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जाति और सामाजिक गतिशीलता

सामान्य

जीवन सभी का होता है. इतिहास भी सभी का होता है. जो लोग अपने इतिहास के प्रति उदासीन होते हैं, वे लुटेरों और आक्रामकों के इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं. लेकिन तब उनकी भूमिकाएं बदल जाती हैं. लुटेरे और आक्रामक इतिहास में दयालु और देशभक्त बन जाते हैं. जबकि कमजोर और अपने इतिहास के प्रति उदासीन सीधेसादे लोग लुटेरे, बेईमान और संस्कृति के दुश्मन घोषित कर दिए जाते हैं. इसीलिए गुणीजन कहते हैं, अपना इतिहास स्वयं लिखने की आदत डालो. लिखेलिखाए इतिहास पर भरोसा मत करो. यदि उसे पढ़ना मजबूरी है तो उसके पात्रों की भूमिका को बदलकर पढ़ो. उपलब्ध इतिहास का सच जानना है तो उसकी भूमिकाएं बदलकर पढ़ो.

भारतीय समाज, विशेषकर हिंदुओं में जाति के प्रश्न बहुत पुराने हैं. यह ऐसी हकीकत है जिसके कारण हिंदू धर्म को अनेकानेक आलोचनाएं झेलनी पड़ी हैं. इसका सहारा लेकर कथित ऊंची जातियां शताब्दियों से निम्नस्थ जातियों का शोषण करती आई हैं. इस कारण कुछ आलोचक जातिप्रथा को भारतीय समाज का कलंक मानते हैं. वे गलत नहीं हैं. आज भी समाज में जो भारी असमानता और ऊंचनीच है, आदमीआदमी के बीच गहरा भेदभाव हैजाति उसका बड़ा कारण है. समाजार्थिक समानता के लक्ष्य की यह आज भी सबसे बड़ी बाधा है. जातीय उत्पीड़न के शिकार समाज के दोतिहाई से अधिक लोग, निरंतर इसकी जकड़बंदी से बाहर आने को छटपटाते रहे हैं. यदाकदा उन्हें आंशिक सफलता भी मिली है. मगर आत्मविश्वास की कमी और बौद्धिक दासता की मनःस्थिति उन्हें बारबार कथित ऊंची जातियों का वर्चस्व स्वीकारने को बाध्य करती रही है. भारतीय समाज में जातिविधान इतना अधिक प्रभावकारी है कि सिख और इस्लाम जैसे धर्म भी, जिनमें जाति के लिए सिद्धांततः कोई स्थान नहीं हैइसके प्रभाव से अछूते नहीं हैं. इनमें सिख धर्म का तो जन्म ही जाति और धर्म पर आधारित विषमताओं के प्रतिकारस्वरूप हुआ था, जबकि इस्लाम की बुनियाद बराबरी और भाईचारे पर रखी गई थी. भारत में आने के बाद इस्लाम पर भी जातिभेद का रंग चढ़ चुका है.

जाति आधारित विभाजन पूरी तरह अमानवीय है. यह मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता में अवरोध उत्पन्न करता है. जाति और वर्ण की संकल्पना सामान्य मनोविज्ञान के भी विपरीत है, जिसके अनुसार जन्म के समय सभी शिशु एक समान होते हैं. उनका मस्तिष्क कोरी सलेट जैसा होता है. एकदम साफ. इबारत उसपर बाद में लिखी जाती है. ब्राह्मण और शूद्र के शिशुओं को यदि एक साथ, एक ही जंगल में छोड़ दिया जाए और उनसे किसी भी प्रकार का संपर्क न रखा जाए; तो समान अवधि के उपरांत दोनों की बौद्धिक परिपक्वता का स्तर लगभग एकसमान होगा. जो भी अंतर होगा, उसके पीछे उनकी देहयष्टि का योगदान होगा. लगभग वैसा ही विकास जैसा पशुओं और वन्य प्राणियों में दिखाई पड़ता है. जाहिर है मनुष्य अपने गुणकर्म और प्रवृत्तियां समाज में रहते हुए ग्रहण करता है. जातिव्यवस्था के अनुसार मान लिया जाता है कि फलां शिशु ‘पंडित’ के घर में जन्मा है, इसलिए उसमें जन्मजात पांडित्य है. जबकि शूद्र के घर में जन्म लेने वाले शिशु सामान्य बुद्धिविवेक से भी वंचित मान लिए जाते हैं. इसलिए उनका काम बताया जाता हैविप्र वर्ग की सेवा करना, उनकी चाकरी करते हुए जीवन बिताना. यह थोपी हुई दासता है, परंतु हिंदू परंपरा में इसे धर्म बताया गया है. बिना कोई शंका किए, चुपचाप परंपरानुसरण करते जाने को पुरुषार्थ की संज्ञा दी जाती रही है. इस तरह जो धर्म बुद्धिमत्तापूर्ण व्यवहार की अपेक्षा के साथ ब्राह्मण को शीर्ष पर रखता है, और प्रकांतर में मानवीय विवेक का सम्मान करता हैव्यवस्था बनते ही समाज के अस्सी प्रतिशत लोगों से बौद्धिक हस्तक्षेप और पसंदों का अधिकार छीनकर, पूरे समाज को नए ज्ञान का विरोधी बना देता है. हिंदू धर्म की यही विडंबना समयसमय पर उसके बौद्धिक एवं राजनीतिक पराभव का कारण बनी है. आज भी समाज में जो भारी असमानता और असंतोष है, उसके मूल में भी जाति ही है. जाति का लाभ उठा रहे वर्गों और जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे लोगों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि संस्कृति को लेकर जरासी बहस भी चले तो जनता का बड़ा हिस्सा उसपर संदेह करने लगता है. इससे कई बार धार्मिकसांस्कृतिक सुधारवादी आंदोलन भी खटाई में पड़ जाते हैं.

वैसे भी पांडित्य, चिंतनमनन और स्वाध्याय की उपलब्धि होता है. वह न तो बैठेठाले आ सकता है, न ही व्यक्ति का जन्मजात गुण हो सकता है. कथित दैवी अनुकंपा भी जड़बुद्धि व्यक्ति को पंडित नहीं बना सकती. दूसरी ओर जाति है कि उसके माध्यम से एक वर्ग जन्मजात पांडित्य के दावे के साथ हाजिर होता है तो दूसरा वर्ग ‘शासक’ के रूप में. फिर निहित स्वार्थ के लिए ये दोनों वर्ग संगठित होकर शेष समाज के लिए शोषक की भूमिका में आ जाते हैं. ‘पांडित्य’ को यदि ज्ञान का पर्याय भी मान लिया जाए तो वह स्वाभाविक रूप से व्यवहार का विषय होगा, अनुभव का विषय होगा, प्रदर्शन की वस्तु वह हरगिज नहीं हो सकता. यदि हम प्राचीन पुराणों और टीकाओं की बात करें तो उनमें दर्शित ज्ञान प्रदर्शन और महिमामंडन से आगे नहीं बढ़ पाता. पूरी की पूरी ब्राह्मण मेधा, कुछ अपवादों को छोड़कर, देवताओं के नखसिख वर्णन और उनके छलप्रपंच भरे काल्पनिक विजय अभियानों के बखान में लगी रहती है. मनुष्य का अस्तित्व, जिसने विषम परिस्थितियों से जूझकर, आपदाओं से निरंतर संघर्ष करते हुए इस धरती को रहने लायक बनाया है, इन ग्रंथों में बस एक दास जितना है. उपनिषदों में अवश्य कुछ श्रेष्ठ, श्रेष्ठतर और श्रेष्ठतम है, मगर उनमें भी जबरदस्त दोहराव है. बाकी सब आत्मरति और मनःरंजन का विषय तो हो सकता है. समाज का वास्तविक हित उससे सध ही नहीं सकता. इस वास्तविकता को जातिव्यवस्था के शीर्ष पर मौजूद लोग जानते जरूर थे, मगर निहित स्वार्थ की खातिर सत्य की ओर से मुंह फेरे रहते थे. उन्होंने शूद्रों के लिए धर्मग्रंथों का अध्ययन केवल इसलिए निषिद्ध नहीं किया कि वे उन्हें अपात्र मानते थे. डर यह भी था कि शूद्र यदि वेदादि धर्मग्रंथ पढे़ंगे तो उनमें दर्ज देवों की सत्ता लोलुपता, वासनाएं, साधारण सम्राट की तरह किए गए छलप्रपंच पर विमर्श करने का अधिकार भी उन्हें मिल जाएगा. क्योंकि धर्म और शास्त्र के नाम पर मनमानी तभी तक चल सकती है, जब तक सामनेवाला अनपढ़ हो, या उसे जानबूझकर अनपढ़ रखा गया हो. जब व्यक्ति जानने लगता है तो सवाल भी उठाने लगता है. संभवतः वे भूल गए थे कि नदी की तरह विचार भी निरंतर गतिशील रहने पर ही शुद्ध रह पाते हैं. ठहराव आते ही उनमें अशुद्धियां पनपने लगती हैं. आलोचना, विमर्श न हो तो परंपरा के नाम पर आडंबरों को खुली छूट मिल जाती है. जाति, धर्म और संस्कृति के नाम पर इस देश में यही हुआ. आड़ंबरपूर्ण शास्त्रीयता धीरेधीरे सभ्यता और संस्कृति के पाखंड में ढलती चली गई. ऐसा नहीं कि इसका विरोध नहीं हुआ. आडंबरवाद को प्रत्येक युग में लताड़ा गया, किंतु सत्ता के शिखर पर मौजूद लोग विरोध को हमेशा नजरंदाज करते रहे. विरोध में रचे गए साहित्य और कलाओं को पुराने जमाने के ‘गजनवियों’ द्वारा निमर्मतापूर्वक मिटाया जाता रहा.

कुछ देर के लिए यदि मान भी लिया जाए कि वर्णविभाजन तत्कालीन समाज में कार्यविभाजन के लिए आवश्यक था. हमारे पूर्वजों ने समाज की आवश्यकताओं, सुख एवं संसाधनों की वृद्धि हेतु बड़े ही बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से उसे चार वर्णों में विभाजित किया था. उनका ध्येय समाज के संपूर्ण सुख एवं संसाधनों में वृद्धि करना था. दूसरे शब्दों में जाति और वर्ण को यदि कार्यविभाजन की बेहतरीन पद्धति मान लिया जाए तो उन्हें अर्थशास्त्र का विषय होना चाहिए था. धर्म और संस्कृति का हिस्सा बनाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता. यदि यह कहा जाए कि प्राचीनकाल में सभी कुछ धर्म और संस्कृति का हिस्सा था….कि ‘अर्थशास्त्र’ में अर्थनीति, राजनीति, व्यवहारशास्त्र आदि सभी कुछ हैतो भी जातीयता की संकल्पना के चारपांच हजार वर्षों में उसपर कभी तो अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से विचार किया जाना था? आकलन किया जाता कि कार्यविभाजन की उस परंपरागत भारतीय प्रणाली की समसामयिक उपयोगिता कैसी और कितनी है? निष्पक्ष समीक्षा के बाद ही उन्हें बनाए रखने या हटाने का निर्णय लेना चाहिए था. जैसे यूनान में हुआ था. प्लेटो ने मनुष्यों को स्वर्ण, रजत और लौह वर्गों में बांटा था. उसने जन्म को उसके लिए आधार नहीं बनाया था. उसके द्वारा किए गए वर्गीकरण का आधार व्यक्ति के अपने गुण और प्रवृत्तियां थीं. तो भी अरस्तु को अपने गुरु का यह विचार जमा नहीं. उसने यह मानते हुए कि मानवव्यक्तित्व जटिल रचना है, और उसका इस तरह सरलीकरण नहीं किया जाना चाहिए, प्लेटो द्वारा किए गए वर्गीकरण को अनुपयुक्त मानकर उसे आधी शताब्दी से भी कम समय में नकार दिया था. भारत में ऐसा नहीं हुआ. इसलिए नहीं हुआ क्योंकि उस अवैज्ञानिक कार्यविभाजन को शिखरस्थ वर्गों का समर्थन प्राप्त था. सत्ताधारी वर्गों के स्वार्थ उससे जुड़े थे. उसके बहाने वे समाज के अधिकांश संसाधनों पर कब्जा जमाए रखते थे. इसलिए एक के बाद एक स्मृतिग्रंथ वर्णव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए रचे गए. सांस्कृतिक वैविध्य के मुखौटे में जातीय भेदभाव को बचाया गया.

गौरतलब है कि कार्यविभाजन समाज की आवश्यकता है. मनुष्य की अनेकानेक भौतिकअभौतिक आवश्यकताएं उससे जुड़ी होती हैं. इसलिए वही कार्यविभाजन श्रेष्ठ माना जाता है, जो मनुष्य की अधिकतम उत्पादकता को सामने लाए और जरूरत पड़ने पर उसमें सुधार भी कर सके. उत्पादकता के आकलन के नियम आज के नहीं है. कम से कम दो शताब्दियों से तो उनपर खुलकर विचार किया जा रहा है. जातिव्यवस्था उनके आगे कहीं नहीं टिकती. इसलिए वह आधुनिक विमर्श से बाहर है. केवल चलन में है. वह भी इसलिए कि जो वर्ग इससे लाभान्वित हैं, वे इसे छोड़ना नहीं चाहते. प्रत्यक्ष या परोक्ष हठ के द्वारा इसे अपनाए हुए हैं. अच्छा होता जातिव्यवस्था का मूल्यांकन भी व्यक्ति की सामाजिकआर्थिक और भौतिक जरूरतों के आधार पर किया जाता. यदि ऐसा होता तो उसकी परिभाषाओं पर बहस होती. उसकी समाजेतिहासिकता को बहुत पहले विमर्श में शामिल किया जाता. तब उन विसंगतियों से बचा जा सकता था, जो वर्ण के जाति में रूढ़ होने के साथसाथ जन्मीं और लगातार बढ़ती गईं. मगर भारत में कार्य(वर्ण) विभाजन को सामाजिकसांस्कृतिक सवाल बनाकर जानबूझकर समीक्षा से काट दिया. नतीजा यह हुआ कि जाति और वर्ण को लेकर पूरा समाज दो हिस्सों में बंट गया. एक वे जो उसका समर्थन करते हैं, दूसरे वे जो शताब्दियों तक जातीय शोषण का शिकार रहने के बाद आज उससे नफरत करते हैं. संख्या जातिव्यवस्था के आलोचकों की अधिक और निर्णायक है. लोकतांत्रिक दौर में विचार बहुमत को प्रभावित ही नहीं करते, उससे प्रभावित भी होते हैं, इसलिए जातिसमर्थकों के स्वर दबेदबे होते हैं. चूंकि मन से वे जातिभेद के समर्थक हैं तथा किसी न किसी रूप में उससे लाभान्वित भी हैं, इसलिए उनका अपना जीवन और चिंतन अंतर्विरोधों से भरा होता है. समाज का यह वर्ग आज भी जाति को अपनी अस्मिता का पर्याय समझता है; और वह चाहता है कि दूसरे वर्ग भी जाति की मर्यादाओं को समझें, इसलिए उन वर्गों के पास जो जातिअनुक्रम में निचले स्तर पर हैं, सीधे विरोध के अलावा और कोई रास्ता रह ही नहीं जाता. यह विरोध कभी धर्मांतरण के रूप में सामने आता है तो कभी जातीय संघर्ष के रूप में.

सवाल है कि चौतरफा विरोध और आलोचनाओं के बावजूद जाति जीवित क्यों है? विरोधों में डटे रहने की खुराक उसे कहां से मिलती है? प्रश्न भले ही नए लगें, इनका उत्तर अनजाना नहीं है. जैसा ऊपर कहा गया है, जाति यदि सचमुच कार्यविभाजन की जरूरत होती तो वह अर्थशास्त्र के विमर्श का विषय भी होती; या देरसवेर अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से उसकी समीक्षा की जाती. उस अवस्था में उसे बहुत पहले अप्रासंगिक मान लिया गया होता. मगर ऐसा कभी नहीं किया गया. इसलिए कि वह कार्यविभाजन की प्रणाली थी ही नहीं. असल में वह अभिजन हितों की सुरक्षा के लिए की गई असमानताकारी और स्वार्थपरक व्यवस्था थी, जिसमें शक्तिशाली वर्ग केवल अपनी जरूरतों के हिसाब से लोगों को अलगअलग पेशे में बांट रहे थे. फिर जैसेजैसे उस वर्ग की जरूरतें बढ़ी, जातियों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी होती गई. वह एक चालाकीभरा कदम था. उन अनेक कदमों में से एक जिन्हें अभिजन वर्ग शेष समाज पर अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए उठाता है. आर्थिकसामाजिक असमानता से ग्रस्त समाजों में मुट्ठीभर अभिजन सत्ताप्रतिष्ठानों पर कब्जा जमाए होते हैं. बाकी जनसमाज उनसे कहीं अधिक शक्तिशाली होने के बावजूद, बंटा होने के कारण अपनी वास्तविक शक्ति से अपरिचित होता है. शीर्षस्थ अभिजन उसे छोटेछोटे वर्गों में बांटकर उसकी प्रभावी शक्ति को कमजोर कर देते हैं, और उस बंटी हुई शक्ति को अपने हितों की सुरक्षा के लिए काम में लाते हैं. इससे गैरअभिजन वर्ग की शक्तियां अपने ही समूहों से टकराकर जाया होती रहती हैं. बंटा हुआ जनसमाज अपने ही सदस्यों पर संदेह करना है. चूंकि उत्पादकता के अधिकांश संसाधनों पर अभिजन समुदाय का अधिकार होता है, इसलिए रोजीरोटी की मजबूरियां भी गैरअभिजन समाज को अभिजनों के आदेशानुपालन हेतु विवश करती हैं. इस काम में धर्म और संस्कृति मददगार बनते हैं. अतः इस प्रश्न के उत्तर में कि जाति को विरोधों के बीच डटे रहने की खुराक कहां से मिलती है, विश्वासपूर्वक कहा जा सकता हैधर्म और संस्कृति से.

ऋग्वेद का पुरुषसूक्त जातिभेदवर्गभेद का बीजमंत्र है. उसमें लिखा है कि ब्राह्मण, ब्रह्मा के मुख से, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य उदर से तथा शूद्र उसके पैरों से जन्मे हैंꟷ‘ब्राह्मणोऽस्य मुखामासीद्वाहू राजन्यः कृतः. ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत.’ ब्रह्मा यहां समाज का प्रतीक हैं. इसका लक्ष्यार्थ है कि समाज में ज्ञान, व्यापार तथा सेवाकर्म चार प्रमुख अंग होते हैं. रूपक के चयन में भी चतुराई देखी जा सकती है. यदि सीधेसीधे कार्यविभाजन किया जाता तो देरसवेर लोगों का ध्यान उसके औचित्य पर भी जाता. ऐसा न हो इसलिए अभिजन वैदिक मनीषियों ने उसे सांस्कृतिक रूपक के माध्यम से प्रस्तुत किया था. ताकि उसको आस्था और विश्वास की साम्रगी के रूप में देखा जाए. आलंकारिक भाषा केवल कविता में ही फबती है. बौद्धिक विमर्श को उससे दूर रखने की सलाह दी जाती है. दरअसल मिथकों और बिंबों की विशेषता होती है कि उन्हें सामान्य विवेक के सहारे मनचाहा आकार दिया जा सकता है. वे सर्वसाधाराण की चेतना का हिस्सा भले हों, मगर समयसमय पर उनकी ऐसी व्याख्याएं होती रहती हैं जो उनकी मूल संकल्पना से एकदम अलग होती हैं. जैसे इंद्र का मिथक. वह एक ओर देवराज है. दूसरी ओर देवताओं में ही सबसे बड़ा खलनायक. गिरे हुए चरित्र का स्वामी, जिसे अपने सिंहासन के खिसकने का भय हमेशा सताता रहता है. इसकी प्रतीकात्मकता को देखें तो सत्ता छिन जाने का भय केवल इंद्र का भय नहीं था. यह हर उस राजा का डर हो सकता है, जो प्रजा कल्याण से दूर, केवल भोगविलास में लिप्त रहता है. बावजूद इसके देवराज इंद्र के मिथक के जरिये उस ओर हमारा ध्यान नहीं जाता. इसलिए कि वह भौतिक जगत का न होकर, सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा है; और संस्कृति को प्रायः आस्था और विश्वास का विषय माना जाता है. इंद्र उन देवताओं का सम्राट है जिन्हें मत्र्य जीवन के कष्टों का सामना नहीं करना पड़ता. मिथकों के विरूपण या उनकी नवव्याख्याओं के पीछे सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही प्रकार के दृष्टिकोण हो सकते हैं. कुल मिलाकर मिथक उससे अपने परंपरागत संदर्भों से कट सकता है. अतएव मिथक को यथार्थ मानना, ‘ईश्वर की मूर्ति है, इसलिए ईश्वर भी है’जैसा ही भ्रांत धारणा है. इसके बावजूद परंपरावादियों का जातीय विभाजन को लेकर ब्रह्मा के मिथक में विश्वास आज भी बना हुआ है. गीता में कृष्ण स्वयं को विराट पुरुष के रूप में पेश कर, वर्णभेद की इसी संकल्पना को आगे बढ़ाते हैंꟷ‘चातुर्वर्णमरूपक मयास्रष्ठं गुणकर्म विभागभ्य’….‘मैंने चार प्रकार के मनुष्यों की रचना की है. उनके गुण, स्वभाव के आधार पर उन्हें वर्णों में विभाजित किया है.’ दबे स्वर में ही सही, परंपरावादी आज भी इन घिसेपिटे तर्कों को आगे बढ़ाकर असमानताकारी जातिव्यवस्था के पोषण में लगे रहते हैं.

कुछ विद्वानों के अनुसार पुरुषसूक्त ऋग्वेद का प्रक्षेपित हिस्सा है. इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता. ऋग्वेद आर्यों की कई शताब्दियों की यादों को समेटे हुए है. उसका आरंभिक हिस्सा तब का है जब आर्य भारतभूमि पर पांव जमाने का प्रयास ही कर रहे थे. उस समय तक वर्णव्यवस्था इतनी जटिल नहीं हुई थी. वैसे भी ब्रह्मा प्राचीनतम देवता नहीं है. भारत में शिव और बाकी सभ्यताओं में सूर्य प्राचीनतम देवता रहे हैं. आरंभ में शूद्र राजन्य और ब्राह्मण केवल तीन वर्ण थे. इसके साथ ही ऋक्, यर्जु, साम तीन वेद. वेद त्रयी और वर्णत्रयी का साम्य था. कालांतर में जब शूद्रों के एक वर्ग ने स्वयं को आर्थिक रूप से संपन्न कर लिया तो उसकी उपेक्षा कर पाना असंभव हो गया. चौथे वर्ग की कल्पना करनी पड़ी. यजुर्वेद में वैश्य और क्षत्रियों को सजातीय कहा गया है. इसलिए जब तक वेद तीन रहे, तब तक तीन वर्ण भी मान्य रहे होंगे. कालांतर में चौथे वर्ण को मान्यता मिली तो अथर्ववेद के रूप में चौथे वेद को भी स्वीकार किया जाने लगा. हालांकि इनमें पहले क्या हुआ? पहले चौथे वर्ण को मान्यता मिली या चौथे वेद को यह शोध का विषय है. कल्पना की जा सकती है कि दोनों का समय आसपास का रहा होगा. ऐसे में परमपुरुष की अवधारणा; यानी पुरुष सूक्त की रचना ईसा से पांच से आठ सौ वर्ष पहले तक की हो सकती है.

आरंभ में वर्ण इतने रूढ नहीं थे. आरंभिक ग्रंथों में अनुलोम और विलोम दोनों ही प्रकार के अंतरण के उदाहरण मिलते हैं. यह अंतरण तत्कालीन परिस्थितियों में जब आर्य और मूल निवासी घुलनेमिलने की कोशिश में थे, स्वाभाविक था. आर्यों ने भारत भूमि पर आक्रामक के रूप में प्रवेश किया. वे यहां पहले से रह रहे मूल निवासियों की अपेक्षा निपुण लड़ाके, रणकौशल में पारंगत थे. उत्तरी एशिया से भारत तक पहुंचने में उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. उनकी अपेक्षा इस देश के मूल निवासी शांतिप्रिय और अपने संतोष के साथ जीवन जीने वाले थे. मूल निवासी अनेक कबीलों में बंटे थे, किंतु लंबे समय तक साथ रहने के बाद वे सहअस्तित्व की कला में निपुण होने लगे थे. धर्मशास्त्रों में देवासुर संग्राम के अनेक उल्लेख हैं, मगर ऐसा कोई उल्लेख नहीं है जो दैत्यों के आपसी वैमनस्य को दर्शाता हो. बहरहाल एक लंबी संघर्षपूर्ण यात्रा के अनुभव के बाद आर्यों का कुशल रणनीतिकार के रूप में उभरना स्वाभाविक था. बावजूद इसके भारत के मूल निवासियों को अपने साथ जोड़ना, उनपर अपना सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करना आसान नहीं था. हड़प्पा और मोनजोदाड़ो से प्राप्त अवशेष बताते हैं कि भारतीय मूल निवासी एक समृद्ध संस्कृति के वासी थे. कदाचित उनकी समृद्धि ही आर्यों को मध्यएशिया से भारत तक खींच कर लाई थी. यात्रा के दौरान आर्यों ने जहां आवश्यक समझा, वहां युद्ध किया. जहां लगा कि युद्ध के माध्यम से ऐच्छिक परिणाम तक पहुंचना असंभव है, वहां उन्होंने युद्धेत्तर नीतियों का सहारा लिया.

उदाहरण के लिए शिव भारत की आदिम जातियों के आराध्य थे. उनका सभी समूहों पर प्रभाव था. मूल निवासी कबीलों को प्रसन्न करने के लिए शिव को प्रसन्न करना अनिवार्य था. इसके लिए आर्यों ने उनके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए. उन्हें महादेव की पदवी दी. पार्वती आर्य सम्राट हिमवान की पुत्री थी. शिव को अपना जामाता बना लेने के बाद आर्यों की मुश्किलें आसान होने लगीं. शिव का स्थानीय कबीलों के सर्वमान्य मुखिया थे. मिलीजुली सभ्यता की खातिर उन्होंने आर्यों तथा प्राचीन कबीलों के मध्यस्थ का काम किया. शिव के सहयोगी के रूप में भूत, पिशाच, प्रेत आदि को हम भारत के आदिम कबीलों के प्रतीक के रूप में देख सकते हैं. चतुराईपूर्वक आर्यों ने शिव को तो अपनाया, उन्हें अपने आराध्य और ‘महादेव’ का दर्जा दिया. अपनी प्रवृत्ति के अनुसार उनसे हितसाधन किया. लेकिन शिव के सहयोगी भारत की प्राचीन कबीलों को, जिनके वे नेता और आराध्य थे, पूरी तरह उपेक्षा की. उन्हें असभ्य मानते हुए भूत, प्रेत, कापालिक आदि कहा गया. नतीजा यह हुआ कि शिव का तो दैवीकरण हुआ, किंतु उनके सहयोगी कबीलों की पूरी तरह उपेक्षा हुई. उन्हें ऐसा ही दर्शाया जैसा विकसित सभ्यता पर गर्वाए सत्ताधीश करते हैं. बख्शा शिव को भी नहीं गया. उन्हें आक, धतूरा खाने वाला, भभूत लगाकर रमने वाले अवधूत की तरह दर्शाया गया. इससे सृष्टि को चलाने की जिम्मेदारी ‘ब्राह्मण ब्रह्मा’ तथा उसके सहयोगी ‘क्षत्रिय विष्णु’ पर आ गई. इसके बावजूद एक डर उनके मन में हमेशा बना रहा. उस डर ने ही शिव को मृत्यु के देवता का पद देने को बाध्य किया. शिव की तीसरी आंख दरअसल जनसंस्कृति के वाहक उन कबीलों की सम्मिलित ताकत और विद्रोह शक्ति का प्रतीक है, जिन्हें भूत, प्रेत, कापालिक आदि कहा जाता है और जिनके मुखिया शिव थे. किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसकी जनता में निहित होती है. राज्य केवल उसका प्रतीक होता है. जनता यदि कुपित हो जाए तो बड़ी से बड़ी सामरिक शक्ति को मिट्टी में मिला सकता है. चूंकि शिव के पीछे कबीलों की शक्ति थी, इसलिए उन्हें महादेव, मृत्यु का देवता जैसा पद दिया गया. उनकी तीसरी आंख खुलने का अभिप्राय था, समर्थक कबीलों के साथ विद्रोह पर उतर आना, जिनसे अल्पसंख्यक अभिजात तथा उनके कथित देवता भय खाते थे.

