Category Archives: बचपन बहती गंगा

बालक का मन

सामान्य

प्यार के नाम के बहाने

घरपरिवार के बीच बच्चों को हम अक्सर उनके असली नाम से नहीं पुकारते. अपने संबोधन को प्यार का विशेषण देते हैं. फिर टीलू, गीलू, मोनी, टोनी, अंजा, बंजा, बेली, जेली जो शब्द हमें पसंद हो, उसे बच्चों पर लाद देते हैं. असली नाम के लिए लोग पंडित के पास जाते हैं. परिजनों, मित्रों तथा रिश्तेदारों की सलाह लेते हैं. सुप्रसिद्ध हस्तियों के नाम जहन में लाते हैं. पुस्तकों, दूरदर्शन धारावाहिकों, फिल्मों के नायकनायिकाओं को याद करते हैं. अपने लाडले या लाडली के अदद नाम के लिए हम हरचंद कोशिश करते हैं. नाम ऐसा जो एकदम नया हो, अनूठा इतना कि किसी ने सुना तक न हो. जिसका अर्थ बूझने में भी मश्क्कत करनी पड़े. आजकल तो सजेसंवरे नामकोश भी आने लगे हैं, ऊपर से इंटरनेट है. बालक का असली नाम तय करने के लिए जितना परिश्रम और खोजबीन की जाती है, उसका शतांश भी घरेलू नाम के लिए नहीं किया जाता. रोजमर्रा के संबोधन के चयन हेतु हमारी नीतिरीति पूर्णतः भिन्न होती है. उस समय हम केवल अपने मुखसुख का ध्यान रखते हैं. ऐसा नाम जिसे बोलने में जराभी कष्ट न उठाना पड़े. परिजनों, रिश्तेदारों द्वारा रखे गए नामों की संख्या कभीकभी एकाधिक भी हो जाती है. उस अवस्था में बालक को न केवल सभी नामों को अपने अवचेतन में सुरक्षित रखना पड़ता है, बल्कि नाम विशेष द्वारा संबोधित करनेवाले व्यक्ति को भी स्मरण रखना पड़ता है.

मातापिता बच्चे का असली नाम ऐसा रखते हैं जो दूसरों से हटकर जान पड़े, अनूठा, अनसुना और विरल हो. जो उनके अलावा दूसरों को भी पसंद आए. सुनते समय बालक अच्छा और सम्मानित महसूस करे. मगर घरेलू नाम चुनते समय वे केवल और केवल सहजता पर जोर देते हैं. सहजता भी ऐसी जो केवल उन्हें सुख प्रदान करती हो. घरेलू नाम असली का लघु संस्करण भी हो सकता है. जीवन के आसान रास्तों की खोजने वाली मानववृत्ति की सहज, स्वाभाविक खोज. सामान्यतः यह मान लिया जाता है कि बालक को उसके पूरे नाम से हर समय पुकारा जाना न तो संभव है, न ही जरूरी. इसी सोच के साथ असली नाम को दबानिचोड़कर गुठलीसम कर दिया जाता है. इस कोशिश में आलोक ‘अलू’ बन सकता है, मानसी‘मुन्नु’. एक जमाना था जब लोग कसरत करते थे. बड़ीबड़ी मूंछें बढ़ाते थे. तब लोगों के व्यक्तित्व की भांति नाम भी भारीभरकम रखे जाते थे. दरयाब सिंह दलपत, सूबेदार सिंह सिंघानियां वगैरह….अब नई तकनीक का जमाना, नया चलन है. भारीभरकम पिक्चर ट्यूब वाले टेलीविजन और भाप के इंजन की तरह भारीभरकम नाम भी जिंदगी और बाजार दोनों से गायब हो चुके हैं. पढ़ेलिखे लोगों की जुबान पर लंबे नाम चढ़ ही नहीं पाते. मातापिता हल्काफुल्का, नाजुकसा नाम रखते हैं. पर जो रखते हैं, उसे भी पूरी तरह पुकारना उन्हें कठिन लगता है. प्यार का नाम कहकर बच्चे पर मनमाना संबोधन थोप देते हैं. ऐसे संबोधन को बालक कितने प्यार से लेता है? उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है? बालक के व्यक्तित्व पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है? ये बातें कभी उनके दिमाग में नहीं आतीं. न कभी हम यह सोचते हैं कि अगर वही संबोधन उनके मातापिता द्वारा उन्हें दिया गया होता तो कैसा लगता? या जो उपनाम उन्हें दिए गए थे, उन्हें सुनकर वे कैसा महसूस करते थे?

नाम का सरलीकरण अथवा संक्षिप्तीकरण केवल परिवार द्वारा नहीं होता. बड़े परिवार के रूप में समाज भी यही काम करता है. दोनों में अंतर है तो इतना कि मातापिता जहां मुखसुख के लिए अतिरिक्त नाम जोड़ देते हैं, वहीं समाज असली नाम को कसरगड़कर अनुकूलित कर लेता है. वहां व्यक्ति की आर्थिकसामाजिक हैसियत बहुत मायने रखती है. आदमी रसूखवाला हो तो नाम में कांटछांट करने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ती. उल्टे नाम को खींचखांचकर लंबा कर दिया जाता है. लोगों के दिलों में सम्मान भले हो या न हो, पर नाम के साथ मानसम्मान साफ नजर आना चाहिए, यह कोशिश निरंतर बनी रहती है. जनसाधारण के साथ ऐसा नहीं होता. समाज अक्सर उससे सौतेला व्यवहार करता है. लोगों की जुबान पर घिसकरघिसकर फतेहचंद ‘फत्तु’ रह जाता है, ‘किरोड़ीमल’ ‘कुर्री’. इस तरह उनके व्यक्तित्व का अवमूल्यन उसके नामोच्चारण के साथ ही होने लगता है. अभिजन वर्ग की इस चालाकी को सामान्यजन भलीभांति समझते हैं. मगर विभिन्न प्रकार के दबावों के बीच वे कुछ कर नहीं पाते. ये विशेषताएं किसी न किसी रूप में प्रत्येक समाज में पाई जाती हैं.

