Category Archives: भारतीय दर्शन

समय : पारंपरिक दृष्टिकोण

सामान्य

समय का दर्शन : एक

समय सबसे बड़ा छलिया होता है. मेहरबान हो तो दुनियाभर की सल्तनत बख्श दे. रूठ जाए तो चौहद्दी के राजपाट समेत डुबा दे. इस जैसा न तो कोई दयालु, न बेहरम. न इससे असरदार कोई मरहम. न इससे धारदार कोई हथियार….

समयसा कोई महाज्ञानी नहीं!

समय से बड़ा बहरूपिया भी नहीं!

समय से कभी मत लड़ना!

समय को चुनौती मत देना!

समय पर कभी भरोसा न करना!

हर आदमी यही कहता है. चाहता है कि समय से बचकर रहे. उसे कभी अनदेखा न करे. बूढ़ी होती पीढ़ी कामना करती है कि उसका समय ज्यों का त्यों बना रहे….आने वाली पीढि़यों पर समय की सदा मेहरबानी रहे. समय पर सब काम पूरे हों. समय का सब लाभ उठाएं.

आने वाला समझता है कि जाने वाली पीढ़ी अपने हिस्से का समय इस्तेमाल कर चुकी. अब उसकी बारी है. जाने वाला सोचता है कि उसकी यादें और समय ज्यों का त्यों उसके बाद भी बना रहे.

समय को लेकर अनगिनत मुहावरे, अनगिनत किवदंतियां हैं. समय बदलता है…. समय खराब होता है, समय भला निकलता है. समय मेहरबानी दिखाता है. समय आंखें तरेरता है. समय करीब होता है. समय उड़नछू हो जाता है. समय का हर खेल निराला है. समय बादशाहों का बादशाह, सूरमाओं का सूरमा है. वह अपनी चाल चलता है. बहुत तेज भागता है. कभी वापस लौटकर नहीं आता. फिर भी दिन बहुरेंगे, यह सोचकर मन को तसल्ली दी जाती है. समय अबूझ पहेली बना रहता है.

बड़ेबड़े मनीषी कह गए हैं—समय को समझना आसान नहीं! भर्तृहरि जैसे ज्ञानी न समझ सके, हमारी तो बिसात क्या?

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः।

तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।।

कालो न यातं वयमेव याताः।

तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः।।

यानी सब कुछ नश्वर है. हम समय को नहीं जीते, समय हमें जीता है. कविता में नैराश्य झलकता है. लेकिन यह कोई नई बात नहीं है. संसार को मोहमाया से ग्रस्त और नश्वर दिखाने की प्रवृत्ति धार्मिक ग्रंथों का प्रमुख स्वर रही है. डर धर्म की धंधागिरी का प्रमुख आधार है. भविष्य के प्रति अनिश्चितता इसके लिए जिम्मेदार है. हालांकि हमेशा ऐसा नहीं होता. अनिश्चितता का गुण समय को मानवोपयोगी भी बनाता है. विशेषकर दुख और निराशा भरे दिनों में, यह विश्वास कि आनेवाला समय अपने साथ कुछ अच्छा ला सकता है, मनुष्य को भविष्य के प्रति आशावान बनाए रखता है.

समय के अनिश्चित स्वभाव के कारण ही मनुष्य उससे डरता, समय के साथ बढ़ता है. समय क्या है, कोई नहीं जानता. समय है यह सब मानते हैं. आदमी भगवान पर भरोसा भले कर ले, समय पर कभी विश्वास नहीं लाता. डरता है, वह जाने कब, किस ओर पलटनिया खा जाए. आदमी समय को अपना मानता है, मगर समय के लिए कोई खास नहीं होता. इस कारण आदमी तो क्या देवता तक समय के आगे झुकते आए हैं. समय सबका है, पर समय पर अधिकार किसी का नहीं….इसीलिए ज्ञानी लोग कहते आए हैं—समय को मनाओ, उससे टकराओ मत. वैज्ञानिक और वुद्धिजीवी कुछ भी दावा करें. समय को तीसराचौथा आयाम चाहे जो मानें, आम आदमी का उससे संबंध भावनात्मक ही होता है. उसमें उसका डर भी समाया होता है. उम्मीदें होती हैं, मगर डरीसहमी. इस तरह समय के कई रूप हो सकते हैं. वैज्ञानिकों के लिए समय एक विज्ञान है, ज्योतिषी के लिए भूतभविष्य और वर्तमान का लेखा, पुजारी के लिए धर्म और जनसाधारण के लिए वह कुछ भाग्यरेख जैसा है. दूसरे शब्दों में समय ऐसी झील है, जिसमें स्वच्छ, स्फटिकजैसी विपुल नील जलराशि भरी होती है. उसमें झांको तो अपनी ही छवि दिखाई पड़ती है.

समय को लेकर कुछ ऐसी ही अवधारणा, ऐसे ही विचार जनमानस में व्याप्त हैं. कुछ लोग समय को इतिहास मानकर संतुष्ट हो जाते हैं, कुछ के लिए वह निस्सीम विस्तार है. ग्रह, नक्षत्र, चांदसितारे, धरतीअंबर और न जाने कितने ब्रह्मांड उसमें समाए हुए हैं. कुछ ऐसे भी हैं जो समय को बहती धारा मानते हैं. भूतवर्तमान और भविष्य की चिरतरंगिणी. अदृश्य प्रवाह जो ब्रह्मांड की समस्त हलचलों, ग्रहनक्षत्र, नीहारिकाओं, नदियों, महासागरों के साथसाथ गतिमान है. समय की प्रतीतियां अनंत हैं. किसी के लिए वह ब्रह्मांड के भीतर है. किसी के लिए बाहर. कोई समय को जलधार की भांति सतत प्रवाहमान मानता है, कोई ब्रह्मांड की भांति विस्तीर्ण. समय को परमात्मा स्वरूप भी माना गया है. ईश्वर का एक नाम ‘काल’ भी है. ‘काल’ यानी मौत का देवता. जब वह आता है तो माना जाता है कि प्राणी का समय पूरा हो गया. ‘काल’ के संबंध में समय का व्यक्ति सापेक्ष अर्थ है—मनुष्य का अपना समय. धार्मिक आधार पर यह माना जाता है कि प्रत्येक मनुष्य एक सुनिश्चित समय लेकर इस संसार में आता है. जैसे ही वह समय पूरा होता है, काल उसे लेने के लिए पुनः धरती पर अवतरित हो जाता है. समय को लेकर ये मान्यताएं बहुत पुरानी हैं और लगभग सभी समाजों में मिलतीजुलती हैं. विज्ञान भी उन्हें बदल नहीं पाया है. यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो समय के रूप में हम केवल घटनाओं की स्थिति बयान कर रहे होते हैं. उनके घटने की दर, उनका स्वरूप, या उनके बारे में कोई नया आकलन. इसके बावजूद समय का प्रभाव इतना गहरा होता है कि घटनाओं के होने को ही उसकी प्रतीति मानने का साहस नहीं कर पाते. अथवा समय को जानने की कोशिश में हम दरअसल कुछ और जान रहे होते हैं. जैसेजैसे हम समय के बारे में आगे विचार करेंगे, ये रहस्य स्वतः अनावृत होते जाएंगे.

समय की अवधारणा कब जन्मी, यह ठीकठीक बता पाना संभव नहीं. सिर्फ कल्पना की जा सकती है कि आदमी ने जब सूरज को समय पर उगते और डूबते देखा. तारामंडल की उदयअस्त होती कलाबाजियां देखीं. बालक को जन्मते, बड़ा होते, फिर बूढ़ा होकर मौत के गाल में समाते हुए पाया—तब उसने माना कि कुछ है जो कभी उसके साथ चलता है, तो कभी उसको पीछे ढकेल आगे निकल जाता है. जो अंतरिक्ष की तरह सर्वव्यापी, नदी की तरह पलपल प्रवाहमान है. जिसका कोई ओर है न छोर. जो घटनाओं को क्रम देता है. उन्हें एकदूसरे से संबद्ध करता है. कल, आज और कल की इस चिरतरंगिणी को मनुष्य ने ‘समय’ नाम दिया. यह संज्ञा इतनी मनोहारी थी कि आगे जो भी दार्शनिक और विचारक आए, सभी ने उसकी पुष्टि की. वैज्ञानिकों तक की हिम्मत न हुई कि समय की परिकल्पना तथा उससे जुड़े लोकविश्वासों को चुनौती दे सकें. मान्यता चाहे जैसी हो, समय भी उनके विचारों के विकास में सहायक बना रहा.

दार्शनिकों ने समय के बारे में तरहतरह की परिकल्पनाएं प्रस्तुत कीं. कुछ ने समय को घटनाओं और परिवर्तन के आधार पर परिभाषित किया तो कुछ घटनाओं को समय के परिप्रेक्ष्य में, उसके भीतर घटते हुए माना. कुछ विचारक समय को अनंत का प्रतिरूप, ब्रह्मांड के समानांतर मगर उससे स्वतंत्र सत्ता मानते रहे, तो कुछ ने उसको भूतवर्तमान और भविष्य के रूप में देखा. ‘टाइमस’ में प्लेटो ने समय को अनंत की संज्ञा दी है. उसके अनुसार, ‘समय अनंत की गत्यात्मकता को दर्शानेवाली अपरिमेय सत्ता है.’ घटअघट सबकुछ उसमें समाया रहता है. कुछ मामलों में समय ब्रह्मांड से भी विस्तीर्ण है. चूंकि ब्रह्मांड की प्रत्येक घटना किसी न किसी अंतराल में घटित होती है; और स्वयं ब्रह्मांड भी घटनाओं की अपरिमित शृंखला में है—अतः कहा जा सकता है कि समय ब्रह्मांड से भी विस्तीर्ण है. दूसरे शब्दों में ब्रह्मांड का भी समय होता है. उसकी आयु है, उसके गर्भ में घटनेवाली तरहतरह की घटनाएं और गतियां हैं. इसलिए वह भी समय की पकड़ से दूर नहीं है. कुल मिलाकर प्लेटो के अनुसार समय ऐसी अपरिमेय रचना है, जिसमें सृष्टि की समस्त घटनाएं घटित होती हैं.

मनुष्य समय की सत्ता पर लगभग पिछले 2500 वर्ष से निरंतर विचार करता आया है. बौद्ध दर्शन से लेकर सुकरात, प्लेटो, अरस्तु आदि ने अपनीअपनी तरह से समय की विवेचना की है. इसके बावजूद समय की सत्ता को लेकर विद्वानों के बीच आज भी सहमति नहीं बन पाई है. अनेक प्रश्न आज भी उलझे हुए हैं. मसलन समय क्या है? यदि ब्रह्मांड न हो क्या तब भी समय रहेगा? क्या मानवमस्तिष्क का समय से कोई प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष संबंध है? भूत, वर्तमान और भविष्य क्या सचमुच घटनाओं से स्वतंत्र हैं, अथवा ये केवल भ्रांति और मानव मस्तिष्क की उपज हैं? कल, आज और कल क्या केवल समयबोध का प्रतीक हैं और समय वास्तव में कालरहित है? क्या कालरहित समय और समयरहित ब्रह्मांड की कल्पना की जा सकती है? ब्रह्मांड और समय दोनों की उत्पत्ति क्या एक साथ हुई? क्या ब्रह्मांड की भांति समय भी भौतिक नियमों से पूरी तरह अनुशासित होता है? ऐसे ही अनेक प्रश्न हैं, जो मानवमस्तिष्क को हजारों वर्षों से मथते आए हैं. मानवीय मेधा आज तक उनका सर्वसम्मत निदान नहीं खोज पाई है. न्यूटन, अरस्तु जैसे कई दार्शनिकों, वैज्ञानिकों ने समय की सत्ता को स्वीकारा है. समय के प्रत्यय का विज्ञान में भी भरपूर उपयोग होता है. प्लेटो समय को अनंत का पर्याय मानता है. उसके अनुसार—

प्राणीमात्र की प्राकृतिक क्षमताएं अपरिमेय थीं. यह संभव नहीं था वह उन क्षमताओं को ब्रह्मांड पर पूरी तरह न्योछावर कर दे, बजाय इसके उसने अपरिमेय की चलतीफिरती छवि बनाने का फैसला किया. उसने स्वर्ग से ऐसी अपरिमेय छवि बनाने का आदेश दिया तब स्वर्ग ने वह बनाया, जिसे आज हम समय कहते हैं. स्वर्ग यानी अनंत की अकेली अपरिमेय छवि, जो अनंत तक बनी रहेगी.’2

समय के बारे में प्लेटो के आदर्शवादी दृष्टिकोण की अपेक्षा अरस्तु व्यावहारिकता पर जोर देता है. मानव मस्तिष्क एवं समय की अंतर्निभरता पर टिप्पणी करते हुए वह लिखता है—

यदि मस्तिष्क अनुपस्थित है तब समय अनुपस्थित होगा या नहीं, ऐसा सवाल किया जा सकता है. मगर उसके बारे में जानना चाहिए कि यदि किसी के पास किसी के पास गिनने लायक कुछ नहीं है, वहां ऐसा कुछ नहीं होगा, जिसको गिना जा सके.’3

जाहिर है, अरस्तु की समयसंबंधी अवधारणा व्यावहारिक और जनसाधारण के सोच के करीब है. वह मानता है कि समय स्वतंत्र है, उसकी अपनी सत्ता है, गति है. सृष्टि की प्रत्येक घटना, परिवर्तन समय का आभास कराता है. तदनुसार जहां परिवर्तन है, वहां समय अथवा उसकी प्रतीति है. ‘समय भूत और भविष्य के संदर्भ में घटनाओं की आवृत्ति है.’ लेकिन समय केवल कल आज और कल नहीं हैं. भूत, वर्तमान और भविष्य केवल मनुष्य के समयबोध को दर्शाते हैं. वास्तविक समय इनसे अलग और स्वतंत्र है. अरस्तु का यह संबोधन समय को लेकर गहरे निहितार्थ रखता है. यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो इस परिभाषा में अरस्तु ने जहां समयसंबंधी प्लेटो की मान्यताओं का सम्मान किया है, वहीं समय को गतिशीलता का लक्षण मानकर, मतवैभिन्नय भी बनाए रखा है. हालांकि समय को लेकर प्लेटो को योगदान भी संदेह से परे नहीं है. आगे चलकर समय के बारे में जो दो प्रमुख दृष्टिकोण बने, उनमें से एक के बीजतत्व प्लेटो के दर्शन में तथा दूसरे के अरस्तु के विचारों में दिखाई पड़ते हैं.

आधुनिक वैज्ञानिक ब्रह्मांड की कुल आयु को लेकर स्वयं कोई दावा नहीं करते, ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत जिसके अनुसार पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता, केवल रूपांतरित होता रहता है, कदाचित इसके आड़े आता है. लेकिन उनका मानना है कि एक न एक दिन, भले वह समय करोड़ों, अरबों वर्ष बाद हो—वर्तमान ब्रह्मांड और उसके साथ समय भी नए रूप को प्राप्त हो सकता है. वैज्ञानिक मानते हैं कि समय का भी जन्म हुआ है. वे समय और ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक साथ, एक ही घटना से मानते हैं. हाकिंग ब्रह्मांड के निर्माण के रहस्य की गुत्थी सुलझाने के लिए ‘समय का इतिहास’ को माध्यम बनाते हैं. एक वैज्ञानिक के लिए ब्रह्मांड एवं समय के उद्भवकाल को एक मानना सैद्धांतिक रूप से सही हो सकता है. मगर इससे ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ केवल ब्रह्मांड की उत्पत्ति तक सीमित रह जाता है. समय की आयु भले न हो, परंतु ब्रह्मांड की आयु है, इसे निरंतर फैलता हुआ ब्रह्मांड भी सिद्ध करता है. वह दिखाता है कि ब्रह्मांड सतत परिवर्तनशील है. कल्पना कीजिए निरंतर फैलता हुआ ब्रह्मांड कुछ लाख या करोड़ वर्षों के बाद, किसी नई संरचना में ढल जाता है. अथवा अपने आंतरिक परिवर्तनों के चलते पुनः परमबिंदू में सिमट जाता है—तब समय का नया रूप क्या होगा. क्या समय या उसकी प्रतीति दुबारा नष्ट हो जाएगी. स्टीफन हाकिंग के विचार हमें इसी निष्कर्ष तक ले जाते हैं. मगर इसमें दृष्टि को ही सृष्टि मान लेने जैसा दोष है. इससे यह विचार कि सबकुछ समय के साथ घटता है, संदेह के दायरे में आ जाता है.

लोकव्यवहार में समय के दो रूप देखने को मिलते हैं. पहला दिनरात, वर्ष, ऋतु काल जिसमें जीवन की दैनंदिन घटनाएं संचालित होती हैं. दूसरा समय को सर्वव्यापी, अनंत, ब्रह्मांडनुमा रचना मानना जिसमें सृष्टि की प्रत्येक घटना घटित होती है. आस्थावान लोगों के लिए संभव नहीं होता कि वे समयसंबंधी किसी भी प्रतीति की उपेक्षा कर सकें. समय उनके लिए अनंत प्रवाह, देवता तुल्य और आराधनयोग्य है. सामान्यतः वे समय से डरते, उसका उपकार मानते हैं तथा उसे धर्म की भांति नियामक सत्ता मानकर, जीवन को उसके अनुसार ढालने के लिए प्रयत्नरत रहते हैं. लेखकों और कवियों ने समय को परमतत्व का विस्तार मानकर, उसका भांतिभांति से महिमा मंडन किया है. दार्शनिकों ने समय को केंद्र में रखकर जीवनरहस्यों की व्याख्या की. दूसरी ओर ऐसे भी कई भौतिकवादी विचारक हैं जिन्होंने समय की सत्ता पर खरेखरे सवाल उठाए हैं. मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि व्यक्ति पर समय का प्रभाव उसकी मनःस्थिति और परिवेश के अनुसार पड़ता है. तदनुसार समय व्यक्तियों पर अलगअलग प्रभाव डालता है. इन परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच कुछ प्रश्न लगातार सिर उठाए रहे.कृ

समय: दार्शनिक पहेली

माना कि समय है, उसकी प्रतीति है. पर वह है क्या? कब उसका जन्म हुआ? ब्रह्मांड के साथ अथवा उससे पहले? यदि पहले तो कितना? समय क्या घड़ी की टिकटिक, नदी की कलकल की भांति आगे बढ़ने वाला प्रवाह है? अथवा ऐसी निस्सीम सत्ता जिसमें घड़ी की टिकटिक, नदी की कलकल, चांद, सितारे, सूरज, ग्रहउपग्रह जैसे ब्रह्मांड के कोटिक कोटि पिंड समाए हुए हैं? समय की प्रतीति घटनाओं के माध्यम से होती है, तो क्या वह घटनाओं की अन्वति मात्र है? घटनाएं समय में बीतती हैं या घटनाओं के साथ समय की उलटबांसी चलती है? अगर वह घटना नहीं है तो उसकी प्रतीति का आधार क्या है? क्या घटनाओं से बाहर समय की अनुभूति संभव है? समय और समयबोध में अंतर क्या है? क्या समय और समयबोध दोनों साथसाथ जन्मे? यदि नहीं तो उनके बीच अंतराल कितना है? दोनों में पहले कौन जन्मा? मानवमन में हजारों वर्ष पहले कौंधे ये प्रश्न आज भी उसी तरह बने हुए हैं. समय को लेकर जो चुनौतियां ईसा से चारपांच सौ वर्ष पहले थीं, वे किसी न किसी रूप में आज भी मुंह बाए खड़ी हैं. समय को लेकर महत्त्वपूर्ण चिंतन बौद्ध, न्याय, वैशेषिक आदि दर्शनों में हुआ है. मगर आधुनिक भारतीय विचारकों ने इस क्षेत्र को उपेक्षित ही रखा है. जबकि समय की दार्शनिक विवेचना एक प्रकार से इस विश्वसमाज की वस्तुनिष्ट विवेचना जैसी होगी. वह हमें धर्म के नाम पर चल रहे अनेकानेक पाखंडों और अज्ञानताओं से मुक्ति दिला सकती है. संतोष है तो बस इतना है कि प्रश्न का होना भी कम नहीं होता. समस्या हो तो मानवीय जिजीविषा उसका समाधान कभीकभी खोज ही लेती है.

समय की व्युत्पत्ति को लेकर वैज्ञानिकों के अलगअलग विचार हैं. स्टीफन हाकिंग समय की उत्पत्ति को ब्रह्मांड के जन्म से जोड़ते हैं. ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ में उन्होंने समय की व्युत्पत्ति महाविस्फोट की घटना से मानी है. हाकिंग के अनुसार, महाविस्फोट से पहले पूरा ब्रह्मांड अनंत संपीडित ‘परम बिंदू’;ैपदहनसंतपजलद्ध अथवा ‘परमएैक्य’ की अवस्था में था. लगभग 15 अरब वर्ष पहले निंरतर बढ़ता आंतरिक दाब ही ‘परम बिंदू’ के महाविस्फोट तथा ब्रह्मांड के जन्म का निमित्त बना था. हाॅकिंग के अनुसार ब्रह्मांड के जन्म से पहले समय अथवा किसी वस्तु की कोई कल्पना संभव नहीं है. यहां हाकिंग अरस्तु और न्यूटन के विचारों से सहमत दिखाई पड़ते हैं, मगर एक उलझन है. न्यूटन और अरस्तु समय को ‘परमतत्व’ के तुल्य मानते हैं. उनके अनुसार समय की अपनी सत्ता है और वह भौतिक घटनाओं से स्वतंत्र है. समय घटनाओं पर नजर रखता तथा उनके होने के प्रभाव को दर्शाता है. स्टीफन हाकिंग सहित ये दोनों वैज्ञानिक भी समय की उत्पत्ति को ब्रह्मांड के जन्म से जोड़ते हैं. यह उनकी विवशता है. विज्ञान तर्क के सहारे चलता है. चूंकि ब्रह्मांड के जन्म से पहले समय की सत्ता का प्रमाणन असंभव है. इसलिए उनकी वैज्ञानिक बुद्धि समय की उत्पत्ति को ब्रह्मांड की उत्पत्ति से पीछे नहीं ले जा पाती. दार्शनिक के लिए ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती. उसके लिए विचार का तर्क सम्मत होना पर्याप्त है. जाहिर है, समय की व्युत्पत्ति की वैज्ञानिक व्याख्या एक दार्शनिक के लिए अनेक सवाल छोड़ जाती है. सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण प्रश्न तो यही है कि ब्रह्मांड और समय को एकदूसरे से संबद्ध करने का आधार क्या है? यदि दोनों को परस्पर जोड़ा जाता है तो माना जाएगा कि कि वे परस्पर अन्योन्याश्रित हैं, ऐसे में समय को ‘परम’ अथवा ‘स्वतंत्र’ मानना अनुचित होगा, जबकि प्लेटो, अरस्तु, न्यूटन से लेकर अनेक आधुनिक वैज्ञानिक समय को परिवर्तन निरपेक्ष और स्वतंत्र मानते आए हैं.

अरस्तु से लेकर हाकिंग तक इन समस्याओं पर कोई विचार नहीं करते. न ही किसी प्रकार का सवाल उठाते हैं. उनका यह अभीष्ट भी नहीं है. इसलिए कि हाकिंग हो या न्यूटन अथवा अरस्तु सभी का ध्येय सृष्टि के जन्म से जुड़ी जिज्ञासाओं के प्रति वैज्ञानिक नजरिया पेश करना था. उससे जुड़े दार्शनिक प्रश्नों का समाधान करना नहीं. अब यदि हाकिंग की स्थापना को सत्य मान लिया जाए, मान लिया जाए कि सृष्टि का जन्म महाविस्फोट से ही हुआ था, तब भी समय को लेकर कुछ सवाल हमेशा बने रहते हैं. जैसे कि पदार्थ को निरंतर संपीडित होतेहोते ‘परमबिंदू’ की अवस्था तक आने में कितना समय लगा था? वह परमबिंदू की अवस्था में कब तक रहा? यदि समय घटनाओं की अन्वति अथवा उनके परिवर्तन को दर्शाता है तो ‘परमशून्य बनने तथा उसके विखंडित होने के बीच की अवधि को भी समय क्यों न मान लिया जाए? क्या परम बिंदू बनने तथा ‘महाविस्फोट’ का क्षण दोनों एक हैं? क्या परमबिंदू से पहले भी सृष्टि का कोई स्वरूप था? यदि परमबिंदू बनना एक घटना है तो उसके बनने में लगने वाले समय की उपेक्षा हम कैसे कर सकते हैं? परम शून्य की अवस्था में आने से पहले ब्रह्मांड और समय का क्या संबंध था? हाकिंग इन सवालों को छोड़ आगे बढ़ जाते हैं. उनके अनुसार ब्रह्मांड से पहले समय की परिकल्पना का वैज्ञानिक आधार उन्हें नजर नहीं आता. हाकिंग का कहना सही हो सकता है, लेकिन दार्शनिक की दृष्टि से यह जल्दबाजी का निष्कर्ष है. विषय ही सीमा को सत्य की सीमा मान लेने के कारण प्रायः ऐसा होता रहता है. ध्यातव्य है कि हाकिंग का ध्येय ब्रह्मांड की उत्पत्ति जुड़ी वैज्ञानिक गुत्थियों को सुलझाना था. ऐसा नहीं है कि समय पर वैज्ञानिक दृष्टि से विचार नहीं किया जा सकता. न्यूटन के गति के नियमों से लेकर हाइंजवर्ग के अनिश्चितता के सिद्धांत तक सभी में समय का प्रयोग किया जाता है. आइंस्टाइन के विचार के अनुसार समय चौथा आयाम है. हाइंजवर्ग भी परमाणु के भीतर मूलकणों की वास्तविक उपस्थिति को जानने के लिए समय को चौथे आयाम के रूप में स्वीकार करते हैं. लेकिन प्रकारांतर में वे दोनों ही किसी पिंड अथवा मूलकण की स्थिति को समझने के लिए चौथे आयाम के रूप में मानव मस्तिष्क द्वारा कल्पना के अतिरिक्त विस्तार, अधिक बौद्धिक श्रम की अपेक्षा कर रहे होते हैं.

दर्शन के विद्यार्थी के लिए समय की विवेचना से जुड़े प्रश्न बड़े प्रासंगिक हैं. एक वैज्ञानिक ब्रह्मांड के जन्म से समय की उत्पत्ति को मानकर संतुष्ट हो जाता है. क्योंकि उससे पहले किसी भी सत्ता की कल्पना उसके लिए असंभव है. असंभव कल्पना करना विज्ञान का क्षेत्र भी नहीं है. दर्शन तर्क की विचारभूमि पर विकसित होता है. दार्शनिक के लिए समय को लेकर सामान्यतः दो विकल्प होते हैं. समय को अनंत प्रवाह मानते हुए गहन सृष्टि के जन्म से पहले ‘परम बिंदू’ बनने से लेकर महाविस्फोट तथा उसके बाद की समस्त घटनाओं का,े उसके विभिन्न अंतरालों में घटी हुई घटनाएं माने. दूसरे समय और महाविस्फोट दोनों का जन्म एक साथ मानते हुए समय को घटनापरिवर्तन के साक्षी के रूप में देखे. लेकिन ब्रह्मांड एवं समय की व्युत्पत्ति को परस्पर असंबद्ध करना, दर्शन की दृष्टि से भी इतनी समस्याएं उत्पन्न करता है, जिनका समाधान असंभव है. यदि समय की व्युत्पत्ति को ब्रह्मांड से पहले मान लिया जाए, तब एक और ब्रह्मांड अथवा ऐसी रचना की परिकल्पना करनी होगी, जिसमें समय रह सके; अथवा जिसके साथ वह अपने ‘होने’ को दर्शा सके. उसके बाद सिलसिला अनंत तक चलता जाएगा. चूंकि समय की सत्ता की सिद्धि बगैर परिवर्तन के असंभव है और दृश्यमान जगत में परिवर्तन के लिए वस्तु जगत की मौजूदगी अपरिहार्य है, इसलिए समय के इतिहास के बहाने वैज्ञानिक दरअसल ब्रह्मांड अथवा ब्रह्मांडीय हलचलों का इतिहास ही बता रहे होते हैं; और किसी ठोस तर्क के अभाव में दार्शनिक भी समझौते की ओर बढ़ते नजर आते हैं. अधिकांश यह मान लेते हैं कि समय और ब्रह्मांड एक ही है. अथवा दोनों एक ही सत्ता की भिन्न प्रतीतियां हैं. यदि यह सही है तब समस्या होती है कि ब्रह्मांड की व्याख्या के लिए समय की अवधारणा क्यों जरूरी है?

दूसरे शब्दों में समय को घटनाओं की प्रतीति मानते हुए हम केवल समयबोध अथवा उसकी व्यावहारिक उपस्थिति को महत्त्व दें. जैसा अरस्तु और न्यूटन जैसे वैज्ञानिक भी मानते आए हैं, मान लें कि प्रत्येक परिवर्तन समय सापेक्ष होता है. इससे स्टीफन हाकिंग, न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों, जिनके लिए ब्रह्मांड के जन्म से पहले समय की उपस्थिति असंभव है, की मान्यता अवधारणा को स्वीकृति मिलेगी. हालांकि उस अवस्था में समय की निरपेक्षता का प्रश्न आइंस्टाइन के सापेक्षता के सिद्धांत से संघर्ष करता हुआ नजर आएगा. विकल्प यह भी है कि समय को अनंत एवं निरपेक्ष सत्ता के रूप में पहचाना जाए, जिसमें समस्त घटनाएं, परिवर्तन आदि बनतेमिटते रहते हैं. मानें कि समय सभी का साक्षी, केवल दृष्टामात्र है. प्लेटो ने भी उसे अनंत के साथी और सहधर्मी के रूप में देखा है, यह भी हो सकता है कि समय के व्यावहारिक बोध जिसे हमारी स्मृति तय करती है, जो परिवर्तन को समझने के लिए जरूरी है, को मान्यता देते हुए समय की स्वतंत्रता जैसे सवालों से मुक्ति पा लें. आइंस्टाइन, स्टीफन हाकिंग आदि मानते हैं कि विशिष्ट परिस्थितियों में समय का आचरण वह नहीं रह जाता, जैसा सामान्य अवस्था में होता है. उनके अनुसार समय स्थिति सापेक्ष है. और यदि वह स्थिति सापेक्ष है, तब उसके संदर्भ में स्वतंत्रता, स्वायत्तता जैसे विशेषण बेमानी हो जाते हैं. क्योंकि समय को यदि परिवर्तन की दर अथवा घटनाओं की प्रतीति मात्र माना जाए तो प्रत्येक वस्तु अथवा घटना के लिए स्वतंत्र समय की परिकल्पना करनी होगी. अनंत घटनाओं के लिए समय के अनंत प्रारूपों की कल्पना करने से उचित होगा कि समय को वस्तुजगत से निरपेक्ष मान लिया जाए. मान लिया जाए कि ब्रह्मांड की भांति समय भी अनंत और अपरिमेय है, जो उसके समस्त परिवर्तनों का साक्षी है. तीसरी धारणा के समर्थक विचारक वे हैं जो समय की सत्ता को घटनाओं से परे मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं, जो समय की किसी भी प्रकार की उपस्थिति को नकारते हैं. जिनके अनुसार समय मनुष्य की कल्पना या भ्रांति जैसा कुछ है, जिसे वह घटनाओं के अनुक्रम की व्याख्या के लिए अपनाता है.