महाकाव्य काल में ही वर्ण जातियों में ढलने लगे थे. व्यक्ति के अपने कौशल का कोई महत्त्व नहीं रह गया था. कर्ण और एकलव्य ऐसे ही उदाहरण हैं. जो उस समय की व्यवस्था के अनुसार क्षत्रिय नहीं थे. लेकिन दोनों ने ही स्वयं को धनुर्विद्या में अत्यंत निपुण बना लिया था. महाभारत युद्ध में दुर्योधन के पक्ष में होने के बावजूद कर्ण को बारबार आहत और अपमानित होना पड़ता है. वहीं एकलव्य के वाणकौशल से विस्मित द्रोणाचार्य उसका अंगूठा ही मांग लेता है. हालांकि इस युग तक जाति को रूढ बनाने का विरोध भी जारी रहा. लोग जातिविहीन सभ्यता की याद भी दिलाते रहते थे, जैसे महाभारत के शांतिपर्व में कहा गयाꟷ‘असलियत में वर्णविभाजन जैसी कोई चीज नहीं है. यह पूरी सृष्टि ब्रह्म है, क्योंकि इसे ब्रह्मा ने बनाया है.’ इस प्रसंग की यदि एकलव्य और कर्ण के प्रकरण से तुलना की जाए तो उस सभ्यता के विरोधाभास सामने आने लगते हैं. लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि ‘जय’ से ‘विजय’, ‘विजय’ से ‘भारत’ और फिर ‘महाभारत’ तक की यात्रा अनेक विरोधाभासों से भरी है. इसलिए कि हर मनीषी ने सत्य को अपनी तरह से देखा और उसे प्रक्षेपण का हिस्सा बना दिया.

बाद के धर्मग्रंथों में रक्तशुद्धता एवं कुलीनता पर काफी जोर दिया गया, लेकिन आरंभ में ऐसा न था. आर्यों के आगमन के साथ ही उनका यहां रह रही प्राचीन जातियों के साथ सम्मिलन शुरू हो चुका था. भारत में आर्यों का आगमन एक समूह में नहीं रहा. वे अनेक बार टुकड़ोंटुकड़ों में आए थे. इस बात की प्रबल संभावना है कि जो आरंभिक कबीले भारत तक पहुंचे हों उनमें स्त्री सदस्यों की संख्या आनुपातिक रूप से कम रही हो; या हो सकता है कि लंबी यात्रा के पश्चात भारत तक पहुंचने में उनका लिंगानुपात गड़बड़ा गया हो. इसलिए आरंभ में ही हम अंतवर्गीय संबंधों की बहुलता देखते हैं. व्यवस्था की गई कि स्त्री किसी भी वर्ग की हो, उससे उत्पन्न संतान पिता के गौत्र की होगी. मनुस्मृति में कहा गया, ‘वैध दांपत्य में बंधने के बाद स्त्री अपने पति के वर्ण में सम्मिलित हो जाती है, ठीक ऐसे ही जैसे नदी सागर में मिलकर उसके गुणों को धारण कर लेती है.’(मनुस्मृति 9/22). उदाहरण कई हैं. वशिष्ट की पत्नी अक्षमाला निम्न जाति की स्त्री थी. इसी प्रकार सारंग मुनि की पत्नी भी निम्न वर्ण से आती थी. भविष्य पुराण के अनुसार शृंग ऋषि हरिणी के गर्भ से उत्पन्न थे. पराशर चांडाल स्त्री की संतान हैं, व्यास केवट पुत्री मत्स्यगंधा की. वशिष्ट वेश्या के गर्भ से जन्मते हैं. अपनी लग्न और प्रतिभा के बल पर वे ब्राह्मण बनते हैं. भिन्न वर्णों के बीच विवाह सामान्य थे. क्षत्रिय सम्राट ययाति की एक पत्नी देवयानी ब्राह्मणसुता थी, दूसरी असुर राज की बेटी. बाद में रक्त शुद्धता की अवधारणा विकसित होने पर, आर्यों ने प्राचीन अंतर्जातीय संबंधों को वैध बनाने अथवा चमत्कार सिद्ध करने के लिए उन्हें मिथकीय आख्यानों का हिस्सा बना लिया. लोग उन दिनों चमत्कार पर भरोसा भी खूब करते थे. यदि आकस्मिक रूप से कुछ हो जाए तो उसे दैवी कृपा मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेते थे. इसके फलस्वरूप लोकमहत्त्व के विभिन्न मुद्दों को लेकर ब्राह्मणवादी नजरिये से कहानियां गढ़ी जाने लगीं.

अपनी प्रतिभा और लगन के बल पर दूसरे वर्ग में अंतरण के भी अनेक उदाहरण धर्मग्रंथों में उपलब्ध हैं. विश्वामित्र के क्षत्रिय कुल से ब्राह्मण वर्ग में दाखिल होने का किस्सा तो जानापहचाना है. क्षत्रिय दिवोदास का पुत्र मैत्रेय ब्राह्मण बनता है. हरिवंश पुराण के अनुसार वैश्य पुत्र नाभाग और अरिष्ट ब्राह्मण कुल में शामिल होते हैं. वर्णअंतरण को लेकर सत्यकाम जाबाल का किस्सा भी खूब चर्चित है. सत्यकाम दासीपुत्र था. उसने गुरु की शरण में जाकर शिक्षा लेने की इच्छा व्यक्त की तो गुरु ने उसका नाम, गौत्र आदि पूछा. सत्यकाम ने घर आकर यही प्रश्न अपनी मां से किया. तब मां ने बताया, ‘पुत्र, दासी होने के कारण मुझे अनेक घरों में काम के लिए जाना पड़ता है. एक घर से दूसरे घर की यात्रा के दौरान तू कब मेरे गर्भ में आ गया, मुझे नहीं पता. तू सत्यकाम है. मेरा नाम जाबाला है. सो तू सत्यकाम जाबाल हुआ.’ सत्यकाम यही बात गुरु से बता देता है. गुरु उसके सत्यवाचन से प्रसन्न होकर दीक्षा देने के लिए तैयार हो जाते हैं. यही सत्यकाम जाबाल आगे चलकर वेदमंत्रों के रचियता के रूप में उभरता है.

जाति प्रथा चलते ही यह संभव हुआ कि पंडित के घर पंडितजी जन्म लेने लगे. यदि सबकुछ बिना किए जन्म ही से प्राप्त है तो कुछ और पाने के लिए गुणवत्ता को क्यों बढ़ाया जाए! इसलिए तप और स्वाध्याय का अभिप्राय रामराम जपने तक सिमट गया और अध्यापन कर्मकांड तक. लोग सोलह पृष्ठ की पंजिका पढ़कर ‘पंडित’ कहलाने लगे. बिना ‘सत्य’ और ‘सत्यनारायण’ वाली ‘सत्यनारायण की कथा’ घरघर बंचीबंचवाई जाने लगी. उन कहानियों में आदमी की पहचान जाति से जुड़ी थी. जानते सब थे कि जन्म आधारित वर्गीकरण मनुष्य के मूल स्वभाव के विरुद्ध है. दो व्यक्ति कभीभी पूरी तरह से एक हो ही नहीं सकते. इसलिए किसी एक की परिस्थितियों पर विचार कर हूहू वही निर्णय दूसरे के लिए नहीं लिया जा सकता. चूंकि यह मनुष्य की प्रवृत्ति के विरुद्ध है, समाजीकरण की धारा के विरुद्ध है, इसलिए व्यक्ति केवल परंपराएं ढोता रहा. समाज जड़ और लोग यथास्थितिवादी बन गए. जाति ने लोगों से उनका विवेक, चयन का अधिकार छीनकर उन्हें एक नशा थमा दिया. बिना कुछ किएधरे खास होने का नशा. जाति आधारित विभाजन की खूबी है कि उसमें हर कोई खास होता है. हालांकि खासियत के लिए उसका अपना कोई योगदान नहीं होता. बस अपनी लकीर के बराबर में मनमाफिक थोड़ी छोटी लकीर खींच लेता है. इसलिए कि वह जातीय पायदान पर अपने से नीचे के किसी कम खास की उपस्थिति मानकर मन को तसल्ली देने लगता है. दूसरा चाहे उसका विरोध करे, और विरोध होता ही है, फिर भी वह खुद को ‘अपने मुंह मिंया मिट्ठू’ बनने से रोक नहीं पाता. चूंकि जाति पर उसका जोर नहीं चलता, इसलिए जिस जाति वर्ग में वह जन्म लेता है, उसे अपनी नियति मानकर जीवन से समझौता किए रहता है. इससे भाग्यवाद और नियतिवाद को बढ़ावा मिलता है, जो परिवर्तनकामी आंदोलनों की आंच पर राख डालते रहने का काम करता है.

विद्वानों ने जातिप्रथा की आलोचना की. कहा कि जाति ऐसी व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति अपनी मर्जी से शामिल नहीं होता. जन्म व्यक्ति की जाति निर्धारित करता है, फिर मनुष्य मृत्युपर्यंत उसके चंगुल से निकल नहीं पाता. दूसरे शब्दों में जाति व्यक्ति की नैसर्गिक स्वतंत्रता का हनन करती है. यह कार्यविभाजन की असमानताकारी निकृष्ट शैली है. यह व्यक्ति के चयन के अधिकार को बाधित करती है. जन्मना जाति मनुष्य का कुदरत के नाम पर लगाया गया बदसूरत ठप्पा है, जो मनुष्यता का अवमूल्यन करता है. कहीं आनेजाने, पेशा बदल देने से व्यक्ति की जाति में कोई बदलाव नहीं आता. फिर भी कुछ विद्वान जाति के जड़ स्वभाव के कारण ही उसे पसंद करते रहे. जाति उनके द्वारा भारतीय समाज और संस्कृति के महिमामंडन का कारण बनी. उनमें प्रायः वही लोग थे, जो समाज के शीर्ष पर विराजमान, समस्त संसाधनों पर कुंडली मारे नजर आते हैं. समयसमय पर ऐसे कार्यकर्ता और विद्वान भी हुए हैं जिन्होंने जाति प्रथा का जमकर विरोध किया. जाति और जन्म के आधार पर पक्षपात करनेवालों को बुरी तरह से लताड़ा. समयसमय पर जातिविरोधी आंदोलन चले. कह सकते हैं जाति का जब से जन्म हुआ, जब से उसने समाज को जकड़ना आरंभ किया, तभी से उसपर हमले आरंभ हो चुके थे.

ज्ञात इतिहास में जाति प्रथा को सबसे पहली चुनौती गौतम बुद्ध ने दी थी. उन्होंने भिक्षु संघ की स्थापना की, जिसमें जाति संबंधी किसी भी प्रकार का पक्षपात न था. मध्यकाल में संत कवियों ने जाति को भारतीय समाज का कलंक मानते हुए जन्म के आधार पर आदमीआदमी में भेद करने वालों को धिक्कारा. तीखे शब्दों में उनकी आलोचना कीꟷ‘जो तू कहे बाहमन का जाया, और मार्ग ने क्यों न आया.’(कबीर). बावजूद इसके जाति का बाल भी बांका न हुआ. इसलिए कि बहुत पहले से इसे रोजीरोटी से जोड़ दिया गया था. उस व्यवस्था में समस्त संसाधनों पर कथित ऊंची जातियों का कब्जा था. क्षत्रिय को हथियार उठाने का अधिकार दिया गया था. ब्राह्मण को सलाह देने का. इन दोनों ने बाकी वर्गों को उभरने ही नहीं दिया. जिसने विरोध किया, उसको दंडित किया गया. धीरेधीरे ये जातियां व्यवस्था से अनुकूलित होती गईं. धर्म ने इसमें मदद की. पिछला जन्म किसी ने देखा नहीं था, न उसका कोई प्रमाण ही था. बावजूद इसके हिंदुओं में कर्मसिद्धांत की ऐसी आंधी चली कि अच्छेअच्छों के विवेक को उड़ाकर ले गईं. लोग लकीर पीटने के अभ्यासी होते चले गए. शताब्दियों तक ऐसा ही चलता रहा.

गौरतलब है कि गौतम बुद्ध ने जाति व्यवस्था के विरोध में सीधे कुछ नहीं कहा था. केवल भिक्षुसंघ में सभी जातिवर्ग के लोगों को प्रवेश देकर बराबरी का संदेश दिया था. लेकिन उसका चामत्कारिक असर हुआ. धार्मिक बंधन शिथिल पड़ने से लोग, विशेषकर कर्मकार जातियां भविष्य के बारे में नए सिरे से सोचने को उद्धत हुए. संसाधनों की कमी को उन्होंने अपने संगठनसामथ्र्य से पाटा. भारतीय शिल्पकार संगठन हालांकि पहले से ही अंतद्र्वीपीय बाजार में आगे थे. गौतम बुद्ध के समय में उसमें बहुत तेजी से वृद्धि हुई. तेली, चर्मकार, बुनकर, काष्ठकार, रंगरेज, राजमिस्त्री, गुड़ बनाने वाले, रथवाह आदि जितने भी शिल्पकार वर्ग थे, उन सबके अपनेअपने व्यावसायिक संगठन थे. वैदिक परंपरा में प्रतिवर्ष लाखों पशुओं की यज्ञों में दी जानेवाली बलियों के कारण तत्कालीन समाज की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ा था. बौद्ध और जैन दर्शन के प्रभाव में बलि में कमी आई थी. बचा हुआ पशुधन किसानों और पशुपालन द्वारा आजीविका चलाने वाली जातियों के लिए आर्थिक रूप से बहुत मददगार सिद्ध हुआ था. इसका प्रभाव उस समय के व्यापार पर पड़ा था. उसमें तेजी आई. सहयोगाधारित उन व्यापारिक संगठनों को श्रेणि, पूग, गिल्ड, व्रात्य, संघ आदि कहा जाता था. चंद्रगुप्त मौर्य तक तो श्रेणियां खुद को प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित कर चुकी थीं. श्रेणियों की शक्ति का आकलन इससे भी किया जा सकता था कि कौटिल्य उनके संगठनों को राज्य पर संकट की संभावना के रूप में देखता है. इसलिए उसने श्रेणियों पर नजर रखने की अनुशंसा ‘अर्थशास्त्र’ में की थी. श्रेणियों की आर्थिक हैसियत ऊंची थी. वे जरूरतमंद राजाओं की आर्थिक मदद भी खूब करती थीं. ईसा पूर्व दोतीन सौ वर्ष के समय को अनेक विद्वान भारत का स्वर्णकाल मानते हैं. उसके पीछे शिल्पकार संगठनों का बड़ा योगदान था. अर्थव्यवस्था विकेंद्रीकृत थी. गांव संपन्न, आत्मनिर्भर इकाई. धीरेधीरे श्रेणियों का पतन होने लगा. दूसरीतीसरी शताब्दी में उनके कारोबार में मंदी आने लगी थी. इसका पहला कारण बौद्ध धर्म के कमजोर पड़ते ही जातिवादी बंधनों का एक बार फिर मजबूत हो जाना था. व्यापारी संगठन को चलाने के लिए अनेक प्रकार के शिल्पकारों की जरूरत पड़ती थी. पहले वे अपनी जातीय शुचिता को बिसराकर साथसाथ काम करते थे. जातीय अनुशासन मजबूत होने से एकजुट होकर काम करना कठिन हो गया. देश छोटेछोटे राज्यों में बंटने लगा था. खुलकर व्यापार करना कठिन होता गया. श्रेणियों के कारोबार में कमी आई. शिल्पकार संगठन बिखरने से लोग एक बार फिर अपनीअपनी जाति के दड़बों में लौटने लगे. इस तरह जातीयता के बंधनों के शिथिल पड़ने की जो शुरुआत बुद्ध के समय हुई थी, उसपर पानी फिरने लगा. आगे चलकर वर्णव्यवस्था और भी रूढ़ होने लगी. उससे नईनई जातियां बनने लगीं. जातीय शुचिता के नाम पर भेदभाव परोसा जाने लगा.

मध्यकाल में जाति विरोधी आंदोलन के सूत्रधार संतकवि थे. संत रैदास, कबीर, दादू, आदि समाज के निचले वर्गों से आए थे. जो जातीय उत्पीड़न का शिकार थे. इसलिए उन्होंने जातिआधारित ऊंचनीच को अपनी समानताधारित समाज की स्थापना के सपने का अवरोधक माना था. लेकिन समानता से उनका आशय बस इतना था कि गरीबगरीब रहे, अमीरअमीर और सब अपनेअपने संतोष के साथ जीना सीख लें. बावजूद इसके संत कवि जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे लोगों की उम्मीद का केंद्र थे. इसलिए वे संत कवियों के आसपास जुटने लगे. जातिभेद को बढ़ावा देने के लिए संत कवियों ने ब्राह्मणों एवं जाति के पैरोकारों को ललकारा. लेकिन कुछ खास नहीं कर पाए. बहुत जल्दी उनके आंदोलन को संस्कृति का हिस्सा बनाकर हिंदू धर्म में समाहित कर लिया गया. सामंतवादी दौर में उनकी आर्त्त पुकार झोपडि़यों और चौराहों पर दम तोड़ने लगी. जाति को सामाजिक असमानता एवं अंतर्द्वंद्वों का कारण मानते हुए विवेकानंद, दयानंद आदि ने भी उसकी आलोचना की. लेकिन परिणाम लगभग शून्य ही निकला. उनकी असफलता के कारण एकदम स्पष्ट थे. वे विचारक चाहते थे कि कथित ऊंची जातियां अपने से निम्न जातियों के प्रति करुणाभाव लाएं और अपने मन से ऊंचनीच की भावना को निकाल फैंकें. प्रकारांतर में जाति उन्मूलन उनके लिए शीर्षस्थ जातियों की कृपा पर टिका ऐच्छिक प्रश्न था. विचारक शीर्ष जातियों से अपेक्षा करते थे कि वे अपना बड़प्पन दिखाते हुए जातीय भेदभाव को दिल से निकाल फेंकें और पिछड़े वर्गों के साथ करुणा के साथ पेश आएं. यह ठीक ऐसा ही था, जैसे ‘ट्रस्टीशिप’ के सहारे गांधी जी ने जमींदारों और पूंजीपतियों से दुर्बल और आर्थिक रूप से विपन्न लोगों के पक्ष में, अपने संपत्ति अधिकार समाज को सौंप देंने का आवाह्न किया था. जबकि मुफ्त में मिलने वाला सम्मान हो या सुविधाएं, शिखरस्थ वर्ग अपनी मर्जी से कुछ भी छोड़ने को तैयार न थे. अतएव इन महापुरुषों की सदेच्छाओं तथा वक्त की जरूरत होने के बावजूद जाति की सामाजिक सत्ता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. फिर भी उन महापुरुषों के प्रयास निरर्थक नहीं गए. उनके अनथक प्रयत्नों के फलस्वरूप समाज में थोड़ी हलचल अवश्य मची. लोग धर्म और जाति के नाम पर होने पाखंड के प्रति एकजुट होने लगे. जिससे समाज सुधार के आंदोलनों को प्रेरणा मिली. उसके फलस्वरूप विचारकों का ध्यान निचले वर्गों समस्याओं की ओर गया.

जाति विरोधी प्रयासों की असफलता के कुछ कारण एकदम साफ थे. जातीय संरचना के संगठन से जुड़ी, उसके बनाए रखने की समर्थक जातियों की मूल प्रवृत्ति कछुए के समान थी. परिस्थितियां प्रतिकूल हों तो वे कछुए की भांति अपने अंगप्रत्यंगों को धर्म के कवच में ढक लेती थीं. परिस्थितियां अनुकूल होते ही अपने पैने नखदंतों के साथ वे अपने आलोचकों पर आक्रामक होकर जातीयता के बंधनों को और भी कसने लगती थीं. जैसा लगभग 1900 वर्ष पहले बौद्ध धर्म के अवसान के समय देखने को मिला. बुद्ध ने जाति का सीधे विरोध नहीं किया था. मगर उनके बौद्ध विहारों के दरबार सभी जातिवर्गों के लिए खुले थे. उन्होंने हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों और बलिप्रथा के माध्यम से उसपर गहरी चोट की. बावजूद इसके बौद्ध दर्शन ने जितनी चोट वैदिक धर्मदर्शन पर की थी, उतनी चोट जाति प्रथा पर नहीं कर सका. उनका विरोध मुख्यतः हिंदू धर्म में व्याप्त कर्मकांड तथा बलि प्रथा से था. जो सामाजिक असमानता को सांस्थानिक बनाते थे. इसलिए जाति उन्हें अपनी संघीय मान्यताओं की अवरोधक लगी. चूंकि बौद्ध दर्शन धर्म की अधीनता में जाति व्यवस्था का विरोध करता था, इसलिए उसका जाति पर वास्तविक प्रभाव बहुत ही कम पड़ा.

जाति और सामाजिक गतिशीलता

जाति हिंदू धर्म की मानस रचना है. उसका पूरा कारोबार धर्म के सहारे चलता है. हिंदू धर्म मजबूत, तो जाति मजबूत. हिंदू धर्म शिथिल तो जाति बंधन शिथिल. बौद्ध धर्म ने हिंदू धर्म को पाश्र्व में ढकेला तो जाति भी नेपथ्य में जाने लगी थी. अठारहवीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के कमजोर होने के साथ हिंदू धर्म ने अपनी जड़ें दुबारा मजबूत कीं तो जाति भी सिर उठाने लगी. महाराष्ट्र, दक्षिण भारत, बंगाल यानी जहांजहां हिंदू धर्म पुनर्जागरण की ओर बढ़ा, वहांवहां जाति भी पांव पसारने लगी. हिंदू धर्माचार्यों में से अनेक आज भी जाति को हिंदू धर्म का आभूषण समझते हैं. उन्हें आज भी लगता है कि जाति के न रहने पर धर्म संकट में पड़ सकता है. इसलिए आजादी के सातवें दशक में भी दलितों को मंदिर की चौखट पर देख उन्हें अपना धर्म संकट में नजर आने लगता है. विषम परिस्थितियों में भी वे शांत नहीं बैठते. जबतब जाति विरोधी आंदोलन होते हैं, जब उनमें लगे लोगों को लगता है कि वे बस जीतने ही वाले हैं, जाति का जनाजा अब उठा कि बस अब उठा; तब तब वे ऐसी चाल चलते हैं कि परिवर्तन और सुधार की सारी संभावनाओं पर पानी फिर जाता है. जाति समर्थक लोग धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीयता की आड़ में, बहुत तसल्ली के साथ जाति को तरहतरह से मजबूत कर, सामाजिक व्यवहार के केंद्र में बनाए रखने हेतु जुटे होते हैं. उनके प्रयास बहुत ही महीन, आसानी से न समझ में आनेवाले होते हैं. जिन दिनों बौद्ध धर्म प्रभाव में था, उन दिनों पुराणों और स्मृतियों के लेखन में तेजी आई थी. मध्यकाल में किस्सेकहानियों के माध्यम से ब्राह्मणवाद में जान फूंकी गई तो भक्ति साहित्य में जाति को बचाए रखने का काम तुलसी, सूरदास, मीरा, हरिदास जैसे भक्त कवियों ने किया. इन दिनों कानून के दखल से जाति संबंधी आचारविचार शिथिल पड़े हैं तो जातिवादी संगठन उसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का कवच पहनाने की तैयारी में लगे हैं. धर्म और जाति के इस नाभिनाल संबंध को सर्वप्रथम महामना ज्योतिबा फुले ने समझा था. इसलिए उन्होंने जाति के मूल यानी धर्म की विकृतियों पर प्रहार किया. उनके आंदोलन को जमीन शाहू जी महाराज ने दी. दलितोंशोषित वर्गों को आत्मविश्वास से लैस करने, अपने अधिकारों के लिए खड़े होने तथा दलित आंदोलन को सही दिशा देकर नई युगचेतना लाने का सबसे महत्त्वपूर्ण काम डॉ. अंबेडकर ने किया. फलस्वरूप अस्मितावादी आंदोलनों को जमीन मिली. दबेकुचले लोग अपने अधिकारों के लिए आगे आने लगे.

पहले जाति प्रथा की आलोचना वे लोग करते थे जो खुद जातीय उत्पीड़न और असमानता का शिकार थे. तब उत्पीडि़त वर्ग जाति का उच्छेद चाहता था. उसके लिए ‘जातितोड़क’ आंदोलन चलाए गए थे. स्वयं डॉ. अंबेडकर ने ‘जाति का उच्छेद’ पुस्तक लिखकर जाति और जातिवादी शोषण दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया था. अब हालात बदले हुए हैं. जातीय शोषण का शिकार रहे वर्ग अब जाति को ही हथियार बना रहे हैं. ऐसा नहीं है कि जातिआधारित शोषण समाप्त हो चुका है? या उन्होंने उन्होंने जाति के नाम पर सामाजिक ऊंचनीच से समझौता कर लिया है. जातीय आधार पर ऊंचनीच की भावना तो आज भी बरकार है. लेकिन वह केवल सामाजिक संबंधों तक सीमित है. लोकतंत्र ने जाति आधारित भेदभाव को सिद्धांततः समाप्त किया है. अस्पृश्यता आज एक कानूनी अपराध है, भले ही सामाजिक स्तर पर उसके अवशेष आज चिंता का विषय हों. कानून हालांकि बराबरी का अधिकार देता है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भेदभाव पूरी तरह बना हुआ है. इसलिए नए परिवेश में जातीय शोषण का शिकार रहे वर्गों को अपनी रणनीतियों में संशोधन करना पड़ा है. दलितों और पिछड़ों की समझ में आ चुका है कि केवल कानूनी प्रावधान होने से समानता के लक्ष्य को प्राप्त कर पाना असंभव है. कल्याण राज्य की अवधारणा के चलते सरकार से कुछ उम्मीद की जा सकती है, लेकिन अपनी पैठ और राजनीतिक हैसियत का लाभ उठाकर सत्ता में बारीबारी से वही लोग आते रहते हैं, जो जातीय शोषण के लिए जिम्मेदार हैं. ऐसी परिस्थितियों में शोषित वर्ग का नया संघर्ष आनुपातिक हिस्सेदारी को लेकर है. दलित और पिछड़े वर्ग अब संसाधनों और अवसरों में आनुपातिक हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं. चूंकि यह मांग न्याय सम्मत है, इसलिए संवैधानिक स्थितियां भी उनके पक्ष में हैं. इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा है. जाति को लेकर हीनताबोध समाप्त हो चुका है. दबीकुचली जातियां पहले सरकार और शीर्षस्थ वर्गों से अपनी जरूरतों की भरपाई की उम्मीद करती थीं, दैन्य दिखाती थीं, उनसे विकास के समुचित अवसरों की मांग करती थीं. अब उन्हें लगता है कि दैन्य दिखाने, गिड़गिड़ाने की अपेक्षा संगठित संघर्ष द्वारा, अपने अधिकारों को ससम्मान प्राप्त किया जा सकता है.

पेशागत आधार पर भी जातीय विभाजन बेमानी सिद्ध हो रहा है. ब्राह्मण चमड़े का काम करने लगे हैं. जबकि चर्मकार जाति के होनहार पढ़लिखकर दूसरों को पढ़ाने लगे हैं. दूसरी दबीकुचली जातियां भी मुख्यधारा की ओर बढ़ रही हैं. गति बहुत धीमी है, मगर जैसेजैसे लोग शिक्षित हो रहे हैं, उनमें अपने अधिकारों के प्रति चेतना भी बढ़ती जा रही है. यदि आधुनिक समाज में परिवर्तन की ललक है और कुछ समूह तेजी से विकास की ओर अग्रसर हैं तो इसका एक कारण यह भी है कि वे लोग जो शताब्दियों तक शोषितउत्पीडि़त होते आए थे, जिन्होंने पीढ़ीदरपीढ़ी जातीय आधार पर भेदभाव, उत्पीड़न, और असमानता का दंश सहा है, जिन्हें जाति के आधार पर विकास के अवसरों से वंचित रखा गया थाअब संगठित होकर विकास में साझेदारी चाहते हैं. प्रौद्योगिकी के अलावा जाति आज सामाजिक गतिशीलता की सबसे बड़ी उत्पेरक है. कुछ मामलों में तो यह प्रौद्योगिकी से अधिक प्रभावशाली है. आधुनिक प्रौद्योगिकी की क्षमताएं अनंत हैं. मगर पूंजीपतियों के नियंत्रण के कारण वह फैशन का हिस्सा बन चुकी है. वह मनुष्य को तकनीक के स्तर पर समृद्ध, किंतु मनोभौतिक स्तर पर बौद्धिकविपन्न बना रही है. एक तरह से जीतेजागते मनुष्यों को मशीन में तबदील कर रही है. दूसरी ओर जाति नएनए विमर्श छेड़कर मानवसमाज को नए विचारों से लैस कर रही है. जाति के पीछे कोई कल्याणकारी विचारधारा नहीं है. हो भी नहीं सकती. किंतु जाति के माध्यम से संघर्षरत आंदोलनकारियों को लगता है कि केवल संगठित प्रतिकार ही उन्हें समाजार्थिक शोषण से मुक्ति दिला सकता है. कुछ लोग जाति के उभार से खिन्न हैं. वे लगातार आरोप लगा रहे हैं कि जातिवादी आंदोलन देश को शताब्दियों पीछे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसा सोचने वालों में वही लोग हैं जिन्हें अस्मितावादी आंदोलनों से खतरा है. जो जाति के नाम पर संगठित होते युवाओं को संस्कृति और राष्ट्र के वास्ते जाति से अलग होने को उपदेश दे रहे हैं. जबकि जाति स्वयं उनके आचारव्यवहार का हिस्सा है. समाचारपत्रों में छपने वाले वैवाहिक विज्ञापनों से उनकी मनस्थिति और द्वैध को आसानी से समझा जा सकता है. कुल मिलाकर जातीय शोषण का शिकार रहे वर्गों के लिए आज जाति ही सबसे बड़ा हथियार है. वे कांटे से कांटा निकालना चाहते हैं. जाति उन्हें संगठित होने में मदद करती है. इसलिए कार्यविभाजन की अवैज्ञानिक शैली होने के बावजूद अधिकांश मानवसमूह जाति को संगठनकारी औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.

