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उतावले समाज के बीच बचपन

सामान्य

उस दिन पुराने प्रकाशक मित्र के घर जाना हुआ. आजकल वे मंदी से जूझ रहे हैं. कारण अंदरूनी हैं. पहले प्रकाशन को दो भाई मिलकर चलाते थे. बाद में छोटे के मन में लालच उमड़ा. उसने नया प्रकाशन खोल लिया. वह पहले से जुड़े साहित्यकारों को अपनी ओर खींचने लगा. पुराना संस्थान घाटे में आ गया. अपनों की मार से कराह रहा व्यक्ति प्रायः भावुक हो जाता है. वे अपना दुखड़ा बयां कर ही रहे थे कि उनका पोता खेलता-खेलता कमरे में चला आया. जैसे अंधेरे कमरे में धूप ने दस्तक दी हो. चमत्कार की तरह उनके चेहरे का विषाद एकाएक धुल गया. उन्होंने पोते को गोद में उठा लिया—

‘कश्यप जी, कुल मिलाकर तीन साल का है. लेकिन बड़े से बड़ा वाक्य एक साथ बोल लेता है. पूरी तरह साफ. मानो डॉ…..शर्मा खुद लौट आए हों….’ उन्होंने नगर के चर्चित भाषा-विज्ञानी रह चुके अपने दिवंगत पिता का नाम लिया. बच्चे की बातें सुनकर मैं समझ चुका था कि वे गलत नहीं कह रहे. बालक सचमुच ही तेज है. मेरी निगाहें उसी पर टिकी थीं. किंतु मस्तिष्क पर ईशान छाया हुआ था. मेरा साढ़े तीन वर्ष का पोता. बच्चे की जन्मतिथि पूछकर मैं जान चुका था कि ईशान उससे चार महीना बड़ा है. और मैं यह कल्पना कर रहा था कि चार महीने पहले, यानी उस बच्चे की अवस्था में ईशान का व्यवहार कैसा था. दिमाग में चौकड़ी भरते स्पर्धा के अश्व, ईशान को उस बच्चे से आगे लिए जा रहे थे. बालक अभी भी अपनी धुन में मग्न था. प्रकाशक मित्र के चेहरे पर उमड़ा वात्सल्य और चमक बता रही थी कि उन्हें भी अपने पोते के निरालेपन पर गर्व है.

यह सामान्य बात है. जीवन में ऐसे अनुभव अकसर होते रहते हैं. बच्चों की विलक्षण मेधा को लेकर सैकड़ों-हजारों कहानियां हमने पढ़ी हैं. शास्त्रों में नचिकेता, ध्रुव, सत्यकाम, उपमन्यु, अभिमन्यु, आरुणि उद्दालक आदि न जाने कितने विलक्षण प्रतिभाशाली और सूझ-बूझ संपन्न बच्चों का जिक्र है. पश्चिम में भी उदाहरण कम नहीं हैं. प्लेटो की विलक्षण मेधा के बारे में जन्म से ही भविष्यवाणी कर दी गई थी. जेम्स मिल ने अपने बच्चे की प्रतिभा को पहचाना था और जैसा उसे वह बनाना चाहता था, वैसा उसने किया. फलस्वरूप बेटा जॉन स्टुअर्ट मिल महान दार्शनिक बना. जन्म के समय हर बालक नचिकेता और अभिमन्यु की भांति ही प्रतिभाशाली होता है. जब वह दुनिया में आता है तो किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त होता है. सीधे प्रकृति के साथ उसका जुड़ाव होता है. उसके अतिरिक्त यदि किसी दूसरे से उसका अपनापा होता है तो उस स्त्री से जिसने उसको जन्म दिया है. इसलिए नहीं कि वह उसकी मां है. मां संबोधन के मायने क्या हैं, यह उसकी समझ में बहुत बाद में आता है. उससे पहले उसका संबंध प्राकृतिक होता है. मां उसे भोजन देती है. उसका लालन-पालन करती है. आवश्यकता पड़ने पर उसे सुरक्षा भी देती है. मां की गोद से वह परिवेश में झांकने की शुरुआत करता है. प्रकृति के अंश के रूप में अपने चारों ओर विस्तृत ब्रह्मांड को देखकर वह विस्मित होता है. यह विस्मय ही जिज्ञासा का मूल है. छोटे-से छोटा बालक अपने आसपास की वस्तुओं के बारे में जान लेना चाहता है. यह बचपन की स्वाभाविक प्रक्रिया है. चूंकि परिवेश की हरेक वस्तु बालक के लिए नई होती है, इसलिए वह उनमें से प्रत्येक को जान लेना चाहता है. न केवल दृश्य को, बल्कि दृश्यमान के पीछे जो अदृश्य कारण है, उसे जानने की भी उसकी जिज्ञासा होती है.

फिर हमें हर बालक अजूबा क्यों लगता है? क्यों उसकी जल्दी से जल्दी सीखने की आकुलता हमें हैरत में डाल देती है? क्या इसलिए कि उसकी बातें हमें दुनियादारी से बाहर की लगती हैं. हमें लगता है कि बालक जो सोच रहा है, उसका यथार्थ से कोई संबंध नहीं है! यह अस्वाभाविक भी नहीं है. बालक की दुनिया हमसे स्वतंत्र होती है. वह अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखना चाहता है. जबकि हमारी कोशिश होती है कि बालक जल्दी से जल्दी अपने दुनिया छोड़कर हमारी बिरादरी में सम्मिलित हो जाए. एक सीमा तक तो यह जरूरी भी है. बालक को जिस समाज में रहना है, उसके रीति-रिवाजों, परंपराओं और प्रवृत्तियों के बारे में उसको जानना ही चाहिए. लेकिन बड़े होने के नाते हमारी ओर से इतनी उदारता जरूरी है कि बालक को बजाय हमेशा सिखाते रहने के, उसे समझने और आवश्यकतानुसार कुछ सीखने की इच्छा भी रखें. इसके बावजूद बालक की दुनिया को जाने बिना, बगैर उसकी मौलिकता का सम्मान किए, उसपर अपनी परंपराएं लाद देने की माता-पिता की कोशिशें उसके जन्म के साथ ही आरंभ हो जाती है. इस मामले में हमारा उतावलापन कमाल का होता है. बालक जब शैशवावस्था में होता है, तभी हम उसकी दुनिया को वस्तुओं से, उन वस्तुओं से जिनके बारे में हमें बताया जाता है कि वे बालक की पसंद से जुड़ी हैं, भर देना चाहते हैं. बालक की रुचि और उसकी जिज्ञासा पर हम उतना ध्यान नहीं देते, जितना किसी न किसी रूप में अपनी पसंद की वस्तुओं को उसपर लादने पर. बालक घर की पुरानी चीजों से, कबाड़ से खेलना चाहता है, हाथ में कलम या पैंसिल आ जाए तो वह उससे दीवार पर आड़ा-तिरछा कुछ बना देना चाहता तो उससे हमें असुविधा होती है. हम उसको ‘गंदी बात’ कहकर बरजते रहते हैं. बालक निरुत्साहित होकर अपनी भावनाओं को छिपाने लगता है. कुछ बच्चे भीतर-ही-भीतर घुटने लगते हैं. नतीजा यह होता है कि जन्म के कुछ महीने बाद ही बालक अपनी मौलिकता खोने लगता है. बालक और उसके माता-पिता एक ही परिवेश में साथ-साथ रहते हैं. लेकिन परिवेश को देखने की दोनों की दृष्टि अलग-अलग होती है. बालक के लिए उसकी जिज्ञासा और कौतूहल महत्त्वपूर्ण होते हैं. इसलिए वह परिवेश के प्रति बोधात्मक दृष्टि रखता है. उसकी उत्सुकता एक विद्यार्थी की उत्सुकता होती है. माता-पिता सहित परिवार के अन्य सदस्यों की दृष्टि बाह्यः जगत को उपयोगितावादी नजरिये से देखती है. वे वस्तुओं को जानने से ज्यादा उन्हें उपयोग करने के लिए अपने साथ रखते हैं. आसान शब्दों में कहें तो वस्तु जगत के प्रति बालक और बड़ों की दृष्टि में दार्शनिक और व्यापारी जैसा अंतर होता है. लोकप्रिय संस्कृति में बाजी सामान्यतः व्यापारी के हाथ रहती है. उसका नुकसान ज्ञानार्जन के क्षेत्र में मौलिकता के अभाव के रूप में सामने आता है.

बालक और उसकी जिज्ञासा वृत्ति के आकलन के बहुस से तरीके हैं. तीन-चार वर्ष का बालक अपने माता-पिता, सगे-संबंधियों से औसतन 450 सवाल प्रतिदिन पूछता है. उत्तर मिल जाता है तो जानने की इच्छा और भड़कती है. प्रत्येक प्रश्न अपने साथ पुनः कुछ नए प्रश्न लाता है. हर सवाल के साथ उसकी जिज्ञासा कुलांचे भरती रहती है. वह सवाल के भीतर से सवाल निकालता है. उत्तर न मिले तो मायूस हो जाता है. भीतर उमगते कौतूहल के समाहार के लिए वह फिर सवाल करता है. यदि बार-बार पूछने पर भी प्रश्नों के उत्तर न मिलें तो उसकी प्रश्नाकुलता दम तोड़ने लगती है. बड़ों के साथ यह बात नहीं होती. उन्हें यह भ्रम होता है कि उन्होंने ‘जो कुछ जानने योग्य था, वह जान लिया है.’ इसी के साथ वे अपनी जिज्ञासावृत्ति से पीछा छुड़ा लेते हैं. अपनी बंधी-बधाई दिनचर्या में वे नएपन का अनुभव शायद कर ही नहीं पाते हैं. यदि कोई नया ज्ञान दिमाग के दरवाजे पर दस्तक भी दे तो झट से उससे किनारा कर जाते हैं. इसे जानकर क्या होगा?’ यह हमारे सुख-वैभव में कितनी वृद्धि करेगा? वगैरह. उनकी ज्ञान और उसके वास्तविक उपकरणों के प्रति सामान्य उपेक्षा बनी ही रहती है. छोटा बच्चा दार्शनिक की भांति अपनी हर जिज्ञासा का समाधान चाहता है. वह सवाल की तह तक पैठना चाहता है. बुढ़ापा आते-आते आदमी आम तौर पर पोंगा-पंडित बनकर रह जाता है.

यह सच है कि बालक की सीखने की ललक हमसे ज्यादा होती है. इसलिए नहीं कि वह बुद्धि में हमसे तेज होता है. बल्कि इसलिए कि उसके पास ढेरों प्रश्न होते हैं. उसे इस बात का बोध होता है कि उसे क्या नहीं आता. सुकरात के शब्दों में कहें तो बालक को अपने अज्ञान का ज्ञान होता है. उसकी भरपाई के लिए वह सवाल करता है. बड़े मना कर देते हैं, मुंह फेर देते हैं, टाल जाते हैं. झुंझलाकर हड़का भी देते हैं, फिर भी वह सवाल करना नहीं छोड़ता. इस मोर्चे पर बड़े बालक से पिछड़ा हुआ पाते हैं. इसलिए कि वे अपनी जिज्ञासा, सीखने की ललक, ज्ञानार्जन की चाहत को दुनियादारी के बीच मार चुके होते हैं. उनके सामने उनकी महत्त्वाकांक्षाएं होती हैं. ऐसी महत्त्वाकांक्षाएं जो उनकी अपनी ईजाद नहीं होतीं. प्रायः दूसरों के अनुसरण में अपना ली जाती हैं. उपलब्धि को वे भौतिकता के पैमानों से आंकते हैं—‘उसकी कमीज मेरी कमीज से सफेद क्यों?’, ‘हमारी कार पड़ोसी की कार से छोटी क्यों’ वगैरह….दूसरों से पिछड़ जाने की चिंता उन्हें मारे रहती है. ठीक है सपने देखना बुरा नहीं. यदि कोई किसी वस्तु को अपने पास रखना चाहता है तो वस्तु को वैधानिक तरीके से अर्जित कर उसका स्वामित्व प्राप्त करने का अधिकार उसे है. समस्या तब उत्पन्न होती है जब वह किसी ऐसी वस्तु जिसे वह स्वयं अर्जित करने में नाकाम रहा है, को अपनी संतान के माध्यम से पाना चाहता है. चाहता है कि उसके बेटे-बेटियां उसके सपनों को अपना समझकर उन्हें पाने को समर्पित हों. भूल जाता है कि बच्चों का भी स्वतंत्र सोच और वरीयताएं हो सकती हैं. इसके बावजूद अधिकांश माता-पिता माने रहते हैं कि उनका अपनी संतान पर निर्जीव वस्तुओं जितना ही अधिकार है.

बालक की दुनिया को लेकर अपनी कल्पना होती है. वह अपनी कल्पना के संसार को बसाना चाहता है. ठीक है उन्हें तत्काल पूरा करना उसके बस की बात नहीं होती. अपनी छोटी-से-छोटी जरूरत के लिए वह माता-पिता पर निर्भर होता है. संतानोत्पत्ति और बच्चे का लालन-पालन माता-पिता का नैसर्गिक कर्म है. यह कार्य उन्हें बालक के मौलिक सोच की सुरक्षा के साथ करना चाहिए. उसपर अपने विचार थोपने से उस समय तक बचना चाहिए जब तक उससे परिवार में बहुत बड़ा नैतिक संकट उत्पन्न होने की संभावना न हो. बावजूद इसके बालक के सपनों की कद्र करने के बजाय उन्हें अपने सपनों की चिंता सताए रहती है. ऐसे में सवाल करता हुआ बालक उनके लिए समस्या बन जाता है. माता-पिता को बालक के वे सवाल फिजूल लगने लगते हैं, जिनका उनके अपने सपनों से कोई वास्ता न हो. उससे बालक के सामने असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. उसके लिए यह तय करना कठिन हो जाता है कि वह अपने सपनों पर ध्यान दे, दुनिया को उस दृष्टि से देखे, जैसा वह सोचता आया है या वैसा करे जैसा उसके माता-पिता और अभिभावक उससे चाहते हैं. चूंकि वह माता-पिता पर आश्रित है, उनसे भावनात्मक और भौतिक संरक्षण प्राप्त करता है. अतः उसके लिए माता-पिता की उपेक्षा करना भी सर्वथा संभव नहीं होता. यह स्थिति उसे अनचाहे तनाव की ओर ले जाती है.

कई बार सुविधा और संसाधन जुटाने की कोशिश में लगे माता-पिता बच्चों पर पूरा ध्यान नहीं दे पाते. वे दिन-भर आॅफिस में या दूसरी ऐसी जगह खटते रहते हैं जहां से कुछ आमदनी हो सके. दूसरी ओर बच्चे पहले स्कूल फिर टयूशन. टयूशन भी एक नहीं, दिन में चार-चार ट्यूशन. दिन-भर कड़ी स्पर्धा. माता-पिता सुविधा-संसाधन बटोरने के लिए उतावलापन दिखाते हैं. बालक से चाहते हैं वह पढ़ने-लिखने में उतावलापन दिखाए, ताकि वे अपने मृत हो चले सपनों में प्राण-प्रतिष्ठा कर सकें. ऐसे माता-पिता दिखावा तो यह करते हैं मानो वे अपना योग्य उत्तराधिकारी तैयार करना चाहते हैं. असल में उनकी कोशिश बच्चों पर अपनी इच्छाएं लादने की पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाने; यानी खुद को श्रेष्ठ उत्तराधिकारी सिद्ध करने की होती है. उनका तर्क होता है कि माता-पिता की विनम्र संतान के रूप में वे स्वयं अपने सपनों को दांव पर लगा चुके हैं. इसलिए बच्चों पर अपनी इच्छाएं लादना कहीं से भी गलत नहीं है. दिखाई गई तस्वीर से अलग दुनिया को लेकर कोई नया सपना उनके पास नहीं होता. एक बार मौलिकता गंवा देने के बाद उनके पास अनुसरण के सिवाय दूसरा रास्ता रह ही नहीं जाता. वे मान लेते हैं कि दुनिया जैसी है, उसी रूप में अच्छी है. स्पर्धी समाज में परिवार के ऐसे बहुत से काम जिन्हें माता-पिता की ओर से पूरा करने की अपेक्षा की जाती है, बच्चे को करने पड़ते हैं. बालक उन्हें अपनी क्षमतानुसार निपटाते भी हैं, माता-पिता की महत्त्वाकांक्षा को उनकी विवशता मानकर सबकुछ खुशी-खुशी करने को तैयार रहते हैं. लेकिन एक बालक होने नाते उनकी स्वाभाविक इच्छा होती है कि माता-पिता सप्ताह का एक दिन उनके लिए सुरक्षित रखें. कई माता-पिता अपनी संतान की इस मामूली मगर स्वाभाविक इच्छा में भी पिछड़ जाते हैं.

बालमन पर बड़ों के सपनों के अध्यारोपण ने बच्चों का बचपन छीन लिया है. ऐसा नहीं कि बालक उसे जानता तक नहीं. वह इतना नादान भी नहीं होता कि आपकी बातें मान ले. ज्यूं की त्यूं मान ले. उस समय उसका सामना अपने ही भीतर विराजमान उस सजग बालक से होता है जो अपने जीवन को अपनी तरह से जीना चाहता है. जिसके अपने सपने हैं. जीवन के प्रति अपना खास द्रष्टिकोण है. कर्तव्यों के बीच द्वंद्व की स्थिति उसको डांवाडोल कर देती है. उन्हें लगता है कि उनसे कुछ छीना जा रहा है. इसी के साथ वह अपने कर्तव्य की ओर से उदासीन होने लगता है. अवांछित उदासीनता उसको घेरने लगती है. वह काम से जी चुराने लगता है. स्कूलों में हमने बिगडै़ल बच्चों को देखा होगा. प्रायः वे अपने परिवेश से उकताए हुए जीव होते हैं. उन्हें लगता है कि उनकी सुनी नहीं जा रही. इसलिए वे गुस्से के जरिये अपना क्षोभ प्रकट करते हैं. गुस्सा इसलिए आता है कि क्षोभ और असंतोष प्रकट करने के दूसरे तरीके यानी संवाद का रास्ता अपनाने का उन्हें अभ्यास नहीं होता. उन्हें यह अभ्यास कराया ही नहीं जाता. जबकि यह बहुत जरूरी है. इससे बालक का आत्मविश्वास बढ़ता है. उसकी निर्णय क्षमता में सुधार आता है. संवाद के लिए जरूरी नहीं कि एकाधिक व्यक्ति ही हों. व्यक्ति अपने आप से भी संवाद कर सकता है. कई बार अपने आप से संवाद का होना भी लाभदायक होता है. इसके अभाव में उनका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है. वे स्वयं को दिशाहीन, उदासीन, लक्ष्यविहीन और अनुरागविहीन नजर आते हैं. ये ऐसी समस्याएं हैं बच्चों का दूर रहना ही श्रेयस्कर है. लेकिन ऐसा हो नहीं पाता. द्वंद्व और द्वैध की स्थिति उन्हें चिड़चिड़ा बना देती है. उसका दुष्परिणाम बच्चों में सिरदर्द, पेटदर्द, अनिद्रा, भूख न लगना, तनाव, एकाकीपन, अवसाद आदि रूप में सामने आता है.

सबकुछ एकाएक समेटने की कोशिश में माता-पिता हर काम में उतावलापन दिखाते हैं. वे चाहते हैं बालक जल्दी से जल्दी बड़ा होकर कैरियर को संभाले. इसके लिए वे बालक को जल्दी से जल्दी सबकुछ पढ़ा देना चाहते हैं. माता-पिता का यह रोग अंततः उनकी संतान में भी चला आता है. आपाधापी के बीच माता-पिता के लिए भी यह संभव नहीं होता कि वे बालक का पूरी तरह अपने सपनों के अनुसार अनुकूलन कर सकें. यानी बालक उन्हीं मामलों में बड़ा हो जिनमें उसके माता-पिता चाहते हैं. बड़ा होने की आपाधापी में वह उस दिशा में भी बढ़ जाता है, जो उसके बचपन के लिए घातक सिद्ध हो सकती है. अभी तक पश्चिमी देश इसके ज्यादा शिकार हैं. लेकिन भारत में जिस गति से शहरीकरण बढ़ रहा है, कैरियर के लिए अंतहीन स्पर्धा और तनाव से बालक को गुजरना पड़ता है, वहां भी इसका असर पड़ने लगा है. नतीजा यह हुआ है कि बच्चों में नशाखोरी बढ़ रही है. स्कूलों में अपराध, आत्महत्या, किशोरावस्था में गर्भधारण का अनुपात तेजी से बढ़ रहा है. विकसित देशों में इसके जो आंकड़े देते हैं, वे किसी भी सभ्य देश के लिए चिंताजनक हैं. आंकड़ों के अनुसार 70 प्रतिशत किशोरियां किशोरावस्था से पहले ही अपना कौमार्य खो देती हैं. उनमें से 40 प्रतिशत गर्भ के कारण अपने जीवन को खतरे में डाल देती हैं. इनके अलावा ड्रग और शराब के बड़ते हुए मामले, आत्महत्या तेजी से बढ़ रही है. पांच हजार किशोर प्रतिवर्ष किसी न किसी कारण आत्महत्या के लिए बाध्य होते हैं. इनमें बहुत से ऐसे होते हैं जो अपने साथ-साथ अपने माता-पिता के सपनों के बोझ से दबकर कराह रहे होते हैं.

परिवार की आर्थिक बेहतरी के लिए काम करने का दबाव गरीब परिवारों में भी होता है. लेकिन गरीब माता-पिता बच्चों को इसलिए बड़ा होते देखना चाहते हैं ताकि वे आर्थिक मामलों में उनकी मदद कर सकें. लेकिन उनकी ऐसी हैसियत नहीं होती कि बच्चों को उनकी वयस् के अनुकूल काम दिला सकें. परिणामस्वरूप गरीब बालक कम उम्र में ही चाय के ढाबों पर, होटलों में, कबाड़ी के यहां, स्टेशनों पर छोटे-मोटे काम करने लगते हैं, जहां उन्हें नशाखोरी और शराब की शरण में जाने के अधिक अवसर प्राप्त होते हैं. मध्यवर्गीय परिवार अपने सपनों के साथ जीता है. वहां माता-पिता की चाहत होती है कि बालक जल्दी से जल्दी बड़ा होकर नाम कमाए, उसका अच्छा कैरियर हो, ताकि वे उन सभी सुख-साधनों को प्राप्त कर सकें, जिन्हें वह स्वयं पाने में नाकाम रहे हैं. दूसरे शब्दों में गरीब परिवारों के बच्चों के सपने छोटे, जरूरतें बड़ी होती हैं. वही उन्हें छोटे-मोटे धंधों में अपना बचपन छकाने के लिए विवश कर देती हैं. किंतु स्टेशन पर, ढाबों, होटलों, बाजार में कुलीगिरी करते हुए उनके चारों ओर का परिवेश ऐसा होता है जो उन्हें जरूरतें पूरी करने के फेर में भटकाव की ओर ले जाता है.

मध्यवर्गी परिवार के बालक के कंधों पर अभिभावकों के सपनों का बोझ होता है. अपेक्षाएं होती हैं. कठिन स्पर्धा के बीच अनिश्चितता भी होती है. इससे वह तनाव का शिकार हो जाता है. तनाव-मुक्ति की खोज उसे ड्रग, शराब आदि दुव्र्ययनों की ओर ले जाती है. यानी बच्चे चाहे गरीब परिवार में जन्मे हों या मध्यवर्गी परिवार में, बचपन को बचपन की भांति न जीने देने के दबाव दोनों को एक ही नियति की ओर ढकेल देते हैं. इसमें दोष किसका है? मध्य वर्ग में पला-बढ़ा बालक जानता है कि उसको तनाव की ढकेलने, अपनी अपेक्षाओं का बोझ लादने और असमय ही बचपन छीन लेने के लिए उसके माता-पिता भी जिम्मेदार हैं. गरीब माता-पिता की संतान अपेक्षाकृत उदारता बरतती है. वह जानती है कि उन्हें असमय काम पर ढकेल देना, उनके माता-पिता की जरूरत थी. गरीब माता-पिता अपनी जरूरतें बच्चे पर लादते हैं. बच्चे भी उनसे इत्तफाक रखते हैं. इसलिए वे माता-पिता को दोष देने के बजाय समाज को दोष देते हैं, जिसमें भारी आर्थिक उतार-चढ़ाव हैं. जहां अमीर छाती ठोंककर अपने उत्पाद का, ऐसे उत्पाद का मूल्यांकन करता है, जिसे बनाने में उसका अपना श्रम-योगदान शून्य है. जबकि गरीब से उसके श्रम के मूल्यांकन का अधिकार भी छीन लिया जाता है.

गरीब माता-पिता की संतान समझती है कि उनपर अपनी मजबूरी लादना माता-पिता की विवशता थी. मध्यवर्गी और उच्च मध्यवर्गी माता-पिता की संतान असफलता की अवस्था में सीधे अपने माता-पिता को दोष देती है. वह मान लेती है कि अपने माता-पिता के सपनों को साकार करने के बजाय अपना श्रम उन्होंने यदि अपने सपनों को साकार करने में लगाया होता तो अधिक कामयाब हो सकते थे. गरीब परिवार में जन्मा बालक अपने माता-पिता द्वारा समुचित समय न देने को इसलिए भी क्षमा कर देता है कयोंकि वह जानता है कि उनके लिए माता-पिता के पास समय ही नहीं था. जबकि मध्यमवर्गी माता-पिता द्वारा बालक के समुचित विकास के लिए समय दे ही नहीं पाते. क्योंकि उस अवधि में वे अपनी स्वार्थ-सिद्धि में जुटे होते हैं. यह स्थिति मध्यवर्गी परिवारों में असंतोष और विघटन की बढ़ती दर के रूप में सामने आती है. और बच्चों के मामले में तो तय है कि वे बचपन में जैसा भोगते हैं, बड़ा होने पर उसी को सूद समेत लौटाते हैं. बकौल डेबिड अलकिंद, ‘तरुणाई वह अवस्था है जब बच्चे हमारे उन सभी अपराधों को, चाहे वे वास्तविक हों अथवा काल्पनिक हमें वापस लौटा देते हैं जो हमने उनके विरुद्ध तब किए थे, जब वे छोटे थे.’

ये बातें ऐसी नहीं जो अजानी हों. बालक के कोमल मन पर परिवार और परिवेश के प्रभाव के बारे में मनोवैज्ञानिक अर्से से बताते आ रहे हैं. इसके बावजूद स्थिति दिनोंदिन भयावह हो रही है. नई तकनीक ने मां के गर्भ में झांकने की ताकत इंसान को दे दी है. इस काबलियत का उपयोग मनुष्य गर्भ से ही बालक की कंडीशनिंग के लिए करने लगा है. ‘सुपर बेबी’, ‘मनचाही संतान’ की सनक बालक को जन्म से ही माता-पिता की प्रयोगशाला बना देती है. तीन महीने के बच्चे का बौद्धिकता स्तर मापने के प्रयोग बढ़ रहे हैं. टेलीविजन पर लाइव शो ने एक और स्पर्धा खड़ी कर दी है. वहां तीन-चार वर्ष तक के बच्चे हाथ-पैर चलाने की कोशिश करते हुए मिल जाएंगे. उनके माता-पिता गर्व से बताते हैं कि वे महीनों पहले उनकी ट्रेनिंग आरंभ कर चुके हैं. यानी दो-ढाई साल के बालक को ज्ञान की, सौंदर्य की, खेल की, नांच-गाने और संगीत की स्पर्धा में ढकेल दिया जाता है.

चूंकि यह काम बाजार की मर्जी से हो रहा है, इसलिए बाजार उसका लाभ भी उठा रहा है. गर्भ से ही बच्चे की जांच, शैश्वावस्था में बौद्धिकता परिक्षण के लिए महंगी किट बाजार में आने लगी हैं. टेलीविजन, फिल्म आदि पर बच्चों की सक्रियता देख उनके लिए डिजायन कपड़ों के अलावा चार से नौ वर्ष के बच्चे के लिए लिपिस्टिक, आई लाईनर, साबुन, क्रीम, फेशियल जैसे उत्पादों से बाजार अटे पड़े हैं. नाच-गानों में बच्चों से कामुक मुद्राएं कराई जाती हैं. उसकी समस्याएं भी सामने आ रही हैं. बालक जल्दी वयस्क होने लगे हैं, उनका चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है. अजीर्ण, सिर-दर्द, उल्टी, नजर की कमजोरी जैसी व्याधियां असमय ही उनसे चिपक जाती हैं. बालक को डिजायनर कपड़े पहनाने, फैशन की डगर पर पटक देने में माता-पिता को उसका विकास नजर आता है. उनमें से अधिकांश वे हैं जो लार्ड मैकाले को कोसते हैं कि उसने भारतीयों पर अंग्रेजी थोपी. शिक्षा का ढर्रा बदलकर उसे रटंत-कला बना दिया. आज के शिक्षाशास्त्री उन्हें नजर नहीं आते जो बाजार के इशारे पर ज्ञान को सूचना में समेट चुके हैं. पूरी शिक्षा प्रणाली जिसे बालक के मौलिक और बहुआयामी विकास को समर्पित होना चाहिए, सूचना और आंकड़ों में सिमटकर रह गई है. कोई मानवाधिकारवादी संगठन इसके विरुद्ध खड़ा नजर नहीं आता. प्रकट-अप्रकट रूप में सभी ने बालक को माता-पिता की विशिष्ट परिसंपत्ति मान लिया है. यह एक चुनौती है. जिससे निपटने के लिए बालक की बेहतरी की सोचने, उसको समग्र मानवीय इकाई मानने वाले साहित्य, साहित्यकार एवं शिक्षा-मनीषियों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है.

© ओमप्रकाश कश्यप

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हिंदी बालसाहित्य : अतीत से आज तक

सामान्य

कोई भी भाषा तभी समृद्ध मानी जा सकती है, जब उसमें समाज के प्रत्येक वर्ग जिनमें स्त्रीपुरुष, बालवृद्ध, धनवाननिर्धन, उच्च और अल्प शिक्षित आदि सभी के लिए भरपूर पाठ्यः सामग्री उपलब्ध हो. भरपूर पाठ्यसामग्री से हमारा अभिप्राय शिक्षा, संस्कृति, कला, दर्शन, साहित्य एवं साहित्येत्तर विषयों पर आवश्यक समस्त शब्दसंपदा से है, जो किसी भी समाज के प्रबोधीकरण के लिए अनिवार्य हो सकती है. पाठ्य सामग्री की बहुलता के साथ आवश्यक है कि उसको पढ़ने, समझने और पसंद करने वाले भी बहुसंख्यक हों. हालांकि किसी भाषा का पूरी दुनिया के लिए एकसमान उपयोगी होना, विभिन्न मान्यताओं, संस्कृतियों और सभ्यता वाले समाजों के प्रत्येक वर्ग से, एक ही स्तर पर संवाद करना पूर्णतः आदर्श एवं अव्यावहारिक अवस्था है, लेकिन किसी भी भाषा के लिए जो स्वयं को जीवंत और सचेतक होने का दम भरती हो, जिसका दुनिया के विभिन्न समाजों के बीच संपर्क सेतु बनाने का दावा हो, यह पवित्र लक्ष्य भी है. चूंकि देश की भांति प्रत्येक भाषाभाषी समाज की भी सीमाएं, विशिष्ट सामाजिकसांस्कृतिक आग्रह एवं परिस्थितियां होती हैं. इसलिए प्रत्येक वर्गविषय के अनुरूप पर्याप्त सामग्री उपलब्ध करा पाना, अभी तक किसी भी भाषा के लिए संभव नहीं हो पाया है. वैसी स्थिति में व्यावहारिक रूप में भाषा की समृद्धता का स्तर समाज में उसकी पैठ तथा उसके लिए साहित्य एवं ज्ञानविज्ञान से भरपूर पाठ्यसामग्री की उपलब्धता से लिया जाता है.

जब कोई भाषा लोक संपर्क से आगे बढ़ती है, तो वह सबसे पहले अपने समाज की मूलभूत जिज्ञासाओं को पंख देना चाहती है. उसके बाद उसका अगला काम उन जिज्ञासाओं, जीवनानुभवों, सामाजिकसांस्कृतिक प्रतीकों, पुराख्यानों तथा ज्ञान के अन्यान्य उपादानों को सहेजते हुए, जिन्हें वह समाज के प्रबोधीकरण के लिए आवश्यक मानती है—विमर्श के बीच निरंतर बनाए रखना रह जाता है. इन जिज्ञासाओं में जीवनजगत की उपस्थिति, व्यक्ति और समाज की समस्याएं, परिस्थतिकीय ससंबंध, प्रकृति और बृह्मांड से उपजी जिज्ञासाएं होती हैं. स्वाभाविक रूप से हर भाषा पहले इन्हीं चुनौतियों से दोचार होती है. वह न केवल उनसे प्रभाव ग्रहण करती है, बल्कि अनिवार्यरूप से उनको प्रभावित भी करती है. शायद इसीलिए इतिहास में प्रत्येक भाषा पहले आध्यात्मिक जिज्ञासाओं की शोधक बनी है. कालांतर में उसमें समाज, संस्कृति, उत्पादन के साधनों के आधार पर विकसित अर्थनीति, राजनीति एवं विज्ञान सहित अन्य लोकोपयोगी धाराएं भी समाविष्ठ होती जाती हैं. देखा जाए तो यही मनुष्य की बौद्धिक चेतना का विस्तारक्रम भी है. जिसे हम साहित्य कहते हैं अथवा साहित्य का जो रूप आजकल प्रचलित है, वह विभिन्न विचारधाराओं के समन्वय एवं संघर्ष, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकीकरण के परिणामों, उसकी उपलब्धियों, विसंगतियों एवं तज्जनित आंदोलनों का संवेदनात्मक विस्तार है.

