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न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—दो

सामान्य

‘न्याय क्या है’ पर सबसे पहली प्रतिक्रिया केफलस की ओर से ही आती है. केफलस मैटिक(विदेशी) है. उसके विचार कुछ-कुछ परंपरागत किस्म के हैं. उसके अनुसार न्याय का अर्थ है—‘अपने कथन और कर्म में सच्चा रहना तथा मनुष्यों एवं देवताओं के प्रति ऋण चुकाना.’ सुकरात इस परिभाषा से संतुष्ट नहीं होता. उसके अनुसार सत्य सापेक्षिक होता है. यानी एक व्यक्ति के लिए जो सत्य है, आवश्यक नहीं कि दूसरे व्यक्ति की परिस्थितियों में भी ठीक वैसा ही सत्य स्वीकार्य हो. इसलिए केफलस के विचारों की आलोचना वह यह कहकर करता है कि विशेष परिस्थितियों में सत्य और समुचित व्यवहार को न्याय माना जा सकता है. परंतु उसे सार्वभौमिक सत्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. उधार को समय पर चुकाना अच्छी बात है. उसे मानव-चरित्र के विशिष्ट गुण के रूप में लिया जा सकता है. परंतु इस नियम की भी सीमा है. यह प्रत्येक परिस्थिति में निरापद नहीं है. केफलस के मत के विरोध में अपना तर्क प्रस्तुत करते समय सुकरात उदाहरण देता है—‘मान लीजिए आपके दोस्त ने अपना घातक हथियार आपके पास सुरक्षित रख छोड़ा है. उसे वह उस समय वापस मांगता है, जब वह अत्यंत क्रोधावस्था में है; तथा हथियार द्वारा किसी तीसरे व्यक्ति की हत्या करना चाहता है. उस क्षण हथियार लौटाकर ऋण-मुक्त होना क्या न्याय की परिसीमा में आएगा?’ इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर केफलस के पास नहीं है. परिस्थिति चाहे जो हो, शुभ यदि अशुभ का जन्मदाता अथवा उसे प्रोत्साहित करता है—तो वह न्याय नहीं माना जा सकता. न्याय की कसौटी उसकी सार्वभौमिकता में है. वही न्याय है जो अधिकतम व्यक्तियों को न्याय जंचे और अधिकतम परिस्थितियों में न्याय-संगत सिद्ध हो. समय पर उधार लौटाने का गुण व्यक्ति को जिम्मेदार तो दर्शाता है, परंतु वह न्याय की कसौटी नहीं बन सकता.

केफलस वयोवृद्ध है. उस पीढ़ी का प्रतीक जो सुकरात के समय बूढ़ी हो चली थी. उसका ज्ञान सुदीर्घ अनुभव पर आधारित है. उसकी पीढ़ी के लिए न्याय और नैतिकता के अर्थ बहुत सीमित थे. सत्य-भाषण एवं समय पर उधार चुकाने का मामला भी व्यावहारिक नैतिकता से जुड़ा था. लोगों में उधार लेन-देन चलता रहता था. उसके कारण झगड़े भी होते थे. प्रकारांतर में केफलस उस न्याय की ओर इशारा करता है, जिसके लिए न्यायालय या किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की आवश्यकता पड़ती है. जबकि सुकरात न्याय को उसके वृहद संदर्भों में देख रहा था. सबकुछ जानते-समझते हुए भी सुकरात केफलस के विचारों को पुराना मानकर उसका उपहास नहीं करता. अच्छे विमर्शकार की भांति वह धैर्यपूर्वक सुनता और बाद में विनयपूर्वक उसका प्रतिवाद करता है. इसके लिए सिसरो ने सुकरात की प्रशंसा की है—‘सुकरात का आचरण एक उदाहरण है, जिसे अरस्तु ने दर्शन के अध्येता के लिए अनुकरणीय बताया है.’ न्याय की दृष्टि से सुकरात ने केफलस को भले ही निरुत्तर कर दिया हो, परंतु उसके अनुभवों से हमें व्यावहारिक नैतिकता की झलक मिलती है. जिनका दर्शन की दृष्टि से भले ही बहुत ज्यादा महत्त्व न हो, परंतु समाज का समूचा कार्य-भार सामान्यतः उसी पर केंद्रित होता है. प्रकारांतर में वह सुकरात को चरित्र की महत्ता से परचाना चाहता है. वह बताना चाहता है कि गरीबी निश्चित रूप से मनुष्य के सुख में बाधक बनती है. जीवन में अनेक परेशानियां और दुश्वारियां धनाभाव के कारण पैदा होती हैं. बावजूद इसके यह मान लेना कि जो अमीर हैं, जिन्हें कोई अभाव नहीं है, वे पूरी तरह प्रसन्न हैं अनुचित होगा. मनुष्य के लिए उसका चरित्र ही सच्ची दौलत है—इस तरह का सोच लंबे अनुभव और समाज के साथ सतत संवाद के बाद ही पनप सकता है. इसलिए व्यावहारिक न्याय और नैतिकता को देखते हुए केफलस के विचार मायने रखते हैं, हालांकि न्याय की परिभाषा की दृष्टि से उनका खास महत्त्व नहीं है.

केफलस को निरुत्तर देख उसका बेटा पोलीमार्क बहस में कूद पड़ता है. पोलीमार्क की न्याय संबंधी अवधारणा सीधी-सरल है. वह सोफिस्ट विचारकों से प्रभावित है. एक तरह से वह अपने पिता के न्याय संबंधी सहज बोध को ही आगे बढाता है. उसके अनुसार, ‘न्याय का अभिप्राय है—मित्रों को लाभ पहुंचाना और दुश्मनों को हानि.’ इस प्रकार का भेदभाव न्याय की आधारभूत मान्यता के विपरीत है. उसके आधार पर न्याय की कसौटी का निर्माण असंभव है. गौरतलब है कि उन दिनों यूनान के छोटे-छोटे राज्य परस्पर युद्ध करते रहते थे. युद्धक संस्कृति पूरे यूनान पर बढ़त बनाए थी. मित्र राज्यों की मदद तथा दुश्मन राज्यों का विरोध करना उस संस्कृति का सामान्य लोकाचार था. मित्रों के प्रति अनुराग और शत्रु से राग-विराग प्राचीन यूनानी समाज की सामान्य नैतिकता का हिस्सा था. सोलन की कविताओं में मिलता है—‘मुझे अपने मित्रों के प्रति सुखद तथा शत्रुओं के प्रति उदार बना दो.’ इसी तरह ईसा पूर्व आठवीं शताब्दी के कवि हेसियाद ने एक जगह लिखा था—‘वे हमें देंगे तो हम भी देंगे. वे यदि नहीं देंगे तो हम भी नहीं देंगे.’ प्राचीन भारत में न्याय की यही स्थिति थी. देवताओं से कुछ प्राप्त करने के लिए उन्हें अर्घ्य, भेंट-पूजा चढ़ाना. एक चढ़ाकर दस लाख की उम्मीद न करना. नहीं तो देवता के कोप-भाजन बनने से भयभीत रहना. यही व्यवस्था तत्कालीन राजनीति के न्याय-सिद्धांत की मुख्य प्रेरणा थी. राजा प्रसन्न हो तो भेंट-सौगात से मालामाल कर देता था. राजा के अप्रसन्न होने पर दंड सुनिश्चित था. दंड की मात्रा भी राजा के कोप और उसकी मर्जी पर निर्भर करती थी. कोई लिखित विधान न था. बाद में धर्मसूत्रों में हालांकि दंड संबंधी व्यवस्था देखने को मिलती है. परंतु उसका अनुसरण आवश्यक न था. राजा की मर्जी ही दंड विधान था. उसके विरोध में कहीं, कोई सुनवाई न थी.