इन दिनों एक ओर तो विभिन्न जातियों के बीच अस्मिता की पहचान को लेकर होड़ मची हुई है. दूसरी ओर आरएसएस जैसे संगठन धर्म और संस्कृति को रोपने में लगे हुए हैं. इसलिए जो लोग भारतीय समाज को जातिमुक्त देखना चाहते हैं, उन्हें धर्म की संकल्पना में आमूलचूल बदलाव करना पड़ेगा. जो समझते हैं कि हिंदू धर्म अपने वर्तमान स्वरूप में, लुंजपुंज देवताओं की फौज के रूप में रहे और जाति चली जाए? वे या तो बहुत भोले हैं या जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति अगंभीर हैं. बहुजन राजनीति के पैरोकार इस तथ्य को बाखूबी समझते हैं. इसलिए वे इस बार जाति के सवालों को सीधे नहीं उठा रहे हैं. देखा जाए तो उठा ही नहीं रहे हैं. शताब्दियों से जो जाति के औचित्य पर सवाल उठाते थे, अब उन्होंने इसे भारतीय समाज की हकीकत के रूप में, भले ही अस्थायी तौर पर, स्वीकार कर लिया है. इसलिए जाति के आधार पर सवाल उठाने के बजाय उसके आधार पर हुए समाजार्थिक शोषण और गैरबराबरी पर सवाल उठाए जा रहे हैं. जाति का सहारा लेकर शोषित और वंचित वर्गों को संगठित किया जा रहा है. लंबे अर्से के बाद यह समझ लिया है कि लोकतंत्र में राजनीतिक सहभागिता सामाजिक अन्याय को मेटने वाले प्रमुख उपकरणों में से है. इससे आर्थिक समानता के उस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है, जो मनुष्यता का अभीष्ट है. इस विभेदकारी समस्या के निदान के लिए शिक्षा और संसाधनों में साझेदारी की आवाज बुलंद की जा रही है. चूंकि इस बार जाति भी समानता के संघर्ष का एक हथियार है, इसलिए उससे सबसे अधिक तखलीफ उन लोगों को हो रही है, जो अभी तक जाति प्रथा का लाभ उठाते आए हैं. और जिसका सहारा लेकर उन्होंने बहुसंख्यक समाज को अपना आश्रित बनाए रखा है.

एक समय था जब आर्थिक सुदृढ़ीकरण देश के विकास की धुरी था. विशेषकर देश की आजादी के समय. तब आर्थिक उन्नति को लेकर नईनई योजनाएं बनाई जा रही थीं. इन दिनों सामाजिक न्याय जैसी समसामयिक अवधारणा विकास के साथ जुड़ चुकी है. विकास हो और उसका लाभ देश के सभी वर्गों तक पहुंचेꟷ˹ऐसी अपेक्षा की जाती है. सामाजिक न्याय के संघर्ष में जाति एक तात्कालिक माध्यम बन सकती है. लेकिन यह एकदम आसान भी नहीं है. जाति की अवधारणा ही अपने आप में नकारात्मक है. अतएव जाति को औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे वर्गों और समूहों को समझना चाहिए कि औजार केवल माध्यम होता है. वह लक्ष्य को अपेक्षाकृत सुगम तो बनाता है, लेकिन स्वयं लक्ष्य नहीं होता. इसलिए अस्मितावादी आंदोलनों की मूल प्रवृत्ति छोटे जातिसमूहों को बड़े जाति समूहों में ढालने, जन से बहुजन और बहुजन से सर्वजन की ओर ले जाने वाली होनी चाहिए. ऐसा होगा, तभी जाति के कलंक से मुक्ति पाई जा सकती है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सामना वैकल्पिक जनसंस्कृति और श्रमसंस्कृति के उभार द्वारा आसानी से किया जा सकता है. वह ऐसी संस्कृति होगी जिसमें लोग धर्म के आधार पर नहीं हितों की समानता के आधार पर एकजुट होंगे तथा परस्पर सहयोग करते हुए आगे बढ़ेंगे. उस समय धर्म और उसपर टिकी विभेदक संस्कृति उनके रास्ते के सबसे बड़े अवरोधक होंगे. तब यह याद रखना उन्हें विशेष बल देगा कि प्रकृति ने अधिकार तो सभी को दिए हैं, बराबर दिए हैं, मगर विशेषाधिकार संपन्न किसी को भी नहीं बनाया है.

© ओमप्रकाश कश्यप

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अहिंसा और इंसानियत के दो दावेदार

उन दोनों के देश अलग थे, धर्म अलग थे, भाषाएं और कार्यक्षेत्र अलगअलग थे. दोनों आमनेसामने कभी मिल भी न पाए थे. आपसी पत्रव्यवहार भी न के बराबर था. इसके बावजूद उनके मन में एकदूसरे के प्रति अगाध श्रद्धा थी. उनमें से एक विज्ञान के क्षेत्र की शिखरतम प्रतिभा था. नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर वह विश्व का विलक्षण मेधासंपन्न वैज्ञानिक माना गया. विज्ञान जगत उसकी अकूत मेधा और अद्वतीय कल्पनाशीलता से इतना अभिभूत था कि उसकी बौद्धिक विलक्षणता को समझने के लिए मरणोपरांत उसके मस्तिष्क को संरक्षित रखा गया. दूसरा पुरस्कारसम्मान से बहुत ऊपर था. इतना ऊपर कि हर सम्मान, पुरस्कार उसके नाम से जुड़कर सम्मानित होता था. वह लोगों के दिलों पर आजीवन राज करता रहा. दोनों ही विश्वशांति के समर्थक थे. एक के शोध को आधार बनाकर कुछ सिरफिरे वैज्ञानिकों ने परमाणु बम का निर्माण किया, जो दूसरे विश्वयुद्ध में तबाही का कारण बना. दूसरे की कथनीकरनी में एकता थी. वह आजीवन सत्य और अहिंसा की बात करता और उस पथ पर चलता रहा. फिर भी उसकी मृत्यु एक सिरफिरे राष्ट्रवादी की गोली से हुई. एक को नवगठित देश का राष्ट्रपति बनने का न्योता मिला. तब उसने यह कहकर कि वह राजनीति के लिए नहीं बना है, प्रस्ताव विनम्रतापूर्वक लौटा दिया. दूसरा बना ही राजनीति के लिए था. उसके लिए राजनीति समाजसेवा थी और समाजसेवा राजनीति. अतः आजादी के बाद जब उसके देश में अपनी सरकार बनी तो जनसेवा के प्रति अपनी संकल्पबद्धता दोहराकर वह सत्ता के प्रलोभन से हमेशा के लिए मुक्त हो गया. वह हर समय अपने समर्थकों, कार्यकर्ताओं से घिरा रहता था. उसके समर्थकों में हर वर्ग के आदमी थे. वह उनके सुखदुख और संघर्षों को समझता था. इस कारण लोगों का उससे गहरा जुड़ाव था. दूसरे को ‘एकांतसेवी’ कहा जाता है. गणित और भौतिक विज्ञान की जटिलतम गुत्थियों को सुलझाने में संलिप्त रहने हेतु उसका आमजन से कटाव स्वाभाविक ही था. पहला जिस ओर कदम बढ़ाता सैकड़ों लोग कतार बांधे उसका अनुसरण करने लगते. दूसरे की कल्पनाशक्ति जब मुक्ताकाश में डोलती तो उसमें हजारों ग्रहनक्षत्र और ब्रह्मांडीय स्फुर्लिंग ज्योतिवान हो उठते थे. दोनों में अनेक समानताएं थीं और अंतर भी. उनमें से प्रत्येक ने अपने समय और समाज को गहराई से प्रभावित किया. बेशुमार ख्याति, मानसम्मान पाया. अपने जीवनआचरण में दोनों मनुष्यता के पक्षधर, पवित्रता, सादगी, नैतिकता की मिसाल और इंसानियत के दावेदार बने रहे.

इतने विवरण के बाद अपने समय की इन विरलतम प्रतिभाओं का नामोल्लेख आवश्यक नहीं है. पाठकगण जान चुके होंगे कि उनमें से एक का नाम थामोहनदास करमचंद गांधी, दूसरे का—अल्बर्ट आइंस्टाइन. आइंस्टाइन का जन्म 1879 में हुआ था. गांधी के जन्म के दस वर्ष बाद. बचपन में दोनों ही संकोची थे. विद्यार्थी भी साधारण ही माने गए. आइंस्टाइन को स्कूल में साथियों का उपहास सहना पड़ता था. गांधी पोरबंदर के दीवान के बेटे थे. इसलिए उनका वैसा उपहास तो नहीं होता था, मगर विद्यार्थी वे औसत ही थे. दोनों की शुरुआत साधारण ही थी. पढ़ाई पूरी करने के बाद आइंस्टाइन ने पेटेंट कार्यालय में नौकरी कर ली. लंदन से बैरिस्टर बनकर लौटे अवश्य, किंतु वकालत के लिए जरूरी लंदफंद से दूर रहने के कारण आरंभ में असफलता ही उनके हिस्से आई. दोनों ने अपनी दुर्बलताओं को हथियार बनाया. आइंस्टाइन कल्पनाजगत में डूबे रहने वाले विद्यार्थी थे. औपचारिक पढ़ाईलिखाई पर कम ध्यान दे पाते थे. सापेक्षिकता के सिद्धांत की खोज उनकी अद्वितीय कल्पनाशक्ति के बल पर संभव हो सकी थी. प्रकाशवेग की अपरिवर्तनीयता, पदार्थ और ऊर्जा की अंतःपरिर्वतनीयता(E=MC2) प्रारंभ में परिकल्पना के रूप में ही जन्मे थे. गांधी ने अपनी सहनशक्ति को ताकत बनाया था. अपने आचरण से उन्होंने सिद्ध किया कि अहिंसा, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा जैसे विचार केवल कागजी नहीं हैं. पर्याप्त नैतिक सामथ्र्य हो तो उन्हें आचरण में भी उतारा जा सकता है. दोनों को अपने ऊपर अटूट विश्वास था. आइंस्टाइन ने सापेक्षिकता के सिद्धांत की परिकल्पना दुनिया के सामने रखी तो उनका खूब मजाक उड़ाया गया. अधिकांश वैज्ञानिकों का मानना था कि डॉप्लर प्रभाव जैसे ध्वनि पर असरकारक होता है, वैसे ही प्रकाश पर भी उसका असर पड़ता है. लेकिन आइंस्टाइन अपनी धारणा पर अडिग रहे. खिल्ली उड़ाने वालों को उनका एक ही जवाब था—‘गलत सिद्ध करके दिखाओ?’ गांधी की अहिंसा को आलोचकों ने भीरूपन कहा था. मगर वे स्थिरमना अपने काम में लगे रहे. आखिर खुद को दुनिया की महाशक्ति समझने वाला ब्रिटिश साम्राज्य एक अधनंगे फकीर के आगे घुटने टेकने को मजबूर हो गया. आइंस्टाइन विलक्षण की सीमा तक अंतर्मुखी थे. वे खुद से घंटों संवाद कर सकते थे. मस्तिष्क गणित की पहेलियों को हल करने में उलझा रहता था. अकेलापन उन्हें पसंद था मगर उनका काम, अनूठी उपलब्धियां उन्हें बारबार लोगों के बीच ले आती थीं. गांधी अपने अनूठे प्रयोगों, कथनीकरनी की एकता तथा आचरण की पवित्रता के दम पर, लोगों के चहेते थे. इसलिए भीड़ में सबसे अलग नजर आते थे.

गांधी और आइंस्टाइन के बीच सीधी मुलाकात तो कभी संभव न हो सकी. पत्रव्यवहार भी अत्यल्प था. उनके अहिंसावादी दृष्टिकोण, जीवन की सादगी, सत्य के प्रति अटूट निष्ठा, जनांदोलनों की गहरी समझ तथा लोगों के दिलों में पैठ बनाने के अकूत सामथ्र्य ने आइंस्टाइन को प्रभावित किया था. संभवतः ऊर्जा के अजस्र, विराट स्रोत की खोज के रूप में दुनिया को परमाणु बम का आधारसिद्धांत देने वाला भावुक, संवेदनशील, मनुष्यता का हितचिंतक, नैतिकबोध से संपन्न सरलमना वैज्ञानिक अपने आविष्कार के दुरुपयोग की संभावनाओं की कल्पनामात्र से खुद को दोषी मान बैठा था. स्मरणीय है कि सापेक्षिकता के सिद्धांत की व्याख्या करते समय आइंस्टाइन ने सिद्ध किया था कि ऊर्जा और पदार्थ परस्पर अंतपर्रिवर्तनीय हैं. पदार्थ को ऊर्जा में बदला जा सकता है. इस प्रक्रिया में विपुल ऊर्जा उत्पन्न होती है. इसके बाद से ही परमाणु विखंडन द्वारा ऊर्जा के चिरंतन स्रोत को प्राप्त करने की कोशिशें तेज हो चली थीं. प्रथम विश्वयुद्ध में चोट खाए देश गुपचुप अपनी ताकत का विस्तार करने में लगे थे. 1933 में हिटलर द्वारा जर्मनी की सत्ता संभालते ही उनमें और भी तेजी आई. राष्ट्रों के बीच हथियारों की अंधस्पर्धा तथा भीतर ही भीतर उमड़ता असंतोष, नए विश्वयुद्ध की भविष्यवाणी कर रहा था. अपनी दूरद्रष्टि से आइंस्टाइन ने शायद यह भांप लिया था कि कोई सिरफिरा वैज्ञानिक परमाणु ऊर्जा संबंधी उनके शोध का दुरुपयोग कर, मनुष्यता के समक्ष भयावह संकट प्रस्तुत कर सकता है. इसीलिए गांधी, जो दक्षिणी अफ्रीका में सत्याग्रह का सफल प्रयोग कर चुके थे और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व करते समय भी अहिंसा पर पूर्णतः अडिग थे, का मानवतावादी द्रष्टिकोण उन्हें आकर्षित करता था. विश्वशांति की चाहत रखनेवाले आइंस्टाइन निरस्त्रीकरण के सबसे मुखर समर्थकों में थे. उसके पीछे बर्ट्रेंड रसेल, रवींद्रनाथ ठाकुर के अलावा गांधी की प्रेरणा भी प्रमुख थी. विश्वशांति के प्रति आइंस्टाइन की प्रतिबद्धता का एक और प्रमाण था—अनिवार्य सैन्यसेवा एवं युद्ध प्रशिक्षण के विरोध में जारी घोषणापत्र, जिसपर उनके और महात्मा गांधी के अलावा रवींद्रनाथ ठाकुर, सिगमंड फ्रायड, रोमन रोलेंड, एच. जी. वेल्स आदि के हस्ताक्षर थे.

आइंस्टाइन का विज्ञान पर भरोसा था. वह मानते थे कि विज्ञान की मदद से विश्व की भीषण समस्याओं यथा गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा आदि का उपचार संभव है. इसके लिए पर्याप्त जनसहभागिता और नियोजित कार्यक्रम जरूरी हैं. अनियोजित मशीनीकरण की आलोचना करते हुए आइंस्टाइन ने कहा था कि पूंजीवादी तंत्र के नेतृत्व में होने वाली प्रौद्योगिकीय क्रांति ने लोगों की गरीबी और अन्यान्य समस्याओं का समाधान करने के बजाय उन्हें बेरोजगारी की ओर ढकेला है. ऐसे तंत्र में उत्पादक का ध्यान केवल अपने मुनाफे पर होता है. इससे समाज में पूंजी का निचले वर्ग से ऊपर के वर्ग की ओर अंतरण लगातार बढ़ता जाता है. फलस्वरूप शीर्षस्थ वर्ग की खुशहाली बढ़ती जाती है, जो पूरी तरह से निम्नस्थ वर्गों के श्रम और कौशल की देन होती है. उच्च स्तर पर बढ़ती स्पर्धा निचले वर्गों के लिए और बड़ी चुनौतियां पेश करती है, जिससे बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है. उच्च प्रौद्योगिकीकरण की सबसे बड़ी बुराई है कि वह अपनी कीमत मनुष्य की कार्यक्षमता एवं कौशल से वसूलता है. जिससे श्रम के मूल्यांकन का अधिकार श्रमिक के हाथों से खिसककर पूंजीपति के अधीन चला जाता है. वे उस अधिकार का मनमाना दुरुपयोग करते हैं. अपने ही जैसे शोषितों, उत्पीड़ितों के साथ स्पर्धा और शोषणकारी स्थितियों से घिरा श्रमिक खुद को उनके आगे पंगु और लाचार अनुभव करता है. आपसी अविश्वास, कुंठा, हताशा, दैन्य और अवसाद जैसे अवगुण उसे घेर लेते हैं. पूंजीवादी समाज की ऐसी अनेकानेक नकारात्मक स्थितियों और संभावनाओं के बीच सर्वोदय, अहिंसा, आर्थिक आत्मनिर्भरता तथा विश्वबंधुत्व को समर्पित गांधी के विचार, उनका समाज के प्रति सकारात्मक और नीतिसम्मत सोच आइंस्टाइन को उम्मीद के ताजे झोंके की तरह लगता था.

आइंस्टाइन के मन में गांधी के प्रति सम्मान भाव पहली बार जुलाई-1929 में ‘क्रिश्चन सेंच्युरी’ को दिए गए साक्षात्कार में प्रकट हुआ, जिसमें उन्होंने गांधी द्वारा अहिंसापूर्ण ढंग से चलाए जा रहे आंदोलन की सराहना की थी. हालांकि उस समय तक दोनों के बीच कोई संवाद नहीं था. उनके बीच इकलौते पत्रव्यवहार की शुरुआत आइंस्टाइन की ओर से होती है. घटना 1931 की है. गांधी उस दिनों लंदन की यात्र पर थे. वहां भारत में संवैधानिक सुधारों को लेकर गोलमेज सम्मेलन की तैयारियां चल रही थीं. गांधी भारतीयों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. आइंस्टाइन उन दिनों बर्लिन में थे. वहीं, उनके आवास पर गांधी का शिष्य सुंदरम उनसे मिला. उसके माध्यम से आइंस्टाइन ने एक पत्र गांधी को भेजा था. 27 सितंबर, 1931 को लिखे उस पत्र में उन्होंने गांधी के प्रति अपनी श्रद्धा को बिना लागलपेट प्रस्तुत किया था—

परम आदरणीय गांधी जी,

इस पत्र को आप तक पहुंचाने के लिए मैंने आपके मित्र का सहारा लिया है, जो इस समय मेरे घर मेरे मेहमान हैं. अपने कार्यकलापों द्वारा आपने दिखा दिया कि उन सभी आदर्शों को जिनकी हम केवल कल्पना कर सकते हैं, हिंसा का सहारा लिए बिना भी प्राप्त किया जा सकता है और उन्हें जिनको हिंसा पर भरोसा है, अहिंसा के माध्यम से आसानी से जीता जा सकता है. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि आपका संदेश आपके देश की सीमाओं के पार भी फैलेगा. उसके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मतभेदों का स्थायी समाधान संभव होगा. यही एकमात्र रास्ता है जो वैश्विक शांति एवं खुशहाली की ओर जाता है, जिससे हम अपने मतभेदों को आसानी से सुलझा सकते हैं.

पुनश्चः आपके प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धा और सम्मानभाव के साथ मैं उम्मीद करता हूं कि बहुत जल्दी हम आमनेसामने होंगे.’(गांधी सेवा फाउंडेशन).1

पत्र में गांधी के अहिंसावादी द्रष्टिकोण के प्रति एक उदारमना वैज्ञानिक के उद्गार थे. गांधी विश्वशांति हेतु आइंस्टाइन के कार्यकलापों से परिचित थे. उनके प्रति मन में अगाध श्रद्धा भी थी. इसलिए पत्र का त्वरित प्रत्युत्तर देते हुए उन्होंने 18 अक्टूबर को आइंस्टाइन को लिखा—

सुंदरम के हाथों आपका खूबसूरत पत्र मुझे मिला. मुझे यह जानकर अत्यधिक संतोष है कि आप मेरे कार्यों का समर्थन करते हैं. मेरी उत्कट अभिलाषा है कि हमारी आमनेसामने की भेंट हो और आप भारत में मेरे आश्रम का आतिथ्य ग्रहण करें.’(गांधी सेवा फाउंडेशन).2

आइंस्टाइन गांधी के आमंत्रण पर भारत भले न आ सके, मगर गांधीजी द्वारा भारत में किए जा रहे सत्य एवं अहिंसा के प्रयोगों से निरंतर प्रेरणा लेते रहे. वे मूलतः वैज्ञानिक थे. विज्ञान के उपयोग को लेकर उनका मत ‘पश्चिमी विज्ञान का पितामह’ कहे जाने वाले दार्शनिक फ्रांसिस बेकन(1561—1626) से मेल खाता था. पंद्रहवीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति से उत्साहित बेकन का कहना था कि मशीनें मनुष्य को जानलेवा श्रम से मुक्ति दिलाकर उसके कल्याण की राह प्रशस्त करेंगी. ‘ज्ञान ही शक्ति है’ कहकर उसने विज्ञान और प्रौद्योगिकीय सुधारों का स्वागत किया था. आगे चलकर विज्ञान ने खूब तरक्की की. लेकिन उसके लोकोपकारी उपयोग को लेकर बेकन की भविष्यवाणी पूर्ण सच न हो सकी. खर्चीला उद्यम होने के नाते वैज्ञानिक शोधों की धारा उस दिशा में अग्रसर रही, जो केवल समाज के प्रभुवर्ग की स्वार्थानुरूप थी, या जैसा पूंजीपति और सरमायेदार वर्ग चाहता था. इससे श्रमविरोधी मशीनों के विकास को बढ़ावा मिला. कालांतर में उससे समाजार्थिक स्तरीकरण और बेरोजगारी में वृद्धि हुई. पूंजी की मनमानी के फलस्वरूप हुए मशीनीकरण ने उन कारीगरों और शिल्पकर्मियों के समक्ष अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया था, जो परंपरागत अर्थव्यवस्था में, सामंतवादी दबावों के बावजूद अपने श्रम एवं कौशल के दम पर सम्मानित जीवन जीते आए थे. यह बेकन की उस मनोवांछा के विपरीत था, जो वैज्ञानिक क्रांति का स्वागत करते हुए प्रकट हुई थी. वस्तुतः वैज्ञानिक शोधों का लाभ देश के आमजन तक कैसे पहुंचाया जाए, यह चिंता अठारहवीं शताब्दी से ही समाजविज्ञानियों और दार्शनिकों को परेशान करने लगी थी. कालांतर में यह चुनौती और भी कठिन, कठिनतर होती गई. आगे चलकर इसी ने यूरोप के वैचारिक आंदोलनों के लिए नई जमीनें तैयार कीं.

उल्लेखनीय है कि पश्चिम में अनियंत्रित मशीनीकरण के विरुद्ध आवाजें सतरहवीं शताब्दी से ही उठने लगी थीं. उनीसवीं शताब्दी आतेआते उसमें और भी तेजी आ चुकी थी. पूंजीवाद के प्रति विरोधी वातावरण और चौतरफा आलोचनाओं के बावजूद पश्चिम को अपनी प्रगति पर गर्व था. वह इसको आधुनिकता की निशानी मानता था. इसका कारण भी था. अठारहवीं शताब्दी में नए बाजारों की तलाश में निकले व्यापारी काफिलों ने ब्रिटेन के लिए नए उपनिवेश निर्मित किए थे. ब्रिटेन की आर्थिक समृद्धि में उसके उपनिवेशों का बड़ा योगदान था. औपनिवेशिक शोषण के लिए जिम्मेदार और विज्ञान के इकतरफा लाभों पर इतराने वाली कथित पश्चिमी सभ्यता को गांधी ने ‘शैतानी सभ्यता’ कहा था. यह बात अलग है कि पूरब में जाति, धर्म, परंपरा और संस्कृति के नाम पर फैला हुआ मकड़जाल, मानवमात्र की स्वाधीनता और खुशहाली की राह में, कथित ‘शैतानी सभ्यता’ से कहीं अधिक नुकसानदेह था. और गांधी जिसे शैतानी सभ्यता कहते थे, उसमें मानवाधिकारवादी आंदोलनों के विस्तार की भारत की दैवी सभ्यता से अधिक संभावनाएं थीं. गांधी की प्रमुख राजनीतिक, आर्थिक प्रेरणाएं धर्मदर्शन से निकली थीं. वैज्ञानिक बोध के बजाय उनमें भावबोध प्रबल था. पूंजी की मनमानी और तज्जनित बेलगाम मशीनीकरण को वे धार्मिक और सांस्कृतिक संकट के रूप में देखते और उसके निदान के लिए रहरहकर परंपरा की शरण में लौट जाते थे. यही कारण है कि आर्थिक विषमताओं तथा उसके कारणों को लेकर उनकी आलोचना वैसी तथ्यात्मक, तर्कसंगत और तेजवंत न थी जैसी बर्ट्रेंड रसेल, मार्क्स, बकुनिन, पीटर क्रोप्टोकिन, मानवेंद्रनाथ राय आदि विचारकों की. धर्म, विज्ञान एवं समाजवाद के बारे में आइंस्टाइन का विश्लेषण तुलनात्मक रूप से अधिक सुसंगत, वैज्ञानिक, तथ्यपरक एवं पारदर्शी है. लेकिन अपने विचारों, मान्यताओं को जिस गंभीरता और सत्यनिष्ठ भाव से गांधी अपने रोजमर्रा के आचरण का हिस्सा बना लेते हैं, यह आइंस्टाइन से संभव नहीं हो पाता.

गांधी के सत्य और अहिंसा के आदर्श के प्रति आइंस्टाइन की अटूट श्रद्धा थी. उत्तरोत्तर बढ़ते वैश्विक तनाव तथा वैमनस्यकारी स्थितियों के बीच गांधी का रास्ता उनकी एकमात्र उम्मीद थी. बावजूद इस श्रद्धाभाव के कुछ मुद्दों को लेकर गांधी से उनका मतभेद था. ऐसा ही मुद्दा उत्पादन क्षेत्र में मशीनों के प्रयोग को लेकर है, जिनका पश्चिमी देशों की आर्थिक प्रगति के पीछे बड़ा योगदान था. गांधी मशीनीकरण का विरोध करते हैं. उसे समाज में व्याप्त अनेकानेक बीमारियों की जड़ बताते हैं. ‘हिंद स्वराज’ में वे लिखते हैं—‘मशीनें यूरोप को उजाड़ने में लगी हैं. वहां की हवा अब हिंदुस्तान में चल रही है.’ मशीनों की आलोचना से उन्हें यहीं तोष नहीं. आगे वे चेतावनी वाले अंदाज में लिखते हैं, ‘मशीन की हवा अगर ज्यादा चली तो हिंदुस्तान की बुरी दिशा होगी….यंत्र तो सांप का ऐसा बिल है जिसमें एक नहीं बल्कि सैकड़ों सांप होते हैं.’ गांधी द्वारा मशीनों का विरोध केवल उत्पादकता जुड़े यंत्रों तक सीमित नहीं रहता. आगे बढ़कर रेलों, डॉक्टरों और वकीलों को भी अपने दायरे में समेट लेता है. ट्राम को वे स्वास्थ्य रक्षा से जोड़कर देखते हैं. उनकी दृष्टि में जहां मशीनें हैं, वहां अव्यवस्था है, दुख और सांस्कृतिक संकट हैं. मशीनें बीमारी और कमजोर स्वास्थ्य का कारण हैं—‘जहां रेलगाड़ी, ट्राम गाड़ी वगैरह साधन बढ़े हैं, वहां लोगों की सेहत गिरी होती है….यूरोप के एक शहर में जब पूंजी की तंगी हो गई थी तब ट्रामों, वकीलों और डॉक्टरों की आमदनी घट गई थी.’ इसके तुरंत बाद वे फैसलाकुन अंदाज में लिखते हैं, ‘यंत्र का गुण तो मुझे एक भी याद नहीं आता, मगर उसके अवगुणों पर मैं पूरी किताब लिख सकता हूं.’ यहां साफ कर दें कि मशीनों की आलोचना करने वाले गांधी पहले व्यक्ति न थे. उनसे पहले रूसो, थोरो, एडवर्ड कारपेंटर, इमर्सन आदि प्रख्यात विचारकों ने जीवन में मशीनों के बढ़ते दखल को गैरजरूरी माना था.

