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उतावले समाज के बीच बचपन

सामान्य

उस दिन पुराने प्रकाशक मित्र के घर जाना हुआ. आजकल वे मंदी से जूझ रहे हैं. कारण अंदरूनी हैं. पहले प्रकाशन को दो भाई मिलकर चलाते थे. बाद में छोटे के मन में लालच उमड़ा. उसने नया प्रकाशन खोल लिया. वह पहले से जुड़े साहित्यकारों को अपनी ओर खींचने लगा. पुराना संस्थान घाटे में आ गया. अपनों की मार से कराह रहा व्यक्ति प्रायः भावुक हो जाता है. वे अपना दुखड़ा बयां कर ही रहे थे कि उनका पोता खेलता-खेलता कमरे में चला आया. जैसे अंधेरे कमरे में धूप ने दस्तक दी हो. चमत्कार की तरह उनके चेहरे का विषाद एकाएक धुल गया. उन्होंने पोते को गोद में उठा लिया—

‘कश्यप जी, कुल मिलाकर तीन साल का है. लेकिन बड़े से बड़ा वाक्य एक साथ बोल लेता है. पूरी तरह साफ. मानो डॉ…..शर्मा खुद लौट आए हों….’ उन्होंने नगर के चर्चित भाषा-विज्ञानी रह चुके अपने दिवंगत पिता का नाम लिया. बच्चे की बातें सुनकर मैं समझ चुका था कि वे गलत नहीं कह रहे. बालक सचमुच ही तेज है. मेरी निगाहें उसी पर टिकी थीं. किंतु मस्तिष्क पर ईशान छाया हुआ था. मेरा साढ़े तीन वर्ष का पोता. बच्चे की जन्मतिथि पूछकर मैं जान चुका था कि ईशान उससे चार महीना बड़ा है. और मैं यह कल्पना कर रहा था कि चार महीने पहले, यानी उस बच्चे की अवस्था में ईशान का व्यवहार कैसा था. दिमाग में चौकड़ी भरते स्पर्धा के अश्व, ईशान को उस बच्चे से आगे लिए जा रहे थे. बालक अभी भी अपनी धुन में मग्न था. प्रकाशक मित्र के चेहरे पर उमड़ा वात्सल्य और चमक बता रही थी कि उन्हें भी अपने पोते के निरालेपन पर गर्व है.

यह सामान्य बात है. जीवन में ऐसे अनुभव अकसर होते रहते हैं. बच्चों की विलक्षण मेधा को लेकर सैकड़ों-हजारों कहानियां हमने पढ़ी हैं. शास्त्रों में नचिकेता, ध्रुव, सत्यकाम, उपमन्यु, अभिमन्यु, आरुणि उद्दालक आदि न जाने कितने विलक्षण प्रतिभाशाली और सूझ-बूझ संपन्न बच्चों का जिक्र है. पश्चिम में भी उदाहरण कम नहीं हैं. प्लेटो की विलक्षण मेधा के बारे में जन्म से ही भविष्यवाणी कर दी गई थी. जेम्स मिल ने अपने बच्चे की प्रतिभा को पहचाना था और जैसा उसे वह बनाना चाहता था, वैसा उसने किया. फलस्वरूप बेटा जॉन स्टुअर्ट मिल महान दार्शनिक बना. जन्म के समय हर बालक नचिकेता और अभिमन्यु की भांति ही प्रतिभाशाली होता है. जब वह दुनिया में आता है तो किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त होता है. सीधे प्रकृति के साथ उसका जुड़ाव होता है. उसके अतिरिक्त यदि किसी दूसरे से उसका अपनापा होता है तो उस स्त्री से जिसने उसको जन्म दिया है. इसलिए नहीं कि वह उसकी मां है. मां संबोधन के मायने क्या हैं, यह उसकी समझ में बहुत बाद में आता है. उससे पहले उसका संबंध प्राकृतिक होता है. मां उसे भोजन देती है. उसका लालन-पालन करती है. आवश्यकता पड़ने पर उसे सुरक्षा भी देती है. मां की गोद से वह परिवेश में झांकने की शुरुआत करता है. प्रकृति के अंश के रूप में अपने चारों ओर विस्तृत ब्रह्मांड को देखकर वह विस्मित होता है. यह विस्मय ही जिज्ञासा का मूल है. छोटे-से छोटा बालक अपने आसपास की वस्तुओं के बारे में जान लेना चाहता है. यह बचपन की स्वाभाविक प्रक्रिया है. चूंकि परिवेश की हरेक वस्तु बालक के लिए नई होती है, इसलिए वह उनमें से प्रत्येक को जान लेना चाहता है. न केवल दृश्य को, बल्कि दृश्यमान के पीछे जो अदृश्य कारण है, उसे जानने की भी उसकी जिज्ञासा होती है.

फिर हमें हर बालक अजूबा क्यों लगता है? क्यों उसकी जल्दी से जल्दी सीखने की आकुलता हमें हैरत में डाल देती है? क्या इसलिए कि उसकी बातें हमें दुनियादारी से बाहर की लगती हैं. हमें लगता है कि बालक जो सोच रहा है, उसका यथार्थ से कोई संबंध नहीं है! यह अस्वाभाविक भी नहीं है. बालक की दुनिया हमसे स्वतंत्र होती है. वह अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखना चाहता है. जबकि हमारी कोशिश होती है कि बालक जल्दी से जल्दी अपने दुनिया छोड़कर हमारी बिरादरी में सम्मिलित हो जाए. एक सीमा तक तो यह जरूरी भी है. बालक को जिस समाज में रहना है, उसके रीति-रिवाजों, परंपराओं और प्रवृत्तियों के बारे में उसको जानना ही चाहिए. लेकिन बड़े होने के नाते हमारी ओर से इतनी उदारता जरूरी है कि बालक को बजाय हमेशा सिखाते रहने के, उसे समझने और आवश्यकतानुसार कुछ सीखने की इच्छा भी रखें. इसके बावजूद बालक की दुनिया को जाने बिना, बगैर उसकी मौलिकता का सम्मान किए, उसपर अपनी परंपराएं लाद देने की माता-पिता की कोशिशें उसके जन्म के साथ ही आरंभ हो जाती है. इस मामले में हमारा उतावलापन कमाल का होता है. बालक जब शैशवावस्था में होता है, तभी हम उसकी दुनिया को वस्तुओं से, उन वस्तुओं से जिनके बारे में हमें बताया जाता है कि वे बालक की पसंद से जुड़ी हैं, भर देना चाहते हैं. बालक की रुचि और उसकी जिज्ञासा पर हम उतना ध्यान नहीं देते, जितना किसी न किसी रूप में अपनी पसंद की वस्तुओं को उसपर लादने पर. बालक घर की पुरानी चीजों से, कबाड़ से खेलना चाहता है, हाथ में कलम या पैंसिल आ जाए तो वह उससे दीवार पर आड़ा-तिरछा कुछ बना देना चाहता तो उससे हमें असुविधा होती है. हम उसको ‘गंदी बात’ कहकर बरजते रहते हैं. बालक निरुत्साहित होकर अपनी भावनाओं को छिपाने लगता है. कुछ बच्चे भीतर-ही-भीतर घुटने लगते हैं. नतीजा यह होता है कि जन्म के कुछ महीने बाद ही बालक अपनी मौलिकता खोने लगता है. बालक और उसके माता-पिता एक ही परिवेश में साथ-साथ रहते हैं. लेकिन परिवेश को देखने की दोनों की दृष्टि अलग-अलग होती है. बालक के लिए उसकी जिज्ञासा और कौतूहल महत्त्वपूर्ण होते हैं. इसलिए वह परिवेश के प्रति बोधात्मक दृष्टि रखता है. उसकी उत्सुकता एक विद्यार्थी की उत्सुकता होती है. माता-पिता सहित परिवार के अन्य सदस्यों की दृष्टि बाह्यः जगत को उपयोगितावादी नजरिये से देखती है. वे वस्तुओं को जानने से ज्यादा उन्हें उपयोग करने के लिए अपने साथ रखते हैं. आसान शब्दों में कहें तो वस्तु जगत के प्रति बालक और बड़ों की दृष्टि में दार्शनिक और व्यापारी जैसा अंतर होता है. लोकप्रिय संस्कृति में बाजी सामान्यतः व्यापारी के हाथ रहती है. उसका नुकसान ज्ञानार्जन के क्षेत्र में मौलिकता के अभाव के रूप में सामने आता है.