पोलीमार्क का तर्क भी उससे प्रभावित है. परम जिज्ञासु सुकरात उसके तर्कां से आश्वस्त नहीं है. वह बताता है कि निष्पक्षता न्याय की कसौटी है. यदि नैतिकता की दृष्टि से सभी मनुष्य बराबर हैं, तो समान परिस्थितियों में उनके साथ एक जैसा व्यवहार करना ही न्यायिक उत्कृष्टता की कसौटी है. यदि दो व्यक्ति समान अपराध में लिप्त हों तथा उनमें से एक शासक का मित्र तथा दूसरा उसका शत्रु हो तो दोनों के अपराध का दंड क्या अलग-अलग होना चाहिए? व्यक्ति मित्रों के प्रति सामान्यतः उदार होता है, जबकि अमित्रों तथा दुश्मनों के प्रति अनुदार. ऐसे में उसका निर्णय निजी धारणाओं से प्रभावित होगा, जो न्याय-भावना के विपरीत है. पूर्वाग्रहवश वह मित्रों का पक्ष लेगा. जो मित्र नहीं हैं, उनके प्रति उसके निर्णय उपेक्षा से भरे, पक्षपातपूर्ण होंगे. पक्षपात जहां किसी अपात्र को लाभ पहुंचाता है, वहीं किसी अन्य व्यक्ति से जो उसका न्यायपूर्ण अधिकारी है, उचित अवसर छीन लेता है. सुकरात के अनुसार किसी को नुकसान पहुंचाना अथवा उसका बुरा करना न्याय की मूल अवधारणा के विपरीत है. फिर मित्रता कोई स्थायी संबंध नहीं है. दो व्यक्तियों के बीच संबंधों में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं. आज जो मित्र हैं, कल वही दुश्मन भी बन सकते हैं. तदनुसार एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्तियों के प्रति व्यवहार भिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग हो सकता है. अपने मत के समर्थन में प्लेटो सुकरात के माध्यम से कई तर्क प्रस्तुत करता है.

न्याय को यदि अच्छाई और बुराई से अभिव्यक्त होने वाला गुण मान लिया जाए तो कोई भी व्यक्ति उसका मनमाना उपयोग करने को स्वतंत्र हो जाएगा. एक डॉक्टर जो अपने उपचार द्वारा किसी रोगी को सही कर सकता है, उपचार न करके या जानबूझकर गलत उपचार द्वारा उसे नुकसान भी पहुंचा सकता है. प्रत्येक अवस्था में वह अपेने ज्ञान का उपयोग कर रहा होगा, हालांकि उसके परिणाम भिन्न-भिन्न होंगे. मगर जानबूझकर नुकसान पहुंचाने अथवा उपचार में लापरवाही बरतने की अवस्था में रोगी के प्रति उसके व्यवहार को न्यायपूर्ण नहीं माना जाएगा. न्याय कला भी नहीं है. कोई भी कलाकार अपनी कृति को रूपाकार देने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होता है. जबकि न्याय का न तो मनचाहा उपयोग संभव है, न ही मनमाने ढंग से उसे तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है. कलाएं अनुभव के साथ-साथ निरंतर परिष्कृत होती जाती हैं. जबकि न्याय के साथ ऐसा नहीं है. किसी भी समाज में न्याय उसकी आदर्शोन्मुखता का प्रतिरूप होता है. उसे अनुभव के आधार पर परिष्कृत नहीं किया जा सकता. सुकरात के अनुसार न्याय का सीमित अर्थों एवं संदर्भों में प्रयोग निषिद्ध है. वह बृहत्तर ज्ञान का विषय है. पोलीमार्क्स के तर्क के विरोध में सुकरात की अनेक शंकाएं हैं. उसके अनुसार मित्र को लाभ पहुंचाने और शत्रु का अहित करने की बात करना जितना आसान है, वास्तविक मित्र और शत्रु की पहचान करना उतना ही कठिन है. मनुष्य का व्यवहार बदलता रहता है. कुछ मनुष्य इतने तेज-तर्रार होते हैं कि उनके व्यवहार से पता ही नहीं चलता कि वे मित्र हैं या शत्रु? ऐसे लोग सामने हितैषी होने का दावा करते हैं, परंतु पीठ पीछे वे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं. ऐसे मनुष्य के प्रति कैसा व्यवहार न्यायोचित होगा—यह समझ पाना आसान नहीं होता. ऐसे व्यक्तियों के लिए जिनकी मैत्री केवल दिखावा है, हमेशा लाभ की बात करना उन लोगों के प्रति प्रति सरासर अन्याय होगा जिनका व्यवहार आपको पसंद नहीं है, परंतु उन्होंने आपको या किसी अन्य को कभी भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की है. ऐसे व्यक्ति के साथ जो मन से बुरा नहीं है, या परिस्थितिवश बुराई अपनाने को विवश हुआ है—यदि दुर्व्यवहार किया जाए तो समाज के प्रति उसके विश्वास में कमी आएगी. दूसरी ओर जो व्यक्ति सचमुच बुरा है, यदि उसके अहित को न्याय मान लिया जाए तो वह अपने पक्ष को ही न्यायपूर्ण मान लेगा. इस प्रकार उसके सुधार की समस्त संभावनाओं का अंत हो जाएगा. न्याय की पहली शर्त करने वाले और जिसके साथ न्याय किया जा रहा है, स्पष्टता है. उसमें समिष्ठि की भावना अंतनिर्हित होती है. न्याय परिस्थिति-निरपेक्ष, व्यक्ति निरपेक्ष और देश-काल निरपेक्ष होता है. सार्वदैशिकता उसका गुण होता है. देश-काल के अनुसार अपराध की प्रवृत्ति, परिभाषाएं और उनके अनुरूप दंड विधान बदल सकता है, न्याय नहीं. उसे तो पक्षपात रहित और इन सभी से ऊपर, सर्वकल्याणकारी होना चाहिए. इसलिए न्यायशील व्यक्ति मित्र या शत्रु का भेद किए बगैर सर्वकल्याण की भावना के साथ न्याय को अपनाएगा. अतएव मित्र को लाभान्वित करने तथा अमित्र को नुकसान पहुंचाने की भावना न्यायसंगत नहीं कही जा सकती. किसी भी प्रकार का भेदभाव न्याय की मूल-भावना के पूरी तरह विपरीत है. सुकरात के तर्कों के बाद पॉलीमार्क्स तर्क छोड़कर बहस से बाहर आ जाता है. उस तर्क-शृंखला का समापन प्लेटो यह कहकर करता है कि ‘मित्रों के भलाई और दुश्मन के साथ बुराई जैसी धारणा पेरियांडर जैसे निरंकुश सम्राट ने बनाई होगी. प्रसंगवश बता दें कि पेरियांडर की गिनती यूनान के सात प्रसिद्ध संतों में की जाती है. यह उन दिनों की बात है जब वहां दार्शनिक का राजा होना श्रेष्ठतर माना जाता था. पेरियांडर ने कोरिंथ पर ईसापूर्व 625 से 585 ईस्वीपूर्व तक शासन किया था. आरंभ में उसका शासन बहुत दयालुतापूर्ण था. लेकिन बाद में वह दमन का रास्ता अपनाने लगा था.

