आखरमाला

समय से संवाद

बहुजन राजनीति : कामयाबी के लिए जरूरी हैं बड़े सामाजिक आंदोलन — अप्रैल 25, 2021

बहुजन राजनीति : कामयाबी के लिए जरूरी हैं बड़े सामाजिक आंदोलन

देश इस समय दो प्रकार की ताकतों के प्रभाव में हैं। अपने-अपने स्वार्थ के लिए दोनों ही इसके भविष्य से खिलवाड़ कर रही हैं। पहली━हिंदुत्व समर्थक ताकतें, जो धर्म का इस्तेमाल राजनीतिक औजार की तरह करती हैं। उनका असल उद्देश्य जाति तथा उसके आधार पर सवर्णों को प्राप्त विशेषाधिकारों को सुरक्षित रखना है। भाजपा और आरएसएस जैसे संगठन इसके उदाहरण हैं। आज वे राष्ट्रवादी होने का दावा करते हैं, जबकि आजादी से पहले उनका बड़ा हिस्सा अंग्रेजों का पिट्ठू बना था। अंग्रेजी राज बना रहे, उससे प्राप्त सुविधाएं मिलती रहें━इसके लिए उन्होंने अंग्रेजों की हरसंभव मदद की थी। 

दूसरी पूंजीवादी ताकतें, जो ईस्ट इंडिया कंपनी के समय से ही अंग्रेजों के साथ थीं। विश्वयुद्धों के दौरान उन्होंने खूब चांदी काटी थी। बाद में देशभक्त होने का दावा करते हुए वे भी खुद को ‘राष्ट्रवादी’ कहने लगीं। मौका देख कुछ पूंजीपति अखबार और मीडिया के धंधे में घुस गए। उद्देश्य था सरकार और जनता दोनों पर अपनी पकड़ बनाए रखना। ताकि उसका उपयोग मनमाफिक सरकार चुनने; तथा निर्वाचित सरकार से मनमुताबिक काम लेने के लिए कर सकें। 

हिंदुत्व : जातिवाद का सुरक्षाकवच

जातिवादी ताकतों के लिए धर्म अध्यात्म-चेतना का स्वाभाविक विस्तार न होकर, शुद्ध राजनीति है। वे चाहती हैं कि भारत हिंदूवादी राष्ट्र बने। लेकिन वे हजारों वर्ष पुराने जाति-भेद को मिटाने की बात नहीं करतीं। उन जातियों को मिटाने की बात नहीं करतीं जिन्होंने पूरे समाज को ‘शासक’ और ‘शासित’ में बांट दिया है। यह कौन नहीं जानता कि बहुलांश शासित जातियां ही समाज की वास्तविक उत्पादक शाक्ति हैं। मगर देश और समाज के सुखोपभोग हेतु दिन-रात पसीना बहाने के बावजूद उन्हें अधिकार-विपन्न अवस्था में, अपमानित होकर जीना पड़ता है। इस विसंगति को मिटाने की उनकी पार्टी या सरकार के पास कोई योजना नहीं है। शिखर पर बने रहने की उनकी चाहत कभी मंडल बनाम कमंडल, कभी गुजरात मॉडल, कभी मंदिर-मस्जिद और कभी हिंदू-मुस्लिम के नाम से बाहर आती रहती है। जिस हिंदू राष्ट्र की बात वे करती हैं, उसमें संविधान के लिए कोई जगह नहीं है। उनका ‘आदर्शलोक’ मनुस्मृति के कथित ‘दिव्यादेशों’ को ही महत्व देता है।  

अपने स्वार्थपूर्ण गठजोड़ के बल पर ये शक्तियां आजादी के दौरान विकसित सामाजिक-सांप्रदायिक सौहार्द्र को कमजोर करने में कामयाब रही हैं। बहुजन समाज को उन्होंने इतने छोटे-छोटे गुटों में बांट दिया है कि अल्पसंख्यक अभिजन की संगठित ताकत की तुलना में उसकी प्रभावी शक्ति शून्य नजर आती है। इसके लिए केवल भाजपा या आरएसएस दोषी नहीं हैं। विपक्ष भी बराबर का जिम्मेदार है। वह भूल चुका है कोरी राजनीति से केवल सत्ता परिवर्तन संभव है। सामाजिक परिवर्तन की त्वरा को बनाए रखने के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता आवश्यक है। बीसवीं शताब्दी में भारतीय समाज जिन परिवर्तनों से गुजरा है, उनके पीछे सामाजिक आंदोलनों की बड़ी भूमिका थी। उनके मूल में फुले, पेरियार, डॉ. आंबेडकर, रामस्वरूप वर्मा, बाबू जगदेवप्रसाद, राममनोहर लोहिया जैसे महापुरुषों की प्रेरणाएं थीं। आज उनकी विचारधाराएं भले ही पहले से कहीं परिपक्व अवस्था में मौजूद हों, मगर उनसे कट जाने तथा केवल सत्ता की राजनीति करने के कारण━आज पूरा विपक्ष हताश, निराश और किंकर्तव्यविमूढ़ नजर आता है।

हुजन हितों की कीमत पर राजनीति की बिसात

ऐसा नहीं है कि राजनीति और पूंजीवाद का गठजोड़ एकदम नया हो। आजादी के बाद से ही दोनों एक-दूसरे का सहारा बनते आए हैं। मगर भाजपा ने धर्म को भी इसमें शामिल कर लिया है। संविधान सम्मत धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर उस भरोसा नहीं है। इस कारण यह पहले से कहीं ज्यादा बेशर्म, कहीं अधिक विकृत रूप में हमारे सामने है। सात साल पहले विकास के नारे के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार, बहुजन हितों की कीमत पर, अपने सांप्रदायिक एवं राजनीतिक हितों को साधने में लगी है। 

यह वही भाजपा है जो एक-डेढ़ दशक पहले तक स्वदेशी का राग अलापती थी। कांग्रेस की यह कहकर आलोचना करती थी कि उदारीकरण के नाम पर उसने विश्वबैंक सहित विदेशी आर्थिक शक्तियों के आगे समर्पण कर दिया है। मगर सत्ता में आने के बाद वह स्वदेशी की बात करना भूलकर, सार्वजनिक उद्यमों को ओने-पौने दाम बेचने पर तुली है। गौरतलब है कि धर्म, पूंजी और राजनीति के ऐसे ही बेशर्म गठजोड़ ने फ्रांसिसी क्रांति को जन्म दिया था। इस देश में समाजवाद तो कभी नहीं रहा। कुछ हिस्सों को छोड़कर वामपंथ को भी अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया है। किंतु पूंजीवादी ताकतों के आगे सर्वस्व समर्पण कर देने का साहस तो मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार का भी नहीं था━जिसे देश में उदार आर्थिक नीतियां लागू करने का श्रेय दिया जाता है।

विकास के आरंभिक दौर से ही पूंजीवाद व्यक्ति-स्वातंत्र्य का समर्थक रहा है। इसलिए नहीं कि उसे व्यक्ति-मात्र की आजादी से प्यार है। बल्कि इसलिए कि अर्थव्यवस्था के बाजारीकरण के लिए व्यक्ति-स्वातंत्र्य अपरिहार्य है। फिर भारत में पूंजीवाद तथा हिंदुत्व जैसी घोर सांप्रदायिक विचारधारा के गठजोड़ का कारण? गंभीरतापूर्वक विचार करें तो पता चलेगा कि भारत में यह पूंजीवाद की जरूरतों के चलते नहीं, बल्कि फासीवादी ताकतों की स्वार्थपरता के कारण संभव हुआ है।

यह भी कह सकते हैं कि स्वार्थ-सिद्धि की खातिर फासीवादी ताकतों ने पूंजीवाद के समक्ष खुद को समर्पित कर दिया है। रणनीति के रूप में पूंजीवाद ने भी इसे स्वीकार कर लिया है, ताकि वह मजबूर सरकार से मनचाहे फैसले करा सके। धर्म तथा पूंजीवाद के गठजोड़ की सफलता का कारण है कि ये दोनों ही, समाजार्थिक असमानता को नैसर्गिक मानते हैं। समानता, स्वाधीनता और न्याय जैसे मानवतावादी मूल्यों के लिए उनके यहां कोई जगह नहीं है। अपनी स्वार्थपरता पर पर्दा डालने के लिए दोनों ही दान-धर्म, पुण्यादि का बढ़-चढ़कर प्रचार करते हैं। इससे वे जन-असंतोष को कम करने में सफल हो जाते हैं। उनके निरंतर प्रचार-प्रसार से प्रभावित जनसाधारण, सरकार तथा दूसरी शीर्ष शक्तियों को अपना एकमात्र उद्धारक मानकर, समझौतावादी बन जाता है। 

षड्यंत्र को बहुजन भी समझते हैं

ऐसा नहीं है कि बहुजन धर्म, राजनीति और पूंजीवाद के स्वार्थपूर्ण गठजोड़ से सर्वथा अनजान हों। धर्म की आड़ में उत्तरोत्तर फलता-फूलता ब्राह्मणवाद उनकी नजरों से छिपा हो। मुश्किल यह है कि धर्म-राजनीति और पूंजीवाद के संगठित हमलों का सामना करने के लिए जो जमीनी संघर्ष तथा उसे दिशा देने वाले आंदोलन चाहिए━वे इन दिनों पूरी तरह नदारद हैं। ऐसा कोई सामाजिक-राजनीतिक संगठन नहीं है जिसकी पैठ पूरे देश में हो और जो सभी बहुजनों को स्वीकार्य हो। उसके अभाव में आक्रोश की परिणति कथित ‘सोशल मीडिया’ तक सिमटकर रह जाती है, जो किसी भी तरह से ‘सोशल’ नहीं है। वह लोगों को जिस सांगठनिक एकता की प्रतीति कराता है वह पूर्णतः आभासी है। इंटरनेट के माध्यम से मनुष्य विद्युतीय त्वरा के साथ अपने समूहों, मित्रों आदि से तत्क्षण संपर्क कर सकता है, इसलिए वह जमीनी माध्यमों जो आमने-सामने का संपर्क कराते हैं, तथा उनके द्वारा बने संगठनों की आवश्यकता से मुंह मोड़े रहता है।

‘सोशल मीडिया’ के हिसाब से देखा जाए तो पूंजीवाद और भाजपा सहित दूसरे फासीवादी संगठनों के विरुद्ध बहुजनों में आक्रोश उमड़ता हुआ दिखाई देगा। जबकि वास्तविकता इससे अलग है। असल में यह ऐसा माध्यम है जिसे पूंजीवादी तंत्र ने अपने मुनाफे तथा दीर्घकालिक स्वार्थों की सिद्धि हेतु खड़ा किया है। उसका उपयोग जो जितना ज्यादा शक्तिशाली है, वह उतने ही प्रभावशाली ढंग से कर सकता है। 