बालक और उसकी जिज्ञासा वृत्ति के आकलन के बहुस से तरीके हैं. तीन-चार वर्ष का बालक अपने माता-पिता, सगे-संबंधियों से औसतन 450 सवाल प्रतिदिन पूछता है. उत्तर मिल जाता है तो जानने की इच्छा और भड़कती है. प्रत्येक प्रश्न अपने साथ पुनः कुछ नए प्रश्न लाता है. हर सवाल के साथ उसकी जिज्ञासा कुलांचे भरती रहती है. वह सवाल के भीतर से सवाल निकालता है. उत्तर न मिले तो मायूस हो जाता है. भीतर उमगते कौतूहल के समाहार के लिए वह फिर सवाल करता है. यदि बार-बार पूछने पर भी प्रश्नों के उत्तर न मिलें तो उसकी प्रश्नाकुलता दम तोड़ने लगती है. बड़ों के साथ यह बात नहीं होती. उन्हें यह भ्रम होता है कि उन्होंने ‘जो कुछ जानने योग्य था, वह जान लिया है.’ इसी के साथ वे अपनी जिज्ञासावृत्ति से पीछा छुड़ा लेते हैं. अपनी बंधी-बधाई दिनचर्या में वे नएपन का अनुभव शायद कर ही नहीं पाते हैं. यदि कोई नया ज्ञान दिमाग के दरवाजे पर दस्तक भी दे तो झट से उससे किनारा कर जाते हैं. इसे जानकर क्या होगा?’ यह हमारे सुख-वैभव में कितनी वृद्धि करेगा? वगैरह. उनकी ज्ञान और उसके वास्तविक उपकरणों के प्रति सामान्य उपेक्षा बनी ही रहती है. छोटा बच्चा दार्शनिक की भांति अपनी हर जिज्ञासा का समाधान चाहता है. वह सवाल की तह तक पैठना चाहता है. बुढ़ापा आते-आते आदमी आम तौर पर पोंगा-पंडित बनकर रह जाता है.

यह सच है कि बालक की सीखने की ललक हमसे ज्यादा होती है. इसलिए नहीं कि वह बुद्धि में हमसे तेज होता है. बल्कि इसलिए कि उसके पास ढेरों प्रश्न होते हैं. उसे इस बात का बोध होता है कि उसे क्या नहीं आता. सुकरात के शब्दों में कहें तो बालक को अपने अज्ञान का ज्ञान होता है. उसकी भरपाई के लिए वह सवाल करता है. बड़े मना कर देते हैं, मुंह फेर देते हैं, टाल जाते हैं. झुंझलाकर हड़का भी देते हैं, फिर भी वह सवाल करना नहीं छोड़ता. इस मोर्चे पर बड़े बालक से पिछड़ा हुआ पाते हैं. इसलिए कि वे अपनी जिज्ञासा, सीखने की ललक, ज्ञानार्जन की चाहत को दुनियादारी के बीच मार चुके होते हैं. उनके सामने उनकी महत्त्वाकांक्षाएं होती हैं. ऐसी महत्त्वाकांक्षाएं जो उनकी अपनी ईजाद नहीं होतीं. प्रायः दूसरों के अनुसरण में अपना ली जाती हैं. उपलब्धि को वे भौतिकता के पैमानों से आंकते हैं—‘उसकी कमीज मेरी कमीज से सफेद क्यों?’, ‘हमारी कार पड़ोसी की कार से छोटी क्यों’ वगैरह….दूसरों से पिछड़ जाने की चिंता उन्हें मारे रहती है. ठीक है सपने देखना बुरा नहीं. यदि कोई किसी वस्तु को अपने पास रखना चाहता है तो वस्तु को वैधानिक तरीके से अर्जित कर उसका स्वामित्व प्राप्त करने का अधिकार उसे है. समस्या तब उत्पन्न होती है जब वह किसी ऐसी वस्तु जिसे वह स्वयं अर्जित करने में नाकाम रहा है, को अपनी संतान के माध्यम से पाना चाहता है. चाहता है कि उसके बेटे-बेटियां उसके सपनों को अपना समझकर उन्हें पाने को समर्पित हों. भूल जाता है कि बच्चों का भी स्वतंत्र सोच और वरीयताएं हो सकती हैं. इसके बावजूद अधिकांश माता-पिता माने रहते हैं कि उनका अपनी संतान पर निर्जीव वस्तुओं जितना ही अधिकार है.

बालक की दुनिया को लेकर अपनी कल्पना होती है. वह अपनी कल्पना के संसार को बसाना चाहता है. ठीक है उन्हें तत्काल पूरा करना उसके बस की बात नहीं होती. अपनी छोटी-से-छोटी जरूरत के लिए वह माता-पिता पर निर्भर होता है. संतानोत्पत्ति और बच्चे का लालन-पालन माता-पिता का नैसर्गिक कर्म है. यह कार्य उन्हें बालक के मौलिक सोच की सुरक्षा के साथ करना चाहिए. उसपर अपने विचार थोपने से उस समय तक बचना चाहिए जब तक उससे परिवार में बहुत बड़ा नैतिक संकट उत्पन्न होने की संभावना न हो. बावजूद इसके बालक के सपनों की कद्र करने के बजाय उन्हें अपने सपनों की चिंता सताए रहती है. ऐसे में सवाल करता हुआ बालक उनके लिए समस्या बन जाता है. माता-पिता को बालक के वे सवाल फिजूल लगने लगते हैं, जिनका उनके अपने सपनों से कोई वास्ता न हो. उससे बालक के सामने असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. उसके लिए यह तय करना कठिन हो जाता है कि वह अपने सपनों पर ध्यान दे, दुनिया को उस दृष्टि से देखे, जैसा वह सोचता आया है या वैसा करे जैसा उसके माता-पिता और अभिभावक उससे चाहते हैं. चूंकि वह माता-पिता पर आश्रित है, उनसे भावनात्मक और भौतिक संरक्षण प्राप्त करता है. अतः उसके लिए माता-पिता की उपेक्षा करना भी सर्वथा संभव नहीं होता. यह स्थिति उसे अनचाहे तनाव की ओर ले जाती है.

