुणा-प्रदर्शन के लिए नहीं आए हैं. बल्कि हमारा उद्देश्य ही ऐसे समाज की रचना करना है, जहां के निवासियों में एक-दूसरे के प्रति प्यार, मैत्री, विश्वास और करुणा हो. ऐसे ही समाज का गठन करना मेरा लक्ष्य है.

     बैशाख का महीना था. ऊपर आसमान में सूरज तप रहा था. कार्यकर्ता चिलचिलाती धूप से परेशान रहते. मगर विनोबा के आगे तो लक्ष्य था. उनका इरादा पूरे देश में एक करोड़ एकड़ भूमि दलितों के लिए जुटाना था. प्रकट में उन्होंने केवल पचास लाख एकड़ का लक्ष्य अपने कार्यकर्ताओं के समक्ष रखा था. फिर आया भूदान के इतिहास का अविस्मरणीय दिन यानी 29 मई 1952. विनोबा बेतवा के किनारे अपने साथियों के साथ डेरा डाले हुए थे. इरादा जल्दी से जल्दी और अधिक से अधिक जमीन जुटा लेना था. सुबह और शाम की पूजा-अर्चना उनकी दैनिक गतिविधि का हिस्सा थी. दिन में प्रायः दो बैठकें होतीं, उनसे पहले पूजा का कार्यक्रम संपन्न होता. उस समय वे मंगरौठ के राजा के आथित्य में थे. वहां की सभा में विनोबा ने मंत्र दिया—सारी जमीन देवताओं की, गांव का मतलब बड़ा परिवार.’

     सभा में मंगरौठ के जमींदार शत्रुघ्न सिंह तथा उनकी पत्नी राजेंद्र कुमारी भी पधारे हुए थे. दोनों पर महात्मा गांधी के विचारों का गहरा प्रभाव था. उनके आंदोलन में वे हिस्सा भी ले चुके थे. बात जब भूदान की आई तो होठों पर अधखिली मुस्कान लिए विनोबा ने उनकी ओर मुड़कर पूछा—

     ‘आप इस फकीर की झोली में क्या डालने जा रहे हैं?’

     इस पर शत्रुघ्न सिंह ने अपनी अर्धांगिनी राजेंद्र कुमारी की ओर देखा. आंखों ही आंखों में जैसे निर्णय ले लिया गया—

     ‘जितनी भी हमारी जमींदारी है, सब.’ शत्रुघ्न सिंह ने पूरी सभा को चमत्कृत कर दिया.

     गांव वाले पहले भी जानते थे कि उनके जमींदार बड़े दिल के इंसान हैं. पर उनका दिल बड़ा है, इसकी उन्होंने कल्पना भी न की थी. और जब गांव का राजा अपना सबकुछ त्याग सकता है तो वे क्यों नहीं. फिर तो सभा में दानदाताओं की जैसे कतार-सी लग गई. अगले दिन विनोबा को लिखा हुआ दानपत्र मिल गया. गांव का अमीर-गरीब हर आदमी अपनी जमीन दान कर दी थी. गांव में अब भी उतनी ही मिल्कियत थी. मगर अब उसपर एक का साझा नहीं था. वह सबकी हो चुकी थी. पूरा गांव जैसे बड़े परिवार में ढल चुका था. ‘सबै भूमि गोपाल की’ तो किसी कवि द्वारा भावुकतावश रचा गया छंद रहा होगा. मगर मंगरौठ में तो वह दिन की रोशनी में चरितार्थ हो रहा था. जिस जमीन के एक-एक इंच पर अधिकार-भावना को लेकर गांव वाले मरने-मारने पर उतारू हो जाते थे, उसपर गांव वालों की त्यागवृत्ति से विनोबा अभिभूत थे. इसकी तो उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी. वह पहला ग्रामदान हुआ. उसके बाद तो ग्रामदान की मानो झड़ी-सी लग गई.

     उत्तर प्रदेश में अपनी पदयात्रा पूरी कर विनोबा बिहार के लिए बढ़ गए. वहां  सितंबर 1952 से दिसबंर 1954 के बीच के लगभग सताइस महीनों में उन्हें कुल 23 लाख एकड़ जमीन दान में प्राप्त हुई. उड़ीसा, केरल, तमिलनाडु में विनोबा को कई ग्रामदान हुए. उड़ीसा की पदयात्रा के दौरान कुल 6,38,706.50 एकड़ जमीन दान में मिली. गांव दान के अलावा संपत्ति दान, स्वर्णदान आदि की झड़ी ही लग गई. इसी से जन्म हुआ श्रमदान का. श्रमदान के पीछे अवधारणा थी कि अकेले जमीन देने से ही गांव का कल्याण होना संभव नहीं है. अभी तक गांववाले विकास के लिए सरकार की ओर देखते आए थे. श्रमदान आत्मनिर्भरता का मूलमंत्र था. लोककल्याण के लिए लिया गया लोकसंकल्प. गांव के सभी काम करने योग्य व्यक्तियों का योगदान उसमें अपेक्षित था. यानी जिसके पास कुछ नहीं है, सिर्फ उसका श्रम है, रचनात्मक कार्यों से वह भी पीछे क्यों रहे. श्रम दान कर अपनी भूमिका सुनिश्चित करे. देने वाला देवता है, उसका दर्जा ईश्वर जितना है, लेने वाले से उसका योगदान ज्यादा बड़ा है. विनोबा अक्सर दोहराते—

     ‘हमें स्वराज की, जनता के शासन की स्थापना करनी है. हमें स्वयं को इतना ऊंचा उठाना है कि समाज में व्याप्त हिंसा और दमन पर काबू पर सकें. जनता ही ईश्वर है, जनता ही जर्नादन है.’

     ग्रामदान अपने आप में एक क्रांति था. प्रवृत्ति में भूदान से भी अधिक सुधारवादी. वर्षों से सामाजिक न्याय के पक्षधर गांवों में समानता और बराबरी का सपना देखते आए थे. उनका कहना था कि गांवों से ऊंच-नीच मिटेगी तो पूरे देश में समानता का संचार होगा. समाजवाद का सपना सच हो जाएगा. उल्लेखनीय है कि समाजवादी क्रांति के नाम पर रूस सुलग चुका था. चीन की आंच अभी ठंडी नहीं पड़ी थी. अफ्रीकी देशों जैसे क्यूबा, बोलेविया, घाना, ग्वाटेमाला आदि में अमेरिकी उपनिवेश से आजाद होने के लिए संघर्ष जारी था. खूनी संघर्ष….उन सबसे अलग भारत में भी समाजवादी आंदोलन जारी था. भूदान के नाम पर. बाकी दुनिया से अलग. सबको शांति और सहअस्तित्व का संदेश देता हुआ. यह बताता हुआ कि भारत अब भी अपनी संस्कृति और परंपरा से जुड़ा हुआ है. यह आंदोलन एक ऐसे व्यक्ति के कंधों पर था जिसका वजन बामुश्किल तीस किलो था. जो केवल डेढ़ छटांक चावल पर अपना गुजारा करता था.

     ग्रामदान के अंतर्गत आए गांव में वहां की पूरी जमीन पर पूरे गांव का सामूहिक अधिकार होता. परिवारों के बीच उनकी जरूरत के आधार पर भूमि का विभाजन कर दिया जाता. बांटी गई जमीन पर लोगों को केवल खेती करने का अधिकार होता. उस जमीन को वे न तो खरीद-बेच सकते थे, न बंधक रखकर उसपर उधार ले सकते थे. न ही जरूरत के समय उस बेचकर रकम उठा सकते थे. गांव के प्रशासनिक मामलों की देखभाल के लिए ग्राम परिषद का गठन किया जाता था. गांव के सभी वयस्क सदस्य परिषद के भी सदस्य होते. परिषद के निर्णय के आपसी विचार-विमर्श के उपरांत लिए जाते. निर्णय का आधार सर्वसम्मिति होता, मगर सामाजिक हित के मुद्दों पर सर्वसम्मिति बनाना बहुत जटिल काम था. यानी जब तक एक भी सदस्य निर्णय से असहमत है, तब तक परिषद का निर्णय अमान्य समझा जाता था.

     सर्वसम्मत निर्णय उसी स्थिति में संभव था, जब गांव के सदस्यों के बीच आपसी भाईचारा और विश्वास हो. इससे यह भी साफ है कि परिषद का अनुचित लाभ उठा पाना असंभव था. ग्रामदान की रफ्तार आरंभ में ठीक रही. 1965 तक ग्रामदान आंदोलन धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा. ग्रामदान आंदोलन में गति लाने के लिए विनोबा ने बाद में उसके लिए सघन अभियान भी छेड़ा, जिसे उन्होंने ‘तूफान यात्रा’ का नाम दिया. इसका आशानुकूल परिणाम भी निकला. 1975 तक ग्रामदान के साये में आए गांवों की संख्या 1,60,000 हो चुकी थी, जो देश के कुल गांवों की संख्या की लगभग एक-तिहाई थी.

     बाद में ग्रामदान आंदोलन में भी स्वार्थी तत्व सम्मिलित होने लगे. आंदोलन इतना फैल चुका था कि अकेले विनोबा के बूते उसको संभाल पाना संभव न था. समर्पित और ईमानदार कार्यकर्ताओं की कमी भी साफ तौर पर अनुभव की जाने लगी थी. स्वार्थपरता और प्रसिद्धि की भूख के चलते यह भी देखने को आया कि लोग केवल नाम के लिए ग्रामदान की घोषणा कर देते हैं. अच्छे खेत देने के बजाय अक्सर ऊसर और तराई की जमीन दान में कर दी जाती थी. कुछ लोग विनोबा के नैतिक प्रभामंडल के दबाव में आकर जमीन दान कर देते थे. मगर जैसे ही विनोबा प्रस्थान करते, वे जमीन वापस छीन लेते थे. ग्रामदान की आचार संहिता के अंतर्गत उसकी आमूल कायापलट नहीं हो पाता था. 1970 तक ग्रामदान के अंतर्गत प्राप्त गांवों में से मात्र कुछ गांवों में ग्राम-परिषद का गठन हो पाया था. दरअसल विनोबा का प्रभामंडल जनता के मन में इतनी तेजी से फैलता जा  रहा था कि लोकप्रिय राजनीति के कर्णधारों के मन में उसको लेकर ईश्र्या-सी व्यापने लगी थी. वे भूदानी मुखौटा लगाकर उसमें सम्मिलित हो रहे थे. विनोबा उनकी चाल को समझते थे. देशव्यापी आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए अब सरकारी मदद की आवश्यकता महसूस की जा रही थी. मगर छठे दशक की समाप्ति तक राजनीति जोड़-तोड़ और स्वार्थपरता का खेल बन चुकी थी. इस कारण सरकार से किसी प्रकार के नैतिक समर्थन की उम्मीद विनोबा को न थी. परिणामस्वरूप 1971 के आसपास ग्रामदान आंदोलन अपने ही भार तले दबकर शांत हो गया.

     भूदान आंदोलन की सफलता आगे चलकर और भी कई रूपों में सामने आई. उपद्रव ग्रस्त क्षेत्रों में अहिंसक तरीके से शांति स्थापना के लिए शांति सेना बनी. भूदान आंदोलन की सफलता के लिए आजीवन उसके लिए कार्य करने का व्रत यानी जीवनदान. बिहार में जयप्रकाश नारायण ने विनोबा के भूदान यज्ञ के लिए अपना जीवन आहूत करने का निश्चय किया. इसी यात्रा में विनोबा की सर्वोदय की अवधारणा खुल कर सामने आई. सर्वोदय यानी सभी का उदय. सभी का कल्याण. विकास में सबकी समान सहभागिता. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि विनोबा को लगभग 1,60,000 ग्रामदान प्राप्त हुए, जो देश के कुल गांवों की संख्या का लगभग एक तिहाई है. हर घर के लिए एक ‘सर्वोदय-पात्र’ की संकल्पना की गई. बिहार यात्रा के दौरान विनोबा ने लोगों से आग्रह किया कि वे अपने घर में एक पात्र रखें और हर सद्ग्रहस्थ उस पात्र में प्रतिदिन अंजुलि-भर अनाज डालता चला जाए. ताकि उन लोगों का जो भूखे हैं, विपन्न हैं, पेट भर सके.

     विनोबा को स्वास्थ्य की समस्या आरंभ से ही थी. लंबी यात्रा की थकान वे सह ही नहीं सकते थे. लेकिन वह संत ही क्या जो अपनी सीमाओं का अतिक्रमण न कर सके. विनोबा तो रोज-रोज अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करने के लिए विख्यात होते जा रहे थे. भूदान यात्रा के दौर भी उनका स्वास्थ्य खराब था. फिर भी वे प्रतिदिन दस से बारह मील यानी सतरह से बीस किलोमीटर तक यात्रा करते. यात्रा दल का अनुशासन पक्का था. प्रातः तीन बजे सब जाग जाते. प्रार्थना होती. उसके बाद यात्रा आरंभ हो जाती. भूदान की चाहत में सर्वोदयी कार्यकत्र्ता गांव-गांव जाते. यात्रा टोली में स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े, जवान, आदर्शवादी स्वयंसेवक, गृहस्थ सभी होते. राजनेता, व्यापारी गरीब, मजदूर सभी के बीच विनोबा की लोकप्रियता एकसमान थी. गांव, शहर और कस्बों से लोग विनोबा दर्शन के लिए आते. जिस गांव भी विनोबा का आगमन होता, वहां के निवासी उनके दर्शन के लिए मुख्यमार्ग के किनारे-किनारे जुट जाते. हाथ में फूलमालाएं लिए. सजे-धजे, अपनी विपन्नता छिपाकर मुस्काने का प्रयास करते, मन में बदलाव की आस जगाए हुए. गांव के प्रवेशद्वार पर तोरण सजाए जाते. जैसे ही विनोबा की एक झलक ग्रामीणों को मिलती, वे संत विनोबा, संत विनोबा, भूदानी बाबा के नाम से उनका जयगान करने लगते. विनोबा का वह स्वागत होता, जो संभवतः गांधीजी का भी नहीं होता था. वहां कुछ देर विश्राम करने के बाद कार्यकर्ता नाश्ता करते. उसके बाद सभी कार्यकर्ता गांव में फैल जाते. जगह-जगह ग्रामीणों से भेंट-मुलाकात जमती. उस समय विनोबा एक स्थान पर बैठे रहते, आगंतुकों और ग्रामीणों से बतियाते. उनके प्रश्नों का जवाब देते हुए.

     दोपहरी में कुछ देर आराम करते. उसके बाद शाम की प्रार्थना का समय हो आता. प्रार्थना सभा में सैकड़ों ग्रामीणों की भीड़ होती. दूर-दूर से आए हुए लोग. सभा में लोकगीत, भजन के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रमों की बैठक भी जमती. उसके बाद विनोबा का प्रवचन आरंभ होता. उनकी गंभीर, ओजस्वी वाणी जब सभा-मंडप में गूूंजती तो चारों और सन्नाटा छा जाता. लोग एकाग्र होकर उनका प्रवचन सुनने लगते. प्रवचन से पहले विनोबा पूरी तैयारी कर चुके होते. जिस विषय को भी वे छूते वह जीवंत हो उठता. भारतीय धर्मग्रंथों के अलावा वे ग्रामीण जीवन से भी जीवंत चरित्र उठाते. उनके संदेश में सर्व धर्म समभाव होता. आपस में मिल-जुलकर रहने की भावना का संदेश देते. फिर भूदान की बारी आती. सभा के समापन पर एक बार फिर प्रार्थना होती. विनोबा धर्म के नाम पर, इंसानियत के नाम पर, आपसी भाईचारे और सद्भाव के नाम पर, संस्कृति और सौहार्द के नाम पर भूदान का आह्वान करते. उनके आह्वान से लोगों के दिल खुल जाते. दानदाताओं की कतार-सी बंध जाती.

     भूदान यात्रा अनवरत चलती. प्रतिदिन, बिना किसी विराम, बगैर किसी साप्ताहिक अवकाश के. विनोबा उस समय जीवन के 57 वर्ष में थे. बुढ़ापा देह पर असर जमाने लगा था. ऊपर से स्वास्थ्य अक्सर चुनौती बना रहता था. रोजाना बदलती परिस्थितियां और जलवायु उन्हें और भी परेशान करतीं. कभी पेचिश आ घेरती, कभी वातरोग तो कभी मलेरिया अपना शिकार बना लेता. अलसर तो ताजिंदगी बना रहा. जो खाते आंत्र-शोथ के कारण उसका बहुत कम हिस्सा देह को लग पाता. फिर भी उनकी चुस्ती-फुरती देखने लायक होती. उनकी आवाज का ओज कभी मंद न पड़ता. दिमाग हमेशा तेज और जिज्ञासु बना रहता. स्वास्थ्य कारणों से यात्रा में कोई बिघ्न न पड़े, लोककार्य बाधित न हो, इसके लिए खाने-पीने का परहेज वे हमेशा रखते. अधिकतर शहद और दही पर गुजारा होता. जहां यह न मिलता वहां केवल पानी पर दिन गुजार देते. लोग उनका श्रम और उसकी तुलना में लिया गया अल्पाहार देखकर हैरान होते. सोचते इतना कम खाकर इतना श्रम कैसे कर लेते हैं बाबा. श्रद्धावश कुछ लोग उन्हें ‘भूदानी बाबा’ तो कुछ अतिउत्साही ‘वरदानी बाबा’ भी कहते. और वे गलत भी नहीं थे. लगभग एक दशक की भूदान यात्रा के दौरान विनोबा लाखों एकड़ जमीन भूदान में लेकर बेजमीनों में बांट चुके थे. कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में बेजमीनों को जमीन मिल जाना, वरदान ही तो था.