मानवीय स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक, ‘मनुष्य आजाद जन्मा है, लेकिन हर जगह वह बेड़ियों में है’ कहनेवाले रूसो ने भी कला एवं विज्ञान के विकास को मनुष्य के नैसर्गिक विकास में बाधक बताया था. यूरोप की वैज्ञानिक उपलब्धियों पर कटाक्ष करने हुए अपने सुप्रसिद्ध निबंध ‘डिस्कार्स आन दि आर्ट एंड साइंसिज’ में उसने कहा था कि विज्ञान एवं आधुनिक कलाओं के विकास ने मनुष्य और समाज के आगे नैतिक संकट खड़े किए हैं. मानवीय गरिमा और शुभत्व की स्थापना के लिए उनके पास न तो कोई कार्यक्रम है, न ही तैयारी. विकास के नाम पर मची आपाधापी ने मनुष्य और समाज के बीच दीवार खड़ी कर दी है. ऐसे संद्धिग्ध, विश्वासशून्यता से भरे समाज में, ‘हमारे पास भौतिक विज्ञानी हैं, गणितज्ञ हैं, रसायनज्ञ, कवि, संगीतकार यहां तक कि पेंटर भी भारी संख्या में हैं. ये सब हैं बस मनुष्य’ की कमी है. यदि वह हैं भी तो वे देश के विभिन्न समाजों में यहांवहां छिपे हुए हैं. इस व्यवस्था ने उन्हें उपेक्षित, बेचारा और अकेला बनाकर रख दिया है.’3 दरअसल रूसो जब सवाल करता है तो उसके जहन में मनुष्यमात्र की स्वतंत्रता और अस्मिता की सुरक्षा जैसे बड़े सवाल होते हैं. अपनी शीर्ष स्थिति का लाभ उठाते हुए पूंजीपति वर्ग विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुए शोध एवं आविष्कार का उपयोग अपनी स्वार्थसिद्धि हेतु करना चाहता था. रूसो के अनुसार ज्ञान के नाम पर रचे गए आयोजन प्रकारांतर में केवल समाज के शीर्षस्थ वर्ग लिए लाभकारी सिद्ध होते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि वैज्ञानिक आविष्कारों का जितना लाभ समाज के शीर्षस्थ वर्गों को मिला, उतना जनसाधारण के हिस्से में नहीं आ पाया था. इसके बावजूद यातायात, चिकित्सा, शिक्षा, आवास आदि क्षेत्रों में विज्ञान के माध्यम से जो तरक्की हुई थी, उसका कम ही सही, जनसाधारण को भी लाभ पहुंचा था. गांधी विज्ञान की सभी उपलब्धियों की उपेक्षा कर उच्च प्रौद्योगिकी को परंपरा और संस्कृति पर संकट के रूप में देखते थे. मानते थे कि किसी कारीगर से उसका रोजगार छीन लेना भी हिंसा है. इसलिए उन्होंने रोजगार के लिए नुकसानदेह सिद्ध हो चुकी मशीनों को चलनबाह्यः कर उनकी जगह ग्रामोद्योगों लाने का समर्थन किया था.

गांधी का निजी संपत्ति से दुराव न था. वे मात्र इतना चाहते थे कि ‘वे(जमींदार और राजामहाराजा) अपने लोभ और संपत्ति के बावजूद उन लोगों के समकक्ष बन जाएं जो मेहनत करके रोटी कमाते हैं. मजदूरों को भी यह समझना होगा कि मजदूरों का काम करने की शक्ति पर जितना अधिकार है, मालदार आदमी का अपनी संपत्ति पर उससे भी कम है.’ (हरिजन सेवक 3 जून, 1939). गोया समझ लेने मात्र से हकीकत बदल जाएगी! गांधी पूंजीवादी विकृतियों का समाधान संरक्षकता के सिद्धांत में खोजते थे. उन्होंने पूंजीपतियों से अपील की थी वे खुद को संपत्ति का स्वामी मानने के बजाय उसका संरक्षक समझें और लोककल्याण के निमित्त उसका उपयोग करें. हालांकि यह बात भी दूर की कौड़ी के समान थी कि कोई पूंजीपति अपनी संपत्ति स्वेच्छा से छोड़ने को तैयार हो जाएगा. स्वयं गांधी को भी इसमें संदेह था, इसलिए वे व्यवस्था करते हैं कि कोई पूंजीपति यदि अपनी संपत्ति का उपयोग लोककल्याण के लिए करने में कतराता है तो राज्य को उसकी संपत्ति न्यूनतम बलप्रयोग के आधार पर हस्तगत कर लेने का अधिकार है—‘लोग स्वेच्छा से ट्रस्टियों की तरह व्यवहार करने लगें तो मुझे सचमुच बड़ी खुशी होगी. लेकिन यदि वे ऐसा न करें तो मेरा ख्याल है कि हमें राज्य के द्वारा भरसक कम हिंसा का सहारा लेकर उनसे उनकी संपत्ति (मुआवजा देकर अथवा मुआवजा दिए बगैर, जहां जैसा उचित हो) अपने हाथ में कर लेनी चाहिए(मेरे सपनों का भारत).’

आइंस्टाइन सामाजिक विकास की व्याख्या के लिए वैज्ञानिक द्रष्टिकोण अपनाते हैं. इतिहास की वस्तुपरक व्याख्या करते हुए वे लिखते हैं—‘इतिहास का बड़ा हिस्सा आक्रामकों ने कब्जाया हुआ है. उसमें शक्तिसंपन्न वर्ग की स्तुतियां और उनका गुणगान है. साम्राज्यवादी मंसूबों से भरी वे ताकतें अवसर मिलते ही दूसरे राज्यों पर अधिकार कर वहां की भूमि तथा उत्पादन के संसाधनों पर कानूनी, सामाजिक अधिकार प्राप्त कर लेती थीं. समाज के बौद्धिक निदेशन, उसकी शिक्षादीक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाला पुजारी वर्ग साम्राज्यवादी शक्तियों से हाथ मिलाकर उनकी अधिसत्ता को धार्मिकसामाजिक एवं कानूनी रूप से स्वीकार्य बनाता था. संस्कृति और धर्म के प्रलोभनों से यह वर्ग समाज के बहुसंख्यक वर्ग को अपने साथ जोड़े रखता था. पुजारी वर्ग की समाज पर पकड़ का लाभ उठाने के लिए साम्राज्यवादी शक्तियां उन्हें तरहतरह के प्रलोभन देकर अपने साथ मिलाए रखती थीं—

पुजारी, शिक्षा पर नियंत्रण के माध्यम से समाज के वर्गविभाजन को स्थायी रचना का रूप दे देता है. तथा सामाजिक आचार संहिता के नाम पर ऐसा ढांचा तैयार करता है, जिसमें समाज का बहुसंख्यक वर्ग सामाजिक मामलों में भीड़ की तरह आचरण करने लगता है.’4

आइंस्टाइन के अनुसार समाजवाद का लक्ष्य समाज को नैतिक सामाजिक लक्ष्य की ओर अग्रसर करना है. जबकि पूंजीवादी केवल और उद्योगस्वामी के लाभ की उच्चाकांक्षा से संचालित होता है. उसमें बड़ी मछली छोटी को निगलती जाती है. इसलिए पूंजीवादी व्यवस्था में शीर्षस्थ वर्ग की ओर लाभानुपात निरंतर बढ़ता जाता है. जिसके परिणामस्वरूप उसमें पूंजी का पलायन उच्च वर्ग की ओर होता रहता है. गांधी अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में बड़ी मशीनों के उपयोग को लेकर संकोची थे. आइंस्टाइन ने हालांकि समाज कल्याण के क्षेत्र में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल को जरूरी माना है. उसका विश्वास था कि विज्ञान की सहायता से सामाजिक समस्याओं का निदान खोजना अतिरेकी कामना है. समाजवाद व्यक्ति एवं समाज दोनों को सामाजिकनैतिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रयत्नरत रहता है. जबकि पूंजीवाद अपने एकमात्र लक्ष्य पूंजीस्वामी के लाभ पर जोर देता है. जिसमें लाभार्थी वर्ग निरंतर सिकुड़ता जाता है. आइंस्टाइन के अनुसार यह जानना बहुत जरूरी है कि केवल नियोजित अर्थव्यवस्था समाजवाद का उद्दिष्ट नहीं है. बल्कि उसका लक्ष्य मानवमात्र की मुक्ति है. ऐसा कहते हुए वे विचारदर्शन में गांधीवाद के करीब चले आते हैं.

निजी पूंजी को लेकर आइंस्टाइन के विचार अपेक्षाकृत स्पष्ट हैं. सीमा से अधिक व्यक्तिगत संपत्ति के वे विरोधी थे. मानते थे कि संपत्ति के कुछ हाथों में सिमट जाने से उसपर प्रभावी नियंत्रण असंभव हो जाता है. उन्होंने माना कि पूंजी की ताकत के आगे लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा चुनी गई सरकारें भी बेबस सिद्ध होती हैं. इसलिए कि लोकतांत्रिक समाजों में जो भी जनप्रतिनिधि चुनकर आते हैं, वे किसी न किसी रूप में पूंजीपतियों पर निर्भर होते हैं. इससे वे गरीब और शोषित वर्ग के अधिकारों का संरक्षण करने में असफल सिद्ध होते हैं. अपने ऐतिहासिक लेख ‘समाजवाद क्यों?’ में वे कुशल आर्थिक व्याख्याकार की भांति पूंजीवादी समाज की विकृतियों पर न केवल गंभीर विचार करते हैं, बल्कि उससे निदान की राह भी सुझाते हैं. आइंस्टाइन के अनुसार पूंजीवादी समाज की कमजोरी है कि वहां ‘उत्पादन का आधार पूजीपति द्वारा लाभ की अंतहीन कामना’ होती है, न कि लोगों की जरूरत. ‘उत्पादन लाभार्जन की दृष्टि से निर्धारित किया जाता है न कि उपयोगिता और लोगों की आवश्यकता के आधार पर’. पूंजीवादी उत्पादन तंत्र में श्रमिकों पर प्रायः छंटनी की दीवार अटकी रहती है—

पूंजीवादी समाज में ऐसा कोई रास्ता नहीं कि उन सभी लोगों को रोजगार मिल सके, जो काम करना चाहते हैं. श्रमिकों के दिल पर छंटनी की तलवार तनी होती है….जैसेजैसे प्रौद्योगिकीय विकास होता है, बेरोजगारों की संख्या भी लगातार बढ़ती जाती है. लाभकेंद्रित उत्पादन व्यवस्था पूंजीपतियों के बीच आभासी स्पर्धा खड़ी कर देती है….असीमित स्पर्धा श्रम की बरबादी को बढ़ावा देती है, जिससे उनकी संवेदना और सामाजिकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. पूंजीवादी की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह पूरे शिक्षातंत्र को प्रदूषित कर देता है. विद्यार्थियों के बीच स्पर्धा नामक बुराई का प्रवेश होने से शिक्षा का मकसद ही बदल जाता है….’5

मतवैभिन्नय के बावजूद गांधी और आइंस्टाइन इस बात पर एकमत हैं कि समस्या का निदान बलप्रयोग या हिंसा नहीं है. केवल अहिंसक समाधान ही सर्वाधिक स्थायी और बहुउपयोगी हो सकता है, लेकिन विकास, अर्थनीति और आदर्श समाज की स्थापना को लेकर आइंस्टाइन का विश्लेषण तुलनात्मक रूप से अधिक संतुलित एवं उपयोगी जान पड़ता है. वे विज्ञान के लोकहित में प्रयुक्त करने के समर्थक थे. ज्ञान यदि शक्ति है तो उसका अधिकतम लाभ पूरे समाज को पहुंचना चाहिए. इस बिंदू पर आतेआते दोनों के बीच मतवैभिन्नय साफ झलकने लगता है. ‘ग्राफिक सर्वे’ के लिए दिए 1935 के एक इंटरव्यू में आइंस्टाइन के माध्यम से उद्धृत किया गया है—

मैं गांधी से अत्यधिक प्रभावित हूं. मगर उनके कार्यक्रम में दो कमजोरियां मुझे एकदम साफ नजरआती हैं. असहयोग हालांकि अपने विरोधियों से निपटने का बुद्धिमानीभरा रास्ता है. लेकिन यह केवल आदर्श स्थितियों में ही संभव है. यह भारत में अंगे्रजों के विरुद्ध उपयोगी हो सकता है, लेकिन जर्मनी में नाजियों के विरुद्ध इसका कारगर प्रयोग संभव नहीं है. गांधी उस समय भी गलत है, जब वे आधुनिक सभ्य समाज में मशीनों के बहिष्कार अथवा उनको न्यूनतम बनाए रखने पर जोर देते हैं. मशीनें समाज की जरूरत बन चुकी हैं, यह उन्हें स्वीकार लेना चाहिए.’6

गांधी के प्रति अपनी सम्मानभाव के बावजूद उनकी आलोचना आइंस्टाइन की वैचारिक दृढ़ता की ओर इशारा करती है. गांधी की भांति आइंस्टाइन का चिंतन भी बहुआयामी था. तभी वे गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ और मशीनीकरण विरोध की सुस्पष्ट और शालीन आलोचना कर पाते हैं. वे मानते थे कि समाजवाद पूंजीवाद की कमजोरियों का समाधान करने में सक्षम है. वह मानवीय नैतिकता का दर्शन है, जो ‘सामाजिकनैतिक लक्ष्य की ओर निरंतर अग्रसर’ रहता है. ध्यातव्य है कि श्रमिक या कारीगर की मूल समस्या मशीनें नहीं हैं. वास्तविक समस्या प्रौद्योगिकी तथा उत्पादन के अन्य साधनों का कुछ लोगों के हाथों में सिमट जाना है, जिससे उनकी उपयोगिता के मायने ही बदल जाते हैं. न केवल उनका लाभ मुट्ठीभर सरमायेदारों तक सीमित रह जाता है, बल्कि प्रकारांतर में वे समाज के बहुसंख्यक वर्ग के शोषण का कारण भी बनते हैं. उनकी मदद से पूंजीवादी तंत्र पहले तो श्रमकौशल को खुद पर निर्भर बनाता है, फिर उसके संभावित विकल्पों को शून्य कर श्रम के मूल्यांकन का अधिकार अपने हाथों में ले लेता है. परिणामस्वरूप शोषण श्रमिक की नियति बन जाता है. पूंजीपति वर्ग की मनमानी के कारण श्रमिक को उसके श्रमकौशल का वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाता. प्रौद्योगिकी के विकास के साथसाथ बेरोजगारी बढ़ती है, साथ में कारीगरों, श्रमिकों का शोषण और उत्पीड़नकारी परिस्थितियां भी. एक कुशल समाजविज्ञानी की भांति आइंस्टाइन इन स्थितियों को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं—

मेरी दृष्टि में पूंजीवादी समाज की आर्थिक अराजकता, आधुनिक समाज में व्याप्त समस्त बुराइयों की असली जड़ है. हम देख सकते हैं कि हमारे सामने उत्पादकों की बड़ी संख्या है जिसके सदस्य एकदूसरे की मेहनत की कमाई को हड़प लेने पर उतारू हैं. यह कार्य वे ताकत के बूते नहीं, बल्कि कानूनी तौर पर स्थापित विधिसम्मत व्यवस्थाओं की मदद से कर रहे हैं.’7

उल्लेखनीय है कि आइंस्टाइन के समाजवाद विषयक विचार उस समय सामने आए थे जब सोवियत संघ की प्रेरणा से चीन, लातिनी अमेरिका, वियतनाम आदि देशों में समाजवादी क्रांति का बिगुल बजा हुआ था. आहत मनुष्यता परमाणु बम की विभीषिका से कराह रही थी. प्रथम विश्वयुद्ध की स्थितियों का लाभ उठाकर पूंजीवाद अपनी जड़ें पक्की कर रहा था. राष्ट्रों के बीच व्याप्त हिंसा, प्रतिहिंसा तथा साम्राज्यवादी होड़ के बीच उसे अपना भविष्य सुरक्षित जान पड़ता था. बड़ेबड़े पूंजीपति जिन्होंने सतरहवींअठारहवीं शताब्दी में मशीनीकरण के कारण लोहे और इस्पात की बढ़ती मांग के कारण उसके कारखाने लगाए थे, उनमें से कई हथियार निर्माण की ओर मुड़ चुके थे. पूंजीवादी स्पर्धा से समाज में आर्थिकसामाजिक विषमता की खाई उत्तरोत्तर चैड़ी हो रही थी. इसके फलस्वरूप सामाजिक असंतोष बढ़ता ही जा रहा था. नई शिक्षा एवं लोकतांत्रिक विचारों की रोशनी में लोग अपने अधिकारों की रक्षा हेतु एकजुट होने लगे थे. समाज में नए विचारों का आगमन बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार कर चुका था.

गांधी चाहते थे कि ग्राम स्वावलंबी हों. वहां के लोग आत्मनिर्भर बनें. ताकि अपनी सीमित अर्थक्षमता से सम्मानित जीवन जी सकें. यह आवश्यक भी है. इससे अर्थव्यवस्था और प्रकारांतर में सत्ता के विकेंद्रीकरण का स्वप्न सच होता है. लेकिन जब पूरी दुनिया में प्रौद्योगिकीय क्रांति का नगाड़ा गूंज रहा हो, विज्ञान के क्षेत्र में नित नए आविष्कार सामने आ रहे हों—तब कोई समाज, सभ्यता या समूह उससे वंचित भला कैसे रह सकता है. विशेषकर तब जब संचार प्रौद्योगिकी ने दुनिया को जोड़ दिया हो, यातायात के साधनों द्वारा समस्त विश्व एक परिवार में ढल चुका हो. फिर बढ़ती जनसंख्या के साथ गांवों में जोतें सिकुड़ रही हैं, जिससे कृषिभूमि पर दबाव बढ़ता ही जा रहा है. यदि मान लिया जाए कि ग्रामोद्योग अतिरिक्त श्रमऊर्जा को खपाने में मददगार सिद्ध होंगे तो भी एक समस्या बनी रहेगी कि जब बड़ी संख्या में ग्रामोद्योग होंगे तब उनके उत्पाद की खपत के लिए अतिरिक्त बाजार की आवश्यकता भी पड़ेगी. चीन का ही उदाहरण लें. वहां उत्पादन का बड़ा हिस्सा स्थानीय इकाइयों के माध्यम से होता है. भारत समेत दुनिया के अनेक विकसित और विकासशील बाजारों में उसे खपाया जाता है. इस काम में राज्य उनकी मदद करता है. यदि गांव बाहर बाजार की खोज करना अपरिहार्य हुआ तो स्वाभाविक रूप से ग्रामोद्योग इकाइयों के बीच बाजार को कब्जाने की होड़ भी पैदा होगी. तब स्पर्धा में बने रहने के लिए वे नई वैचारिकी और प्रौद्योगिकी के संपर्क में आएंगे ही. उस समय जो समस्याएं पैदा होंगी, गांधी का अर्थशास्त्राीय दृष्टिकोण हमें उसका निदान नहीं देता. दूसरे गांधीवाद के अपने अंतर्विरोध हैं. उनसे यह प्रतीति भी संभव है कि अपने संरक्षकता के सिद्धांत की ओट में गांधी पूंजीपतियों को बचाए रखना चाहते हैं. जब बड़े उद्यमी, भले ही संरक्षक के रूप में, रहेंगे तो बड़ी मशीनें और उनकी प्राणवायु उच्च प्रौद्योगिकी भी रहेगी ही. उन्हें भी अपने उत्पादों को खपाने के लिए बाजार की आवश्यकता पड़ेगी. उस समय छोटी पूंजी वाले ग्राम एवं कुटीर उद्योग जो पहले ही अपने अस्तित्व के संकट एवं आपसी स्पर्धा से जूझ रहे हैं, बड़ी पूंजीवाले उद्योगों के सामने बाजार में कैसे टिक पाएंगे—संरक्षकता का सिद्धांत इसका कोई समाधान नहीं देता.

कामगार को बेहतर उत्पादन परिस्थितियां देना, जानलेवा श्रम से उसे मुक्ति दिलाना प्रत्येक उधोमुखी सभ्यता का लक्ष्य होता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि उच्च प्रौद्योगिकी अपने साथ अनेक समस्याएं और चुनौतियां लेकर आई थी. इसके बावजूद समाज को उसकी देन कम न थी. शिक्षा और रोजगार के वैकल्पिक संसाधनों के माध्यम से उसने सामंतवाद और उसकी मददगार धार्मिक संस्थानों पर गहरी चोट की थी. जिससे सतरहवींअठारहवी शताब्दियों का वैचारिक विस्फोट संभव हो सका. नए विचारों ने परंपरा एवं संस्कृति के नाम पर शताब्दियों से चली आ रही रूढ़ियों पर चोट की थी, जिससे परंपरावादी शक्तियों का तिलमिला उठना स्वाभाविक था. आइंस्टाइन पर नई वैचारिक चेतना का प्रभाव था, जबकि धर्म और परंपरा से आबद्ध गांधी का संस्कारग्रस्त मन बारबार अतीत की शरण में लौट जाता है. हालांकि वे स्वयं बैरिस्टर थे. फिर भी शिक्षा के प्रति उनके विचार दकियानूसी की भांति परंपरा से बंधे थे. आधुनिक सभ्यता की भांति आधुनिक शिक्षा भी उन्हें अस्वीकार्य थी‘धर्मिक शिक्षा जरूरी मानी जाए. वह शिक्षक के आचरण और उसके मुंह से निकलनी चाहिए. एवं उसके आचरण द्वारा निकलनी चाहिए.’

चूंकि महान व्यक्तित्वों की चूकों का प्रभाव भी बड़ा होता है. इसलिए गांधी के देखतेदेखते प्रथम विश्वयुद्ध के बाद की परिस्थितियों का लाभ उठाकर देश में एक नवउद्योगपति वर्ग तेजी से उभरा था. बिरला, टाटा, डालमिया, बजाज जैसे औद्योगिक घराने उसके प्रमुख कर्णधारों में से थे. वे सब कांग्रेस के प्रमुख संरक्षकों में से थे. और कांग्रेस से वे इसलिए नहीं जुड़े थे कि उन धनकुबेरों को देश की आजादी से कुछ लेनादेना था. ना ही गांधी के संपर्क से उनका कायाकल्प हुआ था, वे गांधी से इसलिए जुड़े थे क्योंकि रूस और बरास्ते चीन से आती समाजवादी क्रांति की गर्म हवाएं उन्हें भयभीत करती थीं. गांधी उनके लिए सुरक्षित आड़ थे. यह डर आजादी मिलते ही जाता रहा. 1947 के बाद धनकुबेरों को ऐसे माहौल आवश्यकता थी, जिसमें वे खुलकर पांव पसार सकें. उस समय गांधी को किनारे कर दिया गया. दूसरे शब्दों में गांधी के संरक्षकतावाद के विचार को कांग्रेस और उनके करीबी धनकुबेरों ने उसी समय नकार दिया था.

आइंस्टाइन की खूबी है कि वे समाजवाद का समर्थन करते हैं, मनुष्यमात्र के विकास के लिए उसे अपरिहार्य मानते हैं, मगर इसके लिए किसी भी प्रकार की हिंसा उन्हें अस्वीकार्य है. इस लक्ष्य को वे लोकतांत्रिक परिवर्तनों के माध्यम से साधना चाहते हैं. समाजवाद, बरास्ते अहिंसा—उनका स्वप्न है. उनकी निगाह में मनुष्य सर्वोपरि है. अपनी इस धारणा पर वे अडिग हैं. गांधी के लेखों में समाजवाद का जिक्र आता है. मगर इसके लिए वे समाज और अर्थव्यवस्था के मूल ढांचे में अधिक बदलाव के पक्षधर नहीं हैं. अहिंसा, धर्म और परंपरा की सीमाओं में जितना संभव हो, उससे वे संतोष कर लेते हैं. ध्यातव्य है समाजवाद की जड़ों की खोज के लिए धर्म की शरण में चले जाने वाले दार्शनिक विचारकों में गांधी अकेले न थे. जार्ज बनार्ड शॉ, विलियम मॉरिस, जॉन रस्किन, इमर्सन, एडवर्ड कारपेंटर आदि विद्वानों की समाजवाद प्रेरणाएं बाइबिल तथा अन्य ईसाई धर्मग्रंथों से ही निकली थीं. स्वयं गांधी का ‘अंत्योदय’ का विचार रस्किन की पुस्तक ‘अन्टू दिस लास्ट’ से प्रभावित था, जबकि रस्किन को यह प्रेरणा बाइबिल से मिली थी. ‘अनटू दिस लास्ट’ के आरंभ में बाइबिल का एक पद उद्धृत किया गया है, जिसके अनुसार एक किसान यह तर्क देते हुए कि जरूरतें तो सभी की समान हैं, देर से आए श्रमिक को भी दूसरे मजदूरों के बराबर मजदूरी देता है.8 समाजवाद के विश्लेषण हेतु आइंस्टाइन वैज्ञानिक की दृष्टि से काम लेते हैं. उनके लिए समाजवाद संसाधनों, अवसरों की समानता और समान भागीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि मनुष्यता के उच्चतम आदर्शों से युक्त नैतिक व्यवस्था है. गांधी संरक्षतावाद के शास्त्रीय नाम से, नए विचारों की रोशनी में संदेह के घेरे में आ चुकी दान और शोषण के सांस्कृतिकरण की परंपरा को पुनर्जीवित करना चाहते थे. माजवाद बरास्ते अहिंसा का समर्थन करते हैं. वे संसाधनों और अवसरों के समान वितरण पर उतना जोर नहीं देते जितने कल्याण के संवितरण पर—

यदि समाजवाद बिना किसी हिंसा के आए तो हम उसका स्वागत करेंगे. क्योंकि तब मनुष्य किसी भी तरह की संपत्ति जनता के प्रतिनिधि की तरह और जनता के हित के लिए ही रखेगा; अन्यथा नहीं. करोड़पति के पास उसके करोड़ रहेंगे तो सही, लेकिन वह उन्हें अपने पास धरोहर के रूप में जनता के हित के लिए ही रखेगा.’9

इस लक्ष्य को पाने के लिए गांधी अहिंसा और मानवीय प्रेम की तरफदारी करते हैं—‘मैं घृणा से नहीं अपितु प्रेम की शक्ति से लोगों को अपनी बात समझाऊंगा और अहिंसा के द्वारा आर्थिक समानता पैदा करूंगा.’ विश्लेषण के दौरान गांधी घूमफिरकर धर्म और परंपरा की शरणागत होते हैं. संभवतः यहीं वे चूक जाते हैं. इसलिए कि दुनिया के प्रायः सभी धर्मों का स्वरूप सामंतवादी और केंद्रोन्मुखी रहा है. खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए धर्म नैतिकता का सहारा लेता है, लेकिन अवसर मिलते ही वह नैतिक प्रतिबद्धताओं को बिसराकर सत्तापक्ष की गोद में जा बैठता है और प्रायः उसके हर धत्कर्म का साक्षीसमर्थक बनता है.