सोशल मीडिया ठेठ पूंजीवादी आयोजन है  

दरअसल जिसे ‘सोशल मीडिया’ कहा जाता है उसे पूंजीवादी शक्तियों ने जनाक्रोश के समयानुसार शमन हेतु खड़ा किया है। जैसे प्रेसर कुकर, समय-समय पर भाप को निकालकर, दबाव को एक सीमा से अधिक नहीं बढ़ने देता, यही काम ‘सोशल मीडिया’ कर रहा है। वह पूंजीवादी संस्थानों द्वारा अपने मुनाफे और बढ़ती आर्थिक-सामाजिक विषमताओं की ओर से ध्यान हटाने के लिए खड़ा किया गया, ठेठ पूंजीवादी आयोजन है। वह जनाक्रोश को स्वर तो देता है, किंतु एक विचार की दूसरे विचार पर इतनी तीव्र ‘ओवरलेपिंग’ करता है कि दिमाग चकराने लगता है। उसके माध्यम से विचारधाराओं के बोन्साई संस्करण, इतनी तेजी से संज्ञान में आते हैं कि पाठक को उन्हें आत्मसात करने, उनके साथ अपनी स्थिति का तादात्मय बिठाने तथा उन्हें आंदोलन का रूप देने के लिए समय ही नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप वैचारिक स्फुर्लिंग, जुगनुओं की तरह टिमटिमाकर अंधेरे में विलीन होते रहते हैं।

सोशल मीडिया का  उपयोग : सावधानी जरूरी है

यहां सोशल मीडिया की उपयोगिता और आवश्यकता को नकारने का हमारा कोई उद्देश्य नहीं है। खासकर ऐसे समय जब टेलीविजन और अखबार बड़े पूंजीपति घरानों के कमाऊ पूत बनकर रह गए हैं, विरोधी स्वरों को संगठित कर आगे बढ़ाने के लिए ‘सोशल मीडिया’ से जनमाध्यम का काम लिया जा सकता है। उसने आमजन को मुखर होना सिखाया है। यह अनायास नहीं है कि सरकार के चहेते पूंजीपतियों अंबानी और अडानी के विरुद्ध कथित ‘सोशल मीडिया’ पर आवाजें बुलंद हो रही हैं। कभी धीरूभाई अंबानी के आर्थिक साम्राज्य को खड़ा करने में मददगार रही कांग्रेस के नेता राहुल गांधी सार्वजनिक मंचों से सरकार को पूंजीपतियों की अवांछित मदद करने का आरोप लगा चुके हैं। ऐसा पहली बार हुआ है जब आक्रोशित किसानों ने रिलायंस के टावरों को उखाड़ फेंकने की कोशिश की हो, और अंबानी समूह को मदद के लिए सरकार के आगे गुहार लगानी पड़ी हो। यह भी पहली बार हो रहा है कि जनता के कोप से बचने के लिए पंजाब में रिलायंस के स्टोर महीनों से बंद पड़े हैं। इसलिए ऐसे समय में जब टेलीविजन, अखबार तथा संचार के अन्यान्य साधनों को पूंजीवादियों और राजनेताओं ने अपने कब्जे में कर लिया हो, यह कम से कम ऐसा मंच तो है जिसके माध्यम से समाज के एकदम निचले वर्ग के लोगों की भावनाएं सामने आ रही हैं। इसलिए जन-अभिव्यक्ति को स्वर देने वाले किसी भी माध्यम की उपयोगिता से इन्कार नहीं किया जा सकता। किंतु आवश्यक है कि उनका प्रयोग आंदोलन को एकजुट करने के लिए सहायक के तौर पर किया जाए, न कि निर्देशक शक्ति के रूप में। 

जनता के गुस्से को बदलाव का संवाहक बनाना जरूरी

धर्म-पूंजीवाद और राजनीति के विरुद्ध उमड़ा आक्रोश समाज में वास्तविक बदलाव का कारक नहीं बन पा रहा है। आखिर क्यों? यहां 2011 की घटनाओं को याद करने की कोशिश करें। टयुनीशिया से भड़के जनविद्रोह ने देखते ही देखते यमन, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, लीबिया, इराक सहित यूरोप के भी कई देशों को अपनी चपेट में ले दिया था। विद्रोह इतना प्रबल था कि कई अरब देशों में निरंकुश सत्ताधीशों को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी। कुछ देशों में तो गृह-युद्ध जैसे हालात बन चुके थे। उसके पीछे सोशल मीडिया का बड़ा योगदान था। इतना कि आम भाषा में उसे ‘फेसबुकिया विद्रोह’ भी कह दिया जाता है। 

सोशल मीडिया के बल पर हुई वे आधी-अधूरी क्रांतियां, कुछेक देशों में तख्तापलट के बावजूद, अपेक्षित व्यवस्था-परिवर्तन करने में नाकाम सिद्ध हुई थीं। कारण वही जो हमने ऊपर गिनाए हैं। इंटरनेट पर विद्युतीय त्वरा से आ रही सूचनाएं, समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित कर, केवल विद्रोह की मनःस्थिति पैदा कर सकती हैं, जमीनी चेतना के अभाव में वास्तविक परिवर्तन की संवाहक नहीं बन सकतीं। उसके लिए क्रांतिकारी विचारधाराओं को केवल जानना ही नहीं, उन्हें लोकमानस में उतारना पड़ता है। जबकि सोशल मीडिया पर एक के बाद एक तेजी से आ रहे विचार, सूचनाओं का रूप लेकर, विचारहीनता के हालात पैदा कर देते हैं। परिणामस्वरूप समाज भीड़ की तरह वर्ताब करने लगता है। 

सोशल मीडिया और पूंजीवाद

2011 की जनक्रांतियां भले ही नाकाम हुई हों, किंतु उनके माध्यम से पूंजीवादी ताकतें विभिन्न राजनीतिक दलों और सरकारों को यह समझाने में कामयाब हुई थीं कि वे जनता को बड़े पैमाने पर भड़काकर न केवल जनविद्रोह के हालात पैदा कर सकते हैं, बल्कि चाहें तो तख्तापलट भी करा सकते हैं। बिना उनकी मदद के सत्ता में बने रहना तो क्या, वहां तक पहुंचना भी संभव नहीं है। अप्रत्यक्ष रूप से वह सत्ता-लोलुप दलों के लिए एक संदेश भी था कि सोशल मीडिया और पूंजीपतियों के समर्थन से वे अपने सपनों को साकार कर सकते हैं। भारत में उन घटनाओं पर बहुत कम लिखा गया। संभवतः लिखने से जानबूझकर बचा गया। लेकिन उनसे सबक लेने वाले संगठन कम नहीं थे। उनमें प्रमुख थे आरएसएस, भाजपा तथा उनके अनुषंगी संगठन, जो आजादी के बाद से ही अपने जातिवादी एजेंडे को थोपने के लिए सत्ता में आने को लालायित थे। ‘आम आदमी पार्टी’ का उदय भी ऐसे ही आंदोलन से हुआ था। 

बदलाव के लिए जमीनी आंदोलन जरूरी

सोशल मीडिया की मदद से बहुजन बुद्धिजीवी अपने विचारों को तेजी से अपने समर्थकों और विरोधियों तक पहुंचा सकते हैं। उसके माध्यम से बहुजन समाज में जागरूकता भी पैदा कर सकते हैं। ब्राह्मणवाद की धूर्तताओं से अपने लोगों को परचाकर उन्हें बड़े आंदोलन के लिए तैयार भी कर सकते हैं। लेकिन क्रांतिधर्मा विचारधाराओं को आमूल परिवर्तन की संवाहक बनाने के लिए, जमीनी आंदोलनों की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। 

दूसरे शब्दों में डॉ. आंबेडकर, पेरियार, डॉ. रामस्वरूप वर्मा, स्वामी अछूतानंद, गाडगे महाराज, ललई सिंह ‘पेरियार’, कांशीराम आदि महापुरुषों की विचारधाराओं से प्रेरणा लेने के साथ-साथ उनके द्वारा शुरू किए गए आंदोलनों को भी━नए समय और संदर्भों के साथ, नए रूप में आगे बढ़ाने की जरूरत आज भी पहले जितनी ही है। मार्क्स के शब्दों में कहें तो विचारधाराएँ अनेक हैं, समस्या उन्हें परिवर्तन का वाहक बनाने की है। इसलिए बहुजन हितैषियों को चाहिए कि वे परिवर्तनकारी विचारधाराओं को समझने के साथ-साथ, उन्हें जनांदोलन में बदलने के लिए भी काम करें।

ओमप्रकाश कश्यप

बहुजन चेतना का निर्माण और अर्जक संघ — सितम्बर 16, 2019

बहुजन चेतना का निर्माण और अर्जक संघ

धार्मिक यंत्रणाएं, एक साथ और एक ही समय में वास्तविक यंत्रणाओं की अभिव्यक्ति तथा उनके विरुद्ध संघर्ष हैं।  धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह, निष्ठुर, हृदयहीन संसार का हृदय, आत्माहीन परिस्थितियों की आत्मा है।  यह लोगों के लिए अफीम है। । । । मनुष्य ने धर्म की रचना की है, न कि धर्म ने मनुष्य को बनाया है। ’                             

                                                                    कार्ल मार्क्स 

दुनिया में अनेक धर्म है, लेकिन अपने ही भीतर जितनी आलोचना हिंदू धर्म को झेलनी पड़ती है, शायद ही किसी और धर्म के साथ ऐसा हो।  इसका कारण है हिंदुओं की जाति-व्यवस्था, जो मनुष्य को जन्म के आधार पर अनगिनत खानों में बांट देती है।  ऊंच-नीच को बढ़ावा देती है।  मुट्ठी-भर लोगों को केंद्र में रखकर बाकी को हाशिये पर ढकेल देती है।  ऐसा नहीं है कि इसकी आलोचना नहीं हुई।  गौतम बुद्ध से लेकर आज तक, जब से जन्म हुआ है, तभी से उसके ऊपर उंगलियां उठती रही है।  जाति और जाति-भेद मिटाने के लिए आंदोलन भी चले हैं, बावजूद इसके उसे मिटाना चुनौतीपूर्ण रहा है।  इसलिए कि हिंदू धर्म का प्रमुख लाभकर्ता ब्राह्मण, धर्म के साथ-साथ जाति के भी शिखर पर है, समाज में अतिरिक्त रूप से प्रभावशाली है।  वही किसी न किसी रूप में जाति को बचाए रखता है।  लोगों का विश्वास जीतने के लिए कभी-कभार कुछ समझौते या सुधारवाद का दिखावा करना पड़े तो बेझिझक करता है।  मध्यकाल में संत रविदास, कबीर, नानक आदि ने जाति के नाम पर समाज के बंटवारे को चुनौती दी थी।  उनीसवीं शताब्दी में केशवचंद सेन, स्वामी दयानंद, विवेकानंद आदि ने जाति उन्मूलन की दिशा में गंभीरता से काम किया।  लेकिन उनका प्रभाव सीमित और अल्पकालिक रहा।  उनीसवीं शताब्दी के बौद्धिक जागरण के दौरान, यह मानते हुए कि बिना धर्म को चुनौती दिए जातीय भेदभाव से मुक्ति असंभव हैᅳफुले ने हिंदू धर्म तथा उसको संरक्षण देने वाले ब्राह्मणवाद पर सीधा प्रहार किया।  उसके बाद उसे बहुआयामी चुनौती डॉ।  आंबेडकर, ई।  वी।  रामास्वामी पेरियार, स्वामी अछूतानंद, श्रीनारायण गुरु आदि की ओर से मिली।  इस बीच बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ‘त्रिवेणी संघ’ ने पिछड़ी जातियों और अछूतों को संगठित करना शुरू किया।  1970 के आसपास ‘अर्जक संघ’ ने जातीय शोषण और धार्मिक आडंबरवाद के विरुद्ध आवाज बुलंद की।  आरंभ में उसका प्रभाव कानपुर और आसपास के क्षेत्रों तक सीमित था।  पिछले कुछ वर्षों से उसकी लोकप्रियता में तेजी आई है।  संचार-क्रांति के इस दौर में सैकड़ों युवा उससे जुड़ चुके हैं।  इसके फलस्वरूप वह उत्तर प्रदेश की सीमाओं से निकलकर बिहार, उड़ीसा जैसे प्रांतों में भी जगह बना रहा है।

