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ओबीसी साहित्य : सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध मोर्चा

सामान्य
मिलावट बुरी बात है. ज्ञान की खूबी है कि वह हर मिलावट का पर्दाफाश कर देता है. इसलिए इस देश में ज्ञानी को हमेशा सिर-माथे लिया गया है. सैंकड़ों ग्रंथ उनके अवदान और प्रशस्तियों से भरे पड़े हैं. बावजूद इसके ज्ञान ही है, जिसमें सर्वाधिक मिलावट पाई जाती है. धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, क्षेत्रीयता और राष्ट्रवाद के नाम पर कुछ ज्ञानियों ने इस क्षेत्र में इतना घोटाला किया है कि झूठ और सच का पता लगाना चुनौती बन जाता है. खासकर उसके लिए जो ज्ञान पर मानव-मात्र के अधिकार का समर्थक है; तथा उसे मनुष्यता के हक में इस्तेमाल करना चाहता है.

लेख का शीर्षक सैकड़ों सवाल उठाने वाला है. प्रतिक्रियावादियों के लिए एक और मौकाᅳ‘अरे! दलित साहित्य तो था ही, अब ओबीसी साहित्य भी! आखिर क्यों? कौन हैं ये लोग जो देश और समाज को बांटने पर तुले हैं! उन्हें पता होना चाहिए कि साहित्य और साहित्यकार की कोई जाति नहीं होती! संपूर्ण मनुष्यता उनकी जद में होती है! उसपर ये सिरफिरे हैं कि साहित्य को बांटने की जिद ठाने हैं. जातिवाद फैला रहे हैं! छिः!! ये प्रतिक्रियाएं उनकी होंगी जो वर्षों से जाति की मलाई मारते आए हैं. जिन्हें सुधार के नाम से ही चिढ़ है. जातिवाद जिनकी रग-रग में भरा है. उसपर पर्दा डालने के लिए कभी धर्म का सहारा लेते हैं, कभी राष्ट्रवाद का. जो खुद को दूसरों से बहुत-बहुत ऊपर मानते हैं. जिनके मन में समाज को हजार-दो हजार वर्ष पीछे ले जाने का षड्यंत्र हमेशा चलता रहता है. उसके लिए उन्हें चाहे जो करना पड़े. संयोग से इन दिनों माहौल उनके अनुकूल है. इसलिए इस बार उनके तेवर कुछ अलग हो सकते हैं.

आलोचना पूरी तरह हवा में हो यह बात भी नहीं है. ठीक है, ओबीसी में समाजार्थिक रूप से पिछड़ी जातियां आती हैं. यह भी कि देश में उनका कोई एक स्वरूप नहीं है. उनकी सूची प्रदेशानुसार बदलती रहती है. सरकारी योजनाओं की बात अलग है, परंतु साहित्य में जिसका रूप ही समावेशी होता हैᅳयह कैसे माना जा सकता है कि किसी एक प्रदेश में जाति-विशेष के साहित्यकार को ओबीसी की श्रेणी में लिया जाए और दूसरे प्रदेश में उसी जाति के साहित्यकार को छोड़ दिया जाए? अगर ऐसा हुआ तो जाति का प्रश्न और गहराएगा. उस समय साहित्य के नाम पर जातिवाद फैलाने के आरोप से कैसे बच पाएंगे? विशेषकर तब जब जातिवाद के विरुद्ध जंग, साहित्य और साहित्यकार दोनों का पहला संकल्प हो. लेकिन प्रदेशवार जातियों के बदलने की समस्या तो दलित साहित्य के साथ भी है. वहां इस तरह के सवाल नहीं उठते. क्यों? इसलिए कि ‘दलित साहित्य’ जाति के बजाय उपेक्षा और उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों की बात करता है. वर्ग के रूप में ही वह करोड़ों लोगों की अस्मिता और अधिकारों के संघर्ष को विमर्श के केंद्र में ले लाता है. ‘ओबीसी’ स्वयं एक वर्ग है. लेकिन इस वर्ग में आने वाले लोगों के जातीय पूर्वाग्रह इतने प्रबल रहे हैं कि खुद को वर्ग के रूप में देखने की प्रवृत्ति बन ही नहीं पाई. जबकि वर्ग-भेद का दंश पिछड़ों ने उतना ही झेला है, जितना दलितों ने. ब्राह्मण ग्रंथों में जो प्रतिबंध अंतज्यों पर लगाए गए हैं, लगभग वही शूद्र के लिए भी हैं. केवल पेशे के कारण दोनों में वर्ग-भेद पैदा किया गया है.

ओबीसी सरकार द्वारा घोषित श्रेणी है. इस शब्द में वैसी कशिश नहीं है, जैसी इसके समानधर्मा ‘दलित’ में है. ‘दलित’ संबोधन के साथ-साथ दमित तथा दमनकारी जातियों, वर्गों की याद बरबस आ जाती है. तब क्या ओबीसी साहित्य का विचार छोड़ देना चाहिए? परंतु यह तो देश की आधी से अधिक जनता के हितों को लेकर विमर्श की जो संभावना बन रही है, उसपर पानी फेर देने जैसा काम होगा. काम इतना आसान भी नहीं है. चुनौती शून्य को सागर का विस्तार देने की है. सिर्फ साहित्यकारों द्वारा यह संभव नहीं. ‘ओबीसी साहित्य’ के विचार को सफल बनाना है तो उसके अंदर सम्मिलित जातियों में वैसी चेतना भी पैदा करनी होगी जिससे वे स्वयं को वर्ग के रूप में देख और महसूस कर सकें. यानी कुछ ऐसा हो कि ‘ओबीसी साहित्य’ का नाम आते ही वर्गीय शोषण, उत्पीड़न, दैन्य के साथ-साथ उनके कारणों तथा उन संघर्षों की तस्वीर भी आंखों में तैर जाए जो उन्होंने खुद को दैन्य और दुर्दशा से बाहर लाने हेतु किए हैं. न केवल उन लोगों की आंखों में जो जाने-अनजाने उनके पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार रहे हैं, बल्कि उन लोगों की आंखों में भी जो ‘पिछड़ेपन’ को अपना भूत-भविष्य-वर्तमान मानकर हिम्मत हार चुके हैं. अपनी तरह से साहित्य भी यह काम कर सकता है. करेगा ही. यही इस विमर्श का उद्देश्य है. परंतु इसके लिए उसे आंतरिक और बाह्यः चुनौतियों से साथ-साथ गुजरना पड़ेगा.

भारत में दलित आंदोलन की लंबी परंपरा है. पूरी संत-परंपरा एक तरह से उनका समर्थन करती है. उन आंदोलनों का संबंध सामाजिक आधार पर पिछड़े वर्गों में से भी था. लेकिन अशिक्षा और वर्गीय चेतना के अभाव में पिछड़े उनसे कम ही प्रभावित हुए. दोष पिछड़ी जातियों का भी है. उन्होंने स्वयं यह भुला दिया कि जिन्हें आज पिछड़ा माना जाता है, उन्होंने प्राचीनकाल में अनेकानेक अगड़े चिंतक इस देश और समाज को दिए हैं. रैक्व, पूर्ण कस्सप, मक्खलि गोशाल, सति, कौत्स, अजित केशकंबलि, महीदास, उपालि, महामोग्गलायन जैसे पिछड़े वर्ग के चिंतकों की लंबी शृंखला है. कमी ज्ञान को सहेजने तथा उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने वालों की रही. नतीजा यह हुआ है कि हम पुरावैदिक काल से बुद्धकाल तक के अनेक विचारकों के अवदान, यहां तक कि उनके नाम से भी अपरिचित हैं. सत्ता और धर्म के गठजोड़ ने उस ज्ञान को जो उनकी परंपरा और संस्कृति के प्रति विरोध दर्ज कराता था, हर तरह से मिटाने की कोशिश की है. उनका छिटपुट उल्लेख बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में है; जो स्वयं ब्राह्मण धर्म के विरोध में जन्मे थे. चूंकि उनके प्रवर्त्तक क्षत्रिय कुलोद्भव थे, इसलिए स्वयं ब्राह्मणों ने उनके दर्शन को सहेजने के लिए समर्पित कर दिया. इसके पीछे उनके वर्गीय स्वार्थ भी थे. ब्राह्मणों लेखकों ने बौद्ध धर्म के तेज को कम करने, उसका ब्राह्मणीकरण करने का षड्यंत्र किया. ‘दीघनिकाय’ में बुद्ध जादू-टोने, सम्मोहन आदि का विरोध करते हैं. परंतु उत्तरवर्ती बौद्ध-ग्रंथों में वे स्वयं जादू-टोना करते दिखाई पड़ते हैं. षड्यंत्र के चलते ही बुद्ध को विष्णु के अवतारों में जगह दी गई.

वर्गीय चेतना के अभाव में पिछड़ों ने दलितों के साथ ठीक वही व्यवहार किया जैसा सवर्ण उनके साथ करते आए थे. इसका नुकसान दलितों को कम, पिछड़ों को अधिक हुआ. परिवर्तन के दौर में दलित बहुत जल्दी यह समझ गए कि उनके उद्धार के लिए कोई मसीहा आसमान से उतरने वाला नहीं है. ‘अप्प दीपो भव’ᅳकी भावना के अनुरूप उन्होंने ठान लिया कि जो करना है, स्वयं करना होगा. दासता ग्रंथि से ग्रसित पिछड़े देर तक अगड़ों से उम्मीद पाले रहे. बहुसंख्यक होने के बावजूद उन्होंने अपनी शक्तियां जातीय मतभेदों में फंसकर गंवा दीं. ओबीसी साहित्य को विमर्श का विषय बनाते समय सबसे पहली चुनौती लेखकों, साहित्यकारों और पाठकों के मन में यह विश्वास जगाने की होगी कि ‘ओबीसी’ केवल जातीय समूह न होकर एक वर्ग है. उन शिल्पकारों, कर्मकारों और मेहनतकशों का वर्ग जिसने अपने श्रम-कौशल द्वारा शुरू से आजतक मानवीय सभ्यता को संवारने का काम किया है. इसके लिए उन्हें अपने  सुख और सम्मान दोनों की बलि चढ़ानी पड़ी है. ब्राह्मणवाद के जितने शिकार वे हैं, उनसे कहीं अधिक दुख-दर्द दलितों को झेलना पड़ा है, इसलिए जाति और वर्चस्ववाद के विरुद्ध संघर्ष में दलित उनके वास्तविक सहयोगी हैं.