किसी भी समाज में साहित्य की प्रथम दस्तक लोककथाओं एवं लोकपरंपराओं के रूप में सामने आती है. ये साहित्य की वे मूल धाराएं हैं, जिनके लिए औपचारिक शिक्षा आवश्यक नहीं होती. वाचिक परंपरा में समाज के सभी वर्ग इनसे न केवल लाभान्वित होते हैं, बल्कि अपनीअपनी तरह से इनके विस्तार में योगदान भी देते हैं. साहित्य का आदिस्वरूप वाचिक परंपरा से समृद्ध रहा है. सहस्राब्दियों तक वही सभ्यता और संस्कृति के आदानप्रदान, लोकानुभवों को सहेजने, अंतरित करने, नए प्रतीक तथा जीवनमूल्य गढ़ने का माध्यम बना रहा. साहित्य का जो रूप आज प्रचलन में है तथा उसकी परिभाषा से जो सामान्यबोध अभिव्यक्त होता है—कुछ शताब्दियों के पहले तक साहित्य के वह मायने नहीं थे. साहित्य का आरंभिक रूप मनुष्य की नैसर्गिक आवश्यकता की भांति स्वतः जन्मा. वह मनुष्य को उपयोगी जान पड़ा इसलिए उसको अपनाया जाने लगा. अपने आदिरूप में साहित्य लोक संस्कार का हिस्सा था. मनोरंजन के अलावा लोग उसका उपयोग अपने मंतव्य को स्पष्ट करने, बात को धार देने, तार्किकता प्रदान करने हेतु भी करते थे. जीवन में स्थायित्व आने पर समाज की एकता एवं विकासदर को बनाए रखने के दबाव ने साहित्य की सप्रयोजन रचना की मांग को जन्म दिया. हालांकि लेखनकला के विकास तथा उसकी सर्वोपलब्धता तक साहित्य का मौखिक रूप ही बहुस्वीकार्य बना रहा. कालांतर में लिपि का विकास हुआ तो साहित्य को जैसे ठोस आधार मिला. जनसाधारण तक उसकी पहुंच बढ़ी, साथ में जिम्मेदारियां तथा अपेक्षाएं भी. लिपिबद्ध साहित्य पर बहस करना आसान था. उससे एकाएक मुकर पाना संभव नहीं था. इससे विचारधाराओं के जन्म का मार्ग प्रशस्त हुआ. लोकसाहित्य में रचनाकार की पहचान स्थायी रखने का कोई कारगर उपाय न था. लिपिबद्ध साहित्य ने यह समस्या दूर कर दी थी. अब रचनाकार आसानी से अपना नाम रचना के साथ चला सकता था. इससे रचनाओं पर परिश्रम कर, सोचसमझकर उद्देश्यपूर्ण ढंग से लिखने की परंपरा ने जोर पकड़ा. धीरेधीरे विचारधारा की अभिव्यक्ति के लिए भी साहित्य का उपयोग होने लगा. सवाल उठता है कि वे कौनसी आवश्यकताएं थीं, जिन्होंने साहित्य को जन्म दिया. उसको मनुष्य के लिए अपरिहार्य बनाया. इसके लिए हमें मानवइतिहास के वे पन्ने पलटने होंगे जब वह आखेट युग से कृषि युग में प्रवेश कर चुका था और जीवन में आए स्थायित्व ने मनुष्य को सोचने के लिए न केवल नए क्षेत्र बल्कि अवसर भी दिए थे.

कृषिकला के विकास ने मानवीय सभ्यता के विकास को नए पंख दिए थे. आखेट युग में मनुष्य का प्रमुख भोजन मांस था. उसकी सुलभता थी, परंतु जुटा पाना आसान न था. शिकार करने के लिए मनुष्य को कठिन परिश्रम भी करना पड़ता था. इस कार्य में जान का भी खतरा था. स्वयं शिकार हो जाने का खतरा शिकारी के सिर पर मंडराता ही रहता था. पशु उत्पादों को भोज्य पदार्थ के रूप में उपयोग करने की दूसरी कमजोरी थी कि उन्हें लंबे समय तक संरक्षित कर पाना संभव न था. जबकि कृषि उत्पादों को न केवल लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता था, बल्कि कृष्ठ भूमि की प्रचुरता के कारण अकेला व्यक्ति अनेक परिवारों के लिए भोजन उगा सकता था. इससे बची हुई श्रमशक्ति का उपयोग शिल्पकर्मों में होने लगा, जो कृषिकर्म के विकास के साथ समाज की अनिवार्य आवश्यकता बन चुके थे. कृषिऔजार तथा जीवन की बढ़ती जरूरतों के लिए अन्यान्य वस्तुओं की आपूर्ति के लिए मृदाकारी, लौहकारी, काष्ठकर्म, बुनकर, चर्मकारी जैसे शिल्पकर्मों का विकास हुआ. अतिरिक्त अनाज को संरक्षित करने के लिए मिट्टी के बर्तन बनाए जाने लगे. भोजन की निश्चिंतता बढ़ने से सभ्यता के विकास को गति मिली. उपजाऊ भूस्थलों पर, जहां सिंचाई के लिए पानी का उपयुक्त प्रबंध था, मानव बस्तियां आकार गढ़ने लगीं. समूह की सदस्य संख्या बढ़ने के साथसाथ समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए भी मनुष्य की जिम्मेदारी बढ़ती जा रही थी. समाज को व्यवस्थित रखने के लिए ग्रामणी, गण, गणप्रमुख आदि पदों का सृजन किया गया. इन पदों पर समाज के वरिष्ठ एवं योग्यतम व्यक्तियों को बिठाया जाता. यही वर्ग अतिरिक्त अनाज के सरंक्षण एवं जरूरतमंद लोगों के बीच विपणन का दायित्व वहन करता था.

एक ओर समाज भौतिक जीवन में प्रगति की डगर पर था तो दूसरी ओर उसकी बौद्धिक उपलब्धियां नितनए आसमान छू रही थीं. उसकी बुद्धि विराट प्रकृति के जितने रहस्यों का अनावरण करती, उतनी ही उलझती जाती थी. वह उसकी विलक्षणता के प्रति नतमस्तक था. जिज्ञासा के आयाम अनंत थे. उन सबका एकाएक समाधान उसके लिए संभव न था. मनुष्य की बौद्धिक सीमाओं ने प्रकारांतर में प्रकृति के प्रति दैवीय भाव को जन्म दिया. वैसे भी खेती हो अथवा नदीसागर तट पर बनी बस्ती, सभी तो प्रकृति की कृपा पर निर्भर थे. बारिश न पड़े तो खेती बंजर बन जाए, अतिवृष्टि हो तो खड़ी फसल बह जाए. जीवन से कदमकदम पर जूझता मनुष्य इन प्राकृतिक आपदाओं का सामना भी करता था. आपदाओं के डर तथा प्रकृति के प्रति मन में उमड़ी अतिश्रद्धा ने स्तुतियों को जन्म दिया. जीवनसंघर्ष से गुजरते मनुष्य ने अपनी भावनाओं को कविता में ढालना, कहानी में पिरोना आरंभ कर दिया. इसके मूल में आदि मानव की मनोरंजन की भूख तथा दूसरों के साथ अपने अनुभव बांटने की ललक थी.

दिनभर की घटनाएं सुननासुनाना भी कम मनोरंजक न था. सांझ को काम से निवृत्त हुए लोग अलाव के सहारे, गांवबस्ती के सार्वजनिक स्थलों पर जुटते तो अनुभवोंआख्यानों के आदानप्रदान का सिलसिला आरंभ हो जाता. उन्हीं में एकाध व्यक्ति ऐसा भी मिल जाता, जिसको कहन की कला में दूसरों की अपेक्षा महारत हासिल होती. लोगों का सूचना के साथ मनोरंजन भी हो जाता. प्रकृति के सीधे साहचर्य में रहने वाले, कदमकदम पर संघर्ष करने वाले मनुष्य के लिए यह सौगात कम न थी. इसलिए लोगों के बीच वह व्यक्ति गुणी, अतिरिक्त सम्मान और सराहना का पात्र समझा जाता. चतुर किस्सागो अपनी रचना में जीवनजगत से जुडे़ उदाहरण पेश करता, साथ में कुछ न कुछ काम की बातें भी जोड़ देता था. इससे वे न केवल मनोरंजन की कसौटी पर सौ टका खरी उतरतीं, बल्कि बालकोंबड़ों को बौद्धिकरूप में समृद्ध भी बनाती थीं. इस तरह साहित्य का वाचिक रूप समाज में विकसित होने लगा था. लेखनकला का विकास हुआ तो रोजमर्रा के अनुभवों तथा संपर्क में आने वाले व्यक्तियों, पशुपक्षियों, वस्तु जगत आदि को लोकाख्यानों में ढालने, सुगठित रचना का रूप देने की परंपरा बनी. इससे साहित्य और अन्यान्य कलाओं के विकास को गति मिली. अनुभव सहेजे जाने से मनुष्य के बौद्धिक विकास को पुनः गति मिली.

सभ्यता के विकास केव्व दौरान अक्षर की खोज मनुष्य के लिए सर्वाधिक चौंकाने और आत्ममुग्ध कर देने वाली है. यह उसको रचयिता की अनुभूति से भर देती है. इसलिए मनुष्य ने ज्यों ही अक्षरों को जोड़ना सीखा, इस कला का उपयोग उसने अपने सोच और संकल्पनाओं को शब्दबद्ध करने के लिए किया. इसमें उसको अभूतपूर्व आनंद मिला. मनुष्य अथवा समाज विशेष की धार्मिकआध्यात्मिक जिज्ञासाओं के उस समय तक पूर्णतः निजी, सीमित और उथला रह जाने का अंदेशा था, जब तक कि उनमें समाज के वृहद हिस्से के लिए उपयोगी तत्व न हो. इसलिए उसके लेखन में धार्मिकआध्यात्मिक जिज्ञासाओं के साथ उन सामान्य नैतिकताओं को भी स्थान मिलने लगा, जिन्हें मनुष्य ने विकासक्रम के अंतर्गत अपने अनुभव से जानासमझा था. जिनके बिना उसे लगता था कि समाज का चल पाना असंभव होगा. रचे गए धर्मग्रंथ तथा उनमें वर्णित विचार सर्वमान्य तथा बहुउपयोगी हों, इसके लिए उनमें लोककल्याण की भावना को स्थान मिला. चूंकि सृजन का काम कहीं न कहीं बड़ेपन की अनुभूति से भी भर देता था, अतएव रचनाकार तथा उसकी कृति को दैवीय मानने का चलन हुआ. मानवमात्र के लिए कल्याणकारी कृतियों को लोकेत्तर माने जाने का चलन आरंभ हुआ. वे आसानी से सर्वग्राह्यः हों, इसके लिए उनके साथ दैवीय सहमति जैसा कुछ जोड़ा जाने लगा. भारतीय मनीषियों ने नाम के बजाय लेखन के उद्देश्य को प्राथमिकता दी है. विशेषकर प्राचीन समाजों में, जहां विद्वानों की लंबी कतार है जो अपनी बड़ी से बड़ी रचना से अपना जोड़ने के बजाय उसको स्थापित गोत्र या ऋषिकुल के नाम करते रहे हैं. उनके द्वारा प्रणीत ग्रंथों का उद्देश्य ही लोककल्याण की उदात्त भावना थी. समाज की ओर से मानव जीवन के लिए अनिवार्य मान लिए गए आचारविचारों के प्रतिपादन हेतु रचित ग्रंथों को कालांतर में दैवीय मानने का चलन हुआ. इस प्रवृत्ति के पीछे आरंभ में भले ही मनुष्य की सदेच्छाएं, सद्भावनाएं रही हों, मगर यह सर्वथा निःस्वार्थ नहीं रह सका. कुछ अरसे बाद ही उनके समर्थन का हवाला देते हुए समाज में एक परजीवी वर्ग पनपने लगा. उसने स्वयं को धर्मग्रंथों का व्याख्याकार, लेखक बताते हुए उनमें मनमाना प्रक्षेपण करना आरंभ कर दिया. प्राचीन ग्रंथों के प्रणयन से एक संकेत भी मिलता है कि वैचारिक द्वंद्व और मतवैभिन्न्य उस उस समय भी थे. ऐसे में वही लेखक या लेखक समूह, जो अपने विचारों के संग्रंथन में सफल रहा, जिसने समावेशी दृष्टि का परिचय दिया, अपने विचारों को बचाने तथा दूरदूर तक फैलाने में भी कामयाब हो सका.

साहित्य का आधुनिक रूप औद्योगिकीकरण और विज्ञान के विस्तार की देन है. जैसा कि ऊपर संकेत किया गया है, उससे पहले या तो सामंतों और राजाओं की प्रशस्ति में किया जाने वाला लेखन था, अथवा आत्मश्लाघा से भरा इतिहास, जिसे राजा और बादशाह अपने आश्रित विद्वानों से लिखवाया करते थे. गौरवशाली अतीत से आगामी पीढ़ियों को परचाने के लिए प्रत्येक भाषा और समाज में महाकाव्य भी लिखे गए. उनमें इतिहास, अर्थशास्त्र, दर्शन तथा राजनीतिकसामाजिक गठन का विवरण मिलता है. इन सब ग्रंथों का आज साहित्येतिहासिक महत्त्व है, मगर उन्हें आधुनिक चेतनाबोध का उत्स मान लेना, एक प्रकार का अतीत व्यामोह, नास्टेल्जिया या अधिक से अधिक स्मृति को सहेजने का परिणाम है. साहित्य में समकालीन मूल्यबोध ही सर्वाधिक प्रेरणाशील एवं उपयोगी होता है. लेकिन परंपरागत रूप में सहेजे गए आचारविचार, नियम, संकल्प आदि भी अपनी भूमिका निभाते हैं.

भारतीय संदर्भों में मनुष्य के सामाजिकसांस्कृतिक विकास के आगे के इतिहास को हम चार वर्गों में बांट सकते हैं—

. वैदिक युग:यह युग मानवेतिहास में लगभग तीन हजार ईसा पूर्व से लेकर लगभग एक हजार वर्ष ईसापूर्व तक विस्तृत है.

. महाकाव्य युग:एक हजार ईसा पूर्व से लगभग छह सौ ईस्वी पूर्व तक.

. बौद्धकाल:ईसा पूर्व छठी शताब्दी से लेकर हर्षवर्धन तक. इस कालखंड का बड़ा हिस्सा इतिहास में भारत के स्वर्णकाल के नाम से भी जाना जाता है. हम इसको प्रबोधनकाल भी कह सकते हैं.

. मध्यकाल से लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन तक:इसमें भक्ति आंदोलन का परिवर्तनकारी दौर भी शामिल है.

. आधुनिक काल:सुविधा की दृष्टि से इस कालखंड को चाहें तो स्वतंत्रता पूर्व और स्वातंत्रयोत्तर भारत में पिछली शताब्दी के दौरान रचे गए बालसाहित्य में भी बांट सकते हैं.

बालसाहित्य की स्वतंत्र अवधारणा का विकास तो बीसवीं शताब्दी में हुआ. उससे पहले बच्चे बड़ों के लिए गए साहित्य से काम चलाते थे. बड़ों के लिए लिखी गई जो रचना बच्चों को रुचिकर लगती, वही उनकी हो जाती थी. यह बात विद्वानों के काफी देर से समझ आई कि बच्चों की रुचि और मनोविज्ञान को पहचानते हुए उनके लिए अलग साहित्य रचा जाए. यह सिर्फ भारत में नहीं हुआ, बल्कि दुनिया के प्रायः सभी देशों, भाषाओं की यही स्थिति रही. वहां भी जिसको श्रेष्ठतम बालसाहित्य कहा जाता है, वह मूलतः बड़ों के लिए रचा गया है. दूसरे शब्दों में बालोपयोगी साहित्य से बालसाहित्य तक की यात्रा अपने भीतर लंबा इतिहास समेटे हुए है. बालसाहित्य की पीठिका को समझने के लिए उसपर संक्षिप्त चर्चा आवश्यक है.

पुरा वैदिक युग से वैदिक युग तक

कहानी कहनेसुनने का इतिहास मानवीय सभ्यता के इतिहास से भी बहुत अधिक पुराना है. सितंबर 1940 को में भ्रमण पर निकले चार फ्रांसिसी किशोरों—मार्सल रेवीडट, जेकुइस मार्शल, साइमन कोइनकस तथा जार्ज एंगेल ने पाइरेनीस पर्वतमालाओं के बीच लेसकाक्स नामक गुफाओं की ऐसी शृंखला की खोज की, जिनकी दीवारों पर जानवरों और कीड़ेमकोड़ों की रंगीन चित्राकृतियां बनी हैं. उससे पहले 1880 स्पेन की अल्टामाइरा नामक गुफाओं में भी इसी प्रकार की शैलचित्र शृंखलाएं पाई गई थीं. ये चित्र महज दीवारों पर उकेरी गई आकृतियां नहीं हैं. बल्कि उनमें अद्भुत कलात्मक तारतम्यता है, जिसमें कथात्मकता का आभास होता है. उससे लगता है कि प्राचीन मनुष्य अपनी अभिव्यक्ति और मनोरंजन के माध्यमों की खोज कर चुका था. अल्टामाइरा की गुफाओं की जब खोज की गई तो अनेक विद्वानों ने इस बात पर संदेह व्यक्त किया था कि पूर्व पाषाण युग का मनुष्य इस प्रकार कलात्मक अभिव्यक्ति की क्षमता क्षमता शायद ही रखता था. उसकी अगली कड़ी के रूप में लेसकाॅक्स गुफाओं की खोज ने उनके संदेह को निर्मूल सिद्ध कर दिया है. कार्बन जांच से पता चला है कि इनमें से कुछ गुफाएं 35,000 वर्ष पुरानी हैं. 1940 के बाद लेसकाक्स में दर्जनों गुफाओं की खोज की जा चुकी है. उनकी दीवारों पर विभिन्न पशुओं की आकृतियां इस प्रकार चित्रित की गई हैं, मानो उनके माध्यम से कहानी कहने का प्रयास किया गया हो. स्पष्ट है कि आखेट युग में मनुष्य कहानी कहने की कला में प्रवीणता प्राप्त कर चुका था. यह स्वाभाविक भी था. समूह में रहकर शिकार करने वाला मनुष्य शाम को जब अपने परिजनों के साथ आराम करने के लिए जुटता होगा, तो दिनभर की घटनाओं को सुननेसुनाने की रुचि स्वाभाविक रूप से लोगों को रहती होगी. इसी से कहानी कला का विकास हुआ. आदि मानव के लिए कहानी सुननासुनाना भी चमत्कारी कला रही होगी. समूह के उन सदस्यों को जो किसी कारण उस दिन शिकार पर जाने में असमर्थ रहे हों, अथवा वृद्ध परिजनों जो शिकार करने में अक्षम हो चुके हों, को दिनभर की संघर्षपूर्ण घटनाओं का रोमांचक बयान देना एक नैमत्तिक कर्म रहा होगा. यदि शिकार करते समय कोई बड़ी घटना घटी है अथवा कोई बड़ा शिकार करने में कामयाबी मिली है तो उसको समूह के सदस्यों के बीच बांटना बड़ा मनोरंजक रहा होगा. कहानी सुनाने के उत्साह में अवश्य ही कुछ अतिश्योक्तिपूर्ण, कुछ अतिरेकी होता होगा, जिसे श्रोता ज्यादा पंसद करते हों. इससे सचाई से परे केवल कल्पनाधारित किस्सेकहानी गढ़ने की शुरुआत हुई, जिनका ध्येय केवल मनोरंजन था. धीरेधीरे जंगल तथा वहां के जानवरों के बारे में कहानियों गढ़ना, शिकार के बनावटी किस्से सुनाने का प्रचलन भी बढ़ता गया.

आदिमानव के लिए यह भी संभव नहीं था कि वह प्रतिदिन शिकार पर जा सके. इसलिए विश्राम के दिनों में शिकार की रूपरेखा बनाना, बच्चों एवं वृद्धों को वन्य जीवों एवं शिकार के बारे में बताना, अपनी स्मृति को बनाए रखने के लिए विशिष्ट अवसरों पर घटनाओं को पत्थर पर उकेरना आदिमानव के पसंदीदा काम रहे होंगे. यह कार्य विभिन्न स्थानों पर वन्य जीवों तथा जंगल की परिस्थितियों के अनुसार भिन्नभिन्न प्रकार से किया जाता है. इससे अलगअलग संस्कृतियों की नींव पड़ी. सिंधु घाटी की सभ्यता में भी बड़ी संख्या में प्रस्तर चित्रावलियां प्राप्त हुई हैं, जिससे लगता है कि वहां भी कहानी कहने की परंपरा मौजूद थी. कह सकते हैं कि कहानियों गढ़ने का प्रचलन एक युगीन घटना है.

शिकार कर्म में निपुण, समूह का नेतृत्व करने वाले नायक, अथवा शिकार के दौरान विपरीत परिस्थितियों में विशिष्ट साहस का प्रदर्शन करने वाले व्यक्ति को अतिरिक्त सम्मान का पात्र समझा जाता होगा. इसलिए उसके किस्से समूहों के बाकी सदस्यों और बच्चों को सुनाने की परंपरा बनी होगी. इसने कालांतर में समूह के नायकों, बहादुर व्यक्तियों को अतिरिक्त महत्त्व मिलना शुरू हुआ. प्रकारांतर में सर्वगुणसंपन्न व्यक्तित्व के रूप में देवताओं की कल्पना की गई. सबसे पहले यह कल्पना कहानियों के माध्यम से सामने आई होगी. इस आधार पर कहा जा सकता है कि कहन की परंपरा मानवसंस्कृति की न केवल साक्षी बनी, बल्कि उसमें सहायक भी रही है. आगे चलकर जब मनुष्य ने पशुपालन व्यवस्था से कृषि व्यवस्था में प्रवेश किया, गांवों और कस्बों का विकास हुआ तो ऐसे व्यक्तियों जो घटनाओं को आकर्षक ढंग से सुना सकें को अतिरिक्त महत्त्व दिया जाने लगा. इसी से पेशेवर किस्सागो का जन्म हुआ. दुनिया का पहला लिखित किस्सा यूनान में गिलगमेश के महाकाव्य के रूप में उपलब्ध है. वह लगभग 4000 वर्ष पुराना है. यूनान के अलावा चीन और भारत भी कहानी सुननेसुनाने की परंपरा आदिकाल से रही है.

प्रायः सभी प्रमुख सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे हुआ. पानी की उपलब्धता के कारण वहां पर खेती करना, पशुओं के लिए भोजन जुटाना आसान था. परंतु नदी के तटवर्ती जीवनबसर की अपनी अलग समस्याएं थीं. बरसात के दिनों में उमड़ती नदियां पूरी बस्ती को तबाह कर जाती थी. तबाही का मंजर वर्षों तक लोगों की यादों में बना रहता और धीरेधीरे किस्से कहानी का रूप ले लेता. प्रायः सभी सभ्यताओं में जलप्लावन को युगांतरकारी घटना के रूप में दर्ज किया है. भारतीय प्रायद्वीप में भी जलप्लावन की घटना शतपथ ब्राह्मण में नई सृष्टि के जन्म के रूप में दर्ज है. इस बात के भी पर्याप्त प्रमाण है कि ईसा से तीन हजार वर्ष तक पहले गांवों में स्थानीय प्रशासन व्यवस्था विकसित हो चुकी थी. ग्राम्यस्तर के पदाधिकारियों में ग्रामणी के अलावा किस्सागो का भी पद हुआ करता था. विशिष्ट अवसरों पर वह कहानी सुनाकर गांववालों का मनोरंजन करता था. लेखनकला का विकास उस समय तक नहीं हो पाया था. समूह की अनुभव संपदा और रोमांचक स्मृतियों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का दायित्व किस्सागो का था. इसलिए उसे हम उस दौर का संस्कृतिकर्मी भी कह सकते हैं. इस तरह कहानी के कहन की परंपरा का इतिहास सभ्यता के इतिहास जितना ही पुराना है. विभिन्न संस्कृतियों में गढ़ी गई प्राचीन कहानियोंं में आश्चर्यजनक एकरूपता है. बाढ़ की स्मृतियां लगभग सभी में सुरक्षित हैं. इसके अलावा नैतिकता के प्रति तीव्र आग्रह, भोजन के बंटवारे को लेकर संघर्ष की लगभग एक समान स्थितियां हैं.

ऋग्वेद को भारतीय मेधा का पहला लिखित दस्तावेज माना जाता है. विद्वानों के अनुसार इसका संहिताकरण ईसा से करीब 1500 वर्ष पहले किया गया. हालांकि श्रुति परंपरा के रूप में यह ग्रंथ उससे बहुत पहले से भारतीय जनजीवन को प्रभावित करता रहा है. विद्वानों के अनुसार ऋग्वेद की कुछ ऋचाएं ईसा से पांच से छह हजार वर्ष पुरानी हैं. ऋग्वेद तक आतेआते भारत में नागरी सभ्यता विकसित हो चुकी थी. बालक के महत्त्व को समझा जाने लगा था. यद्यपि उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व को मान्यता नहीं मिल पाई थी, तथापि उसके चारित्रिक विकास में शिक्षा के योगदान को स्वीकारा जाने लगा था. वेद, उपनिषद, स्मृतिगं्रथ और आरण्यकों में ऐसी अनेक कहानियों उपलब्ध हैं, जिनको आज भी हिंदी बालसाहित्य की महत्त्वपूर्ण निधि के रूप में स्वीकार किया जाता है. वेदों में ऐसी अनेक कथाएं हैं, जिनके पात्र बच्चे हैं. उनसे यह साफ जाहिर होता है कि उनकी रचना बच्चों को संस्कारित करने अथवा उनकी संस्कारशीलता को दर्शाने हेतु की गई थी. इनमें सत्यकाम जाबालि, नचिकेता, आरुणि उद्दालक, उपमन्यु की कहानियों उदात्त बालचरित्रों को दर्शाती हैं—

‘‘जाबाला का पुत्र सत्यकाम अपनी माता के पास जाकर बोला, ‘हे माता, मैं ब्रह्मचारी बनना चाहता हूं. मैं किस वंश का हूं?’

माता ने उसे उत्तर दिया, ‘हे मेरे पुत्र! मैं नहीं जानती कि तू किस वंश का है. अपनी युवावस्था में जब मुझे दासी के रूप में बहुत अधिक बाहर आनाजाना होता था, तभी तू मेरे गर्भ में आया था. इसलिए मैं नहीं जानती कि तू किस वंश का है. मेरा नाम जाबाला है. तू सत्यकाम है. तू कह सकता है कि मैं सत्यकाम जाबाला हूं.

हरिद्रमुत के पुत्र गौतम के पास जाकर उसने कहा, ‘भगवन्! मैं आपका ब्रह्मचारी बनना चाहता हूं. क्या मैं आपके यहां आ सकता हूं?’

उसने सत्यकाम से कहा, ‘हे मेरे बंधु, तू किस वंश का है?’

उसने कहा, ‘भगवन्, मैं नहीं जानता कि मैं किस वंश का हूं. मैंने अपनी माता से पूछा था और उसने यह उत्तर दिया—‘अपनी युवावस्था में जब दासी का काम करते समय मुझे बहुत बाहर आनाजाना होता था, तब तू मेरे गर्भ में आया. मैं नहीं जानती कि तू किस वंश का है. मेरा नाम जाबाला है और तू सत्यकाम है’—इसलिए हे भगवन्! मैं सत्यकाम जाबाला हूं.’

गौतम ने सत्यकाम से कहा कि, ‘एक सच्चे ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य कोई इतना स्पष्टवादी नहीं हो सकता. जा और समिधा ले आ. मैं तुझे दीक्षा दूंगा. तू सत्य के मार्ग से च्युत नहीं हुआ है.’’ (छांदोग्योपनिषद 4.4,1,4).

भले ही विधिवत बालसाहित्य का हिस्सा न हों, पर ये कहानियोंं कहन की उस परंपरा का विस्तार हैं, जो उससे हजारों वर्ष पहले आरंभ हो चुकी थी. चूकि वेदउपनिषद आदि दार्शनिक विवेचना के लिए लिखे गए ग्रंथ हैं, अतएव उनमें बालकों को भी दर्शन के गूढ़ प्रश्नों से साक्षात करते हुए दिखाया गया है. आरुणि उद्दालक, उपमन्यु की कहानियोंं तो सर्वख्यात हैं. दोनों में ही गुरुभक्ति और समाज के प्रति अनन्य निष्ठा का प्रदर्शन हैं. आरुणि गुरु के आदेश पर बांध का निरीक्षण करने जाता है. बरसात का मौसम है. बांध पर जाकर वह देखता है कि वहां से पानी रिस रहा है. आरुणि पानी को रोकने का प्रयास करता है. मगर नाकाम रहता है. इसी कोशिश में शाम हो जाती है. बांध का छेद बढ़ता ही जा रहा है. आश्रम और खेतों को बचाने के लिए आरुणि को जब कोई और उपाय नहीं सूझता तो वह बांध के टूटे हुए भाग से पीठ सटाकर बैठ जाता है. पूरी रात वह बांध से पीठ सटाए बैठा रहता है. सुबह ऋषि धौम्य अपने शिष्यों के साथ आरुणि को खोजते हुए वहां पहुंचते हैं, तब उन्हें आरुणि की गुरुभक्ति एवं आश्रम के प्रति निष्ठा का पता चलता है.

छांदोग्योपनिषद के एक प्रसंग में श्वेतकेतु को अपने पिता से संवाद करते हुए दर्शाया गया है. पिता उससे कहता है—

वहां से मेरे लिए न्यग्रोध वृक्ष का फल लाकर दो.’

यह लीजिए, भगवन, यह है.’

इसे फोड़ो.’

लीजिए तात्, यह फूट गया.’

तुम्हें इसमें क्या दिखाई देता है.’

यह बीज है, जो अत्यंत सूक्ष्म है.’

इसमें किसी एक को फोड़ो.’

लीजिए भगवन, यह फूट गया.’

तुम्हें इसमें क्या दिखाई देता है?’

कुछ नहीं भगवन्!’

पिता ने कहा, ‘हे मेरे पुत्र, वह सूक्ष्म तत्व जो तुम्हें उसमें प्रत्यक्ष नहीं होता, वस्तुतः उसी तत्व से इस महान नयग्रोध वृक्ष की सत्ता है. हे मेरे पुत्र! विश्वास करो इस सत्य पर कि यह सूक्ष्म तत्व ही है, और इसी के अंदर सब कुछ वर्तमान है. वही आत्मा को धारण करता है. यही सत्य है. यही आत्मा है. और तू, हे श्वेतकेतु, तू यही है.’’

(छांदोग्योपनिषद: 6: 10 और आगे).

नचिकेता और उपमन्यु की कथाओं के बीजतत्व ऋग्वेद में मौजूद हैं. सम्राट वाजश्रवा का पुत्र नचिकेता पिता द्वारा बीमार और अशक्त गायों को दान दिए जाने पर खिन्न होकर पिता से पूछता है—‘पिताजी मुझे किसको दान देंगे?’ पिता के यह कहने पर कि यमराज को, तब वह उससे मिलने की उत्कंठा में राज्य छोड़ देता है. लंबी साधना के उपरांत उसकी भेंट यमराज से होती है. यमराज उसको मृत्यु के बारे में बताते हैं. यह प्रसंग कठोपनिषद् में विस्तार आया है. बल्कि पूरी उपनिषद ही यमराज और नचिकेता के संवाद पर केंद्रित है. कुछ लोग यह कह सकते हैं कि आठनौ वर्ष के बालक से जीवनमृत्यु जैसे गंभीर प्रश्नों पर संवाद कराना उसके साथ खिलवाड़ करना है. भले ही यह संवाद सर्वथा काल्पनिक हो. तो भी यह कहा जा सकता है कि उस समय तक जीवनमूल्यों, विचारों, दार्शनिकसामाजिक मान्यताओं को लेकर साहित्य सृजन की शुरुआत हो चुकी थी. दूसरे यह उस कालखंड की रचना है जब आश्रमों में दार्शनिक प्रश्नों पर विमर्श करना सामान्य चर्या थी. शिष्य गुरु के सान्न्ध्यि में रहता था. मातापिता भी अपने बच्चों को गुरु के आश्रम में कठोर दिनचर्या के लिए छोड़ देते थे, ताकि उसका नवोन्मेष हो सके. बच्चों के प्रसंग में एक संस्कार का उल्लेख ऋग्वेद में कई स्थानों पर हुआ है. वह था—उपनयन संस्कार. जब बालक मातापिता के आंगन से निकलकर गुरु के आश्रम में चला जाता था. शिक्षार्जन करने. जितनी अवधि वह पाठशाला में रहता, उसपर केवल उसके गुरु का आदेश चलता था. शिष्य की निष्ठा को परखने के लिए गुरु उसकी तरहतरह से परीक्षा भी लेते थे. एक और बालक उपमन्यु की गुरुभक्ति का किस्सा ऋग्वेद में मिलता है—

‘‘महर्षि आयोदधौम्य का शिष्य उपमन्यु दूसरे शिष्यों के साथ भिक्षाटन करने जाता है. एक दिन गुरु प्रश्न करते हैं—

वत्स उपमन्यु, तुम भोजन क्या करते हो.’

गुरुदेव भिक्षाटन से जो मिलता है, उसी से कुछ अपने लिए रख लेता हूं.’

पर भिक्षाटन पर तो गुरु और आश्रम का अधिकार होता है.’