‘रिपब्लिक’ को पढ़ते हुए कभी-कभी यह लगता है कि उसके पात्र प्लेटो की कल्पना की उपज हैं. उनकी भूमिका किसी न किसी विचार के पक्ष-विपक्ष को आगे बढ़ाने तक सीमित है. सुकरात का योगदान कहीं सूत्रधार का है, कहीं महत्त्वपूर्ण वक्ता के रूप में तो कहीं विभिन्न विचारधाराओं में समन्वयक का. संवाद के बीच अनेक व्यक्तियों की सहभागिता का उद्देश्य है कि उनके माध्यम से प्लेटो, अंतिम निष्कर्ष से पहले किसी एक विचार या अवधारणा के यथासंभव सभी पक्षों पर खुलकर विचार कर लेना चाहता है. वह लगातार यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि न्याय को लेकर परंपरागत किस्म की धारणाएं व्यावहारिक दृष्टि के लिए उपयोगी कही जा सकती हैं. परंतु विशिष्ट परिस्थितियों में उनकी उपयोगिता सीमित तथा अलाभकारी हो जाती है. व्यापक परिदृश्य में उनके अंतर्विरोध और सीमाएं सामने आने लगती हैं. न्याय पर चर्चा करते हुए सुकरात केवल अपने साथियों की न्याय-संबंधी अवधारणा में खोट नहीं निकालता. परिचर्चा के दौरान वह खुद का भी अविकल परिमार्जन करता जाता है. ‘रिपब्लिक’ में हम प्लेटो न्याय-संबंधी प्रारंभिक संकल्पना में एक के बाद एक सुधार हुआ पाते हैं. न्याय की अवधारणा पर शुरू हुई बहस में तीसरे पात्र के रूप में थ्रेचाइमच्स का आगमन होता है. प्लेटो ने उसे वाग्मिता में निपुण ऐसा व्यक्ति बताया है तो श्रोताओं की वासनाओं को उत्तेजित करने में दक्ष था. शिक्षा का प्राथमिक ध्येय ज्ञानार्जन है. जबकि सोफिस्टों के लिए वह केवल वाक्-कौशल अथवा वाक्-चातुर्य तक सीमित था. तो भी सोफिस्टों की ग्रीक संस्कृति में महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. सुकरात और प्लेटो के आगमन से पहले सोफिस्ट ही थे, जिनसे ग्रीक संस्कृति का बोध होता था. वे अपनी विचारधारा और तर्क-सामर्थ्य के आधार पर जाने जाते थे. तर्क-नैपुण्य उनके लिए इतना महत्त्वपूर्ण था कि आगे चलकर उन्होंने उसी को अपना व्यवसाय बना लिया था. यूनानी समाज में उनकी हैसियत ठीक ऐसी ही थी जैसी भारत में पुरोहित वर्ग की. थ्रेचाइमच्स के विचार ‘सत्ता-सर्वेसर्वा’ का प्रतिनिधित्व करते हैं. बहस में उतरने के पश्चात वह दावा करता है कि शक्तिशाली की हित-सिद्धि ही न्याय है. उसके अनुसार—‘सबल सर्वदा सही होता है.’ ‘राजा जो करे वही न्याय’—ऐसी मान्यता भारत में भी रही है. तुलसी ने लिखा है, ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं.’ इसी से शायद यह कहावत भी बनी है—‘जिसकी लाठी उसकी भैंस.’ अपने मंतव्य को स्पष्ट करता हुआ थ्रेचाइमच्स कहता है—

‘विभिन्न प्रकार के राजदर्शनों यथा जनतंत्रात्मक, निरंकुश, कुलीनतंत्री आदि के आधार पर गठित सरकारें इस प्रकार के कानून बनाती हैं, जिनके द्वारा उनकी अपनी स्वार्थ-सिद्धि होती है. निहित स्वार्थ के लिए बनाए गए कानूनों को ही वे न्याय की संज्ञा देती हैं और चाहती हैं कि लोग बिना कोई प्रश्न उठाए उनका पालन करें. जो व्यक्ति उनके आदेश की अवहेलना करता है उसे वे कानून के उल्लंघन का तर्क देते हुए दंडित करती हैं. सभी राज्यों में न्याय का एकमात्र उद्देश्य है शासकीय वर्गों का हित. चूंकि राज्य अपने आप में शक्तिशाली तंत्र होता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि न्याय सर्वत्र एक ही है, वह है—शासक वर्ग का हित और शक्तिशाली का स्वार्थ.’