 पूंजीवाद की आलोचना में प्रायः कहा जाता है कि वह श्रमिक से उसके श्रम और शिल्पकार से शिल्पकर्म के मूल्य-निर्धारण का काम छीन लेता है. अपनी ओर से उसकी न्यूनतम कीमत तय कर, मजदूरों और शिल्पकर्मियों का शोषण करता है. उस समय मान लिया जाता है कि शिल्पकारों और श्रमिकों का शोषण आधुनिक या उदार अर्थव्यवस्था की देन है. जबकि प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था में अल्प ही सही, इन वर्गों को अपने श्रम के मूल्य को लेकर मोल-भाव करने के अधिकार रहता है. देर-सवेर विकल्प भी मौजूद होते हैं. अन्याय के विरोध में न्यायालयों और अदालतों का दरवाजा खटखटाया जा सकता है. भारतीय संदर्भ में श्रमिक से उसके श्रम के मूल्यांकन का अधिकार छीन लेना केवल, पूंजीवाद की करतूत नहीं है. यहां यह काम बहुत पहले श्रम-विभाजन के नाम पर जातिप्रथा के माध्यम से शुरू हो चुका था. विराट पुरुष का रूपक अपने आप में इसका गवाह है. वह शारीरिक श्रम की तुलना में बौद्धिक श्रम को वरीयता देता है. रूपक के माध्यम से बताया यह जाता है कि शिखर पर मौजूद लोग अपने ज्ञानानुभव का उपयोग लोक-कल्याण के लिए करेंगे. लगभग ऐसी ही कामना है, जैसी प्लेटो ने दार्शनिक राज्य के रूप में ‘रिपब्लिक’ में की थी. वहां अरस्तु जैसा जागरूक विद्धान था. वह नैतिकता को श्रेष्ठ शासन की अनिवार्य शर्त मानता था. इसलिए अपने गुरु के प्रति संपूर्ण मान-सम्मान के बावजूद उसने दार्शनिक राज्य के सुझाव को अव्यावहारिक मानकर नकार दिया था. भारतीय मनीषियों को अपनी दर्शन-परंपरा पर गर्व रहा है. परंतु यहां दर्शन को या तो पुस्तकों तक सीमित रखा गया, अथवा वानप्रस्थी आश्रम के लिए छोड़ दिया. बाकी सब जगह धर्म ही हावी रहा है. यहां जो बौद्धिक सत्ता थी, असल में वह धर्मसत्ता ही थी. निहित स्वार्थ के लिए यहां आस्था पर जोर दिया गया. परिणामस्वरूप धर्म की आलोचना करना, उसके ऊपर सवाल खड़े करना असंभव-सा हो गया. जिन लोगों ने ऐसा करने की कोशिश की, उन्हें शूद्र और धर्म-विरोधी कहकर नकार दिया गया. चुनौती के अभाव में शिखरस्थ ब्राह्मण अपने बुद्धि-विवेक का उपयोग केवल स्वार्थ-सिद्धि हेतु करने लगे. इसके लिए उन्होंने हर कानून, हर सिद्धांत की मनमानी व्याख्याएं कीं; यहां तक कि अपने ही रचे शास्त्रों को खूब तोड़ा-मरोड़ा. पुरोहितों का जनता पर प्रभाव था. वे जनता को कभी भी राज्य के विरुद्ध उकसा सकते थे. इसलिए राजाओं की हिम्मत न थी कि उनका विरोध कर सकें.

जनता पर पकड़ के चलते पुरोहित वर्ग को प्रसन्न रखना राजा के लिए जरूरी हो गया. इसका अंदाज उसे मिलने वाले वेतन और दूसरी सुविधाओं से लगाया जा सकता है. पुरोहितों और ब्राह्मणों को गांव के गांव दान में देने की परंपरा थी. मौर्य शासन के दौरान उसे राज्य के खजाने से सेनापति और अमात्य के बराबर 48000 पण मासिक वेतन मिलता था. जबकि कुशल शिल्पकार का मासिक वेतन मात्र 120 पण था. इससे उस कालखंड में शिल्पकारों जिन्हें वर्ण-व्यवस्था के अनुसार शूद्रों में स्थान मिला हैᅳकी दुर्दशा का अनुमान लगाया जाता है. यह तब है जब राज्य की आर्थिक समृद्धि का भार पूरी तरह से श्रमिकों और शिल्पकारों के कंधों पर था. जाहिर है शारीरिक श्रम की अनदेखी करना या उसे बौद्धिक श्रम से कमतर आंकना प्राचीनकाल से ही आरंभ हो चुका था. चाणक्य के अर्थशास्त्र और मनुस्मृति में इस बात की व्यवस्था की गई थी कि वर्ण-व्यवस्था में सबसे निचले स्तर पर रखे गए लोग कभी आर्थिक रूप से स्वावलंबी न होने पाएं. यदि वे आर्थिक स्तर पर आत्मनिर्भर हो जाएंगे तो ब्राह्मणों और क्षत्रियों के लिए भोजन या नाम मात्र की वृत्तिका पर रात-दिन मेहनत करने वाले लगभग मुफ्त के सेवक कहां से आएंगे! मनुस्मृति तो ब्राह्मणों को यहां तक अधिकार देती है कि वे शूद्र के पास धन इकट्ठा न होने दे. यदि किसी तरह से शूद्र धन अर्जित कर ले तो ब्राह्मण को यह अधिकार दिया गया था कि उसपर बलात् कब्जा कर ले. इसके लिए अर्थशास्त्र में ब्राह्मणों और क्षत्रियों को परस्पर मिलकर काम करने की सलाह दी गई. कहा गया कि दोनों के हित परस्पर जुड़े हैंᅳ‘ब्राह्मण की सहायता के बिना क्षत्रिय आगे नहीं बढ़ता और क्षत्रिय की मदद के बगैर ब्राह्मण की उन्नति असंभव है. दोनों मिल-जुलकर रहें तभी लोक-परलोक में सुख प्राप्त कर सकते हैं’(नाऽब्रह्म क्षत्रमृध्नोति नाऽक्षत्रं ब्रह्मवर्धते. ब्रह्मक्षत्रं च संप्रक्तंमिह चामुत्र वर्धतेमनुस्मृति 9/322). शिखर पर बने रहने के लिए एक दूसरे को समर्थन देने, पारस्परिक हितों की रक्षा करने की नीति आगे चलकर मिथ का रूप ले लेती है. जिसमें तीन प्रमुख देवता इस तरह एक-दूसरे महिमा-मंडन करते रहते हैं कि व्यक्ति भ्रम से बाहर आ ही नहीं पाता. इसी तरह स्वार्थ के आधार पर संगठित तीन शीर्षस्थ वर्ग असंगठित जनसमाज को परस्पर उलझाए रखते हैं.

ब्राह्मण ग्रंथों में शूद्र को विपन्न बनाने, उन्हें आर्थिक-सामाजिक रूप से पराश्रित बनाए रखने की अचूक प्रावधान किए गए हैं. लेकिन आवश्यकतानुसार इस नियम में संशोधन भी होता रहा है. कौटिल्य पूर्व भारत में ब्राह्मण ग्रंथ शूद्रों को शस्त्र उठाने की अनुमति नहीं देते. माना जाता था कि ब्राह्मण सर्वाधिक तेजवंत होता है. तेज की प्रधानता के अनुसार सेना में शूद्र के बजाय वैश्य को, वैश्य के बजाय क्षत्रिय को और क्षत्रिय के बजाय ब्राह्मण को भर्ती किया जाना चाहिए(अर्थशास्त्र, 9/2/21). चाणक्य का यह सोच अपने पूर्ववर्ती ब्राह्मण आचार्यों जैसा ही था. परंतु परिस्थितियां उसके साथ नहीं थीं. मौर्यकाल में देश पर यवनों के आक्रमण होने लगे थे. अकेले क्षत्रियों से जिनकी अधिकांश ऊर्जा और शक्ति आपस के युद्धों में क्षीण होती रहती थी, देश की सुरक्षा असंभव थी. पुरोहिताई करते-करते ब्राह्मण सत्ता-सुख के अभ्यस्त होने लगे थे. चुनौतियों के बीच शूद्र के युद्ध में भाग लेने संबंधी नियम में संशोधन आवश्यक हो जाता है. ब्राह्मण को युद्ध क्षेत्र से दूर रखने के लिए कौटिल्य अजीब-सा तर्क देता है, जिसे पढ़कर हंसी आने लगती है. उसके अनुसार ब्राह्मण स्वाभावतः उदार होता है, इसलिए ‘शत्रु दंडवत कर युद्धभूमि में उसे पटा लेगा.’(प्राणिप्रातेन ब्राह्मणबलं पराऽभिहारयेत, अर्थशास्त्र 9/2/23). परंपरा अनुमति देती तो कौटिल्य कदाचित कहता कि युद्ध करना ब्राह्मण का धर्म ही नहीं है. चूंकि वह पुरोहिताई में रम चुके ब्राह्मणों की कमजोरी से भली-भांति परिचित था, इसलिए बजाए ‘तेजवंत’ ब्राह्मणों के आपत्काल के नाम पर शूद्रों को सेना में भर्ती करने की छूट देता है. इसके लिए उसके तर्क चतुराई-भरे हैंᅳ‘विनयशील ब्राह्मणों की अपेक्षा क्षत्रियों की सेना श्रेयस्कर है. संख्याबल में अधिक होने के कारण वैश्य-शूद्रों को सेना में भर्ती किया जाना चाहिए’(प्रहरण विद्याविनीतं तु क्षत्रियबलं श्रेयः बहुलसारं वा वैश्यशूद्रबलंमिति, अर्थशास्त्र 9/2/24). वेदादि ग्रंथ ब्राह्मणों के युद्ध-प्रेम तथा युद्ध के दौरान उनके द्वारा बरती गई क्रूरता के उदाहरणों से भरे पड़े हैं. परशुराम जैसे ब्राह्मण का भी महिमामंडन है जिसके बारे में बताया गया है कि वह पृथ्वी को कही बार क्षत्रीय-विहीन कर चुका था. इन सब शौर्यगाथाओं(!) के बावजूद वह ब्राह्मणों को युद्ध क्षेत्र से दूर रखना चाहता है तो इसकी दो संभावनाएं हो सकती हैं. पहली, सत्ता-सुख में लिप्त, पुरोहिताई में रमे ब्राह्मण अपना युद्ध-कौशल गंवा चुके थे. दूसरी, उसे लगता था कि प्रशीक्षित यवन-सेना के मुकाबले ब्राह्मणों को खतरे में डालने से उचित था, शूद्रों को उनके आगे झोंक दिया जाए. कौटिल्य की ब्राह्मणों को युद्धक्षेत्र से दूर रखने की सलाह को ‘अर्थशास्त्र’ के पांचवे अध्याय की एक व्यवस्था से जोड़कर देखा जाए तो उसकी नीयत साफ नजर आने लगती है. उसमें वह राजा को सलाह देता हैᅳ‘कोष की कमी होने पर पाषंडसंघों(संभवतः बौद्ध संघों) के द्रव्य को, श्रोत्रिय के उपयोग में न आने वाले देवमंदिर के धन को एक जगह बटोरकर राजकोष में हथिया लेना चाहिए’(अर्थशास्त्र 5/2/38, मार्क्स और पिछड़े हुए समाज, डॉ. रामविलास शर्मा, पृष्ठ-195). आगे वह कहता है, ‘देवताध्यक्ष दुर्ग और राष्ट्र के धन के देवमंदिरों का धन एकत्रित करेगा फिर उनका अपहरण करेगा’(वही). वह जानता था कि ब्राह्मण देवमंदिरों और बौद्ध संघों में जमा धन के अपहरण हेतु एकाएक तैयार न होंगे. अतः ऐसे अलोकप्रिय कार्य के लिए वह शूद्रों और वैश्यों की सेना बनाने की सलाह देता है. ताकि ब्राह्मणों को क्षमा, धृतिशील और विनम्रता की प्रतिमूर्ति सिद्ध किया जा सके. कहने की आवश्यकता नहीं कि कौटिल्य द्वारा गढ़ी गई ब्राह्मणों की यह छवि आगे चलकर सत्ता से निकटता बनाए रखने में बहुत सहायक सिद्ध हुई.

कौटिल्य मजबूत केंद्र का समर्थक था. राज्य की मजबूती के लिए वह शूद्रों को सेना में भर्ती करने की छूट तक देता है. राजकोष में किसी प्रकार की कमी न हो, इसलिए धर्मालयों में आए चढ़ावे को राज-कल्याण के नाम पर उपयोग करने का नियम बनाता है. मनु वर्णाश्रम धर्म को लेकर इतना उदार नहीं था. शूद्रों और वैश्यों को लेकर जो डर कौटिल्य को था, मनु का डर उससे कहीं ज्यादा बड़ा था. डर यह कि यदि शूद्रों को युद्ध में जाने का अवसर मिला, तो युद्ध-कौशल में प्रवीण शूद्र अपने संख्याबल के आधार पर, क्षत्रियों और ब्राह्मणों के मुकाबले बड़ी आसानी से युद्ध जीत सकते हैं. इसलिए वह वर्णाश्रम व्यवस्था के कड़े नियम बनाकर समस्त संभावनाओं का पटाक्षेप कर देता है. इसका असर शताब्दियों तक रहता है.