अगले दिन उपमन्यु को जो भिक्षान्न प्राप्त हुआ वह उसने गुरु के समक्ष लाकर रख दिया. गुरु ने उसको आश्रम के सुपुर्द कर दिया. उपमन्यु को भूखा रह जाना पड़ा. दूसरे दिन भी यही हुआ तो उपमन्यु भूख मिटाने के लिए दुबारा भिक्षाटन के लिए निकल गया. अगले दिन गुरुदेव ने पुनः वही प्रश्न किया—

वत्स उपमन्यु, आजकल भोजन क्या करते हो?’ उपमन्यु ने सच कह दिया. इसपर गुरु विचलित होकर बोले—‘दुबारा भिक्षाटन करना तो धर्म विरुद्ध है. इससे गृहस्थों पर अतिरिक्त भार पड़ता है.’

गुरु की आज्ञा मानकर उपमन्यु ने वह भी छोड़ दिया. एक दिन गुरु ने फिर पूछा—

वत्स उपमन्यु, आजकल भोजन क्या करते हो?’

गुरुदेव, गायों का दूध पी लेता हूं.’

परंतु आश्रम की गायों पर तो मेरा अधिकार है? मुझसे बिना अनुमति के गायों का दूध पी लेना तो चोरी हुई.’ उसके बाद उपमन्यु केवल दूध दुहने के बाद गायों के फेन से काम चलाने लगा. गुरु को पता चला तो वह भी बंद करा दिया. उपमन्यु निराहार रहने लगा. भूख असह् होने पर एक दिन उसने आक के पत्ते खा लिए. इससे उसकी नेत्रों की ज्योति चली गई…’’

कहानी का अंत दुःखद होता है. गुरुशिष्य के संबंधों में बंटी उस शिक्षाव्यवस्था में गुरु के गुरुत्व को दर्शाने के लिए चामत्कारिक कहानियोंं लिखना सामान्य बात थी. यहां इन कहानियों की नैतिकता खंगालने का उद्दिष्ट हमारा नहीं. हमारा उद्देश्य मात्र यह दिखाना है कि बच्चों के लिए साहित्य लेखन का आरंभ वैदिक युग में ही हो चुका था. उसका आरंभिक उद्देश्य समाज को तात्कालिक मान्यताओं, विश्वासों के अनुकूल ठालना था. यह भी कह सकते हैं कि कहन की कला लिपि के आविष्कार के साथ ही शब्दों में ढलने लगी थी. उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों और स्मृतियों में आकर इसको और भी गति मिली. कहानी सुननासुनाना लोगों में इतना लोकप्रिय हुआ कि हर ‘पुर’ में एक दक्ष किस्सागो की मौजूदगी अनिवार्य मान ली गई. उसको लगभग उतना ही सम्मान मिलता था, जितना गांव प्रमुख को.

महाकाव्य युग

महाकाव्य युग(1500 ईस्वी पूर्व—800 ईस्वी पूर्व तक) तक आतेआते भारतीय समाज व्यवस्थित हो चुका था. आपस में युद्धरत रहने वाले छोटेछोटे कबीलों ने बड़े राज्यों में संगठित होना आरंभ कर दिया था. राजाओं में स्पर्धा और साम्राज्यवादी ललक बढ़ी थी. अर्थव्यवस्था के स्रोतों में भी बदलाव आया था. कृषि की उपयोगिता बढ़ती जा रही थी. हालांकि समाज के कुछ वर्ग उस समय भी पशुपालन अर्थव्यवस्था को अपनाए हुए थे.अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार करता, अधिक से अधिक कृष्ठ भूमि को अपनी सीमाओं में सम्मिलित करना, वीरता और राजकीय कौशल की पहचान बन चुका था. जिस सम्राट का अधिक भूभाग पर अधिकार हो, वह अधिक सम्मान का पात्र माना जाने लगा था. कृषि के विकास ने सहायक उद्योगंधों को जन्म दिया था. लोगों की आवश्यकताएं निरंतर बढ़ रही थीं. इसके फलस्वरूप समाज में शिल्पकार वर्ग का सम्मान बढ़ा था. आय बढ़ने से व्यापार में तेजी आई थी. समृद्धि और वैभव के प्रतीक बड़ेबड़े प्रासाद, अट्टालिकाएं, दुर्ग समाज में आकर्षण का केंद्र बनते जा रहे थे. वर्गविभाजन एवं आर्थिक स्तरीकरण की शुरुआत हो चुकी थी. शीर्षस्थ वर्ग की निकटता का लाभ उठाने के लिए पुरोहितों एवं धर्माचार्यों ने लोगों को अपने प्रभाव में लेना आरंभ कर दिया था. वे धर्म के नाम पर लोगों का सत्ता के साथ अनुकूलन करना सिखा रहे थे. राजा का पद महत्त्वपूर्ण था. उसको पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था. उससे अपेक्षा की जाती थी कि वह ब्राह्मण को यथोचित महत्त्व दे. इस तरह पूरे समाज पर धर्मसत्ता और राजसत्ता का समवेत अधिकार था.

उस दौर में बच्चों के लिए अथवा उनके नाम पर जो साहित्य रचा गया, वह किसी न किसी प्रकार इन्हीं दो सत्ताओं से संबद्ध था. उसका एक ही उद्देश्य था शिखरसत्ताओं से तालमेल बनाकर चलना. उससे अनुकूलन करते रहने की शिक्षा देना. कर्मकांड और दैवीय ताकतों के भरोसे पूरा समाज स्वयं को वर्णव्यवस्था के अनुरूप ढाल चुका था. वर्चस्ववादी सत्ता का विरोध उस समय भी होता था. उसके प्रमाण वैदिक और उत्तरवैदिक साहित्य में भरे पड़े हैं. रामायणमहाभारतकाल तक वैदिक सभ्यता के समानांतर उसी के समान तेजवंत और प्रतापी सभ्यता मौजूद थी. उसको रक्षक(राक्षसी) सभ्यता कहा गया है. इस सभ्यता का कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं है. दोनों महाकाव्य असल में पुरातन रक्षक सभ्यता पर वैदिक सभ्यता की जीत का बयान है. आर्यों को युद्धप्रिय जाति बताया गया है. अतः यह संभव है कि आर्यद्रविड़ युद्ध में युद्ध जीतने के उपरांत आर्यों ने रक्षक सभ्यता के सभी संदर्भग्रंथ, साहित्यिक प्रमाण जला दिए हों. वैदिक साहित्य में इंद्र की महिमा तथा उस समय के देवदानव युद्धों का वर्णन तो है, लेकिन उस समय के रक्षक सभ्यता के साहित्य का नामोल्लेख तक नहीं है. जिसको प्राचीन भारतीय साहित्यिक संपदा कहा जा सकता है, वह असल में व्यवस्था से अनुकूलितमर्यादित साहित्यरचना है. उसमें विद्रोह की छवि सर्वथा अलभ्य है. अपने से बड़ों के प्रति विद्रोह तो दूर मतभेद की अनुमति तक नहीं थी. बालक को घर में मातापिता और पाठशाला में गुरु के अनुशासन में रहना पड़ता था. इस युग के बालकों में राम और कृष्ण के अलावा एकलव्य, श्रवण कुमार, कौषिक, ध्रुव, प्रहलाद, लवकुश आदि ऐसे बालचरित्र हैं, जिनका उल्लेख रामायण और महाभारत दोनों में मिलता है. इनमें ध्रुव और प्रहलाद की कहानियोंं आर्य संस्कृति के विस्तार को दर्शाती हैं. जबकि एकलव्य की कहानी एक बालक के आत्मविश्वास और अंततः उस व्यवस्था से छले जाने की गाथा है.

एकलव्य सम्राट हिरण्यधेनु का बेटा है. द्रोणाचार्य जो केवल राजपुत्रों को शस्त्रसंधान करना सिखाते हैं, की ख्याति से प्रभावित होकर वह उनके पास जाता है. ठुकराए जाने पर वह उन्हीं को गुरु मानकर अपनी एकांत साधना आरंभ कर देता है. कठिन परिश्रम और अनवरत अभ्यास द्वारा वह अल्प समय में ही इतनी निपुणता प्राप्त कर लेता है कि उसके धनुसंधान कौशल की धूम मच जाती है. एक दिन द्रोणाचार्य स्वयं शरसंधान का उसका कौशल देख चमत्कृत रह जाते हैं. एकलव्य का शस्त्रकौशल देखकर उन्हें अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने के लिए दिया गया वचन खटाई में जान पड़ता है. उसमें जीत ब्राह्मणवाद की होती है. द्रोण कुटिलतापूर्वक एकलव्य का अंगूठा मांग लेते हैं. उल्लेखनीय है कि बालक एकलव्य स्वयं राजपुत्र है. द्रोण द्वारा केवल राजपुत्रों को शस्त्रसंधान सिखाने की शर्त को वह पूरा करता है. यही विश्वास उसको उनके पास खींच ले जाता है. हालांकि उसके अग्रज जानते हैं कि द्रोण उसको शिक्षा देने को हरगिज तैयार न होंगे. वही होता भी है. द्रोण इन्कार कर देते हैं. एकलव्य का संबंध उस अनार्य संस्कृति से था, जिसपर विजय की कामना रामायण और महाभारत युद्ध की प्रमुख प्रेरणाएं हैं. सांस्कृतिक प्रेरणा के दबाव में ही द्रोण गुरुदक्षिणा में एकलव्य का अंगूठा मांग लेता है. एक विलक्षण अनार्य योद्धा आर्य संस्कृति के मनमाने आचरण और सम्मोहन का शिकार हो जाता है. विलक्षण प्रतिभा की इस बलात् हत्या को ‘गुरुभक्ति’ का नाम दिया जाता है. एकलव्य की कहानी यदि देखा जाए तो सांस्कृतिक वर्चस्ववाद की कहानी है. दिखाती है कि एक ताकतवर संस्कृति किस प्रकार कमजोर संस्कृति को मिटने पर बाध्य कर देती है. यह बात बिलकुल भिन्न है कि कटे हुए अंगूठे के बावजूद एकलव्य केवल उंगलियों की मदद से तीरसंधान के अपने अभ्यास को जारी रखता है और जरासंध की सेना में सम्मिलित होकर कृष्ण के आगे चुनौती पेश करता है. उस युद्ध में वह वीरगति को प्राप्त होता है. उसकी वीरता देखकर स्वयं कृष्ण सम्मोहित हैं. महाभारत युद्ध में पराक्रमी एकलव्य के रणकौशल की प्रशंसा करते हुए वे अर्जुन से कहते हैं—‘हे पार्थ! आज यदि एकलव्य जीवित होता तो देव, दानव और नाग ये सब मिलकर भी उसे युद्ध में जीत नहीं सकते थे.’ एकलव्य के साथ हुए अन्याय का बोध विजेता संस्कृति के आचार्यों को भी रहा. संभवतः इसी घटना से जन्मे पापबोध पर पछतावा करते हुए बाद के एक उपनिषदकार ने कहा है—

वत्स, तू केवल हमारे अच्छे कर्मों से प्रेरणा लेना. उससे इतर कर्मों से: अर्थात जो अश्रेष्ठ और हेय हैं, तू कोई शिक्षा ग्रहण मत करना.’1

तत्कालीन साहित्य द्वारा यह भ्रम भी लगातार बनाया जाता है कि केवल क्षत्रिय ही राज करते थे या विद्याध्ययन का कार्य केवल तथा केवल ब्राह्मण शिक्षित एवं विद्धान. इतिहास में कोई समय ऐसा नहीं हुआ जब केवल इन्हीं दो वर्गों का वर्चस्व रहा हो, लेकिन इस व्यवस्था से अनुकूलन की कोशिश हर समय होती रही. लेकिन समाज पर धर्म का बढ़ता अनुशासन सदैव प्रतिगामी रहा हो, ऐसा नहीं है. अच्छे जीवनमूल्यों से परचाने के लिए भी धर्म को माध्यम बनाया जाता था.

महाभारत में कौषिक नाम के ब्राह्मण की एक बालोपयोगी कहानी आती है—

‘‘वेदाध्ययन को उत्सुक कौषिक जब गुरु की खोज में जाने को उद्धत हुआ तो उसके वृद्ध मातापिता को चिंता हुई. मां ने कहा—

वत्स! हम दोनों जराशक्त हैं. तुम चले गए तो हमारी देखभाल कौन करेगा?’

कौषिक पर तो वेदाध्यन का भूत सवार था. वृद्ध मातापिता को निराश्रित छोड़कर वह जंगल की ओर प्रस्थान कर गया. कुछ वर्षों की साधना के पश्चात उसने अनेक सिद्धियां प्राप्त कर लीं. एक दिन वह एक वृक्ष के नीचे बैठा आराम कर रहा था. उसी समय एक सारस ऊपर डाल पर आकर बैठ गया. उसने कौषिक के सिर पर बीट कर दी. कुपित कौषिक ने पक्षी को घूरा. कहानी बताती है कि तापस की कोप दृष्टि के आगे पक्षी कहां टिक पाता. वह भस्म होकर भूमि पर आ गिरा. पक्षी को जमीन पर तड़फते देख कौषिक को बड़ा अपराधबोध हुआ—

यदि मैं अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रख पाता तो मुझे मान लेना चाहिए कि मेरी साधना में दोष है.’ उसने स्वयं से कहा. समस्या थी कि गुस्से पर नियंत्रण कैसे प्राप्त हो? अगले दिन वह भिक्षाटन के लिए निकला. एक गृहणी के द्वार जाकर उसने टेर लगाई. गृहणी बाहर आई और शीघ्र लौटने का आश्वासन देकर भीतर चली गई. उसी समय स्त्री का पति वहां पहुंच गया. स्त्री सबकुछ छोड़कर अपने पति की सेवा में जुट गई. कौषिक को यह बहुत अपमानजनक लगा. कुछ देर बाद स्त्री भिक्षान्न का कटोरा लिए बाहर आई तो उससे रहा न गया. उसने कुपित दृष्टि स्त्री पर डाली—

एक साधु को दरवाजे पर छोड़कर तुम अपने पति की सेवा में जुट गईं. यह ब्राह्मण का अपमान है….’

मैंने तो केवल अपने कर्तव्य का पालन किया है.’ स्त्री ने उत्तर दिया.

ब्राह्मण के अपमान के लिए मैं तुम्हें शाप भी दे सकता हूं.’

मुझे धमकी देने की आवश्यकता नहीं है, भिक्षुक. मैं कोई सारस नहीं हूं जो तुम्हारी कोपदृष्टि से भस्म हो जाऊंगी.’ कौषिक हैरान. आखिर उस घटना के बारे में स्त्री कैसे जानती हे. अवश्य यह सिद्ध स्त्री है. वह क्षमायाचना करने लगा—

क्षमा करें देवि, इतनी सिद्धियां प्राप्त करने के बावजूद मैं अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं रख पाता….क्या आप मेरी गुरु बनकर मुझे बताएंगी कि गुस्से पर नियंत्रण कैसे पाया जा सकता है?’

मेरा समय तो अपने पति और बच्चों के लिए है. मैं तुम्हें शिक्षा नहीं दे सकती. परंतु मथुरा में धर्मव्याध रहता है. वह तुम्हारी समस्या का समाधान अवश्य करेगा.’ कौषिक धर्मव्याध के पास पहुंचा. वह उस समय अपनी दुकान पर था. दुकान पर लटके मांस के लोथड़ों को देखकर कौषिक दंग रह गया—

एक कसाई भला धर्मसिद्ध कैसे हो सकता है.’

व्यक्ति को उसके कार्य से नहीं, कर्तव्यनिष्ठा द्वारा पहचाना जाता है.’ धर्मव्याध ने कहा. यही वह सीख है, जिसे समझाने के लिए उस गृहणी ने तुम्हें यहां भेजा है. आओ घर चलें. घबराओ मत, मेरा ठिकाना यहां से बस थोड़ी दूर है.’

मांस का कारोबार तो हिंसा से भरा है…’ चलतेचलते कौषिक ने कहा.

दुनिया में ऐसा कौनसा कारोबार है, जिसमें हिंसा न होती हो. किसान हल चलाता है तो फाल से लगकर लाखों कीड़ेमकोड़ों की सहसा जान चली जाती है, पर किसान को कोई कसाई या हत्यारा नहीं कहता. राह चलते व्यक्ति के कदमों के नीचे भी हजारों छोटे जीव रोज कुचले जाते हैं, परंतु कोई स्वयं को अपराधी नहीं मानता. मैं भी अपना कार्य करता हूं. फिर मुझे पाप का भागीदार क्यों होना पड़ेगा?’

कौषिक धर्मव्याध के घर पहुंचा तो आंगन में बच्चों को खेलता हुआ पाया. उसकी पत्नी घर के कार्यों में लगी थी. धर्मव्याध ने बुलाकर उसका परिचय कराया. भीतर के कमरे में पहुंचा तो धर्मव्याध के वृद्ध मातापिता वहां मौजूद थे. धर्मव्याध ने आगे बढ़कर उनके पांव छुए. फिर मुड़कर कौषिक से बोला—‘मेरे मातापिता ही मेरे सर्वस्व हैं. अपने परिवार के साथ मैं इनकी सेवा करता हूं. जो काम अपने लिए चुना है, उसका पालन करता हूं. और बचा हुआ समय अपने मातापिता की सेवा में लगाता हूं.’

कौषिक कुछ सोचने लगा. इसपर धर्मव्याध ने कहा—

यही वह शिक्षा है, जिसे ग्रहण करने के लिए उस स्त्री ने तुम्हें यहां भेजा है. ’ कौषिक को अपनी गलती का एहसास हुआ. वह वापस अपने वृद्ध मातापिता के पास लौट गया.’’

ऊपर कहानी में उस समय की परंपरा के अनुसार यह दर्शाने की कोशिश की गई है कि समाज द्वारा निर्दिष्ट जीविका के लिए किया जाने वाला कार्य पाप की श्रेणी में नहीं आता, भले ही उससे कुछ जीवों को नुकसान पहुंचता हो. युद्धभूमि पर परिजनों को सामने देख मोहाग्रस्त हो हथियार छोड़ बैठे अर्जुन को भी कृष्ण का यही उपदेश है कि हे अर्जुन, तू केवल अपना कर्म कर. फल की चिंता जाने दे. कहानी में सामाजिक मर्यादाओं का पूरापूरा ध्यान रखा गया है. ब्राह्मण को देख धर्मव्याध के वयोवृद्ध मातापिता ससम्मान प्रणाम करते हैं. ब्राह्मण उनके घर जाता अवश्य है, मगर भोजन से दूर रहता है. इस प्रकार की युगीन नैतिकता प्रधान कहानियोंं रामायण और महाभारत में भरी पड़ी हैं. दरअसल यही वह साहित्य है जो सांस्कृतिक रूप से हमारे जीवन को प्रभावितनिर्देशित करता है. प्राचीन भारतीय साहित्य की एक भी पुस्तक, इस मर्यादा के पार नहीं जाती. सिवाय चार्वाक दर्शन के जो कर्मकांडों और पोंगापंथी पर मुक्त कटाक्ष करता है, परंतु शेष साहित्य उसे इतना निंदनीय और त्याज्य घोषित कर देता है कि प्रकट रूप से उसका समर्थन कर पाना किसी के लिए भी असंभव था. ये कहानियों धार्मिक साहित्य के रूप में प्रचलित थीं. रचनाकर्मियों का लक्ष्य पाठक संपूर्ण जनसमाज था. बच्चों के लिए अलग साहित्य का विचार उस समय तक जन्मा ही नहीं था.

बौद्ध और जैन साहित्य में बालोपयोगी साहित्य

इस युग में कहानियों कहनेसुनाने की परंपरा तत्कालीन सभ्यता और संस्कृति का अंग बन चुकी थी. प्रमाणस्वरूप उस युग की उन चित्राकृतियों का जिक्र किया जा सकता है, जो हमें प्राचीन भवनों, स्तूपों, मीनारों पर उकेरी हुई प्राप्त होती हैं. उनकी उम्र दो हजार वर्ष से भी ऊपर मानी जा सकती है. गौतम बुद्ध ने मूर्तिपूजा का तीव्रतम विरोध किया था. बल्कि बौद्ध धर्म की तो नींव ही कर्मकांड, जीव हिंसा एवं मूर्तिपूजा के विरोध स्वरूप रखी गई थी. यह बात अलग है कि गौतम बुद्ध के अवसान के बाद बौद्ध धर्म को जनता के बीच स्थापित करने की छटपटाहट ने बौद्ध भिक्षुओं को भी वही रास्ते अपनाने के लिए बाध्य कर दिया था, जिसपर चलकर वैदिक सभ्यता पतनोन्मुखी बनी थी. इसके बावजूद यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि बौद्धधर्म के प्रचारप्रसार हेतु उसके अनुयायियों ने जो रास्ते अपनाए वे कालांतर में भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के बहुआयामी विकास में मददगार बने. पहली बार भारत की दार्शनिक संपदा देश की सीमाओं को लांघकर चीन, जापान, श्रीलंका, कंबोडिया, जावा, सुमित्रा, मारीशस आदि हजारों किलोमीटर दूर देशों तक पहुंची. कंबोडिया, जाबा, सुमात्रा तो भारतीय संस्कृति के अविस्मरणीय ठिकाने हें. सैकड़ों प्राचीन बौद्ध इमारतों, स्तूपों, धर्म स्तंभों पर आज गौतम बुद्ध के पूर्वजन्म की कथाएं चित्रों में उकेरी गई हैं, जो तत्कालीन समाज में कहानी की स्थापित लोकप्रियता के बारे में बताती हैं. सांची, अमरावती, सारनाथ, बेहरूत आदि स्थानों से प्राप्त बौद्धकालीन इमारतों के भग्नावशेषों, धर्मस्तंभों पर गौतम बुद्ध के पूर्वजन्म की कहानियों दी गई हैं. राजकुल में जन्मे बालक सिद्धार्थ का गौतम बुद्ध के रूप में उभरना और दार्शनिक चिंतन के आधार पर दुनियाभर पर अपना प्रभाव जमाना अपने आप में ही एक कहानी है. ऐसी कहानी जिससे बालक और बड़े दोनों आनंद ले सकते हैं. गौतम बुद्ध के निधन के उपरांत उनके विचारों को पंथ में बदलने की चाहत ने उनके शिष्यों को बुद्ध के जीवन से जुड़ी कहानियों गढ़ने के लिए बाध्य कर दिया. परिणामस्वरूप जातक कथाओं का जन्म हुआ.

उस समय कहानियों जनसमुदाय में अपने विचारों को फैलाने का सशक्त माध्यम थी. बस्तियों में दक्ष किस्सागो का बहुत मान किया जाता था. बौद्ध धर्म की घरघर में पैठ बनाने के लिए जातक कथाओं की रचना की गई. जैन मुनिगण भी महावीर स्वामी के बाद से ही अपने धर्मदर्शन को किस्सोंकहानियों, किवदंतियों के माध्यम से जनजन में लोकप्रिय बनाने के लिए जुटे थे. जातक कथाओं तथा महावीर स्वामी के जीवन तथा उनके जीवनदर्शन को लोकप्रिय बनाने के लिए कहानियों के अलावा भी इस युग में बहुत कुछ ऐसा रचा गया जिसका उद्देश्य हालांकि तात्कालिक धर्म और उसके नैतिक मूल्यों को जनसाधारण में लोकप्रिय बनाना था. कथासरितसागर, जातक कथाएं, पंचतंत्र, हितोपदेश आदि प्रमुख ग्रंथ जिन्हें आज हिंदी बालसाहित्य की अमूल्य संपदा माना जाता है, की रचना इसी युग में की गई. इनमें ‘कथासरितसागर’ प्राकृत में रचित, इस भाषा की संभवतः सबसे पहली पुस्तक, गुणाढ्य की बृहद पुस्तक ‘बड्डकहा’ पर आधारित है. गुणाढ्य पंडित सातवाहन सम्राट के दरबारी थे. सातवाहन सम्राट के सिक्कों पर ‘सात’ अथवा ‘साड’ छापा गया है. वे प्राकृत भाषा के बड़े प्रेमी थे. बताते हैं कि उन्होंने अपने राजमहल में प्राकृत बोलने का नियम बना रखा था. इसके लिए संस्कृत अनुरागी पंडित समाज उनका उपहास भी करता था. ‘बड्डकहा’ का मूल स्वरूप आज अनुपलब्ध है. इसके पीछे कहानी है कि महाराज सातवाहन के ही अन्य दरबारी कवि वत्सल ‘हाल’ द्वारा कृति का उपहास उड़ाए जाने से क्षुब्ध गुणाढ्य पंडित ने उसको स्वयं ही जला दिया था. राजा के प्रयास से पुस्तक का सातवां हिस्सा जलने से बचा लिया गया था. बचाया गया सातवां हिस्सा भी मूल रूप में अनुपलब्ध है. उसके संस्कृत भावानुवाद बुद्धस्वामी के ‘बृहत्कथा श्लोक संग्रह’, ‘क्षेमेंद्र की बृहत्कथा मंजरी’ तथा सोमदेव के ‘कथासरित्सागर’ के रूप में उपलब्ध हैं. इसके बारह खंडों में कुल 124 अध्याय हैं. पुस्तक का दसवां खंड ‘पंचतंत्र’ तथा बारहवां ‘वैताल पचीसी’ को अपने साथ जोड़े हुए है. इससे इस ग्रंथ की विशद्ता का अनुमान लगाया जा सकता है. पंचतंत्र, वैताल पचीसी तथा कथासरित्सागर की कहानियों के मूल चरित्र में जो एकरूपता और लोकतत्व है, उससे प्रतीत होता है कि ये कहानियोंं लिखे जाने से पहले ही लोकसाहित्य में प्रचलित हो चुकी थीं. इन कहानियों की रचना समाज के सभी वर्गों के लिए की गई थी. इनका सहज किस्सागोई रूप बच्चों को घरपरिवार में सुनाया जाता था. यही स्थिति जातक कथाओं के साथ भी है. जातक कथाएं यद्यपि गौतम बुद्ध के पूर्वजन्म की कहानियों के रूप में लिखी गई थीं. उद्देश्य था गौतमबुद्ध तथा उनके धर्म के बारे में लोगों को शिक्षित करना. ये नैतिकता और मानवीय मूल्यों की कहानियोंं हैं. उनसे मिलीजुली कथाएं हमारे लोकसाहित्य में भी मौजूद रही हैं. कहा जा सकता है कि समाज में पहले से ही व्याप्त कहानियों की लोकप्रियता का लाभ उठाने के लिए उनके आधार अपनी धार्मिकदार्शनिक मान्यताओं को समाज में लोकप्रिय बनाने का प्रयास, दार्शनिकों, प्रचारकों द्वारा समयसमय पर किया जाता रहा है.

पंचतंत्र को छोड़कर शेष दोनों खंडों का उद्देश्य यद्धपि बड़ों को धार्मिक नैतिकता से परचाना था. लेकिन अपनी उद्देश्यपरकता, रोचकता, मनोरंजन सामथ्र्य तथा सहजता के आधार पर ये कृतियां बड़ों के साथ बच्चों में भी समानरूप से लोकप्रिय होती गईं. पर्याप्त लोकतत्व होने के कारण उन्हें लोकसाहित्य का हिस्सा बनते देर न लगी. बौद्ध दर्शन के पराभव के उपरांत भारत भारत में नए सिरे से कर्मकांडों तथा जातीय ऊंचनीच की बाढ़ आ गई. बौद्धिक क्षेत्र में जड़ता का प्रवाह होने लगा था. बौद्धधर्म के साथसाथ इस युग में जैन धर्म भी अपनी जड़ जमा चुका था. लेकिन अहिंसा के प्रति अपने अतिवादी द्रष्टिकोण के कारण यह लोकमानस में अपेक्षित पैठ न बना सका. दूसरी ओर जातक कथाएं अपने नैतिकतावादी द्रष्टिकोण और रोचक शैली के कारण देशविदेश में समाज के हर वर्ग के बीच लोकप्रिय होती चली गईं. उन्हें विद्वानों द्वारा समयानुसार लिपिबद्ध किया जाता रहा है—

कौशल नरेश सम्राट प्रसेनजित के पास एक हाथी था. नाम था—पायेक्का. महाराज प्रसेनजित थे, उदार, प्रजावत्सल और पराक्रमी. ऐसा ही उनका हाथी था. सुंदर, सजीला, परम बलशाली और बुद्धिमान. चिंघाड़ पड़े तो दुश्मन की सेना के छक्के छूट जाएं. कमजोर दिल इंसान गश खाकर जमीन पर जा पड़े. पायेक्का पर सवार होकर महाराज प्रसेनजित ने अनेक युद्ध लड़े थे. हर बार विजयश्री प्राप्त की थी. खुद पायेक्का भी अनेक बार, अनेक दुश्मनों के दांत खट्टे कर चुका था. महाराज उसे पुत्रवत प्यार करते, उसकी देखभाल में कोई कमी न आने देते.

पर वक्त के साथ हाथी बूढ़ा होने लगा. तब सम्राट प्रसेनजित ने उसे अपनी सेवा से मुक्त कर दिया. हाथी के साथ बूढ़ा महावत भी सेवामुक्त होकर गांव लौट गया. राज्य में एक झील थी. प्रकृति की गोद में पनपी. गहरी और नीलेस्वच्छ जल से लबालब भरी हुई. मनोहर कमलदल हमेशा उसकी शोभा बढ़ाते. एक बार की बात. बूढ़ा पायेक्का झील में पानी पीने गया. झील की सुंदरता ने उसका मन मोह लिया. वह उसमें और भीतर, और भीतर घुसता चला गया. झील में दलदल था. बूढ़ा पायेक्का उसमें फंसने लगा. बाहर निकलने की वह जितनी भी कोशिश करता, दलदल उसको अपनी ओर खींचता जाता. पायेक्का को झील से निकालने के लिए लोगों ने उकसाया. बाहर आने के लिए स्वादिष्ट भोजन का लालच दिया. डंडे का डर भी दिखाया. उकसावे पर पायेक्का बारबार जोर लगाता. पर उबरने के बजाय दलदल में और गहरा धंसता चला जाता. रक्षक दल के औसान बिगड़ने लगे.

इस बीच पायेक्का को देखने हजारों की भीड़ झील के किनारे आ जुटी थी. महाराज तक खबर पहुंची तो वे भी अपने प्यारे हाथी को बचाने के लिए झीलकिनारे आ गए. उन्होंने खुद भी पायेक्का को उकसाया. बाहर आने के लिए पुकारा. महाराज की आवाज सुनकर पायेक्का ने एक बार फिर जोर लगाया. लेकिन बूढे शरीर में दलदल को पार करने की ताकत कहां! अपनी विवशता पर पायेक्का की आंखों में आंसू आ गए. उसको उदास देख प्रसेनजित भी अपने आंसू न रोक सके. अपने प्यारे सम्राट को रोता हुआ देख प्रजा भी रोने लगी. मंत्रीमहामंत्री, बालवृद्ध सब उदास हो गए. प्रकृति में रुदन मच गया. तब किसी ने पुराने महावत को बुलाने की सलाह दी. उन दिनों अनाथपिंडक सेठ के जेतवनाराम में महात्मा बुद्ध पधारे हुए थे. उनका धर्मोपदेश चल ही रहा था कि महावत को बुलाने के लिए सम्राट का दूत आ पहुंचा. बुद्ध का आशीर्वाद लेकर महावत वहां से चल पड़ा. कुछ भिक्कु भी उसके साथ हो लिए.

पायेक्का को दलदल में फंसा देख महावत की हंसी छूट गई. फिर देर तक वह हंसता ही रहा. लोग उसकी उन्मादित हंसी देखकर हैरान थे.

यह कैसा पागलपन है महावत. राज्य से दूर रहकर क्या आप उसके अनुशासन भी भूल चुके हैं. महाराज अपने प्रिय हाथी को फंसा देखकर उदास हैं और आपको हंसी छूट रही है?’ महामंत्री ने चेताया.

क्षमा करें महाराज!’ महावत ने कहा. आप फौरन युद्ध के वाद्य मंगवाइये. नगाड़ा और बिगुल बजने दीजिए.’

महामंत्री को लगा कि बूढ़ा महावत सठिया चुका है. उम्र के साथ उसकी अक्ल भी बुढ़ा चुकी है. पर उस समय महावत की बात न मानने के अलावा कोई और रास्ता भी न था. तत्काल युद्ध के वाद्य मंगवाए गए. रणभेरियां बजने लगीं. पायेक्का ने बिगुल की आवाज सुनी तो उसका खून उबाल मारने लगा. रगरग सनसना उठी. लगा कि उसका दुश्मन आंखों के सामने है. एक झटके में उसको वह रौंद सकता है. वह उछला. एक ही प्रयास में दलदल से बाहर था. उसे झील से कुलांचे मारकर बाहर आते देख लोग खुशी से चीखने लगे. महाराज की आंखें भी खुशी से छलछला उठीं.

बूढ़े महावत को भारी ईनाम देकर विदा किया गया. वह भिक्कुओं के साथ बुद्ध की शरण में पहुंचा. भिक्कुओं के मन बेचैन थे. उलझे हुए अनगिनत प्रश्न उनके दिलोदिमाग को मथ रहे थे.

वत्स, प्रश्न की खोज उत्तर से भी कठिन है. जिज्ञासा को दबाओ मत.’ भिक्कुओं के चेहरे के भाव पहचानकर बुद्ध ने कहा.

देव, आप प्राणीमात्र के प्रति दया की शिक्षा देते हैं. सभी से प्रेम करना सिखाते हैं. दूसरों को संकट में देखकर उनका उपहास करना और भी बुरा है—यह आप ही ने सिखाया है.’

अपनी शंका तो व्यक्त करो वत्स!’ बुद्ध ने मुस्कान बिखेरी.