कई बार सुविधा और संसाधन जुटाने की कोशिश में लगे माता-पिता बच्चों पर पूरा ध्यान नहीं दे पाते. वे दिन-भर आॅफिस में या दूसरी ऐसी जगह खटते रहते हैं जहां से कुछ आमदनी हो सके. दूसरी ओर बच्चे पहले स्कूल फिर टयूशन. टयूशन भी एक नहीं, दिन में चार-चार ट्यूशन. दिन-भर कड़ी स्पर्धा. माता-पिता सुविधा-संसाधन बटोरने के लिए उतावलापन दिखाते हैं. बालक से चाहते हैं वह पढ़ने-लिखने में उतावलापन दिखाए, ताकि वे अपने मृत हो चले सपनों में प्राण-प्रतिष्ठा कर सकें. ऐसे माता-पिता दिखावा तो यह करते हैं मानो वे अपना योग्य उत्तराधिकारी तैयार करना चाहते हैं. असल में उनकी कोशिश बच्चों पर अपनी इच्छाएं लादने की पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाने; यानी खुद को श्रेष्ठ उत्तराधिकारी सिद्ध करने की होती है. उनका तर्क होता है कि माता-पिता की विनम्र संतान के रूप में वे स्वयं अपने सपनों को दांव पर लगा चुके हैं. इसलिए बच्चों पर अपनी इच्छाएं लादना कहीं से भी गलत नहीं है. दिखाई गई तस्वीर से अलग दुनिया को लेकर कोई नया सपना उनके पास नहीं होता. एक बार मौलिकता गंवा देने के बाद उनके पास अनुसरण के सिवाय दूसरा रास्ता रह ही नहीं जाता. वे मान लेते हैं कि दुनिया जैसी है, उसी रूप में अच्छी है. स्पर्धी समाज में परिवार के ऐसे बहुत से काम जिन्हें माता-पिता की ओर से पूरा करने की अपेक्षा की जाती है, बच्चे को करने पड़ते हैं. बालक उन्हें अपनी क्षमतानुसार निपटाते भी हैं, माता-पिता की महत्त्वाकांक्षा को उनकी विवशता मानकर सबकुछ खुशी-खुशी करने को तैयार रहते हैं. लेकिन एक बालक होने नाते उनकी स्वाभाविक इच्छा होती है कि माता-पिता सप्ताह का एक दिन उनके लिए सुरक्षित रखें. कई माता-पिता अपनी संतान की इस मामूली मगर स्वाभाविक इच्छा में भी पिछड़ जाते हैं.

बालमन पर बड़ों के सपनों के अध्यारोपण ने बच्चों का बचपन छीन लिया है. ऐसा नहीं कि बालक उसे जानता तक नहीं. वह इतना नादान भी नहीं होता कि आपकी बातें मान ले. ज्यूं की त्यूं मान ले. उस समय उसका सामना अपने ही भीतर विराजमान उस सजग बालक से होता है जो अपने जीवन को अपनी तरह से जीना चाहता है. जिसके अपने सपने हैं. जीवन के प्रति अपना खास द्रष्टिकोण है. कर्तव्यों के बीच द्वंद्व की स्थिति उसको डांवाडोल कर देती है. उन्हें लगता है कि उनसे कुछ छीना जा रहा है. इसी के साथ वह अपने कर्तव्य की ओर से उदासीन होने लगता है. अवांछित उदासीनता उसको घेरने लगती है. वह काम से जी चुराने लगता है. स्कूलों में हमने बिगडै़ल बच्चों को देखा होगा. प्रायः वे अपने परिवेश से उकताए हुए जीव होते हैं. उन्हें लगता है कि उनकी सुनी नहीं जा रही. इसलिए वे गुस्से के जरिये अपना क्षोभ प्रकट करते हैं. गुस्सा इसलिए आता है कि क्षोभ और असंतोष प्रकट करने के दूसरे तरीके यानी संवाद का रास्ता अपनाने का उन्हें अभ्यास नहीं होता. उन्हें यह अभ्यास कराया ही नहीं जाता. जबकि यह बहुत जरूरी है. इससे बालक का आत्मविश्वास बढ़ता है. उसकी निर्णय क्षमता में सुधार आता है. संवाद के लिए जरूरी नहीं कि एकाधिक व्यक्ति ही हों. व्यक्ति अपने आप से भी संवाद कर सकता है. कई बार अपने आप से संवाद का होना भी लाभदायक होता है. इसके अभाव में उनका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है. वे स्वयं को दिशाहीन, उदासीन, लक्ष्यविहीन और अनुरागविहीन नजर आते हैं. ये ऐसी समस्याएं हैं बच्चों का दूर रहना ही श्रेयस्कर है. लेकिन ऐसा हो नहीं पाता. द्वंद्व और द्वैध की स्थिति उन्हें चिड़चिड़ा बना देती है. उसका दुष्परिणाम बच्चों में सिरदर्द, पेटदर्द, अनिद्रा, भूख न लगना, तनाव, एकाकीपन, अवसाद आदि रूप में सामने आता है.

सबकुछ एकाएक समेटने की कोशिश में माता-पिता हर काम में उतावलापन दिखाते हैं. वे चाहते हैं बालक जल्दी से जल्दी बड़ा होकर कैरियर को संभाले. इसके लिए वे बालक को जल्दी से जल्दी सबकुछ पढ़ा देना चाहते हैं. माता-पिता का यह रोग अंततः उनकी संतान में भी चला आता है. आपाधापी के बीच माता-पिता के लिए भी यह संभव नहीं होता कि वे बालक का पूरी तरह अपने सपनों के अनुसार अनुकूलन कर सकें. यानी बालक उन्हीं मामलों में बड़ा हो जिनमें उसके माता-पिता चाहते हैं. बड़ा होने की आपाधापी में वह उस दिशा में भी बढ़ जाता है, जो उसके बचपन के लिए घातक सिद्ध हो सकती है. अभी तक पश्चिमी देश इसके ज्यादा शिकार हैं. लेकिन भारत में जिस गति से शहरीकरण बढ़ रहा है, कैरियर के लिए अंतहीन स्पर्धा और तनाव से बालक को गुजरना पड़ता है, वहां भी इसका असर पड़ने लगा है. नतीजा यह हुआ है कि बच्चों में नशाखोरी बढ़ रही है. स्कूलों में अपराध, आत्महत्या, किशोरावस्था में गर्भधारण का अनुपात तेजी से बढ़ रहा है. विकसित देशों में इसके जो आंकड़े देते हैं, वे किसी भी सभ्य देश के लिए चिंताजनक हैं. आंकड़ों के अनुसार 70 प्रतिशत किशोरियां किशोरावस्था से पहले ही अपना कौमार्य खो देती हैं. उनमें से 40 प्रतिशत गर्भ के कारण अपने जीवन को खतरे में डाल देती हैं. इनके अलावा ड्रग और शराब के बड़ते हुए मामले, आत्महत्या तेजी से बढ़ रही है. पांच हजार किशोर प्रतिवर्ष किसी न किसी कारण आत्महत्या के लिए बाध्य होते हैं. इनमें बहुत से ऐसे होते हैं जो अपने साथ-साथ अपने माता-पिता के सपनों के बोझ से दबकर कराह रहे होते हैं.

