Category Archives: प्लेटो : स्वप्नदृष्टा दार्शनिक

प्लेटो के आदर्शलोक में शिक्षा नीति : लैंगिक समानता का प्रथम स्वप्न

सामान्य

राज्य की एकता और अखंडता सर्वोपरि है. इसके लिए प्लेटो ने सुझाव दिया था कि राज्य का आकार कभी भी तय सीमा से अधिक नहीं होना चाहिए. लोगों को अपने विकास के, तरक्की के अवसर भी मिलने चाहिए. इसके लिए उचित होगा कि प्रशासन को समानता के दायरे में रखा जाए. उसमें किसी भी प्रकार का वर्गीय विभाजन, ऊंचनीच की भावना नहीं होनी चाहिए. लोगों में कर्तव्यभावना जाग्रत हो, उनमें इतना विवेक हो कि वे राज्य के कल्याण के लिए आवश्यक नियमकानून बना सकें. वे शारीरिक रूप से स्वस्थ और मजबूत हों, ताकि युद्धकाल में शत्रु के समक्ष मोर्चे पर डटे रह सकेंइसके लिए प्लेटो शारीरिक और बौद्धिक दोनों ही प्रकार की शिक्षा पर जोर देता है.

शिक्षा के बारे में उसके विचार आधुनिक के करीब तथा किसी भी प्रकार के पूर्वग्रह से मुक्त थे. वह समाज में स्त्रीपुरुष के बीच किसी भी प्रकार के भेदभाव को अस्वीकार करता था. उसका मानना था कि स्त्री और पुरुष बराबर हैं. इसलिए स्त्रियों को भी पुरुषों के समान पढ़नेलिखने के अवसर मिलने चाहिए. उन्हें समाज के सर्वश्रेष्ठ संरक्षकों के अधीन रखा जाना चाहिए, जो उनके साथ समानतापूर्ण व्यवहार कर सकें. उल्लेखनीय है कि प्लेटो से जीवनकाल में एथेंस में स्त्रीपुरुष अधिकारों में काफी अंतर था. स्त्रियों को पुरुषों से अलग, एकांत स्थल पर रहना पड़ता था. सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेने की उन्हें मनाही थी. समाज में भी उन्हें केवल कामेच्छापूर्ति तथा संतानोत्पत्ति का साधन माना जाता था. ऐसे में प्लेटो ने खुलकर लिखा था कि उन्हें पुरुषों के समान ही शिक्षा तथा अन्य अवसर प्राप्त होने चाहिए, ताकि वे भी अपना विकास कर सकें. प्लेटो का यह विचार इस भावना से प्रेरित था कि मनुष्य की आत्मा ही महत्त्वपूर्ण है, वही ‘शुभ’ की संरक्षक है. लेकिन वह एक उभयलिंगी सत्ता है. हालांकि उसने माना कि स्त्री और पुरुष की स्वभावगत भिन्नताएं और शारीक्षिक क्षमताएं अलगअलग हो सकती हैं. सामान्यतः ये समाज और स्थानीय लोकाचारों में अंतर का परिणाम होती हैं. तथापि यह भेद कहीं से भी प्राकृतिक नहीं है. अतः समाज को स्त्री के साथ बजाय किसी प्रकार का भेदभाव करने के, उन्हें वे सभी अवसर देने चाहिए जो उनके मानसिक और शारीरिक विकास के लिए अत्यावश्यक हैं.

प्लेटो ने यह भी स्वीकार किया था कि स्त्री और पुरुष को साथसाथ शिक्षा देने, साथसाथ व्यायाम कक्षाओं में हिस्सा लेने की अनुमति देने से कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां उत्पन्न हो सकती हैं. सामान्य लोकाचार के विपरीत होने के कारण लोग आरंभ में उनका उपहास भी उड़ा सकते हैं. एक प्रश्न के उत्तर में वह उन स्थितियों पर भी विचार करता है जब लड़के और लड़की को साथसाथ व्यायाम करते देख, विशेषकर जब लड़कियां अर्धनग्न अवस्था में व्यायामरत हों, उत्पन्न हो सकती हैं. उस अवस्था में लड़के उनका उपहास भी कर सकते हैं. यदि स्त्री वुजुर्ग अथवा देखने में असुंदर है तो इसकी संभावना अधिक भी हो सकती है. इसके बावजूद व्यापक हित में उन्हें मात्र इसी कारण से शारीरिक और अकादमिक शिक्षा से वंचित नहीं किया जाना चाहिए.

रिपब्लिक’ के पांचवे खंड में वह स्त्रीपुरुष की शारीरिक एवं मानसिक भिन्नताओं पर चर्चा करता है और इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि ये आभासी हैं. पांचवे खंड में एडीमेंटस, पोलीमार्क्स और ग्लुकोन के साथ चर्चा में हिस्सा ले रहा सुकरात कहता है कि जिस प्रकार घर की देखभाल के लिए कुत्ते का चयन करते समय यह नहीं देखा जाता कि वह नर है अथवा मादा, केवल उसके गुणों पर ध्यान पर रखा जाता है, इसी प्रकार सामाजिक दायित्वों के अनुपालन के लिए भी स्त्री और पुरुष के भेद को नजरंदाज किया जाना चाहिए. यदि फिर भी कोई मानता है कि स्त्री और पुरुष की कार्यक्षमताओं में अंतर होता है तो भी कार्यविभाजन के समय इस अंतर की उपेक्षा की जानी चाहिए. प्लेटो ने सुकरात से कहलवाया है—

और यदिस्त्री और पुरुष की देहयष्टि, उसके कार्य अथवा प्रदर्शन में यदि कोई अंतर लक्षित भी होता है, तो हम यह कहते हैं कि उस कार्य अथवा प्रदर्शन का दायित्वभार उनमें से ही किसी अन्य को सौंप दिया जाना चाहिए(जो उस कार्य को करने में अधिक निपुण हों). लेकिन वह अंतर यदि सिर्फ बाहरी पहनावे और देहरचना तक सीमित है तो इसका यह अभिप्राय कदापि नहीं है कि स्त्री पुरुष से भिन्न अथवा कमतर है तथा उसको किसी क्षेत्रविशेष में शिक्षित किया ही नहीं जा सकता, इसलिए हमें अपने अभिभावकों तथा उनकी पत्नियों को एक ही स्तर की शिक्षा देनी चाहिए. इस मामले में किसी भी प्रकार का भेद करना अनुचित एवं न्याय भावना के विरुद्ध होगा.’

ऐसा नहीं है कि अपने विचारों में प्लेटो ने सर्वत्र उदारता ही बरती हो. यदि ऐसा होता तो आज से करीब चौबीस सौ वर्ष पहले ही यूनान में वास्तविक लोकतंत्र को बढ़ावा मिलता है. कम से कम उस दिशा में मौलिक चिंतन कुछ तो आगे बढ़ता. दरअसल प्लेटो और सुकरात दोनों ही स्पार्टा की सादगी से बेहद प्रभावित थे. एक युद्धसमर्पित समाज बनाने के लिए स्पार्टा ने अपने नागरिकों से उनका निजी जीवन छीन रखा था. परंतु प्लेटो के लिए व्यापक राज्य हितों के लिए यह बलिदान बहुत मामूली था. यद्यपि सादगी की कीमत वहां के नागरिकों को अपने अस्मिताबोध से चुकानी पड़ती थी. राज्यहित के आगे वहां व्यक्तिहितों को गौण माना जाता था. यही नहीं, व्यक्ति को अपनी महत्त्वाकांक्षाएं, जीवन की खुशियां, यहां तक कि अपनी पारिवारिक पहचान भी राज्य के पक्ष में भुलानी पड़ती थी. प्लेटो सुदृद्ध राजनीतिक तंत्र के पक्ष में था. इसके लिए राज्य का अधिनायकवादी रवैया भी उसको स्वीकार्य था. शिक्षा, कला, स्वास्थ्यरक्षण आदि के प्रति वह इसलिए आग्रहशील है. क्योंकि वह केंद्र की मजबूती और खुशहाली के लिए भी अत्यावश्यक है. प्लेटो की निगाह में राज्य के आगे व्यक्ति की अपनी इच्छाआकांक्षाएं अर्थविहीन है. यहां तक वह बच्चों को भी उनके मातापिता से अलग राज्य के संरक्षण में इस प्रकार पाले जाने का अनुमोदन करता है, ताकि मातापिता और संतान में से कोई भी परस्पर पहचान न सके. प्लेटो की अंतिम संवादिका है—‘लॉज’. जिसमें वह ऐसी सलाह देता है, जो आधुनिक समाज में शायद ही मान्य हो. हालांकि उन दिनों स्पार्टा में ऐसी वही व्यवस्था थी, परंतु प्लेटो का इसे समर्थन इसलिए हैरान करने वाला है, क्योंकि वह संभवतः पहला विचारक है जो स्त्रीपुरुष समानता के पक्ष में आवाज उठाता है. स्त्री की शिक्षा एवं स्वास्थ्यरक्षण की अनिवार्यता पर जोर देते हुए वह लिखता है कि—

अभिभावक वर्ग की पत्नियां तथा उनकी संतान संयुक्त होनी चाहिए. इस तरह कि किसी भी मातापिता को उसकी संतान के बारे में कोई जानकारी न हो, न ही कोई बालक अपने मातापिता के बारे में जान पाए.’

यह संदेह व्यक्त करने पर कि पत्नियों और बच्चों के संयुक्त रहने पर क्या विवाद नहीं होंगे? प्रत्युत्तर में प्लेटो आश्वस्त करता है कि स्थिति ठीक इसके विपरीत होगी. पत्नी और संतान के एक होने से लोगों के बीच परस्पर अधिक भाईचारा, विश्वसनीयता और पारिवारिकता भी पनप सकती है, जो उन्हें एकदूसरे से सहयोग के लिए प्रेरित करेगी. संयुक्त पत्नियों और बच्चों की परिकल्पना के पीछे प्लेटो की असली मंशा अभिभावक वर्ग को पारिवारिक संबंधों तथा भावनात्मक बंधनों से मुक्त करने की थी, ताकि वे समाज के प्रति पूर्णतः एकनिष्ठ रहकर अपने दायित्वों का परिपालन कर सकें. उसका मानना था कि बच्चे और पत्नियां संयुक्त होंगे तो निजी संपत्ति की आवश्यकता भी खत्म हो जाएगी. इसलिए उससे बच्चों को राज्य के संरक्षण में रखने का सुझाव दिया था. यह संभावना व्यक्त करने पर कि संयुक्त संतान होने पर बच्चों की उपेक्षा होने लगेगी—प्लेटो की प्रतिक्रिया थी कि इससे लोग बच्चों के लालनपालन पर संयुक्तरूप से अधिक ध्यान देंगे. बालक परिवार की आर्थिक हैसियत से मुक्त एक समानतापूर्ण वातावरण में पलेगा. इसलिए बच्चों के पालनपोषण में कोई कमी नहीं आएगी.

परिवार की अवधारणा को समाप्त करने के पीछे प्लेटो का मानना था कि इससे एक ऐसे स्वयं अनुशासित शासकवर्ग का विकास हो सकेगा जो अधिक संगठित, एकात्मक, सहिष्णु तथा प्रतिद्विंद्वता की भावना से मुक्त हो. स्पार्टा का नागरिक जीवन युद्ध की अनिवार्यताओं से संचालित था. प्लेटो स्पार्टा की समाजव्यवस्था से कितना प्रेरित था. इसका अनुमान उसकी इस मान्यता से भी लगाया जा सकता है कि वह जहां हृष्टपुष्ट बच्चों का विशेष ध्यान देने पर जोर देता है, ताकि वे बड़े होकर अच्छे सैनिक का धर्म निभा सकें. वह शारीरिकमानसिकरूप से कमजोर बच्चों को शेष बच्चों से अलग रखने की सलाह देता है. अपने आदर्श राज्य में प्लेटो विवाहसंस्था को अनावश्यक मानता था. उसका मानना था कि—

समाज में स्त्रीपुरुष की एक संयुक्त जीवनचर्या होनी चाहिए….उनकी शिक्षा संयुक्त रूप से हो, उनके बच्चे संयुक्त परिवेश में रहें. फिर चाहे वे युद्ध पर हों अथवा शांति काल में आम शहरी का जीवन बिता रहे हों—बच्चों का पालनपोषण भी संयुक्तरूप से करें. वे साथसाथ काम करें, ऐसे ही जैसे कि कुत्ते एकजुट होकर शिकार करते हैं. स्त्रियोंपुरुषों के संबंध भी सामूहिक हों तथा वे अपने कर्तव्य का पालन इतनी निष्ठा के साथ करें, जितना कि वे अधिकतम कर सकते हैं. कोई भी कानून का उल्लंघन न करे, कामसंबंधों के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखा जाए.’

बच्चों के संयुक्त पालनपोषण की परिकल्पना के पीछे उसका विचार था कि इससे लोग अपने बारे में सोचना छोड़कर पूरे समाज के बारे में सोचेंगे. अपने राज्य के बारे में सोचेंगे. शिक्षा के बारे में प्लेटो के विचार अपने समय के किसी भी अन्य विद्वान की अपेक्षा कहीं अधिक प्रगतिशील थे. वह शिक्षा के मामले में किसी भी प्रकार की जोरजबरदस्ती अथवा दबाव का विरोध करता था. उसका मानना था कि—

एक स्वतंत्र व्यक्ति को कुछ भी दबाव में नहीं सीखना चाहिए. अनिवार्य शारीरिक व्यायाम शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता, किंतु जोरजबरदस्ती की शिक्षा कभी दिमाग में नहीं ठहरतीइसलिए दबाव को छोड़ो, बच्चों को खेलखेल में सीखने दो.’

करीब 2400 वर्ष पहले जब तक यूनानी समाज में नागरिकबोध पर्याप्तरूप से विकसित नहीं हुआ था, प्रायः सभी समाज कबीलों में बंटे थे. उनके बीच आपसी युद्ध और तनातनी सामान्य बात थी. युद्ध के कारण भी मामूली होते थे. मगर उन युद्धों में अनेक निर्दोष मारे जाते थे. जो गिरफ्तार होते, उन्हें विजेता पक्ष दास बनाकर अपने अधिकार में ले लेता था. बाकी जीवन उन्हें इसी गुलामी में बिताना पड़ता था. ऐसे में राज्य में शांतिव्यवस्था बनाए रखना प्रत्येक विचारक की समस्या थी. इसका एक उपाय उन्हें मजबूत केंद्र के रूप में दिखाई देता था. भारत में चाणक्य की भांति प्लेटो भी एक सुदृढ़ केंद्र का समर्थक था. राज्य की संगठित ताकत को कोई खतरा न हो, इसलिए उसका सुझाव था कि राज्य यह ध्यान रखे कि उसके नागरिकों के दिमाग में क्या चल रहा है. खासकर बुद्धिमान लोगों के. स्पार्टा में तो कला, साहित्य आदि जो व्यक्ति को अंतर्मुखी बनाते हैं, को गैरजरूरी माना गया था. प्लेटो स्वयं भी स्पार्टा से प्रभावित था. युवावस्था में प्लेटो ने स्वयं भी प्रेम कविताएं लिखी थीं. शायद इसी लगाव के कारण वह साहित्य और कलाओं का सीधे विरोध तो नहीं करता. वह राज्य को ऐसे लोगों पर नजर रखने की सलाह देता है. उसके अनुसार—

राज्य का सबसे पहला काम होगा गल्पकथा लेखकों पर पाबंदी लगाना, और उसके बाद अच्छी और बुरी गल्पकथाओं का चयन करना, हम चाहेंगे कि माताएं और धाय बच्चों को वही कहानियां सुनाएं जो उनके लिए निर्धारित की गई हैं. उन कहानियों को बच्चों में लोकप्रिय बनाएं जो उनके हाथपैर सक्रिय बनातीं यानी उन्हें परिश्रम करना सिखाती हों. समाज में फिलहाल सुनीसुनाई जा रही कहानियों में से अधिकांश बकवास हैं, इसलिए उनका विरोध किया जाना चाहिए.’

साहित्य और कलाओं में यथार्थवाद का समर्थक प्लेटो प्राचीन यूनानी कवियों होमर और हेसोद की रचनाओं को भी बच्चों के लिए नुकसानदेह मानता है. उसका मानना है कि इन कथाओं को बच्चों को सुनाना उनके आगे ‘झूठ बोलने, बल्कि भद्दा झूठ बोलने जैसा’ है. कलात्मक चित्रकला का विरोध करते हुए उसने कहा था कि चित्रकार अपनी कूंची से प्रकृति का जो चित्र खींचता है, उसका सच से कोई वास्ता नहीं होता. वह जिस फंतासी को अपने चित्र के माध्यम से दर्शाना चाहता है, वह बच्चों को एक ऐसी बनावटी दुनिया से परचाती से है, जो यथार्थ से एकदम परे है. इसलिए बच्चों को ऐसी चित्रकला और कथासाहित्य से दूर रखना चाहिए. सुकरात का विचार था कि बच्चे यथार्थ और कल्पनाजगत में अंतर करने में असमर्थ होते हैं, इस कारण कभीकभी वे कल्पनाजगत को ही वास्तविक संसार मानकर व्यवहार करने लगते हैं. इसलिए प्रारंभ में उन्हें ऐसी कहानियां सुनाई जानी चाहिए जो नैतिक शिक्षा देने वाली हों.

स्मरणीय है कि उस समय प्राचीन यूनान में कला और साहित्य की स्थिति भारत के रीतिकालीन कलासाहित्य के समान थी. यूनानी सम्राट प्रतिष्ठित कलाकारों एवं दार्शनिकों को अपने आश्रय में रखते थे. ऐसे उपकृत विद्वान अपनी प्रतिभा का उपयोग अपने आश्रयदाता को प्रसन्न करने के लिए करते थे. प्लेटो ने ऐसे साहित्य को बच्चों से दूर रखने को कहा है. उसका मानना था कि सभी मनुष्य अपने आप में अपूर्ण हैं और उनके अनेक लक्षण जानवरों से मिलतेजुलते हैं. मगर वह यह भी मानता कि शिक्षा के माध्यम से मनुष्य अपने आप को ऊपर उठा सकता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

प्लेटो का राजनीतिक दर्शन : परमशुभ की साधना

सामान्य

कहा जाता है कि आधुनिक समाज में दर्शन की जितनी भी चिंतनधाराएं हैं, सभी प्लेटो के विशद् लेखन की पादटिप्पणियां हैं. गुरु सुकरात ने प्लेटो के चिंतन को नूतन दिशा दी थी. उसी के विचारों का प्रभाव था कि अपनी सभी कविताओं, जिनमें वह पांडुलिपि भी थी, जो एक प्रतियोगिता के लिए तैयार की गई थी, को उसने सुकरात के मिलने के पश्चात आग के हवाले कर दिया था. सुकरात ने ही उसको समझाया था कि ‘शुभत्व’ दुनिया से, जीवन से बाहर की वस्तु नहीं है, प्रत्येक व्यक्ति जो उसकी कामना करता है, वह उसको प्राप्त कर सकता है. उसका यह भी मानना था कि शुभत्व व्यक्तिमात्र का, लक्षण है. हर कोई शुभ की कामना करता है. ज्ञान और सत्याचरण शुभत्व को प्राप्त करने के साधन हैं. सुकरात से पहले प्राणी और परमात्मा के बीच अलंघ्य दूरी थी. दर्शन वादविवाद में बदल चुका था. दूसरों को शास्त्रार्थ में परास्त कर देना ही बुद्धिमानी का पर्याय था. सोफिस्ट विचारक तो इसी को अपने जीवन का ध्येय मानते थे. इसी प्रकार की शिक्षा देने में उन्हें प्रवीणता प्राप्त थी. किंतु सुकरात ने यह कहकर कि हर कोई शुभत्व की कामना करता है, परोक्षरूप में यह भी स्वीकारा था कि आत्मोत्थान की चाहत व्यक्तिमात्र का लक्षण है. तदनुसार सभी एकदूसरे के बराबर हैं. अंतर केवल बाहरी है. मनुष्य और ईश्वर यानी आत्मा और परमात्मा के बीच भी अलंघ्य दूरी नहीं है. मनुष्य चाहे तो स्वयं को नैतिकरूप से इतना ऊंचा उठा सकता है कि परमात्मा से सीधा संवाद कर सके. कह सकते हैं कि सुकरात की विचारधारा ईश्वर और इंसान के अंतर को मेटती, उन्हें परस्पर करीब लाती थी. उससे पहले यह संभव न था. ऐसा भी नहीं है कि सुकरात ने जो कहा वह सर्वथा अनूठा था. भारत में औपनिषदिक मुनि प्रायः यही कहते आए थे. गौतम बुद्ध ने तो नैतिक प्रश्नों को इतना अहम् माना था कि उनसे बाहर सोचने, इतर अभिकल्पना करने को भी अनावश्यक माना था. यूनान और भारत के बीच प्रगाढ़ व्यापारिक संबंध भी थे. व्यापारिक काफिले भौतिक वस्तुओं के अलावा विचारों एवं सांस्कृतिक उपादानों का भी आदानप्रदान करते हो. इसलिए यह असंभव नहीं कि यूनान और भारतीय मनीषा आपस में एकदूसरे को आरंभ से ही प्रभावित करते रहे हों.

प्लेटो के सामने समस्या थी कि शुभत्व की यात्रा को आसान कैसे बनाया जाए. चूंकि परमात्मा परमशुभ है, अतः उसको पाने, उसके जैसा बनने के लिए व्यक्ति को भी अपने स्तर से ऊपर उठना होगा. इसके लिए उसका चारित्रिक विकास अत्यावश्यक है. अतएव जरूरी है कि हर व्यक्ति ‘शुभत्व’ के लक्षणों को पहचाने. उन्हें प्यार करे. उनकी राह का राही बने तथा इस पुनीत कर्तव्य में दूसरों की भी यथासंभव सहायता करे. उसने आचरण की पवित्रता पर जोर दिया है. वह जानता था कि व्यक्ति की शांति में ही समाज की शांति और प्रगति निहित है. इसलिए उसने एक आदर्श समाज का सपना देखा था. उसके कल्पनालोक की झलक हमें उसकी महत्त्वाकांक्षी संवादपुस्तक ‘रिपब्लिक’ में दिखाई पड़ती है. दस अध्यायों में बंटे इस विशद् ग्रंथ में प्लेटो शिक्षा, समाज, न्याय, नैतिकता सहित विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों यथा कुलीनतावाद, राजशाही, साम्राज्यवाद, गणतंत्र, तानाशाही आदि पर विस्तृत चर्चा करता है. बट्रेंड रसेल के अनुसार विषय की दृष्टि से यह पुस्तक मोटे तौर पर तीन हिस्सों में बंटी है. पहले खंड से लेकर चौथे खंड से समापन से कुछ पहले तक वह अपने आदर्श समाज की भूमिका बनाता है. किंतु न्याय की व्याख्या को वह इस हिस्से से अलग रखता है. स्पष्ट है कि रिपब्लिक’ के लेखन के दौरान ही प्लेटो के मन में न्याय को लेकर अलग से पुस्तक तैयार करने की भूमिका बन चुकी थी, जो आगे चलकर ‘ला॓ज’ में पूरी हुई. चैथे खंड के बाकी हिस्से से सातवें खंड तक वह ‘दार्शनिक’ सम्राट की अपनी परिकल्पना को विस्तार देता है, यह सिद्ध करने का प्रयत्न करता है कि केवल दार्शनिक ही आदर्श सम्राट हो सकते हैं. पुस्तक के आठवें से दसवें खंड इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं कि इनमें वह सभी प्रचलित शासन प्रणालियों यथा सामंतशाही, राजतंत्र, तानाशाही और गणतंत्र के गुणअवगुण पर विचार करता है. उस समय तक यूनान में आदर्श समाज की संकल्पना जन्म ले चुकी थी. ‘रिपब्लिक’ में यह कल्पनालोक अधिक व्यवस्थित रूप से मौजूद है. लेकिन यदि यहीं तक सीमित होता तो प्लेटो अन्य यूनानी विचारकों जितनी ख्याति से ही संतोष करना पड़ता. उसका योगदान इससे कहीं अधिक है. वह आदर्शवादी समाज की संकल्पना तथा उसको साकार बनाने के लिए व्यवस्थित चिंतन प्रस्तुत करता है. सुकरात और अपने समकालीन विचारकों के अध्ययन के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि सम्राट को दार्शनिक होना चाहिए, तभी वह समाज को निजी आकांक्षाओं एवं प्रलोभनों से परे रखकर विकासवादी दृष्टि से देख सकता है. व्यक्तिवादी दृष्टि राज्य को भी सीमाओं में कैद कर देती है. यदि व्यक्तिविशेष सोचे कि राज्य को कैसा होना चाहिए, तो राष्ट्र संबंधी उसकी अभिकल्पना भी पूर्णतः व्यक्तिवादी अभिकल्पना होगी. जबकि कल्याणकारी राज्य के लिए आवश्यक है कि वह अपने अधिक से अधिक नागरिकों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करे. प्लेटो ने इसके लिए राज्य के जिन सद्गुणों की बात कहता है, वे हैं—साहस, ज्ञान, सहिष्णुता तथा न्याय. न्याय की अधिकतम संभाव्यता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि राज्य में राजनीतिक दर्शन की प्रमुख शर्तों का पालन होता हो.

प्लेटो ने मानवसमाज के वर्गीकरण आधार उसकी नैसर्गिक प्रतिभा, शक्ति तथा साहस को माना है. जो विलक्षण प्रतिभाशाली नहीं हैं, न बहादुर हैं और न ही हृष्टपुष्ट हैं, वे प्रायः उत्पादक कार्यों, खेती, हाथ के दस्तकार के सर्वाधिक उपयुक्त माने जाते हैं. मगर जो सुंदरसजीले हैं, साथ में ताकतवर और साहसी भी हैं, उनको सुरक्षा और राजनीति के क्षेत्र में लिया जाना चाहिए. उनमें भी जो अतिरिक्तरूप से साहसी, विलक्षण प्रतिभाशाली और सद्गुण संपन्न हैं, वे राज्य को चलाने में स्वयं समर्थ होंगे. प्लेटो के आदर्श राज्य की परिकल्पना अभिजात वर्ग पर निर्भर है. यूनानी भाषा में जिसका अर्थ है, ‘सर्वोत्तम द्वारा सुशासन’. इस विश्लेषण से यह नहीं समझ लेना चाहिए कि प्लेटो की शासन व्यवस्था में कम प्रतिभाशली अथवा जनसाधारण के लिए कोई स्थान नहीं है. उसका मानना है कि समाज का बहुसंख्यक वर्ग, यानी जनसाधारण जो न सामान्य स्तर का प्रतिभाशाली है, शरीर सौष्ठव और युद्धकला में भी उतना प्रवीण नहीं है, को समाज के शेष कार्यों का दायित्व सौंपा जाना चाहिए. इस वर्ग को उसने ‘उत्पादक’ वर्ग की संज्ञा दी है. प्लेटो के समय में यही वर्ग लौहमति, काष्ठकारी, बुनकर, रंगाई, कृषिकर्म, व्यापार आदि में लिप्त था. आर्थिक दृष्टि से इस वर्ग की आय सीमित थी, मगर संख्या की दृष्टि से यह अन्य सभी वर्गों से बड़ा था. उन दिनों यूनान में युवाओं का सेना में भर्ती होना गर्व और प्रतिष्ठा का विषय था. पुलिस और सैन्यबलों को ‘सुरक्षा दस्ता’ कहा जाता था. समाज और राज्य दोनों की बागडोर सर्वाधिक प्रतिभाशाली, वीर, साहसी, अतीव धैर्यवान नागरिकों के समूह को को सौंपी जाती थी, जिन्हें ‘गार्जियन’ यानी अभिभावक कहा जाता था. प्लेटो के आदर्श राज्य में ‘साहस’ को सुरक्षाकर्मियों तथा ‘बुद्धिमानी’ को अभिभावकों का लक्षण बताया गया है. उसके अनुसार राज्य के स्थायित्व के लिए आवश्यक है कि ‘उत्पादक’ यानी कृषक और शिल्पकर्मी, सुरक्षाकर्मियों के अनुशासन में हों और सुरक्षाबल पूरी तरह से अभिभावकों के नियंत्रण में रहें. इनमें ये यदि एक भी समूह अपने कर्तव्यपालन में चूक करता है, अनुशासन को भंग करता है, तो उससे राज्य की शांति भंग हो सकती है. समाज और सरकार के इन विभिन्न अंगों में कर्तव्यपरायणता की भावना स्वयंस्फूर्त होनी चाहिए, न कि किसी बाह्यः दबाव से अनुप्रेत. यदि अनुशासन के प्रति अंतःपे्ररणा का अभाव है तो उसके लिए सरकार को अतिरिक्त संसाधन खर्च करने होंगे, जिससे विकास की गति में गिरावट आ सकती है. इसलिए प्लेटो ने आत्मानुशासन एवं दायित्वभावना पर जोर दिया है.