इसके पर्याप्त उदाहरण हैं कि मातापिता, संबंधियों द्वारा प्यार से दिया गया नाम बच्चे को उतना प्यारा नहीं होता, जितना उन्हें स्वयं को प्यारा होता है अथवा जैसा वे सोचते हैं. नाम के सरलीकरण को लेकर बालक अक्सर भावनात्मक दोहन का शिकार होता है. बल्कि कई बार तो खासा क्षुब्ध भी. घरेलू नाम चूंकि बड़ों के स्नेहप्रदर्शन का बहाना होता है, और ऐसा प्रायः सभी के साथ होता है, इसलिए व्यवहार में ऐसे सरलीकरण को स्वीकार करने के अतिरिक्त बालक के पास दूसरा कोई रास्ता नहीं होता. पर यह समझौता मन से किया गया समझौता नहीं होता. बेमन का समझौता कालांतर में आदत बन जाता है. आदत सहते जाने की, अप्रिय का प्रतिकार न करने और समझौतापरस्ती की. बचपन चूंकि अत्यधिक संवेदनशील अवस्था है, इसलिए नाम चुनने में हुई लापरवाही बालक को कुंठा, तनाव तथा आत्मविश्वास की कमी की ओर ले जाती है. साहित्य अकादमी में उपसंपादक देवेंद्र कुमार देवेश बताते हैं कि उनका पांच वर्षीय बेटा उस समय बुरी तरह नाराज हो जाता है जब पड़ोस की लड़की उसे उसके असली नाम से न बुलाकर ‘जॉज’ कहती है. उस लड़की को यह नाम भला लगता है. उस बच्चे को वह अतिशय प्यार करती है. बावजूद इसके बालक पर इस संबोधन का एकदम उल्टा असर होता है. वह स्वयं को अपमानित महसूस करता है. यह इकलौता उदाहरण नहीं है. खोजने पर हजारों मिल जाएंगे. एक आपबीता किस्सा भी है. चूंकि यह आलेख उसी घटना की परिणति है, इसलिए सनद के रूप में वह ज्यों की त्यों प्रस्तुत है.

ईशान हमारे परिवार में तीसरी पीढ़ी का सदस्य है. उसने इसी चार सितंबर को दो वर्ष तीन महीने पूरे किए हैं. यह घटना करीब दो महीने पहले की है. तब वह दो वर्ष एकसवा महीने का रहा होगा. शरारत में वह दूसरे बच्चों जैसा ही है. घर में हम उसको ईशू कहते हैं. खानेपीने का ज्यादा शौकीन उसे नहीं है. बस साथ खेलने वाला चाहिए. पेट खाली हो तो भी उसका खेल चलता रहता है. ईशू को उस समय बहुत सुख मिलता है जब हम किसी वस्तु से उसका नाम जोड़ देते है. जैसे घर ईशू का है, गाड़ी ईशू की है, मोटर साइकिल ईशू की है वगैरह. ऐसे क्षणों में उसके चेहरे की दीप्ति देखते ही बनती है. उसके अधिकारक्षेत्र में कोई नया नाम जुड़े तो उसकी हंसी दूरदराज की हवा को भी उमंगित कर जाती है.

उस दिन मजाक में ही ईशान को ‘छुटकू’ कहा तो उसकी आश्चर्यजनक प्रतिक्रिया थी

छुटकू नईं दादू….’ वह मचल उठा.

छुटकू तो बहुत अच्छा नाम है….तुम छोटे हो नाम भी छुटकू रख लेते हैं….?’ मैंने छेड़ा था.

नईं….दादू, छुटकू नईं….’ मुझे लगा कि शायद कुछ गलत समझ रहा है. भला दो वर्ष का बालक कैसे समझेगा कि उसका कौनसा नाम अच्छा है. कौनसा बुरा! इसलिए मैंने उसी से पूछा—

क्या तुम्हें ‘ईशू’ कहा जाए….?’ इस संबोधन को वह अच्छी तरह पहचानता है. पर उस दिन मानो उसका अस्मिताबोध प्रबल था, सो तुरंत नट गया—

नईं….ईशान!’

ईशू!’

ईशान…..!’ उसने जोर देकर कहा.

उसके कुछ देर बाद उसको ईशू कहकर संबोधित किया गया तो उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. शायद वह समझता था कि हमें यही पसंद है. यह सोचकर कि उस दिन जो हुआ कहीं महज संयोग ही न हो. बालक हमारे शब्दों का अर्थ ही नहीं समझ पाया हो, सो तीसरेचैथे दिन मैंने उसे फिर टोक दिया—

अरेरे! मेरा छूटकू….’ मैंने प्यार से आमंत्रित किया. वह खुशीखुशी आगे बढ़ा. लेकिन दिमागी सजगता पहले जैसी ही थी. जैसे हमारी एकएक चाल पर नजर हो—

छूटकू नईं, दादू.’ वह पास आतेआते मचला.

हमें तो यही अच्छा लगता है….’