परिवार की आर्थिक बेहतरी के लिए काम करने का दबाव गरीब परिवारों में भी होता है. लेकिन गरीब माता-पिता बच्चों को इसलिए बड़ा होते देखना चाहते हैं ताकि वे आर्थिक मामलों में उनकी मदद कर सकें. लेकिन उनकी ऐसी हैसियत नहीं होती कि बच्चों को उनकी वयस् के अनुकूल काम दिला सकें. परिणामस्वरूप गरीब बालक कम उम्र में ही चाय के ढाबों पर, होटलों में, कबाड़ी के यहां, स्टेशनों पर छोटे-मोटे काम करने लगते हैं, जहां उन्हें नशाखोरी और शराब की शरण में जाने के अधिक अवसर प्राप्त होते हैं. मध्यवर्गीय परिवार अपने सपनों के साथ जीता है. वहां माता-पिता की चाहत होती है कि बालक जल्दी से जल्दी बड़ा होकर नाम कमाए, उसका अच्छा कैरियर हो, ताकि वे उन सभी सुख-साधनों को प्राप्त कर सकें, जिन्हें वह स्वयं पाने में नाकाम रहे हैं. दूसरे शब्दों में गरीब परिवारों के बच्चों के सपने छोटे, जरूरतें बड़ी होती हैं. वही उन्हें छोटे-मोटे धंधों में अपना बचपन छकाने के लिए विवश कर देती हैं. किंतु स्टेशन पर, ढाबों, होटलों, बाजार में कुलीगिरी करते हुए उनके चारों ओर का परिवेश ऐसा होता है जो उन्हें जरूरतें पूरी करने के फेर में भटकाव की ओर ले जाता है.

मध्यवर्गी परिवार के बालक के कंधों पर अभिभावकों के सपनों का बोझ होता है. अपेक्षाएं होती हैं. कठिन स्पर्धा के बीच अनिश्चितता भी होती है. इससे वह तनाव का शिकार हो जाता है. तनाव-मुक्ति की खोज उसे ड्रग, शराब आदि दुव्र्ययनों की ओर ले जाती है. यानी बच्चे चाहे गरीब परिवार में जन्मे हों या मध्यवर्गी परिवार में, बचपन को बचपन की भांति न जीने देने के दबाव दोनों को एक ही नियति की ओर ढकेल देते हैं. इसमें दोष किसका है? मध्य वर्ग में पला-बढ़ा बालक जानता है कि उसको तनाव की ढकेलने, अपनी अपेक्षाओं का बोझ लादने और असमय ही बचपन छीन लेने के लिए उसके माता-पिता भी जिम्मेदार हैं. गरीब माता-पिता की संतान अपेक्षाकृत उदारता बरतती है. वह जानती है कि उन्हें असमय काम पर ढकेल देना, उनके माता-पिता की जरूरत थी. गरीब माता-पिता अपनी जरूरतें बच्चे पर लादते हैं. बच्चे भी उनसे इत्तफाक रखते हैं. इसलिए वे माता-पिता को दोष देने के बजाय समाज को दोष देते हैं, जिसमें भारी आर्थिक उतार-चढ़ाव हैं. जहां अमीर छाती ठोंककर अपने उत्पाद का, ऐसे उत्पाद का मूल्यांकन करता है, जिसे बनाने में उसका अपना श्रम-योगदान शून्य है. जबकि गरीब से उसके श्रम के मूल्यांकन का अधिकार भी छीन लिया जाता है.

गरीब माता-पिता की संतान समझती है कि उनपर अपनी मजबूरी लादना माता-पिता की विवशता थी. मध्यवर्गी और उच्च मध्यवर्गी माता-पिता की संतान असफलता की अवस्था में सीधे अपने माता-पिता को दोष देती है. वह मान लेती है कि अपने माता-पिता के सपनों को साकार करने के बजाय अपना श्रम उन्होंने यदि अपने सपनों को साकार करने में लगाया होता तो अधिक कामयाब हो सकते थे. गरीब परिवार में जन्मा बालक अपने माता-पिता द्वारा समुचित समय न देने को इसलिए भी क्षमा कर देता है कयोंकि वह जानता है कि उनके लिए माता-पिता के पास समय ही नहीं था. जबकि मध्यमवर्गी माता-पिता द्वारा बालक के समुचित विकास के लिए समय दे ही नहीं पाते. क्योंकि उस अवधि में वे अपनी स्वार्थ-सिद्धि में जुटे होते हैं. यह स्थिति मध्यवर्गी परिवारों में असंतोष और विघटन की बढ़ती दर के रूप में सामने आती है. और बच्चों के मामले में तो तय है कि वे बचपन में जैसा भोगते हैं, बड़ा होने पर उसी को सूद समेत लौटाते हैं. बकौल डेबिड अलकिंद, ‘तरुणाई वह अवस्था है जब बच्चे हमारे उन सभी अपराधों को, चाहे वे वास्तविक हों अथवा काल्पनिक हमें वापस लौटा देते हैं जो हमने उनके विरुद्ध तब किए थे, जब वे छोटे थे.’

ये बातें ऐसी नहीं जो अजानी हों. बालक के कोमल मन पर परिवार और परिवेश के प्रभाव के बारे में मनोवैज्ञानिक अर्से से बताते आ रहे हैं. इसके बावजूद स्थिति दिनोंदिन भयावह हो रही है. नई तकनीक ने मां के गर्भ में झांकने की ताकत इंसान को दे दी है. इस काबलियत का उपयोग मनुष्य गर्भ से ही बालक की कंडीशनिंग के लिए करने लगा है. ‘सुपर बेबी’, ‘मनचाही संतान’ की सनक बालक को जन्म से ही माता-पिता की प्रयोगशाला बना देती है. तीन महीने के बच्चे का बौद्धिकता स्तर मापने के प्रयोग बढ़ रहे हैं. टेलीविजन पर लाइव शो ने एक और स्पर्धा खड़ी कर दी है. वहां तीन-चार वर्ष तक के बच्चे हाथ-पैर चलाने की कोशिश करते हुए मिल जाएंगे. उनके माता-पिता गर्व से बताते हैं कि वे महीनों पहले उनकी ट्रेनिंग आरंभ कर चुके हैं. यानी दो-ढाई साल के बालक को ज्ञान की, सौंदर्य की, खेल की, नांच-गाने और संगीत की स्पर्धा में ढकेल दिया जाता है.

चूंकि यह काम बाजार की मर्जी से हो रहा है, इसलिए बाजार उसका लाभ भी उठा रहा है. गर्भ से ही बच्चे की जांच, शैश्वावस्था में बौद्धिकता परिक्षण के लिए महंगी किट बाजार में आने लगी हैं. टेलीविजन, फिल्म आदि पर बच्चों की सक्रियता देख उनके लिए डिजायन कपड़ों के अलावा चार से नौ वर्ष के बच्चे के लिए लिपिस्टिक, आई लाईनर, साबुन, क्रीम, फेशियल जैसे उत्पादों से बाजार अटे पड़े हैं. नाच-गानों में बच्चों से कामुक मुद्राएं कराई जाती हैं. उसकी समस्याएं भी सामने आ रही हैं. बालक जल्दी वयस्क होने लगे हैं, उनका चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है. अजीर्ण, सिर-दर्द, उल्टी, नजर की कमजोरी जैसी व्याधियां असमय ही उनसे चिपक जाती हैं. बालक को डिजायनर कपड़े पहनाने, फैशन की डगर पर पटक देने में माता-पिता को उसका विकास नजर आता है. उनमें से अधिकांश वे हैं जो लार्ड मैकाले को कोसते हैं कि उसने भारतीयों पर अंग्रेजी थोपी. शिक्षा का ढर्रा बदलकर उसे रटंत-कला बना दिया. आज के शिक्षाशास्त्री उन्हें नजर नहीं आते जो बाजार के इशारे पर ज्ञान को सूचना में समेट चुके हैं. पूरी शिक्षा प्रणाली जिसे बालक के मौलिक और बहुआयामी विकास को समर्पित होना चाहिए, सूचना और आंकड़ों में सिमटकर रह गई है. कोई मानवाधिकारवादी संगठन इसके विरुद्ध खड़ा नजर नहीं आता. प्रकट-अप्रकट रूप में सभी ने बालक को माता-पिता की विशिष्ट परिसंपत्ति मान लिया है. यह एक चुनौती है. जिससे निपटने के लिए बालक की बेहतरी की सोचने, उसको समग्र मानवीय इकाई मानने वाले साहित्य, साहित्यकार एवं शिक्षा-मनीषियों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है.