समय की सत्ता के नकार अनेक लोगों को चैंका सकता है. हजारों वर्षों से चली आ रही इस मान्यता का प्रतिकार उन्हें अनोखा लगेगा ही. लेकिन हमें जानना चाहिए कि समय की सामान्य प्रतीति घटनाओं से जुड़ी है. मनुष्य परिवर्तन की रफ्तार को समझने के लिए समयबोध का सहारा लेता है. घटनाशून्य ब्रह्मांड समय शून्य होगा, इसमें भी संदेह नहीं है. हाकिंग इसी आधार पर महाविस्फोट से पहले समयशून्यता की स्थिति स्वीकार करते हैं. तो समय क्या केवल अंतराल है? घटनाओं के बीच का शून्य? निरंतर परिवर्तनकारी जगत में मनुष्य होश संभालते ही स्वयं को घटनाओं के प्रवाह में स्वयं को पाता है. उन्हीं का अवलोकन करते, हिसाबकिताब रखते हुए समय का प्रत्यय उसके अवचेतन में अनायास पैठ जाता है. चूंकि मनुष्य घटनाओं का दृष्टा ही नहीं भोक्ता भी है. इसलिए उनका प्रभाव इतना गहरा और स्थायी होता है कि उसके प्रभावक्षेत्र से बाहर आ पाना जनसाधारण तो क्या अच्छेअच्छों के लिए संभव नहीं होता. हालांकि यह आवश्यक नहीं कि मनुष्य के आसपास घटनेवाली सभी घटनाएं उसे समानरूप से प्रभावित करती हों. प्रायः दो प्रकार की घटनाएं मनुष्य के आसपास में अंतरिक्ष में घट सकती हैं. पहली वे जिनका मनुष्य से सीधा संबंध हो. दूसरी वे जिनका उससे कोई प्रत्यक्ष संबंध न हो. हालांकि यह आवश्यक नहीं कि केवल वही घटनाएं मनुष्य को प्रभावित करें, जिनका उससे प्रत्यक्ष संपर्क हो. अनेक ऐसी घटनाएं हो सकती हैं, जिनका मनुष्य से तात्कालिक रूप से कोई संबंध नहीं है, बावजूद इसके वे तात्कालिक रूप से, अथवा कुछ अंतराल के पश्चात मनुष्य को प्रभावित करती हैं. कह सकते हैं कि समय की प्रतीति प्राणी चेतना के आरंभिक बिंदू से जुड़कर अंत तक बनी रहती है. उल्लेखनीय है कि मानवमस्तिष्क घटनाओं के ही माध्यम से समय का आकलन करता है. रातदिन, ऋतुकाल, धूप, आकाश में चांदतारों की बदलती स्थितियां मस्तिक पर प्रभाव डालती हैं. उनमें से अनेक स्थितियां ऐसी होती हैं, जिनकी एक निश्चित अंतराल के बाद पुनरावृत्ति होती है. धीरेधीरे मानवमस्तिष्क उनकी तारतम्यता से अनुकूलित होने लगता है. यही अनुकूलन समयबोध के रूप मंे जाना जाता है.

समय के विवेचन का सामाजिकसांस्कृतिक पक्ष भी है. दरअसल समय के प्रत्यय का जीवन में इतने प्रकार से प्रयोग होता है कि वह सामाजिकसांस्कृतिक संबंधों के निर्धारण में प्रमुख नियामक शक्ति के रूप में नजर आता है. जन्म के साथ मनुष्य का अपने मातापिता; तथा उनके माध्यम से शेष समाज के साथ संबंध बनता है. उसी से मनुष्य के व्यक्तिगत समय की शुरुआत होती है. मृत्यु के साथ मान लिया जाता है कि संबंधित व्यक्ति का समय पूरा हो चुका है. प्राणिमात्र के संबंध में जीवन और मृत्यु यद्यपि जैविक घटनाएं हैं, जैसेजैसे मनुष्य का जीवन आगे बढ़ता है, वैसेवैसे अनेक घटनाएं उनके जीवन में घटती हैं. उनसे उसके बदलते जीवन और समय की प्रतीति होती है. वृद्धावस्था में समय जितनी तेजी से बीतता हुआ महसूस होता है, वैसा युवावस्था में नहीं हो पाता. कारण स्पष्ट है. वृद्धावस्था में मनुष्य जीवन के सूक्ष्म अवलोकन से कट जाता है. एक युवा लिए दिन का आशय सुबह व्यायाम, काॅलेज, खेल, पढ़ाई, दोस्तों से साथ मटरगश्ती, टेलीविजन, सिनेमा, पुस्तकालय आदि हो सकता है. अपने दिनभर के समय को वह इन्हीं कार्यों में बांटकर उन्हें टुकड़ेटुकड़े जीता है. वृद्धावस्था में बाहरी कार्यकलाप सिमट जाते हैं. जीवन बच्चों के साथ बातचीत, भोजन, पुरानी यादों और निद्रा में सिमट जाता है. इसलिए समय भागता हुआ महसूस होता है. यदि बीमारी हो तो बात भिन्न है. तब भी देह के बाहर समय की प्रतीति घट जाती है.

आशय है कि मनुष्य का समयबोध जीवन के व्यावहारिक पहलुओं से जुड़ा होता है. इस बीच अव्यावहारिक और अनावश्यक है उसे प्रायः छोड़ दिया जाता है. उदाहरण के लिए किसी मनुष्य की जीवनावधि जन्म से मृत्यु के क्षण तक मानी जाती है. चूंकि जन्म और मृत्यु साक्षात घटनाएं हैं, इसलिए उन्हें जीवन यात्रा के पहले और अंतिम पड़ाव के रूप में देखने की परंपरा, लगभग सभी समाजों में मिलती है. जबकि हम सभी जानते हैं कि प्राणीमात्र का जीवन गर्भाधान की प्रक्रिया संपन्न होने के साथ ही आरंभ हो जाता है. अनेक महामानव अपने विचारों और कर्म से दुनिया को अपनी मृत्यु के बाद भी प्रभावित करते हैं और इस तरह समाज में उनकी अभौतिक उपस्थिति बनी रहती है. इसके बावजूद गर्भस्थ भ्रूण की अवधि को हम मनुष्य की जीवनावधि का हिस्सा नहीं मानते. अनिश्चितता अथवा सामाजिक शुचिता के लिहाज से भी उसे मनुष्य की कुल जीवनावधि में जोड़ना उचित नहीं माना जाता.

समय को लेकर मानवमात्र की अनुभूति दो प्रकार की होती है. पहली उसके व्यक्तिगत जीवन और अनुभवों को लेकर. जिसमें वह सूरज को उदयअस्त होते देखता है. व्यक्ति की दिनचर्या सुबह के साथ आरंभ हो जाती है. दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर काम पर जाना, समयानुसार भोजन और दूसरे दायित्वों को निपटाना, फिर शाम होतेहोते घर लौटकर रात्रिविश्राम करना. इस तरह उसके दिमाग पर समय का जो प्रत्यय बनता है. उसको भौतिक समय कह सकते हैं. दूसरे शब्दों में व्यक्ति की पूरी दिनचर्या भौतिक समय के साथ एक संवाद है. उसे मनुष्य का व्यक्तिगत समय भी कह सकते हैं. लेकिन जब कोई मनुष्य समय के साथ व्यवहार करने के बजाय उसके बारे में सोचने लगता है. जब वह सोचता है कि न केवल उसका अपना जीवन बल्कि उसके साथियों, जड़चेतन सभी, जो जीवित हैं और जो नहीं हैं, वे भी जो हजारोंलाखों वर्ष पहले मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं, साथ में धरती, ग्रहनक्षत्र, चरअचर, ब्रह्मांड सभी समय के भीतर आजा रहे हैं; यानी जब वह अपने अलावा दूसरों के समय के बारे में सोचता है तो उसे समय को लेकर कुछ और ही अनुभव होता है. तब उसके मन में अपरिमेय समय की छवि आकार लेने लगती है. समय की अपरिमेयता के बोध ने ही जीवन की नश्वरता के विचार को जन्म दिया है. उसी से आदमी ने माना कि कुछ है जिसमें सब कुछ बीत रहा है. यहां तक कि उसका जीवन भी. जो इतना शक्तिशाली है कि बड़े से बड़े पहलवान को एक ही झटके में धूल चटा दे. और इतना व्यापक भी कि ब्रह्मांड की एक भी घटना, एक भी प्राणी, चरअचर उससे बाहर नहीं.

समय की अनिश्चितता के बोध ने डर को जन्म दिया. डर ने अमरत्व की कल्पना को. जरामरण से घबराए इंसान ने समय को ताकतवर सत्ता मान लिया गया. समय की मेहरबानी बनी रहे इसके लिए मनौतियां मांगी जाने लगीं. भयभीत मनुष्य समय से दोस्ती गांठने, उसके साथ सातत्य बनाए रखने की कोशिश करने लगा. समय के साथ बने रहने की चाहत ने पुनर्जन्म की संकल्पना को जन्म दिया. मृत्यु के चंगुल से पार छिटक जाने की चाहत का नाम मोक्ष पड़ा. वह अमरत्व की ऐसी कल्पना थी, जिसपर समय की मार भी बेअसर थी. समय के साथ बने रहना. उसको दौड़ में मात दे देना पुरुषार्थ का लक्षण मान लिया गया. समय के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ने वाले निस्प्रह पुरुषार्थी को कर्मयोगी कहा गया. चूंकि समय के संग दौड़ में बने रहना, सभी के लिए सदैव संभव नहीं होता. समय अच्छेअच्छों को छका देता है, कथित देवता भी उसके प्रभाव से मुक्त नहीं हैं—अतएव स्वार्थी पंडाओं ने भाग्य, प्रारब्ध, कपालरेख, नियतिचक्र, कालचक्र, गति जैसी संज्ञाओं और विशेषणों की परिकल्पना की. फलित ज्योतिष का गूदा स्वयं खाकर गुठलियां वे जनसाधारण में बांटने लगे. निराशा से उबरने के आदमी जबतब उनकी शरण लेने लगा. भाग्य कर्महीनों की शरणस्थली बना, पुरुषार्थ कर्मयोगियों की पहचान.

मानव जीवन समय से अनुशासित है. तो क्या समय की संकल्पना मनुष्य की सामाजिकता का निकष् है? क्या अकेले व्यक्ति का भी कोई समय होता है? शायद नहीं; या शायद हां? अकेले व्यक्ति के लिए भी घटनाएं होंगी. उन्हें देखकर उसको अपने आसपास गतिशीलता का आभास होगा. इससे वह वर्तमान को अपने सामने से गुजरते हुए देखेगा. यानी जैसा हमने पीछे कहा, व्यक्तिगत रूप से मनुष्य भौतिक समय के संपर्क में रहता है. मगर नितांत अकेले, मानव समाज से कटे हुए मनुष्य का समयसंबंधी सोच ठीक वह नहीं होगा, जो समाज में रहनेवाले मनुष्य का है. उसे स्मृति की आवश्यकता शायद ही पड़ेगी. चूंकि अनुभवों को बांटने के लिए दूसरा कोई नहीं होगा, इसलिए मस्तिष्क और स्मृति का उपयोग भी धीरेधीरे घटता जाएगा. इस प्रकार अकेला, समाज से कट चुका मनुष्य, पशुपक्षियों की भांति घटनाओं की तारतम्यता, उनकी परिवर्तनशीलता का बारीक हिसाबकिताब शायद ही रख पाएगा. यदि रखेगा भी तो सबकुछ गड़बड़ा भी सकता है. इसलिए कि उसके निर्णय और बोध को चुनौती देने वाला कोई न होगा. दूसरे शब्दों में समाज से कटे व्यक्ति का समयबोध हुआ भी तो वह सामूहिक समयबोध से काफी भिन्न और सीमित होगा. वह कुछ ऐसा होगा जैसी पशुपक्षियों की अंतश्चेतना, जो अपनी जैविक आश्यकताओं के आधार पर सौर दिवस में प्रकृतिचक्र से तालमेल बनाए रखती है. प्रकृति के निरंतर साहचर्य में रहते हुए वे अपनी जैविक आवश्यकताओं और परिवेश के बीच सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं. दिन की पहली झलक के साथ उन्हें भोजन की चिंता सताने लगती है. अंबर से उतरता उजाला देखते ही चिडि़याओं में उड़ान भरने का हौसला आ जाता है. पशु अपनेअपने काम की ओर निकल जाते हैं. इससे मनुष्य की समयसंबंधी अवधारणा पर सामाजिकता के प्रभाव को आंका जा सकता है. दूसरे शब्दों में मनुष्य के समयसंबंधी जो भी विचार आज हमें उपलब्ध हैं, वे समाजसापेक्ष भी हैं.

स्मृति मनुष्य के लिए प्रकृति का अनोखा वरदान है. वह घटनाओं की आवृत्ति तथा उनका क्रमानुक्रम सहेजने में सहायक सिद्ध होती है. उसके अभाव में सूरज का उगना और अस्त होना महज प्राकृतिक घटनाएं होतीं. स्मृति घटनाओं को सहेजने का दायित्व निभाती है. मनुष्य के आसपास जो घटनाएं घटती हैं, स्मृति उन्हें एकएक कर दर्ज करती जाती है. वे स्मृतियां मस्तिष्क में अपने स्वरूप एवं क्रमानुक्रम के साथ दर्ज होती जाती हैं. दो घटनाओं का अंतराल समय की प्रतीतियों को जन्म देता है. कह सकते हैं कि परिवर्तन शून्यता ही समयशून्यता है. लेकिन घड़ी की सुइयों को रोकने से समय नहीं रुकता. इसलिए परिवर्तन शून्यता का अभिप्राय प्रेक्षक और प्रेक्षित दोनों की आंतरिक और बाह्य ठहराव से है. लेकिन मानवमस्तिष्क की सीमा है कि वह अति उच्च गति और अत्यंत निम्न गति के परिवर्तनों को पकड़ नहीं पाती. खासतौर पर अकेलेपन की अवस्था में. वैज्ञानिक प्रयोग इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं. यदि घटनाओं में बहुत तेजी से परिवर्तन हो तो वे मानवमस्तिष्क पकड़ से बाहर रह जाते हैं. सिनेमा और दूरदर्शन पर दिखनेवाले धारावाहिक, चलचित्र असल में अलगअलग चित्रों की शृंखला होते हैं. उन्हें आंखों के आगे इतनी तेजी से गुजारा जाता है कि वे उनमें सातत्य, एकदूसरे से परस्पर जुड़ाव नजर आने लगता है, जिसके कारण निर्जीव आकृतियां जीवंत दिखाई पड़ने लगती हैं. दूसरे शब्दों में जो दिखता है, और जो वास्तविक है, दोनों में मूलभूत अंतर होता है. अर्थात जो दृष्टि में है, आवश्यक नहीं कि वही सृष्टि में भी हो. कलकल बहती नदी एक धारा होने का आभास कराती है. इस कारण लोग उसको पूजते भी हैं. अगर हेराक्लाइट्स की माने तो नदी असल में नदी न होकर अनगिनत जलबिंदुओं से मिलकर बना एक प्रवाह है. अपरिमित जलबिंदू लघु धाराएं बनकर नदी होने का एहसास कराते हैं. इसलिए हेराक्लाइट्स कहना था—‘हम एक ही नदी में दो बार नहीं उतर सकते.’ जब हम नदी में दुबारा प्रवेश करते हैं, पहले वाला जल कहीं आगे बढ़ चुका होता है. इससे एक धारा संदेहवाद की ओर भी जाती है. फलस्वरूप समय की सत्ता पर सवाल उठाने वालों को ठोस तार्किक आधार प्राप्त होता है. संदेहवादियों के अनुसार समय असल में अंतहीन घटनाओं से उत्पन्न प्रवाह, एक मानसिक संरचना है. ठीक वैसा ही जैसे अनेक छोटीछोटी धाराएं एवं अनंत जलकण मिलकर नदी के प्रत्यय को जन्म देती हैं. (और हिग्स बोसोन मिलकर द्रव्यमान को!)

समय का प्रत्यय व्यक्तिसापेक्ष भी होता है. यदि दो ऐसे प्रेक्षकों की कल्पना की जाए जिनमें एक पृथ्वी पर है, दूसरा पृथ्वी से लाखों किलोमीटर दूर ऐसे ग्रह पर जिसका सौरचक्र पृथ्वी के सौरचक्र से पूरी तरह भिन्न है, तो दोनों के समयबोध में पर्याप्त अंतर होगा. आइंस्टाइन के अनुसार यदि दो प्रेक्षक एक दूसरे के सापेक्ष असंभव तीव्र गति से जा रहे हों तो दोनों के समयबोध में काफी अंतर होगा. उस अवस्था में यदि कोई अंतरिक्षयात्री पृथ्वी पर मौजूद प्रेक्षक से घड़ी मिलाकर अतितीव्र गति से यात्रा पर निकलता है तो, उसकी घड़ी, पृथ्वी पर मौजूद प्रेक्षक की घड़ी की अपेक्षा कम समय बताएगी. आइंस्टाइन इसे ‘समय का सिकुड़ना’ कहते हैं. आइंस्टाइन ने प्रकाश गति को व्यवहार में असंभव माना है. फिर भी यदि कल्पना की जाए कि दो प्रेक्षकों की सापेक्षिक गति प्रकाश वेग के बराबर हो तो उनका समयबोध शून्य होगा. कारण स्पष्ट है, प्रकाशवेग को सृष्टि का उच्चतम वेग माना गया है, कोई भी घटना उससे तेज गति से चल ही नहीं सकती. इसलिए प्रकाशगति से दौड़ रहे प्रेक्षक तक घटनासंबंधी सूचना पहुंच ही नहीं पाएगी. साफ है कि स्वतंत्र या स्वच्छंद समय जैसा कुछ नहीं होता. समय न केवल व्यक्तिसापेक्ष होता है, बल्कि परिस्थिति सापेक्ष भी होता है. चूंकि समय का आभास घटनाओं के माध्यम से होता है, उसकी सीधी अनुभूति का कोई माध्यम ही नहीं है, चूंकि प्रकाश गति से दौड़ने के कारण कोई घटना उस तक पहुंच ही नहीं पाएगी, इसलिए गतिमान प्रेक्षक के लिए शेष ब्रह्मांड की घटनाएं शून्य प्रतीत होंगी. तदनुसार समय उसको ठहरा हुआ नजर आएगा.

जिस प्रकार घनत्व, द्रव्यमान, आयतन आदि को पदार्थ से अलग करके देखना असंभव है, उसी प्रकार घटनाओं अथवा परिवर्तन को अवधि निरपेक्ष कर पाना असंभव है. एक सवाल यह भी किया जा सकता है कि क्या किसी मनुष्य को समयशून्य स्थिति में ले जाया जा सकता है. उत्तर ‘न’ में मिलेगा. चूंकि मनुष्य का परिवर्तनशून्य स्थिति में जाना संभव नहीं है, इसलिए समयशून्यता भी असंभव है. उदाहरण के लिए एक प्रेक्षक को अंधेरे बंद कमरे में कैद करके बाहरी जगत से उसका संपर्क बिलकुल काट दिया जाए. उस अवस्था में उसका व्यक्ति का व्यावहारिक समयबोध समाप्त हो जाएगा. किंतु शेष सृष्टि किसी न किसी रूप में उससे जुड़ी रहेगी. उसका शरीर उसकी क्रियाएं निंरतर चलती रहेंगी. व्यक्ति प्राकृतिक घटनाओं तथा उनसे जन्मे समयबोध की ओर से भले ही संवेदन शून्य हो जाए, विश्व के लिए वह समय का वैसा ही हिस्सा बना रहेगा. यह भी संभव है कि एक अवधि के बाद उसकी जैविक घड़ी रातदिन तथा भौतिक जगत की अन्य दृश्यमान घटनाओं से संचालित होने के बजाय, केवल भूखप्यास तथा अन्य शारीरिक प्रक्रियाओं से नियंत्रित होने लगे. क्योंकि प्रकृति को देखकर समय का अनुमान लगाने वाली उसकी जैविक घड़ी भौतिक घटनाओं से कटते ही गड़बड़ा सकती है. लंबे समय तक प्रकृति से कटे रहने पर उसमें स्थायी व्यवधान भी आ सकता है. इसके बावजूद व्यक्ति के लिए समयशून्य स्थिति असंभव होगी. क्योंकि जीवन के रहते परिवर्तनशून्यता से मुक्ति असंभव है. दो घटनाओं अथवा परिवर्तन के अंतराल के रूप में समय का बोध लगातार बना रहेगा. दूसरे शब्दों में घटनाओं की क्रमानुक्रमता ही समयबोध के रूप में विकसित होती है. बातचीत के दौरान सामने वाला व्यक्ति उन घटनाओं को उसी क्रमानुक्रम में ग्रहण करता है. इसलिए घटना के साथ उनके अंतराल के रूप में उनसे संबद्ध समयबोध भी बड़ी आसानी से दूसरे के मनमस्तिष्क पर छा जाता है. अकेलेपन की अवस्था में ऐसा समयबोध अस्थायी होगा. तब व्यक्ति घटनाओं का प्रेक्षकभर होता. क्योंकि उपयोग न होने के कारण उसकी स्मृति शायद ही विकसित हो. इस उदाहरण से समय की निरपेक्षता का सवाल खटाई में पड़ने लगते हैं और वह स्वतंत्र सत्ता न होकर परिवर्तनों का प्रभाव उसी प्रकार जैसे घनत्व, द्रव्यमान, आयतन आदि हैं—नजर आने लगता है.

अनेक विद्वान भौतिक समय अथवा समय की प्रवाहशीलता के विचार से सहमत नहीं हैं. समय को मिनट, सैकिंड, पलअनुपल में बांटने का विचार उन्हें स्वीकार नहीं है. उनके अनुसार समय से ऐसा भौतिक आचरण अनपेक्षित है. समय उनके लिए अनुभूति का विषय है. उनके अनुसार समय ब्रह्मांडीय विस्तार जैसा ही निस्सीम और शाश्वत है, जिसमें सबकुछ घटता है. ऐसा कुछ भी नहीं जो समय की व्याप्ति से परे हो. ब्रह्मांड की प्रत्येक हलचल उसमें समाई है. इस मान्यता के अनुसार समय का आकलन संभव नहीं. मनुष्य उसकी निस्सीमता का मात्र अनुभव कर सकता है. घटनाएं उसके अनंत महासागरीय विस्तार में आतीजाती क्षुद्र डांेगियों के समान हैं. भूत, वर्तमान और भविष्य का कालविभाजन यद्यपि इस मान्यता में भी है. इसलिए नहीं कि वह समय की विशेषता है. बल्कि इसलिए कि वह मनुष्य की व्यावहारिक जरूरत है. सांत मानवेंद्रियों द्वारा अनंत समय से तालमेल बनाए रखने की चेष्ठा! इसलिए भूतवर्तमानभविष्य आदि समय के स्वतंत्र प्रखंड न होकर उसकी निस्सीमता में समाहित हैं. समय के प्रत्यय की तार्किक विवेचना के लिए ये निष्कर्ष बहुत काम के हैं. जिसपर हम आगे विचार करेंगे.

जो भी हो, समय अपने आप में रोचक पहेली है. प्राचीन मनीषियों ने मतवैभिन्न्य को बौद्धिकता के लक्षण के रूप में स्वीकार किया है—‘न एको मुनिस्र्य मर्तिभिन्ना.’—यानी ‘एक भी विचारक ऐसा नहीं है, जो अपनी स्वतंत्र राय न रखता हो.’ समय को लेकर भी ऐसे ही विभिन्न मतमतांतर हैं. जिनमें तीन प्रमुख हैं. पहला है घटनाओं को आगे रखकर समय का आकलन करना. जैसे एक लेख की तैयारी के लिए कल मैं पुस्तकालय गया था. आज मैं यह लेख लिख रहा हूं. लेख के प्रकाशित होने के बाद यह पाठकों के हाथ तक पहुंचेगा. ये घटनाएं आगेपीछे की हैं. समय इनके होने के और बीच के अंतराल को तय करता है. तदनुसार उसका भौतिक अस्तित्व है. दूसरी प्रविधि समय को केंद्र में रखकर घटनाओं को परखने की है—जैसे प्राचीन समय में आदिमानव आग जलाने के लिए पत्थर के टुकड़ों को रगड़ता था. गौतम बुद्ध ने गणिका आम्रपाली को धर्मोपदेश दिया था. गुरु नानक ने सिख धर्म की नींव रखी. भारत द्वारा छोड़ा गया यान मंगल की कक्षा में, उसकी परिक्रमा कर रहा है. यदि विश्वयुद्ध हुआ तो करोड़ों लोग तबाह हो सकते हैं. रात्रि के दस बजे हैं और मैं अपने लेख को पूरा करने के लिए कलम घसीट रहा हूं, अमेरिका में सुबह दस्तक दे चुकी है. चांदनी रात का आनंद लेने के लिए कुछ लोग इंडिया गेट पर घूम रहे हैं. समय की निस्सीमता में घट रहीं, घट चुकीं या घटनेवाली ये घटनाएं ऐसी हैं, जिनका कोई न कोई साक्षी है या होगा. इनमंे आगेपीछे की अनुभूति मानवमस्तिष्क तय करता है. तदनुसार समय ब्रह्मांडतुल्य रचना है. सृश्टि की समस्त हलचल को अपने भीतर समेटे हुए. इसमें सभी घटनाएं जो समय के विभिन्न कालखंडों में घटीं, उनके अलावा कोटिक अन्यान्य घटनाएं भी रही होंगी,कृस्वतः समाहित हैं. दूरदर्शन पर प्रसारित लोकप्रिय धारावाहिक ‘महाभारत’ में उद्घोषक हरीश भिमाणी की गूंजती हुई आवाज ‘मैं समय हूं’ समय की इसी निस्सीमता का बखान करती थी. इस सैद्धांतिकी में कालविभाजन अमान्य है. यह समय की चिंरतनवादी अवधारणा है. पहली ने इतिहास को जन्म दिया. दूसरी ने दार्शनिक चिंतना को. तीसरा दृष्टिकोण उन विद्वानों का है जो समय के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगाते हैं. उनके अनुसार समय सिवाय मानसिक संरचना के कुछ नहीं है. वह केवल परिवर्तनशीलता का प्रभाव है. जैसे द्रव्यमान वस्तुओं का गुण है, वैसे ही समय परिवर्तनशीलता का लक्षण है. यह भौतिकवादी दृष्टिकोण है. इसके माननेवाले संख्या में कम हैं, लेकिन तार्किक आधार पर यह किसी भी जनोन्मुखी विचार से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है. इन सबके बावजूद समय आज भी अबूझ पहेली बना हुआ है.

समय के बारे में पहला वस्तुनिष्ठ चिंतन बौद्ध दर्शन में मिलता है. न्याय दर्शन में उसी को विस्तार दिया गया है. पश्चिम विचारकों में प्लेटो, अरस्तु, यूडीपियस, न्यूटन, जीनो, ह्यूम, बर्कले, कांट, हीगेल, हाकिंग आदि ने भी समय को लेकर स्वतंत्र रूप से विचार किया है. कुछ संदेहवादी दार्शनिक भी हुए हैं, जिन्होंने समय के अस्तित्व पर ही सवाल उठाए है. लेकिन समय के बारे में पहली बार सुनिश्चित चिंतन बीसवीं शताब्दी में आरंभिक दशकों में आया. उसके पीछे आइंस्टाइन के सापेक्षिकतावाद की प्रेरणा थी. जैसा कि हम सभी जानते हैं आइंस्टाइन ने समय को चौथा आयाम मानते हुए उसकी शाश्वत सत्ता में विश्वास प्रकट किया था. समय की कुछ गांठों को पहचानने की कोशिश हम इस लेखमाला के अगले हिस्से के रूप में करेंगे.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

1. वैराग्य शतक, 12/1045 भर्तृहरि

2. The nature of living being was eternal, and it was not possible to bestow this attribute fully on the created universe; but he determined to make a moving image of eternity, and so when he ordered the heavens he made in that which we call time an eternal moving image of the eternity which remains for ever at one. Plato in Timaeus. trans by Desmond Lee.

3. Whether, if soul (mind) did not exist, time would exist or not, is a question that may fairly be asked; for if there cannot be someone to count there cannot be anything that can be counted…”Aristole, Physics, chapter 14.

सहविधान : एक विकल्प

सामान्य

धर्म और अभिजन संस्कृति7

आप जिसे संविधान कहते हैं, मैं उसको सहविधान के रूप में देखना चाहूंगा. सहविधान ही क्यों? क्या अंतर है दोनों में? संविधान की भांति सहविधान के गठन में भी नागरिकों की सहमति होती है. उसे भी जनसहमति पर उनके प्रतिनिधियों द्वारा बनाया जाता है. बनाने के पहले लंबी चर्चां, विचारविमर्श होते हैं. बन जाने के बाद भी उसपर विचार किया जा सकता है. आवश्यकता पड़ने पर संशोधन मंजूर होते हैं. तदनंतर सर्वसम्मति अथवा बहुमत के आधार पर ही उसको लागू किया जाता है. इस प्रकार संविधान अपने नागरिकों की सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति होता है. एक ऐसा अनुबंध जिससे राष्ट्र और नागरिक दोनों बंधे होते हैं. संविधान में उनके कर्तव्यों एवं अधिकारों की सुस्पष्ट व्याख्या होती है. अपेक्षा की जाती है कि दोनों अपने कर्तव्य के प्रति सत्यनिष्ठ रहकर प्रदत्त अधिकारों का व्यापक लोकहित में उपयोग करेंगे. इन व्यवस्थाओं के बाद प्रकटतः उसमें कोई झोल नहीं रह जाता. उसमें विश्वास करना राष्ट्रभक्ति का परिचायक माना जाता है और अविश्वास राष्ट्रद्रोह. लागू संविधान में संशोधनों की प्रक्रिया यद्यपि बहुत लंबी और जटिल होती है, तथापि असहमति और अस्वीकारों के बावजूद, संविधान के प्रति सम्मान बनाए रखना राष्ट्रीय भावनाओं का प्रतीक माना जाता है.