नईं दादू!’

फिर क्या कहें?’

ईशान….’

यह आगे भी आजमाया गया. उसका हर बार एक ही उत्तर था—‘छुटकू नईं, दादू!’

इस घटना से पता चलता है कि बालक आत्मसम्मान का भूखा होता है. फ्रायड, जीन पिगेट, फिलिप ऐरिस, पीटर हंट आदि विद्वानों ने बालअस्मिता की विस्तार से चर्चा की है. बीसवीं शताब्दी के महान बालमनोवैज्ञानिक जीन पीगेट के अनुसार बालक का विकास अहंकारोन्मुखता(Egocentrism) से समाजोन्मुखता (Sociocentrism) की ओर बढ़ता जाता है. चूंकि बालक नैतिकता के पहले पायदान पर होता है, इसलिए उसके व्यवहार में कोई दुराव भी नहीं होता. बालक के जो मन में होता है, वही व्यवहार में. कारण साफ है कि अपने अस्तित्व के प्रति वह अतिरिक्तरूप से सजग होता है. इसको जानना है तो कुछ देर बालक की गतिविधियों का अवलोकन कीजिए. उसका अहंबोध स्पष्ट नजर आने लगेगा. जैसे—शिशु का पसंदीदा खिलौने के लिए आग्रह करना, न मिलने पर मचलना, जिद करना. छीनाझपटी करना. जो प्यारभरा व्यवहार करे उसे ज्यादा महत्त्व देना. डराए, धमकाए तो पास पहुंचने पर मुंह फेर लेना. इन गतिविधियों में बालक का अहंभाव साफ झलकता है. वह चाहता है कि बड़े केवल अपनी न चलाएं. उसकी भी सुनें. उसकी उपस्थिति को भी उतना ही महत्त्व दें. बालक को अपनी बात मनवानी हो, मातापिता पर दबाव बनाना हो तो वह रोने लगता है. रोना केवल कमजोरी या अभाव की स्थिति नहीं है. फिर क्या कारण है कि कोई व्यक्ति लोकभाषा के स्थान पर प्राकृतिक संकेतों का प्रयोग करता है. रोेने के बजाय सीधे वह नहीं कह देता जो उसका उद्दिष्ट है. इसका एकमात्र कारण लोकभाषा का अपर्याप्त ज्ञान नहीं है, क्योंकि बड़ा होने पर जब वह भाषायी उपकरणों को जानने लगता है, उस समय भी रोनारूठना जैसे मनोभाव दबाव के तौर पर प्रयुक्त किए जाते हैं. इसका प्रमुख कारण है, अभिव्यक्ति सामथ्र्य और आत्मविश्वास की कमी. बालक को लगातार दबाने, शब्दों का सही संस्कार न देने से वह भाषायी उपकरणों से अनभिज्ञ बना रहता है. परिणामस्वरूप उसका अभिव्यक्तिसामथ्र्य अविकसित रह जाता है और वह कुंठित रहने लगता है. तब अजनबियों को लेकर डर, संकोच और हीनताबोध जैसे नकारात्मक भाव उसके दिमाग में जगह बना लेते हैं. अगर बालक का विकास मुक्त परिवेश में हो, उसे अपना पक्ष विश्वास के साथ प्रस्तुत करने का प्रशिक्षण दिया जाए, तब वह अपने मनोभावों को बिना किसी झिझक के और स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करेगा. रोनेरूठनेजिद के नैसर्गिक भाषा संकेतों की जरूरत ही नहीं पड़ती.

जीन पिगेट का मानना था कि दुनिया के बारे में बालक के निष्कर्ष उसके अपने अवलोकन पर आधारित होते हैं. उसका सोच हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक वैज्ञानिक और तार्किक होता है. उसका अपना नैतिक संसार होता है, न्यायअन्याय, उचितअनुचित का निर्णय उसका अपना होता है. बालक का नैतिक संसार जरूरी नहीं वही हो जिसके बारे में उसके मातापिता या गुरुजनों ने बताया है. वह उससे एकदम अलग, यहां तक कि उल्टा भी हो सकता है. इसी कारण कभीकभी वह अपने तर्कों से आपको निरुत्तर भी कर सकता है. यही उसके अहंबोध का कारण है. इसलिए शरीर से भले ही दूसरों पर आश्रित नजर आए, दिमाग में बड़ीबड़ी बातें भी न आती हों, जुबान अक्सर तुतला जाती हो, लेकिन अपने विवेकबोध में वह पूरी तरह स्वतंत्र और अस्मिता की सुरक्षा के लिए सदैव सजग होता है. हालात से समझौता करना यदि मजबूरी न हो तो मानसम्मान के मामले में वह खुद को बड़ों से कम नहीं आंकता. जन्म के तुरंत बाद वह अपनी स्वतंत्रता की अनुभूति करने लगता है. इस बोध को न तो सामाजिक संस्कार पूरी तरह मिटा पाते हैं, न ही धार्मिकनैतिककानूनी मर्यादाएं. हालांकि शारीरिक अःशक्तता उसे दूसरों पर निर्भर बनाती तथा उनसे तालमेल बनाए रखने को विवश करती है. परिवार के बीच रहकर वह मान लेता है कि सामंजस्यीकरण समाजीकरण की अनिवार्य स्थिति है. इसलिए वह परिवार और शेष समाज दोनों से तालमेल बनाए रखने की कोशिश करता है. कालांतर में सामाजिक अनुकूलन की प्रक्रिया के बीच बालक जैसेजैसे समाज से सामंजस्य स्थापित करता है, उसका अस्मिताबोध नएनए जन्मे सामाजिकबोध के नीचे दबने लगता है.