प्लेटो का आदर्शलोक

प्लेटो पहला दार्शनिक था, जिसने न्यायाधारित समाज का सपना देखा था. उसका मानना था कि शिक्षा केवल शीर्षस्थ वर्ग सीमित न रहे. जबकि जनसाधारण को भी अपने बौद्धिक विकास के अवसर प्राप्त हों. उसकी बहुचर्चित पुस्तक ‘रिपब्लिक’ का प्रथम उद्देश्य ही न्याय को परिभाषित करना है. यद्धपि न्याय की उसकी परिकल्पना कानून, न्यायालय, वकील आदि की प्रचलित अवधारणा से भिन्न है. न्याय से उसका अभिप्राय नैतिकता और आत्मानुशासन की भावना से है. चूंकि किसी भी पदार्थ की गुणवत्ता का आकलन करना बड़े परिवेश में अपेक्षाकृत आसान होता है, इसलिए वह न्याय को पूरे समाज के संदर्भ में देखता है, न कि व्यक्तिविशेष की वस्तु मानकर. यह मानते हुए कि न्याय किसी भी आदर्श राज्य की पहली जरूरत हो सकता है, अतएव वह न्याय को उसकी संपूर्णता में स्थापित करना चाहता है. प्लेटो का समाजदर्शन वास्तव में वह कल्याणकारी सपना है, जो उसकी आंखों में आदर्शसमाज की स्थापना को लेकर था. प्लेटो सबसे पहला विचारक था जिसने नागरिकों को तीन समूहों में वर्गीकृत किया था, वे हैं—जनसाधारण, सिपाही या रक्षक तथा अभिभावक. समस्त राजकीय शक्तियां अभिभावक के अधीन होती हैं, जिनकी संख्या बाकी दो वर्गों के सापेक्ष बहुत कम होती है. अभिभावक कौन बन सकता है? वही जो बुद्धिमानी में अद्वितीय हो. जो सर्वाधिक धैर्यवान और विवेकसंपन्न हो. जो इतना शक्तिशाली भी हो कि आवश्यकता पड़ने पर युद्ध के मैदान में सैनिकों का नेतृत्व कर सके. अभिभावक वर्ग के सदस्यों का चयन संवैधानिक नियमों के अनुसार किया जाता है. यूनान की तत्कालीन प्र्रथा के अनुसार अभिभावक वर्ग का चयन प्रायः वंशानुगत आधार पर किया जाता था. मगर कभीकभी किसी विलक्षण प्रतिभासंपन्न किशोर को भी भी वरिष्ठों की कतार में सम्मिलित कर लिया जाता था. अभिभावक नियुक्त किए जाने के बाद भी उसके कार्यों की समीक्षा की जाती थी. भ्रष्टाचार अथवा अकर्मण्यता के आरोपी को पदावनत कर वरिष्ठों की सभा से निष्कासित कर दिया जाता था. प्लेटो के सामने मुख्य समस्या थी वरिष्ठों को संविधान के प्रति जवाबदेह और समर्पित बनाए जाने की थी. चूंकि यह कार्य व्यक्तिगत नैतिकता, बुद्धिमानी और समर्पणभाव के साथ ही संभव है, अतएव अपने लक्ष्य को प्राप्त करने, समाज को मर्यादित बनाने के लिए वह आर्थिक, शैक्षिक, जैविक, धार्मिक, राजनीति आदि अनेक व्यवस्थाओं को अपनाने का सुझाव देता है. भारतीय वर्णव्यवस्था में ब्राह्मणों को मिले अतिरिक्त अधिकारों की भांति प्लेटो भी अभिभावक वर्ग के लिए अतिरिक्त अधिकारों की संस्तुति करता है, तथापि दोनों में अंतर है. भारतीय वाङमय में यह काम जहां धर्म आग्रह अथवा धर्म के निर्देशन में किया जाता है, प्लेटो पदाधिकारियों का चयन वस्तुनिष्ठ ढंग से, उनकी अपनी योग्यता और कार्यकुशलता के आधार पर करने का सुझाव देता है. उसकी सामाजिकराजनीतिक आचारसंहिता के कुछ प्रावधान केवल रक्षकों के लिए है. बावजूद इसके उसका विशेष आग्रह वरिष्ठों को जवाबदेह बनाने पर है, जो बिना शिक्षा के संभव नहीं.

प्लेटो जीवन में शिक्षा को कितना महत्त्व देता था, इसका परिचय उसके द्वारा स्थापित ‘अकादमी’ से भी मिलता है. वह शिक्षा को बहुआयामी बनाने का समर्थक था. अपने आदर्शलोक के लिए उसने शिक्षा को दो प्रमुख वर्गों में वर्गीकृत किया था, वे हैं—संगीत और शारीरिक व्यायाम. संगीत और व्यायाम दोनों को ही वह व्यापक संदर्भों में देखता था. उसके लिए संगीत का अभिप्राय था, हर वह चीज जो मानवसंतति के क्षेत्र में आती हो, जिससे मानवसमाज को उन्नत बनाया जा सके. इसमें राजनीति, कला, साहित्य, दर्शन, अर्थशास्त्र सभी में प्रवीणता ही व्यक्ति को जीवनक्षेत्र में सफल बना सकती है. इनमें से किसी एक विषय में भी अधूरे ज्ञान से जीवन की लय बिगड़ सकती है. इसी प्रकार व्यायाम का अभिप्राय था, हर वह वस्तु जो शारीरिक कसरत और प्रशिक्षण के क्षेत्र से संबद्ध हो, जिसके द्वारा शरीर के साथ मन को भी ऊर्जा मिले. इस तरह प्राचीन यूनानी शब्दावली में संगीत का अभिप्राय लगभग उतना ही व्यापक था, जितना आजकल संस्कृति का है. इसी प्रकार व्यायाम से अभिप्राय बौद्धिक और शारीरिक स्फूर्ति और ऊर्जा से था. प्लेटो का मानना था कि संस्कृति का काम व्यक्ति को स्वाभाविक रूप से विनम्र एवं उदार बनाना है. ‘रिपब्लिक’ में यूनानी अभिजात वर्ग का जिस तरह चित्रण किया गया है, उससे जाहिर होता है कि वह धनवैभव और प्रतिष्ठा का तो भोग करता था, किंतु राजनीतिक एकाधिकारवाद से मुक्त था. राजनीति का वह उतना ही प्रयोग करता था, जितना कि पदप्रतिष्ठा और सामाजिक गरिमा को बनाए रखने के लिए अनिवार्य था. अभिभावक वर्ग के लिए राजनीतिक दायित्वपालन का माध्यम थी. वस्तुतः ईसा पूर्व चैथी शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी पूर्व तक भारत और यूनान समेत प्रायः सभी प्राचीन सभ्यताओं में बौद्धिक जागरण का वातावरण बना था. पुराने ज्ञान को लगातार चुनौती दी जा रही थी. समाज में नवबौद्धिक वर्ग की जो प्रतिष्ठा थी, उसके आगे राजनीतिक धनवैभव कोई मायने नहीं रखते थे. इसलिए उस समय के समाजों में हम देखते हैं कि राजा भी खुद को लेखक और दार्शनिक कहलवाने को उत्सुक दिखते हैं. महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध दोनों ने राजकुल में जन्मे थे, किंतु उन्होंने राजकीय प्रलोभनों को त्यागकर अपने लिए ज्ञानसाधना का मार्ग चुना था. जिन राजाओं में निजी प्रतिभा का अभाव होता वे अपने राज्य में दार्शनिकों, कवियों और वैज्ञानिकों को शरण देकर गौरव का अनुभव करते थे.

अभिजात वर्ग में शिक्षा पर पूरा जोर दिया जाता था. शिक्षा का उद्देश्य किसी खास विषय में बौद्धिक विशेषज्ञता प्राप्त कर लेने तक सीमित नहीं था, शिक्षण का वास्तविक ध्येय व्यक्तित्व निर्माण होता था. इसलिए धैर्य, सदाचरण, साहस, बुद्धिविवेक आदि कुछ ऐसे गुण थे, जिन्हें शिक्षा के माध्यम से उभारने पर जोर दिया था. स्पार्टा और एथेंस दोनों की राज्यों में जिस प्रकार लगातार युद्ध होते रहते थे, वहां सैन्य अभियानों के लिए मानवशक्ति की सदैव आवश्यकता पड़ती थी. युवाओं में आक्रामकता को पसंद किया जाता था. उसमें कोई कमी न आए, इसके लिए उन्हें रागात्मक गतिविधियों, विशेषकर प्रेम कविताओं से दूर रखा जाता था. स्मरणीय है कि प्लेटो ने अपने लेखन की शुरुआत एक कवि के रूप में की थी, किंतु बहुत जल्दी उसको सुकरात की गहन दार्शनिक विवेचनाओं के आगे कविताओं का क्षेत्र छोटा दिखने लगा. इसलिए लगभग बीस वर्ष की अवस्था में ही जब सबसे संवेदनशील और भावनाओं में बह जाने की उम्र होती है, उसने कविताओं से किनारा कर लिया था. माताओं और दाइयों से अपेक्षा की जाती थी कि वे अपने बच्चों को केवल तयशुदा कहानियां ही सुनाएं. ऐसी कहानियां जिनमें साहस, सदाचरण, सहनशीलता और मानवीय व्यवहार की गाथाएं हों. यहां तक कि होमर और हेसीयोद जैसे प्राचीन कवियों की रचनाएं भी बच्चों के लिए वर्जित मानी जाती थीं. यह माना जाता था कि ये चीजें बच्चों को मृत्यु का भय दिखाती हैं, जबकि यूनानियों के लिए शिक्षा का प्रथम उद्देश्य था, युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहना

हमारे बच्चों को सिखाया जाना चाहिए कि दासता मृत्यु से कहीं ज्यादा घृणित है. अतः इसके लिए उन्हें ऐसे किसी भले आदमी की कहानी नहीं सुनानी चाहिए जो, अपने घनिष्ट मित्रों की मृत्यु पर भी, रोता और विलाप करता हो.’

मानव व्यक्तित्व का एक गुण मर्यादा पूर्ण आचरण भी था, जिसके अनुसार सभा के बीच जोरजोर से हंसना असभ्य समझा जाता था. प्राचीन ग्रीक कविताएं जो व्रत, उपवास, ईश्वर के प्रति गहन निष्ठा दर्शातीं अथवा स्वर्ग का लालच देती थीं, उन्हें बच्चों के लिए वर्जित माना जाता था. प्लेटो के अनुसार श्रेष्ठ व्यक्ति वह है, जो बुरे व्यक्ति का अनुसरण नहीं करता. कलाओं में नाटकों को भी बहुत प्रशंसा की दृष्टि से नहीं देखा जाता था. चूंकि अधिकांश नाटकों में खलनायक की उपस्थिति सामान्य थी. अतः प्लेटो का विचार था कि खलनायक का अभिनय करने वाले पात्र दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, जिससे लोगों में, भले ही ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम हो, उसके प्रति सहानुभूति उत्पन्न होती है. यही क्यों स्त्रियों, दासों तथा समाज के अन्य कमजोर वर्ग के लोगों को भी नाटक के पात्र भिन्नभिन्न प्रकार से प्रभावित करते हैं; और उन्हें अपनी किसी न किसी रूप में यथास्थिति को बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं. उल्लेखनीय है कि प्राचीन यूनान में नाटकों में स्त्रियों का अभिनय पुरुष पात्रों द्वारा किया जाता था, वे प्रायः समाज के शीर्षस्थ वर्गों तथा दुष्ट प्रवृत्ति वाले लोगों का ही चित्रण करते थे. यथार्थवादी नाटकों का उदय उस समय तक नहीं हो पाया था. शायद यही कारण है कि अपने आदर्शलोक में प्लेटो ने नगर से सभी नाटक मंडलियों के निष्कासन का सुझाव दिया था. यही नहीं उसने दुख एवं शैथिल्य का भाव जगाने वाले संगीत का भी बहिष्कार करने का सुझाव दिया था, जबकि साहस और धैर्य जगाने वाले संगीत पर किसी प्रकार का नियंत्रण न था. इसी प्रकार गीत भी वही स्वीकार्य थे, जो साहस और सहिष्णुता के भावों को जगाते हों. सहिष्णुता का अर्थ युद्धस्थल में वीरतापूर्ण ढंग से जूझते हुए अधिक से अधिक घाव सहने तथा उनकी परवाह न करते हुए भी युद्ध में डटे रहने से था. प्रेम और भावानुराग भरे गीतों और कविताओं के लिए प्लेटो के आदर्शलोक में कोई स्थान न था. शरीर को चुस्त और फुर्तीला बनाए रखने के लिए शारीरिक प्रशिक्षण पर पूरा जोर दिया जाता था. नागरिकों को भोगविलास से दूर रखने के लिए प्लेटो ने उनके खानपान पर भी नियंत्रण का सुझाव दिया है. किसी को भी बगैर अनुमति भुना मांस, मछली खाने की छूट न थी. भोजन में सीमित व्यंजन रखने का सुझाव दिया गया था. चटनी और मिठाई परोसने से परहेज था. प्लेटो ने सादे और पौष्टिक भोजन की अनुशंसा की है, ताकि डा॓क्टरों को दूर रखा जा सके. रोजमर्रा की बातचीत में भी अनुशासन और मर्यादा का ध्यान रखने के निर्देश ‘रिपब्लिक’ में हैं. युवाओं को गालीगलौंच वाली भाषा का उपयोग करने, भद्दा मजाक करने की मनाही थी. यद्यपि कुछ विशेष अवसरों पर उन्हें चीखनेचिल्लाने और मौजमस्ती की अनुमति सायास दी जाती थी. दुश्मन को डराने, उसके दिल में दहशत पैदा करने के लिए इस तरह का अभ्यास जरूरी माना गया था. युद्धकाल में किशोरों को युद्ध देखने के लिए प्रेरित किया जाता था, ताकि वे स्वयं को एक अच्छे योद्धा के रूप में तैयार कर सकें. हालांकि किशोरों को बिना अनुमति के युद्ध में हिस्सा लेना वर्जित था.

अपने आदर्शलोक में अर्थव्यवस्था के नियमन के लिए प्लेटो ने कुछ सुझाव दिए हैं. और हम हैरान होते हैं कि करीब 2400 वर्ष अर्थात मार्क्स से भी 2200 वर्ष पहले प्लेटो ने आर्थिक समानता पर आधारित समाज का सपना देखा था. विशेषकर अभिभावक वर्ग के लिए उसका सुझाव था कि उन्हें छोटे घरों में रहना चाहिए. साधारण भोजन करना चाहिए. उस वर्ग के लिए उसने सामूहिक आवास बनाए जाने का सुझाव था. उनका भोजन भी सामूहिक होता था. प्लेटो के आदर्शलोक में व्यवस्था थी कि अभिभावक वर्ग को निजी संपत्ति रखने का कोई अधिकार नहीं होगा. उनके लिए सोने और चांदी के गहनों का उपयोग वर्जित था. चूंकि संपत्ति की कोई स्पर्धा नहीं थी. पूरे समाज के लिए एक जैसे कानून थे, अतएव ऐसा कोई कारण नहीं था, जो उन्हें दुख पहुंचाता हो. अत्यधिक संपन्नता और विपन्नता दोनों ही हानिकारक हैं, इस कारण प्लेटो के आदर्शलोक में इन्हें निषिद्ध माना गया था. उसने व्यक्ति के बजाय समाज के सुख को महत्त्व दिया जाता था. प्लेटो के कुछ आधुनिक अनुयायी उसके सहजीवन के विचार का विस्तार करते हुए उसे परिवार की सामूहिकता तक ले जाते हैं. उनके अनुसार मित्रों के बीच कोई भेद नहीं होता, न किसी पर्दे की दरकार होती है. अतः समाज में स्त्रियों और बच्चों समेत सबकुछ साझा होना चाहिए. आदर्श राज्य की परिकल्पना करते हुए प्लेटो ने सुझाव दिया है कि बच्चों को उनके मातापिता से जन्म के कुछ समय बाद ही अलग कर, राज्य के नेतृत्व में ले लेना चाहिए. लड़कियों और लड़कों की शिक्षा में समानता होनी चाहिए. यहां तक कि संगीत, व्यायाम, कलासाहित्य में भी लड़कों और लड़कियों की शिक्षा में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए. स्त्री और पुरुष की मूल प्रवृत्तियां एकसमान होती हैं, इसलिए अच्छा अभिभावक बनने के लिए जो शिक्षा पुरुषों के लिए अनिवार्य है, वही लड़कियों के लिए भी जरूरी है. प्लेटो सेना और रक्षा सामग्री के खर्च को न्यूनतम करने के पक्ष में था. यूनानी समाज युद्ध प्रिय था. उनमें छोटेछोटे राज्य थे, जिनके बीच अकसर युद्ध होते रहते थे. इसके लिए राज्य को सेना और युद्ध साम्रगी पर अधिक खर्च करना पड़ता था. प्लेटो का मानना था कि युद्ध और सेना पर अत्यधिक खर्च करने से उचित है, जीत की सुनिश्चितता के लिए युद्धकाल में सहयोगियों को खरीद लेना. चूंकि उस समय राज्य छोटेछोटे भूक्षेत्रों तक सीमित थे, तथा वे परस्पर युद्धरत रहते थे, इसलिए सहयोगियों को खरीदना कठिन भी नहीं था. प्लेटो का यह विचार उसकी राजनीतिक कूटनीतिज्ञता का परिचायक है.

प्लेटो के आदर्शलोक में जिस बात पर पूरा जोर दिया गया था, वह थी—स्त्रीपुरुष की समानता. शिक्षा, समाज, राजनीति के स्तर पर स्त्रियों को पुरुष के समान अधिकार देना. वह कला, साहित्य, राजनीति के साथ युद्ध के बारे में भी लड़कियों को लड़कों जैसी शिक्षा दिलाने के पक्ष में था. उसका मानना था कि बच्चों के पालनपोषण से लेकर उनकी शिक्षादीक्षा तक का संपूर्ण दायित्व राज्य का होना चाहिए. बच्चे व्यक्तिविशेष की नहीं, समाज की जिम्मेदारी हैं. वे भावी नागरिक हैं, अतः उनके बीच स्पर्धा की भावना को समाप्त करने के लिए आवश्यक है कि उनका पालनपोषण इस प्रकार हो कि मातापिता अपनी संतान की पहचान भी न कर सकें. न ही किसी बच्चे को यह पहचान हो कि उसके जन्मदाता कौन हैं. इसके लिए उन्हें ऐसे रहस्यमय और एकांत स्थान पर रखा जाना चाहिए, जहां उनको रखा जा सकता है. बालक हृष्टपुष्ट, विवेकवान और होंइसके लिए आवश्यक है कि उनके मातापिता स्वस्थ एवं संतानोत्पत्ति में सक्षम हों. वे इतने वृद्ध भी न हों कि उनका स्वास्थ्य उनकी संतति को प्रभावित कर सके. प्लेटो के अनुसार बच्चे को जन्म देते समय मां की आयु बीस से चालीस वर्ष और पिता की अवस्था पचीस से पचपन के बीच होनी चाहिए. इससे ऊपर की अवस्था के स्त्रीपुरुष परस्पर संभोग तो कर सकते हैं, किंतु उनको संतानोत्पत्ति की अनुमति नहीं दी जा सकती. निर्धारित आयु सीमा के पश्चात स्त्रीपुरुष के संसर्ग से यदि गर्भ ठहरता है तो भ्रूणपात कराना अनिवार्य होगा.

प्लेटो के आदर्शलोक में समाज और राज्य को ऊंचे स्थान पर रखा गया था. राज्यहित सर्वोपरि था. प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य था कि वह राज्य के लिए स्वस्थ्य और बुद्धिमान नागरिक तैयार करे. भावी संतति स्वस्थ एवं विवेक संपन्न हो, इसके लिए राज्य नागरिकों के कामसंबंध नियंत्रित करने का अधिकार था. वैवाहिक संबंध तय करने में भी राज्य की भूमिका सर्वोपरि होती थी. राज्य द्वारा तय किए गए विवाहसंबंधों के विरुद्ध आवाज उठाने का अधिकार नागरिकों को भी नहीं था, उन्हें यह दायित्व राज्य के प्रति कर्तव्यपालन के निमित्त निभाना ही पड़ता था. वैवाहिक संबंधों को तय करने में प्यार और भावना कभी आड़े नहीं आते थे. चूंकि कोई बालक यह नहीं जान पाएगा कि उसका वास्तविक जन्मदाता कौन है, इसलिए व्यवस्था की गई थी कि पिता की वयस् के प्रत्येक व्यक्ति को वह ‘पिता’ से संबोधित करेगा. इसी तरह माता की वयस् की स्त्रियों को ‘माता’ और अपने समवयस्कों को भाई अथवा बहन कहकर पुकारेगा. ‘पिता’ और ‘पुत्री’ तथा ‘माता’ और ‘पुत्र’ के बीच वैवाहिक संबंधों का बहिष्कार किया जाता था, यद्यपि इसके लिए कोई ठोस नियम नहीं था. यहां प्लेटो के चिंतन की दुर्बलता साफ नजर आती है. तयशुदा व्यवस्था के अनुसार यदि कोई बालक या बालिका अपने वास्तविक जन्मदाताओं के नाम से पूर्णतः अनभिज्ञ रखा गया है, तो वह यह कैसे तय कर पाएगा कि उसका रक्तसंबंधी भाई अथवा बहन कौन है?

ऐसा लगता है कि प्लेटो ‘विवाह’ और ‘परिवार’ नामक संस्थाओं को लेकर अपने आप में स्पष्ट नहीं था. वह एक ओर तो बच्चों का पालनपोषण मातापिता से दूर राज्य के संरक्षण में इस तरह करने की सिफारिश करता है कि बच्चों को पता भी न चले कि उनके वास्तविक जन्मदाता कौन हैं, वह यह भी शर्त रखता है कि समवयस्क युवकयुवतियां परस्पर भाईबहन होंगे. दूसरे वह ‘भाई’ और ‘बहन’ के बीच विवाहसंबंधों को भी निषिद्ध ठहराता है. वह यह नहीं बताता कि मातापिता से दूर, एकांत में अपने हमउम्र बच्चों के बीच पले बच्चे कैसे अपने वास्तविक भाईबहन की पहचान कर सकेंगे. इससे इतना स्पष्ट है कि मातापिता, पुत्रपुत्री और भाईबहन को लेकर जिस तरह के भावनात्मक संबंध आज पाए जाते हैं, प्लेटो के दिमाग में भी उसी प्रकार के संबंधों की छवि मौजूद रही होगी. इस अवधारणा का आधार यह है कि प्लेटो के आदर्शलोक में कोई युवा अपने पिता की उम्र के व्यक्ति पर हाथ नहीं छोड़ सकता था. क्योंकि वह वृद्ध उसका जन्मदाता भी हो सकता है. कहा जा सकता है कि यत्किंचित राज्य की अधिनायकवादी सत्ता के समर्थक प्लेटो ने निजी अनुभूतियों, संवेदनाओं के सामान्यीकरण करने का प्रयास किया था. वृहद सामाजिक हितों के मद्देनजर उसको यह जरूरी जान पड़ा था. इससे समाज में न केवल निजी संपत्ति की अवधारणा को चुनौती दी जा सकती थी, बल्कि व्यक्ति के हितों के सापेक्ष सामाजिक हितों को वरीयता देना भी अपेक्षाकृत सरल था. मानवीय रिश्तों का यह सामान्यीकरण युद्धप्रिय समाज में सैन्यबल की अबाध आपूर्ति के लिए भी जरूरी था.

प्लेटो एक ओर तो सामाजिक हितों को व्यक्ति के हितों से ऊपर रखता है. ऐसी व्यवस्था करने का प्रयास करता है, जिससे सामाजिक संपत्ति का लाभ उसके सभी सदस्यों को एकसमान प्राप्त हो सके; तथा लोग समाज और राष्ट्र के प्रति इस प्रकार आस्थावान हों कि निजत्व की अवधारणा ही न रहे. दूसरी ओर उसके चिंतन के विरोधाभास भी सामने आते हैं. सामाजिक स्तरीकरण को लेकर प्लेटो ने आश्चर्यजनक तर्क दिया है, जिसके अनुसार ईश्वर ने तीन प्रकार के मनुष्यों को पैदा किया है. स्वर्णनिर्मित, जो सर्वश्रेष्ठ हैं. रजतनिर्मित, ये दूसरे स्तर पर आते थे. इनके अलावा बाकी जनसमूह को उसने कांस्य और लौहविनिर्मित श्रेणियों में रखा था, जिनका दायित्व समाज के परिश्रमसाध्य कार्यों को निपटाना था. प्लेटो के अनुसार एकमात्र स्वर्णविनिर्मित अर्थात सर्वोत्तम श्रेणी के पुरुष ही समाज का संरक्षक बनने की योग्यता रखते हैं. रजतविनिर्मित पुरुष समाज की रक्षा करने योग्य होते हैं, जबकि लौह और कांस्य निर्मित मनुष्य केवल शारीरिक श्रमकौशल द्वारा अपना भरणपोषण करने में सक्षम होते हैं. जहां तक बच्चों की बात है, उनका वर्ग मातापिता के वर्ग द्वारा निर्धारित होगा, हालांकि इसका कोई सार्वकालिक नियम नहीं था. बच्चों को उनके मानसिकशारीरिक स्तर के अनुसार ऊंचे अथवा नीचे वर्ग में विस्थापित किया जा सकता था. प्लेटो को एहसास था कि संभवतः आरंभिक पीढ़ी इस प्रकार के विभाजन को एकाएक स्वीकार न करे. इसलिए उसने लिखा है कि लोगों को इसके लिए उपयुक्त शिक्षा दी जानी चाहिए. प्लेटो का मानना था कि किसी मिथक में विश्वास पैदा करने, समाज में उसको स्थापित करने के लिए न्यूनतम दो पीढ़ियों की जरूरत पड़ती है. उसका आकलन गलत भी नहीं था. जापानियों को बचपन से ही यह सिखाया था जाता था कि सम्राट मिकाडो सूर्य देवता के वंशज, उसके उत्तराधिकारी हैं तथा जापान का निर्माण संसार में सबसे पहले हुआ था. धीरेधीरे यह मिथक जापानी लोगों के मानस स्थापित होता गया. आज स्थिति यह है कि यदि बड़े से बड़ा विद्वान भी इस मिथक के विरुद्ध कोई टिप्पणी करे तो वह बेअसर सिद्ध होती है, बल्कि उसको जापानी सभ्यता एवं संस्कृति के विरुद्ध मान लिया जाता है. प्लेटो ने इस वास्तविकता पर कोई ध्यान नहीं दिया था कि इस प्रकार के मिथकीय अंधविश्वास दार्शनिक अवधाराणाओं से सर्वथा असंगत होते हैं. वे न तो विवेकसम्मत होते हैं, न ही तर्कसिद्ध, वास्तव में वे कुछ चालाक और स्वार्थी बुद्धिजीवियों के बौद्धिक शगल का परिणाम होते हैं, जिन्हें वे समाज में यथास्थिति बनाए रखने के लिए तरहतरह से जीवित रखने का प्रयास करते हैं. चूंकि समाज के अधिकांश संसाधनों तथा उत्पादनतंत्र पर इसी वर्ग का अधिकार होता है, अतएव जनसाधारण की विवशता होती है कि वह इनकी सत्ता को स्वीकार कर उनके द्वारा स्थापित मान्यताओं के प्रति सहमति व्यक्त करता रहे. प्लेटो ने इस समस्या पर विचार अवश्य किया था, किंतु कहीं न कहीं वह भी यूनानी श्रेष्ठता के प्राचीन मिथक के प्रति अंधभक्त था. इसलिए एक ओर जहां वह सामान्य नागरिकों से राष्ट्रराज्य के प्रति सर्वस्व समर्पण की अपेक्षा रखता था, इसके लिए उसने अपनी संवादपुस्तक ‘रिपब्लिक’ में प्रावधान भी किया था, वहीं वह समाज के संरक्षक वर्ग को अतिरिक्त छूट दिए जाने के पक्ष में था. यह बहुत कुछ भारत के वर्णविभाजन से मिलताजुलता था, जिसमें ब्राह्मणों को अतिरिक्त अधिकार प्रदान किए गए थे, जिसके दुष्परिणामस्वरूप इस देश में धर्म और जाति के नाम पर अकर्मण्य और परजीवी समाज का जन्म हुआ, जो अंततः शताब्दियों लंबी दासता और देश के पिछड़ेपन का कारण बना. यूरोप इससे जल्दी उभर पाया तो इसलिए कि वहां सामाजिक विभाजन को धमसत्ता के हस्तक्षेप से मुक्त रखा गया था, जबकि भारतीय धर्मशास्त्रों में वर्णविभाजन बृह्मा की सर्जना है.

रिपब्लिक’ के चौथे खंड में ‘न्याय’ की अवधारणा पर विचार किया गया है. जिस गंभीरता के साथ प्लेटो इस विषय पर विचार करता है, उससे स्पष्ट होता है कि गणतंत्र अथवा राजनीति के बजाय ‘न्याय’ ही पुस्तक का प्रधान विषय है. न्याय की पर्तदरपर्त व्याख्या करता हुआ प्लेटो स्पष्ट करता है कि राज्य की सफलता तभी सुनिश्चित है, जब उसके नागरिक निर्दिष्ट कर्तव्यों का पूरी निष्ठा के साथ पालन करें. व्यापारी ईमानदारी से व्यापार करें, सेनाएं युद्ध में वीरता का प्रदर्शन कर राज्य की गरिमा को सुरक्षित रखें तथा संरक्षक वर्ग अपने दायित्व का निर्वाह करे. समाज के ये सभी वर्ग बिना दूसरे के काम में बाधा उत्पन्न किए अपने कर्तव्य का पालन करें, तभी राज्य की समृद्धि और सुरक्षा संभव है. यदि सभी नागरिक अपनेअपने कर्तव्यपालन के प्रति सचेत हों तो ‘कानून’ और ‘न्याय’ जैसे मुद्दों का कोई अर्थ ही न रहे. लेकिन व्यवहार में ऐसा हो नहीं पाता. मानवीय कमजोरियां उसके कर्तव्यपालन में विचलन का कारण बनती हैं. वही समाज में शांतिव्यवस्था बनाए रखने के लिए बाहरी शक्तियों की आवश्यकता को जन्म देती हैं. प्रसंगवश यह जान लेना उचित होगा कि यूनानी परंपरा में न्याय की अवधारणा उसकी आधुनिक अवधारणा से काफी भिन्न है. एनेक्जमेंडर के अनुसार न्याय को उस रूप में देखना चाहिए जिसके अनुसार वस्तुएं अपने स्वाभाविक रूप में आकार ग्रहण करती हैं तथा किसी समय विशेष में दूसरी वस्तुओं पर प्रभाव डालती हैं. आरंभिक यूनानी दर्शन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति तथा वस्तु का पूर्व निर्धारित स्थान और कर्तव्य होता है. इस संदर्भ में वह किसी भी पराभौतिक शक्ति के अनुशासन से मुक्त होती है. उसके अनुसार परसत्ता स्वयं भी अनुशासन से मुक्त नहीं है. वह उसी प्रकार अपने कर्तव्य से आबद्ध है, जैसे सृष्टि की बाकी वस्तुएं तथा प्राणी. इसलिए अपने दायित्व का निर्वहन करना समाज के प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पद अथवा प्रतिष्ठा से जुड़ा क्यों न हो, की जिम्मेदारी है. पराभौतिक शक्तियों पर भी यह बात उतनी ही गंभीरता से लागू होती है. समस्या तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति शक्ति के उन्माद में अपने कर्तव्य की उपेक्षा करने लगता है. दूसरों से श्रेष्ठता का दर्प उसको नियमों की अवहेलना के लिए उकसाता है. शक्ति के उन्माद और घमंड में डूबा हुआ व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख होने लगता है. परिणामस्वरूप समाज में अंतद्र्वंद्व पैदा होते हैं. इसलिए प्राचीन यूनानी विधिशास्त्र में दर्प को कुचल डालने की अनुशंसा की गई है. क्योंकि दूसरों से श्रेष्ठता का दर्प ही मनुष्य को कर्तव्य से विमुख होने तथा दूसरों के कार्य में बाधा खड़ी करने के लिए उकसाता है. प्लेटो की ‘न्याय’ की अवधारणा इसी यूनानी चेतना से बनी थी. उसके लिए ‘न्याय’ का मतलब था—‘कर्तव्यबोध तथा कर्तव्यपालन.

आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों में न्याय को अक्सर समानता के पर्याय के रूप में लिया जाता है. प्लेटो की अवधारणा इससे भिन्न थी. उसके अनुसार दूसरों के उधार को चुकाना भी मनुष्य का कर्तव्य है, अतएव वह भी न्याय का पर्याय है. ‘रिपब्लिक’ के आरंभ में ‘न्याय’ के बारे में कुछ ऐसी ही स्थापना है

न्याय आखिर क्या है? सदा सच बोलना और समय पर उधार लौटाना! इससे आगे क्या न्याय कुछ नहीं है? क्या यही मान लेने के अलावा हमारे सामने कोई अन्य विकल्प नहीं है?’

न्यायसंबंधी अपनी ही प्रारंभिक संकल्पना में प्लेटो एक के बाद एक सुधार करता जाता है. इसके लिए वह सुकरात को माध्यम बनाता है. प्लेटो की न्यायसंबंधी अवधारणा के कई बिंदू विचारणीय है, जिनसे उसकी कुंठा जाहिर होती है. ‘न्याय’ की बात करता हुआ वह ‘अन्याय’ का पक्ष लेता हुआ नजर आता है. दरअसल वह न्याय की परिभाषा को इतना व्यापक कर देता है कि अन्याय और न्याय के बीच भेद कर पाना असंभवसा हो जाता है. प्लेटो के समाज में ‘गार्जियन’ का कर्तव्य अपने बुद्धिविवेक से समाज को अनुशासित और कर्तव्योन्मुखी बनाए रखना है, इसके लिए उन्हें व्यापक अधिकार प्राप्त होते हैं. लेकिन यदि ऐसे वर्ग का कोई व्यक्ति जो ‘गार्जियन’ नहीं है, न ही उसकी योग्यता रखता है, बुद्धिविवेक में ‘गार्जियन’ से आगे निकल जाता है, तो उसका क्या किया जाए? कैसे उसकी योग्यता का समाज के हित में उपयोग किया जाए. न्याय तो इसी में है कि उस व्यक्ति को संरक्षक वर्ग में सम्मिलित कर उसकी बौद्धिक क्षमताओं का उपयोग समाजहित में किया जाए. दूसरी और संरक्षक वर्ग में सम्मिलित वे व्यक्ति जो बौद्धिक नेतृत्व करने में असमर्थ हैं, जो समाजहित के बजाय स्वार्थ को महत्ता देते हैं, जो नैतिक दृष्टि से भी पतनशील हैं—उचित होगा कि ऐसे दुराचारियों को पदावनत कर निचले वर्गों में ढकेल दिया जाए. प्लेटो बजाए इसके दासप्रथा का समर्थन करता है और उसको बनाए रखने के लिए तर्क देता है. यहीं उसकी न्याय की अवधारणा ‘अन्याय’ में बदलती नजर आती है.

प्लेटो द्वारा स्थापित इस व्यवस्था की तुलना अगर भारतीय वर्णव्यवस्था से की जाए तो दोनों में काफी समानता नजर आती है. प्राचीन यूनान की तरह भारत में भी समाज का विभाजन तीन प्रमुख वर्गांे, ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय के बीच था. जो मनुष्य इन तीन वर्गों से बाहर थे, उन्हें शूद्र कहा गया है, जिनका कार्य दूसरे वर्गों की सेवा करना है. आरंभ में भारतीय वर्णव्यवस्था में वर्गांतरण संभव था. व्यक्ति अपनी रुचि एवं योग्यता के अनुसार एक वर्ग से दूसरे वर्ग में आजा सकता था. कालांतर में यह विभाजन रूढ़ होता चला गया.वर्ण जातियों में ढल गए और जातियां उपजातियों में विस्तार पाती रहीं. भारत में जो स्थान शूद्रों के लिए तय था, यूनानी समाज में वही स्थिति ‘दास’ की थी. तय है कि सामाजिक न्याय के बारे हैं सिवाय इसके कि प्लेटो ने सामाजिकविभाजन की अपनी पद्धति में वर्गांतरण को सीमित मान्यता दी है, कोई नयापन नहीं है. उसने स्वीकार किया था कि जन्म एवं शिक्षा में दूसरों से बेहतर होने के कारण संरक्षकों के बेटेबेटियां समाज के शेष वर्गों की संतान की अपेक्षा लाभ की स्थिति में होंगे, जिससे समाज का शक्ति संतुलन एक वर्ग विशेष के पक्ष में खिसकता चला जाएगा. न्याय की व्याख्या के अगले चरण में प्लेटो ऐसे राज्य की परिकल्पना करता है जिसका संघटन पंरपरा अथवा किंचित आदर्शयुक्त पसंदों के आधार पर किया गया है. आदर्श राज्य के रूप में प्लेटो की परिकल्पना में ऐसा राज्य था, जहां ‘न्याय’ कि सर्वत्र व्याप्ति हो. जहां प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यपालन में तल्लीन रहता हो.

प्रश्न उठता है कि व्यक्ति के कर्तव्य को परिभाषित कैसे किया जाए. वह कौनसा कार्य हो सकता है, जिसको करके कोई नागरिक आदर्श राज्य के निर्माण में अपना योगदान दे सकता है? प्राचीन यूनान, आमेर आदि राज्यों में पुत्र को वही कार्य करना पड़ता था, जो उसके पिता के लिए निर्धारित था. पीढ़ीदरपीढ़ी यही चलता रहता था. इस प्रणाली पर कोई सवाल नहीं खड़ा होता था. मगर प्लेटो के राज्य में स्थिति दूसरी थी. उसने बच्चों का पालनपोषण मातापिता से दूर, इस प्रकार करने की अनुशंसा की है, जिसमें मातापिता अथवा उनकी संतान कभी एकदूसरे की पहचान न कर सकें. दूसरे शब्दों में उसके राज्य में व्यक्ति का कोई निजी अभिभावक नहीं था. वहां संबंधों के वर्ग थे, जिसके अनुसार पिता की उम्र के सभी व्यक्तियों को पिता का दर्जा प्राप्त था और पुत्र की उम्र के युवाओं को पुत्र का. यही स्थिति स्त्री के साथ थी. ऐसी अवस्था में कार्यांतरण की प्राचीन यूनानी पद्धति वहां कारगर ही न थी. इसलिए व्यक्ति के कार्य का निर्धारण या तो राज्य की मर्जी से हो सकता था अथवा उसकी अपनी रुचि के आधार पर. यदि सबकुछ व्यक्ति की इच्छा पर छोड़ दिया जाए तो जो कार्य बहुत श्रम की अपेक्षा रखते हैं, जो बेहद हानिकर हैं, या जिनमें अप्रीतिकर हालात का सामना करना पड़ता है, उनका क्या होगा? बिना किसी प्रलोभन अथवा दबाव के समाज के लिए अनिवार्य होने के बावजूद, ऐसे कार्यों को भला कौन करना चाहेगा! स्पष्ट है कि इसके लिए सरकार को अलग से व्यवस्था करनी होगी. आदर्श राष्ट्रराज्य में यह दायित्व सरकार को खुद संभालना चाहिए. दार्शनिक सम्राट की संकल्पना के पीछे एक कारण यह भी था. प्लेटो का मानना था कि एक दार्शनिक सम्राट ही ऐसा करने में सक्षम हो सकता है. मगर सिर्फ विचार से तो समाज को नहीं चलाया जा सकता. विकास की गति को बनाए रखने के लिए नए आविष्कारों की भी जरूरत पड़ती है. राज्य में उत्पादन वृद्धि और तकनीकी शोध के लिए दार्शनिक सम्राट का क्या योगदान होगा, प्लेटो इस बारे में कोई सुझाव नहीं देता. इसका कारण दास के रूप में उपलब्ध अतिरिक्त और सस्ता श्रम भी हो सकता है. यहां प्लेटो की कल्पनाशीलता कोई नया आयाम नहीं गढ़ती. दार्शनिक सम्राट की अवधारणा वास्तव में प्लेटो का पूर्वग्रह था, जिसमें वह इतना आगे बढ़ जाता है कि ‘रिपब्लिक’ का संदेश ही बिगड़ जाता है. तो फिर प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ की देन क्या है? आधुनिक समाज उससे क्या ग्रहण कर सकता है? इस बारे में एक आलोचक की टिप्पणी है—

उत्तर है—गतिहीनता, ठहराव, एकरसता! इससे केवल युद्धकाल में सफल हुआ जा सकता है, वह भी तब जब सामना करीबकरीब बराबरी का हो. यह केवल छोटे समूह की आजीविका को सुरक्षित रख सकता है. जड़ सोच और कठोर नियमों के कारण इस व्यवस्था में निश्चितरूप से न तो विज्ञान का भला होगा, न ही कलाओं का.’

स्पार्टा और वहां की राजनीति ने अपने समकालीन जिन विचारकों को प्रभावित किया था, प्लेटो भी उनमें से एक था. अपने जीवन में उसने कई उतारचढ़ाव देखे थे, जिनमें उसके देश एथेंस की शर्मनाक पराजय तथा अकाल आदि सम्मिलित थे. इन सभी घटनाओं ने उसके संवेदनशील मन को गहराई से प्रभावित किया था. इसका स्पष्ट प्रभाव उसके राजनीतिक सोच पर देखने को मिलता है. वह मानता था राजनीतिज्ञों में सुधार के साथ इन आपदाओं से मुक्ति संभव है. कविहृदय प्लेटो का मनुष्यता में अटूट विश्वास था. उसके लेखन से सर्वत्र इसकी पुष्टि भी होती है. हालांकि वह या तो समझ नहीं पाया था अथवा स्वयं को जानबूझकर भुलावे में रखे था कि आदर्श सदैव व्यक्तिसापेक्ष होता है. उसके बारे में चर्चा भी वही करते हैं, जो उसमें विश्वास रखते हैं. पर अधिकांश व्यक्ति निजी सुखों को ही अहमियत देते हैं. उन्हें अपने लिए बेहतर भोजन, अच्छा आवास तथा अन्य सुखसुविधाएं चाहिए. तब आदर्श और सामान्य पसंदों के बीच अंतर कैसे किया जाए? वह कौनसा गुण है जो व्यक्ति की सामान्य पसंदों को आदर्श पसंदों का रूप दे दे सकता है? प्लेटो के अनुसार व्यक्ति की इच्छाएं कहीं न कहीं उसके अहं से प्रेरितप्रभावित होती हैं. अहं व्यक्ति को आत्मकेंद्रित एवं स्वार्थी बनाता है. इसलिए ‘आदर्श पसंदें’ वे पसंदें कही जा सकती हैं, जिनमें व्यक्ति के अहं का न्यूनतम प्रभाव हो. जो समाज की सामान्य इच्छाएं हों तथा व्यक्ति के निजत्व को सामान्यबोध की पहचान देती हों, उन्हें प्राथमिकता दी जाए. जैसे किसी व्यक्ति की यह इच्छा कि प्रत्येक व्यक्ति के पास पर्याप्त भोजन हो अथवा यह सोच कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के पास उत्तम आवास, वस्त्र तथा भोजन आदि की सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में हों. इस प्रकार की इच्छा के साथ व्यक्ति का अहं तिरोहित हो जाता है. किंतु सभी मनुष्य तो एकसमान नहीं होते. उनकी रुचियों, स्वभाव और पसंदों में स्वाभाविक अंतर होता है. ऐसे में इच्छाओं का समाजीकरण कैसे हो? कैसे उनके आदर्श स्वरूप को कायम रखा जाए? ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो इसकी भी व्याख्या करता है. उसके अनुसार अहं के तिरोहण के पश्चात इच्छाओं का सहज समाजीकरण संभव है. उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की दर्शन में रुचि है तो वह इच्छा कर सकता है कि समाज के सभी व्यक्तियों को दर्शन का भरपूर ज्ञान हो. ऐसे ही विज्ञान में रुचि रखने वाला व्यक्ति विज्ञान और कलाओं में रुचि रखने वाला व्यक्ति कलाओं के बारे में इच्छा व्यक्त कर सकता है. इच्छाओं का समाजीकरण क्या मानवस्वभाव से निरपेक्ष होगा? उदारतापूर्ण इच्छाएं अपने समन्वयीकरण की प्रक्रिया में समाज में अपनी ही जैसी इच्छाओं को बढ़ावा देंगी. इससे व्यक्ति के निजी स्वार्थ में कमी आएगी. समाज में निजी संपत्ति की अवधारणा कमजोर पड़ेगी, फलस्वरूप आर्थिक समानता के स्तर को बनाए रखना आसान होगा.

इच्छाओं और पसंदों का सामान्यीकरण जितना आसान दिखता है, उतना होता नहीं. यदि व्यक्ति का पालनपोषण भिन्न परिस्थितियों में हुआ हो तो यह और भी कठिन हो जाता है. विकास की भिन्न स्थितियां तथा तज्जनित विषमताएं मतभेदों को जन्म देती हैं. मतभेद हों तो व्यक्तिगत इच्छाएं अहं से संचालित होने लगती हैं. जैसे राष्ट्रीय भावना से प्रेरित कोई व्यक्ति यह इच्छा रख सकता है कि सभी जर्मनवासी प्रसन्न हों. पर कोई दूसरा व्यक्ति इसपर आपत्ति कर सकता है कि सिर्फ जर्मनवासी क्यों, दुनिया में जितने भी लोग हैं, सभी प्रसन्न रहने चाहिए. यह समस्या प्लेटो के दिमाग में भी रही होगी. इसलिए वह समाधान भी देता है. समाधान उसके इस विश्वास से जन्म लेता है कि मनुष्य मूलतः अच्छा प्राणी होता है. प्लेटो के अनुसार व्यक्ति का सामान्य मनोविज्ञान यह है कि वह व्यक्तिविशेष अथवा कुछ व्यक्तियों के अप्रसन्न रहने की इच्छा तो कर सकता है, किंतु दुनिया के अधिकांश लोगों के अप्रसन्न होने की चाहत व्यक्ति के सामान्य मनोविज्ञान के विरुद्ध है. इसलिए ऊपर के उदाहरण में दूसरे व्यक्ति की इच्छा जो दुनियाभर के लोगों के प्रसन्न होने की कामना करता है, पहले व्यक्ति पर, जो केवल जर्मनवासियों के प्रसन्न होने की इच्छा रखता है, मनोवैज्ञानिक दबाव बना सकती है. इच्छाओं के सार्वजनिक प्रकटीकरण के अवसर पर वह अपने अहं को आहत महसूस कर सकता है. यह उसको अपनी राष्ट्रभावना के विरुद्ध भी लग सकता है. इसके बावजूद सार्वजनिक रूप में उसको दूसरे व्यक्ति की भावनाओं का सम्मान करना पड़ेगा. सच यह भी है कि व्यवहार में निरपेक्ष आदर्श जैसा कुछ हो ही नहीं सकता. व्यक्ति की अभिप्रेरणाएं उसकी रुचियों, स्वभाव, सोच और परिस्थितियों द्वारा संचालित होती हैं. नीत्शे के महामानव की संकल्पना ईसाई परंपरा में संत की अवधारणा से एकदम भिन्न है. लेकिन नीत्शे पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि उसकी महामानव की संकल्पना के पीछे उसका कोई स्वार्थ था. सच तो यह है कि समाज की बेहतरी के लिए ईसाई परंपरा में संत जो काम करते हैं, विचारक के नाते नीत्शे ने महामानव की संकल्पना भी समाज की बेहतरी को ध्यान में रखकर की थी. इसलिए नीत्शे के विचारों की आलोचना की जा सकती है, किंतु उसकी नीयत पर संदेह करना सर्वथा अनुचित होगा. अज्ञानता के कारण ही सही प्राचीन भारत और विश्व में पशुबलि को मानवकल्याण के लिए जरूरी माना जाता रहा है. भारत में जब बौद्ध धर्म का उदय हुआ तो महात्मा बुद्ध ने केवल पशुबलि का जोरदार विरोध किया था, बल्कि आत्मा और परमात्मा जैसे विषयों पर चर्चा को भी अनावश्यक माना, जिनपर उनसे पहले का लगभग पूरा का पूरा भारतीय दर्शन निर्भर था. चूंकि बौद्ध दर्शन वृहद जनसमाज के हितों का पक्ष लेता था तथा पशुबलि का निषेध लोगों के आर्थिकसामाजिक विकास से भी जुड़ा था, इसलिए ऐसे लोगों ने बौद्ध धर्म को हाथोंहाथ अपनाया जो पिछली व्यवस्था में अभाव और उत्पीड़न झेलते आए थे.

इच्छाओं का सर्वथा निरपेक्ष सामान्यीकरण असंभव है. दो इच्छाओं के बीच चयन उस समय तक असंभव है, जब तक व्यक्ति का किसी एक इच्छा की ओर अपना झुकाव न हो. यदि उनमें से एक भी इच्छा से उसकी सहमति नहीं है तो वह उनका विरोध करेगा. नैतिक असहमति के संभव नहीं है. जहां नैतिक सहमतिअसहमति आसान न हो, वहां बलप्रयोग भी संभावना भी बनी रहती है. संभवतः इसी भावना से प्रेरित होकर ‘रिपब्लिक’ का एक पात्र थरसाइमचस, जो प्लेटो ने वास्तविक जीवन से उठाया था, न्याय पर चर्चा करते हुए उग्र हो जाता है—

न्याय ताकतवर के हितलाभ के सिवाय कुछ नहीं है.’

हालांकि सुकरात ने इस तर्क का विरोध किया था, लेकिन वहां भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल पाता. सच तो यह है कि ‘न्याय’ की संकल्पना पर कभी गंभीरतापूर्ण विचार संभव ही नहीं हुआ. इसने न्यायविद्ों और राजनीति विज्ञानियों के लिए सदैव समस्याएं उत्पन्न की हैं. उनमें से एक बड़ी समस्या है कि ‘अच्छे’ और ‘बुरे’, ‘पाप’ और ‘पुण्य’ की तार्किक व्याख्या कैसे संभव हो? वे कौन से मानक हैं, जिनके आधार पर इनके बीच एक स्पष्ट विभाजनरेखा खींच पाना संभव है? यह समस्या प्लेटो के सामने भी थी. वह विविध स्थितियों की व्याख्या करता है, जिन्हें न्यायसंगत माना जा सकता है. लेकिन संवाद के दौरान कोई न कोई पक्ष सदैव असंतुष्ट बना रहता है. इसलिए उसने ‘आदर्श पसंदों’ का अपना विचार भी सामने रखा. ‘आदर्श पसंदों’ का अभिप्राय था, जिन्हें अधिकतम लोग पसंद करते हों या जिनसे अधिकांश की सहमति हो. लेकिन परोक्ष में तो यह बहुमत की दादागिरी ही हुई. प्लेटो यह समझता था, मगर उसके सामने अपने आदर्श नगरराज्य की समृद्धि और सुरक्षा का मसला बहुत बड़ा था. इसलिए न्याय पर चर्चा करते हुए उसकी अन्यान्य स्थितियों पर चर्चा करता है तथा निर्णय पाठक के विमर्श के लिए छोड़ देता है. उसके लिए यह समीचीन भी था.

धर्म भी न्याय को परिभाषित करने का प्रयास करता है, किंतु एक सपाटसी व्याख्या में वह कह देता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा—इसका निर्धारण ईश्वर करता है. अतः हर वह व्यक्ति जो ईश्वेच्छा को सहर्ष स्वीकार लेता है, उसको अपनी इच्छा मान लेता है—वही सत्पुरुष है. धर्माचार्य दावा करते हैं कि ईश्वर परमशुभ, शुभ की आश्रयस्थली है. उनके अनुसार ईश्वर चूंकि परमकल्याणकर्ता है, अतएव उसकी इच्छा और कर्तव्यों को शुभ का आधार माना जा सकता है. पर ईश्वर की इच्छा जाहिर कैसे हो? यह कैसे तय हो कि ईश्वर यही चाहता है? क्या ऐसा कोई रास्ता नहीं है, जिससे ईश्वरेच्छा का सटीक अनुमान लगाया जा सके? जिसको ईश्वरेच्छा बताकर आरोपित किया जाता है, उसके प्रमाणन का रास्ता क्या हो? चूंकि ऐसा कोई रास्ता व्यवहार में संभव नहीं है, अतएव उसके अनुयायी इसको आस्था का विषय बनाकर आरोपित करने का प्रयास करते हैं.

सच तो यह है कि जिसे ईश्वरेच्छा बताकर उसके अनुयायियों द्वारा आरोपित किया जाता है, वह वास्तव में उसके अनुयायियों की ही इच्छा होती है. धर्म और ईश्वरेच्छा के नाम पर ऐसे पाखंड पुरोहित वर्ग सहस्राब्दियों से रचता आ रहा है. दरअसल ‘शुभ’, ‘अशुभ’, ‘पाप’, ‘पुण्य’ आदि अवधारणाएं व्यक्तिसापेक्ष होती हैं. ‘वस्तुनिष्ठ सत्य’ जैसा कुछ नहीं है. हां, सीमित संदर्भों में व्यक्ति ‘सत्य’ अथवा ‘असत्य’ के बारे में अनुमान अवश्य लगा सकता है. ठीक ऐसे ही जैसे यह जान लेना कि ‘वर्फ’ सफेद है. यहां सफेद रंग वर्फ की मूल पहचान है, परंतु यह संज्ञा मनुष्य की ओर से ही एक रंग विशेष के नाम की गई है. उससे तुलना के आधार पर कोई व्यक्ति वर्फ के रंग का बयान कर सकता है. पर यदि कोई ऐसा व्यक्ति जिसने सफेद वर्फ कभी देखी ही न हो, वह वर्फ के रंग के बारे में दावे के साथ कोई बात नहीं कह सकता. तो भी सामान्य जानकारी में यह कहना कि वर्फ सफेद होती है, कि महात्मा गांधी की हत्या हुई थी, कि जवाहर लाल नेहरू इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे, कि 1947 में भारत का विभाजन एक सच्ची ऐतिहासिक घटना है जैसी कुछ बातें हैं जो लोकसम्मति के आधार पर सच मान ली जाती हैं.

प्लेटो मानता था कि ‘शुभ’ की सत्ता है तथा उसको पहचाना जा सकता है. अपने आदर्शलोक में वह उन स्थितियों पर जोर डालता है, जिनके द्वारा मनुष्य के आचरण को नैतिक बनाए रखकर शुभ की संभावना को बढ़ाया जा सकता है. उसका मानना था कि आदर्श गणतंत्रात्मक राज्य भी अपने आप में ‘शुभ’ है. हालांकि गणतंत्र की कोई स्पष्ट परिभाषा वह नहीं देता. जिस आदर्शलोक की परिकल्पना वह ‘रिपब्लिक’ में करता है, उसमें जबरदस्त आर्थिकसामाजिक स्तरीकरण है. निकृष्ट दासप्रथा है, जिसके कारण लाखों लोगों को गुलाम के रूप में जिंदगी बसर करनी पड़ती है. प्लेटो उस प्रथा का समर्थन करता है. अतः ऐसे अनेक बुद्धिजीवी होंगे जिन्हें प्लेटो की यह स्थापना अस्वीकार्य होगी. स्वयं प्लेटो के समय में भी उसके कई आलोचक और विरोधी थे. उनका उत्तर प्लेटो के समकालीन और ‘रिपब्लिक’ के एक पात्र थरसाइमचस ने दिया था. उसका कहना था कि प्लेटो से सहमति अथवा असहमति का प्रश्न ही नहीं है. प्रश्न सिर्फ यह है कि आप प्लेटो के आदर्शलोक की स्थापना से कितने और कहां तक सहमत हैं. यदि आप उससे सहमत हैं तो यह आपके लिए शुभ है; और यदि आप उससे असहमत हैं तो निश्चय ही यह आपके लिए बुरा है. आशय है कि प्लेटो के दर्शन में ऐसा बहुत कुछ है, जो उससे असहमति से बावजूद बुद्धिजीवियों को प्रेरित और आकर्षित करता रहा है. उसके आदर्शलोक की विशेषता यह भी है कि वह केवल बौद्धिक विमर्श और कागजों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी स्थापना वास्तविक धरातल पर संभव हुई थी. उसके अनेक प्रावधान जिन्हें अव्यावहारिक माना जाता है, जैसे बच्चों को उनके मातापिता से दूर रखकर उनकी पहचान को छिपाकर पालनापोसना स्पार्टा से लिए गए थे. दार्शनिक सम्राट का प्रयोग भी अनेक राज्यों में आजमाया जा चुका था. अनेक सम्राट ऐसे थे जो अपने राज्यों में दार्शनिकों को उच्च स्थान पर रखते थे, यद्यपि ऐसे राज्यों की सफलता के बारे में सटीक टिप्पणी कर पाना संभव नहीं है. सही मायने में प्लेटो सबसे पहला साम्यवादी था, जिसने एक ऐसे समाज का सपना देखा था, जहां संसाधनों का उपयोग संपूर्ण समाज के भले के लिए किया जाता हो. इसलिए उन सबके लिए वह आज भी सम्मानेय है, जो आमूल परिवर्तन का सपना अपनी आंखों में पाले हुए हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

प्लेटो : स्वप्नदृष्टा दार्शनिक-दो

सामान्य

शिक्षा

बचपन से ही प्लेटो ने दिखा दिया था कि वह अतुलनीय मेधावी और असामान्य तीक्ष्ण बुद्धि से संपन्न है. बचपन में ही उसने प्राचीन यूनानी कवियों होमर, हेसोद आदि की रचनाओं का अध्ययन किया था. अनेक रचनाएं तो उसको पूरी तरह कंठस्थ हो चुकी थीं, जो युवावस्था में उसके काव्यानुराग की प्रेरणा बनीं. हालांकि सुकरात से मुलाकात के बाद उसने न केवल कविताओं से अपना पीछा छुड़ा लिया, बल्कि अपनी उस समय तक की रचनाओं को भी आग के हवाले कर दिया. उन दिनों एथेंस में सार्वजनिक विद्यालय नहीं थे. अध्यापन का कार्य सोफिस्टों के जिम्मे था, वे निजी विद्यालयों में गणित, दर्शन, व्याख्यान विद्या और व्यावहारिक विज्ञान की शिक्षा देते थे. उन विद्यालयों में केवल अभिजात्य वर्ग के विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर पाते थे. प्लेटो ने ऐसे ही एक विद्यालय में प्रवेश लिया था. उसको पाठशाला तक लाने-ले जाने के लिए एक दास नियुक्त था, जिसको ‘ट्यूटर’ कहा जाता था. उस समय यूनान में स्त्रियों की शिक्षा के प्रति जागरूकता का अभाव था. प्लेटो को जहां निजी विद्यालय में अध्ययन के लिए भेजा गया था, वहीं उसकी बहन को घर पर रहकर शिक्षा दिलाने का प्रबंध किया गया था. शिक्षा के मामले में स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव को प्लेटो ने गहराई से अनुभव किया था. इसलिए अपने आदर्श राज्य की संकल्पना में उसने दोनों के लिए एकसमान शिक्षा पर जोर दिया है. अस्तु, उस विद्यालय में प्लेटो ने अंकगणित की शिक्षा प्राप्त की. उन दिनों प्राचीन यूनानी काव्य में पारंगत होना विशेष योग्यता मानी जाती थी. अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का परिचय देते हुए प्लेटो ने उपलब्ध यूनानी काव्य का गहरा अध्ययन किया. होमर के साहित्य को पूरा कंठस्थ कर उसने अपने गुरुजनों को हैरत में डाल दिया था. प्लेटो के जीवनीकार डायोजिनिस ने उसको मेहनती और पढ़ने-लिखने में मन लगाने वाला विद्यार्थी कहा है. उसके अनुसार प्लेटो अद्भुत प्रतिभाशाली था. उसको ईश्वरीय वरदान प्राप्त था, उसी के फलस्वरूप उसकी मेधा विलक्षण थी. वह पाठ को बहुत जल्दी याद कर लेता था. उसका गला भी सुंदर था. प्राचीन कवियों की रचनाओं को सस्वर गाकर वह सबको हैरत में डाल देता था. प्लेटो की कविता और गायन कला पर पकड़ उसकी संवाद-पुस्तक ‘प्रोटेगोरस’ में दिखाई पड़ती है. उसकी यह मान्यता थी कि बच्चों के मस्तिष्क को छोटी और सुरीली कविताओं से समृद्ध किया जाना चाहिए. ताकि वे संवेदनशील बनें और समाज में रहकर बाकी लोगों से अच्छा तालमेल बना सकें. राजपरिवार से संबंध होने के कारण शारीरिक सौष्ठव और व्यायाम का प्रशिक्षण भी अनिवार्य था. इसके लिए वह नियमित रूप से व्यायामशाला जाता था. नियमित व्यायाम को उसने शिक्षा के अनिवार्य हिस्से के रूप में उल्लिखित किया है. अपनी पुस्तक ‘लाज’ में उसने लिखा है कि किशोरावस्था में कदम रखने के साथ ही बालक को एक कुशल स्वास्थ्य प्रशीक्षक के सुपुर्द कर देना चाहिए.