उपर्युक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि शूद्रों ने मनु की व्यवस्था को ज्यों का त्यों मान लिया था और वर्णाश्रम व्यवस्था का कोई विरोध था ही नहीं. ब्राह्मण ग्रंथों में विरोध का कोई उल्लेख नहीं है. उन्हें पढ़कर लगता है कि शूद्रों उस व्यवस्था के प्रति पूर्णतः समर्पित थे और उनकी ओर से विरोध जैसी कोई बात न थी. वास्तविकता यह है कि उस समय भी समाज का बड़ा वर्ग ब्राह्मणवाद के प्रतिकार में खड़ा था. बल्कि यह कहना अथिक सार्थक होगा कि ब्राह्मण धर्म का प्रभाव सीमित लोगों तक था. ‘ब्रह्मजालसुत्त’ में बुद्ध ने अपने समकालीन 62 दार्शनिक सिद्धांतों के बारे में बताया है. उनमें कम से कम चार नास्तिक परंपरा के दर्शन हैं. दूसरी ओर जैन प्राकृत ग्रंथ ‘सूत्रकृतांगसुत्त’ के आधार पर बनाई गई सूची में 363 विभिन्न प्रकार के दार्शनिक संप्रदायों का उल्लेख है. उनमें 183 नास्तिक परंपरा के, 84 अक्रियावादी, 67 संशयवादी तथा 32 वैनायिकः(आजीवक) सम्मिलित हैं. बाकी 180 को क्रियावादी कहा गया है(अर्ली बुद्धिस्ट थ्योरी ऑफ नॉलिज, कुलित्स नंद जयतिलके, पृष्ठ 116). इससे सिद्ध होता है कि लोगों में श्रमण-परंपरा के दर्शनों पर ज्यादा विश्वास था. समाज का बड़ा वर्ग ब्राह्मणवादी विचारधारा की पकड़ से बाहर था. आगे चलकर लोकायत, चार्वाक, आजीवक, श्रमण, बौद्ध और जैन दर्शनों को मिली ख्याति इसी का परिणाम थी. ‘शांतिपर्व’(59/97) में पर्वतों और वनों में रहनेवाले निषादों और मलेच्छों का वर्णन है, जो तत्कालीन वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थकों के लिए चुनौती बने हुए थे. बेशम के अनुसार गंगातट के सभी प्रमुख नगरों में आजीवकों की बस्तियां थीं. आजीवक धर्म का प्रभाव समाज के सभी वर्गों, विशेषरूप से उन्नतिशील व्यापारी समुदाय के बीच था.’(बेशम, हिस्ट्री एंड डॉक्ट्रीन ऑफ आजीवक्स, पृष्ठ 133-134). पोलसपुरवासी सदलपुत्त नाम के एक कुम्हार का उल्लेख जैन ग्रंथों में मिलता है. वह 500 कुम्हार परिवारों का मुखिया था. उसके अधीन नावों का बेड़ा था, जो पूरी गंगा तट पर फैला हुआ था. जैन और बौद्ध ग्रंथों में कांपिल्यपुरवासी करोड़पति महाश्रेष्ठि कुंदकोल्यि का भी उल्लेख है. उसके पास अकूत स्वर्ण-संपदा और पशुधन था. वह आजीवकों का समर्थक था. इस तरह के और भी कई प्रमाण है जो दिखाते हैं कि ब्राह्मणधर्म के विकास के आरंभिक चरण में अधिकांश शूद्र अनीश्वरवाद में भरोसा रखते थे. कालांतर में उन्हीं का एक हिस्सा बौद्ध और जैन धर्मों की ओर आकृष्ट हुआ था.

‘पंचविश ब्राह्मण’ पूर्ववर्ती ब्राह्मण ग्रंथों में से है. उसके अनुसार शूद्र का जन्म उस समाज में हुआ जहां ईश्वर का अस्तित्व नहीं माना जाता था. वहां यज्ञ का आयोजन भी नहीं होता था. परंतु उनके पास बहुत-से मवेशी रहते थे.’(पंचविश ब्राह्मण 6,1,2). बेशम ने ऐसे कुंभकार परिवार का उल्लेख किया, जो मालिक की ज्यादतियों के विरोध में उठ खड़ा होता है. उन दिनों शूद्र कामगारों के विरोध का सबसे प्रचलित तरीका था, काम छोड़कर चले जाना. एक जातक के अनुसार लकड़कारों की एक बस्ती को काम करने के लिए पहले ही भुगतान कर दिया गया था. किसी कारणवश वह समय पर काम पूरा नहीं कर सका. जब उसपर बहुत ज्यादा दबाव डाला गया तो लकड़हारे ने अपने परिवार के साथ मिलकर चुपचाप एक नाव बनाई और पूरा परिवार रातों-रात बस्ती खाली कर वहां से कूंच कर गया. वे लोग गंगा नदी के साथ-साथ चलते हुए समुद्र तक पहुंचे. समुद्र के भीतर भी उस समय तक चलते रहे जब तक उन्हें उपजाऊ द्वीप नहीं मिल गया.(शूद्रों का प्राचीन इतिहास, रामशरण शर्मा, पृष्ठ 130). मनु ने बौद्धों तथा वर्णाश्रम व्यवस्था का विरोध करने वाले आजीवकों को वृषल (शूद्र) की संज्ञा दी है. बेशम के अनुसार वायुपुराण जो गुप्तकाल का ग्रंथ है, के आसपास आजीवकों को शूद्र मान लिया गया था. ग्रंथ इस बात की भी गवाही देते हैं कि ब्राह्मणों ने हर उस व्यक्ति या समुदाय के सदस्य को शूद्र मान लिया था, जो उनके धर्म तथा श्रेष्ठत्व को चुनौती देता था.

मनुष्य की स्वाभाविक कमजोरी कि वह केवल उन्हीं बातों को गंभीरता से लेता है जिनका सत्ता से निकट-संबंध हो. ब्राह्मणों को इसी का लाभ मिला. बुद्ध और महावीर भी भली-भांति समझते थे कि प्रजा अपने राजा का अनुसरण करती है. इसलिए अपने धर्म-दर्शन को लोकप्रिय बनाने के लिए उन्होंने सत्ता का भली-भांति इस्तेमाल किया. बुद्ध ने जाति-आधारित असमानता का विरोध किया था. लेकिन जाति और वर्ग संबंधी ऊंच-नीच, दासप्रथा से उन्हें बहुत अधिक शिकायत न थी. उनके सारे प्रवचन या तो किसी सम्राट की पहल पर होते थे अथवा श्रेष्ठि के उपवन में. अपने विशेषाधिकारों के साथ ब्राह्मण भी सदैव सत्ता के निकट बने रहे. जितना उनसे बन पड़ा, उन्होंने ब्राह्मणेत्तर वर्गों को सत्ता से दूर रखने की भरपूर कोशिश की. सीता की ‘अग्निपरीक्षा’ का उल्लेख रामायण में है. वर्षों पूर्व मध्यभारत के किसी ऐसे तालाब के बारे में कहीं पढ़ा था, जिसे नए ग्रंथों की परख के लिए इस्तेमाल किया जाता था. उसके लिए पांडुलिपि को बजाय उसके अध्ययन के ‘पवित्र तालाब’ के सुपुर्द कर दिया जाता था. जो पोथी डूब जाती, उसे व्यर्थ मान लिया जाता था. लेख में बताया गया था तैर न पाने के कारण लगभग पांच हजार पांडुलिपियां उस तालाब में समाई हुई थीं. बाद में तालाब को मिट्टी से पाटकर उन्हें हमेशा के लिए दफना दिया गया. यह पुरोहित वर्ग की मौलिक ज्ञान के प्रति असहिष्णुता का उदाहरण है. पुराणों और महाकाव्यों में उसने बातों का जो बबंडर खड़ा किया है, उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए हीगेल ने कहा थाᅳ

‘भारतीयों के पास राजाओं की कतार है, असंख्य देवी-देवता हैं, लेकिन उनमें से कोई भी संदेह से परे नहीं है.’

ब्राह्मणों ने अपने धर्म को सदैव ही राष्ट्र से बढ़कर माना है. कोई भी सम्राट जो प्रजा की दृष्टि में भले ही अनर्थकारी हो, यदि वह ब्राह्मणों के अधिकारों और हिंदुओं के बीच उनके शिखरत्व का समर्थन करता था, तो उन्हें उसकी सत्ता से कोई आपत्ति न थी. हिंदू समाज का मस्तिष्क कहे जाने वाले ब्राह्मणों की इस दुर्बलता का लाभ प्रायः सभी विदेशी आक्रांताओं ने उठाया. मुस्लिम आक्रामक केवल इस्लाम का परचम लहराने भारत आए थे. यह देश उन्हें इतना अधिक पसंद आया कि उन्होंने यहीं बसने का मन बना लिया. उस समय समाज का मस्तिष्क होने का दावा करने वाले ब्राह्मणों ने आक्रमणकारियों का मुकाबला करने के लिए देश को तैयार करने के बजाय अपने शीर्ष स्थान की सुरक्षा करना उचित समझा. औरंगजेब ने जब सख्ती बरती तो वे भड़क गए और पुनः देश की आत्मा को जगाने के बजाय ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों द्वारा बंगाल के राजा पर विजय का स्वागत किया. इसी अवसरवादी दृष्टिकोण के चलते वे लंबे समय तक भारतीय समाज के शिखर पर बने रहे. उनकी सत्ता को पहली चुनौती मैकाले की ओर से मिली. 1861 में सभी भारतीयों के लिए एक समान दंड संहिता बनाकर उसने ब्राह्मणों के शताब्दियों से चले आए रहे वर्चस्व का अंत कर दिया. इसीलिए मैकाले उनकी निगाहों में सबसे बड़ा खलनायक है.

अप्रासंगिक से लगने वाले इस विवेचन का उद्देश्य मात्र यह दर्शाना है कि ओबीसी साहित्य का मुख्य संघर्ष सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से बाहर आने का है. संस्कृति की लड़ाई राजनीतिक लड़ाई से बड़ी और महत्त्वपूर्ण है. आज देश में लोकतंत्र है. संख्याबल के आधार पर पिछड़े राजनीति में अगड़ों के लिए चुनौती बने हुए हैं. इसलिए वे तरह-तरह के प्रपंच रचकर लोगों को भरमाने में लगे रहते हैं. इसलिए यह समझना और समझाना बेहद जरूरी है कि बगैर सांस्कृतिक वर्चस्व से बाहर निकले सामाजिक परिवर्तन का लक्ष्य असंभव है. इन दिनों समाज में जातिबंधन शिथिल पड़े हैं. बावजूद इसके समाज में ऐसे लोगों की अच्छी-खासी संख्या है जो आज भी दो हजार वर्ष पुरानी मानसिकता में जीते हैं. जिन्हें मनु का वर्ण-विधान आदर्श लगता है. कुछ दबावों के चलते वे प्रकट में भले ही कुछ न कह पाएं, परंतु उनका सोच और हर प्रयास इस देश और समाज को हजार-दो-हजार वर्ष पीछे ले जाने के लिए होता है. चूंकि ऐसे लोग अपने मनसूबों को छिपाए रखने में माहिर हैं, इस कारण उनकी पहचान करना और निपटना आसान नहीं हैं. इसलिए ओबीसी साहित्यकारों की चुनौतियां बड़ी और लंबे समय तक चलने वाली होंगी. उन्हें एक ओर तो अपने ही साथियों को साहित्य की इस नई धारा से जुड़ने के लिए तैयार करना होगा. साथ ही साहित्य के मानवतावादी स्वरूप को बनाए रखने के लिए उन्हें उन स्थितियों से भी जूझना पड़ेगा जो उनके पिछड़ेपन का कारण बनती आई हैं. इनमें जाति के अलावा धर्म भी सम्मिलित है.