स्वातंत्र्यबोध और अस्मिताबोध परस्पर पूरक हैं. स्वातंत्र्यबोध राष्ट्रसमाज में अधिकारों और अवसरों की समानता को दर्शाता है, जबकि अस्मिताबोध समाज में अपनी हैसियत के प्रति विनम्र विश्वास से है. अवसर मिलने पर पर स्वतंत्रताबोध ही अस्मिताबोध के रूप में विकसित होता है. इसी अस्मिताबोध के चलते बालक अपनी पसंदों पर जोर देता है और जो नापसंद हो उसका विरोध करता है. बशर्ते उसको इसका अवसर दिया जाए. उसका विकास खुले वातावरण में हो. लेकिन मातापिता को जल्दी होती है, बालक को अपने समाज के, परिवेश के रंगढंग में ढाल देने की. इसलिए बालक की मर्जी क्या है, किसी मुद्दे को लेकर वह स्वयं क्या सोचता है, यह जानने और इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देने का प्रयास नहीं किया जाता. इसलिए जब भी कोई प्रतिकूल अवसर होता है या उसको विषम परिस्थिति से गुजरना पड़ता है, तब स्वतंत्र निर्णय लेने का अभ्यस्त न होने के कारण वह प्रायः चुप्पी भी साध सकता है. यदि उसको अभिव्यक्ति का पूरा अवसर दिया जाए तो वह एक परिपक्व व्यक्ति की तरह व्यवहार करेगा. यदि कोई बात उसे नापसंद है तो एक स्वतंत्र और विवेकवान नागरिक की भांति उसका यथासंभव प्रतिवाद भी करेगा. डर, संकोच अथवा अभ्यास की कमी से यदि वह अपने मन की बात को साफसाफ नहीं कह पाता, सच कहने में किसी कारण चूक जाता है, और मातापिता उसके निर्णयसामथ्र्य को बढ़ावा देने पर यदि जोर नहीं देते हैं तो उसके मानसिक विकास के अवरुद्ध होने की पूरी संभावना होती है. तब यह मान लेना चाहिए कि बालक को उसके स्वतंत्र विकास के लिए जिन अवसरों की आवश्यकता थी, वे उसको नहीं मिल पाए हैं. उस अवस्था में बालक कुंठा का शिकार भी हो सकता है. इसलिए चाहे शिक्षक हो या बालसाहित्यकार, जो भी बालक के संपूर्ण चारित्रिक विकास की कल्पना करता है, उसके लिए आवश्यक है कि बालक के अस्मिताबोध को कमजोर न पड़ने दे. परंतु क्या ऐसा हो पाता है? असल में बालक के अस्मिताबोध को न समझ पाने के कारण बड़े साहित्यकार भी बालक को निरा बालक समझने की भूल करते रहे हैं. प्यार के नाम पर उपनामकरण और उसके लिए केवल अपनी पसंद को बालक पर थोप देना इसी का हिस्सा है.

बालसाहित्यकार भी इस प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हैं. यथार्थबोध के नाम पर वे भी रचना में उपनामों से काम चलाने की कोशिश करते हैं. वे पात्रों के नाम ही ऐसे रखते हैं जो उपनाम सरीखे हों. हिंदी के एक वरिष्ठ बालसाहित्यकार हैं. विदेशों में घूम आए हैं. उनकी कुछ बालकविताएं तो सचमुच गजब हैं. उनकी हाल की बालकहानियों में पात्र ‘लूलू’ से मिला जा सकता है. ‘लुलु’ अतिसामान्य लड़का होता है. कबाड़ी या ऐसा ही कुछ और. रेंगती हुई जिंदगी का प्रतिनिधि. गांव में ‘लुलु’ जमीन पर रेंगने वाले की ड़े को कहते हैं. कहानी में यह शब्द जुगुप्सा पैदा करता है. यह ठीक है कि बालपाठक कथानायक के नाम से उसकी हैसियत का अंदाज लगा लेता है. इससे उसके दिमाग में यह बात और गाढ़ी हो जाती है कि नाम और व्यक्तित्व का गहरा भेद होता है. इसलिए उपनाम के जरिये यदि कोई ऐसावैसा, निस्सार शब्द उसपर थोपा जाए तो वह उसपर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालता है. साहित्यिक रचना विशेषकर बालसाहित्य में कथापात्रों के नाम का अत्यधिक महत्त्व होता है. लेकिन बालक जो समाज की वर्ग संरचना से करीबकरीब अनजान होता है, उसे होना भी चाहिए, उसके लिए नामकरण ऐसा होना चाहिए जो सामाजिक स्तरीकरण से मुक्त नजर आए. कहा जा सकता है कि कहानी में कहानीपन और कहने का अंदाज देखना चाहिए. परंतु मेरा मानना है कि नामकरण की भी अपनी दृष्टि होती है. तभी तो मनुस्मृति में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के नामकरण का अलगअलग विधान दिया गया है. हम कभी नहीं सोचते कि हमारे द्वारा प्यार के नाम पर रखे गए ऊलजुलूल नाम सुनकर बालक पर क्या गुजरती होगी.