प्लेटो का विश्वास था कि केवल दार्शनिक ही अच्छे शासक हो सकते हैं. मगर उनके लिए भी शिक्षा अनिवार्य है. किसी भी अन्य बालक की भांति किशोर दार्शनिक को भी मानसिक और शारीरिक रूप से परिपुष्ट होना चाहिए. इसके लिए उसको योग्य अध्यापकों के निर्देशन में व्याकरण जिसमें लिखना और पढ़ना सम्मिलित है, चित्रकला तथा शारीरिक व्यायाम के बारे में बताया जाना चाहिए. स्वयं प्लेटो नियमित रूप से जमकर व्यायाम करता था. वह कई खेलों में पारंगत था और अपने समकालीन युवाओं को छका देता था. सुकरात से मिलने से पहले प्लेटो दर्शनशास्त्र की नियमित कक्षाओं में हिस्सा ले सकता था. सबसे पहले वह उस समय के महान दर्शनशास्त्री क्रेटीलस के संपर्क में आया, जो हेराक्लाटस का शिष्य था. हेराक्लाइटस की गिनती सुकरात से पहले के महान यूनानी दार्शनिकों में होती है. क्रेटीलस ने उसको उस समय तक प्रचलित दार्शनिक विचारधाराओं का बोध कराया, जिसमें प्लेटो ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए अल्प समय में ही विशेषज्ञता प्राप्त कर ली. प्लेटो की रचनात्मक प्रतिभा के दर्शन उसकी किशोरावस्था से ही होने लगे थे. यूनान के प्रतिभाशाली व्यक्तियों की तरह उसने अध्ययन के दौरान ही कविताएं लिखना आरंभ कर दिया था. युवावस्था के दिनों में उसने कविताएं, गीत, धार्मिक कविताएं आदि खूब रचीं. एक नाटक पुस्तक की रचना भी की. मगर सुकरात से भेंट के बाद उसके परंपरागत लेखन पर विराम लग गया. सुकरात से उसकी मुलाकात मानो उसके कायाकल्प की घटना थी, जिसने दुनिया को एक अप्रतिम आदर्शवादी विचारक, दर्शनशास्त्री प्लेटो को जन्म दिया. सुकरात के विचारों से प्रभावित होकर उसने अपनी सारी कविताएं, नाटक आदि आग के हवाले कर दिए तथा स्वयं को दर्शनशास्त्र के अध्ययन-लेखन तक सीमित कर दिया. प्रसंगवश बता दें कि उन दिनों दर्शनशास्त्र का विषयक्षेत्र बहुत व्यापक था. राजनीति, विज्ञान, अर्थशास्त्र, कानून, समाज, तत्वविज्ञान, अध्यात्म आदि उसी का हिस्सा माने जाते थे. सुकरात और प्लेटो की पहली मुलाकात को लेकर एक दंतकथा यह भी है कि सुकरात ने प्लेटो से मिलते ही कहा था कि एक हंस उसकी शरण में आया है. कुछ अनाम कवियों ने उस अवसर को महिमामंडित करते हुए कविताएं भी लिखी हैं. किंतु उनकी ऐतिहासिकता को लेकर सटीक टिप्पणी संभव नहीं है. आधुनिक विद्वानों का मानना है कि जिन दिनों प्लेटो की सुकरात से पहली भेंट हुई, वह युवा था. उस समय तक सुकरात सोफिस्टों की व्यंग्यात्मक आलोचना के कारण काफी ख्याति बटोर चुका था. उसकी वक्रोक्तियां लोगों की जुबान पर चढ़ी थीं. प्लेटो का एक चाचा चारमिंडस तथा उसका एक और संबंधी क्राइटिइस सुकरात के निकट मित्रों में थे. इस तथ्य की ऐतिहासिकता पर सटीक टिप्पणी करना इसलिए कठिन है, क्योंकि सुकरात ने स्वयं कुछ नहीं लिखा. उसके बारे में जो भी लिखित सामग्री है, वह प्लेटो तथा उसके अन्य शिष्यों द्वारा लिखी गई है. सुकरात से भेंट के पश्चात प्लेटो ने स्वयं को अध्ययन और लेखन तक सीमित कर दिया. यद्यपि उसके परिवार की आर्थिक-राजनीतिक हैसियत को देखते हुए उसके पास एथेंस की राजनीति में जगह बनाने के भरपूर अवसर थे. यदि ऐसा हो जाता तो महान दार्शनिक सुकरात का वह मेधावी शिष्य अधिक से अधिक रोम के विलासी सम्राटों-शासकों में अपना नाम लिखवाने में कामयाब हो जाता, किंतु उसने तो अपने लिए स्वतंत्र मार्ग चुना था. निश्चित रूप से इस चयन के पीछे प्रेरणा सुकरात की ही थी.

सिसली की यात्रा
सुकरात को दंडित किए जाने की घटना ने प्लेटो को आहत कर दिया था. उसे राजनीति से ऊब होने लगी थी. एथेंस की हवा में उसका दम घुटने लगा था. इसलिए कुछ समय के लिए उसने बाहर जाने का निर्णय किया और एक लंबी यात्रा पर प्रस्थान कर गया. यात्रा के लिए कोई पूर्वनिर्धारित गंतव्य नहीं था. केवल मन में एथेंस के राजनीतिक परिदृश्य से जन्मी आकुलता थी, वही उसे एथेंस के जड़-परिवेश से दूर निकलने के लिए उकसा रही थी. कालांतर में वही वैकल्पिक राजनीतिक दर्शन की खोज की प्रेरणा बनने वाली थी. उस यात्रा से, संभवतः वह अपने मन के उस खालीपन को भी भरना चाहता था, जो गुरु सुकरात को अचानक मृत्युदंड दिए जाने से उत्पन्न हुआ था. यात्रा के पहले पड़ाव के रूप में उसने मेगरा को चुना. वहां उन दिनों यूक्लिड की धूम मची थी. गणित प्लेटो की रुचि का विषय था. मेगरा में रहते हुए उसने यूक्लिडीय ज्यामिति का गहरा अध्ययन किया. पर उसका अशांत मन वहां बहुत दिनों तक विश्राम न पा सका. कुछ दिन वहां प्रवास करने के उपरांत वह दक्षिणी इटली की ओर प्रस्थान कर गया. मेग्ना ग्रेशिया उन दिनों यूनान के सबसे बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में ख्यात था. असल में वह दक्षिणी इटली के समुद्र तटीय इलाके में बसा छोटे-छोटे नगरों का समुच्चय था, जिसको व्यापारिक गतिविधियों ने जोड़ा हुआ था. व्यापारिक केंद्र होने के साथ वह गणितज्ञों और वैज्ञानिकों का ठिकाना भी था. मेग्ना ग्रेशिया प्रवास के दौरान प्लेटो पाइथागोरेस के अनुयायियों से मिला, जिनका उसपर गहरा असर पड़ा. इसी से उसके मन में अंकगणित के प्रति अनुराग का जन्म हुआ जो जीवनपर्यंत बना रहा. वह टेरेंटम में रह रहे, उस समय के प्रख्यात वैज्ञानिक आक्रिटस के संपर्क में भी आया. मेग्ना ग्रेशिया व्यापारिक केंद्र के रूप में विख्याता महानगर था, वहां की आबोहवा भी दिलकश थी. लेकिन वह भी प्लेटो के अशांत मन को लंबे समय तक बांधने में असमर्थ रही. उसका अगला पड़ाव सिसली था. उन दिनों सिसली पर डायोनिसियस प्रथम का अधिकार था. वह निरंकुश सम्राट था. उसका खास शौक था, प्रतिभाशाली लोगों को अपने दरबार में रखना. इसलिए नहीं कि उनके ज्ञान और अनुभव का लाभ उठाया जा सके, बल्कि इसलिए कि उसके माध्यम से अन्य राजाओं पर अपनी बुद्धिमत्ता की धाक जमाई जा सके. उसके दरबार में अनेक वैज्ञानिक, दर्शनशास्त्री, कवि, साहित्यकार, संगीतज्ञ आदि नियुक्त थे. सिसली प्रवास के दौरान प्लेटो की धारणा बनी कि शासन का दायित्व दर्शनशात्री को सौंपा जाना चाहिए. उसका विश्वास था कि दार्शनिक अधिक धैर्यवान, करुणाशील एवं शांतिप्रिय होते हैं. इसलिए उनसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर प्रजा-कल्याण के लिए अधिक कारगर नीतियांे पर काम करेंगे. उसका मानना था कि राजा को निजी महत्त्वाकांक्षाओं, भोगविलासों, बहादुरी के दंभ-भरे कारनामों का बखान करने के बजाय स्वयं को नैतिक मूल्यों के विकास के प्रति समर्पित कर देना चाहिए. प्लेटो की उस सलाह पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.

प्लेटो की रचनाओं में मिस्र के प्राचीन नगरों का भी उल्लेख हुआ है. इसलिए यह संभावना भी व्यक्त की जाती है कि उस यात्रा के दौरान उसने मिस्र के प्रख्यात नगर हेलियोपोलिस का भी भ्रमण किया था. प्लेटो ने लिए वह यात्रा नए अनुभव बटोरने की थी. उस समय वह अपनी वयस् के चालीसवें वर्ष से गुजर रहा था. यात्रा के दौरान उसकी लेखनी अनवरत-अविराम चल रही थी. लोग भी उसको पहचानने लगे थे. अंततः बारह वर्ष तक विभिन्न देशों की अनवरत यात्रा के बाद वह एथेंस वापस लौट आया.

सायराकस प्रवास के दौरान वह डायोन के संपर्क में आया था, जो वहां के निरंकुश सम्राट डायोनिसियस प्रथम का निकट का रिश्तेदार था. अपुष्ट òोतों के अनुसार उसने डाओन को शिक्षा भी दी. प्लेटो के एथेंस वापस लौटने के कुछ ही वर्षों पश्चात डायोनिसियस प्रथम की मृत्यु हो गई. प्लेटो को डीओन की ओर डायोनिसियस द्वितीय की शिक्षा के लिए निमंत्रण प्राप्त हुआ. उस समय तक वह सुकरात की छाया से बाहर आ चुका था. हालांकि अपने गुरु के प्रति उसके सम्मान में किंचित कमी नहीं आई थी. अब उसको लगने लगा था कि राजनीति, दर्शन, कानून आदि को लेकर उसके जो विचार हैं, उन्हें स्वतंत्र रूप में भी प्रकट किया जा सकता है. डीओन के आमंत्रण को स्वीकार कर वह साइराकस के लिए रवाना हो गया. वहां पहुंचने पर उसका जोरदार स्वागत किया गया. गणित प्लेटो का प्रिय विषय था. उसको वह कुशल दर्शनशास्त्री बनने की पहली सीढ़ी मानता था. डीओन स्वयं भी गणित और दर्शनशास्त्र में रुचि रखता था. उसने सम्राट के दुर्ग को ज्यामितीय रचनाओं के अनुसार तैयार करवाया था, जो अपने समय का अनोखी और विशिष्ट वास्तुरचना थी. डीओन के जीवनीकार प्लूटार्क ने उस दुर्ग का वर्णन किया है. उसने लिखा है कि दुर्ग में बुरादे का चबूतरे बनवाकर उनके ऊपर त्रिभुज, वृत आदि विभिन्न ज्यामितीय रचनाओं को दर्शाया गया था. पाइथागोरेस की प्रमेय का चित्रण भी एक स्थान पर था. उस समय जब अधिकांश सम्राट शिकार करने, अपने महलों में सुंदर स्त्रियों की भरमार करने के लिए राज्य का अधिकांश श्रमबल और ताकत झोंक देते थे, डीओन की कल्पना पर निर्मित वह दुर्ग गणितीय आकृतियों पर आधारित विशिष्ट रचना थी. प्लेटो कुशल अध्यापक था, किंतु उसका युवा शिष्य डायोनिसियस द्वितीय उतना प्रतिभाशाली न था. वह पढ़ते हुए बहुत जल्दी थक जाता था. उसका मन शिकार खेलने जैसे विलासितापूर्ण कार्यों में अधिक लगता था. डीओन से उसको ईष्र्या थी, इसलिए वह उसको पहले ही निष्कासित कर चुका था. अपने श्रम का कोई लाभ न देख प्लूटो वहां से ऊब गया और एथेंस वापस लौट आया. वापस लौटकर उसने शिक्षा केंद्र के रूप में अपनी महत्त्वाकांक्षी परियोजना के अंतर्गत ‘अकादमी’ की स्थापना की और खुद को अकादमी की सफलता के प्रति समर्पित कर दिया.

प्लेटो के प्रयासों से अकादमी की प्रतिष्ठा दिनोंदिन बढ़ रही थी. तभी उसको सायराकस से तीसरा निमंत्रण प्राप्त हुआ. उस समय वह वृद्धावस्था की ओर बढ़ चला था. एक सफल लेखक, विचारक और दार्शनिक के रूप में भी उसकी प्रतिष्ठा लगातार बढ़ती ही जा रही थी. हालांकि सायराकस के तीसरे दौरे के लिए प्लूटो पहले ही अपनी सहमति दे चुका था. मगर वह यात्रा उसके लिए विशेष कष्टकारी सिद्ध हुई. उसके पहुंचने के एक महीने के अंदर ही डायोनिसियस द्वितीय ने प्लूटो के मित्र और शुभचिंतक डीओन को देश-निकाले की सजा सुना दी. यही नहीं प्लूटो को डीओन का मित्र और समर्थक मानते हुए तानाशाह सम्राट ने नजरबंद बना लिया गया. आखिर बुलावे पर सायराकस लौट आने का वचन देने पर सम्राट ने उसको मुक्त किया. इस घटना का उल्लेख प्लूटो ने अपनी 7’वीं पत्र-रचना में किया है. अपुष्ट स्रोत यह भी बताते हैं कि डायोनिसियस द्वितीय प्लेटो से नाराज हो गया था तथा उसने प्लेटो को दास के रूप में बेचने का पूरा इंतजाम भी कर दिया था. उस समय आक्रिटस ने उसकी मदद की, जिसके फलस्वरूप वह एथेंस वापस लौटने में सफल हो सका. कुछ दिन पश्चात निर्वासन की सजा काट रहा डीओन भी एथेंस पहुंच गया. दोनों की मुलाकात अकादमी परिसर में हुई. डीओन प्लेटो की अकादमी को देखकर बहुत प्रसन्न था. उसके बाद वह चार वर्षों(465—361 ईसा पूर्व) तक एथेंस में ही रहा. इस बीच उसको तानाशाह डायोनिसियस की ओर से एक और निमंत्रण मिला. इस बार प्लेटो ने उस निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया. इस घटना को एक वर्ष नहीं बीता था कि प्लेटो को डायोनिसियस की ओर से एक और बुलावा आया. इस बार उसने प्लेटो के मित्र एक्रेडेमस को जहाज पर प्लेटो को लिवाने के लिए भेजा था. डायोनिसियस द्वितीय की धूर्तता को समझते हुए प्लेटो चैथी बार सायराकस जाने के लिए कतई तैयार न था, किंतु उसके मित्र डीओन ने एक योजना के तहत उसको आमंत्रण स्वीकार कर लेने की सलाह दी. डीओन के आग्रह पर प्लेटो सायराकस की चैथी यात्रा को तैयार हो गया. मगर स्थितियां फिर उसके प्रतिकूल थीं. डायोनिसियस ने विश्वासघात करते हुए उसको एक बार फिर कारावास में डाल दिया. इस बार प्लेटो के कुछ मित्रों ने उसकी मदद की, तभी वह कारागार से मुक्त हो सका.

इस बीच डीओन ने भाड़े के सैनिकों को जुटाकर एक सेना तैयार की और अपनी मातृभूमि पर धावा बोल दिया. युद्ध में उसको सफलता मिली और सिसली उसके कब्जे में आ गई. किंतु उसको मिली सफलता अल्पकालिक सिद्ध हुई. वह कुछ ही दिन राज कर पाया था कि एक विश्वासघाती ने उसकी हत्या कर दी. सिसली में एक बार फिर अराजकता का छा गई. इस घटना ने प्लेटो को बुरी तरह आहत कर दिया. वह निराशा से भर उठा. उसकी हताशा और अवसाद का एक कारण यह भी था कि डीओन की हत्या कर, राजसत्ता पर कब्जा कर लेने वाला विश्वासघाती उसका अपना ही शिष्य केलीप्पस था. इस घटना से प्लेटो का राजनीति से ही विश्वास हट गया था. इसलिए सायराकस को अलविदा कहकर वह वापस अपनी अकादमी में लौट आया. उस समय वह बूढ़ा हो चला था. अपने जीवन के शेष तेरह वर्ष उसने अकादमी में रहकर बिताए. 347(कुछ विद्वानों के अनुसार 348) ईसा पूर्व जब उसकी मृत्यु हुई, उस समय उसकी उम्र लगभग 80 वर्ष थी. इतिहासविद् डायोजिनिस के अनुसार उसको अकादमी के परिसर में ही दफनाया गया था, यद्यपि उसके मकबरे की खोज अभी तक नहीं की जा सकी है.

प्लेटो पर अपने समकालीन जिन लेखकों का प्रभाव पड़ा था, उनमें हेराक्लिीटस, पेरामेंडिस, जीनो तथा सुकरात प्रमुख हैं. इनके अलावा वह, स्पार्टा के राजनीतिक परिवेश, वहां की नीतियों तथा पाइथागोरेस के अनुयायियों से भी प्रभावित-प्रेरित था. प्लेटो के तत्वदर्शन पर पेरामेंडिस का प्रभाव है. जबकि जीनों से वह इतना प्रभावित था कि उसको अपनी एक संवादिका में स्थान दिया है. सुकरात तो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में प्लेटो का नायक है ही. उसका लेखनकाल पचास वर्ष से अधिक विस्तृत है. इस अवधि में कभी ऐसा नहीं हुआ कि उसने सुकरात को विस्मृत किया हो, या उसकी उपेक्षा की हो. केवल एक पुस्तक को छोड़कर सुकरात उसकी सभी पुस्तकों में महत्त्वपूर्ण पात्र के रूप में उपस्थित है, जो उसकी अपने गुरु के प्रति निष्ठा को दर्शाता है. उसके राजनीतिक विचारों पर हेराक्लाइटस सहित पाइथागोरेस के अन्य अनुयायियों का प्रभाव है. उन्हीं को पढ़ते हुए प्लेटो के मन में गणित के प्रति विशेषानुराग पैदा हुआ था. हालांकि गुरु सुकरात की भांति प्लेटो भी कविता और कवियों को नापसंद करता था. उसके अनुसार कवि बात को आलंकारिक भाषा में बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं. उनका जोर सत्य को यथातथ्य प्रस्तुत करने के बजाय उसको चामत्कारिक बनाने पर होता है. इस कारण कविता अपना असर खो देती है. इसके बावजूद परोक्षरूप में ही सही उसके लेखन पर प्राचीन यूनानी कवियों होमर और हेसोद का भी प्रभाव भी है. प्लेटो के लेखन में जो अद्भुत तरलता एवं लालित्य है, वह बिना संवेदनशील मनस् के संभव ही नहीं है.

प्लेटो का योगदान

प्लेटो के दर्शन को यदि किसी एक शब्द में अभिव्यक्त करने को कहा जाए तो उसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त शब्द होगा—आदर्श. दूसरा एक शब्द जो इसके विकल्प के रूप में संभव है, वह है—नैतिकता. वस्तुतः प्लेटो ने जिस आदर्श समाज का सपना देखा था, वह तभी संभव है, जब उसके शासकगण अपने आचरण को नैतिकता की कसौटी पर कसते रहें. उनमें आत्मावलोकन का गुण हो. वे पर्याप्त संवेदनशील तथा अपने कर्तव्य को समझने वाले हों. जो विलासिता से दूर सादगीपूर्ण जीवन पसंद करते हों. उनमें अपना पक्ष प्रस्तुत करने का सलीका हो तथा विरोधी की बात सुनने का धैर्य. प्लेटो स्वयं एक भावुक एवं संवेदनशील इंसान था. मन का सच्चा और खरा. गुरु सुकरात का मानना था कि सृष्टि में कोई ऐसा प्राणी नहीं जो बुराई की कामना करता हो. मूलतः सभी शुभत्व के समर्थक हैं. शुभत्व केवल सद्गुण द्वारा संभव है, जो वास्तविक ज्ञान से जन्म लेता है. गुरु सुकरात की भांति प्लेटो ने भी आदर्श समाज का सपना देखा था. जहां कानून का राज हो. मगर कानून का कर्तव्य अपने नागरिकों को अनुशासन में बांधने तक सीमित नहीं है. बलप्रयोग से जेलखाना तो चलाया जा सकता है, समाज नहीं. समाज को चलाने के लिए नैतिक बल की जरूरत पड़ती है. उसके लिए कोरी ताकत किसी काम की नहीं होती. यह तभी संभव है, जब कर्तव्य और अनुशासन की भावना नागरिकों के अंतर्मन से उमड़े. उनका अपने शासकों पर पूरा-पूरा विश्वास हो. इसकी संभावना तभी है जब शासकगण अपने कर्तव्यों को समझकर उनका पालन करने के लिए प्रतिबद्ध हों…उनका अपना जीवन किसी भी प्रकार की विलासिता अथवा वैभव प्रदर्शन से मुक्त हो. जब राज्य की संपत्ति का विभाजन इस प्रकार हो कि उसका लाभ वहां के प्रत्येक नागरिक को मिल सके. प्लेटो ने दास प्रथा का समर्थन किया था. स्मरण रहे कि यह उस समय की घटना है, जब रोम की लगभग आधी आबादी दासों से मिलकर बनी थी. कुछ हालांकि ऐसे भी दास थे, जो स्वयं को स्वतंत्र करा चुके थे, किंतु उन्हें भी नागरिकों जितने अधिकार न थे. स्वतंत्र हो जाने के बावजूद समाज में उनकी हालत दूसरे दर्जे के नागरिक जैसी थी. जो दास थे, वे पशु की तरह व्यवहृत होते, खरीदे-बेचे जाते थे. समाज के संसाधनों पर अभिजात्य वर्ग का अधिकार था. दास भी संसाधनों का अनिवार्य हिस्सा थे. उनका कर्तव्य था अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करना. प्लेटो के माता-पिता की आर्थिक स्थिति भले ही दूसरे अभिजात्य परिवारों, राजकुल के सदस्यों जितनी सुदृढ़ भले न थी, किंतु उसके परिवार का पूरा का पूरा परिवेश अभिजात्य परिवारों जैसा था. गुरु सुकरात भी दासप्रथा को जरूरी मानते थे. प्लेटो ने भी इस कुप्रथा का उत्पादन के स्तर को बनाए रखने के लिए समर्थन किया. अपने लेखन विशेषकर अपनी महान कृति ‘रिपब्लिक’ में उसने जिस आदर्श समाज का सपना देखा था, उसमें समानता और बंधुत्व की जो कल्पना की गई थी, वह केवल समतामूलक समाज में ही संभव है. अगले चरण में अरस्तु ने भी विकासदर के स्थायित्व एवं गतिशीलता के लिए दास प्रथा का समर्थन किया था.

प्लेटो ने अपना लेखन कवि के रूप में आरंभ किया था. प्राचीन ग्रीक साहित्य से प्रभावित होकर प्रारंभ में उसने दुखांत रचनाएं लिखीं. मगर जिस दार्शनिक प्लेटो को दुनिया जानती है, उसका वास्तविक जन्म प्लेटो और सुकरात की भेंट के पश्चात ही संभव हो सका था. प्लेटो उस समय बीस वर्ष का स्वप्नदृष्टा युवा था, उसकी आंखों में रूमानी सपने थे. गंभीर और अंतर्मुखी वह बचपन से ही था. इसलिए बचपन से युवावस्था तक आते-आते वह प्राचीन यूनानी साहित्य का अध्ययन कर चुका था. सुकरात उस समय वयस् के साठवें वर्ष में प्रवेश कर चुका था, मगर उसकी ख्याति पूरे एथेंस में फैली हुई थी. खासकर नवयुवकों पर उसका जादुई प्रभाव था. सुकरात के संपर्क में आने के पश्चात प्लेटो को अपना उस समय तक रचा सब व्यर्थ लगने लगा. उसको कविता से अरुचि हो गई. एक दिन उद्धिग्न होकर उसने अपनी समस्त काव्य रचनाएं आग के हवाले कर दीं. उनमें वह नाटक भी था, जिसको उसने एक प्रतियोगिता के लिए विशेषरूप से रचा था. तदोपरांत उसने स्वयं को दर्शन, राजनीति, गणित, विज्ञान और खगोलविज्ञान के अध्ययन तक सीमित कर दिया. उल्लेखनीय है कि राजपरिवार से संबद्ध होने के कारण प्लेटो के पास एथेंस की राजनीति में स्थान बनाने के भरपूर अवसर थे. यदि वह सुकरात से न मिला होता तो अवश्य की उसकी गिनती एथेंस के महत्त्वपूर्ण राजनयिकों में होती. किंतु सुकरात की प्रेरणा पर उसने परंपरागत राजनीति को आगे बढ़ाने की अपेक्षा नए समाज का सपना देखा, नई राजनीतिक प्रणालियों की खोज के काम को वरीयता दी, जिसके लिए गहन साधना और त्याग की आवश्यकता थी.

सुकरात से प्रभावित प्लेटो ने अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए विपुल वाङ्मय की रचना की. हालांकि उसके द्वारा लिखे गए ग्रंथों की कुल संख्या को लेकर विद्वानों के बीच मतभेद है. संवाद-शैली पर आधारित होने के कारण प्लेटो द्वारा रचित पुस्तकें ‘डायलाग्स’ कही जाती हैं. इन पुस्तकों में उसने सुकरात की संवाद-शैली का प्रयोग किया था, जिसे ‘सुकरातीय शैली’ के नाम से भी जाना जाता है. उसने कुल मिलाकर 46 संवादों(डायलाग्स) की रचना की. इनमें शिक्षा, राजनीति, कानून, दर्शन, नैतिकता, तत्वज्ञान आदि पर विस्तृत विचार-विमर्श प्रस्तुत किया गया है. अधिकांश विद्वानों का मानना है कि प्लूटो द्वारा रचे गए संवादों की संख्या मात्र 24 है. कुछ विद्वान इस संख्या को 28 तक ले जाते हैं. बाकी रचनाएं बाद में उसके नाम से जोड़ दी गई हैं. प्लेटो द्वारा रचित प्रमुख ‘संवादों’ में ‘रिपब्लिक’, ‘दि अपोला॓जी’, ‘फीडो’, ‘प्रोटागोरेस’, ‘चारमेंडिस’, ला॓ज आदि प्रमुख हैं. इनमें कर्तव्य, साहस, सद्गुण, न्याय, प्रेम, सौंदर्य, विज्ञान, प्रकृति, कानून, रीति-रिवाज, नैतिकता, शुभता, परंपरा, उत्तराधिकार, मेल-मिलाप, ज्ञान आदि विभिन्न विषयों को बड़े विद्वतापूर्ण ढंग से समेटा गया है, जिसके कारण ये पुस्तकें गत 2400 वर्षों से विद्वानों और शोधकर्ताओं को प्रभावित करती आ रही हैं. प्लेटो की रचनाओं में अब भी वे तत्व मौजूद हैं, जिनके आधार पर काम करते हुए उन अनेक समस्याओं का हल खोजा जा सकता है, जो पूंजीवाद अथवा सांस्कृतिक अपसंस्करण की देन हैं.

संवादों के अतिरिक्त उसने 13 पुस्तकें(लेटरर्स) पत्र-शैली में रची हैं. इनमें यूनान के तत्कालीन इतिहास और प्लेटो के जीवन की झलक देखी जा सकती है. प्लेटो के जीवनी-लेखकों के लिए तो उसकी पत्र-शैली की रचनाएं प्रामाणिक òोत हैं हीं. ‘संवादों’ की भांति पत्र-शैली में रची गई पुस्तकों की प्रामाणिकता पर भी कुछ विद्वान आपत्ति करते हैं. अधिकांश का मानना है कि प्लेटो के नाम से उपलब्ध पत्र-शैली की 13 पुस्तकों में से मात्र छठी, सातवीं और आठवीं रचनाओं को ही उसकी वास्तविक कृति माना जा सकता है. शेष रचनाएं परिवर्ती लेखकों द्वारा प्लेटो के नाम पर थोप दी हैं. पहले अकसर ऐसा होता था. जब किसी विचारक का नाम अथवा पुस्तक अधिक प्रचलित हो जाती तो उनके समर्थक-अनुयायी उसमें अपनी ओर से भी विस्तार करते जाते थे. कभी यह काम उस ग्रंथ के प्रति समर्पण भाव दर्शाते हुए भावातिरेक में कर दिया जाता था तो कभी-कभी, आत्मविश्वास की कमी के कारण, अपने विचारों को भी ग्रंथ-विशेष में यह सोचकर समाहित कर लिया जाता था, इससे वे अधिक मान्य होकर जनता में प्रचलित हो सकें. उदाहरणार्थ भारत में भी वेदों, महाकाव्यों, स्मृतियों, पुराणों में ऐसे प्रक्षेपण लगातार होते रहे हैं. प्लेटो द्वारा रचित सभी संवादों में मनुष्यता की चिंताएं तथा उसकी स्थापना के प्रति तीव्र आग्रहशीलता है. ‘ला॓ज’ उसका अंतिम संवाद है, जिसमें वह शिक्षा की अनिवार्यता तथा उसकी सर्वोपलब्धता पर जोर देता है. स्मरणीय है कि प्लेटो पहला विचारक था जिसने आदर्श समाज की स्थापना के लिए बच्चों की वैज्ञानिक तरीके से शिक्षा को जरूरी माना था. उससे पहले शिक्षा का मुख्य उद्देश्य धार्मिक प्रतीकों, आस्थाकेंद्रों के बारे में बताना और अध्यात्म-जिज्ञासा को बनाए रखना होता था. उनसे अलग हो चुके सोफिस्ट विचारक भी थे, जो केवल अभिजात्य वर्ग अध्यापन करते थे. उनकी दृष्टि में शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य व्यावहारिक निपुणता प्राप्त करना था. बदले में वे मोटी शुल्क वसूलते थे. उन दिनों एथेंस का कानून ही ऐसा था कि तीस वर्ष से अधिक वयस् का कोई भी नागरिक राजनीति में हिस्सा ले सकता था. राजनीतिक गतिविधियां प्रायः खुले में संपन्न होती थीं. वहां अनुकूल निर्णय के लिए दूसरे सदस्यों को प्रभावित करना अत्यावश्यक था. इसलिए वाक्-निपुण होना अतिरिक्त योग्यता मानी जाती थी. असल में वह गणतंत्र के नाम पर भीड़तंत्र था. जिसमें वाक्निपुण व्यक्ति के विकास के अतिरिक्त अवसर थे.