उन्हें समझना होगा कि हिंदू धर्म और जाति का नाभि-नाल का संबंध है. दोनों एक दूसरे का पोषण करते हैं. जानना होगा कि धर्म ब्राह्मण के लिए ठीक ऐसे ही धंधा है जैसे मोची के लिए जूते गांठना, ग्वाला के लिए दूध दुहना, गड़हरिया के लिए पशु चराना. उन सबका ज्ञान अनुभव के साथ निखरता जाता है. पुरोहिताई के साथ ऐसा नहीं है. यह कहते हुए कि जो पुराना है, वही सत्य-सनातन है, उसमें फेरबदल की सोचना भी पाप हैᅳब्राह्मण बार-बार अतीत की ओर लौटता रहा है. धर्म में सिवाय डर के कुछ भी मौलिक नहीं है. इस डर को स्थायी बनाने, पुरातन को सनातन सिद्ध करने के लिए ब्राह्मण अपने धंधे के साथ चतुराईपूर्वक पवित्रता का मिथ जोड़ देता है. अतः इस धारणा ने कि ज्ञान पर केवल ब्राह्मणों का एकाधिकार है. एकमात्र वही वास्तविक चिंतक और पथ-प्रदर्शक हैᅳइंसानियत का काफी नुकसान किया है. इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ, जब केवल और केवल ब्राह्मण ज्ञान-संपदा के इकलौते स्वामी और संवर्धक रहे हों. हालांकि ब्राह्मणों की ओर से यह दावा हमेशा बना रहा.

आज जिसे हिंदी साहित्य के नाम से जाना जाता है, वह मुख्यतः ब्राह्मणों द्वारा, ब्राह्मणों के हितों की सुरक्षा के लिए रचा गया साहित्य है. अपवाद रूप में कुछ भले लोगों को छोड़ दिया जाए तो वे पक्के जातिवादी हैं. कदम-कदम पर जातिवाद परोसते आए हैं. अगर ओबीसी साहित्यकार ऐसे लोगों से अपनी जातीय पहचान के साथ संवाद करेगा तो वे कभी उसे गंभीरता से नहीं लेंगे, क्योंकि ब्राह्मणवादी नजरिया उसके बारे में शूद्र से बढ़कर सोचने को तैयार न होगा. लेकिन यदि वह देश की आधी से अधिक जनता के प्रतिनिधि के रूप में संवाद करेगा तथा उसके सपनों और संघर्षों को साहित्य में लेकर आएगा तो देर-सवेर उन्हें साहित्य की इस नई धारा को गंभीरता से लेना ही पड़ेगा. परंतु यह कह देना जितना आसान है, करना उतना ही कठिन है. समस्या यह नहीं है कि शताब्दियों से हिंदी साहित्य पर कुछ खास जातियों का कब्जा रहा है; और तीन-चौथाई लोग उसी को वास्तविक साहित्य मानते आए हैं. समस्या यह है कि शोषण सहते-सहते तीन-चौथाई लोगों मे से अधिकांश को शोषक की भूमिका में आने में ही अपनी मुक्ति नजर आती है. इससे बचाव का एकमात्र रास्ता यही है कि ओबीसी साहित्यकार अपने लेखन में, व्यवहार में लोकतांत्रिक हो.

‘ओबीसी साहित्य’ की मांग फिलहाल भले ही अवधारणा तक सीमित हो, इसकी संकल्पना नई नहीं है. न ही वह शून्य से उपजेगा. सभ्यता और संस्कृति के विकासकाल से ही उसका अस्तित्व रहा है. इसलिए ओबीसी साहित्य को रचने से बड़ी चुनौती परंपरा से अर्जित साहित्य को सहेजने तथा ओबीसी हितों के अनुरूप उसकी पुनर्व्याख्या की होगी. कुछ सवाल इस बीच उठेंगे ही. मसलन ओबीसी साहित्य का आधार क्या है? उसके सौंदर्यबोध की परख की कसौटी क्या होगी? क्या दलित साहित्य की तरह ओबीसी साहित्य का दायरा भी गैर ओबीसी के लिए बंद होगा? भारतीय संस्कृति की सुदीर्घ परंपरा में से अनुकूल को चुनने तथा तथा अप्रासंगिक को छांट देने की उसकी कसौटी क्या होगी? ओबीसी साहित्यकार को इन सब सवालों का हल खोजना होगा. जिन कुरीतियों से साहित्य संघर्ष करता आया है उनमें से एक जातिवाद भी है. इसलिए अच्छा तो यही है कि साहित्य का जातिवाद के नाम पर विभाजन न हो? इन सबसे ज्यादा यह महत्त्वपूर्ण है कि समाज का जाति के आधार पर विभाजन न हो? यह नहीं हो सकता कि समाज में जाति रहे और साहित्य से जाति का जनाजा पूरी तरह उठ जाए. ओबीसी साहित्य पर जातिवादी होने का आरोप लगाने वालों के लिए एक उत्तर यह भी हो सकता है कि जातियों का विधान ओबीसी(शूद्र) ने नहीं रचा. उसकी कोशिश तो इस जंजाल से हमेशा पीछा छुड़ाने की रही है. ओबीसी साहित्य के साथ वही चल सकता है जो इस जंजाल से मुक्ति की सौगंध उठा चुका हो, जिसका भरोसा जाति और धर्म से ज्यादा इंसानियत में हो.

आप चाहें तो इसे सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध एक और मोर्चे का नाम भी दे सकते हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

 

बहुजन साहित्य की रूपरेखा

सामान्य

एफपीबुक ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ के बहाने

वेब संस्करण की घोषणा हो चुकी थी. वह समयानुसार काम भी करने लगा था. बावजूद इसके ‘फारवर्ड प्रेस’ द्वारा जून—2016 के बाद ‘प्रिंट संस्करण’ के बंद होने की घोषणा मन में आशंका पैदा करने वाली थी. ऐसे में ‘एफपी बुक्स’ की पहली खेप का आगमन बड़ा ही आह्लादकारी है. अपनी प्रतिबद्धता और वायदे पर खरा उतरने के लिए फारवर्ड प्रेस(अब एफपी बुक्स) के संपादक-द्वय आयवन कोस्का और प्रमोद रंजन चिर प्रशंसा के पात्र हैं. पत्रिका अपनी रीति-नीति में आरंभ से ही स्पष्ट रही है. हिंदी में बहुजन साहित्य की अवधारणा को बीच-बहस उतारने तथा तत्संबंधी प्रश्नों को लेकर उत्तेजक एवं महत्त्वपूर्ण बहसों की शुरुआत का श्रेय इसी पत्रिका को जाता है. तीन पुस्तकों की शृंखला में एक का शीर्षक ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ है. पुस्तक-सामग्री का अधिकांश हिस्सा इसी पत्रिका के विभिन्न अंकों में प्रकाशित हो चुका है. बावजूद इसके विषयगत आलेखों को एक स्थान पर ले आना समीचीन था. यह कार्य समय रहते हुआ, इसके लिए भी संपादक द्वय प्रशंसा के पात्र हैं. पुस्तकाकार रचना पत्रिकायी कलेवर से कहीं अधिक प्रभावी, आकर्षक तथा दूरगामी महत्त्व रखती है. यदि ‘एफपी बुक्स’ की शृंखला पांच वर्ष भी सफलतापूर्वक चली; और प्रकाशकगण इन पुस्तकाकार संस्करणों की, पत्रिका-संस्करण की अपेक्षा आधी प्रतियां भी बेचने में सफल रहे तो यह न केवल बहुजन साहित्य की सैद्धांतिकी विकसित करने में मददगार होगी, बल्कि तब तक ब्राह्मणवाद को चुनौती देने में सक्षम समानांतर जनसंस्कृति के पक्ष में पुख्ता सोच तैयार हो चुकी होगी.

पुस्तक में लेखों को तीन खंडों में संयोजित किया गया है—ओबीसी साहित्य विमर्श, आदिवासी साहित्य विमर्श तथा बहुजन साहित्य विमर्श. उनके माध्यम से हम ‘ओबीसी साहित्य विमर्श’ से ‘बहुजन साहित्य विमर्श’ तक की यात्रा को भी समझ सकते हैं. हालांकि वह अभी अपने आरंभिक पड़ाव पर ही है. पुस्तक की सामग्री विचारोत्तेजक है. विशेषकर कंवल भारती, प्रेम शंकर मणि के लेख, जो सोचने को विवश करते हैं. यहां दो आलेखों का संदर्भ प्रासंगिक है. पहला सुप्रिसिद्ध भाषाविद् डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह का आलेख. ‘ओबीसी’ साहित्यकारों के बारे में उनका अध्ययन विशद् है. वे इस धारा के प्रथम प्रस्तावक माने जाते हैं. ब्राह्मणवादियों के लिए जाति का मुद्दा ईश्वर और धर्म से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण रहा है. इसलिए ईश्वर और धर्म के नाम पर अलग-अलग मत रखने वाले ब्राह्मणवादियों में जाति के नाम पर अटूट एकता दिखती है. पिछले ढाई-तीन हजार वर्षों में धर्म ने तरह-तरह के बदलाव देखे हैं. इस कारण इसे जीवन-शैली भी माना जाता है. लेकिन इस बीच जाति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है. लोगों की अशिक्षा का लाभ उठा, संस्कृति की मनमानी व्याख्या करते आए ब्राह्मण पहले भी शिखर पर थे, आज भी शिखर पर हैं. इस मनुवादी षड्यंत्र को डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह गंभीरता से सामने लाते हैं. अपने लेख के माध्यम से वे बहुजन साहित्य की आवश्यकता को भी रेखांकित करते हैं.  दूसरा आलेख वरिष्ठ लेखक-समालोचक  डॉ. चौथीराम यादव का है, जिसमें वे पिछड़े वर्ग के लेखकों के अवदान की याद दिलाते हैं. दोनों विद्वान दलित साहित्य के विकास में पिछड़ी जातियों के साहित्यकारों की भूमिका को चिह्नित करते हैं. यह चिह्नन तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य के समानांतर अपनी पहचान बना चुके दलित साहित्यकारों को यथारूप स्वीकार नहीं है. स्वीकार हो भी क्यों! जिस समय जातीय असमानता का सर्वाधिक शिकार रहे दलित-लेखक साहित्य की समानांतर धारा को स्थापित करने के लिए सतत संघर्ष कर रहे थे, पिछड़े वर्ग के लेखक विचित्र-से ऊहापोह में थे. द्विज लेखक उन्हें ईमानदारी से स्वीकारने को तैयार नहीं थे; और दलितों के साथ जाना उन्हें स्वयं अस्वीकार था. अपनी प्रतिभा, लगन और निरंतर संघर्ष द्वारा दलित लेखकों ने तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य के समानांतर परिवर्तनकामी साहित्य को खड़ा करने में सफलता प्राप्त की है. अपनी उपलब्धि पर गर्व करने का अधिकार उन्हें है. इसीलिए कबीर, फुले, पेरियार आदि जो दलित साहित्य में पहले से ही सम्मानित स्थान रखते हैं, को ‘ओबीसी’ के नाम पर झटक लेना उन्हें स्वीकार नहीं है. कमोबेश यही मानसिकता आदिवासी पृष्ठभूमि के साहित्यकारों की भी है. बात सही है. दलित साहित्य दमन के विरुद्ध चेतना का साहित्य है. इसमें उन वर्गों की चेतना अभिव्यक्त होती है, जिन्हें इतिहास के दौर में सर्वाधिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी है. पुस्तक के कुछ लेखों में बहुजन साहित्य को लेकर स्वागत का भाव है, तो कुछ को पढ़कर लगता है कि दलित साहित्यकार बहुजन साहित्य की धारा में पूरी तरह समाहित होने के बजाए उसमें बड़े भाई की भूमिका को बनाए रखना चाहते हैं. साहित्य में बहुजन विमर्श की नवागंतुक धारा जो अभी केवल प्रस्तावना तक सीमित है, जिसकी रूपरेखा तक अस्पष्ट है—को लेकर स्थापित साहित्यकारों का दुराव अस्वाभाविक नहीं है.