इसका यह अभिप्राय नहीं है कि मातापिता और अभिभावक गण बालक को पसंदीदा संबोधन देना ही छोड़ दें. जीवन केवल बुद्धि द्वारा ही नियंत्रित नहीं होता, उसे दिशा देने के लिए संवेदनतत्त्व भी अनिवार्य है. अतः ऐसा प्रत्येक कार्य या संबोधन तो मातापिता, परिजनों और बालक के संबंधों को आत्मीय और करीबी बनाए, वह जायज है. उसका सम्मान किया जाना चाहिए. लेकिन वह संबोधन ऐसा होना चाहिए जो घरपरिवार और समाज के बीच बालक के मानसम्मान की रक्षा करे, जिससे उसका व्यक्तित्व निखरकर सामने आए. गरिमाहीन, अर्थहीन और बालक के अहंबोध को चोट पहुंचाने वाले संबोधनों से जितना हो सके दूर ही रहना चाहिए. यह ध्यान रखना चाहिए कि आने वाला समय अधिक चुनौतीपूर्ण होने वाला है. उसका सामना विखंडित मानस द्वारा संभव नहीं है. अतएव मातापिता और समाज का कर्तव्य है कि वे बालक के व्यक्तित्व निर्माण और उसके बहुमुखी विकास के लिए यथासंभव प्रयास करें. मातापिता का काम बालक पर अपनी पसंदे और सपने सौंपना नहीं है. बल्कि उनका कर्तव्य बालक को भविष्य के नागरिक के रूप में तैयार करना है.

बड़ों द्वारा कथित प्यार के नाम दिया गया नाम बच्चे को कैसा लगता है, इस पर शोध होना चाहिए. एक शोध इस विषय पर भी होना चाहिए कि बचपन में जिन लोगों को उनके प्यार का नाम जराभी पसंद नहीं था, उनके व्यक्तित्व में संकोच, अविश्वास और हीनताबोध पैदा करने में इन कथित प्यार के नामों की भूमिका क्या और कितनी है? अपने बचपन के नाम को बेपर्दा करना मुझे आज भी अच्छा नहीं लगेगा. उस समय भी हिम्मत नहीं होती थी कि कह पाऊं कि श्रीमन् इस प्यार के नाम को आप अपने पास रखिए, मुझे मेरे असली नाम से पुकारिए. मेरे जैसे और भी दूसरे बालकबड़े होंगे जो अपनी पसंदनापसंद का इजहार करने में चूक जाते हैं. मुझे उस तथाकथित प्यार के नाम ने जो संकोच, अविश्वास और हीनताबोध बख्शा था, वह आज भी कम नहीं हुआ है. अंत में एक भरोसा, एक उम्मीद कि प्यार के नाम पर बालक के साथ मनमानी का खेल आगे और नहीं चलने वाला. नए सोच के चलते बचपन को समझने के लिए जिस तरह से जोर दिया जा रहा है, उससे उम्मीद है कि मातापिता इस हकीकत को समझेंगे और उपनामकरण के बहाने बालक पर कुछ भी ऊलजुलूल थोपने से बचेंगे. लेखकगण पात्रों के नामकरण के समय ध्यान देंगे. अपनी तीसरी पीढ़ी के युवतम सदस्य ईशान को देखकर मैं दावे के साथ यह भी कह सकता हूं. आने वाली पीढ़ी में इतना आत्मविश्वास है कि जो उसे नापसंद है उसका तत्काल विरोध कर सके.

© ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com

बचपन बहती गंगा

सामान्य

हर बालक अपने आप में एक्टीविस्ट होता है. पुराने को भंग कर नए की स्थापना को उत्सुक. आप उसे खिलौना दीजिए. कुछ देर खेलेगा, उसके बाहरभीतर झांकनेसमझने की कोशिश करेगा. तोड़ने का मन हुआ तो पल गंवाए बिना वैसा प्रयास भी करेगा. खिलौना महंगा है, पैसा खर्च करके लाया गया हैखूनपसीने की कमाई का है. ऐसा कोई मुहावरा वह नहीं समझता. मातापिता समझते हैं. वे बालक को बरजते हैं. रोकते हैं खिलौना तोड़ने से. बालक अक्सर मान भी जाता है. मान लेता है कि खिलौने के अंतनिर्हित सत्य को जानने के ज्यादा जरूरी है उसके साथ जीना.

जन्म के तुरंत बाद नवशिशु जब स्वयं को विराट प्रकृति के संपर्क में आता है तो अपने परिवेश को जानना चाहता है. शारीरिक रूप से वह भले माता पर निर्भर हो, लेकिन चाहता यही है कि दुनिया को अपनी तरह से जानेसमझे. हर छोटेबड़े कार्य में बड़ों की मदद लेना बालक की नैसर्गिक प्रवृत्ति नहीं. समाज की संरचना उसे विवश करती है. बालक चाहता है कि मातापिता उसकी जिज्ञासापूर्ति में सहायक बनें. अपनी ओर से कुछ थोपें नहीं. लेकिन मातापिता तथा अभिभावकगण जो बालक के आसपास का परिवेश रचते हैं, समाज से अनुकूलित कर चुके लोग होते हैं. उनकी जिज्ञासा की आंच ठंडी पड़ चुकी होती है. अनुभव तपे व्यक्ति के संपर्क में जब प्रखर जिज्ञासायुक्त बालक आता है तो ‘बड़े’ को अपना बड़प्पन खतरे में जान पड़ता है. उस समय जो विवेकवान और ज्ञानार्जन की ललक को बचाए हुए है, जान जाता है कि समाज से अनुकूलन की प्रक्रिया में वह कितना कुछ पीछे छोड़ आया है. इसलिए वह बालक के बहुमुखी विकास के लिए मुक्त परिवेश रचता है. सामान्यजन बालक की बौद्धिक प्रखरता और अतीव जिज्ञासा को समझ नहीं पाते. इसलिए वे बालक पर अपना निर्णय थोपने का प्रयास करते हैं. शारीरिक रूप से बड़ों पर निर्भरता बालक को उनकी बात मानने के लिए विवश करती है. प्रारंभ में उसके मन में विद्रोहभाव पनपता है. लेकिन जब वह देखता है कि उसके मातापिता समेत आसपास के सभी लोग परिस्थितियों के आगे नतमस्तक हैं, तब वह भी समर्पण की मुद्रा में आ जाता है.