आइंस्टाइन के लिए परंपरा का महत्त्व तभी तक है जब तक वह तर्कसम्मत हो और विज्ञान की कसौटी पर खरी उतर सके. उनकी प्राथमिकता विज्ञान का लाभ जनसाधारण तक पहुंचाने की थी. विज्ञान की सीमाओं से भी वे परिचित थे. विज्ञान मनुष्य की सभी समस्याओं का निदान कर सकता है—इस प्रकार का कोई भ्रम उन्हें नहीं था. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. जैविक इकाई के रूप में जहां वह अपने सुख की कामना करता है, बौद्धिक प्राणी होने के नाते वह अपना मानसम्मान और अस्मिता की सुरक्षा चाहता है, वहीं सामाजिक प्राणी के रूप में वह दूसरों के हर्षविषाद में सम्मिलित भी होता है. अकेले व्यक्ति की उपलब्धियां अर्थहीन होती हैं. अतः अपने सामथ्र्य और उपलब्धियों के प्रदर्शन के लिए मनुष्य समाज का सदस्य बनने को बाध्य होता है. मनुष्य और समाज का संबंध एकदूसरे की सामान्य आवश्यकताओं और सामाजिक नैतिकता के आधार पर बनता है. संबंधों में स्थायित्व एवं सफलता के आवश्यक है कि उनका नैतिक आधार आवश्यकताओं की अपेक्षा विस्तृत हो. क्या समाजवाद से मानव जीवन की समस्याओं का समाधान संभव है. आइंस्टाइन इससे आश्वस्त हैं,

इन गंभीर बुराइयों से बचाव का एकमात्र रास्ता है, लोकोन्मुखी शिक्षा प्रणाली की स्थापना तथा अर्थव्यवस्था का समाजवादी नजरिये के अनुरूप निर्धारण, जिसमें उत्पादन के साधन समुदाय के अधीन हों. उत्पादन का स्वरूप लोगों की आवश्यकता के अनुसार तय होना चाहिए और काम का विभाजन इस तरह से हो कि स्त्रीपुरुष, बच्चे जो भी काम कर सकते हैं, उन्हें काम मिले और किसी के सामने आजीविका संबंधी संकट न हो.’10

आइंस्टाइन ने समाजवाद का पक्ष लिया था. परंतु उसके नाम पर समाज में जो हो रहा है, उसके प्रति वे बहुत आश्वस्त नहीं थे. वे मान रहे थे कि समाज में समाजवाद को लेकर अत्यधिक अस्पष्टता है. सबसे बड़ा संकट ईमानदार विमर्श का है. उन्हें लगता था कि समाजवाद के नाम पर प्रचलित विभिन्न परिभाषाओं, अवधारणाओं तथा अर्थहीन बहसों ने उसको बहुत नुकसान पहुंचाया है. जिससे समाजवादी राज्य का सपना एक टोटम में सिमट चुका है. आइंस्टाइन के इस तर्क से उपन्यासकार जार्ज आरवेल की याद आने लगती है. समाजवाद को लेकर बुद्धिजीवियों की अनर्थक बहसों पर कटाक्ष करते हुए आरवेल ने कहा था—‘अंग्रेज बुद्धिजीवियों के साम्यवाद को समझने की कोशिश की जाए तो वह बहुत कुछ पागलों की देशभक्ति के समान है.’11 यह कोई नई बात नहीं है, समाजवाद और उसके विविध संकायों को लेकर इस प्रकार की अचरजनुमा टिप्पणियां शताब्दियों से होती आ रही हैं. आइंस्टाइन का आशय उदार और विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था से था. ऐसे समाजवादी राज्य का सपना उनके दिमाग में था जो अधिकतम लोकतांत्रिक और आर्थिकसामाजिक समानता के सिद्धांत पर टिका हो. जिसमें राज्य की नियंत्रणकारी शक्तियां अधिक जिम्मेदार और लोकप्रतिबद्ध हों.

गांधी की भांति आइंस्टाइन की करुणा भी मानव समाज तक सीमित न थी. उसमें प्राणिमात्र के प्रति करुणाभाव अंतर्निहित था. गांधी शाकाहार के समर्थक थे. भारतीय आमतौर पर, शाकाहारी न हों तो भी, उसे लेकर संवेदनशील होते हैं. इस संबंध में आइंस्टाइन की भावनाएं गांधी से मेल खाती थीं. शाकाहार का समर्थन करते हुए उन्होंने लिखा था—‘मानवीय स्वास्थ्य एवं पृथ्वी पर जीवन की उत्तरजीविता के निमित्त कोई भी इतना सहायक नहीं है, जितना शाकाहार को बढ़ावा देना.’12 इसलिए कि मनुष्यता की कसौटी वर्चस्व में न होकर सहयोगभावना में है. सबके साथ मिलजुलकर रहने में है. अपने साथसाथ दूसरे के अस्तित्व की रक्षा और मानसम्मान में है. न केवल मनुष्य, बल्कि प्राणिमात्र के प्रति करुणा की भावना से भरपूर यह नैतिक संदेश प्रायः हर संस्कृति का मूल स्वर रहा है. ‘सर्वे सुखिन भवंतु, सर्वे संतु निरामया’—गांधी इस औपनिषदिक कामना को राष्ट्रराज्य की प्रमुख पहचान के रूप देखना चाहते हैं. यह भावना गांधी द्वारा शाकाहार के समर्थन से भी अभिव्यक्त होती है—‘किसी राष्ट्र की महानता उसके द्वारा पशुओं के प्रति किए गए व्यवहार से आंकी जा सकती है.’13 जीवदया के प्रति धार्मिक द्रष्टिकोण इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना करुणा का संस्कार. करुणा का यही संस्कार गांधीवाद की आत्मा है. यही वह गुण है जो आइंस्टाइन को बारबार गांधी की ओर खींच लाता था. गांधी के प्रति अपनी श्रद्धा और सम्मान को आइंस्टाइन ने कई अवसरों पर व्यक्त किया था. आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक एस. राधाकृष्णन गांधी के सत्तरवें जन्मदिन पर एक पुस्तक संपादित करना चाहते थे. उन्होंने पत्र लिखकर आइंस्टाइन से उसमें सहयोग देने को कहा. उस अवसर पर आइंस्टाइन ने गांधी की प्रशस्ति में लिखा—

राजनीतिक इतिहास के क्षेत्र में महात्मा गांधी का योगदान अन्यतम है. उन्होंने अपने देश के गरीब, वंचित एवं दमित लोगों की स्वतंत्रता हेतु एकदम नए और मानवीय औजार विकसित कर उनका प्रयोग अपनी संपूर्ण निष्ठा और कर्तव्यबोध के साथ किया है. दुनिया के आधुनिक सभ्य समाजों तथा उनके चिंतनधर्मा बुद्धिजीवियों पर उनका जो प्रभाव पड़ा है, वह तलवार के जोर पर की गई कार्रवाहियों की अपेक्षा कहीं अधिक गहरा और स्थायी है. इस कसौटी पर केवल उन्हीं राजनयिकों का योगदान सराहनीय हो सकता है जो शिक्षा, लोकचेतना तथा नैतिकता की स्थापना द्वारा अपने लोगों के लिए नैतिक राज्य की स्थापना कर सकते हैं. यह हम सभी के लिए अत्यंत प्रसन्नता और सम्मान का विषय है कि हम ऐसी महान, प्रतिभा संपन्न शख्सियत से सीधे संवाद करने में सक्षम हैं.’14

गांधी की कथनी और करनी में अद्भुत एकता थी. उन्हें अपने ऊपर विश्वास था और खुद के निर्णयों पर वे इतने दृढ़ रहते थे कि उनके अपने ही साथी कभीकभी उन्हें हठी और दुराग्रही तक कह देते थे. अपवादस्वरूप ही सही परिस्थितियों के आगे गांधी को भी झुकना पड़ा और आइंस्टाइन को भी. दूसरी ओर यह भी सच है कि जब भी इन महापुरुषों को समझौते के लिए बाध्य किया गया, उसका नुकसान पूरे समाज को झेलना पड़ा. गांधी देश के विभाजन के विरोधी थे. उन्होंने कहा था कि हिंदुस्तान का बंटवारा उनकी लाश से गुजरकर होगा. मगर तत्कालीन नेताओं के आगे उनकी एक न चली. आजादी के बाद तो वे पूरी तरह किनारे कर दिए गए. जिन धनकुबेरों से वे कामना करते थे कि वे आजाद भारत में सरंक्षकतावाद के आदर्श को अपनाएंगे, खुद को संपत्ति का सरंक्षक मानकर व्यवहार करेंगे, जो गांधीवादी होने का दिखावा करते थे, वे अपने ही जैसे स्वार्थी नेताओं के संग मिलकर आजादी के बाद के माहौल को भुनाने में लग गए. इससे आजादी के बाद देश के वास्तविक निर्माण का जो सपना गांधी ने देखा था, और जिसकी कामना इस देश का आम नागरिक करता था, वह उत्तरोत्तर दूर होता चला गया. नवनिर्माण के बहाने देश के संसाधन धनकुबेरों के हवाले किए जाने लगे. इससे देश में आर्थिक विभाजन में तेजी आई और वह आर्थिकराजनीतिक विकेंद्रीकरण के लक्ष्य से दिनांेदिन दूर होता गया. सत्ता चंद राजनीतिक परिवारों तक और संसाधन मुट्ठीभर धनकुबेरों तक सिमटते चले गए.

कुछ ऐसा ही आइंस्टाइन के साथ हुआ. वे नहीं चाहते थे कि उनकी खोज का उपयोग परमाणु बम के लिए किया जाए. लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्थितियां इतनी तेजी से बदलीं कि उन्हें उसके लिए अनुमति देनी ही पड़ी. जर्मनी में हिटलर परमाणु शक्ति हासिल करने के लिए रातदिन एक किए था, जिसने अमेरिका की चिंता बढ़ा दी थी. एक प्रकार से वह भी स्पर्धा ही थी, मारक हथियारों की होड़ में आगे निकलने की. दूसरे विश्वयुद्ध की आहट के बीच अमेरिकी भौतिक विज्ञानी लियो सिजलॉर्ड तथा यूजीन विगनर राष्ट्रपति रूजवेल्ट का संदेश लेकर आइंस्टाइन से मिले. उन्होंने उनसे परमाणु बम बनाने के लिए सहमतिपत्र पर हस्ताक्षर करने को कहा था. आइंस्टाइन से कहा गया कि बम दुनिया में शक्ति संतुलन कायम करने के काम आएगा. परमाणु बम होगा तो किसी दुश्मन की युद्ध छेड़ने की हिम्मत ही नहीं पड़ेगी. आइंस्टाइन उसके लिए भी तैयार न थे. लेकिन जब उनसे कहा गया कि यदि अवसर चूके तो हिटलर अमेरिका से पहले परमाणु बम बनाने में सफल हो जाएगा, तो वे सोच में पड़ गए. यहूदी होने के कारण उन्हें जर्मनी छोड़कर अमेरिका में शरण लेनी पड़ी थी. इसका उन्हें मलाल था. ‘तानाशाह के हाथों में अकूत ताकत आने से अच्छा है कि बम अमेरिका के हाथों में रहे, जो एक लोकतांत्रिक राज्य है.’ आइंस्टाइन का कुछ ऐसा ही सोचना था. असल में यह उनका खुद को दिया गया भरोसा था. यह आभास उन्हें था कि यदि हस्ताक्षर न भी करेंगे तो भी युद्धोन्मत्त शक्तियां एक न एक दिन बम का आविष्कार कर ही लेंगी. इसलिए पत्र पर हस्ताक्षर कर लौटा दिया. रूजवेल्ट को लिखे पत्र के बाद अमेरिका में मेनहट्टन परियोजना में गति आई. आखिर बम बना. उस समय उन्होंने शायद ही यह कल्पना की हो कि उनकी खोज हिरोशिमा और नागसाकी की भीषण तबाही, मनुष्यता के कलंक का कारण बनेगी. यह अपराधबोध उन्हें आजीवन बना रहा. नबंवर 1954 में अपनी मृत्यु से पांच महीने पहले परमाणु बम बनाने की अनुमति देने को आइंस्टाइन ने जीवन की सबसे बड़ी भूल स्वीकार किया था. हालांकि यह भी माना कि वह उस समय की परिस्थितियों की मांग थी. इसके बावजूद वे इस आत्मग्लानि से कभी न उबर सके. इसी ने उन्हें गांधी के करीब लाने का काम किया. उन्हें लगता था कि युद्धोन्मत्त राजसत्ताओं के बीच गांधी का अहिंसा रास्ता ही श्रेय की ओर ले जा सकता है. उसी पर चलकर लोकतंत्र को बचाया जा सकता है. जापान में बमबारी के वर्षों बाद वहां के एक दैनिक ‘कैजो’ ने आइंस्टाइन से परमाणु बम के प्रयोग पर टिप्पणी करने को कहा. प्रत्युत्तर में पत्र संपादक के नाम 1952 में आइंस्टाइन ने जो पत्र लिखा, उसमें एक बार फिर गांधी के प्रति आस्था और विश्वास झलकता था. हालांकि उस समय तक गांधी की हत्या को तीन वर्ष बीत चुके थे. पत्र में आइंस्टाइन गांधी को सम्मानपूर्वक याद किया था—

गांधी, हमारे समय के महानतम राजनीतिज्ञ प्रतिभा ने हम सत्य और अहिंसा के उस रास्ते से परचाया है, जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए. उन्होंने यह प्रमाणित कर दिया कि एक व्यक्ति के मन में सत्य के लिए उत्सर्ग की भावना हो तथा रास्ता सही हो तो वह कुछ भी प्राप्त कर सकता है. भारतीय स्वाधीनता के लिए उनका कार्य इस बात का स्वतः प्रमाण है कि अदम्य विश्वास से युक्त मनुष्य की दृढ़ इच्छाशक्ति अजेय समझी जाने वाली सैन्य ताकतों से कहीं अधिक ताकतवार है.’15

एक वैज्ञानिक के रूप में आइंस्टाइन को जो लोकप्रियता मिली, वह अद्वितीय थी. उतनी ख्याति मानसम्मान उससे पहले शायद ही किसी और वैज्ञानिक को मिला हो. यूं भी जनसाधारण प्रायः ऐसे चरित्रों को पूजतासराहता है, जिनका उसके अपने जीवन से वास्ता हो. या जो लोकप्रियता की उसकी कसौटी पर खरे उतरते हों. आइंस्टाइन, उनके द्वारा प्रस्तुत सापेक्षिकता का सिद्धांत, समय का वेग आदि जनसाधारण की समझ से ऊपर की चीजें थीं. फिर भी आइंस्टाइन को इतनी मिली असाधारण ख्याति के आगे न्यूटन की चमक भी फीकी पड़ गई, जिनकी पुस्तक ‘दि प्रंसीपिया मैथेमेटिका’ को वैज्ञानिकों के धर्मग्रंथ का दर्जा प्राप्त है. और जिसके आविष्कारों ने पंद्रहवींसोहलवीं शताब्दी की वैज्ञानिकसामाजिक क्रांति की नींव तैयार की थी. लोकहित के हिसाब से देखा जाए तो एडवर्ड जेनर(1749—1823) द्वारा वैक्सीन तथा एलेक्जेंडर फ्लेमिंग(1881—1955) द्वारा पेनसिलीन की खोज मनुष्यता के इतिहास की सबसे चामत्कारिक और कल्याणधर्मी खोजें थीं. उनकी सहायता से महामारियों पर काबू पाना संभव हो सका. आइंस्टाइन के बाद भी अनेक प्रतिभासंपन्न वैज्ञानिक हुए हैं, जिन्होंने चिकित्सा, भौतिक विज्ञान और जीन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विलक्षण आविष्कार किए हैं. इसके बावजूद एडवर्ड जेनर, फ्लेमिंग, लुई पाश्चर, नील रदरफोर्ड अथवा आइंस्टाइन से पहले और बाद में जन्मे अन्य वैज्ञानिकों को वैसी लोकप्रियता प्राप्त न हो सकी, जो उन्हें सहज रूप से प्राप्त थी. उन्हें शताब्दी का ‘जीनियस’ कहकर पुकारा गया. उससे पहले यह सम्मान शायद ही किसी को मिला था. इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि आइंस्टाइन ने समय के वेग के बारे में जो अनूठी जानकारी दी थी, उसमें परीकथाओं जैसा रोमांच था. अतः समय की जादुई गति को आधार मानकर विश्वविख्यात उपन्यास लिखे गए. समय को तेज गति से दौड़ते हुए दर्शाना, उसके वेग का आकलन करना फंतासीनुमा खोजें थीं. उनके फलस्वरूप आइंस्टाइन को भी लोकप्रियता हासिल हुई. दूसरे वे खुद अच्छे लेखक थे. उनके लिखे गए करीब 500 शोधपत्रों में से लगभग 150 समाजविज्ञान तथा मानविकी की दूसरे विषयों पर थे. तीसरा और महत्त्वपूर्ण और बड़ा कारण था—डर का मनोविज्ञान. आइंस्टाइन की खोज के फलस्वरूप परमाणु ऊर्जा के रूप में एक विराट शक्ति मनुष्य के हाथ में आ गई, जो मनुष्य को सहलाती नहीं, डराती थी. और डर का प्रभाव अपेक्षाकृत स्थायी होता है. इसलिए आइंस्टाइन का नाम जनसाधारण के दिलोदिमाग पर छाता चला गया. इसी तरह देखा जाए तो ‘सविनय अवज्ञा’, ‘सत्याग्रह’ अथवा ‘अंत्योदय’ जैसे विचार भी गांधी की मौलिक खोज भले न हों, मगर जिस निष्ठा और अटल विश्वास के साथ उन्होंने उनको जीवन में उतारा उससे इतना तो कहा ही जा सकता है कि यदि गांधी न होते तो ये विचार भी पुस्तकों में कैद अनगिनत विचारों की भांति कहीं दबे रह गए होते.

डरा हुआ आदमी दूसरों को सावधान रहने की सलाह देता है. आइंस्टाइन का आविष्कार लोगों को डराता था. परंतु यह डर खुद आइंस्टाइन का भी था. उनका डर अकारण भी नहीं था. अल्फ्रेड नोबेल का उदाहरण उनके आगे था. प्रसंगवश बता दें कि मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मा अल्फ्रेड नोबेल बड़ा होकर अपने समय का सबसे हथियार निर्माता बना. एक कामयाब पूंजीपति जिसने युद्धोन्मत्त शक्तियों को हथियार बेचकर बेशुमार दौलत बटोरी थी. विस्फोटक ‘डायनामाइट’ के अलावा करीब 350 हथियारों के पेटेंट नोबेल के हाथ में थे. परंतु एक घटना ने नोबेल का ऐसा हृदयपरिवर्तन किया कि उसका मकसद ही बदल गया. वह घटना 1888 की है. अल्फ्रेड नोबेल का भाई लुडविग नोबेल फ्रांस में केंस की यात्र के लिए पहुंचा हुआ था. वहीं उसका देहांत हो गया. एक फ्रांसिसी समाचारपत्र को यह समाचार मिला तो बगैर ज्यादा जांचपड़ताल किए, उतावलेपन में समाचार छाप मारा. यह समझकर कि डायनामाइट का आविष्कारक स्वयं अल्फ्रेड नोबेल मारा गया है, अपने समाचारपत्र में मोटे हरफों में छापा. शीर्षक था—‘मौत के सौदागर की मौत.’ संयोगवश वह समाचारपत्र नोबेल के हाथों में पहुंचा. पढ़ते ही उसके दिल को जबरदस्त धक्का लगा. तब मृत्योपरांत अपनी प्रतिष्ठा और मानसम्मान को बचाए रखने तथा समाज के बुद्धिजीवी वर्ग को अपने अधिकार में रखने के लिए उसने एक ट्रस्ट का गठन किया, उसके माध्यम से नोबेल पुरस्कारों की शुरूआत हुई. अल्फ्रेड नोबेल के साथ घटी इस घटना ने आइंस्टाइन को भी प्रभावित किया. परमाणु शक्ति के आविष्कारक होने के कारण उनके आलोचक भी कम न थे. ऐसे लोग भी थे जो उनके शांति प्रस्तावों को दिखावा कहा करते थे. 1933 में मैकुले रेमंड ने उनका एक कार्टून बनाया था. जिसमें आइंस्टाइन के हाथ में तलवार थी. और वे ताकत के मद में अपनी बांह चढ़ाते दिखाए गए हैं. वह आइंस्टाइन के शांतिप्रस्तावों पर आलोचक की नजर थी, जिसमें उनकी शांतिवादी नीतियों पर कटाक्ष किया था. आलोचक गलत नहीं हैं, यह आइंस्टाइन भी समझते थे. अपने आविष्कार के दुरुपयोग का डर उन्हें गांधी के करीब लाता रहा. इसके लिए जब, जहां भी उन्हें अवसर मिला, गांधी के प्रति अपने स्नेहसम्मान का उन्होंने मुक्तकंठी बयान किया. अपनी पुस्तक ‘आउट आॅफ माई लेटर ईयर्स’ में गांधी पर प्रशंसात्मक टिप्पणी करते हुए उन्होंने लिखा है—

जनसाधारण का नेता, जिसको लगातार कमजोर पड़तीं औपनिवेशिक शक्तियों का समर्थन प्राप्त है. एक ऐसा जननेता जिसकी सफलता कूटनीति, राजनयिक चातुर्य अथवा दूसरों पर अधिकार जमाने के लिए छिछले राजनीतिक दांवपेंच पर निर्भर नहीं है. उसके पास केवल सच को अभिव्यक्त करने की कला है, एक काया है जिनमें इंसानियत और ज्ञान दोनों साथसाथ विद्यमान हैं. उसके हथियार संवेदना और सहिष्णुता हैं, जो उसने अपने समाज को सुरक्षित और सुदृढ़ बनाने के लिए गढ़े हैं. ऐसा इंसान जो आमजन का प्रतीक है. जिसने यूरोपीय नृशंसता और क्रूरता का सामना किया है, और जो जनसाधारण का मसीहा है. इस तरह उसका प्रभाव अमिट है….पीढ़ियों के बाद इस बात पर शायद ही कोई विश्वास करेगा कि इस प्रकार का सचमुच जीताजागता मनुष्य इस धरती पर था. इस तरह वह सार्वकालिक उदीयमान सितारा है.’16

गांधी नेता भी थे और सामाजिक कार्यकर्ता भी. लोकमानस से जुड़े मुद्दों पर उनकी कितनी गहरी पकड़ थी, वैसी शायद ही किसी और नेता की रही हो. उन्होंने कुशल राजनयिक की भांति सरकार और जनता से संवाद किया और एक दक्ष समाजविज्ञानी की भांति लोकहित से जुड़े विषयों पर बोलते रहे. गांधी के व्यक्तित्व की भांति उनकी शैली भी सरल है. चाहे भाषण हों या पत्रकारिता, हर जगह उनका कुशल शैलीकार छाया रहता है. उनकी बनिस्पत आइंस्टाइन लेखनशैली विवेचनापरक है. उसमें गंभीरता है. वाक्य अपेक्षाकृत लंबे हैं, भाषा अपेक्षाकृत जटिल. इसके बावजूद एक प्रवाह उनकी शैली में है, जिसके कारण वे पठनीय बने रहते हैं. गांधी एक प्रवाह से साथ अपने विचारों में बहा ले जाते हैं, आइंस्टाइन की शैली में मुग्ध कर देने वाली परिनिष्ठता है. अपनी बहुमुखी प्रतिभा से दार्शनिकवैज्ञानिक आइंस्टाइन हमें उस युग की याद दिला देते हैं, जब विज्ञान, इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्रा आदि सब एक ही विषय के अंतर्गत आते था—वह था दर्शन. पारमेनिडिस, डेमोक्रिटिस, पाइथागोरस, अरस्तु, जेनो आदि आरंभिक यूनानी दार्शनिकों की जितनी पैठ दर्शन के क्षेत्र में थी, उतनी ही विज्ञान में. आइंस्टाइन को विज्ञान और धर्म के सहसंबंध से बड़ी उम्मीद थी. ईश्वर उनके लिए रूढ़ विश्वास न होकर, आध्यात्मिक विवेचना का विषय था, जिसे वे अपने लेख ‘धर्म और विज्ञान’ में विस्तार देते हैं. ‘समाजवाद क्यों?’ में वे चारों और व्याप्त आर्थिक विसंगतियों तथा उनके कारण जनसाधारण को जो दुश्वारियां झेलनी पड़ती हैं, उनके प्रति चिचिंत नजर आते हैं. आइंस्टाइन को गांधी का अहिंसापथ स्वीकार्य है तो अर्थदर्शन को लेकर वे बर्ट्रेंड रसेल के बहुत करीब नजर आते हैं. रसेल की पुस्तक ‘ए रोड टू फ्रीडम’ में जिस लोकतांत्रिक, विकेंद्रीकृत, समानताधारित और जनसहयोगात्मक अर्थव्यवस्था की ओर संकेत किया गया है, आइंस्टाइन के लेखों में उसी चेतना का प्रवाह है. विज्ञान और दर्शन के समन्वय से उन्हें जो उम्मीदंे थीं, उनकी छाया आइंस्टाइन के चिंतन पर एकदम साफ नजर आती है.

आइंस्टाइन के दिलोदिमाग पर गांधी कितने छाए हुए थे, इसका एक और उदाहरण नीचे दी गई टिप्पणी है. यूरोशलम की हिब्रू यूनीवर्सिटी के आइंस्टाइन संग्रहालय से प्राप्त यह टिप्पणी जिस कागज पर है, उसके आधे से अधिक हिस्से पर वे गणित की पहेली को हल करने में जुटे हैं. निचले हिस्से पर एकदम अनौपचारिक और आकस्मिक ढंग से लिखी गई यह टिप्पणी है, मानो गणित में डूबा हुआ मन अचानक गांधी की ओर बढ़ चला हो. ऐसा तभी होता है, जब व्यक्ति अपने को आदर्श मान चुका हो. आइंस्टाइन की गांधी के प्रति श्रद्धाभाव कुछ ऐसा ही था—

राजनीति के इतिहास में महात्मा गांधी की उपलब्धियां अद्वितीय हैं. उन्होंने एक पराधीन देश की स्वतंत्रता के लिए नए और इंसानियत से भरपूर रास्ते की खोज की. तथा उसपर अपनी निष्ठा और संपूर्ण आत्मविश्वास के साथ बढ़ते गए. मानवता पर उनके विचारों का प्रभाव हमारी कल्पना से, जो अन्यायी की ताकत का बढ़चढ़कर आंकने की अभ्यस्त है, से कहीं अधिक चिरस्थायी है. क्योंकि अंत तो केवल उस राजनेता का होगा जिसने अपने लोगों को अपनी शिक्षा और नैतिक आचरण से ऊपर उठाने की कोशिश की है. हमें इस बात के लिए खुश होना चाहिए कि उन्होंने जो नैतिक ऊंचाई हमें दी है, वह आने वाली पीढ़ियों को भी प्रभावित करेगी. उनके लिए आदर्श होगी.’17

गांधी के प्रति आइंस्टाइन का सम्मान इस मृत्युलेख से भी होता है, जो उन्होंने गांधी की हत्या के तीन सप्ताह बाद वाशिंग्टन में आयोजित एक स्मृतिसभा के लिए लिखा था, ‘केवल सत्यानुयायी, अहिंसक और पवित्र समाजवादी ही दुनिया में या हिंदुस्तान में समाजवाद फैला सकता है. जहां तक मैं जानता हूं, दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है जो पूरी तरह समाजवादी हो. मेरे बताये हुए साधनों के बिना ऐसा समाज कायम करना असंभव है.’ आगे गांधी को सम्मानपूर्वक याद करते हुए आइंस्टाइन लिखते हैं—‘हर वह इंसान जो मनुष्यता की बेहतरी का सपना देखता है, उसको गांधी की असामयिक, त्रसद हत्या ने हिला दिया है. उन्होंने अपने आदर्शों के लिए, अहिंसा के पक्ष में मृत्यु का वरण किया है, इसलिए उन्हें मार डाला गया. इसलिए भी कि देश में अशांति और अव्यवस्था के वातावरण के बावजूद वह किसी भी प्रकार की सुरक्षा लेने को तैयार न था. यह उसका अटूट विश्वास था कि ताकत का उपयोग अपने आप में ही बुराई है.’ आज न तो गांधी हैं न आइंस्टाइन, परंतु आइंस्टाइन की बौद्धिक प्रखरता और गांधी की सत्य को परखने और उसके लिए हर जोखिम उठाने का साहस हमें निरंतर कुछ नया सोचने, आगे बढ़ने और मनुष्यता में विश्वास रखने की प्रेरणा देता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

अनुक्रमणिका

1. You have shown by all you have done that we can achieve the ideal even without resorting to violence. We can conquer those votaries of violence by the non-violent method. Your example will inspire and keep humanity to put an end to a conflict based on violence with international help and cooperation guaranteeing peace of the world. With this expression of my devotion and admiration I hope to be able to meet you face to face. Einstein and the Indian minds: Tagore, Gandhi and Nehru, Rasoul Sorkhabi.

2. I was delighted to have your beautiful letter sent through Sundaram. It is a great consolation for me that the work I am doing finds favor in your sight. I do indeed wish that we could meet face to face and that too in India at my Ashram. 10 October 1931.—Ibid.