     विनोबा का नाम देश की जुबान पर था. लोग कहते—‘दूसरा गांधी उनके भले के लिए गांव-गांव भटकर रहा है.’ वे उनमें किसी सिद्ध-महात्मा की छवि देखते. सोचते कि विनोबा के हाथ में जादू की छड़ी है. जिसके माध्यम से पलक झपकते सारी समस्याओं का निदान संभव है. विनोबा स्वयं बीमार रहते. यात्रा की थकान, पेट की बीमारी लगी ही रहतीं. फिर भी लोग विनोबा के पास अपने बीमार परिजनों को लेकर आते. स्त्रियां अपने बच्चों को विनोबा के आगे कर कहतीं—

     ‘बाबा देखिए तो, पंद्रह दिनों से बीमार है. न हंसता है और न खेलता है. और तो और मां का दूध तक नहीं पीता. इसको आशीर्वाद दीजिए कि पहले जैसा हंसने-खेलने लगे.’

     विनोबा लाख समझाते कि वे साधारण आदमी हैं. हाड़-मांस का पुतला, ‘अगर हाथ में जस होता तो अपनी ही बीमारियों से न सुलट लेता.’ लेकिन ऋद्धावान लोग कहां मानने वाले थे! आशीर्वाद लेकर ही टलते. विनोबा ईश्वर से प्रार्थना करते कि उनकी इच्छाएं पूरी हों. रोग-शोक का जड़ से नाश हो. ये प्रार्थनाएं किसी साधु-तांत्रिक या चमत्कारी की भांति न होकर एक संत प्रवृत्ति के व्यक्ति की ओर से थीं. जिसके मन में पूरी दुनिया के लिए दर्द था. सच्चे मन से उस समय वे यदि पीड़ित व्यक्ति को छू भी लेते तो उसका दर्द घट जाता. आत्मा को नैतिक संबल मिलता. इसे दूसरों के लिए जीने वालों की आत्मिक शक्ति का परिणाम माने या प्रकृति की सहज कृपा. बहुत से रोगी ठीक हो जाते. या विनोबा के दर्शनमात्र से उन्हें अपने संकट का एहसास जाता रहता.

     विनोबा उन दिनों असम की यात्रा पर थे. संत शंकरदेव का देश. विनोबा ने उनकी ख्याति सुनी थी. असम की मिट्टी में उस महान संत की आत्मा को महसूस कर वे अभिभूत हो उठे. वहां से वे पश्चिमी बंगाल जाने चाहते थे. गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर और शरतचंद्र का प्रांत. सुभाष और रासबिहारी बोस की धरती. महर्षि अरविंद की जन्मस्थली.

     पांच सितंबर 1962 को विनोबा असम की सीमा पर पहुंचे. मगर इस बार अपना देश नहीं, दूसरे देश की सीमा थी. पूर्वी पाकिस्तान. विनोबा को पदयात्रा पर निकले कई वर्ष बीत चुके थे. इस बीच हजारों किलोमीटर लंबी पदयात्रा उन्होंने बिना थके, बगैर रुके की थी. पहली बार वे दूसरे देश की सीमा पर थे. विनोबा के लिए हालांकि दूसरा देश कुछ भी नहीं था. वे तो खुद को आरंभ से ही पूरे विश्व का मानते हुए आए थे. फिर पाकिस्तान, वह तो भारत का ही छोटा हिस्सा, उसी की आत्मा का टुकड़ा था. वक्त की गलतफहमियों ने उसको दूसरे देश का रूप दे दिया था. हालात ने इन दोनों देशों को दो दुश्मन पड़ोसियों के रूप में ढाल दिया था. पूर्वी पाकिस्तान से होकर पश्चिमी बंगाल तक जाने में छोटा रास्ता पड़ता था. विनोबा ने अनुमति मांगी. अब ऐसे संत को भला कौन मना करता. विनोबा न तो राजनीतिक थे, न राजनीति उनका पेशा थी. वे भारतीय जनता के चहेते थे तो पाकिस्तानी आवाम के भी. अनुमति मिल गई. उस समय जवाहरलाल नेहरू का बयान आया—

     ‘विनोबा जी की इस छोटी-सी पाकिस्तान यात्रा से दो देशों के बीच आपसी सौहार्द बढ़ेगा. मन-मुटाव कम होगा.’

     विनोबा भले ही अराजनीतिक व्यक्ति हों, उनका अभियान भी मानवमात्र के कल्याण के प्रति समर्पित हो जिसके लिए देश-समाज की सीमाएं कोई मायने नहीं रखतीं. मगर लोग तो उतने सच्चे, उतने ही खरे न थे. कुछ लोगों को पाकिस्तान सरकार द्वारा रास्ता दिए जाने के काम में भी राजनीति नजर आई. आर्थिक विभाजन वहां भी था. सामंतवाद के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जमा हुआ. वहां के जमींदार और उनकी नुमाइंदगी करने वाला बुद्धिजीवी वर्ग मानो डरा हुआ था. नहीं चाहता था कि नैतिक दबाव में आकर उसको भूदान के लिए बाध्य होना पड़े. ऐसे लोगों द्वारा विनोबा की अराजनीतिक यात्रा का राजनीतिकरण किया गया. पश्चिमी पाकिस्तान के समाचारपत्रों ने विनोबा को अनुमति दिए जाने की खुलकर आलोचना की. कुछ लोगों ने इसको भारत की चाल बताया. अंततः पाकिस्तान के विदेशमंत्री को ही हस्तक्षेप करना पड़ा. विनोबा की यात्रा के प्रति अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि—

     ‘विनोबा जी को पूर्वी पाकिस्तान जाने की इजाजत केवल इंसानियत के नाते दी गई है. पाकिस्तान सरकार के इस कार्य की तारीफ पूरी दुनिया में हो रही है. विनोबा की पाकिस्तान यात्रा बहुत थोड़े समय की है. इससे दोनों देशों के बीच आपसी मेल-मिलाप बढ़ेगा. हम भी भारत के साथ मेल-मिलाप चाहते हैं.’

     विनोबा की कश्मीर यात्रा के दौर की बात है. जब वे पाकिस्तान सीमा के निकटवर्ती गांवों की यात्रा पर थे तो सीमा से सटे पाकिस्तानी गांवों के नागरिक भारत से जाने वाले लोगों से अक्सर यह सवाल पूछते—

     ‘आपका यह बाबा हमारे पाकिस्तान कब आएगा?’

     ‘वह इधर क्यों आएगा, आना भी चाहे तो पाकिस्तान सरकार क्या आज्ञा देगी!’

     ‘क्यों नहीं देगी…बाबा क्या केवल हिंदुस्तान का है!’

     सच ही तो कहा था. विनोबा जैसे महापुरुषों को क्या किसी एक देश की सीमा में बांधा सकता है. विनोबा की पाकिस्तान आने की बाट जोहने वाले पाकिस्तानी नागरिकों में प्रायः भूमि से वंचित लोग थे. जिनके लिए विनोबा एक उम्मीद की किरण थे. विनोबा के पूर्वी पाकिस्तान में प्रवेश पर ऐसे लोगों में खुशी की लहर दौड़ना स्वाभाविक था. विनोबा के लिए तो देशकाल की सीमाएं न पहले थीं, न बाद में. उनके लिए पूरी दुनिया ‘विश्वग्राम’ थी. पाकिस्तान की धरती पर अपने पहले प्रवचन में इन्हीं अनुभूतियों का विस्तार करते हुए उन्होंने कहा—

     ‘मैं अमन और मुहब्बत का पैगाम लेकर पाकिस्तान की आवाम के बीच उपस्थित हूं. आप सब मेरे अपने हैं. किसी तरह के परायेपन का एहसास यहां मुझे नहीं हो रहा. वही आवोहवा, वही आसमान, वही मिट्टी, वही इंसान, वही मुहब्बत-भरा दिल. हिंदुस्तानी आवाम को देखकर मेरे दिल में प्यार की जैसी लहर उठती है. वैसा ही यहां भी हो रहा है. सारी दुनिया मेरी है; मैं केवल उसका सेवक हूं. मैं ‘जय जगत’ कहता हूं, जिसका मतलब है कि सारी दुनिया एक है. सारे इंसान एक हैं.’

     जो लोग यह सोच रहे थे कि विनोबा की पाकिस्तान यात्रा साधारण ही रहेगी, भारत विरोध की राजनीति करने वाले पाकिस्तानी राजनीतिज्ञों की भांति वहां की जनता भी कूटनीति की भाषा बोलेगी; और हिंदू विनोबा पाकिस्तान की मुस्लिम बहुल जनता के बीच उपेक्षित होकर रह जाएंगे—वे पूरी तरह गलत सिद्ध हुए. जिस रास्ते से वे गुजरते वहां की जनता विनोबा के दर्शनों को उमड़ पड़ती. लोग पैदल, गाड़ियों पर चलकर उनके दर्शनों को खिंचे चले आते. विनोबा जहां से भी गुजरते, पाकिस्तानी सरकार का धन्यवाद देने से न चूकते. फिर भी विनोबा से तेज उनकी कीर्ति पाकिस्तान की यात्रा पर थी. लोग कहते, ‘हिंदुस्तान से एक फकीर आया है. वह पैदल चलता है. दान में जमीन और गांव मांगता है. अपने लिए नहीं, गरीबों के लिए. हिंदुस्तान में लाखों गरीबों का भला उसने किया है. अब पाकिस्तान के लोगों की बारी है. हिंदुस्तान के दूसरे सूबे में जाने के लिए पाकिस्तानी सरकार ने रास्ता दिया है. जिधर से वह फकीर गुजरेगा, उस इलाके के गरीबों की किस्मत संवर जाएगी.

     लोगों को संबोधन के दौरान विनोबा कुरआन से संदर्भ लेते. स्थानीय सांस्कृतिक प्रतीकों को भी अपने प्रवचन का विषय बनाते. पाकिस्तान यात्रा में पहला पड़ाव भरूंगामारी गांव बना. साथ चल रहे कार्यकर्ताओं ने पड़ाव के बारे में पहले ही घोषित कर दिया था. इसलिए विनोबा के पहुंचने से पहले ही हजारों की तादाद में दर्शानार्थी वहां जमा थे. विनोबा के आने की सूचना बिना पंखों के, मानो हवा पर सवार होकर गांव-गांव फैल जाती थी. विनोबा के साथ चलने वाले बहुत से कार्यकर्ता पाकिस्तान यात्रा के दौरान भी उनके साथ थे. उन्हें लग ही नहीं रहा था कि वे किसी बाहरी मुल्क में हैं. पाकिस्तान में हैं.

     भारत की भांति भरूंगामारी में भी सर्वधर्म प्रार्थना सभा हुई. पाकिस्तान में यह शायद पहला अवसर रहा हो, जब हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई एक साथ प्रार्थना में सम्मिलित हुई. स्थानीय नागरिक द्वारा कुरआन पाठ कराया गया. प्रार्थना सभा के बाद विनोबा फिर अपने रंग में आ गए. उन्होंने पाक्स्तिानी नागरिकों को संबोधित करते हुए कहा कि उन्हें यह हरगिज नहीं लगा रहा है कि वे किसी दूसरे देश में हैं. उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान की तरह पाक्स्तिान में भी गरीबी है. बेरोजगारी और विषमता है. गरीबों के कल्याण के लिए गरीबी को मिटाना होगा. कैसे मिटाना होगा, इसके लिए विचार करना है. गरीबी हिंदुस्तान में है. गरीबी पाकिस्तान में भी है. गरीबों की गरीबी मिटे, उनके दुःख दूर हों, उसके लिए सबको मिलकर प्रयास करने चाहिए. प्रयास कैसे होने चाहिए इस पर भी उन्होंने बताया, बोले—

     ‘भाइयो, आपने मुझे खिलाया-पिलाया. इस फकीर को अपना प्यार दिया. मगर गांव के गरीबों को कौन खिलाएगा-पिलाएगा. कौन उन्हें प्यार देगा. कौन उनके सुख-दुःख का इंतजाम करेगा.’

     लोग चुप हो गए. सभा में सन्नाटा व्याप गया. भारत में विनोबा के कारनामे के बारे में वे लोग सुन चुके थे. गरीब लोगों के दिल धड़क रहे थे. भारत में तो इस फकीर के आवाह्न पर दानदाताओं की कतार लग जाती है. पाकिस्तान में कौन आएगा. कुछ देर सन्नाटा भांय-भांय करता रहा. विनोबा अपने आसन पर शांतचित्त बैठे रहे. थोड़ी देर बाद एक व्यक्ति खड़ा हुआ. चेहरे पर नूरानी चमक और विश्वास लिए हुए. मानो भीतर से कोई दिव्य प्रेरणा उभर रही हो. विनोबा को संबोधित कर उसने कहा—

     ‘बाबा, मेरे पास कुल चार एकड़ जमीन है. मेरा परिवार बड़ा है. घर में कई खाने वाले हैं. फिर भी एक बीघा जमीन तो मैं दे ही सकता हूं.’

     साथ चल करे कार्यकर्ताओं ने दानपत्र उसकी ओर बढ़ा दिया. दानपत्र पर हस्ताक्षर करते समय उस व्यक्ति की अंतश्चेतना एक बार पुनः प्रबल हो उठी. वहां मौजूद एक-एक व्यक्ति को चमत्कृत करते हुए उस आदमी ने कहा,

     ‘एक बीघा से उस गरीब का गुजारा कैसे चलेगा. एक एकड़ ही लिख लीजिए. रजिस्ट्री कराने का खर्च भी मैं ही दे दूंगा.’

     उस व्यक्ति का नाम था अब्दुल खालिफ मुंशी. उसकी खुद की आर्थिक हालत भी बहुत टिकाऊ न थी. लोगों की आंखें झरझरा उठीं. खुद विनोबा भी भावविह्वल हो उठे. पाकिस्तान के उस रामचंद्र रेड्डी के कंधे पर हाथ रखकर बोले, ‘मैं आपके लिए ईश्वर से प्रार्थना करूंगा.’

     भारत में विनोबा की यात्रा का प्रबंध कार्यकर्ता और स्थानीय निवासी करते थे. पाकिस्तान में वे सरकारी अतिथि थे. इसलिए नियमानुसार पुलिस उनके साथ रहती. भरूंगामारी में पुलिस के सिपाही भी विनोबा का चमत्कार देखकर दंग थे. जिस जमीन के एक-एक अंश के लिए लोग अपनों की लाशें बिछा देते हैं. झूठ बोलते हैं. पाप करते हैं. बेईमानी से दूसरे का हिस्सा दबा जाते हैं. वही जमीन एक आदमी अपनी मर्जी से खुशी-खुशी दूसरों के नाम लिख रहा था. अब्दुल खालिफ मुंशी….पाकिस्तान का रामचंद्र रेड्डी. पाकिस्तान का भरूंगामारी गांव, भूदान की पहल का साक्षी, भारत का पोचनपल्ली बन बन गया. भारत के रामचंद्र रेड्डी तो बड़े जमींदार थे. पर अब्दुल खालिफ तो मात्र चार एकड़ जमीन का मालिक ठहरा. उसपर उसका बड़ा परिवार. दानपात्र पर दस्तखत होते ही लोग भारत और पाकिस्तान की जय के नारे लगाने लगे. विनोबा ने उन्हें समझाया कि इंसानियत को देशों की सीमाओं में मत बांधिए. ‘जय जगत’ बोलिए. पाकिस्तान यात्रा के दौरान पहले दो दिन तो दर्शानार्थी भारत और पाकिस्तान की जीत के नारे लगाते रहे. फिर वे नारे ‘जय-जगत’ में बदल गए. लोगों ने मनुष्यता का एक नया पाठ पढ़ा. ‘वसुधैव कुटंुबकम्’ की औपनिषदिक् भावना साकार होने लगी.

     यात्रा आगे बढ़ गई. पूरे जोश और हुजूम के साथ. रास्ते में विनोबा से तरह-तरह सवाल करते. विनोबा भी खुले मन से उनका जवाब देते. दूर-दूर से उनसे मिलने के लिए लोग आते. अगले पड़ाव में वे अपने कारवां के साथ पगलागीर गांव पहुंचे. लोग पहले की तरह वहां उपस्थित थे. छोटे-से गांव में दूर-दूर से चलकर आए लोग. उन्हीं लोगों में एक सुदर्शन युवक भी था. हाथ में कैमरा लिए हुए. स्थानीय नागरिकों में से कई उसको पहचानते थे. वह एक अभिनेता था, जो विनोबा से मिलने के लिए ढाका से चलकर पहुंचा था.उस युवक ने तीन एकड़ जमीन का दानपत्र लिखा. और विनोबा को नमन कर वापस लौट गया. खुद को अभिनेता बताते हुए उसने कहा कि बाबा के दर्शनों के लिए दूर ढाका से चलकर आया हूं.

     विनोबा के लिए यह क्षण नया नहीं था. पहले भी ऐसे अवसर आए थे जब लोग उनके प्रति अपनी श्रद्धा का प्रदर्शन करने दूर-दराज से चलकर उनसे मिलने पहुंचते थे. पर पराए देश में. ऐसे देश में जो भारत को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता आया हो, जहां के नागरिकों के दिलों में विभाजन की त्रासदी अभी भी जिंदा हो, वहां के लोगों का इतना प्यार देखकर विनोबा का दिल भी पिघलने लगा. इसमें कोई अनूठी बात भी नहीं थी. दूसरों के कल्याण के लिए अपना जीवन जीने वालों, निष्प्रह और अपरिग्रही लोगों का जनता इसी तरह खुले दिल से स्वागत करती रही है. पगलागीर में पांच दानदाताओं ने भूदानपत्र विनोबा को सौंपे. मगर एक व्यक्ति का दान वहां मौजूद सभी को भावाकुल कर गया.