थ्रेचाइमच्स के अनुसार न्याय शक्तिशाली का अधिकार है. जो शक्तिसंपन्न है, वह न्याय को अपने पक्ष में कर लेता है. शक्तिशाली हमेशा अपने पक्ष में कानून बनाता है. सवाल है शक्ति कैसी? देह की, मन की या किसी और प्रकार की? सुकरात प्रश्न करता है. थ्रेचाइमच्स इस बारे में स्पष्ट है. वह शारीरिक शक्ति से इन्कार करता है. भूल जाता है कि शारीरिक शक्तियों, जिनमें बौद्धिक सामर्थ्य भी सम्मिलित है, से इतर जितनी भी शक्तियां हैं, वे सभी व्यक्ति को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में समाज की ओर से प्राप्त होती हैं, भले ही समाज अपनी इस देन को गंभीरता से न लेता हो. उसमें व्यक्ति की अपनी प्रतिभा एवं परिश्रम का भी योगदान होता है, परंतु इतना नहीं कि समाज के योगदान की बराबरी कर सके. अध्ययन-अध्यापन, अनुभव आदि के माध्यम से मनुष्य जो ज्ञान अर्जित करता है, वह उसकी पूर्ववर्त्ती पीढ़ियों के अनुभवों का निचोड़ होता है. परंतु अहंभाव के चलते व्यक्ति समाज की देन को अपनी मान बैठता है. यह उसका अहंभाव है. अपने ज्ञान पर गर्व करने का अधिकार उसे है. लेकिन पूर्ववर्त्ती पीढ़ियों के योगदान को बिसरा देना भी अनैतिक कर्म है. थ्रेचाइमच्स नेतृत्व के अधिकार को शक्ति मानता है. उसके अनुसार जिसके पास कानून बनाने की शक्ति है, उसे दूसरों पर नियंत्रण का अधिकार और अवसर स्वतः प्राप्त हो जाते हैं. थ्रेचाइमच्स की कसौटी है कि जो शक्ति-संपन्न है, वह न्याय-संपन्न भी है. कानून-निर्माता होने के कारण शक्तिशाली सदैव लाभ की अवस्था में रहता है. उस गड़हरिया की भांति जो अपनी भेड़ों को इसलिए पालता है ताकि समय आने पर वह उनसे काम ले सके. जिसमें जरूरत पड़ने पर उसकी बलि भी शामिल है. थ्रेचाइमच्स का विचार प्राचीन राजनीति के बेहद करीब है. प्राचीन सम्राट अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए प्रजा को कभी भी युद्ध में उतार सकते थे, लोगों से मनचाहा काम या बेगार ले सकते थे. थ्रेचाइमच्स के अनुसार जो लोग शासन से दूर हैं, जिन्हें कानून बनाने या बदलने का कोई अधिकार नहीं है, वे सामान्यतः नुकसान में रहते हैं. शिखर पर मौजूद व्यक्ति यदि जनता की भलाई के लिए काम भी करता है तो इसलिए कि उसके पीछे उसका कहीं बड़ा स्वार्थ निहित है. सुकरात को यह तर्क मंजूर नहीं है. उसके अनुसार ऐसा करना राज्य की नीयत को कठघरे में लाना तथा उसके औचित्य के आगे प्रश्न-चिह्न लगाना है, शिखर पर मौजूद लोग अपना स्वार्थ देखते हैं. परंतु वे ऐसा हमेशा करें, यह आवश्यक नहीं है. डॉक्टर अपनी प्रक्टिश केवल धन जुटाने के लिए नहीं करता. लोग सेवाभाव से भी चिकित्सक के पेशे को अपनाते आए हैं. यही बात शिक्षक पर भी लागू होती है. कलाकार भी लोक-कल्याण का भाव लेकर कला-साधना करता है.

सुकरात को विपरीत-कथन या व्याजोक्ति के लिए भी जाना जाता है. बहस के दौरान ऐसा ही विपरीत-कथन जैसा थ्रेचाइमच्स भी करता है. हालांकि वह अपने विचारों पर दृढ़ है और उसका यह कथन ‘शक्तिशाली सदा सही’ का ही विस्तार है. वह कहता है—‘अन्याय करना न्याय करने से बेहतर है.’ अपने तर्क को नई दिशा में बढ़ाता हुआ थ्रेचाइमच्स कहता है कि न्याय को शक्तिशाली की इच्छा या उसके लाभ तक सीमित कर देने से प्रत्येक व्यक्ति को उसका लाभ नहीं मिल पाएगा. बल्कि जो अन्यायी है वह अधिक प्रसन्न और संतुष्ट दिखाई पड़ेगा. इन परिस्थितियों में अन्याय अधिक सुखदायी और आश्वस्तिकारक हो सकता है. इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति केवल अपने स्वार्थानुरूप कार्य करेगा, जिसके लिए उसे अन्यायी मान लिया जाएगा. जबकि वह वही कर रहा है, जिसे करने में वह सक्षम है और जिसके द्वारा उसकी स्वार्थ-सिद्धि संभव है. कुल मिलाकर व्यक्ति का हित अन्यायी बनने में है. अपने तर्क की पुष्टि के लिए थ्रेचाइमच्स के पास अपने तर्क हैं. आप उन्हें कुतर्क सकते हैं; और चाहें तो वाग्जाल भी. लेकिन अन्य सोफिस्टों की भांति थ्रेचाइमच्स को भी अपनी इस कला पर गर्व था. अपने तर्क को आगे बढ़ाता हुआ वह कहता है—‘यदि न्यायी और अन्यायी दो व्यक्ति साथ-साथ व्यापार करें तो लाभ की गणना के समय यह कहना बहुत कठिन होगा कि न्यायी को अधिक लाभ हुआ हो. संभावना इसी की है जो अन्यायी है, उसने अधिक लाभ कमाया हो. व्यवहार में प्रायः देखा जाता है कि न्यायी व्यक्ति हमेशा घाटे में रहता है, जबकि अन्यायी ज्यादा ऐंठ ले जाता है. कराधान के समय भी अन्यायी कर-चोरी कर लाभ की अवस्था में रहता है. दूसरी ओर न्यायी व्यक्ति ईमानदारी बरतते हुए अधिक कराधान कर अपेक्षाकृत घाटे में रहता है. राज्य की ओर कोई सुविधा प्राप्त करनी हो तो अन्यायी आगे बढ़कर ज्यादा हाथ मार ले जाता है, जबकि न्यायी वहां भी पिछड़ जाता है. इन तर्कों से वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि न्यायी व्यक्ति से अन्यायी होना अच्छा है. थ्रेचाइमच्स के अनुसार, ‘न्याय बलवान का स्वार्थ’ अथवा ‘सबल की स्वार्थ दृष्टि है.’ जनसाधारण को न्याय सिवाय आत्मतुष्टि के, कुछ नहीं दे पाता. थ्रेचाइमच्स का तर्क यहीं समाप्त नहीं होता. वह आगे बढ़कर शासकीय पदों पर विराजमान व्यक्तियों की तुलना करते हुए कहता है कि अन्यायी व्यक्ति, न्यायी की अपेक्षा सदैव अधिक लाभ कमाते हैं. अन्यायी व्यक्ति न केवल अपने परिजनों को अधिक सुख दे पाता है, बल्कि न्यायी की अपेक्षा अधिक यश-लाभ का भी भागी बनता है. अन्याय जितना बड़ा हो, लाभ में रहने की संभावना भी उतनी ही बढ़ जाती है. छोटी-मोटी चोरी या लूट करने वाले चोर-डकैत कहे जाते हैं और समाज में अपमान और दंड के भागी बनते हैं. जबकि अपनी सेना और शक्ति के भरोसे यदि कोई नरेश दूसरे राज्य को लूटकर ले जाता है तो वह यश का भागी बनता है. चारणवृंद उसकी गौरव-गाथाएं लिखते हैं. इसलिए थ्रेचाइमच्स कहता है कि—‘हे सुकरात! पर्याप्त रूप से बड़े स्तर पर किया गया अन्याय, न्याय की अपेक्षा अधिक गौरवशाली, स्वच्छंद एवं यश-लाभ देने वाला कार्य है.’ उस समय थ्रेचाइमच्स न्याय के साथ-साथ लाभ को भी बहुत सीमित संदर्भों में ले रहा होता है. या यह कहें कि न्याय और लाभ को लेकर शक्तिशाली की जो दृष्टि है, वह उसी को आगे बढ़ाता है. आदर्श राज्य में लाभ का अभिप्रायः केवल मौद्रिक लाभ तक सीमित नहीं रहता. बल्कि उसके सारे कारोबार और संकल्प सामाजिक लाभ की दृष्टि के साथ रचे जाते हैं. राज्य व्यक्तियों से इतर संस्था नहीं है. वह अपने नागरिकों की सामूहिक इच्छा और संकल्पशक्ति का ही रूप है. राज्य की समस्त शक्तियां, संसाधन तथा लक्ष्य उसके नागरिकों के सामूहिक श्रम तथा इच्छा का सुफल होते हैं. इसलिए जो व्यक्ति ईमानदारी से अपना अपना काम करते हुए यथानिर्दिष्ट कराधान देता है, वह परोक्ष रूप में उन कार्यों को पूरा करने में भी सहभागी बनता है, जिनके लिए राज्य का गठन किया गया है. ऐसा व्यक्ति मौद्रिक अवदान के बदला सामाजिक लाभ के अपेक्षाकृत वृहत्तर संदर्भों में प्राप्त करता है.