3. We have physicists, geometricians, chemists, astronomers, poets, musicians, and painters in plenty; but we have no longer a citizen among us; or if there be found a few scattered over our abandoned countryside, they are left to perish there unnoticed and neglected. Such is the condition to which we are reduced, and such are our feelings towards those who give us our daily bread, and our children milk.- Rousseau, Discourse on the Arts and Sciences

4. The priests, in control of education, made the class division of society into a permanent institution and created a system of values by which the people were thence forth, to a large extent unconsciously, guided in their social behavior.— Albert Einstein in Why Socialism?, Monthly Review (May 1949).

5. Production is carried on for profit, not for use. There is no provision that all those able and willing to work will always be in a position to find employment; an “army of unemployed” almost always exists. The worker is constantly in f ear of losing his job. Since unemployed and poorly paid workers do not provide a profitable market, the production of consumers’ goods is restricted, and great hardship is the consequence. Technological progress frequently results in more unemployment rather than in an easing of the burden of work for all. The profit motive, in conjunction with competition among capitalists, is responsible for an instability in the accumulation and utilization of capital which leads to increasingly severe depressions. Unlimited competition leads to a huge waste of labor, and to that crippling of the social consciousness of individuals which I mentioned bef ore. This crippling of individuals I consider the worst evil of capitalism. Our whole educational system suffers from this evil. An exaggerated competitive attitude is inculcated into the student, who is trained to worship acquisitive success as a preparation for his future career.—Albert Einstein, Monthly Review (May 1949).

6. I admire Gandhi greatly but I believe there are two weaknesses in his program; while nonresistance is the most intelligent way to cope with adversity, it can be practiced only under ideal conditions. It may be feasible to practice it in India against the British but it could not be used against the Nazis in Germany today. Then, Gandhi is mistaken in trying to eliminate or minimize machine production in modern civilization. It is here to stay and must be accepted. —‘Peace Must Be Waged,’ Interview with Robert Merrill Bartlett in the Survey Graphic, August 1935, Nathan and Norden (1968), ref. 15, p. 261.

7. The economic anarchy of capitalist society as it exists today is, in my opinion, the real source of the evil. We see before us a huge community of producers the members of which are unceasingly striving to deprive each other of the fruits of their collective labor—not by force, but on the whole in faithful compliance with legally established rules. In this respect, it is important to realize that the means of production—that is to say, the entire productive capacity that is needed f or producing consumer goods as well as additional capital goods—may legally be, and f or the most part are, the private property of individuals.—Why Socialism?

8. Friend, I do thee no wrong.

Didst not thou agree with me for a penny?

Take that thine is, and go thy way.

I will give unto this last even as unto thee.”

“If ye think good, give me my price;

And if not, forbear.

So they weighed for my price thirty pieces of silver.”— John Ruskin‘s Unto This Last.

9. हरिजन, 13 मार्च 1937, मेरे सपनों का भारत, पृष्ठ—31

10. I am convinced there is only one way to eliminate these grave evils, namely through the establishment of a socialist economy, accompanied by an educational system which would be oriented toward social goals. In such an economy, the means of production are owned by society itself and are utilized in a planned fashion. A planned economy, which adjusts production to the needs of the community, would distribute the work to be done among all those able to work and would guarantee a livelihood to every man, woman, and child.—Why Socialism?

11. The Communism of the English intellectual is something explicable enough. It is the patriotism of the deracinated. Orwell, George, Inside the Whale(1940)

12. Nothing will benefit human health and increase chances for survival of life on Earth as much as the evolution to a vegetarian diet”. ~Albert Einstein.

13. The greatness of a nation…can be judged by the way its animals are treated”. –Mahatma Gandhi.

14. Mahatma Gandhi’s life’s work is unique in political history. He has devised a quite new and humane method for fostering the struggle for liberation of his suppressed people and has implemented it with greatest energy and devotion. The normal influence which it has exerted on the consciously thinking people of the entire civilized world might be far more lasting than may appear in our time of overestimation of brutal methods of force. For only the work of such statesmen is lasting who by example and educational action awaken and establish the moral forces of their people. We may all be happy and grateful that fate has given us such a shining contemporary, an example for coming generations. –Radhakrishnan, S. (ed.), Birthday Volume to Gandhi, George Allen & Unwin, London, 1939. (Mahatma Gandhi: s and Reflections on His Life and Work: Presented to Him on His Seventieth Anniversary, 2 October 1939, 2nd edn, 1949, p. 557).

15. Gandhi, the greatest political genius of our time, indicated the path to be taken. He gave proof of what sacrifice man is capable once he has discovered the right path. His work in behalf of India’s liberation is living testimony to the fact that man’s will, sustained by an indomitable conviction, is more powerful than material forces that seem insurmountable.-Reply to the Editor of Kaizo”, 1952, Rowe 488-489.

16. A leader of his people, unsupported by any outward authority: a politician whose success rests not upon craft nor the mastery of technical devices, but simply on the convincing power of his personality; a victorious fighter who has always scorned the use of force; a man of wisdom and humility, armed with resolve and inflexible consistency, who has devoted all his strength to the uplifting of his people and the betterment of their lot; a man who has confronted the brutality of Europe with the dignity of the simple human beings, and thus at all times risen superior.

Generations to come, it may be, will scarce believe that such a one as this ever in flesh and blood walked upon this earth. – Einstein, A., Out of My Later Years, Philosophical Library, New York, 1950, p. 240.

17. Mahatma Gandhi’s life achievement stands unique in political history. He has invented a completely new and humane means for the liberation war of an oppressed country, and practised it with greatest energy and devotion. The moral influence he had on the conciously thinking human being of the entire civilized world will probably be much more lasting than it seems in our time with its overestimation of brutal violent forces. Because lasting will only be the work of such statesmen who wake up and strengthen the moral powerof their people through their example and educational works.We may all be happy and grateful that destiny gifted us with such an enlightened contemporary, a role model for the generations to come. source : http://streams.gandhiserve.org/einstein.html.


भारतीय दर्शनों में समतावादी द्रष्टिकोण

सामान्य

जातिप्रथा और वर्णव्यवस्था जैसी अवैज्ञानिक व्यवस्था ने भारतीय चिंतन को जगहजगह लांछित किया है. लेकिन कम सही, भारतीय धर्मदर्शन में मानवमात्र के प्रति समानतावादी द्रष्टिकोण देखने को मिल ही जाता है, भले ही उसका स्वरूप केवल सैद्धांतिक हो.वैदिक सभ्यता पशुपालन सभ्यता थी. जो तेजी से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रही थी. पशुपालक समाज प्रकृति के अंचल में रहता था. मुक्त हवा में सांस लेता, खुले आसमान तले सोता. पूंजी की अवधारणा विकसी नहीं थी. उसके आर्थिक संबंध सरल और एकरैखिक थे. कुल धनसंपदा पशुओं तक सीमित थी. वेदों और पुराणों में ऐसी अनेक कहानियां हैं जब सम्राट को गायांे को दान करते हुए बताया गया है. कठोपनिषद में नचिकेता के पिता उद्दालक द्वारा यज्ञ में एक लाख गाएं दान करने का उल्लेख है. पशुओं के लिए युद्ध भी होते थे. ऋग्वेद में शत्रु को परास्त कर उसके पशुओं को हांक लाने का उल्लेख किया गया है. यह कार्य उन दिनों उतना ही वीरतापूर्ण एवं सम्मानीय माना जाता था, जितना बाद के समय में दूसरे के राज्य पर कब्जा जमाकर उसकी भूमि को कब्जा लेना. हालांकि कृषिकर्म का प्रचलन बढ़ रहा था, तो भी पशुधन की महत्ता कम नहीं हुई थी. आश्रमों में जीवनयापन का मुख्य स्रोत पशु ही होते थे. जनसंख्या का बड़ा हिस्सा जंगलों में, प्रकृति के सीधे सान्न्ध्यि में रहता था. इसके साथसाथ नागरी सभ्यता के विकास के संकेत भी वेदों से प्राप्त होते हैं. वेदों में इंद्र को पुरंदर कहा गया है, जिसका अभिप्राय है, दुश्मन के किलों को ध्वस्त कर देने वाला. ऋग्वेद में में बारबार प्रार्थना की गई है कि शत्रु पर विजय प्राप्त हो, दास हमारे अधीन हों. एक प्रार्थना में इंद्र को स्वर्ण, दास आदि को जीतते हुए दर्शाया गया है.

वेदों में भारतीय समाज के उस कालखंड की एकांगिक झलक है. आधुनिक विद्वानों का एक दल मोनजोदारो और हड़प्पा नगर की सभ्यता को वैदिक सभ्यता से जोड़ता है. इन स्थानों के उत्खनन से जो विस्तृत नगरसंरचनाएं देखने को मिली हैं. उनमें मोनजोदारो बड़ा और करीब 200 एकड़ में बसा हुआ था. दूसरा शहर हड़प्पा अपेक्षाकृत छोटा था. उसका कुल क्षेत्रफल लगभग 150 एकड़ था. उनका बेबीलोन, रोम, अरब, मेसोपोटामिया आदि अनेक देशों के साथ व्यापार था. व्यापारिक काफिले हजारों मील की यात्रा करते रहते थे. उन्हें न केवल सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था, बल्कि कई मायनों में उन्हें विशेष छूट भी मिली हुई थी. उस समय तक कृषि क्षेत्र में पर्याप्त विकास हो चुका था. गेहूं और जौ की खेती बहुतायत से होती थी. कृषि उत्पादों को लानेले जाने के लिए बैलगाड़ी का प्रयोग होने चलन में था. दोनों स्थानों की खुदाई से मिले मिट्टी के बर्तन उस समय मृदाकला के विकास को दर्शाते हैं. हड़प्पा में घर लगभग एक ही आकार के बने थे, जिससे प्रतीत होता है कि वहां के नागरिक जीवन में समानता थी. तो भी ऐसे अनेक लक्षण हैं, जो दर्शाते हैं कि आर्थिक स्तरीकरण की शुरुआत सभ्यता के आरंभ में ही हो चुकी थी. मोनजोदारो में ही सार्वजनिक स्नानग्रहों और विशिष्ट स्नानगृहों की अलगअलग उपस्थिति उन दिनों समाज में बढ़ते आर्थिक स्तरीकरण की मौजूदगी को साफ करती है. सामाजिक स्तरीकरण की शुरुआत केवल आर्थिक आधार तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह समाज के बड़े वर्ग को राजनीतिक, सामाजिक स्तर पर भी अधिकारों से वंचित करती थी.

वेदों को भारतीय मनीषा की उड़ान माना जाता है. कुछ ऋचाओं के कारण उन्हें पवित्र भी माना जा सकता है. इनमें मानवमन की सहज जिज्ञासा है, विराट प्रकृति के आगे अपनी अनश्वरता और तुच्छता के कारण उत्पन्न भय है. साथ ही सुदीर्घ, सुखमय, समृद्ध और स्वस्थ जीवन के लिए मंगलकामनाएं भी हैं. वैदिक मनुष्य प्रकृति को ओज एवं जीवनदायिनी शक्ति के रूप में देखता था. इसलिए उसको मनाने, खुश रखने हेतु उसके प्रति स्नेह और सम्मान की अभिव्यक्ति वैदिक ऋचाओं में अनेक स्थानों पर हुई है, हालांकि उनका बहुत सारा हिस्सा निरर्थक कर्मकांडों, युद्ध के वर्णनों और आडंबरयुक्त वक्तव्यों से भरा पड़ा है. दर्शन की जो धारा उपनिषदों, न्याय और वैशेषिक ग्रंथों में आगे चलकर दिखाई पड़ती है, वेदों में उसका शतांश भी नहीं है. उनकी अधिकांश ऋचाएं स्तुति और यज्ञगान से भरी हैं और वे किसी न किसी बहाने निरर्थक कर्मकांड को पुष्ट करती हैं. सैंकड़ों ऋचाएं ऐसी हैं, जिनमें युद्ध का उल्लेख हुआ है. तो भी भारतीय सभ्यता के प्राचीनतम ग्रंथ होने के नाते वेदों में जो श्रेयस्कर है, उसका उल्लेख भी उपयुक्त जान पड़ता है. ऋग्वेद के दशम मंडल के अंतिम सूक्तों में वैदिक जनों की प्रार्थनाएं देखिएः

हम सब साथ गमन करें, साथ रहें, परस्पर मिलकर प्रेमालाप करें, एकनिष्ठ, एकात्म हो साथसाथ ज्ञानार्जन को तत्पर हों. जैसे अभी तक सब मिलजुलकर रहते आए हैं, उसी तरह एकमत होकर आगे भी कार्य करें.’

हम सबकी प्रार्थना एक हो. हमारा मिलन भेदभाव रहित, एकरस हो, हमारे विचार एक हों. हमारा चिंतनमनन और उसके साधन, अंतःकरण, मंत्र, विचारधारा आदि सब एकसमान हों. हमारा ज्ञान एक हो, हमारा प्रभाव, हमारे प्रयत्न एक हों.

तुम्हारा संकल्प एक समान हो. तुम्हारे हृदय एकसमान हों. तुम्हारे मन एक समान हों. तुम्हारे कार्य पूर्ण और प्रयास एकनिष्ठ हों.

अर्थवेद में यही मंगलकामना कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त हुई है—

तुम सभी में हृदय की एकता हो. मन की एकता हो. मैं तुम्हारे अंतर में अविद्वेष की भावना चाहता हूं. तुम्हारा जीवन परस्पर प्रेम और अनुराग से भरा हो. जिस तरह गाय अपने बछडे़ को प्रेम करती है, उसी प्रकार तुम भी आपस में प्रेम करो.’

दरअसल लंबे सहजीवन के बाद उसकी समझ में आ चुका था कि उसका सुख, सुरक्षा एवं समृद्धि दूसरों पर निर्भर है. अकेला होने पर प्रकृति का विराट वैभव भी उसके लिए अर्थहीन है. ऊपरोल्लित सद्कामनाएं उन मुनियों की थीं, जो श्रमण परंपरा के पोषक थे. प्रकृति के साहचर्य में रहकर शांतिपूर्वक अपना जीवनयापन करते थे. ‘जियो और जीने दो’ जिनके जीवन का मूलमंत्र था. उनके लिए प्राणीमात्र में कोई भेद नहीं था. जो ज्ञान और प्रकृतिप्रदत्त संसाधनों को मानवमात्र के उपयोग की वस्तु मानते थे. जो ज्ञान को पवित्र और मानवमात्र की साझा धरोहर मानते थे. इसलिए उन्होंने आवाह्न किया था—‘ज्ञान को चारो दिशाओं से आने दो.’ वे प्रकृति को अपना घर, संरक्षक और देवता मानते थे. उनके लिए पूरी वसुधा एक आंगन थी और उसपर बसने वाले सभी मानवजन एक ही परिवार के सदस्य. जिनका मानवमात्र से अपनापा था. पराया उनके लिए कोई न था—

यह अपना है, वह पराया है—यह सोच क्षुद्र वृत्ति की उपज है. उदारचरितों, सज्जनों के लिए तो पूरा विश्व एक परिवार के समान है, पृथ्वी पर रहने वाले सभी नरनारी उनके परिजन हैं.’

वेदों में राजाओं के बीच युद्ध की अनेक घटनाएं हैं. देवासुर संग्राम के अलावा सुदास का युद्ध भी है, जो अनार्य सम्राट था. ये युद्ध राजनीति पर पुरोहितों के बढ़ते प्रभाव को दर्शाते हैं. उनमें दर्शन और अध्यात्म की खोज करना बेमानी होगा. लेकिन धर्म के नाम पर पाखंड और राजनीति के स्थान पर युद्धोन्मत्तता से भरी स्तुतियों के बीच कुछ काम की बातें भी वेदों में आई हैं. राजा कैसा हो, यह बात भी वैदिक ऋषि जोर देकर कहते हैं. राजा है तो प्रजा के लिए कल्याणकारी हो. राजा ऐसा होना चाहिए जो अपनी प्रजा के सुखदुःख को समझ सके. उसमें साझा कर सके. ऋग्वेद(1.82.2) में कहा गया है, ‘अहि दभ्रस्य चिद वृध’— राज्य के प्रत्येक नागरिक को पर्याप्त भोजन मिले, यह व्यवस्था राजा को करनी चाहिए. वेदों में ऐसी सूक्तियां बिखरी पड़ी हैं. समाजवाद यदि एक राजनीतिक सदेच्छा है, तो उसका प्रावधान भी वेदों में था. मगर कल्याण की धारा बहुत ही प्रच्छन्न और कर्मकांड के बीच दबसी गई है.

वेदों के उद्गाता ऋषियों की संख्या करीब 300 है. उनमें से अधिकांश अपनी प्रतिभा का उपयोग कर्मकांडों की स्थापना और युद्धों के बखान के लिए करते हैं. कहीं वे अदृश्य, अविकारी परमात्मा की स्तुति करते हुए दिखाई पड़ते हैं, तो अधिकांश जगह उनकी स्तुतियों में बहुदेववादी स्थापनाएं हैं. आशय यह है कि बहुदेववाद, कर्मकांड और युद्ध के वर्णन के बीच वेदों की यह मानवतावादी धारा म्लान होने लगती थी. तो भी उपनिषदों, महाकाव्यों में यत्रतत्र ये अनमोल मोती बिखरे पड़े हैं. बीसवीं शदी के महान महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटाइन ने कहा था कि मनुष्य के लिए मनुष्य से बढ़कर कुछ नहीं है. इस बात को लगभग तीन सहस्राब्दी पहले वेदव्यास महाभारत में कह चुके हैं—‘न हि मानुषात्परतरं किंचिदस्ति’—मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है. इसी उक्ति का प्रस्फुटन लगभग तीन हजार वर्ष पश्चात महाकवि रवींद्रनाथ ठाकुर अपनी कविता पंक्तियों में कुछ इस प्रकार नजर आता है—‘सबार ऊपरे मानुस सत्यं, तहार ऊपरे केऊ नाहीं,’ आशय यही है कि मानवसत्य सबसे ऊपर है, उससे बढ़कर कुछ भी नहीं है.हालांकि ऐसी उक्तियां कवियों की संवेदना से आगे, यथार्थ स्तर पर बहुत कम प्रभाव छोड़ पाई हैं.

जैसा कि ऊपर कहा गया है, वेदों में सबकुछ श्रेयस्कर हो, ऐसा नहीं है. अगर ऐसा होता तो वे हर भारतीय के समानरूप से सम्मान के पात्र होते. मगर अब हकीकत है कि वे मुट्ठीभर ब्राह्मणों और कर्मकांडों के प्रेरणास्रोत बनकर रह गए हैं. ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में ही भारत की जातिव्यवस्था के चिह्न मिलते हैं. वर्गविभाजन को उस समय भले कितनी ही सदेच्छा के साथ अपनाया गया हो, मगर बहुत शीघ्र उसके दुष्परिणाम सामने आने लगे थे. इसलिए इसका विरोध भी उसी समय प्रारंभ हो चुका था. वैदिक युग में भी वर्णव्यवस्था एवं कर्मकांडों का विरोध करने वाले भारी संख्या में थे. उनमें वेन, सुदास, सुमुख, निमि, हिरण्यकाश्यप आदि सम्राट भी थे, जिन्होंने धर्म और दर्शन के नाम पर थोपे जा रहे, पुरोहितवाद का जमकर विरोध किया था. इन सभी ने ब्राह्मणवाद के विरुद्ध भारी संघर्ष छेड़ा हुआ था. वेन की कथा हरिवंश पुराण में भी आई है, जिसके अनुसार वह विश्व का प्रथम निर्वाचित सम्राट था. मगर अंततः कर्मकांड के विरोध के चलते पुरोहितों, ब्राह्मणों के षड्यंत्र का शिकार हुआ. इसकी एक दिलचस्प मगर चैंका देने वाली कहानी है. जबकि बालि, प्रहलाद जैसे कुछ सम्राट ब्राह्मणवाद के बढ़ते प्रभाव के आगे समर्पण कर उसको अपना चुके थे.

वस्तुतः देवताओं के अभिकल्पना और उनका विकास मनुष्यता के विकास से जुड़ा है. समय के साथ प्रासंगिकता को देखते हुए मनुष्य ने जहां अनेक देवताओं की संकल्पना की, वहीं समय के प्रवाह में प्रासंगिक न होने के कारण अनेक देवता अपना महत्त्व खोते चले गए. नए देवताओं का आना भी जुड़ा रहा. जिन दिनों कृषि जीवन का मुख्याधार थी, उन दिनों जल का देवता वरुण और वर्षा के अधिष्ठाता इंद्र की बड़ी महिमा थी. मगर अब इनकी शायद ही कहीं नियमित पूजा होती हो. प्रागैतिहासिक काल में जब मानवजीवन शिकार पर निर्भर था, और पशुओं का मांस मनुष्य का मुख्य अहार था, उन दिनों पशुओं की भांति मनुष्य भी धरती पर भटकता रहता था. भोजन एवं सहवास जैसी सहज प्राकृतिक इच्छाएं वह खुले में संपन्न करता था. उन दिनों अपने भोजन के लिए वह शिकार पर निर्भर था. इसलिए पत्थर के औजारों के शोध पर जोर दिया गया. उसने वही हथियार बनाए जिनसे शिकार करने में सुविधा हो. शिकार में पालतू जानवरों की मदद भी ली जाती थी. स्वभाविक रूप से उन समय तक उसके देवता भी जंगलवासी थे. इसलिए देवताओं की प्रारंभिक अभिकल्पना टोटम के रूप में की गई. टोटम यानी प्रतीक या गणचिह्न, जिससे कोई कबीला या समुदाय अपने अस्तित्व को जोड़कर देखता था. वह जानवर या कोई पेड़पौधा भी हो सकता था.

टोटम कबीले अथवा गणसमूह की संपन्नता और शुभता का प्रतीक था. बाद में शिकार के समय जब यह पाया गया कि आदमियों में उनके शारीरिक सौष्ठव, प्राकृतिक गुण और शारीरिक विकास के आधार कुछ लोग अधिक उपयोगी सिद्ध होते हैं, तो समूह के नेता के चयन की परंपरा की शुरुआत हुई. साथ ही एक ऐसे देवता की अभिकल्पना की गई जिसमें सभी गुण एकसाथ हों. सभ्यता के आरंभ में आदिदेव शंकर के रूप में ऐसे ही देवता की परिकल्पना में दिखाई पड़ती है. उनके हाथों में त्रिशूल सजाया गया, जिसको पत्थर और उससे बने औजारों की भांति दूर से ही फेंककर मारा जा सकता था. मगर उसकी मार पत्थर के मुकबाले कहीं ज्यादा मारक थी. खासकर शिकार के काम में. कृषियुग आया तो इंद्र, वरुण, अग्नि और मरुत आदि देवताओं का महत्त्व बढ़ता गया. ऋग्वेद के एक मंत्र में इंद्र को पशुओं और दासों को साथसाथ हांकते हुए उल्लेख किया गया है. युद्ध मंे जीते हुए दासों के साथ शत्रुओं जैसा व्यवहार किया जाता था. वेद में इंद्र की चर्चा स्वयं सम्राट की भांति की गई है. आगे चलकर बौद्ध धर्म के प्रचारप्रसार के बीच जब वैदिक कर्मकांड की उपयोगिता को लेकर प्रश्न उठाए जाने लगे तो समाज का बड़ा वर्ग उनकी आलोचना करने लगा. यह विरोध इतना अधिक बढ़ा था कि वेदों में वर्णित इंद्र के लिए देवराज की सत्ता डगमगाने लगी. कालांतर में जैसे ही बौद्धधर्म कमजोर पड़ा, तो ब्राह्मणों ने इंद्र को उसके स्थान से हटाकर राम, कृष्ण, आदि को देवता के रूप में स्थापित करना प्रारंभ कर दिया, जिसमें उन्हें व्यापक सफलता मिली.

उल्लेखनीय है कि भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के लगभग पांच हजार वर्ष के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ जब समाज का बौद्धिक नेतृत्व पूरी तरह ब्राह्मणों के हाथों में रहा हो. राजसिंहासन पर केवल क्षत्रिय विराजमान रहे हों और विणजव्यौपार वैश्यों की बपौती बनकर रहा हा—प्रतिभाशाली और कर्मठ लोग, इतिहास को मनचाहा मोड़ देने वाले नायक, हर युग, प्रत्येक कालखंड में के साक्षी बने हैं. वर्णव्यवस्था की शुरुआत में जब तक विभिन्न वर्णों के बीच अंतपर्रिवर्तनीयता संभव थी, उस समय तक तो विभिन्न वर्णों के लोग हर क्षेत्र में कार्यरत थे ही, बाद के वर्षों में भी जब जातिप्रथा समाज पर अपनी जकड़ बना चुकी थी, विभिन्न जातियों के प्रतिभाशाली लोग धर्म, राजनीति, व्यापार, शिल्पकला आदि में अपनी उपस्थिति बनाए हुए थे. मगध सम्राट महानंद शूद्र था. चाणक्य के प्रयासों से महानंद से सत्ता हथियाने वाला चंद्रगुप्त मौर्य भी शूद्र ही था. वैदिक तत्ववेत्ताओं में रैक्व और सत्यकाम जाबालि भी शूद्र वर्ग से आए थे. सत्यकाम जाबालि की मां तो वेश्या थी. सुग्रीव, बालि, हनुमान वन्य जाति से संबंधित थे, जिन्होंने अपनी शांति की कीमत पर साम्राज्यवादी राम से समझौता किया था. रामायण और महाभारत में असुर जातियों का उल्लेख हुआ है, जिनका ब्राह्मणधर्म से तीखा विरोध था और उनके बीच लड़ाइयां चलती ही रहती थीं.

असुरों में भी एक से बढ़कर एक प्रतापी राजा हुए हैं, जिन्हें वर्णव्यवस्था से बाहर होने के कारण क्षत्रिय नहीं माना जा सकता. राम के पूर्वज अयोध्या के सम्राट नहुष भी ब्राह्मणवाद के मुखर विरोधियों में से थे. राजा हरिश्चंद्र को अपने ब्राह्मणविरोध के चलते अनेक कष्ट झेलने पड़े थे. इसके बावजूद एक षड्यंत्र के रूप में लोगों को बताया जाता रहा कि केवल ही समाज का बौद्धिक नेतृत्व कर सकता है. केवल क्षत्रिय में युद्धकौशल और राज करने की कला और वैश्य को व्यापार का गुण आता है. रामायण काल से लेकर गौतम बुद्ध, यहां तक कि हषवर्धन तक शूद्र कही जाने वाली जातियां व्यापार में काफी आगे थीं. जुलाहों, कोविदों, तैलिकों, तांबूलकों, काष्ठकारों, शिल्पकर्मियों आदि के अपने व्यापारिक संगठन थे, जिनकी पहुंच राजदरबारों तक थी. महत्त्वपूर्ण अवसरों पर सम्राट उनसे परामर्श लेता था. राज्य के अधीन संचालित अनेक कल्याणकारी योजनाओं के सफलतापूर्वक संचालन के लिए इन संगठनों का सहयोग लिया जाता था. लेकिन साजिशाना ढंग से, विशेषकर धर्मग्रंथों में इस तथ्य की घोर उपेक्षा की गई. गैर द्विज जातियों को या तो जानबूझकर छोड़ दिया गया, अथवा उनकी उपलब्धियों और गुणों का उल्लेख करते समय कृपणता को अपनाया गया, ताकि छोटी कही जाने वाली जातियों का आत्मविश्वास डोलता रहे. ‘शूद्रधर्मः परो नित्यं शुश्रूषा च द्विजातिषु’—तीनों वर्णों की सेवा करना ही शूद्र का परम कर्तव्य है, यह महाभारत में व्यास के मुंह से कहलवाया गया है, जो स्वयं शूद्र थे. एक अन्य जगह पर इसी महाकाव्य में लिखा है—‘देवताद्विज बंदक’, देवताओं एवं ब्राह्मणों की सेवा, शिल्पकर्म, खेतीबाड़ी, नाटक और नक्काशी जैसे काम शूद्रों के हैं, ब्राह्मण के लिए ये कार्य निषिद्ध थे. इस तरह की बातों से न केवल शूद्रों के स्वाभिमान को चुनौती दी गई, बल्कि उनकी उपलब्धियों को अपना बताकर समाजनिर्माण में उनकी भूमिका को कमतर आंका गया.