     नंगे पांग गांव-गांव जाकर दूसरों के लिए जमीन मांगने वाले विनोबा की ख्याति सुनकर उनके दर्शनों की साध ले एक गरीब लड़का सभा में पहुंचा. उसके तन पर साधारण कपड़े थे. विनोबा के पास पहुंचकर उस लड़के ने जेब में हाथ डाला. कुछ रुपये बाहर निकाले और विनोबा की ओर बढ़ाते हुए बोला—

     ‘बाबा, मुझ गरीब के पास जमीन नहीं है. दान देने के लिए कोई बड़ी संपत्ति भी नहीं. चना-चबैना बेचता हूं. बड़े प्रयत्न से चना-चबैना बेचकर पांच रुपए जमा किए हैं. आप इन्हें स्वीकार कर लेंगे तो मेरी यात्रा सफल हो जाएगी.’

     विनोबा ने रुपए ले लिए. दानपत्र लिख दिया गया. लड़के के कंधे पर हाथ रख प्यार और आशीर्वाद देते हुए विनोबा बोले—

     ‘तुम्हारा दान किसी भू-स्वामी से कम नहीं है. मैं इसका मोल नहीं चुका सकता. अल्लाह तुम्हें बरकत दे. वही तुम्हारे दान कर हिसाब रखेगा.’

     पगलागीर से यात्रा-दल आगे बढ़ गया. रास्ते में नए लोग मिले. भजन-कीर्तन के साथ-साथ विचार-विमर्श चलता रहा. लोग विनोबा से भारत और पाकिस्तान के बीच व्याप्त तनाव पर बात करना चाहते. पूर्वी पाकिस्तान के लिए बृह्मपुत्र नदी की बाढ़ एक समस्या थी. नदी जब उफनती तो आसपास के इलाके को अपने आगोश में ले लेती. फसलें तबाह हो जातीं. घर-झोपड़ियां और मवेशी बह जाते. बाढ़ के बाद बीमारियों का दौर चलता. हैजा, खांसी, बुखार और दूसरी जानलेवा बीमारियों से जनजीवन त्रस्त हो उठता. किसी ने विनोबा से प्रश्न किया, इस बाढ़ का कोई समाधान बताइए बाबा. विनोबा तो संगठन और समन्वय के पक्षधर थे. बोले—

     ‘भारत और पाकिस्तान दोनों देशों को इसके लिए मिलकर काम करना होगा.’

     ‘क्या दोनों देश इस मुद्दे पर एक साथ होंगे?’

     पता चला कि सरकारें राजनीति करती हैं. वे लोककल्याण के किसी मुद्दे पर शायद ही एक मंच पर आएं. लेकिन आवाम के लिए उसकी समस्याएं प्रमुख हैं. उसके लिए राजनीतिक दांव-पेंच से अधिक रोजमर्रा की मुश्किलों से निजात पाना है. ये समस्याएं दोनों तरफ लगभग एक जैसी हैं. विनोबा अपनी यात्रा को राजनीतिक होने से बचाए रखना चाहते थे. उन्होंने लोगों से मिल-जुलकर रहने और संबंधों में राजनीति को न लाने की अपील की.

     भूदान यात्रा के दौरान ही विनोबा को पदयात्रा का महत्त्च समझ में आया. उन्हें समझ आया कि समाज में अच्छे लोगों की बहुतायत है. जरूरत उन्हें अपनी सचाई का भरोसा दिलाने, अपने आचरण द्वारा उनकी अच्छाइयों को सामने लाने की है. अपने इसी विश्वास की खातिर वे लगातार तेरह वर्ष तक पदयात्रा करते रहे. 12 सितंबर, 1951 को पवनार आश्रम से शुरू हुई उनकी यात्रा लगभग 13 वर्ष पश्चात 10 अप्रैल, 1964 को वहीं पहुंचकर संपन्न हुई. इस बीच उन्होंने पूरे देश की पदयात्रा की. हजारों किलोमीटर पैदल चले.     विनोबा की पदयात्राओं से पूरे देश में एक नैतिक वातावरण बना था. इसलिए उसका उपयोग देश की अन्य जटिल समस्याओं के निदान के लिए करने का विचार भी बना. चंबल की तलहटी में बसे गांववालों ने विनोबा के आगे जाकर गुहार की. बाबा, हमारे पास थोड़ी-बहुत जमीन भी है. लेकिन डाकू हैं कि खेती ही नहीं करने देते. वे हमारी सारी कमाई लूट ले जाते हैं. ना करो तो गोली मार देते हैं. हमारे बच्चों का अपहरण करके ले जाते हैं. और नहीं तो खड़ी फसल को ही आग लगा देते हैं.

     कानून की नजर में डाकू अपराधी थे. इसलिए उसने अपने सिपाही और सैनिक डाकुओं की खोज में छोड़ रखे थे. कभी आमना-सामना हो जाता, तो कभी डाकू चकमा देकर निकल जाते. आमने-सामने की लड़ाई कभी सिपाही दो-चार डाकुओं की लाश बिछाने में कामयाब भी हो जाते. कभी इसका उल्टा भी हो जाता. डाकुओं की लाशें बिछतीं तो सरकार और कानून अपनी पीठ थपथपाते. सिपाहियों की मौत पर डाकु समस्या पर चर्चाएं आम हो जातीं. इस बीच खबर मिलती कि घाटी में उससे कहीं ज्यादा नए डाकू बढ़ चुके हैं. कानून मन मसोसता. उनसे निपटने के नाम पर कुछ सिपाही तथा सैनिक भेजता. नए-नए चक्रव्यूह डाकुओं को फंसाने के लिए बनाए जाते. मगर समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती.

     विनोबा सोचते कि समस्या सिर्फ लूट-खसोट की नहीं है. कहीं न कहीं वह संपत्ति और संसाधनों के असमान बंटवारे से जुड़ी है. डाकू भी आखिर इंसान हैं. जब तक आसानी से खाने को मिलेगा, तब तक कोई बीहड़ का रास्ता क्यों चुनेगा. वह कहते थे कि दोष डाकुओं का नहीं, उस बंदूक का है, जो उन्हें हिंसा की ओर ले जाती है. मई 1960 में चंबल के बीहड़ों में ही विनोबा को आशातीत सफलता प्राप्त हुई थी. अनेक खूंखार डाकू जो वर्षों से पुलिस और प्रशासन को छकाते आ रहे थे, उन्होंने विनोबा के आगे अपने हथियार डाल दिए थे. उनमें एक खूंखार डाकू लालमन भी था.

     7 जून 1966 को विनोबा को गांधी से मिले पूरे पचास वर्ष बीत चुके थे. इस बीच गांधी जी के आदर्शों को उन्होंने संभवतः गांधी जी से भी अधिक पवित्रता के साथ जिया था. लेकिन अब उन्हें लगने लगा था कि बाहरी यात्रा का दौर पूरा हो चुका है. अब उन्हें अपने भीतर की यात्रा करनी होगी. भारत-भर का भ्रमण करने के बाद 2 नबंवर 1969 को अपने आश्रम पवनार में लौट आए. और यह तय कर लिया कि अब वे एक स्थान पर टिके रहकर अध्यात्म चिंतन करेंगे. 25 दिसंबर 1974 को उन्होंने अपना मौनव्रत आरंभ कर दिया. 1976 में उन्होंने गौकशी के विरोध में अनशन आरंभ किया.

     भूदान ऐसा आंदोलन था जिसे पश्चिम में संभवतः गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन से भी अधिक सराहना मिली. अमेरिका के लुइस फिश्चर ने लिखा—

     ‘ग्रामदान हाल के दौर में पूर्व की ओर से आने वाला सबसे रचनात्मक विचार है.’

     अल्फ्रेड टेनीसन के पोते हेलम टेनीसन ने विनोबा के साथ कई वर्षों तक पदयात्रा की थी. भूदान से जुडे़ अपने अनुभवों को उसने एक पुस्तक की शक्ल में दी, जिसका शीर्षक ह—‘पदयात्रा पर संत(The Saint on the march) भारत में अमेरिकी राजदूत चेस्टर बाउल ने अपनी पुस्तक ‘शांति के सोपान’ (The dimensions of peace) में भूदान के बारे में अपने अनुभवों का उल्लेख करते हुए लिखा कि हमने पाया कि 1955 में भूदान आंदोलन भारत-भर में परिवर्तनकारी संदेश दे रहा था. उसने साम्यवाद के विरुद्ध एक क्रांतिकारी विचार बनकर सामने आया, जिसने मानवीय आत्मसम्मान और अस्मिता को नए सिरे से स्थापित किया.

     भूदान ने न केवल भारत में बल्कि दुनिया के उद्योगपतियों पर भी अपना प्रभाव छोड़ा. ब्रिटिश उद्योगपति अर्नेस्ट बार्डर ने भूदान आंदोलन की सफलता से प्रेरित-प्रभावित होकर अपनी कंपनी के 90 प्रतिशत शेयर कंपनी के कर्मचारियों में बांट दिए. एक आंदोलन के रूप में भूदान को खूब सराहना मिली. उसको परिवर्तनकामी आंदोलन माना गया. हालांकि कुछ विद्वानों ने उसकी जमकर आलोचना भी की. जितने दिन आंदोलन चला उतने दिन संयुक्त राष्ट्र के समाचारपत्र आंदोलन की खबरों से भरे रहते थे. न्यूयार्क टाइम्स, दि नयू यार्कर जैसे अखबारों में आंदोलन को लेकर नित्यप्रति कुछ न कुछ प्रकाशित होता था. सुप्रसिद्ध ‘टाइम’ पत्रिका ने विनोबा का चित्र अपने मुख्य पृष्ठ पर छापकर उनके प्रति अपने सम्मान का प्रदर्शन एवं भूदान को अपनी नमन प्रस्तुत किया था.

     भूदान के दौरान देश भर में कुल 41,94,270 एकड़ जमीन प्राप्त हुई. विड़ंबना देखिए कि 1975 तक सरकार उस जमीन में से केवल 12,85,738 एकड़ ही भूमिहीनों को बांट पाई थी. 18,57,398 एकड़ जमीन को बंटवारे के अयोग्य पाया गया. ब्रिटेन का डोनाल्ड गू्रम सर्वोदय कार्यकर्ताओं के साथ पूरे छह महीने साथ रहा और इस अवधि में उसने 2200 किलोमीटर से अधिक की पदयात्रा की. आर्थर कोस्टलर ने 1959 में लंदन आबजर्बर में लिखा कि भूदान आंदोलन ने नेहरू के प्रश्चिम से प्रेरित विकास के मा॓डल का सार्थक स्वदेशी विकल्प दुनिया के सामने रखा. जितने दिन भूदान आंदोलन चला, अमेरिकी अखबार उसके समाचारों से भरे रहते थे. न्यूयार्क टाइम्स और न्यूयार्क जैसे प्रतिष्ठित समाचारपत्रों ने विनोबा पर कई लेख प्रकाशित किए.

    अगर हम गांधी के जीवन को देखें तो उसमें हमें कई विचलन दिखाई पड़ेंगे. बचपन में चोरी करने से लेकर अपने सेक्स के विवादित प्रयोगों तक. वहां गाधीं का महात्मापन कई बार हमें चैंकाता है तो अनेक बार हमारे मन में क्षोभ और जुगुप्सा का संसार करता है. इसके विपरीत विनोबा का जीवन एक संत का कल्याणकामी जीवन है. संभव है बचपन की कुछ स्वाभाविक गलतियां विनोबा ने भी की हों. और उन्हें गांधी जी की तरह सार्वजनिक करने का साहस उनमें न रहा हो. तो भी यह सत्य है कि आरंभ से ही संन्यास उन्हें आकर्षित करता रहा था. मां की आध्यात्मिक शिक्षा उन्हें इस संसार की मोह-माया से निर्लिप्त रखती रही. इसलिए किशोर विनोबा अपने सारे प्रमाणपत्र आग के हवाले कर देते हैं. उस समय तक उन्होंने गांधी जी का नाम भी नहीं सुना था. बस एक ही साध थी, हिमालय में जाकर तापसी जीवन जीने की. तुकाराम, शंकराचार्य और समर्थ गुरु रामदास उनके आदर्श थे. इस चाहत को मां रुक्मिणी बाई यह कहकर कि ‘अगर मैं पुरुष होती तो बताती कि संन्यास क्या होता है, और भी हवा देती रहीं. मां ने उन्हें संन्यास की ओर ले जाने की मदद की. उन्हें अपरिग्रही, और आत्मसंतोषी जीव बनाया तो गांधी जी ने उन्हें कर्मयोग से जोड़ा. विनोबा के जीवन में मां रुक्मिणी बाई और गांधी दोनों में से किसका योगदान अधिक है, यह कह पाना कठिन है. इतना अवश्य कहा जा सकता है कि उनके जीवन और आचरण में गीता जैसी विविधता है. उसमें भक्ति है और ज्ञानयोग भी कर्मयोग है और चरैवेति-चरैवेति की भावना भी.

     बचपन में मां रुक्मिणी बाई विनोबा को यदि संन्यास की ओर न ले जातीं तो उनका नैतिक आभामंडल शायद उतना ऊंचा न उठता. ऐसे में भूदान जैसे आंदोलन की सफलता संद्धिग्ध ही थी. गांधी जी जब आवाहन करते थे तो स्त्रियां अपने घरों से निकल आती थीं. अपने कीमती गहने और वस्त्राभूषण दान कर देती थीं. विनोबा जब आवाह्न करते हैं तो किसान जमींदार और सामंत जो उससे पहले जमीन के लिए खून-खराबा और मारकाट करते आए थे, जिसके एक कूंड के लिए गांवों में लाशें बिछ जाया करती थीं, वे उस जमीन को खुशी-खुशी दान कर देते हैं, ताकि वह गांव के ही भूमिहीनों के पेट भरने के काम आ सके.

     उल्लेखनीय है कि भूदान की संकल्पना का जन्म गांधी जी की मृत्यु के लगभग तीन वर्ष बाद हुआ था. स्वयं विनोबा भी कहां सोचते थे कि जिस जमीन के लिए महाभारत हुआ, लोग आपस में लड़-मर जाया करते हैं, उससे इतनी आसानी से अधिकार छोड़ने को राजी हो जाएंगे. निश्चितरूप से इसके पीछे रूस और  चीन की क्रांतियों का भी हाथ था. जहां आंदोलनकारियों ने आततायी जमींदारों को विषैली गैसों के चेंबर में बंदकर मौत की सजा दी थी. उनपर तेलगांना के कम्युनिस्टों का भी दबाव था, जिन्होंने अपने अधिकारों और न्याय के लिए संघर्ष की राह चुनी थी. इससे जागीरदारों और सामंतों को लगने लगा था कि यदि उन्होंने गरीबों को खुशी-खुशी उनका हक नहीं दिया तो भारत में भी हिंसक क्रांति होने से वे रोक नहीं पाएंगे. यह उन्होंने तेलगांना में देखा था. बंगाल में भी ऐसी ही परिस्थितियां बन रही थीं. बाद में किसी किसान ने जो भूदान करने के बाद टिप्पणी भी की थी कि विनोबा ने हमें उग्र कम्युनिस्टों के कोप से बचाया है. वरना हमारा हाल भी चीन और रूस के किसानों जैसा हुआ होता.

     विनोबा के भूदान को विश्वव्यापी ख्याति मिली. राजनीतिक कारणों से यूरोपीय इतिहासकार और विद्वान गांधी जी के आंदोलन और उनके सत्याग्रह पर उतना सकारात्मक नहीं लिख पाए थे, जितना अपेक्षित और न्यायसंगत था. मगर विनोबा के भूदान पर उन्होंने खूब लिखा. कई विदेशी पत्रकार वर्षों तक विनोबा की भूदान यात्रा में उनके साथ रहे और उसके सकारात्मक प्रभाव को दुनिया के सामने लाते रहे. 1951 में विनोबा ने शिवराम पल्ली जाने के लिए पवनार छोड़ा था. उसके बाद वे 1964 तक भूदान के काम से बाहर ही रहे. इन तेरह वर्षों में उन्हें दान-स्वरूप चालीस लाख एकड़ से अधिक भूमि दान में प्राप्त हुई. अपने अंतिम वर्षों में भूदान का प्रभाव वह नहीं रह गया था जो उसके आरंभिक वर्षों में था. आंदोलन की असफलता में उन अवसरवादी लोगों का भी हाथ था जो विशुद्ध राजनीतिक महत्त्चाकांक्षाओं के कारण विनोबा के साथ जुड़े थे. फिर भी भूदान की उपलब्धियां अतुलनीय थीं. वह एक सच्चा परिवर्तनकामी आंदोलन था.