थ्रेचाइमच्स का कथन सर्वथा गलत भी नहीं है. सामान्य धारणा यही है कि न्याय सदैव सबल का पक्ष लेता है. शक्तिशाली के आगे अदालतें भी झुक जाया करती हैं. रोजमर्रा के सामान्य अनुभवों से न्याय को लेकर एक दृष्टिकोण यह भी बनता है कि न्याय का जन्म दुर्बलों को शक्तिशाली वर्ग की लोभ, लालच और स्वार्थपरता से बचाने के लिए हुआ है. समाज में यदि सभी सबल हों अथवा सभी दुर्बल हो तो न्याय की कदाचित आवश्यकता ही न पड़े. इसलिए न्याय एक कृत्रिम व्यवस्था है, जो असमानताओं के अन्याय को पाटने के लिए जरूरी मानी गई है. उसे ‘भय की संतान’ या कमजोर का ‘रक्षाकवच’ भी कहा जा सकता है. प्रकृति में भी हम देखते हैं कि वहां जो शक्तिशाली है, वह सदैव लाभ की अवस्था में रहता है. इसलिए न्याय और कानून जैसी कृत्रिम व्यवस्थाएं कमजोर वर्ग की सुरक्षा और बेहतरी के लिए की गई हैं. वे शक्तिशाली वर्ग की मनमानी पर रोक लगाने तथा दुर्बल वर्ग को संरक्षण देने का काम करती हैं. ‘रिपब्लिक’ के अगले ‘संवाद’ में प्लेटो गलाकॉन के मुंह से कहलवाता है—‘जनसाधारण की मान्यता है कि न्याय को वास्तविक अच्छाई और शुभता का पर्याय कभी नहीं माना जा सकता. असल में वह ऐसी चीज है जिसको अन्याय न कर पाने की क्षमता के कारण स्वीकार्य माना जाता है.’ ग्लाकॉन के अनुसार न्याय की जरूरत कमजोर व्यक्ति की अन्याय न कर पाने की क्षमता तथा अन्यायी का सामना न करने की अक्षमता के कारण पड़ती है. दूसरे शब्दों में न्याय कमजोर की बैशाखी है, और शक्तिशाली की राह की बाधा. थ्रेचाइमच्स जहां न्याय को शक्तिशाली व्यक्तियों का हित स्वीकारता है, ग्लाकॉन उसे भय की भावना के कारण दुर्बल वर्ग के हित में बनाई कई अनिवार्यता की संज्ञा देता है. दोनों ही न्याय को बनावटी और दुर्बल वर्ग की रक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्था स्वीकारते हैं. दोनों का मानना है कि न्याय को अपने आप में नैतिक या शाश्वत सिद्धांत नहीं माना जा सकता. अपने पक्ष को प्रस्तुत करते हुए थ्रेचाइमच्स कुतर्क की सीमा तक चला जाता है. उसके कहने का आशय है कि मनुष्य अपनी शक्ति के बल पर जितना समेट सकता है, उतना समेट लेने का उसे अधिकार है और यह काम उसे करते रहना चाहिए. इसी में उसका सुख है. वह संतोष को दुर्बल व्यक्ति द्वारा किया गया समझौता मानता है. लोकतंत्र में भी जनता यदि शासन की ओर से मुंह मोड़ ले, पूरी तरह निर्वाचित प्रतिनिधियों पर छोड़कर शासन की ओर से उदासीन हो जाए तो लोकतंत्र के अल्पतंत्र में बदलने में देर नहीं लगती. ऐसे राज्यों के कानून केवल अल्पतंत्र के हितों का ही रक्षण करते हैं. लोकतांत्रिक सरकारें निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा संचालित होती हैं. उनमें निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में जो संख्या में अत्यल्प होते हैं—कानून बनाने के अधिकार होते हैं. संयोग से अल्पतंत्र में भी कानून बनाने का अधिकार सीमित वर्ग के अधीन होता है. इसलिए जनता की उदासीनता अथवा जनमत के बंटा होने पर शासन-शिखर पर मौजूद लोगों को मनमानी का अधिकार मिल जाता है. परिणामतः जनतंत्र के अल्पतंत्र में बदलते देर नहीं लगती.