इसके बावजूद सहविधान की मेरी कल्पना संविधान से मेल नहीं खाती. हालांकि संविधान भी मेरी परिकल्पना के सहविधान की भांति खुली व्यवस्था है. जिसे सर्वसम्मति अथवा बहुमत की स्वीकृति के उपरांत लागू किया जाता है. उसमें भी संशोधनों के लिए आवश्यक गुंजाइश होती है. संविधान भी न्याय एवं समानता की भावना से आबद्ध होता है. उसी के अनुसार उसमें समाज के विभिन्न वर्गों, संस्थाओं और समूहों के अधिकारों एवं कर्तव्यों की सुस्पष्ट व्याख्या होती है. इन सब विशेषताओं के बावजूद संविधान की मूल अभिकल्पना को निर्दोष मानने में मुझे संकोच है. मेरे विचार में संविधान एक बेहद जटिल संरचना है. कुछ विशेषज्ञों को छोड़कर शेष के लिए उसे आत्मसात करना तो दूर, पढ़ना तक संभव नहीं हो पाता. सरकार की ऐसी योजना भी नहीं है कि वह संविधान के बारे में लोगों को शिक्षित करे, उन्हें उनके नागरिक धर्म से परचाए. न नागरिकों की ऐसी रुचि होती है कि संविधान को भी अपने परमप्रिय धर्मग्रंथों की बगल में जगह दें तथा संवैधानिक व्यवस्थाओं को अपने नागरिक धर्म का हिस्सा माने रहें. कई बार तो सरकार संविधान को लोकतंत्र के धर्मग्रंथ की भांति परोसती है. वह उसके प्रति उतनी ही दुराग्रही नजर आती है, जितना कोई मठाधीश धर्मग्रंथों को लेकर. अंतर केवल इतना है कि धर्माचार्य अपने धर्मग्रंथों की महत्ता से परचाने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाते रहते हैं, यहां तक कि प्रचारसाहित्य को निःशुल्क उपलब्ध कराते हैं, वहीं सरकार का इस ओर कोई प्रयास नहीं होता. इस उद्देश्य के लिए गठित संस्थाएं भी अधिकारियों की काहिली, अदूरदर्शिता तथा सरकार की उपेक्षा के चलते प्रभावहीन सिद्ध होती हैं. पर्याप्त चर्चाविमर्श के अभाव में संविधान अभिजात्य तानाशाही का मूकदृष्टा बनकर रह जाता है. उसका महत्त्व मठों में संरक्षित उस धर्मग्रंथ की तरह होता है जो सिर्फ इसलिए मान्य होता है कि कुछ लोगों ने जिन्हें हम बड़ा मानते है, उसको विशिष्ट माना और अपनाया है. इस धारणा के चलते लोग निजविवेक से काम लेना बंद कर देते हैं. उनकी वृत्ति अनुसरणात्मक हो जाती है. यह वृत्ति समाज के बड़े हिस्से को उसके बौद्धिक सामर्थ्य का उपयोग करने से रोकती है. उसका नुकसान व्यक्ति एवं समाज दोनों को उठाना पड़ता है.

संविधान और उसके तहत गठित संस्थाएं पेशेवर बुद्धिजीवियों को जन्म देती हैं. इससे विशेषज्ञ संस्कृति पनपने लगती है. पेशेवर बुद्धिजीवियों की कमजोरी होती है कि वे मानवीय विवेकीकरण के प्रत्येक आयोजन को निजी लाभ की दृष्टि से देखते हैं. और जिस दिशा में उन्हें लाभ दिखाई दे, अपने बुद्धिविवेक के अनुसार संविधान की वैसी ही व्याख्याएं करने लगते हैं. संविधान सम्मत भारीभरकम संस्थाओं के औचित्य का वे जमकर समर्थन करते हैं, इसलिए कि वे संस्थाएं उनकी स्वार्थसिद्धि का खूबसूरत ठिकाना सिद्ध होती हैं. वे उन्हें भले ही लोकहित से जोड़कर देखते हों, किंतु उनका बड़ा श्रम निजी हितों की सुरक्षा करने में ही खप जाता है. उनके नेतृत्व में संवैधानिक संस्थाओं में वर्गीय सोच पनपने लगता है. परिणामस्वरूप उनके न्याय का पलड़ा समाज के प्रभुवर्ग की ओर झुक जाता है. इस प्रकार वे सकल राष्ट्रीय उत्पाद के बड़े हिस्से को अपने अधिकार में रख लेते हैं. मूल संवैधानिक प्रावधान भले ही इसका विरोध करते हों, किंतु खरीदे गए बुद्धिजीवियों की टीम उनकी मनमानी व्याख्या कर माहौल को उनके अनुकूल बनाए रखती है.

लोकतंत्र के सफल संचालन, कल्याण के समविभाजन तथा न्यायाधारित राज्यों की स्थापना हेतु ऐसे भारीभरकम संविधान भले ही अपरिहार्य माने जाते हों, लेकिन यह भी सच है कि उनकी उलझी हुई कानूनी व्याख्याएं कथित कल्याण राज्यों में, जहां संपत्ति और अधिकारों के विभाजन में ढेर सारा अंतर और अनियमितताएं हों, वहां जनसाधारण के हित में उन्हें लागू कर पाना असंभवप्रायः होता है. ऐसे समाजों में सरकारी उदासीनता और जनसाधारण में अधिकारचेतना की कमी के चलते, संवैधानिक व्यवस्थाएं अल्पसंख्यक अभिजन समाज के एकाधिकार के समर्थन में उतर आती हैं. उसकी अगली परिणति बहुसंख्यक जनसमाज पर अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग की तानाशाही के रूप में होती है. परिणामस्वरूप संविधान में अंतनिर्हित न्याय और समानता की भावना बहुत पीछे छूट जाती है. संविधान, विशेषरूप से लोकतांत्रिक देशों के संविधान के पक्ष में यह कहा जा सकता है कि वे सामाजिक असमानता का प्रकटतः समर्थन नहीं करते. लेकिन यह भी उतना ही सही है कि उनके अधीन बनी कथित लोकतांत्रिक सरकारें वर्गीय असमानता को दूर करने के गंभीर प्रयासों से सुरक्षित दूरी बनाए रखती हैं, जिससे आमजन और न्याय के बीच की दूरी निरंतर बढ़ती जाती है.

एक बार लागू हो जाने के बार राष्ट्र अपने नागरिकों को निर्दिष्ट करता है कि वे संविधान के अनुबंधों का अक्षरशः पालन करें. यदि कोई उल्लंघन करता है तो उसे कानूनी उलझनों का सामना करना पड़ता है. आशय है कि लागू होने के तुरंत बाद संविधान ऐसा बंद निकाय बन जाता है, जिसके प्रति श्रद्धा राष्ट्रभक्ति तथा संदेह राष्ट्रद्रोह मान लिया जाता है. सरकार और शीर्ष पर विराजमान अल्पसंख्यक अभिजन की कोशिश होती है कि लोग संविधान को चाहे पढ़ें या न पढ़ें, उसके पालन में जराभी कोताही न बरतें. संविधान के प्रति उनकी अंधश्रद्धा ठीक वैसी ही होती है, जैसी धार्मिक संस्थाओं की अपने विश्वासों को लेकर. इसके फलस्वरूप अंधश्रद्धा का कारोबार करने वाले लोगों की बन आती है. लोकतांत्रिक छूटों का सहारा लेकर स्वार्थी राजनीतिक दल, कभी लोकहित तो कभी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा लगाते हुए सत्ता में चले आते हैं. प्रकारांतर में वे समाज के वर्गीय विभाजन की जड़ों को मजबूत करने का काम करते हैं, जिससे सामाजिक अंतर्द्वंद्वों को जमीन मिलती है, राष्ट्र विकास की पटरी से उतरकर अंतर्द्वंद्वों के दिखावटी समाहार में जुट जाता है. चूंकि राष्ट्र का संचालन कर रही शक्तियों में अधिसंख्यक लोग अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग से संबंधित होते हैं, इसलिए उनका स्वाभाविक झुकाव समाज के शीर्षस्थ वर्गों के हितसंरक्षण की ओर होता है. नतीजा यह होता है कि उत्पीड़ित वर्ग के पक्ष में न्याय की संभावना और भी कम हो जाती है.

एक और बात भी ध्यान देने योग्य है. अभी तक के अनुभव से यह प्रमाणित हुआ है कि संविधान की जरूरत प्रायः उन्हीं समाजों में ज्यादा पड़ती है, जहां आर्थिकसामाजिक स्तर पर भारी असमानताएं हों, सामाजिक न्यायव्यवस्था एवं संसाधनों पर मुट्ठीभर लोगों का अधिकार हो.. ऐसे समाजों में संविधान वंचित वर्ग के मन में न्याय की उम्मीद जगाता है. इसलिए नहीं कि संविधान ऐसा करने में सर्वथा सक्षम होता है. बल्कि इसलिए कि शताब्दियों लंबी राजनीतिकमानसिक दासता के चलते आमजन का आत्मविश्वास बुरी तरह डगमगाया होता है. उसका आंतरिक बिखराव, अपने ही जैसे लोगों के साथ प्रतिस्पर्धा एवं तज्जनित अंतर्द्वंद्व भी उसे मानसिक रूप से डावांडोल रखते हैं. आपसी सूझबूझ एवं संगठनसामर्थ्य के बल पर वह परिवर्तनचक्र को अपने बलबूते नई दिशा दे सकता है—आत्मविश्वास की कमी के चलते इसका उसे ख्याल तक नहीं आता. इसलिए लोकतंत्र का सहारा लेकर वह अपना नेतृत्व अपने प्रतिनिधियों को सौंप, स्वयं नेपथ्य में चला जाता है. यह अस्वाभाविक भी नहीं है. लोकतांत्रिक प्रणाली को अपनाने वाले समाजों में, लंबी सामंती दासता से उबरने के बाद जनसाधारण के विवेकीकरण का यह पहला चरण होता है. विवेकीकरण के दूसरे चरण में लोग समझने लगते हैं कि अपने दैन्य से उबरने के लिए उन्हें स्वयं आगे आने आना होगा. इस बोध के पश्चात, अभिजन प्रतिनिधियों के बजाय वे अपने ही समूह के सदस्यों पर विश्वास करने लगते हैं. तदनंतर कॉमन समस्याओं की पहचान की जाती है. उसके बाद ही परिवर्तन की वास्तविक शुरुआत संभव हो पाती है. संविधान की परिकल्पना इसी आदर्श को सामने रखकर की जाती है. लेकिन इतिहास में ऐसा उदाहरण दीया लेकर खोजने पर भी नहीं मिलेगा जहां संविधान दूसरे चरण में सफल हो पाया हो. लोकतंत्र के पहले चरण में शीर्ष पर विराजमान शक्तियां समस्त सत्ताकेंद्रों पर अपना अधिकार जमाकर उन्हें ऐसी दिशा देने में कामयाब हो जाती हैं, जो संविधानसम्मत विकास की मूल भावना से एकदम परे होती है. इससे जनसाधारण के लिए दिल्ली उत्तरोत्तर दूर होती जाती है.

संविधान प्रायः उन अर्धलोकतांत्रिक अथवा सामंती समाजों में अपनाया जाता है, जिनमें अत्यधिक आर्थिकसामाजिक विषमताएं और अंतर्द्वंद्व हों. सार्थक विकल्पों के अभाव में संविधान निर्माताओं को उम्मीद होती है कि उसकी मदद से वे समाज के वंचित वर्गों को एकजुट कर उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और संप्रेरित कर सकेंगे. व्यवहार में उसके एक छोर पर पर वे लोग होते हैं जो संविधान की धाराओं का जोड़तोड़ द्वारा अपने पक्ष में उपयोग करने में सक्षम होते हैं. संविधान विशेषज्ञों की बड़ी फौज उनकी मदद को तैयार होती है. दूसरी ओर साधारणजन रहता है, जिनके हितरक्षण हेतु संविधान विशिष्ट प्रावधानों का दावा करता है. विडंबना यह है कि संविधान को समझने तथा उसकी व्यवस्थाओं का लाभ उठाने के लिए यह वर्ग पूरी तरह समाज के प्रभुवर्ग पर आश्रित होता है. इस कारण वह संविधान प्रदत्त लाभों से वंचित रह जाता है. लंबे शोषण एवं उत्पीड़न के दौरान ऐसे क्षण अकसर आते हैं जब जनसाधारण को अपने छले जाने का बोध हो और उसे शीर्षस्थ वर्ग की मनमानी अखरने लगे. लेकिन उपयुक्त नेतृत्व एवं प्रेरणाओं के अभाव में जनगणमन की यह कचोट सार्थक आक्रोश में ढलने में नाकाम सिद्ध होती है. यदि असंतोष की चिंगारी उठे भी तो यथास्थिति बनाए रखने के लिए समाज का प्रभुवर्ग तानाशाहीपूर्ण आचरण पर उतर आता है.

उल्लेखनीय है कि संविधान के जटिल प्रावधान व्यापक लोकहित की दुहाई देते हुए बनाए जाते हैं. चूंकि जिनके नाम पर वे प्रावधान होते हैं, विभिन्न कारणों से वे उन्हें समझ पाने में असमर्थ होते हैं, इसलिए आवश्यकता पड़ने पर उन्हें अभिजन विशेषज्ञों की शरण में जाना ही पड़ता है. विभिन्न दबावों के बीच जनसाधारण को अभिजन वर्ग के तानाशाही पूर्ण आचरण का विरोध करने की न तो छूट होती है, न इसका उन्हें अवसर मिल पाता है. इस अवस्था में संविधान केवल दिखावे और मनबहलाव की चीज बनकर रह जाता है.

सहविधान

सवाल है कि सहविधान और संविधान को अलगअलग करके कैसे देखा जाए? दोनों एकदूसरे से कहां मिलते और किन बिंदुओं पर अपनी स्वतंत्र राह ले लेते हैं? उनके संधिस्थल एवं विरोधबिंदुओं की पहचान कैसे की जाए? यह बहुत उलझनवाली बात भी नहीं है. संविधान को हम लोकतंत्र का संरक्षक कह सकते हैं. जबकि सहविधान न केवल लोकतंत्र के जिम्मेदार संरक्षक का दायित्व निभाता है, बल्कि लोगों की जीवनशैली में ढलकर मनोभौतिक एवं समाजार्थिक विकास का वातावरण तैयार करता है. दूसरे शब्दों में सहविधान ‘अपूर्ण लोकतंत्र’ से ‘संपूर्ण जनतंत्र’ को प्राप्त करने की यात्रा है. इसके लिए व्यक्ति और समाज दोनों के विवेकीकरण एवं सामंजस्यपूर्ण प्रयत्न आवश्यक होते हैं. सहविधान चुनींदा व्यक्तियों अथवा घटकों के नेतृत्व में होने वाली प्रयाण यात्रा, जिसमें कुछ अतिसक्रिय लोग, लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बूते आगे बढ़कर राज्य की बागडोर संभाले रहते हैं, तथा पूरा समाज शासक और शासित में बंटा होता है—से पूरी तरह भिन्न है.

सहविधान में प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार, समाज और फिर राज्य के साथ पूरे जोश एवं उछाह से जुड़ा होता है. उसमें न कोई बड़ा होता है न छोटा. न निदेशक होता है न ही निदेशित. यदि कुछ अंतर हो भी तो वह परिस्थितिगत होता है. जिसे पाटने की भरपूर स्वतंत्रता और समूह के सदस्यों का संपूर्ण भरोसा, उस सदस्य को सहज प्राप्त होता है. दूसरी ओर संविधान में वर्णित लोक एक अमूर्त्त धारणा है. सहविधान लोकतंत्र पर जनतंत्र को वरीय बनाकर उसे लौकिक संस्कार देता है. फलस्वरूप वह राजनीति का ऐसा विधान बन जाता है, जिसमें राज की समस्त शक्तियां निचुड़कर उसकी सदस्य इकाइयों के हाथों में चली आती हैं और समाजदेश के समस्त कार्यकलाप जनसंगठनों द्वारा संचालित पूर्णतः विकेंद्रीकृत संस्थाओं और दलों द्वारा संपन्न होने लगते हैं. दूसरे शब्दों में सहविधान, संविधान में फलनेफूलने वाली विशेषज्ञ संस्कृति को जनसंस्कृति में परिवर्तित कर देने वाली युगांतरकारी यात्रा का प्रबंधकाव्य है, जिसकी रचना जनता द्वारा अपने सहज विवेक और समन्वयकारी चेतना के बल पर की जाती है.

लोकतांत्रिक समाजों में ऐसे क्षण प्रायः आते हैं जब संविधानप्रदत्त छूटों का लाभ उठाते हुए विशेषज्ञ शक्तियां निर्णायक पदों पर विराजमान हो जाती हैं और वे शेष समाज का संचालन निहित स्वार्थ के अनुसार करने लगती हैं. वे ऐसा वातावरण रचते हैं जिससे शासित जनसमाज के लिए उनके शीर्षत्व को चुनौती देना असंभवप्रायः हो जाए. परिणामस्वरूप वहां धार्मिक और समाजार्थिक स्तरीकरण पनपने लगता है. जनचेतना के अभाव में वह निरंतर बढ़ता ही जाता है. सहविधान में अधिकारों एवं कर्तव्यों का नियोजन इस प्रकार होता है कि वहां कोई भी व्यक्ति अपने पद, प्रतिष्ठा, धनसंपदा, रंग, पारिवारिक हैसियत, कुल, गौत्र, जाति, लिंग अथवा किसी भी अन्य लौकिक कारण से दूसरों पर अधिपत्य जमाने की स्थिति में नहीं रहता. प्रत्येक नागरिक इस भावना से बंधा होता है कि उसका अस्तित्व दूसरों पर निर्भर है. इसलिए अपने सुखसम्मान को पाने का एकमात्र रास्ता है कि दूसरों के सुख और सम्मान का ख्याल रखा जाए. जनसंस्कृति की यह अंकुराहट कालांतर में समानतावादी, समरस समाज की स्थापना के लक्ष्य को पाने में सहायक होती है.

सहविधान का उद्देश्य है औपचारिक सरकार के लिए अवसरों को शून्य की स्थिति में ले आना. एकएक कर उन सभी कारणों का उन्मूलन जो सरकार की सर्वस्वीकार्यता को अनिवार्य बनाते हैं. यह तभी संभव है जब लोग जागरूक और आत्मानुशासित हों. वे यह भलीभांति जानते हों कि उनके विकास, शोषण एवं उत्पीड़न से मुक्ति के लिए कोई उनकी मदद को आगे आने वाला नहीं है. इसके लिए उन्हें स्वयं प्रयास करना होगा. वर्गीय हितों को पहचानकर उन लोगों के साथ मिलजुलकर आगे बढ़ना होगा, जो उन्हीं भांति शोषित और उत्पीड़ित हैं. उन लोगों के साथ साझा करना करना जो उन्हीं के समान परिस्थितियों में जी रहे हैं. हो सकता है कि इतिहास में कुछ ऐसे उदाहरण उन्हें मिलें जब किसी महापुरुष ने वर्गीय हितों से ऊपर उठकर जनसामान्य के कल्याण के लिए ईमानदार प्रयास किए हों और उनसे समाज वास्तविक परिवर्तन की डगर पर आगे बढ़ा हो. ऐसे महापुरुषों के प्रति सम्मान व्यक्त करना हमारा कर्तव्य है. लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि महापुरुषों के उत्तराधिकारी लंबे समय तक अपने कर्तव्य और सोच के प्रति ईमानदार नहीं रह पाते. वे महापुरुष के आदर्शों का मिथकीकरण कर, उन्हें बड़ी आसानी से अपने वर्गीय हितों के समर्थन में उतार देते हैं. ऐसे माहौल में आमूल परिवर्तन की संभावना कमजोर पड़ती जाती है. जनसामान्य को यह हकीकत बहुत देर से समझ में आती है कि वास्तविक एवं स्थायी परिवर्तन तभी संभव है जब समाज और व्यवस्था का नियंत्रण उसके अपने हाथों में हो.

सहविधान का आशय ऐसी व्यवस्था से भी है जिसमें सबकी स्वैच्छिक सहभागिता हो. इस उत्तरदायी तंत्र के एक छोर पर मनुष्य होगा. अपनी स्वतंत्रता, मर्यादा, इच्छाआकांक्षा, कर्तव्यनिष्ठा से युक्त स्वतंत्र, विवेकवान इकाई. दूसरे छोर पर समाज को रखा जाएगा. विभिन्न वर्गों, क्षेत्रीय विषमताओं, संस्कृति, धनसंपदा के साथ अनेकता में एकता तथा सामूहिक विवेक की प्रतीति कराता मानव समुदाय. यहां समाज की मेरी कल्पना वैसी नहीं है जैसी इसे सामान्यतः समझा जाता है. प्रायः समाज को व्यक्ति से बड़ा माना जाता है. अपने भीतर अनेक मानव इकाइयों को समाहित रखने के कारण कदाचित वह बड़ा है भी. अनेक एकल इकाइयों के हित जुड़े होने के कारण समाजहित में व्यक्ति का बलिदान करना प्रशंसनीय कर्तव्य माना जाता रहा है. किंतु यदि स्वतंत्रता के लिहाज से देखा जाए तो सहविधान में जितनी स्वतंत्रता समाज के लिए जरूरी है, उतनी ही जरूरी व्यक्ति की स्वतंत्रता भी है. स्वतंत्रता के मामले में सहविधान में व्यक्ति दूसरे पक्ष यानी समाज से न एक अंश कम होगा, न एक अंश ज्यादा. उनकी स्वतंत्रता अपनीअपनी जगह पूर्ण, समानांतर और महत्त्वपूर्ण मानी जाएगी.

पूर्ण स्वातंत्र्य एवं सहअस्तित्व के लिए दोनों यह स्वीकार करेंगे कि उनकी स्वतंत्रता एकदूसरे पर निर्भर है. सहविधान में स्वतंत्रता की कसौटी इससे तय होगी कि वह मनुष्य की प्राकृतिक स्वच्छंदता के कितनी निकट है. समाज के गठन से पहले या समाज से मुक्त होने के बाद जितनी स्वच्छंदता की कल्पना मनुष्य अपने लिए कर सकता है, वह उसको न्यूनतम कटौती के साथ प्राप्त होनी चाहिए. न्यूनतम कटौती का मापदंड समाज और मनुष्य के सहसंबंधों को स्थायी एवं उत्पादनसक्षम बनाए रखने की आवश्यकता के अनुसार तय किया जाना चाहिए. इसमें कानून और अनुशासन के नाम पर अधिकारों में कटौती न्यूनतम होगी. सहविधान अपने प्रत्येक नागरिक से यह अपेक्षा करेगा कि वह स्वयं को नैतिकता के उच्चतम मापदंड के अनुरूप मर्यादित करें और दूसरों के साथ सहयोग करते हुए समाजकल्याण की राह पर आगे बढ़े.

संक्षेप में सहविधान ‘अपूर्ण लोकतंत्र’ से ‘संपूर्ण जनतंत्र’ तक की यात्रा होगी. इस दृष्टि से देश के इतिहास में ‘बड़ा दिन’ वह होगा जब हम ‘गणतंत्र दिवस’ के स्थान पर ‘जनतंत्र दिवस’ कहकर पुकार सकेंगे तथा प्रस्तावित ‘जनतंत्र दिवस’ ‘गणतंत्र दिवस’ की भांति केवल उत्सवी आयोजन न होकर लोगों की संस्कारचेतना का हिस्सा होगा. वह कागजी व्यवस्था तक सीमित न होकर सचमुच का जनतंत्र होगा, जिसमें नागरिक अधिकारों और कर्तव्यों की व्याख्या उस अर्थ में फिजूल मानी जाएगी क्योंकि समूहसमाज के सभी सदस्य अपनेअपने कर्तव्य एवं अधिकारों के प्रति स्वतः जागरूक होंगे तथा उन्हें पाने के लिए अंतःस्फूर्त्त प्रेरणा से प्रवृत्त भी होंगे. सहविधान का मूल मंत्र होगा—‘हितों का सामान्यीकरण, अपने समूह एवं समाज के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता तथा साझा प्रयास.’ सहविधान में शिक्षा, धर्म, राजनीति, अर्थव्यवस्था, अंतराष्ट्रीय संबंध, उत्पादन, विपणन, न्याय, कानून, प्रशासन, लोकनीति आदि का स्वरूप इस प्रकार तय होगा कि वे विकास की सार्वजनीन प्रक्रिया, मानव स्वातंत्र्य तथा उच्चतम जीवनमूल्यों द्वारा परिचालित हों.

शिक्षा

शिक्षा के सामान्यतः तीन उद्देश्य होते हैं. अपने लिए, यानी अपना बौद्धिक परिष्कार. यह सोचना कि समाज के लिए स्वयं को अधिकाधिक उपयोगी कैसे बनाया जा सकता है? फिर उस दिशा में संकल्पबद्ध हो आगे बढ़ना. दूसरा अपने ज्ञान और कौशल का समाज के हित के उपयोग. तदनुसार समाज में रहते हुए अपनी उपयोगिता सिद्ध करना तथा सामाजिक विकास को गति प्रदान करना. शिक्षा का तीसरा उद्देश्य ज्ञान को सहेजने और विस्तार देने के लिए है. ये तीनों ही भेद व्यावहारिक हैं. बारीकी से सोचा जाए तो इनमें कोई अंतर है ही नहीं. समाज और व्यक्ति दोनों ही अन्योन्याश्रित हैं. एकदूसरे पर निर्भर, एकदूसरे से बंधे हुए. इसलिए उनके हित भी आपस में जुड़े हैं. व्यक्ति द्वारा अर्जित ज्ञान में समाज का भी साझा होता है. उन लोगों का भी जो कभी समाज का हिस्सा थे; और अब केवल स्मृतियों में हैं. इस तरह व्यक्ति और समाज दोनों का हित ज्ञान की सुदीर्घ परंपरा को सहेजने और उपयुक्त विस्तार देने में है. व्यक्ति की कार्यकुशलता का अधिकतम सदुपयोग समाज में रहकर ही संभव है. शिक्षा व्यक्ति को समाज के लिए उपयोगी बनाती है. उसे वह आत्मविश्वास देती है जो अच्छे और बुरे की पहचान करने और फिर अच्छाई के मार्ग पर दृढ़तापूर्वक डटे रहने के लिए जरूरी है. अच्छे से अच्छे हलवाई की सर्वश्रेष्ठ मिठाई भी तभी अपना महत्त्व रखती है, जब उसका कोई भोग करने वाला हो. अपने लिए तो कोई रोजरोज मिठाई नहीं बना सकता! फिर अच्छी मिठाई बनाने के लिए जिस सामग्री की दरकार है वह दूसरों की मदद के बिना संभव नहीं. व्यक्ति के ज्ञान, अनुभव, बौद्धिक सामर्थ्य एवं कार्यकौशल का समाज में रहकर ही उपयोग संभव है. इसी तरह किसी समाज में अनगिनत ज्ञानीध्यानी व्यक्ति हों, खूब हुनरमंद और बेमिसाल कारीगर हों, लेकिन यदि उस समाज में तालमेल का अभाव है, यदि वे अपनी ऊर्जा एकदूसरे को आगे बढ़ाने के बजाय पीछे खींचने में खपाते हैं, तो वहां के लोगों के ज्ञानानुभव और कार्यकौशल तथा समाजीकरण की प्रक्रिया का होना निरर्थक है. यानी अच्छी शिक्षा व्यक्ति को सहयोग और समभाव के दर्शन से भी परचाती है. किंतु और व्यक्ति का समाज से संबंध एकतरफा नहीं है. व्यक्ति समाज की महत्त्वपूर्ण इकाई है. अतएव व्यक्ति की समाज से भी कुछ स्वाभाविक अपेक्षाएं होती हैं.

यदि कोई समाज अपने शिल्पकारों, श्रमजीवियों, कारीगरों यथा हलवाई, कुंभकार, बुनकर, राजमिस्त्री, बिजली मिस्त्री, बढ़ई, लुहार आदि की प्रतिभा को पहचानता है, मनस्वियों का सम्मान करता है, उनकी कार्यकुशलता के भरपूर उपयोग की योग्यता रखता है, उनके लिए पर्याप्त रोजगार अवसरों का सृजन करता है, यदि वह उनके विकास हेतु व्यापक योजनाएं बनाता है तथा सामूहिक प्रेरणाओं के सिद्धांत के आधार पर उनसे अधिकतम उत्पादकता हासिल करने में कामयाब भी रहता है तो यह उसकी व्यावहारिक सफलता मानी जाएगी. किंतु समाज के गठन का उद्देश्य मात्र इसी से पूरा नहीं हो जाता. न इससे समाज का वास्तविक विकास संभव है. यदि उसके सुधारों की प्रक्रिया यदि यहीं आकर विराम ले लेती है, तब यह मानना पड़ेगा कि वहां समाजीकरण की प्रक्रिया अभी अधूरी है. उसमें कहीं न कहीं खोट है. सदस्य इकाइयां और उनके संगठन सहविधान के दर्शन को समझने में नाकाम रहे हैं; तथा विकास के परम लक्ष्य को हासिल कर रहे जनसमूह के लिए समाजीकरण की कसौटी पर खरा उतरना अभी बाकी है.