     प्रश्न उठता है कि इतनी अप्रतिम कामयाबी के बावजूद भूदान को क्यों भुला दिया गया? उनके विरोधी उनपर कांग्रेस सरकार और इंदिरागांधी के अंर्धसमर्थक होने का आरोप लगाते हैं. विनोबा ने आपातकाल का समर्थन ‘अनुशासन पर्व’ कहकर किया था, जो उनके विरोधियों को बुरा लगा. बल्कि इससे जयप्रकाश नारायण जैसे उनके समर्थक भी विनोबा से परे छिटक गए. लेकिन सत्ता में आने के बाद जनता पार्टी और उसके नेताओं जो धत्कर्म किया, उसके छोटे-से कार्यकाल में जैसी अराजकता पनपी, और उसके बाद लोगों में जो गुस्सा और असंतोष फैला, जिससे इंदिरा गांधी की सत्ता वापसी संभव हुई—उसे देखकर तो लगता है कि विनोबा ने गलत नहीं कहा था. वे जनता पार्टी तथा उसके नेताओं के अवसरवादी चरित्र को समझते थे. इसलिए उन्होंने आपातकाल को अनुशासन पर्व समझने-कहने की भूल कर बैठे थे. यहां उल्लेखनीय है कि विनोबा कोई राजनीतिक जीव नहीं थे. होते तो अपने वक्तव्य को घुमा-फिराकर ऐसा मोड़ दे सकते थे, जिससे की दोनों अर्थ निकाले जा सकें. परंतु विनोबा ने न तो कभी अपने तर्क का खंडन किया न कभी पछतावा व्यक्त किया. बल्कि बाद में उनका मौन और गहरा गया, जो आगे उनकी मृत्यु तक बना रहा.

     1965 में उड़ीसा में बाढ़ आई हुई थी. जुलाई-अगस्त 1965 में मूर डिक्सन ने उड़ीसा के गांवों का निरीक्षण किया. उससे पहले के वर्षों में मानसून असफल होने के कारण उड़ीसा समेत पूर्वी भारत के कई हिस्सों में अकाल जैसी स्थिति बन चुकी थी. स्थानीय नागरिकों की याद में उससे ठीक एक शताब्दी पहले का वह भीषण अकाल पसारा हुआ था, जिसने कुछ ही वर्षों में उड़ीसा और आसपास के इलाकों की लगभग एक-चैथाई आबादी को अपना शिकार बनाया था. इस बार भी पहले सूखे 1965 में भी सूखे के हालात लगभग वैसे ही थे. कई जिलों की जमीन सूखे के कारण पड़ा चुकी थी. हालांकि अब हिंदुस्तान आजाद था और सरकार तथा स्वयंसेवी संगठन बचाव कार्य में जी-जान से जुटे हुए थे. हालांकि सरकार ने हालात की गंभीरता का अनुमान देरी से लगाया था. तब तक सूखे और कुपोषण के कारण सैकड़ों जाने जा चुकी थीं. सरकार उसको अकाल घोषित करने से बच रही थी. दूसरी ओर विदेशी अखबार बार-बार अकाल की चेतावनी दे रहे थे. उसी दौर में मूरे डिक्सन ने उड़ीसा के गांवों में सूखे और राहत कार्यों की स्थिति का जायजा लेने के लिए जुलाई 1966 में वहां का निरीक्षण किया था.

     उस समय तक राहत कार्यों को शुरू हुए कुछ महीने बीत चुके थे. लोगों को भोजन के साथ-साथ मुफ्त दवाइयां भी उपलब्ध कराई जा रही थीं. अंतरराष्ट्रीय संस्था रेडक्रास उन गरीब बच्चों की देखभाल में लगी थी, जिनकी माताएं कुपोषण के चलते उन्हें स्तनपान कराने में असमर्थ थीं. निरीक्षण के दौरान मूर ने पाया कि एक गांव ऐसा था, जहां प्राकृतिक सूखे के बावजूद लोगों के जीवन पर उसका बहुत कम प्रभाव हुआ था. हालांकि वहां के नागरिकों ने सूखे के प्रकोप को उतनी ही बुरी तरह झेला था, जैसा कि आसपास के ग्रामवासियों ने. बावजूद इसके वे उसकी विभीषिका से खुद को बचाए हुए थे. अपने इस अनुभव का डिक्सन ने बड़ा ही मर्मस्पर्शी वर्णन किया है, अपनी पुस्तक COMMUNITY DEVELOPMENT AND THE GRAMDAN MOVMENT IN INDIA  में वे लिखते हैं—

     ‘सूखाग्रस्त क्षेत्र की अपनी यात्रा के दौरान में एक ऐसे गांव में पहुंचा जहां किसी प्रकार के राहत कार्य की आवश्यकता नहीं थी. यद्यपि वहां के निवासी सूखे के भयावह दौर से गुजर चुके थे. लेकिन उन्होंने बिना किसी बाहरी मदद के उसका सफलतापूर्वक सामना किया था. उनपर आसपास के गांवों की अपेक्षा सूखे का कम असर था. उनकी यह उपलब्धि सराहनीय थी. मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने अपने बचाव के लिए क्या किया? उसके जवाब में गांव के प्रमुख व्यक्तियों ने जो कहा, उसको मेरे साथ चल रहे अनुवादकों के माध्यम से मैंने सुना, ‘हमारा गांव ग्रामदान गांव है. इसलिए हम अपनी समस्याओं का निवारण ग्राम परिषद में आपसी विचार-विमर्श के द्वारा करने में विश्वास रखते हैं. हम मिल-बांटकर खाने में विश्वास रखते हैं. हमारा प्रयास रहता है कि अपने गांव को अधिकतम की सीमा तक आत्मनिर्भर बनाएं. इसलिए पिछले वर्ष जब मानसून की उदासीनता के चलते यह स्पष्ट हो चला था कि आने वाले महीने भारी सूखे के होंगे. खेत खाली रह जाएंगे, तब ग्राम-परिषद ने आपसी परामर्श से आने वाली परिस्थितियों का सामना करने के लिए योजनाएं बनाना आरंभ कर दिया था. ग्राम-परिषद में विचार-विमर्श के दौरान अनेक व्यक्तियों ने बड़े उपयोगी सुझाव दिए. जैसे कि कुछ आदमी यह बताने में निपुण थे कि आने वाले दिनों में कौन-कौन से काम कर सकते हैं. उसी दौरान एक आदमी ने परिषद को बताया कि वह अभी भी अपनी परंपरा का पालन करते हुए घर में एक वर्ष का अनाज आरक्षित रखता है. उसने खुशी-खुशी सुझाव दिया कि सुरक्षित अनाज को वह गांव वालों के साथ मिल-बांट सकता है. उस व्यक्ति की बात का असर हुआ. इससे दूसरे व्यक्ति भी उन वस्तुओं का साझा करने को तैयार हो गए, जिसका दूसरे व्यक्तियों के पास अभाव था. अंततः हमने एक योजना बनाई. पूरे गांव के लिए लिए एक कार्यनिर्देशिका. उस योजना से हमें अपने गांव के सर्वांगीण विकास हेतुु, उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए योजना बनाने में मदद की. ध्यान यह रखा गया कि गांव का एक भी व्यक्ति भूख से त्रस्त न हो.

     हमारे द्वारा ग्रामदान का संकल्प लिए जाने से पहले सूखे की आपदा गांव के हर किसान के लिए उसकी निजी समस्या होती थी. जिसका सामना कुछ परिवार तो बहुत आसानी से कर लेते थे. जबकि कुछ इससे तबाह हो जाते थे. ग्रामदान ने हमें मिल-जुलकर करना सिखाया, हमें यह भी सिखाया कि हम कैसे दूसरों के सुख-दुःख में साथ दें, कैसे उनके हितों की सुरक्षा करें.’

     गांधी जी अस्प्रश्यता विरोधी आंदोलन के माध्यम से हरिजनों को कांग्रेस से जोड़ा था. सत्याग्रह को एक आंदोलन से अधिक विचार की मान्यता प्राप्त थी. बाद में यही काम विनोबा ने भूदान आंदोलन का विकल्प देश को दिया और उसके माध्यम से लाखों-करोड़ों दलितों, गरीब लोगों को कांग्रेस से जोड़कर किया. उन्हीं के दम पर कांग्रेस 25 वर्षों तक निष्कंट राज करती रही. इन आंदोलनों को मिली अप्रत्याशित कामयाबी के पीछे भी यही तथ्य था कि जनता उन्हें विचार के रूप में स्वीकार चुकी थी. 1951 से पहले विनोबा का जीवन आध्यात्मिक कार्यकर्ता का रहा. गांधी जी के अनुशासित शिष्य के रूप में उन्होंने सत्याग्रह आंदोलन में भी हिस्सा लिया. भूदान की कोई रूपरेखा उस समय तक विनोबा के मन में न थी. भूदान आंदोलन का रास्ता दिखाने वाला तो किसान रामचंद्र रेड्डी था. संभव है कि भूदान के समय कम्युनिस्टों का डर भी उसकी प्रेरणा रहा हो. मगर उससे जो राह प्रशस्त हुई उसने देश में भू-वितरण संबंधी असमानताओं, ग्रामीण जीवन की विसंगतियों और संसाधनों के असमान वितरण से उत्पन्न समस्याओं के निदान का एक सार्थक रास्ता देश दुनिया को दिखा दिया. जनता पार्टी के शासनकाल के दौरान जो जो लोग विनोबा का विरोध कर रहे थे, वे दरअसल उस विचार की आलोचना कर रहे थे, जो समानतावादी, समताधारी दृष्टिकोण से प्रेरित हो सकता था.

     एक वक्तव्य के दौरान विनोबा को सरकारी संत की उपाधि दी गई. पूछा जा सकता है कि आपातकाल को अनुशासन पर्व कहना क्या इतनी बड़ी भूल थी कि इसके लिए उनके भूदान जैसे आंदोलन को भुला दिया जाए. उल्लेखनीय है कि भूदान ने गांधीवादी विचारधारा के समर्थक राजनीतिक सामाजिक-कार्यकर्ताओं की एक पूरी पीढ़ी तैयार की थी, जिसने आगे चलकर कांगेस सरकार को जीवनदान दिया. मौन के बावजूद विनोबा के जीवन के अंतिम वर्ष सक्रियता से भरपूर थे. उन्होंने स्त्री शक्ति के उत्थान, स्त्रीवादी विमर्श को आगे ले जाने के लिए भी समय-समय पर आंदोलन किए. भारत की तीन-चैथाई आबादी कृषि पर निर्भर है और कृषि बैल पर. ग्रामीण जीवन में कृषि का महत्त्व पहचानते हुए विनोबा ने गौकशी के विरुद्ध आंदोलन भी छेड़ा. हालांकि उसके लिए भी उन्हें काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. जयप्रकाश नारायण ने भूदान आंदोदन के लिए अपना सर्वस्व दान करने का संकल्प लिया था, बिहार में आंदोलन को सफल बनाने के लिए उन्होंने विनोबा के साथ पदयात्राएं भी कीं. पर इससे राजनीति ही अधिक पनपी.

     सत्तर के दशक के मध्य में विनोबा ‘सर्व सेवा संघ’ में अलग-थलग पड़ने लगे थे. इंदिरा गांधी द्वारा थोपे गए आपातकाल के विरोध में जयप्रकाश नारायण ने भूदान के बजाय अपना लक्ष्य कांग्रेस की नेता इंदिरा गांधी को हटाने का बना लिया और वे अपने एकसूत्री कार्यक्रम के प्रति समर्पित हो गए. क्या यह काम भूदान आंदोलन जितना ही महत्त्वपूर्ण था? इस बात पर बहस हो सकती थी. मगर इसने चतुराई पूर्वक, आपातकाल के बहाने से, सर्वोदय और भूदान के समानतावादी विचार को ही मीडिया से गायब कर दिया गया. यह सामाजिक परिवर्तन की जरूरत और भूदान जैसे परिवर्तनकारी आंदोलन को बहस से बाहर ले जाने के लिए रची गई साजिश थी. जिसके लिए आपातकाल को माध्यम बनाया गया था. 15 नबंवर 1982 को विनोबा ने अंतिम सांस ली. विनोबा को पेट के अल्सर की बीमारी वर्षों से थी. इस कारण वे अपना जीवन शहद और दही के सहारे बिताते आ रहे थे.

     अप्रैल 1951 का महीना परिवर्तनवादियों के लिए खास अविस्मरणीय है. विशेषकर उनके लिए जो आर्थिक-सामाजिक समानता का सपना देखते हैं. जिनके लिए मनुष्यमात्र में एकसमानता है. ध्यातव्य है कि उससे मात्र पंद्रह महीने पहले अर्थात 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू किया गया था. जिसके साथ देश को प्रभुसत्ता संपन्न गणराज्य घोषित किया गया था. संविधान के माध्यम से देश में समानता पर आधारित कानून-व्यवस्था लागू करने, आर्थिक-सामाजिक समानता के लिए निरंतर प्रयास करने की कसमें भारतीय कर्णधारों ने खाई थी. उससे ठीक तीन वर्ष पहले ही महात्मा गांधी का अवसान हुआ था. लेकिन भारतीय राजनीति पर उनके विचारों का असर था. नेहरू, पटेल, पंत समेत अनेक नेता जिन्होंने महात्मा गांधी के साथ स्वाधीनता आंदोलन में हिस्सा लिया था, उस समय भारतीय राजनीति में थे. हालांकि ऐसे भी अनेक नेता थे, जो महात्मा गांधी के आदर्शों को बिसराकर केवल निहित स्वार्थों के लिए ही काम कर रहे थे. फिर भी राजनीति पर गांधीजी के विचारों का असर था. हालांकि कुछ नेता यह मान चुके थे कि गांधीजी के विचारों को व्यावहारिकता के धरातल पर लोगों को लग रहा था, कि

     आजीवन राजनीति से दूर रहने वाले उस विनोबा भावे अंततः राजनीति के शिकार हुए थे. वर्तमान राजनीति की कमजोरी यह है कि वह हर विचार अथवा वस्तु को उसकी तात्कालिक उपयोगिता के आधार पर आंकती है. और जो विचार तात्कालिक नहीं है, जो दूरगामी प्रभाव देने वाला है, वह बहुउपयोगी होने के बावजूद नकार दिया जाता है. परिणामस्वरूप आमूल परिवर्तन हर बार आगे टलता जाता है. कहा जा सकता है कि स्वातंत्रयोत्तर भारत में जिन महापुरुषांे के आकलन में विद्वानों से चूक हुई उनमें विनोबा भावे भी हैं. वे राजनीति का शिकार हुए. विद्याधर सूरज नायपाल जैसे लेखक भी विनोबा के आलोचकों में से एक हैं. अनंत विजय ने अपने एक लेख में नायपाल के विनोबा संबंधी विचारों को प्रकट किया है. उन्हें पढ़कर हैरानी होती है कि कोई संवेदनशील लेखक भला ऐसी टिप्पणी कैसे कर सकता है. लेख में गांधी की आलोचना की गई है, लेकिन बख्शा विनोबा को भी नहीं गया है—

     ‘एक मूर्ख शख्स थे विनोबा भावे, जिन्होंने पचास के दशक में गांधी की नकल करने की कोशिश की. वे गांधी के विभिन्न आश्रमों में रहे थे. उन जगहों की बौद्धिक शिथिलता ने उनके दिमाग को मोथरा कर दिया था और ये उनकी आत्मा तक में प्रवेश कर गया था. वो रसोई में काम करते थे, पखाना भी साफ करते थे…इतनी देर तक चरखा चलाते थे कि गांधी भी उनके बारे में चिंतित रहने लगे थे….खुशी की बात ये है कि विनोबा को बाद में एक करियर मिल गया—एक सुधारक के रूप में नहीं, बुद्धिमान व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक तरह के धार्मिक मूर्ख के रूप में, जिनके साथ आला नेता फोटो खिंचवाना पसंद करते थे और आशीर्वाद के लिए लालायित रहते थे।’ (वक्त के साथ बूढ़े हो चले हैं ना॓यपा॓ल के विचार, अनंत विजय, आईबीएन खबर, सिंतबर 8, 2008).

     असल में यह ना॓यपा॓ल जैसे लेखकों की भड़ास है जो विनोबा और भूदान की वैचारिकी को न जानने के कारण जन्मी है. इस देश की विडंबना ही यही है कि यहां वास्तविक परिवर्तन को समर्पित जब भी कोई नई और कारगर व्यवस्था सामने आती है, यथास्थितिवादियों तथा उनके द्वारा खरीदे गए बुद्धिजीवियों की एक जमात उस आंदोलन को टालने, बदनाम करने की बार-बार कोशिश करती है. भूदान का आंदोलन विषमताकारी समाज में एक उम्मीद की तरह जन्मा था. यह उम्मीद आगे भी बनी रहे, इसकी आवश्यकता है, फिर चाहे ना॓यपा॓ल जैसे लेखक कुछ भी कहें. गांधी को इस देश के कुछ लोग राष्ट्रपिता कहते हैं. उन्हें आजादी का श्रेय दिया जाता है.

     इस देश को विनोबा का बहुत बड़ा, संभवतः गांधी से भी बड़ा योगदान होता, यदि भूदान आंदोलन पूरी तरह सफल हो गया होता. भूदान असल में उस सामाजिक स्वतंत्रता का पर्याय था, जिसका सपना ज्योतिबा फुले ने देखा था, जिसकी मांग डॉ. आंबेडकर कर रहे थे, जिसकी कामना ऋग्वेद में की गई है तथा जिसकी आवश्यकता इस देश के करोड़ों दलित, मजूदरों, गरीब किसानों, सर्वहारा श्रमिकों तथा आर्थिक-सामाजिक स्तर पर पिछड़े हुए लोगों को थी. कमी विनोबा की भी रही, उन्होंने स्वयं को कभी गांधी की छवि से बाहर लाने की कोशिश नहीं की. अगर वे ‘सर्वोदय’ के अपने चिंतन को ‘गांधीवाद’ के समानांतर खड़ा करने की कोशिश करते, अगर वे उसको समाजार्थिक आंदोलन की तरह प्रस्तुत करते तथा बार-बार धर्म का उल्लेख करने के बजाय उसे केवल नैतिकतावादी आंदोलन रहने देते तब शायद उसपर अधिक गंभीरता से बहस हो पाती. उसके परिणाम भी अधिक स्थायी और दूरगामी होते थे. तब उन्हें इस देश में स्वतंत्र विचारक की तरह याद किया जाता. भूदान असल में परिस्थितिजन्य आंदोलन था. दान में जमीन भी ली जा सकती है, इसकी उम्मीद विनोबा को भी न थी. पोचनपल्ली में जो हुआ, वह आकस्मिक घटना थी. हालांकि उसके बीजतत्व चीन, रूस में चल रहे समाजवादी आंदोलनों तथा तेलंगाना सहित देश के अन्य क्षेत्रों में चल रहे जनविद्रोह में छिपे थे.