कुछ लोग कहेंगे कि समाज में रहना है तो बालक को उसके तौरतरीके भी सिखाने होंगे. इसलिए मातापिता, सगेसंबंधी गलत नहीं करते. वे वही शिक्षा देते हैं जो उसको समाजोपयोगी बनाने में मदद करे. पर क्या वे सचमुच ऐसा कर पाते हैं? क्या वे ऐसी शिक्षा दे पाते हैं जो बालक की रचनात्मकता का सदुपयोग करती हो? जो उसके मस्तिष्क को सीमाबद्ध करने के बजाय मुक्त करे! दिमाग की खिड़कियों को खोलती चली जाए! कल्पना को पंख, सोच को नववितान दे! सवाल यह भी है कि क्या बालक को उसकी स्वतंत्रता के नाम पर मनमानी करने का अधिकार दिया जा सकता है? आखिर मातापिता जिस समाज से अनुकूलन करने की शिक्षा बालक को देते हैं, वह कोई एक दिन या एक व्यक्ति की रचना नहीं. मानवीय सभ्यता, संस्कृति तथा जीवनमूल्य की गरिमा प्राप्त कर चुकी सामाजिक आचारसंहिताएं—मानवीय मेधा एक उसकी जिजीविषा के शताब्दियों लंबे का परिणाम हैं. मनुष्य और पशु में अंतर भी यही है कि मनुष्य अपने ज्ञान को सहेजता हुआ, भावी संततियों को सौंपता चला जाता है. पशु अपने ज्ञान, अनुभवादि को सहेज नहीं पाते, इसलिए शताब्दियों से वे वहीं के वहीं टिके हुए हैं, जबकि मनुष्य ने प्रगति के एक के बाद एक सोपान पार किए हैं. अनुभव संपदा को बचाए रखने के लोभ में प्रत्येक समाज विगत की बांह में बांह डालकर चलता है. भविष्य की ओर एकाएक कुलांच नहीं मारता.

बालक की समझ में यह सत्य देर से आता है. धीरेधीरे वह परिवेश को आत्मसात करने लगता है. अनुकूलन की प्रवृत्ति बढ़ती ही जाती है. लेकिन इस कोशिश में बालक की मौलिकता, उसकी सृजनात्मकता और जिज्ञासावृत्ति निरंतर कमजोर पड़ती जाती हैं. बालक की मौलिकता बनी रहे, वह अपने सृजनसामथ्र्य का अधिकतम लोककल्याण में निवेश करे, लोकहित को पहचाने—इसके लिए उपयुक्त शिक्षा जरूरी है. वह मनुष्य को समाजोपयोगी बनने में मदद करती है. लेकिन हमारे शिक्षातंत्र का ढांचा ऐसा है कि बालक के मौलिक विकास के लिए उसमें बहुत कम ‘स्पेस’ बच पाता है. बालक अपने अनुभव से सीखना, अपने विवेकानुसार उसका संवर्धन करना चाहता है. अरस्तु की माने तो जन्म के समय बालक का मस्तिष्क पूरी तरह खाली होता है. शायद इसलिए उसमें उतावलापन होता है. अनुभवों के जरिये मस्तिष्क को बोध से भर लेने की जल्दी. अनुभव और शिक्षा इसमें मददगार सिद्ध होते हैं. इसलिए अरस्तु का सुझाव था कि बच्चों को अकादमिक और व्यावहारिक शिक्षा साथसाथ दी जानी चाहिए. उसके पूर्ववर्ती विद्वान सुकरात का कहना था कि—

ज्ञान का जन्म अज्ञान की कोख से होता है, सत्य की खोज निरंतर प्रश्नाकुलता द्वारा ही संभव है.’

इसके बावजूद हम हैं कि अपने अनुभव उसपर थोप देना चाहते हैं. ग्यारहवीं शताब्दी में अरबी विद्वान इब्न सीन अरस्तु का पक्ष दोहराते हुए कहा कि जन्म के समय मानवीय बोध खाली स्लेट जैसा होता है. शिक्षा उसको परिष्कृतपरिमार्जित करती है.’ विकासक्रम के बीच मानवीय प्रज्ञा वस्तुगत चेतना से ऊपर उठती हुई सक्रिय चेतना के स्तर को प्राप्त करती है और निरंतर विकासोन्मुखी रहने के बाद ही वह बोध के उच्चतम शिखर को छू पाती है.’ सीन के विचारों को इब्न तुफैल ने अपने दार्शनिक उपन्यास ‘हाये इब्न याक्जां’ में उपयोग किया. तुफैल ने बालक को ऐसे व्यक्ति की संज्ञा दी जिसका मस्तिष्क समाज के ‘लंदफंद’ से पूर्णतः मुक्त है. उपन्यास में दर्शाया गया था कि व्यक्ति केवल अनुभव से सीखता है. इब्न तुफैल के दार्शनिक उपन्यास का लातिनी अनुवाद ‘फिलोसोफस आॅटोडेक्टस’ शीर्षक से किया गया. उस उपन्यास को प्रकाशित किया था एडबर्ड पा॓कोक ने. इस उपन्यास से प्रेरणा लेकर सतरहवीं शताब्दी में जान ला॓क ने मानवीय विवेकीकरण की प्रक्रिया पर लंबा लेख लिखा, जिसमें उसने सिद्ध किया था कि मनुष्य के ज्ञान का मूल उद्गम उसका अनुभव है. इस लेख को भरपूर ख्याति मिली और जान ला॓क का नाम अपने समय के प्रमुख दर्शनशास्त्रियों में लिया जाने लगा. लेकिन ला॓क से लगभग एक शताब्दी पहले ही मस्तिष्क को कोरी स्लेट कहे जाने के विचार की समीक्षा करते हुए शताब्दी के महान चेक शिक्षाशास्त्री जा॓न अमोस काॅमिनियस(1592-1670) ने कहा था—