आखिर क्या है समाजीकरण की कसौटी? इसकी ओर संकेत हम आरंभ में ही कर चुके हैं. समाज और मनुष्य का संबंध अन्योन्याश्रित है. मनुष्य समाज में अपने सुख की वृद्धि, शांति और समृद्धि के लिए सम्मिलित हुआ है. यह सोचकर कि जिन सुखसुविधाओं को वह स्वयं अर्जित नहीं कर सकता, उन्हें पाने में समाज उसकी मदद करेगा. समाजीकरण की प्रक्रिया के आरंभ में यही शर्त थी. बदले में व्यक्ति को समाज के साथ हितों का साझा करना पड़ता था और अपनी नैसर्गिक स्वच्छंदता के थोड़ेसे हिस्से की कुर्बानी देनी पड़ती थी. उस समय भी जिन्हें यह बंधन अस्वीकार्य था, वे समाज की जकड़न से दूर, यायावरी जीवन बिताते थे. देशविदेश का साहित्य उनके उदात्त किस्सों से भरा है. किंतु समाज से दूर रहने के बावजूद वे उसके औचित्य पर उंगली कभी नहीं उठाते थे. बल्कि उनका सारा चिंतन समाज के कल्याण के लिए होता था. दूसरे शब्दों में वे खुद को समाज नहीं, मात्र उसके प्रलोभनों से दूर रखते थे. समाज से विलग रहकर भी उसके विकास और कल्याण की चिंता उन्हें हर पल सताती थी. उनमें से कुछ तो इसलिए सामाजिक प्रलोभनों से दूर रहते थे, ताकि समाज को और भी सुंदर भी, और अधिक विकासोन्मुखी बना सकें. इस तरह उनका समाज से छिटके रहना भी लोककल्याण के निमित्त होता था. समाज से भौतिक दूरी बनाए सिद्ध यायावर, लोगों से परस्पर मिलजुलकर रहने तथा समन्वित विकास के लिए निरंतर प्रयासरत रहने की कामना करते थे—

तुम्हारा अध्यवसाय एक हो, तुम्हारे हृदय एक हों, तुम्हारा अंतःकरण एक हो, और तुम लोगों का संगठन अटूट हो.’1

ऋग्वेद की इस प्रार्थना में उदगाता ऋषि उपद्रष्टाओं के संगठित होने की कामना करता है. वहां स्पर्धा नहीं मैत्री और सहयोग का दर्शन है. इसे महाभारतकार ने कुछ अलग ढंग से कहा है. ‘न मानुषात श्रेष्ठतरं हि किंचित.’ सृष्टि में मनुष्य से श्रेष्ठतर कुछ भी नहीं है, कहकर वह मनुष्य को विमर्श के केंद्र में ले आता है. यह बात अलग है कि भारतीय वाङमय की, इस विरल किंतु नैतिकतावादी अवधारणाओं पर भारत में बहुत कम काम हो पाया है. उस अनुपात में तो और भी कम जितना उस दौर में चीन और प्राचीन यूनान में हुआ. पश्चिमी विचारकों में यदि हम देखें तो सुकरात, प्लेटो और अरस्तु आदि से लेकर इमानुएल कांट, स्पिनोजा, बट्रेंड रसेल, आस्कर वाइल्ड तक नैतिकतावादी चिंतन की वहां सुर्दीर्घ परंपरा रही है. चीन में भी बुद्ध के समकालीन कन्फ्यूशियस ने शिक्षा में नैतिक मूल्यों को बनाए रखने पर जोर दिया. उसका कहना था शिक्षा और ज्ञान पर सभी का समानाधिकार है. इसलिए सभी बच्चों को बगैर किसी भेदभाव के शिक्षा मिलनी चाहिए. कन्फ्यूशियस द्वारा अकेले दम पर संचालित विद्यालय में तीन हजार से ऊपर विद्यार्थी थे और वहां दर्शन, राजनीति, शिल्पकला, युद्धनीति आदि की शिक्षा दी जाती थी. ईसा से भी पांच शताब्दी पहले यह बात बहुत मायने रखती है. ‘इल्म के लिए चीन भी जाना पड़े तो जाना चाहिए.’ यह कहावत कन्फ्यूशियस जैसे महान शिक्षकों के अवदान के कारण ही बनी है. इसके पीछे उन जिज्ञासुओं का भी बड़ा योगदान था, जो कष्ट सहकर भी ज्ञान को सहेजना चाहते थे. इसके विपरीत भारत में शिक्षा पर खास वर्गों का विशेषाधिकार माना गया. ऊपर से मनुष्य की स्वाभाविक नैतिकता को धर्म से आच्छादित कर दिया गया.

व्यक्ति और समाज के बीच बेहतर तालमेल के लिए ज्ञानाधारित समाज की स्थापना कैसे संभव हो, पश्चिम में इस पर शुरू से ही विचार होता रहा है. वहां विचारकों ने लोगों के बीच रहकर शिक्षा और नीतिदर्शन के प्रसार के लिए कार्य किया. इसके लिए अपने निजी सुख यहां तक की परिवार की भी परवाह न की. यूनानी दार्शनिक सुकरात का निजी जीवन बहुत कष्टमय था. पत्नी चिड़चिड़ी थी. घर में क्लेश रहा करता था. इसके बावजूद वह अपनी शिष्यमंडली से घिरा मनुष्यता की बेहतरी की चिंता में डूबा रहता था. जिस समाज में वह रहता था, जिसके कल्याण के लिए वह हमेशा विचारमग्न रहता थाउसी ने उसे जहर पीने को विवश किया. सुकरात ने विनम्र रहकर समाज के उस अतिचार को सहा और जहर गले में उतार लिया. उस ‘शुभत्व’ की मानरक्षा के लिए जिसे वह मानवमात्र के जीवन का लक्ष्य बनाना चाहता था. सुकरात के अनुसार शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है, व्यक्ति को अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित कर उसको पाने योग्य बनाना. तदनंतर उसे अपने परमलक्ष्य यानी ‘शुभत्व’ की प्राप्ति हेतु अग्रसर करना. शुभत्व नैतिकता की चरमसीमा है, जिसमें मानवमात्र के विकास और पूर्ण कल्याण की भावना सन्निहित है.

अरस्तु ने मनुष्य को विवेकशील प्राणी कहा है. उसके अनुसार विवेक की सफलता जीवन को समग्रता से देखने में है. प्लेटो का आदर्शवाद अरस्तु की चिंतनधारा में आकर व्यावहारिक चिंतन में ढल जाता है. उसका मानना था कि शासनव्यवस्था चाहे जैसी हो, यदि वह लोककल्याण को समर्पित है, तो शुभ है. अरस्तु जीवन को समग्रता से देखता था. यह कला स्पर्धायुक्त समाजों में नहीं आती. इसलिए कि स्पर्धा समाज को बांट देती है. उसमें एकदूसरे को पीछे ढकेल, आगे निकलने की होड़ कर रहे व्यक्तियों का समूह होता है, जिनका दूसरों के सुखसुविधाओं से कोई संबंध नहीं होता. उनमें से प्रत्येक अपना स्वार्थ देखता है. दूसरों को दौड़ में पछाड़कर वह आगे निकल जाने को आतुर रहता है. सीधी तरह से काम न चले तो उसके लिए कुटिल चालें चली जाती हैं. स्पर्धा की और भी सीमाएं है. उसका लाभ हर कोई नहीं उठा सकता. उसमें बराबरी नहीं, आगेपीछे की दौड़ होती है. उस दौड़ में एक वर्ग का पीछे छूट जाना लाजिमी होता है, जिसे उस व्यवस्था की स्वाभाविक नियति मान बड़ी बेदर्दी से बिसरा दिया जाता है.

स्पर्धायुक्त समाजों में एक समूह ऐसा भी होता है, जो चाहकर भी उससे नहीं जुड़ पाता. वह खुद को अलग रखने के लिए विवश होता है. इसमें नुकसान भी उस वर्ग का अधिक होता है. इसलिए कि वह दौड़ में उतरने से पहले ही वह स्वयं को पराजित मान लेता है. स्पर्धा के एकाधिकारवादी माहौल में ऐसे लोगों के लिए न जगह होती है, न उनके प्रति किसी की सहानुभूति. ‘दौड़ में आगे रहने वाले को अधिकतम’—के सिद्धांत के चलते किसी कारणवश पीछे छूट गए समूह निरंतर पिछड़ते जाते हैं. इससे विषमता पनपती है. शिक्षा का काम ऐसे लोगों को एकजुट करना है. उनमें यह विश्वास पैदा करना है कि स्पर्धा नहीं, सहयोग के आधार पर वे आगे निकल चुके समूहों को चुनौती दे सकते हैं. उन्हें समझाया जा सकता है कि आगे निकल चुके समूह हमेशा आगे रहने वाले नहीं हैं. क्योंकि उनकी अंतहीन स्पर्धा और अंतसंघर्ष, एकदूसरे को टंगड़ी मार आगे बढ़ जाने की उनकी सहजवृत्ति, जिसे वे व्यावसायिक कौशल का नाम देते हैं—उन्हें एकदूसरे की काट करने को प्रेरित करती रहेगी. इससे शिखर पर मौजूद शक्तियों का एक न एक दिन नीचे आना तय है. आशय है कि स्पर्धायुक्त समाजों में शीर्ष पर, जहां उसके सर्वाधिक संसाधन और बौद्धिक संपदा जुटी होती हैं, वहां भी घोर अनिश्चितता का माहौल रहता है. अंतर केवल इतना है कि शीर्ष पर मौजूद लोगों के पास संसाधनों का जखीरा होता है, जरूरत पड़ने पर सरकार और अन्य संस्थाएं भी उनकी मदद को आ जाती हैं. इसलिए कड़ी स्पर्धा के बीच वे देर तक संघर्ष करने और अपनी हैसियत को बनाए रखने में सक्षम होते हैं. जबकि श्रमिक वर्ग को केवल अपने श्रम—कौशल के साथ अपने ही जैसे साधन—विपन्न लोगों से स्पर्धा करनी पड़ती है. सिवाय चंद सरकारी आश्वासनों के उनके समर्थन में कोई नहीं आता. इसलिए स्पर्धा उसके अस्तित्व के लिए चुनौती बनकर आती है. व्यावसायिक अनिश्चितता ऊपरले वर्गों को और अधिक स्वार्थी, शंकालू एवं क्रूर बनाती है. परिणामस्वरूप उनके निर्णयों में व्यावसायिक हिंसा एवं स्वार्थपरता का अनुपात बढ़ता ही जाता है. इसका नुकसान अपने श्रमकौशल के बल पर जीवनयापन करने वाले लोगों को अधिक होता है. उच्चतकनीक और स्पर्धा के चलते उत्पादनतंत्र में उनकी भूमिका निरंतर घटती जाती है.

शिक्षा का प्रमुख कार्य है ज्ञानविज्ञान को सहेजना, उसको आगे बढ़ाने के साथ मनुष्य में यह विवेक पैदा करना कि उसका अस्तित्व दूसरों के साथ सुरक्षित है. न केवल अपनी दैनिक आवश्यकताओं, बल्कि अपने अस्तित्व के लिए भी वह दूसरों के सहयोग पर निर्भर है. अतएव सहविधान के अंतर्गत मैं ऐसी शिक्षा प्रणाली का पक्ष लूंगा जो व्यावहारिक और सरलतम हो. जो लोगों में सहकारदर्शन के प्रति विश्वास लगाए तथा उनके विज्ञानबोध का विस्तार करे. मनुष्य की आंतरिक अच्छाइयों को बाहर लाकर उसे शुभत्व की डगर पर आगे ले जाए तथा नवीनतम ज्ञान की राह प्रशस्त करे. सहविधान में शिक्षा ‘शुभत्व’ के पवित्र लक्ष्य को समर्पित होगी. यहां ‘शुभत्व’ का अभिप्राय है, अधिकतम लोगों का अधिकतम कल्याण और सुख का न्यायिक विभाजन. तदनुसार सहविधान में शिक्षा का तीसरा और वास्तविक लक्ष्य होगा—लोगों के मनमस्तिष्क से आपसी द्वैत का उन्मूलन. स्पर्धा को पूर्ण तिलांजलि. समाज का मैत्री, बंधुत्व, समानता, सहयोग, सद्भाव एवं सर्वकल्याण की भावना के अनुरूप संचालन. इसके लिए व्यक्ति और समाज के बीच बराबरी का नाता अनिवार्य है.

इधर समाज में विज्ञान शिक्षा का बड़ा जोर है. सुनियोजित एवं त्वरित विकास बगैर विज्ञान और तकनीक की सहायता के संभव नहीं. समाज को अज्ञानता की रूढ़ियों से बाहर निकालने के लिए भी वैज्ञानिक शिक्षा अनिवार्य है. बच्चों को विज्ञान और तकनीक की आधुनिकतम शिक्षा मिले, सहविधान में इसकी भी माकूल व्यवस्था होगी. ऐसी विज्ञान और तकनीक के आविष्कार पर जोर दिया जाएगा, जो लोगों के श्रमकौशल का सम्मान करे, उसे विस्तार दे. उन्हें अनावश्यक श्रम तथा खतरों से बचाए. जो सस्ती तथा अधिकतम लोगों की सीधी पहुंच में हो. इतनी सरल हो कि उसे आसानी से इस्तेमाल किया जा सके. लोग अपनी जरूरत के अनुसार उसमें आवश्यक संशोधन भी कर सकें. वैज्ञानिक आविष्कार यूं तो आज भी संपूर्ण समाज की थाती कहे जाते हैं. लेकिन व्यवहार में ऐसा होता नहीं है. बौद्धिक संपदा कानून और पेटेंट जैसी पूंजीवादी व्यवस्थाएं उनपर कुछ समूहों के एकाधिकार को वैध ठहराती हैं. इससे उनका लाभ समाज के कुछ वर्गों तक सीमित होकर रह जाता है. समाज का वह वर्ग जो अपने श्रमकौशल पर जीना चाहता है, जो वास्तविक उत्पादक और सर्वहारा है, उसके लाभों से वंचित रह जाता है.

सहविधान में वैज्ञानिक आविष्कार के क्षेत्र में पेटेंट व्यवस्था के लिए कोई स्थान न होगा. सवाल उठाया जा सकता है कि यदि किसी वैज्ञानिक या इंजीनियर को उसके आविष्कार का सीधा लाभ न मिला तो वह शोध की थकाऊ स्थितियों में खुद को क्यों खपाएगा! इस बारे में जो मूलभूत भ्रांति है उसे मैं पहले ही दूर कर देना चाहता हूं. पेटेंट व्यवस्था या बौद्धिक संपदा कानून का आविष्कार किसी वैज्ञानिक के दिमाग की उपज नहीं है. वह सीधेसीधे पूंजीवाद के एकाधिकारवादी आचरण की खोज रही है. उनीसवीं शताब्दी तक के आविष्कारों में से अधिकांश वैज्ञानिकों के निजी श्रमकौशल का सुफल थे. उनके पीछे व्यक्तिगत लाभ उठाने की मंशा उतनी न थी जितनी आज है. उत्पादन व्यवस्था के पूंजीवादी ताकतों के हाथों में जाने के बाद वह निरंतर विस्तार लेती गई. यदि पेटेंट हुए भी थे तो वास्तविक शोधकर्ताओं के नाम, जिन्हें उपयुक्त शुल्क चुकाने पर कोई भी इस्तेमाल कर सकता था. औद्योगिक क्रांति ने जोर पकड़ा तो वैज्ञानिक शोधों पर भी पूंजी का एकाधिकारवादी रवैया हावी होता चला गया. बड़े औद्योगिक घरानों ने वैज्ञानिकों को मोटा वेतन देकर नौकरी पर रखना आरंभ कर दिया. इससे जो आविष्कार हुए वे पूंजीवादी ताकतों के कब्जे में चले गए. आविष्कार भी वही हुए जिनसे पूंजीपतियों को सीधा लाभ पहुंचे. उनका एकाधिकार मजबूत हो. यह एक तरह से समाज की कुल मेधा को निहित स्वार्थ के लिए कैद कर लेने जैसा उपक्रम था.

सहविधान में ऐसी स्वार्थपरता के लिए कोई स्थान न होगा. वैज्ञानिक शोधों को बढ़ावा देने के लिए वहां भी हर संभव प्रयास किए जाएंगे. और उनके शोध पर समाज का अधिकार होगा. यहां पुनः एक शंका खड़ी हो सकती है. यह कि ऊंचे वेतन और सुविधाओं के बीच काम करने के अभ्यस्त वैज्ञानिक कम परिलब्धियों के लिए क्यों तैयार होंगे? और सुविधाओं के अभाव में क्या वैज्ञानिक शोधों की गति को बनाए रखा जा सकता है. एक एक बड़ी चुनौती है. यही सहविधान की सफलता की कसौटी होगी. परंतु इसका निदान सहविधान की स्थापना की उस अवधारणा में छिपा है जो आर्थिक लाभ को सामाजिक लाभ में बदल देने पर जोर देगी. वैज्ञानिक आविष्कार भी सामाजिक लाभ की मूल सैद्धांतिकी को ध्यान में रखकर किए जाएंगे. सहविधान में बड़ी मशीनों और आधुनिकतम तकनीक के लिए भी जगह होगी. लेकिन उनपर निर्वाचित संगठनों का अधिकार होगा. वे समूह और समाज की संपत्ति माने जाएंगे. उनका उपयोग इस प्रकार किया जाएगा कि उनकी सघन उत्पादकता का लाभ समाज के सभी वर्गों को एकसमान रूप से पहुंचे. उसपर कुछ लोगों अथवा उनके समूह का एकाधिकार न हो. इसके लिए ‘आर्थिक लाभ’ के स्थान पर ‘सामाजिक लाभ’ की अवधारणा को अपनाया जाएगा.

समाज में वैज्ञानिक शिक्षा को नैतिक शिक्षा जितना ही सम्मान प्राप्त होगा. लेकिन यदि विज्ञान और नैतिक शिक्षा के बीच चयन का अवसर आन पड़े तो वहां नैतिक शिक्षा को पहले स्थान पर रखूंगा. इस डर से कि नैतिक शिक्षा का अर्थ लोग धार्मिक शिक्षा न निकालने लगें, मैं वही कहूंगा जो अन्यत्र इससे पहले भी कह चुका हूं. मेरे विचार में नैतिकता धर्म का एकमात्र संबल है. अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए नैतिकता को धर्म के सहारे की आवश्यकता नहीं पड़ती. जबकि धर्म नैतिकता के बगैर केवल कर्मकांडीय टीमटाम है. धर्म से अध्यात्म तक की यात्रा को संभव बनाने के लिए यह कोशिश की जाएगी की समाज में पर्याप्त वैज्ञानिक बोध हो. यह लक्ष्य दर्शन और विज्ञान की नियमित शिक्षा द्वारा प्राप्त किया जा सकता है.

नैतिकता को विज्ञान से ऊपर रखने का निर्णय भी सोचाविचारा है. सहविधान में नागरिक स्वतंत्र, विवेकवान इकाई के रूप में, सामान्य नैतिकता और कल्याणभावना के साथ एकजुट होकर काम करेंगे. इसके फलस्वरूप वैज्ञानिक शोधों में कमी नहीं आएगी. यदि एकाध अवसर हाथ से चला भी जाता है तो सहयोग, समन्वय और संगठनसामर्थ्य के बल पर उस कमी को पूरी कर लिया जाएगा. यदि नैतिकता न रही तो वैज्ञानिक आविष्कारों का दुरुपयोग होगा. लोग उनका अपने स्वार्थानुरूप उपयोग करने के लिए स्वतंत्र होंगे. वह समाज में भयानक समाजार्थिक स्तरीकरण का कारण बनेगा. समाज में ऊंचनीच की खाइयां बनेंगी. ऐसे में यदि युद्ध हुआ तो वह पूरी दुनिया को शताब्दियों पीछे ढकेल देगा. इसलिए शिक्षा का नैतिक होना, कानून की परिभाषा में न्यायसंगत होने से कहीं ज्यादा जरूरी है. मनुष्यता का महान शिक्षक कन्फ्यूशियस नैतिक शिक्षा पर जोर देते हुए कहता है—

कानून एवं दंडप्रणाली द्वारा शासित राज्यों में लोग केवल इतना जानते हैं कि खुद को कानूनी अड़चनों से कैसे बचाया जाए. ऐसा करते समय उन्हें शर्म भी नहीं आती. जबकि ‘सद्गुण’ एवं ‘नैतिकता’ प्रधान शिक्षा पाए नागरिक अनजानी गलती पर भी न केवल ग्लानिबोध से भर जाते हैं, बल्कि खुद को स्वयं सुधारना भी जानते हैं.’2

जन्म से सभी बालक एकसमान होते हैं. सभी का मस्तिष्क कोरी स्लेट जैसा होता है. शिक्षा के आधार पर उनके अनुभव और ज्ञान का दायरा बंटता है. इसलिए शिक्षा को लेकर किसी भी प्रकार का पक्षपात, एकाधिकार अथवा मनमानी, चाहे किसी भी वर्ग की क्यों न हो—अस्वीकार्य होगी. सहविधान में सभी वर्गों के लिए एक समान शिक्षा की व्यवस्था होगी. इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक विद्यार्थी को इतिहास पढ़ना पड़ेगा; या कविता में रुचि रखने वाले विद्यार्थी को गणित में अपना दिमाग खपना ही पड़ेगा. इसका बस इतना अभिप्राय है कि जो विद्यार्थी इतिहास पढ़ना चाहता है, उसको उस विषय में शिक्षा और रोजगार के उतने ही अवसर प्राप्त होंगे, जितने उस विद्यार्थी को जो अपनी रुचि के अनुसार विज्ञान पढ़ा है—प्राप्त हैं. लेकिन समाज, राजनीति, दर्शन और नैतिक शिक्षा सभी के लिए अनिवार्य होगी. शिक्षा का ढांचा इस प्रकार बनाया जाएगा ताकि वह लोगों को संगठित के स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाए और सम्मिलित हितों के लिए कार्य करने को प्रेरित करे. इसके लिए ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता होगी, जो बिना किसी गुरुताबोध के पढ़ाने के लिए आगे आएं. कक्षा में आकर जो स्वयं को विद्यार्थी ही समझें और छात्रों को ज्ञान बांटने के साथसाथ उनसे कुछ ग्रहण करने का साहस भी दिखला सकें. जो विद्यार्थियों को समझाएं कि मनुष्य सामान्यतः भला होता है. यदि उसमें कुछ विचलन है तो उसके लिए वह अकेला जिम्मेदार नहीं. उसका परिवेश भी समानरूप से जिम्मेदार है. इसलिए यही न्याय संगत है कि स्थितियों के समग्र विवेचन के बाद निर्णय लिया जाए. उन्हें यह भी समझाया जाना चाहिए कि लोकहित के कार्य को आगे बढ़ाना उसपर बातचीत करने से कहीं ज्यादा जरूरी है. अतीत में इस बारे में बातें अधिक होती रही हैं. वास्तविक काम बहुत कम हो पाया है. इससे विद्यार्थियों की समाज के प्रति अनुराग में वृद्धि होगी, साथ ही उनमें कर्तव्यनिष्ठा भी जगेगी.

शिक्षार्जन के दौरान विद्यार्थी को जाति, धर्म, गौत्र वर्ण आदि की कम से कम शिक्षा मिलनी चाहिए. उसे निरंतर यह बोध होना चाहिए कि ‘अपने लिए’ और ‘समाज के लिए’ शिक्षा की अवधारणा में कोई व्यावहारिक अंतर नहीं है. देखा जाए तो दोनों एक ही सिक्के के दो पक्ष हैं. मनुष्य शिक्षा ग्रहण करता है तो उसकी समाज के लिए उपयोगिता बढ़ जाती है. उधर समाज का भी दायित्व है कि वह बालक को वह सब सिखाए जो उसके लिए जरूरी हो. ताकि उसका बहुआयामी विकास संभव हो सके. साथ में यह व्यवस्था भी करे कि शिक्षा की समाप्ति के बाद उसको रोजगार की तलाश में भटकना न पड़े. दूसरी ओर विद्यार्थी का दायित्व है कि वह खुद को समाज के लिए उपयोगी बनाए. ध्यान रखे कि समाज भले ही उसका स्वैच्छिक वरण हो, शताब्दियों से समाज के साथ रहते आए मनुष्य के लिए आज वह एक अनिवार्यता है. इस कारण कुछ विद्वान अरस्तु की परिभाषा, ‘मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है’ को संशोधित कर, ‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’ कहने लगे हैं. यह समाज और मनुष्य के गाढे़ संबंधों का प्रतीक है. शिक्षा मानवीकरण की सीढ़ी, आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है. बालक के लिए अनिवार्य शिक्षा उसके समाजीकरण की आरंभिक जरूरत भले हो, किंतु यह बड़ों के लिए उतनी ही जरूरी है जितनी बच्चों को किशोरों के लिए. इसलिए आवश्यक है कि शिक्षा को ताउम्र चलने वाली ज्ञार्नाजन की सतत प्रक्रिया के रूप में अपनाया जाए. कन्फ्यूशियस कुछ ऐसा ही चाहता था—

‘‘कन्फ्युशियस चीन के प्रांत ‘वी’ की यात्रा पर था. उसका शिष्य रेन यू उसकी गाड़ी हांक रहा था. वी एक घनी आबादी वाला शहर था. इतने बड़े शहर में पहुंचकर रेन ने हैरानी से कन्फ्युशियस से पूछा—

गुरुदेव! शहर की इतनी सघन आबादी में भला हम क्या करेंगे?’

लोगों को समृद्धि की ओर ले जाएंगे.’ कन्फ्यूशियस ने नपातुला जवाब दिया. रेन यू को अपने गुरु पर विश्वास था. किंतु उसके दिमाग में अब भी एक शंका थी. इसलिए उसने आगे पूछा—

एक दिन जब शहर के सभी नागरिक समृद्ध हो जाएंगे, तब हम क्या करेंगे.’

तब हम उन्हें शिक्षित करेंगे.’3

कन्फ्यूशियस शिक्षा को नैतिक आयोजन मानता था. उसने परंपरा का भी पक्ष लिया था, लेकिन इस तरह कि लोग उसके पीछे अंतनिर्हित सत्य से परिचित हो सकें. भारतीय पंरपरा में शिक्षा को विशिष्ट वर्गों तक सीमित रखा गया है. शिक्षा के लिए विद्यार्थी की प्रतिभा और रुचि नहीं, उसका वर्ग देखा जाता था. लंबे समय तक यही नीति भारतीय शिक्षा की दिशादशा को तय करती रही. आधुनिक भारत के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले गांधी भी इसी के समर्थक थे. ‘शिक्षा का आश्रमी यथार्थ’ के नाम पर वर्णव्यवस्था का समर्थन करते हुए वे लिखते हैं—

इस काल में मातापिता का धंधा यदि निश्चित रूप से मालूम हो, तो बच्घ्चे को उसी धंधे का ज्ञान मिलना चाहिये; और उसे इस तरह तैयार किया जाय कि वह अपने बापदादा के धंधे से जीविका चलाना पसंद करे. यह नियम लड़की पर लागू नहीं होता.’4

एक कहावत है कि उत्पीड़ित को उसकी दुर्दशा का एहसास करा दो, वह बगावत कर देगा. दुरवस्था की जानकारी और उसके फलस्वरूप जन्मे असंतोष ने कई मानवीय आविष्कारों और क्रांतिकारी विचारों की राह प्रशस्त की है. मगर गांधी के विचार इस मामले में भिन्न थे. यहां वे परंपरा का दामन छोड़ नहीं पाते. गोया वे नहीं चाहते थे कि गरीब अपनी दुरवस्था और उसके कारणों को समझे. इसलिए अन्यत्र लिखते हैं—

शिक्षा तालीम का अर्थ क्या है?….एक किसान ईमानदारी से खुद खेती करके रोटी कमाता है. उसे मामूली तौर पर दुनियावी ज्ञान है. अपने मां बाप के साथ कैसे बरतना, अपनी स्त्री के साथ कैसे बरतना? बच्चों से कैसे पेश आना? जिस देहात में वह बसा हुआ है वहां उसकी चालढाल कैसी होनी चाहिये? इस सबका उसे काफी ज्ञान है. वह नीति के नियम समझता है और उनका पालन करता है. लेकिन वह अपने दस्तखत करना नहीं जानता. इस आदमी को आप अक्षर ज्ञान देकर क्या करना चाहते है? उसके सुख में आप कौनसी बढ़ती करेंगे? क्या उसकी झोपड़ी या उसकी हालत के बारे में आप उसके मन में असंतोष पैदा करना चाहते हैं? ऐसा करना हो तो भी उसे अक्षर ज्ञान देने की जरूरत नहीं है. पश्चिम के असर के नीचे आकर हमने यह बात चलायी है कि लोगों को शिक्षा देनी चाहिये, लेकिन उसके बारे में हम आगेपीछे की बात सोचते ही नहीं.’5

भारत में धर्म महत्त्वपूर्ण है. वह लोगों की जीवनशैली और दिनचर्या को प्रभावित करता है. यदि सत्तरअस्सी वर्ष के बूढ़े व्यक्ति तमाम कष्ट सहकर दुर्गम यात्राओं को निकल पड़ते हैं, कड़क सर्दी में भी गंगाजल में स्नान करने की हिम्मत जुटा पाते हैं, तो साफ है कि उनकी आस्था उन्हें इसके लिए प्रेरित करती है. इसलिए धर्म के सवाल की एकाएक उपेक्षा संभव नहीं है. इसके बावजूद जहां तक धार्मिक शिक्षा का प्रश्न है, समाज में वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना और कल्याण के समविभाजन के लिए उसको फिलहाल तिलांजलि देनी होगी. तब शिक्षा का धर्म से नाता क्या हो? इसका सीधासा उत्तर है, निषेध का, या फिर धर्म की अवधारणा में आमूल परिवर्तन का. इसे गहराई में जानने के लिए हम एक प्रतिप्रश्न का सहारा लेते हैं—‘क्या धर्म शिक्षा से जुड़कर ज्ञान की परंपरा को विस्तार देने में सक्षम होगा? क्या वह जिज्ञासा को बढ़ावा देता है? यदि ईमानदारी से देखें तो धर्म ऐसा नहीं करता. हम सब जानते हैं कि धर्म और ज्ञान के नवीकरण का दूर तक संबंध नहीं है, ज्ञान की खोज का सिलसिला संदेह से आरंभ होता है; और संदेह धर्म की निगाह में ‘पाप’ है. परंपरागत धर्म में संदेह के लिए कोई स्थान नहीं है. न वह जिज्ञासा को महत्त्व देता है. बल्कि आस्था के नाम पर वह दैनंदिन अनुभव के दौरान में जन्मते रहनेवाले संदेहों पर पर्दा डालने का काम करता है. शंका करना वहां गुरुअपराध है. धर्म में जो जितना पुराना है, परिवर्तन से दूर है, वह उतना ही सम्मानेय है. दूसरी ओर वास्तविक शिक्षा मनुष्य का नित नवीकरण करती है. वह मानवीय विवेक की ऊंचाइयों की ओर सतत आरोहण है. जबकि धर्म जड़ता है, ठहराव है. भ्रांति है. यथास्थिति बनाए रखने के लिए प्रभुवर्ग का षड्यंत्र, झूठी दिलासा है.

आस्था की नींव पर खड़े धर्म से, यदि कोई व्यक्तिस्वातंत्र्य की दुहाई देते हुए उससे चिपका रहना चाहता है तो उसी तक सीमित रखने में भलाई है. ऐसे लोगों के लिए शिक्षक का काम है, उसको धर्म के स्थान पर अध्यात्म से जोड़ने को प्रेरित करे. यह काम आसान नहीं है. जो लोग शताब्दियों से धर्म से चिपके हुए हैं, उनके लिए एकाएक अध्यात्म की डगर पकड़ना कठिन हो सकता है. ऐसे लोगों को धीरेधीरे उसकी ओर लाना होगा. उसका पहला चरण यह हो सकता है कि धर्म के नाम पर, कर्मकांड के नाम पर वे जो भी करना चाहते हैं, उसे अपने बूते पर करें. मसलन यदि किसी को ‘सत्यनारायण की कथा’ में धर्म का पालन नजर आता है, तो वह इसी से शुरुआत कर सकता है. बाजार से इस कथा की पुस्तक लेकर उसको पढ़नासमझना शुरू करे. यदि उससे जुड़े कर्मकांडों को जरूरी मानता है तो बिना किसी मध्यस्थ को बीच में लाए उस अनुष्ठान को स्वयं करने की कोशिश करे. खुद नहीं पढ़ सकते तो किसी परिजन या पड़ोसी से पढ़वाए. परंपरागत पुरोहितों को बीच में न आने दे. शब्द से जुड़ाव का सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो थम नहीं पाएगा. उसकी जिज्ञासा उसको दूसरी पुस्तकों की ओर ले जाएगी. जिससे धर्म के नाम पर व्याप्त रूढ़ियों और निरर्थक कर्मकांडों से मुक्ति की राह प्रशस्त होगी.