थ्रेचाइमच्स के अनुसार द्वारा ‘शक्तिशाली सदा सही’ कहना अनुभव-सिद्ध निर्णय था. जिस दौर में सोफिस्ट विचारधारा पनपी थी, उस दौर के शासकों के लिए शक्ति की सबकुछ थी. यूनान ही क्यों, प्राचीन सभी सभ्यताओं में लगभग वही स्थिति थी. भारत में इसे धर्म कहा गया है; और धर्म के नाम पर सत्ता के प्रत्येक धत्तकर्म को श्रेय की कोटि में रख दिया जाता था. राम जब शंबूक को मृत्युदंड देता है, निर्दोष पत्नी को वनवास की सजा सुनाता है अथवा बालि की छिपकर हत्या करता है, तो तत्कालीन विधान उसे दोष नहीं देता. उल्टे उसका महिमा-मंडन करता है. चूंकि राम वर्चस्वकारी संस्कृति का महानायक है, इसलिए उसके दोष पर पर्दा डालने के लिए समर्थन में तर्क गढ़ लिए जाते हैं. धर्म-विजय कहकर शक्तिशाली के वर्चस्व को अधिमान्य ठहराया जाता है. महाभारत युद्ध को जीतने के लिए कृष्ण कदम-कदम पर छल करता है. उसकी हर चतुराई और छल का भी धर्म बताकर महिमामंडन कर दिया जाता है. अपने स्तर पर यही काम संस्कृति भी करती है. इसे विजेता संस्कृति का दर्प भी कह सकते हैं, जो इतिहास और सांस्कृतिक प्रतीकों की व्याख्या अपने स्वार्थ के अनुरूप करती रहती है. प्लेटो का ध्येय न्याय संबंधी प्रचलित अवधारणाओं पर विचार करते हुए उसके वास्तविक रूप की पहचान करना है. थ्रेचाइमच्स का तर्क तत्कालीन यूनानी प्रभुवर्ग की सामान्य मानसिकता को दर्शाता है. चर्चा के दौरान सवाल करने पर वह कहता है—‘न्याय असल में दूसरों के कल्याण से ही संबंधित है. शासकवर्ग नियम बनाता है, इसलिए वह सदैव लाभ की अवस्था में रहता है.’ किसी न किसी रूप में वह उन्हीं नियमों को मान्यता देता है जो उसके लिए हितकारी हैं. जो व्यक्ति उन नियमों को एकतरफा मानकर उसका विरोध करता है, उन्हें वह दंडित करता है; अथवा उपेक्षित कर हाशिये पर ढकेल देता है.’ उस समय वह बड़ी चतुराई से संस्कृति, समाज तथा कानूनी प्रावधानों की अपने पक्ष में व्याख्या करता है. न्याय की यह अवधारणा सुकरात की निगाह में उचित नहीं है. यदि शक्तिशाली द्वारा मनमाने ढंग से, केवल अपने हितों में काम करने को न्याय मान लिया जाए तो उसकी मूल अवधारणा ही खतरे में पड़ जाएगी. न्याय को परखने के लिए वह तीन कसौटियां बनाता है—‘कौन-सा कार्य बुद्धिमत्तापूर्ण है?’ ‘सबसे सुरक्षित रास्ता क्या है?’ तथा ‘जीवन में शुभत्व की स्थापना किस प्रकार संभव है?’ सुकरात के लिए इनमें तीसरा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है.

‘रिपब्लिक’ की शैली में दार्शनिक गांभीर्य है. प्लेटो न तो व्यंजना का सहारा लेता है, न ही अनपेक्षित संवेदना को बीच में हालात है. ध्रेचाइमच्स के माध्यम से वह सोफिस्टों की न्याय-संबंधी अवधारणा को हमारे सामने लाता है. सोफिस्ट शक्ति का आराधन करने वाले थे. लेकिन उनके राज्य बड़े नहीं थे. जब चारों और शक्ति का बोलबाला हो और लोग समाज की समन्वित शक्ति के बजाय अपनी-अपनी शक्ति पर नाज करते हों तो संघर्ष की स्थितियां बनेंगी ही. सो उस समय तक राज्य नगरीय सीमाओं में सिमटे हुए थे. थ्रेचाइमच्स शक्ति के सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण को हमारे सामने रखता है. सुकरात को माध्यम बनाकर प्लेटो उसका प्रतिवाद करता है. बताता है कि केवल शक्ति-आराधन से राज्य नहीं बनते. प्रत्येक समाज में ऐसे लोग होते हैं जो दूसरों के लिए समर्पण-भाव से जीना जानते हैं. डॉक्टर अपना पेशा दूसरों के भले के लिए चलाता है. अध्यापक ज्ञान बांटता है. दर्जी दूसरों के लिए वस्त्र सिलता है, कलाकर लोककल्याण की भावना के साथ चित्र बनाता है. ठीक है ये सब अपने-अपने कार्य के बदले में समाज से कुछ वसूलते हैं. डॉक्टर रोगी से फीस लेता है. अध्यापक को पढ़ाई के बदले वेतन मिलता है. इसी तरह दर्जी, कलाकार आदि भी अपने-अपने श्रम-कौशल के बदले समाज से कुछ न कुछ प्राप्त करते हैं. परंतु यह सब तो इसलिए आवश्यक है ताकि वे समाज को अपनी अनवरत सेवाएं प्रदान कर सकें. इससे उनके योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता. ‘रिपब्लिक’ में थ्रेचाइमच्स सुकरात के तर्कों के आगे शांत हो जाता है. परंतु जिस प्रकार वह शक्ति का पक्ष लेता है, उसके सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण का समर्थन करता है, उसका प्रभाव पीढ़ियों तक बना रहता है. थ्रेचाइमच्स के दृष्टिकोण का विस्तार उनीसवीं शताब्दी में, नीत्शे के दर्शन में नजर आता है. प्लेटो ने जहां दार्शनिक सम्राट की परिकल्पन की थी, नीत्शे ने महामानव की परिकल्पना की, जो प्लेटो के दार्शनिक सम्राट जैसा ही सर्वगुणसंपन्न, विराट व्यक्त्वि का स्वामी है. अपनी पुस्तक The genealogy of morals में वह  ‘दास नैतिकता’ और ‘स्वामी नैतिकता’ की बात करता है. उसके अनुसार स्वामी के नैतिक मूल्य शक्ति, सदाचरण, सज्जनता, अच्छे और बुरे को परखने की दृष्टि से देखे जा सकते हैं, जो दास की नैतिकता ‘समर्पण’, दयालुता, मानवता, करुणा और संवेदना से परखी जा सकती है.