यह ठीक है कि बच्चे का मस्तिष्क कोरी सलेट होता है, जिसपर हम मनचाही इबारत लिख सकते हैं. लेकिन एक अर्थ में यह उससे भी बढ़कर है. सलेट की सीमा होती है. हम उसपर उसके आकार से अधिक कोई इबारत लिख ही नहीं सकते. जबकि मानवमस्तिष्क अनंत क्षमतावान होता है. उसपर जितना चाहे लिखा जा सकता है, क्योंकि वह निस्सीम है.’

काॅमिनयस का कहना था कि बच्चे स्वभावतः अच्छे होते हैं. इतने कि उन्हें सद्गुणों की खान कहा जा सकता है. तथापि उनके व्यक्तित्व को निखारने के लिए शिक्षा अनिवार्य है. का॓मिनियस ने ये विचार उस समय और समाज में व्यक्त किए थे, जहां एक सर्वमान्य मान्यता थी कि पाप मनुष्य के साथ उसके जन्म से जुड़ा है. पापपंक से उबारने के लिए शिक्षा (धार्मिक) अनिवार्य है. इस मान्यता के चलते तत्कालीन समाज में शिक्षा के नाम पर बलप्रयोग सामान्य बात थी. अपनी पुस्तक ‘डाइडेक्टिा मेग्ना’, जिसका अभिप्राय संपूर्ण शिक्षणकला से है, में का॓मिनियस ने शिक्षापद्धति को लेकर मौलिक विचार प्रस्तुत किए गए थे. उसका कहना था कि न केवल अमीर और ताकतवर वर्ग के बच्चों, बल्कि गांवों, कस्बों, शहरों में रहने वाले अभिजात और सामान्य, गरीब और अमीर, झोपड़ियों और अट्टालिकाओं के सभी लड़केलड़कियों को शिक्षा के लिए अनिवार्यतः स्कूल जाना चाहिए. ये विचार तत्कालीन यूरोपीय समाज में क्रांतिकारी थे. काॅमिनियस की पुस्तक वर्षों तक कई यूरोपीय भाषाओं में बेस्टसेलर बनी रही.

बीसवीं शताब्दी में बालकों के मन को समझा मारिया मानटेसरी ने. पेशे से डा॓क्टर मारिया को जिम्मेदारी सौंपी गई, मानसिक रूप से कमजोर बच्चों की देखभाल की. वह बच्चों के कुदरती हुनर को निखारकर उनकी प्रतिभा को तराशने में विश्वास रखती थी. वह अक्सर कहती—‘शिक्षा वह नहीं जो अध्यापकगण देते हैं; या जो तय पाठ्यक्रम द्वारा उपलब्ध कराई जाती है. शिक्षा तो व्यक्तिमात्र द्वारा किया जाने वाला नैसर्गिक उपक्रम है, जो कक्षा में पढ़ानेभर से पूरा नहीं हो जाता, बल्कि जीवनभर चलता रहता है. शिक्षाचक्र को पूरा करने के लिए परिवेश के संपूर्ण साक्षात्कार अनिवार्य है.’ मारिया का मानना था कि शिक्षण के पुनीत कर्तव्य को समर्पित शिक्षक को अपने विद्यार्थी की वैसे मदद करनी चाहिए, जैसे नौकर अपने स्वामी की करता है. लोग मारिया के प्रयोगों का मखौल उड़ाते. आरोप लगाते कि अर्धविक्षिप्त और मानसिक विकलांगता के शिकार बच्चों की शिक्षा पर वह अपना श्रम और सरकार का धन वृथा लुटा रही है. आलोचनाओं से निस्पृह, धुन की पक्की मारिया अपने प्रयासों में जुटी रही. उसको पहली सफलता उस समय मिली जब मानसिक रूप से विकलांग उसके कई विद्यार्थियों ने राज्य स्तरीय परीक्षा न केवल पास की, बल्कि औसत विद्यार्थियों से अधिक नंबर लाकर उस समय के शिक्षाविज्ञानियों को चकित कर दिया था. कुछ वर्ष पहले आई आमिर खान की चर्चित फिल्म ‘तारे जमीन पर’ के दर्शील सफारी का चरित्र का कांसेप्ट मारिया के छात्रों से लिया गया है.