देव, आप जानते हैं कि वह महावत वर्षों तक उस हाथी के साथ रहा है. फिर भी अपने दुलारे हाथी की दलदल में दुर्दशा देखकर वह हंसने लगा, बुद्धिमान होकर भी उसने पागलों जैसा व्यवहार क्यों किया? सिर्फ आप ही इस रहस्य की व्याख्या कर सकते हैं?’ तब बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्यों पर दिव्य मुस्कान बिखेरते हुए कहा—

तुम ठीक कहते हो. वह महावत ज्ञानी है, उसको हाथी का मूल स्वभाव और महान अतीत पता था. वह हंसा तो इसलिए कि सम्राट प्रसेनजित को सैकड़ों बार युद्ध के मैदान से सुरक्षित निकाल लाने वाला पायेक्का मामूली दलदल को देखते ही घबरा गया. उसी घबराहट में वह अपना मूल स्वभाव और आत्मविश्वास भी भूल बैठा. युद्ध के नगाड़े और बिगुल की आवाज सुनकर हाथी को अपना महान अतीत और पराक्रम फिर याद आ गए. साथ ही उसका आत्मविश्वास भी लौट आया. उसी के जोश में वह दलदल से बाहर आने में सफल हो सका.’

यह जातक कथा जितनी बड़ों के लिए उपयोगी है, उतनी ही बच्चों के लिए मूल्यवान है. उनका रचनाकाल पंचतंत्र से पुराना है. लेकिन वह कई शताब्दियों तक फैला हुआ है. इससे यह भी सिद्ध होता है कि पशुपक्षियों को केंद्रीय पात्र बनाकर किस्सागोई का आरंभ बौद्धकाल में ही हो चुका था. अंतर सिर्फ इतना है कि जातक कथाओं का उद्देश्य जहां गौतम बुद्ध के नीतिसंदेश को जनजन तक पहुंचाना था. वहीं पंचतंत्र की रचनाओं का प्रथम उद्देश्य था राजकुमारों को व्यावहारिक ज्ञान से समृद्ध करना. पंचतंत्र की रचना चाणक्य के समकालीन विष्णुशर्मा ने की थी. चाणक्य का एक नाम विष्णुगुप्त भी है, इसलिए अनेक विद्वान दोनों को एक ही व्यक्ति मानते हैं. चाणक्य तक आतेआते बड़े साम्राज्यों का महत्त्व बढ़ चुका था. और बड़े साम्राज्य की स्थापना केवल नीतिगत उपदेशों के सहारे संभव न थी. इसलिए चाणक्य के समय में नीति कूटनीति का रूप ले लेती है. यही कूटनीति व्यवहारशास्त्र के रूप में पंचतंत्र की मूल प्रेरणा है. चाणक्य के समकालीन अरस्तु ने भी अपने गुरु प्लेटो के दार्शनिक सम्राट के सुझाव को किनारे करते हुए नीतिआधारित व्यावहारिक राजनीतिक दर्शन का पक्ष लिया है.

मध्यकाल: भक्तिकाव्य

हर्षवर्धन(590—647) के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में राजनीतिक अस्थिरता का लंबा दौर चला. स्थानीय राजाओं की आपसी रंजिशों और महत्त्वाकांक्षाओं के कारण देश छोटेछोटे राज्यों में बिखरता चला गया. इस बीच दक्षिण में कुछ बड़े राज्य पनपे. मगर कुल मिलाकर राजनीतिक अस्थिरता ही व्यापती रही. बिखरी हुई राजनीतिक शक्तियां विदेशी आक्रामकों से अपनी और देश की रक्षा करने में अक्षम सिद्ध हुई थीं. इस बीच उत्तर में पृथ्वीराज चैहान तथा दक्षिण में चालुक्य वंशीय राजाओं ने भारतीय राजाओं की कीर्ति रक्षा के लिए संघर्ष किया ओर कुछ सीमा तक उसे बचाए भी रखा, परंतु आपसी फूट के कारण वे मुस्लिम आक्रामकों के निरंतर प्रहार को झेल पाने में असमर्थ रहे. सोलहवीं शताब्दी में मुगल शासकों ने भारत को फिर से एकसूत्र में पिरोने में कामयाबी हासिल की. इससे भिन्न संस्कृतियों से मेलजोल का सिलसिला बना. इसके फलस्वरूप साहित्यिकसांस्कृतिक आदानप्रदान में भी तेजी आई. मध्य युग तक आतेआते साहित्य की दो प्रमुख धाराएं बन चुकी थीं. पहली वेदवेदांगों पर आधारित रचनाएं, जो मूलतः मनुष्य की प्राकृतिक उपादानों के प्रति तीव्र आस्था, विश्वास, तर्कसामथ्र्य, आध्यात्मिक चेतना एवं समर्पणभाव को अभिव्यक्त करती थीं, लेकिन उसमें पहले जैसी गूढ़ता और ज्ञान के प्रति ललक गायब हो चुकी थी. उसकी जगह कर्मकांड तथा स्तुतिकाव्य ने ले ली थी. सम्राटों, सामंतों और जमींदारों की प्रशस्ति, उनके आग्रह पर रचा गया स्तुतिगान अथवा उनका कृपापात्र बनने, उन्हें रिझाने की कोशिश में नायकनायिकाओं का नखसिख वर्णन जोर पकड़ने लगा था. साहित्यिकता तथा उसकी मूल भावना से उसका दूरदूर तक कोई संबंध नहीं था.

इस कालखंड में संस्कृतियों के संलयन के साथ साहित्य का भी संलयन हो रहा था. काफिलों के रूप में दूरदेश की यात्रा करने वाले व्यापारियों के माध्यम से अरब, रोम, मिò और भारत की सभ्यताएं परस्पर तेजी से पास आ रही थीं. इस परंपरा में जातक कथाएं, कथासरित्सागर, हितोपदेश, पंचतंत्र, वैतालपचीसी, शुकसप्तति, सिहांसनबतीसी आदि हिंदी की क्लासिक कृतियों की रचना हुई. ये कृतियां टीका और अनुवाद के सहारे विभिन्न भाषाओं में अपना स्थान बनाने में सफल रहीं. दूसरी ओर आलिफलैला, हातिमताई, गुलबकाबली जैसी पुस्तकें अनूदित होकर भारत में आईं. लोकसाहित्य में भी उनका जादू सिर चढ़कर बोला, जिसके फलस्वरूप सांस्कृतिक तालमेल का वातावरण बना. इनमें किस्सागोई का कमाल था. जो कहन की प्राचीन परंपरा से जन्मी थी. कथासरितसागर, वैतालपचीसी, सिंहासनबतीसी आदि पुस्तकों की रचना के केंद्र में बच्चे नहीं थे. ‘शुक सप्तति’ तो बड़ों की कहानियों की पुस्तक थी. लेकिन अपनी रोचकसहज भाषा शैली के कारण ये पुस्तकें शीघ्र ही लोकमानस का हिस्सा बन गईं. इस अवधि में चंदबरदाई, सूरदास, अमीर खुसरो, कबीर जैसे कवि हुए. सूरदास ने कृष्ण के बचपन को लेकर अनूठी कविताएं लिखीं, लेकिन वे बच्चों की समझ से बहुत ऊपर थीं.

सोलहवीं शताब्दी में जन्मे नरोत्तम दास(1550—1605) ने ‘सुदामा चरित’ और ‘धु्रव चरित’ लिखकर बालोपयोगी साम्रगी की रचना की. उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जन्मे गिरधर कविराय(1877) ने भी अपनी कुंडलियों के माध्यम से लोकरुचि के अनेक विषयों पर कविताएं लिखीं. उनकी लगभग 500 प्राप्य कुंडलियों में से अनेक बालोपयोगी हैं. नरोत्तम दास और गिरधर कवि दोनों के मन में बालसाहित्य संबंधी कोई प्रत्यय मौजूद नहीं था. लेकिन अपनी विषयभूमि तथा सहज अभिव्यक्ति के कारण उनकी रचनाएं आज भी बच्चों में लोकप्रिय हैं. कुल मिलाकर इस युग का सारा साहित्य बड़ों के लिए बड़ों द्वारा बड़ी कामनाओं की सिद्धि के लिए किया गया आयोजन था. बानगी के तौर पर गिरधर की दो कुंडलियां यहां उद्धृत की जा रही हैं—

हुक्का बांध्यौ फेंट में नैं गहि लीनी हाथ

चले राह में जात है, बंधी तमाकू साथ

बंधी तमाकू साथ गैल कौ धंधा भूल्यौ

गई सब चिंता दूर आग देखत मन फूल्यौ

कह गिरधर कविराय जु जम कौ आयो रुक्का

जीव लै गया काल हाथ में रह गयौ हुक्का.

गिरधर कवि की ही एक और कुंडली, जो समसामयिक और आधुनिकताबोध से परिपूर्ण है—

साईं घोड़न के अछत गदहन आयौ राज

कौआ लीजै हाथ में दूर कीजियै बाज

दूर कीजियै बाज राज ऐसौ ही आयो

सिंह कैद में कियो स्यार गजराज चढ़ायौ

कह गिरधर कविराय जहां यह बूझ बढ़ाई

तहां न कीजै सांझ सवेरहि चलियै साईं

भारतीय साहित्य के लौकिकीकरण तथा उसको आमआदमी की इच्छाआकांक्षाओं, कुंठाओं, तनावों एवं जनसमस्याओं से रूरू कराने का श्रेय प्रारंभिक भक्त कवियों को जाता है. उन्होंने जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर बुरी तरह विभाजित समाज में मूर्तिपूजा, कर्मकांड, रूढ़िवाद तथा तंत्रमंत्र के सहारे चल रहे शोषण एवं अमानवीय आचरण का अपनी सीधीसादी मगर तीखी वाणी में चुनौती देते हुए निराकारनिर्गुण परमात्मा की अराधना पर जोर दिया था. जातिधर्म तथा संप्रदाय के नाम पर भेद करने वालों को ललकारा. प्रारंभिक भक्त कवि समाज की उन जातियों से आए थे, जो स्वयं शोषण का शिकार थीं. उन्हें वेद पढ़ने की मनाही थी. मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने से उन्हें रोक दिया जाता था. उन्होंने समाज के वंचित तबके की पीड़ा, धर्म तथा जाति के आधार पर उसके शोषणउत्पीड़न को समझा और कहा कि ईश्वर की खोज में बाहर भटकना नादानी है. वह तो जनजन के भीतर है. उसके लिए मंदिरमस्जिद जाने की जरूरत नहीं है. लोगों ने इस सीख को हाथोंहाथ लिया. इसके फलस्वरूप समाज में क्रांतिधर्मी लहरें उठने लगीं. लोकोपकारी साहित्यसर्जक के रूप में संत कवि सत्ता से निस्पृह रहकर, लगभग विद्रोही अवस्था में क्रांतिधर्मा साहित्य का सृजन कर रहे थे. स्तुतिकाव्य रचने वाले कवियों, चारणवृंदों के लिए जो प्रजा थी, भक्त कवियों की निगाह में वह आत्मा का रूप ले चुकी थी. उनके लिए राजा और प्रजा की आत्मा में भेद न था. भक्ति काल का उद्भव सही मायने में धार्मिक आडंबरवाद और जातीय वर्चस्ववाद के विरुद्ध शंखनाद था, उसका श्रेय उन संत कवियों को जाता है, जो समाज के कथित निचले वर्गों से अपनी प्रतिभा और नैतिक ऊंचाई के बल पर उभरकर आए थे; और अपने नैतिक सामथ्र्य के दम पर बड़ी से बड़ी सत्ता से टकराने का साहस रखते थे. जनसाधारण ने भक्त कवियों को सिरमाथे बिठाया, दूसरी ओर यथास्थितिवादियों की ओर से इन कवियों का भरपूर विरोध किया गया. उन्हें तरहतरह की प्रताड़नाएं दी गईं. धीरेधीरे समाज पर उनका प्रभाव बढ़ता गया.

दक्षिण भारत से शुरू हुआ निर्गुण भक्ति आंदोलन दो शताब्दी से अधिक अपना तेज कायम न रख सका. कालांतर में भक्तकवियों में ऊंची जातियों के कवि आ मिले. वे अपने साथ जातीय संस्कार भी लाए थे. उनके प्रभाव से निर्गुण के उपासक सगुण की उपासना करने लगे. पूर्वस्थापित देवताओं के स्थान पर राम और कृष्ण जैसे नए देवता अवतार बनकर विराजमान हो गए. उन्होंने भक्ति आंदोलन की धार को कंुद करने का ही काम किया. सगुण उपासना भक्ति आंदोलन की क्रांतिधर्मिता पर पानी फेरने का कारण बनी. तो भी इस युग की उपलब्धियां सराहनीय थीं. आध्यात्मिक नजरिये से मध्यकाल में ही यह संभव हो पाया कि समानता और बराबरी की बातें, जो सहस्राब्दियों से लुप्त हो चली थीं, भक्तकवियों की वाणी में पुनः सामाजिक विमर्श का हिस्सा बनने लगीं. अधिकांश भक्त कवि धर्म और जाति के आधार पर समाज के विभाजन का विरोध करते हैं. आदमीआदमी के बीच फर्क तथा आवश्यकता से अधिक संचय न करने, सबके साथ समानतापूर्ण व्यवहार एवं जरूरत के समय दूसरों की मदद करने का आवाह्न भी वे करते हैं. इसके बावजूद भक्ति आंदोलन की क्रांतिचेतना, उच्चवर्गीय लोगों की मानसरचना में आमूल बदलाव लाने में असमर्थ रही. सगुण भक्तों के अवतारवादी द्रष्टिकोण ने पूरे भक्ति आंदोलन की उपलब्धियों पर पानी फेरने का काम किया. इस बीच इस धारा में कुछ ऐसे कविलेखक भी आ मिले जिनकी आस्था पुरातन वर्णव्यवस्था में थी. उन्होंने अपने वर्गीय हितों के अनुकूल साहित्य की रचना पर जोर दिया. इसी के चलते तुलसी युग के सबसे बड़े कवि के रूप में स्थापित हुए. निर्गुण भक्त कवि सामान्यतः राज्याश्रय से दूर रहते थे, मगर उनके सगुण उत्तराधिकारियों ने राज्याश्रय अथवा सत्ताशिखर के आसपास रहना आरंभ कर दिया. मगर इससे भक्ति काव्य की क्रांतिधर्मिता फीकी पड़ती गई.

ईष्ठ देव के आगे त्राण की पुकार करते संत कवियों की रचनाओं में आम आदमी, विशेषकर सामाजिक रूप से उपेक्षित वर्गों की व्यथा को खूब विस्तार मिला. यह कहना तो अनुचित होगा कि उस दौरान राजा की प्रशस्ति में साहित्य रचा ही नहीं गया. बल्कि ढेर इसी कोटि में समा सकता है. बड़ेबड़े राजाओं, सम्राटों की लिखित शब्द के प्रति आस्था ही थी, जिससे उसे राजदरबार में इतिहासकारों, लेखकों और कवि के रूप में चारणवृंदों की विधिवत नियुक्ति होती थी. उनकी प्रतिभा का कथित ‘सम्मान’ होता था. चूंकि समस्त मानसम्मान और पदप्रतिष्ठा आश्रयदाता की खुशी पर निर्भर थे, उसकी वक्री नजर से सब कुछ एक झटके में छिन सकता था. इसलिए कवि लेखक अपने आश्रयदाता की भावनाओं के अनुकूल इतिहास और काव्य के सृजन में लीन रहते थे. उन कवियों ने जो लिखा उसको आधुनिक हिंदी आलोचक रीतिकालीन साहित्य मानते हैं. ‘स्तुतिकाव्य’ को ‘रीतिकाव्य’ कहना, तत्कालीन सामंतीतंत्र से सहानुभूति का ही द्योतक है. बहरहाल उस समय तक साहित्य के तीन रूप प्रचलित थे—

1. धार्मिक आस्थाओं, संप्रदाय आदि को लेकर लिखा जाने वाला साहित्य : महत्त्वपूर्ण होते हुए भी यह आमजन की वास्तविक समस्याओं से दूर था.

2. आश्रयदाता की सहमति पर उसकी प्रशंसा या कृपा के लिए लिखा जाने वाला साहित्य : इस श्रेणी के लेखकों की वर्गीय दृष्टि प्रबल थी. इसलिए ऐसे लेखन का कलात्मक मूल्य चाहे जो हो, उसका साहित्यिक मूल्य नगण्य है.

3. भक्त कवियों द्वारा लिखा जाने वाला साहित्य: इसमें समाज के धर्म और जातीयता आधारित विभाजन तथा ऊंचनीच की भावना को ललकारा गया था. तात्कालिक परिस्थितियों को देखते हुए ऐसे साहित्य को हम क्रांतिधर्मी साहित्य कह सकते हैं. और ऐसा हुआ भी है. लेकिन भक्त कवियों की समस्या है कि वे छोटी से छोटी समस्या से त्राण के लिए परमात्मा की ओर ही देखते थे. सामंती सत्ताओं से टकराने के बजाय वह वर्ग उससे दूर रहने पर जोर देता था.राजनीतिक चेतना से लगभग शून्य होने के कारण भक्ति साहित्य समाज को अपेक्षित दिशा देने में असफल रहा. बल्कि इसकी जनमानस में लोकप्रियता का लाभ उठाते हुए ऐसे कवि भी इससे जुड़ गए जिनका उसकी भक्ति आंदोलन मूल चेतना से दूर तक संबंध नहीं था.

4. जनप्रतिभाओं द्वारा रचा जाने वाला लोकसाहित्य: जनसमाज किसी भी प्रकार की सत्ता और उसके आतंककारी प्रभावों से परे जनसाधारण भी अपनी आवश्यकता और रुचि के अनुकूल मौखिक परंपरा का साहित्य रचने में दक्ष होता है. सही मायने में यही साहित्य समाज की जीवनधारा होता है. यह श्रुतिस्मृति के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक अंतरित होता रहता है; और सत्ता परिवर्तन से निरपेक्ष रहकर विषम परिस्थितियों में भी अपनी जगह बनाए रखता है.

भक्तिकाल में साहित्य जीवन के करीब आया था. भले ही इसके मूल में उस समय व्याप्त राजनीतिकधार्मिक हताशा रही हो, जो लगभग तीन शताब्दी तक परतंत्र रह चुके जनसमाज में स्वभाविक रूप से उभरने लगी थी. भक्तिकाल के प्रमुख कवियों कबीर, रहीम, सूरदास, मीरा आदि के काव्य में बहुत कुछ ऐसा है, जिसको आज हम बच्चों के लिए उपयोगी पाते हैं. तो भी उसको बालसाहित्य नहीं कहा जा सकता. इस कालखंड के दौरान लोकसाहित्य खूब समृद्ध हुआ. बीरबल, तेनालीराम, गोपाल भांड, गोनू झा, देवन मिसर मुल्ला नसरुद्दीन के किस्से दक्ष किस्सागोओं और लोगों की जुबान पर चढ़कर गांवगांव सुनाए जाते थे. आल्ह खंड, नल दमयंती, गोराबादल जैसी कालजयी लोकगाथाओं की रचना भी इसी कालाखंड में हुई, जिन्होंने बच्चों और बड़ों के बीच एकसमान लोकप्रियता अर्जित की.

 क्रमश:….

© ओमप्रकाश कश्यप

परीकथाएं और विज्ञानगल्प

सामान्य

हिंदी बालसाहित्य में परीकथा संभवतः अकेला ऐसा विषय है, जिसे लेकर लंबी-लंबी बहसें चली हैं. बालसाहित्य मर्मज्ञ विद्वानों का एक वर्ग परीकथाओं को उच्च मानवीय गुणों एवं नैतिकता के अजस्र स्रोत के रूप में देखता है. वह संवेदना, सदगुण, सकारात्मक द्रष्टिकोण, तार्किकता और नए जीवनमूल्यों के अनुरूप लिखी गईं परीकथाओं का बालसाहित्य के रूप में समर्थन करता है. आलोचकों की माने तो जादुई घटनाओं, चमत्कारों, अतिकल्पनाशीलता एवं छिछली भावुकता से भरपूर परीकथाएं बालक को उस दिशा में ले जाती हैं, जिसका उसके जीवन से कोई संबंध नहीं होता. निरंतर उनके प्रभाव में रहने से बालमन में अकर्मण्यता पनपती है. इसलिए वास्तविक चुनौती से सामना होते ही उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है. विषम परिस्थितियों में स्वतंत्र निर्णय लेने के बजाय वह किसी बाहरी शक्ति की मदद अथवा चमत्कार की आस करने लगता है. साहित्य विवेकसम्मत निर्णय लेने में उसकी मदद कर सकता है. इसलिए परीकथा के आलोचकों का विचार है कि बच्चों को चुनौतियों से स्वयं निपटने योग्य बनाने के लिए उन्हें आधुनिक भावबोध से भरपूर बालकहानियां, कविताएं आदि दी जानी चाहिए. तदनुसार परीकथा के विकल्प के रूप में वे ‘विज्ञान कथा’ एवं ‘विज्ञान गल्प’ को अपनाने की सलाह देते हैं. आलोचनाओं के बावजूद परीकथाएं आज भी लिखी जा रही हैं. उनका एक विशिष्ट पाठक वर्ग है. लोकसाहित्य की समृद्ध परंपरा के रूप में वे सहस्राब्दियों से, प्रायः हर समाज एवं संस्कृति में हिस्सा रही हैं. भारत और हिंदी दोनों की बात करें तो अपने वर्तमान रूपाकार में परीकथाएं, उनपर चलने वाली बहसों की तरह ही बाहर से आयातित हैं. इस लेख द्वारा हम विज्ञानपरक बालसाहित्य की अवधारणा के बीच परीकथाओं के अस्तित्व एवं उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित करने का प्रयास करेंगे.

परीकथाएं, विज्ञान एवं कल्पनाशक्ति

घटना 1954 के आसपास की है. बताया जाता है कि एक स्त्री आइंस्टाइन से मिलने पहुंची. नोबल पुरस्कार विजेता, विलक्षण प्रतिभा संपन्न वैज्ञानिक होने के कारण उनका मान-सम्मान पहले भी कम न था. मगर विश्वशांति के लिए किए गए अपने अनथक प्रयासों तथा 1952 में इजरायल के राष्ट्रपति पद का प्रस्ताव विनम्रतापूर्वक ठुकरा देने के बाद तो वे पूरी दुनिया पर छा चुके थे. मिलने पहुंची औरत आइंस्टाइन की प्रशंसक थी. वह चाहती थी कि आइंस्टाइन उसके बेटे को समझाएं. उन पुस्तकों की जानकारी दें, जिन्हें पढ़कर उसका बेटा उन जैसा महान वैज्ञानिक बन सके. उत्तर में आइंस्टाइन का कहना था—‘आप इसे परीकथाएं, अधिक से अधिक परीकथाएं पढ़ने को दीजिए.’ महिला चौंकी. उसको लगा आइंस्टाइन ने कोई मजाक किया है. उसने वैज्ञानिक से गंभीर होने की विनती की. बताया कि वह अपने बेटे से बहुत प्यार करती है तथा उसे जीवन में सफल देखना चाहती है. इसके बावजूद आइंस्टाइन का उत्तर पहले जैसा ही था. उनका कहना था—‘रचनात्मक कल्पनाशक्ति सच्चे वैज्ञानिक के लिए उसका अनिवार्य बौद्धिक उपकरण है.’ परीकथाएं बालक की कल्पनाशक्ति को प्रखर करती हैं. अतएव उन्होंने जोर देकर कहा था, ‘मैंने अपने सोचने-समझने के तरीके की पड़ताल की है. काफी चिंतन-मनन के पश्चात मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि मेरे लिए मेरी अद्भुत कल्पनाशक्ति वस्तुजगत संबंधी किसी भी बोध, यहां तक कि सकारात्मक सोच से भी कहीं अधिक लाभकारी है.’
उन्होंने महिला को पुनः समझाया—

‘यदि तुम्हें अपने बेटे को प्रतिभाशाली बनाना है तो उसको परीकथाएं पढ़ाओ. यदि तुम उसे और ज्यादा प्रतिभाशाली बनाना चाहती हो तो उसे और अधिक परीकथाएं पढ़ने को दो.’

उपर्युक्त प्रसंग का उल्लेख अनेक विद्वानों ने किया है. कितना सच है यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. यदि यह सच है तो आइंस्टाइन ने उस स्त्री से क्या कोई परिहास किया था? शोध एवं कल्पना का क्या कोई अंतःसंबंध है? क्या परीकथाओं को पढ़कर कोई बालक सचमुच वैज्ञानिक बन सकता है? यदि नहीं तो आइंस्टाइन ने ऐसा क्यों किया था? यदि हां, तो यह कैसे संभव है कि परीकथा जैसे निहायत कल्पनाशील किस्सों को पढ़कर कोई बालक वैज्ञानिक बन सके? जो लोग वैज्ञानिक प्रविधियों की जानकारी रखते हैं, जिन्हें विज्ञान और उसके इतिहास की समझ है, वे जानते हैं कि यह असंभव भी नहीं है. ज्ञान-विज्ञान एवं कल्पना का रिश्ता बड़ा करीबी होता है. तीव्र कल्पनाशक्ति संभावनाओं के नए वितान खोलकर वैज्ञानिक बोध को रचनात्मक दिशा देने में मददगार सिद्ध होती है. आइंस्स्टाइन ने खुद स्वीकार किया था कि उनके द्वारा किए गए शोध के पीछे उनकी अद्भुत कल्पनाशक्ति का योगदान था. आपेक्षिकता के सिद्धांत की परिकल्पना भी उनके प्रखर कल्पना-सामर्थ्य के दम पर संभव हो पाई थी. पाठक के रूप में यह जानना हमारे लिए रोमांचक हो सकता है कि पदार्थ एवं ऊर्जा की अंतपर्रिवर्तनीयता को दर्शाने वाला सूत्र तथा सापेक्षिकता का विचार उनके मानस में कल्पना के द्वारा ही उभरा था; अन्यथा यह तो कभी का प्रमाणित हो चुका था कि पृथ्वी समेत ब्रह्मांड के सभी ग्रह-नक्षत्र गतिमान हैं. उनकी गति चक्रीय एवं घूर्णन दो प्रकार की होती है. विराट अंतरिक्ष में किसी पिंड की स्थिति की कल्पना करनी हो तो क्षण-क्षण परिवर्तनशील होने के कारण उसकी स्थिति का सटीक अनुमान संभव ही नहीं है, क्योंकि अनेक गतिमान पिंडों के बीच में किन्हीं दो गतिशील पिंडों की स्थिति को लेकर सटीक गणना उस समय तक असंभव है, जब हम बाकी गतियों को कल्पना में ही सही, शून्य नहीं मान लेते. यही वह समस्या थी, जिसे सुलझाने में आइंस्टाइन ने कामयाबी हासिल की थी.

उस समय के भौतिक विज्ञानी एक जटिल पहेली से जूझ रहे थे. पहेली थी—‘मान लीजिए कोई अंतरिक्ष यात्री प्रकाशवेग जितने असंभव वेग से अंतरिक्ष यात्रा पर है. उसके हाथ में एक दर्पण है. तो क्या उस दर्पण में वह अपना प्रतिबिंब देख पाएगा? कोई और होता तो उस पहेली पर कुछ देर तक माथापच्ची करता. तीर-तुक्का चलाता. फिर हाथ झाड़कर आगे बढ़ जाता. जब से वह पहेली बनी थी, तब से यही होता आया था. साधारण मनुष्यों की भांति यदि आइंस्टाइन भी यही करते तो उन्हें जीनियस कौन कहता! इस पहेली का हल खोजने में आइंस्टाइन ने एक-दो दिन या महीने नहीं, 1895 से 1905 तक, पूरे दस वर्ष लगा दिए. इस बीच जो भी उन्हें मिला उससे पहेली के बारे में चर्चा की. उसका समाधान करना चाहा. मित्रों-गुरुजनों को पत्र लिखकर संवाद किया. मगर नाकामी हाथ लगी. आखिरकार उनकी तीव्र कल्पनाशक्ति उनके काम आई. उससे पहले प्रकाशवेग को भी परिवर्तनशील माना जाता था. मान्यता थी कि प्रेक्षक के अनुसार प्रकाश का वेग भी बदलता रहता है. आइंस्टाइन ने प्रकाश वेग को सृष्टि का उच्चतम वेग माना. साथ ही परिकल्पना की कि वह प्रेक्षक की स्थिति पर निर्भर नहीं करता. प्रेक्षक चाहे स्थिर हो अथवा गतिमान, प्रकाशवेग प्रत्येक स्थिति में अपरिवर्तित रहता है. यह उनकी मौलिक परिकल्पना थी. एक दूर की कौड़ी, जिसे वैज्ञानिक कसौटी पर प्रमाणित करने में स्वयं आइंस्टाइन को पूरे बीस वर्ष लग गए. इस खोज के फलस्वरूप खगोलीय पिंडों की स्थिति की सटीक व्याख्या के लिए क्षण को महत्ता प्राप्त हुई. समय को चैथे आयाम के रूप में स्वीकारा जाने लगा. न केवल आइंस्टाइन बल्कि न्यूटन, आर्कीमिडीज, लियोनार्दो दा विंसी, गैलीलियो, था॓मस अल्वा एडीसन, जेम्स वाट आदि अनेक वैज्ञानिक हुए हैं, जिनकी सफलता के पीछे उनकी विलक्षण कल्पना-शक्ति का योगदान था.

पृथ्वी में कोई शक्ति है यह विचार न्यूटन को कथित रूप से सेब के जमीन पर गिरने की घटना से सूझा था. ‘कथित’ इसलिए क्योंकि फल गिरने से आकर्षण शक्ति की परिकल्पना का उल्लेख न्यूटन से करीब नौ सौ वर्ष पहले लिखित ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’ में भी मिलता है. यह मध्यकालीन आचार्य ब्रह्मगुप्त की रचना है. उनसे भी पहले वाराहमिहिर ने लिखा था—‘पृथ्वी उसी को आकृष्ट करती है, जो उसके ऊपर हो. क्योंकि यह सभी दिशाओं में नीचे है और आकाश सभी दिशाओं में ऊपर है.’ ब्रह्मगुप्त इसे और भी स्पष्ट कर देते हैं—

‘चारों तरफ आकाश बराबर रहने पर पृथ्वी ही के ऊपर बहुत पके हुए फल को गिरता हुआ देखकर भूपृष्ठ स्थित प्रत्येक बिंदू में आकर्षण शक्ति है—यह अनुमान किया गया.’

वैज्ञानिक शोध के लिए कल्पना का सहारा प्राचीनकाल से लिया जाता रहा है. शोध क्षेत्र में कामयाबी प्रायः उन्हीं के हाथ लगी, जिनकी कल्पना-शक्ति प्रखर थी. यह न्यूटन की अंतःप्रज्ञा ही थी जिसने उसको चेताया था कि यदि पृथ्वी में आकर्षण बल है तो उसका कुछ न कुछ परिमाण भी होना चाहिए! अपनी विलक्षण मेधा से उसने गुरुत्वाकर्षण बल की संकल्पना को नए सिरे से न केवल स्थापित किया, बल्कि उसकी परिगणना भी की. फलस्वरूप एक नई संकल्पना ने जन्म लिया कि पृथ्वी सहित ब्रह्मांड के सभी ग्रह-नक्षत्र एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं. आकर्षण बल की मात्रा उनके द्रव्यमान तथा बीच की दूरी पर निर्भर करती है. भारी पिंडों का आकर्षण बल उसी अनुपात में अधिक होता है. यह बल दूरी बढ़ने के साथ निरंतर घटता जाता है.

शोध-क्षेत्र में कल्पनाशक्ति का योगदान लक्ष्य की पूर्वपीठिका तैयार करने का है, जिसके बिना किसी यात्रा का शुभारंभ असंभव है. वैज्ञानिक शोध के प्रायः दो रास्ते होते हैं. आगमनात्मक प्रणाली, जिसमें उपस्थित विशिष्ट तथ्यों के आधार पर सामान्य सिद्धांत का अन्वेषण किया जाता है. न्यूटन का जड़त्व का सिद्धांत, एडवर्ड जेनर द्वारा चेचक की वैक्सीन, फ्लेमिंग द्वारा बादलों में बिजली इसी प्रकार के शोध हैं. दूसरी ‘निगमनात्मक प्रणाली’ में पहले सामान्य सिद्धांत की परिकल्पना कर ली जाती है, तदनंतर उसकी पुष्टि हेतु प्रमाण खोजे जाते हैं. पहली यानी ‘आगमनात्मक प्रणाली’ का उपयोग प्रायः वैज्ञानिक शोध के क्षेत्र में किया जाता है. इसका आशय यह नहीं है कि ‘निगमनात्मक प्रणाली’ विज्ञान के लिए सर्वथा वर्जित है. बल्कि ऐसे अनेक मामले हैं, जिनमें प्रमाणों के अभाव में वैज्ञानिक अपने बोध अथवा अनुभव के आधार पर सामान्य परिकल्पना कर लेते हैं. बाद में विभिन्न प्रयोगों, अन्वीक्षण आदि के आधार पर उस परिकल्पना को जांचा-परखा जाता है. इन दिनों चर्चित ‘हिग्स बोसोन’ के लिए यही पद्धति अपनाई जा रही है. वरना सार्वत्रिक बल की परिकल्पना तो आइंस्टाइन ने ही कर ली थी.