     भूदान ने जहां क्षेत्रीय स्तर पर बड़ी संख्या में आदर्शोंन्मुखी कार्यकर्ताओं तैयार किए वहीं उसके प्रभाव में अवसरवादी नेताओं, सामंती शक्तियों को भी अपनी छवि सुधारने का अवसर मिला. आगे चलकर वे शक्तियां जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एकजुट हुईं और इंदिरा विरोध के नाम पर भूदान आंदोलन की सारी उपलब्धियों पर पानी फेरने का काम उन्होंने किया. इसके बावजूद भूदान आंदोलन को इस लिए याद किया जाएगा कि उसने इस देश के आम आदमी पर भरोसा कायम किया. इस विश्वास को पुनर्जीवित किया कि जनसाधारण आज भी सहयोग और सहअस्तित्व की चाहत रखता है. नेतृत्व यदि ईमानदार, भरोसेमंद और उच्च नैतिकता संपन्न है तो वह स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरों की मदद को तत्पर रहता है.

©  ओमप्रकाश कश्यप

विनोबा भावे: प्रथम सत्याग्रही—एक

सामान्य

चरख भिख्खवे चारिकम्: बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय गौतम बुद्ध

 

यूं तो समूची भारत वसुंधरा ही चिंतन और कर्म की जन्मभूमि रही है. लेकिन महाराष्ट्र की धरा को एक साथ कई परिवर्तनकामी आंदोलनों की पुण्यधरा का गौरव विशेषरूप से प्राप्त है. ऊंच-नीच और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध समानतावादी आंदोलनों के जन्मदाता महापुरुष जितने महाराष्ट्र में जन्म, उतने देश के किसी और हिस्से में शायद ही जन्मे हों. उन्हीं के सद्कर्मों से परिवर्तनकामी आंदोलनों की लहर वहां उठी, जिसने पूरे देश में बदलाव को हवा दी. यहीं पर बारहवीं शताब्दी में निर्गुण भक्ति परंपरा के उन्नायक संत ज्ञानेश्वर का जन्म हुआ, जिन्होंने कर्मकांड, धार्मिक जड़ता, बौद्धिक वितंडा एवं वर्गीय उत्पीड़न का विरोध करते हुए निर्गुण भक्ति पर जोर दिया. धार्मिक कट्टरपंथियों तथा पाखंडप्रेमियों के अत्याचार-अनाचार के कारण ज्ञानेश्वर और उनके परिवार का जीवन अत्यंत कष्ट और दुःख में बीता. उनके महान ग्रंथ ज्ञानेश्वरी की उपेक्षा की गई. मगर रचना के तीन सौ वर्ष उपरांत जब वह अप्रतिम ग्रंथ दुनिया के सामने आया तो लोग उसकी सरलता और चिंतन की गहराई से अचंभित रह गए. संत ज्ञानेश्वर की प्रतिभा और ज्ञान-सिद्धि ने लोगों की आंखों को चैंधिया दिया. उनका संदेश महाराष्ट्र के घर-घर में गूंजने लगा. संत की गरिमा प्रदान की गई. इनके अतिरिक्त संत नामदेव, तुकाराम, एकनाथ आदि ने भी महराष्ट्र की संत परंपरा को समृद्ध करने का काम किया. आजकल राजनीति से प्रेरित लोग महाराष्ट्र को वीर शिवाजी की धरती कहते हैं. उन्हें मराठी अस्मिता का प्रतीक-पुरुष बताते हैं. लेकिन जिन्हें इतिहास की थोड़ी भी समझ है वे जानते हैं कि वीर शिवाजी को छत्रपति शिवाजी बनाने, उनका सुसंस्कार करने में शिवाजी की मां जीजाबाई का जितना योगदान था, लगभग उतना ही योगदान था समर्थ गुरु रामदास का भी था.

      उनीसवीं शताब्दी के स्त्री एवं समाज सुधार आंदोलनों के अगुआ, विचारक ज्योतिबा फुले का जन्म भी पुण्यभूमि महाराष्ट्र में ही हुआ. उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री बाई फुले के साथ सामाजिक समानता के लिए लंबा संघर्ष किया. स्त्रियों को घर की चारदीवारी से निकाल कर उनके लिए स्वतंत्र शिक्षा की राह प्रशस्त की. स्त्री-शिक्षा की राह को आसान बनाने के लिए उन्होंने उनके लिए स्वतंत्र पाठशालाएं खोलीं. इसके लिए रूढ़िवादी, धर्म-प्रवंचकों और जाति का पाखंड रचने वाले लोगों ने उनका विरोध भी किया. जानलेवा हमले किए उनपर. लेकिन वे अड़े रहे. अड़े ही रहे. फुले के संघर्ष को आगे बढ़ाने वालों में डॉ. भीमराव आंबेडकर प्रमुख थे. जिन्होंने बीसवीं शताब्दी को दलित अस्मिता के उन्नयन का पर्याय बना दिया. अपनी सूझबूझ और अप्रतिम विद्वता के आधार पर दलित अधिकारों के लिए निरंतर अनथक संघर्ष करते हुए उन्होंने उसमें अपेक्षित कामयाबी प्राप्त की. डॉ. आंबेडकर के आंदोलन का ही प्रभाव था कि महात्मा गांधी को अपने अछूतोद्धार जैसे कार्यक्रम प्रमुखता से आरंभ करने पड़े. डॉ. आंबेडकर के जन्म के चार वर्ष पश्चात ही इस पुण्य धरा पर एक और महापुरुष का जन्म हुआ, जिसने गांधी जी के विचारों को उनसे भी ज्यादा ईमानदारी और निष्ठा के साथ जिया. लोग उन्हें गांधीजी का शिष्य मानते हैं. स्वयं वे भी यही मानते थे. मगर वे केवल परंपरा का अनुसरण करने वाले वाले शिष्य नहीं थे. बल्कि वे गुरु की विरासत का विस्तार करने वाले, उसको नई ऊचाइयों तक ले जाने वाले इंसान थे.

     गांधी और विनोबा की गुरु-शिष्य परंपरा की तुलना अगर किसी से करनी ही हो तो वह सुकरात और प्लेटो अथवा प्लेटो और अरस्तु के साथ की जा सकती है, जहां शिष्यत्व गुरु की चेतना का संवाहक और उन्नायक है. सर्वोदय गांधीवादी विचारधारा से आगे का चिंतन है. विनोबा की भूदान और ग्रामदान जैसी अभिकल्पनाएं गांधी जी के ग्राम स्वराज्य के सपने का ही विस्तार थीं. बावजूद इसके यह विनोबा की उदारता ही थी कि वे आजीवन स्वयं को गांधी जी का विनम्र अनुयायी ही मानते रहे.

     महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में एक गांव है, गागोदा. वहां एक साधारण गृहस्थ निवास करते थे, नरहरि भावे. गणित के प्रेमी और वैज्ञानिक सूझबूझ वाले. रसायन विज्ञान में उनकी गहन रुचि थी. उन दिनों रंगों को बाहर से आयात करना पड़ता था. नरहरि भावे रात-दिन रंगों की खोज में लगे रहते. बस एक धुन थी उनकी कि भारत को इस मामले में आत्मनिर्भर बनाया जा सके. उनकी पत्नी रुक्मिणी बाई ममतामयी, विदुषी महिला थीं. उदार-चित्त, आठों याम लोककल्याण भाव में डूबी रहतीं. इसका असर उनके दैनिक कार्य पर भी पड़ता था. मन कहीं और रमा होता तो कभी सब्जी में नमक कम पड़ जाता, कभी ज्यादा. कभी दाल के बघार में हींग डालना भूल जातीं तो कभी बघार दिए बिना ही दाल परोस दी जाती. पूरा परिवार उनके स्नेह-सूत्र में बंधा था. इसलिए इन छोटी-मोटी बातों की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता था. उसी सात्विक वातावरण में 11 सितंबर, 1895 को विनोबा का जन्म हुआ. उनका बचपन का नाम था विनायक. मां उन्हें प्यार से विन्या कहकर बुलातीं. विनोबा के अलावा रुक्मिणी बाई के दो और बेटे थे—वाल्कोबा और शिवाजी. विनायक से छोटे वाल्कोबा. शिवाजी सबसे छोटे. विनोबा नाम गांधी जी ने दिया था. महाराष्ट्र में नाम के पीछे ‘बा’ लगाने का जो चलन है, उसके अनुसार. तुकोबा, विठोबा और विनोबा.

     मां का स्वभाव विनायक ने भी पाया था. उनका मन भी हमेशा अध्यात्म चिंतन में लीन रहता. न उन्हें खाने-पीने की सुध रहती थी. न स्वाद की खास पहचान थीं. मां जैसा, जो भी परोस देतीं, चुपचाप खा लेते. रुक्मिणी बाई का गला बड़ा ही मधुर था. भजन सुनते हुए वे उसमें डूब जातीं. गातीं तो भाव-विभोर होकर, पूरे वातावरण में भक्ति-सलिला प्रवाहित होने लगती. रामायण की सैकड़ों चैपाइयां उन्हें कंठस्थ थीं. उन्हें वे मधुर भाव से गातीं. ऐसा लगता जैसे मां शारदा गुनगुना रही हो. विनोबा को अध्यात्म के संस्कार देने, उनके मन में भक्ति के प्रति अनुराग जगाने, बचपन में ही उनके मन में संन्यास और वैराग्य की प्रेरणा जगाने में उनकी मां रुक्मिणी बाई का बड़ा योगदान था. बालक विनायक को माता-पिता दोनों के संस्कार मिले. गणित की सूझ-बूझ और तर्क-सामर्थ्य, विज्ञान के प्रति गहन अनुराग, परंपरा के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तमाम तरह के पूर्वाग्रहों से अलग हटकर सोचने की कला उन्हें पिता की ओर से प्राप्त हुई. जबकि मां की ओर से मिले धर्म और संस्कृति के प्रति गहन अनुराग, प्राणीमात्र के कल्याण की भावना. जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण, सर्वधर्म समभाव, सहअस्तित्व और ससम्मान की कला. आगे चलकर विनोबा को गांधी जी का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माना गया. आज भी कुछ लोग यही कहते हैं. मगर यह विनोबा के चरित्र का एकांगी और एकतरफा विश्लेषण है. वे गांधी जी के ‘आध्यात्मिक उत्तराधिकारी’ से बहुत आगे, स्वतंत्र सोच के स्वामी थे. मुख्य बात यह है कि गांधी जी के प्रखर प्रभामंडल के आगे उनके व्यक्तित्व का स्वतंत्र मूल्यांकन हो ही नहीं पाया.

      महात्मा गांधी राजनीतिक जीव थे. आम हिंदुस्तानी की भांति उनकी आध्यात्मिक चेतना सुबह-शाम की आरती और पूजा-पाठ तक सीमित थी. जबकि उनकी धार्मिक-चेतना उनके राजनीतिक कार्यक्रमों के अनुकूल और समन्वयात्मक थी. उसमें आलोचना-समीक्षा भाव के लिए कोई स्थान नहीं था. धर्म-दर्शन के मामले में यूं तो विनोबा भी समर्पण और स्वीकार्य-भाव रखते थे. मगर उन्हें जब भी अवसर मिला धर्म-ग्रंथों की व्याख्या उन्होंने लीक से हटकर की. चाहे वह ‘गीता प्रवचन’ हों या संत तुकाराम के अभंगों पर लिखी गई पुस्तक ‘संतप्रसाद’. इससे उसमें पर्याप्त मौलिकता और सहजता है. यह कार्य वही कर सकता था जो किसी के भी बौद्धिक प्रभामंडल से मुक्त हो. एक बात यह भी महात्मा गांधी के सान्न्ध्यि में आने से पहले ही विनोबा आध्यात्मिक ऊंचाई प्राप्त कर चुके थे. आश्रम में आनने के बाद भी वे अध्ययन-चिंतन के लिए नियमित समय निकालते थे. विनोबा से पहली ही मुलाकात में प्रभावित होने पर गांधी जी ने सहज-मन से कहा था—

      ‘बाकी लोग तो इस आश्रम से कुछ लेने के लिए आते हैं, एक यही है जो हमें कुछ देने के लिए आया है.’

     विनोबा भावे की अध्यात्म-चेतना असाधारण थी. दर्शनशास्त्र उनका प्रिय विषय था. आश्रम में दाखिल होने के कुछ महीने के भीतर ही दर्शनशास्त्र की आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने एक वर्ष का अध्ययन अवकाश लिया था. अगर वे दर्शन के क्षेत्र में जाते तो भक्ति वेदांत की हृदयग्राही व्याख्याओं के लिए जाने जाते. इसलिए विनोबा को गांधी का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी मानना जहां गांधी जी क्षमताओं का गलत आकलन करना है, वहीं विनोबा भावे की प्रतिभा/पहुंच को कमतर आंकना है. असल में गांधीजी के प्रभामंडल में विनोबा के चरित्र की व्याख्या कभी हो ही नहीं पाई.

     विनोबा के यूं तो दो छोटे भाई और भी थे, मगर मां का सर्वाधिक वात्सल्य विनायक को ही मिला. भावनात्मक स्तर पर विनोबा भी खुद को अपने पिता की अपेक्षा मां के अधिक करीब पाते थे. यही हाल रुक्मिणी बाई का था, तीनों बेटों में ‘विन्या’ उनके दिल के सर्वाधिक करीब था. वे भजन-पूजन को समर्पित रहतीं. मां के संस्कारों का प्रभाव. भौतिक सुख-सुविधाओं के प्रति उदासीनता और त्याग की भावना किशोरावस्था में ही विनोबा के चरित्र का हिस्सा बन चुकी थी. घर का निर्जन कोना उन्हें ज्यादा सुकून देता. मौन उनके अंतर्मन को मुखर बना देता. वे घर में रहते, परिवार में सबके बीच, मगर ऐसे कि सबके साथ रहते हुए भी जैसे उनसे अलग, निस्पृह और निरपेक्ष हों. एकांत से बाहर आते तो मां के सान्निध्य में शरण पाते. ‘विन्या’ रुक्मिणी देवी के दिल, उनकी आध्यात्मिक मन-रचना के अधिक करीब था. मन को कोई उलझन हो तो वही सुलझाने में मदद करता. कोई आध्यात्मिक समस्या हो तो भी विन्या ही काम आता. यहां तक कि यदि पति नरहरि भावे भी कुछ कहें तो उसमें विन्या का निर्णय ही महत्त्वपूर्ण होता था.

     ऐसा नहीं है कि विन्या एकदम मुक्त या नियंत्रण से परे था. परिवार की आचार संहिता विनोबा पर भी पूरी तरह लागू होती थी. ठीक उसी प्रकार जैसे बाकी सदस्यों पर. विनोबा के बचपन की एक घटना है. रुक्मिणी बाई ने बच्चों के लिए एक नियम बनाया हुआ था कि भोजन तुलसी के पौघे को पानी देने के बाद ही मिलेगा. विन्या बाहर से खेलकर घर पहुंचते, भूख से आकुल-व्याकुल. मां के पास पहुंचते ही कहते—

     ‘मां, भूख लगी है, रोटी दो.’

      ‘रोटी तैयार है, लेकिन मिलेगी तब पहले तुलसी को पानी पिलाओ.’ मां आदेश देती.

      ‘नहीं मां, बहुत जोर की भूख लगी है.’ अनुनय करते हुए बेटा मां की गोद में समा जाता. मां को उसपर प्यार हो आता. परंतु नियम-अनुशासन अटल—

      ‘तो पहले तुलसी के पौधे की प्यास बुझा.’ बालक विन्या तुलसी के पौधे को पानी पिलाता, फिर भोजन पाता.

      रुक्मिणी सोने से पहले समर्थ गुरु रामदास की पुस्तक ‘दास बोध’ का प्रतिदिन अध्ययन करतीं. उसके बाद ही वे चारपाई पर जातीं. बालक विन्या पर इस असर पड़ना स्वाभाविक ही था. वे उसे संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम, नामदेव और शंकराचार्य की कथाएं सुनातीं. रामायण, महाभारत की कहानियां, उपनिषदों के तत्व ज्ञान के बारे में समझातीं. वही बातें जिन्हें वे दूसरों से सुनती आई थीं. संन्यास उनकी भावनाओं पर सवार रहता. लेकिन वे दुनिया से भागने के बजाय लोगों से जुड़ने पर अधिक जोर देतीं. संसार से भागना तो जीवन से पलायन है. बुराइयों के लिए दुनिया की कोसने के बजाय वे उसे बदलने का आग्रह करतीं. अक्सर कहतीं—‘विन्या, गृहस्थाश्रम का भली-भांति पालन करने से पितरों को मुक्ति मिलती है.’ लेकिन विन्या पर तो गुरु रामदास, संत ज्ञानेश्वर और शंकराचार्य का भूत सवार रहता. इन सभी महात्माओं ने अपनी आध्यात्मिक तृप्ति के लिए बहुत कम आयु में अपने माता-पिता और घर-परिवार का बहिष्कार किया था. वे कहते—

      ‘मां जिस तरह समर्थ गुरु रामदास घर छोड़कर चले गए थे, एक दिन मुझे भी उसी तरह प्रस्थान कर देना है.’