पश्चिमी जगत में सुकरात को बौद्धिक संत की गरिमा प्राप्त है. वही सुकरात प्लेटो के संवादों में प्रत्यक्ष अथवा परोक्षरूप में नायक के रूप में उपस्थित है, जबकि स्वयं प्लेटो सिवाय ‘अपोला॓जी’ के किसी भी संवादिका में उपस्थित नहीं है. इस संवाद में सुकरात के अंतिम दिनों का वर्णन है. यहां उल्लेख करना प्रासंगिक हो सकता है कि सुकरात ने स्वयं कुछ नहीं लिखा था, सिवाय कुछ धार्मिक गीतों के अनुवाद के, जो उसने अपनी मृत्यु से पहले, कारागार में अपने अंतिम दिन बिताते हुए लिखे थे. उनके अलावा वह सिर्फ संवाद में हिस्सा लेता रहा. वहां भी उसकी उपस्थिति एक प्रश्नवाचक जिज्ञासु की होती थी. ‘मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि मैं कुछ नहीं जानता….मुझे अपने अज्ञान का ज्ञान है.’—यह उसकी प्रसिद्ध उक्ति थी. इसके विपरीत सोफिस्ट विचारक थे, जो अपने ज्ञान के अहंकार से तने-तने रहते थे. जिनका ज्ञान केवल समाज के उच्च वर्ग के काम की चीज था. दूसरी ओर सुकरात के शिष्यों में अधिकांश नवयुवक थे, जिनके मन में कहीं न कहीं एथेंस की राजनीतिक के प्रति असंतोष था. सुकरात द्वारा लिखी गई किसी पुस्तक का उल्लेख नहीं मिलता. जिस सुकरात को दुनिया जानती और सम्मान करती है, उसके बारे में अधिकांश विवरण प्लेटो तथा जेनोफीन की रचनाओं से ही प्राप्त होता है. इसलिए यह कहना बहुत कठिन है कि प्लेटो के विचारों में कितना मौलिक और कितना गुरु सुकरात से आयातित है. लेकिन यह सप्रमाण कहा जा सकता है कि गुरु-शिष्य के विचारों में काफी समानता थी, प्लेटो ने अपनी रचनाओं में जहां भी उसे अवसर मिला, मौलिक दृष्टि के साथ गुरु के विचारों को ही विस्तार दिया है. अतएव प्लेटो के संवादों के भाषाशास्त्रीय वर्गीकरण-विश्लेषण तथा जेनोफीन, प्रोटेगोरेस आदि की समकालीन लेखकों की कृतियों के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा सुकरात के विचारों को जानने की कोशिश की जाती रही है. इनमें जेनोफीन और प्रोटेगोरस प्लेटो के समकालीन थे.

सुकरात और प्लेटो दोनों ही परंपरा के नाम पर रूढ़ियों को थोपे जाने के विरुद्ध थे. दोनों ही सोफिस्टों के तर्कों, मिथ्या व्याख्यानों को व्यर्थ का वितंडा मानते थे. दोनों ही का मानना था कि ज्ञार्नाजन ही मनुष्य का पहला लक्ष्य है. वही शुभत्व की प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है. अतएव ‘न तो कोई इच्छा पाप है, न इच्छा करना कोई अपराध है. सभी सदगुण ज्ञान का प्रतीक हैं’—सुकरात का मानना था. केवल सद्गुण द्वारा ही परमशुभ को जाना जा सकता है और सद्गुण की पहचान के लिए ज्ञान परमावश्यक है. इसलिए प्लेटो ने अपनी संवादों में शिक्षा पर पूरा जोर दिया था. समाज के रूप में उसने ऐसी व्यवस्था की संकल्पना की थी, जिसके द्वारा सभी को ज्ञानार्जन का पर्याप्त अवसर मिल सके. वह सुकरात के आदर्शों को अपने चिंतन में न केवल महत्त्वपूर्ण स्थान देता है, बल्कि ऐसी व्यवस्थाओं की परिकल्पना भी करता है, जिनसे इस लक्ष्य को सुगम बनाया जा सके. जो मानवोत्कर्ष के सपने को सच करने में सहायक हों. देखा जाए तो प्लेटो का पूरा लेखन मनुष्य के बहुआयामी उत्थान को समर्पित है. उसकी संवादिकाओं में सुकरात की उपस्थिति एक प्रखर-बुद्धि, निस्पृह, आदर्शवादी विचारक, मौलिक चिंतक और भौतिक प्रलोभनों से मुक्त मानवतावादी शिक्षक की है. जिसके संपूर्ण चेष्ठाएं मनुष्यता की स्थापना को समर्पित हैं, और जिसके पास मनुष्यता की सर्वश्रेष्ठता को स्थापित करने वाले असंख्य तर्क हैं. जिसकी ज्ञान प्राप्ति की ललक वरेण्य है. जो हर पल कुछ सीखने को छटपटाता रहता है तथा किसी भी प्रकार के भौतिक प्रलोभनों और लालसाओं से परे है. जो तर्क के माध्यम से अपनी बात मनवाना चाहता है. लेकिन तर्क उसके लिए दूसरों को बौद्धिक रूप से परास्त करने, उनपर अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता सिद्ध करने अथवा विमर्श के नाम पर फिजूल का वाग्जाल खड़ा करने का माध्यम नहीं है. सुकरात के लिए तर्क सत्य की खोज का माध्यम है, जिसके द्वारा सद्गुणों की स्थापना संभव है. उसके पास मनुष्यता की हर समस्या का समाधान, उससे उबरने की युक्ति है, वह ज्ञानार्जन को अपने जीवन का लक्ष्य मानता है, और बौद्धिक जड़ता को मनुष्यता के लिए अभिशाप.

प्लेटो के लेखन-चिंतन का दायरा व्यापक था. पत्र-शैली में रचित उसकी पुस्तकों द्वारा उसके अपने जीवन तथा तत्कालीन इतिहास के बारे में प्रामाणिक जानकारी मिलती है. चूंकि सुकरात इन सभी में किसी न किसी रूप में मौजूद है इसलिए कुछ विद्वान उन्हें ‘सुकरातीय संवाद’ भी कहते हैं. प्लेटो ने सुदीर्घ जीवन जिया और भरपूर लेखन किया था. उसके विपुल वाङमय में हर सोच-समझ के व्यक्ति को सीखने, पे्ररणा लेने के लिए कुछ न कुछ मिल जाता है. यह आधार पर यह दावा भी किया जाता है कि पश्चिम का कोई दर्शन ऐसा नहीं है, जिसके बीजतत्व प्लेटो के लेखन में उपलब्ध न हों. गत 2400 वर्ष के कालखंड में अनेक विचारकों ने अपने सोच और विचारधारा के अनुरूप उसके लेखन को वर्गीकृत-विश्लेषित करने का प्रयास किया है. सबसे पहले लुइस केंपबेल ने, उनीसवीं शताब्दी में शैली-वैज्ञानिक अध्ययन द्वारा प्लेटो की संवादों को भिन्न-भिन्न वर्गों में बांटने का काम किया था. अपने अध्ययन के उपरांत केंपबेल इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि क्रिटिअस, टाइमियस, लाॅज, फिलेबस तथा स्टेटसमेन प्लेटो की अपेक्षाकृत परिवर्ती रचनाएं हैं. बावजूद इसके प्लेटो विभिन्न पुस्तकों के रचनाकाल को लेकर विवाद अकसर उठते ही रहते हैं. तो भी मोटे तौर पर उसकी पुस्तकों के रचनाकाल को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है. आरंभिक संवाद-पुस्तकों का लेखनकाल 400 ईस्वी पूर्व से 387 ईस्वी पूर्व है. इस वर्ग के संवादों में सुकरात की शत-प्रतिशत उपस्थिति है. यह सुकरात के जीवन और दर्शन के बारे में सवार्धिक प्रामाणिक स्रोत हैं. विश्व-समाज में व्यक्ति और विचारक के रूप में सुकरात की जो छवि है, उसका आधार यही पुस्तकें हैं. इनमें एक ओर जहां प्राचीन यूनान के सामाजिक-राजनीतिक परिवेश की झलक मिलती है, वहीं प्लेटो और सुकरात की अंतरंगता का भी बोध होता है. इनपर प्लेटो की युवावस्था के अनुभव और चिंतन की छाप है. सुकरात की इनमें मौजूदगी इस सीमा तक है कि इस कारण कुछ विद्वान इन्हें ‘सुकरातीय संवाद’ भी कहते हैं. इनमें मनुष्यता और प्रेम का दर्शन है. अपोलाॅजी, चारमिंडिस, क्रीटो, यूथाइफ्रो, आयोन, लेसर हिप्पीयास, मेनेक्जीनियस, लाइसस, प्रोटेगोरस, लेस आदि इसी वर्ग में आती हैं. इनके अतिरिक्त यूथाइडेमस, मेनो तथा जोर्जिया को भी प्लेटो के प्रारंभिक संवादों में गिना जाता है. इन पुस्तकों के माध्यम से हमें सुकरात की वक्तृत्वकला का साक्षात होता है तथा उसका मानवताप्रेमी, निर्भीक, स्पष्टवक्ता का रूप सामने आता है. इन सभी संवादिकाओं में एक और विशेषता है कि इनमें सुकरात विनम्रतापूर्वक प्रश्न उठाता है. उसके उत्तर की अपेक्षा वह प्रतिपक्षी से रखता है. वार्तालाप के बीच वह गजब का धैर्य दिखलाता है. यदि सामनेवाला नाराज हो तो भी वह उद्धिग्न नहीं होता. बल्कि शांतिपूर्वक संवाद की निरंतरता को बनाए रखता है. वह साभिमान इस बात को कहता है कि उसको अपने अज्ञान का ज्ञान है. उसकी यह विनम्रता ही उसको उच्चकोटि का जिज्ञासु और विचारक सिद्ध करती है.

दूसरी श्रेणी में प्लेटो के उन संवादों को रखा जाता है, जो उसने सुकरात की मृत्यु के बाद, 386 ईसा पूर्व से लेकर 367 ईसा पूर्व के बीच लिखे थे. उल्लेखनीय है कि सुकरात की मृत्यु से खिन्न प्लेटो एथेंस को छोड़कर सिसली की सुदीर्घ यात्रा पर निकल चुका था. दस वर्ष लंबी उस यात्रा में उसने सिसली के अलावा अनेक निकटवर्ती राज्यों का भ्रमण दिया. सायराकस के निरंकुश सम्राट डायोनिसियस के उत्थान और पतन का साक्षी बना. कहा जा सकता है कि जीवन में व्यावहारिक अनुभव बटोरते हुए प्लेटो ने इन संवादों की रचना की थी, जिनकी छाप इन पर है. सुकरात की मौजूदगी इनमें भी है, किंतु उसके स्वभाव में किंचित अंतर आ चुका है. अब वह सिर्फ जिज्ञासा ही प्रकट नहीं करता, साथ-साथ समस्या का समाधान भी देता है. उसके समाधान उसके मानवतावादी दृष्टिकोण के ही अनुरूप हैं. इन रचनाओं में हमारा साक्षात प्लेटो की बौद्धिक परिपक्वता से भी होने लगता है. हालांकि यह अंतर कर पाना बड़ा कठिन है कि इन संवाद-पुस्तकों में उल्लिखित विचारों में कितने प्लेटो के हैं और कितने गुरु सुकरात से आयातित. ‘केवल शुभत्व का बोध ही ज्ञान है, प्राणीमात्र शुभ की कामना करता है. जानबूझकर कोई भी पाप का भागी नहीं बनना चाहता.’—यही सुकरात के दर्शन का मूल तत्व है, जो प्लेटो के मध्यकालीन संवादों में निखरकर आता है. ‘पदार्थ के शुद्ध-सात्विक स्वरूप को पहचान लेना, उसको उसकी पवित्रता के साथ अनुभव करना ज्ञान का प्रमुख मार्ग है. मानवजीवन का लक्ष्य ऐसी ही अनुभूतियों की खोज है, जिससे वह सृष्टि के रहस्यों की सही-सही व्याख्या कर सके.’ ये विचार प्लेटो के थे, जो उसकी रचनाओं में अलग-अलग तर्कों के साथ अभिव्यक्त होते हैं. ‘सिंपोजियम’ और ‘रिपब्लिक’ इस दौर में लिखी गई प्रमुख संवाद-पुस्तकें हैं. जिनमें वह आत्मा की अमरता के साथ न्याय, सत्य, सौंदर्य, शुभत्व, ज्ञान आदि को लेकर अपना विशिष्ट चिंतन प्रस्तुत करता है. ‘पेरामेंडिस’ तथा ‘थिटेट्स’ इस काल के अंतिम दौर में रची गई पुस्तकें हैं. इस दौर के संवादों में क्रिटेलस, पेरामेंडिस, फीडिया, फीडरस, रिपब्लिक, सिंपोजियम, थीटेट्स आदि आती हैं. इन रचनाओं से प्लेटो का राजनीति और धर्म के प्रति रुझान भी प्रकट होता है.

परिवर्ती जीवनकाल की संवाद-पुस्तकों का लेखनकाल 366 ईसा पूर्व से 348 ईसा पूर्व तक है. उस समय तक प्लेटो राजनीति से उकता चुका था. एथेंस वापस लौटकर उसने खुद को अध्ययन-अध्यापन को समर्पित कर दिया था. ‘अकादमी’ में रहते हुए उसने विपुल साहित्य की रचना की थी. प्लेटो के अधिकांश महत्त्वपूर्ण संवाद इसी दौर में रचे गए. ‘ला॓ज’, ‘सोफिस्ट’, ‘फिलेबस’, ‘स्टे्टसमेन’ तथा ‘टाइमियस’ इस कालखंड की अतिमहत्त्वपूर्ण संवादिकाएं हैं. इनमें प्लेटो लगभग अपने गुरु की गहन छाया से उबर चुका था, इसलिए इन संवादों में वह या तो नदारद है, अथवा न्यून भूमिका लिए हुए है. इनमें हम प्लेटो को मौलिक दार्शनिक और चिंतक के रूप में पाते हैं. ‘टाइमियस’ में वह वस्तुओं के वर्गीकरण पर चर्चा करता है. इस समय तक प्लेटो की संवादशैली भी काफी निखर चुकी थी. वह नए तर्कों के साथ बात को आगे बढ़ाता है. वार्तालाप में भाग ले रहा प्रतिपक्षी किसी वस्तु अथवा विचार के वर्णन के लिए अन्य वस्तुओं से उसकी समानता और असमानताओं का विश्लेषण करता है, ताकि उनको उनके यथार्थरूप में जाना जा सके. ‘सोफिस्ट’ में प्लेटो इस अवधारणा के साथ प्रस्तुत होता है कि दर्शन का मूल स्वरूप, जानने की शाश्वत प्रक्रिया में निहित है. यानी मनुष्य की जिज्ञासा है, तो दर्शन है. किसी वस्तु को जान लेने के बाद भी उसके बारे में बहुत कुछ जानना शेष रह जाता है. इसलिए दर्शन की भूमिका कभी समाप्त नहीं होती. इन संवादों में प्लेटो बहुत-से नए मुद्दे भी उठाता है. मगर कई बार वह उन बिंदुओं को भी पुनःविमर्श के केंद्र में लाता है, जिनपर वह अपने पूर्ववर्ती संवादों में विचार कर चुका था. नए निष्कर्ष उसके पिछले चिंतन को आगे बढ़ाने का काम करते हैं. परिपक्व और सधे हुए चिंतन के कारण ये संवाद प्लेटो की पिछली संवाद-पुस्तकों की अपेक्षा अधिक गंभीर और विषय-केंद्रित बन पड़े हैं.

जैसा कि पहले भी कहा गया है कि इन संवादों में प्लेटो स्वयं अनुपस्थित है. सिवाय ‘अपोला॓जी’ के वह किसी भी संवाद में नजर नहीं आता. उद्घोषक की उपस्थिति भी चर्चा को मूल विषय तक लाने तक सीमित है. हालांकि अनेक ऐसे संवाद जैसे मेनो, जोर्जियास, फीड्रस, क्रीटो, यूथाइफ्रो हैं जो सीधे वार्तालाप से आरंभ हैं. कुछ संवादों में उद्घोषक की भूमिका स्वयं सुकरात ने निभाई है, जिनमें वह प्रथम पुरुष में सीधे संवाद करता है. ऐसी रचनाओं में लाइसिस, चार्मिंडिस, रिपब्लिक आदि हैं. संवाद-पुस्तक ‘प्रोटेगोरस’ का आरंभ सीधे वार्तालाप से होता है, मगर कुछ देर बाद ही सुकरात उसमें उद्घोषक की भूमिका में उपस्थित हो जाता है. इसी प्रकार फीडो और सिंपोजियम की शुरुआत संवादों के माध्यम से होती है, मगर इनमें थोड़ी देर बाद सुकरात के शिष्य उपस्थित होकर उसको नया मोड़ दे देते हैं. आशय यह है कि प्लेटो ने अपनी संवादिकाओं में विषय प्रस्तुतीकरण के लिए विभिन्न पात्रों, स्थितियों और शैलियों का सहारा लिया है, हालांकि उसका ध्येय नाटकीयता प्रस्तुत करना हरगिज नहीं था. न ही वह अपनी रचनात्मक क्षमता द्वारा विद्वानों को प्रभावित करना चाहता था. न ही उसका लक्ष्य प्राचीन और समकालीन यूनानी साहित्यकारों की भांति प्रसिद्ध यूनानी चरित्रों का महिमामंडन करना था. ये संवाद मूलतः दार्शनिक चर्चा हैं, इसलिए इनमें वार्तालाप में हिस्सा ले रहे व्यक्तियों की संख्या बहुत कम है. उनमें से कुछ ऐतिहासिक चरित्र भी हैं. चर्चा को अवरोध से बचाए रखने के लिए प्लेटो उनमें नए-नए पात्रों को लाता है. वे पात्र साधारण व्यक्ति भी हो सकते हैं. जैसे ‘सोफिस्ट’ और ‘स्टेटसमेन’ नामक संवादों में दक्षिणी इटली से आया एक अजनबी यात्री चर्चा को आगे बढ़ाता है. इसी प्रकार ‘लाॅज’ में एथेंस के दो नागरिक स्पार्टा तथा क्रीट से आए सैलानियों से चर्चा करते हैं. लिखते समय प्लेटो न केवल अपने पाठकों से संवाद में सहभागिता की अपेक्षा रखता है, बल्कि वह वार्तालापियों के व्यवहार, चरित्र, वातावरण आदि पर भी अपनी आलोचनात्मक दृष्टि बनाए रखता है. रूढ़ चरित्रों पर सूक्ष्म कटाक्ष के माध्यम से वह उनकी अस्वाभाविकता को निशाने पर लाता है. प्रोटागोरस, जोर्जियास, यूथाडेमस आदि संवादों में यह शैली खुलकर सामने आई है. इसका सुखद परिणाम यह रहा है कि वह गूढ़-गंभीर विषय को भी सहज-संप्रेषणीय रूप में व्यक्त करने में सफल रहा है, जो विषय को रोचक एवं ग्राह्यः बनाए रखने के लिए अत्यावश्यक था.

प्लेटो आदर्शवादी विचारक तथा दक्ष लेखक था. वह विचारों के आधार पर आदर्शवादी था, जिसकी निगाह में समाज का स्तर व्यक्ति से ऊपर है. बाद की संवाद-पुस्तकों में ‘रिपब्लिक’ सर्वाधिक लोकप्रिय है. आजकल ‘रिपब्लिक’ शब्द को गणतंत्र के पर्याय के रूप में लिया जाता है. मगर गणतंत्र की आधुनिक अवधारणा से यह पुस्तक कोसों दूर है. इसको राजनीति से अधिक नीतिशास्त्र की पुस्तक मानना उपयुक्त होगा, जिसमें वह राज्य एवं उसके नागरिक के कर्तव्यों का निष्पादन करता है तथा अपेक्षा करता है कि प्रत्येक नागरिक स्वयं-स्फूर्त भाव से उनका पालन करे. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो के आदर्श समाज की संकल्पना की झलक देखी जा सकती है. इस पुस्तक में यह विचार भी सामने आया है कि राज्य की बागडोर एक दार्शनिक को सौंपी जानी चाहिए. प्लेटो का मानना था कि दार्शनिक स्वाभाविक रूप से विवेकवान, दूरदृष्टा, ईमानदार, संवेदनशील, उदार तथा धैर्यवान होते हैं. वे भौतिक प्रलोभनों से दूर होते हैं. उनके नेतृत्व में समाज का बहुआयामी और समरस विकास संभव है. प्लेटो की इस अवधारणा के पीछे कुछ विद्वान उसकी कुंठा की झलक भी पाते हैं. उसका संबंध एथेंस के राजवंश से था. मगर वह कभी एथेंस की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा सका. दार्शनिक और प्रखर बुद्धिमान होने के बावजूद उसे सुकरात के मुकदमे में मतदान से मात्र इसलिए वंचित रखा गया था कि उसकी वय मतदान के लिए निर्धारित न्यूनतम वय से मात्र दो वर्ष कम थी. एक संभावना यह भी हो सकती है कि 401 ईस्वी तक इतिहास प्रसिद्ध पेलोपोनिशयन युद्ध में स्पार्टा के हाथों करारी मात के बाद एथेंस का शासन अभिजात्य वर्ग के हाथों में आ चुका था. महान सोलोन और वीर पेरिक्लीस के एथेंस पर उन लोगों का शासन था जो अदूरदर्शी, निकम्मे और विलासी थे. मात्र आठ महीने में उस समूह का आचरण तानाशाहीपूर्ण हो चला था. एथेंस जो कभी समृद्धि के शिखर पर था, वह लगातार चलने वाले युद्धों, अभिजात्य वर्ग की मनमानी तथा उनकी विलासितापूर्ण हरकतों के कारण पतन के कगार तक पहुंच चुका था. प्लेटो ने अपनी आंखों के सामने राजसत्ता को उखड़ते और क्रमशः एक तानाशाही व्यवस्था में ढलते हुए देखा था. अभिजात्यों की तानाशाही ने ही सुकरात को मृत्युदंड दिया था. इस कारण प्लेटो का उस व्यवस्था से स्वप्नभंग होना स्वाभाविक था. ‘रिपब्लिक’ में प्लेटो ने अपने सपनों के राज्य की परिकल्पना की थी, यद्यपि वह इतनी अव्यावहारिक थी कि उसके शिष्य अरस्तु ने ही इसे स्वीकारने से इंकार कर दिया था. तथापि उसकी महत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता. क्योंकि शताब्दियों से प्लेटो के लेखन को आधार मानकर ही वैकल्पिक दर्शन की खोज की जाती रही है. अठारहवीं शताब्दी तथा उसके बाद के प्रमुख दार्शनिकों हीगेल, नीत्शे, कार्ल मार्क्स, ऐंगल्स आदि पर प्लेटो का प्रभाव था.

‘रिपब्लिक’ में वह अपनी कल्पना के अनुरूप आदर्श समाज का सपना देखता है. उसके सपने की विशेषता है कि उसको किसी भी आदर्शवादी शासन-व्यवस्था के माध्यम से संभव किया जा सकता है. उसके दूसरे संवाद ‘लाॅज’ के बारे में भी सच है. यह संवाद भी कानून के प्रबंधन अथवा कानून के आधार पर प्रबंधन के बारे बहुत चर्चा नहीं करता. अपराधियों की नाक में नकेल डालने की व्यवस्था करना भी ‘ला॓ज’ का उद्देश्य नहीं है. इसका मूल विषय है मानव समाज की समुन्नत व्यवस्था और विवेकीकरण की प्रक्रिया को ऊर्जस्वित करना, ताकि लोगों में कर्तव्यबोध जाग्रत हो. अपना मंतव्य स्पष्ट करने के लिए प्लेटो एक सूत्र का सहारा लेता है. उसकी स्थापना उस समाज को चौंका सकती है जो स्वयं कानूनी आधार पर व्यवस्थित होने का दावा करता है. उल्लेखनीय है कि वह कानून के नाम पर किसी बाहरी शक्ति को थोपने पर उतना जोर नहीं देता, जितना कि वह व्यक्ति को नैतिक और सामाजिक रूप से मर्यादित देखना चाहता है. कानून उसके लिए न्याय की स्थापना का माध्यम नहीं है, बल्कि मानवीय बोध और आत्मानुशासन की उच्चतम अवस्था का प्रतीक है. यहां हम प्लेटो और सुकरात के विचारों के साम्य को परख सकते हैं. सुकरात ज्ञान को सत्य और सत्य को परमशुभ की संज्ञा देता था. उसके अनुसार व्यक्ति का कर्तव्य है, शुभत्व की प्राप्ति के लिए अविरत प्रयास करना और दूसरों को अपने इस लक्ष्य में सहयोग करना. संवाद-पुस्तक ‘ला॓ज’ में प्लेटो भी यही कामना करता है. किंतु इसके लिए वह किसी बाह्यः शक्ति के बजाय व्यक्ति के नैतिक उत्थान और आत्मानुशासन को अनिवार्य मानता है. तो प्लेटो का समीकरण है कि किसी राज्य में न्याय की मौजूदगी, वहां के नागरिकों के आचरण में मौजूद न्याय की भावना से आंकी जा सकती है. उसका मानना था कि जनसाधारण के व्यवहार में न्याय की भावना जाग्रत करने के लिए हमें समाज को इस प्रकार व्यवस्थित करना चाहिए, जिस प्रकार हम खुद को रखना चाहते हैं. प्लेटो व्यक्ति को अपूर्ण इकाई मानता था. इसके बावजूद उसको विश्वास था कि आदर्श समाज की स्थापना का लक्ष्य व्यक्तिमात्र के सहयोग और समर्पण के बगैर संभव नहीं है. नैतिकता की इस उच्चतम स्थिति का विस्तार आगे चलकर कांट के दर्शन में देखने को मिलता है—

‘हमें न्याय के रूप में ऐसे सदगुण की कल्पना करनी चाहिए जो पूरे समाज में उसी प्रकार मौजूद है, जैसे कि उसकी इकाई-विशेष में, और समाज सदैव दो से अधिक से मिलकर बनता है. इससे इस बात की संभावना बढ़ेगी कि हम न्याय को अधिक मात्रा में प्राप्त कर सकते हैं, उसकी स्थापना कर सकते हैं…’

प्लेटो अपने विचारों के मामले में जड़ अथवा एकीभूत नहीं था, बल्कि उसकी मान्यताओं में समय के साथ परिवर्तन भी देखने को मिलते हैं. उसके लेखन की एक अन्य विशेषता थी कि वह कृति के प्रकाशित होने के बाद भी उसमें निरंतर सुधार करता रहता था. ‘रिपब्लिक’ जैसी महान कृति में भी उसने एकाधिक बार संशोधन किया था. विद्वानों के अनुसार यह ग्रंथ चार या पांच बार लिखा गया. वर्षों तक यह ‘प्रोटो रिपब्लिक’ के शीर्षक के अंतर्गत पढ़ाया जाता रहा. इस बात के भी प्रमाण हैं कि प्लेटो द्वारा स्थापित ‘अकादमी’ के सदस्य भी उसकी कृतियों की लोकप्रियता को बनाए रखने के लिए उनमें समयानुसार संशोधन-परिवर्धन करते रहते थे. यह दावा भी किया जाता है प्लेटो की कुछ संवाद-पुस्तकें ‘अकादमी’ के सदस्यों के सहयोग से रची गई थीं. विशेषतः ‘ला॓ज’ शीर्षक से रचा गया संवाद, जो उसकी अंतिम पुस्तकों में से एक है, के बारे में संभावना व्यक्त की जाती है कि यह प्लेटो के शिष्यों ने, उसके द्वारा दी गई रूपरेखा के आधार पर रचा था. तथापि इस बात से प्लेटो की प्रतिभा पर संदेह करना सर्वथा अनुपयुक्त होगा. इसलिए कि ‘डायलाग्स’ अथवा संवाद-पुस्तकों के अतिरिक्त भी विविध विधाओं में लिखित विपुल सामग्री हमें प्लेटो के नाम से प्राप्त होती है. उसके अध्ययन-मनन का क्षेत्र अत्यंत व्यापक था. अपनी सुदीर्घ आयु का अधिकांश हिस्सा उसने अपने अध्ययन-मनन को समर्पित किया था, जिसमें उसने राजनीति, नीतिशास्त्र, दर्शन, कानून, शिक्षा के मानवीयकरण के लिए लगातार लेखन किया. यही कारण है कि लगभग 2400 वर्षों से वह दुनिया-भर के विचारकों को अलग-अलग तरह से प्रभावित करता रहा है. उसी के दम पर प्लेटो के प्रशंसक यह दावा भी करते हैं—
‘पश्चिम के जितने भी दर्शन हैं, वे वस्तुतः प्लेटो के दर्शन पर की गई पाद-टिप्पणियां हैं.’

किसी भी विचारक के लिए इससे बड़ी बात भला और क्या हो सकती है.