कुछ ऐसे शोध भी हैं जिनमें आगमनात्मक और निगमनात्मक दोनों ही प्रणालियों का उपयोग होता है. न्यूटन के गुरुत्त्वाकर्षण और आइंस्टाइन के सापेक्षिकता के सिद्धांत की खोज में आगमनात्मक और निगमनात्मक दोनों प्रणालियों का योगदान दिखाई पड़ता है. एक श्रेणी आकस्मिक रूप से होने वाली खोजों की भी है. उन आविष्कारों की जो किसी दूसरे प्रयोग अथवा घटना के दौरान अकस्मात हाथ लग जाते हैं, जैसे मैग्नेशिया के चरवाहों द्वारा चुंबक की खोज, मैडम क्यूरी द्वारा रेडियम, फीनीशिया के समुद्रतट पर सीरियाई व्यापारियों द्वारा कांच की खोज वगैरह. उनके लिए भी ऐसी सूझबूझ होना जरूरी है जो नएपन को पकड़ सके तथा उसके आधार पर सामान्य परिकल्पना गढ़कर आगे बढ़ सके. बुदापेस्ट विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. के. स्टेलजेर ने शोधकर्ता में अपेक्षित जिन आठ गुणों को जरूरी बताया है, वे हैं—तत्परता(5%), खुला मन(10%), दृष्टि की विशालता(15%), कल्पनाशक्ति(30%), निर्णय दक्षता(15%), विषय का सांकेतिक ज्ञान(10%), अनुभव(10%) तथा दायित्वबोध(5%). इस विश्लेषण को ध्यान से देखें तो नवीन शोध के लिए कल्पना को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है. कुछ ऐसे ही विचार जेरोम सिंगर के रहे हैं. पेशे से मनोविश्लेषक सिंगर का मानना है कि कल्पना स्वस्थ मनस् की ओजपूर्ण कार्रवाही है. उसके अनुसार कल्पना की ऊंची उड़ान यहां तक कि दिवास्वप्न भी हमारे आत्मविश्वास और धैर्य की वृद्धि में सहायक होते हैं. कुल मिलाकर हमारे वे हमारे विवेक एवं चारित्रिक गठन में सकारात्मक योगदान देते हैं. वह आगे लिखते हैं कि अच्छी-तरह सोची-विचारी गई कल्पना व्यक्ति-स्वातंत्र्य, यथार्थबोध, और आत्मविश्वास की वृद्धि में सहायक सिद्ध होती है.

उपर्युक्त विश्लेषण से इतना तो तय हुआ कि कल्पना और सृजनात्मकता के बीच कोई वैर नहीं है. उनमें न तो कोई स्पर्धा है और न कोई वैर. दोनों एक-दूसरे की पूरक, समानांतर और सहायक हैं. अतएव मात्र अतिकल्पनाशीलता का तर्क देकर परीकथाओं की आलोचना को नीतिसंगत नहीं ठहराया जा सकता. परीकथाएं बालक के कल्पना-सामर्थ्य को निखारकर उसे कई वैकल्पिक समाधान दे सकती हैं. वैज्ञानिक शोध को नई दिशाएं देने के लिए यह अत्यावश्यक है. वहीं विज्ञान परीकथा लेखकों को कल्पना के नए क्षेत्र, नए विषय और तार्किक आधार प्रदान कर सकता है. फिर परीकथाओं की आलोचना की वजह? क्या परीकथाओं का अपना कोई ऐसा लक्षण है जो उन्हें विज्ञान-विरोधी सिद्ध करता हो? यहां परीकथा के कथानक और पात्रों को जानबूझकर नजरंदाज किया रहा है. हालांकि साहित्यिक, विशेषकर कथारचना में पात्रों की प्रकृति का अपना महत्त्व होता है. फिर भी मेरा मानना है कि पात्र लेखक की मनोरचना होते हैं, रचना द्वारा उसका ध्येय किसी चरित्र की स्थापना करना नहीं होता, बल्कि उन जीवनमूल्यों की पुन:स्थापना अथवा व्याख्या करना होता है, जिन्हें वह मनुष्य एवं समाज के कल्याण हेतु आवश्यक मानता है. ऐतिहासिक, धार्मिक मामलों में स्थिति थोड़ी भिन्न हो सकती है. क्योंकि वहां जीवनमूल्य पात्रों के नाम से जुड़े होते हैं. उद्देश्य वहां भी किसी लोकोपयोगी सत्य को, तत्संबधी ऐतिहासिक चरित्र के माध्यम से कुछ और प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करना होता है. परीकथा-आलोचकों को सबसे अधिक आपत्ति उनके पात्रों तथा विचित्र घटनाक्रम से होती है. उनके अनुसार परीकथाओं के पात्र इस दुनिया से बाहर की चीज होते हैं, जादू-टोने और चमत्कार जिन्हें लेकर सामान्य परीकथाएं गढ़ी जाती हैं, कल्पना की मनगढ़ंत दुनिया है—आलोचकों के ये तर्क युक्तिसंगत कहे जा सकते हैं. मगर सच भी है कि साहित्य में कथानक अथवा पात्रों की असलियत महत्त्वपूर्ण नहीं होती. वे तो रचना का केवल बाह्यः कलेवर तैयार करते हैं. जिसे साहित्य कहते हैं, उसकी प्रतीति लेखकीय सदेच्छा तथा रचना द्वारा पाठक के मनस् पर डाले गए सकारात्मक प्रभावों तथा उनकी रचनात्मक प्रतिक्रिया द्वारा होती है.

साधारण लेखक यह कामना कर सकता है कि पाठक उसके गढ़े हुए पात्रों और कथानक को याद रखें. सच्चे साहित्यकार की दृष्टि सदैव शुभ पर केंद्रित होती है. वह व्यक्ति और समाज में जीवन-मूल्यों की स्थापना के लिए कलम उठाता है. अर्नेस्ट हेंमिंग्वे के उपन्यास ‘ए मेन आ॓न दि सी’ का उल्लेख करना चाहूंगा. परीकथाओं जैसी पृष्ठभूमि लिए इस लघु उपन्यास में एक नाव है, मछुआरा है, समुद्र है और है विशालकाय मछली. इन पात्रों को लेकर न जाने कितने लेखकों ने कलम उठाई है. खोजने पर हजारों रचनाएं ऐसे परिवेश और कथापात्रों के साथ मिल सकती हैं. लेकिन एक व्यक्ति की जिजीविषा, विषम परिस्थितियों से जूझने, धैर्य बनाए रखने की भावना और कर्तव्यनिष्ठा, जिस शिद्दत के साथ इस छोटे-से उपन्यास में उभरकर आती है, वैसी बाकी किसी रचना में नहीं. यही साहित्यत्व है, यही शुभ. इसी को रचना के माध्यम से पेश करना साहित्यकार का अभीष्ट होता है. यह रचना में पूरी तरह उभर आए तो वह ‘क्लासिक’ की श्रेणी में आ जाती है. अन्यथा उसकी नियति बोरे में भरे आलुओं में से किसी एक आलू जैसी होती है. ‘परी’ नाम को छोड़ दिया जाए तो कोई भी पात्र परीकथाओं के लिए अनिवार्य नहीं है. सक्षम साहित्यकारों ने तो परियों को बीच में लाए बिना भी लाजवाब परीकथाएं लिखी हैं. उन्हें पूरी दुनिया में सराहा गया है. हेंस एंडरसन की ‘स्नोमेन’ ऐसी ही मर्मस्पर्शी परीकथा है.

परीकथाओं की सामान्य विशेषता है कि वे बच्चों को केंद्र में रखकर लिखी जाती हैं. हालांकि साहित्यकार पर यह दबाव होता है कि वह मनोरंजन के साथ-साथ सोद्देश्यता को भी बनाए रखे. यदि कोई रचना साहित्यत्व ही गंवा देगी तो उसके लिखने का नैतिक उद्देश्य ही जाता रहेगा. संदेश और सोद्देश्यता परीकथाओं में भी होती है. लेकिन परीकथा लेखक केवल इन्हीं को ध्यान में रखकर नहीं लिखता. उसका ध्येय होता है कि बालक उसकी कल्पना के साथ-साथ उड़ान भरता हुआ, उस लोक में पहुंच जाए जहां कहानी की पात्र परियों का वास है; अथवा जहां वह अपने कथानक के माध्यम से उन्हें ले जाना चाहता है. इसके लिए सबसे पहले उसको अपने साहित्यकार होने के दर्प को किनारे कर बच्चों के मनोस्तर तक उतरना पड़ता है. बच्चों के साथ रहकर, उनके खेल-कूद, बातचीत, रहन-सहन, कोमल मनोभावों को समझ, उनकी चिंताओं और सपनों से बाबस्ता होने के बाद वह अपनी कल्पना के तार जोड़ता है. उस समय तक बालपाठक भी उसके साथ घुल-मिल जाता है. संक्षेप में परीकथा लेखक की वास्तविक सफलता बालक को अनूठी कल्प-यात्रा का सहयात्री बना लेने तथा बालक द्वारा लेखक को अपना सखा-सहयात्री स्वीकार लेने में है. यहां साहित्यकार का अनुभव काम आता है. सोद्देश्यता बनाए रखने के लिए वह साहित्यत्व को रचना में लाता है, किंतु अतिप्रच्छन्न रूप में. ऐसे कि बालक को आभास तक न हो.

उदाहरण-स्वरूप हम एंडरसन की परीकथाओं का उल्लेख कर सकते हैं. उनकी एक चर्चित कहानी है—‘टीन का सिपाही’. बहुत ही मार्मिक कहानी. ‘टीन का सिपाही’ एक पांव से लंगड़ा और दुबला-पतला था. इस कारण कोई उसको प्यार नहीं करता था. एक दिन गुड़िया उसको भा जाती है. गुड़िया पर बाजीगर की भी नजर है. वह टीन के सिपाही के लिए तरह-तरह की मुश्किलें खड़ी करता है. आखिर टीन का सिपाही जलती हुई अंगीठी में गिर जाता है. पीछे से गुड़िया भी उसमें कूद जाती है. यहां तक कहानी में परी की कोई भूमिका नहीं है. विचित्र कल्पना के रूप में टीन का सिपाही है. गुड़िया है और खलनायक के रूप में निर्दयी बाजीगर है, जो टीन के सिपाही और गुड़िया पर एक के बाद एक अत्याचार करता है. पर टीन के सिपाही को अंगीठी में जलते हुए देख परी अचानक उपस्थित होती है. वह दोनों को अंगीठी से निकालकर उन्हें स्त्री-पुरुष बना देती है. वह दोनों को निश्चिंत करती है कि बाजीगर आगे उन्हें कभी परेशान नहीं कर पाएगा. यह सब कल्पना में ही होता है, किंतु इसी बहाने व्यक्ति को यह विश्वास होता है कि एक न एक दिन उसकी दुरवस्था का निदान संभव है. प्रख्यात परीकथा लेखक, विचारक जी. के. चेटरसन लिखते हैं—

‘परीकथाओं का सच, यथार्थ से आगे का सच होता है. परीकथाओं में महत्त्वपूर्ण यह नहीं हैं कि वे हमें राक्षस की मौजूदगी से परचाती हैं. महत्त्वपूर्ण यह है कि वे हमें भरोसा दिलाती हैं कि राक्षस की पिटाई भी संभव है.’

साहित्य में प्रतीक महत्त्वपूर्ण होते हैं. एंडरसन की कहानी में ‘टीन का सिपाही’ और ‘गुड़िया’ दोनों आम आदमी का प्रतीक हैं. बाजीगर धर्मसत्ता और राजसत्ता के योग से बनी निरंकुश सत्ता का. निरंकुश सत्ताआम जन पर उसी समय तक अत्याचार कर पाती है, जब तक वे अपनी ताकत से अनभिज्ञ हों. ‘परी’ यहां नई ज्ञान-चेतना का प्रतीक है तथा अंगीठी प्रबोधीकरण की प्रक्रिया का. टीन के सिपाही और गुड़िया का जैसे ही विवेकीकरण होता है, उनमें नई ज्ञान-चेतना उमड़ने लगती है. दोनों के चेतनासंपन्न होते ही बाजीगर रूपी निरंकुश सत्ता की चालबाजियों का अंत स्वतः हो जाता है. यह परीकथाओं की खूबी है जो जिनमें पाठक तो पाठक, लेखक तक अपनी कुंठाओं का समाहार कर सकता है. परीकथाएं यह विश्वास दिलाती हैं कि बुरी से बुरी स्थिति का भी सार्थक समाधान संभव है. इसके लिए बालक को लगना चाहिए कि अजूबे पात्रों के माध्यम से जो कहानी कही जा रही है, वह कहीं न कहीं उसकी भी है. एक अच्छा परीकथा लेखक बाल-पाठकों को सिर्फ वह नहीं देता जो उसे पसंद हो. बल्कि वह अपनी रचना को इतनी बहुआयामी बना लेता है कि बालक उसमें से अपनी पसंद को चुन सके. यह कुशलता भाषा-शैली के स्तर पर भी होनी चाहिए, ताकि नाद के माध्यम से एक अतिरिक्त आकर्षण रचना में समा जाए. पढ़ते समय पाठक को सुनने का आनंद भी आए. लेखकीय कौशल अनूठी कल्पना के रूप में भी होना चाहिए, जिसके फलस्वरूप पाठक उसमें इतना डूब जाए कि अपने आसपास का उसे बोध ही न रहे. यदि श्रोता-पाठक रचना के पात्रों के साथ तादात्मय स्थापित कर लेगा तो वह रचना की अनेक कमजोरियों अथवा उन बिदुंओं को जिनमें उसकी अरुचि है, भुला देगा.

परीकथाएं एवं विज्ञान गल्प

साधारण नजर से देखने पर परीकथा एवं विज्ञान गल्प परस्पर भिन्न, दो विपरीत दिशाओं में खड़े टापुओं के समान दिखाई पड़ते हैं. ऐसा ही प्रचारित किया जाता है. यह सचाई का एक पहलू है. ध्यानपूर्वक विचार करने पर पाएंगे कि दोनों में आश्चर्यजनक एकरूपता है. परीकथा एवं विज्ञान गल्प का सृजन सामान्यतः दो घटकों के आधार पर होता है. उनमें एक विशिष्ट है, दूसरा सामान्य. सामान्य इसलिए कि अपने अस्तित्व एवं मौलिकता को बनाए रखने के लिए दोनों उसे अपरिहार्य मानते हैं. उसकी दोनों में समान उपस्थिति है. इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा समझा जा सकता है—

विज्ञानबोध   +   कल्पना   =   विज्ञान गल्प
करुणा अथवा करुणतत्व   + कल्पना   =   परीकथाएं

उपर्युक्त से स्पष्ट है कि कल्पना की उपस्थिति जितनी परीकथा लेखन के लिए आवश्यक है, उतनी जरूरी विज्ञान गल्प के लिए भी है. अब यदि यह माना जाए कि विज्ञान-गल्प एवं परीकथा दोनों परस्पर विपरीत धुर्वी हैं, तब यह भी मानना पड़ेगा कि ‘विज्ञानबोध’ तथा ‘करुणा’ जो इनके विशिष्ट घटक हैं; अथवा जिनसे इन्हें भिन्न पहचान प्राप्त होती है—परस्पर विपरीतधर्मा हैं. या फिर कल्पना के साथ स्वतंत्र संयोग कर ये दोनों जो भिन्न-भिन्न संरचनाएं गढ़ते हैं, वे आपस में विपरीत-धर्मा है. प्रकट में समाज का काम न तो बिना ‘करुणा’ के चलता है, न ‘विज्ञानबोध’ के. सामाजिक संतुलन, विकास की निरंतरता हेतु ये दोनों ही अत्यावश्यक हैं. पिछले चार-पांच सौ वर्षों से विज्ञान जिस तेजी से सामाजिक विकास का मुख्य प्रवर्त्तक बनकर उभरा है, उससे लेखकों एवं बुद्धिजीवियों में उसके प्रति अतिरिक्त आस्था है. तथापि विज्ञान अथवा विज्ञानबोध की तुलना में ‘करुणा’ का प्रत्यय काफी पुराना है. लेखन का पहला स्फुरण ही आदि कवि के मुख से, उनके हृदय में उपजी करुणा के फलस्वरूप हुआ था. करुणा मानव-हृदय को नैतिक प्रेरणाओं से समृद्ध करती है. व्यक्तित्व को आवश्यक लचीलापन प्रदान करती है. विज्ञान करुणामय हो सकता है. उसके कई आविष्कार वैज्ञानिकों की मनुष्यता के प्रति आस्था एवं करुणा द्वारा संभव हो पाए हैं. इसके बावजूद करुणा विज्ञान का विषय नहीं है.

करुणा मूलतः संश्लेषणात्मक होती है. रचना की अंतरात्मा में प्रवेश कर उसे कोमल और हृदयग्राही बनती है. यह करुणा का ही विस्तार है जो हम विज्ञान के किसी आविष्कार को लेकर कामना करते हैं कि वह समाज के अंतिम छोर पर स्थित व्यक्ति के कल्याण में सहायक बनेगा. उसके कष्टों, विपत्तियों, बाधाओं, व्याधियों, अभावों आदि का समाहार कर सुख-सपनों के दरवाजे खोल देगा. अतीत में उसने ऐसा किया भी है. एडवर्ड जेनर, एलेक्जेंडर फ्लेमिंग के मन में करुणा का कोई छिपा अंश ही रहा होगा, जिसके फलस्वरूप अपना सबकुछ दांव पर लगा, यहां तक कि प्राणों का जोखिम उठाकर भी वे क्रमशः ‘वैक्सीन’ और ‘पेनिसिलीन’ का आविष्कार करने में कामयाब हुए थे. करुण-तत्व प्रमुख होने के कारण परीकथाएं पाठक के दिल में उतर जाती हैं. आमतौर पर वही परीकथाएं ज्यादा पढ़ी-सुनी जाती हैं, जिनमें दुख की सघन व्याप्ति तथा उसके व्यापक संदर्भ हों.

विज्ञान की प्रवृत्ति ज्ञान के संश्लेषण के बजाय, विश्लेषण की होती है. सत्य तक पहुंचने के लिए वह तथ्यों के परिवीक्षण और विश्लेषण की नीति को अपनाता है. इसके फलस्वरूप प्राप्त निष्कर्ष अधिक प्रामाणिक एवं भरोसेमंद माने जाते हैं. विज्ञान से हम अपेक्षा करते हैं कि उसकी उपलब्धियां मानवमात्र के लिए कल्याणकारी सिद्ध होंगी. दूसरे शब्दों में हम विज्ञान से अपेक्षा करते हैं कि वह करुण-तत्व को अपनाए, मानवमात्र के हितों को लेकर संवेदनशील रहे, तभी वह स्वयं को वृहद लोककल्याण के प्रति समर्पित कर सकता है. इसलिए ‘करुणा’ और ‘विज्ञानबोध’ जो क्रमशः परीकथाओं एवं विज्ञानगल्प के विशिष्ट घटक हैं, समाज के बहुआयामी विकास की दृष्टि से विपरीतगुणधर्मा न होकर, परस्पर पूरक-सहायक हैं. ऐसे में विज्ञान लेखक का दायित्व है कि वह समाज में यत्र-तत्र मौजूद विपुल ज्ञान-विज्ञान संपदा का रचनात्मक उपयोग करे. इस प्रकार कि वह सहज-सरल रूप में ढलकर अधिसंख्यक वर्ग के लिए लाभकारी सिद्ध हो सके.

परीकथाओं का विशिष्ट तत्व ‘करुणा’ मानवीकरण की उच्चाकांक्षा से अनुप्रेत होता है. अपने विनम्र अंदाज में परीकथाएं सामाजिक समानता का रूपक रचती हैं. वे समाज में व्याप्त अनेकानेक समस्याओं का काव्यात्मक समाधान देती हैं, जिसे परीकथा समर्थक उनका विशिष्ट गुण मानते हैं, विरोधी अवगुण. यह ठीक है कि कोरे रागात्मक समाधान से अपेक्षित परिवर्तन नहीं आता. उससे न तो किसी की भूख मिटती है, न सामाजिक असमानता खत्म हो पाती है, किंतु उससे खुद पर, आने वाले समय और समाज पर भरोसा बना रहता है. दरअसल, अनियोजित शहरीकरण ने समाज के समक्ष जो चुनौतियां पेश की थीं, उनमें बड़ी चुनौती व्यक्ति के केंद्र में ढल जाने की है. भारत की प्राचीन सभ्यता, भाईचारे की परंपरा का दावा करने वाले गांव भी उससे अछूते नहीं हैं. विज्ञान ने हमारी मदद की है. किंतु उसकी अपनी सीमाएं हैं. विज्ञान अकेलेपन द्वारा पैदा हुई मुश्किलों की भरपाई तो कर सकता है, करता आया है. किंतु उसके पास अकेलेपन की कोई दवा नहीं है. इसलिए सुख-सुविधाओं के जमघट के बावजूद मानवीय अवसाद की घटनाएं निरंतर बढ़ रही हैं. जो विद्वान अकेलेपन को आधुनिक सभ्यता की नियति मान बैठे हैं, उनका निराशा की शरण में जाना अवश्यंभावी है. उसका विकल्प वे विज्ञान और तज्जनित फंतासी की निष्प्राण दुनिया में खोजना चाहते हैं. उनसे इतर जो मनुष्य के रागात्मक जीवन तथा आधुनिक भावबोध में संतुलन चाहते हैं, वे परीकथाओं तथा साहित्य की अन्यान्य विधाओं के महत्त्व को समझकर उन्हें सहेजे रखना चाहते हैं. साहित्य अथवा उसकी किसी विधा की सबसे बड़ी चुनौती अपने समय से तालमेल बनाकर रखना है. नए-नए प्रयोगों द्वारा परिकथाओं ने ऐसा किया भी है. उनकी अपेक्षा विज्ञान कथाओं में प्रयोगधर्मिता कम देखने को मिलती है. खासकर विकासशील और अविकसित देशों में, जहां विज्ञानबोध की कमी के चलते विज्ञान साहित्य लोकजीवन का स्वाभाविक हिस्सा नहीं बन पाता. परिणामस्वरूप वह ऊपर से थोपा हुआ, कभी-कभी तो निखालिस टोटम लगने लगता है.

विज्ञान गल्प और परीकथाओं दोनों की खूबी उनका अतिकल्पनाशील होना है. यह विडंबना ही कही जाएगी कि अतिकल्पनाशीलता जो विज्ञान गल्प के लिए दोषरहित दिखाई पड़ती है, परीकथाओं के संदर्भ में वह आलोच्य मान ली जाती है. जो विज्ञान लेखक अरबों प्रकाशवर्ष दूर अंतरिक्ष में कल्पित ग्रह पर अच्छे और बुरे वैज्ञानिकों के बीच संघर्ष से युक्त आधारविहीन फंतासी को विज्ञान-सम्मत घोषित करते नहीं अघाते, वे परीकथाओं की परंपरागत फंतासी से भुन्नाने लगते हैं. विज्ञान लेखकों का तर्क होता है कि उनकी मुक्ताकाशी कल्पना के पीछे कोई न कोई स्वयंसिद्ध वैज्ञानिक आधार होता है. साथ में यह उम्मीद कि आज नहीं तो कल विज्ञान उस लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल रहेगा. परीकथाएं प्रकट में ऐसा कोई आश्वासन नहीं देतीं.

परंपरागत परीकथाओं के साथ यह डर भी जुड़ा हुआ था कि उनके अधिकांश पात्र सामंती स्वभाव के होते थे. परियों में भी राजा और रानियां होती थीं. बौने होते थे, जिनकी हैसियत समाज के छोटे, दूसरों की दया पर जीने वाले, उपेक्षित कार्मिक वर्ग जैसी थी. इस तरह वे प्राचीन अलोकतांत्रिक और विभेदकारी समाज-व्यवस्था से पाठक के अनुकूलन का काम करती थीं. यहां परीकथाआंे की पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है. जान लेना चाहिए कि परीकथाओं का उद्भव लोकसाहित्य के हिस्से के रूप में हुआ है. इसलिए सामंतवाद, ब्राह्मणवाद सहित भारतीय समाज के तत्कालीन संस्कारों की उसमें उपस्थिति अवश्यंभावी थी. परीकथाओं की इस कमजोरी को यूरोपीय जागरण के दौरान समझ लिया गया था. अतएव अठारहवीं और उनीसवीं शताब्दी में वहां परीकथाओं को नए सिरे से लिखे जाने का चलन शुरू हुआ. हालांकि कुछ पश्चिमी लेखकों ने भारत को परीकथाओं के मूल देश की भांति देखा था. इसके बावजूद यहां आधुनिक युगबोध से संपन्न परीकथाओं के लेखन की रफ्तार काफी मंद रही. शायद इसलिए कि एक तो ‘परी’ की अवधारणा अभारतीय थी, जिससे प्रतिभाशाली लेखकों की उनके प्रति उपेक्षा बनी रही. दूसरे आरंभिक पारसियन और यूरोपीय विद्वानों ने जिन रचनाओं को भारतीय परीकथा के रूप में स्वीकारा था, उनमें से अधिकांश लोकसाहित्य का हिस्सा थीं. भारतीय उन्हें देसी परंपरा के रूप में देखने के अभ्यस्त थे. आगे चलकर पश्चिमी विद्वानों ने पंचतंत्र, वैताल पचीसी, सिंहासन बतीसी, लोकसाहित्य आदि के अलावा कुछ पौराणिक और वैदिक कहानियों को भी भारतीय परीकथाओं के रूप में मान्यता दी, जिन्हें भारतीय लेखकों ने करीब-करीब नकार दिया. शायद इसलिए कि अपनी साहित्यिक परंपरा को विदेशी पहचान के अंतर्गत देखा जाना उन्हें स्वीकार न था. इसके बावजूद समाज में परीकथाओं की लोकप्रियता बनी रही. उन्हें संवेदना, करुणा, मानवता, परोपकार के अजस्र स्रोत के रूप में देखा जाता रहा. यही उनकी लोकप्रियता की असली वजह थी. यही उनकी असली ताकत. शायद इसी को ध्यान में रखकर ‘स्टडी आ॓फ फेयरी टेल्स’ में लौरा एफ. क्रैडी ने लिखा था—

‘परीकथाओं का मूल संदेश है, मायावी दुनिया में सचमुच का जीवन, चाहे वह सामान्य बालक की असामान्य परिवेश में उपस्थिति के रूप में हो या असामान्य बालक की सामान्य परिवेश में. सामान्य और असामान्य का यह सुयोग ही ‘एलिस इन वंडरलेंड’ का मुख्याकर्षण है, जिसमें एक सामान्य बालिका कृत्रिम और मायावी दुनिया में विचरण करती है.’

परीकथाएं अर्से तक लोकजीवन का हिस्सा रही हैं. किंतु साहित्य की मान्यता उन्हें काफी विलंब से मिल सकी. यह जानना भी कम चैंकाऊ नहीं है कि आधुनिक परीकथा तथा विज्ञान-गल्प दोनों का जन्म एक ही ऐतिहासिक मोड़ पर करीब-करीब एक ही समय में हुआ था. विशेषकर आधुनिक परीकथाओं ने तो उस समय में अपनी पहचान बनाई थी, जब पूरा फ्रांस वैचारिक उद्वेलन से गुजर रहा था. जान ला॓क, चार्ल्स फ्यूरियर, इमानुएल कांट, जेरमी बैंथम, रूसो, ग्रीन, मिल आदि विचारकों ने महिला स्वातंत्र्य का समर्थन किया था. फलस्वरूप फ्रांसिसी महिलाओं में पढ़ने-लिखने की तीव्र होड़ पैदा हुई. औद्योगिकीरण से आमदनी बढ़ी तो उन्होंने पुरुषों के साये से हटकर, मनोरंजन के नए साधनों की खोज में घर से बाहर निकलना आरंभ किया. संभ्रांत परिवारों से संबंधित उन स्त्रियों ने महिला मनोरंजन सदनों की स्थापना की थी. वहां वे बारी-बारी से परीकथाएं सुनाती थीं. जिस महिला का कहानी सुनाने का नंबर आता, उसको ‘फी’ कहा जाता. उसी से आगे चलकर ‘फेयरी टेल्स’ शब्द की उत्पत्ति हुई. उस दौर में जब पूरा परिवेश सामंती था, रक्त शुद्धता के नाम पर स्त्रियों को चारदीवारी में कैद रखा जाता था—फ्रांसिसी महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से घर से बाहर निकलकर मनोरंजन सदनों की स्थापना करना क्रांतिकारी कदम था. वह ढलते सामंतवाद का दौर भी था. यूरोपीय दर्शन में सुखवाद एवं उयोगितावाद की धूम मची हुई थी. बैंथम, हीगेल, जेम्स मिल, जा॓न स्टुअर्ट मिल, ग्रीन और कांट जैसे विद्वान अपने सुखवादी दर्शन के साथ नई चेतना के निर्माण में लगे थे. विज्ञान साहित्य का अभीष्ट भी यही था कि वह मनुष्यता के कल्याणकारी अनुप्रयोगों की ओर बुद्धिजीवियों-वैज्ञानिकों का ध्यानाकर्षित करे तथा उनके समर्थन में खड़ा नजर आए. उसका असर साहित्य, समाज सभी पर एक साथ देखने को मिला. वैज्ञानिक खोजों को लेकर कहानी-उपन्यास लिखने का चलन बढ़ा तो परीकथाएं भी लोकसाहित्य से छिटककर स्वतंत्र पहचान बनाने लगीं. हालांकि उन्हें परंपरा से हटकर परिष्कृतरूप में ढालने की कोशिशें करीब-करीब नगण्य रहीं.

परीकथाएं बच्चों एवं बड़ों की कोमल भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं. प्रेम और नीतिवादी संदेश के साथ वे मानवीय संवेदनाओं को उनके उच्चतम स्तर तक ले जाकर उन्हें सामाजिक आदर्श का रूप दे देती हैं. समाज के संतुलित विकास के लिए उसे रागात्मक चेतना भी चाहिए और विज्ञान बोध भी. परीकथाएं मनुष्य की रागात्मक चेतना को समृद्ध करती हैं. अतः समाज को जितनी जरूरत विज्ञान साहित्य की है, परीकथाओं की भी उतनी ही हैं. लेकिन परीकथाओं के साहित्य होने की शर्त है कि वे मौलिक रहकर युगबोध से जुड़ी रहें. इसके बावजूद जो विद्वान परीकथाओं को विज्ञान गल्प से स्थानापन्न करना चाहते हैं, वे कदाचित वही हैं जो विकास और उपभोक्ता संस्कृति को एक-दूसरे का पर्याय मानते हैं. लेखन उनके लिए एक फैशन है. अतिरिक्त उत्साह में उन्होंने विज्ञान-लेखन को भी धर्म मान लिया है. प्रौद्योगिकी प्रदत्त सुविधाओं के जोश में वे भूल गए कि विज्ञान जितनी बड़ी ताकत है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी है. समाज में आर्थिक-सामाजिक समानता बनी रहे, विज्ञान के आधुनिकतम शोधों का लाभ पूरे समाज को मिले, यह पर्याप्त नैतिकताबोध के बगैर असंभव है. साहित्य अनुभूत सत्य तथा प्रयोगशाला में खरे उतरे सत्य को बराबर महत्त्व देता है. विज्ञान तथा उसके अनुप्रयोग को लेकर नैतिक दृष्टि साहित्य में होगी, तभी वह विज्ञान तथा उसके माध्यम से समाज में आएगी. कोरी वैज्ञानिक दृष्टि आइंस्टाइन के सापेक्षिकता के सिद्धांत से केवल परमाणु बम बनवा सकती है. विज्ञान के सदुपयोग के लिए मनुष्य का नैतिक संस्कार अनिवार्य है. इस कार्य को परीकथाएं शताब्दियों से करती आई हैं. दूसरे शब्दों विज्ञान और परीकथा दोनों के संकल्प मानवतावादी हैं, बशर्ते ये युगीन चुनौतियों का सामना करने के लिए, अपनी मौलिकता, उद्देश्यपरकता और मनोरंजन सामर्थ्य को को बनाए रहें.

© ओमप्रकाश कश्यप

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बालक और समाज

सामान्य

कोई भी समाज चाहे जितना उदार हो, वह हमेशा चाहता है कि भविष्य के नागरिक के रूप में बालक स्थापित मान्यताओं को समझे, उनका पालन करे. उसकी आचारसंहिता, रीतिरिवाजों को अपनाए तथा तयशुदा मर्यादाओं में रहकर व्यवहार करे. यह न तो अनुचित है न ही अस्वाभाविक. आखिर समाज किसी एक व्यक्ति या एक दिन की रचना तो नहीं! उसको बनने में सैकड़ों वर्ष लग जाते हैं. हजारों लोग उसकी विकासमान अवस्था को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार होते हैं. जबकि लाखोंकरोड़ों व्यक्ति उसकी आचारसंहिता जिसे प्रायः पंरपरा अथवा रीतिरिवाज कहा जाता है, से जुड़े हो सकते हैं. यह डर भी अन्यथा नहीं है कि समाज यदि अपने प्रत्येक नागरिक को तयशुदा नियमों, मर्यादाओं के पालन से छूट देने लगे तो उसका मूलभूत ढांचा ही चरमरा जाएगा. सभ्यता और संस्कृति के तब कोई मायने ही नहीं रहेंगे. बालक को यह छूट न दिए जाने के संबंध में एक तर्क यह भी हो सकता है कि उसे समाज के बारे में बहुतकुछ सीखनासमझना होता है. किसी परंपरा या रीतिरिवाज की अंतर्निहित विशेषताओं, उसकी खूबियोंखामियों को समझने के बाद ही उसकी आलोचनासमीक्षा करना न्यायसंगत माना जाता है. तदनुसार बालक से अपेक्षा होती है कि स्वयं को योग्य शिष्य दर्शाते हुए उससे जितना बन पड़े, गुरुसमाज से ग्रहण करे. समाज का दिया लौटाने को तो उम्र पड़ी है.