प्लेटो मानता है कि सृष्टि में पूर्ण समानता असंभव है. जितने भी प्राणी हैं उनमें परस्पर अनेक भिन्नताएं हैं. प्रकृति में देखा जाता है कि शक्तिशाली कमजोर पर राज्य करता है. उसपर अधिकार जमाकर किसी न किसी रूप में उसके अधिकारों का हनन करता है. ऐसे में राज्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है. राज्य प्राकृतिक असमानताओं की खाई को पाटते हुए लोगों को समान धरातल पर लाने का प्रयास करता है. यही उसके गठन का उद्देश्य भी है. साधारण सोच यही है कि शक्तिशाली को दुर्बल पर राज्य करना चाहिए. वृहद सामाजिक हितों के लिए यह अत्यावश्यक है. सोफिस्ट चिंतक यही मानते थे. ‘जार्जियस’ नामक संवाद में प्लेटो स्वयं यूनानी विचारक केलीक्लिस के विचारों से सहमत नजर आता है. वह स्वीकारता है कि प्राकृतिक आधार पर असमानताओं की भरपाई के लिए शक्तिशाली को समाज के कमजोर पक्षों का समर्थन, प्रोत्साहन करते हुए शासन करना चाहिए. इसी से प्राकृतिक स्तर पर गैरबराबरी को कम किया जा सकता है. सुकरात वहां भी प्रतिवादी के रूप में उपस्थित हो जाता है. वह उसी प्रश्न को दोहराता है, जो उसने थ्रेचाइमच्स से किया था कि श्रेष्ठतम के चयन की कसौटी क्या हो? शक्ति या फिर बुद्धिमत्ता? केवल ताकत के भरोसे शासन करना संभव नहीं है. जनता की सामूहिक शक्ति किसी भी शक्तिशाली शासक के कुल सैन्य-सामर्थ्य से अधिक होती है. प्रजा ही कभी समर्थन तो कभी निष्क्रिय रहकर राज्य के सर्वसत्तासंपन्न होने का भ्रम पैदा करती है. युद्ध तक में शारीरिक बल से अधिक बुद्धिबल की आवश्यकता पड़ती है. दूसरे शारीरिक बल को श्रेष्ठता का पर्याय मान लेना प्रकारांतर में प्राकृतिक न्याय को सामाजिक न्याय मान लेने जैसा ही है. यदि मान लिया जाए कि शक्ति ही सबकुछ है तो उसके आधार पर प्रतिफल की अपेक्षा से कौन रोक सकता है. सुकरात के अनुसार केलीकिल्स न्याय की मूल-भावना को पकड़ने में असमर्थ है. केवल शक्ति को न्याय का पर्याय बताकर वह अन्याय का पक्ष लेने की गलती कर जाता है. पहले चरण की बहस बेनतीजा समाप्त होती है. उससे हम यह तो जान लेते हैं कि ‘न्याय क्या नहीं है’, परंतु यह नहीं जान पाते कि ‘न्याय वास्तव में क्या है?’

© ओमप्रकाश कश्यप

एक ‘राष्ट्रवादी’ फैसला

सामान्य
  • राष्ट्रवाद महज धारणा है. उससे हम यह मान लेते हैं कि कोई एक देश दुनिया के  बाकी देशों से मात्र इस कारण श्रेष्ठतर है, क्योंकि हमारा  जन्म उसमें हुआ है.                                                               जार्ज बनार्ड शा.

  • कल्पना कीजिए कि (आपका)कोई देश नहीं है, जिसके लिए मारा या मरा जाए. यह सोच पाना बहुत कठिन भी नहीं है. सोचिए कि कोई धर्म भी नहीं है. सब शांतिपूर्वक जीवनयापन कर रहे हैं. आप कह सकते हैं कि मैं कोरा स्वप्नजीवी हूं. लेकिन ऐसा केवल मैं ही नहीं हूं. मुझे उम्मीद है  कि एक दिन तुम भी मेरे साथ खड़े नजर आओगे. उस दिन यह दुनिया एक हो जाएगी.                                    जॉन लिनन.

पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय ने सिनेमाघरों में राष्ट्रीय गान को अनिवार्य कर दिया. पता चला कि मामला 13 वर्षों से लटकता आ रहा था. न्यायालय को लगा कि अब और टालना अनुचित होगा. क्यों लगा? क्या इसलिए कि केंद्र में भाजपा की सरकार है? किसी और दल की सरकार होती तो फैसला कुछ और आता! या फिर कुछ वर्ष और लटका रहता! संभवतः कोर्ट ने सोचा हो कि राष्ट्रप्रेम का पाठ स्वयंभू राष्ट्रवादियों की सरकार के अनुशासन में आसानी से पढ़ाया जा सकता है. सचाई चाहे जो हो, महत्त्वपूर्ण यह जानना है कि अदालत को अचानक क्यों लगा कि लोगों में राष्ट्रीयता की भावना घट रही है. वह भी स्वयंभू राष्ट्रवादियों की सरकार तथा वाग्वीर प्रधानमंत्री के रहते. बात-बात पर भारत-माता का जयकारा लगाने वाले ‘आर्यपुत्र’ लोगों में राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा जगाने में असमर्थ क्यों हुए, जो न्यायालय को हस्तक्षेप के लिए आगे आना पड़ा?

फैसला देश की सबसे बड़ी अदालत का है तब कुछ हकीकत तो होगी. पेंच यह है कि राष्ट्रप्रेम की क्लास लगाने के लिए सिनेमाघरों को चुना गया है, जहां जाने वाले दर्शकों में बड़ी संख्या बेरोजगारों, रिक्शाचालकों और प्रवासी मजदूरों की होती है. घर-परिवार से दूर, कभी मनोरंजन की चाहत में तो कभी यूं ही, परिजनों की याद से छुटकारा पाने के लिए अधिकांश वही सिनेमाघर जाते हैं. कुछ इसलिए भी जाते हैं क्योंकि उनके पास रात बिताने का ठिकाना नहीं होता. देर रात का शो देखकर लौटने तक सड़कें सुनसान होने लगती हैं. आवारा कुत्ते थककर सड़कों के किनारे, दुकान के थड़ों के आसपास ठिकाना तलाशने लगते हैं. मौका देखकर वे भी जहां सिर समाए, अगली सुबह जिंदगी से जूझने का संकल्प लेकर लुढ़क जाते हैं. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो बड़े लोग सिनेमाघर जाते नहीं, सिनेमा खुद उनके बीच चला जाता है. जब भी मन करता है, वे सिने कलाकारों को जन्मदिवस या किसी और बहाने आंगन में नंचवा लेते हैं. जो और बड़े हैं उनके घर ही में सिनेमाघर बने हैं. फैसले से यह साफ नहीं हुआ कि यह कानून क्या ‘एंटीला’ और उस जैसे प्रासादों में बने सिनेमाघरों पर भी लागू होगा? शायद नहीं. इसलिए कि हमारे यहां खुद को राष्ट्रभक्त सिद्ध करने की जिम्मेदारी प्रायः जनसाधारण की होती है. अमीर और वीवीआईपी की नहीं. उनकी राष्ट्रभक्ति तो स्वयंसिद्ध होती है. एहसान तले दबा मीडिया दिन-रात उनके महिमा-मंडन में जुटा रहता है. राष्ट्रप्रेम बलिदान मांगता है. सो बेघर, अकेलेपन के शिकार, बेरोजगार लोगों को राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाते रहना जरूरी है. कदाचित इसीलिए अदालत ने दखल दिया है.