अकादमी की स्थापना

सायराकस में डायोनिसियस द्वितीय के अध्यापन के समय प्लेटो को लगने लगा था कि उसके पास शिक्षा, दर्शनशास्त्र, विज्ञान, राजनीति, कानून आदि को लेकर कुछ नए विचार हैं. उनके माध्यम से शिक्षा और शिक्षा पद्धति में बदलाव संभव है. जैसा कि पहले भी कहा गया है, उस समय शिक्षा समाज के अभिजात्य वर्ग तक सीमित थी. शिक्षण का प्रमुख लक्ष्य विद्यार्थी को व्यवहार-कुशल, व्याख्यान कला में पारंगत तथा तर्क-वितर्क में निपुण बनाना था. उन्हें वे अभिजात्यीय संस्कार देना था, जिनपर एथेंस का तत्कालीन अभिजात्य-वर्ग गर्व करता था. उस समय तक शासन के स्तर पर शिक्षण की कोई व्यवस्था न थी. अधिकांश विद्यालय निजी थे, जिनका संचालन सोफिस्टों के अधीन था, जो केवल समाज के प्रभावशाली वर्ग को शिक्षा देते और बदले में मोटी शुल्क वसूलते थे. तत्कालीन कानून और व्यवस्था के अंतर्गत दासों का कर्तव्य केवल अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करना था, अतएव उनके शिक्षण का कोई प्रावधान न था. अभिजात्य वर्ग और दासों के अलावा तीसरा वर्ग ‘मेटिक्स’ का था, जिनकी हैसियत मुक्त दास जैसी थी. मेटिक्स कृषि, उत्पादन और व्यापार को संभालते थे. दासों की भांति मेटिक्स को भी नागरिकता के अधिकार से वंचित रखा गया था. न वे एथेंस की राजनीति में सक्रिय भाग ले सकते थे, किंतु उन्हें व्यापार एवं उत्पादन-कर्म करने की पूर्ण स्वतंत्रता थी. इसलिए एथेंस के समाज में अल्पसंख्यक होने के बावजूद उनकी हैसियत ऊंची थी. प्लेटो का समाज को लेकर एक सपना था. वह चाहता था कि व्यक्ति का नैतिक स्तर इतना ऊंचा हो कि समाज में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून की आवश्यकता ही नहीं पड़े. चरित्र-निर्माण में शिक्षा की महत्ता को समझते हुए वह बच्चों को बहुआयामी शिक्षा दिए जाने के पक्ष में था, ताकि उनका बहुमुखी विकास हो सके. वह चाहता था कि बच्चों को गीत-संगीत की शिक्षा मिले, ताकि उनमें थोड़ी संवेदनशीलता हो और वे सुहृदय नागरिक की भांति व्यवहार कर सकें. शरीर को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए उनको व्यायाम की भी शिक्षा दी जाए. इसके साथ-साथ गणित और विज्ञान की शिक्षा भी अनिवार्यतः दी जानी चाहिए, ताकि वे प्रकृति में होने वाले बदलावों को भली-भांति समझ सकें.

प्लेटो की अत्यंत महत्त्वाकांक्षी परियोजना ‘अकादमी’ की स्थापना का विचार सायराकस दूसरी यात्रा के दौरान जन्मा था. उन दिनों वह डायोनिसियस द्वितीय के शिक्षण में रत था, जिसके लिए पढ़ाई-लिखाई का कोई महत्त्व न था. वह हमेशा स्वयं को सायराकस के भावी सम्राट के रूप में सोचता था कि वह आने वाले दिनों का सम्राट है. अपने उस विद्यार्थी को पढ़ाने में प्लेटो को विशेष परिश्रम करना पड़ता था, फिर भी परिणाम लगभग शून्य था. वह समझ रहा था कि राजनीति के जिन आदर्शों की वह कल्पना करता है, उनमें से एक भी डायोनिसियस प्रथम और द्वितीय में नहीं है. तभी सायराकस की राजनीति करवट लेने लगी. तानाशाह सम्राट को मृत्यु ने आ दबोचा. पिता की मृत्यु के बाद शासन की जिम्मेदारी डायोनिसियस द्वितीय के कंधों पर आ गई. अपने पिता की भांति वह भी निरंकुश सम्राट सिद्ध हुआ. बदलते घटनाक्रम के बीच डायोनिसियस द्वितीय अचानक डिओन से नाराज हो गया. चूंकि प्लेटो डीओन का मित्र था. उसी के निमंत्रण पर सायराकस पहुंचा था. इसलिए डायोनिसियस प्लेटो का भी दुश्मन बन गया. प्लेटो बड़ी मुश्किल से खुद को बचाते हुए एथेंस लौटने में कामयाब हो पाया. उस समय उसका मन खिन्न था. राजनीति से उसका मन उचाट हो चुका था. वह कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे मन को तसल्ली मिले. वह ईसा से लगभग 385(अथवा 387) ईस्वी पूर्व का समय था. प्लेटो अपनी वयस् के चालीसवें वर्ष से गुजर रहा था. उसके मन में नया करने का संकल्प था. आंखों में कुछ अलग गढ़ने की बेचैनी. उसको इसका अवसर भी शीघ्र मिल गया.

एथेंस से लगभग एक किलोमीटर दूर उत्तर में एक पवित्र स्थान था. ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी में उस स्थान को यूनानी महायोद्धा ‘अकादमस’ के नाम पर ‘अकादमिया’ कहा जाता था. प्राचीन यूनानी ग्रंथों में ‘अकादमस’ को ‘हेकादमस’ भी कहा गया है. वह अत्यंत प्राचीन स्थल था, जो यूनान की ज्ञान की देवी एथेना के वास-स्थल के नाम से प्रसिद्ध था. वहां लौंग के महमहाते वृक्ष थे. चारों और हरियाली. एथेंसवासियों के लिए वह स्थल बहुत ही खास था. ईसापूर्व पांचवी शताब्दी में एथेंस के साम्राज्य के स्थापकों में से एक सीमोन ने उस स्थान पर एक अहाता बनवा दिया था. समय के अंतराल में वह स्थल हालांकि खंडहर में ढल चुका था. तो भी स्थल की ऐतिहासिकता को दर्शाने वाले कई मूर्तिशिल्प, धर्म-स्थल वहां थे. उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण थी, एथेंसवासियों की ज्ञान की देवी ‘एथेना’ के पवित्रस्थल के रूप में, उस स्थान के प्रति गहन ऋद्धा, जिसके चलते वे एथेंस का अजेय नगर-राज्य मानते थे. हरे-भरे वृक्षों से घिरे उस स्थान का उपयोग नगर के युवजन खेलकूद और व्यायाम के लिए करते थे. उस स्थान का एक हिस्सा प्लेटो को पैत्रिक संपत्ति के रूप में मिला था. वहां छोटा-सा बाग था. उसी पवित्र और ऐतिहासिक स्थल पर ‘अकादमी’ की स्थापना की गई थी. एक प्रकार का खुला विश्वविद्यालय, जिसकी तुलना हम भारतीय उपनिषदों में व्यक्त आश्रमों से कर सकते हैं. कुछ विद्वान प्लेटो द्वारा स्थापित उस विश्वविद्यालय को दुनिया का पहला विश्वविद्यालय मानते हैं. मेग्ना ग्रेशिया की यात्रा के दौरान प्लेटो पाइथागोरस के अनुयायियों के संपर्क में आया था, जो गणित एवं विज्ञान के क्षेत्र में शोधरत रहते थे. उस विश्वविद्यालय का ढांचा उन्हीं की प्रेरणा से तैयार किया गया था. पाठ्यक्रम में गणित, धर्म, दर्शन, विज्ञान, राजनीति, ज्योतिष, कानून आदि को सम्मिलित किया गया था. इनके अलावा बच्चों को शारीरिक व्यायाम की शिक्षा भी नियमित रूप से दी जाती थी. प्लेटो ने अपनी ‘अकादमी’ यूनानी देवता मूस को समर्पित की थी. ज्ञानार्जन के लिए वहां आपसी तर्क-वितर्क और संवाद-पद्धति को अपनाया जाता था, जो सुकरात की सर्वप्रिय शैली थी. ‘अकादमी’ का परिसर घने, छायादार वृक्षों से घिरा था, जो लौंग की गंध से महमहाता रहता था. पूरा वातावरण शांत और सौहार्दपूर्ण था. कुछ ही अवधि में अकादमी ने स्वयं को एथेंस के प्रमुख शिक्षा-केंद्र के रूप में स्थापित कर लिया. आसपास के नगर-राज्यों के विद्यार्थी और जिज्ञासु वहां आने लगे.

ऐसे अभिलेख भी मिले हैं, जिनके अनुसार विश्वविद्यालय के मुख्यद्वार पर एक प्रस्तर आलेख खुदा था, जिसके अनुसार विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए ज्यामिती का ज्ञान अनिवार्य था. कुछ विद्वानों का मत है कि प्लेटो की गणित के बारे में रुचि पाइथागोरस के समर्थकों के संपर्क में आने के बाद पैदा हुई थी. वह स्वयं गणित में प्रवीण था. ‘अकादमी’ में पढ़ाए जाने विषयों के स्पष्ट पाठ्यक्रम का अभाव था, किंतु वरिष्ठताक्रम का पूरा ध्यान रखा जाता था. अध्यापन के लिए उस समय के प्रसिद्ध आचार्यों को नियुक्त किया गया था. आवश्यकता पड़ने पर वह बाहर से भी जाने-माने अध्यापकों और विद्वानों को आमंत्रित करता रहता था. वहां पढ़ाने वालों में गणितज्ञ, ज्योतिष-विज्ञानी, भूवेत्ता, चिकित्सक, वैज्ञानिक यूडोक्सस भी था. प्लेटो स्वयं दर्शन, तत्वविज्ञान, नीतिशास्त्र आदि विषय पढ़ाता था. वह विद्यार्थियों और विद्वानों को नए-नए विषयों पर विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित करता था. अकादमी में वैज्ञानिक शोध की भी व्यवस्था थी. प्लेटो के ‘टाइमियस’ जो प्रकृति-विज्ञान के अध्ययन और तत्संबंधी प्रयोगों को लेकर प्रमुख ग्रंथ है, अकादमी में हुए शोध का ही निक्ष है. वहां की अध्यापन की शैली विचित्र थी. प्रतिदिन कक्षा आरंभ होने से पहले विद्यार्थियों को एक विषय दे दिया जाता था, जिसपर सब खुले मन से चर्चा करते थे. उस विमर्श से निकलने वाला निष्कर्ष भी अंतिम नहीं था. शंका होने पर कोई भी उसपर अगले दिन नए सिरे से चर्चा की शुरुआत कर सकता था. वहां पढ़ाए जाने वाले विषयों में ‘राजनीति’ प्रधान विषय था, जिसका नियमित अध्यापन होता था. ‘अकादमी’ का पुस्तकालय बेहद समृद्ध था. उसमें विभिन्न देशों के लिखित संविधान की प्रतिलिपियां, विद्वानों, राजनेताओं के ग्रंथ, पांडुलिपियां, आलेख, लिखित भाषण आदि भारी संख्या में उपलब्ध थे. उन्हें जुटाने के लिए प्लेटो को अथक प्रयास करना पड़ा था, जिसमें उसके अर्जित धन का बड़ा हिस्सा भी खर्च हुआ था. अकादमी में संविधान और कानून की पढ़ाई मुख्यरूप से होती थी. कुछ ही समय में अकादमी की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी थी. अकादमी में अध्ययन करने वाले प्रतिष्ठित लोगों की लंबी सूची है.

जीवन में नैतिकता एवं उच्चादर्शों को सर्वाधिक महत्त्व देने वाला प्लेटो दासप्र्रथा का समर्थक था. वह इस तथ्य से भी प्रमाणित होता है कि अकादमी में जनसाधारण के लिए शिक्षा की अनुमति न थी. वहां केवल अभिजातवर्ग के सदस्य शिक्षा ग्रहण कर सकते थे. प्लेटो ने हालांकि सोफिस्टों की आलोचना की है. किंतु उसने अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित प्लेटो का लक्ष्य था कि अकादमी के द्वारा भावी राजनीतिज्ञों को दर्शन, विज्ञान, राजनीति, कानून आदि की शिक्षा दी जाए. ‘रिपब्लिक’ तथा ‘स्टेटसमेन’ में वह पहले ही लिख चुका था कि केवल दार्शनिक ही श्रेष्ठतर सम्राट सिद्ध हो सकते हैं. शायद इसीलिए अकादमी में दर्शन को प्रमुख विषय के रूप में पढ़ाया जाता था. प्लेटो और उसके साथियों को इसपर गर्व भी था. सुकरात का असर वहां पढ़ाए जाने वाले दर्शनशास्त्र के पाठ्यक्रम पर स्पष्ट था. उसके अलावा जिस दार्शनिक का अकादमी के पाठ्यक्रम पर गहरा प्रभाव पड़ा, वह था पाइथागोरस. प्लेटो स्वयं दर्शनशास्त्र का अध्यापन करता था. कुछ विद्वानों के अनुसार प्लेटो ‘अकादमी’ के माध्यम से अपनी उन मान्यताओं को साकार करना चाहता था, जो उसने ‘रिपब्लिक’ में व्यक्त की थीं. जबकि अन्य का विचार है कि प्लेटो अपने आदर्श समाज के सपने को आगे बढ़ाना चाहता था, जिसमें नागरिक स्वयं प्रबुद्ध एवं अनुशासित हों, इसलिए वहां औपचारिक पाठ्यक्रम के बजाय अध्यापन के लिए संवाद-शैली का प्रयोग किया जाता था. विद्यार्थी अपनी समस्या समूह के बीच रखते. तदनंतर सभी उसपर मुक्त चर्चा में हिस्सा लेते थे. प्लेटो हालांकि पांचवी शताब्दी के यूनानी दार्शनिक डेमोक्रिटिस की स्थापनाओं से असहमत था, जिसे परमाणुवाद का जनक माना जाता है, लेकिन वैज्ञानिक शोध में उसको पूरा विश्वास था. इसलिए अकादमी परिसर में वैज्ञानिक शोध पर भी नियमित काम चलता था. भावी राजनीतिज्ञों के लिए तो वह मानो तीर्थस्थली थी.

प्लेटो की मृत्यु के उपरांत अकादमी का दायित्व क्रमशः स्पीसिप्पस(347—314 ईस्वी पूर्व), जेनोक्रेट्स (339—314 ईस्वी पूर्व), पोलेमा(314—269 ईस्वी पूर्व) से होता हेगेसीनस (160 ईस्वी पूर्व) तक जाता है. उसके सम्मानित सदस्यों में अरस्तु, हेराक्लाडस, यूडोसस, फिलीप्पस, क्रेंटर जैसे महान दार्शनिक रहे हैं. लगभग तीन सौ वर्ष तक अपने उत्थान-पतन के अनेक दौर देखने के बावजूद ‘अकादमी’ अपना काम करती रही. उसके पतन का दौर 88 ईस्वी पूर्व शुरू हुआ, जब रोमन कमांडर लुइस कोरनिलयस सूला ने भारी दलबल के साथ एथेंस पर हमला कर उसको युद्ध में पराजित किया. सूला तानाशाह प्रवृत्ति का था. उसका लक्ष्य पारेअस पर कब्जा जमाना था, जो एथेंस विजय के बिना संभव न था. इसलिए भारी-भरकम सेनाओं के दम पर उसने पूरे एथेंस की नाकेबंदी कर दी. सूला को युद्धक हथियारों के लिए भारी मात्रा में लकड़ी की जरूरत थी. उसके आदेश पर अकादमी परिसर, जो एथेंस का सर्वाधिक हरा-भरा क्षेत्र था, के सभी वृक्ष काट डाले गए. कुछ ही घंटों में पूरी अकादमी उजाड़ दी गई. अकादमी के तत्कालीन प्रधान आचार्य फिलो आ॓फ लेरिसा को परिसर छोड़ना पड़ा. सुकरात की वार्तालाप शैली को समर्पित प्लेटो, हेराक्लाइट्स, यूडोसस, फिलीप्पस, केंटर जैसे महान दार्शनिकों की अध्यापन-स्थली एक सनकी तानाशाह की महत्त्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़कर वीराने में बदल गई. उसके करीब दस वर्ष बाद सिसरो ने अकादमी स्थल का भ्रमण किया तो वहां सिवाय उजाड़ मैदान के कुछ नहीं था. एक तानाशाह शासक ने महान प्लेटो के सपने को मिट्टी में मिला दिया. पर सच में जो मिटा वह प्लेटो की स्मृति का भौतिक अवशेष था. क्योंकि प्लेटो तो अपने वृहत लेखन और अपने उन समर्थकों में जीवित था, जो ज्ञान के आगे किसी भी अन्य प्रलोभन के आगे झुकने को तैयार न थे.
क्रमशः….

ओमप्रकाश कश्यप
opkaashyap@gmail.com

प्लेटो : स्वप्नदृष्टा दार्शनिक

सामान्य

ज्ञानार्जन मनुष्य का स्वभाव है, जिज्ञासा उसका मूल लक्षण. पर प्राणीमात्र की प्रथम आवश्यकता है—भोजन. आदिम मनुष्य अपना भोजन वन्य जीवों का शिकार करके जुटाता था. कड़ी स्पर्धा एवं संघर्ष के बीच अपनी अदम्य जिजीविषा तथा अनूठी जिज्ञासा के कारण उसने सृष्टि के अन्यान्य जीवों पर वरीयता प्राप्त की थी. उसके सीखने की आरंभिक गति बहुत धीमी, करीब-करीब नगण्य थी. इस कारण परिवर्तन की गति वर्षों तक लगभग स्थिर बनी रही. विकास प्रक्रिया में लगभग बीस लाख वर्ष पहले जब आधुनिक मनुष्य का जन्म हुआ, तो उसके एवं पशु-जमात के बीच बहुत अंतर नहीं था. वह हिमयुग की बेला थी. अन्य जानवरों की भांति मनुष्य भी पेड़ों, गुफाओं में छिपकर रहता था. भोजन के लिए वह वन्य पशुओं का शिकार कर लेता था. तत्पश्चात विराट प्रकृति के आंचल में निर्द्वंद्व रात गुजारता था. भोजन जुटाने की कोशिश में स्वाभाविक रूप से उसको अपने कुछ साथी भी गंवाने पड़ते थे. उसके लिए यह जीवन-संघर्ष की अनिवार्यता थी. ऐसे में हर्ष-शोक उसको बहुत अधिक सताते भी नहीं थे. हिमयुग की समाप्ति के बाद वनस्पतियों ने धरती को हरियाना शुरू कर दिया था. सूरज की किरणें हरियाली को चूमने लगीं. आदिम मनुष्य के लिए वे दिन बड़े ही आह्लादकारी रहे होंगे. सपाट भूमि पर उसे भयानक हिम-तूफानों का खतरा नहीं था. मौसम उसके अनुकूल था. अतएव अपने प्रियजनों के साथ वह अधिक समय बिता सकता था. यह सबकुछ इतनी जल्दी भी नहीं हुआ था. परिवर्तन की गति अत्यंत धीमी थी. हिम युग की बेला से वन-वनस्पतियों के युग तक आते-आते दस-बारह लाख वर्ष और आदिम मनुष्य की लगभग तीस हजार पीढ़ियां दाव पर लग चुकी थीं. मानवीय संवेदनाएं उस समय विकासमान अवस्था में थीं. संज्ञा-सर्वनाम से परे के उस युग को सामाजिक संबंधों तक आने के लिए हजारों वर्ष की यात्रा तथा कई पड़ाव अभी और पार करने थे.
विराट प्रकृति के सान्निध्य में रहकर चुनौतियों का सामना करते हुए आदिमानव सहयोग और सहकार की महत्ता को समझने लगा था. इसलिए वह समूह में रहता, समूह में ही आक्रमण करता, आपसी बातचीत के लिए इशारों की भाषा का इस्तेमाल करता था. पाषाणयुग आते-आते उसने आग जलाना, पहिये का उपयोग तथा शिकार के लिए हथियारों की मदद लेना सीख लिया था. यह सब पीढ़ियों के अनुभव एवं ज्ञान के संचयन तथा उन्हें अगली पीढ़ी तक अंतरण बगैर संभव न था. इस क्षेत्र में आदिम मनुष्य गुणात्मक दर से प्रगति कर रहा था. संकेतों को स्थायी रूप देने के लिए उसने एक लिपि विकसित की थी, जिसका उपयोग वह शिलाखंडों, गुफाओं, तख्तीनुमा पत्थरों, पशुचर्म तथा वृक्ष की छाल आदि पर करता रहता था. लिपि के विकास से उसे अपने अनुभवों को सहेजने तथा उन्हें दूसरे समूहों, आगामी पीढ़ियों तक पहुंचाने में मदद मिली. स्मृति ने उसको अन्य प्राणियों के साथ स्पर्धा में आगे निकलने का रास्ता दिखाया. सभ्यता के आरंभिक दौर में ही मनुष्य ने जाना कि कि मृत्य जीवों की अपेक्षा जीवित प्राणी उसके लिए अधिक उपयोगी हैं. वन-वनपस्तियों को उजाड़ने के बजाय उनके साथ सहअतिस्तत्व एवं सामंजस्यपूर्ण जीवन बिताने पर वह अधिक सुखी और संपन्न रह सकता है. इस बोध के साथ ही उपयोगी पशुओं की पहचान करने तथा उन्हें पालतू बनाकर रखने का सिलसिला बना. स्थानीय उपलब्धता के आधार पर गाय, भैंस, बकरी, भेड़, याक, कुत्ता, बैल, घोड़ा, गधा आदि जानवर मानव-समाज का अभिन्न हिस्सा बनते चले गए. मनुष्य ने प्रकृति से सामंजस्य बनाकर रखना, उसको अपने अनुकूल ढालना आरंभ कर दिया. इसके बावजूद सभ्यता के सामान्य स्तर तक पहुंचते-पहुंचते आदिम मनुष्य की तीस हजार पीढ़ियां और खप गईं. मानव-विकास के इतिहास में यह अवधि भले ही बड़ी दिखाई दे, किंतु जैविक सृष्टि के विकासक्रम में यह बहुत छोटी अवधि थी.

जिसे हम सभ्यता कहते हैं उसकी शुरुआत लगभग 12000 वर्ष पुरानी है. यह मानव-सभ्यता के इतिहास का वह हिस्सा है, जब मनुष्य ने एक ही स्थान पर टिककर रहना आरंभ किया था. मानव-पीढ़ी की औसत आयु 35 वर्ष मान ली जाए तो मनुष्य के आदि पुरखे से आज तक लगभग 60,000 पीढ़ियां गुजर चुकी हैं. मनुष्य की पहली सभ्य पीढ़ी आज से मात्र 340-350वीं पुरानी पीढ़ी रही होगी. पृथ्वी की आयु लगभग दो अरब वर्ष की अपेक्षा यह एकदम हाल की घटना है. सबसे पहले शैलीय जीव की उत्पत्ति लगभग 120 करोड़ वर्ष पहले हुई थी. उस एककोशीय जीव को मनुष्य के रूप में विकसित होने में करोड़ों वर्ष लगे. अनेक परिवर्तनों तथा विकास-चक्रों से उसको गुजरना पड़ा था. पृथ्वी के जन्म की अपेक्षा मनुष्यता का इतिहास कितनी हाल की घटना है, यह जानने के लिए ब्रिटिश वैज्ञानिक जेम्स रिची ने अपने भाषण के दौरान एक रोचक उदाहरण प्रस्तुत किया है—

‘मान लीजिए पृथ्वी पर सबसे पहला जीव 1.20 अरब वर्ष पहले अस्तित्व में आया था. इस 120 करोड़ वर्ष की अवधि को यदि 12 घंटे मान लिया जाए तो एक घंटा व्यतीत होने का अर्थ होगा कि हम अतीत में 10 करोड़ वर्ष की अवधि पार कर आए हैं. इस तरह एक मिनट की अवधि लगभग 17 लाख वर्ष के तुल्य होगी. इसको और विभाजित किया जाए तो एक सेंकिड बराबर होगा अतीत के करीब 28,000 वर्ष के. सृष्टिकत्र्ता प्रकृति ने यदि अब से 12 घंटे पूर्व समुद्री खरपतवार आदि प्रथम शैल जीवी बनाए तो प्रारंभिक वनस्पति के उद्भव तक पहुंचने में सुबह के 7 बज जाएंगे. तत्पश्चात सवेरे के सात बजे से लेकर 11 बजकर 15 मिनट के अंदर बिना रीढ़ वाले जीव जैसे मछली, कछुआ, उभयचर, केचुए तथा अन्य सर्पजातीय प्राणी, स्तनपायी जीव आदि एक-एककर जन्म लेते जाएंगे. मनुष्य की तरह के या मनुष्येत्तर जीव का आविर्भाव होगा सबसे हाल के एक मिनट के समय में. उसमें भी आधुनिक मनुष्य का जन्म होगा, केवल एक सैकिंड पहले. समय के इस आनुपातिक खंड में नवपाषाण युग से आगे की सभ्यता अपने को प्रकट करेगी मात्र एक तिहाई सैकिंड को.’

स्पष्ट है कि मानव सभ्यता का उद्भव जैविक सृष्टि के विकास की अपेक्षा एकदम हाल की घटना है. हालांकि इस छोटे-से कालखंड में ही मनुष्य ने निहित स्वार्थ के लिए प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से जो पारिस्थितिक समस्याएं पैदा की हैं, वे चिंता उत्पन्न करने वाली हैं. लेकिन यह इस पुस्तक का प्रतिपाद्य विषय नहीं है. नवपाषाण युग में मनुष्य को एक ही स्थान पर टिककर रहना रास आने लगा था. जीविका के लिए वह पशुओं, वन-वनस्पतियों और खेती पर निर्भर था. उसने अपने रहने के लिए आवास बना लिए थे. खेती और शिकार के लिए वह पत्थर के औजारों का प्रयोग करता था. सांस्कृतिक नैरंतर्य तथा सामूहिकता की अभिव्यक्ति के लिए उसने पर्व-त्योहार बना लिए थे, जिनके बहाने सामूहिक भोज की परंपरा की नींव रख चुकी थी. नवपाषाणीय मनुष्य कांसे का उपयोग करना सीख चुका था. हालांकि यह एक दुर्लभ धातु थी, समाज के चुनींदा लोग ही उसका उपयोग कर पाते थे. उस समय भी कई समूह ऐसे थे, जो यायावर जीवन जीते थे. वे प्राकृतिक परिवर्तनों के अनुसार अपना ठिकाना बदलते रहते थे. नए स्थानों की खोज में वे नए कबीलों के संपर्क में भी आते थे, जिससे अनुभवों का आदान-प्रदान होता, जो निश्चय ही उनके विकास में सहायक सिद्ध होता था. कई बार मतभेद के कारण उनके बीच संघर्ष की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती थी. मगर कुल मिलाकर उससे विकास को गति ही मिलती थी. वस्तुतः वह अन्न संग्रहण सभ्यता थी. भोजन मनुष्य की मुख्य आवश्यकता था. जीवन में स्थायित्व लाने के लिए आवश्यक था कि भोजन की प्रचुरता हो, ताकि वह आसानी से उपलब्ध हो सके. कृषि के विकास ने यह संभव कर दिखाया था. अतिरिक्त अनाज का उत्पादन संभव हुआ तो उसके संग्रहण और वितरण के लिए व्यवस्थाएं बनीं. बर्तन बनाने की कला का विकास सभ्यता के आदिकाल से जुड़ा है. अनाज के संग्रहण के साथ ही उसके न्यायिक वितरण के लिए भी व्यवस्थाओं का गठन हुआ. उस समय की परंपरा के अनुसार अतिरिक्त अनाज की मात्रा यदि कम हो तो उसको समूह की स्त्रियों को सौंप दिया जाता था, जो घर का प्रबंधन करती थीं. अधिक मात्रा में अनाज होने पर वह समूह के मुखिया की निगरानी में रखा जाता था, ताकि जरूरत पड़ने पर उसका समूह-हित में उपयोग किया जा सके.

कृषि और पशुपालन को महत्त्व दिए जाने से मनुष्य के जीवन में स्थायित्व तो बढ़ा था, किंतु एक स्थान पर टिककर रहने की समस्याएं कम नहीं थीं. इसे यूं भी कह सकते हैं कि नए परिवेश में ढला जीवन नई व्यवस्थाओं के गठन की मांग कर रहा था. साथ-साथ रहते हुए हितों में तालमेल और शांति बनाए रखना अत्यावश्यक था. वह तभी संभव था जब सभी सदस्यों की सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति संभव हो. अपना भोजन जुटाने में असमर्थ सदस्यों, बच्चों और बूढ़ों की देखभाल की समुचित व्यवस्था हो. समूह के रूप रहते हुए मनुष्य ने यह सब अपने अनुभव से सीखा और जैसे-जैसे समस्याएं आती गईं, उनके समाधान के प्रयास भी होते रहे. बौद्धिक परिपक्वता प्राप्त कर चुके मनुष्य ने समूह के भीतर शांति-व्यवस्था एवं एकता बनाए रखने के लिए नियम-कानून बनाए. सामाजिक मर्यादाओं का सही-सही पालन हो, इसके लिए लोगों को जिम्मेदारी सौंपी गई. मनुष्य की जरूरतें बढ़ रही थीं, इसलिए औजारों और सम्मिलित शक्ति द्वारा उत्पादन को बढ़ाने के जतन भी चलते रहे. और जैसी कि उत्पादन की प्रवृत्ति है. व्यक्ति सामान्य स्थितियों में अपनी आवश्यकता से अधिक उत्पादन करने में समर्थ होता है. इसलिए उत्पादन बढ़ा तो उसको ठिकाने लगाने के लिए व्यापारिक वर्ग का जन्म हुआ, नए बाजारों की खोज में व्यापारी वर्ग दूर-दराज की यात्राएं करने लगा. व्यापारिक यात्राओं के साथ-साथ संस्कृति और तकनीक का आवागमन भी बढ़ता गया. इससे विकास को गति मिली. मनुष्य का आत्मविश्वास बढ़ा. उससे पहले तक वह स्वयं को प्रकृति का आश्रित मानता आया था. प्रकृति उसके लिए अबूझ पहेली थी. वेदों-उपनिषदों में प्रकृति को सर्वेसर्वा मानकर उससे मदद की अपेक्षा की जाती थी. मगर कालांतर में कृषि के विकास तथा एक के बाद एक आविष्कारों से मनुष्य को लगने लगा था कि वह प्रकृति को अपने हितों के अनुसार ढाल सकता है. इसमें उसको चामत्कारिक सफलता भी मिली. कालांतर में उसने नए आत्मविश्वास के साथ सभ्यता और संस्कृति को अपने विचारों के अनुसार ढालने के प्रयत्न करने आरंभ कर दिए. इससे समाज में नए जीवनदर्शन और ज्ञान-विज्ञान के उदय को बल मिला, जिसका मुख्य गुण व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाना तथा उसकी बौद्धिक जिज्ञासाओं का समाधान खोजना था.