 

सुनने में यह बहुत तर्कसंगत और आदर्श प्रतीत होता है. समस्या यह है कि जिसे हम सीखना कहते हैं, वह स्थापित मान्यताओं, रीतिरिवाजों, विभिन्न ज्ञानशैलियों का बोध तथा उसके प्रति अनुकूलन है. औपचारिक शिक्षा का अधिकांश विद्यार्थी को समाज अथवा समाजों की सभ्यता, सांस्कृतिक विशेषताओं, उपलब्धियों से परचाने पर खर्च होता है, उसमें बालक के मौलिक विकास की बहुत कम संभावना होती है. प्रकट में हर समाज मौलिक ज्ञान को बढ़ावा देने की बात करता है. इसके निमित्त भारीभरकम तामझाम भी रचता है, मगर तब उसका आयोजन एकपक्षीय होता है. उसकी खास सुविधाएं अभिजनवर्ग से आगे बढ़ ही नहीं पातीं. निर्णायक पदों पर विराजित अभिजन समाज के बहुसंख्यक वर्ग को बहुत आसानी से छोटेछोटे गुटों में बांट देते हैं. इतने छोटे कि संख्याबल में कहीं अधिक होने के बाबजूद जनसाधारण स्वयं को शक्तिविहीन मान लेता है. यही विश्वास उसको समझौतावादी बनाए रखता है. निर्णायक पदों पर विराजमान अभिजन वर्ग समाज की कुल पूंजी एवं संसाधनों का उपयोग अपने वर्गीय हितों की पूर्ति हेतु करता है. बालक के संबंध में अभिजन मानसिकता, उसको भविष्य का अभिजन बनाने के प्रलोभन के बहाने, फिलहाल निर्णय प्रक्रिया से किनारे कर देने की होती है. पूंजी आधारित समाजों में जहां हर नई खोज पूंजीपति की तिजोरी को भरने के काम आती है, समाज, सभ्यता और संस्कृति के कमजोर पक्षों पर चर्चा या तो की नहीं जाती अथवा उसके मायने इस प्रकार बदल दिए जाते हैं कि अपनी सत्ता और पहुंच के अनुचित इस्तेमाल से अभिजन वर्ग द्वारा अर्जित वैभवसंपदा, मानसम्मान आदि उसका अधिकार मान लिए जाते हैं. अभिजन वर्ग की चालाकी से अनजान जनसमाज दुरवस्था को अपनी नियति मानने लगता है. यह आवश्यक नहीं कि जिस चालाकी को बड़े समझ न पाएं उसको बालक एकाएक समझ ले, लेकिन यदि अपनी प्रखर बुद्धिचेतना से सब कुछ देखता, महसूस करता हुआ कोई बालक उस अवस्था में यदि कोई प्रतिक्रिया दर्ज कराना चाहे तो उसे युवा होने; कम से कम उस उम्र तक इंतजार करना पड़ता है, जब उसके निर्णय को कानून के दायरे में परखा जा सके. तब तक वह परिवार तथा अन्यान्य जिम्मेदारियों में इतना गहरा फंस चुका होता है कि समझौते और समर्पण से अलावा कुछ सोच ही नहीं पाता.

 

ज्ञान की खोज एवं संवितरण के लिए स्वयं को समर्पित मानने वाले आकादमिक सदनों का ढांचा भी इससे अलग नहीं है. परीक्षा में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में छात्र यदि अपनी मर्जी से कुछ लिख आए तो उसे पास होने की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए. बालक को ज्ञानार्जन के लिए उत्सुक करने के बजाय वह उसके सोच एवं आचरण की दिशा निर्धारित करने पर जोर देता है. शिक्षा का काम हैबालक की चिंतनशक्ति को ऊर्जस्वित करना, न कि उसको विशिष्ट दायरों तक सीमित करना. इसके बावजूद बालक की रुचि के क्षेत्रों की पहचानकर अपनी उदारता का दम भरनेवाले समाज भी शिक्षा और संस्कार के माध्यम से तयशुदा व्यवस्था से अनुकूलन की सीख ही दे पाते हैं. बालक के आलोचनात्मक विवेक को उभारने की कोशिश की ही नहीं जाती. अपनी ओर से वह कुछ मौलिक करना चाहे तो डांटकर चुप करा दिया जाता है. हंसकर टाल देना समझदारी कही जाती है. यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि मनुष्य बाल्यावस्था से लेकर किशोरावस्था तक सर्वाधिक सचेतन, संवेदनशील, जिज्ञासु एवं मौलिक होता है. अपने आसपास के परिवेश को समझने की उसकी जिज्ञासा इस अवस्था में चरम पर होती है. उसका जितना उपयोग ज्ञानार्जन और ज्ञान की विभिन्न पद्धतियों को सिखाने, संवारने, बालमन की कमजोरियों को सामने लाने में किया जा सके, उतना ही लोकहित में है. अब इसे हम अतीत के प्रति अपना अतिरेकी सम्मोहन कहें अथवा नएपन को अपनाने का डर, जो परंपरा के माध्यम से प्राप्त सुविधाओं, उन सुविधाओं के छिन जाने के भय से जन्मते हैं, जो हमारी अपनी योग्यता, कौशल के बजाय विरासत में प्राप्त हुई हैं—हम बालक को स्थापित परंपराओं एवं संस्कृति के मानकों से जोड़े रखने में ही अपनी भलाई समझते हैं. मामूली विचलन पर हमारी धड़कनें बढ़ जाती हैं. यह भूल जाते हैं कि जीवन केवल सामाजिक, सांस्कृतिक मानकों द्वारा अनुशासित नहीं होता. वह समाज की भौतिक संपदा, उत्पादन तथा उपभोग से भी नियंत्रित होता है. बालक घर से बाहर जाता है तो परंपरा एवं संस्कृति उसके मनस् पर सवार होते हैं, जबकि भौतिक सुविधाएं तथा अन्य प्रलोभन आंखों के सामने. उनका आकर्षण इतना जबरदस्त होता है कि व्यक्ति अपने मनोभावों की उपेक्षा करके भी उनमें डूब जाना चाहता है. सामाजिकसांस्कृतिक संरक्षण और विकास के नाम पर दी गई शिक्षा वहां बहुत कारगर नहीं होती. स्वयं को सफलता की दौड़ में बनाए रखने के लिए बालक चीजों को पूरी तरह समझने के बजाय केवल उसका नाटक करने लगता है. आरंभिक सफलता बौद्धिकता के इस छदम् को उत्तरोत्तर विस्तार देती है. बाजार के प्रलोभन व्यक्ति और समूह दोनों पर लगभग एक जैसा प्रभाव डालते हैं. विभिन्न प्रकार के दबावों के बीच केवल सूचना समृद्ध होने को ज्ञानवान होना मान लिया जाता है. बालक के मौलिक सोच, समाज के संपर्क में आने पर जन्मी मौलिक उद्भावनाओं की अक्सर अनदेखी कर दी जाती है. इस तरह समाज के लगभग एकचौथाई सदस्य निर्णय प्रक्रिया से कट जाते हैं.

 

जिस प्रकार मातापिता संतान में अपना भविष्य देखते हैं, समाज भी नागरिकों में अपना भविष्य सुरक्षित रखने का सपना देखता है. लोकतांत्रिक समाजों में बालक को जन्म के साथ नागरिकता संबंधी अधिकार प्राप्त हो जाते हैं. इनमें अभिव्यक्ति का अधिकार भी सम्मिलित है. यहां एक अतिस्वाभाविक प्रश्न छोड़ा जा सकता है कि लोकतांत्रिक समाजों में जो अधिकार बड़ों को प्राप्त होते हैं, क्या उतने ही अधिकार बच्चों को भी प्राप्त होते हैं? इसका तात्कालिक उत्तर नकारात्मक होगा. खुलेपन का दावा करने वाले समाजों में भी बालक के कार्यकारी अधिकार बहुत सीमित होते हैं. उसकी वास्तविक अधिकारिता 18 वर्ष का होने तक प्रतीकात्मक ही रहती है. इसके पीछे तर्क प्रायः एक जैसे होते हैं. उस समय हम यह बिसार देते हैं कि हमने जानेअनजाने मौलिक ज्ञान की आमद के लिए सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण दरवाजे बंद कर दिए हैं. यह ठीक है कि बालक बौद्धिक विकास की आरंभिक अवस्था में होता है. वह दुनियादारी के मामलों में, विशेषकर उन मामलों में जिन्हें उसका समाज मान्यता देता है, उतनी जानकारी नहीं रखता जितनी सामान्यतः बड़े रखते हैं, परंतु यह भी सच है कि उम्र की आरंभिक अवस्था में वह सर्वाधिक मौलिक और नैतिक होता है. उचित यही है कि उसकी मौलिकता का लाभ उठाया जाए. अपने परिवेश के बारे में बालक जो सोचता, महसूस करना है, उसको अभिव्यक्त करने के लिए उत्साहित किया जाए. इसके रास्ते क्या हों, उनका निर्धारण समाज अपनी परिस्थितियों के अनुसार कर सकता है. यह संभव है कि उन अनेक मामलों में जिन्हें दुनियादारी कहा जाता है, बालक की जानकारी अत्यल्प हो, कुछ न हो तो भी यह प्रक्रिया बालक को अपने समाज और राष्ट्र के बारे में सोचने, उसको जोड़े रखने में मददगार सिद्ध होगी. उसके आत्मविश्वास और नागरिकबोध, जिसका इन दिनों बड़ों में भी अभाव है, आशानुकूल वृद्धि होगी. तदनंतर छिटपुट टिप्पणियों के रूप में भी उसकी ओर से ज्ञान की जो आमद होगी, वह अनूठी होगी. मगर बालक को तब तक उपेक्षित रखा जाता है, जब तक उसकी ज्ञानपिपासा दुनियादारी के रंग में रंगकर मंद नहीं पड़ जाती.

 

बालक का जीवन अनुशासित हो इसके लिए जिम्मेदार परिवार एवं समाज मानवव्यवहार को संस्कृति एवं परंपराओं के अनुरूप बनाए रखने पर जोर देते हैं. ताकि इन संस्थाओं का स्थापित ढांचा क्षतिहीन बना रहे. उसमें किसी प्रकार का विकार उत्पन्न न हो. लेकिन जिन मूल्यों को आधार बनाकर बालक से संस्कृति एवं परंपराओं से जुड़े रहने का आग्रह किया जाता है, उनका किताबी आकर्षण यथार्थ के आगे बगलें झांकता नजर आता है. स्कूल में जब बालक को पता चलता है कि उसकी शिक्षा के लिए मातापिता को मोटी रकम का भुगतान करना पड़ा है….जिन बच्चों के मातापिता भुगतान करने में असमर्थ थे, वे बच्चे पाठशाला नहीं आ पाए हैं, अथवा जब वह घर आए कथावाचक को कर्मकांड के बीचबीच में दान के लिए आग्रह करते, दक्षिणा के वजन से पूजा का स्वरूप तय होते देखता है. फिर जब वह देखता है कि उसका एक निबुर्द्धि पड़ोसी केवल अपनी शानदार कोठी, बड़ी गाड़ी के कारण समाज में प्रतिष्ठित है. पुनः जब वह पाता है कि कोरा ज्ञानार्जन उसकी शिक्षा का अभीष्ठ नहीं है. मातापिता उसको डाॅक्टर, इंजीनियर या बड़ा अधिकारी बनाना चाहते हैं, जिसके लिए पढ़ाई जरूरी है; यानी ज्ञान का उसका आयोजन ज्ञान के लिए न होकर दूसरों से स्पर्धा में आगे बने रहने के लिए है. और जब वह पाता है कि किताबों में पढ़ी नैतिकता भरी बातें व्यवहार में कोई मायने नहीं रखतीं, तब पुस्तकों से उसका जी उचटने लगता है. जिज्ञासावृत्ति कमजोर पड़ जाती है. परीक्षा में किसी भी तरह अधिक से अधिक अंक लाना उसका लक्ष्य बन जाता है. प्रकारांतर में स्कूल स्पर्धा का मैदान बन जाता है, पढ़ाई महज औपचारिकता. ज्ञान और ज्ञानार्जन के अतिरिक्त बालक ऐसे वैकल्पिक और आसान मार्गों की खोज में जुट जाता है, जो उसको स्पर्धा में बनाए रख सकें. चूंकि वह स्वयं को अपने ही जैसे युवाओं से घिरा हुआ पाता है, जो स्वयं स्पर्धा में आगे निकलने को आतुर हैं. स्पर्धा धीरेधीरे प्रतिद्विंद्वता में ढलने लगती है. सामाजिकसांस्कृतिक मूल्यों, परंपराओं के प्रति उसका विश्वास कमजोर पड़ने लगता है. व्यक्ति सहयोगपूर्ण परिवेश में पूरा जीवन बिता सकता है, स्पर्धा के बीच वह अधिक लंबा नहीं चल पाता. आधाअधूरा ज्ञान मन में आत्महीनता की स्थिति को जन्म देता है. धीरेधीरे वह परिवार, पड़ोसी और मित्रसंबंधियों के प्रति संदेह करने लगता है. उनसे निपटने के लिए विकल्पों की तलाश करता है. परिणामस्वरूप ज्ञान की मौलिक साधना से उसका विश्वास उठ जाता है. शिक्षा के मायने केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित रह जाते हैं. उस अवस्था में धनार्जन की ललक सामाजिकसांस्कृतिक उपादानों पर भारी पड़ने लगती है. बालक उसी को अपना लक्ष्य मान लेता है.

 

किशोरावस्था के दौरान बालक में स्पर्धा की भावना जन्म ले लेती है. उसकी शुरुआत परिवार से होती है. पुत्र परिवार में स्वयं को पिता का उत्तराधिकारी मानने लगता है. वह चाहता है कि बड़े उसके निर्णय का सम्मान करें. लेकिन यदि उसको लगे कि बड़ों की निगाह में उसके निर्णय का कोई मूल्य नहीं है. तब उसे ठेस पहुंचती है. उस समय उसके सामने केवल दो रास्ते होते हैं. या तो वह बड़ों के निर्णय का सम्मान करते हुए अपने सोच और इच्छाओं को सीमित रखे तथा वयस्क होने तक बड़ों के मामलों में राय देने में संयम बरते. दूसरा यह कि किसी की भी परवाह न कर वह मनमानी करे. वही करे, जिसे उचित मानता है. अधिकांश मामलों में पहली स्थिति से समझौता कर लिया जाता है. लेकिन यदि वह अपने लिए दूसरा रास्ता अपनाता है तब समाज में विक्षोभ पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है. सर्वकुशल जैसे हालात पहली स्थिति में भी नहीं होते. इसलिए कि सर्वाधिक सक्रिय और जागरूक मानसिक अवस्था में दूसरों के निर्णय पर अवलंबित बालक धीरेधीरे अपना निर्णय सामर्थ्य खोने लगता है. सामाजिकसांस्कृतिक एकता और समरस विकास के लिए हितकर तो यही है कि बालक समाज, संस्कृति एवं परंपरा के आधार पर बने संबंधों को प्राथमिक एवं उत्पादन, उपभोग, विपणन आदि के आधार पर निर्मित संबंधों को द्वितीयक माने. मगर मौलिक सोच, आत्मविश्वास की कमी के कारण ऐसा अक्सर नहीं हो पाता. इससे प्राथमिकताओं की अदलाबदली होने लगती है तथा व्यक्ति वैयक्तिता को बढ़ावा देने वाले प्रलोलनों का शिकार हो जाता है.

 

अकादमिक शिक्षा प्राचीन एवं आधुनिक सभ्यता के अंतर को केवल समाज की भौतिक प्रगति तक सीमित कर देती है. बालक को यह तो बताया जाता है कि मानवसभ्यता के दसबारह हजार वर्षों में मनुष्य की भौतिक उपलब्धियां क्या हैं, इस बीच विकास की कितनी लंबी यात्रा उसने तय की है. पर दो लाख वर्ष पहले से लेकर बारह हजार वर्ष पहले तक; यानी जब सभ्यता की नईनई शुरुआत हुई थी, उत्तरजीविता के लिए मनुष्य के आदि वंशजों को प्रकृति के साथ कितने संघर्ष करने पड़े होंगे? यह जानकारी उसको या तो दी नहीं जाती या उसे एकदो वाक्यों में समेट दिया जाता है. भविष्य को लेकर भी हमारे समस्त आकलन तकनीक और प्रौद्योगिकीय विकास पर केंद्रित होते हैं. तदनुसार हम पचाससौ वर्ष बाद जिन नए उपकरणों के आविष्कार की संभावना है, का अनुमान तो आसानी से लगा लेते हैं. लेकिन इतनी अवधि में समाज, संस्कृति और परंपराओं में क्या बदलाव हो सकते हैं, या होने चाहिए इसे लेकर गंभीर विमर्श न केवल बालक बल्कि बड़ों के स्तर पर भी नदारद होता है. हम यह माने रहते हैं कि संस्कृति जड़ अवधारणा है. उसका जो स्वरूप आज है वही आगे पचाससौ वर्ष बाद भी बना रहेगा. संस्कृति और परंपराओं के वे प्रतीक जो समाज की एकजुटता के लिए जिम्मेदार कहे जा सकते हैं, जिनके आधार पर समाज संगठित होता आया है, क्या वे आगे भी इसी तरह बने रहेंगे? यदि नहीं तो उनका वैकल्पिक रूप क्या हो सकता है, इसपर हम चुप्पी साधे रखते हैं.

 

जवाब में कहा जा सकता है कि ये शिक्षा के ऐसे क्षेत्र हैं, जहां मनुष्य आज भी बहुत कम जान पाया है. उसका जितना भी ज्ञान है, वह अनुमानाधारित है. उसको प्रमाणिक सिद्ध करने के लिए उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्य बहुत कम या अपर्याप्त हैं. यह सच भी है. तब शिक्षा का एक दायित्व यह भी है कि बालक को उन क्षेत्रों की जानकारी भी दी जाए जहां, मनुष्यता की ज्ञानोपलब्धियां अत्यल्प अथवा नगण्य हैं. सुकरात का अपने बारे में यह कहना, ‘मुझे अपने अज्ञान का ज्ञान है’ इस संबंध में प्रेरक हो सकता है. दूसरे शिक्षा का काम केवल यह नहीं होता कि वह अपनी खोजों, उपलब्धियों और प्रगति से बालक को परचाए, उसका यह कर्तव्य भी होना चाहिए कि वह ज्ञान के अंधकूपों की ओर इशारा करते हुए बालक को उसकी निष्पत्ति के लिए प्रवृत्त करे. उसकी प्रश्नाकुलता को विस्तार दे. बालक अपने और समाज के अज्ञान के बारे में भी जाने, यह व्यवस्था भी किसी न किसी रूप में होनी चाहिए. इसका अभाव संस्कृति और भौतिक प्रगति के बीच लंबी संवादहीनता के रूप में सामने आता है.

 

भौतिक सुखसुविधाओं के साथ असुरक्षा एवं अस्थायित्व की भावना गहरे तक जुड़ी होती है, इसलिए सुरक्षा और स्थायित्व की चाहत में व्यक्ति समाज और संस्कृति से जुड़ा रहना चाहता है. जो स्वयं परिवर्तन की परंपरा से कटे हुए होते हैं. ज्ञान की मौलिक साधना से कटे समाज आत्मविश्वास की कमी के शिकार होते हैं. वे पूंजीवादी हमलों को झेल पाने में असमर्थ होते हैं. इसलिए वे या तो उसके आकर्षण में बहने लगते हैं अथवा उसको अपने लिए हानिकारक मानकर उससे किनारा कर लेते हैं. कई बार ऊहापोह और असमंजस की स्थिति बन जाती है. ऐसे हालात में समाज में यदि बदलाव आता भी है तो मात्र नवीन प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग को लेकर. वे इसी से संतुष्ट होकर बाजार के हाथों का खिलौना बने रहते हैं.

 

इस समस्या का समाधान क्या हो? संस्कृति की गतिशीलता को बनाकर कैसे रखा जाए? बालक की कोमलता, निश्छलता, नैतिकता और सहृदयता का लोकहित में लाभ कैसे उठाया जाए? क्या कोई ऐसा रास्ता भी संभव है जिसपर चलकर संस्कृति और सभ्यता की गतिशीलता के अंतर को पाटा जा सकता है? ऐसा कैसे संभव हो कि संस्कृति सभ्यता की अनुगामी न होकर सहगामी बन जाए! परिवर्तनप्रवाह अकल्पित और आकस्मिक न होकर आकल्पित हो! इसके लिए आवश्यक है कि बालक अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त रहे. उसके मन में डर और अकेलेपन जैसे मनोभाव पनपने न पाएं. शिक्षा व्यक्तित्व निर्माण और बौद्धिक उठान दोनों को एकसमान, एक साथ महत्त्व दे. ज्ञानार्जन आस्थावादी दुराग्रहों से पूरी तरह मुक्त हो. बालक की परवरिश विश्व नागरिक की तरह हो. ‘ज्ञान सत्य है और सत्य आत्मा की आवश्यकता’— आइंस्टाइन के ये शब्द उसके मनमस्तिष्क में उतर जाने चाहिए. लेकिन ज्ञानवान होने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति विशिष्टताबोध का शिकार होकर रह जाए. खुद को बाकी लोगों से ऊपर समझने लगे और केवल अपनी सुखसुविधाओं को जीवन की सिद्धि मान बैठे. उसको जानना चाहिए कि अकेले व्यक्ति का न तो कोई वर्तमान है, न भविष्य. अहंकार हो या प्रेम, सौहार्द हो अथवा ईर्ष्या, मनुष्य को अपने मनोभावों के प्रदर्शन के लिए दूसरों की जरूरत पड़ती ही है.

 

मनुष्य ने अभी तक जो अर्जित किया है, वह उन महापुरुषों की देन है जो लोकहित को व्यक्तिसुख से बड़ा मानते थे. मानवजीवन की सुखमय बनाने के लिए जिन्होंने अपने सुख, सम्मान की कभी परवाह न की, बल्कि अक्सर उसकी उपेक्षा ही करते रहे. अतः जरूरी है कि ज्ञान का आयोजन, प्रदर्शन सर्वकल्याण के लिए हो. बगैर समानताबोध के यह संभव नहीं. इसलिए बालक को समझाया जाना चाहिए कि, ‘सब आंखें मनुष्य के विचारों तक पहुंचने के द्वार हैं….न तो मनुष्य जाति का अधिकांश भाग अपनी पीठ पर काठियां कसबा कर उत्पन्न हुआ है; और न कुछ थोड़े से विशेषाधिकार प्राप्त लोग ईश्वर की दया से बूट पहने और एड़ लगाए ही उत्पन्न हुए हैं कि वे उन लोगों पर तुरंत सवारी गांठ सकें.’ (थामस जैफर्सन). सत्ता का चरित्र सदैव अल्पसंख्यकवादी होता है. उसपर विराजमान लोग सदैव इस प्रयत्न में रहते हैं कि शिखर पर कम से कम लोगों की भागीदारी रहे. सत्ता के चरित्र को बालक उससे अनुकूलन करके नहीं सीख सकता. यह तभी संभव है, जब उसमें पर्याप्त आलोचनाविवेक हो.

 

बालक के संपूर्ण विकास के लिए आवश्यक है कि समाज उसके मौलिक विकास को बढ़ावा दे. उसमें समाज को समझने और बरतने की योग्यता स्वतः विकसित होने दे. ताकि वह अवसर पड़ने पर वह उनपर उठने सवालों पर तार्किक प्रतिक्रिया दे सके. उसे उसकी सीमाओं और क्षमताओं से साथसाथ परिचित कराए. उनका अधिकतम इस्तेमाल करने की प्रेरणा दे. बालक समाज एवं संस्कृति की उपयोगिता पर उठनेवाले प्रश्नों का उत्तर देने में स्वयं को असमर्थ पाता है या उस समय अपने भीतर ग्लानि, आत्मविश्वास की कमी या कुंठा का अनुभव करता है, तो वह द्वितीयक संबंधों को ही प्राथमिक समझने लगेगा. जैसा कि इन दिनों हो रहा है. इसलिए उसे समझाए कि उसकी तरह समाज भी विकासमान अवस्था में है. सभ्यता, संस्कृति या परंपराओं का कोई भी विधान ऐसा नहीं जिसकी समीक्षा न हो सके. सोच को पूर्वाग्रहमुक्त रखने के लिए उसको समझाया जाए कि धर्म एक कुटिल राजनीति है, जिसमें सत्ता का हासिल करने का सपना अगले जन्म तक टाल दिया जाता है. यह भी कि नैतिकता धर्म की चेरी नहीं है. वह मानवता का लक्ष्य है. धर्म तो उसका लक्षण मात्र है.

 

उपयुक्त अवसर पर बालक को यह भी बताएं कि धरती पर कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जो मनुष्य के लिए निषिद्ध हो. मगर उसका यह अधिकार दूसरों के अधिकार की सुरक्षा में ही संभव है. हम यदि कोई वृक्ष लगाते हैं, तभी हमें फल खाने का अधिकार है. दूसरों के श्रम पर जीना, किसी भी तरह परावलंबी होना मानवी गरिमा के प्रतिकूल है. बालक जब खुद को समझ लेगा तो समाज को भी समझ लेगा. तब उसकी प्रतिक्रिया सकारात्मक होगी. तभी वह अपने विवेक का अधिकतम उपयोग कर सकेगा. समाज आज जिस प्रकार भय, कुंठा, नैराश्य, हताशा, नकारात्मक सोच तथा सांस्कृतिक अपसंस्करण से त्रस्त है, उसके निदान का रास्ता भी स्वतः खुलता जाएगा. लेकिन बालक की शिक्षा अकेले उसका विषय नहीं है. वह हम बड़ों से भी जुड़ा है. इसलिए जो हम बालक से चाहते हैं, जिस रूप में उसको ढालना चाहते हैं, भविष्य में जिस तरह के समाज की कल्पना करते हैं, उसके लिए क्या हम स्वयं तैयार हैं? यही वह पहेली है, जिसमें बालक और समाज दोनों का भविष्य छिपा है. जिसके रहस्य को बूझना आज के समाजविज्ञानियों और शिक्षाशास्त्रियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

 © ओमप्रकाश कश्यप

 

बालक का मन

सामान्य

प्यार के नाम के बहाने

घरपरिवार के बीच बच्चों को हम अक्सर उनके असली नाम से नहीं पुकारते. अपने संबोधन को प्यार का विशेषण देते हैं. फिर टीलू, गीलू, मोनी, टोनी, अंजा, बंजा, बेली, जेली जो शब्द हमें पसंद हो, उसे बच्चों पर लाद देते हैं. असली नाम के लिए लोग पंडित के पास जाते हैं. परिजनों, मित्रों तथा रिश्तेदारों की सलाह लेते हैं. सुप्रसिद्ध हस्तियों के नाम जहन में लाते हैं. पुस्तकों, दूरदर्शन धारावाहिकों, फिल्मों के नायकनायिकाओं को याद करते हैं. अपने लाडले या लाडली के अदद नाम के लिए हम हरचंद कोशिश करते हैं. नाम ऐसा जो एकदम नया हो, अनूठा इतना कि किसी ने सुना तक न हो. जिसका अर्थ बूझने में भी मश्क्कत करनी पड़े. आजकल तो सजेसंवरे नामकोश भी आने लगे हैं, ऊपर से इंटरनेट है. बालक का असली नाम तय करने के लिए जितना परिश्रम और खोजबीन की जाती है, उसका शतांश भी घरेलू नाम के लिए नहीं किया जाता. रोजमर्रा के संबोधन के चयन हेतु हमारी नीतिरीति पूर्णतः भिन्न होती है. उस समय हम केवल अपने मुखसुख का ध्यान रखते हैं. ऐसा नाम जिसे बोलने में जराभी कष्ट न उठाना पड़े. परिजनों, रिश्तेदारों द्वारा रखे गए नामों की संख्या कभीकभी एकाधिक भी हो जाती है. उस अवस्था में बालक को न केवल सभी नामों को अपने अवचेतन में सुरक्षित रखना पड़ता है, बल्कि नाम विशेष द्वारा संबोधित करनेवाले व्यक्ति को भी स्मरण रखना पड़ता है.

मातापिता बच्चे का असली नाम ऐसा रखते हैं जो दूसरों से हटकर जान पड़े, अनूठा, अनसुना और विरल हो. जो उनके अलावा दूसरों को भी पसंद आए. सुनते समय बालक अच्छा और सम्मानित महसूस करे. मगर घरेलू नाम चुनते समय वे केवल और केवल सहजता पर जोर देते हैं. सहजता भी ऐसी जो केवल उन्हें सुख प्रदान करती हो. घरेलू नाम असली का लघु संस्करण भी हो सकता है. जीवन के आसान रास्तों की खोजने वाली मानववृत्ति की सहज, स्वाभाविक खोज. सामान्यतः यह मान लिया जाता है कि बालक को उसके पूरे नाम से हर समय पुकारा जाना न तो संभव है, न ही जरूरी. इसी सोच के साथ असली नाम को दबानिचोड़कर गुठलीसम कर दिया जाता है. इस कोशिश में आलोक ‘अलू’ बन सकता है, मानसी‘मुन्नु’. एक जमाना था जब लोग कसरत करते थे. बड़ीबड़ी मूंछें बढ़ाते थे. तब लोगों के व्यक्तित्व की भांति नाम भी भारीभरकम रखे जाते थे. दरयाब सिंह दलपत, सूबेदार सिंह सिंघानियां वगैरह….अब नई तकनीक का जमाना, नया चलन है. भारीभरकम पिक्चर ट्यूब वाले टेलीविजन और भाप के इंजन की तरह भारीभरकम नाम भी जिंदगी और बाजार दोनों से गायब हो चुके हैं. पढ़ेलिखे लोगों की जुबान पर लंबे नाम चढ़ ही नहीं पाते. मातापिता हल्काफुल्का, नाजुकसा नाम रखते हैं. पर जो रखते हैं, उसे भी पूरी तरह पुकारना उन्हें कठिन लगता है. प्यार का नाम कहकर बच्चे पर मनमाना संबोधन थोप देते हैं. ऐसे संबोधन को बालक कितने प्यार से लेता है? उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है? बालक के व्यक्तित्व पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है? ये बातें कभी उनके दिमाग में नहीं आतीं. न कभी हम यह सोचते हैं कि अगर वही संबोधन उनके मातापिता द्वारा उन्हें दिया गया होता तो कैसा लगता? या जो उपनाम उन्हें दिए गए थे, उन्हें सुनकर वे कैसा महसूस करते थे?

नाम का सरलीकरण अथवा संक्षिप्तीकरण केवल परिवार द्वारा नहीं होता. बड़े परिवार के रूप में समाज भी यही काम करता है. दोनों में अंतर है तो इतना कि मातापिता जहां मुखसुख के लिए अतिरिक्त नाम जोड़ देते हैं, वहीं समाज असली नाम को कसरगड़कर अनुकूलित कर लेता है. वहां व्यक्ति की आर्थिकसामाजिक हैसियत बहुत मायने रखती है. आदमी रसूखवाला हो तो नाम में कांटछांट करने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ती. उल्टे नाम को खींचखांचकर लंबा कर दिया जाता है. लोगों के दिलों में सम्मान भले हो या न हो, पर नाम के साथ मानसम्मान साफ नजर आना चाहिए, यह कोशिश निरंतर बनी रहती है. जनसाधारण के साथ ऐसा नहीं होता. समाज अक्सर उससे सौतेला व्यवहार करता है. लोगों की जुबान पर घिसकरघिसकर फतेहचंद ‘फत्तु’ रह जाता है, ‘किरोड़ीमल’ ‘कुर्री’. इस तरह उनके व्यक्तित्व का अवमूल्यन उसके नामोच्चारण के साथ ही होने लगता है. अभिजन वर्ग की इस चालाकी को सामान्यजन भलीभांति समझते हैं. मगर विभिन्न प्रकार के दबावों के बीच वे कुछ कर नहीं पाते. ये विशेषताएं किसी न किसी रूप में प्रत्येक समाज में पाई जाती हैं.

इसके पर्याप्त उदाहरण हैं कि मातापिता, संबंधियों द्वारा प्यार से दिया गया नाम बच्चे को उतना प्यारा नहीं होता, जितना उन्हें स्वयं को प्यारा होता है अथवा जैसा वे सोचते हैं. नाम के सरलीकरण को लेकर बालक अक्सर भावनात्मक दोहन का शिकार होता है. बल्कि कई बार तो खासा क्षुब्ध भी. घरेलू नाम चूंकि बड़ों के स्नेहप्रदर्शन का बहाना होता है, और ऐसा प्रायः सभी के साथ होता है, इसलिए व्यवहार में ऐसे सरलीकरण को स्वीकार करने के अतिरिक्त बालक के पास दूसरा कोई रास्ता नहीं होता. पर यह समझौता मन से किया गया समझौता नहीं होता. बेमन का समझौता कालांतर में आदत बन जाता है. आदत सहते जाने की, अप्रिय का प्रतिकार न करने और समझौतापरस्ती की. बचपन चूंकि अत्यधिक संवेदनशील अवस्था है, इसलिए नाम चुनने में हुई लापरवाही बालक को कुंठा, तनाव तथा आत्मविश्वास की कमी की ओर ले जाती है. साहित्य अकादमी में उपसंपादक देवेंद्र कुमार देवेश बताते हैं कि उनका पांच वर्षीय बेटा उस समय बुरी तरह नाराज हो जाता है जब पड़ोस की लड़की उसे उसके असली नाम से न बुलाकर ‘जॉज’ कहती है. उस लड़की को यह नाम भला लगता है. उस बच्चे को वह अतिशय प्यार करती है. बावजूद इसके बालक पर इस संबोधन का एकदम उल्टा असर होता है. वह स्वयं को अपमानित महसूस करता है. यह इकलौता उदाहरण नहीं है. खोजने पर हजारों मिल जाएंगे. एक आपबीता किस्सा भी है. चूंकि यह आलेख उसी घटना की परिणति है, इसलिए सनद के रूप में वह ज्यों की त्यों प्रस्तुत है.