‘अर्जक संघ’ की स्थापना रामस्वरूप वर्मा ने 1 जून 1968 को की थी।  उसके पीछे ‘बिहार का लेनिन’ कहे जाने वाले बाबू जगदेवप्रसाद सिंह की प्रेरणा थी।  आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम महाराज सिंह भारती, मंगलदेव विशारद जैसे बुद्धिवादी चेतना से लैस नेताओं ने किया।  स्थापना के लगभग दो महीने बाद बाबू जगदेवप्रसाद सिंह भी ‘अर्जक संघ’ से जुड़ गए।  उन सभी का एकमात्र उद्देश्य था, सामाजिक न्याय की लड़ाई को विस्तार देना।  ऊंच-नीच, छूआछूत, जात-पांत, तंत्र-मंत्र, भाग्यवाद, जन्म-पुनर्जन्म आदि के मकड़जाल में फंसे दबे-कुचले लोगों को, उनके चंगुल से बाहर लाना।  फुले हिंदू धर्म की विकृतियों की ओर बहुत पहले इशारा कर चुके थे।  उसके बाद से ही उसमें सुधार के दावे किए जा रहे थे।  स्वाधीनता संग्राम के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब दलितों और पिछड़ों का नेता कहलाने की होड़-सी मची थी।  उससे लगता था कि लोकतंत्र जातीय वैषम्य को मिलाने में सहायक होगा।  लेकिन हो एकदम उलटा रहा था।  जिन नेताओं पर संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी थी, वे चुनावों में जाति और धर्म के नाम पर वोट मांगते थे।  पुरोहितों के दिखावे और आडंबर में कोई कमी नहीं आई थी।  ऊपर से समाज के निचले वर्गों पर होने वाले जाति-आधारित हमले।  उन्होंने साफ कर दिया था कि हिंदू धर्म के नेता अपनी केंचुल से बाहर निकलने को तैयार नहीं हैं।  वे जाति और धर्मांधता को स्वयं नहीं छोड़ने वाले।  लोगों को स्वयं उसके चंगुल से बाहर आना पड़ेगा।  पिछले आंदोलनों से यह सीख भी मिली थी कि जाति-मुक्त समाज के लिए धर्म से मुक्ति आवश्यक है।  मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म मनुष्यता है।  जियो और जीने दो उसका आदर्श है।  मामला धार्मिक हो या सामाजिक, मनुष्य यदि अपने विवेक से काम न ले तो उसके मनुष्य होने का कोई अर्थ नहीं है।  

 रामस्वरूप वर्मा का जन्म कानपुर(वर्तमान कानपुर देहात) जिले के गौरीकरन गांव में पिछड़ी जाति के किसान परिवार में दिनांक 22 अगस्त 1923 को हुआ था।  उनके पिता का नाम वंशगोपाल और मां का नाम सुखिया देवी था।  चार भाइयों में सबसे छोटे रामस्वरूप वर्मा की प्राथमिक शिक्षा कालपी और पुखरायां में हुई।  हाईस्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षा पास करने के पश्चात उन्होंने  इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया।  वहां से 1949 में हिंदी में परास्नातक की डिग्री हासिल की।  उसके बाद उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री प्राप्त की।  वे शुरू से ही मेधावी थे।  हाईस्कूल और उससे ऊपर की सभी परीक्षाएं उन्होंने प्रथम श्रेणी में पास की थीं।  

छात्र जीवन से ही रामस्वरूप वर्मा की रुचि राजनीति में थी।  बौद्धिक स्तर पर वे समाजवादी विचारधारा के निरंतर करीब आ रहे थे।  उनका संवेदनशील मन सामाजिक ऊंच-नीच और भेदभाव को देखकर आहत होता था।  लोहिया उनके आदर्श थे।  फिर भी छात्र जीवन में वे राजनीति से दूरी बनाए रहे।  माता-पिता चाहते थे कि उनका बेटा उच्चाधिकारी बने।  उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए रामस्वरूप वर्मा ने भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षाएं दीं और उत्तीर्ण हुए।  उनकी मेधा और अध्ययनशीलता का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि प्रशासनिक सेवा के लिए उन्होंने इतिहास को चुना था और सर्वाधिक अंक उसी में प्राप्त किए थे, जबकि परास्नातक स्तर पर इतिहास उनका विषय नहीं था।  एक अच्छी नौकरी और भविष्य की रूपरेखा बन चुकी थी, लेकिन नौकरी के साथ बंध जाने का मन न हुआ।  वे स्वभाव से विनम्र, मृदुभाषी तथा आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे।  आत्मविश्वास उनमें कूट-कूट कर भरा था।  इसलिए प्रशासनिक सेवा के लिए साक्षात्कार का बुलावा आया तो उन्होंने शामिल होने से इन्कार कर दिया।  

परिचितों को उनका फैसला अजीब लगा।  कुछ ने टोका भी।  लेकिन परिवार को उनपर भरोसा था।  इस बीच उनकी डॉ।  राममनोहर लोहिया और सोशलिष्ट पार्टी से नजदीकियां बढ़ी थीं।  सार्वजनिक जीवन की शुरुआत के लिए उन्होंने अपने प्रेरणा पुरुष को ही चुना।  वे सोशलिष्ट पार्टी के सदस्य बनकर उनके आंदोलन में शामिल हो गए।  1957 में उन्होंने ‘सोशलिस्ट पार्टी’ के उम्मीदवार के रूप में कानपुर जिले के भोगनीपुर से, विधान सभा का चुनाव लड़ाय और मात्र 34 वर्ष की अवस्था में वे उत्तरप्रदेश विधानसभा के सदस्य बन गए।  यह उनके लंबे सार्वजनिक जीवन का शुभारंभ था।  उससे अगला चुनाव वे 1967 में ‘संयुक्त सोशलिष्ट पार्टी’ के टिकट पर जीते।  गिने-चुने नेता ही ऐसे होते हैं, जो पहली ही बार में जनता के मनस् पर अपनी ईमानदारी की छाप छोड़ जाते हैं।  रामस्वरूप वर्मा ऐसे ही नेता थे।  जनमानस पर उनकी पकड़ थी।  लोहिया के निधन के बाद पार्टी नेताओं से उनके मतभेद उभरने लगे।  1969 का विधान सभा चुनाव उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा और जीते।  स्वतंत्र राह पकड़ने की चाहत में उन्होंने 1968 में ‘समाज दल’ नामक राजनीतिक पार्टी की स्थापना की थी।  उद्देश्य था, समाजवाद और मानवतावाद को राजनीति में स्थापित करना।  लोगों के बीच समाजवादी विचारधारा का प्रचार करना।  उनका दूसरा लक्ष्य था, ब्राह्मणवाद के खात्मे के लिए अर्जक संघ की वैचारिकी को घर-घर पहुंचाना।  गौरतलब है कि ‘समाज दल’ की स्थापना से कुछ महीने पहले बाबू जगदेवप्रसाद सिंह ने 25 अगस्त 1967 को ‘शोषित दल’ का गठन किया था।  दोनों राजनीतिक संगठन समानधर्मा थे।  क्रांतिकारी विचारधारा से लैस।  ‘शोषित दल’ के गठन पर बावू जगदेवप्रसाद सिंह ने ऐतिहासिक महत्त्व का, क्रांतिकारी और लंबा भाषण दिया था।  उन्होंने कहा था—

‘जिस लड़ाई की बुनियाद आज मैं डालने जा रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी।  चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी।  परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं।  इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेंगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेंगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे।  जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी। ’

बाबू जगदेवप्रसाद सिंह और रामस्वरूप वर्मा के विचार काफी हद तक मिलते थे।  दोनों व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं से मुक्त थे।  आखिकार दोनों नेताओं ने राजनीतिक एकजुटता दिखाने का निर्णय लिया।  7 अगस्त 1972 को ‘शोषित दल’ और ‘समाजदल’ के विलय के बाद ‘शोषित समाज दल’ का जन्म हुआ।  1980 तथा 1989 के विधानसभा चुनावों में वर्मा जी ने ‘शोषित समाज दल’ के सदस्य के रूप में हिस्सा लिया।  दोनों बार उन्होंने शानदार जीतें हासिल कीं।  1991 में उन्होंने ‘शोषित समाज दल’ के उम्मीदवार के रूप में छठी बार विधान सभा चुनावों में जीत हासिल की।  रामस्वरूप वर्मा पर क्षेत्र की जनता का पूरा भरोसा था।  वे एक के बाद एक चुनाव जीतते जा रहे थे।  राजनीतिक क्षेत्र में उनकी प्रतिष्ठा और मान-सम्मान था।  लेकिन सिर्फ संसदीय राजनीति से उन्हें संतोष न था।  इसलिए सक्रिय राजनीति के साथ जनांदोलनों में भी नियमित सक्रियता बनी हुई थी।  

भारतीय समाज के बड़े हिस्से के पिछड़ेपन का मूल कारण है—धर्म के नाम पर आडंबर।  तरह-तरह के कर्मकांड और रूढ़ियां।  शताब्दियों से दबे-कुचले समाज को पंडित और पुजारी तरह-तरह के बहाने बनाकर लूटते रहते थे।  ‘अर्जक संघ’ के गठन का प्रमुख उद्देश्य लोगों को धर्म के नाम किए जा रहे छल-प्रपंच और पाखंड से मुक्ति दिलाना था।  रामस्वरूप वर्मा पर फुले, पेरियार और आंबेडकर का प्रभाव था।  बाबू जगदेवप्रसाद सिंह तो उनके सहयोगी और प्रेरणा-पुरुष थे ही।  उन दिनों डॉ।  आंबेडकर के प्रभाव से उत्तर प्रदेश और बिहार के दलितों में भी चेतना का संचार हुआ था।  स्वामी अछूतानंद के आंदोलन का भी लोगों पर प्रभाव था।  जाति मुक्ति की मांग तेज हो चुकी थी।  दलित अपने परंपरागत पेशों, जिनके आधार पर उन्हें नीच और गुलाम बनाया हुआ था, को छोड़कर नए धंधे अपनाने को संकल्पबद्ध थे।  