      ऐसे में कोई और मां होती तो हिल जाती. विचारमात्र से रो-रोकर आसमान सिर पर उठा लेती. क्योंकि लोगों की सामान्य-सी प्रवृत्ति बन चुकी है कि त्यागी, वैरागी होना अच्छी बात, महानता की बात, मगर तभी तक जब त्यागी और वैरागी दूसरे के घर में हों. अपने घर में वे हों जो साधारण आदमी की तरह गृहस्थी बसाएं, सुख-समृद्धि बटोरें, यश कमाएं. पर रुक्मिणी बाई तो जैसे किसी और ही मिट्टी की बनी थीं. वे बड़े प्यार से बेटे को समझातीं—

      ‘विन्या, गृहस्थाश्रम का विधिवत पालन करने से माता-पिता तर जाते हैं. मगर बृह्मचर्य का पालन करने से तो 41 पीढ़ियों का उद्धार होता है.’

      बेटा मां के कहे को आत्मसात करने का प्रयास कर ही रहा होता कि वे आगे जोड़ देतीं—

      ‘विन्या, अगर मैं पुरुष होती तो सिखाती कि वैराग्य क्या होता है.’

      बचपन में बहुत कुशाग्र बुद्धि थे विनोबा. दर्शन में खास रुचि थी. गणित उनका प्रिय विषय था. कविता और अध्यात्म चेतना के संस्कार मां से मिले. उन्हीं से जड़ और चेतन दोनों को समान दृष्टि से देखने का बोध जागा. मां बहुत कम पढ़ी-लिखी थीं. पर उन्होने की विन्या को अपरिग्रह, अस्तेय के बारे में अपने आचरण से बताया. व्यवहार से समझाया कि दूसरों को सुख पाकर आनंद प्राप्त करना एक कला है. उसी में गृहस्थी की सफलता का राज छिपा है. मां ने ही उन्हें संसार में रहकर उससे निस्पृह-निर्लिप्त रहना सिखाया. यह जीते जी कैवल्य प्राप्त करने की अवस्था थी. मां का ही असर था कि विन्या कविता रचते और और उन्हें आग के हवाले कर देते. दुनिया में जब सब कुछ अस्थाई और क्षणभंगुर है, कुछ भी साथ नहीं जाना तो अपनी रचना से ही मोह क्यों पाला जाए! उस समय यही भाव उनके साथ रहता. अतिशय भावुक वे आरंभ से ही थे. इसलिए जो भी करते उसको सच्चे मन और दिल की गहराइयों से करते. मां यह सब देखतीं, सोचतीं, मगर कुछ न कहतीं. मानो दिमाग में कोई बड़ी योजना हो. विन्या को बड़े से बड़े त्याग करने के लिए तैयार कर रही हों. विनोबा की अध्यात्म चेतना मां की देन थी. गणित की प्रवीणता और उसके तर्क उनके आध्यात्मिक विश्वास के आड़े नहीं आते थे. यदि कभी दोनों के बीच स्पर्धा होती भी तो जीत आध्यात्मिक विश्वास की ही होती. जैसे माता-पिता दोनों से गहनानुराग होने के बावजूद वे अकेले में स्वयं को मां के अधिक निकट पाते थे. आज वे घटनाएं मां-बेटे के आपसी स्नेह-अनुराग और विश्वास का ऐतिहासिक दस्तावेज हैं—

      रुक्मिणी बाई हर महीने चावल के एक लाख दाने दान करती थीं. एक लाख की गिनती करना भी आसान न था, सो वे पूरे महीने एक-एक चावल गिनती रहतीं. नरहरि भावे पत्नी को चावल गिनते में श्रम करते देख मुस्कराते. कम उम्र में ही आंख कमजोर पड़ जाने से डर सताने लगता. उनकी गणित बुद्धि कुछ और ही कहती. सो एक दिन उन्होंने रुक्मिणी बाई  को टोक ही दिया—

      ‘इस तरह एक-एक चावल गिनने में समय जाया करने की जरूरत ही क्या है. एक पाव चावल लो. उनकी गिनती कर लो. फिर उसी से एक लाख चावलों का वजन निकालकर तौल लो. कमी न रहे, इसलिए एकाध मुट्ठी ऊपर से डाल लो.’

      बात तर्क की थी. लौकिक समझदारी भी इसी में थी कि जब भी संभव हो, दूसरे जरूरी कार्यों के लिए समय की बचत की जाए. रुक्मिणी बाई को पति का तर्क समझ तो आता. पर मन न मानता. एक दिन उन्होंने अपनी दुविधा विन्या के सामने प्रकट करने के बाद पूछा—‘इस बारे में तेरा क्या कहना है, विन्या?’

      बेटे ने सबकुछ सुना, सोचा. बोला, ‘मां, पिता जी के तर्क में दम है. गणित यही कहता है. किंतु दान के लिए चावल गिनना सिर्फ गिनती करना नहीं है. गिनती करते समय हर चावल के साथ हम न केवल ईश्वर का नाम लेते जाते हैं, बल्कि हमारा मन भी उसी से जुड़ा रहता है.’ ईश्वर के नाम पर दान के लिए चावल गिनना भी एक साधना है, जिसमें मन हर घड़ी अपने आराध्य के निकट अनुभव करता है. सुनकर रुक्मिणी बाई हैरान. चावलों के गिनने की ऐसी व्याख्या….ऐसा पहले कहां सोचा था! अध्यात्मरस में पूरी तरह डूबी रहने वाली रुक्मिणी बाई को ‘विन्या’ की बातें खूब भातीं. बेटे पर गर्व हो आता था उन्हें. उन्होंने आगे भी चावलों की गिनती करना न छोड़ा. न ही इस काम से उनके मन कभी निरर्थकता बोध जागा. एक साधना मानकर उसे और भी मनोयोग से करने लगीं.

      ऐसी ही एक और घटना है. जो दर्शाती है कि विनोबा कोरी गणितीय गणनाओं में आध्यात्मिक तत्व कैसे खोज लेते थे. घटना उस समय की है जब वे गांधी जी के आश्रम में प्रवेश कर चुके थे तथा उनके रचनात्मक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे. आश्रम में सुबह-शाम प्रार्थना सभाएं होतीं. उनमें उपस्थित होने वाले आश्रमवासियों की नियमित गिनती की जाती. यह जिम्मेदारी एक कार्यकर्ता थी. प्रसंग यह है कि एक दिन प्रार्थना सभा के बाद जब उस कार्यकर्ता ने प्रार्थना में उपस्थित हुए आगंतुकों की संख्या बताई तो विनोबा झट से प्रतिवाद करते हुए बोले—

      ‘नहीं इससे एक कम थी.’

      कार्यकर्ता को अपनी गिनती पर विश्वास था, इसलिए वह भी अपनी बात पर अड़ गया. कर्म में विश्वास रखने वाले विनोबा आमतौर पर बहस में पड़ने से बचते थे. मगर उस दिन वे भी अपनी बात पर अड़ गए. आश्रम में विवादों का निपटान बापू की अदालत में होता था. गांधी जी को अपने कार्यकर्ता पर विश्वास था. मगर जानते थे कि विनोबा यूं ही बहस में नहीं पड़ने वाले. वास्तविकता जानने के लिए उन्होंने विनोबा की ओर देखा. तब विनोबा ने कहा—

      ‘प्रार्थना में सम्मिलित श्रद्धालुओं की संख्या जितनी इन्होंने बताई उससे एक कम ही थी.’

      ‘वह कैसे?’

      ‘इसलिए कि एक आदमी का तो पूरा ध्यान वहां उपस्थित सज्जनों की गिनती करने में लगा था.’

      गांधीजी विनोबा का तर्क समझ गए. प्रार्थना के काम में हिसाब-किताब और दिखावे की जरूरत ही क्या. आगे से प्रार्थना सभा में आए लोगों की गिनती का काम रोक दिया गया.

      युवावस्था के प्रारंभिक दौर में ही विनोबा आजन्म ब्रह्मचारी रहने की ठान चुके थे. वही महापुरुष उनके आदर्श थे जिन्होंने सत्य की खोज के लिए बचपन में ही वैराग्य ओढ़ लिया था. जब संन्यास धारण कर ब्रह्मचारी बनना है, गृहस्थ जीवन से नाता ही तोड़ना है तो क्यों न मन को उसी के अनुरूप तैयार किया जाए. क्यों उलझा जाए संबंधों की मीठी डोर, सांसारिक प्रलोभनों में. ब्रह्मचर्य की तो पहली शर्त यही है कि मन को भटकने से रोका जाए. वासनाओं पर नियंत्रण रहे. इसके लिए वह हर संभव प्रयत्न करने लगे.

      किशोर विनायक से किसी ने कह दिया था कि ब्रह्मचारी को किसी विवाह के भोज में सम्मिलित नहीं होना चाहिए. वे ऐसे कार्यक्रमों में जाने से अक्सर बचते भी थे. पिता नरहरि भावे तो थे ही, यदि किसी और को ही जाना हुआ तो छोटे भाई चले जाते. विनोबा का तन दुर्बल था. बचपन से ही कोई न कोई व्याधि लगी रहती. आंत्र रोग तो मानो चिपका हुआ था. लेकिन मन-मस्तिष्क पूरी तरह चैतन्य, सजग और विचारवान. मानो शरीर की सारी शक्तियां सिमटकर दिमाग में समा गई हों. स्मृति विलक्षण थी. किशोर विनायक ने वेद, उपनिषद के साथ-साथ संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम, नामदेव के सैकड़ों पद अच्छी तरह याद कर लिए थे. गीता उन्हें बचपन से ही कंठस्थ थी. संस्कृत, मराठी, हिंदी, उर्दू में वे धाराप्रवाह बोल सकते थे. आगे चलकर चालीस हजार श्लोक भी उनके मानस में अच्छी तरह रम गए.

      वैराग्य की अपनी धुन में भोज से दूर रहने का संकल्प वे ले चुके थे. कि अचानक परीक्षा की घड़ी करीब आ गई. बड़ी बहन का विवाह तय हुआ. व्रत के पक्के विनोबा ने तय कर लिया कि विवाह के अवसर पर भोज से दूर रहेंगे. कोई टोका-टाकी न करे, इसलिए उन्होंने उस दिन उपवास रखने की घोषणा कर दी. बहन के विवाह में भाई उपवास रखे, यह भी उचित न था. पिता तो सुनते ही नाराज हो गए. मगर मां ने बात संभाल ली. उन्होंने बेटे के मन को समझा. उसके संकल्प का सम्मान करते हुए उन्होंने साधारण ‘दाल-भात’ खाने के लिए राजी कर लिया. यही नहीं अपने हाथों से अलग पकाकर भी दिया. धूम-धाम से विवाह हुआ. विनायक ने खुशी-खुशी उसमें हिस्सा लिया. लेकिन अपने लिए मां द्वारा खास तौर पर बनाए दाल-भात से ही गुजारा किया. मां-बेटे का यह प्रेम आगे भी बना रहा. आगे चलकर जब संन्यास के लिए घर छोड़ा तो मां की एक लाल किनारी वाली धोती तथा उनके पूजाघर से एक मूति साथ ले गए. मूर्ति तो उन्होंने दूसरे को भेंट कर दी थी. मगर मां की धोती जहां भी वे जाते, अपने साथ रखते. सोते तो सिरहाने रखकर. जैसे मां का आशीर्वाद साथ लिए फिरते हों. संन्यासी मन भी मां की स्मृतियों से पीछा नहीं छुटा पाया था. मां के संस्कार ही विनोबा की आध्यात्मिक चेतना की नींव बने. उन्हीं पर उनका जीवनदर्शन विकसित हुआ. आगे चलकर उन्होंने रचनात्मकता और अध्यात्म के क्षेत्र में जो ख्याति अर्जित की उसके मूल में भी मां की ही प्रेरणाएं थीं.

      रुक्मिणी बाई  कम पढ़ी-लिखीं थीं. संस्कृत समझ नहीं आती थीं. लेकिन मन था कि गीता-ज्ञान के लिए तरसता रहता. एक दिन मां ने अपनी कठिनाई पुत्र के समक्ष रख ही दी—

      ‘विन्या, गीता पढ़ना चाहती हूं, पर संस्कृत गीता समझ में नहीं आती.’ विनोबा जब अगली बार बाजार गए, गीता के तीन-चार मराठी अनुवाद खरीद लाए. लेकिन उनमें भी अनुवादक ने अपना पांडित्य प्रदर्शन किया था.

      ‘मां बाजार में यही अनुवाद मिले.’ विन्या ने समस्या बताई. ऐसे बोझिल और उबाऊ अनुवाद अपनी अल्पशिक्षित मां के हाथ में थमाते हुए वे स्वयं दुःखी थे. पर मां तो मानो भविष्य देख रही थीं.

     ‘तो तू नहीं क्यों नहीं करता नया अनुवाद.’ मां ने जैसे चुनौती पेश की. विनोबा उसके लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे.

      ‘मैं, क्या मैं कर सकूंगा?’ विनोबा ने हैरानी जताई. उस समय उनकी अवस्था मात्र 21 वर्ष थी. पर मां को बेटे की क्षमता पर पूरा विश्वास था.

      ‘तू करेगा…तू कर सकेगा विन्या!’ मां के मुंह से बरबस निकल पड़ा.

 मानो आशीर्वाद दे रही हो. कह रही हों कि यह कार्य बस तू ही कर सकता है. गीता के प्रति विनोबा का गहन अनुराग पहले भी था. परंतु उसका वे भाष्य लिखेंगे, और वह भी मराठी में—यह उन्होंने कभी सोचा तक न था. लेकिन मां की इच्छा भी उनके लिए सर्वोपरि थी. धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया. गीता पहले भी उन्हें भाती थी. अब तो जैसे हर आती-जाती सांस गीता का पाठ करने लगी. रोम-रोम मानो गीता हो गया. यह सोचकर कि मां मे निमित्त काम करना है. दायित्वभार साधना है. विनोबा का मन गीता में रमण करने लगा. और फिर स्वप्न के संकल्प में बदलते देर न लगी. उसी साल 7 अक्टूबर को उन्होंने अनुवादकर्म के निमित्त कलम उठाई. उसके बाद तो प्रातःकाल स्नानादि के बाद रोज अनुवाद करना, उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया. यह काम 1931 तक निरंतर चला. परंतु जिस मां के लिए सारा संकल्प साधा था, वह उस उपलब्धि को देख न सकीं. रुक्मिणी बाई का निधन 24 अक्टूबर 1918 को हुआ. उस समय तक अनुवादकर्म अधूरा था. मां का जाना विनोबा के लिए बड़ा आघात था. परंतु तब तक मन में वैराग्य भाव समा चुका था. मां गीता के अनुवाद का दायित्वभार सौंप कर गई हैं, विनोबा मनोयोग से उस काम में लगे रहे.

      धार्मिक संस्कारों में पाखंड उन्हें स्वीकार न था. मां के निधन के समय भी विनोबा का अपने पिता और भाइयों से मतभेद हुआ. विनोबा ब्राह्मणों के हाथ से परंपरागत तरीके से दाह-संस्कार का विरोध कर रहे थे. लेकिन परिवार वालों की जिद के आगे उनकी एक न चली. विनोबा भी अपने सिद्धांतों पर अडिग थे. नतीजा यह कि जिस मां को वे सबसे अधिक चाहते थे, जो उनकी आध्यात्मिक गुरु थीं, जिनसे उन्हें भावना का वरदान मिला था, उनके अंतिम संस्कार से वे दूर ही रहे. मां को उन्होंने भीगी आंखों से मौन विदाई दी. आगे चलकर 29 अक्टूबर 1947 को विनोबा के पिता का निधन हुआ तो उन्होंने वेदों के निर्देश कि ‘मिट्टी पर मिट्टी का ही अधिकार है’ का पालन करते हुए उनकी देह को अग्नि-समर्पित करने के बजाय, मिट्टी में दबाने जोर दिया. तब तक हालात बदल चुके थे. गांधीजी के करीबी विनोबा अब ‘संत विनोबा’ थे. बापू का उन्हें आशीर्वाद था. इसलिए इस बार उन्हीं की चली.

      मां की गीता में आस्था थी. रुक्मिणी बाई विनोबा को गीता का मराठी में अनुवाद करने का दायित्व सौंपकर गई थीं. विनोबा उस कार्य में पूरी तल्लीनता से लगे थे. आखिर अनुवाद कर्म पूरा हुआ. पुस्तक का नाम रखा गया—गीताई. ‘गीता़+आई = गीताई. महाराष्ट्र में ‘आई’ का अभिप्राय ‘मां के प्रति’ से है. ‘गीताई’ का अर्थ हुआ—‘मां की स्मृति’…..उसके नेह से जुड़ी-रची गीता. मां तो पुत्र की कृति को देखने से पहले ही चल बसीं थीं. विनोबा ने मां की स्मृति और उनकी प्रेरणाओं को साथ लेकर काम पूरा किया था. ‘गीताई’ रुक्मिणी बाई की याद और अभिलाषा से जुड़ी थी. ज्ञान और प्रेमरस का अनूठा सामंजस्य. छपने के साथ की पुस्तक की पूरे महाराष्ट्र में धूम मच गई. वह घर-घर में माताओं, बहनों के कंठ-स्वर में ढलने लगी. उनकी अध्यात्म चेतना का आभूषण बन गई. गांधी जी ने सुना तो अनुवाद कर्म की भूरि-भूरि प्रशंसा की. जो महिलाएं संस्कृत नहीं जानती थीं, जिन्हें अपनी भाषा का भी आधा-अधूरा ज्ञान था, उनके लिए सहज-सरल भाषा में रची गई थी —‘गीताई’. साधारण गृहस्थ स्त्रियों के लिए वह मानो ज्ञान और अध्यात्म का सम्मिलित वरदान लेकर आई थी.