संविधान लोकविकास के नाम पर शिक्षा के प्रति वचनबद्ध होता है. किंतु शिक्षा कैसी हो, इस बारे में बहुसंख्यक समाज की राय की प्रायः उपेक्षा होती है. उसका स्वरूप विशेषज्ञों द्वारा तय किया जाता है, जो अपने वर्गीय हितों की ओर ज्यादा समर्पित होते हैं. कदाचित यह जरूरी भी है. लेकिन विशेषज्ञों के हाथों में पड़कर शिक्षा का प्रभाव एकतरफा रह जाता है. व्यक्ति अपनी और स्थानीय समुदाय की विशेषताओं को समझ ही नहीं पाता. इससे उसके भीतर अविश्वास बढ़ने लगता है. इसलिए वह समाजकल्याण के कार्यों से मुंह चुराने लगता है. जबकि सामाजिक विकास संबंधी कार्यों में व्यक्ति की हिस्सेदारी आत्मस्फूर्त्त होनी चाहिए. दबाव की स्थिति मनुष्य को भविष्य के प्रति शंकालु बनाती है. नैतिक दायरे से बाहर आकर वह केवल स्वार्थसिद्धि का संकल्प मन पर लादे रखता है. औनिषदिक चिंतन का निचोड़ हैं—‘सर्व भूत हिते रतः, कृणवंतो विश्वमार्यम्।’ समस्त प्राणियों के कल्याण की वांछा रखते हुए विश्व को श्रेष्ठ बनाने का संकल्प लें.’ सहविधान में शिक्षा ज्ञान की इसी उदात् भावना और संकल्प से अनुप्रेरित होगी.

क्रमश:….

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका :

 1. समानी व आकूति समाना हृदयानि वः।

समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।।—ऋग्वेद, अष्ठम अध्याय, दशम मंडल, 191/4.

2. Regulated by the edicts and punishments, the people will know only how to stay out of t rouble but will not have a sense of shame. Guilted by virtues and the rites, they will not only have a sense of shame but also know how to correct their mistakes of their own accord.Analects of Confucius, pp. 13, Beijing Foreign Languages Printing House, 1994.

3. When Confucius went to the state of Wei, Ran You (one of Confucius’ student) drove the carriage for him. Confucius said, ‘What a large population Wei has?’ Ran You asked, ‘what should be done with such a large population?’ Confucius answered, ‘Enrich the people.’ Ran You went on asking. ‘What should be done when they have become rich?’ Confucius answered, ‘Educate them.’ Analects of Confucius, pp. 233-234.

4. महात्मा गांधी, मेरे सपनों का भारत.

5. वही.

जैन और बौद्धदर्शन में समाजवादी चेतना

सामान्य

हितोपदेश की एक सुभाषित है : अयं निज परोवेति गणना लघुचैतसाम्। उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम् यानी ‘यह अपना है, वह पराया हैयह सोच क्षुद्र वृत्ति की उपज है. उदारचरितों, सज्जनों के लिए तो पूरा विश्व एक परिवार के समान है, पृथ्वी पर रहने वाले सभी नरनारी उनके परिजन हैं.’जिस दौर की यह उक्ति है वह मानवीय मेधा के प्रस्फुटन का था. जैन और बौद्ध दर्शन का उदय उससे करीब तीन सौ वर्ष पहले हो चुका था. जिन दिनों पंचतंत्रादि ग्रंथों की रचना हुई ये दोनों दर्शन देश की सीमाओं से बाहर निकलकर दुनिया को अपनी कल्याणकारी मेधा से प्रभावित कर रहे थे. उल्लेखीय है कि बौद्ध दर्शन का उद्भव वैदिक धर्म की प्रतिक्रिया में हुआ था. वेदों में बहुदेववाद, कर्मकांड और युद्धों का इतना विशद् वर्णन है कि उनके आगे उनकी दार्शनिक, नैतिक, आध्यात्मिक चिंतनधारा म्लान दिखने लगती है. इसलिए वे तत्वचिंतन के नाम पर कर्मकांड, धर्म के बजाय पाखंड, नीति के स्थान पर ऊंचनीच और आडंबर रचते हुए नजर आते हैं. पुरोहित वर्ग उनके माध्यम से धर्मदर्शन की स्वार्थानुकूल और मनमानी व्याख्याएं थोपने का प्रयास करता है. राजनीति के सहयोग से वह इस धृष्टता में कामयाब भी होता है. धर्म और राजसत्ता परस्पर मिलकर लोगों के शोषण के लिए नएनए विधान गढ़ते हैं. समाजार्थिक शोषण का यह सिलसिला लगभग पांच शताब्दियों तक निरंतर चलता है. ऐसा भी नहीं है कि शेष समाज शोषण को अपनी नियति मान चुका था. बल्कि जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, ब्राह्मणवाद का विरोध उसके आरंभिक दिनों से ही होने लगा था. मगर उसको रचनात्मक दिशा देने का काम किया था, जैन और बौद्ध दर्शन ने. इन दोनों दर्शनों ने वेदों की बुद्धिवाद की उस धारा को नई एवं युगानुकूल दिशा देने का काम किया, जो कर्मकांड और मिथ्याडंबरों के बीच अपनी पहचान लगभग गंवा चुकी थी.

जैन और बौद्ध धर्म के प्रवर्त्तक क्रमशः महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध, ईसा से छह शताब्दी पहले, क्षत्रिय कुल में जन्मे थे. अपनेअपने दर्शन में दोनों ने ही कर्मकांड और आडंबरवाद का जमकर विरोध किया था. दोनों ही यज्ञों में दी जाने वाली पशुबलियों के विरुद्ध थे. दोनों ने शांति और अहिंसा का पक्ष लिया था, और भरपूर ख्याति बटोरी. जैन और बौद्ध, दोनों ही दर्शनों को भारतीय चिंतनधारा में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. इनमें से जैन धर्म अहिंसा को लेकर अत्यधिक संवेदनशील था, जबकि जीवन को लेकर बुद्ध का दृष्टिकोण व्यावहारिक था. अहिंसा के प्रति अत्यधिक आग्रहशीलता के कारण जैन दर्शन प्रचारप्रसार के मामले में बौद्ध दर्शन से पिछड़ता चला गया. व्यावहारिक होने के कारण बौद्ध दर्शन को उन राजाओं आ समर्थन भी मिला जो ब्राह्मणवाद से तंग हो चुके थे; और उपयुक्त विकल्प की तलाश में थे.

गौतम बुद्ध ने कर्मकांड के स्थान पर ज्ञानसाधना पर जोर दिया था. पशुबलि को हेय बताते हुए वे अहिंसा के प्रति आग्रहशील बने रहे. वेदवेदांगों में आत्मापरमात्मा आदि को लेकर इतने अधिक तर्कवितर्क और कुतर्क हो चुके थे कि बुद्ध को लगा कि इस विषय पर और विचार अनावश्यक है. इसलिए उन्होंने आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि विषयों को तात्कालिक रूप से छोड़ देने का तर्क दिया. उसके स्थान पर उन्होंने मानवजीवन को संपूर्ण बनाने पर जोर दिया. समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए उन्होंने पंचशील का सिद्धांत दिया. जिसमें पहला शील है, अहिंसा. जिसके अनुसार किसी भी जीवित प्राणी को कष्ट पहुंचाना अथवा मारना वर्जित कर दिया गया था. दूसरा शील था, अचौर्य. जिसका अभिप्राय था कि किसी दूसरे की वस्तु को न तो छीनना न उस कारण उससे ईर्ष्या करना. तीन शील सत्य था. मिथ्या संभाषण भी एक प्रकार की हत्या है. सत्य की हत्या. इसलिए उससे बचना, सत्य पर डटे रहना. तीसरे शील के रूप में तृष्णा न करना शामिल था. व्यक्ति के पास जो है, जो अपने संसाधनों द्वारा अर्जित किया गया, उससे संतोष करना. आवश्यकता से अधिक की तृष्णा न करना. इसलिए कि यह पृथ्वी जरूरतें तो सबकी पूरी कर सकती है, मगर तृष्णा एक व्यक्ति की भी भारी पड़ सकती है. पांचवा शील मादक पदार्थों के निषेद्ध को लेकर है. पंचशील को पाने के लिए उन्होंने अष्ठांगिक मार्ग बताया था, जिसमें उन्होंने सम्यक दृष्टि(अंधविश्वास से मुक्ति), सम्यक वचन(स्पष्ट, विनम्र, सुशील वार्तालाप), सम्यक संकल्प(लोककल्याणकारी कर्तव्य में निष्ठा, जो विवेकवान व्यक्ति से अभीष्ट होता है), सम्यक आचरण(प्राणीमात्र के साथ शांतिपूर्ण, मर्यादित, विनम्र व्यवहार), सम्यक जीविका(किसी भी जीवधारी को किसी भी प्रकार का कष्ट न पहुंचाना), सम्यक परिरक्षण(आत्मनियंत्रण और कर्तव्य के प्रति समर्पण का भाव), सम्यक स्मृति(निरंतर सक्रिय एवं जागरूक मस्तिष्क) तथा सम्यक समाधि(जीवन के गंभीर रहस्यों पर सुगंभीर चिंतन) पर जोर दिया था.

बुद्ध की चिंता थी कि किस प्रकार मानवजीवन को सुखी एवं समृद्ध बनाया जाए. सुख से उनका अभिप्राय केवल भौतिक संसाधनों की उपलब्धता से नहीं था. इसके स्थान पर वे न केवल मानवजीवन के लिए सुख की सहज उपलब्धता चाहते थे, बल्कि समाज के बड़े वर्ग के लिए सुख की समान उपलब्धता की कामना करते थे. यह वैदिक ब्राह्मणवाद के समर्थकों से एकदम भिन्न था. जिन्होंने परलोक की काल्पनिक भ्रांति के पक्ष में भौतिक सुखों की उपेक्षा की थी, जबकि उनका अपना जीवन भोग और विलासिता से भरपूर था. यही नहीं वर्णाश्रम व्यवस्था के माध्यम से उन्होंने समाज के बहुसंख्यक वर्गों, जो मेहनती और हुनरमंद होने के साथसाथ समाज के उत्पादन को बनाए रखने के लिए कृतसंकल्प थे, सुख एवं समृद्धि से दूर रखने की शास्त्राीय व्यवस्था की थी. शूद्र कहकर उसको अपमानित करते थे. और इस आधार पर उन्हें अनेक मानवीय सुविधाओं से वंचित रखा गया था.

उल्लेखनीय है कि वेदों के आडंबरवाद का विरोध उन्हीं दिनों शुरू हो चुका था. उस समय के महानतम विद्वान कौत्स तो वैदिक ऋचाओं को शब्दाडंबर मात्र मानते थे. समाज का बड़ा वर्ग वैदिक परंपराओं का खंडन करता था. इस कारण वेद समर्थकों और उनके विरोधियों के बीच घमासान भी होते रहते थे. जिनसे कूटनीति और छल के कारण ब्राह्मणवादियों को विजय प्राप्त हुई थी. दरअसल यह बुद्ध ही थे जिन्होंने दर्शन को वायवी आडंबर से बाहर लाकर आचरण और व्यवहार के धरातल पर लाकर अवस्थित किया था. उन्होंने दर्शन को निरर्थक और अनुपयोगी प्रश्नों के चक्र से बाहर लाकर जीवन से जोड़ा. मानव मन की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं के सापेक्ष नैतिकता को केंद्र में लेकर आए. पंडितों और पुरोहितों से अलग भाषा अपनाते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि धर्म और दर्शन, दोनों का उद्देश्य इस विश्व का पुनर्निर्माण करना है, ब्रह्मांड की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं. आज प्रयोगों द्वारा सिद्ध हो चुका है कि ब्रह्मांड की व्याख्या वैज्ञानिक नियमों द्वारा ही सटीक ढंग से की जा सकती है. नैतिकता से कटा हुआ धर्म महज आडंबर है. विरोधियों की आलोचना की परवाह न करते हुए उन्होंने आगे कहा कि सृष्टि का केंद्र मनुष्य है, न कि ईश्वर. धर्म के बारे में उनका कहना था कि उसका केंद्रविषय नैतिकता है. वे जीवन में दुःख को अवश्यंभावी मानते थे. साथ ही उनका मानना था कि दुःखों से मुक्ति संभव है. इसके लिए जीवन के प्रति संपूर्ण समर्पण अनिवार्य है.

पुरोहितों और पंडितों के चंगुल से आमजन को बचाने के लिए उन्होंने अष्ठांग मार्ग का प्रवर्त्तन किया. जीवन की पवित्रता के लिए उन्होंने उसको संपूर्णता के साथ अपनाने की सलाह दी. बातबात पर पुरोहितों और धर्माचार्यों की शरण में जाने वाले लोगों को उन्होंने नेक सलाह दी—अप्प दीपो भवः! अपना दीपक स्वयं बनो. उन्होंने जोर देकर कहा कि सुख केवल शीर्षस्थ वर्गों की बपौती नहीं है. गृहस्थ के लिए धनार्जन न तो पाप है, न कोई अभिशाप. जीवन के प्रति मध्यमार्गी दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने धर्नाजन को गृहस्थ के लिए अनिवार्य उपक्रम माना. वे पहले धर्माचार्य थे, जिन्होंने गणतंत्र का पक्ष लिया, यह उस युग में एकदम क्रांतिकारी था. परिणाम यह हुआ कि सांसारिक सुखों के प्रति जनसामान्य पापबोध लगातार घटने लगा. शिल्पकर्मियों को शूद्र का दर्जा देकर उन्हें तरहतरह से प्रताड़ित किया जाता था. बौद्ध धर्म में जातिवर्ण के लिए कोई स्थान न था. बल्कि सभी के लिए सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार था. इसलिए जातीय उत्पीड़न का शिकार रही जातियां बड़ी तेजी से बौद्धधर्म में शामिल होने लगीं. देखते ही देखते वह देश की सीमाएं पार कर, विदेशी भूमियों पर अपनी पकड़ बनाता गया.

बुद्ध स्वयं क्षत्रिय थे. उनके समकालीन महावीर स्वामी भी क्षत्रिय ही थे. दोनों ने ही राजनीतिक सुखसुविधाओं को ठुकराकर अध्यात्मचिंतन का मार्ग चुना था. राजघराना छोड़कर उन्होंने चीवर धारण किया था. इसलिए बाकी वर्गों में विशेषकर उन लोगों में जो ब्राह्मणों और उनके कर्मकांडों से दूर रहना चाहते थे, जैन और बौद्धधर्म की खासी पैठ बनती चली गई. मगर सामाजिक स्थितियां बौद्ध धर्म के पक्ष में थीं. इसलिए कि एक तो वह व्यावहारिक था. दूसरे जैन दर्शन में अहिंसा आदि पर इतना जोर दिया गया था कि जनसाधारण का उसके अनुरूप अपने जीवन को ढाल पाना बहुत कठिन था. यज्ञों एवं कर्मकांडों के प्रति जनसामान्य की आस्था घटने से उनकी संख्या में गिरावट आई थी. उनमें खर्च होने वाला धर्म विकास कार्यों में लगने लगा था. पहले प्रतिवर्ष हजारों पशु यज्ञों में बलि कर दिए जाते थे. महात्मा बुद्ध द्वारा अहिंसा पर जोर दिए जाने से पशुबलि की कुप्रथा कमजोर पड़ी थी. उनसे बचा पशुधन कृषि एवं व्यापार में खपने लगा. शुद्धतावादी मानसिकता के चलते ब्राह्मण समुद्र पार की यात्रा को निषिद्ध और धर्मविरुद्ध मानते थे. बौद्ध धर्म में ऐसा कोई बंधन न था. इसलिए अंतरराज्यीय व्यापार में तेजी आई थी. चूंकि अधिकांश राजाओं द्वारा अपनाए जाने से बौद्ध धर्म राजधर्म बन चुका था, इसलिए युद्धों में कमी आई थी, जो राजीनितिक स्थिरता बढ़ने का प्रमाण थी. व्यापारिक यात्राएं सुरक्षित हो चली थीं. जिससे व्यापार में जोरदार उछाल आया था.

ये सभी स्थितियां जनसामान्य के लिए भले ही आह्लादकारी हों, मगर ब्राह्मणधर्म के समर्थकों के लिए अत्यंत अप्रिय और हितों के प्रतिकूल थीं. इसलिए उसका छटपटाना स्वाभाविक ही था. अतएव महात्मा बुद्ध को लेकर वे ओछे व्यवहार पर उतर आए थे. बुद्ध का जन्म शाक्यकुल में हुआ था, जो वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार क्षत्रियों में गिनी जाती थी. ब्राह्मणों ने उन्हें शूद्र कहकर लांछित किया, जिसको बुद्ध इन बातों से अप्रभावित बने रहे. दर्शन को जनसाधारण की भावनाओं का प्रतिनिधि बनाते हुए उन्होंने दुःख की सत्ता को स्वीकार किया. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि दुःख निवृत्ति संभव है. उसका एक निर्धारित मार्ग है. दुःख स्थायी और ताकतवर नहीं है. बल्कि उसको भी परास्त किया जा सकता है.

बुद्ध का दर्शन वर्जनाओं का दर्शन है. सबसे पहले वह वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रहार करते हैं. उस व्यवस्था पर प्रहार करते हैं, जो ब्राह्मणों को विशेषाधिकार संपन्न बनाती है. पुरोहितवाद की जरूरत को नकारते हुए वे कहते हैं‘अप्प दीपो भव!’ अपना दीपक आप बनो. तुम्हें किसी बाहरी प्रकाश की आवश्यकता नहीं हैं. किसी मार्गदर्शक की खोज में भटकने से अच्छा है कि अपने विवेक को अपना पथप्रदर्शक चुनो. समस्याओं से निदान का रास्ता मुश्किलों से हल का रास्ता तुम्हारे पास है. सोचो, सोचो और खोज निकालो. इसके लिए मेरे विचार भी यदि तुम्हारे विवेक के आड़े आते हैं, तो उन्हें छोड़ दो. सिर्फ अपने विवेक की सुनो. करो वही जो तुम्हारी बुद्धि को जंचे. उन्होंने पंचशील का सिद्धांत दुनिया को दिया. उसके द्वारा मर्यादित जीवन जीने की सीख दुनिया को दी. कहा कि सिर्फ उतना संजोकर रखो जिसकी तुम्हें जरूरत है. तृष्णा का नकारहिंसा छोड़, जीवमात्र से प्यार करो. प्रत्येक प्राणी को अपना जीवन जीने का उतना ही अधिकार है, जितना कि तुम्हें है. इसलिए अहिंसक बनो. झूठ भी हिंसा है. इसलिए कि वह सत्य का दमन करती है. झूठ मत बोलो. सिर्फ अपने श्रम पर भरोसा रखो. उसी वस्तु को अपना समझो जिसको तुमने न्यायपूर्ण ढंग से अर्जित किया है. पांचवा शील था, मद्यपान का निषेध. बुद्ध समझते थे वैदिक धर्म के पतन के कारण को. उन कारणों को जिनके कारण वह दलदल में धंसता चला गया. दूसरों को संयम, नियम का उपदेश देने वाले वैदिक ऋषि खुद पर संयम नहीं रख पा रहे थे. अपने आत्मनियंत्रण को खोते हुए उन्होंने खुद ही नियमों को तोड़ा. मांस खाने का मन हुआ तो यज्ञों के जरिये बलि का विधान किया. कहा कि ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’और अपनी जिव्हा के स्वाद के लिए पशुओं की बलि देते चले गए. नशे की इच्छा हुई तो सोम को देवताओं का प्रसाद कह डाला और गले में गटागट मदिरा उंडेलने लगे. ऐसे में धर्म भला कहां टिकता. कैसे टिकता!

बुद्ध पहले महात्मा थे, साहचर्य का पाठ दुनिया को पढ़ाया. उससे पहले आश्रम सहजीवन की पहचान हुआ करते थे. लेकिन वहां गुरु का नाम चलता था. सारे आश्रम गुरु के नाम से जाने जाते थे. वौद्ध विहार किसी एक भिक्षु की संपत्ति नहीं थे. वे सबसे साझे थे. बुद्ध का कहना था कि जो है, सबका है. जितना है, उसको मिलबांटकर उपयोग करो. उनके भिक्षुसंघ की व्यवस्था ही ऐसी थी. प्रारंभ में गौतम बुद्ध का शिष्यत्व धारण करने वाले अधिकांश भिक्षु राजपरिवारों से आए थे. संघ के नियमानुसार प्रत्येक भिक्षु को चीवर धारण करना पड़ता था. जिसका अर्थ है जीर्णशीर्ण परिधान. उस समय आम आदमी के यही वस्त्र थे. वह मेहनत मजदूरी करता और अपने राजा के लिए कमाता था. जमीन या संपत्ति पर उसका अधिकार न था. वह राजा की मानी जाती थी. लगान चुकाने के बाद जो बचता उससे वह सिर्फ आधा तन ही ढक पाता था. बहुत बाद में अपने राजनीतिक गुरु गोविंदवल्लभ पंत के कहने पर गांधी जी जब ‘भारत को जानने’ के लिए यात्रा पर निकले तो उन्होंने भी एक नदी तट पर ऐसे ही अंधनंगे स्त्रीपुरुषों को देखकर अपने वस्त्र उनकी ओर बहा दिए थे. उसके बाद साबरमती का वह फकीर अधनंगे तन की अंग्रेजों से जूझता रहा. वह जनता के दुःखदर्द को पहचानकर उसके करीब आने की, राजा से रंक बनने की कोशिश थी. बिना इसके लोगों के दिल में बनाना आसान न था. बौद्ध संघों के नियम भी ऐसे थे कि जो भी वहां आए, अतीत के वैभव को बिसराकर सच्चे मन से आए.

बुद्ध के कुछ शिष्यों को अच्छा नहीं लगा कि उनका गुरु ऐसे जीर्णशीर्ण वस्त्र धारण करे. यह उनका प्रेरक रहा होगा. मगर यह उस सत्ता की प्रतीति का भी परिणाम था, जो धर्मसत्ता के संगठित होतेहोते आकार ले लेता है. ऐसे शिष्यों ने बुद्ध के लिए नए कपड़े से बुना चीवर लाकर दिया. प्रार्थना की कि उसको पहनें. बुद्ध ने अपने शिष्यों पर निगाह डाली. वे भी जीर्णशीर्ण चीवर में थे. ‘मुझे कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन संघ में तो सभी बराबर हैं. बाकी भिक्षु भी पुराने वस्त्र क्यों धारण करें. उस दिन के बाद से संघ में पुराने कपड़े का बना चीवर पहनने की शर्त हटा दी गई.

ऐसा ही एक और उदाहरण है. गौतम बुद्ध की मां माया तो उन्हें जन्म देने के नवें दिन ही मर चुकी थीं. उन्हें मां का स्नेह देकर पालने वाली थी, गौतमी, जिन्हें वे सदैव मां का सम्मान देते रहे. गौतम बुद्ध ने भिक्षु संघ की स्थापना की तो गौतमी भी उसमें सम्मिलित हो गई. सर्दी का मौसम था. गौतमी ने बुद्ध को एकमात्र चीवर में देखा तो उनका वात्सल्य मचलने लगा. जानती थीं कि राजपाट को ठोकर मार चुका उनका संन्यासी बेटा सर्दी से बचाव के लिए भी अन्य वस्त्र धारण नहीं करेगा. इसलिए उन्होंने रातदिन लगकर बुद्ध के लिए एक गुलुबंद तैयार किया. उसको लेकर वे खुशीखुशी उनके पास पहुंची और उनसे पहनने का आग्रह किया. बुद्ध ने बाकी भिक्षुओं की ओर देखा. वे सभी एकमात्र चीवर में थे. उन्होंने गुलुबंद लेने से इनकार कर दिया. बोले कि यदि यह उपहार है तो सभी भिक्षुओं के लिए होना चाहिए. सिर्फ उन्हीं के लिए क्यों? गौतमी ने बहुत अनुनयविनय की. लेकिन बुद्ध नहीं माने. समाजवाद की, सहजीवन की पहली शर्त है, संसाधनों में बराबर की हिस्सेदारी. इसके लिए उनका राष्ट्रीयकरण. बुद्ध ने भिक्षु संघ की जो व्यवस्था की थी, उसके अनुसार समस्त संपत्ति संघ की मानी जाती थी. संपत्ति और संसाधनों के समान बंटवारे के अतिरिक्त भिक्षु संघ में अधिकारों का भी एकसमान विभाजन था. सभी निर्णय सहमति के आधार पर लिए जाते थे. भिक्षु संघ के बीच महात्मा बुद्ध की हैसियत अधिक से अधिक एक प्रधान सचिव जैसी थी. किसी को भी मनमानी करने अथवा अपना निर्णय थोपने का अधिकार नहीं था. महात्मा बुद्ध वैशाली गणतंत्र के प्रशंसक थे. ऐसी ही व्यवस्था वे भिक्षु संघ में चाहते थे. जीवन के उत्तरार्ध में कम से कम दो अवसर ऐसे आए, जब उनसे उनके उत्तराधिकारी के बारे में पूछा गया था. कहा गया कि जिसको वे उपयुक्त समझते हों उसको संघ की व्यवस्था सौंप सकते हैं. उस समय यदि वे चाहते तो किसी भी व्यक्ति को यह दायित्व सौंपकर उपकृत कर सकते थे. मगर हर बार उन्होंने यही कहा कि धम्म ही संघ का सेनापति है. और आजकल के कथावाचक टाइप स्वयंभू भगवानों को देखें, जो धर्म के नाम पर बने अपने संगठन को भी किसी कारपोरेट कंपनी की भांति चलाते हैं. धर्म के नाम पर जनसाधारण की भावनाओं का दोहन कर मुनाफा बटोरना और पूंजी बटोरना ही उनका ही उनका व्यवसाय है. शंकराचार्य की गद्दी पाने के लिए षड्यंत्र किए जाते हैं, हत्याएं तक होती हैं.

बुद्ध कोरे अध्यात्म पर जोर नहीं देते. बल्कि व्यक्ति की दैनंदिन की समस्याओं पर भी विचार करते हैं. बुद्ध का दुःख की शाश्वतता को स्वीकारना और उसे अपने चिंतन की परिधि में लाना उन्हें व्यावहारिक और जनसाधारण के निकट लाता है. मगर दुःख की बात कहकर, वे डराते नहीं हैं. वे स्पष्ट कहते हैं कि दुःख की सत्ता है, और उसका कारण भी है. कारण का निवारण कर दुःख से मुक्ति संभव है. इसके लिए बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है. खुद को पहचानो. अपने भीतर छिपे प्रकाश को पकड़ो.

यूं तो हिंदू दर्शन भी चार पुरुषार्थों को मान्यता देता है. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. लेकिन काम और मोक्ष को लेकर भारतीय परंपरा विरोधाभासों का शिकार रही है. एक ओर तो व्यक्ति को अर्थ और काम के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहा है, दूसरे उन्हें माया और भ्रांति कहकर पारलौकिक सुख का लालच दिया जाता रहा. बुद्ध मुक्ति की बात नहीं कहते. मुक्ति का अभिप्राय वैदिक आचार्यों को लिए आत्मा का परमात्मा से सम्मिलन रहा है. बुद्ध आत्मा और परमात्मा को अचिंत्य मानते थे. इसलिए उन्होंने निर्वाण का पक्ष लिया. मुक्ति के लिए मृत्यु अनिवार्य है. निर्वाण इसी जीवन में संभव है. बस उसके लिए चित्तवृत्तिनिरोध और आत्मसंयम की आवश्यकता है. भिक्षु के लिए उन्होंने किंचित कठोर नियम बनाए थे. संन्यासी को संचय की आवश्यकता ही क्या. यदि संचय से लगाव था तो संन्यास की आवश्यकता ही क्या थी. अतः भिक्षु को चाहिए कि वह प्रतिदिन पहनने के लिए तीन वस्त्र(त्रीचीवर), एक कटिबांधनी यानी कमर में बांधने वाली पेटी, एक भिक्षापात्र, वाति यानी उस्तरा, सुईधागा तथा पानी साफ करने के लिए एक छननी अथवा छन्ना के अतिरिक्त कुछ और न रखे. भिक्षु के लिए महंगी धातुएं यथा सोना, चांदी पहनना या पास में रखना निषिद्ध था. डर था कि सोने को बेचकर वह विलासिता का प्रतीक बाकी वस्तुएं भी खरीद सकता है.

एक ओर जहां भिक्षु के लिए इतने सख्त नियम थे, वहीं गृहस्थ को उन्होंने उदारतापूर्वक संपत्ति संचय की छूट दी थी. इस संबंध में एक कथा है

अनाथ पिंडक गौतम बुद्ध का प्रिय शिष्य था. एक बार उसने सोचा कि गौतम बुद्ध ने भिक्षुओं की संचय की प्रवृत्ति के निषेध के लिए काफी कठोर नियम बनाए हैं. इसलिए उसके मन में जिज्ञासा जगी कि बुद्ध से व्यक्तिगत संपत्ति के बारे में उनका मत जाना जाए. निर्वाण की लालसा तो जितनी भिक्षु को है, करीबकरीब उतनी ही गृहस्थ को भी होती है. इसलिए अभिवादन करने के बाद उसने गौतम बुद्ध से पूछा—

क्या भगवन, यह बताएंगे कि गृहस्थ के लिए कौनसी बातें स्वागतयोग्य, सुखद एवं स्वीकार्य हैं, परंतु जिन्हें प्राप्त करना दुष्कर है?’

प्रश्न सुनने के उपरांत बुद्ध ने कहा—

इनमें प्रथम विधिपूर्वक धन अर्जित करना है. दूसरी बात यह देखना है कि आपके संबंधी भी विधिपूर्वक धनसंपत्ति अर्जित करें. तीसरी बात है दीर्घकाल तक जीवित रहो और लंबी आयु प्राप्त करो.’

गृहस्थ को इन चार चीजों की प्राप्ति करनी है, जो कि संसार में स्वागतयोग्य, सुखकारक तथा स्वीकार्य हैं. परंतु जिन्हें प्राप्त करना कठिन है. चार अवस्थाएं भी हैं, जो कि इनसे पूर्ववर्ती हैं. वे हैं, श्रद्धा, शुद्ध आचरण, स्वतंत्रता और विवेक. शुद्ध आचरण दूसरे का जीवन लेने अर्थात हत्या करने, चोरी करने, व्यभिचार करने तथा मद्यपान करने से रोकता है.

स्वतंत्रता ऐसे गृहस्थ का गुण होती है, जो धनलोलुपता के दोष से मुक्त, उदार, दानशील, मुक्तहस्त, दान देकर आनंदित होने वाला और इतना शुद्ध हृदय का हो कि उसे उपहारो का वितरण करने के लिए कहा जा सके.

बुद्धिमान कौन है?

जो यह जानता हो कि जिस गृहस्थ के मन में लालच, धन लोलुपता, द्वेष, आलस्य, उनींदापन, निद्रालुता, अन्यमनस्कता तथा संशय है और जो कार्य उसको करना चाहिए, उसकी उपेक्षा करता है, और ऐसा करने वाला प्रसन्नता तथा सम्मान से वंचित रहता है.