© ओमप्रकाश कश्यप

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बालक और समाज

सामान्य

कोई भी समाज चाहे जितना उदार हो, वह हमेशा चाहता है कि भविष्य के नागरिक के रूप में बालक स्थापित मान्यताओं को समझे, उनका पालन करे. उसकी आचारसंहिता, रीतिरिवाजों को अपनाए तथा तयशुदा मर्यादाओं में रहकर व्यवहार करे. यह न तो अनुचित है न ही अस्वाभाविक. आखिर समाज किसी एक व्यक्ति या एक दिन की रचना तो नहीं! उसको बनने में सैकड़ों वर्ष लग जाते हैं. हजारों लोग उसकी विकासमान अवस्था को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार होते हैं. जबकि लाखोंकरोड़ों व्यक्ति उसकी आचारसंहिता जिसे प्रायः पंरपरा अथवा रीतिरिवाज कहा जाता है, से जुड़े हो सकते हैं. यह डर भी अन्यथा नहीं है कि समाज यदि अपने प्रत्येक नागरिक को तयशुदा नियमों, मर्यादाओं के पालन से छूट देने लगे तो उसका मूलभूत ढांचा ही चरमरा जाएगा. सभ्यता और संस्कृति के तब कोई मायने ही नहीं रहेंगे. बालक को यह छूट न दिए जाने के संबंध में एक तर्क यह भी हो सकता है कि उसे समाज के बारे में बहुतकुछ सीखनासमझना होता है. किसी परंपरा या रीतिरिवाज की अंतर्निहित विशेषताओं, उसकी खूबियोंखामियों को समझने के बाद ही उसकी आलोचनासमीक्षा करना न्यायसंगत माना जाता है. तदनुसार बालक से अपेक्षा होती है कि स्वयं को योग्य शिष्य दर्शाते हुए उससे जितना बन पड़े, गुरुसमाज से ग्रहण करे. समाज का दिया लौटाने को तो उम्र पड़ी है.

 

सुनने में यह बहुत तर्कसंगत और आदर्श प्रतीत होता है. समस्या यह है कि जिसे हम सीखना कहते हैं, वह स्थापित मान्यताओं, रीतिरिवाजों, विभिन्न ज्ञानशैलियों का बोध तथा उसके प्रति अनुकूलन है. औपचारिक शिक्षा का अधिकांश विद्यार्थी को समाज अथवा समाजों की सभ्यता, सांस्कृतिक विशेषताओं, उपलब्धियों से परचाने पर खर्च होता है, उसमें बालक के मौलिक विकास की बहुत कम संभावना होती है. प्रकट में हर समाज मौलिक ज्ञान को बढ़ावा देने की बात करता है. इसके निमित्त भारीभरकम तामझाम भी रचता है, मगर तब उसका आयोजन एकपक्षीय होता है. उसकी खास सुविधाएं अभिजनवर्ग से आगे बढ़ ही नहीं पातीं. निर्णायक पदों पर विराजित अभिजन समाज के बहुसंख्यक वर्ग को बहुत आसानी से छोटेछोटे गुटों में बांट देते हैं. इतने छोटे कि संख्याबल में कहीं अधिक होने के बाबजूद जनसाधारण स्वयं को शक्तिविहीन मान लेता है. यही विश्वास उसको समझौतावादी बनाए रखता है. निर्णायक पदों पर विराजमान अभिजन वर्ग समाज की कुल पूंजी एवं संसाधनों का उपयोग अपने वर्गीय हितों की पूर्ति हेतु करता है. बालक के संबंध में अभिजन मानसिकता, उसको भविष्य का अभिजन बनाने के प्रलोभन के बहाने, फिलहाल निर्णय प्रक्रिया से किनारे कर देने की होती है. पूंजी आधारित समाजों में जहां हर नई खोज पूंजीपति की तिजोरी को भरने के काम आती है, समाज, सभ्यता और संस्कृति के कमजोर पक्षों पर चर्चा या तो की नहीं जाती अथवा उसके मायने इस प्रकार बदल दिए जाते हैं कि अपनी सत्ता और पहुंच के अनुचित इस्तेमाल से अभिजन वर्ग द्वारा अर्जित वैभवसंपदा, मानसम्मान आदि उसका अधिकार मान लिए जाते हैं. अभिजन वर्ग की चालाकी से अनजान जनसमाज दुरवस्था को अपनी नियति मानने लगता है. यह आवश्यक नहीं कि जिस चालाकी को बड़े समझ न पाएं उसको बालक एकाएक समझ ले, लेकिन यदि अपनी प्रखर बुद्धिचेतना से सब कुछ देखता, महसूस करता हुआ कोई बालक उस अवस्था में यदि कोई प्रतिक्रिया दर्ज कराना चाहे तो उसे युवा होने; कम से कम उस उम्र तक इंतजार करना पड़ता है, जब उसके निर्णय को कानून के दायरे में परखा जा सके. तब तक वह परिवार तथा अन्यान्य जिम्मेदारियों में इतना गहरा फंस चुका होता है कि समझौते और समर्पण से अलावा कुछ सोच ही नहीं पाता.

 