ईशान हमारे परिवार में तीसरी पीढ़ी का सदस्य है. उसने इसी चार सितंबर को दो वर्ष तीन महीने पूरे किए हैं. यह घटना करीब दो महीने पहले की है. तब वह दो वर्ष एकसवा महीने का रहा होगा. शरारत में वह दूसरे बच्चों जैसा ही है. घर में हम उसको ईशू कहते हैं. खानेपीने का ज्यादा शौकीन उसे नहीं है. बस साथ खेलने वाला चाहिए. पेट खाली हो तो भी उसका खेल चलता रहता है. ईशू को उस समय बहुत सुख मिलता है जब हम किसी वस्तु से उसका नाम जोड़ देते है. जैसे घर ईशू का है, गाड़ी ईशू की है, मोटर साइकिल ईशू की है वगैरह. ऐसे क्षणों में उसके चेहरे की दीप्ति देखते ही बनती है. उसके अधिकारक्षेत्र में कोई नया नाम जुड़े तो उसकी हंसी दूरदराज की हवा को भी उमंगित कर जाती है.

उस दिन मजाक में ही ईशान को ‘छुटकू’ कहा तो उसकी आश्चर्यजनक प्रतिक्रिया थी

छुटकू नईं दादू….’ वह मचल उठा.

छुटकू तो बहुत अच्छा नाम है….तुम छोटे हो नाम भी छुटकू रख लेते हैं….?’ मैंने छेड़ा था.

नईं….दादू, छुटकू नईं….’ मुझे लगा कि शायद कुछ गलत समझ रहा है. भला दो वर्ष का बालक कैसे समझेगा कि उसका कौनसा नाम अच्छा है. कौनसा बुरा! इसलिए मैंने उसी से पूछा—

क्या तुम्हें ‘ईशू’ कहा जाए….?’ इस संबोधन को वह अच्छी तरह पहचानता है. पर उस दिन मानो उसका अस्मिताबोध प्रबल था, सो तुरंत नट गया—

नईं….ईशान!’

ईशू!’

ईशान…..!’ उसने जोर देकर कहा.

उसके कुछ देर बाद उसको ईशू कहकर संबोधित किया गया तो उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. शायद वह समझता था कि हमें यही पसंद है. यह सोचकर कि उस दिन जो हुआ कहीं महज संयोग ही न हो. बालक हमारे शब्दों का अर्थ ही नहीं समझ पाया हो, सो तीसरेचैथे दिन मैंने उसे फिर टोक दिया—

अरेरे! मेरा छूटकू….’ मैंने प्यार से आमंत्रित किया. वह खुशीखुशी आगे बढ़ा. लेकिन दिमागी सजगता पहले जैसी ही थी. जैसे हमारी एकएक चाल पर नजर हो—

छूटकू नईं, दादू.’ वह पास आतेआते मचला.

हमें तो यही अच्छा लगता है….’

नईं दादू!’

फिर क्या कहें?’

ईशान….’

यह आगे भी आजमाया गया. उसका हर बार एक ही उत्तर था—‘छुटकू नईं, दादू!’

इस घटना से पता चलता है कि बालक आत्मसम्मान का भूखा होता है. फ्रायड, जीन पिगेट, फिलिप ऐरिस, पीटर हंट आदि विद्वानों ने बालअस्मिता की विस्तार से चर्चा की है. बीसवीं शताब्दी के महान बालमनोवैज्ञानिक जीन पीगेट के अनुसार बालक का विकास अहंकारोन्मुखता(Egocentrism) से समाजोन्मुखता (Sociocentrism) की ओर बढ़ता जाता है. चूंकि बालक नैतिकता के पहले पायदान पर होता है, इसलिए उसके व्यवहार में कोई दुराव भी नहीं होता. बालक के जो मन में होता है, वही व्यवहार में. कारण साफ है कि अपने अस्तित्व के प्रति वह अतिरिक्तरूप से सजग होता है. इसको जानना है तो कुछ देर बालक की गतिविधियों का अवलोकन कीजिए. उसका अहंबोध स्पष्ट नजर आने लगेगा. जैसे—शिशु का पसंदीदा खिलौने के लिए आग्रह करना, न मिलने पर मचलना, जिद करना. छीनाझपटी करना. जो प्यारभरा व्यवहार करे उसे ज्यादा महत्त्व देना. डराए, धमकाए तो पास पहुंचने पर मुंह फेर लेना. इन गतिविधियों में बालक का अहंभाव साफ झलकता है. वह चाहता है कि बड़े केवल अपनी न चलाएं. उसकी भी सुनें. उसकी उपस्थिति को भी उतना ही महत्त्व दें. बालक को अपनी बात मनवानी हो, मातापिता पर दबाव बनाना हो तो वह रोने लगता है. रोना केवल कमजोरी या अभाव की स्थिति नहीं है. फिर क्या कारण है कि कोई व्यक्ति लोकभाषा के स्थान पर प्राकृतिक संकेतों का प्रयोग करता है. रोेने के बजाय सीधे वह नहीं कह देता जो उसका उद्दिष्ट है. इसका एकमात्र कारण लोकभाषा का अपर्याप्त ज्ञान नहीं है, क्योंकि बड़ा होने पर जब वह भाषायी उपकरणों को जानने लगता है, उस समय भी रोनारूठना जैसे मनोभाव दबाव के तौर पर प्रयुक्त किए जाते हैं. इसका प्रमुख कारण है, अभिव्यक्ति सामथ्र्य और आत्मविश्वास की कमी. बालक को लगातार दबाने, शब्दों का सही संस्कार न देने से वह भाषायी उपकरणों से अनभिज्ञ बना रहता है. परिणामस्वरूप उसका अभिव्यक्तिसामथ्र्य अविकसित रह जाता है और वह कुंठित रहने लगता है. तब अजनबियों को लेकर डर, संकोच और हीनताबोध जैसे नकारात्मक भाव उसके दिमाग में जगह बना लेते हैं. अगर बालक का विकास मुक्त परिवेश में हो, उसे अपना पक्ष विश्वास के साथ प्रस्तुत करने का प्रशिक्षण दिया जाए, तब वह अपने मनोभावों को बिना किसी झिझक के और स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करेगा. रोनेरूठनेजिद के नैसर्गिक भाषा संकेतों की जरूरत ही नहीं पड़ती.

जीन पिगेट का मानना था कि दुनिया के बारे में बालक के निष्कर्ष उसके अपने अवलोकन पर आधारित होते हैं. उसका सोच हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक वैज्ञानिक और तार्किक होता है. उसका अपना नैतिक संसार होता है, न्यायअन्याय, उचितअनुचित का निर्णय उसका अपना होता है. बालक का नैतिक संसार जरूरी नहीं वही हो जिसके बारे में उसके मातापिता या गुरुजनों ने बताया है. वह उससे एकदम अलग, यहां तक कि उल्टा भी हो सकता है. इसी कारण कभीकभी वह अपने तर्कों से आपको निरुत्तर भी कर सकता है. यही उसके अहंबोध का कारण है. इसलिए शरीर से भले ही दूसरों पर आश्रित नजर आए, दिमाग में बड़ीबड़ी बातें भी न आती हों, जुबान अक्सर तुतला जाती हो, लेकिन अपने विवेकबोध में वह पूरी तरह स्वतंत्र और अस्मिता की सुरक्षा के लिए सदैव सजग होता है. हालात से समझौता करना यदि मजबूरी न हो तो मानसम्मान के मामले में वह खुद को बड़ों से कम नहीं आंकता. जन्म के तुरंत बाद वह अपनी स्वतंत्रता की अनुभूति करने लगता है. इस बोध को न तो सामाजिक संस्कार पूरी तरह मिटा पाते हैं, न ही धार्मिकनैतिककानूनी मर्यादाएं. हालांकि शारीरिक अःशक्तता उसे दूसरों पर निर्भर बनाती तथा उनसे तालमेल बनाए रखने को विवश करती है. परिवार के बीच रहकर वह मान लेता है कि सामंजस्यीकरण समाजीकरण की अनिवार्य स्थिति है. इसलिए वह परिवार और शेष समाज दोनों से तालमेल बनाए रखने की कोशिश करता है. कालांतर में सामाजिक अनुकूलन की प्रक्रिया के बीच बालक जैसेजैसे समाज से सामंजस्य स्थापित करता है, उसका अस्मिताबोध नएनए जन्मे सामाजिकबोध के नीचे दबने लगता है.

स्वातंत्र्यबोध और अस्मिताबोध परस्पर पूरक हैं. स्वातंत्र्यबोध राष्ट्रसमाज में अधिकारों और अवसरों की समानता को दर्शाता है, जबकि अस्मिताबोध समाज में अपनी हैसियत के प्रति विनम्र विश्वास से है. अवसर मिलने पर पर स्वतंत्रताबोध ही अस्मिताबोध के रूप में विकसित होता है. इसी अस्मिताबोध के चलते बालक अपनी पसंदों पर जोर देता है और जो नापसंद हो उसका विरोध करता है. बशर्ते उसको इसका अवसर दिया जाए. उसका विकास खुले वातावरण में हो. लेकिन मातापिता को जल्दी होती है, बालक को अपने समाज के, परिवेश के रंगढंग में ढाल देने की. इसलिए बालक की मर्जी क्या है, किसी मुद्दे को लेकर वह स्वयं क्या सोचता है, यह जानने और इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देने का प्रयास नहीं किया जाता. इसलिए जब भी कोई प्रतिकूल अवसर होता है या उसको विषम परिस्थिति से गुजरना पड़ता है, तब स्वतंत्र निर्णय लेने का अभ्यस्त न होने के कारण वह प्रायः चुप्पी भी साध सकता है. यदि उसको अभिव्यक्ति का पूरा अवसर दिया जाए तो वह एक परिपक्व व्यक्ति की तरह व्यवहार करेगा. यदि कोई बात उसे नापसंद है तो एक स्वतंत्र और विवेकवान नागरिक की भांति उसका यथासंभव प्रतिवाद भी करेगा. डर, संकोच अथवा अभ्यास की कमी से यदि वह अपने मन की बात को साफसाफ नहीं कह पाता, सच कहने में किसी कारण चूक जाता है, और मातापिता उसके निर्णयसामथ्र्य को बढ़ावा देने पर यदि जोर नहीं देते हैं तो उसके मानसिक विकास के अवरुद्ध होने की पूरी संभावना होती है. तब यह मान लेना चाहिए कि बालक को उसके स्वतंत्र विकास के लिए जिन अवसरों की आवश्यकता थी, वे उसको नहीं मिल पाए हैं. उस अवस्था में बालक कुंठा का शिकार भी हो सकता है. इसलिए चाहे शिक्षक हो या बालसाहित्यकार, जो भी बालक के संपूर्ण चारित्रिक विकास की कल्पना करता है, उसके लिए आवश्यक है कि बालक के अस्मिताबोध को कमजोर न पड़ने दे. परंतु क्या ऐसा हो पाता है? असल में बालक के अस्मिताबोध को न समझ पाने के कारण बड़े साहित्यकार भी बालक को निरा बालक समझने की भूल करते रहे हैं. प्यार के नाम पर उपनामकरण और उसके लिए केवल अपनी पसंद को बालक पर थोप देना इसी का हिस्सा है.

बालसाहित्यकार भी इस प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हैं. यथार्थबोध के नाम पर वे भी रचना में उपनामों से काम चलाने की कोशिश करते हैं. वे पात्रों के नाम ही ऐसे रखते हैं जो उपनाम सरीखे हों. हिंदी के एक वरिष्ठ बालसाहित्यकार हैं. विदेशों में घूम आए हैं. उनकी कुछ बालकविताएं तो सचमुच गजब हैं. उनकी हाल की बालकहानियों में पात्र ‘लूलू’ से मिला जा सकता है. ‘लुलु’ अतिसामान्य लड़का होता है. कबाड़ी या ऐसा ही कुछ और. रेंगती हुई जिंदगी का प्रतिनिधि. गांव में ‘लुलु’ जमीन पर रेंगने वाले की ड़े को कहते हैं. कहानी में यह शब्द जुगुप्सा पैदा करता है. यह ठीक है कि बालपाठक कथानायक के नाम से उसकी हैसियत का अंदाज लगा लेता है. इससे उसके दिमाग में यह बात और गाढ़ी हो जाती है कि नाम और व्यक्तित्व का गहरा भेद होता है. इसलिए उपनाम के जरिये यदि कोई ऐसावैसा, निस्सार शब्द उसपर थोपा जाए तो वह उसपर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालता है. साहित्यिक रचना विशेषकर बालसाहित्य में कथापात्रों के नाम का अत्यधिक महत्त्व होता है. लेकिन बालक जो समाज की वर्ग संरचना से करीबकरीब अनजान होता है, उसे होना भी चाहिए, उसके लिए नामकरण ऐसा होना चाहिए जो सामाजिक स्तरीकरण से मुक्त नजर आए. कहा जा सकता है कि कहानी में कहानीपन और कहने का अंदाज देखना चाहिए. परंतु मेरा मानना है कि नामकरण की भी अपनी दृष्टि होती है. तभी तो मनुस्मृति में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के नामकरण का अलगअलग विधान दिया गया है. हम कभी नहीं सोचते कि हमारे द्वारा प्यार के नाम पर रखे गए ऊलजुलूल नाम सुनकर बालक पर क्या गुजरती होगी.

इसका यह अभिप्राय नहीं है कि मातापिता और अभिभावक गण बालक को पसंदीदा संबोधन देना ही छोड़ दें. जीवन केवल बुद्धि द्वारा ही नियंत्रित नहीं होता, उसे दिशा देने के लिए संवेदनतत्त्व भी अनिवार्य है. अतः ऐसा प्रत्येक कार्य या संबोधन तो मातापिता, परिजनों और बालक के संबंधों को आत्मीय और करीबी बनाए, वह जायज है. उसका सम्मान किया जाना चाहिए. लेकिन वह संबोधन ऐसा होना चाहिए जो घरपरिवार और समाज के बीच बालक के मानसम्मान की रक्षा करे, जिससे उसका व्यक्तित्व निखरकर सामने आए. गरिमाहीन, अर्थहीन और बालक के अहंबोध को चोट पहुंचाने वाले संबोधनों से जितना हो सके दूर ही रहना चाहिए. यह ध्यान रखना चाहिए कि आने वाला समय अधिक चुनौतीपूर्ण होने वाला है. उसका सामना विखंडित मानस द्वारा संभव नहीं है. अतएव मातापिता और समाज का कर्तव्य है कि वे बालक के व्यक्तित्व निर्माण और उसके बहुमुखी विकास के लिए यथासंभव प्रयास करें. मातापिता का काम बालक पर अपनी पसंदे और सपने सौंपना नहीं है. बल्कि उनका कर्तव्य बालक को भविष्य के नागरिक के रूप में तैयार करना है.

बड़ों द्वारा कथित प्यार के नाम दिया गया नाम बच्चे को कैसा लगता है, इस पर शोध होना चाहिए. एक शोध इस विषय पर भी होना चाहिए कि बचपन में जिन लोगों को उनके प्यार का नाम जराभी पसंद नहीं था, उनके व्यक्तित्व में संकोच, अविश्वास और हीनताबोध पैदा करने में इन कथित प्यार के नामों की भूमिका क्या और कितनी है? अपने बचपन के नाम को बेपर्दा करना मुझे आज भी अच्छा नहीं लगेगा. उस समय भी हिम्मत नहीं होती थी कि कह पाऊं कि श्रीमन् इस प्यार के नाम को आप अपने पास रखिए, मुझे मेरे असली नाम से पुकारिए. मेरे जैसे और भी दूसरे बालकबड़े होंगे जो अपनी पसंदनापसंद का इजहार करने में चूक जाते हैं. मुझे उस तथाकथित प्यार के नाम ने जो संकोच, अविश्वास और हीनताबोध बख्शा था, वह आज भी कम नहीं हुआ है. अंत में एक भरोसा, एक उम्मीद कि प्यार के नाम पर बालक के साथ मनमानी का खेल आगे और नहीं चलने वाला. नए सोच के चलते बचपन को समझने के लिए जिस तरह से जोर दिया जा रहा है, उससे उम्मीद है कि मातापिता इस हकीकत को समझेंगे और उपनामकरण के बहाने बालक पर कुछ भी ऊलजुलूल थोपने से बचेंगे. लेखकगण पात्रों के नामकरण के समय ध्यान देंगे. अपनी तीसरी पीढ़ी के युवतम सदस्य ईशान को देखकर मैं दावे के साथ यह भी कह सकता हूं. आने वाली पीढ़ी में इतना आत्मविश्वास है कि जो उसे नापसंद है उसका तत्काल विरोध कर सके.

© ओमप्रकाश कश्यप

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बालशिक्षा एवं लोकतंत्रीय संस्कार

सामान्य

लोकतंत्र की सफलता का मूलाधार है कि लोग उसको जानें. उसे अपने आचरण का हिस्सा बनाएं. इसके लिए जरूरी है कि उन्हें उसके बारे में संपूर्ण जानकारी हो. नहीं है तो बताया जाए. बताने का काम सरकार का है. उन लोगों का है जो खुद को किसी न किसी रूप में देश और समाज के प्रति जिम्मेदार मानते हैं. शिक्षा का अनिवार्य कर्म होना चाहिए कि वह बच्चों के लोकतांत्रिक प्रबोधीकरण पर ध्यान दे. उन्हें स्कूल के दिनों में ही सिखाया जाना चाहिए कि लोकतंत्र ऊपर से थोपी गई व्यवस्था नहीं है. बल्कि यह तो व्यवस्था के नाम पर शासक थोपे जाने, सत्ताशिखर पर बैठकर मनमानी करने का विरोध है. यह व्यक्तिमात्र के विवेक का सार्वजनिकरण कर, उसे सामूहिक विवेक में ढालने की प्रणाली है. यही वह विधान है जिसको प्रबुद्ध नागरिक अपने कल्याण के लिए स्वेच्छाभाव से अपनाते हैं. जब उन्हें लगे कि सत्ताशिखर पर विराजमान लोग अपने रास्ते से भटके हुए हैं, सही काम नहीं कर पा रहे हैंतब बड़े बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से उन्हें अंगूठा भी दिखा देते हैं. लोगों की मर्जी से, उनके अनुशासन में जो सरकार बनती है, उसके लिए लोकेच्छा की अवहेलना करना संभव नहीं होता. इस तरह लोकतंत्र सरकार का सरकारीपन निचोड़कर उसे लोकानुशासन से बांध देने की व्यवस्था है. बच्चों को जान लाॅक के उन शब्दों के बारे में भी बताया जाना चाहिए जिनमें उसने कहा है

मनुष्य की नैसर्गिक स्वाधीनता के मायने हैं कि वह इस सृष्टि की किसी भी बलशाली शक्ति के नियंत्रण से बाहर है. वह किसी व्यक्ति के वैधानिक अथवा स्वयंघोषित अधिकार से भी सर्वथा मुक्त है. इनके बजाय मानवमात्र को केवल प्राकृतिक नियमों से अनुशासित होना चाहिए. समाज में मानवीय स्वाधीनता केवल और केवल ऐसी शक्ति से मर्यादित होनी चाहिए, जिसका गठन उसके सदस्यों ने परस्पर मिलबैठकर, आमसहमति और स्वेच्छा के आधार पर किया है.’

सामान्यवुद्धि धर्म को समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना का मूलाधार मानती है. यह जानते हुए कि उसका विकास के आधुनिक मापदंडों से कोई लेनादेना नहीं है, बच्चों को धर्म, जाति, पूजापाठ, देवीदेवता तथा कर्मकांडों के बारे में लगातार बताया जाता है. इसके परिणामस्वरूप घर में मातापिता को आरती करते देख अबोध बालक भी ‘जै’ करना सीख जाता है. पत्थर और कागज की मूर्तियों को देखकर वह हाथ जोड़ लेता है. मांबाप उसे देखकर प्रसन्न होते हैं. सोचते हैं कि बालक ठीक रास्ते पर है. पड़ोसी के सामने वे उसकी संस्कारशीलता की प्रशंसा करते हुए नहीं अघाते. वे समझ नहीं पाते कि बालक का अपने परिवार और समाज से कटने का सिलसिला आरंभ हो चुका है. उसकी एकाकी यात्रा अनजाने ही आरंभ हो चुकी है. कारण साफ हैप्रत्येक धर्म व्यवहार में नैतिकता की बात करता है, संगठन की बात करता है, कल्याण की बात करता है. सबको साथ लेकर चलने की बात करता है. लेकिन जब वास्तविक फल की बात आती है. लक्ष्य की बात आती है, परिणाम से गुजरने की बात आती है तो वह प्राणी को अकेला छोड़ देता है. स्वर्ग के बहाने, जन्नत के बहाने, मोक्ष और कैवल्य के बहाने—उसकी रीतिनीति व्यक्ति को अंततः अकेला कर देने की होती है. मृत्युभय से जन्मा धर्म मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य मुक्ति को मानता है. ईश्वरप्राप्ति को मानता है. कहता है कि मुक्ति के रास्ते पर, ईश्वरप्राप्ति के रास्ते पर अकेला ही बढ़ा जा सकता है….कि धर्म के उच्चतम सफर में प्रत्येक व्यक्ति अकेला होता है. चौबीस घंटे वह समझाता है कि अपने सिवाय हम जो कुछ देख रहे हैं, सब माया है, नश्वर है, भवप्रपंच है. यहां तक कि हमारे मातापिता, घरपरिवार में जीवन की कथित पवित्रतम यात्रा के दौरान कोई हमारा साथ देने वाला नहीं है. संबंधों का मोहजाल व्यक्ति को संसारचक्र में उलझाता है. लेकिन जिस मोक्ष के नाम पर इस खूबसूरत और सजीली दुनिया को माया, मिथ्या, प्रपंचादि कहकर तिरस्कार किया जाता है, उसकी वास्तविकता को लेकर बड़े से बड़ा भक्त भी तार्किक दावा नहीं कर पाता. इसके बावजूद उसका प्रलोभन इतना प्रबल कि व्यक्ति आजीवन उससे बाहर कुछ सोच ही नहीं पाता है. परिणामस्वरूप बालक जन्म से ही निराधार फंतासी की दुनिया में जीने लगता है, जो उसको पलायनवादी संस्कार देता है.

धर्म की नींव आस्था पर टिकी होती है, जो विवेकबुद्धि के ठहराव की अवस्था है. धर्म के व्यापार में लगी शक्तियां आस्था के नाम पर कुछ प्रतीक व्यक्ति के मानस पर आरोपित कर देती हैं. वे प्रतीक हालांकि पूरी तरह बाह्यारोपित होते हैं, लेकिन चतुराईपूर्वक व्यक्ति को यह विश्वास दिला दिया जाता है कि वे उसका अपना वरण हैं. आरोपित प्रतीक व्यक्ति की मनोरचना पर इस प्रकार सवार हो जाते हैं कि वह उनसे स्वतंत्र रहकर कुछ भी सोच नहीं पाता. हिंदू धर्म जाति प्रथा को मान्यता देता है. वह इसे समाजीकरण की प्रक्रिया का अनिवार्य अंग मानता है. कहा जाता है कि स्वयं सृष्टिपुरुष ब्रह्मा ने लोगों के लिए अलगअलग वर्णों की रचना की है. इसके आधार पर कुछ व्यक्तियों को जन्म के साथ ही कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हो जाते हैं. विशेषाधिकारों का जन्म के आधार पर आरक्षण प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है. परंपरागत धर्म इस व्यवस्था का पोषण करता है. अतः उसके द्वारा अनुशासित व्यवस्था लोकतांत्रिक हो ही नहीं सकती. जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त समाज में बालक जब खेलने के लिए बाहर निकलता है तो मां प्रायः उसे समझाती है कि अमुक के साथ मत खेलना. अमुक गंदा बच्चा है. अमुक अछूत है, उसके संपर्क में भी मत आना. अबोध बालक ऊंचनीच नहीं जानता. पर जब बारबार उसको समझाया जाता है, पिटाई का डर दिखाया जाता है, तो उसको मानना ही पड़ता है. इस तरह होश संभालते ही बालक प्रतिगामी सोच के प्रभाव में आ जाता है. जिसका उसके चारित्रिक विकास से दूरदूर तक संबंध नहीं होता. आरंभ में ही बच्चों की मनोरचना ऐसी बना दी जाती है कि वे धर्म, जाति, परिवार, कुलपरंपरा आदि के दायरे से बाहर सोच ही नहीं पाते. इसलिए जब असल चुनौती सामने आती है, जीवन में प्रतिकूल स्थितियों का सामना होता है, तो वे घबरा जाते हैं. संकट से त्राण के लिए उन्हीं शक्तियों की ओर देखने लगते हैं, जिनके बारे में बचपन से रटाया जाता है. वे हैं या नहीं, इस बारे में विश्वास के साथ कुछ भी कह पाना उनके लिए संभव नहीं होता. ऐसे में पंडा, पुजारी, ज्योतिषी, तांत्रिक, पादरी और मुल्लामौलवियों की बन आती है. इन सबका तो कारोबार ही लोगों के अज्ञान और चमत्कारप्रियता का दोहन करना है.

बालक अनुभव से सीखता है. वह अपने मातापिता, गुरु, अग्रज आदि से प्रेरणा लेता है. परिवार में जिन्हें वह पसंद करता है, उन्हीं का सर्वाधिक अनुसरण भी करता है. परिवार में लोकतांत्रिक परिवेश होगा तो उसका असर बालक पर अवश्य पढ़ेगा. पाठशाला में लोकतांत्रिक वातावरण हुआ तो बालक उससे भी प्रेरणा लेगा. इसलिए मातापिता को चाहिए कि वे परिवार की निर्णय प्रक्रिया में बच्चों को भागीदार बनाएं. उनके निर्णयसामर्थ्य को बढ़ाएं. यह कहा जा सकता है कि परिवार के हजार मसले होते हैं. उन्हें तय करना बड़ों की जिम्मेदारी होती है. बच्चे जब उन कामों के बारे में जानते ही नहीं तो राय कैसे दे पाएंगे? ऐसे में उनकी राय लेने की आवश्यकता ही क्या है? यह संभव है कि बच्चों को किसी काम के बारे में जानकारी ही न हो. फिर भी बालकों को लोकतांत्रिक संस्कार देने के लिए उचित होगा कि निर्णय प्रक्रिया के दौरान अथवा उसके बाद में मातापिता बच्चों को पास बिठाकर बताएं कि उस निर्णय के पीछे उनका तर्कसम्मत दृष्टि क्या है. वे उनसे पूछ सकते हैं उन परिस्थितियों में वे होते तो क्या निर्णय लेते? संभव है बच्चे इसपर चुप्पी साध लें. लेकिन इससे उनकी निर्णय क्षमता अवश्य विकसित होगी, प्रोत्साहन भी मिलेगा. संभव है अगली बार जब ऐसी ही स्थिति आ बने तो वे विकल्पों के साथ तैयार रहें. उनका यह जानना जरूरी है कि संसार से भागकर उसे नहीं बदला जा सकता. बीहड़ में रास्ता बिना जूझे नहीं मिलता. मानवीय सौहार्द, करुणा, समानता, समरसता, विश्वबंधुत्व, नैतिकता जैसे जीवनमूल्यों की स्थापना के लिए लोकतांत्रिक समझ जरूरी है. और ये सब हों इसके लिए आवश्यक है कि नागरिकों को उसकी शिक्षा बचपन से ही जाए. ठीक ऐसे ही जैसे दूसरी चीजों के बारे में बताया जाता है.

बालक अपने साथ ढेर सारी जिज्ञासाएं लेकर आता है. शिक्षा का प्रथम ध्येय उन जिज्ञासाओं का समाधान करना है. उसका वास्तविक कर्म है बालक की प्रश्नाकुलता को बढ़ावा देना. उसके व्यक्तित्व का परिष्कार करना, आत्मविश्वास को बढ़ाना. यह तभी संभव है बालकों को बताया जाए कि मानवीय सभ्यता ने शताब्दियों में जो प्रगति की है. वह सिर्फ और सिर्फ मानवीय श्रमकौशल की देन है. उसके पीछे न तो कोई चमत्कार है न ऊपरी कृपा. दुनिया में जिन्होंने भी विलक्षण कार्य किया, जोजो लोग महान कहलाए, जिन्होंने इतिहास की धारा को मोड़ने का युगांतरकारी कार्य किया, बाकी लोगों तथा उनमें बस इतना अंतर था कि वे अपने सपने को संकल्प में ढालना चाहते थे. इसलिए उन्होंने पलायन के बजाय प्रयाण का वरण किया. भागने के बजाय दुनिया को बदलना बेहतर समझा. मनुष्यता में विश्वास, इसलिए मानवमात्र के कल्याण की राह बनाते समय उन्होंने अपने सुख की परवाह तक नहीं की. संघर्ष किया, कष्ट भी सहे. इसलिए कि उनके लिए लौकिक लक्ष्य निजी सुखदुख से कही बड़े थे. बालक को समझाया जाना चाहिए कि मानुषजात होने के नाते उसमें भी वही गुणसामथ्र्य संभव हैं जो उन लोगों में थे. यही नहीं बाकी लोगों में भी वे सब गुण संभव हैं. इसलिए आवश्यकता सभी को साथ लेकर चलने की, उसकी क्षमताओं का लाभ उठाने और सम्मिलित बुद्धिविवेक से संसार संवारने की है.

स्कूल में अध्यापकगण को चाहिए कि वे बालकों के बीच किसी प्रकार का स्तरीकरण न पनपने दें. कक्षा में और उससे बाहर भी वे बच्चों को विभिन्न मसलों पर राय रखने के लिए आमंत्रित करें. विद्यालय की पाठननीति के बारे में बच्चों की राय लें. विभिन्न अवसरों पर उसपर परिचर्चा आयोजित कराएं, जिसमें बच्चों की मुक्त भागीदारी हो. महत्त्वपूर्ण अवसरों पर उन्हें विश्वास दिलाया जाना चाहिए कि उनमें से प्रत्येक अपनी विचारधारा में स्वतंत्र है….कि उनमें से किसी की भी विचारधारा केवल उसकी नहीं है. बल्कि वह उसके परिवेश की देन है. इसलिए उस विचारधारा को समझना प्रकारांतर में उसके परिवेश को समझने के लिए जरूरी है. तभी उसमें अपेक्षित सुधार संभव है. परिवेश सुधरेगा तो समाज अपने आप सुधरता जाएगा. उनमें से प्रत्येक की राय का महत्त्व है, अतः हर एक को अपनी बात रखनी ही चाहिए. सप्ताह के अंत में होने वाली सभाओं में निष्कर्ष निकालते समय भी यह ध्यान रखना चाहिए कि वे किसी एक व्यक्ति अथवा कुछ व्यक्तियों के मंतव्य के भरोसे न छोड़ दी जाएं. उन सभाओं में अधिक से अधिक बच्चों को अपनी राय रखने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए.

गणतंत्र आदर्श शासन प्रणाली भले न हो. मगर सभ्यता के इतिहास में आज तक आजमायी जा चुकी प्रायः सभी राजनीतिक प्रणालियों में यह श्रेष्ठतम है. इस कारण फिलहाल विकल्पहीन भी है. जिन कमजोरियों की चर्चा होती है, वे भी ऐसा नहीं कि आज ही जन्मी हैं. वर्षों पहले लोकतंत्र की आलोचना करते हुए प्लेटो ने कहा था—‘प्रजा में परिवर्तन की चाहत और उत्साह देख समाज का कुलीनतंत्र यानी वह तंत्र जो किसी न किसी भांति राजसत्ता पर आसीन रहा है—लोकतंत्र का राग अलापने लगता है. एक दिन वह पूरे समाज को तानाशाही की जद में ले आता है.’ लोकतंत्र की यह बीमारी पुरानी सही, लाइलाज नहीं है. इसका सर्वोत्तम निदान तो यही है कि समाज में कुलीनतंत्र को पनपने ही न दिया जाए. कुलीनतंत्र की जान असमान आर्थिक विभाजन में होती है. समाज के संसाधन जब कुछ हाथों में सिमट जाते हैं तो वे उनका मनमाना उपयोग करने लगते हैं. आर्थिकसामाजिक और राजनीतिक सत्ता पर काबिज होकर वे स्वयं को विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग घोषित कर लेते हैं. विशेषाधिकारों का पीढ़ीदरपीढ़ी मनमाना अंतरण ही कुलीनतावाद है. यह तभी फलताफूलता है जब समाज का बड़ा वर्ग निर्णय प्रक्रिया से खुद को अलगथलग कर लेता या कर दिया जाता है तथा निर्णय लेने का अधिकार दूसरों के हाथों में सौंपकर स्वयं भाग्यवादी बन जाता है.