अच्छी बात यह है कि ‘ओबीसी साहित्य’ को लेकर दलित और आदिवासी साहित्यकारों के जितने भी किंतु-परंतु हैं, ‘बहुजन साहित्य’ के अपेक्षाकृत बड़े कैनवास में उनका समाधान दिखने लगता है. उम्मीद की जानी चाहिए कि जैसे-जैसे बहुजन साहित्य की रूपरेखा स्पष्ट होगी, एक-दूसरे के प्रति समझ में इजाफा होगा—अंतर्विरोधों का समाहार स्वतः होता जाएगा. हालांकि बहुजन साहित्यकारों के कुछ घटकों के समक्ष पहचान का जो संकट अभी है, वह आगे भी बना रह सकता है. दरअसल बहुजन साहित्यकारों में जिन घटकों के सम्मिलन की परिकल्पना हम करते हैं, उनमें दलित, स्त्री-अस्मितावादी, आदिवासी साहित्य-धारा काफी परिपक्व हो चुकी है. जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग के साहित्य को लेकर इन्हीं जातियों के साहित्यकार किंतु-परंतु में उलझे हुए हैं. बहुजन साहित्य के एक अन्य घटक आदिमजाति साहित्य के समक्ष भी यही दुविधा बनी हुई है.

यह सच है कि दलित साहित्यकार जिन्हें अपना मूल प्रेरणास्रोत मानते हैं, उनमें से कई पिछड़ी जातियों से आए हैं. यह भी सच है कि दलितों पर अतीत में जो अत्याचार हुए, उनमें चाहे-अनचाहे पिछड़ी जातियों का भी हाथ रहा है. मगर अतीत की अप्रिय घटनाओं के आधार पर मन में गांठ पाल लेने से अच्छा है, भविष्य पर ध्यान दिया जाए. जातिवाद की पृष्ठभूमि की समझ इस संकल्प को आसान बना सकती है. ‘मनुस्मृति’ को मुख्यतः धर्म-ग्रंथ माना जाता है. इस ग्रंथ को लेकर यह अधूरी समझ है. वह केवल सामाजिक ऊंच-नीच को बढ़ावा देने वाली कृति ग्रंथ नहीं है, असल में वह समस्त संसाधनों पर मुट्ठी-भर लोगों के एकाधिकार की जन्मदाता है. वह ब्राह्मणों को पृथ्वी के समस्त संसाधनों का स्वामी घोषित करती है(सर्वं स्वं ब्राह्मणस्येदं यत्किझ्ज्जिगतीगतम्—मनु. 1/100). उस दौर में जब अर्थव्यवस्था खेती और पशु-संपदा पर आधारित थी. एक ओर संसार को माया कहना, उसे प्रपंचमय बताना, उससे दूर भागने का उपदेश देना और दूसरी तरफ समस्त संसाधन ब्राह्मणों के नाम घोषित करना—उस व्यवस्था के विरोधाभासों को दर्शाता है. जिसके कारण समाज सहस्राब्दियों तक कमजोर और देश बरसों-बरस गुलाम बना रहा. यह काम सोची-समझी नीति के तहत हुआ. इस तरह किया गया कि ब्राह्मण संपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श तथा जीवन की समस्त गतिविधियों का केंद्र बना रहे. आखिर ऐसा क्यों हुआ? मनुस्मृति की आलोचना आर्थिक वैषम्य को बढ़ावा देने वाले ग्रंथ के रूप में क्यों नहीं की गई? दरअसल ‘मनुस्मृति’ आलोचना की शुरूआत उन वर्गो की ओर से हुई जो कम से कम में गुजारा करने, संतोष को परम धन मानते आए थे. जिनके लिए सामाजिक समानता आर्थिक समानता से अधिक मूल्यवान थी. उन्हें लगता था कि सामाजिक समानता का लक्ष्य प्राप्त होने के उपरांत आर्थिक समानता का मार्ग स्वत: प्रशस्त: हो जाएगा.

बहरहाल, मनु का नाम लेकर किसी अनाम-धूर्त्त ब्राह्मण द्वारा लिखी गई उस पुस्तक के माध्यम से  न्याय भावना का गला घोंटते हुए समस्त संसाधनों को ब्राह्मणों के नाम कर दिया गया. उस स्थिति में बाकी वर्गों को उनका आश्रित होना ही था. ‘मनुवादी व्यवस्था’ क्षत्रियों को दूसरे स्थान पर रख उन्हें संसाधनों की रखवाली का काम सौंपती है. क्षत्रियों का काम शक्ति-प्रबंधन से जुड़ा है. जिसके पास शक्ति है उसे निर्णय लेने का सलीका न हो तो भी समाज उसकी बातों को आदेश की तरह लेता है. क्षत्रियों ने भी अपने हित को देखते हुए मनुस्मृति के विधान कि ब्राह्मण समस्त संपदा का स्वामी और वे संरक्षक हैं, का अतिक्रमण करना आरंभ कर दिया था. यह विरोध आमने-सामने का नहीं था. मनुस्मृति से कमोबेश दोनों के स्वार्थ जुड़े थे. इसलिए प्रकट में दोनों ही उसका गुणगान करते थे. किंतु आंतरिक स्तर पर संघर्ष हमेशा बना रहता था. कुछ ऐसी घटनाएं भी रहीं जो उस संघर्ष को एकदम धरातल पर ले आती हैं. परशुराम-सहस्रार्जुन युद्ध, विश्वामित्र-वशिष्ठ जैसे संघर्षों की लंबी गाथा है. महाभारत से लेकर देवासुर संग्रामों तक, जिन्हें ब्राह्मण धर्मयुद्ध कहकर प्रचारित करते रहे हैं, वास्तव में संपत्ति और संसाधनों के बंटवारे की खातिर हुए युद्ध थे. महाभारत के कौरव-पांडव परस्पर चचेरे भाई थे, जबकि देवता, दानव, दैत्य आदि तो एक ही पिता की संतान थे. उनकी माएं जरूर अलग-अलग थीं. इतिहास लेखन से बचने वाले ब्राह्मणों ने, निहित स्वार्थ के लिए संपत्ति के बंटवारे की खातिर हुए संघर्षों का जानबूझकर मिथकीकरण किया है. परिणामस्वरूप इतिहास का सच समय की गहरी पर्तों में विलीन होता चला गया. यहां समुद्र मंथन की प्रतीक कथा का भी संज्ञान ले सकते हैं. उसमें असुरों को वासुकि नाग के फन की ओर खड़ा किया जाता है. देवता पूंछ संभालते हैं. नाग का फन न केवल भारी होता है. बल्कि सारा विष उसी ओर रहता है. इस तरह असुरों को आरंभ से ही कठिन चुनौती के लिए तैयार किया जाता रहा है. वे गाय की पूंछ पकड़कर वैतरणी पार करते आए हैं. समय के साथ आवश्यकताएं बढ़ीं तो हर नई जरूरत के नाम पर एक नई जाति समाज से जुड़ती चली गई. उन जातियों का न तो अपने श्रम पर अधिकार था, न ही श्रमोत्पाद पर. नतीजा यह हुआ कि अपने श्रम-कौशल पर पूरे समाज का भरण-पोषण करने वाले बहुजन, अल्पसंख्यक अभिजनों के बंधुआ बनकर रह गए. दासत्वबोध उनके स्वभाव का अभिन्न हिस्सा बन गया. गिरबी दिमाग या तो नियति को कोसता; अथवा ‘स्वामी-सर्वेसर्वा’(बॉस इज आलवेज राइट) की भावना के साथ गर्दन झुकाए काम करता रहता था. मार्क्स ने यही बातें द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के माध्यम से कही हैं. इसलिए ब्राह्मणवादियों को वामपंथ और मार्क्स फूटी आंख नहीं सुहाते.

आगे चलकर कर्मकांडों में वृद्धि हुई. यायावर ऋषियों के स्थान पर परंपराबद्ध पुरोहित वर्ग छाने लगा. जब तक कर्मकांड आश्रम-केंद्रित रहे, वर्ण-व्यवस्था में कम ही सही, अंतरण की संभावना बनी रही. सत्यकाम जाबाल, मतंग, कर्दम, महीदास, रैक्व, विश्वामित्र आदि ने अपनी प्रतिभा के आधार पर उच्च वर्गों में अंतरण किया. यहां गिनाए गए नामों में पहले पांच ऋषि शूद्र वर्ग से आए थे. ब्राह्मण-ग्रंथों में उनके नाम इसलिए बचे रहे क्योंकि वे मानसिक रूप से ब्राह्मणवादी व्यवस्था को अपनाकर उसके प्रवक्ता बन चुके थे. अजित केशकंबलि, कौत्स, पूर्ण कस्सप, मक्खलि गोसाल भी शूद्र और अपने समय के प्रखरतम दार्शनिक थे. वे ब्राह्मणों के बौद्धिक वर्चस्व को चुनौती देते थे. वेदों को ‘धूर्त्त-भांड और निशाचरों’ की कृति बताकर उनका मखौल उड़ाते थे. इसलिए उनके नाम ब्राह्मण-ग्रंथों से पूरी तरह गायब हैं. सिवाय कौत्स के. कौत्स को वे नहीं मिटा पाए. क्योंकि स्वयं यास्क ने ‘निरुक्त’ के पंद्रहवें अध्याय में उसका उल्लेख किया है. पाणिनी शिष्य, अपने समय का महान वैयाकरणाचार्य कौत्स वैदिक ऋचाओं को ‘निरर्थक’ मानता था, ‘यदि तर्कपूर्ण ढंग से विश्लेषण किया जाए, तो वैदिक ऋचाएं अर्थविहीन काव्य हैं’(निरुक्त पंद्रहवां अध्याय). कालांतर में यज्ञादि कर्मकांड आश्रमों से निकलकर गृहस्थों की जीवनचर्या का हिस्सा बनने लगे तब स्वार्थी और कूपमंडूक पुरोहित वर्ग ने जन्म लिया. उससे पहले यज्ञादि कर्मकांड मुख्यतः ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों तक सीमित थे. पुरोहित वर्ग द्वारा उनका विस्तार समाज के दूसरे वर्गों तक होने लगा. अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए उसने निकृष्ट समझे जाने वाले कार्यों में लगी जातियों को अस्पृश्य घोषित कर दिया. खुद को ऊंचा दिखाने के लिए ब्राह्मण पुरोहितों ने अस्पृश्यों से दूरी बनानी शुरू कर दी. अस्पृश्य होने के कारण ब्राह्मण उनके घरों में प्रवेश नहीं कर सकता था. परिणामस्वरूप अस्पृश्य कही जाने वाली जातियों से काम कराने की जिम्मेदारी निम्न और मंझोली जातियों पर आ गई. वे स्वयं ब्राह्मणवाद की शिकार थीं. परंतु परिवर्तनकारी चेतना के अभाव में वे अपने शोषकों को ही अपना पालक और मुक्तिदाता मान बैठी थीं. धीरे-धीरे यही उनका संस्कार बनता गया. जब यह व्यवस्था जम गई और ब्राह्मणों का काम आसानी से होने लगा, तब उन्होंने खुद को अस्पृश्यों की छाया से भी दूर रखना शुरू कर दिया. लेकिन यह लोक चलन, यानी महज दिखावे के लिए था. पर्दे के पीछे जारकर्म चलता ही रहता था. आगे चलकर इसी ने सैकड़ों मिश्रित वर्णों और जातियों को जन्म दिया. जातीय उत्पीड़न का निरंतर शिकार रहे अछूतों ने भी कालांतर में अस्पृश्यता को अपनी नियति मान लिया. समय-समय पर जन्मे महापुरुषों ने उनकी चेतना को जगाने की कोशिश भी. परंतु आमूल परिवर्तनकारी दौर सभ्यता के इतिहास में कभी नहीं आ सका.