लालच, कृपणता, द्वेष, आलस्य तथा अन्यमनस्कता तथा संशय मन के कलंक हैं. जो गृहस्थ मन के इन कलंकों से छुटकारा पा लेता है, चह महान बुद्धि, प्रचुर बुद्धि एवं विवेक, स्पष्ट दृष्टि तथा पूर्ण बुद्धि व विवेक प्राप्त कर लेता है.

अतएव, न्यायपूर्ण ढंग से तथा वैध रूप में धन प्राप्त करना, भारी परिश्रम से कमाना, भुजाओं की शक्ति व बल से धन संचित करना, तथा भौहों का पसीना बहाकर परिश्रम से प्राप्त करना, एक महान वरदान है. ऐसा गृहस्थ स्वयं को प्रसन्न तथा आनंदित रखता है तथा अपने मातापिता, पत्नी तथा बच्चों, मालिकों और श्रमिकों, मित्रों तथा सहयोगियों, साथियों को भी प्रसन्नता तथा प्रफुल्लता से परिपूर्ण रखता है.’

उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि बुद्ध का दर्शन मानव जीवन को संपूर्ण और परिपक्व बनाने के लिए आग्रहशील है. वह सीधेसीधे उस ब्राह्मणवाद के विरोध में जन्मा था, जिसके केंद्र में जनसाधारण था ही नहीं. जो आत्ममोह से ग्रस्त समाज था, एक प्रकार से लड़ाकू कबीला. जो सिर्फ वर्चस्व की भाषा जानता था. बुद्ध गणतंत्र के प्रशंसक थे. इसलिए उनके दर्शनचिंतन में भी गणतंत्र की खूबियां हैं. वे न केवल सामाजिक समानता पर जोर देते हैं, और उसके लिए सामाजिक समाज के जातीय विभाजन को दोषी ठहराते हैं, वहीं आर्थिक अधिकार देकर व्याक्ति को उन सामंती संस्कारों से बचाए रखना चाहते हैं, जो धर्म और राजनीति की कुटिल संधियों की उपज थे. इन सब कारणों से बुद्ध का दर्शन समाजवादी भावनाओं से ओतप्रोत जान पड़ता है. कई मायने में तो वह माक्र्स के वैज्ञानिक समाजवाद तथा व्यक्ति से भी आगे ले जाता है. इसलिए कि भौतिक द्वंद्ववाद का विश्लेषण करता हुआ माक्र्स उत्साह के साथ शुरू तो करता है, मगरउसका चिंतन आर्थिक पहलुओं से आगे नहीं बढ़ पाता. वह आर्थिक समस्याओं को जीवन की मूल समस्याओं के रूप में देखता है. जबकि ऐसा नहीं है. दूसरी ओर बुद्ध का दर्शन राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक समानता यानी समानता के सभी पहलुओं की विस्तार से चर्चा करता है. और आर्थिक मानवीकरण के मुद्दे पर कई जगह से मार्क्स के समाजवाद से आगे निकल जाता है.

जैन दर्शन में समाजवादी तत्त्व

जैन धर्म के चैबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी, बुद्ध के समकालीन, उनसे लगभग तीस वर्ष बड़े थे. दोनों के दर्शन में काफी समानता है. जैसे कि दोनों ही क्षत्रिय परिवार में जन्मे थे. दोनों ने ही अपना दर्शन ब्राह्मणवाद के विरोध में प्रस्तुत किया था. दोनों ही कर्मकांड के बजाय आचरण की पवित्रता के प्रति अधिक आग्रहशील थे. आत्मापरामात्मा और ईश्वर आदि की वैदिक मताब्लंबियों की बंधीबंधाई धारणा पर उन्हें विश्वास नहीं था. वैदिक ग्रंथों में श्रमणों का जगहजगह उल्लेख हुआ है. ये श्रमण कर्मकांड के विरोधी थे. अपनी जिज्ञासा के समाधान हेतु अधिकांश प्रकृति के सान्न्ध्यि में रहकर सृष्टि के रहस्यों की खोज में लगे रहते थे. जैन धर्म में विश्वास करने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि नदी को पाटने का पहला चमत्कार प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जी किया था. इसके अतिरिक्त लिपिकला, कुंभकारी, चित्रकारी तथा मूर्तिशिल्प का भी आविष्कार उन्होंने ही किया था. ऋषभदेव का नाम यजुर्वेद तथा श्रीमद् भागवत में भी आया है. ईसा से लगभग 900 वर्ष पूर्व जन्मे बाइसवें तीर्थंकर अरिष्ठनेमि भी क्षत्रिय वंशज तथा कृष्ण के चचेरे भाई थे. कृष्ण के प्रयासों के फलस्वरूप ही राजकुमारी राजमती से उनका विवाह तय हुआ था. लेकिन अरिष्ठनेमि ने जब अपने विवाह में हिरन समेत अन्य निरीह प्राणियों को बलि होते देखा तो उनका मन उचट गया, उसके बाद उन्होंने अपना समस्त जीवन बलि की कुप्रथा को समाप्त करने पर झोंक दिया. तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ भी अहिंसा पर जोर देते थे. एक किवदंति के अनुसार उन्होंने एक सर्प की उस समय प्राणरक्षा की थी, जब ब्राह्मण उस वृक्ष को जहां वह रहता था, जला देने का प्रयास कर रहे थे. उनका विवाह एक राजकुमारी के साथ हुआ था. तीस वर्ष तक सुखी गृहस्थ का जीवन जीने के बाद एक दिन उन्हें वैराग्य सूझा और अपनी समस्त संपत्ति दान देकर प्रवज्या ले ली. पार्श्वनाथ अपने शिष्यों के बीच बहुत प्रिय थे. उन्हें जैन साधुओं एवं साध्वियों को संगठित कर उन्हें संगठन का रूप देने का श्रेय दिया जाता है. उनके आदर्श ऊंचे थे. जीवन नैतिकता के उच्च मापदंडों ये युक्त एवं अनुशासित होता था.

जीवन परिचय

जैन धर्म के प्रवर्त्तक चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म ईसा से 599 वर्ष पहले वैशाली के निकट कुंदपुरा नामक स्थान पर हुआ था. बुद्ध की भांति वे भी क्षत्रिय परिवार से संबंधित थे. उस समय पुरोहितों के कर्मकांड अपने शिखर पर थे. यज्ञादि अनुष्ठानों के बीच पोंगापंथी, बुद्धि के नाम पर वितंडा रचना, ज्ञान के स्थान पर पौरोहित्य का प्रशिक्षण देना और तर्क की जगह तंत्रमंत्र साधना ही उस समय अध्यात्म चिंतन मान लिया जाता था. चारों ओर ब्राह्मणवाद का बोलबाला था, जो स्वयं छोटेछोटे गुटों में बंटे थे. उनके बीच ढेर सारे मतांतर थे. उनमें आपस में बहसें चलती रहती थीं. सिर्फ वर्गीय श्रेष्ठता के दावे और स्वार्थ संबंधी मुद्दों को छोड़कर दूसरा शायद की कोई ऐसा पक्ष था, जिसपर वे सभी एकमत होते हों. देश छोटेछोटे राज्यों में बंटा था. राजा अन्यान्य कारणों से परस्पर लड़तेझगड़ते रहते थे. पूरी श्रमण परंपरा, जिनमें कौत्स एवं सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि जैसे विद्वान, चार्वाक दार्शनिक उनके विरोध में थे. प्रजा मन से लोकायतों और श्रमणों के साथ थी, किंतु ब्राह्मणवादी कर्मकांडों से गुजरना उसकी व्यावहारिक मजबूरी थी.

महावीर स्वामी के पिता का नाम सिद्धार्थ और मां त्रिशला थीं. पिता पाश्र्वनाथ के अनुयायी थे. त्रिशला देवी वैशाली के राजा की बहन थी. महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्धमान था. इस नामकरण के पीछे भी एक रहस्य था. बताते हैं कि जब वे गर्भ में थे, उन दिनों राजकोष में तीव्र वृद्धि हुई थी. यही उनके वर्धमान नामकरण का कारण बना. बचपन में उनका लालनपालन राजकीय वैभव के बीच हुआ. वे स्वभाव से उदार, निडर और शक्तिशाली थे. एक बार उत्तेजित हाथी की सूंड पकड़कर उसपर सवारी गांठने और दूसरी घटना में विषैले नाग को पूंछ पकड़कर एक ओर फेंक देने जैसे साहसपूर्ण कार्य दिखाने के बाद सभी उन्हें ‘महावीर’ कहने लगे थे. उनका विवाह राजकुमारी यशोदा के साथ हुआ, जिनसे एक बेटी भी जन्मी. राजसी वैभव के बीच पलनेबढ़ने के बावजूद वहां का वातावरण उन्हें पसंद न था. सारे ठाठबाट, नौकरचाकर, वैभवविलास बनावटी लगने लगे. मातापिता की मृत्यु के बाद महावीर का संसार से मन उचट गया. उन्होंने संन्यास लेने का निर्णय लिया. उस समय उनकी अवस्था मात्र अठाइस वर्ष की थी. मगर अपने बड़े भाई के आग्रह पर उन्होंने दो वर्ष और परिवार के साथ बिताने के लिए सहमत हो गए.

अगले दो वर्ष महावीर ने खुद को सुखसुविधाओं से मुक्त करने का अभ्यास करते हुए बिताए. उन्होंने एकएक कर अपनी सारी वस्तुएं भिखारियों को दान कर दीं. राजकीय वैभवविलास से परे रहकर अपने मन और शरीर को तापसी जीवन के लिए तैयार करने लगे. तीस वर्ष की अवस्था तक वे अपनी समस्त धनसंपत्ति, विलासितापूर्ण साम्रगी, परिवार यहां तक कि पत्नी से भी किनारा कर चुके थे. अपने गांव कुंदपुरा में दो दिनों तक निराहार, निर्जल, मौन रहते हुए उन्होंने अपने सिर के बाल उखाड़ लिए. देह से वस्त्राभरण दूर करने के उपरांत उन्हें अद्भुत शांति की प्रतीति हुई. एकमात्र उत्तरीय को कंधों पर डाल उन्होंने गृहस्थान छोड़ने का संकल्प कर लिया. जिस समय वे प्रस्थान कर रहे थे, ठीक उसी समय एक भिखारी वहां उपस्थित हुआ. यह कहकर कि गत दो वर्षों से वे जो दान करते आ रहे हैं, उससे वह वंचित रहा है, उसने महावीर से दान की अपेक्षा की. इसपर महावीर ने कंधे पर पड़े उत्तरीय में से आधा फाड़कर उस भिखारी को थमाया और वहां से प्रस्थान कर गए.

वास्तविक ज्ञान और आत्मशांति की खोज करते हुए महावीर मोरेगा पहुंचे. वहां एक मठ के अधिपति उनके पिता के मित्र थे. मठाधीश के आग्रह पर महावीर ने वर्षाकाल को वहीं ठहरकर बिताने का निश्चय किया. ठहरने के लिए मठ की ओर से उन्हें एक झोपड़ी भी मिल गई. उससे पिछले वर्ष मोरेगा और आसपास के क्षेत्र में भयानक सूखा पड़ा था. उसकी भीषण मार से समस्त वनस्पतियां झुलस चुकी थीं. जंगली पशुपक्षियों के समक्ष भीषण खाद्यसंकट था. एक दिन आश्रम में अपेक्षाकृत हरियाली देख, भूख से व्याकुल पशुओं का रेला वहां आ धमका. मठ में रह रहे बाकी संन्यासी पशुओं को भगाने के लिए बलप्रयोग करने लगे. मगर महावीर क्षुधापीड़ित पशुओं को देख करुणा से आद्र हो गए. बजाय भगाने के लिए वे स्वयं झोपड़ी से एक ओर हो गए. भूखे पशुओं ने कुछ ही देर में सारा छप्पर साफ कर दिया. उनकी शिकायत मठाधिपति तक पहुंची. इसपर महावीर स्वामी ने आश्रम छोड़ दिया. वर्षाकाल बिताने के लिए निकटवर्ती गांवों की ओर प्रस्थान कर गए. एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते हुए महावीर स्वामी को विचित्र अनुभव हुए. उन्हें समाज को करीब से देखनेसमझने का अवसर प्राप्त हुआ. ज्ञान की खोज में वे उन ब्राह्मण साधुओं से भी मिले जिनका जीवन के नाम पर खुद को सांसारिक सुखों से दूर रखने के लिए उन्होंने अपने लिए पांच कठोर नियम बनाए. वे नियम थे: किसी अस्नेही, अनुदार व्यक्ति का आथित्य ग्रहण न करना. प्रस्तर प्रतिमा की भांति, एक ही स्थान पर देर तक अडोल खड़े रहना, शांत रहना. बिना बर्तनों के भोजन करना तथा गृहस्थों के साथ विनम्रता से पेश न आना.

पांचवा नियम कुछ विचित्र था, मगर खुद को सांसारिक सुखों से वंचित रखना, किसी भी प्रकार की श्रद्धा के अतिरेक से स्वयं को बचाए रखना ही उसका उद्देश्य था. गर्मियों में तपते मैदान में नंगे पैर एक ही स्थान पर खड़ेखड़े वे पूरी दोपहरी बिता देते थे. सर्दियों में खुले आसमान के नीचे नंगे तन रहकर शीतमार झेल जाते. रास्ता चलते हुए एकएक कदम बहुत सावधानी से रखते, ताकि निरीह जीवों की हत्या न हो. सायं होने पर वे सुनसान खंडहर, शमशान घाट, वन, उपवन अथवा जहां भी एकांत मिलता ठहर जाते. मन सृष्टि के रहस्यों की अन्वीक्षा में लीन रहता. भोजन वे बहुत कम करते. भिक्षा भी सिर्फ उतनी ही लेते, जितने से न्यूनतम भोजन की जरूरत पूरी हो सके. भीख वे मांगते नहीं थे. बस घर के सामने से मूक गुजर जाते. उस समय यदि गृहस्वामी बुलाकर स्वेच्छा से कुछ देना चाहता, तो चुपचाप रख लेते. नहीं तो आगे बढ़ जाते. कई बार तो पूरा गांव पार हो जाता. उस अवस्था में उन्हें निराहार रहना पड़ता था. निराहार रहने का उन्हें अभ्यास था. वे लंबेलंबे उपवास रखते. कभीकभी तो पूरा महीना ही निराहार रहकर बिता देते. भोजन करते समय भी यदि कोई भिखारी, पशुप्राणी भोजन की चाहत में सामने पड़ जाता तो अपना भोजन उसको सौंप, निर्लिप्त भाव से आगे प्रस्थान कर जाते थे.

उन दिनों देश छोटेछोटे राज्यों में बंटा हुआ था. राजाओं के बीच युद्ध और संघर्ष चलते ही रहते थे. शीतयुद्ध की स्थिति बनना तो सामान्य बात थी. महावीर स्वामी को यहां से वहां भटकते देख कुछ लोग उनपर संदेह करते. उन्हें दुश्मन देश का जासूस समझकर पकड़ लिया जाता. कुछ लोग उनपर संदेह भी करते. एक बार बंगाल में चोरेगा नामक स्थान पर राजा के जासूसों ने उन्हें पकड़कर जेल में डाल दिया. एक अन्य अवसर पर रस्सी से बांधकर उनकी पिटाई की गई. वहां से छूटे तो कुइया नामक स्थान पर एक बार फिर जासूसों के चक्कर में फंस गए. उस समय उनके सहयोगी और समर्थक गोसला उनके साथ थे. अंततः राजकर्मियों की गलतफहमी दूर हुई और क्षमायाचना करते हुए उन्हें छोड़ दिया गया. उस घटना के बाद लोग महावीर स्वामी को जानने लगे थे. अपने सहयोगी गोसला के साथ वे पांच वर्ष तक सत्य की खोज में यहां से वहां भटकते रहे. छठे वर्ष में गोसला उनसे अलग हुए. मगर यह अभिन्नता मात्र छह महीने ही रह पाई. अवधि बीतते ही गोसला वापस लौट आए. तत्पश्चात वे चार वर्ष और महावीर स्वामी के साथ रहे. बाद में उन्होंने स्वयं को आजीवक संप्रदाय का प्रवत्र्तक घोषित कर दिया.

महावीर वैशाली लौट गए. उस समय वहां का अधिपति शंख था. जंगल में यहां से वहां भटकते हुए उनक वस्त्र जर्जर हो चुके थे. मगर उन्हें अपनी देह तक सुध न थी. जिस समय वे वैशाली से गुजर रहे थे, कुछ शैतान बच्चों ने उन्हें घेर लिया. वे उन्हें परेशान करने लगे. शंख के प्रयास से ही महावीर स्वामी मुक्त हो सके. बोध की तलाश में यहां से वहां भटकते हुए उन्हें बारह वर्ष बीत गए. अंततः उन्हें सफलता मिली. आत्मबोध हुआ. इस बीच घोर साधना में उनका शरीर सूखकर कांटा हो चुका था. देह के वस्त्र तारतार होकर लटक चुके थे. मगर आत्मलीन महावीर को उसकी सुध ही नहीं थी. आत्मबोध के आनंद में वे एक ही स्थान पर बिना हिलेडुले छह महीने तक लगातार बैठे रहे. मगर उनकी वह साधना सफल न हो सकी. उनकी पत्नी उन्हें खोजती हुई वहां आ पहुंचीं. इसे अपनी साधना में विघ्न मानकर वे प्रायश्चित में डूब गए.

धीरेधीरे एक वर्ष और बीत गया. महावीर ने उपवास साधा हुआ था. निर्जल रहते हुए ढाई दिन बीत चुका था. वे मौन साधनारत थे कि अचानक उन्हें निर्वाण की अनुभूति हुई. महावीर स्वामी ने उस अवस्था को कैवल्य कहा है, विदेह हो जाने की उच्चतम स्थिति जब शरीर में रहते हुए भी शरीर का बोध, उसकी सीमाएं समाप्त हो जाता है. व्यक्ति परमज्ञान की अवस्था में होता है. निर्वाण प्राप्ति के उपरांत महावीर स्वामी ने पहला उपदेश दिया. उनके आत्मबोध की प्रथम अनुभूति का विवरण मज्झिम निकाय में है—‘मुझे सबकुछ समझ आ रहा है, मैं सबकुछ पूरी तरह साफसाफ देख रहा हूं. मुझे पवित्र आत्मज्ञान की प्रतीति हो चुकी है. अब चाहे मैं चलता रहूं अथवा एक ही स्थान पर स्थिर होकर खड़ा रहूं. चाहे सो जाऊं अथवा जागता रहूं, परमज्ञान और उसकी अंतरानुभूति प्रतिपल मेरे साथ है…’

उच्चतम ज्ञान प्राप्त करने के उपरांत उन्होंने लिजुवेलिया नदी के तट पर धार्मिक सभा को संबोधित किया. यह उनका पहला जनसंबोधन था. मगर पहला प्रभाव बहुत कम रहा. वहां से वे महसाणा के लिए प्रस्थान कर गए. रास्ते में उनकी ब्राह्मणों के एक दल से भेंट हुई जो आत्मबलिदान करने जा रहे थे. उनकी संख्या ग्यारह थी. उन्होंने संस्कृत में बोलने की परंपरा को तोड़ा था, यही उनका अपराध था, जिसके प्रायश्चित के लिए उन्हें आत्मबलिदान करना था. भाषा तो संवादवहन का माध्यम होती है. इसके बावजूद भाषाविशेष के प्रति इतना दुराग्रह. महावीर को यह बहुत विचित्र जान पड़ा. उन्होंने उन्हें अर्धमागधी भाषा में उपदेश दिया, जिससे प्रभावित होकर सभी उनके शिष्य बन गए. यह उनकी ब्राह्मणवाद पर पहली विजय थी. जैन दर्शन के प्रथम ग्रंथ अर्धमागधी भाषा में ही लिखे गए हैं.

इस घटना के बाद महावीर स्वामी का यश चतुर्दिक फैलने लगा. लोग उन्हें सिद्ध पुरुष मानने लगे. इंद्रभूति गौतम नाम के एक ब्राह्मण के कानों में जब उनकी ख्याति पहुंची तो वह ईष्र्या से भर उठा और उनसे मिलने के लिए चल दिया. उस समय महावीर स्वामी एक बाग में ठहरे हुए थे. जैसे ही इंद्रभूति बाग तक पहुंचा, महावीर स्वामी ने अपनी अंतर्दृष्टि से उसको पहचान लिया. उन्होंने उसका स्वागत करते हुए कहा—

आइए गौतम! मैं जानता हूं कि इस समय आपके मस्तिष्क में आत्मा की सत्ता को लेकर संदेह है. हम उसपर चर्चा कर सकते हैं.’

उसके पश्चात स्वामी महावीर ने उन्हें उपदेश दिया. भारतीय दर्शन में आत्मा की उपस्थिति को लेकर जो विशद चिंतन किया गया है, उसका संदर्भ लेते हुए उन्होंने आत्मतत्व की विवेचना की. इंद्रभूति उनका प्रवचन सुनकर अभिभूत हो गया. उसी दिन उसने महावीर स्वामी का शिष्यत्व ग्रहण कर लिया. यह सूचना जैसे ही इंद्रभूति के बड़े भाई अग्निभूति तक पहुंची, वह उद्धिग्न हो उठा. अग्निभूति शास्त्रज्ञ पंडित था. अपने तत्वचिंतन पर उसे बड़ा गुमान था. भाई द्वारा महावीर स्वामी का शिष्यत्व ग्रहण करना उसको सहन न हुआ. सूचना मिलते ही वह उनसे शास्त्रार्थ करने के लिए चल पड़ा. उसने कर्म की वास्तविकता और आत्मा से उसके संबंध को लेकर महावीर स्वामी के समक्ष कई प्रश्न किए, जिनका उन्होंने तथ्यपरक उत्तर दिया. अग्निभूति उनका ज्ञान देख प्रभावित हुआ और अपने छोटे भाई की भांति वह भी उनका शिष्य बन गया. तत्पश्चात एक के बाद एक नौ विद्वान महावीर स्वामी से शास्त्रार्थ पहुंचे और परास्त होकर उनके शिष्य बन गए. उनके शिष्यों की संख्या बढ़कर ग्यारह हो गई. जैन पंरपरा के अनुसार ग्यारह शिष्य अपने साथ अपने अनुयायियों को भी लाए थे, जिनको मिलाकर महावीर के शिष्यों की कुल संख्या 4400 तक पहुंच गई.

कुछ दिनों के बाद अपने शिष्यों के साथ महावीर स्वामी वहां से प्रथान कर गए. रास्ते में न कोई प्रवचन न सभा. उनकी मौन यात्रा 66 दिन तक चलती रही. लगातार चलते हुए वे राजगृह पहुंचे, जो उस समय के शक्तिशाली राज्य मगध की राजधानी था. उस समय बिंबसार वहां का सम्राट था. महावीर स्वामी द्वारा प्रवत्तित नए धर्म को लेकर सम्राट बिंबसार ने उनसे अनेक प्रश्न किए. जिनका उन्होंने संतोषजनक उत्तर दिया. इंद्रभूति ने महावीर स्वामी का शिष्यत्व अवश्य ग्रहण किया था. मगर अपनी विद्वता पर उसको अब भी बड़ा घमंड था. मगध प्रवास के दौरान ही एक वृद्ध व्यक्ति अपनी शंकाएं लेकर महावीर स्वामी के सामने पहुंचा. उसने संस्कृत में एक श्लोक पढ़कर उसकी विवेचना का अनुरोध किया. महावीर उस समय मौन अवस्था में थे. तब आगंतुक ने अपनी जिज्ञासा इंद्रभूति के समक्ष प्रकट की. मगर इंद्रभूति अपने उत्तर से वृद्ध को संतुष्ट न कर सका. वहां उपस्थित अन्य विद्वानों को भी उसकी व्याख्या आधीअधूरी जान पड़ी. उस समय तक महावीर स्वामी का मौनव्रत पूरा हो चुका था. उन्होंने वृद्ध का प्रश्न सुनकर उसकी शास्त्रसम्मत व्याख्या की. उससे वृद्ध संतुष्ट हो गया. यह देख इंद्रभूति का रहासहा दंभ भी जाता रहा.

जैन दर्शन को आरंभिक पहचान मिलने के साथ उसके अनुयायियों को संगठित करना भी अत्यावश्यक था. उन्होंने कुल शिष्यों को भिक्षु, साध्वी, गृहस्वामी और गृहस्वामिनी नामक चार वर्गों में विभाजित किया. धर्म में अनुशासन एवं नैतिकता के स्तर को बनाए रखने के लिए पांच व्रत साधने होते थे. ये हैं: अहिंसा, सत्य, अचौर्य, अपरिग्रह तथा पवित्रता. इनमें से प्रथम चार पाश्र्वनाथ के विचारों से अनुप्रेरित थे. राजगृह में वर्षाकाल व्यतीत करने के उपरांत महावीर ने वैशाली के लिए प्रस्थान कर दिया. वहां उन्होंने अपनी पुत्री और दामाद जामाली को धर्माेपदेश दिया. इसी दौरान उन्हें पूर्वाभास हुआ कि सम्राट रुद्रायण उनसे मिलना चाहते हैं, वे सिंधुसौवीर स्थित उनकी राजधानी पहुंचे. रुद्रायण महावीर के विचारों से प्रभावित होकर जैनश्रमण बन गया. सिंधुसौवीर से वापसी का रास्ता बहुत कठिनाइयोंभरा था. रास्ते में लंबा रेगिस्तान पड़ता था. भिक्षुदल के साथ उस रास्ते से गुजरते हुए महावीर को भोजन एवं पानी की समस्या का सामना करना पड़ा. किंतु कठिन साधना की अभ्यस्त हो चुकी देह ऐसी भीषण चुनौतियों से भी निकलना जानती थी. वहां से वे अपनी छोटीसी शिष्य मंडली के साथ वाराणसी पहुंचे, जिसे वैदिक परंपरा में पवित्र नगरी माना जाता था. वाराणसी में उन्होंने एक अरबपति सेठ को अपना शिष्य बनाया और फिर राजगृह के लिए प्रस्थान कर गए, जहां उन्होंने दो वर्षाकाल बिताए. इस अवधि में उन्होंने युवराज और उनके 25 भाईबहनों को जैन धर्म की दीक्षा दी. महावीर स्वामी का यशकीर्ति लगातार बढ़ती ही जा रही थी. उनसे प्रभावित होकर अनेक लोग मिलने आते और श्रमण परंपरा में सम्मिलित होते जाते थे. इस बीच वैदिक ब्राह्मणों से भी शास्त्रार्थ हुआ, जिसमें उन्होंने अपनी विद्वता से सभी को प्रभावित किया. जैन मत ब्राह्मणपंथ के लिए लगातार चुनौती बनता जा रहा था.

मगध प्रवास के दौरान ही उन्हें कोशांबी सम्राट का निमंत्रण मिला. वहां पहुंचकर उन्होंने सम्राट प्रद्योत तथा अनेक साम्राज्ञियों को जैनमत की दीक्षा दी. उस वर्ष का वर्षाकाल उन्होंने वैशाली में व्यतीत किया. चातुर्मास पूरे होते ही वे मगध वापस लौट गए. राजगृह में उन्होंने फिर सैकड़ों श्रद्धालुओं को श्रमणपरंपरा में सम्मिलित किया. इस बीच अजातशत्रु ने मगध पर आक्रमण कर उसपर अधिपत्य जमा लिया. राजनीतिक उथलपुथल से स्वयं के दूर रखते हुए उन्होंने राजगृह छोड़ दिया. वहां से वे चंपा पहुंचे, वहां उन्होंने राजकुमार सहित अनेक नगरवासियों को जैन धर्म में सम्मिलित किया. मगधसम्राट अजातशत्रु महावीर स्वामी का सम्मान करता था. किंतु यह आस्था उसकी साम्राज्यवादी भावनाओं पर नियंत्रण करने में अपर्याप्त थी. उसने भारी संख्याबल के साथ वैशाली गणतंत्र पर आक्रमण कर दिया. भीषण युद्ध में सम्राट चेतक की मृत्यु के बाद वैशाली पर मगध के कब्जे में आ गई. युद्ध में हुए भारी नरसंहार ने महावीर स्वामी को आहत कर दिया. उन्होंने स्वयं को एकांत तपश्चर्या में लीन कर दिया. अंततः 72 वर्ष की अवस्था में उन्हें निर्वाण की प्राप्ति हुई. संयोग देखिए कि महावीर स्वामी के मृत्यु के अगले ही दिन उनका पहला शिष्य इंद्रभूति गौतम भी निर्वाण प्राप्त हो गया. मगर उस समय तक लाखों श्रद्धालु जैन धर्म को अपना चुके थे.

 

जैनदर्शन परदुःखकातरता और करुणा पर केंद्रित दर्शन है. इसमें व्यक्तिगत संपत्ति की भावना का निषेध किया गया है. गृहस्थों के लिए तो संपत्तिसंबंधी मान्यताओं में फिर भी किंचित छूट है. किंतु जैन तापसों के लिए तो देह पर वस्त्र धारण करना भी विलासिता की श्रेणी में आता है. यह मान लिया जाता है कि शरीर ढकने के लिए वस्त्र का लालच भी मोक्ष प्राप्ति की अवधि को लंबा खींचने का काम करता है. जैन दर्शन में आवश्यकता से अधिक संचय को पाप माना गया है. समझा गया है कि यह भी एक प्रकार की हिंसा है. जैन दर्शन का संपत्ति संबंधी अवधारणा समाजवादी विचारधारा से मेल खाती है. समाजवाद भी हर व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के अनुरूप देने का आश्वासन देता है. वहां संपत्ति कल्याणकारी राज्य के अधीन सुरक्षित मानी जाती है, जिसका उपयोग नागरिकों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर व्यापक लोककल्याण की कामना के निमित्त किया जाता है. जैनमत के संपत्तिसंबंधी सिद्धांत और समाजवाद में महज इतना अंतर है कि समाजवाद राजनीतिकसंवैधानिक व्यवस्था है. जबकि जैन दर्शन नैतिक आचरण है. वह त्याग और सर्वकल्याण की भावना पर टिका है. यह आत्मानुशासन के बिना संभव नहीं. समाजवाद में अनुशासन के लिए राजनीति की मदद ली जाती है. जोकि बाहरी और खर्चीला उपक्रम है. उसकी अपेक्षा अपरिग्रह नैतिकता की जमीन पर खड़ा होता है. जाहिर है कि यह उच्च मानवादर्श है.