जाति मुक्ति के लिए पेशा-मुक्ति आंदोलन की शुरुआत 1930 से हो चुकी थी।  आगे चलकर अलीगढ़, आगरा, कानपुर, उन्नाव, एटा, मेरठ जैसे जिले, जहां चमारों की संख्या काफी थी─उस आंदोलन का केंद्र बन गए।  आंदोलन का नारा था─‘मानव-मानव एक समान’।  उन दिनों गांवों में मृत पशु को उठाकर उनकी खाल निकालने का काम चमार जाति के लोग करते थे।  जबकि चमार स्त्रियां नवजात के घर जाकर नारा(नाल) काटने का काम करती थीं।  समाज के लिए दोनों ही काम बेहद आवश्यक थे।  मगर उन्हें करने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता था।  अछूत मानकर उनसे नफरत की जाती थी।  डॉ।  आंबेडकर की प्रेरणा से 1950-60 के दशक में उत्तर प्रदेश से ‘नारा-मवेशी आंदोलन’ का सूत्रपात हुआ था।  उसकी शुरुआत बनारस के पास, एक दलित अध्यापक ने की थी।  चमारों ने एकजुटता दिखाते हुए इन तिरष्कृत धंधों को हाथ न लगाने का फैसला किया था।  इससे दबंग जातियों में बेचैनी फैलना स्वाभाविक था।  आंदोलन को रोकने के लिए उनकी ओर से दलितों पर हमले भी किए गए।  बावजूद इसके आंदोलन जोर पकड़ता गया।

रामस्वरूप वर्मा अपने संगठन और सहयोगियों के साथ ‘नारा मवेशी आंदोलन’ के साथ थे।  जहां भी नारा-मवेशी आंदोलन के कार्यक्रम होते अपने समर्थकों के साथ उसमें सहभागिता करने पहुंच जाते थे।  अछूतों के प्रति अपमानजनक स्थितियों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए उन्होंने ‘अछूतों की समस्याएं और समाधान’ तथा ‘निरादर कैसे मिटे’ जैसी पुस्तिकाओं की रचना भी की।  उनमें जातीय आधार पर होने वाले शोषण और अछूतों की दयनीय हालत के कारणों पर विचार किया गया था।  चमारों द्वारा थोपे गए पेशे के बायकाट की सवर्ण हिंदुओं में प्रतिक्रिया होना अवश्यंभावी था।  उनकी ओर से चमारों पर हमले किए गए।  रामस्वरूप वर्मा ने प्रभावित स्थानों पर जाकर न केवल पीड़ितों को ढाढस बंधाने का काम किया, अपितु आंदोलन में डटे रहने का आवाह्न भी किया।  ‘अर्जक संघ’ के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने ‘अर्जक साप्ताहिक’ अखबार भी निकाला।  उसका मुख्य उद्देश्य ‘अर्जक संघ’ के विचारों को जन-जन तक पहुंचाना था।  

1967—68 में उत्तर प्रदेश में ‘संयुक्त विधायक दल’ की सरकार बनी तो रामस्वरूप वर्मा को वित्तमंत्री का पद सौंपा गया।  उस पद पर रहते हुए उन्होंने जो बजट पेश किया, उसने सभी को हैरत में डाल दिया था।  बजट में 20 करोड़ लाभ दर्शाया गया था।  उससे पहले मान्यता थी कि सरकार के बजट को लाभकारी दिखाना असंभव है।  केवल बजट घाटे को नियंत्रित किया जा सकता है।  जहां घाटे को नियंत्रित रखना ही वित्तमंत्री का कौशल हो, वहां लाभ का बजट पेश करना बड़ी उपलब्धि जैसा था।  केवल ईमानदार और विशेष प्रतिभाशाली मंत्री से, जिसकी बजट निर्माण में सीधी सहभागिता हो─ऐसी उम्मीद की जा सकती थी।  बजट में सिंचाई, शिक्षा, चिकित्सा, सार्वजनिक निर्माण जैसे लोकोपकारी कार्यों हेतु, उससे पिछले वर्ष की तुलना में लगभग डेढ़ गुनी धनराशि आवंटित की गई थी।  कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में वृद्धि का प्रस्ताव भी था।  इस सब के बावजूद बजट को लाभकारी बना देना चमत्कार जैसा था।  उस बजट की व्यापक सराहना हुई।  रामस्वरूप वर्मा की गिनती एक विचारशील नेता के रूप में होने लगी।  पत्रकारों के साथ बातचीत के दौरान उनका कहना था कि उद्योगपति और व्यापारी लाभ-हानि को देखकर चुनते हैं।  घाटा बढ़े तो तुरंत अपना धंधा बदल लेते है।  लेकिन किसान नफा हो या नुकसान, किसानी करना नहीं छोड़ता।  बाढ़-सूखा झेलते हुए भी वह खेती में लगा रहता है।  वह उन्हीं मदों में खर्च करता है, जो बेहद जरूरी हों।  जो उसकी उत्पादकता को बनाए रख सकें।  इसलिए किसान से अच्छा अर्थशास्त्री कोई नहीं हो सकता।  जाहिर है, बजट तैयार करते समय सरकार के अनुत्पादक खर्चों में कटौती की गई थी।  कोई जमीन से जुड़ा नेता ही ऐसा कठोर और दूरगामी निर्णय ले सकता था।  

देश में आर्थिक आत्मनिर्भरता की चर्चा अकसर होती है।  मगर बौद्धिक आत्मनिर्भरता को एकदम बिसरा दिया जाता है।  यह प्रवृत्ति आमजन के समाजार्थिक शोषण को स्थायी बनाती है।  समाज का पिछड़ा वर्ग जिसमें  शिल्पकार और मेहनतकश वर्ग शामिल हैं, अपने श्रम-कौशल से अर्जन करते हैं।  जब उसको खर्च करने, लाभ उठाने की बारी आती है तो पंडा, पुरोहित, व्यापारी, दुकानदार सब सक्रिय हो जाते हैं।  धर्म के नाम पर, ईश्वर के नाम पर, तरह-तरह के कर्मकांडों, आडंबरों, ब्याज और दान-दक्षिणा के नाम पर─वे उसकी मामूली आय का बड़ा हिस्सा हड़पकर ले जाते हैं।  धर्म मनुष्य की बौद्धिक आत्मनिर्भरता, उसके वास्तविक प्रबोधीकरण में सबसे बाधक है।  लेकिन जब भी कोई उसकी ओर उंगली उठाता है, विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग तुरंत परंपरा की दुहाई देने लगता है।  इस मामले में हिंदू विश्व-भर में इकलौते धर्मावलंबी हैं, जो पूर्वजों के ज्ञान पर अपनी पीठ ठोकते हैं।  कुछ न होकर भी सबकुछ होने का भ्रम पाले रहते हैं।  तर्क और बुद्धि-विवेक की उपेक्षा करने के कारण कूपमंडूकता की स्थिति में जीते हैं।  ‘अर्जक संघ’ कमेरे वर्गों का संगठन है।  धर्म या संप्रदाय न होकर वह मुख्यतः जीवन-शैली है, जिसमें आस्था से अधिक महत्त्व मानवीय विवेक को दिया जाता है।  उसका आधार सिद्धांत है कि श्रम का सम्मान और पारस्परिक सहयोग।  लोग पुरोहितों, पंडितों के बहकावे में आकर आडंबरपूर्ण जीवन जीने के बजाय ज्ञान-विज्ञान और तर्कबुद्धि को महत्त्व दें।  गौतम बुद्ध ने कहा था─‘अप्पदीपो भव। ’ अपना दीपक आप बनो।  अर्जक संघ भी ऐसी ही कामना करता है।

रामस्वरूप वर्मा विचारों से पूरी तरह समाजवादी थे।  अपने छात्र जीवन के दौरान ही वे डॉ।  नरेंद्र देव और लोहिया के विचारों से प्रभावित थे।  स्वयं लोहिया उनके व्यक्तित्व से प्रभावित थे।  उन्हें पार्टी के लिए ऐसे ही ईमानदार, विचारशील और प्रतिभाशाली युवाओं की दरकार थी।  इसलिए उनके राजनीति में प्रवेश के निर्णय का लोहिया ने खुले दिल से स्वागत किया था।  रामस्वरूप वर्मा ने भी उन्हें निराश नहीं किया।  राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में हिस्सेदारी करते हुए उन्होंने महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कई राज्यों की यात्राएं कीं।  इस काम में उन्हें मंगलदेव विशारद और महाराज सिंह भारती जैसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले सहयोगी प्राप्त हुए, जिनकी समाजवाद के प्रति निष्ठा असंद्धिग्ध थी।  जिनका सपना रूढ़िमुक्त समाज का था।  जो ब्राह्मणवाद को भारतीय समाज की अनेकानेक समस्याओं के लिए जिम्मेदार मानते थे।  वे जानते थे कि शताब्दियों से जड़ जमाए धर्म और जातिवाद से एकाएक मुक्ति संभव नहीं है।  परंतु लोकतंत्र और वैज्ञानिक सोच की मदद से उन्हें चुनौती दी सकती है।  

‘शोषित दल’ के संस्थापक बाबू जगदेवप्रसाद सिंह ‘अर्जक संघ’ के माध्यम से किए जा रहे कार्यों से बेहद प्रभावित थे।  उनका मानना था का ब्राह्मणवाद के अनाचारों से मुक्ति केवल ‘अर्जक संघ’ द्वारा संभव है।  बाबू जगदेवप्रसाद सिंह और रामस्वरूप वर्मा दोनों का विश्वास था कि श्रम-केंद्रित संस्कृति मानववाद को बढ़ावा देगी।  उसके माध्यम से ब्राह्मणवाद से मुक्ति सहज संभव हो सकेगी।  लेकिन यह काम आसान नहीं है।  क्योंकि शताब्दियों से सत्ता और संसाधनों पर कुंडली मारकर बैठे लोग इतनी आसानी से जगह खाली करने को तैयार न होंगे।  उनके द्वारा फैलाए जा रहे अंधविश्वासों और धार्मिक पाखंडों से मुक्ति के लिए शिक्षा आवश्यक है।  इसलिए उनकी मांग थी कि देश में सभी को शिक्षा के समान अवसर प्राप्त हों।  विद्यालयों का पाठ्यक्रम ऐसा बनाया जाए जो वैज्ञानिक सोच और तर्कबुद्धि को बढ़ावा दे।  नैतिक शिक्षा का आधार मानवीय संबंधों को बनाया जाए।  सरकार को चाहिए कि गरीबों और समाज के पिछड़े वर्गों को प्रोत्साहन देकर आगे लाए।  रामस्वरूप वर्मा, बाबू जगदेवप्रसाद सिंह, महाराज सिंह भारती, बामसेफ के सहसंस्थापक डी।  के।  खापर्डे, पेरियार ललई सिंह यादव जैसे नेताओं के कारण देश में मानो नई सामाजिक-राजनीतिक चेतना अंगड़ाई ले रही थी।  ‘शोषित समाज दल’ का यह नारा उन दिनों गली-गली गूंजता था—