ज्ञान की खोज एवं संवितरण के लिए स्वयं को समर्पित मानने वाले आकादमिक सदनों का ढांचा भी इससे अलग नहीं है. परीक्षा में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में छात्र यदि अपनी मर्जी से कुछ लिख आए तो उसे पास होने की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए. बालक को ज्ञानार्जन के लिए उत्सुक करने के बजाय वह उसके सोच एवं आचरण की दिशा निर्धारित करने पर जोर देता है. शिक्षा का काम हैबालक की चिंतनशक्ति को ऊर्जस्वित करना, न कि उसको विशिष्ट दायरों तक सीमित करना. इसके बावजूद बालक की रुचि के क्षेत्रों की पहचानकर अपनी उदारता का दम भरनेवाले समाज भी शिक्षा और संस्कार के माध्यम से तयशुदा व्यवस्था से अनुकूलन की सीख ही दे पाते हैं. बालक के आलोचनात्मक विवेक को उभारने की कोशिश की ही नहीं जाती. अपनी ओर से वह कुछ मौलिक करना चाहे तो डांटकर चुप करा दिया जाता है. हंसकर टाल देना समझदारी कही जाती है. यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि मनुष्य बाल्यावस्था से लेकर किशोरावस्था तक सर्वाधिक सचेतन, संवेदनशील, जिज्ञासु एवं मौलिक होता है. अपने आसपास के परिवेश को समझने की उसकी जिज्ञासा इस अवस्था में चरम पर होती है. उसका जितना उपयोग ज्ञानार्जन और ज्ञान की विभिन्न पद्धतियों को सिखाने, संवारने, बालमन की कमजोरियों को सामने लाने में किया जा सके, उतना ही लोकहित में है. अब इसे हम अतीत के प्रति अपना अतिरेकी सम्मोहन कहें अथवा नएपन को अपनाने का डर, जो परंपरा के माध्यम से प्राप्त सुविधाओं, उन सुविधाओं के छिन जाने के भय से जन्मते हैं, जो हमारी अपनी योग्यता, कौशल के बजाय विरासत में प्राप्त हुई हैं—हम बालक को स्थापित परंपराओं एवं संस्कृति के मानकों से जोड़े रखने में ही अपनी भलाई समझते हैं. मामूली विचलन पर हमारी धड़कनें बढ़ जाती हैं. यह भूल जाते हैं कि जीवन केवल सामाजिक, सांस्कृतिक मानकों द्वारा अनुशासित नहीं होता. वह समाज की भौतिक संपदा, उत्पादन तथा उपभोग से भी नियंत्रित होता है. बालक घर से बाहर जाता है तो परंपरा एवं संस्कृति उसके मनस् पर सवार होते हैं, जबकि भौतिक सुविधाएं तथा अन्य प्रलोभन आंखों के सामने. उनका आकर्षण इतना जबरदस्त होता है कि व्यक्ति अपने मनोभावों की उपेक्षा करके भी उनमें डूब जाना चाहता है. सामाजिकसांस्कृतिक संरक्षण और विकास के नाम पर दी गई शिक्षा वहां बहुत कारगर नहीं होती. स्वयं को सफलता की दौड़ में बनाए रखने के लिए बालक चीजों को पूरी तरह समझने के बजाय केवल उसका नाटक करने लगता है. आरंभिक सफलता बौद्धिकता के इस छदम् को उत्तरोत्तर विस्तार देती है. बाजार के प्रलोभन व्यक्ति और समूह दोनों पर लगभग एक जैसा प्रभाव डालते हैं. विभिन्न प्रकार के दबावों के बीच केवल सूचना समृद्ध होने को ज्ञानवान होना मान लिया जाता है. बालक के मौलिक सोच, समाज के संपर्क में आने पर जन्मी मौलिक उद्भावनाओं की अक्सर अनदेखी कर दी जाती है. इस तरह समाज के लगभग एकचौथाई सदस्य निर्णय प्रक्रिया से कट जाते हैं.

 

जिस प्रकार मातापिता संतान में अपना भविष्य देखते हैं, समाज भी नागरिकों में अपना भविष्य सुरक्षित रखने का सपना देखता है. लोकतांत्रिक समाजों में बालक को जन्म के साथ नागरिकता संबंधी अधिकार प्राप्त हो जाते हैं. इनमें अभिव्यक्ति का अधिकार भी सम्मिलित है. यहां एक अतिस्वाभाविक प्रश्न छोड़ा जा सकता है कि लोकतांत्रिक समाजों में जो अधिकार बड़ों को प्राप्त होते हैं, क्या उतने ही अधिकार बच्चों को भी प्राप्त होते हैं? इसका तात्कालिक उत्तर नकारात्मक होगा. खुलेपन का दावा करने वाले समाजों में भी बालक के कार्यकारी अधिकार बहुत सीमित होते हैं. उसकी वास्तविक अधिकारिता 18 वर्ष का होने तक प्रतीकात्मक ही रहती है. इसके पीछे तर्क प्रायः एक जैसे होते हैं. उस समय हम यह बिसार देते हैं कि हमने जानेअनजाने मौलिक ज्ञान की आमद के लिए सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण दरवाजे बंद कर दिए हैं. यह ठीक है कि बालक बौद्धिक विकास की आरंभिक अवस्था में होता है. वह दुनियादारी के मामलों में, विशेषकर उन मामलों में जिन्हें उसका समाज मान्यता देता है, उतनी जानकारी नहीं रखता जितनी सामान्यतः बड़े रखते हैं, परंतु यह भी सच है कि उम्र की आरंभिक अवस्था में वह सर्वाधिक मौलिक और नैतिक होता है. उचित यही है कि उसकी मौलिकता का लाभ उठाया जाए. अपने परिवेश के बारे में बालक जो सोचता, महसूस करना है, उसको अभिव्यक्त करने के लिए उत्साहित किया जाए. इसके रास्ते क्या हों, उनका निर्धारण समाज अपनी परिस्थितियों के अनुसार कर सकता है. यह संभव है कि उन अनेक मामलों में जिन्हें दुनियादारी कहा जाता है, बालक की जानकारी अत्यल्प हो, कुछ न हो तो भी यह प्रक्रिया बालक को अपने समाज और राष्ट्र के बारे में सोचने, उसको जोड़े रखने में मददगार सिद्ध होगी. उसके आत्मविश्वास और नागरिकबोध, जिसका इन दिनों बड़ों में भी अभाव है, आशानुकूल वृद्धि होगी. तदनंतर छिटपुट टिप्पणियों के रूप में भी उसकी ओर से ज्ञान की जो आमद होगी, वह अनूठी होगी. मगर बालक को तब तक उपेक्षित रखा जाता है, जब तक उसकी ज्ञानपिपासा दुनियादारी के रंग में रंगकर मंद नहीं पड़ जाती.

 

बालक का जीवन अनुशासित हो इसके लिए जिम्मेदार परिवार एवं समाज मानवव्यवहार को संस्कृति एवं परंपराओं के अनुरूप बनाए रखने पर जोर देते हैं. ताकि इन संस्थाओं का स्थापित ढांचा क्षतिहीन बना रहे. उसमें किसी प्रकार का विकार उत्पन्न न हो. लेकिन जिन मूल्यों को आधार बनाकर बालक से संस्कृति एवं परंपराओं से जुड़े रहने का आग्रह किया जाता है, उनका किताबी आकर्षण यथार्थ के आगे बगलें झांकता नजर आता है. स्कूल में जब बालक को पता चलता है कि उसकी शिक्षा के लिए मातापिता को मोटी रकम का भुगतान करना पड़ा है….जिन बच्चों के मातापिता भुगतान करने में असमर्थ थे, वे बच्चे पाठशाला नहीं आ पाए हैं, अथवा जब वह घर आए कथावाचक को कर्मकांड के बीचबीच में दान के लिए आग्रह करते, दक्षिणा के वजन से पूजा का स्वरूप तय होते देखता है. फिर जब वह देखता है कि उसका एक निबुर्द्धि पड़ोसी केवल अपनी शानदार कोठी, बड़ी गाड़ी के कारण समाज में प्रतिष्ठित है. पुनः जब वह पाता है कि कोरा ज्ञानार्जन उसकी शिक्षा का अभीष्ठ नहीं है. मातापिता उसको डाॅक्टर, इंजीनियर या बड़ा अधिकारी बनाना चाहते हैं, जिसके लिए पढ़ाई जरूरी है; यानी ज्ञान का उसका आयोजन ज्ञान के लिए न होकर दूसरों से स्पर्धा में आगे बने रहने के लिए है. और जब वह पाता है कि किताबों में पढ़ी नैतिकता भरी बातें व्यवहार में कोई मायने नहीं रखतीं, तब पुस्तकों से उसका जी उचटने लगता है. जिज्ञासावृत्ति कमजोर पड़ जाती है. परीक्षा में किसी भी तरह अधिक से अधिक अंक लाना उसका लक्ष्य बन जाता है. प्रकारांतर में स्कूल स्पर्धा का मैदान बन जाता है, पढ़ाई महज औपचारिकता. ज्ञान और ज्ञानार्जन के अतिरिक्त बालक ऐसे वैकल्पिक और आसान मार्गों की खोज में जुट जाता है, जो उसको स्पर्धा में बनाए रख सकें. चूंकि वह स्वयं को अपने ही जैसे युवाओं से घिरा हुआ पाता है, जो स्वयं स्पर्धा में आगे निकलने को आतुर हैं. स्पर्धा धीरेधीरे प्रतिद्विंद्वता में ढलने लगती है. सामाजिकसांस्कृतिक मूल्यों, परंपराओं के प्रति उसका विश्वास कमजोर पड़ने लगता है. व्यक्ति सहयोगपूर्ण परिवेश में पूरा जीवन बिता सकता है, स्पर्धा के बीच वह अधिक लंबा नहीं चल पाता. आधाअधूरा ज्ञान मन में आत्महीनता की स्थिति को जन्म देता है. धीरेधीरे वह परिवार, पड़ोसी और मित्रसंबंधियों के प्रति संदेह करने लगता है. उनसे निपटने के लिए विकल्पों की तलाश करता है. परिणामस्वरूप ज्ञान की मौलिक साधना से उसका विश्वास उठ जाता है. शिक्षा के मायने केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित रह जाते हैं. उस अवस्था में धनार्जन की ललक सामाजिकसांस्कृतिक उपादानों पर भारी पड़ने लगती है. बालक उसी को अपना लक्ष्य मान लेता है.