जैनमत में लोकतांत्रिक समाजवाद का एक अन्य रूप ‘स्याद्वाद’ के रूप में भी मिलता है. जैन मतावलंबियों की विशेषता यह है कि वे किसी भी कोटि के दुराग्रह का संपूर्ण निषेध करते हैं. अपनी बात दूसरों से बलात् मनवाना या केवल अपने ही मत को अंतिम सत्य मानना हठधर्मी, एक प्रकार की वैचारिक हिंसा है. इसलिए वहां अहिंसा पर इतना जोर दिया गया है. जैनमत के अनुसार किसी भी जीव की हत्या करना तो पाप है ही, विचारों की हिंसा भी वहां सर्वथा वज्र्य है. इसलिए कि विचार भी जीवात्मा की देन, उसकी विशेषता हैं. वैचारिक सहिष्णुता, विरोधों को आत्मसात करने की यह प्रवृत्ति जैन मत में स्याद्वाद के सिद्धांत के उद्भव का कारण बनी. ‘स्याद्वाद’ जैनदर्शन का सर्वाधिक मौलिक एवं वैज्ञानिकता पर आधारित विचार है. इसके अनुसार किसी भी वस्तु अथवा विचार के बारे में जो कहा जाता है, वह अनेक संभावनाओं से युक्त होता है. सत्य कई रूपों में प्रकट होता है.

अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए हाथी और छह अंधों की कहानी का उदाहरण देते हैं. कहानी के छह अंधों को हाथी के सामने खड़ा कर उसकी शरीर रचना के बारे में बताने को कहा जाता है. जिस अंधे ने हाथी के कान का स्पर्श किया था, उसके अनुसार हाथी की देह पंखे के समान है. दूसरा जो हाथी की सूंड का स्पर्श करता है, वह हाथी को मोटी बेल जैसा बताता है. तीसरा अंधा जो हाथी के पैर का स्पर्श करता है, वह उसकी रचना को खंबेनुमा कहकर अपने अनुभव का बखान करता है. वे सभी अपनी जगह सही है. सभी सच्चे हैं. मगर उनका सत्य आंशिक और परिस्थितिजन्य है, जो उनकी सीमा को दर्शाता है. उन छह के अलावा एक दृष्टिसंपन्न व्यक्ति भी है. हाथी की वास्तविक देहरचना के बारे में केवल वही जानता है. ज्ञान की स्थिति केवल प्रज्ञावान को ही संभव है. यही निर्वाण की अवस्था भी है, जब कोई तापस सृष्टि के वास्तविक रहस्य को जान चुका होता है. जैनमत मानता है कि साधारण व्यक्ति की ऐंद्रियानुभूति सीमित होती है. इसलिए उसका बोध भी सीमित होता है. मगर वह गलत नहीं है. अंधों की कहानी में यदि उन सभी के अनुभवों को परस्पर मिला दिया जाए तो हाथी की संपूर्ण रचना सामने आ सकती है. यही लोकतंत्र में होता है, जो समाजवादी व्यवस्था की धुरी है. वहां अनेक नागरिक मिलकर अपने विकास के लिए उपयुक्त व्यवस्था का चयन करते हैं.

जैनदर्शन की सृष्टि संबंधी व्याख्या आधुनिक वैज्ञानिक खोजों से मेल खाती है. उसके अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति का कारण छोटेछोट पुद्गलों को माना है. ये पुद्गल परस्पर मिलकर अणु बनाते हैं. अणुओं के संयोग से संसार की विभिन्न वस्तुओं, जड़चेतनादि की उत्पत्ति होती है. जड़चेतन में पुद्गलों की उपस्थिति उसे जीवनमय बनाती है. जैन दर्शन का पुद्गल का विचार कणाद मुनि के वैशेषिक दर्शन से मेल खाता है. पुद्गल की तुलना हम परमाणुवाद के साथ के आधुनिक सिद्धांत से भी कर सकते हैं. यह भी विज्ञानप्रमाणित है कि दो परमाणु परस्पर मिलकर एक अणु की रचना करते हैं, जो सृष्टि के समस्त पदार्थों की उत्पत्ति का कारण है. लेकिन पुद्गल परमाणु नहीं है. परमाणु में जीवन है, वैज्ञानिक ऐसा कोई दावा नहीं करते. वे परमाणु की गति का आकलन कर सकते हैं. परमाणु में अंतनिर्हित ऊर्जा की खोज भी की जा चुकी है. वैज्ञानिक अवधारणा के अनुसार परमाणु जड़चेतन से परे लघुत्तम कण है, जो संसार की प्रत्येक वस्तु, जड़ और चेतन दोनों की व्युत्पत्ति का कारण है. इससे भिन्न पुद्गल चेतनामय इकाई, जीवन का लघुत्तम रूप है. तदुनुसार यह समस्त संसार छोटेछोट पुद्गलों से मिलकर बना है. अतएव जैन दर्शन के अनुसार दृश्यमान जगत के कणकण में जीवन है. उनका सम्मान करना जीवन का सम्मान करना है.

जैन शब्द ‘जिन’ धातु से बना है. यानी ऐसा व्यक्ति जिसने इंद्रियों को अधीन कर लिया हो. इंद्रियनिग्रह के लिए अपरिग्रह अस्तेय, अहिंसा, सत्य आदि की कसौटियां बनाई र्गइं. जिनका अर्थ है, जरूरत से अधिक संचय न करना. चोरी न करना. दूसरे के धन की लालसा न रखना. हिंसा का पूर्ण निषेध और सत्याचरण. यही सिद्धांत बौद्ध धर्म के भी थे. आशय यह है कि नैतिक मान्यताओं को लेकर जैन और बौद्ध धर्म एक ही कोटि के माने जा सकते हैं. इसलिए कुछ विद्वानों ने जैनधर्म को बौद्ध धर्म की ही एक शाखा माना है. हालांकि कुछ मायने में दोनों में अंतर भी है. बौद्ध दर्शन व्यावहारिक बोध को महत्त्व देता है. वह जीवन की उपेक्षा करने के बजाय, उसको संयमित ढंग से जीने पर विश्वास रखता है. ऐसा जीवन जो अपने और दूसरों के लिए समानरूप से सुखकारी हो. इसलिए जैनदर्शन का अतिअनुशासन भी वहां वज्र्य है. कामनाओं से भागने से उनसे बच पाना संभव नहीं. वे पीछा करती हैं. उनसे मुक्ति का एक ही उपाय है, कामनाओं के बीच रहकर उनसे मुक्ति. मन को साधना. यह आसान नहीं है. लेकिन अभ्यास से इसको साधा जा सकता है. इसके लिए बुद्ध ने अष्ठांग योग का विचार दुनिया के सामने रखा था. मगर उनका अष्ठांग योग भी व्यावहारिक है. वह मनुष्य की पहुंच में है. जबकि जैन मत का अहिंसा का सिद्धांत और अन्य धार्मिक अनुशासन बहुत कड़े हैं. यही कारण है कि जैन धर्मदर्शन जनसाधारण के बीच अपनी जगह बनाने में असमर्थ रहा था.

बोधि वृक्ष के नीचे साधना करते समय बुद्ध को समझ आया था कि जीवन वीणा के तारों की तरह भांति है. ढीला छोड़ने पर सुर नहीं निकलते. अधिक कसने पर तार टूट भी सकते हैं. इसलिए उन्होंने मध्यम मार्ग को अपनाने का आग्रह किया था. लेकिन अहिंसा जैसे विषय को लेकर जैन मत व्यावहारिकता की सीमा तक प्रतिबद्ध है. वहां अपरिग्रह पर इतना आशय है कि शरीर पर वस्त्र धारण करना भी मोक्ष की राह में बाधक माना गया है. बौद्ध धर्म की अहिंसा के सिद्धांत को उसकी तत्व विवेचना के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है. जैन दर्शन सम्यक व्यवहार, सम्यक बोध, तथा सम्यक आचरण पर जोर देता है.

जैन दर्शन एक भौतिकवादी दर्शन है. वह संसार की सत्ता को नकारता नहीं है. बल्कि उसकी वास्तविकता को स्वीकारते हुए कतिपय वैज्ञानिक आधार पर उसकी व्याख्या करता है. जीवनमूल्यों को वरीयता देते हुए वह मनुष्य को अपनी चिंताओं के केंद्र में रखता है. उसकी आचारसंहिता तीन प्रमुख सिद्धांतों पर टिकी है. जैन दर्शन को यदि श्रेष्ठ विचारों की एक माला स्वीकारा जाए तो इन तीन सिद्धांतों को उसके माणिकमुक्ता समझा जाता है, जिनपर माला की समस्त सुंदरता निर्भर करती है. ये हैं—सम्यक आचरण, सम्यक कर्तव्य एवं सम्यक बोध. सम्यक आचरण से अभिप्राय सृष्टि के प्रत्येक प्राणी के साथ भेदभाव रहित दयालुतापूर्ण व्यवहार से है. हर प्राणी में एक ही जीवात्मा है, इसलिए उसका सम्मान. सभी के साथ एक समान व्यवहार. सम्यक बोध मानव चेतना के विकास के पांच स्तरों को दर्शाता है. वे हैं अध्ययन, साधना, सिद्धि एवं कैवल्य. सम्यक कर्तव्य आत्मानुशासन, निश्छल व्यवहार, सदाशयता को दर्शाता है. यह मानवेंद्रियों को विचलन से बचाकर उन्हें साधना पथ पर अग्रसर करने से संभव है. वह उपदेश से अधिक आत्मनियंत्रण पर जोर देता है. जैनग्रंथ ‘उत्तरध्यान’ में आत्मानुशासन की आवश्यकता पर लिखा गया है—

खुद को जीतो

इसलिए कि आत्मविजय सबसे बड़ी साधना है

यदि तुम स्वयं को जीत लेते हो

तो संसार में रहकर भी बनोगे अनिवर्चनीय आनंद के भागी

उससे भी श्रेष्ठ है

इससे पहले कि दुनिया के प्रलोभन और मायावी शक्तियां

मेरी इंद्रियों को अपने जाल में फंसा लें

मुझे भटकाएं

प्रताड़ित करें

आत्मनुशासन एवं प्रायश्चित द्वारा खुद को जीतकर

आत्मविजयी बनना.

इन सिद्धांतों की तुलना हम बौद्ध धर्म के अष्ठांग योग से कर सकते हैं. महावीर स्वामी का जन्म बुद्ध से पहले हुआ था. मगर दोनों में अधिक अंतर नहीं है. दोनों का कार्यक्षेत्र भी भारत का पूर्वी क्षेत्र है. हम आसानी से कल्पना कर सकते हैं कि जिन दिनों महात्मा बुद्ध ने संन्यास के लिए घर छोड़ा था, उन दिनों देशभर में महावीर स्वामी के विचारों की धूम मची होगी. कर्मकांड और यज्ञ के नाम पर होने वाली जीवहत्या से उकताए हुए लोग जैन धर्म में दीक्षित हो रहे थे. उनमें हर वर्ग के लोग सम्मिलित थे. वैशाली जैसे गणराज्य जिसके महात्मा बुद्ध प्रशंसक थे, के शासक भी भी जैन धर्म की दीक्षा ग्रहण कर चुके थे. आचार्य वर्षकार जब वैशाली पर आक्रमण से पहले बुद्ध से परामर्श लेने पहुंचते हैं तो बुद्ध वैशाली गणराज्य की मिलजुलकर निर्णय लेने की गणतांत्रिक प्रणाली की प्रशंसा करते हुए वैशाली को अजेय घोषित करते हैं.

सम्यक आचरण मनुष्य के मानवीय स्वरूप को बनाए रखने की कला है. प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक ही जीवात्मा है. स्त्रीपुरुष सभी एक समान हैं. इसलिए मनुष्य का पहला धर्म है कि वह सभी के साथ एक जैसा आचरण करे. बिना किसी पक्षपात, वगैर किसी स्वार्थलिप्सा के सबके साथ समानतापूर्ण व्यवहार करते हुए प्राणीमात्र के कल्याण के निमित्त समर्पित हो. दूसरों के साथ वही व्यवहार करो, जैसा उनसे अपने प्रति अपेक्षित है. संसार में रहकर भी उसके प्रलोभन से विरक्ति. देह में रहकर भी विदेहत्व की साधना. मुक्ति का साक्षात अनुभव. वौद्धदर्शन की भांति जैन दर्शन भी वेदों को प्रामाण्य नहीं मानता. उसके स्थान पर वह व्यक्ति की सत्ता को सर्वोच्च ठहराता है. नैतिक आचरण पर जोर देता है.

संसाधनों के न्यायिक बंटवारे और प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार देना ही समाजवादी व्यवस्था का प्रमुख ध्येय है. यह कार्य वह राज्य की नियामक शक्ति की मदद से करती है. राज्य भी व्यक्तियों से परे नहीं है. वह नागरिकों की सहमति और अनुशंसा के आधार पर बनी संस्था है. अंधों की कहानी में जैसे किसी एक अंधे की राय का कोई मूल्य नहीं है, लेकिन जब उन सबके अनुभवों को मिला दिया जाता है, तो उससे वही विंब बनता है, जो एक दृष्टिसंपन्न व्यक्ति की चेतना में बनता है. राज्य भी अपने नागरिकों की संस्तुति के आधार पर बनी संस्था है, जो एक नियामक संस्था सत्ता का रूप ग्रहण कर लेती है. कह सकते हैं कि जैन दर्शन की नैतिक मान्यताएं समाजवाद की मूल आस्था के अनुकूल हैं. हालांकि इसकी कड़ी अनुशासनव्यवस्था, इसको जनसाधारण के लिए असहज बनाती है.

© ओमप्रकाश कश्यप

भारतीय दर्शनों में समतावादी द्रष्टिकोण

सामान्य

जातिप्रथा और वर्णव्यवस्था जैसी अवैज्ञानिक व्यवस्था ने भारतीय चिंतन को जगहजगह लांछित किया है. लेकिन कम सही, भारतीय धर्मदर्शन में मानवमात्र के प्रति समानतावादी द्रष्टिकोण देखने को मिल ही जाता है, भले ही उसका स्वरूप केवल सैद्धांतिक हो.वैदिक सभ्यता पशुपालन सभ्यता थी. जो तेजी से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रही थी. पशुपालक समाज प्रकृति के अंचल में रहता था. मुक्त हवा में सांस लेता, खुले आसमान तले सोता. पूंजी की अवधारणा विकसी नहीं थी. उसके आर्थिक संबंध सरल और एकरैखिक थे. कुल धनसंपदा पशुओं तक सीमित थी. वेदों और पुराणों में ऐसी अनेक कहानियां हैं जब सम्राट को गायांे को दान करते हुए बताया गया है. कठोपनिषद में नचिकेता के पिता उद्दालक द्वारा यज्ञ में एक लाख गाएं दान करने का उल्लेख है. पशुओं के लिए युद्ध भी होते थे. ऋग्वेद में शत्रु को परास्त कर उसके पशुओं को हांक लाने का उल्लेख किया गया है. यह कार्य उन दिनों उतना ही वीरतापूर्ण एवं सम्मानीय माना जाता था, जितना बाद के समय में दूसरे के राज्य पर कब्जा जमाकर उसकी भूमि को कब्जा लेना. हालांकि कृषिकर्म का प्रचलन बढ़ रहा था, तो भी पशुधन की महत्ता कम नहीं हुई थी. आश्रमों में जीवनयापन का मुख्य स्रोत पशु ही होते थे. जनसंख्या का बड़ा हिस्सा जंगलों में, प्रकृति के सीधे सान्न्ध्यि में रहता था. इसके साथसाथ नागरी सभ्यता के विकास के संकेत भी वेदों से प्राप्त होते हैं. वेदों में इंद्र को पुरंदर कहा गया है, जिसका अभिप्राय है, दुश्मन के किलों को ध्वस्त कर देने वाला. ऋग्वेद में में बारबार प्रार्थना की गई है कि शत्रु पर विजय प्राप्त हो, दास हमारे अधीन हों. एक प्रार्थना में इंद्र को स्वर्ण, दास आदि को जीतते हुए दर्शाया गया है.

वेदों में भारतीय समाज के उस कालखंड की एकांगिक झलक है. आधुनिक विद्वानों का एक दल मोनजोदारो और हड़प्पा नगर की सभ्यता को वैदिक सभ्यता से जोड़ता है. इन स्थानों के उत्खनन से जो विस्तृत नगरसंरचनाएं देखने को मिली हैं. उनमें मोनजोदारो बड़ा और करीब 200 एकड़ में बसा हुआ था. दूसरा शहर हड़प्पा अपेक्षाकृत छोटा था. उसका कुल क्षेत्रफल लगभग 150 एकड़ था. उनका बेबीलोन, रोम, अरब, मेसोपोटामिया आदि अनेक देशों के साथ व्यापार था. व्यापारिक काफिले हजारों मील की यात्रा करते रहते थे. उन्हें न केवल सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था, बल्कि कई मायनों में उन्हें विशेष छूट भी मिली हुई थी. उस समय तक कृषि क्षेत्र में पर्याप्त विकास हो चुका था. गेहूं और जौ की खेती बहुतायत से होती थी. कृषि उत्पादों को लानेले जाने के लिए बैलगाड़ी का प्रयोग होने चलन में था. दोनों स्थानों की खुदाई से मिले मिट्टी के बर्तन उस समय मृदाकला के विकास को दर्शाते हैं. हड़प्पा में घर लगभग एक ही आकार के बने थे, जिससे प्रतीत होता है कि वहां के नागरिक जीवन में समानता थी. तो भी ऐसे अनेक लक्षण हैं, जो दर्शाते हैं कि आर्थिक स्तरीकरण की शुरुआत सभ्यता के आरंभ में ही हो चुकी थी. मोनजोदारो में ही सार्वजनिक स्नानग्रहों और विशिष्ट स्नानगृहों की अलगअलग उपस्थिति उन दिनों समाज में बढ़ते आर्थिक स्तरीकरण की मौजूदगी को साफ करती है. सामाजिक स्तरीकरण की शुरुआत केवल आर्थिक आधार तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह समाज के बड़े वर्ग को राजनीतिक, सामाजिक स्तर पर भी अधिकारों से वंचित करती थी.

वेदों को भारतीय मनीषा की उड़ान माना जाता है. कुछ ऋचाओं के कारण उन्हें पवित्र भी माना जा सकता है. इनमें मानवमन की सहज जिज्ञासा है, विराट प्रकृति के आगे अपनी अनश्वरता और तुच्छता के कारण उत्पन्न भय है. साथ ही सुदीर्घ, सुखमय, समृद्ध और स्वस्थ जीवन के लिए मंगलकामनाएं भी हैं. वैदिक मनुष्य प्रकृति को ओज एवं जीवनदायिनी शक्ति के रूप में देखता था. इसलिए उसको मनाने, खुश रखने हेतु उसके प्रति स्नेह और सम्मान की अभिव्यक्ति वैदिक ऋचाओं में अनेक स्थानों पर हुई है, हालांकि उनका बहुत सारा हिस्सा निरर्थक कर्मकांडों, युद्ध के वर्णनों और आडंबरयुक्त वक्तव्यों से भरा पड़ा है. दर्शन की जो धारा उपनिषदों, न्याय और वैशेषिक ग्रंथों में आगे चलकर दिखाई पड़ती है, वेदों में उसका शतांश भी नहीं है. उनकी अधिकांश ऋचाएं स्तुति और यज्ञगान से भरी हैं और वे किसी न किसी बहाने निरर्थक कर्मकांड को पुष्ट करती हैं. सैंकड़ों ऋचाएं ऐसी हैं, जिनमें युद्ध का उल्लेख हुआ है. तो भी भारतीय सभ्यता के प्राचीनतम ग्रंथ होने के नाते वेदों में जो श्रेयस्कर है, उसका उल्लेख भी उपयुक्त जान पड़ता है. ऋग्वेद के दशम मंडल के अंतिम सूक्तों में वैदिक जनों की प्रार्थनाएं देखिएः

हम सब साथ गमन करें, साथ रहें, परस्पर मिलकर प्रेमालाप करें, एकनिष्ठ, एकात्म हो साथसाथ ज्ञानार्जन को तत्पर हों. जैसे अभी तक सब मिलजुलकर रहते आए हैं, उसी तरह एकमत होकर आगे भी कार्य करें.’

हम सबकी प्रार्थना एक हो. हमारा मिलन भेदभाव रहित, एकरस हो, हमारे विचार एक हों. हमारा चिंतनमनन और उसके साधन, अंतःकरण, मंत्र, विचारधारा आदि सब एकसमान हों. हमारा ज्ञान एक हो, हमारा प्रभाव, हमारे प्रयत्न एक हों.

तुम्हारा संकल्प एक समान हो. तुम्हारे हृदय एकसमान हों. तुम्हारे मन एक समान हों. तुम्हारे कार्य पूर्ण और प्रयास एकनिष्ठ हों.

अर्थवेद में यही मंगलकामना कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त हुई है—

तुम सभी में हृदय की एकता हो. मन की एकता हो. मैं तुम्हारे अंतर में अविद्वेष की भावना चाहता हूं. तुम्हारा जीवन परस्पर प्रेम और अनुराग से भरा हो. जिस तरह गाय अपने बछडे़ को प्रेम करती है, उसी प्रकार तुम भी आपस में प्रेम करो.’

दरअसल लंबे सहजीवन के बाद उसकी समझ में आ चुका था कि उसका सुख, सुरक्षा एवं समृद्धि दूसरों पर निर्भर है. अकेला होने पर प्रकृति का विराट वैभव भी उसके लिए अर्थहीन है. ऊपरोल्लित सद्कामनाएं उन मुनियों की थीं, जो श्रमण परंपरा के पोषक थे. प्रकृति के साहचर्य में रहकर शांतिपूर्वक अपना जीवनयापन करते थे. ‘जियो और जीने दो’ जिनके जीवन का मूलमंत्र था. उनके लिए प्राणीमात्र में कोई भेद नहीं था. जो ज्ञान और प्रकृतिप्रदत्त संसाधनों को मानवमात्र के उपयोग की वस्तु मानते थे. जो ज्ञान को पवित्र और मानवमात्र की साझा धरोहर मानते थे. इसलिए उन्होंने आवाह्न किया था—‘ज्ञान को चारो दिशाओं से आने दो.’ वे प्रकृति को अपना घर, संरक्षक और देवता मानते थे. उनके लिए पूरी वसुधा एक आंगन थी और उसपर बसने वाले सभी मानवजन एक ही परिवार के सदस्य. जिनका मानवमात्र से अपनापा था. पराया उनके लिए कोई न था—

यह अपना है, वह पराया है—यह सोच क्षुद्र वृत्ति की उपज है. उदारचरितों, सज्जनों के लिए तो पूरा विश्व एक परिवार के समान है, पृथ्वी पर रहने वाले सभी नरनारी उनके परिजन हैं.’

वेदों में राजाओं के बीच युद्ध की अनेक घटनाएं हैं. देवासुर संग्राम के अलावा सुदास का युद्ध भी है, जो अनार्य सम्राट था. ये युद्ध राजनीति पर पुरोहितों के बढ़ते प्रभाव को दर्शाते हैं. उनमें दर्शन और अध्यात्म की खोज करना बेमानी होगा. लेकिन धर्म के नाम पर पाखंड और राजनीति के स्थान पर युद्धोन्मत्तता से भरी स्तुतियों के बीच कुछ काम की बातें भी वेदों में आई हैं. राजा कैसा हो, यह बात भी वैदिक ऋषि जोर देकर कहते हैं. राजा है तो प्रजा के लिए कल्याणकारी हो. राजा ऐसा होना चाहिए जो अपनी प्रजा के सुखदुःख को समझ सके. उसमें साझा कर सके. ऋग्वेद(1.82.2) में कहा गया है, ‘अहि दभ्रस्य चिद वृध’— राज्य के प्रत्येक नागरिक को पर्याप्त भोजन मिले, यह व्यवस्था राजा को करनी चाहिए. वेदों में ऐसी सूक्तियां बिखरी पड़ी हैं. समाजवाद यदि एक राजनीतिक सदेच्छा है, तो उसका प्रावधान भी वेदों में था. मगर कल्याण की धारा बहुत ही प्रच्छन्न और कर्मकांड के बीच दबसी गई है.

वेदों के उद्गाता ऋषियों की संख्या करीब 300 है. उनमें से अधिकांश अपनी प्रतिभा का उपयोग कर्मकांडों की स्थापना और युद्धों के बखान के लिए करते हैं. कहीं वे अदृश्य, अविकारी परमात्मा की स्तुति करते हुए दिखाई पड़ते हैं, तो अधिकांश जगह उनकी स्तुतियों में बहुदेववादी स्थापनाएं हैं. आशय यह है कि बहुदेववाद, कर्मकांड और युद्ध के वर्णन के बीच वेदों की यह मानवतावादी धारा म्लान होने लगती थी. तो भी उपनिषदों, महाकाव्यों में यत्रतत्र ये अनमोल मोती बिखरे पड़े हैं. बीसवीं शदी के महान महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटाइन ने कहा था कि मनुष्य के लिए मनुष्य से बढ़कर कुछ नहीं है. इस बात को लगभग तीन सहस्राब्दी पहले वेदव्यास महाभारत में कह चुके हैं—‘न हि मानुषात्परतरं किंचिदस्ति’—मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है. इसी उक्ति का प्रस्फुटन लगभग तीन हजार वर्ष पश्चात महाकवि रवींद्रनाथ ठाकुर अपनी कविता पंक्तियों में कुछ इस प्रकार नजर आता है—‘सबार ऊपरे मानुस सत्यं, तहार ऊपरे केऊ नाहीं,’ आशय यही है कि मानवसत्य सबसे ऊपर है, उससे बढ़कर कुछ भी नहीं है.हालांकि ऐसी उक्तियां कवियों की संवेदना से आगे, यथार्थ स्तर पर बहुत कम प्रभाव छोड़ पाई हैं.

जैसा कि ऊपर कहा गया है, वेदों में सबकुछ श्रेयस्कर हो, ऐसा नहीं है. अगर ऐसा होता तो वे हर भारतीय के समानरूप से सम्मान के पात्र होते. मगर अब हकीकत है कि वे मुट्ठीभर ब्राह्मणों और कर्मकांडों के प्रेरणास्रोत बनकर रह गए हैं. ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में ही भारत की जातिव्यवस्था के चिह्न मिलते हैं. वर्गविभाजन को उस समय भले कितनी ही सदेच्छा के साथ अपनाया गया हो, मगर बहुत शीघ्र उसके दुष्परिणाम सामने आने लगे थे. इसलिए इसका विरोध भी उसी समय प्रारंभ हो चुका था. वैदिक युग में भी वर्णव्यवस्था एवं कर्मकांडों का विरोध करने वाले भारी संख्या में थे. उनमें वेन, सुदास, सुमुख, निमि, हिरण्यकाश्यप आदि सम्राट भी थे, जिन्होंने धर्म और दर्शन के नाम पर थोपे जा रहे, पुरोहितवाद का जमकर विरोध किया था. इन सभी ने ब्राह्मणवाद के विरुद्ध भारी संघर्ष छेड़ा हुआ था. वेन की कथा हरिवंश पुराण में भी आई है, जिसके अनुसार वह विश्व का प्रथम निर्वाचित सम्राट था. मगर अंततः कर्मकांड के विरोध के चलते पुरोहितों, ब्राह्मणों के षड्यंत्र का शिकार हुआ. इसकी एक दिलचस्प मगर चैंका देने वाली कहानी है. जबकि बालि, प्रहलाद जैसे कुछ सम्राट ब्राह्मणवाद के बढ़ते प्रभाव के आगे समर्पण कर उसको अपना चुके थे.

वस्तुतः देवताओं के अभिकल्पना और उनका विकास मनुष्यता के विकास से जुड़ा है. समय के साथ प्रासंगिकता को देखते हुए मनुष्य ने जहां अनेक देवताओं की संकल्पना की, वहीं समय के प्रवाह में प्रासंगिक न होने के कारण अनेक देवता अपना महत्त्व खोते चले गए. नए देवताओं का आना भी जुड़ा रहा. जिन दिनों कृषि जीवन का मुख्याधार थी, उन दिनों जल का देवता वरुण और वर्षा के अधिष्ठाता इंद्र की बड़ी महिमा थी. मगर अब इनकी शायद ही कहीं नियमित पूजा होती हो. प्रागैतिहासिक काल में जब मानवजीवन शिकार पर निर्भर था, और पशुओं का मांस मनुष्य का मुख्य अहार था, उन दिनों पशुओं की भांति मनुष्य भी धरती पर भटकता रहता था. भोजन एवं सहवास जैसी सहज प्राकृतिक इच्छाएं वह खुले में संपन्न करता था. उन दिनों अपने भोजन के लिए वह शिकार पर निर्भर था. इसलिए पत्थर के औजारों के शोध पर जोर दिया गया. उसने वही हथियार बनाए जिनसे शिकार करने में सुविधा हो. शिकार में पालतू जानवरों की मदद भी ली जाती थी. स्वभाविक रूप से उन समय तक उसके देवता भी जंगलवासी थे. इसलिए देवताओं की प्रारंभिक अभिकल्पना टोटम के रूप में की गई. टोटम यानी प्रतीक या गणचिह्न, जिससे कोई कबीला या समुदाय अपने अस्तित्व को जोड़कर देखता था. वह जानवर या कोई पेड़पौधा भी हो सकता था.

टोटम कबीले अथवा गणसमूह की संपन्नता और शुभता का प्रतीक था. बाद में शिकार के समय जब यह पाया गया कि आदमियों में उनके शारीरिक सौष्ठव, प्राकृतिक गुण और शारीरिक विकास के आधार कुछ लोग अधिक उपयोगी सिद्ध होते हैं, तो समूह के नेता के चयन की परंपरा की शुरुआत हुई. साथ ही एक ऐसे देवता की अभिकल्पना की गई जिसमें सभी गुण एकसाथ हों. सभ्यता के आरंभ में आदिदेव शंकर के रूप में ऐसे ही देवता की परिकल्पना में दिखाई पड़ती है. उनके हाथों में त्रिशूल सजाया गया, जिसको पत्थर और उससे बने औजारों की भांति दूर से ही फेंककर मारा जा सकता था. मगर उसकी मार पत्थर के मुकबाले कहीं ज्यादा मारक थी. खासकर शिकार के काम में. कृषियुग आया तो इंद्र, वरुण, अग्नि और मरुत आदि देवताओं का महत्त्व बढ़ता गया. ऋग्वेद के एक मंत्र में इंद्र को पशुओं और दासों को साथसाथ हांकते हुए उल्लेख किया गया है. युद्ध मंे जीते हुए दासों के साथ शत्रुओं जैसा व्यवहार किया जाता था. वेद में इंद्र की चर्चा स्वयं सम्राट की भांति की गई है. आगे चलकर बौद्ध धर्म के प्रचारप्रसार के बीच जब वैदिक कर्मकांड की उपयोगिता को लेकर प्रश्न उठाए जाने लगे तो समाज का बड़ा वर्ग उनकी आलोचना करने लगा. यह विरोध इतना अधिक बढ़ा था कि वेदों में वर्णित इंद्र के लिए देवराज की सत्ता डगमगाने लगी. कालांतर में जैसे ही बौद्धधर्म कमजोर पड़ा, तो ब्राह्मणों ने इंद्र को उसके स्थान से हटाकर राम, कृष्ण, आदि को देवता के रूप में स्थापित करना प्रारंभ कर दिया, जिसमें उन्हें व्यापक सफलता मिली.