दस का शासन नब्बे पर

नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।

सौ में नब्बे शोषित है,

नब्बे भाग हमारा है।

धन-धरती और राजपाट में,

नब्बे भाग हमारा है।

अपने विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए रामस्वरूप वर्मा ने ‘क्रांति क्यों और कैसे’, ‘ब्राह्मणवाद की शव-परीक्षा’, ‘अछूत समस्या और समाधान’, ‘ब्राह्मण महिमा क्यों और कैसे?’, ‘मानवतावादी प्रश्नोत्तरी’, ‘मनुस्मृति राष्ट्र का कलंक’, ‘निरादर कैसे मिटे’, ‘सृष्टि और प्रलय’, ‘अम्बेडकर साहित्य की जब्ती और बहाली’,  जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों की रचना की।  उनकी लेखन शैली सीधी-सहज और प्रहारक थी।  ऐसी पुस्तकों के लिए प्रकाशक मिलना आसान न था।  सो उन्होंने उन्हें अपने ही खर्च पर प्रकाशित किया।  जहां जरूरी समझा, पुस्तक  को मुफ्त वितरित किया गया।  उत्तर प्रदेश की प्रमुख भाषा हिंदी है।  रामस्वरूप वर्मा स्वयं हिंदी के विद्यार्थी रह चुके थे।  सरकार का कामकाज जनता की भाषा में हो, इस तरह सहज-सरल ढंग से हो कि साधारण से साधारण व्यक्ति भी उसे समझ सके, यह सोचते हुए उन्होंने वित्तमंत्री रहते हुए, सचिवालय से अंग्रेजी टाइपराइटर हटवाकर, हिंदी टाइपराटर लगवा दिए थे।  उस वर्ष का बजट भी उन्होंने हिंदी में तैयार किया था।  जनता को यह परचाने के लिए कि प्रशासन में कौन कहां पर है, उसके धन का कितना हिस्सा प्रशासनिक कार्यों पर खर्च होता है—बजट में छठा अध्याय विशेषरूप से जोड़ा गया था।  उसमें प्रदेश के कर्मचारियों और अधिकारियों का विवरण था।  उस पहल की सभी ने खूब सराहना की थी।  

1970 में उत्तर प्रदेश सरकार ने ललई सिंह की पुस्तक ‘सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन करें’ पर रोक लगा दी।  यह पुस्तक डॉ।  आंबेडकर द्वारा जाति-प्रथा के विरुद्ध दिए गए भाषणों संकलन थी।  सरकार के निर्णय के विरुद्ध ललई सिंह यादव ने उच्च न्यायालय में अपील की।  मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट में था।  रामस्वरूप वर्मा कानून के विद्यार्थी रह चुके थे।  उन्होंने मुकदमे में ललई सिंह यादव की मदद की।  उसके फलस्वरूप 14 मई 1971 को उच्च न्यायालय ने पुस्तक से प्रतिबंध हटा लेने का फैसला सुनाया।

रामस्वरूप वर्मा ने लंबा, सक्रिय और सारगर्भित जीवन जिया था।  उन्होंने कभी नहीं माना कि वे कोई नई क्रांति कर रहे हैं।  विशेषकर अर्जक संघ को लेकर, उनका कहना था कि वे केवल पहले से स्थापित विचारों को  लोकहित में नए सिरे से सामने ला रहे हैं।  उनके अनुसार पूर्व स्थापित विचारधाराओं को, लोकहित को ध्यान में रखकर, नए समय और संदर्भों के अनुरूप प्रस्तुत करना ही क्रांति है।  एक तरह से उनका यह विश्वास सही भी था।  क्योंकि महावीर और बुद्ध के पहले से ही आजीवकों का एक बड़ा संप्रदाय था।  उसके अधिकांश सदस्य अपने श्रम-कौशल द्वारा आजीविका कमाते थे।  जीवन से भागने के बजाय उसका सम्मान करते थे।  मध्यकाल में कबीर और संत रविदास ने भी अपना काम-धंधा करते हुए उपदेश दिए थे।  प्रसिद्ध कहावत है कि ‘आदमी जैसा खाता है, वैसा ही सोचता है’।  तुलसी ने मंदिर में बैठकर, दूसरों के श्रमोत्पाद पर ‘रामचरितमानस’ की रचना की थी।  इसलिए महाकाव्य रचने के बावजूद वे रचनाकार का आत्मविश्वास कभी अर्जित नहीं कर पाए।  अपनी रचनाओं में तुलसी, दुनिया के कदाचित सबसे दीन कवि हैं।  दूसरी ओर अपने श्रम के भरोसे जीवनयापन करने वाले कबीर और रविदास साहित्य में बेहद मुखर हैं।  जहां भी अनैतिकता और अनाचार दिखे, उनकी ललकार दूर तक सुनाई पड़ती है।  

विचारों से कबीर, जीवन में बुद्धिवाद, तर्क और मानववाद को महत्त्व देने वाला, भारतीय राजनीति वह फकीर,  19 अगस्त 1998 को हमसे विदा ले गया।

अर्जक संघ 

भारतीय समाज के संदर्भ में जाति महज सामाजिक समस्या नहीं है।  उसका प्रभाव राजनीतिक और आर्थिक पक्षों पर भी प्रभाव पड़ता है।  इसमें जो जाति के शिखर पर है, वह शुरू से आर्थिक और राजनीतिक सत्ता का लाभ उठाता आया है।  उसका परिणाम भीषण आर्थिक विषमता के रूप में हमारे सामने है।  ऊपर के तीनों वर्ग जो प्रत्यक्ष श्रम से दूर हैं, वे आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सुख-सुविधाओं, पद-प्रतिष्ठा का भरपूर लाभ उठाते हैं।  उनके पास विपुल अधिकार हैं।  दूसरी ओर शूद्र और अतिशूद्र जो समाज के प्रमुख उत्पादक वर्ग हैं, उन्हें उनके श्रम-लाभों से वंचित कर दिया गया है।  उनकी संख्या देश की कुल आबादी की तीन-चौथाई है।  देश और समाज के विकास की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है।  लेकिन जब लाभ के बंटवारे का समय आता है, देश की तीन-चौथाई से ज्यादा कमाई ऊपर के 25 प्रतिशत लोगों में बंट जाती है।  भारतीय समाज में व्याप्त भीषण आर्थिक असमानता की यही वजह है।  धर्म और जाति का विधान लोगों को भुलावे में रखने और यथास्थिति बनाए रखने के लिए है।  इस तरह धर्म और जाति से मुक्ति का मसला, केवल सामाजिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, उसमें आर्थिक स्वतंत्रता और राजनीतिक समानाधिकार एवं सहभागिता की चाहत भी सम्मिलित हैं।   

रामस्वरूप वर्मा ने स्वयं कहते थे कि ‘अर्जक संघ’ के पीछे कोई नई वैचारिकी नहीं थी।  जैन ग्रंथ ‘भगवती सूत्र’ और बौद्ध त्रिपिटक में आजीवक चिंतकों के बारे में आया है।  हालांकि वहां उनकी उपस्थिति केवल उनके मत के खंडन के लिए है।  जैन और बौद्ध दोनों आजीवक चिंतकों के प्रति आलोचनात्मक हैं।  कभी-कभी लगता है मानो उनपर कटाक्ष कर रहे हों।  यह स्वाभाविक था।  समाज में पहले से जमे-जमाए आजीवक और लोकायत विचारधाराओं को चुनौती दिए बिना, किसी नए धर्म-संप्रदाय की स्थापना संभव भी न थी।  बौद्ध साहित्य के अनुसार आरंभ में आजीवक मक्खलि गोशाल के समर्थकों की संख्या गौतम बुद्ध के अनुयायियों से अधिक थी।  ‘दीघनिकाय’ में मक्खलि गोशाल और पूरण कस्सप को पूर्ण ज्ञानी, मत संस्थापक, अनेक लोगों का शास्ता, धर्म-गुरु, मत-संस्थापक आदि माना है।  

बुद्धकालीन अर्थव्यवस्था, जिसे आजीवक या लोकायतकालीन अर्थव्यवस्था भी कहा जा सकता है—के बारे में विचार करें तो उन दिनों भारत का विदेशी व्यापार शिखर पर था।  जो उत्पादक वर्ग था, उसके अपने संगठन थे।  उन संगठनों का इतना प्रभाव था कि राजा को भी उनके कामकाज में हस्तक्षेप करने का अधिकार न था।  ब्राह्मण उन दिनों भी समाज के शिखर पर थे।  वे मानव-बस्तियों से दूर, यज्ञादि में लिप्त रहते थे।  बलि हेतु पशु तथा अन्य समिधा जुटाने के लिए ही वे राजाओं और श्रेष्ठियों के संपर्क में आते थे।  बदले में वे धार्मिक कर्मकांडों का नेतृत्व करते तथा उनके बच्चों को शिक्षा दिया करते थे।  उनके अलावा एक वर्ग कारीगरों, किसानों और शिल्पकारों का था।  जो अपने काम में लीन रहता था।  उनमे से अधिकांश आजीवक संप्रदाय के मानने वाले थे।  आजीवक संप्रदाय अब भले ही लुप्त प्राय हो, परंतु तमिल भाषा में लिखित जैनग्रंथ ‘नीलकेसी’ के अनुसार जिसका लेखनकाल 10वीं शताब्दी है, काशी में एक धनाढ्य सेठ रहता था, जो आजीवक संप्रदाय में विश्वास रखता था।  आजीवक मूलतः प्रकृतिवादी विचारधारा में विश्वास रखते थे।  श्रम-कौशल उनके लिए सब कुछ था।  यज्ञादि कर्मकांड तथा देवताओं के नाम पर होने वाले आडंबर उन्हें स्वीकार्य न थे।  ‘अर्जक संघ’ को हम भारत की उसी आजीवक परंपरा का आधुनिक संस्करण मान सकते हैं।  

‘अर्जक संघ’ मानवीय विवेक को महत्त्व देकर, तर्क और बुद्धिवाद में यकीन रखता है।  धर्म या दैवी शक्ति के नाम पर थोपा गया, कुछ भी उसे स्वीकार नहीं है।  धर्म और उसके समर्थन से पनपा जातिवाद, आदमी-आदमी के बीच भेद करना सिखाता है।  अर्जक संघ का विश्वास है कि प्रकृति सभी के साथ समान व्यवहार करती है।  इसलिए जन्म के आधार पर किसी को छोटा-बड़ा नहीं माना जा सकता।  वह जाति, वर्ण, क्षेत्रीयता आदि किसी भी प्रकार के कृत्रिम विभाजन को नकारता है।  सभी मनुष्य बराबर हैं।  इसलिए सबके अधिकार भी बराबर हैं।  जन्म के आधार पर किसी को छोटा, बड़ा अथवा विशेषाधिकार संपन्न नहीं बताया जा सकता।  जातियां मनुष्य द्वारा निर्मित हैं।  उन्हें प्राकृतिक संरचना के रूप में महिमा-मंडित करना, मनुष्य और मनुष्यता दोनों का अपमान करना है।  उसका मानना है कि ब्राह्मणवाद की विकृतियों और अनाचारों का समाधान केवल मानवतावाद द्वारा संभव है।  ‘अर्जक संघ’ जाति, धर्म, वर्ण, संप्रदाय के भेदभाव से रहित ऐसे समाज की परिकल्पना करता है, जिसमें सभी बराबर हों।  सभी को समान आजादी, सुख, शांति एवं समृद्धि के अवसर प्राप्त हों।  उसका एक बहुप्रचलित नारा है—