 

किशोरावस्था के दौरान बालक में स्पर्धा की भावना जन्म ले लेती है. उसकी शुरुआत परिवार से होती है. पुत्र परिवार में स्वयं को पिता का उत्तराधिकारी मानने लगता है. वह चाहता है कि बड़े उसके निर्णय का सम्मान करें. लेकिन यदि उसको लगे कि बड़ों की निगाह में उसके निर्णय का कोई मूल्य नहीं है. तब उसे ठेस पहुंचती है. उस समय उसके सामने केवल दो रास्ते होते हैं. या तो वह बड़ों के निर्णय का सम्मान करते हुए अपने सोच और इच्छाओं को सीमित रखे तथा वयस्क होने तक बड़ों के मामलों में राय देने में संयम बरते. दूसरा यह कि किसी की भी परवाह न कर वह मनमानी करे. वही करे, जिसे उचित मानता है. अधिकांश मामलों में पहली स्थिति से समझौता कर लिया जाता है. लेकिन यदि वह अपने लिए दूसरा रास्ता अपनाता है तब समाज में विक्षोभ पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है. सर्वकुशल जैसे हालात पहली स्थिति में भी नहीं होते. इसलिए कि सर्वाधिक सक्रिय और जागरूक मानसिक अवस्था में दूसरों के निर्णय पर अवलंबित बालक धीरेधीरे अपना निर्णय सामर्थ्य खोने लगता है. सामाजिकसांस्कृतिक एकता और समरस विकास के लिए हितकर तो यही है कि बालक समाज, संस्कृति एवं परंपरा के आधार पर बने संबंधों को प्राथमिक एवं उत्पादन, उपभोग, विपणन आदि के आधार पर निर्मित संबंधों को द्वितीयक माने. मगर मौलिक सोच, आत्मविश्वास की कमी के कारण ऐसा अक्सर नहीं हो पाता. इससे प्राथमिकताओं की अदलाबदली होने लगती है तथा व्यक्ति वैयक्तिता को बढ़ावा देने वाले प्रलोलनों का शिकार हो जाता है.

 

अकादमिक शिक्षा प्राचीन एवं आधुनिक सभ्यता के अंतर को केवल समाज की भौतिक प्रगति तक सीमित कर देती है. बालक को यह तो बताया जाता है कि मानवसभ्यता के दसबारह हजार वर्षों में मनुष्य की भौतिक उपलब्धियां क्या हैं, इस बीच विकास की कितनी लंबी यात्रा उसने तय की है. पर दो लाख वर्ष पहले से लेकर बारह हजार वर्ष पहले तक; यानी जब सभ्यता की नईनई शुरुआत हुई थी, उत्तरजीविता के लिए मनुष्य के आदि वंशजों को प्रकृति के साथ कितने संघर्ष करने पड़े होंगे? यह जानकारी उसको या तो दी नहीं जाती या उसे एकदो वाक्यों में समेट दिया जाता है. भविष्य को लेकर भी हमारे समस्त आकलन तकनीक और प्रौद्योगिकीय विकास पर केंद्रित होते हैं. तदनुसार हम पचाससौ वर्ष बाद जिन नए उपकरणों के आविष्कार की संभावना है, का अनुमान तो आसानी से लगा लेते हैं. लेकिन इतनी अवधि में समाज, संस्कृति और परंपराओं में क्या बदलाव हो सकते हैं, या होने चाहिए इसे लेकर गंभीर विमर्श न केवल बालक बल्कि बड़ों के स्तर पर भी नदारद होता है. हम यह माने रहते हैं कि संस्कृति जड़ अवधारणा है. उसका जो स्वरूप आज है वही आगे पचाससौ वर्ष बाद भी बना रहेगा. संस्कृति और परंपराओं के वे प्रतीक जो समाज की एकजुटता के लिए जिम्मेदार कहे जा सकते हैं, जिनके आधार पर समाज संगठित होता आया है, क्या वे आगे भी इसी तरह बने रहेंगे? यदि नहीं तो उनका वैकल्पिक रूप क्या हो सकता है, इसपर हम चुप्पी साधे रखते हैं.

 

जवाब में कहा जा सकता है कि ये शिक्षा के ऐसे क्षेत्र हैं, जहां मनुष्य आज भी बहुत कम जान पाया है. उसका जितना भी ज्ञान है, वह अनुमानाधारित है. उसको प्रमाणिक सिद्ध करने के लिए उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्य बहुत कम या अपर्याप्त हैं. यह सच भी है. तब शिक्षा का एक दायित्व यह भी है कि बालक को उन क्षेत्रों की जानकारी भी दी जाए जहां, मनुष्यता की ज्ञानोपलब्धियां अत्यल्प अथवा नगण्य हैं. सुकरात का अपने बारे में यह कहना, ‘मुझे अपने अज्ञान का ज्ञान है’ इस संबंध में प्रेरक हो सकता है. दूसरे शिक्षा का काम केवल यह नहीं होता कि वह अपनी खोजों, उपलब्धियों और प्रगति से बालक को परचाए, उसका यह कर्तव्य भी होना चाहिए कि वह ज्ञान के अंधकूपों की ओर इशारा करते हुए बालक को उसकी निष्पत्ति के लिए प्रवृत्त करे. उसकी प्रश्नाकुलता को विस्तार दे. बालक अपने और समाज के अज्ञान के बारे में भी जाने, यह व्यवस्था भी किसी न किसी रूप में होनी चाहिए. इसका अभाव संस्कृति और भौतिक प्रगति के बीच लंबी संवादहीनता के रूप में सामने आता है.