उल्लेखनीय है कि भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के लगभग पांच हजार वर्ष के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ जब समाज का बौद्धिक नेतृत्व पूरी तरह ब्राह्मणों के हाथों में रहा हो. राजसिंहासन पर केवल क्षत्रिय विराजमान रहे हों और विणजव्यौपार वैश्यों की बपौती बनकर रहा हा—प्रतिभाशाली और कर्मठ लोग, इतिहास को मनचाहा मोड़ देने वाले नायक, हर युग, प्रत्येक कालखंड में के साक्षी बने हैं. वर्णव्यवस्था की शुरुआत में जब तक विभिन्न वर्णों के बीच अंतपर्रिवर्तनीयता संभव थी, उस समय तक तो विभिन्न वर्णों के लोग हर क्षेत्र में कार्यरत थे ही, बाद के वर्षों में भी जब जातिप्रथा समाज पर अपनी जकड़ बना चुकी थी, विभिन्न जातियों के प्रतिभाशाली लोग धर्म, राजनीति, व्यापार, शिल्पकला आदि में अपनी उपस्थिति बनाए हुए थे. मगध सम्राट महानंद शूद्र था. चाणक्य के प्रयासों से महानंद से सत्ता हथियाने वाला चंद्रगुप्त मौर्य भी शूद्र ही था. वैदिक तत्ववेत्ताओं में रैक्व और सत्यकाम जाबालि भी शूद्र वर्ग से आए थे. सत्यकाम जाबालि की मां तो वेश्या थी. सुग्रीव, बालि, हनुमान वन्य जाति से संबंधित थे, जिन्होंने अपनी शांति की कीमत पर साम्राज्यवादी राम से समझौता किया था. रामायण और महाभारत में असुर जातियों का उल्लेख हुआ है, जिनका ब्राह्मणधर्म से तीखा विरोध था और उनके बीच लड़ाइयां चलती ही रहती थीं.

असुरों में भी एक से बढ़कर एक प्रतापी राजा हुए हैं, जिन्हें वर्णव्यवस्था से बाहर होने के कारण क्षत्रिय नहीं माना जा सकता. राम के पूर्वज अयोध्या के सम्राट नहुष भी ब्राह्मणवाद के मुखर विरोधियों में से थे. राजा हरिश्चंद्र को अपने ब्राह्मणविरोध के चलते अनेक कष्ट झेलने पड़े थे. इसके बावजूद एक षड्यंत्र के रूप में लोगों को बताया जाता रहा कि केवल ही समाज का बौद्धिक नेतृत्व कर सकता है. केवल क्षत्रिय में युद्धकौशल और राज करने की कला और वैश्य को व्यापार का गुण आता है. रामायण काल से लेकर गौतम बुद्ध, यहां तक कि हषवर्धन तक शूद्र कही जाने वाली जातियां व्यापार में काफी आगे थीं. जुलाहों, कोविदों, तैलिकों, तांबूलकों, काष्ठकारों, शिल्पकर्मियों आदि के अपने व्यापारिक संगठन थे, जिनकी पहुंच राजदरबारों तक थी. महत्त्वपूर्ण अवसरों पर सम्राट उनसे परामर्श लेता था. राज्य के अधीन संचालित अनेक कल्याणकारी योजनाओं के सफलतापूर्वक संचालन के लिए इन संगठनों का सहयोग लिया जाता था. लेकिन साजिशाना ढंग से, विशेषकर धर्मग्रंथों में इस तथ्य की घोर उपेक्षा की गई. गैर द्विज जातियों को या तो जानबूझकर छोड़ दिया गया, अथवा उनकी उपलब्धियों और गुणों का उल्लेख करते समय कृपणता को अपनाया गया, ताकि छोटी कही जाने वाली जातियों का आत्मविश्वास डोलता रहे. ‘शूद्रधर्मः परो नित्यं शुश्रूषा च द्विजातिषु’—तीनों वर्णों की सेवा करना ही शूद्र का परम कर्तव्य है, यह महाभारत में व्यास के मुंह से कहलवाया गया है, जो स्वयं शूद्र थे. एक अन्य जगह पर इसी महाकाव्य में लिखा है—‘देवताद्विज बंदक’, देवताओं एवं ब्राह्मणों की सेवा, शिल्पकर्म, खेतीबाड़ी, नाटक और नक्काशी जैसे काम शूद्रों के हैं, ब्राह्मण के लिए ये कार्य निषिद्ध थे. इस तरह की बातों से न केवल शूद्रों के स्वाभिमान को चुनौती दी गई, बल्कि उनकी उपलब्धियों को अपना बताकर समाजनिर्माण में उनकी भूमिका को कमतर आंका गया.

जिस समाज में ऐसा सोच हो, जहां कर्मकांडों की बहुलता हो, जहां आत्मरक्षा को सबसे बड़ा आपद्धर्म माना जाता हो. जो समाज स्त्रियों के बारे में कहा जाता हो कि ‘स्त्रियोहि मूलं दोषाणाम्’ अर्थात ‘स्त्रियां बुराई की जड़ होती हैं. जिसका मानना हो कि विपत्ति के लिए बचाए धन से पहले भार्या को बचाएं. लेकिन खुद पर संकट आन पड़े तो बचाने के लिए धन और पत्नी दोनों को जाने दें. जिस समाज का ऐसा निर्लज्ज सोच हो, जो समाज अपनी तीनचौथाई आबादी से संसाधन छीनकर उन्हें दूसरे के सहारे जीवनयापन के लिए विवश बना दे, जिस समाज में स्वार्थ को नीति की मान्यता प्राप्त हो, जहां आत्मरक्षा ही सबसे बड़ा आपद्धर्म माना जाता हो, जहां शास्त्रों की व्यवस्था हो कि—‘एक आदमी की कीमत पर कुल को बचाना चाहिए. कुल जा रहा हो तो गांव को बचाना चाहिए. गांव की कीमत देकर जनपद को बचाना चाहिए. पर अपने को बचाने का सवाल हो तो सारी पृथ्वी को कुर्बान कर देना चाहिए.’ ऐसे समाज में सचमुच की समानता होगी, यह विचार गले नहीं उतरता.

वेदसमर्थित वर्णव्यवस्था सत्तावान वर्ग को अतिरिक्तरूप से अधिकारसंपन्न बनाती थी, इसलिए आगे चलकर उस व्यवस्था को बदलना असंभवसा होता गया. वेदों में या तो ब्राह्मण पुरोहित हैं अथवा उनके यजमान. इनके अतिरिक्त उनका वर्णन है जिनका इंद्र ने अपनी श्रेष्ठता दर्शाने के लिए हनन किया. विजेता के पक्ष में वह समाज है जो दूसरे के परिश्रम पर जीवनयापन का अभ्यस्त है. किसान, श्रमिक, शिल्पकार आदि की उपस्थिति वहीं तक है, जहां तक वह सामंतवाद का पोषण करती हो. इनके अलावा अनगिनत देवगण हैं, जो ब्राह्मणों से समिधा ग्रहण करते हैं, इसलिए उनके संरक्षक हैं. सर्वशक्ति संपन्न होने के बावजूद वे दूसरे के श्रम का क्यों खाते हैं? उन्हें आत्मप्रशंसा क्यों प्रिय है? क्यों बिना चाटुकारिता कराए उनसे रहा नहीं जाता? भोजन करने से पहले उन्हें भोग लगाए बिना वे क्यों नाराज हो जाते हैं? इन प्रश्नों का उत्तर न तो वेदों में है, न ही बाद के ग्रंथों में इसपर विचार किया गया है. बल्कि अधिकांश जगह इसको श्रद्धा का मसला बताकर टाल दिया जाता है. हैरानी की बात यह होती है कि दिनभर सड़कों पर पत्थर तोड़कर अपने परिवार का पोषण करने वाला श्रमिक भी अपनी मामूली आय का एक हिस्सा चढ़ावे में चढ़ाकर देवता से अपने कल्याण की प्रार्थना करता है. वह कभी यह प्रार्थना नहीं करता कि देवता उसके भारी काम को पूरा करने में उसका सहयोग करे. पत्थर तोड़ने या मेहनत का दूसरा कोई काम जो वह करता है, उसमें उसके साथ मिलकर पसीना बहाए. कोई धर्मग्रंथ इसपर विचार नहीं करता कि परिश्रम श्रमिक की नियति और मुफ्तखोर होना, दूसरे की कमाई खाना देवताओं की नियति क्यों है. ऐसे ही देवताओं की महिमा का बखान वेदों में है. इसके अलावा उनमें बलि है, सुरापान की प्रशंसा है, पुरोहितों का व्यभिचार है यानी उनमें हर वह वस्तु अथवा विचार है जो शिखरस्थवर्गों के अन्याय, उत्पीड़न, वर्चस्व, विशेषाधिकार को उचित ठहराता हो. वेदों में तत्कालीन जनजीवन की झलक न होकर, निरर्थक कर्मकांडों का गुणगान है.

बौद्धकाल

बौद्धधर्म का उद्भव वैदिक धर्म की प्रतिक्रिया में हुआ था. वेदों में बहुदेववाद, कर्मकांड और युद्धों का इतना विशद् वर्णन है कि उनके आगे उनकी दार्शनिक, नैतिक, आध्यात्मिक चिंतनधारा म्लान दिखने लगती है. इसलिए वे तत्वचिंतन के नाम पर कर्मकांड, धर्म के बजाय पाखंड, नीति के स्थान पर ऊंचनीच और आडंबर रचते हुए नजर आते हैं. पुरोहित वर्ग उनके माध्यम से धर्मदर्शन की स्वार्थानुकूल और मनमानी व्याख्याएं थोपने का प्रयास करता है. राजनीति के सहयोग से वह इस धृष्टता में कामयाब भी होता है. धर्म और राजसत्ता परस्पर मिलकर लोगों के शोषण के लिए नएनए विधान गढ़ते हैं. समाजार्थिक शोषण का यह सिलसिला लगभग पांच शताब्दियों तक निरंतर चलता है. ऐसा भी नहीं है कि शेष समाज शोषण को अपनी नियति मान चुका था. बल्कि जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, ब्राह्मणवाद का विरोध उसके आरंभिक दिनों से ही होने लगा था. मगर उसको रचनात्मक दिशा देने का काम किया था, जैन और बौद्ध दर्शन ने. इन दोनों दर्शनों ने वेदों की बुद्धिवाद की उस धारा को नई एवं युगानुकूल दिशा देने का काम किया, जो कर्मकांड और मिथ्याडंबरों के बीच अपनी पहचान लगभग गंवा चुकी थी.

जैन और बौद्ध धर्म के प्रवर्तक क्रमशः महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध, ईसा से छह शताब्दी पहले, क्षत्रिय कुल में जन्मे थे. अपनेअपने दर्शन में दोनों ने ही कर्मकांड और आडंबरवाद का जमकर विरोध किया था. दोनों ही यज्ञों में दी जाने वाली पशुबलियों के विरुद्ध थे. दोनों ने शांति और अहिंसा का पक्ष लिया था, और भरपूर ख्याति बटोरी. जैन और बौद्ध, दोनों ही दर्शनों को भारतीय चिंतनधारा में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. इनमें से जैन धर्म अहिंसा को लेकर अत्यधिक संवेदनशील था, जबकि जीवन को लेकर बुद्ध का दृष्टिकोण व्यावहारिक था. अहिंसा के प्रति अत्यधिक आग्रहशीलता के कारण जैन दर्शन प्रचारप्रसार के मामले में बौद्ध दर्शन से पिछड़ता चला गया. व्यावहारिक होने के कारण बौद्ध दर्शन को उन राजाओं आ समर्थन भी मिला जो ब्राह्मणवाद से तंग हो चुके थे; और उपयुक्त विकल्प की तलाश में थे.

गौतम बुद्ध ने कर्मकांड के स्थान पर ज्ञानसाधना पर जोर दिया था. पशुबलि को हेय बताते हुए वे अहिंसा के प्रति आग्रहशील बने रहे. वेदवेदांगों में आत्मापरमात्मा आदि को लेकर इतने अधिक तर्कवितर्क और कुतर्क हो चुके थे कि बुद्ध को लगा कि इस विषय पर और विचार अनावश्यक है. इसलिए उन्होंने आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि विषयों को तात्कालिक रूप से छोड़ देने का तर्क दिया. उसके स्थान पर उन्होंने मानवजीवन को संपूर्ण बनाने पर जोर दिया. समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए उन्होंने पंचशील का सिद्धांत दिया. जिसमें पहला शील है, अहिंसा. जिसके अनुसार किसी भी जीवित प्राणी को कष्ट पहुंचाना अथवा मारना वर्जित कर दिया गया था. दूसरा शील था, चौर्य. जिसका अभिप्राय था कि किसी दूसरे की वस्तु को न तो छीनना न उस कारण उससे ईर्ष्या करना. तीन शील सत्य था. मिथ्या संभाषण भी एक प्रकार की हत्या है. सत्य की हत्या. इसलिए उससे बचना, सत्य पर डटे रहना. तीसरे शील के रूप में तृष्णा न करना शामिल था. व्यक्ति के पास जो है, जो अपने संसाधनों द्वारा अर्जित किया गया, उससे संतोष करना. आवश्यकता से अधिक की तृष्णा न करना. इसलिए कि यह पृथ्वी जरूरतें तो सबकी पूरी कर सकती है, मगर तृष्णा एक व्यक्ति की भी भारी पड़ सकती है. पांचवा शील मादक पदार्थों के निषेद्ध को लेकर है. पंचशील को पाने के लिए उन्होंने अष्ठांगिक मार्ग बताया था, जिसमें उन्होंने सम्यक दृष्टि(अंधविश्वास से मुक्ति), सम्यक वचन(स्पष्ट, विनम्र, सुशील वार्तालाप), सम्यक संकल्प(लोककल्याणकारी कर्तव्य में निष्ठा, जो विवेकवान व्यक्ति से अभीष्ट होता है), सम्यक आचरण(प्राणीमात्र के साथ शांतिपूर्ण, मर्यादित, विनम्र व्यवहार), सम्यक जीविका(किसी भी जीवधारी को किसी भी प्रकार का कष्ट न पहुंचाना), सम्यक परिरक्षण(आत्मनियंत्रण और कर्तव्य के प्रति समर्पण का भाव), सम्यक स्मृति(निरंतर सक्रिय एवं जागरूक मस्तिष्क) तथा सम्यक समाधि(जीवन के गंभीर रहस्यों पर सुगंभीर चिंतन) पर जोर दिया था.

बुद्ध की चिंता थी कि किस प्रकार मानवजीवन को सुखी एवं समृद्ध बनाया जाए. सुख से उनका अभिप्राय केवल भौतिक संसाधनों की उपलब्धता से नहीं था. इसके स्थान पर वे न केवल मानवजीवन के लिए सुख की सहज उपलब्धता चाहते थे, बल्कि समाज के बड़े वर्ग के लिए सुख की समान उपलब्धता की कामना करते थे. यह वैदिक ब्राह्मणवाद के समर्थकों से एकदम भिन्न था. जिन्होंने परलोक की काल्पनिक भ्रांति के पक्ष में भौतिक सुखों की उपेक्षा की थी, जबकि उनका अपना जीवन भोग और विलासिता से भरपूर था. यही नहीं वर्णाश्रम व्यवस्था के माध्यम से उन्होंने समाज के बहुसंख्यक वर्गों, जो मेहनती और हुनरमंद होने के साथसाथ समाज के उत्पादन को बनाए रखने के लिए कृतसंकल्प थे, सुख एवं समृद्धि से दूर रखने की शास्त्रीय व्यवस्था की थी. शूद्र कहकर उसको अपमानित करते थे. और इस आधार पर उन्हें अनेक मानवीय सुविधाओं से वंचित रखा गया था.

उल्लेखनीय है कि वेदों के आडंबरवाद का विरोध उन्हीं दिनों शुरू हो चुका था. उस समय के महानतम विद्वान कौत्स तो वैदिक ऋचाओं को शब्दाडंबर मात्र मानते थे. समाज का बड़ा वर्ग वैदिक परंपराओं का खंडन करता था. इस कारण वेद समर्थकों और उनके विरोधियों के बीच घमासान भी होते रहते थे. जिनसे कूटनीति और छल के कारण ब्राह्मणवादियों को विजय प्राप्त हुई थी. दरअसल यह बुद्ध ही थे जिन्होंने दर्शन को वायवी आडंबर से बाहर लाकर आचरण और व्यवहार के धरातल पर लाकर अवस्थित किया था. उन्होंने दर्शन को निरर्थक और अनुपयोगी प्रश्नों के चक्र से बाहर लाकर जीवन से जोड़ा. मानव मन की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं के सापेक्ष नैतिकता को केंद्र में लेकर आए. पंडितों और पुरोहितों से अलग भाषा अपनाते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि धर्म और दर्शन, दोनों का उद्देश्य इस विश्व का पुनर्निर्माण करना है, ब्रह्मांड की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं. आज प्रयोगों द्वारा सिद्ध हो चुका है कि ब्रह्मांड की व्याख्या वैज्ञानिक नियमों द्वारा ही सटीक ढंग से की जा सकती है. नैतिकता से कटा हुआ धर्म महज आडंबर है. विरोधियों की आलोचना की परवाह न करते हुए उन्होंने आगे कहा कि सृष्टि का केंद्र मनुष्य है, न कि ईश्वर. धर्म के बारे में उनका कहना था कि उसका केंद्रविषय नैतिकता है. वे जीवन में दुःख को अवश्यंभावी मानते थे. साथ ही उनका मानना था कि दुःखों से मुक्ति संभव है. इसके लिए जीवन के प्रति संपूर्ण समर्पण अनिवार्य है.

पुरोहितों और पंडितों के चंगुल से आमजन को बचाने के लिए उन्होंने अष्ठांग मार्ग का प्रवर्तन किया. जीवन की पवित्रता के लिए उन्होंने उसको संपूर्णता के साथ अपनाने की सलाह दी. बातबात पर पुरोहितों और धर्माचार्यों की शरण में जाने वाले लोगों को उन्होंने नेक सलाह दी—अप्प दीपो भवः अपना दीपक स्वयं बनो. उन्होंने जोर देकर कहा कि सुख केवल शीर्षस्थ वर्गों की बपौती नहीं है. गृहस्थ के लिए धनार्जन न तो पाप है, न कोई अभिशाप. जीवन के प्रति मध्यमार्गी दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने धर्नाजन को गृहस्थ के लिए अनिवार्य उपक्रम माना. वे पहले धर्माचार्य थे, जिन्होंने गणतंत्र का पक्ष लिया, यह उस युग में एकदम क्रांतिकारी था. परिणाम यह हुआ कि सांसारिक सुखों के प्रति जनसामान्य पापबोध लगातार घटने लगा. शिल्पकर्मियों को शूद्र का दर्जा देकर उन्हें तरहतरह से प्रताड़ित किया जाता था. बौद्ध धर्म में जातिवर्ण के लिए कोई स्थान न था. बल्कि सभी के लिए सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार था. इसलिए जातीय उत्पीड़न का शिकार रही जातियां बड़ी तेजी से बौद्धधर्म में शामिल होने लगीं. देखते ही देखते वह देश की सीमाएं पार कर, विदेशी भूमियों पर अपनी पकड़ बनाता गया.

बुद्ध स्वयं क्षत्रिय थे. उनके समकालीन महावीर स्वामी भी क्षत्रिय ही थे. दोनों ने ही राजनीतिक सुखसुविधाओं को ठुकराकर अध्यात्मचिंतन का मार्ग चुना था. राजघराना छोड़कर उन्होंने चीवर धारण किया था. इसलिए बाकी वर्गों में विशेषकर उन लोगों में जो ब्राह्मणों और उनके कर्मकांडों से दूर रहना चाहते थे, जैन और बौद्धधर्म की खासी पैठ बनती चली गई. मगर सामाजिक स्थितियां बौद्ध धर्म के पक्ष में थीं. इसलिए कि एक तो वह व्यावहारिक था. दूसरे जैन दर्शन में अहिंसा आदि पर इतना जोर दिया गया था कि जनसाधारण का उसके अनुरूप अपने जीवन को ढाल पाना बहुत कठिन था. यज्ञों एवं कर्मकांडों के प्रति जनसामान्य की आस्था घटने से उनकी संख्या में गिरावट आई थी. उनमें खर्च होने वाला धर्म विकास कार्यों में लगने लगा था. पहले प्रतिवर्ष हजारों पशु यज्ञों में बलि कर दिए जाते थे. महात्मा बुद्ध द्वारा अहिंसा पर जोर दिए जाने से पशुबलि की कुप्रथा कमजोर पड़ी थी. उनसे बचा पशुधन कृषि एवं व्यापार में खपने लगा. शुद्धतावादी मानसिकता के चलते ब्राह्मण समुद्र पार की यात्रा को निषिद्ध और धर्मविरुद्ध मानते थे. बौद्ध धर्म में ऐसा कोई बंधन न था. इसलिए अंतरराज्यीय व्यापार में तेजी आई थी. चूंकि अधिकांश राजाओं द्वारा अपनाए जाने से बौद्ध धर्म राजधर्म बन चुका था, इसलिए युद्धों में कमी आई थी, जो राजीनितिक स्थिरता बढ़ने का प्रमाण थी. व्यापारिक यात्राएं सुरक्षित हो चली थीं. जिससे व्यापार में जोरदार उछाल आया था.

ये सभी स्थितियां जनसामान्य के लिए भले ही आह्लादकारी हों, मगर ब्राह्मणधर्म के समर्थकों के लिए अत्यंत अप्रिय और हितों के प्रतिकूल थीं. इसलिए उसका छटपटाना स्वाभाविक ही था. अतएव महात्मा बुद्ध को लेकर वे ओछे व्यवहार पर उतर आए थे. बुद्ध का जन्म शाक्यकुल में हुआ था, जो वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार क्षत्रियों में गिनी जाती थी. ब्राह्मणों ने उन्हें शूद्र कहकर लांछित किया, जिसको बुद्ध इन बातों से अप्रभावित बने रहे. दर्शन को जनसाधारण की भावनाओं का प्रतिनिधि बनाते हुए उन्होंने दुःख की सत्ता को स्वीकार किया. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि दुःख निवृत्ति संभव है. उसका एक निर्धारित मार्ग है. दुःख स्थायी और ताकतवर नहीं है. बल्कि उसको भी परास्त किया जा सकता है.

बुद्ध का दर्शन वर्जनाओं पर प्रहार का दर्शन है. सबसे पहले वह वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रहार करते हैं. उस व्यवस्था पर प्रहार करते हैं, जो ब्राह्मणों को विशेषाधिकार संपन्न बनाती है. पुरोहितवाद की जरूरत को नकारते हुए वे कहते हैं— तुम स्वयं दीपक हो.तुम्हें किसी बाहरी प्रकाश की आवश्यकता नहीं हैं. किसी मार्गदर्शक की खोज में भटकने से अच्छा है कि अपने विवेक को अपना पथप्रदर्शक चुनो. समस्याओं से निदान का रास्ता मुश्किलों से हल का रास्ता तुम्हारे पास है. सोचो, सोचो और खोज निकालो. इसके लिए मेरे विचार भी यदि तुम्हारे विवेक के आड़े आते हैं, तो उन्हें छोड़ दो. सिर्फ अपने विवेक की सुनो. करो वही जो तुम्हारी बुद्धि को जंचे. न्होंने पंचशील का सिद्धांत दुनिया को दिया. उसके द्वारा मर्यादित जीवन जीने की सीख दुनिया को दी. कहा कि सिर्फ उतना संजोकर रखो जिसकी तुम्हें जरूरत है. तृष्णा का नकारहिंसा छोड़, जीवमात्र से प्यार करो. प्रत्येक प्राणी को अपना जीवन जीने का उतना ही अधिकार है, जितना कि तुम्हें है. इसलिए अहिंसक बनो. झूठ भी हिंसा है. इसलिए कि वह सत्य का दमन करती है. झूठ मत बोलो. सिर्फ अपने श्रम पर भरोसा रखो. उसी वस्तु को अपना समझो जिसको तुमने न्यायपूर्ण ढंग से अर्जित किया है. पांचवा शील था, मद्यपान का निषेध. बुद्ध समझते थे वैदिक धर्म के पतन के कारण को. उन कारणों को जिनके कारण वह दलदल में धंसता चला गया. दूसरों को संयम, नियम का उपदेश देने वाले वैदिक ऋषि खुद पर संयम नहीं रख पा रहे थे. अपने आत्मनियंत्रण को खोते हुए उन्होंने खुद ही नियमों को तोड़ा. मांस खाने का मन हुआ तो यज्ञों के जरिये बलि का विधान किया. कहा कि ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ और अपनी जिव्हा के स्वाद के लिए पशुओं की बलि देते चले गए. नशे की इच्छा हुई तो सोम को देवताओं का प्रसाद कह डाला और गले में गटागट मदिरा उंडेलने लगे. ऐसे में धर्म भला कहां टिकता. कैसे टिकता!

बुद्ध पहले महात्मा थे, साहचर्य का पाठ दुनिया को पढ़ाया. उससे पहले आश्रम सहजीवन की पहचान हुआ करते थे. लेकिन वहां गुरु का नाम चलता था. सारे आश्रम गुरु के नाम से जाने जाते थे. वौद्ध विहार किसी एक भिक्षु की संपत्ति नहीं थे. वे सबसे साझे थे. बुद्ध का कहना था कि जो है, सबका है. जितना है, उसको मिलबांटकर उपयोग करो. उनके भिक्षुसंघ की व्यवस्था ही ऐसी थी. प्रारंभ में गौतम बुद्ध का शिष्यत्व धारण करने वाले अधिकांश भिक्षु राजपरिवारों से आए थे. संघ के नियमानुसार प्रत्येक भिक्षु को चीवर धारण करना पड़ता था. जिसका अर्थ है जीर्णशीर्ण परिधान. उस समय आम आदमी के यही वस्त्र थे. वह मेहनत मजदूरी करता और अपने राजा के लिए कमाता था. जमीन या संपत्ति पर उसका अधिकार न था. वह राजा की मानी जाती थी. लगान चुकाने के बाद जो बचता उससे वह सिर्फ आधा तन ही ढक पाता था. बहुत बाद में अपने राजनीतिक गुरु गोविंदवल्लभ पंत के कहने पर गांधी जी जब ‘भारत को जानने’ के लिए यात्रा पर निकले तो उन्होंने भी एक नदी तट पर ऐसे ही अंधनंगे स्त्रीपुरुषों को देखकर अपने वस्त्र उनकी ओर बहा दिए थे. वह जनता के दुःखदर्द को पहचानकर उसके करीब आने की कोशिश थी. बिना इसके लोगों के दिल में बनाना आसान न था. बौद्ध संघों के नियम भी ऐसे थे कि जो भी वहां आए, अतीत के वैभव को बिसराकर सच्चे मन से आए.

बुद्ध के कुछ शिष्यों को अच्छा नहीं लगा कि उनका गुरु ऐसे जीर्णशीर्ण वस्त्र धारण करे. यह उनका प्रेरक रहा होगा. मगर यह उस सत्ता की प्रतीति का भी परिणाम था, जो धर्मसत्ता के संगठित होतेहोते आकार ले लेता है. ऐसे शिष्यों ने बुद्ध के लिए नए कपड़े से बुना चीवर लाकर दिया. प्रार्थना की कि उसको पहनें. बुद्ध ने अपने शिष्यों पर निगाह डाली. वे भी जीर्णशीर्ण चीवर में थे. ‘मुझे कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन संघ में तो सभी बराबर हैं. बाकी भिक्षु भी पुराने वस्त्र क्यों धारण करें. उस दिन के बाद से संघ में पुराने कपड़े का बना चीवर पहनने की शर्त हटा दी गई.

ऐसा ही एक और उदाहरण है. गौतम बुद्ध की मां माया तो उन्हें जन्म देने के नवें दिन ही मर चुकी थीं. उन्हें मां का स्नेह देकर पालने वाली थी, गौतमी, जिन्हें वे सदैव मां का सम्मान देते रहे. गौतम बुद्ध ने भिक्षु संघ की स्थापना की तो गौतमी भी उसमें सम्मिलित हो गई. सर्दी का मौसम था. गौतमी ने बुद्ध को एकमात्र चीवर में देखा तो उनका वात्सल्य मचलने लगा. जानती थीं कि राजपाट को ठोकर मार चुका उनका संन्यासी बेटा सर्दी से बचाव के लिए भी अन्य वस्त्र धारण नहीं करेगा. इसलिए उन्होंने रातदिन लगकर बुद्ध के लिए एक गुलुबंद तैयार किया. उसको लेकर वे खुशीखुशी उनके पास पहुंची और उनसे पहनने का आग्रह किया. बुद्ध ने बाकी भिक्षुओं की ओर देखा. वे सभी एकमात्र चीवर में थे. उन्होंने गुलुबंद लेने से इनकार कर दिया. बोले कि यदि यह उपहार है तो सभी भिक्षुओं के लिए होना चाहिए. सिर्फ उन्हीं के लिए क्यों? गौतमी ने बहुत अनुनयविनय की. लेकिन बुद्ध नहीं माने. समाजवाद की, सहजीवन की पहली शर्त है, संसाधनों में बराबर की हिस्सेदारी. इसके लिए उनका राष्ट्रीयकरण. बुद्ध ने भिक्षु संघ की जो व्यवस्था की थी, उसके अनुसार समस्त संपत्ति संघ की मानी जाती थी. संपत्ति और संसाधनों के समान बंटवारे के अतिरिक्त भिक्षु संघ में अधिकारों का भी एकसमान विभाजन था. सभी निर्णय सहमति के आधार पर लिए जाते थे. भिक्षु संघ के बीच महात्मा बुद्ध की हैसियत अधिक से अधिक एक प्रधान सचिव जैसी थी. किसी को भी मनमानी करने अथवा अपना निर्णय थोपने का अधिकार नहीं था. महात्मा बुद्ध वैशाली गणतंत्र के प्रशंसक थे. ऐसी ही व्यवस्था वे भिक्षु संघ में चाहते थे. जीवन के उत्तरार्ध में कम से कम दो अवसर ऐसे आए, जब उनसे उनके उत्तराधिकारी के बारे में पूछा गया था. कहा गया कि जिसको वे उपयुक्त समझते हों उसको संघ की व्यवस्था सौंप सकते हैं. उस समय यदि वे चाहते तो किसी भी व्यक्ति को यह दायित्व सौंपकर उपकृत कर सकते थे. मगर हर बार उन्होंने यही कहा कि धम्म ही संघ का सेनापति है. और आजकल के कथावाचक टाइप स्वयंभू भगवानों को देखें, जो धर्म के नाम पर बने अपने संगठन को भी किसी कारपोरेट कंपनी की भांति चलाते हैं. धर्म के नाम पर जनसाधारण की भावनाओं का दोहन कर मुनाफा बटोरना और पूंजी बटोरना ही उनका ही