व्यवस्था के प्रति नासमझी उसकी मनमानियों को बढ़ावा देकर उन्हें चिर-जीवी बनाती है. निरंकुशता लंबी चले तो लोग हालात से समझौता कर उनके आगे समर्पण कर देते हैं. मुक्ति की चाहत जगे भी तो व्यवस्था से अनुकूलित मानस पहले उन्हीं हथियारों को आजमाता है, जो उसकी दुर्दशा का कारण रहे हैं. पाब्लो फ्रेरा के अनुसार उत्पीड़न के कारणों की अपर्याप्त समझ की वजह से, ‘उत्पीड़ित अपनी मुक्ति उत्पीड़क की भूमिका में आने देखता है’(उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र). जाहिर है, दुर्दशा के कारणों के प्रति आधी-अधूरी समझ परिवर्तनकामी आंदोलनों को उनके लक्ष्यों से दूर रखती है. लोग अपनी दुरावस्था के कारणों को समझ न सकें, इसमें धर्म की बड़ी भूमिका होती है. जैसे विकट विपन्नता के लिए आर्थिक असमानता और संसाधनों पर कुछ लोगों के एकाधिकार के बजाय पूर्व जन्म के कर्मों को दोषी ठहराना, स्वर्ग-नर्क की अभिकल्पना, पूजा-पाखंड को संस्कार और माला फेरने, नाम रटने को ज्ञान-साधना की संज्ञा देना आदि. ये सब ब्राह्मणों के वर्चस्ववादी षड्यंत्र का हथियार बने हैं. दुरावस्था के कारणों की आधी-अधूरी समझ ने कई जनांदोलनों को भटकाया है. उदाहरण के लिए वर्ण-व्यवस्था से त्रस्त लोगों ने मुक्ति की चाहत में मनु को गालियां दीं, मनुस्मृति को जलाया, असमानता थोपने के लिए हिंदू धर्म को कोसा, परंतु उन लोगों से दूरी बनाए रहे, जो भिन्न जातीय स्तर पर होने के बावजूद उसके उतने ही शिकार थे, जितने वे. न ही संसाधनों पर एकाधिकार के तथाकथित धर्म-विधान को उन्होंने सीधी चुनौती दी. जबकि क्षत्रियों ने, जैसा कि हमने पहले भी संकेत किया है, इस व्यवस्था को वहीं तक स्वीकारा जहां तक उनके वर्गीय हित सधते हों. कभी बातचीत तो कभी संघर्ष के माध्यम से वे ब्राह्मणों के एकाधिकार को निरंतर चुनौती देते रहे. अपने बौद्धिक चातुर्य के भरोसे शूद्रों का ही एक वर्ग संसाधनों में हिस्सेदारी कर, तथाकथित सवर्ण समूहों का हिस्सा बन गया. जाति-व्यवस्था के रहस्य को समझने के लिए उसकी चर्चा यहां प्रासंगिक है.

समय के साथ समाज की जरूरतें बढ़ती गईं. लगातार चुनौतियों से गुजरते हुए उनके शिल्प में सुधार हुआ. अपने उत्पाद को अधिक दाम पर बेचने की समझ भी पैदा हुई. आजीवक कर्मकांडों का निषेध करते थे. बुद्ध ने भी उसी नीति को आगे बढ़ाया था. उसके फलस्वरूप जाति-संबंधी बंधन शिथिल पड़ने लगे. यज्ञ-बलियों में कमी से पशुधन की बचत हुई तो समृद्धि रफ्तार पकड़ने लगी. आजीवकों और बुद्ध के प्रभाव से जाति-प्रथा कमजोर पड़ रही थी. सामाजिक आचार-विचार और शुचिता संबंधी नियम भी ढीले पड़े थे. फलस्वरूप विभिन्न जाति-समुदायों के लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करने लगे. शिल्पकारों ने भी संगठन की ताकत को समझा और सामूहिक पद्धति को अपनाया. अपने श्रम-कौशल द्वारा आजीविका चलाने के कारण वे आजीवक कहलाते थे. वही उनका धर्म था. मक्खलि गोसाल, पूर्ण कस्सप, अजित केशकंबलि उनके मार्गदर्शक और आचार्य थे. बौद्ध धर्म के उदय के बाद आजीवकों का एक हिस्सा उसकी ओर आकर्षित हुआ था, लेकिन संगठन और व्यापार के प्रति उनकी निष्ठा ज्यों की त्यों बनी रही. अपने श्रम-कौशल के बल पर शिल्पकार समूहों ने सफलता की ऐसी कहानी लिखी कि कुछ ही अर्से में उसका व्यापार दूर-दराज के देशों तक फैल गया. उनकी प्रगति को ग्रहण चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में लगा.

ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि अपनी शिल्पकला और व्यापार-कौशल से समस्त विश्व को चकित कर देने वाले उन शिल्पकार संगठनों ने राज्य की सत्ता को कभी चुनौती दी हो. अथवा अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के कारण राज्य के लिए खतरा बने हों. बावजूद इसके चाणक्य को शिल्पकार संगठनों से आपत्ति थी. वह मजबूत केंद्र का समर्थक था. नहीं चाहता था कि राज्य के समानांतर यहां तक कि उसके आसपास भी दूसरी कोई सत्ता हो. राजभवनों में पलने वाले षड्यंत्रों के बारे में उसे पूरी जानकारी थी. लेकिन राज्य की अर्थव्यवस्था में शिल्पकार संगठनों का योगदान इतना अधिक था कि उनके विरुद्ध सीधी कार्रवाही का साहस चाणक्य में भी नहीं था. उसने शिल्पकार समूहों की निगरानी करना शुरू कर दिया था. नतीजा यह हुआ कि आजीवक समुदाय जिसकी संख्या कभी बुद्ध के शिष्यों से भी अधिक थी; तथा जिसके स्थापक मक्खलि गोशाल तथा पूर्ण कस्सप को महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध से पहले ही बुद्धत्व प्राप्त हो चुका था—धीरे-धीरे बिखरने लगा. इससे उस वर्ग को लाभ पहुंचा जिसका उत्पादन में सीधा योगदान न था, जो केवल लाभार्जन की कामना के साथ व्यापार करता था. अवसर अनुकूल देख उसने भेंट-पूजा, दानादि देकर पुरोहितों और अधिकारियों को खुश करना शुरू कर दिया. फलस्वरूप वे राज्य के कृपापात्र कहलाने लगे. बुद्ध के समय व्यापारिक संगठनों में काम मिल-जुलकर किया जाता था. धीरे-धीरे वैश्य ‘श्रेष्ठि’ संगठन का पर्याय बनने लगे. विशेष अवसरों पर उन्हें राज्य की ओर से आमंत्रित किया जाने लगा. भेंट-सौगात के बदले राज्य की ओर से निर्बाध व्यापार की सुविधा मिलने लगी. परिणाम अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में  दलाल-तंत्र के रूप में सामने आया. जिससे व्यापार के नाम पर उन वस्तुओं के मूल्य-निर्धारण का अधिकार मिल गया, जिसके निर्माण में किसी दूसरे के श्रम-कौशल का योगदान था. धर्म के क्षेत्र में यह काम बहुत पहले शुरू हो चुका था. वहां ‘भक्त’ और ‘भगवान’ के बीच ‘मध्यस्थ’ की भूमिका पुरोहित निभाता था. श्रेष्ठि वर्ग को बढ़ावा मिलने से शिल्पकार समूह अर्थव्यवस्था के केंद्र से हटने लगे. उत्पादों की बिक्री के लिए श्रेष्ठि-वर्ग पर उनकी निर्भरता बढ़ती चली गई. यह काम मनुस्मृति लिखे जाने के आसपास या उससे कुछ ही समय पहले हुआ. दूसरे शब्दों में जब तक देश की राजनीतिक शक्ति विकेंद्रित थी, अर्थसत्ता भी विकेंद्रित रही. सत्ता के उस केंद्रीकरण के दौर में ही महाभारत को उसका वर्तमान रूप मिला. गीता की रचना हुई. चातुर्वर्ण्य व्यवस्था  को समर्थन देते हुए ब्राह्मणों ने पुरुष सूक्त की रचना की. स्मृति-ग्रंथ, गीता, पुराणादि वर्ण व्यवस्था समर्थित ग्रंथों की रचना इसी दौर में संपन्न हुई. याद दिला दें कि वर्ण-विभाजन का विचार आर्य अपने पैत्रिक देश पर्शिया से साथ लाए थे. वहां समाज को चार वर्णों(Pishtras) में बांटा गया था. उनके नाम थेᅳ‘अथर्वा’ या पुजारी(Athravas or Priest), रथेस्थस्स या योद्धा(Rathaesthas or Warrior) वास्त्रय श्युआंत्स(Vastrya Fshuyants) अथवा उपार्जक तथा हाउटिस(Huitis or Manual Workers) यानी मेहनतकश मजदूर. भारत में आकर ये क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बन कहलाने लगे.

शिल्पकार संगठन स्वयं को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखते थे. बावजूद इसके राज्य के समानांतर हैसियत वाले शिल्पकार वर्गों के आर्थिक संगठनों का भय ब्राह्मणों के दिमाग में इतना था कि उन्होंने ‘मनुस्मृति’ के सहारे शूद्र शिल्पकर्मियों से उनके सारे संसाधन, उनके आर्थिक अधिकार छीन लिए. शूद्रों के लिए निर्धारित किया गया कि उनका काम केवल सेवा करना है. अपने लिए कुछ अपेक्षा करना नहीं. वे अपने अवदान के बदले कोई अपेक्षा न रखें. इसके लिए गीता के माध्यम से निष्काम कर्म की अवधारणा को प्रचारित किया.  उन्हें बताया गया कि केवल कर्म पर उनका अधिकार है. फल पर नहीं. शूद्रों से यहां तक कहा गया कि यदि उनमें धन-संचय का सामर्थ्य है, तो भी वैसी धृष्टता न करें. इसके बावजूद यदि कोई शूद्र धनार्जन में सफल हो जाए तो ब्राह्मण को अधिकार दिया गया कि वह शूद्र द्वारा अर्जित धन को उसके मालिक (जमींदार/सामंत/सम्राट आदि) की मदद से छीन ले. चैतरफा दबाव का नतीजा यह हुआ कि शूद्रों की सेवाएं मुफ्त हो गईं. बेगार लेने के लिए शूद्र को जीवित रखना था, इसलिए विशेष अवसरों यानी शादी-विवाह, पर्व-उत्सवों तथा नई फसल के अवसर पर उनको भेंट-सौगात दी जाने लगी, जिसका स्वरूप भीखनुमा होता था. शूद्र इस छलनीति को समझ न पाए इसके लिए उसके पढ़ने-लिखने पर पाबंदी लगा दी गई. लेकिन यह पाबंदी केवल वैदिक साहित्य को तर्कसम्मत ढंग से पढ़ने, अपने विवेक के अनुसार उसका अर्थ निकालने की थी. ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण से अध्ययन-अध्यापन करने पर नहीं. महीदास, सत्यकाम जाबाल शूद्र होकर भी वेदपाठी कहलाए गए, क्योंकि वे ब्राह्मणवाद के श्रेष्ठत्व को स्वीकार कर, उसके आगे समर्पित हो चुके थे.