व्यक्तिमात्र का कर्तव्य है कि वह अपने मौलिक अधिकारों के प्रति सचेत रहे. उन अधिकारों के प्रति सचेत रहे जिनका सीधा सरोकार उसके होने से है. जिनसे उसका अस्तित्व, उसकी पहचान सुरक्षित है. उसे जानना चाहिए कि ये अधिकार किसी बाहरी सत्ता की बख्शीश न होकर, मनुष्य होने के नाते उसको नैसर्गिक रूप से प्राप्त हैं. इस प्रकार के अधिकारों में बौद्धिक संपदा संबंधी अधिकार, अभिव्यक्ति का अधिकार तथा अन्य वे सभी कार्यकारी अधिकार सम्मिलित हैं, जिनके अनुसार वह दूसरों के नैसर्गिक अधिकारों को प्रभावित किए बिना, अपनी सुखसुविधा एवं प्रसन्नता अर्जित करता है. इसके लिए जरूरी है कि मनुष्य के सामने जहां कहीं भी राय देने का अवसर आए, आत्मविश्वास के साथ निर्भय, निस्संकोच अपनी राय रखे. यदि कहीं अधिकारों पर आंच आती दिखाई पड़े तो जमकर उनका विरोध करे. राज्य के संसाधनों का असमान विभाजन किसी एक व्यक्ति या वर्ग के लिए नुकसानदेह न होकर संपूर्ण राज्य के लिए नुकसानदेह होता है. इस बारे में थामस पेन ने बहुत काम की बात कही है. उसने कहा था कि जिस राज्य में आर्थिक विभाजन जितना अधिक समान होगा, उस राज्य के कानून आम जनता के लिए उतने ही हितकारी होंगे. दूसरे शब्दों में आर्थिक बंटवारा जितना अधिक समान होगा, नागरिकों की क्रियाशील मांगों में उतनी ही समानता होगी. उतना ही लोग एकदूसरे पर विश्वास रखेंगे. उनमें सहयोग की भावना उतनी ही प्रबल होगी. उनके अंतर्विरोध क्षीण होंगे. राज्य में अधिक अटूट एकता और समरसता होगी.

बालक को लोकतंत्रीय संस्कार देने में साहित्य की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है. हिंदी बालसाहित्य का जन्म औपनिवेशिक वातावरण में हुआ. उन दिनों समाज में सामंतीमूल्य प्रचलित थे. इसलिए आरंभिक हिंदी बालसाहित्य पर उसका असर साफ नजर आता है. आज हालात तेजी से बदल रहे हैं. बालसाहित्यकार को चाहिए कि वह पाठकों के लोकतांत्रिक प्रबोधीकरण पर ध्यान दे. नए जीवनमूल्यों से भरपूर बालसाहित्य की रचना करे. जिसमें बच्चों की इच्छाआकांक्षाओं, सपनों, संकल्पों और अधिकारों की अभिव्यक्ति होती हो. जिसमें आर्थिकसामाजिकसमानता के बारे में बताया गया हो. समाज की रचना ही इसलिए हुई है कि उसमें मनुष्य के मूलभूत अधिकारों की रक्षा हो. न इसलिए कि उसके अधिकारों पर कुछ साधनसंपन्न लोग कब्जा जमा लें—यह ध्वनि बालसाहित्य की हर रचना से आनी चाहिए. बालक का परिवेश लोकतांत्रिक होगा तभी वह अपने जीवन को उसके अनुसार ढाल पाएगा. लोकतंत्र में विश्वास रहेगा तो उसकी वे कमियां भी दूर होंगी, जिनके लिए आज उसकी आलोचना की जाती है.

© ओमप्रकाश कश्यप

इकीसवीं सदी के पहले दशक में हिंदी बालसाहित्य की स्थिति और चुनौतियां

सामान्य


स्मृति अंतराल अधिक नहीं है. सब कुछ जैसे हमारी आंखों के सामने हो. इकीसवीं शताब्दी का स्वागत लोगों ने पूरे हर्षोल्लास के साथ किया था. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पिछली शताब्दी ने जो लक्ष्य सिद्ध किए थे, उनसे उत्साहित लोग यह मान चुके थे कि आने वाली शताब्दी वैज्ञानिक क्रांति की होगी. वर्तमान शती के पहले दशक में देखें तो लगता है कि इसने हमें निराश भी नहीं किया है. मात्र दस वर्ष की अवधि में हम विकास की इतनी लंबी यात्रा कर आए हैं, जितनी पहले पूरी शताब्दी में असंभवप्रायः थी. कंप्यूटर, इलेक्ट्रानिक्स, संचार, अंतरिक्ष, आवास, स्वास्थ्य, चिकित्सा, यातायात जैसे अनेक क्षेत्र हैं जिनमें विकास की गति इतनी तेज है, मनुष्यता के इतिहास में उतनी शायद ही कभी रही हो. हम यह भी नहीं भूले हैं कि साहित्य के लिए इकीसवीं शती की दस्तक आशंकाओंभरी थी. दूरदर्शन और कंप्यूटर को शब्द पर संकट के रूप में लिया जा रहा था. माना जा रहा था कि तेजगति जीवन और आपाधापी में लोगों के पास शब्द से संवाद करने का समय ही नहीं बचेगा. लगातार बढ़ते चैनल पाठकों को पुस्तकों से दूर कर देंगे. पर जो हो रहा है, वह उस समय की हमारी कल्पना से एकदम परे है. आज इंटरनेट के कारण टेलीविजन को खतरा बढ़ चुका है, जबकि शब्दसाधकों और पाठकों के लिए जो महंगी होने के कारण पुस्तकों से कटने लगे थे, इंटरनेट पर मौजूद साहित्य कागज पर छपे साहित्य का सार्थक विकल्प बनता जा रहा है. वहां मौजूद नेटपुस्तकों का खजाना पुस्तकप्रेमियों के लिए अनूठा वरदान है. दुर्लभ मानी जाने वाली पुस्तकें मात्र एक क्लिक पर, लगभग मुफ्त उपलब्ध हैं. साहित्य और बौद्धिक संपदा के लिए नए बाजार तलाशने की कोशिश भी जोरशोर से जारी है. संचारक्रांति ने साहित्य और पाठक की दूरी को समेट दिया है. अब उत्तर में रह रहे दक्षिण भारतीय पाठक को यह चिंता करने की आवश्यकता नहीं है कि उसकी भाषा की पुस्तक और पत्रिकाएं उसके आसपास उपलब्ध नहीं. प्रायः सभी अच्छी पत्रिकाओं के इंटरनेट संस्करण मौजूद हैं, जिन्हें सामान्यतः निःशुल्क उतारा जा सकता है. साहित्य विद्युतीय त्वरा से हम तक पहुंच रहा है. भाषाएं क्षेत्रीय सीमाएं लांघकर विश्वमंच पर संवाद कर रही हैं. शब्द के नएनए रूपाकार सामने आ रहे हैं. इंटरनेट की लोकप्रियता का आलम यह है कि चाहे वह लेखक हो, पाठक हो अथवा प्रकाशक, सभी वहां अपना नामपता खोजने को लालायित रहते हैं. नई तकनीक का लाभ उठाने में बालसाहित्य भी अछूता नहीं है. इंटरनेट पर नएनए जालपट्टों(बेवसाइटों) एवं जालपट्टिकाओं(ब्लागों) के आगमन से बालसाहित्य की उपलब्धता बढ़ी है. वहां बालसाहित्य की प्रत्येक विधा कहानी, कविता, कामिक्स, चुटुकले, संस्मरण, यात्रावृतांत, लेख आदि विपुल मात्रा में मौजूद हैं. यानी आधुनिक तकनीक बालसाहित्य के लिए उस रूप में तो हानिकर सिद्ध नहीं हुई है, जैसा आमतौर पर सोचा जा रहा था. तो भी सवाल उठता है कि तकनीकी बदलावों के साथसाथ बालसाहित्य के रूपाकार में जो बदलाव आ रहे हैं, क्या वे हमारी कल्पनाओं के अनुरूप हैं? विज्ञापनों की भूख से बिलबिलाता हमारा आधुनिक मीडिया, जिसमें प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों सम्मिलित हैं, बालसाहित्य के नाम पर जो परोस रहा है, क्या वही हमारी अपेक्षा थी? बालसाहित्यकारों का एक वर्ग वैज्ञानिक रचनाओं का हिमायती रहा है. पर विज्ञान और तकनीक के नाम पर जो सूचनावाद बालसाहित्य में फलफूल रहा है, क्या वही उनका लक्ष्य था? क्या बालसाहित्य की पुस्तकों का सुंदरसजीला होना ही उनकी उत्कृष्टता की कसौटी माना सकता है? और यदि बाजार के दबाव में कुछ ऐसा हो रहा है जो हमारी कल्पना के विरुद्ध है, जो हमने कभी सोचा तक नहीं था, तो क्या उसे रोका जा सकता है? क्या हमारे बालसाहित्यकार इस अनपेक्षित चुनौती से जूझने के लिए तैयार हैं?

बाजार कोई नई अवधारणा नहीं है. करीब पांच हजार वर्षों से जब साहित्य केवल श्रुति का हिस्सा था, सभ्यता ने पांव पसारने शुरू ही किए थे, बाजार रहा है. उस समय बाजार की भूमिका साहित्य के प्रवत्र्तक की थी. व्यापारियों के काफिले अपने साथ अपनी जमीन का साहित्य और कलाएं भी ले जाते थे. पंचतंत्र, कथासरित्सागर, वैतालपचीसी, सिंहासन बतीसी, आलिफलैला, मुल्ला नसरुद्दीन, किस्सा चार दरवेश, गुलीवर की यात्राएं, जातक कथाएं, सिंदबाज जहाजी जैसी कालजयी रचनाएं बाजार द्वारा प्रेरित सांस्कृतिकसाहित्यिक आदानप्रदान के कारण ही विश्वसाहित्य की धरोहर बनी हैं. उस समय संस्कृति के सम्मिलन के प्रायः दो ही रास्ते थे. वे यायावर जिज्ञासु जो ज्ञान एवं सत्य की खोज में धरती का कोनाकोना छानते रहते थे. दूसरे वे व्यापारी जो काफिलों के रूप में न केवल वस्तुओं बल्कि साहित्य और संस्कृति का भी आदानप्रदान करते थे. उस समय तक दोनों परस्पर पूरक थे. बाजार साहित्य और संस्कृतियों के सम्मिलन में अहं भूमिका निभाता था, तो साहित्य एवं कलाएं उसे व्यापार के नए अवसर तथा विश्वसनीयता प्रदान करते थे. फिर ऐसा नया क्या है, जो चिंता का विषय बना है, जिससे साहित्य और कलाओं पर संकट की बात समयसमय पर उठती रहती है. वस्तुतः बाजार और बाजारवाद में बहुत अंतर है. बाजार मानवसमाज के विकास को दर्शाता है. जबकि बाजारवाद पूंजीवादी व्यवस्था की देन है, उस व्यवस्था की देन है जो मनुष्य का अवमूल्यन कर उसको जड़ उपभोक्ता में बदल देना चाहती है. उसके साथ वही व्यवहार करती है, जो किसी जड़ वस्तु अथवा पशु के साथ किया जा सकता है. यह कार्य वह शासन और अपने भरोसे के अर्थशास्त्रियों की मदद से करती है. चूंकि सांस्थानिक धर्म अवसर मिलते ही निरंकुश सत्ता की भांति व्यवहार करने लगता है, अतः बाजारवाद एवं तज्जनित सांस्कृतिक अवमूल्यन का रोना रोतेरोते धार्मिक संस्थाएं भी प्रकारांतर में उसके पोषण का ही काम करती हैं. विषय गंभीर है तथा विशद् विवेचना की अपेक्षा रखता है. लेख की मर्यादा के निर्वहन में हम वर्तमान चर्चा को मात्र निम्नलिखित बिंदुओं तक सीमित रखेंगे—

  • क्या बालसाहित्य की रचना को प्रौढ़ पाठकों के लिखी गई रचना की अपेक्षा अनिवार्यरूप से छोटा होना चाहिए?
  • बालसाहित्य की पुस्तकों चित्र महत्त्वपूर्ण हैं अथवा कथ्य? प्रकाशनक्षेत्र में तकनीक की मदद से पुस्तक को सुंदर और सजीला बनाने के प्रयासों ने क्या प्रकाशकों को कथ्य के प्रति उदासीन बनाया है
  • क्या बालसाहित्य में बढ़ते सूचनाओं के दबाव पर नियंत्रण जरूरी है?
  • क्या बालसाहित्य लैंगिक भेदभाव का शिकार है? यदि हां तो उसमें बाजारवाद की क्या भूमिका है?
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साहित्यकारों द्वारा बाजार के समक्ष समझौतावादी रवैये की शुरुआत उस समय से मानी जानी चाहिए, जब उन्होंने बजाय विषयवस्तु के, पत्रपत्रिकाओं में उपलब्ध स्पेस अथवा प्रकाशक की अपेक्षाओं को देखते हुए लिखना आरंभ किया था. वरिष्ठतम लेखक भी रचना आमंत्रित करने वाले संपादक से उसकी अनुमानित शब्दसंख्या पूछना नहीं भूलते थे, ताकि निर्धारित सीमा के भीतर कथानक का ढांचा खड़ा किया जा सके. साहित्यिक पांडुलिपियों की पृष्ठसंख्या प्रकाशक की मांग पर, उसकी जरूरत को देखकर तय की जाने लगी थी. वह साहित्य के नाम पर रचनाओं का बोनसाई संस्करण बनाने की शुरुआत थी, जो आज भी बदस्तूर जारी है. आज भी साहित्यकार से अपेक्षा की जाती है कि वह पाठकों की रुचि के अनुकूल ऐसी रचना लिखकर दे जो अखबार में उपलब्ध स्पेस की मर्यादाओं का पालन करती हो, जिसे पूर्वनिर्धारित खाने में सेट किया जा सके. इसमें कोई संदेह नहीं है कि पत्रपत्रिकाओं की भी एक सीमा है, बाजार की मजबूरियों और जनरुचि का ख्याल रखते हुए प्रत्येक विधा को सीमित स्थान देना उनकी विवशता हो सकती है. परेशानी तब खड़ी होती है, जब लेखकसंपादक ही यह मानने लगें कि बच्चों की रचनाओं यथा कहानी, कविता, उपन्यास आदि को अनिवार्य रूप से छोटा ही होना चाहिए….कि बच्चों का मानसिक सामथ्र्य उतना नहीं कि वे बड़ी रचनाओं को पचा सकें. संपादकोंप्रकाशकों की यह विवशता हो सकती है कि वे अपने विभिन्न उम्र, वर्ग, क्षेत्र और संस्कृति के पाठकों की रुचि के अनुरूप साहित्य का प्रकाशन करें. किंतु यह मान लेना कि बच्चे छोटी रचनाएं पढ़ना पसंद करते हैं, या पाठ्य पुस्तकों के दबाव में उनके पास बड़ी रचनाएं पढ़ने का समय ही नहीं होगा, अपने पूर्वग्रहों तथा कमजोरियों को पाठक पर थोपना है. बाजारवाद पहले बड़ों को, जो अर्थोपार्जन में सक्षम हैं, अपने प्रभाव में लेता है. जब तक वे उसके आगे समर्पण न करें, तब तक वह बच्चों तक पहुंच ही नहीं सकता. उल्लेखनीय है कि लोकसाहित्य के रूप में पहचानी जाने वाली प्रायः सभी क्लासिक रचनाएं, जो हमारे संस्कारों का बड़ा हिस्सा गढ़ती हैं, बड़ों के साथ बच्चों में भी समानरूप से लोकप्रिय रही हैं. बच्चे नलदमयंती, रामायण, महाभारत, किस्सा चार दरवेश, हातिमताई आदि को भी उतने ही चाव से पढ़तेसुनते थे, जितने कि बड़े. कथासरित सागर, जातक कथाएं, वैताल पचीसी, सिंहासन बतीसी जैसी रचनाएं भी उतनी छोटी नहीं हैं, जितनी आजकल के समाचारपत्रों में प्रकाशित की जाती हैं. उनकी लोकप्रियता का कारण यह भी है कि उनमें एक तारतम्यता है. एक कहानी पूरी होते ही दूसरी के शुरू होने का संकेत दे जाती है. साथ ही उनमें पाठक को बांधे रखने वाली किस्सागोई है, जो उपन्यास जैसा आनंद देती थी. परिणामस्वरूप बालक का मन रचना में डूबा रहता था. अब बालक कथाकहानी में जब तक डूबने का प्रयास करता है, तब तक कहानी पूरी हो जाती है. कहानी में न तो परिवेश होता है, न चरित्रचित्रण के लिए समय. बिना शैली और परिवेश की चिंता के सबकुछ ऐसे परोसा जाता है, जैसे फास्ट फूड.

कुछ समय पहले तक पत्रपत्रिकाओं द्वारा औसत 1500 शब्द संख्या की बालकहानी आमंत्रित की जाती थी. अब यह स्पेस भी पांचसात सौ शब्दों में सिमटता जा रहा है. शब्दसंख्या का निर्धारण करते समय बालकों की रुचि या मनोविज्ञान का कोई ध्यान नहीं रखा जाता, जबकि बालक कहानी का आकार, उसकी शब्द संख्या क्या हो, यह कभी नहीं देखता. वह उसकी रोचकता और विषयवस्तु को देखता है. इसलिए दादादादी के लंबे, कईकई रातों तक चलनेवाले किस्से बच्चों में अपेक्षाकृत अधिक लोकप्रिय हुआ करते थे. हमारे लोकसाहित्य का अधिकांश हिस्सा आज भी वही घेरते हैं. परीकथाओं को आधुनिक परिवेश में रचने वाले महान डेनिश बालसाहित्यकार हेंस क्रिश्चिन एंडरसन की कई बालकहानियां 11000—13000 शब्दों की हैं, और वे बच्चों में पर्याप्त लोकप्रिय रही हैं. उनकी कहानी ‘भविष्य के जूते’ तथा ‘वर्फ की रानी’ क्रमशः 12644 तथा 11930 शब्दों की हैं. उनकी कहानियों की औसत शब्द संख्या ही 3100 है. हिंदी के पत्रपत्रिका तो प्रौढ़ साहित्य की इतनी बड़ी रचना नहीं छापते. अब जरा हिंदी के बालउपन्यासों अथवा बच्चों के उपन्यास के नाम पर छापी गई रचनाओं का भी तुलनात्मक अंतर देखिए. हिंदी के वरिष्ठतम बालसाहित्यकारों में से एक, जो शताधिक बालउपन्यासों के लेखक होने का दावा करते हैं, के औसत उपन्यास मोटे टाइप में छपे 30—35 पृष्ठों यानी अधिक से अधिक 12000—13000 शब्दों में सिमटे हैं. अपनी प्रतियोगिताओं में चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट जो पांडुलिपियां आमंत्रित करता है, उनमें बाल उपन्यास के लिए 25000—30000 शब्दों (मोटे टाइप में अस्सी से सौ पृष्ठ) की सीमा रखी जाती है. इनके सापेक्ष अंग्रेजी की क्लासिक रचनाओं की लंबाई देखते हैं. लेविस कैरोल की कालजयी उपन्यास ‘एलिस इन वंडरलेंड’, जिसका प्रायः दुनिया की हर भाषा में अनुवाद हो चुका है, जिसपर दर्जनों फिल्में भी बन चुकी हैं, का 2007 में प्रकाशित संस्करण की पृष्ठ संख्या 204 है. ऐसी ही महान रचना डेनियल डेफो की ‘राबिंसन क्रूसो’ का 2008 में नया संस्करण आया है, पृष्ठ संख्या है 244. ‘दि एडवेंचर आ॓फ टाम सायर’ नामक उपन्यास के लेखक मार्क ट्वेन के असली नाम सेम्युअल लेंगहार्न क्लेमेंस के बारे में बहुत कम लोग जानते होंगे. वह अपने उपनाम से ही पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. यह उपन्यास पहली बार 1876 में प्रकाशित हुआ था, पृष्ठ संख्या थी—275. पुस्तक इतनी लोकप्रिय हुई कि ट्वेन को इसका अगला हिस्सा लिखना पड़ा. आठ वर्ष बाद पुस्तक का अगला भाग ‘एडवेंचर आ॓फ हकलबेरी फिन(1884)’ प्रकाशित हुआ तो वह पहले से भी अधिक स्थूलकाय था. 366 पृष्ठ संख्या की इस मोटी पुस्तक के बारे में अमेरिका के महान साहित्यकार नोबल विजेता अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने अपनी पुस्तक ‘ग्रीन हिल्स आ॓फ अफ्रीका में लिखा है—‘‘आधुनिक अमेरिकी साहित्य का स्रोत एक ही पुस्तक है—मार्क ट्वेन की ‘हकलबेरी हिन.’’1

ये सभी विश्व क्लासिक्स हैं. फिर भी कहा जा सकता है कि ये उदाहरण पुराने हैं. तो चलिए इन्हें छोड़ देते हैं. हम ‘हैरी पा॓टर’ को भी नहीं लेंगे जिसके एक के बाद एक सात खंड आ चुके हैं और जिसने लोकप्रियता की सभी सीमाओं को तोड़ा है. कुछ लोगों के लिए वह असाहित्यिक रचना है. मगर फिलिप पुलमेन का नाम तो आधुनिक लेखकों में सम्मान के साथ लेना पड़ेगा. अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों के विजेता पुलमेन ने ‘हिज डार्क मैटीरियल्स’ शृंखला की तीन पुस्तकें लिखी हैं. उनमें ‘नादर्न लाइट(1995)’ 399 पृष्ठ, ‘दि सबटेल नाइफ(1997) 341 पृष्ठ तथा ‘दि अंबर स्पाईग्लास(2000) 518 पृष्ठ की हैं. बालउपन्यास की इतनी बड़ी कृति हिंदी में शायद ही किसी ने लिखी है. कम से कम मुझे तो याद नहीं आती. यहां लेखक पर अंग्रेज प्रेमी होने का आरोप लगाया जा सकता है! लीजंेड फिल्मकार सत्यजीत राय ने बालसाहित्य लेखन को गंभीरता से लिया था. बच्चों के मनोविज्ञान तथा उनकी रुचि का ख्याल रखते हुए उन्होंने कई लोकप्रिय पुस्तकों की रचना की. ‘फेलुदा’, ‘प्रोफेसर शंकु’, ‘फाटिकचंद’ उनकी अत्यंत लोकप्रिय कृतियां हैं. इनमें ‘फेलुदा’ और ‘प्रोफेसर शंकु’ कहानी संग्रह हैं. ‘फेलुदा’ शीर्षक से उन्होंने जासूसी, रहस्य और रोमांच से भरपूर एक के बाद एक 35 कहानियों की रचना की थी. ‘प्रोफेसर शंकु’ उनकी विज्ञानआधारित कहानियों का संकलन है. हिंदी में ऐसा प्रयोग मुझे याद नहीं. इस क्षेत्र में कुछ लेखकों ने अवश्य ही सराहनीय काम किया, पर अधिकांश की वर्णनात्मकता के बोझ से दबी रचनाएं, पाठकों पर अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पातीं. ‘फाटिकचंद’ किशोरोपयोगी उपन्यास है, इसका हाल ही में पेपरबैक संस्करण आया है जो अपने आकार, कथ्य और रोचकता में अंग्रेजी की उपर्युक्त पुस्तकों से टककर लेता है. इसलिए यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब अंग्रेजी और बांग्ला में बच्चों के स्थूलकाय उपन्यास तथा लंबी कहानियां चल सकती हैं तो भारत में क्यों नहीं? अब यह तो कोई नहीं मानेगा कि हिंदी पढ़नेवाले बच्चे इतने मंदबुद्धि हैं कि वे लंबे कथानक वाली रचनाओं को पचा ही नहीं सकते.

दरअसल सारा खेल बाजारवादी मानसिकता का है. रचना के पर कतरने का काम यह कहकर किया जाता है कि आधुनिक भागमभाग के युग में बच्चों के पास बड़ी पुस्तकों को पढ़ने का समय ही नहीं है. यदि ऐसा है तो भी यह बाजारवादी मानसिकता का सामना करने के बजाय उसके समक्ष हथियार डाल देने जैसा है. इसमें साहित्यकार की आत्मविश्वास की कमी झलकती है. यदि रचना का लघु कलेवर ही उसकी पठनीयता की कसौटी होता तो लघुकथा को हिंदी साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा होती. सबसे ज्यादा पाठक कविताओं के होने चाहिए थे. जबकि आज भी ‘कहानी’ और ‘उपन्यास’ सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली विधाएं हैं. दरअसल शब्दसंख्या के आधार पर किसी भी विधा का निर्णय करना अनुचित है. हर विधा की एक तकनीक होती है. रचना का पैमाना उसकी कथावस्तु और प्रस्तुतीकरण होना चाहिए. कहानीउपन्यास यदि रोचक और उसका विषय बच्चों की पसंद के अनुकूल होगा तो वे उसकी ओर आकर्षित होंगे ही. बाजार की अपेक्षाओं के अनुसार जो बालसाहित्य प्रकाशित होता है, वह बच्चों में पढ़ने की तात्कालिक भूख भले शांत कर दे, किंतु उन्हें पढ़ने का संस्कार देने में असमर्थ सिद्ध होता है. परिणामस्वरूप उसका वैसा प्रभाव नहीं पड़ता जो एक साहित्यिक रचना से अपेक्षित होता है. संस्कार के अभाव में बालक साहित्यिक पुस्तक के साथ भी उपभोक्ता वस्तु जैसा ही व्यवहार करता है. जिससे उसकी प्रभावोत्पादकता घट जाती है. अतएव बालसाहित्यकारों से अपेक्षा की जा सकती है कि वे समाचारपत्रपत्रिकाओं की के काॅलम को ध्यान में रखकर तो लिखें ही, उससे इतर कुछ अपने और अपने पाठकों के लिए भी अवश्य लिखें. ताकि बच्चों के लिए सिर्फ पुस्तकें ही नहीं बेहतर रचनाएं भी सामने आ सकें.

सभी जानते है कि साहित्य शब्द से गढ़ा जाता है. उसमें महत्ता उस विचार की होती है, जिसे साहित्यकार सर्वकल्याणकारी भावना के साथ रचना में समाहित करता है, और जिसको पाठक रचना के सत्व के रूप में उसके आस्वादन के साथ प्राप्त करता है. विचार सहज, सरल एवं संप्रेषणीय हों, बालपाठक शब्दों की ओर आकर्षित होकर उससे जुड़े, ताकि उनके माध्यम से लेखक की विचारधारा से परिचित हों, उसके साहित्यत्व को आत्मसात कर सके, जो रचना की आत्मा है—इसके लिए चित्रों ही आवश्यकता पड़ती है, विशेषकर बच्चों और उन सरल बुद्धि बड़ों के लिए जिन्हें शब्दों से गुजरने का अभ्यास कम है. साहित्य में चित्रों और शब्द की अटूट मैत्री को पहली बार जा॓न अमोस का॓मिनियस(1592-1670) ने पहचाना था. बच्चों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर उस चेक लेखक ने ‘आ॓रबिस पिक्चस्’(वस्तु जगत) शीर्षक से सचित्र पुस्तक तैयार की थी. उसका पहला संस्करण 1658 में प्रकाशित हुआ था. उसमें पहली बार कथ्य को समझाने के लिए चित्रों की मदद ली गई थी. असल में बच्चों का पहला सचित्र शब्दकोश था, जिसमें चित्रों बच्चों को उनके आसपास के संसार के बारे में बताया गया था. वे चित्र सादा थे और उन्हें बहुत कलात्मकता से बनाया भी नहीं गया था. साधारण छापे से बस टाप दिया गया था. तो भी उसकी ऐतिहासिक महत्ता है. लगभग साढ़े तीन सौ वर्ष पहले जब छापाखाने का विकास हुआ तब तक देश शब्दक्रांति की ओर बढ़ चुका था. कालांतर में चित्रों का रूपरंग और संवरा. पेशेवर चित्रकारों ने मोर्चा संभाला. अब रचना केवल शब्दों से ही संवाद नहीं करती थी, बल्कि वह चित्रों के माध्यम से भी बोलने लगी थी. किंतु उन चित्रों की एक मर्यादा थी. वे शब्दों के साथ मौजूद तो रहते थे. मगर कभी उनपर भारी नहीं पड़ते थे. दोनों अपनी समानांतर भूमिका में रहकर सफल आयोजन रचते थे. जिन्हें चंदामामा के अंक याद हैं, नंदन और पराग को जिन्होंने पढ़ा है. वे शब्द और चित्र की अटूट जुगलबंदी को बेहतर समझ सकते हैं. वे जानते हैं कि चित्रकार की कूंची का एक कोना किस प्रकार रचना का पूरक और संप्रेषक बन जाता है.

साहित्यिक पुस्तकों के प्रकाशन में व्यावसायिकता के कारण इधर एक प्रश्न उठने लगा है कि बालसाहित्य की पुस्तकों में चित्र महत्त्वपूर्ण हैं अथवा कथ्य? इसमें कोई संदेह नहीं कि चित्र और शब्द यानी साहित्य, अभिव्यक्ति की अलगअलग शैलियां हैं. दोनों ही कला हैं और परस्पर पूरक भी. उनमें कभीकभी स्पर्धा भी देखी जा सकती है. चित्रकार की कूंची का एक झोंका एक झटके में जो बात कह सकता है, संभव है उसका बयान करने के लिए लाखों शब्दों का लश्कर भी अपर्याप्त सिद्ध हो. दूसरी ओर शब्दनाद के माध्यम से जो संदेश मस्तिष्क की शिराओं में प्रवेश करता है, चाक्षुस संदेश की अपेक्षा उसकी अनुगूंज लंबे समय तक रहती है. वह अधिक संप्रेषणीय एवं ग्राह्यः होता है तथा जनसाधारण की पहंुच में भी. जबकि चित्रकला को परखने के लिए पारखी नजरों की जरूरत पड़ सकती है. कई बार तो पाठक कथ्य में इतना रम जाता है कि चित्रमय प्रस्तुतियों की ओर उसका ध्यान ही नहीं जाता. मगर यदि कथ्य कमजोर है तो इस बात की भी संभावना बनी रहती है कि बालक चित्रों को देखकर ही पुस्तक को किनारे रख दे.

अच्छा चित्र पुस्तक में बालक की रुचि जाग्रत करता है. अतः बात जब साहित्य की हो तो उसमें शब्द और उनमें निहित कथ्य ही महत्त्वपूर्ण माना जाएगा. चित्र का काम तो विषय की संप्रेषणीयता को विस्तार देना, उसे सहज एवं चाक्षुस बनाना है. जहां तक बच्चों की पुस्तकों का सवाल है, आजकल अधिकांश चित्र कंप्यूटर द्वारा बनाए जाते हैं. यह कार्य आमतौर पर जिन कंप्यूटरशिल्पियों से कराया जाता है, उनकी दक्षता कंप्यूटर से काम लेने में होती है, न कि बालसाहित्य या बालमनोविज्ञान को लेकर. इसलिए उनके द्वारा बनाए गए चित्रों में सतहीपन झलक स्पष्ट दिखाई पड़ती है. वे चित्र चित्रों की निर्जीवता रेखाओं और रंगों के संयोजन से आगे नहीं बढ़ पाती. जबकि रचना के साथ दिए गए चित्र की भूमिका केवल उसकी अभिव्यक्ति को सहजसंप्रेषणीय बनाना नहीं है, बल्कि उस अनकहे को भी सामने लाना है, जिसका बयान करते समय शब्द अकसर चूक जाते हैं. एक स्तरीय चित्र पाठकदर्शक को सोचने के विविध आयाम देता है. आशय है कि बालसाहित्य की पुस्तकों में चित्र तो महत्त्वपूर्ण हैं, मगर वे कथ्य का स्थान नहीं ले सकते. किसी भी महान साहित्यिक रचना के लिए एक अच्छा चित्र कथ्य एवं संदेश का पूरक हो सकता है, उसकी अनिवार्यता नहीं.

इसके बावजूद बालसाहित्य की पुस्तकों के प्रकाशन के समय प्रकाशक जितना उसके चित्रों पर परिश्रम करते हैं, कथ्य पर उतना नहीं करते. कथ्य को प्रायः संबंधित बालसाहित्यकार के लिए छोड़ दिया जाता है. हाल के वर्षों में तो कई प्रकाशकों को भी लेखक की भूमिका निभाते देखा गया है. वे चतुराईपूर्वक इंटरनेट या इधरउधर से सामग्री जुटाकर उसको चित्रों के साथ सजा देते हैं. कंप्यूटर ने इस काम को और भी आसान करा दिया है. इससे संस्थान में दक्ष लेखकों, चित्रकारों का महत्त्व घटा है. परिणाम यह हुआ है कि चित्रों की आत्मा जाती रही. चित्रकार की कूंची पहले हर चित्रों में प्राणप्रतिष्ठा करती थी. अब वह माउस की बेजानसी क्लिक के भरोसे रह गया है. इसके कारण चित्र अब भावमय नहीं, रंगमय नजर आते हैं.

लगभग दो दशक पहले तक राष्ट्रीय पत्रपत्रिकाओं में बालसाहित्य की सामग्री की तुलना आजकल परोसी जा रही रचनाओं से करें. उन दिनों रचनाओं पर पुराकथाओं का गहरा प्रभाव था. उसके अलावा जो साहित्य इस श्रेणी में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता था, वह मुल्ला नसरुद्दीन, तेनालीराम, अकबरबीरबल, सिंहासन बतीसी, कथासरित्सागर, जातककथाएं और पंचतंत्र जैसे क्लासिकों से आता था. लिखित साम्रगी के साथसाथ बड़ी मात्रा में धारावाहिक रूप से चित्रकथाएं भी छापी जाती थीं. उनका एक ही उद्देश्य होता था, बालपाठकों को अपनी संस्कृति और परंपरा से परिचित कराना. यद्यपि साहित्यकारों का एक वर्ग चित्रकथाओं को बालकों के लिए हानिकर मानता था. यह माना जाता था कि का॓मिक्सों के अतिमानवीय चरित्र बालकों को फंतासी के बहाने यथार्थ से दूर ले जाएंगे, जिससे वे वास्तविक जीवन की समस्याओं का सामना करने में असमर्थ सिद्ध होंगे. असल में