‘मानववाद की क्या पहचान,

ब्राह्मण, भंगी एक समान।  

अर्जक संघ के सिद्धांत

अर्जक संघ के सिद्धांत केवल सिद्धांत नहीं, वे उसके कार्यक्रम भी हैं।  इस तरह वह कोई नया संप्रदाय न होकर मानवीयता, बुद्धिपरकता और सौहार्द्र के साथ जीवन जीने की एक शैली है।  फिर भी उसके मुख्य सिद्धांतों /कार्यक्रमों को निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है—

ब्राह्मणवाद का खंडन 

ब्राह्मणवाद जन्म के आधार पर दूसरों पर अपना आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक वर्चस्व बनाए रखने की राजनीति है।  उसकी आधार मान्यता है कि कुछ लोग जन्म से ही विशेष होते हैं।  इसके समर्थक, जो इसका लाभकारी वर्ग भी हैं, ईश्वर को सर्वोपरि मानकर दावा करते हैं कि ईश्वर ने उन्हें विशेष अनुकंपा और अधिकारों के साथ धरती पर भेजा है।  चूंकि शिक्षा का समस्त कारोबार उन्हीं के हाथों में रहता है, इसलिए उनमें  नेतृत्व की योग्यता होती है, जिसे वे अपना जन्मजात गुण बताते है।  हालांकि हर युग में उनके विरोधी हुए हैं, जिससे कई बार उन्हें नेपथ्य में जाना पड़ा है।  ऐसे अवसरों पर विरोधियों के साथ समझौता करके जैसे-तैसे खुद को बचाए रखना उनका चारित्रिक गुण रहा है।  द्वि-जन्म के सिद्धांत पर विश्वास रखना, जनेऊ धारण करना, भाग्यवाद आदि ब्राह्मणवाद के शतरंजी मोहरे हैं, जिनके आधार पर वह शताब्दियों से लोगों को भरमाता आया है।  ‘अर्जक संघ’ ब्राह्मणवाद के सभी प्रतीकों यथा पुजारी, यज्ञादि कर्मकांड, भाग्य, द्विजीकरण की परंपरा आदि का खंडन करते हैं।  वह मानता है कि मनुष्य को उन सभी रीति-रिवाजों और मान्यताओं को हतोत्साहित करना चाहिए, जो समाजार्थिक असमानता और शोषण को बढ़ावा देती हैं।  उन्हें नियतिबद्ध बताती हैं।  ‘अर्जक संघ’ के अनुयायी विवाह, सगाई आदि अवसरों पर ब्राह्मण पुरोहित की उपस्थिति को अनावश्यक और गैर-वाजिब मानते हैं।  उनके लिए विवाह धार्मिक बंधन न होकर एक समझौता मात्र है, जिसे पति-पत्नी एक-दूसरे के सुख, संतोष, संतान और समृद्धि के लिए अपनाते हैं।  ‘अर्जक संघ’ मूर्ति-पूजा, दहेज, जनेऊ संस्कार, विवाह में फिजूलखर्ची के साथ-साथ मृत्युभोज, श्राद्ध आदि का भी विरोध करता है।  वह इनको ब्राह्मणवाद का षड्यंत्र मानता है।  सभी मनुष्य समान हैं।  ब्राह्मण को पायलागन कहकर चरण-वंदना करना एक तरह से उसकी सामाजिक सर्वोच्चता को स्वीकार करता है।  अर्जक संघ इसका विरोध करता है।  

जाति-व्यवस्था को स्थायी रूप देने के लिए ब्राह्मणी विधान में शूद्रों और अछूतों को बराबर में बैठने की आजादी नहीं थी।  उसे जमीन पर बैठने को कहा जाता था।  ‘अर्जक संघ’ इसका विरोध करता है।  धर्म की रचना सामाजिक स्तरीकरण को मान्य ठहराती है।  इसलिए ऐसे किसी भी धार्मिक रीति-रिवाज जो समाज में भेदभाव फैलाता हो, आदमी को छोटे-बड़े, ऊंच-नीच में बांटता हो—का ‘अर्जक संघ’ विरोध करता है।  धर्म मनुष्य की आध्यात्मिक चेतना से जुड़ा मसला है।  हर व्यक्ति जीवन और सृष्टि की उत्पत्ति के कारण की खोज या उसमें विश्वास रखने को स्वतंत्र है।  ‘अर्जक संघ’ के अनुसार माता-पिता के धर्म को उसकी संतान पर लाद देने की परंपरा, उसके स्वविवेक और चयन के अधिकार का विरोध करती है।  इसलिए वह जन्म के आधार पर धर्म निर्धारित करने की परंपरा का भी विरोध करता है।  

आमतौर पर मान लिया जाता है कि धर्म नैतिकता को संबल देता है।  वही उसका आधार है।  वास्तव में है बिलकुल उलटा।  मनुष्यता के आदर्श सर्वोपरि हैं।  क्योंकि मनुष्य ने समाजीकरण के लंबे अनुभव के बाद उनका चयन किया है।  इसलिए प्रत्येक धर्म अपनी स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार उन्हें अपनी आचार-संहिता से जोड़ता है।  दुनिया में धर्मों और संप्रदायों की संख्या दर्जनों में है।  परंतु उनकी आचार-संहिता लगभग एक समान है।  वही आदर्श समाज के स्थायित्व, विकास तथा एकीकरण के लिए आवश्यक हैं।  मानव-मूल्यों को बनाए रखने के लिए किसी भी धर्म की बैशाखी की आवश्यकता नहीं है।  नैतिकता को सर्वोपरि मानते हुए ‘अर्जक संघ’ मानवधर्म का समर्थन करता है, जो और कुछ नहीं बल्कि मानव समाज द्वारा सबकी बेहतरी के लिए चुने गए आदर्शों का लेखा है।

मनुष्य के विवेकीकरण के लिए शिक्षा अनिवार्य है।  ब्राह्मणवादी शिक्षा का स्वरूप सामाजिक भेदभाव को बढ़ाने वाला रहा है।  संघ की मान्यता है कि भारतीय संविधान सर्वसमानता और स्वतंत्रता का समर्थक है, इसलिए परोक्ष रूप में वह धर्म का विरोध करता है।  इसलिए उसकी मांग थी कि ब्राह्मणवाद को आश्रय देने वाले सभी विचार और परंपराएं यथा पुनर्जन्म, भाग्यवाद, जाति-प्रथा, जाति और वर्णाधारित भेदभाव, चमत्कारपूर्ण कहानियों को बच्चों के पाठ्यक्रम से दूर रखना चाहिए।  उसके स्थान पर वैज्ञानिक चेतना से युक्त ऐसी शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए जो मनुष्य को अंधविश्वास, पाखंड, भाग्यवाद, तंत्रमंत्र आदि से मुक्ति दिला सके।  चूंकि सभी मनुष्य एक समान हैं।  स्वतंत्रता और समानता पर सभी का समानाधिकार है, इस आधार पर वह छूआछूत का विरोध करता है।  वह सभी के लिए समान शिक्षा और अवसरों का समर्थक है।  

अर्जक संघ का मानना है कि दांपत्य जीवन की नींव पति-पत्नी की परस्पर सहमति पर रखी जानी चाहिए।  उसके लिए दहेज, फिजूलखर्ची, दिखावे और तड़क-भड़क के लिए कोई स्थान नहीं है।  विवाह के समय पति-पत्नी लिखित सहमति और शर्तें यदि आवश्यक हों, तो तय की जा सकती हैं।  विवाह समारोह साधारण, कम से कम लोगों की उपस्थिति में संपन्न होने चाहिए, ताकि अमीर-गरीब का अंतर जाता रहे।  समाज में कोई भी उसके आधार पर स्वयं को हीन न समझे।  ब्राह्मणवादी संस्कार मनुष्य के जीवन से लेकर मृत्यु तक पीछा नहीं छोड़ते।  और उनके माध्यम से मनुष्य ब्राह्मणों के चंगुल में फंसा रहता है।  ‘अर्जक संघ’ जन्म से लेकर मृत्यु तक सभी ऐसे संस्कारों का विरोध करता है जिसमें ब्राह्मण या वर्ग-विशेष को सामान्य से अधिक अहमियत दी जाती हो।  हिंदुओं के अधिकांश त्योहारों जैसे दीपावली, दशहरा, होली आदि के साथ कोई न कोई मिथ जुड़ा हुआ है।  पर्व-त्योहारों की अपनी प्रासंगिकता है, वे समाज की एकरसता और मेल-जोल बनाए रखने के लिए आवश्यक माने जाते हैं।  ‘अर्जक संघ’ को पर्व-उत्सव आदि से आपत्ति नहीं है।  परंतु वह उन सभी को मिथों को अनावश्यक मानता है जिनसे किसी भी प्रकार की अधिभौतिक सत्ता का नाम जुड़ा है।  वह त्योहारों के रूप में ऐसे मानवीय चलन की कामना करता है, जिससे लोग आपस में मिलें और बराबरी का संदेश जाए।  होली, दीवाली, दशहरा जैसे त्योहार समाज में गैर-बराबरी को पोसते हैं, इसलिए अर्जक संघ इनका बहिष्कार करता है।  वह मुस्लिमों की ईद ओर ईसाइयों के क्रिसमस को भी ऐसा ही त्योहार मानता है।  इनके बजाए वह जिन 14 मानवतावादी त्योहारों को महत्त्व देता है, उनमें गणतंत्र दिवस, आंबेडकर जयंती, बुद्ध जयंती, स्वतंत्रता दिवस, बिरसा मुंडा और पेरियार रामास्वामी की पुण्यतिथियां शामिल हैं।  

‘अर्जक संघ’ मानववाद में विश्वास रखता है।  उसके अनुसार मानववाद या मानवतावाद वह विचारधारा है जो मनुष्य मात्र के लिए समानता, स्वतंत्रता, सुख, समृद्धि और विकास के समान अवसर उपलब्ध कराती हो।  समानता से उसका आशय उठने-बैठने, बोलने, खान-पान, पहनावे, अभिव्यक्ति के अधिकार आदि में किसी भी प्रकार के भेदभाव के निषेध से है।  इसका आदर्श है कि मनुष्य को दूसरों के साथ वही व्यवहार करना चाहिए, जैसा वह अपने प्रति चाहता है।  प्रत्येक मनुष्य का अहं-बोध प्रबल होता है।  भोजन, वस्त्र, आवास आदि की पूर्ति के साथ-साथ प्रत्येक मनुष्य समाज में अपने लिए मान-सम्मान की कामना करता है।  लेकिन सम्मान का स्तर जन्म के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।  उसका आधार मनुष्य की योग्यता, बुद्धि-विवेक, साहस, सहृदयता, सद्भाव आदि होना चाहिए।  इसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक मनुष्य जाति-धर्म की मर्यादाओं से निकलकर एक-दूसरे का सम्मान करें तथा उनके जीवन-लक्ष्यों में प्राप्ति के प्रति सहायक हों।  