मारिया ने जो काम इटली में किया भारत में उसको अंजाम देने वाले थे, गिजुभाई. उनके प्रशंसक उन्हें ‘मूंछों वाली मां’ कहते थे. गिजु भाई बापू के भक्त ठहरे. उनके साथ दक्षिण अफ्रीका में वकालत करते. उन्हीं की प्रेरणा से रचनात्मक कार्यों से नेह लगा. बापू भारत लौटने लगे तो जमीजमाई वकालत छोड़ गिजु भाई ने भी स्वदेश की राह ली. भारत आकर बापू तो राजनीति में लग गए. उनका काम बड़ा था. पर गिजुभाई क्या करें? उन्होंने बापू से बात की. बापू ने गिजु भाई को बच्चों को शिक्षित बनाने का काम दिया. एक न एक दिन अंग्रेजों को यह देश छोड़कर जाना ही होगा. उस समय राष्ट्र निर्माण की जरूरत होगी. नई पीढ़ी को नए सोच और चुनौतियों से निपटने योग्य बनाना है. बापू का निर्देश पाकर गिजु भाई अपने काम में जुट गए. बच्चों को पढ़ाना साधारणजन की निगाह में भले मामूली काम हो. लेकिन नई सृष्टि के जरूरी है नई दृष्टि की. सोच रचनात्मक सोच हो तो मामूली चीजों को भी विशिष्ट बनाया जा सकता है. फिर गांधी का कोई शिष्य अरचनात्मक हो ही नही सकता था. गिजुभाई भी परंपरा से होते आए को दोहराते तो भला कौन उनको याद रखता!

बापू की सलाह पर गिजु भाई ने टूटेफूटे सरकारी स्कूल को अपनी प्रयोगशाला बनाया. वे गाकर, नाचकर, झूमझूम कर, किस्साकहानी सुनाकर बच्चों को शिक्षा देने लगे. परिणाम उम्मीद से सवाया निकला. पहले बच्चे स्कूल के नाम से कन्नी काटते, सीखने से भागते थे. अब भागभागकर विद्यालय आने लगे. गिजु भाई ने अपने गीतों और किस्सोंकहानियों के माध्यम से बच्चों को एक साल में उतना सिखा दिया, जितना दूसरे अध्यापक पांचसात वर्षों भी नहीं सिखा पाते थे. उन दिनों मारिया मांटेसरी की यूरोप में धूम मची थी. गिजु भाई ने भारत का पहला बाल मन्दिर मांटेसरी पद्धति से दक्षिणामूर्ति भावनगर में खोला. कामयाबी मिलने लगी. गिजु भाई की उपलब्धियों से आह्लादित बापू ने एक बार कहा था—‘गिजु भाई का बच्चों के लिए काम मेरे काम से भी बड़ा है.’

गिजु भाई कहानियों को बालशिक्षण का महत्त्वपूर्ण औजार मानते थे. कहानी सुनाना आसान काम नहीं. यह भी एक कला है. आनंद बांटते हुए आनंदमग्न होने और आनंद लूटने की कला. गिजुभाई कहते थे कि कहानियों को असरदार बनाना उन्हें सुनाने वाले पर निर्भर करता है….कहानी को—‘आप रसीले ढंग से कहिए. कहानी सुनाने के लहजे से कहिए. कहानी भी ऐसी चुनें, जो बच्चे की उम्र से मेल खाती हो. कहानियां आप बच्चों को रटाना नहीं. बल्कि, पहले आप खुद अनुभव करें कि ये कहानियां जादू की छड़ीसी हैं….यदि आपको बच्चों के साथ प्यार का रिश्ता जोड़ना है तो उसकी नींव कहानी से डालें. यदि आपको बच्चों का प्यार पाना है तो कहानी भी एक जरिया है. लेकिन पंडित बनकर भी कहानी नहीं सुनाना. कील की तरह बोध ठोकने की कोशिश कभी न करना. कभी थोपना भी नहीं. यह तो बहती गंगा है. इसमें पहले आप डुबकी लगाएं, फिर बच्चों को भी नहलाएं.’

ज्ञान की मौलिकता को बचाने की. उसको संवर्धितसंरक्षित करने की कोशिश समयसमय पर अनेक विद्वानों ने की है. इसके बावजूद बच्चे पर अपना बोध थोपने की, उसके साथ मनमानी करने की कोशिश होती रही है. समाज में व्याप्त बौद्धिक जड़ता, हताशा, नाउम्मीदी और विवेकहीनता का एक कारण यह भी है कि हम नएपन से घबराते हैं. उसको मुश्किल मानकर लीक पर घिसटते जाते हैं. और बालक जो नए सपने, नई ऊर्जा, नया जोश और नए संकल्प लेकर इस दुनिया में आता है उसको भी उसी लीक पर ला पटकने की कोशिशों में लगे रहते हैं. जन्म के साथ ही स्थितियों से समझौते की, चुनौतियों से पलायन की आदत उसमें डाल देते हैं. हम स्वयं को आसानी से नहीं बदल सकते. बदलना चाहें तो एकाएक वह संभव भी नहीं है. लेकिन यदि हम समाज को बदलना चाहते हैं, यदि हम अपनी आंखों में कुछ बेहतरीन ख्बाव सजाना चाहते हैं तो हमें केवल इतना करना होगा कि बच्चों के बोध को मुक्त कर दें. उन्हें उनके सोच का विस्तृत वितान दें. इस समाज को बदलते तब देर नहीं लगेगी. समय हमारी मुट्ठी में भले न हो, लेकिन बालक समय को अपनी मुट्ठी में लेकर आता है. यह हम ही जो समय पर उसकी पकड़ को ढीला करने का अवरत प्रयास करते रहते हैं. इस बात से अनजान की हमारी यह आदत आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान की नई रोशनी से वंचित कर देती है.

ओमप्रकाश कश्यप