संन्यास की साध

विनोबा को बचपन में मां से मिले संस्कार युवावस्था में और भी गाढ़े होते चले गए. युवावस्था की ओर बढ़ते हुए विनोबा न तो संत ज्ञानेश्वर को भुला पाए थे, न तुकाराम को. वही उनके आदर्श थे. संत तुकाराम के अभंग तो वे बड़े ही मनोयोग से गाते. उनका अपने आराध्य से लड़ना-झगड़ना, नाराज होकर गाली देना, रूठना-मनाना उन्हें बहुत अच्छा लगता. आराध्य के साथ उनका बराबरी का, सखा-भाव का संदेश था. संत रामदास का जीवन भी उन्हें प्रेरणा देता. वे न शंकराचार्य को विस्मृत कर पाए थे, न उनके संन्यास को. दर्शन उनका प्रिय विषय था. हिमालय जब से होश संभाला था, तभी से उनके सपनों में आता था. तब वे कल्पना में स्वयं को सत्य की खोज में गहन कंदराओं में तप-साधना करते हुए पाते. वहां की निर्जन, वर्फ से ढकी दीर्घ-गहन कंदराओं में उन्हें परमसत्य की खोज में लीन हो जाने के लिए उकसातीं.

      1915 में उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा पास की. अब आगे क्या पढ़ा जाए. वैज्ञानिक प्रवृत्ति के पिता और अध्यात्म में डूबी रहने वाली मां का वैचारिक द्वंद्व वहां भी अलग-अलग धाराओं में प्रकट हुआ. पिता ने कहा—‘फ्रेंच पढ़ो.’ परंपरा और संस्कार से बंधी मां बोलीं—‘ब्राह्मण का बेटा संस्कृत न पढ़े, यह कैसे संभव है!’ विनोबा ने उन दोनों का मन रखा. इंटर में फ्रेंच को चुना. संस्कृत का अध्ययन उन्होंने निजी स्तर पर जारी रखा. उन दिनों फ्रेंच ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हो रही क्रांति की भाषा थी. सारा परिवर्तनकामी साहित्य उसमें रचा जा रहा था. दूसरी ओर बड़ौदा का पुस्तकालय दुर्लभ पुस्तकों, पांडुलिपियों के खजाने के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध था. विनोबा ने उस पुस्तकालय को अपना दूसरा ठिकाना बना दिया. विद्यालय से जैसे ही छुट्टी मिलती, वे पुस्तकालय में जाकर अध्ययन में डूब जाते. फ्रांसिसी साहित्य ने विनोबा का परिचय पश्चिमी देशों में हो रही वैचारिक क्रांति से कराया. संस्कृत के ज्ञान ने उन्हें वेदों और उपनिषदों में गहराई से पैठने की योग्यता दी. ज्ञान का स्तर बढ़ा, तो उसकी ललक भी बढ़ी. मगर मन से हिमालय का आकर्षण, संन्यास की साध, वैराग्यबोध न हटा.

     उन दिनों इंटर की परीक्षा के लिए मुंबई जाना पड़ता था. विनोबा भी तय कार्यक्रम के अनुसार 25 मार्च 1916 को मुंबई जाने वाली रेलगाड़ी में सवार हुए. उस समय उनका मन डावांडोल था. पूरा विश्वास था कि हाईस्कूल की तरह इंटर की परीक्षा भी पास कर ही लेंगे. मगर उसके बाद क्या? क्या यही उनके जीवन का लक्ष्य है? विनोबा को लग रहा था कि अपने जीवन में वे जो चाहते हैं, वह औपचारिक अध्ययन द्वारा संभव नहीं. विद्यालय के प्रमाणपत्र और काॅलिज की डिग्रियां उनका अभीष्ठ नहीं हैं. वे कुछ पाने-करने के लिए इस दुनिया में आए हैं. रेलगाड़ी अपनी गति से भाग रही थी. उससे सहस्रगुना तेज भाग रहा था विनोबा का मन. ऊहापोह में डूबा रहा मन-मस्तिष्क. आखिर जीत मन की हुई.

      जैसे ही गाड़ी सूरत पहुंची, विनोबा उससे नीचे उतर आए. गाड़ी आगे बढ़ी पर विनोबा का मन दूसरी ओर खिंचता चला गया. दूसरे प्लेटफार्म पर पूर्व की ओर जाने वाली रेलगाड़ी मौजूद थी. विनोबा को लगा कि हिमालय एक बार फिर उन्हें आमंत्रित कर रहा है. गृहस्थ जीवन या संन्यास. मन में कुछ देर तक संघर्ष चला. ऊहापोह से गुजरते हुए उन्होंने उन्होंने निर्णय लिया और उसी गाड़ी में सवार हो गए. संन्यासी अपनी पसंदीदा यात्रा पर निकल पड़ा. इस हकीकत से अनजान कि इस बार भी जिस यात्रा के लिए वे ठान कर निकले हैं, वह उनकी असली यात्रा नहीं, सिर्फ एक पड़ाव है. जीवन से पलायन उनकी नियति नहीं. उन्हें तो लाखों-करोड़ों भारतीयों के जीवन की साध, उनके लिए एक उम्मीद बनकर उभरना है.

      ब्रह्म की खोज, सत्य की खोज, संन्यास लेने की साध में विनोबा भटक रहे थे. उसी लक्ष्य के साथ उन्होंने घर छोड़ा था. हिमालय की ओर यात्रा जारी थी. बीच में काशी का पड़ाव आया. मिथकों के अनुसार भगवान शंकर की नगरी. हजारों वर्षों तक धर्म-दर्शन का केंद्र रही काशी. साधु-संतों और विचारकों का कुंभ. जिज्ञासुओं और ज्ञान-पिपासुओं को अपनी ओर आकर्षित करने वाली पवित्र धर्मस्थली. न जाने कितने ज्ञान-पिपासु इस नगरी में उम्मीद लेकर पहुंचे. काशी के गंगा घाट पर जहां नए विचार पनपे तो वितंडा भी अनगिनत रचे जाते रहे. उसी गंगा तट पर विनोबा भटक रहे थे. अपने लिए मंजिल की तलाश में. गुरु की तलाश में जो उन्हें आगे का रास्ता दिखा सके. जिस लक्ष्य के लिए उन्होंने घर छोड़ा था, उस लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग बता सके.

      भटकते हुए वे एक स्थान पर पहुंचे जहां कुछ सत्य-साधक शास्त्रार्थ कर रहे थे. विषय था अद्वैत और द्वैत में कौन सही? प्रश्न काफी पुराना था. लगभग बारह सौ वर्ष पहले भी इस पर निर्णायक बहस हो चुकी थी. शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच. उस ऐतिहासिक बहस में द्वैतवादी मंडन मिश्र और उनकी पत्नी को शंकराचार्य ने पराजित किया था. वही विषय फिर उन सत्य-साधकों के बीच आ फंसा था. या कहो कि वक्त काटने के लिए दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ वितंडा रच रहे थे. और फिर बहस को समापन की ओर ले जाते हुए अचानक घोषणा कर दी गई कि अद्वैतवादी की जीत हुई है. विनोबा चौंके. उनकी हंसी छूट गई—

      ‘नहीं, अद्वैतवादी ही हारा है.’ विनोबा के मुंह से बेसाख्ता निकल पड़ा. सब उनकी ओर देखने लगे. एक युवा, जिसकी उम्र बीस-इकीस वर्ष की रही होगी, दिग्गज विद्वानों के निर्णय को चुनौती दे रहा था. उस समय यदि महान अद्वैतवादी शंकराचार्य का स्मरण न रहा होता तो वे लोग जरूर नाराज हो जाते. उन्हें याद आया, जिस समय शंकराचार्य ने मंडन मिश्र को पराजित किया था, उस समय उनकी उम्र भी लगभग वही थी, जो उस समय विनोबा की थी.

      ‘यह तुम कैसे कह सकते हो, जबकि द्वैतवादी सबके सामने अपनी पराजय स्वीकार कर चुका है.’

      ‘नहीं यह अद्वैतवादी की ही पराजय है.’ विनोबा अपने निर्णय पर दृढ़ थे.

      ‘कैसे?’

      ‘जब कोई अद्वैतवादी द्वैतवादी से शास्त्रार्थ करना स्वीकार कर ले, तो समझो कि उसने पहले ही हार मान ली है.’

      उस समय विनोबा के मन में अवश्य ही शंकराचार्य की छवि रही होगी. उनकी बात भी ठीक थी. जिस अद्वैतमत का प्रतिपादन बारह सौ वर्ष पहले शंकराचार्य मंडन मिश्र को पराजित करके कर चुके थे, उसकी प्रामाणिकता पर पुनः शास्त्रार्थ, और वह भी बिना किसी ठोस आधार के. सिर्फ वितंडा के यह और क्या हो सकता है! वहां उपस्थित विद्वानों को विनोबा की बात सही लगी. कुछ साधु विनायक को अपने संघ में शामिल करने को तैयार हो गए. कुछ तो उन्हें अपना गुरु बनाने तक को तैयार थे. पर जो स्वयं भटक रहा हो, जो खुद गुरु की खोज में, नीड़ की तलाश में निकला हो, वह दूसरे को छाया क्या देगा! अपनी जिज्ञासा और असंतोष को लिए विनोबा वहां से आगे बढ़ गए. इस बात से अनजान कि काशी ही उन्हें आगे का रास्ता दिखाएगी, और उन्हें उस रास्ते पर ले जाएगी, जिधर जाने के बारे उन्होंने अभी तक सोचा भी नहीं है. मगर जो उनकी वास्तविक मंजिल है.

गांधी से मुलाकात

एक ओर विनोबा संन्यास की साध में, सत्यान्वेषण की ललक लिए काशी की गलियों में, घाटों पर भटक रहे थे. वहीं दूसरी ओर एक और जिज्ञासु भारत को जानने, उसके हृदय-प्रदेश की धड़कनों को पहचानने, भारतीय जनता से रू-ब-रू होने तथा उससे आत्मीयता-भरा रिश्ता कायम करने के लिए भारत-भ्रमण पर निकला हुआ हुआ था. कुछ ही महीने पहले वह दक्षिण अफ्रीका से बेशुमार ख्याति बटोरकर लौटा था. वहां उन्होंने उन अंग्रेजों को उन्हीं के हथियारों से मात दी थी जो स्वयं को दुनिया की सबसे सभ्य, विकसित एवं न्यायप्रिय कौम मानते थे. उसने वहां उन्हें चिराग तले की अंधेरी स्थितियों से परिचय कराया था. जब आईना दिखाने पर भी दागों की जानबूझकर अनदेखी की गई जो उनके विरुद्ध अहिंसक संघर्ष छेड़ने में भी उसने विलंब नहीं किया. वहां उसने न केवल भारतीय और दक्षिणी अफ्रीका के नागरिकों की अस्मिता के लिए, बल्कि मानवीय गरिमा की सुरक्षा के लिए आंदोलन खड़ा किया था, जिसकी दुनिया-भर में प्रशंसा हुई थी.

      वह एक दुबला-पतला इंसान था, मगर उसकी खूबी थी कि वह अपनी कमजोरियों को ही ताकत में तब्दील कर चुका था. मानवेतिहास में ईसा मसीह को छोड़कर शायद ही किसी ने अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बनाया हो. उसका रास्ता अनोखा था. अब से पहले के नेतागण और वुद्धिजीवी विरोध की राजनीति की करते आए थे. वह विरोध के बजाय असहमति की राजनीति कर रहा था. वह भी अहिंसा के साथ. कहावत थी कि सेनाएं इतिहास बदल देती हैं. सेना उसके पास भी थी. लेकिन निहत्थी. उसी निहत्थी सेना के भरोसे उसकी भावी योजना भारतीय राजनीति में दखल देने की थी. उस साधक का नाम था—मोहनदास करमचंद गांधी. अपने राजनीतिक गुरु गोविंद बल्लभ पंत के कहने पर वह भारत की आत्मा को जानने के उद्देश्य से एक वर्ष के भारत-भ्रमण पर निकला हुआ था. आगे चलकर भारतीय राजनीति पर छा जाने, करोड़ों भारतीयों के दिल की धड़कन, भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का प्रमुख सूत्रधार, अहिंसक सेनानी बन जाने वाले गांधी उन दिनों अप्रसिद्ध ही थे. ‘महात्मा’ की उपाधि भी उनसे दूर थी. उनकी पूंजी दक्षिण अफ्रीका में छेडे़ गए आंदोलन तक सीमित थी. यह लड़ाई उन्होंने उस ब्रिटिश साम्राज्य का विरोध करते हुए जीती थी, जो उस समय तक अजेय माना जाता था. उसी के कारण वे पूरे भारत में जाने जाते थे. उन दिनों उनका पड़ाव भी काशी था. मानो दो महान आत्माओं को मिलवाने के लिए समय कोई जादुई करतब दिखा रहा था.

      काशी में महामना मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित हिंदू विश्वविद्यालय में एक बड़ा जलसा हो रहा था. दिन था—4 फरवरी, 1916. जलसे में राजे-महाराजे, नबाव, सामंत सब अपनी पूरी धज, शानो-शौकत के साथ उपस्थित थे. उसकी छटा देखते ही बनती थी. लोग गांधी जी को देखना-सुनना चाहते थे. सम्मेलन में गांधी जी ने ऐतिहासिक भाषण दिया. वह कहा जिसकी उस समय कोई उम्मीद तक नहीं कर सकता था. वक्त पड़ने पर जिन राजा-सामंतों की खुशामद स्वयं अंग्रेज भी करने लगते थे, जिनके दान पर काशी विश्वविद्यालय और दूसरी अन्य संस्थाएं चला करती थीं, उन राजा-सामंतों की खुली आलोचना करते हुए गांधी जी ने कहा था कि वे अपनी फिजूलखर्ची से बाज आएं. ऐशो-आराम और विलासिता की वस्तुओं पर धन का दुरुपयोग करने के बजाय उसका राष्ट्रनिर्माण के लिए सदुपयोग करें. उसको गरीबों के कल्याण में लगाएं. उन्होंने आह्वान किया कि वे व्यापक लोकहित में अपने सारे आभूषण दान कर दें. वह एक क्रांतिकारी अपील थी. उन सामंतों-राजाओं और नबावों के बीच जिनमें से अधिकांश अपने सुख-सुविधाओं, विलासिता और वैभव प्रदर्शन के स्तर को बनाए रखने के लिए दूसरों के शरीर से आभूषण खींचते आए थे. जिनका दबदबा दूर ब्रिटिश राजदरबार में भी दिखाई पड़ता था. सभा में खलबली मच गई. पर गांधी की मुस्कान उसी तरह बनी रही. अगले दिन उनके भाषण से अखबार रंगे पड़े थे.

      उस भाषण ने बहुतों की मानसिकता को बदला. विनोबा ने समाचारपत्र के माध्यम से ही गांधी जी के बारे में जाना. मन जैसे उमड़ने-सा लगा. उन्हें लगा कि जिस लक्ष्य की खोज में वे घर से निकले हैं, वह पूरी हुई. विनोबा कोरी शांति की तलाश में ही घर से नहीं निकले थे. न वे देश के हालात और अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे अमानवीय अत्याचारों से अपरिचित थे. मगर कोई राह मिल ही नहीं रही थी. भाषण पढ़कर उन्हें लगा कि इस व्यक्ति के पास शांति भी है और क्रांति भी. उन्होंने तुरंत गांधी जी के नाम पत्र लिखा. पत्र में कुछ सवाल थे, स्वाभाविक जिज्ञासाएं थीं. समय पर जवाब आया. गांधी जी ने उन्हें आश्रम आकर मिलने के लिए आमंत्रित किया था. विनोबा तो उसकी प्रतीक्षा कर ही रहे थे. वे तुरंत अहमदाबाद स्थित कोचर्ब आश्रम की ओर प्रस्थान कर गए, जहां उन दिनों गांधी जी का आश्रम था.

      7 जून, 1916 को विनोबा की गांधी से पहली भेंट हुई. विद्वान लोग इसको गुरु-शिष्य की भेंट का नाम दे सकते हैं. मगर मेरी निगाह में वह उन दो महान आत्माओं की भेंट थीं, जिनकी भविष्य-यात्रा दो महान परिवर्तनकारी आंदोलनों को जन्म देने वाली थी. पहली मुलाकात के बाद से ही विनोबा गांधी जी के ही होकर रह गए. गांधी जी ने भी विनोबा की प्रतिभा को पहचान लिया था. इसलिए पहली मुलाकात के बाद ही उनकी टिप्पणी थी कि, ‘अधिकांश लोग यहां से कुछ लेने के लिए आते हैं, यह पहला व्यक्ति है, जो कुछ देने के लिए आया है.’ काफी दिन बाद अपनी पहली भेंट को याद करते हुए विनोबा ने कहा था कि—

      ‘जिन दिनों मैं काशी में भटक रहा था, मेरी पहली अभिलाषा हिमालय की कंदराओं में जाकर घोर तप-साधना करने की थी. एक और अभिलाषा थी, बंगाल के क्रांतिकारियों से भेंट करने की. लेकिन इनमें से एक भी अभिलाषा पूरी न हो सकी. समय खुद मेरा हाथ थामकर मुझे गांधी जी तक ले गया. वहां जाकर मैंने पाया कि उनके व्यक्तित्व में हिमालय जैसी शांति है, तो बंगाल की क्रांति की धधक भी. मैंने छूटते ही स्वयं से कहा था, अहो! मेरी दोनों अभिलाषाएं एक साथ पूरी हुईं.’