इस विस्तृत वर्णन का एक ही उद्देश्य है, बहुजन वर्ग की आंतरिक एकता के सूत्रों की खोज करना. ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’ से बहुजन साहित्य की सैद्धांतिकी का आधार स्पष्ट नहीं होता. यह कार्य भविष्य पर छोड़ दिया गया है. यदि यह मान लिया जाए कि बहुजन समूह मेहनतकश जातियों और शिल्पकार समूहों का बेहद सक्रिय और कर्मशील समूह रहा है तो उससे न केवल बहुजन साहित्य की अवधारणा स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है, बल्कि उसके सहारे हम इतिहास के कई बिखरे सूत्रों को भी सहेज सकते हैं. इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि वर्ण-व्यवस्था द्वारा संसाधनों से वंचित कर दिए जाने के बावजूद शिल्पकार समूह पूरी तरह हताश नहीं हुए थे. बल्कि अपने श्रम, शिल्प-कौशल तथा संगठन सामर्थ्य के दम उन्होंने खुद को इतना सुदृढ़ और व्यापक बना लिया था कि राज्य के लिए उनकी उपेक्षा कर पाना पूर्णतः असंभव था. समानकर्मा शिल्पकारों द्वारा संगठन बनाना उन दिनों सामान्य प्रक्रिया थी. लोग अलग-अलग काम करने के बजाए संगठित व्यापार ज्यादा पसंद करते थे. काष्ठकार, धातुकर्मी, स्वर्णकार, चर्मकार, पत्थर-तराश, हाथी-दांत के आभूषण-निर्माता, जलयंत्र निर्माता, बांसकर्मी, कास्सकार(पीतलकर्मी), बुनकर, कुंभकार, स्वर्णकार, तैलिक, रंगरेज, टोकरी बनाने वाले, अनाज व्यापारी, मत्स्यपालक, किसान, छापाकार, मालाकार, कसाई, नाई, पशुपालक, व्यापारी और व्यापारिक काफिले, दुरुह मार्गों पर व्यापारिक काफिलों की रक्षा करने वाले सैनिक, चोर-लुटेरे, महाजन—बुद्धकालीन भारत में 27 प्रकार के सहयोगी संगठनों का उल्लेख जातक कथाओं के जरिये प्राप्त होता है. इसका उल्लेख डॉ. रमेश मजूमदार ने ‘कोआॅपरेटिव्स लाइफ इन एन्शियंट इंडिया’ में विस्तार से किया है. उन दिनों वे आजीवक कहलाते थे. ब्राह्मण धर्म में उनकी कोई आस्था न थी. बाद के दिनों में उन्हें शूद्र घोषित कर दिया गया. चाणक्य ने तो क्षत्रियों के संघ का भी उल्लेख किया है. ये संगठन अपने आप में पूर्णतः स्वायत्त थे. उनके आंतरिक मामलों में दखल देने का अधिकार राज्य को भी नहीं था. चूंकि वे राज्य की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार थे, इसलिए राजा भी उनके साथ सहयोगात्मक रवैया अपनाते थे. वे अपनी आजीविका को ही अपना धर्म, अपना ईश्वर मानने वाले थे. जिस दौर के भारत को ‘सोने की चिड़िया’ के रूप में याद किया जाता है, वह इन संगठनों का सबसे सक्रिय कार्यकाल था. इससे हम राज्य की अर्थव्यवस्था में उनके महती योगदान का अनुमान लगा सकते हैं.

उपर्युक्त वर्णन से कुछ बातें साफ हो जाती हैं. पहली संगठन, एकता की ताकत. दूसरी समान-धर्मा संगठनों के साथ एकता की जरूरत, तीसरी धार्मिक मिथ्याडंबरों के बजाय तर्कसम्मत ढंग से निर्णय लेने की कला और चौथी चुनौतियों से भागने के बजाय परिस्थितियों के साथ संघर्ष करते हुए रास्ता निकालने की कोशिश करना. जाति-आधारित विषमता आज की समस्या नहीं है. सहस्राब्दियों से वह अस्तित्व में है. उसके विरोध में समय-समय पर आंदोलन छेड़े गए हैं. परंतु समस्या उत्तरोत्तर बढ़ती गई है. इसका पहला कारण तो यही है कि ज्योतिबा फुले से पहले जाति-विरोधी आंदोलनों की बागडोर मुख्यतः सवर्णों के हाथों में रही है. हालांकि मध्यकाल में कबीर, रैदास जैसे संत कवि शूद्र या अतिशूद्र जातियों से आए थे. जाति के विरोध में संत कवियों ने लगातार लिखा भी. परंतु वे संतोष को परमधन मानने वाले, दैन्य का महिमामंडन करने वाले संत थे. हालांकि रैदास ने ‘बेगमपुरा’ तथा कबीर ने ‘अमरपुरी’ के रूप में समानता पर आधारित समाज की कल्पना की थी. तो भी आर्थिक असमानता और संसाधनों पर द्विज वर्गों के एकाधिकार को लेकर उन्हें बहुत ज्यादा शिकायत न थी. उसे लेकर उनका दृष्टिकोण नियतिवादी था. बावजूद इसके संतकवियों का अपने समाज पर प्रभाव था. अपनी सीमाओं के भीतर उन्होंने ब्राह्मणवाद पर जोरदार प्रहार किया था. संतकवियों की समाज में बढ़ती प्रतिष्ठा को देख द्विज वर्गों के कवि भी उनकी ओर आकर्पित हुए. वे अपने साथ वर्गीय संस्कार भी लाए थे. उन्होंने संत-कवियों की मौलिक अध्यात्म चेतना का धार्मिकीकरण किया. परिणामस्वरूप संतकाव्य की क्रांतिधर्मिता भक्तिकाव्य में सिमटने लगी. तुलसी के आते-आते तो सबकुछ परंपरावादी हो गया. जाति और वर्ण पुनः प्रधान हो गए. उन्नीसवीं शताब्दी तक राजनीति पर धर्म का प्रभाव बना रहा. चूंकि धर्म की नींव जाति-व्यवस्था पर टिकी थी, इसलिए जाति के बहिष्कार को लेकर कोई बड़ा आंदोलन उनीसवीं शती से पहले के इतिहास से नदारद है.

जाति और हिंदू धर्म के गठजोड़ को इससे भी समझा जा सकता है कि बौद्ध धर्म से लेकर संत कवियों, सुधारवादी आंदोलनों, ज्योतिराव फुले और डॉ. अंबेडकर सहित जिसने भी जाति के पर कतरने की कोशिश की—प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में उसने धर्म पर भी प्रहार किया. यह आवश्यक था. क्योंकि हिंदू धर्म और जाति-व्यवसथा में नाभि-नाल का संबंध है. दोनों एक-दूसरे को बल प्रदान करते हैं. जाति पर सवाल उठाया जाता है तो धर्म आड़े आ जाता है और धर्म पर सवाल उठाते ही जाति बीच में अड़ जाती है. बुद्ध ने जाति का बहिष्कार किया था, लेकिन उनके बाद बौद्ध धर्म की बागडोर उन लोगों के हाथ में आ गई जो जन्मना सवर्ण थे. उन्हें बुद्ध के धर्म से कोई परेशानी न थी. परेशानी  उनके जाति-विरोध से थी. सो उन्होंने धर्म को सहारा लिया. अपना जीवन और समय उन्हें दिया. परंतु जाति के सवाल पर वे सब ठेठ परंपरावादी निकले. अवसर मिलते ही उन्होंने बौद्ध दर्शन के क्रांतिकारी विचारों को धीरे-धीरे जाति-धर्म की ब्राह्मणवादी व्यवस्था से जोड़ने का काम शुरू कर दिया. बुद्ध को अवतार घोषित कहना, यह कहना कि ‘बुद्ध या तो ब्राह्मण के घर जन्म लेते हैं, अथवा क्षत्रिय के’, ब्राह्मणवादियों की तर्कसम्मत निष्कर्षों से पलायन की मानसिकता को दर्शाता है. बौद्ध लेखकों ने प्रथम  शास्ता के निर्वाण प्राप्ति के तुरंत बाद अपनी जातिवादी मानसिकता को थोपना आरंभ कर दिया था. इसके लिए उन्होंने बुद्ध को भी नहीं बख्शा, जो आजीवन संघ और समानता का उपदेश देते रहते थे. असल में वह बुद्ध के जीवन-दर्शन की पश्चगामी व्याख्या थी. उन संगठनों की एक कमी खुद को केवल और केवल व्यवसाय तक सीमित रहना था. ज्ञान की शक्ति से अनभिज्ञ रहना तथा ज्ञानार्जन को ब्राह्मणों का विशेषाधिकार मानकर उसकी ओर से उदासीन बन जाना भी, उनकी कमजोरी थी. महात्मा ज्योतिबा फुले और डॉ. अंबेडकर सफल रहे तो इसलिए कि उन्होंने ब्राह्मणवादी व्यवस्था को बौद्धिक क्षेत्र में चुनौती दी थी. दोनों ने जीवन के आर्थिक पक्ष पर जोर दिया. उसके फलस्वरूप सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर समानता की मांग होने लगी.

बहुजन साहित्य की अवधारणा विकसित करने में समाज के पुराने अनुभव बहुत काम के सिद्ध हो सकते हैं. क्योंकि जो जो बंधु बहुजन साहित्य को तथाकथित मुख्य धारा के साहित्य के समानांतर देखना चाहते हैं, उनसे सबसे पहले यही सवाल होगा इसकी मूल अवधारणा या सैद्धांतिकी को लेकर उनका अपना सोच क्या है. उसमें जाति की क्या भूमिका होगी? क्या जाति का सहारा लेकर शुरू हुआ आंदोलन उसके बिना चार कदम भी चल पाएगा? यदि ऐसा नहीं हो सकता तो बाकी साहित्य और बहुजन साहित्य में क्या अंतर होगा? इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि जाति भारतीय समाज की एक कटु सचाई है. मजबूरी में ही सही, बहुजन साहित्यकारों को इस आंदोलन से जोड़ने का तुरंतिया आधार जाति ही है. बावजूद इसके वैकल्पिक साहित्य और संस्कृति की आधारशिला रखने के लिए जाति जैसी विष-बेलि पर भरोसा नहीं किया जा सकता. उससे व्यक्ति की बड़ी और स्थायी पहचान नहीं बनती. मार्क्स के दर्शन में जब ‘सर्वहारा’ का नाम लेते हैं तो बेमेलकारी औद्योगिक अर्थव्यवस्था में उपेक्षित, तिरष्कृत, चारों तरफ से छले गए, शोषित व्यक्ति की तस्वीर हमारे मनस् में उभरने लगती है. जाति की मार उससे कहीं ज्यादा घातक है. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था भी सर्वहारा को यह अधिकार देती है कि वह पूंजी के दम पर अपनी स्थिति बदलकर पूंजीवादी तबके में शामिल हो सके. जाति न केवल व्यक्ति, बल्कि उसकी आने वाली पीढ़ियों को भी इस अधिकार से वंचित रखती है. इसलिए जाति की बैशाखी के सहारे बड़ा और परिवर्तनकारी आंदोलन नहीं चलाया जा सकता. इस मामले में ‘बहुजन’ सार्थक शब्द है. इससे लोकतंत्र की ध्वनि निकलती है. इसलिए बहुजन साहित्य के नाम पर ऐसा साहित्य स्वीकार्य हो सकता है, जो लोगों में लोकतांत्रिक आदर्शों के प्रति चेतना जगाए.