 

भौतिक सुखसुविधाओं के साथ असुरक्षा एवं अस्थायित्व की भावना गहरे तक जुड़ी होती है, इसलिए सुरक्षा और स्थायित्व की चाहत में व्यक्ति समाज और संस्कृति से जुड़ा रहना चाहता है. जो स्वयं परिवर्तन की परंपरा से कटे हुए होते हैं. ज्ञान की मौलिक साधना से कटे समाज आत्मविश्वास की कमी के शिकार होते हैं. वे पूंजीवादी हमलों को झेल पाने में असमर्थ होते हैं. इसलिए वे या तो उसके आकर्षण में बहने लगते हैं अथवा उसको अपने लिए हानिकारक मानकर उससे किनारा कर लेते हैं. कई बार ऊहापोह और असमंजस की स्थिति बन जाती है. ऐसे हालात में समाज में यदि बदलाव आता भी है तो मात्र नवीन प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग को लेकर. वे इसी से संतुष्ट होकर बाजार के हाथों का खिलौना बने रहते हैं.

 

इस समस्या का समाधान क्या हो? संस्कृति की गतिशीलता को बनाकर कैसे रखा जाए? बालक की कोमलता, निश्छलता, नैतिकता और सहृदयता का लोकहित में लाभ कैसे उठाया जाए? क्या कोई ऐसा रास्ता भी संभव है जिसपर चलकर संस्कृति और सभ्यता की गतिशीलता के अंतर को पाटा जा सकता है? ऐसा कैसे संभव हो कि संस्कृति सभ्यता की अनुगामी न होकर सहगामी बन जाए! परिवर्तनप्रवाह अकल्पित और आकस्मिक न होकर आकल्पित हो! इसके लिए आवश्यक है कि बालक अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त रहे. उसके मन में डर और अकेलेपन जैसे मनोभाव पनपने न पाएं. शिक्षा व्यक्तित्व निर्माण और बौद्धिक उठान दोनों को एकसमान, एक साथ महत्त्व दे. ज्ञानार्जन आस्थावादी दुराग्रहों से पूरी तरह मुक्त हो. बालक की परवरिश विश्व नागरिक की तरह हो. ‘ज्ञान सत्य है और सत्य आत्मा की आवश्यकता’— आइंस्टाइन के ये शब्द उसके मनमस्तिष्क में उतर जाने चाहिए. लेकिन ज्ञानवान होने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति विशिष्टताबोध का शिकार होकर रह जाए. खुद को बाकी लोगों से ऊपर समझने लगे और केवल अपनी सुखसुविधाओं को जीवन की सिद्धि मान बैठे. उसको जानना चाहिए कि अकेले व्यक्ति का न तो कोई वर्तमान है, न भविष्य. अहंकार हो या प्रेम, सौहार्द हो अथवा ईर्ष्या, मनुष्य को अपने मनोभावों के प्रदर्शन के लिए दूसरों की जरूरत पड़ती ही है.

 

मनुष्य ने अभी तक जो अर्जित किया है, वह उन महापुरुषों की देन है जो लोकहित को व्यक्तिसुख से बड़ा मानते थे. मानवजीवन की सुखमय बनाने के लिए जिन्होंने अपने सुख, सम्मान की कभी परवाह न की, बल्कि अक्सर उसकी उपेक्षा ही करते रहे. अतः जरूरी है कि ज्ञान का आयोजन, प्रदर्शन सर्वकल्याण के लिए हो. बगैर समानताबोध के यह संभव नहीं. इसलिए बालक को समझाया जाना चाहिए कि, ‘सब आंखें मनुष्य के विचारों तक पहुंचने के द्वार हैं….न तो मनुष्य जाति का अधिकांश भाग अपनी पीठ पर काठियां कसबा कर उत्पन्न हुआ है; और न कुछ थोड़े से विशेषाधिकार प्राप्त लोग ईश्वर की दया से बूट पहने और एड़ लगाए ही उत्पन्न हुए हैं कि वे उन लोगों पर तुरंत सवारी गांठ सकें.’ (थामस जैफर्सन). सत्ता का चरित्र सदैव अल्पसंख्यकवादी होता है. उसपर विराजमान लोग सदैव इस प्रयत्न में रहते हैं कि शिखर पर कम से कम लोगों की भागीदारी रहे. सत्ता के चरित्र को बालक उससे अनुकूलन करके नहीं सीख सकता. यह तभी संभव है, जब उसमें पर्याप्त आलोचनाविवेक हो.

 

बालक के संपूर्ण विकास के लिए आवश्यक है कि समाज उसके मौलिक विकास को बढ़ावा दे. उसमें समाज को समझने और बरतने की योग्यता स्वतः विकसित होने दे. ताकि वह अवसर पड़ने पर वह उनपर उठने सवालों पर तार्किक प्रतिक्रिया दे सके. उसे उसकी सीमाओं और क्षमताओं से साथसाथ परिचित कराए. उनका अधिकतम इस्तेमाल करने की प्रेरणा दे. बालक समाज एवं संस्कृति की उपयोगिता पर उठनेवाले प्रश्नों का उत्तर देने में स्वयं को असमर्थ पाता है या उस समय अपने भीतर ग्लानि, आत्मविश्वास की कमी या कुंठा का अनुभव करता है, तो वह द्वितीयक संबंधों को ही प्राथमिक समझने लगेगा. जैसा कि इन दिनों हो रहा है. इसलिए उसे समझाए कि उसकी तरह समाज भी विकासमान अवस्था में है. सभ्यता, संस्कृति या परंपराओं का कोई भी विधान ऐसा नहीं जिसकी समीक्षा न हो सके. सोच को पूर्वाग्रहमुक्त रखने के लिए उसको समझाया जाए कि धर्म एक कुटिल राजनीति है, जिसमें सत्ता का हासिल करने का सपना अगले जन्म तक टाल दिया जाता है. यह भी कि नैतिकता धर्म की चेरी नहीं है. वह मानवता का लक्ष्य है. धर्म तो उसका लक्षण मात्र है.

 

उपयुक्त अवसर पर बालक को यह भी बताएं कि धरती पर कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जो मनुष्य के लिए निषिद्ध हो. मगर उसका यह अधिकार दूसरों के अधिकार की सुरक्षा में ही संभव है. हम यदि कोई वृक्ष लगाते हैं, तभी हमें फल खाने का अधिकार है. दूसरों के श्रम पर जीना, किसी भी तरह परावलंबी होना मानवी गरिमा के प्रतिकूल है. बालक जब खुद को समझ लेगा तो समाज को भी समझ लेगा. तब उसकी प्रतिक्रिया सकारात्मक होगी. तभी वह अपने विवेक का अधिकतम उपयोग कर सकेगा. समाज आज जिस प्रकार भय, कुंठा, नैराश्य, हताशा, नकारात्मक सोच तथा सांस्कृतिक अपसंस्करण से त्रस्त है, उसके निदान का रास्ता भी स्वतः खुलता जाएगा. लेकिन बालक की शिक्षा अकेले उसका विषय नहीं है. वह हम बड़ों से भी जुड़ा है. इसलिए जो हम बालक से चाहते हैं, जिस रूप में उसको ढालना चाहते हैं, भविष्य में जिस तरह के समाज की कल्पना करते हैं, उसके लिए क्या हम स्वयं तैयार हैं? यही वह पहेली है, जिसमें बालक और समाज दोनों का भविष्य छिपा है. जिसके रहस्य को बूझना आज के समाजविज्ञानियों और शिक्षाशास्त्रियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

 © ओमप्रकाश कश्यप