      गांधी और विनोबा की वह मुलाकात क्रांतिकारी थी. क्योंकि उसके बाद गांधी जी को भारतीय स्वाधीनता के समर में उतरना था, जिसमें विनोबा के लिए भी बड़ी भूमिकाएं तय थीं. गांधी जी को जैसे ही पता चला कि विनोबा अपने माता-पिता को बिना बताए घर से चले आए हैं, और उनके परिजन उनके लिए चिंतित हो सकते हैं, उन्होंने तुरंत विनोबा के पिता के नाम एक पत्र लिखा. पत्र में विनोबा के आश्रम में सुरक्षित होने की सूचना भेजी गई थी. स्वातंत्रय समर में पूरा समर्पण तभी संभव है, जब परिजन भी साथ दें. बना परिवार की सम्मिति के उसके किसी सदस्य को आंदोलन से जोड़ना पाप है. उसके बाद उनके संबंध लगातार प्रगाढ़ होते चले गए.

      विनोबा ने खुद को गांधी जी के आश्रम के लिए समर्पित कर दिया. अध्ययन, अध्यापन, कताई, खेती के काम से लेकर सामुदायिक जीवन तक आश्रम की हर गतिविधि में वे हमेशा आगे रहते. गांधी जी का यह कहना कि यह युवक आश्रमवासियों से कुछ लेने नहीं बल्कि देने आया है, सत्य होता जा रहा था. उम्र से एकदम युवा विनोबा, अपने आचरण से बाकी आश्रमवासियों को अनुशासन और कर्तव्यपरायणता का पाठ पढ़ा ही रहे थे. गांधी जी का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था. उतनी ही तेजी से बढ़ रही थी आश्रम में आने वाले कार्यकर्ताओं की संख्या. कुछ ही महीनों के बाद कोचरब आश्रम छोटा पड़ने लगा. राजनीतिक गतिविधियों के संचालन के लिए गांधी जी को अब बड़े ठिकाने की आवश्यकता थी, जहां रहकर वे अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से पूरे देश से संपर्क साध सकें.

      अहमदाबाद में साबरमती का किनारा उपयुक्त पाया गया. वहां नए आश्रम के निर्माण का काम तेजी से होने लगा. लेकिन आजादी के अहिंसक सैनिक तैयार करने का कार्य अकेले साबरमती आश्रम से भी संभव भी न था. कुछ ही दिनों बाद देशव्यापी गतिविधियों के संचालन हेतु नए आश्रम की जरूरत महसूस की जाने लगी. गांधी साबरमती जैसा आश्रम वर्धा में भी चाहते थे. वहां पर ऐसे अनुशासित कार्यकर्ता की आवश्यकता थी, जो आश्रम को गांधी जी के आदर्शों के अनुरूप चला सके. इसके लिए विनोबा सर्वथा अनुकूल पात्र थे और गांधी जी के विश्वसनीय भी. 8 अप्रैल 1923 को गांधी जी के आदेश पर विनोबा वर्धा के लिए प्रस्थान कर गए. वहां उन्होंने ‘महाराष्ट्र धर्म’ मासिक का संपादन शुरू किया.

      मराठी में प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका में विनोबा ने नियमित रूप से उपनिषदों और महाराष्ट्र के संतों पर लिखना आरंभ कर दिया, जिनके कारण देश में भक्ति आंदोलन की शुरुआत हुई थी. पत्रिका को अप्रत्याशित लोकप्रियता प्राप्त हुई, कुछ ही समय पश्चात उसको साप्ताहिक कर देना पड़ा. विनोबा अभी तक गांधी जी के शिष्य और सत्याग्रही के रूप में जाने जाते थे. पत्रिका के माध्यम से जनता उनकी आध्यात्मिक पैठ और कलम के सामथ्र्य को जानने लगी थी.

      गीता और अध्यात्म पर विनोबा की पैठ का अगला उदाहरण ‘गीता प्रवचन’ के रूप में सामने आया. इस पुस्तक में विनोबा ने गीता के कर्मयोग की अनूठी व्याख्या की है. उल्लेखनीय है कि गीता का एक अनुवाद ‘गीता रहस्य’ तिलक द्वारा भी किया गया, जिसमें उन्होंने गीता के कर्मयोग की ओजस्वी व्याख्या की है. विनोबा की व्याख्या में मानो ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग तीनों का समन्वित रूप है. स्मरणीय है कि स्वाधीनता संग्राम के दौरान महापुरुषों की जेलयात्रा कोरी सजा नहीं होती थी. जेल में मिले अवसर का उपयोग वे सब अपने चरित्र निर्माण हेतु, देश-दुनिया के बारे में अधिक से अधिक जानने के लिए अध्ययन को आगे बढ़ाने के लिए करते. अंग्रेज सरकार से लगभग रोजमर्रा का टकराव था. जिससे जेल जाने की संभावना भी लगातार बनी रहती थी. अतएव सजा से घबराए बिना नेतागण प्रायः इस प्रयास में रहते थे कि आने वाली जेल यात्रा का अधिक से अधिक रचनात्मक उपयोग कैसे किया जाए! कैसे उसका अधिक से अधिक राजनीतिक लाभ हो. ‘गीता रहस्य’ मांडले जेल में रचा गया था. उसमें उन्होंने कृष्ण के जीवन-दर्शन को कर्मयोग के माध्यम से अभिव्यक्त करने की कोशिश की है. गीता के कर्मयोग की इससे बेहतर और ओजमयी व्याख्या दूसरी नहीं है.

      विनोबा भी जेलयात्रा से पहले ही अपने अध्ययन-लेखन का कार्यक्रम विधिवत बना लेते थे. वे जेल के अनुशासित कैदी होते थे. इसलिए जबतक वे जेल में रहते, जेलर कारागार की आंतरिक व्यवस्था की जिम्मेदारी उनपर डालकर लगभग निश्चिंत हो जाता था. उन दिनों विनोबा धुले जेल में थे. विनोबा के साथ धुले जेल में बहुत से मजदूर कैदी भी थे. सभी विनोबा की आध्यात्मिक पैठ और गीता पर उनकी पकड़ के बारे में जानते थे. विनोबा वहां एक सत्याग्रही होने की सजा काट रहे थे. उनके साथ साने गुरुजी भी थे. उनकी लिखाई इतनी सुंदर थी, मानो मोती टांक रहे हों.

      ‘गीता प्रवचन’ का जन्म धुले जेल में हुआ. गीता पर विनोबा की पकड़ को देखते हुए मजदूरों ने उनसे गीता पर प्रवचन देने को कहा. विनोबा ने स्वीकार कर लिया. उसके बाद तो प्रत्येक रविवार को प्रातःकाल वे गीता पर बोलते. उस समय जेल का वातावरण मानो पवित्र हो जाता. उसके प्रांगण भक्ति-वेदांत की धारा बहने लगते. विनोबा जो बोलते साने गुरुजी उन्हें अपने मोतियों जैसे अक्षरों में लिखते जाते. तिलक ने अपने ‘गीता रहस्य’ में गीता के कर्मयोग पर जोर दिया है. विनोबा के गीता प्रवचनों में भक्ति की सहजता थी. वे ज्ञान, कर्म और योग की तिकड़ी के बीच सामन्जस्य बिठा रहे थे. वह भी मूल गीता की आत्मा को ठेस पहुंचाए बिना. अपनी पूरी सहजता और विनम्रता के साथ. बचपन में मां रुक्मिणी देवी ने गीता की दुरुह व्याख्याओं को समझने में असमर्थता व्यक्त की थी. धुले जेल में विनोबा के सामने मजदूर और कैदी थे. अधिकांश अशिक्षित या अल्पशिक्षित. ऐसे जिज्ञासुओं के समक्ष वे गीता को गूढ़ रूप में प्रस्तुत कर ही नहीं सकते थे. गीता-प्रवचन के चैदहवें अध्याय का एक अंश देखिए और सोचिए क्या गीता के गूढ़ ज्ञान की इससे ज्यादा सरल-सहज और प्रवाहमयी व्याख्या दूसरी कोई हो सकती है, शायद नहीं…

      ‘यह स्वधर्म कैसे सुनिश्चित किया जाए?’ ऐसा कोई प्रश्न करे तो उसका उत्तर है’ ‘वह स्वाभाविक होता है’. स्वधर्म सहज होता है. उसे खोजने की कल्पना ही विचित्र मालूम होती है. मनुष्य के जन्म के साथ ही उसका स्वधर्म जन्मा है. बच्चे के लिये जैसे उसकी माँ नहीं खोजनी पड़ती, वैसे ही स्वधर्म भी किसी को खोजना नहीं पड़ता. वह तो पहले से ही प्राप्त है. हमारे जन्म के पहले भी दुनिया थी; और हमारे बाद भी वह रहेगी. हमारे पीछे भी एक बड़ा प्रवाह था और आगे भी वह है ही दृ ऐसे प्रवाह में हमारा जन्म हुआ है. जिन माँ-बाप के यहां मैंने जन्म लिया है, उनकी सेवा….जिन पास-पड़ोसियों के बीच मैं जन्मा हूँ, उनकी सेवादृ ये कर्म मुझे निसर्गतः ही मिले हैं. फिर मेरी वृत्तियां तो मेरे नित्य अनुभव की ही हैं न? मुझे भूख लगती है, प्यास लगती है; अतः भूखे को भोजन देना, प्यासे को पानी पिलाना, यह धर्म मुझे स्वतः ही प्राप्त हो गया. इस प्रकार यह सेवा रूप, भूत दयारूप स्वधर्म हमें खोजना नहीं पड़ता. जहां कहीं स्वधर्म की खोज हो रही है, वहां निश्चित समझ लेना चाहिये कि कुछ न कुछ अधर्म हो रहा है.’

      गीता पर इतना प्रभावोत्पादक सहज भाष्य दूसरा नहीं है. स्वयं विनोबा कहा करते थे—

     ‘नाम और रूप तो जाने वाला है, मेरे बाद क्या रह जाएगा. गीता प्रवचन और गीताई.’

विनोबा के जीवन में गीता का जो महत्त्व था, वह उनके इस कथन से स्पष्ट हो जाता है. उन्होंने अपना जीवन उसी आस्था और विश्वास के साथ जिया. पूरा जीवन वे तपस्वी, साधक कर्मयोगी और तत्वज्ञानी के रूप में जीते रहे. आजादी के दौरान अछूतोद्धार का कार्यक्रम भी गांधी जी और कांगे्रस के रचनात्मक कार्यक्रमों में सम्मिलित था. हालांकि वह गांधी जी द्वारा मजबूरी में लिया शामिल किया गया था. यहां अन्यथा न होगा यदि उसकी पृष्ठभूमि पर संक्षिप्त विचार कर लिया जाए.

      वस्तुतः गांधी जी से बहुत पहले ज्योतिबा फुले महाराष्ट्र में दलितों और पिछड़ों के बीच शिक्षा और समानता की अलख जगा चुके थे. यह संयोग ही है कि 1891 के जिस साल डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म हुआ था, उसी वर्ष ज्योतिबा फुले दिवंगत हुए थे. नियति मानो समानतावादी आंदोलन के एक पुरोधा को उत्पीड़ितों के हाथों से छीन रही थी, तो उन्हें दूसरे पुरोधा के हाथों में सौंपकर मानो उऋण भी हो जाना चाहती थी. गांधी जी के समय दलित आंदोलन का नेतृत्व डॉ. आंबेडकर के हाथों में था, जिनका दलितों के बीच लगभग उतना ही प्रभाव था, जितना भारतीय जनमानस पर गांधी जी का. डॉ. आंबेडकर ने महात्मा फुले के आंदोलन को न केवल गति प्रदान की थी, बल्कि दलितों और पिछड़ों को संगठित और अपनी अस्मिता के प्रति जागरूक करने में भी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त कर ली थी. जाति और उसके आधार पर उत्पीड़न के विरोध में लोग घरों से निकलने लगे थे. महाड़ सत्याग्रह ने शताब्दियों से चली आ रही अश्पृश्यता के ताबूत में कील ठोकने का काम किया था. दलित तेजी से एकजुट हो रहे थे. कांगे्रस समेत सभी दलों को यह लगने लगा था कि दलितों की मांगों को स्वीकार किए बिना आजादी की संगठित लड़ाई लड़ पाना असंभव है.

      ऐसा नहीं है कि डॉ. आंबेडकर भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में न थे. मगर दलितों का मान-सम्मान, उनकी अस्मिता की लड़ाई उनकी निगाह में अधिक महत्त्वपूर्ण थी. राजनीतिक आजादी से अधिक महत्ता वे सामाजिक आजादी को दे रहे थे. दूसरी ओर गांधी समेत कांग्रेसी नेता किसी भी तरह और जल्दी से जल्दी देश की राजनीतिक आजादी चाहते थे. इनमें गांधी जी का व्यवहार भले ही निस्पृह रहा हो, मगर अधिकांश कांग्रेसी नेताओं के मन में राजनीतिक आकांक्षाएं जन्म लेने लगी थीं और उसके लिए वे जल्दी से जल्दी आजादी चाहते थे. यह तभी संभव था, जब दलितों की सहानुभूति जीतकर उन्हें अपनी ओर मिला लिया जाए, जो बड़ी तेजी से डॉ. आंबेडकर के पीछे एकजुट हो रहे थे.

      दलितों की एकजुटता और उनके बीच डॉ. आंबेडकर के बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर गांधी जी का हरिजन प्रेम जोर पकड़ने लगा था. भारतीय समाज को आजादी की लड़ाई में एकजुट अंततः उन्हें कहना ही पड़ा कि ‘अश्पृश्यता हिंदू समाज पर कलंक है.’ वर्णव्यवस्था के प्रति पूर्ण आस्थावान गांधी के इस कथन में भले ही उनकी राजनीतिक चतुराई और तात्कालिक राजनीति पर छाए रहने की अभिलाषा छिपी हो, मगर अपने प्रत्येक कार्य को ईमानदारी और संकल्प-भावना से लेने वाले विनोबा ने इसे भी पूरी ईमानदारी के साथ अपने विचार एवं आचरण का हिस्सा बनाया. हालांकि विभेदकारी वर्ण-व्यवस्था में उनकी आस्था भी गांधी जैसी ही थी. साबरमती आश्रम में सभी को संडास की सफाई करनी पड़ती थी. विनोबा भी यह कार्य पूरे मनोयोग पूर्ण ढंग से करने लगे. एक ब्राह्मण होकर विनोबा का संडास की सफाई करना कस्तूरबा को बुरा लगता था. उन्होंने विनोबा को वहां से हटाकर दूसरा काम करने की सलाह दी. पर विनोबा नहीं माने. बल्कि उन्होंने आश्रम से बाहर दलित बस्तियों में भी संडास सफाई करना उन्होंने अपने रचनात्मक कार्यक्रम का हिस्सा बना लिया.

      एक घटना है. गांधी जी के अछूतोद्धार कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए विनोबा ने सुरंगांव नामक एक गांव को चुना था. यह उनके पवनार आश्रम के निकट पड़ता था. बीच में बहती थी एक नदी. विनोबा को नदी पैदल पार करके सुरंगांव तक जाना पड़ता था. पूरे तीन साल तक वे गांव की गलियों को बुहारते रहे. लोगों का पाखाना साफ करते रहे. एक बार बरसात का मौसम था. विनोबा पवनार से सुरंगांव के लिए निकले तो नदी में बाढ़ आई हुई थी. वे किनारे रुककर पार जाने का उपाय सोचते रहे. लेकिन नदी उफान पर थी. विनोबा को नियम टूटने का क्षोभ था. लेकिन बिना किसी साधन के नदी पार कर पाना भी असंभव था. आखिर प्राकृतिक कोप के आगे स्वयं को नतमस्तक करते हुए उन्होंने वापस लौटने का निर्णय ले लिया. गांव वाले कहीं यह न मान लें कि वे जानबूझकर नहीं आए, उन्होंने एक उपाय किया. नदी के दूसरे सिरे पर कुछ बच्चे बाढ़ का पानी देखने आए हुए थे. विनोबा ने उन्हीं को संबोधित कर जोर से कहा—

      ‘बच्चो, गांव के मंदिर जाकर भगवान को संदेश दो कि गांव का सफाईकर्मी आया हुआ है. परंतु नदी ने उसकी राह रोक ली थी, इसलिए उसको वापस लौटना पड़ा है.’ बच्चे जाने को मुड़े तो विनोबा ने पूछा—

      ‘अच्छा बोलो, भगवान से क्या कहोगे बच्चो?’

     ‘कहेंगे कि विनोबा जी आए थे, बाढ़ ने उनकी राह रोक ली.’ बच्चों में से एक ने बताया. मगर विनोबा को यह कहां मंजूर. इससे उनका उद्देश्य कहां पूरा होता था. वे और तेज आवाज में चीखकर बोले—

      ‘नहीं बच्चो, कहना कि गांव का सफाईकर्मी आया था. बाढ़ ने उनकी राह रोक ली.’

      यह एक घटना है जिससे स्पष्ट होता है कि विनोबा अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित और उसमें डूब जानेवाले इंसान थे.

 क्रमशः

© ओमप्रकाश कश्यप