मनुष्य कृषि-कर्म में उत्तरोत्तर पारंगत होता जा रहा था. उसने एक ही स्थान पर टिककर रहना आरंभ कर दिया था. बावजूद इसके जंगली जानवरों का डर अभी मिटा नहीं था, मानव-बस्ती पर समूह के रूप में हमला कर वे एक ही झटके में उसको तबाह कर सकते थे. इसलिए रहने के लिए आवास बस्तियों का निर्माण किया गया. निश्चित रूप से प्रारंभिक आवास सामूहिक ही रहे होंगे. उस समय भोजन की भांति मनुष्य का रहन-सहन भी साझा था. लोग समूहबद्ध होकर रहते थे. उनके परिवारों की संख्या सौ के आसपास होती होगी. लगभग पांच सौ की जनसंख्या वाले समूह के सदस्य एक-दूसरे को आमने-सामने से जानते होंगे. स्त्री का गर्भधारण करना उस समय मानवजीवन का सबसे बड़ा चमत्कार और उपलब्धि थी. प्राचीन मूर्तिशिल्पों में से कई मूर्तिशिल्प गर्भिणी स्त्री के हैं. उल्लेखनीय है कि उस समय के अधिकांश परिवार मातृसत्तात्मक थे. स्त्री परिवार की मुखिया मानी जाती थी. इसी युग में लेखनकला का विकास हुआ. मनुष्य ने प्रतीकों के माध्यम से अपने अनुभवों और विचारों को संग्रहित करना आरंभ कर दिया, जिससे एक पीढ़ी का ज्ञान दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित होने लगा. परिणामस्वरूप न केवल समाज के विकास में तेजी आई. इसके साथ-साथ वर्चस्व की भावना का भी विकास हुआ. इस स्पर्धा में पुरुष बाजी मारने लगा. अपनी सत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए धीरे-धीरे उसने समाज के नियमों को अपने स्वार्थानुकूल ढालना प्रारंभ कर दिया. इस काम में त्रधर्म नामक संस्था के उद्भव से काफी मदद मिली.

प्रकृति के निरंतर सान्निध्य में रहने वाला मनुष्य उसके विराट स्वरूप और क्षण-क्षण बदलते रूपाकारों के प्रति श्रद्धावनत था और सम्मोहित भी. उसकी मेधा नए-नए अनुभवों को दर्ज करती जाती थी. उसके सामने कुछ सामान्य समस्याएं भी थीं. उनमें कुछ मनोवैज्ञानिक थीं और कुछ सामाजिक. प्रकृति में कोई वस्तु उसको अच्छी लगती थी. उसका सान्न्ध्यि उसके लिए सुखकारी था. इसलिए उसकी पहली समस्या यह जानना था कि सुख क्या है? उसको कैसे प्राप्त किया जा सकता है? उसका òोत क्या है? सुख-प्राप्ति को स्थायी कैसे बनाया जाए? मानवीय सुख के सभी उपादान प्रकृति में मौजूद थे, मनुष्य उनका उपभोग भी करता था, किंतु वहां कुछ भी स्थायी नहीं था. अनिश्चितताओं के बीच झूलता जीवन स्थायित्व चाहता था. जीवन और प्रकृति का नाशवान होेना उसको डराता था. मनुष्य चूंकि विराट प्रकृति के संपर्क में रहता था जो उसके लिए अबूझ पहेली थी, प्रतिक्षण रूप बदलती हुई. अतएव मनुष्य की सरल बुद्धि ने कल्पना की कि प्रकृति की संचालक शक्ति भी होनी चाहिए. चूंकि प्रकृति अपने आप में विराट थी, इसलिए मनुष्य के लिए यह कल्पना कठिन न थी कि संचालक शक्ति को उससे भी अधिक शक्तिशाली और विलक्षण प्रतिभासंपन्न होना चाहिए. चूंकि प्राणीमात्र, वनस्पति आदि का जीवन धूप, वर्षा, धरा, आकाश और अग्नि से जुड़ा हुआ था, इसलिए जैसे-जैसे व्यक्ति की बौद्धिक चेतना का विकास हुआ, मनुष्य उन दैवी शक्तियों की कल्पना करने लगा, जो इन शक्तियों यानी प्रकाश, वायु, आकाश आदि की स्वामिनी थीं. यह सूची कालांतर में मनुष्य के विकास के साथ लगातार चैड़ी होती चली गई.

उल्लेखनीय है कि विश्व का हर दर्शन बहुदेववादी परिकल्पनाओं से शुरू हुआ है. चूंकि देवताओं की परिकल्पना जीवन के लिए अनिवार्य वस्तुओं की अधिष्ठाता शक्ति के रूप में की गई थी, इसलिए भारत समेत दुनिया-भर की आरंभिक दार्शनिक कल्पनाएं और वांछाएं परस्पर एक-जैसी दिखती हैं. मिश्र, बेबीलोन, सिंधु घाटी की सभ्यताओं में यद्यपि पारिस्थितिक अंतर है, मगर उनकी स्थापना करने वालों के सोच में एक सुनिश्चित साम्य है, जो दर्शाता है कि मनुष्य की आरंभिक जिज्ञासाएं, सोच चाहे वह दुनिया के किसी भी क्षेत्र में जन्मा हो, एक जैसे रहे हैं. प्राचीन ग्रीक, बेबीलोन, मेसापोटामिया, मोह-जो-दारो की सभ्यताओं में परिस्थितिकीय अंतर होने के बावजूद एक साम्य है. इसका एक कारण यह भी है कि ये सभ्यताएं व्यापारिक दृष्टि से एक-दूसरे से जुड़ी हुई थीं और व्यापारिक काफिले अपने यहां उत्पादित वस्तुओं के साथ-साथ सांस्कृतिक-साहित्यिक उपादानों, ज्ञान-विज्ञान, अनुभव आदि का भी आदान-प्रदान करते रहते थे.

विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक यूनानी सभ्यता अपनी समकालीन सभ्यताओं से कई मायने में विशिष्ट थी. साहित्य, कला, विज्ञान, गणित, कीमियागिरी, दर्शन, खगोल विज्ञान आदि अनेक क्षेत्रों में यूनानवासियों ने उल्लेखनीय उपलब्धियां अर्जित की थीं. उन्हें अंकगणित के आविष्कार का श्रेय प्राप्त है. ऐसा नहीं है कि आज से लगभग 2600-2400 वर्ष पहले के जिस कालखंड पर हम विचार करने जा रहे हैं, उस अवधि में एकमात्र यूनान ही वैचारिक क्रांति का केंद्र था. देखा जाए तो ईसा से 300-600 वर्ष पहले का वह कालखंड अपनी दार्शनिक उपलब्धियों के कारण पूरी दुनिया में ही अलग महत्त्व रखता है. भारत में वेदों के संकलन का कार्य पूरा हो चुका था, अगले चक्र में उनकी टीकाओं और व्याख्याओं का दौर जारी था. वैदिक कर्मकांड और पशुबलि के विरोध में महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, अजित केशकंबलि क्रमशः जैन, बौद्ध एवं चार्वाक दर्शन की आधारशिला रख चुके थे. उनके समानांतर चीन में कन्फ्यूशियस अपने क्रांतिकारी विचारों के साथ दस्तक दे रहा था. राष्ट्र की संपदा के सदुपयोग और सुशासन के समर्थन में उसका कहना था—‘सुशासनयुक्त देश के लिए उसकी निर्धनता शर्म की बात हो सकती है. पर कुशासनयुक्त देश में संपन्नता का होना ही शर्म की बात है.’1 भारत में महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, चीन में कन्फ्यूशियस ज्ञान और तर्क पर आधारित समाज की रचना करना चाहते थे. उधर यूनान में पेरामेनीडिस, हेराक्लाइटस और सुकरात कुलीनता-समर्थक सोफिस्टों को लगातार चुनौती दे रहे थे. गुरु सुकरात से प्रभावित प्लेटो ने आदर्श राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना अपने ग्रंथ ‘रिपब्लिक’ में की थी. प्रसंगवश बता दें कि रोमन साम्राज्य जहां पर सुकरात और प्लूटो जैसे दार्शनिक जन्मे अपने समय का सर्वाधिक वैभवशाली, सुव्यवस्थित साम्राज्य था. उसके अधीन एक शक्तिशाली सेना थी, जो वीरता की अनेक कीर्तिकथाएं लिख चुकी थी. रोमन साम्राज्य की शान थे वहां के वैज्ञानिक, कीमियागर, खगोलशास्त्री, साहित्यकार और दार्शनिक, जिनका यश पूरी दुनिया में फैला हुआ था. वैभव की घृणित विद्रूपताओं और मनुष्यता के लिए शर्म के रूप में वहां मौजूद थी—दासप्रथा. रोम उस साम्राज्य की राजधानी और वहां का सबसे बड़ा, वैभवशाली नगर था. यद्यपि उसकी जनसंख्या मात्र 35000 थी, जो भारत के किसी भी कस्बे की जनसंख्या जितनी हो सकती है. किंतु आज से 3200 वर्ष पहले यह जनसंख्या बहुत मायने रखती थी, विशेषकर उस स्थिति में जब उस समय के अधिकांश गांवों की संख्या 400-500 तक सिमटी होती थी तथा 1000-1200 की जनसंख्या वाली, व्यावसायिक गतिविधियों से युक्त बस्ती को नगर मान लिया जाता था. रोम की संपन्नता के कई कारण थे, उसका पहला और बड़ा कारण थीं लूरियन स्थित चांदी की वे खानें जो सफेद-चमकीली तथा बेशकीमती धातु का बड़ा भंडार थीं. उसकी संपन्नता का दूसरा कारण था संपत्ति का असमान विभाजन. कुल जनसंख्या का एक-तिहाई हिस्सा दास थे, जिनको व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार से वंचित रखा गया था. उनकी गिनती किसी बेजान वस्तु की भांति की जाती और पशुओं की भांति हाट-बाजार में खरीदा-बेचा जा सकता था. रोम के व्यापारी-जमींदार उन्हीं के श्रम पर विलासितापूर्ण जीवन जीते थे. मानव समुदाय के साथ ऐसा व्यवहार एथेंस की गगनचुंबी आलीशान इमारतों, वहां की समृद्धि और खुशहाली, संगीत, कला, दर्शन, विज्ञान, साहित्य, राजनीति आदि क्षेत्रों में उन्नति पर खासा व्यंग्य था. विडंबना है कि वहां का बौद्धिक समाज भी जो अपनी प्रतिभा और वैचारिक मौलिकता के लिए पूरी दुनिया पर धाक जमाए था, घृणित दासप्रथा का समर्थक था. इनमें सुकरात, प्लेटो और अरस्तू जैसे विचारक भी थे, जिनकी गिनती दुनिया के महानतम दार्शनिकों में होती है.

सच तो यह है कि ईसा से चैथी-पांचवी शताब्दी पहले तक यूनान कबीलाई संस्कृति के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाया था. विभिन्न कबीले अपने रणकौशल तथा वीरता के दम पर दुश्मनों के लिए लगातार चुनौती पेश करते रहते थे. बच्चों को यह सोचकर पैदा किया जाता था कि वे यदि लड़के हुए तो आगे चलकर देश के लिए युद्ध करेगें और यदि लड़की हो तो वह बड़ी होकर युद्ध के लिए नए सैनिक पैदा करेगी. उनके राज्य की सीमा कुछ गांवों-शहरों तक सिमटी होती थी. नगर की सुरक्षा के लिए उसके चारों ओर मजबूत परकोटे का होना वहां की स्थापत्य-कला की श्रेष्ठता का मापदंड माना जाता था. जिस नगर-राज्य के आसपास प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता होती, वहां के शासक को अपनी समृद्धि और ताकत बढ़ाने का अतिरिक्त अवसर हाथ लग जाता. हालांकि उसकी प्रारंभिक परिणति वैभव-विलास की पराकाष्ठा तक पहुंचने की ही होती थी. प्रकारांतर में इससे राज्य कमजोर होता. कालांतर में उसे दूसरे राज्यों-कबीलों की अधीनता स्वीकारने के लिए बाध्य होना पड़ता था. प्लेटो ने यह सब अपनी आंखों से देखा था. वह राजशाही की कमजोरियों, उनके सम्राटों की सनकों से भी परिचित था. अच्छी बात यह थी कि वह निराशावादी नहीं था. मानता था कि शिक्षा के माध्यम से राजनीतिक व्यवस्था को सुधारा जा सकता है. उल्लेखनीय है कि तत्कालीन सोफिस्ट विचारक भी स्वयं को शिक्षक मानते थे, किंतु उनका ध्येय लोगों को तर्क-कुशल एवं व्यावहारिक बनाना था. प्लेटो ने जब अकादमी की स्थापना की तो वहां शिक्षा का उद्देश्य अपेक्षाकृत अधिक मानवीय और लोकोन्मुखी रखा गया था. वह प्लेटो ही था जिसने जोर देकर कहा था—‘सभी मनुष्य प्राकृतिक रूप से बराबर हैं. सभी एक मिट्टी से बने, एक ही परमात्मा की संतान है, बावजूद इसके हम स्वयं को यह कहकर धोखा देता है कि कोई छोटा है, कोई बड़ा. कोई गरीब है, कोई धनवान.’ कहना न होगा कि यह प्लेटो ही है, जिसने आने वाली सहòाब्दियों तक विचारकों को तरह-तरह से प्रभावित किया है.

सुकरात

प्लेटो को समझने के लिए सुकरात के बारे में जानना आवश्यक है; और सुकरात को समझने के लिए तत्कालीन रोम को समझना जरूरी है. रोमवासियों को अपनी सभ्यता तथा संस्कृति पर गर्व था. और गर्व हो भी क्यों न! युद्धकौशल, दर्शन, विज्ञान, गणित, चिकित्सा, कला, साहित्य, राजनीति विज्ञान आदि के क्षेत्र में उन्होंने जो चामत्कारिक उपलब्धियां अर्जित की थीं, वे चौंका देने वाली थीं. उसके चारों ओर खेती योग्य उपजाऊ जमीन थी. आसपास के क्षेत्रों में खनिज-संपदा की बहुतायत थी. किंतु उस सभ्यता और संस्कृति की विडंबना थी कि वह मुट्ठी-भर लोगों तक सीमित थी. राजपुरुषों और राजनयिकों के अलावा भू-स्वामी, व्यापारी, उच्च पदाधिकारी आदि थोड़े ही लोग थे, जिन्हें रोम की समृद्धि का सुख प्राप्त था. बाकी लोग साधारण किसान और मजदूर थे. सामंतों और व्यापारियों की समृद्धि का वास्तविक आधार थे वे दास जिनको कुछ मुद्राओं के बदले खरीदा-बेचा जा सकता था. वे उस समय तक अपने स्वामी की इच्छानुसार काम करने को विवश होते थे, जब तक उन्हें कोई दूसरा स्वामी खरीद नहीं लेता था, अथवा एक तयशुदा कीमत का भुगतान करने के बाद वे स्वयं को स्वतंत्र कराने में कामयाब नहीं हो जाते थे. वे दास खेतों में काम करते, हाट-बाजार में बोझा ढोते, जानलेवा हालात में खानों से चांदी, तांबे आदि धातुओं के अयस्क का दोहन करते थे. खतरे के जितने भी काम थे, और जिनके लिए कठिन परिश्रम की दरकार थी, वे सभी दासों द्वारा कराए जाते थे. इसके अलावा हर वह काम जिससे स्वामी को संतुष्टि मिलती हो, उसका हित-साधन होता हो, करना दास के कर्तव्य में शुमार था. स्वामी का हित दास का हित माना जाता था. इस व्यवस्था का अतिक्रमण करने वाले को दंडित करने का अधिकार स्वयं उसके स्वामी को होता था. खुद को दुनिया का सर्वाधिक सभ्य राज्य मानने वाले रोम में दासों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोई अदालत, न्याय-व्यवस्था न थी. वे दोपाये के रूपाकार में चैपाये थे.

एक अनुमान के अनुसार 431 ईस्वी पूर्व एथेंस, जो प्राचीन यूनान सबसे बड़ा और सर्वाधिक समृद्ध नगर-राज्य था, की जनसंख्या लगभग 3,05,000 थी. उसमें 1,20,000 दास, 25,000 मुक्त दास तथा शेष 1,60,000 एथेंस के नागरिक थे. मुक्त दास अर्थोपार्जन के लिए मजदूरी और छोटे-मोटे काम करते थे. एक श्रेणी ऐसे श्रमिकों की थी, जिनकी स्थिति दासों एवं मुक्त दासों के बीच थी. दास की हर सांस उसके मालिक की गुलाम होती थी. मालिक अपने लाभ को ध्यान में रखकर दासों को मंडी में खरीदता-बेचता था. नाराज होने पर मालिक को अपने दास की चमड़ी उधेड़ लेने का अधिकार था. कई दिनों तक भोजन न देने की सजाएं तो आम थीं. उन दिनों रोम के खाए-पिए, अघाये वर्ग का एक और घृणित शौक था, अपने गुलाम लड़ाकों को दूसरे अमीर के गुलाम लड़ाकों से लड़वाना. यह लड़ाई शौकिया कुश्ती जैसी न थी. दोनों लड़ाकों को बरछी, भाले आदि हथियारों के साथ अखाड़े में उतरना पड़ता था. उसके चारों ओर तमाशबीन दर्शकों का हुजूम होता था. जोश में चीखते, चिल्लाते, हुंकार मारते हिंस्र दर्शक, जोश में पागल, उन्मादित भीड़ होश खोती नजर आती. घाव खाए लड़ाकों की देह से छलकता खून उनके जुनून को और बढ़ा देता. मैदान पर गुलाम लड़ाके एक-दूसरे को मरने-मारने पर उतारू होते. वह लड़ाई तभी समाप्त होती, जब विजयी लड़ाका दूसरे को मौत के हवाले कर चुका होता. गुलाम लड़ाकों को जिन्हें गिलेडियेटर कहा जाता था, की हार-जीत पर अमीर लोग दाव लगाते. उनके घावों की संख्या और गहराई पर जुआ खेला जाता था. लड़ाई में भाग लेने से इनकार करना, पीछे हटना संभव न था. आदेश का पालन न करना अपराध होता. आदेश का उल्लंघन करने वाले ग्लेडियेटर को मृत्युदंड देने का अधिकार उसके स्वामी के पास होता.

आपसी स्पर्धा और वर्चस्व भावना के चलते अक्सर युद्ध होते रहते थे. चूंकि राज्य छोटे होते थे, इसलिए सम्राट की निजी महत्त्वाकांक्षाओं और सनकों से भी वे प्रभावित होते थे. राजाओं के बीच युद्ध के कारण भी बहुत मामूली, किंतु उनसे होने वाली तबाही बहुत बड़ी होती थी. इतिहास विदित है कि रामायण और महाभारत के युद्ध स्त्री पर अधिकार की भावना को लेकर लड़े गए थे. इसी प्रकार ट्राय का प्रसिद्ध युद्ध भी एथेंस की राजकुमारी के लिए लड़ा गया था. इसलिए प्लेटो के जमाने से ही एक ऐसी राजनीतिक आचार संहिता की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी, जिससे राज्यों के बीच सामंजस्य की भावना को विस्तार दिया जा सके. प्लेटो ने राज्य के सुख एवं समृद्धि के लिए जहां दार्शनिक सम्राट की अभिकल्पना प्रस्तुत की, वहीं उसका शिष्य अरस्तु एक मजबूत साम्राज्यवादी केंद्र की स्थापना के पक्ष में था. भारत में भी अरस्तु का समकालीन ब्राह्मण चाणक्य, अपनी महत्त्वपूर्ण कृति ‘अर्थशास्त्र’ में एक स्वयंप्रभुता संपन्न मजबूत केंद्र की वकालत करता है. वस्तुतः उन दिनों छोटे-छोटे कबीलाई समाजों को एक बड़े समाज में ढालना सचमुच एक बड़ी चुनौती थी. इस लक्ष्य को कुछ लोग धर्म के माध्यम से प्राप्त करना चाहते थे और कुछ राजनीति के.

जिस समाज का इतना विकट समाजार्थिक विभाजन हो, वहां ज्ञान-विज्ञान का संपन्न वर्ग के हाथों का खिलौना बन जाना सामान्य बात थी. सोफिस्ट अघाए हुए लोगों की जमात थी. ‘Sophism’ शब्द की उत्पत्ति ही ग्रीक शब्द ‘Sophisma(Sophizo)’ से हुई थी, जिसका अभिप्राय है—‘मैं बुद्धिमान हूं’ अथवा ऐसे व्यक्ति से है, जो ज्ञानार्जन के व्यवसाय से जुड़ा हो. सोफिस्ट लोग स्वयं को यूनान का बौद्धिक प्रतिनिधि मानते थे. बहुत गर्व था उन्हें अपनी सभ्यता और संस्कृति पर. इसके बावजूद यूनान में उन दिनों को सार्वजानिक स्कूल न था. शिक्षा निजी स्कूलों में प्रदान की जाती थी. इसलिए केवल संपन्न वर्ग ही शिक्षा ग्रहण कर पाता था. स्त्रियों को ऊंची शिक्षा देने का प्रावधान न था. वे बस घर-परिवार की देखभाल करती थीं. समाज में लैंगिक विभाजन था. नर संतान को जन्म देना गर्व की बात थी. सोफिस्टों का मानना था कि शिक्षा का प्राथमिक उद्देश्य लोगों को व्यवहार-कुशल बनाना है. विद्यार्थी को यह सिखाना है कि प्रतिष्ठित लोगों के आचार-विचार कैसे हों. उनके बीच होने पर व्यवहार कैसे किया जाए. कैसे अपनी बौद्धिकता की धाक दूसरों पर डाली जाए. वाक कला में निपुण कैसे बना जाए. इसके लिए वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करते रहते थे. अध्यापन के लिए सोफिस्ट मोटी शुल्क वसूलते थे—अकसर वे किराये पर कमरा ले लेते थे, जहां वे अभिजात्य वर्ग की संतान, जो अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी कर चुके हों अथवा जिनकी वयस् 16 वर्ष से अधिक हो, को उच्च शिक्षा प्रदान करते थे. इसके बदले वे पर्याप्त शुल्क वसूलते थे…वे अनेक विषयों की शिक्षा देते थे. किंतु उनमें बातचीत के दौरान दूसरों को सम्मोहित कर देने की कला, ‘वक्तृत्व कला’ प्रमुख थी. ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में सोफिस्टों की धाक इतनी थी कि आदर्शराज्य की परिकल्पना करने वाला प्लेटो भी उनसे प्रभावित था. उनके द्वारा दी जाने वाली शिक्षा के बारे में प्लूटो ने अपनी संवाद पुस्तक ‘ज्योर्जिया’ में लिखा है कि—

‘यह ऐसी शक्ति है, जिसके द्वारा जज को अदालत में, सीनेटर को परिषद में, लोगों को विधायिकाओं में तथा नागरिक सभाओं में उपस्थित वृहद जनसमुदाय को प्रभावित किया जा सके.’

स्पष्ट है कि उस समय शिक्षा का उद्देश्य विशुद्ध भौतिक मूल्यों से प्रभावित था. अपने समय के महान सोफिस्ट प्रोटेगोरस का शिक्षा के बारे में मानना था—

‘मैं अपने विद्यार्थियों को व्यक्तिगत मामलों के विधिवत प्रबंधन के तरीके सिखाऊंगा, ताकि वे कर्मयोगी गृहस्थ और कुशल राजनयिक की भांति अपनी गृहस्थी की साज-संवार के साथ-साथ सरकार से जुड़े मामले भी भली-भांति संभाल सकें; तथा नगर की निर्णायक शक्ति बन सकें.’

ढाई हजार साल पहले के जिस समय के यूनान की बात हम कर रहे हैं, वहां सोफिस्ट अघाए हुए लोगों का परजीवी समाज था. दासों के रहते उन्हें स्वयं श्रम करने की आवश्यकता नहीं थी, इसलिए उनके पास सिवाय मौजमस्ती और वाक्-विलास के और कोई काम न था. उनकी तुलना हम भारत के पुरोहितवर्ग से कर सकते हैं. अंतर सिर्फ इतना है कि पुरोहितवर्ग अतींद्रिय सत्ता के नाम पर लोगों को छलते थे. धर्म का डर दिखाकर वे अपनी स्वार्थ-सिद्धि में लिप्त रहते थे. भौतिकवादी सोफिस्ट ऐंद्रियिक सुख को महत्त्व देते थे. उनका नारा था—‘खुद को जानो.’ उनका शुभ वस्तु में निहित था, प्राकृतिक उपादानों में निहित था. इसलिए वह ऐसी शिक्षा पर जोर देते थे जिससे मानवजीवन को सुख एवं समृद्ध बनाया जा सके. वे समाज की ऐसी मनोरचना के निर्माण में मदद करते थे, जो सामंतों और दास-व्यापारियों के हितानुकूल थी. उनका मानना था कि मनुष्य प्रकृति से ही एक-दूसरे से भिन्न है. वह कमजोर और शक्तिशाली वर्गों में बंटा है. शक्तिशाली वर्ग की जिम्मेदारी है कि वह कानून बनाए तथा उनके पालन की समुचित व्यवस्था भी करे. और जो कमजोर हैं, जिनमें शासन करने की योग्यता का अभाव है, उनका यह दायित्व है कि वे अपनी स्थिति को समझें और सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने में शक्तिशाली वर्ग की मदद करें. ज्ञान को वे सापेक्ष मानते थे. हालांकि इस बारे में उनमें स्वयं की इतने मतभेद थे कि बहसों का अंत अकसर अनिश्चितता में होता था. प्राचीन यूनानी मान्यता थी कि ‘अधिकार वही सम्मान्य हैं, जो न्यायाधारित सिद्धांतों द्वारा विकसित हों.’ और न्याय वह है जो राज्य को सुखी, समृद्ध एवं शक्तिशाली बनाने में सहायक हो. सामंतों द्वारा दी गई सुख-सुविधाओं का लाभ उठाने वाले सोफिस्टों ने इसके आधार पर उन अधिकारों को मान्य ठहराया था, जिन्हें शक्तिशाली वर्ग न्याय की स्थापना के लिए अत्यावश्यक मानता है. सोफिस्टों में से कुछ विवेकवान और मौलिक प्रतिभाशाली विद्वान भी रहे. उन्होंने यूनानी समाज में गणतांत्रिक विचारधारा के पक्ष में आवाज उठाई, जिसका प्रभाव प्लेटो के लेखन पर भी पड़ा. यद्यपि उनका गणतंत्र आधुनिक लोकतंत्र से एकदम भिन्न, एक तरह का अधिनायकवाद ही था.