वैसे भी साहित्यपन की कसौटी रचना में अंतर्निहित सर्वहित का भाव है. यह मनुष्य की सीमा है कि सिक्के के दूसरे पक्ष को देखने के लिए पहले को आंखों से ओझल करना ही पड़ता है. ऐसे में उदारमना लेखक केवल इतना कर सकता है कि लिखते समय अपने सोच का दायरा यथासंभव व्यापक रख सके. इस दृष्टि से देखें तो हिंदी का अधिकांश साहित्य ब्राह्मणवादियों द्वारा ब्राह्मणवाद के समर्थन में लिखा गया साहित्य है. वह एक प्रकार का स्तुति-लेखन है, जो येन-केन-प्रकारेण द्विज-हितों का पोषण करता है. संख्याबल के आधार पर ब्राह्मणवाद से लाभान्वित लोगों की संख्या कुल जनसंख्या के पांचवे हिस्से भी कम हैं. जाहिर है, जिसे साहित्य की मुख्यधारा कहा जाता है, वह अल्पसंख्यकों सत्तानशीनों द्वारा अल्पसंख्यक अभिजनों की स्वार्थ-सिद्धि के निमित्त किया गया लेखन है. सामाजिक स्तरीकरण को शास्त्रीय स्वरूप प्रदान करने में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है. तुलसी, सूर, वाल्मीकि, कालीदास आदि इस धारा के प्रतिनिधि रचनाकार कहे जा सकते हैं. कहने को उनके साहित्य में स्त्री, अल्पसंख्यक, दलित, गरीब-अमीर सब आते हैं. परंतु उनका उपयोग द्विज चरित्रों के महिमा-मंडन के लिए किया जाता है, ताकि सामाजिक भेदभाव वाली व्यवस्था के प्रति लोगों का मूक समर्थन बना रहे. इस प्रकार वे आसमानताकारी व्यवस्था को खाद-पानी देने का काम करते हैं, ताकि वह निर्बंध फल-फूल सके. ब्राह्मणवादी कह सकते हैं कि जब उनके साहित्य में स्त्री, अल्पसंख्यक, दलित, गरीब-अमीर सब हैं, तब साहित्य की नई धारा की जरूरत और उसका औचित्य क्या है? वे यह भी कह सकते हैं भारत में उसके समानांतर क्या उसके दूर-दूर तक कोई ऐसी साहित्य धारा नजर नहीं आती जो उसको चुनौती देने में सक्षम हो, तो उससे मुख्यधारा का साहित्य मानने में गुरेज क्यों हो? उन्हें समझाने के लिए, बशर्ते वे समझना चाहें तो कहा जा सकता है कि किसी रचना के साहित्य होने की पहली शर्त यह है कि वह हाशिया नहीं छोड़ती. यदि कुछ हाशिये पर  है तो उसे प्राथमिकता के साथ केंद्र में लाकर विमर्श में सम्मिलित करने की कोशिश करती है. यदि वे अपने साहित्य को मुख्यधारा का साहित्य मानते हैं तो इसका यह अर्थ भी है कि साहित्य में उनके चाहे-अनचाहे ऐसी धाराएं भी मौजूद हैं, जो उपेक्षित या हाशिये की हैं. और ऐसा होने से उन्हें कोई शिकायत भी नहीं है. यदि कभी बराबर में लाने की कोशिश हुई भी तो उपकार भाव से. मानो वही उनके तारणहार हों. यह सोच ही ब्राह्मणवादी ग्रंथों को साहित्य के गौरव से बेदखल करने के लिए पर्याप्त है. बीती दो सहस्राब्दियों के बीच. ब्राह्मणवादी साहित्य द्वारा विरोधी विचारधाराओं से समन्वय या संवाद की संभावना तो दूर, उसकी कोशिश तो उन्हें नकारने और मिटाने की रही है.

दलित, पिछड़े, आदिवासी, आदिम जनजातियां आदि जिन जाति-समूहों को केंद्र में रखकर बहुजन साहित्य की अभिकल्पना की गई है, वे सभी किसी न किसी श्रम-प्रधान जीविका से जुड़े हैं. उनकी पहचान उनके श्रम-कौशल से होती आई है. मगर जाति-वर्ण संबंधी असमानता और संसाधनों के अभाव में उन्हें उत्पीड़न एवं अनेकानेक वंचनाओं के शिकार होना पड़ा है. बहुजन साहित्य यदि जातियों की सीमा में खुद को कैद रखता है तो उसके स्वयं भी छोटे-छोटे गुटों में बंट जाने की संभावना निरंतर बनी रहेगी. इसलिए वह स्वाभाविक रूप से श्रम-संस्कृति का सम्मान करेगा. फलस्वरूप विभिन्न जातियों के बीच स्तरीकरण में कमी आएगी. उसकी यात्रा सर्वजनोन्मुखी साहित्य में ढलने की होगी. कुल मिलाकर बहुजन साहित्य का वास्तविक ध्येय जाति उच्छेद ही होगा. इस तरह बहुजन साहित्य का संघर्ष सभी प्रकार की असमानता, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक से होना चाहिए. तथाकथित सवर्ण जो भारतीय समाज के अभिजन चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, बहुजन साहित्य में दखल देते हैं तो उनका स्वागत किया जाएगा. बशर्ते वे समानता और श्रम-संस्कृति के विचार का समर्थन करते हों. श्रम-संस्कृति को महत्त्व देने का आशय ज्ञान की मौलिक धाराओं से कट जाना नहीं है. बहुजन साहित्य ज्ञान के लोकतंत्र में विश्वास रखते हुए उसकी विभिन्न धाराओं का खुले मन से स्वागत करेगा. परंतु ज्ञान और श्रम को लेकर जिस प्रकार की दूरी ब्राह्मणवादी परंपरा रही है, बहुजन साहित्य में उसके लिए कोई स्थान न होगा, न होना चाहिए.

परिशिष्ट

‘दलित साहित्य’ हो या ‘ओबीसी साहित्य’ अथवा उसका नया नामरूप ‘बहुजन साहित्य’ हो, ये सब समाज और संस्कृति के बजाय चाहे-अनचाहे राजनीति से ज्यादा अनुप्रेत हैं. इसके दो कारण हैं. पहला यह कि भागम-भाग के इस दौर में हर कोई त्वरित परिवर्तन की चाहत रखता है. यह काम उसको राजनीति के माध्यम से आसान लगता है. लेकिन राजनीति की विशेषता है कि उसका कोई न कोई सत्ताकेंद्र होता है. जो भी उसके नजदीक या प्रभाव में आता है, दूरस्थ वर्गों को वह खुद से हीन समझने लगता है. यदि उसपर समाज और संस्कृति का अनुशासन न हो तो वह बहुत जल्दी शक्तिशाली समूहों के वर्चस्व में ढल जाता है. दलित और पिछड़े दोनों ही वर्ग इसके शिकार रहे हैं. 1930 में बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश की तीन प्रमुख पिछड़ी जातियों ने मिलकर ‘त्रिवेणी संघ’ की स्थापना की थी. उसके सदस्यगण बरास्ते राजनीति द्विज वर्गों के बराबर में आना चाहते थे. उन्हें आरंभिक सफलता भी मिली. परंतु पर्याप्त सामाजिक चेतना के अभाव में वह प्रयोग, महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद अंततः असफल सिद्ध हुआ. कारण लोगों के दिमाग में मौजूद जाति की विषबेलि. इसके बावजूद परिवर्तनकामी समाजों में राजनीति का अलग महत्त्च होता है. प्राचीनकाल से लेकर आज तक समाज, संस्कृति और राजनीति सभी पर द्विज वर्गों का अधिपत्य रहा है. दलित और बहुजन दोनों ने ही समाज में जो हैसियत प्राप्त की है, या जिसका वे सपना देखते हैं, उसके लिए उन्हें समाज और संस्कृति दोनों से संघर्ष करना पड़ा है. दोनों ही दलित और पिछड़ों के शोषण का माध्यम बनते आए हैं. उनके दैन्य का कारण भी समाज और संस्कृति के निर्माण में उनकी भूमिका की निरंतर उपेक्षा, उसे कमतर आंका जाना है. इस मामले में स्वतंत्र भारत की राजनीति उनके लिए अधिक मददगार रही है. इसलिए साहित्य में राजनीति को महत्त्व देना या राजनीति के माध्यम से अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक हैसियत ऊपर उठाना अभी तक के उनके संघर्ष की मूल प्रेरणा रहा है.

दलित साहित्य भी इसी त्रासदी से गुजर रहा है. समाज और संस्कृति को राजनीति की अपेक्षा कम महत्त्व देने के कारण दलितों में भी शासक वर्ग का उदय होने लगा है. ‘बीसवीं शती अंबेडकर की होगी’ जैसे नारे इसी मानसिकता की देन है. नारेबाज प्रायः ऐसे राज्य का सपना देखते हैं, जिसमें वर्तमान मनुवादी शक्तियांे का पराभव हो चुका होगा. लेकिन मनुवादी शक्तियों का पराभव ‘मनुवाद’ या ‘ब्राह्मणवाद’ का पराभव नहीं नहीं है. ‘मनुवाद’ विचार से अधिक आज एक मानसिकता है. मनुवादी शक्तियों का पराभव हो परंतु मनुवाद नए चेहरे-मोहरों के रूप में बना रहे यह न तो अंबेडकर का सपना था, न ही आज के लिए सुधी समाजचेता का सपना हो सकता है. मनुवाद का पराभव बिना जाति के पराभव के असंभव है. फुले और अंबेडकर दोनों यह जानते थे. इसलिए अपनी-अपनी तरह से दोनों ने ही जाति का विरोध किया था. डॉ. अंबेडकर की पुस्तक ‘जाति का उच्छेद’ इस सवाल को बार-बार उठाती है. दलित साहित्य ने लोगों को इतना आत्मविश्वास तो दिया है कि जो दलित दो-तीन दशक पहले तक जाति को छिपाने में ही अपनी भलाई समझता थे, अब अपने नाम के साथ खुलकर ‘बाल्मीकि’, ‘जाटव’ आदि जाति-सूचक शब्द लगाने लगे हैं. ‘जाति के उच्छेद’ की दिशा में ऐसा आत्मविश्वास आवश्यक है. यहां मुझे पाब्लो फ्रेरा याद आते हैं. उन्होंने कहा था कि उत्पीड़ित वर्ग अपनी सफलता अनुत्पीड़क वर्ग की अवस्था में आने में देखता है. इसलिए जो शिखर पर है, उसपर ढेर सारे लोगों की निगाहें होती हैं. इसलिए शिखर पर अस्थिरता का मामला बना रहता है. जो लोग शिखर पर पहुंचने का हौसला नहीं रखते, वे शिखर के आसपास मंडराते रहते हैं. प्रेमचंद ने साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल कहा है. इसके लिए आवश्यक है कि साहित्य और राजनीति के बीच न्यूनतम दूरी हो. बहुजन साहित्य राजनीति से प्रेरणाएं, राजनीति की प्रेरणा बनने की कोशिश करेगा, परंतु सीधे राजनीतिक हस्तक्षेप या सहयोग से खुद को दूर रखेगा.

साहित्य की एक शर्त मानवीय अस्मिताओं के बीच समानता और समरसता का वातावरण उत्पन्न करना है. इसके लिए उसकी दृष्टि हमेशा उपेक्षित एवं निचले वर्गों की ओर होती है. ब्राह्मणवादी साहित्य प्रायः सत्ताकेंद्रित रहा है. यह बात अलग है कि उसके द्वारा मनोनीत सत्ताकेंद्र कभी राजनीति तो कभी धर्म की ओर झुकते रहे हैं. इसलिए ब्राह्मणवादी रचनाकारों के लेखन को मुख्यधारा का साहित्य नहीं कहा जा सकता. बजाय इसके उसे इस देश के अभिजन समूहों का वर्चस्वकारी साहित्य कहना उपयुक्त होगा. यह मान लेना चाहिए कि अस्मितावादी आंदोलन चाहे वे दलित आंदोलन हों या पिछड़े वर्गों का संघर्ष या कोई और, कोई भी जाति के दुर्ग को भेदने में असफल रहा है. याद करें भारत में जितनी जातियां हैं उससे कहीं अधिक उपजातियां भी हैं. सवर्ण में जहां गोत्रों की व्यवस्था है, वहीं तरह-तरह के भेद भी हैं. कुछ समय पहले तक ब्राह्मणों में ही दर्जनों उपजातियां थीं. उनके बीच इतना अंतर था कि तथाकथित उच्च श्रेणी का ब्राह्मण निचली श्रेणी के ब्राह्मणों के साथ रोटी-बेटी का संबंध तो दूर, बराबर में बैठकर भोजन करना पसंद नहीं करता था. इसलिए यह कहना कि जातिवाद देश में आज भी उतना ही है जितना पहले था, बड़ी भूल है. इसका श्रेय देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और निचले वर्गों द्वारा शिक्षा प्राप्त कर, द्विजों के लिए चुनौती देने की अवस्था में आना रहा है.

ओमप्रकाश कश्यप