जिस समाज में ऐसा सोच हो, जहां कर्मकांडों की बहुलता हो, जहां आत्मरक्षा को सबसे बड़ा आपद्धर्म माना जाता हो. जो समाज स्त्रियों के बारे में कहा जाता हो कि ‘स्त्रियोहि मूलं दोषाणाम्’ अर्थात ‘स्त्रियां बुराई की जड़ होती हैं. जिसका मानना हो कि विपत्ति के लिए बचाए धन से पहले भार्या को बचाएं. लेकिन खुद पर संकट आन पड़े तो बचाने के लिए धन और पत्नी दोनों को जाने दें. जिस समाज का ऐसा निर्लज्ज सोच हो, जो समाज अपनी तीनचौथाई आबादी से संसाधन छीनकर उन्हें दूसरे के सहारे जीवनयापन के लिए विवश बना दे, जिस समाज में स्वार्थ को नीति की मान्यता प्राप्त हो, जहां आत्मरक्षा ही सबसे बड़ा आपद्धर्म माना जाता हो, जहां शास्त्रों की व्यवस्था हो कि—‘एक आदमी की कीमत पर कुल को बचाना चाहिए. कुल जा रहा हो तो गांव को बचाना चाहिए. गांव की कीमत देकर जनपद को बचाना चाहिए. पर अपने को बचाने का सवाल हो तो सारी पृथ्वी को कुर्बान कर देना चाहिए.’ ऐसे समाज में सचमुच की समानता होगी, यह विचार गले नहीं उतरता.

वेदसमर्थित वर्णव्यवस्था सत्तावान वर्ग को अतिरिक्तरूप से अधिकारसंपन्न बनाती थी, इसलिए आगे चलकर उस व्यवस्था को बदलना असंभवसा होता गया. वेदों में या तो ब्राह्मण पुरोहित हैं अथवा उनके यजमान. इनके अतिरिक्त उनका वर्णन है जिनका इंद्र ने अपनी श्रेष्ठता दर्शाने के लिए हनन किया. विजेता के पक्ष में वह समाज है जो दूसरे के परिश्रम पर जीवनयापन का अभ्यस्त है. किसान, श्रमिक, शिल्पकार आदि की उपस्थिति वहीं तक है, जहां तक वह सामंतवाद का पोषण करती हो. इनके अलावा अनगिनत देवगण हैं, जो ब्राह्मणों से समिधा ग्रहण करते हैं, इसलिए उनके संरक्षक हैं. सर्वशक्ति संपन्न होने के बावजूद वे दूसरे के श्रम का क्यों खाते हैं? उन्हें आत्मप्रशंसा क्यों प्रिय है? क्यों बिना चाटुकारिता कराए उनसे रहा नहीं जाता? भोजन करने से पहले उन्हें भोग लगाए बिना वे क्यों नाराज हो जाते हैं? इन प्रश्नों का उत्तर न तो वेदों में है, न ही बाद के ग्रंथों में इसपर विचार किया गया है. बल्कि अधिकांश जगह इसको श्रद्धा का मसला बताकर टाल दिया जाता है. हैरानी की बात यह होती है कि दिनभर सड़कों पर पत्थर तोड़कर अपने परिवार का पोषण करने वाला श्रमिक भी अपनी मामूली आय का एक हिस्सा चढ़ावे में चढ़ाकर देवता से अपने कल्याण की प्रार्थना करता है. वह कभी यह प्रार्थना नहीं करता कि देवता उसके भारी काम को पूरा करने में उसका सहयोग करे. पत्थर तोड़ने या मेहनत का दूसरा कोई काम जो वह करता है, उसमें उसके साथ मिलकर पसीना बहाए. कोई धर्मग्रंथ इसपर विचार नहीं करता कि परिश्रम श्रमिक की नियति और मुफ्तखोर होना, दूसरे की कमाई खाना देवताओं की नियति क्यों है. ऐसे ही देवताओं की महिमा का बखान वेदों में है. इसके अलावा उनमें बलि है, सुरापान की प्रशंसा है, पुरोहितों का व्यभिचार है यानी उनमें हर वह वस्तु अथवा विचार है जो शिखरस्थवर्गों के अन्याय, उत्पीड़न, वर्चस्व, विशेषाधिकार को उचित ठहराता हो. वेदों में तत्कालीन जनजीवन की झलक न होकर, निरर्थक कर्मकांडों का गुणगान है.

बौद्धकाल

बौद्धधर्म का उद्भव वैदिक धर्म की प्रतिक्रिया में हुआ था. वेदों में बहुदेववाद, कर्मकांड और युद्धों का इतना विशद् वर्णन है कि उनके आगे उनकी दार्शनिक, नैतिक, आध्यात्मिक चिंतनधारा म्लान दिखने लगती है. इसलिए वे तत्वचिंतन के नाम पर कर्मकांड, धर्म के बजाय पाखंड, नीति के स्थान पर ऊंचनीच और आडंबर रचते हुए नजर आते हैं. पुरोहित वर्ग उनके माध्यम से धर्मदर्शन की स्वार्थानुकूल और मनमानी व्याख्याएं थोपने का प्रयास करता है. राजनीति के सहयोग से वह इस धृष्टता में कामयाब भी होता है. धर्म और राजसत्ता परस्पर मिलकर लोगों के शोषण के लिए नएनए विधान गढ़ते हैं. समाजार्थिक शोषण का यह सिलसिला लगभग पांच शताब्दियों तक निरंतर चलता है. ऐसा भी नहीं है कि शेष समाज शोषण को अपनी नियति मान चुका था. बल्कि जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, ब्राह्मणवाद का विरोध उसके आरंभिक दिनों से ही होने लगा था. मगर उसको रचनात्मक दिशा देने का काम किया था, जैन और बौद्ध दर्शन ने. इन दोनों दर्शनों ने वेदों की बुद्धिवाद की उस धारा को नई एवं युगानुकूल दिशा देने का काम किया, जो कर्मकांड और मिथ्याडंबरों के बीच अपनी पहचान लगभग गंवा चुकी थी.

जैन और बौद्ध धर्म के प्रवर्तक क्रमशः महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध, ईसा से छह शताब्दी पहले, क्षत्रिय कुल में जन्मे थे. अपनेअपने दर्शन में दोनों ने ही कर्मकांड और आडंबरवाद का जमकर विरोध किया था. दोनों ही यज्ञों में दी जाने वाली पशुबलियों के विरुद्ध थे. दोनों ने शांति और अहिंसा का पक्ष लिया था, और भरपूर ख्याति बटोरी. जैन और बौद्ध, दोनों ही दर्शनों को भारतीय चिंतनधारा में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. इनमें से जैन धर्म अहिंसा को लेकर अत्यधिक संवेदनशील था, जबकि जीवन को लेकर बुद्ध का दृष्टिकोण व्यावहारिक था. अहिंसा के प्रति अत्यधिक आग्रहशीलता के कारण जैन दर्शन प्रचारप्रसार के मामले में बौद्ध दर्शन से पिछड़ता चला गया. व्यावहारिक होने के कारण बौद्ध दर्शन को उन राजाओं आ समर्थन भी मिला जो ब्राह्मणवाद से तंग हो चुके थे; और उपयुक्त विकल्प की तलाश में थे.

गौतम बुद्ध ने कर्मकांड के स्थान पर ज्ञानसाधना पर जोर दिया था. पशुबलि को हेय बताते हुए वे अहिंसा के प्रति आग्रहशील बने रहे. वेदवेदांगों में आत्मापरमात्मा आदि को लेकर इतने अधिक तर्कवितर्क और कुतर्क हो चुके थे कि बुद्ध को लगा कि इस विषय पर और विचार अनावश्यक है. इसलिए उन्होंने आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि विषयों को तात्कालिक रूप से छोड़ देने का तर्क दिया. उसके स्थान पर उन्होंने मानवजीवन को संपूर्ण बनाने पर जोर दिया. समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए उन्होंने पंचशील का सिद्धांत दिया. जिसमें पहला शील है, अहिंसा. जिसके अनुसार किसी भी जीवित प्राणी को कष्ट पहुंचाना अथवा मारना वर्जित कर दिया गया था. दूसरा शील था, चौर्य. जिसका अभिप्राय था कि किसी दूसरे की वस्तु को न तो छीनना न उस कारण उससे ईर्ष्या करना. तीन शील सत्य था. मिथ्या संभाषण भी एक प्रकार की हत्या है. सत्य की हत्या. इसलिए उससे बचना, सत्य पर डटे रहना. तीसरे शील के रूप में तृष्णा न करना शामिल था. व्यक्ति के पास जो है, जो अपने संसाधनों द्वारा अर्जित किया गया, उससे संतोष करना. आवश्यकता से अधिक की तृष्णा न करना. इसलिए कि यह पृथ्वी जरूरतें तो सबकी पूरी कर सकती है, मगर तृष्णा एक व्यक्ति की भी भारी पड़ सकती है. पांचवा शील मादक पदार्थों के निषेद्ध को लेकर है. पंचशील को पाने के लिए उन्होंने अष्ठांगिक मार्ग बताया था, जिसमें उन्होंने सम्यक दृष्टि(अंधविश्वास से मुक्ति), सम्यक वचन(स्पष्ट, विनम्र, सुशील वार्तालाप), सम्यक संकल्प(लोककल्याणकारी कर्तव्य में निष्ठा, जो विवेकवान व्यक्ति से अभीष्ट होता है), सम्यक आचरण(प्राणीमात्र के साथ शांतिपूर्ण, मर्यादित, विनम्र व्यवहार), सम्यक जीविका(किसी भी जीवधारी को किसी भी प्रकार का कष्ट न पहुंचाना), सम्यक परिरक्षण(आत्मनियंत्रण और कर्तव्य के प्रति समर्पण का भाव), सम्यक स्मृति(निरंतर सक्रिय एवं जागरूक मस्तिष्क) तथा सम्यक समाधि(जीवन के गंभीर रहस्यों पर सुगंभीर चिंतन) पर जोर दिया था.

बुद्ध की चिंता थी कि किस प्रकार मानवजीवन को सुखी एवं समृद्ध बनाया जाए. सुख से उनका अभिप्राय केवल भौतिक संसाधनों की उपलब्धता से नहीं था. इसके स्थान पर वे न केवल मानवजीवन के लिए सुख की सहज उपलब्धता चाहते थे, बल्कि समाज के बड़े वर्ग के लिए सुख की समान उपलब्धता की कामना करते थे. यह वैदिक ब्राह्मणवाद के समर्थकों से एकदम भिन्न था. जिन्होंने परलोक की काल्पनिक भ्रांति के पक्ष में भौतिक सुखों की उपेक्षा की थी, जबकि उनका अपना जीवन भोग और विलासिता से भरपूर था. यही नहीं वर्णाश्रम व्यवस्था के माध्यम से उन्होंने समाज के बहुसंख्यक वर्गों, जो मेहनती और हुनरमंद होने के साथसाथ समाज के उत्पादन को बनाए रखने के लिए कृतसंकल्प थे, सुख एवं समृद्धि से दूर रखने की शास्त्रीय व्यवस्था की थी. शूद्र कहकर उसको अपमानित करते थे. और इस आधार पर उन्हें अनेक मानवीय सुविधाओं से वंचित रखा गया था.

उल्लेखनीय है कि वेदों के आडंबरवाद का विरोध उन्हीं दिनों शुरू हो चुका था. उस समय के महानतम विद्वान कौत्स तो वैदिक ऋचाओं को शब्दाडंबर मात्र मानते थे. समाज का बड़ा वर्ग वैदिक परंपराओं का खंडन करता था. इस कारण वेद समर्थकों और उनके विरोधियों के बीच घमासान भी होते रहते थे. जिनसे कूटनीति और छल के कारण ब्राह्मणवादियों को विजय प्राप्त हुई थी. दरअसल यह बुद्ध ही थे जिन्होंने दर्शन को वायवी आडंबर से बाहर लाकर आचरण और व्यवहार के धरातल पर लाकर अवस्थित किया था. उन्होंने दर्शन को निरर्थक और अनुपयोगी प्रश्नों के चक्र से बाहर लाकर जीवन से जोड़ा. मानव मन की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं के सापेक्ष नैतिकता को केंद्र में लेकर आए. पंडितों और पुरोहितों से अलग भाषा अपनाते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि धर्म और दर्शन, दोनों का उद्देश्य इस विश्व का पुनर्निर्माण करना है, ब्रह्मांड की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं. आज प्रयोगों द्वारा सिद्ध हो चुका है कि ब्रह्मांड की व्याख्या वैज्ञानिक नियमों द्वारा ही सटीक ढंग से की जा सकती है. नैतिकता से कटा हुआ धर्म महज आडंबर है. विरोधियों की आलोचना की परवाह न करते हुए उन्होंने आगे कहा कि सृष्टि का केंद्र मनुष्य है, न कि ईश्वर. धर्म के बारे में उनका कहना था कि उसका केंद्रविषय नैतिकता है. वे जीवन में दुःख को अवश्यंभावी मानते थे. साथ ही उनका मानना था कि दुःखों से मुक्ति संभव है. इसके लिए जीवन के प्रति संपूर्ण समर्पण अनिवार्य है.

पुरोहितों और पंडितों के चंगुल से आमजन को बचाने के लिए उन्होंने अष्ठांग मार्ग का प्रवर्तन किया. जीवन की पवित्रता के लिए उन्होंने उसको संपूर्णता के साथ अपनाने की सलाह दी. बातबात पर पुरोहितों और धर्माचार्यों की शरण में जाने वाले लोगों को उन्होंने नेक सलाह दी—अप्प दीपो भवः अपना दीपक स्वयं बनो. उन्होंने जोर देकर कहा कि सुख केवल शीर्षस्थ वर्गों की बपौती नहीं है. गृहस्थ के लिए धनार्जन न तो पाप है, न कोई अभिशाप. जीवन के प्रति मध्यमार्गी दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने धर्नाजन को गृहस्थ के लिए अनिवार्य उपक्रम माना. वे पहले धर्माचार्य थे, जिन्होंने गणतंत्र का पक्ष लिया, यह उस युग में एकदम क्रांतिकारी था. परिणाम यह हुआ कि सांसारिक सुखों के प्रति जनसामान्य पापबोध लगातार घटने लगा. शिल्पकर्मियों को शूद्र का दर्जा देकर उन्हें तरहतरह से प्रताड़ित किया जाता था. बौद्ध धर्म में जातिवर्ण के लिए कोई स्थान न था. बल्कि सभी के लिए सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार था. इसलिए जातीय उत्पीड़न का शिकार रही जातियां बड़ी तेजी से बौद्धधर्म में शामिल होने लगीं. देखते ही देखते वह देश की सीमाएं पार कर, विदेशी भूमियों पर अपनी पकड़ बनाता गया.

बुद्ध स्वयं क्षत्रिय थे. उनके समकालीन महावीर स्वामी भी क्षत्रिय ही थे. दोनों ने ही राजनीतिक सुखसुविधाओं को ठुकराकर अध्यात्मचिंतन का मार्ग चुना था. राजघराना छोड़कर उन्होंने चीवर धारण किया था. इसलिए बाकी वर्गों में विशेषकर उन लोगों में जो ब्राह्मणों और उनके कर्मकांडों से दूर रहना चाहते थे, जैन और बौद्धधर्म की खासी पैठ बनती चली गई. मगर सामाजिक स्थितियां बौद्ध धर्म के पक्ष में थीं. इसलिए कि एक तो वह व्यावहारिक था. दूसरे जैन दर्शन में अहिंसा आदि पर इतना जोर दिया गया था कि जनसाधारण का उसके अनुरूप अपने जीवन को ढाल पाना बहुत कठिन था. यज्ञों एवं कर्मकांडों के प्रति जनसामान्य की आस्था घटने से उनकी संख्या में गिरावट आई थी. उनमें खर्च होने वाला धर्म विकास कार्यों में लगने लगा था. पहले प्रतिवर्ष हजारों पशु यज्ञों में बलि कर दिए जाते थे. महात्मा बुद्ध द्वारा अहिंसा पर जोर दिए जाने से पशुबलि की कुप्रथा कमजोर पड़ी थी. उनसे बचा पशुधन कृषि एवं व्यापार में खपने लगा. शुद्धतावादी मानसिकता के चलते ब्राह्मण समुद्र पार की यात्रा को निषिद्ध और धर्मविरुद्ध मानते थे. बौद्ध धर्म में ऐसा कोई बंधन न था. इसलिए अंतरराज्यीय व्यापार में तेजी आई थी. चूंकि अधिकांश राजाओं द्वारा अपनाए जाने से बौद्ध धर्म राजधर्म बन चुका था, इसलिए युद्धों में कमी आई थी, जो राजीनितिक स्थिरता बढ़ने का प्रमाण थी. व्यापारिक यात्राएं सुरक्षित हो चली थीं. जिससे व्यापार में जोरदार उछाल आया था.

ये सभी स्थितियां जनसामान्य के लिए भले ही आह्लादकारी हों, मगर ब्राह्मणधर्म के समर्थकों के लिए अत्यंत अप्रिय और हितों के प्रतिकूल थीं. इसलिए उसका छटपटाना स्वाभाविक ही था. अतएव महात्मा बुद्ध को लेकर वे ओछे व्यवहार पर उतर आए थे. बुद्ध का जन्म शाक्यकुल में हुआ था, जो वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार क्षत्रियों में गिनी जाती थी. ब्राह्मणों ने उन्हें शूद्र कहकर लांछित किया, जिसको बुद्ध इन बातों से अप्रभावित बने रहे. दर्शन को जनसाधारण की भावनाओं का प्रतिनिधि बनाते हुए उन्होंने दुःख की सत्ता को स्वीकार किया. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि दुःख निवृत्ति संभव है. उसका एक निर्धारित मार्ग है. दुःख स्थायी और ताकतवर नहीं है. बल्कि उसको भी परास्त किया जा सकता है.

बुद्ध का दर्शन वर्जनाओं पर प्रहार का दर्शन है. सबसे पहले वह वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रहार करते हैं. उस व्यवस्था पर प्रहार करते हैं, जो ब्राह्मणों को विशेषाधिकार संपन्न बनाती है. पुरोहितवाद की जरूरत को नकारते हुए वे कहते हैं— तुम स्वयं दीपक हो.तुम्हें किसी बाहरी प्रकाश की आवश्यकता नहीं हैं. किसी मार्गदर्शक की खोज में भटकने से अच्छा है कि अपने विवेक को अपना पथप्रदर्शक चुनो. समस्याओं से निदान का रास्ता मुश्किलों से हल का रास्ता तुम्हारे पास है. सोचो, सोचो और खोज निकालो. इसके लिए मेरे विचार भी यदि तुम्हारे विवेक के आड़े आते हैं, तो उन्हें छोड़ दो. सिर्फ अपने विवेक की सुनो. करो वही जो तुम्हारी बुद्धि को जंचे. न्होंने पंचशील का सिद्धांत दुनिया को दिया. उसके द्वारा मर्यादित जीवन जीने की सीख दुनिया को दी. कहा कि सिर्फ उतना संजोकर रखो जिसकी तुम्हें जरूरत है. तृष्णा का नकारहिंसा छोड़, जीवमात्र से प्यार करो. प्रत्येक प्राणी को अपना जीवन जीने का उतना ही अधिकार है, जितना कि तुम्हें है. इसलिए अहिंसक बनो. झूठ भी हिंसा है. इसलिए कि वह सत्य का दमन करती है. झूठ मत बोलो. सिर्फ अपने श्रम पर भरोसा रखो. उसी वस्तु को अपना समझो जिसको तुमने न्यायपूर्ण ढंग से अर्जित किया है. पांचवा शील था, मद्यपान का निषेध. बुद्ध समझते थे वैदिक धर्म के पतन के कारण को. उन कारणों को जिनके कारण वह दलदल में धंसता चला गया. दूसरों को संयम, नियम का उपदेश देने वाले वैदिक ऋषि खुद पर संयम नहीं रख पा रहे थे. अपने आत्मनियंत्रण को खोते हुए उन्होंने खुद ही नियमों को तोड़ा. मांस खाने का मन हुआ तो यज्ञों के जरिये बलि का विधान किया. कहा कि ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ और अपनी जिव्हा के स्वाद के लिए पशुओं की बलि देते चले गए. नशे की इच्छा हुई तो सोम को देवताओं का प्रसाद कह डाला और गले में गटागट मदिरा उंडेलने लगे. ऐसे में धर्म भला कहां टिकता. कैसे टिकता!

बुद्ध पहले महात्मा थे, साहचर्य का पाठ दुनिया को पढ़ाया. उससे पहले आश्रम सहजीवन की पहचान हुआ करते थे. लेकिन वहां गुरु का नाम चलता था. सारे आश्रम गुरु के नाम से जाने जाते थे. वौद्ध विहार किसी एक भिक्षु की संपत्ति नहीं थे. वे सबसे साझे थे. बुद्ध का कहना था कि जो है, सबका है. जितना है, उसको मिलबांटकर उपयोग करो. उनके भिक्षुसंघ की व्यवस्था ही ऐसी थी. प्रारंभ में गौतम बुद्ध का शिष्यत्व धारण करने वाले अधिकांश भिक्षु राजपरिवारों से आए थे. संघ के नियमानुसार प्रत्येक भिक्षु को चीवर धारण करना पड़ता था. जिसका अर्थ है जीर्णशीर्ण परिधान. उस समय आम आदमी के यही वस्त्र थे. वह मेहनत मजदूरी करता और अपने राजा के लिए कमाता था. जमीन या संपत्ति पर उसका अधिकार न था. वह राजा की मानी जाती थी. लगान चुकाने के बाद जो बचता उससे वह सिर्फ आधा तन ही ढक पाता था. बहुत बाद में अपने राजनीतिक गुरु गोविंदवल्लभ पंत के कहने पर गांधी जी जब ‘भारत को जानने’ के लिए यात्रा पर निकले तो उन्होंने भी एक नदी तट पर ऐसे ही अंधनंगे स्त्रीपुरुषों को देखकर अपने वस्त्र उनकी ओर बहा दिए थे. वह जनता के दुःखदर्द को पहचानकर उसके करीब आने की कोशिश थी. बिना इसके लोगों के दिल में बनाना आसान न था. बौद्ध संघों के नियम भी ऐसे थे कि जो भी वहां आए, अतीत के वैभव को बिसराकर सच्चे मन से आए.

बुद्ध के कुछ शिष्यों को अच्छा नहीं लगा कि उनका गुरु ऐसे जीर्णशीर्ण वस्त्र धारण करे. यह उनका प्रेरक रहा होगा. मगर यह उस सत्ता की प्रतीति का भी परिणाम था, जो धर्मसत्ता के संगठित होतेहोते आकार ले लेता है. ऐसे शिष्यों ने बुद्ध के लिए नए कपड़े से बुना चीवर लाकर दिया. प्रार्थना की कि उसको पहनें. बुद्ध ने अपने शिष्यों पर निगाह डाली. वे भी जीर्णशीर्ण चीवर में थे. ‘मुझे कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन संघ में तो सभी बराबर हैं. बाकी भिक्षु भी पुराने वस्त्र क्यों धारण करें. उस दिन के बाद से संघ में पुराने कपड़े का बना चीवर पहनने की शर्त हटा दी गई.

ऐसा ही एक और उदाहरण है. गौतम बुद्ध की मां माया तो उन्हें जन्म देने के नवें दिन ही मर चुकी थीं. उन्हें मां का स्नेह देकर पालने वाली थी, गौतमी, जिन्हें वे सदैव मां का सम्मान देते रहे. गौतम बुद्ध ने भिक्षु संघ की स्थापना की तो गौतमी भी उसमें सम्मिलित हो गई. सर्दी का मौसम था. गौतमी ने बुद्ध को एकमात्र चीवर में देखा तो उनका वात्सल्य मचलने लगा. जानती थीं कि राजपाट को ठोकर मार चुका उनका संन्यासी बेटा सर्दी से बचाव के लिए भी अन्य वस्त्र धारण नहीं करेगा. इसलिए उन्होंने रातदिन लगकर बुद्ध के लिए एक गुलुबंद तैयार किया. उसको लेकर वे खुशीखुशी उनके पास पहुंची और उनसे पहनने का आग्रह किया. बुद्ध ने बाकी भिक्षुओं की ओर देखा. वे सभी एकमात्र चीवर में थे. उन्होंने गुलुबंद लेने से इनकार कर दिया. बोले कि यदि यह उपहार है तो सभी भिक्षुओं के लिए होना चाहिए. सिर्फ उन्हीं के लिए क्यों? गौतमी ने बहुत अनुनयविनय की. लेकिन बुद्ध नहीं माने. समाजवाद की, सहजीवन की पहली शर्त है, संसाधनों में बराबर की हिस्सेदारी. इसके लिए उनका राष्ट्रीयकरण. बुद्ध ने भिक्षु संघ की जो व्यवस्था की थी, उसके अनुसार समस्त संपत्ति संघ की मानी जाती थी. संपत्ति और संसाधनों के समान बंटवारे के अतिरिक्त भिक्षु संघ में अधिकारों का भी एकसमान विभाजन था. सभी निर्णय सहमति के आधार पर लिए जाते थे. भिक्षु संघ के बीच महात्मा बुद्ध की हैसियत अधिक से अधिक एक प्रधान सचिव जैसी थी. किसी को भी मनमानी करने अथवा अपना निर्णय थोपने का अधिकार नहीं था. महात्मा बुद्ध वैशाली गणतंत्र के प्रशंसक थे. ऐसी ही व्यवस्था वे भिक्षु संघ में चाहते थे. जीवन के उत्तरार्ध में कम से कम दो अवसर ऐसे आए, जब उनसे उनके उत्तराधिकारी के बारे में पूछा गया था. कहा गया कि जिसको वे उपयुक्त समझते हों उसको संघ की व्यवस्था सौंप सकते हैं. उस समय यदि वे चाहते तो किसी भी व्यक्ति को यह दायित्व सौंपकर उपकृत कर सकते थे. मगर हर बार उन्होंने यही कहा कि धम्म ही संघ का सेनापति है. और आजकल के कथावाचक टाइप स्वयंभू भगवानों को देखें, जो धर्म के नाम पर बने अपने संगठन को भी किसी कारपोरेट कंपनी की भांति चलाते हैं. धर्म के नाम पर जनसाधारण की भावनाओं का दोहन कर मुनाफा बटोरना और पूंजी बटोरना ही उनका ही उनका व्यवसाय है. शंकराचार्य की गद्दी पाने के लिए षड्यंत्र किए जाते हैं, हत्याएं तक होती हैं.

बुद्ध कोरे अध्यात्म पर जोर नहीं देते. बल्कि व्यक्ति की दैनंदिन की समस्याओं पर भी विचार करते हैं. बुद्ध का दुःख की शाश्वतता को स्वीकारना और उसे अपने चिंतन की परिधि में लाना उन्हें व्यावहारिक और जनसाधारण के निकट लाता है. मगर दुःख की बात कहकर, वे डराते नहीं हैं. वे स्पष्ट कहते हैं कि दुःख की सत्ता है, और उसका कारण भी है. कारण का निवारण कर दुःख से मुक्ति संभव है. इसके लिए बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है. खुद को पहचानो. अपने भीतर छिपे प्रकाश को पकड़ो.

यूं तो हिंदू दर्शन भी चार पुरुषार्थों को मान्यता देता है. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. लेकिन काम और मोक्ष को लेकर भारतीय परंपरा विरोधाभासों का शिकार रही है. एक ओर तो व्यक्ति को अर्थ और काम के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहा है, दूसरे उन्हें माया और भ्रांति कहकर पारलौकिक सुख का लालच दिया जाता रहा. बुद्ध मुक्ति की बात नहीं कहते. मुक्ति का अभिप्राय वैदिक आचार्यों को लिए आत्मा का परमात्मा से सम्मिलन रहा है. बुद्ध आत्मा और परमात्मा को अचिंत्य मानते थे. इसलिए उन्होंने निर्वाण का पक्ष लिया. मुक्ति के लिए मृत्यु अनिवार्य है. निर्वाण इसी जीवन में संभव है. बस उसके लिए चित्तवृत्तिनिरोध और आत्मसंयम की आवश्यकता है. भिक्षु के लिए उन्होंने किंचित कठोर नियम बनाए थे. संन्यासी को संचय की आवश्यकता ही क्या. यदि संचय से लगाव था तो संन्यास की आवश्यकता ही क्या थी. अतः भिक्षु को चाहिए कि वह प्रतिदिन पहनने के लिए तीन वस्त्र(त्री चीवर), एक कटिबांधनी यानी कमर में बांधने वाली पेटी, एक भिक्षापात्र, वाति यानी उस्तरा, सुईधागा तथा पानी साफ करने के लिए एक छननी अथवा छन्ना के अतिरिक्त कुछ और न रखे. भिक्षु के लिए महंगी धातुएं यथा सोना, चांदी पहनना या पास में रखना निषिद्ध था. डर था कि सोने को बेचकर वह विलासिता का प्रतीक बाकी वस्तुएं भी खरीद सकता है.