ऐसे ही वाक्-निपुण समाज में 469 ईस्वी पूर्व सुकरात का जन्म हुआ था. कुछ विद्वान सुकरात के जन्मवर्ष को 470 ईस्वी पूर्व मानते हैं. सुकरात के पिता सोफरोनिक्स्कस मूर्तिकार थे. मां फिनेरिट नर्स थीं. उसकी शिक्षा-दीक्षा के बारे में अत्यल्प सूचनाएं प्राप्त हैं. मगर उसके चिंतन से जो प्लेटो के लेखन में विस्तार लेता है, इस बात के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं कि वह साधारण पढ़ा-लिखा, मगर विलक्षण मेधा संपन्न विचारक था. प्राचीन यूनानी दर्शन का बोध उसके स्वाध्याय का सुफल था. अपने चिंतन से उसने पूरे यूनानी दर्शन को प्रेरित-प्रभावित करने का काम किया; और अपनी मौलिकता, बौद्धिक तेजस्विता की चमक में पूर्ववर्ती विचारधाराओं के प्रभाव को करीब-करीब धुंधला कर दिया. इस बात के भी संकेत हैं कि आजीविका के लिए उसने प्रारंभ में अपने पिता के पेशे को अपनाया. कम अवस्था में ही उसका विवाह जेनथिप्पी नामक स्त्री से हो गया. जेनथिप्पी उम्र में सुकरात से बहुत छोटी थी. सुकरात के तीन पुत्र हुए जिनका नाम था—लेंप्रोक्लिस, सोफरोनिक्स्कस तथा मेनीजीनस. मंझली संतान सोफरोनिक्स्कस का नामकरण अपने दादा के नाम किया गया था. परिवार की आर्थिक स्थिति खस्ता थी. पत्नी और परिजन चाहते थे कि सुकरात अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए परिवार के भरण-पोषण का दायित्व संभाले. किंतु सुकरात का मन दार्शनिक चिंतन में लगता था. सृष्टि के गूढ़ रहस्यों के उद्घाटन की कोशिश के समय उसकी मेधा चामत्कारिक रूप से बहुत ही उग्र होती थी. पारिवारिक दायित्वों से निरपेक्ष, अपनी गरीबी की परवाह किए बिना ही सुकरात ने स्वयं को दर्शनशास्त्र के अध्यापन के लिए समर्पित कर दिया था. ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि सुकरात की पत्नी जेनथिप्पी चिड़चिड़ी महिला थी. इस कारण उसकी आलोचना भी की जाती है. मगर हमें याद रखना चाहिए कि दार्शनिक के रूप में पूरी दुनिया में पहचाना जाने वाला सुकरात भी पति के रूप में आदर्श इंसान न था, जबकि जेनथिप्पी की मनोरचना साधारण गृहस्थन की थी, जो अपने परिवार के सुख में ही अपना सुख और शांति तलाशती थी. अतएव पति के व्यवहार से उसका खिन्न हो उठना स्वाभाविक ही था.
सुकरात की मेधा विलक्षण थी. उसका काम था सोचना, सोचना और सिर्फ सोचना. युवा होने पर वह सेना में भर्ती हो गया. एक वीर सैनिक के रूप में मेनटाइना के युद्ध में हिस्सा लेकर उसने अपने कमांडर अल्सीबियाड की प्राणरक्षा भी की थी. यह प्रशंसनीय कार्य था, किंतु सुकरात की नजर में यह कोई बड़ी बात न थी. वह स्वयं को शिक्षक मानता था. युद्ध में दर्शायी गई वीरता और देशभक्ति के लिए प्रशंसा किए जाने पर सुकरात की प्रतिक्रिया थी कि बजाय इसके वह युवकों को सिखाना पसंद करेगा, ताकि उनके व्यक्तित्व को संपूर्ण तथा कानून के प्रति आज्ञाकारी बनाया जा सके. वह चाहेगा कि युवकों की ऐसी पीढ़ी तैयार हो जो कानून पर दंभ करने के बजाय, उसके प्रति विनम्रतापूर्वक समर्पित हो तथा आवश्यकता पड़ने पर सच के लिए सर्वस्व बलिदान कर सके. सुकरात के इन विचारों से सोफिस्ट विचारकों को अधिक आपत्ति न थी, किंतु शिक्षक के रूप में सीधे संवाद करने का सुकरात का तरीका और उसके कटाक्ष उनको चुभते थे. सोफिस्टों की विलास-प्रियता के कारण एथेंस का लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदल चुका था. सुकरात ऐसे गणतंत्र का तीव्र आलोचक था. उसकी आलोचना किताबी न थी. बल्कि सीधे जनता के बीच जाकर अपने विचार रखता था. परिणाम यह हुआ कि सुकरात के आलोचकों और दुश्मनों की संख्या लगातार बढ़ने लगी. दूसरी ओर समाज में ऐसे लोगों की संख्या भी पर्याप्त थी, जो सोफिस्टों के दंभी रवैये से खिन्न थे. जिन्हें शिक्षण के प्रति उनका व्यावसायिक दृष्टिकोण एकदम नापसंद था. सुकरात सोफिस्टों पर सीधा प्रहार करता था. उसके तर्क इतने पैने तथा कटाक्ष इतना तीखा होता था कि सामने वाला बगलें झांकने लगता था. सोफिस्टों के व्यवहार से खिन्न लोगों को उसकी व्यंग्योक्तियां भली लगती थीं. सुकरात का प्रभाव जनमानस पर बढ़ता ही जा रहा था. दूसरी ओर उसके आलोचक उसका मुंह बंद करने का बहाना खोजते रहते थे. आखिर सुकरात को दबाने के लिए एक न्यायिक मंडल का गठन किया गया. मेलीटस, एनीटस और लायकन उस मंडल के सदस्य थे. तीनों ही सुकरात से खार खाते थे. सुकरात पर आरोप लगाया गया कि वह प्रजा की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ कर रहा है, स्थापित दैवी सत्ताओं को अपदस्थ पर वह नई शक्तियों को आरोपित करना चाहता है. उसपर नवयुवकों को बिगाड़ने, उन्हें भ्रमित करने का आरोप भी लगाया गया.
दुनिया के उस सर्वाधिक चर्चित मुकदमे के दौरान सुकरात ने न केवल स्वयं का बचाव किया, बल्कि न्यायिक मंडल के तीनों सदस्यों को स्पष्ट शब्दों में सावधान किया कि वे अपनी अज्ञानता के कारण सचाई से मुंह मोड़ रहे हैं. और इस तरह वे स्वयं का ही उत्पीड़न कर रहे हैं. चूंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं, इसलिए यह मानते हुए कि वे जो कर रहे हैं, उसमें उसका कोई योगदान नहीं है, सुकरात ने उन्हें क्षमा करने का भरोसा भी दिया था. उसने जोर देकर किया कि वह केवल अपनी आत्मा के आगे नत है, न कि किसी बादशाहत के. सुकरात के इस बयान को राष्ट्रद्रोह मानते हुए उसको क्षमायाचना करने का निर्देश दिया गया. जिसे सुकरात ने यह कहते हुए नकार दिया कि अनैतिक सत्ता के आगे झुकने के बजाय वह मृत्यु का वरण करना श्रेयस्कर समझेगा. सुकरात को मृत्युदंड सुनाया गया. मगर उसपर कार्यवाही को एक महीने तक, जब तक कि डेलोस की यात्रा पर गया पवित्र जहाज वापस नहीं लौट आता, टाल दिया गया. एथेंस की परंपरा थी कि अपनी सालाना यात्रा पर डेलोस गया जहाज जब तक लौट नहीं आता था, तब तक वहां किसी को मृत्युदंड नहीं दिया जाता था.

जहाज के लौटने तक, पूरा एक महीना सुकरात ने मृत्यु की तैयारी में बिताया था. प्लेटो अपने गुरु के अंतिम दिनों के एक-एक पल का साक्षी था. उस समय सुकरात उसको निडर महात्मा लगा था, जिसको मृत्यु का कोई भय नहीं था. जिसने अपनी सिद्धांतनिष्ठा को जीवन से अधिक महत्त्व दिया था. सुकरात को मृत्युदंड सुनाए जाने पर एथेंस की प्रजा भी क्षुब्ध थी. उसमें आक्रोश पनप रहा था. बढ़ते जनाक्रोश और चैतरफा आलोचनाओं से घबराकर एथेंस के शासकों ने सुकरात के आगे यह प्रस्ताव भी भेजा था कि यदि वह अब भी अपने शब्दों को वापस लेने तथा स्थापित मान्यताओं का सम्मान करने को तैयार हो तो उसको दी गई सजा में कमी की जा सकती है. इस प्रस्ताव को सुकरात ने सिरे से नकार दिया. सुकरात के शिष्य भी उसको कारावास से बाहर निकालने के लिए प्रयासरत थे. उसका एक शिष्य क्रीटो उसको कारावास से भगा लाने की योजना बनाकर उससे मिलने कारागार में पहुंचा था. मगर सुकरात ने यह कहकर वह अपने देश का कानून तोड़ने की जिम्मेदारी अपने सिर पर हरगिज नहीं ले सकता, क्रीटो को वापस लौटा दिया. अंतिम समय में जब सुकरात को जहर दिया जा रहा था तो अंतिम समय भी उसके चेहरे पर शांति और तेज था. ईसापूर्व 399 का वह वर्ष था. प्लेटो उस समय अपनी उम्र के अठाइसवें वर्ष में चल रहा था.

सुकरात की प्रवृत्ति तर्क करते हुए समाधान तक पहुंचने की थी. अपने शिष्यों और विरोधियों के साथ वह घंटों तक बहस कर सकता था. यह बहस दूसरों पर अपने बौद्धिक सामथ्र्य की छाप छोड़ने के लिए नहीं होती थी, बल्कि उसकी कोशिश होती थी कि लोगों के अंतर्मन में छिपे ज्ञान को बाहर खोज निकालने की. उसका मानना था कि ज्ञान शुभत्व के रूप में प्रत्येक आत्मा के साथ विराजमान रहता है. आवश्यकता उसको उदीप्त करने की होती है, ताकि वह बाहर आ सके. वार्तालाप को वह उदीपन का माध्यम समझता था. यद्यपि उसका लिखा हुआ सामने नहीं आता, मगर प्लेटो की पुस्तकों से उसके ज्ञान, तर्क-सामथ्र्य एवं विचारधारा का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है. प्लेटो के अनुसार सुकरात का होना सोफिस्टों के लिए एक चुनौती थी. उन परंपरावादियों के लिए चुनौती थी, जो निहित स्वार्थ के लिए रूढ़ियों और अज्ञानताओं को ढोए जा रहे थे. सुकरात सोफिस्टों से एकदम भिन्न था. उन्हें जहां अपने ज्ञान पर गुमान था, वहीं सुकरात स्वयं को जिज्ञासु मानता था. वह अपनी सीमाओं से भली-भांति परिचित था. ज्ञान के विशाल सागर के समक्ष वह स्वयं को पिपासु की तरह समझता. वह सदैव ज्ञान की खोज में तत्पर रहता था. इसके विपरीत सोफिस्ट अपने अहम् से तने-तने रहते थे. उन्हें अपने ज्ञान से ज्यादा गुमान था. बातचीत के दौरान भी सुकरात खुद का अज्ञानी बताता. सदैव शांत बना रहता. अपनी प्रश्नाकुलता और धैर्य के साथ. फिर भी कुछ लोग उसकी प्रश्नाकुलता को नाटक मानते थे. उनके अनुसार सुकरात की जिज्ञासा बनावटी थी. वे न जानने का मिथ्या आडंबर रचते हैं—यह कहने वाले, सुकरात से ईष्र्या करने वाले भी कम न थे. वे इस बात से अनजान बने रहते थे कि सुकरात ज्ञान के नाम पर सूचना अथवा उसके किसी एक पहलू से संतुष्ट हो जाने वाला जीव नहीं है. वह प्रत्ययों को उनकी समग्रता के साथ जानना चाहता है. समस्या के प्रत्येक पहलू पर गंभीर विमर्श करना और संवाद के दौरान विनयशील बने रहना, सुकरात की अपनी शैली है. वे ज्ञान को उसकी समग्रता के साथ जानना चाहते हैं. परंतु अपनी सीमाओं से भी परिचित हैं. जानते हैं कि उम्र का आधा पड़ाव पार कर लेने के बाद भी उनका ज्ञान अभी अधूरा है. दुनिया में अनेकानेक ऐसी बातें हैं, जिनके बारे में वे कुछ नहीं जानते. पर वे सचेत हैं. इसलिए हर पल कुछ सीखने को उत्सुक बने रहते हैं. यह बिना अपनी अल्पज्ञता को समझे संभव नहीं. इसलिए सुकरात का मानना था कि उन्हें अपने अज्ञान का ज्ञान है.

पर जिसे अपने अज्ञान का ज्ञान हो, उसके बारे में डेल्फी की भविष्यवक्ता यह कहे कि वह एथेंस का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति है, यह तो चैंकाने वाली बात ही हुई न! सुकरात भी चैंके बिना नहीं रहे थे. उन्हें यह विश्वास ही नहीं था कि डेल्फी की भविष्यवक्ता उनके बारे में इस प्रकार की कोई टिप्पणी कर सकती है. पर यह दावा भविष्यवक्ता पाइथिया का ही था. सुकरात के मित्र केरिफोन के समक्ष किया हुआ. केरीफोन ने पाइथिया से प्रश्न किया था—

‘क्या एथेंस में सुकरात से बड़ा कोई ज्ञानी है?’

‘नहीं!’

पाइथिया का उत्तर था. एथेंस के सभी नागरिक पाइथिया पर भरोसा करते थे. उसको मानते थे. फिर वह भला झूठ क्यों बोलेगी. अगली बार केरीफोन जब सुकरात से मिला तो खुशी-खुशी उसको उस टिप्पणी के बारे में बताया. सुकरात स्तब्ध! यह कैसे संभव है कि एथेंस में उनसे बड़ा कोई ज्ञानी ही न हो. कोई दूसरा होता तो इस बात पर फूलकर कुप्पा हो जाता. नहीं तो ज्योतिषी की गल्पकथा मानकर उपेक्षित कर देता. पर सुकरात तो सुकरात. बिना परिक्षण के भरोसा कैसे करें. सोचा, इस बहाने क्यों न एथेंस के ज्ञानी कहे जाने वाले लोगों की परीक्षा ले ली जाए? सच अपने आप सामने आ जाएगा.

सबसे पहले वे एथेंस के बड़े राजनेता के पास पहुंचे. बड़ा नाज था उसे खुद पर. लोग भी उसको सर्वगुण-संपन्न मानते थे. उससे बातचीत के दौरान सुकरात जान गए कि उसे दूसरी बातों के बारे में तो दूर, राजनीति का भी ढंग का ज्ञान नहीं है. पर गुमान इतना करता है कि जैसे सबकुछ जानता हो. कि जितना वह जानता है, उतना दूसरा कोई जान भी नहीं सकता. जब सुकरात ने उसका उसके अज्ञान से परिचय कराया, बताया कि कितनी ही ऐसी चीजें हैं, जिनके बारे में उसका ज्ञान शून्य है—इसपर वह नाराज हो गया. उसने मन ही मन सुकरात को सबक सिखाने की ठान ली. सुकरात के लिए यह कोई नई बात नहीं थी. मित्र कोई बने न बने, दुश्मन वे रोज बनाते थे. सुकरात को उस अज्ञानी नेता से भी सीखने को ही मिला. वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि—‘इस राजनेता की तुलना में मैं अधिक ज्ञानी हूं, इस अर्थ में कि मैं कम से कम उसके बारे में तो जानता हूं, जो मैं नहीं जानता. जबकि यह राजनेता तो यह भी नहीं जानता कि यह कुछ भी नहीं जानता. अगले चरण में सुकरात ने कवियों से मुलाकात की. ज्ञान की परख के समय कवि महोदय भी बगलें झांकते हुए नजर आए. सुकरात को बड़ी निराशा हुई. उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि भावातिरेक में कविगण ऐसी रचना कर बैठते हैं, जिनके अर्थ के बारे में वे स्वयं भी कुछ नहीं जानते. ऊपर से हर पल अपने विशिष्टताबोध से दबे-दबे रहते हैं. अहंकार इतना करते हैं, मानो भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों पर नजर रखते हों. सुकरात ने जब उन्हें उनके अज्ञान का परिचय कराया तो वे भी नाराज हो गए. उनके दुश्मनों की संख्या में एक और बढ़ गया. अगली बार वे हस्तशिल्पियों से मिले. जिनके हुनर की चर्चा एथेंस के गली-कूंचों में होती थी. सुकरात को वहां अनेक बातें सीखने को मिलीं. अच्छा लगा. अभी तक के प्रयास में यह पहला अवसर था, जब उन्हें कुछ सीखने को मिला था. कुछ ऐसा जिसके बारे में वे उससे पहले कुछ नहीं जानते थे. पर बातचीत के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि राजनेता और कवियों की तरह शिल्पियों को भी बहुत कुछ जानने का अहंकार है. वे क्या नहीं जानते, इस बारे में उनमें से कोई जानना ही नहीं चाहता. अपने कार्यक्षेत्र से बाहर उनकी जानकारी अत्यल्प है, पर यह बात उनमें से कोई जानना ही नहीं चाहता. अपने अज्ञान के बारे में जानना सबसे कठिन काम होता है. इस घटना के बाद भी उसने अपना शोध जारी रखा. आखिर में वे इस निर्णय पर पहुंचे कि एथेंस में उनसे बढ़कर सचमुच कोई ज्ञानी नहीं है—

‘लोग ठीक ही कहते हैं कि सुकरात सबसे बुद्धिमान व्यक्ति है…क्योंकि उसको अपने अज्ञान का ज्ञान है.’
यह घटना स्वयं सुकरात द्वारा अपने मुकदमे की सुनवाई के दौरान बयान की थी. उसने बताया था कि वे सभी लोग जिन्हें उसने अपने उक्त घटना के समय परखा था, इस मुकदमें में प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं. ऐसे ही गुरु के बारे में प्लेटो का कहना था—‘मैं ग्रीक हुआ, गंवार नहीं हुआ. पुरुष हुआ स्त्री नहीं हुआ. स्वतंत्र हुआ, गुलाम नहीं हुआ. पर सबसे बढ़कर मेरा सौभाग्य है कि मैं सुकरात के युग में पैदा हुआ.’

सुकरात प्रसिद्ध पेलोपेनिशियन युद्ध में भी हिस्सा ले चुका था. उसकी बहादुरी बेमिसाल थी. एक बार तो जान पर खेलकर उसने अपने कप्तान की प्राणरक्षा भी की थी. उस युद्ध में एथेंस की पराजय हुई थी. किंतु युद्ध के पश्चात एक चर्चा के दौरान एक सैन्य अधिकारी ने कहा था कि यदि सभी सैनिक उतनी ही वीरता से लड़े होते जितनी सुकरात, तो एथेंस की पराजय को विजय में बदला जा सकता था. सुकरात को अपने मन-मस्तिष्क पर कमाल का नियंत्रण प्राप्त था. वह एक ही विषय पर घंटों तक एकाग्र रह सकता था. खड़े-खड़े, चलते-फिरते सोच सकता था. जो सुकरात के स्वभाव से परिचित थे, उनके लिए तो यह नई बात न थी. पर जो अनभिज्ञ थे, उन्हें यह देख बड़ा ही आश्चर्य होता था. सुकरात एक ही स्थान पर दत्तचित हो कब तक खड़े रह सकते हैं, यह देखने वाले उनके आसपास जुटने लगते. कुछ ही देर में भीड़ जुट जाती. कुछ लोग तो अपना बिस्तर उठाकर सुकरात के आसपास की बैठ जाते. धीरे-धीरे दिन ढलता, शाम होती और उसके साथ ही रात अपनी रंगत बिखेरने लगती. सुकरात को समाधिस्थ अवस्था में देखने वालों की भीड़ लगातार बढ़ती जाती. फिर सुबह होती. न जाने कब सुकरात समाधि से बाहर आते और किसी की ओर देखे बिना आगे बढ़ जाते.

एक घटना का उल्लेख प्लेटो के संवाद ‘सिंपोजियम’ में हुआ है. सुकरात एक बार नहा-धोकर घर से बाहर निकलते. एरिस्टोडोमस ने देखा तो चौंका. ऐसा कम ही होता था. वरना सुकरात तो अपने आप से हमेशा बेपरवाह नजर आते थे.

‘आज कहां चले?’ सुकरात को सजे-संवरे देख एरिस्टोडोमस ने पूछा.

पता चला कि सुकरात को एक मित्र ने दावत पर बुलाया है. उसके कहने पर एरिस्टोडोमस भी साथ हो लिया. दोनों चर्चा करते हुए गंतव्य की ओर बढ़ने लगे. मित्र के घर पहुंचने से कुछ ही पहले सुकरात ने एरिस्टोडोमस से आगे बढ़ जाने को कहा. उसने आज्ञा का पालन किया. भीतर जाकर एरिस्टोडोमस ने मेजबान को सुकरात के पहुंचने की सूचना दी. मित्र सुकरात की अगवानी के लिए बाहर आया तो देखा कि वह सड़क किनारे समाधिरत हैं. उन्हें देखने वाले हैरान रह गए. मेजबान कुछ देर वहीं खड़ा देखता रहा और जब सुकरात की समाधि अखंड रही तो भीतर जाकर मित्रों को भोजन कराने लगा. इस काम में ही शाम हो गई. सहसा सुकरात की समाधि भंग हुई. उन्हें याद आया कि वे तो मित्र के यहां भोजन पर आमंत्रित थे. लेकिन भीतर जाकर उन्हें पता चला कि दावत तो कभी की समाप्त हो चुकी है. सभी मेहमान लौट चुके हैं.
ऐसे मन से प्रबल जिज्ञासु और कर्म से घुमक्कड़ सुकरात का सान्न्ध्यि प्लेटो को मिला. मात्र बीस वर्ष की कल्पनाशील अवस्था में प्लेटो सुकरात के संपर्क में आया था. मनुष्य और समाज के बारे में सुकरात के आदर्श सोच, जीवन और सचाई के प्रति गंभीर निष्ठा तथा उसके मौलिक चिंतन से वह बेहद प्रभावित हुआ. सुकरात ने जोर देकर कहा था समाज की इकाई होने के बावजूद मनुष्य महत्त्वपूर्ण है. सुकरात की सिद्धांतनिष्ठा तथा उसके मानवतावादी सोच का असर प्लेटो के पूरे चिंतन पर छाया हुआ है. इतना गहरा कि स्वयं एक भी शब्द न लिखने वाला सुकरात ढाई हजार वर्षों से दुनिया के महानतम दार्शनिक और मानवता के शिक्षक के रूप में ख्यात है. प्लेटो की लगभग सभी पुस्तकों में उसकी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष उपस्थिति है.

प्लेटो का जन्म

यूनान के इतिहास में ईसापूर्व पांचवी शताब्दी का कालखंड बहुत ही हलचल-भरा था. उस दौर में सुकरात अपने मौलिक दर्शन के साथ विद्रोही मुद्रा में था. स्वयं को ज्ञान का भंडार मानने तथा शिक्षा का व्यापार करने वाले सोफिस्टों को वह कदम-कदम पर चुनौती दे रहा था. वह समय ही कुछ ऐसा था, जब दार्शनिक चेतना की लहर दुनिया के प्रत्येक कोने में छाई हुई थी. उसके लगभग डेढ़ शताब्दी पहले भारत में महावीर स्वामी (599 —527 ईस्वी पूर्व) का अवतरण हो चुका था. बौद्धधर्म के प्रणेता गौतम बुद्ध (550—480 ईस्वी पूर्व) यद्यपि उस समय तक निर्वाण प्राप्त कर चुके थे, किंतु उनके द्वारा चलाए गए धर्म ने संसार-भर का ध्यान आकर्षित किया था. भारत समेत विश्व-भर में उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी. भारत से यूनान आने वाले व्यापारी दलों में बौद्ध भिक्षु भी धर्मयात्राएं करते थे. गौतम बुद्ध तथा महावीर स्वामी दोनों का संबंध राजपरिवारों से था, किंतु साधारण राजा की भांति वैभव और विलासितापूर्ण जीवन जीने के बजाय उन्होंने ज्ञान और सत्य के अनुसंधान की राह चुनी. उसके माध्यम से उन्होंने धर्म और परंपरा के नाम पर थोपे जा रहे कर्मकांडों, पोंगापंथी रीति-रिवाजों का विरोध करते हुए, वैज्ञानिक चेतना और व्यावहारिक सोच को जीवन में उतारने पर जोर दिया. सुकरात और प्लेटो पर जैन तथा बौद्ध मान्यताओं का कितना प्रभाव पड़ा यह कहना तो कठिन है, परंतु सुकरात जैसा दार्शनिक भारत से आ रही नई से पूरी तरह अनभिज्ञ हो, यह असंभव है. दोनों के बीच इतनी समानता तो थी ही कि उन्होंने एक नई दार्शनिक दृष्टि से अपने-अपने समाज को परिचित कराया तथा एक न्यायाधारित व्यवस्था की स्थापना पर जोर दिया.

प्लेटो का जन्म बड़े ही हलचल-भरे समय में, 21 मई, 430 को ईसा पूर्व एथेंस में हुआ था. प्रसिद्ध यूनानी इतिहासकार अपोलोंडरस के अनुसार जन्म का वर्ष 428 ईसा पूर्व है. यूनान की प्राचीन समय गणना पद्धति के अनुसार वह थारगेलियन का महीना था, अठासीवें ओलंपियाड का पहला वर्ष. प्लेटो के जन्म स्थान को लेकर भी मतभेद है. कुछ विद्वान एथेंस को उसकी जन्मस्थली मानते हैं तो कुछ के अनुसार उसका जन्म एथेंस के निकटवर्ती टापू एजीना पर हुआ था. प्लेटो के परिवार की गिनती यूनान के प्रतिष्ठित परिवारों में होती थी. पिता ऐरिस्टोन एथेंस के सम्राट कोडरस के वंशज थे. उसकी मां का नाम पेरिक्टिओन था. तीन भाइयों में सबसे छोटे प्लेटो के एक बहन भी थी, नाम था—पोटोन. शेष दो भाइयों का नाम ग्लुकोन तथा एडीमेंटस था. उसके मामा चारमिंडस का संबंध भी अभिजात्य कुल से था. मां का संबंध भी एथेंस के जाने-माने परिवारों से था. प्लेटो का एक चाचा एथेंस की तीस सदस्यीय परिषद का सदस्य था.

स्पष्ट है कि राजनीति के तत्व प्लेटो को विरासत में मिले थे. उसका असली नाम अरिस्टोले था. प्लेटो उसके दादा का नाम था. उन्हीं के प्रति सम्मान का प्रदर्शन करने के लिए अरिस्टोले ने अपना उपनाम ‘प्लेटो’ रख लिया. कुछ विद्वानों का मत है कि यह उपनाम, जिससे वह पूरे विश्व में जाना-माना जाना जाता है, प्लेटो के अध्यापक ने दिया था. वह अध्यापक प्लेटो को कुश्ती सिखाता था. प्लेटो की कद-काठी अच्छी थी. ‘प्लेटो’ का शब्दार्थ है—विशाल. इसलिए यह नाम उसके बड़े डील-डौल को देखते हुए खूब फबता था. कुछ विद्वानों का मत है कि प्लेटो का मस्तिष्क सामान्य से बड़ा था. हो सकता है इसी कारण उसको यह उपनाम दिया गया हो. प्लेटो के दो समाधिलेखों में से एक में उसका असली नाम अरिस्टोले ही खुदा है. मगर मानवेतिहास में वह प्लेटो के नाम से ही विख्यात है. प्लेटो के जन्म-वर्ष को यूनानी इतिहास में एक और भी कारण से याद किया जाता है. वस्तुतः जिस वर्ष उसका जन्म हुआ, एथेंस अपने महान योद्धा पेरीक्लीस के शोक में डूबा हुआ था, जिसकी मृत्यु कुछ ही दिन पहले हुई थी. पेरीक्लीस एक कुशल, दूरदृष्टा तथा लोकप्रिय सम्राट था. उसने एथेंस को शक्ति, समृद्धि एवं वैभव के शिखर तक पहुंचाने में महान योगदान दिया था. पेरीक्लीस का शासनकाल रोम के इतिहास का ‘स्वर्णकाल’ माना जाता है. पेरीक्लीस के निधन के साथ ही किंकर्तव्यविमूढ़ एथेंस साम्राज्य पतन की ओर बढ़ चला था. उसके कुछ कारण अंदरूनी भी थे. एथेंस के अधिकांश शासक अदूरदर्शी, विलासी और भ्रष्ट थे. शासकों ने जनता की ओर से मुहंमोड़ लिया था, जिसके कारण व्यापारी वर्ग को मनमानी करने का अवसर मिला था. परिणामस्वरूप जनता का अपने शासकों से विश्वास उठ चुका था. शासन के स्तर पर ढील होने के कारण वहां राजनीतिक अराजकता का माहौल था.

प्लेटो के जन्म को लेकर कुछ किवदंतियां भी प्रचलित हैं. तदनुसार प्लेटो को जन्म देते समय उसकी मां दैवीय शक्तियों के प्रभाव में थी. प्लेटो के पिता अरिस्टोन ने उसको सावधान करने का प्रयास किया. तब देवता अपोलो ने अरिस्टोन को सपने में दर्शन देकर उसको पेरिक्टोन के गर्भ में पल रहे बच्चे के बारे में बताया. उसके बाद अरिस्टोन ने अपनी पत्नी को सताना बंद कर दिया और दोनों अलग-अलग रहने लगे. बच्चे को जन्म देने के उपरांत ही पेरिक्टोन और अरिस्टोन ने पुनः साथ रहना आरंभ किया. एक अन्य दंतकथा के अनुसार प्लेटो को जन्म देने के बाद उसके माता-पिता ने उसको देवी मूस और देवता निम्फ को समर्पित कर दिया था. संस्कार के दौरान जिस समय वे शिशु प्लेटो को लेकर पर्वत शिखर पर पहुंचे, वहां विवाह के देवता हिमेटस मधुमक्खी का रूप धारण सदाबहार झाड़ियों से बाहर आए और वे निद्रानिमग्न शिशु प्लेटो के होठों पर बैठ गए. यह शिशु प्लेटो के लिए देवता हिमेटस का वरदान था. जिसके कारण उसके दर्शन में मिठास और गंभीरता दोनों का एकसमान समावेश है. दंतकथाओं और किवदंतियांे की बात जाने दें. किसी भी सफल व्यक्ति को लेकर इस तरह की कहानियां आमतौर पर गढ़ ली जाती हैं. कई बार ऐसी कहानियां जनता को भरमाए रखने के लिए जानबूझकर फैलाई जाती हैं. फिर प्लेटो जैसे बुद्धि-संपन्न और महान दार्शनिक के साथ इस तरह की दंतकथाओं का जुड़ जाना असामान्य नहीं है.

प्लेटो उन दिनों किशोर ही था जब उसके पिता की मृत्यु हुई. एथेंस के कानून के अनुसार स्त्री स्वतंत्र नहीं रह सकती थी. उसके लिए पुरुष का आश्रय लेना अत्यावश्यक था. अतएव प्लेटो की मां पेरिक्टेन ने पायरेलेंपिस से विवाह कर लिया, जो रिश्ते में उसका मामा लगता था. उल्लेखनीय है कि प्राचीन यूनान में चाचा, मामा अपनी भतीजी से विवाह कर सकते थे. ऐसे वैवाहिक संबंधों को वहां कानूनी मान्यता भी प्राप्त थी. अकसर रक्त-शुद्धता के नाम पर इन संबंधों को अनुमति दे दी जाती थी, किंतु इसके पीछे असली कारण पारिवारिक संपत्ति को विभाजित होने से रोकना था. उल्लेखनीय है कि उस समय व्यक्ति की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत उसकी संपत्ति के आधार पर तय होती थी. दास, शिल्पीवर्ग, मजदूर जैसे संपत्तिविहीन समुदायों को मताधिकार से वंचित रखा जाता था. न ही ऐसे लोगों को सक्रिय राजनीति में भाग लेने का अधिकार था. अपनी संवाद-पुस्तकों में प्लेटो ने पायरेलेंपिस को चारमेंडिस का चाचा बताया है. पायरेलंेपिस पहले से ही एक बेटे का पिता था. पेरिक्टेन से विवाह के बाद उसने उसके दूसरे बेटे को जन्म दिया. प्लेटो को अपने परिवार की प्रतिष्ठा पर गर्व था. अपनी संवाद पुस्तकों में उसने न केवल सुकरात के बारे में प्रमुखता से लिखा है, बल्कि यत्र-तत्र अपने परिवार का विवरण भी प्रस्तुत किया है, जो उसके मन में छिपी परिवार संस्था के प्रति आस्था को दर्शाता है. हालांकि प्रकट में उसने परिवार संस्था को गैर जरूरी माना है. उसने जिस आदर्शराज्य की परिकल्पना की है, उसके नागरिक सामूहिक आवासों में रहते हैं, एक ही रसोई का बना भोजन करते हैं. उनके परिवार, यहां तक कि पत्नियां और बच्चे भी साझे हैं. बच्चों का पालन-पोषण इस प्रकार किया जाता है कि माता-पिता अपनी संतान और संतान अपने वास्तविक जन्मदाताओं को कभी पहचान ही न सके. जहां रिश्ते व्यक्ति की वयस् के अनुसार तय होते हों. प्लेटो की यह विचारधारा आगे चलकर साम्यवादियों की प्रेरणास्रोत बनी थी.
क्रमश:….

ओमप्रकाश कश्यप