शिक्षा मनुष्य का न केवल प्रबोधीकरण करती है, अपतिु उसे समाज में जीने के योग्य भी बनाती है।  इसलिए आवश्यक है कि सभी नागरिकों को शिक्षा के समान अवसर प्राप्त हों-उसमें किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो।  अर्जक संघ का प्रचलित नारा है—‘चपरासी हो या राष्ट्रपति की संतान, सबको शिक्षा एक सामान’।  शिक्षा हेतु ऐसे पाठ्यक्रम का निर्धारण करना चाहिए जो मनुष्य के विवेकीकरण में सहायक हो।  उसे अंधविश्वासों से बाहर निकालकर रूढ़ि मुक्त करे।  मनुष्य की उत्पादन क्षमता को बढ़ाए तथा तर्क-सामर्थ्य का विस्तार करे।  पुनर्जन्म और भाग्य जैसी धारणाएं मनुष्य की उत्पादकता को प्रभावित करती हैं।  उसके सोच को विकृत करती हैं।  ‘अर्जक संघ’ उनका बहिष्कार करता है।  एक समय था जब उसका नारा—‘पुनर्जन्म और भाग्यवाद, इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद’ गली-गली गूंजा करता था।  

‘अर्जक संघ’ का अभिप्राय है, मेहनतकश लोगों का संगठन।  इसमें किसान, मजूदर, शिल्पकार, तकनीशियन आदि वे सभी लोग सम्मिलित हैं जो अपने श्रम-कौशल के आधार पर जीविकोपार्जन करते हैं।  वह बौद्धिक श्रम और शारीरिक श्रम में भेद नहीं करता।  अपितु वह शारीरिक श्रम को बौद्धिक श्रम से ऊंचा मानता है।  उसका मानना है कि बौद्धिक श्रम उत्पादन में सहायक तो हो सकता है, लेकिन वह स्वयं उत्पादन नहीं कर सकता।  दूसरी ओर शारीरिक श्रम द्वारा मनुष्य अपनी जरूरत के लायक कुछ भी उत्पादित कर सकता है।  इसलिए वह बौद्धिक श्रम की अपेक्षा श्रेष्ठतर है।  बौद्धिक श्रम करने वाले प्रायः अपनी स्थिति का लाभ उठाकर समाज में अनुकूल स्थितियों का सृजन कर लेते हैं।  इससे वह वर्ग जो शारीरिक श्रम में लिप्तय और समाज का प्रमुख उत्पादक वर्ग भी है-के साथ अन्याय बढ़ता जाता है।  भारतीय वर्ण-व्यवस्था का स्वरूप कुछ ऐसा है कि इसमें शारीरिक श्रम करने वाले को न केवल सबसे नीचे माना गया है, अपितु उसे मानवोचित मान-सम्मान और सुख से भी वंचित रखा जाता है।  ‘अर्जक संघ’ के अनुसार दूसरों के श्रम पर जीना भिक्षावृत्ति जैसा है।  ब्राह्मण आरंभ से ही दूसरों के श्रम पर जीता आया है।  दूसरी ओर सफाई करने वाला सबसे निकृष्ट काम करता है।  उसे ऐसे काम का उचित मेहनताना तो दूर अपेक्षित मान-सम्मान भी नहीं मिल पाता।  खुद को श्रम से बचाए रखने के लिए ही ब्राह्मणों ने जातिप्रथा की रचना की है।  इसलिए किसी भी रूप में ब्राह्मणवाद का बहिष्कार, व्यक्ति और समाज दोनों के हित में है।  ‘अर्जक संघ’ श्रम को उसका वास्तविक सम्मान दिए जाने का समर्थक है।  इसके लिए वह जाति-प्रथा को गैरजरूरी, भेद-भाव को जन्म देनी वाली अमानवीय प्रथा मानता है।  ‘अर्जक संघ’ संपूर्ण सामाजिक समानता, जिसमें लैंगिक समानता भी सम्मिलित है, का समर्थन करता है।  

दार्शनिक समस्याएं और मानववादी प्रश्नोत्तरी

जब भी कोई व्यक्ति नई राह चलना चाहता है, उसके रास्ते को लेकर तरह-तरह के प्रश्न उठने लगते हैं।  कभी-कभी केवल दिखावे के लिए।  कभी-कभी नई राह की खामियों को पकड़ने का श्रेय लेने की कोशिश में।  ऐसे प्रश्न या जिज्ञासाएं सदैव बेकार नहीं होतीं।  स्थापित विचारधाराओं के बीच नए विचार, धर्म या संप्रदाय की महत्ता दर्शाने के लिए भी कई बार उन प्रश्नों का उत्तर देना आवश्यक हो जाता है।  हालांकि कई बार ऐसे सवाल भी सामने आ जाते हैं जिनका उस संगठन के मुख्य उद्देश्यों से कोई करीबी संबंध नहीं होता।  ‘अर्जक संघ’ के संस्थापक रामस्वरूप वर्मा के आगे भी कुछ ऐसे ही प्रश्न थे।  जैसे ‘अर्जक संघ’ की जीवन, सृष्टि और समाज को लेकर क्या दृष्टि है? जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई? ‘अर्जक संघ’ का मूल उद्देश्य रचनात्मक कार्यक्रमों के जरिए समाज में व्याप्त कुरीतियों से संघर्ष करना था।  दर्शन की जटिल समस्याओं का समाधान उसका उद्देश्य नहीं था।  समस्या थी कि इन प्रश्नों को टालने पर संघ के प्रति लोगों की गंभीरता में कमी आ सकती है।  ऐसे आध्यात्मिक किस्म के प्रश्नों के कुछ ‘मानववादी प्रश्नोत्तरी’ में दिए गए हैं।  

यह पूछने पर कि मानव शरीर की क्या आवश्यकताएं हैं, उत्तर मिलता है—‘शुद्ध वायु, जल, पौष्ठिक भोजन और स्वास्थ्य। ’ अगला प्रश्न था, ‘क्या मन भी शरीर की तरह ही पदार्थ है? उत्तर मिला, ‘प्रत्येक पदार्थ दृश्यमान है।  उसका कोई कोई रूप, स्पष्ट देहाकृति होती है।  सृष्टि का प्रत्येक पदार्थ किसी न किसी रूप में गतिमान है।  गति के लिए पदार्थ का होना आवश्यक है।  इसी तरह मन के लिए भी शरीर की उपस्थिति अनिवार्य है। ’ आशय था कि देह मन का आधार है।  बिना पहले के दूसरा असंभव है।  आगे वे कहते हैं कि मन की यदि कोई गति है तो उसे देह की ऊर्जा ही संभव बनाती है।  गति पदार्थ का गुण है।  इस आधार पर पदार्थ स्वयं चैतन्य है।  इसे हम वेदांत का प्रतिचिंतन कह सकते हैं।  वेदांतियों के अनुसार सृष्टि की समस्त गतिशीलता का स्रोत परमात्मा है।  जबकि भौतिकवादियों के लिए चेतना सृष्टि का विशिष्ट गुण है।  वही उसके कण-कण में समायी होती है।  सभी पदार्थ चैतन्य हैं।  दूसरी ओर विज्ञान कहता है, प्रकृति की प्रत्येक वस्तु छोटे-छोटे कणों से मिलकर बनी है।  वे सदैव गतिमान रहते हैं।  नई खोजें बताती हैं कि परमाणु के भीतर भी अत्यंत छोटे-छोटे कण रहते हैं।  नन्हे-नन्हे ऊर्जा पिंड, वे कहीं ठहरते नहीं।  सदैव गतिमान रहते हैं।  सो चेतना सृष्टि के हर पदार्थ में है।  यही चेतना जब जीवन में ढल जाती है तो पदार्थ जीव बन जाता है।  जिनमें जीवन नहीं है, वह केवल पदार्थ रहता है।  

फिर निर्जीव पदार्थ और जैविक पदार्थ में कैसे अंतर किया जाए? ‘अर्जक संघ’ की दार्शनिकी के अनुसार, ‘निर्जीव पदार्थ वह होता है जिसकी गतिशीलता बाहरी कारणों द्वारा नियंत्रित होती है।  उसपर स्वयं पदार्थ का कोई नियंत्रण नहीं होता।  प्रकृति ने जैसा उसे बनाया है, वैसा बने रहना, उसकी नियति है।  इसलिए गतिमान रहकर भी वह अपनी प्रकृति में स्थिर होता है।  इसलिए उसे निर्जीव पदार्थ कहा जाता है।  जीव पदार्थ वे हैं जो कम या ज्यादा अपनी गतियों पर नियंत्रण रखने का गुण रखते हैं।  समय के साथ इस गुण में बदलाव होता रहता है।  निर्जीव पदार्थ में अपेक्षाकृत जड़ता बनी रहती है।  ‘अर्जक संघ’ के अनुसार जीव वह है जो अपने अंदर ऊर्जा का उत्पादन, उत्पादित ऊर्जा की मदद से आवश्यक अणुओं का उत्पादन और प्रजनन कर सके।  ये गुण मनुष्य में भी हैं, इसलिए मनुष्य स्वयं एक जीव है।  लेकिन प्रकृति का हिस्सा होने के कारण है वह पदार्थ ही है।  हम उसे जैविक पदार्थ भी कह सकते हैं, जो विवेक से काम लेना, अपने अनुभवों और ज्ञान को स्मृति के माध्यम से सहेजना जानता है।

सृष्टि की रचना और विनाश जितना विज्ञान का विषय है उतना ही दर्शनशास्त्र का भी विषय है।  अर्से से दार्शनिक और वैज्ञानिक इसपर चर्चा करते आए हैं।  आस्थावादियों के अनुसार सृष्टि की रचना का एकमात्र  स्रोत और कर्ता ईश्वर है।  वही सृष्टि को बनाता मिटाता रहता है।  परमात्मा या ईश्वर क्या है, इसके बारे में हर धर्म ने अपनी-अपनी धारणाएं गढ़ रखी हैं।  वे धर्म इसलिए हैं क्योंकि उनकी धारणाओं में आसानी से बदलाव नहीं होता।  पीढ़ी दर पीढ़ी लोग उनपर विश्वास करते रहते हैं।  भौतिकवादी या विज्ञानवादी की दृष्टि में परमात्मा जैसे मिथ के लिए कोई जगह नहीं है।  प्रकृति स्वयं ही अपना परमात्मा है।  वही खुद को बनाती और मिटाती है।  प्रकृति सनातन है।  उसकी आंतरिक और बाहरी हलचलों से जीवन बनता और मिटता रहता है।  यह सृष्टि के प्रति भौतिकवादी दृष्टिकोण है।  जिसकी विशेषता है कि वह जड़ नहीं है।  कल को यदि विज्ञान जीवन की उत्पत्ति के बारे में नए निष्कर्ष तक पहुंचता है तो प्रकृतिवादी को अपना निर्णय में संशोधन करते में देर न लगेगी।  