एक ओर जहां भिक्षु के लिए इतने सख्त नियम थे, वहीं गृहस्थ को उन्होंने उदारतापूर्वक संपत्ति संचय की छूट दी थी. इस संबंध में एक कथा है—

अनाथ पिंडक गौतम बुद्ध का प्रिय शिष्य था. एक बार उसने सोचा कि गौतम बुद्ध ने भिक्षुओं की संचय की प्रवृत्ति के निषेध के लिए काफी कठोर नियम बनाए हैं. इसलिए उसके मन में जिज्ञासा जगी कि बुद्ध से व्यक्तिगत संपत्ति के बारे में उनका मत जाना जाए. निर्वाण की लालसा तो जितनी भिक्षु को है, करीबकरीब उतनी ही गृहस्थ को भी होती है. इसलिए अभिवादन करने के बाद उसने गौतम बुद्ध से पूछा—

क्या भगवन, यह बताएंगे कि गृहस्थ के लिए कौनसी बातें स्वागतयोग्य, सुखद एवं स्वीकार्य हैं, परंतु जिन्हें प्राप्त करना दुष्कर है?’

प्रश्न सुनने के उपरांत बुद्ध ने कहा—

इनमें प्रथम विधिपूर्वक धन अर्जित करना है. दूसरी बात यह देखना है कि आपके संबंधी भी विधिपूर्वक धनसंपत्ति अर्जित करें. तीसरी बात है दीर्घकाल तक जीवित रहो और लंबी आयु प्राप्त करो.’

गृहस्थ को इन चार चीजों की प्राप्ति करनी है, जो कि संसार में स्वागतयोग्य, सुखकारक तथा स्वीकार्य हैं. परंतु जिन्हें प्राप्त करना कठिन है. चार अवस्थाएं भी हैं, जो कि इनसे पूर्ववर्ती हैं. वे हैं, श्रद्धा, शुद्ध आचरण, स्वतंत्रता और विवेक. शुद्ध आचरण दूसरे का जीवन लेने अर्थात हत्या करने, चोरी करने, व्यभिचार करने तथा मद्यपान करने से रोकता है.

स्वतंत्रता ऐसे गृहस्थ का गुण होती है, जो धनलोलुपता के दोष से मुक्त, उदार, दानशील, मुक्तहस्त, दान देकर आनंदित होने वाला और इतना शुद्ध हृदय का हो कि उसे उपहारो का वितरण करने के लिए कहा जा सके.

बुद्धिमान कौन है?

जो यह जानता हो कि जिस गृहस्थ के मन में लालच, धन लोलुपता, द्वेष, आलस्य, उनींदापन, निद्रालुता, अन्यमनस्कता तथा संशय है और जो कार्य उसको करना चाहिए, उसकी उपेक्षा करता है, और ऐसा करने वाला प्रसन्नता तथा सम्मान से वंचित रहता है.

लालच, कृपणता, द्वेष, आलस्य तथा अन्यमनस्कता तथा संशय मन के कलंक हैं. जो गृहस्थ मन के इन कलंकों से छुटकारा पा लेता है, चह महान बुद्धि, प्रचुर बुद्धि एवं विवेक, स्पष्ट दृष्टि तथा पूर्ण बुद्धि व विवेक प्राप्त कर लेता है.

अतएव, न्यायपूर्ण ढंग से तथा वैध रूप में धन प्राप्त करना, भारी परिश्रम से कमाना, भुजाओं की शक्ति व बल से धन संचित करना, तथा भौहों का पसीना बहाकर परिश्रम से प्राप्त करना, एक महान वरदान है. ऐसा गृहस्थ स्वयं को प्रसन्न तथा आनंदित रखता है तथा अपने मातापिता, पत्नी तथा बच्चों, मालिकों और श्रमिकों, मित्रों तथा सहयोगियों, साथियों को भी प्रसन्नता तथा प्रफुल्लता से परिपूर्ण रखता है.’

उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि बुद्ध का दर्शन मानव जीवन को संपूर्ण और परिपक्व बनाने के लिए आग्रहशील है. वह सीधेसीधे उस ब्राह्मणवाद के विरोध में जन्मा था, जिसके केंद्र में जनसाधारण था ही नहीं. जो आत्ममोह से ग्रस्त समाज था, एक प्रकार से लड़ाकू कबीला. जो सिर्फ वर्चस्व की भाषा जानता था. बुद्ध गणतंत्र के प्रशंसक थे. इसलिए उनके दर्शनचिंतन में भी गणतंत्र की खूबियां हैं. वे न केवल सामाजिक समानता पर जोर देते हैं, और उसके लिए सामाजिक समाज के जातीय विभाजन को दोषी ठहराते हैं, वहीं आर्थिक अधिकार देकर व्याक्ति को उन सामंती संस्कारों से बचाए रखना चाहते हैं, जो धर्म और राजनीति की कुटिल संधियों की उपज थे. इन सब कारणों से बुद्ध का दर्शन समाजवादी भावनाओं से ओतप्रोत जान पड़ता है. कई मायने में तो वह माक्र्स के वैज्ञानिक समाजवाद तथा व्यक्ति से भी आगे ले जाता है. इसलिए कि भौतिक द्वंद्ववाद का विश्लेषण करता हुआ माक्र्स उत्साह के साथ शुरू तो करता है, मगरउसका चिंतन आर्थिक पहलुओं से आगे नहीं बढ़ पाता. वह आर्थिक समस्याओं को जीवन की मूल समस्याओं के रूप में देखता है. जबकि ऐसा नहीं है. दूसरी ओर बुद्ध का दर्शन राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक समानता यानी समानता के सभी पहलुओं की विस्तार से चर्चा करता है. और आर्थिक मानवीकरण के मुद्दे पर कई जगह से माक्र्स के समाजवाद से आगे निकल जाता है.

जैन दर्शन

जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी, बुद्ध के समकालीन, उनसे लगभग तीस वर्ष बड़े थे. दोनों के दर्शन में काफी समानता है. जैसे कि दोनों ही क्षत्रिय परिवार में जन्मे थे. दोनों ने ही अपना दर्शन ब्राह्मणवाद के विरोध में प्रस्तुत किया था. दोनों ही कर्मकांड के बजाय आचरण की पवित्रता के प्रति अधिक आग्रहशील थे. आत्मापरामात्मा और ईश्वर आदि की वैदिक मताब्लंबियों की बंधीबंधाई धारणा पर उन्हें विश्वास नहीं था. वैदिक ग्रंथों में श्रमणों का जगहजगह उल्लेख हुआ है. ये श्रमण कर्मकांड के विरोधी थे. अपनी जिज्ञासा के समाधान हेतु अधिकांश प्रकृति के सान्न्ध्यि में रहकर सृष्टि के रहस्यों की खोज में लगे रहते थे. जैन धर्म में विश्वास करने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि नदी को पाटने का पहला चमत्कार प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जी किया था. इसके अतिरिक्त लिपिकला, कुंभकारी, चित्रकारी तथा मूर्तिशिल्प का भी आविष्कार उन्होंने ही किया था. ऋषभदेव का नाम यजुर्वेद तथा श्रीमद् भागवत में भी आया है. ईसा से लगभग 900 वर्ष पूर्व जन्मे बाइसवें तीर्थंकर अरिष्ठनेमि भी क्षत्रिय वंशज तथा कृष्ण के चचेरे भाई थे. कृष्ण के प्रयासों के फलस्वरूप ही राजकुमारी राजमती से उनका विवाह तय हुआ था. लेकिन अरिष्ठनेमि ने जब अपने विवाह में हिरन समेत अन्य निरीह प्राणियों को बलि होते देखा तो उनका मन उचट गया, उसके बाद उन्होंने अपना समस्त जीवन बलि की कुप्रथा को समाप्त करने पर झोंक दिया. तेइसवें तीर्थंकर पाश्र्वनाथ भी अहिंसा पर जोर देते थे. जैन धर्म के प्रवर्तकचौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म ईसा से 599 वर्ष पहले वैशाली के निकट कुंदपुरा नामक स्थान पर हुआ था. बुद्ध की भांति वे भी क्षत्रिय परिवार से संबंधित थे. उस समय पुरोहितों के कर्मकांड अपने शिखर पर थे. यज्ञादि अनुष्ठानों के बीच पोंगापंथी, बुद्धि के नाम पर वितंडा रचना, ज्ञान के स्थान पर पौरोहित्य का प्रशिक्षण देना और तर्क की जगह तंत्रमंत्र साधना ही उस समय अध्यात्म चिंतन मान लिया जाता था. चारों ओर ब्राह्मणवाद का बोलबाला था, जो स्वयं छोटेछोटे गुटों में बंटे थे. उनके बीच ढेर सारे मतांतर थे. उनमें आपस में बहसें चलती रहती थीं. सिर्फ वर्गीय श्रेष्ठता के दावे और स्वार्थ संबंधी मुद्दों को छोड़कर दूसरा शायद की कोई ऐसा पक्ष था, जिसपर वे सभी एकमत होते हों. देश छोटेछोटे राज्यों में बंटा था. राजा अन्यान्य कारणों से परस्पर लड़तेझगड़ते रहते थे. पूरी श्रमण परंपरा, जिनमें कौत्स एवं सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि जैसे विद्वान, चार्वाक दार्शनिक उनके विरोध में थे. प्रजा मन से लोकायतों और श्रमणों के साथ थी, किंतु ब्राह्मणवादी कर्मकांडों से गुजरना उसकी व्यावहारिक मजबूरी थी.

महावीर स्वामी के पिता का नाम सिद्धार्थ और मां त्रिशला थीं. पिता पाश्र्वनाथ के अनुयायी थे. त्रिशला देवी वैशाली के राजा की बहन थी. महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्धमान था. इस नामकरण के पीछे भी एक रहस्य था. बताते हैं कि जब वे गर्भ में थे, उन दिनों राजकोष में तीव्र वृद्धि हुई थी. यही उनके वर्धमान नामकरण का कारण बना. बचपन में उनका लालनपालन राजकीय वैभव के बीच हुआ. वे स्वभाव से उदार, निडर और शक्तिशाली थे. एक बार उत्तेजित हाथी की सूंड पकड़कर उसपर सवारी गांठने और दूसरी घटना में विषैले नाग को पूंछ पकड़कर एक ओर फेंक देने जैसे साहसपूर्ण कार्य दिखाने के बाद सभी उन्हें ‘महावीर’ कहने लगे थे. उनका विवाह राजकुमारी यशोदा के साथ हुआ, जिनसे एक बेटी भी जन्मी. राजसी वैभव के बीच पलनेबढ़ने के बावजूद वहां का वातावरण उन्हें पसंद न था. सारे ठाठबाट, नौकरचाकर, वैभवविलास बनावटी लगने लगे. मातापिता की मृत्यु के बाद महावीर का संसार से मन उचट गया. उन्होंने संन्यास लेने का निर्णय लिया. उस समय उनकी अवस्था मात्र अठाइस वर्ष की थी. मगर अपने बड़े भाई के आग्रह पर उन्होंने दो वर्ष और परिवार के साथ बिताने के लिए सहमत हो गए.

अगले दो वर्ष महावीर ने खुद को सुखसुविधाओं से मुक्त करने का अभ्यास करते हुए बिताए. उन्होंने एकएक कर अपनी सारी वस्तुएं भिखारियों को दान कर दीं. राजकीय वैभवविलास से परे रहकर अपने मन और शरीर को तापसी जीवन के लिए तैयार करने लगे. तीस वर्ष की अवस्था तक वे अपनी समस्त धनसंपत्ति, विलासितापूर्ण साम्रगी, परिवार यहां तक कि पत्नी से भी किनारा कर चुके थे. अपने गांव कुंदपुरा में दो दिनों तक निराहार, निर्जल, मौन रहते हुए उन्होंने अपने सिर के बाल उखाड़ लिए. देह से वस्त्राभरण दूर करने के उपरांत उन्हें अद्भुत शांति की प्रतीति हुई. एकमात्र उत्तरीय को कंधों पर डाल उन्होंने गृहस्थान छोड़ने का संकल्प कर लिया. जिस समय वे प्रस्थान कर रहे थे, ठीक उसी समय एक भिखारी वहां उपस्थित हुआ. यह कहकर कि गत दो वर्षों से वे जो दान करते आ रहे हैं, उससे वह वंचित रहा है, उसने महावीर से दान की अपेक्षा की. इसपर महावीर ने कंधे पर पड़े उत्तरीय में से आधा फाड़कर उस भिखारी को थमाया और वहां से प्रस्थान कर गए. एक स्थान से दूसरे स्थान तक विचरते हुए एक दिन उन्हें निर्वाण की अनुभूति हुई. महावीर स्वामी ने उस अवस्था को कैवल्य कहा है, विदेह हो जाने की उच्चतम स्थिति जब शरीर में रहते हुए भी शरीर का बोध, उसकी सीमाएं समाप्त हो जाता है. व्यक्ति परमज्ञान की अवस्था में होता है. निर्वाण प्राप्ति के उपरांत महावीर स्वामी ने पहला उपदेश दिया. उनके आत्मबोध की प्रथम अनुभूति का विवरण मज्झिम निकाय में है—‘मुझे सबकुछ समझ आ रहा है, मैं सबकुछ पूरी तरह साफसाफ देख रहा हूं. मुझे पवित्र आत्मज्ञान की प्रतीति हो चुकी है. अब चाहे मैं चलता रहूं अथवा एक ही स्थान पर स्थिर होकर खड़ा रहूं. चाहे सो जाऊं अथवा जागता रहूं, परमज्ञान और उसकी अंतरानुभूति प्रतिपल मेरे साथ है…’

जैन धर्म में अनुशासन एवं नैतिकता के स्तर को बनाए रखने के लिए पांच व्रत साधने होते थे. ये हैं: अहिंसा, सत्य, चौर्य, अपरिग्रह तथा पवित्रता. इनमें से प्रथम चार पाश्र्वनाथ के विचारों से अनुप्रेरित थे. यह परदुःखकातरता और करुणा पर केंद्रित दर्शन है. इसमें व्यक्तिगत संपत्ति की भावना का निषेध किया गया है. गृहस्थों के लिए तो संपत्तिसंबंधी मान्यताओं में फिर भी किंचित छूट है. किंतु जैन तापसों के लिए तो देह पर वस्त्र धारण करना भी विलासिता की श्रेणी में आता है. यह मान लिया जाता है कि शरीर ढकने के लिए वस्त्र का लालच भी मोक्ष प्राप्ति की अवधि को लंबा खींचने का काम करता है. जैन दर्शन में आवश्यकता से अधिक संचय को पाप माना गया है. समझा गया है कि यह भी एक प्रकार की हिंसा है. जैन दर्शन का संपत्ति संबंधी अवधारणा समाजवादी विचारधारा से मेल खाती है. समाजवाद भी हर व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के अनुरूप देने का आश्वासन देता है. वहां संपत्ति कल्याणकारी राज्य के अधीन सुरक्षित मानी जाती है, जिसका उपयोग नागरिकों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर व्यापक लोककल्याण की कामना के निमित्त किया जाता है. जैनमत के संपत्तिसंबंधी सिद्धांत और समाजवाद में महज इतना अंतर है कि समाजवाद राजनीतिकसंवैधानिक व्यवस्था है. जबकि जैन दर्शन नैतिक आचरण है. वह त्याग और सर्वकल्याण की भावना पर टिका है. यह आत्मानुशासन के बिना संभव नहीं. समाजवाद में अनुशासन के लिए राजनीति की मदद ली जाती है. जोकि बाहरी और खर्चीला उपक्रम है. उसकी अपेक्षा अपरिग्रह नैतिकता की जमीन पर खड़ा होता है. जाहिर है कि यह उच्च मानवादर्श है.

जैनमत में लोकतांत्रिक समाजवाद का एक अन्य रूप ‘स्याद्वाद’ के रूप में भी मिलता है. जैन मतावलंबियों की विशेषता यह है कि वे किसी भी कोटि के दुराग्रह का संपूर्ण निषेध करते हैं. अपनी बात दूसरों से बलात् मनवाना या केवल अपने ही मत को अंतिम सत्य मानना हठधर्मी, एक प्रकार की वैचारिक हिंसा है. इसलिए वहां अहिंसा पर इतना जोर दिया गया है. जैनमत के अनुसार किसी भी जीव की हत्या करना तो पाप है ही, विचारों की हिंसा भी वहां सर्वथा वज्र्य है. इसलिए कि विचार भी जीवात्मा की देन, उसकी विशेषता हैं. वैचारिक सहिष्णुता, विरोधों को आत्मसात करने की यह प्रवृत्ति जैन मत में स्याद्वाद के सिद्धांत के उद्भव का कारण बनी. ‘स्याद्वाद’ जैनदर्शन का सर्वाधिक मौलिक एवं वैज्ञानिकता पर आधारित विचार है. इसके अनुसार किसी भी वस्तु अथवा विचार के बारे में जो कहा जाता है, वह अनेक संभावनाओं से युक्त होता है. सत्य कई रूपों में प्रकट होता है.

अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए हाथी और छह अंधों की कहानी का उदाहरण देते हैं. कहानी के छह अंधों को हाथी के सामने खड़ा कर उसकी शरीर रचना के बारे में बताने को कहा जाता है. जिस अंधे ने हाथी के कान का स्पर्श किया था, उसके अनुसार हाथी की देह पंखे के समान है. दूसरा जो हाथी की सूंड का स्पर्श करता है, वह हाथी को मोटी बेल जैसा बताता है. तीसरा अंधा जो हाथी के पैर का स्पर्श करता है, वह उसकी रचना को खंबेनुमा कहकर अपने अनुभव का बखान करता है. वे सभी अपनी जगह सही है. सभी सच्चे हैं. मगर उनका सत्य आंशिक और परिस्थितिजन्य है, जो उनकी सीमा को दर्शाता है. उन छह के अलावा एक दृष्टिसंपन्न व्यक्ति भी है. हाथी की वास्तविक देहरचना के बारे में केवल वही जानता है. ज्ञान की स्थिति केवल प्रज्ञावान को ही संभव है. यही निर्वाण की अवस्था भी है, जब कोई तापस सृष्टि के वास्तविक रहस्य को जान चुका होता है. जैनमत मानता है कि साधारण व्यक्ति की ऐंद्रियानुभूति सीमित होती है. इसलिए उसका बोध भी सीमित होता है. मगर वह गलत नहीं है. अंधों की कहानी में यदि उन सभी के अनुभवों को परस्पर मिला दिया जाए तो हाथी की संपूर्ण रचना सामने आ सकती है. यही लोकतंत्र में होता है, जो समाजवादी व्यवस्था की धुरी है. वहां अनेक नागरिक मिलकर अपने विकास के लिए उपयुक्त व्यवस्था का चयन करते हैं.

जैनदर्शन की सृष्टि संबंधी व्याख्या आधुनिक वैज्ञानिक खोजों से मेल खाती है. उसके अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति का कारण छोटेछोट पुद्गलों को माना है. ये पुद्गल परस्पर मिलकर अणु बनाते हैं. अणुओं के संयोग से संसार की विभिन्न वस्तुओं, जड़चेतनादि की उत्पत्ति होती है. जड़चेतन में पुद्गलों की उपस्थिति उसे जीवनमय बनाती है. जैन दर्शन का पुद्गल का विचार कणाद मुनि के वैशेषिक दर्शन से मेल खाता है. पुद्गल की तुलना हम परमाणुवाद के साथ के आधुनिक सिद्धांत से भी कर सकते हैं. यह भी विज्ञानप्रमाणित है कि दो परमाणु परस्पर मिलकर एक अणु की रचना करते हैं, जो सृष्टि के समस्त पदार्थों की उत्पत्ति का कारण है. लेकिन पुद्गल परमाणु नहीं है. परमाणु में जीवन है, वैज्ञानिक ऐसा कोई दावा नहीं करते. वे परमाणु की गति का आकलन कर सकते हैं. परमाणु में अंतनिर्हित ऊर्जा की खोज भी की जा चुकी है. वैज्ञानिक अवधारणा के अनुसार परमाणु जड़चेतन से परे लघुत्तम कण है, जो संसार की प्रत्येक वस्तु, जड़ और चेतन दोनों की व्युत्पत्ति का कारण है. इससे भिन्न पुदगल चेतनामय इकाई, जीवन का लघुत्तम रूप है. तदुनुसार यह समस्त संसार छोटेछोटेकणों से मिलकर बना है. अतएव जैन दर्शन के अनुसार दृश्यमान जगत के कणकण में जीवन है. उनका सम्मान करना जीवन का सम्मान करना है.

जैन शब्द ‘जिन’ धातु से बना है. यानी ऐसा व्यक्ति जिसने इंद्रियों को अधीन कर लिया हो. इंद्रियनिग्रह के लिए अपरिग्रह अस्तेय, अहिंसा, सत्य आदि की कसौटियां बनाई र्गइं. जिनका अर्थ है, जरूरत से अधिक संचय न करना. चोरी न करना. दूसरे के धन की लालसा न रखना. हिंसा का पूर्ण निषेध और सत्याचरण. यही सिद्धांत बौद्ध धर्म के भी थे. आशय यह है कि नैतिक मान्यताओं को लेकर जैन और बौद्ध धर्म एक ही कोटि के माने जा सकते हैं. इसलिए कुछ विद्वानों ने जैनधर्म को बौद्ध धर्म की ही एक शाखा माना है. हालांकि कुछ मायने में दोनों में अंतर भी है. बौद्ध दर्शन व्यावहारिक बोध को महत्त्व देता है. वह जीवन की उपेक्षा करने के बजाय, उसको संयमित ढंग से जीने पर विश्वास रखता है. ऐसा जीवन जो अपने और दूसरों के लिए समानरूप से सुखकारी हो. इसलिए जैनदर्शन का अतिअनुशासन भी वहां वज्र्य है. कामनाओं से भागने से उनसे बच पाना संभव नहीं. वे पीछा करती हैं. उनसे मुक्ति का एक ही उपाय है, कामनाओं के बीच रहकर उनसे मुक्ति. मन को साधना. यह आसान नहीं है. लेकिन अभ्यास से इसको साधा जा सकता है. इसके लिए बुद्ध ने अष्ठांग योग का विचार दुनिया के सामने रखा था. मगर उनका अष्ठांग योग भी व्यावहारिक है. वह मनुष्य की पहुंच में है. जबकि जैन मत का अहिंसा का सिद्धांत और अन्य धार्मिक अनुशासन बहुत कड़े हैं. यही कारण है कि जैन धर्मदर्शन जनसाधारण के बीच अपनी जगह बनाने में असमर्थ रहा था.

बोधि वृक्ष के नीचे साधना करते समय बुद्ध को समझ आया था कि जीवन वीणा के तारों की तरह भांति है. ढीला छोड़ने पर सुर नहीं निकलते. अधिक कसने पर तार टूट भी सकते हैं. इसलिए उन्होंने मध्यम मार्ग को अपनाने का आग्रह किया था. लेकिन अहिंसा जैसे विषय को लेकर जैन मत व्यावहारिकता की सीमा तक प्रतिबद्ध है. वहां अपरिग्रह पर इतना आशय है कि शरीर पर वस्त्र धारण करना भी मोक्ष की राह में बाधक माना गया है. बौद्ध धर्म की अहिंसा के सिद्धांत को उसकी तत्व विवेचना के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है. जैन दर्शन सम्यक व्यवहार, सम्यक बोध, तथा सम्यक आचरण पर जोर देता है.

जैन दर्शन एक भौतिकवादी दर्शन है. वह संसार की सत्ता को नकारता नहीं है. बल्कि उसकी वास्तविकता को स्वीकारते हुए कतिपय वैज्ञानिक आधार पर उसकी व्याख्या करता है. जीवनमूल्यों को वरीयता देते हुए वह मनुष्य को अपनी चिंताओं के केंद्र में रखता है. उसकी आचारसंहिता तीन प्रमुख सिद्धांतों पर टिकी है. जैन दर्शन को यदि श्रेष्ठ विचारों की एक माला स्वीकारा जाए तो इन तीन सिद्धांतों को उसके माणिकमुक्ता समझा जाता है, जिनपर माला की समस्त सुंदरता निर्भर करती है. ये हैं—सम्यक आचरण, सम्यक कर्तव्य एवं सम्यक बोध. सम्यक आचरण से अभिप्राय सृष्टि के प्रत्येक प्राणी के साथ भेदभाव रहित दयालुतापूर्ण व्यवहार से है. हर प्राणी में एक ही जीवात्मा है, इसलिए उसका सम्मान. सभी के साथ एक समान व्यवहार. सम्यक बोध मानव चेतना के विकास के पांच स्तरों को दर्शाता है. वे हैं अध्ययन, साधना, सिद्धि एवं कैवल्य. सम्यक कर्तव्य आत्मानुशासन, निश्छल व्यवहार, सदाशयता को दर्शाता है. यह मानवेंद्रियों को विचलन से बचाकर उन्हें साधना पथ पर अग्रसर करने से संभव है. वह उपदेश से अधिक आत्मनियंत्रण पर जोर देता है. जैनग्रंथ ‘उत्तरध्यान’ में आत्मानुशासन की आवश्यकता पर लिखा गया है—

‘खुद को जीतो/इसलिए कि आत्मविजय सबसे बड़ी साधना है/यदि तुम स्वयं को जीत लेते हो/तो संसार में रहकर भी बनोगे अनिवर्चनीय आनंद के भागी/उससे भी श्रेष्ठ है/इससे पहले कि दुनिया के प्रलोभन और मायावी शक्तियां/मेरी इंद्रियों को अपने जाल में फंसा लें/मुझे भटकाएं/प्रताड़ित करें/आत्मनुशासन एवं प्रायश्चित द्वारा खुद को जीतकर/ आत्मविजयी बनना.’

इन सिद्धांतों की तुलना हम बौद्ध धर्म के अष्ठांग योग से कर सकते हैं. महावीर स्वामी का जन्म बुद्ध से पहले हुआ था. मगर दोनों में अधिक अंतर नहीं है. दोनों का कार्यक्षेत्र भी भारत का पूर्वी क्षेत्र है. हम आसानी से कल्पना कर सकते हैं कि जिन दिनों महात्मा बुद्ध ने संन्यास के लिए घर छोड़ा था, उन दिनों देशभर में महावीर स्वामी के विचारों की धूम मची होगी. कर्मकांड और यज्ञ के नाम पर होने वाली जीवहत्या से उकताए हुए लोग जैन धर्म में दीक्षित हो रहे थे. उनमें हर वर्ग के लोग सम्मिलित थे. वैशाली जैसे गणराज्य जिसके महात्मा बुद्ध प्रशंसक थे, के शासक भी भी जैन धर्म की दीक्षा ग्रहण कर चुके थे. आचार्य वर्षकार जब वैशाली पर आक्रमण से पहले बुद्ध से परामर्श लेने पहुंचते हैं तो बुद्ध वैशाली गणराज्य की मिलजुलकर निर्णय लेने की गणतांत्रिक प्रणाली की प्रशंसा करते हुए वैशाली को अजेय घोषित करते हैं.

सम्यक आचरण मनुष्य के मानवीय स्वरूप को बनाए रखने की कला है. प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक ही जीवात्मा है. स्त्रीपुरुष सभी एक समान हैं. इसलिए मनुष्य का पहला धर्म है कि वह सभी के साथ एक जैसा आचरण करे. बिना किसी पक्षपात, वगैर किसी स्वार्थलिप्सा के सबके साथ समानतापूर्ण व्यवहार करते हुए प्राणीमात्र के कल्याण के निमित्त समर्पित हो. दूसरों के साथ वही व्यवहार करो, जैसा उनसे अपने प्रति अपेक्षित है. संसार में रहकर भी उसके प्रलोभन से विरक्ति. देह में रहकर भी विदेहत्व की साधना. मुक्ति का साक्षात अनुभव. बौद्धदर्शन की भांति जैन दर्शन भी वेदों को प्रामाण्य नहीं मानता. उसके स्थान पर वह व्यक्ति की सत्ता को सर्वोच्च ठहराता है. नैतिक आचरण पर जोर देता है.

संसाधनों के न्यायिक बंटवारे और प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार देना ही समाजवादी व्यवस्था का प्रमुख ध्येय है. यह कार्य वह राज्य की नियामक शक्ति की मदद से करती है. राज्य भी व्यक्तियों से परे नहीं है. वह नागरिकों की सहमति और अनुशंसा के आधार पर बनी संस्था है. अंधों की कहानी में जैसे किसी एक अंधे की राय का कोई मूल्य नहीं है, लेकिन जब उन सबके अनुभवों को मिला दिया जाता है, तो उससे वही विंब बनता है, जो एक दृष्टिसंपन्न व्यक्ति की चेतना में बनता है. राज्य भी अपने नागरिकों की संस्तुति के आधार पर बनी संस्था है,