अर्जक संघ तर्क और विवेक बुद्धि पर जोर देता है।  विवेकबुद्धि और कुछ नहीं, तर्कसंगत सोचने की कला और सामथ्र्य है।  जिस तरह चेतना पदार्थ का गुण है, वैसे ही विवेक बुद्धि मनुष्य का गुण है।  तो क्या जानवरों में भी बुद्धि होती है? इसका उत्तर नकारात्मक है।  यह स्थापित तथ्य है कि धरती पर मनुष्य अकेला विवेकशील प्राणी है।  लेकिन भूख लगने पर भोजन तो पशु भी मांगते हैं।  प्यास लगने पर वे पानी की ओर चल पड़ते हैं।  फिर मनुष्य और शेष प्राणियों की बुद्धि में क्या अंतर है।  ‘अर्जक संघ’ ने बुद्धि को सहज बुद्धि और विवेक बुद्धि में बांटा है।  सहज बुद्धि वह है तो शरीर की मूल-भूत आवश्यकताओं द्वारा संचालित होती है।  भूख लगने पर नन्हा शिशु रोने लगता है।  वह भूख के बारे में नहीं जानता।  रोने का अर्थ भी नहीं जानता।  लेकिन अपने अनुभव से वह इतना समझ चुका होता है कि उसका रोना सुनकर ‘मां’ उसे भोजन देने चली आएगी।  यह उसकी सहज बुद्धि है।  मनुष्य को छोड़कर सभी रेंगने वाले प्राणी जो उड़ने में असमर्थ होते हैं, तैरने का हुनर उन्हें सहज-बुद्धि से प्राप्त होता है।  धीरे-धीरे बिना बताए भी मनुष्य यह समझ लेता है कि नदी में हाथ-पांव मारने से शरीर गतिमान होने लगता है।  इसी को तैरना कहा जाता है।  

सहज बुद्धि के लिए बाहरी मदद आवश्यक नहीं है।  प्राणी अकेला ही उसमें निपुण हो जाता है।  जबकि अच्छे-बुरे पर विचार करते हुए समुचित निर्णय लेना विवेक बुद्धि है।  मनुष्य जानवर से इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि उसके पास विवेक होता है।  अपने अच्छे-बुरे का निर्णय कर उसके अनुसार कदम आगे बढ़ा सकता है।  जानवरों में इसका अभाव होता है।  ऐसा मनुष्य जिसके पास कुदरती विवेक बुद्धि है, अगर उसका प्रयोग न करे तो वह जानवरों से बदतर ही माना जाएगा।  बावजूद इसके किसी भी स्थिति में मनुष्य जानवर नहीं बन सकता।  क्योंकि मनुष्य होने के कारण विवेक बुद्धि उसको बाकी जानवरों से, जिनके पास केवल सहज बुद्धि है, अलग करती है।  फिर ऐसा क्या है? जिससे मनुष्य की रक्षा और उन्नति हो? कोई भी व्यक्ति अपनी रक्षा के साथ अपने वांछित जीवन लक्ष्यों भी प्राप्त कर सके? इसका उत्तर है, मनुष्य विवेक वुद्धि के प्रयोग द्वारा अपनी ओर दूसरों की रक्षा एवं उन्नति कर सकता है।  मनुष्य का यही गुण बाकी प्राणियों से उसे अलग कर देता है।  

फिर मन और बुद्धि में क्या अंतर है? कहीं ऐसा तो नहीं जिसे विवेक-बुद्धि कहा गया है, वह मन की गतिशीलता का ही परिचायक हो।  अर्जक संघ की दार्शनिकी के अनुसार मन की प्रत्येक स्थिति विवेक को जन्म देती है।  अगर विवेक कुंठित हो, आदमी जानबूझकर उससे काम लेना बंद कर दे, या बहकावे में आकर विवेक के विपरीत जाने लगे तो दुर्बुद्धि पैदा होती है, जो व्यक्ति को कु-मार्ग की ओर ले जाती है।  विवेकशीलता की क्षमता सभी मनुष्यों में बराबर होती है।  व्यक्ति अपने विवेक सामथ्र्य का उपयोग कर दार्शनिक, वैज्ञानिक, भारवाहक, डाॅक्टर, वकील आदि कुछ भी बन सकता है।  इसलिए वह बाकी प्राणियों से श्रेष्ठ है।  जानवर जिनके पास केवल सहज-बुद्धि है, वे अपना स्वाभाविक जीवन तो जी सकते हैं, विवेक के अभाव में प्रगति नहीं कर सकते।

आवश्यक नहीं कि प्रत्येक दर्शन के पास हर उत्तर का जवाब हो।  ऐसी कामना भी नहीं करनी चाहिए।  यह भी संभव नहीं कि किसी दार्शनिक संप्रदाय की प्रत्येक मान्यता हमें आश्वस्त करे।  इस मायने में बुद्ध सचमुच समझदार थे।  उन्होंने शताब्दियों से उलझे हुए सवालों को टाल दिया था।  ईश्वर है या नहीं? आत्मा का अस्तित्व क्या है? सृष्टि का जन्म कैसे हुआ? प्रलय कैसे और क्या होती है? बुद्ध ने इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दिया।  जब जीवन की समस्याएं ही इतनी अधिक हैं तो जो दृश्यमान नहीं है, जो मनुष्य के बस से बाहर है, उसके बारे में चिंता क्यों की जाए? लेकिन जिज्ञासा तो जिज्ञासा है।  सृष्टि कैसे जन्मी? प्रलय कैसे होती है? ये सब सवाल कभी न कभी तो मनुष्य के दिमाग में आते ही हैं।  रामस्वरूप वर्मा का दृष्टिकोण विज्ञानवादी था।  वे विज्ञान की छांह में ही इन प्रश्नों का समाधान खोजते हैं।  उनके अनुसार पदार्थ अपनी अंतश्चेतना के कारण, गति के कारण जब अंतरिक्ष में फैलने लगता है तो सृष्टि होती है।  और अपने ही आंतरिक बल के कारण, गुरुत्वाकर्षण के कारण जब सिकुड़ने लगता है तो प्रलय आ जाती है।  

आवश्यक नहीं कि जीवन और सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़ा ये प्रश्न और उनके व्यावहारिक उत्तर आपको आश्वस्त ही करंे।  रामस्वरूप वर्मा का उद्देश्य कोई धार्मिक या दार्शनिक मत या संप्रदाय चलाना नहीं था।  जिन लोगों ने इन सवालों की खोज में सहòाब्दियां लगा दीं, उनके मत का क्या हुआ।  खुद को सबसे पुराना, सनातन कहने वाला हिंदू धर्म ही सबसे ज्यादा कुरीतियों का वाहक बना हुआ है।  इसलिए आवश्यक नहीं कि हर नए मत संप्रदाय के पास जीवन और सृष्टि से जुड़े सभी प्रश्नों का उत्तर हो।  हमने पहले भी कहा है कि ‘अर्जक संघ’ को धार्मिक संप्रदाय न होकर महज जीवन शैली है।  मनुष्य पर मनुष्य के भरोसे को, आपसी सहयोग को बढ़ावा देने वाली जीवन-शैली।  यही मानवधर्म है।  जो मनुष्य और उसके कर्तव्यों के बीच आत्मा, परमात्मा, पाप, पुण्य, धर्म-अधर्म को ले आते हैं, वे दरअसल आदमी को भरमाए रखकर अपना उल्लू सीधा करने का काम करते हैं।  असली मजहब इंसानियत है।  इसका उद्देश्य है विकास के रास्ते में सभी को बराबरी पर लाना।  ‘अर्जक संघ’ में जातीयता का बंधन नहीं है।  अर्जक यानी कमेरी (श्रमशील) कौम, जो पसीना बहाकर आजीविका कमाता है—वह अर्जक है।  जो दूसरे के श्रम पर जीता है, वह ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद का पोषक है।  सनातन विचारधारा के उलट अर्जक केवल दो संस्कारों को मानते हैं—विवाह और मृत्यु संस्कार।  शादी के लिए लड़का-लड़की संघ की पहले से तय प्रतिज्ञा को दोहराते हैं और एक-दूसरे को वरमाला पहनाकर शादी के बंधन में बंध जाते हैं।  मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार मुखाग्नि या दफनाना तो होता है।  इसके 5 या 7 दिन बाद दिवंगत की याद में एक शोकसभा होती है, जो सामाजीकरण की आवश्यकता है।  बाकी कर्मकांडों के लिए उनके यहां कोई स्थान नहीं है।  

बहुजन चेतना का निर्माण और अर्जक संघ

मनुष्य को धर्म क्यों चाहिए? किसलिए चाहिए? धर्म है तो क्या ईश्वर भी आवश्यक है? क्या बगैर ईश्वर के धर्म चल नहीं सकता? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जो आरंभ से ही मानवीय सरोकारों का हिस्सा रहे हैं।  इसी के साथ एक और भी सवाल है? क्या दलित और बहुजन के लिए भी धर्म उतना ही अपरिहार्य है, जितना वह ब्राह्मण के लिए है? इस प्रश्न का तुरंता जवाब यह हो सकता है कि ईश्वर जात-पात का भेद नहीं करता।  उसकी निगाह में सभी बराबर हैं।  हालांकि व्यवहार में यह बात सच नहीं बैठती।  धार्मिक व्यवस्थाएं ब्राह्मण और अछूत के लिए अलग-अलग हैं।  ब्राह्मण धर्म का प्रमुख कर्ता है।  जबकि अछूत को ईश्वर का सान्निध्य तो दूर, मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने तक का अधिकार प्राप्त नहीं है।  इसलिए धर्म और ईश्वर का चरित्र वैसा नहीं है, जैसा उसके बारे में दावा किया जाता है।  दोनों सीधे-सीधे अलोकतांत्रिक सत्ताएं हैं।  वहां ब्राह्मण जो धर्मसत्ता के केंद्र में है, सबसे शक्तिशाली है।  उसके अधिकार भी उतने ही अधिक हैं।  सत्ता से दूरी के साथ अधिकार और शक्तियां कमजोर पड़ती जाती हैं।  अछूत और आदिवासी वहां हाशिये के लोग हैं जो शक्ति और अधिकार दोनों से विपन्न हैं।  

अर्जक संघ समानता, स्वतंत्रता और लोकतंत्र का समर्थक है।  वह जन्माधारित भेदभाव को नहीं मानता।  बहुजन कमेरे वर्गों का समूह है, जो समाज के प्रमुख उत्पादक और जीवनी शक्ति हैं।  अर्जक संघ बौद्धिक श्रम और शारीरिक श्रम को बराबर मानता है।  वह श्रम के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव के विरुद्ध है।  वह शिक्षा, रोजगार तथा संसाधनों में सभी की समान भागीदारी का समर्थक है।  वह मानवीय विवेक का समर्थक है।  ऐसे धर्म जिसकी नींव कोरे विश्वास पर टिकी होती है का वह बहिष्कार करता है।  इसके स्थान पर वह मानवधर्म की बात करता है, जिसके अनुसार जन्म के आधार पर न कोई छोटा होता है, न बड़ा। कुल मिलाकर  ‘अर्जक संघ’ ठीक वैसे ही समाज की कामना करता है, जो बहुजन समाज का सपना है।  इसलिए बहुजन समाज उससे आवश्यकतानुसार प्रेरणा ले सकता है।

ओमप्रकाश कश्यप

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