आप कह सकते हैं कि अदालत का फैसला सभी के लिए है. मैं कहूंगा गलत. यदि सभी के लिए होता तो शुरुआत संसद और विधान-सभाओं से होती. हर उस कल-कारखाने से होती जिसे राष्ट्र-निर्माण का मंदिर बताया जाता है. साथ ही स्कूल, कॉलेज, क्रिकेट और खेल के मैदानों तथा हर उस सभा से भी होती, जहां सार्वजनिक उपस्थिति हो. सिनेमाघर तो व्यक्ति हल्के-फुलके मूड के साथ जाता है. कभी खुद को भुलाने, तो कभी भूले हुए को याद करने के लिए. अगंभीर मनस्थिति में राष्ट्रगान में हिस्सा लेने का औचित्य? क्या इससे राष्ट्रप्रेम जगाने में सचमुच सफलता मिलेगी? कल्पना कीजिए पर्दे पर राष्ट्रगान के तुरंत बाद हेलन के डांस या सनी लियोनी के रोमांस का सीन आएगा तो उनमें से कौन-सा दिमाग पर देर तक प्रभावी  रहेगा. या फिर राष्ट्रगान समाप्त होते ही पर्दे पर सोडे के बहाने शराब का विज्ञापन आया तो राष्ट्रगान का असर कितनी देर टिक पाएगा? कुल मिलाकर हाल का निर्णय राष्ट्रीय भावनाओं को धर्म में ढाल देने जैसा है, जिसमें पुजारी दुनिया के सभी कारोबार आरती, पूजा-अर्चन के बीच तथा आगे-पीछे चतुर सौदागर की तरह निपटाता है. राष्ट्रप्रेम धर्म न होकर, नागरिक मात्र का अपने राष्ट्र के प्रति नैतिक एवं संवैधानिक कर्तव्य है. इसमें राज्य की भूमिका उत्प्रेरक की होनी चाहिए. कहने की आवश्यकता नहीं कि राज्य के स्वनामधन्य कर्ता-धर्ता अपने स्वार्थपूर्ण आचरण द्वारा इस काम में चूकते रहे हैं. ऐसे में केवल सिनेमाघरों में राष्ट्रीयगान की अनिवार्यता राष्ट्रप्रेम के वास्ते निर्धारित कानूनी कर्मकांड जैसी ही है. राष्ट्रगान की गरिमा तभी है जब परिवेश अनुकूल हो. व्यक्ति उदात्त मन से उसके साथ जुड़ा हो. साथ ही राज्य अपने प्रत्येक नागरिक के साथ ईमानदार एवं निष्पक्ष अभिभावक जैसा व्यवहार करता हो. हमारी संस्कृति कर्मकांड प्रधान सही, परंतु कोरे कर्मकांडों से राष्ट्रप्रेम नहीं जगाया जा सकता. राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान आवश्यक है. प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य कि अपने देश और देशवासियों पर गर्व करे. मगर इसके लिए सिनेमाघर उपयुक्त स्थान नहीं हैं. यदि न्यायालय उन्हें उपयुक्त मानता है, तो क्रिकेट मैच की शुरुआत भी राष्ट्रगान से होनी चाहिए. क्योंकि दोनों ही मनोरंजन का माध्यम हैं; तथा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दोनों ही बाजारवादी अर्थव्यवस्था का हित साधते हैं.

सिनेमा हाल में राष्ट्रगान को जरूरी बताकर उच्चतम न्यायालय में अप्रत्यक्ष रूप से यह मान लिया है कि जो लोग सिनेमाघर जाते हैं, वे राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति उदासीन होते हैं. जबकि ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जब किसी गरीब ने लालच में पड़कर देशद्रोह जैसा धत्तकर्म किया हो. सच तो यह है कि जो लोग घर ही में सिनेमाघर बनवाने का सामर्थ्य रखते हैं, वे प्रतीक की बात दो दूर, खुद को राष्ट्र का पर्याय माने रहते हैं. सीना तान कर प्रधानमंत्री के फोटो का उपयोग अपने प्रॉडक्ट के विज्ञापन के लिए करते हैं. एहसानमंद मीडिया उसे बार-बार दिखाता है. यहां सिनेमा की उपयोगिता से इंकार नहीं है. वह सशक्त माध्यम है. उसका उपयोग राष्ट्रप्रेम जगाने के लिए किया जा सकता है. अच्छा सिनेमा अनेक राष्ट्रहित साध सकता है. उसके लिए सिनेमाघर में राष्ट्रगान आवश्यक नहीं है. विशेषकर भारत में जहां अधिकांश फिल्में फार्मूलाबद्ध होती हैं. सस्ते मनोरंजन के अतिरिक्त उनकी कोई सार्थकता नहीं होती, गाहे-बगाहे जो सामाजिक असमानता तथा उसकी बाजारवादी प्रवृत्तियों का समर्थन करती हैं—वहां थर्ड ग्रेड सिनेमा राष्ट्रीयताबोध जगाने के किसी भी प्रयास को मजाक में बदल सकता है. समस्या यह है कि सरकार हो या अदालत, ऐसे मामलों में पूर्वाग्रहों से सर्वथा मुक्ति असंभव होती है. यह मान लिया गया है कि राष्ट्रधर्म और राष्ट्रीयताबोध, दोनों की रक्षा करना केवल जनसाधारण की जिम्मेदारी है. इन परिस्थितियों में राज्य की भूमिका पेशेवर प्रबंधक जैसी होती है, जो कराधान के बदले नागरिकों को सुरक्षा और सुविधा उपलब्ध कराता है.

जनसाधारण काम की बातें प्रायः बड़े लोगों के आचरण से सीखता आया है. ‘महाजने येन गतः सः पंथा.’—जिस रास्ते पर महान लोग जाएं उसी का अनुसरण उत्तम है. यही उसे सिखाया जाता है. यही सीख उसके गीत-संगीत, किस्से-कहानियों, कहावतों और बड़े-बूढ़ों के अनुभवों के रूप में सामने आती है. उसे राष्ट्रगान का महत्त्व समझाने के लिए सिनेमाघर में पर्दे के सामने खड़ा करने की आवश्यकता नहीं है. शिखर पर मौजूद नेतागण, बड़े अधिकारी, पूंजीपति, व्यवसायी यदि अपने आचरण को राष्ट्रीयता की भावनाओं के अनुकूल ढाल लें तो जनसाधारण को अलग से राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. वर्षों पहले इसी देश के एक नेता ने सिर पर टोपी और लंगोटी पहननी शुरू की थी, तब अच्छे-खासे घरों के उच्च शिक्षा प्राप्त युवा सूट-बूट छोड़ टोपी और लंगोटी में आ गए थे. और उस समय तक न तो देश स्वतंत्र हुआ था, न ही राष्ट्रगान बना था. लेकिन राष्ट्रीय भावनाओं से पूरा देश ओतप्रोत था. पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण गूंजते नारे  स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े सभी में यह एहसास जगा देते थे कि हम सब एक हैं. आजादी के बाद संकट की घड़ी में एक ठिगने कद के प्रधानमंत्री ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन व्रत रखने आवाह्न किया. उस समय न तो टेलीविजन था, न इंटरनेट, न ही बड़े-बड़े सुरसामुखी मीडिया घराने. साउंड ट्रैक का जमाना भी नहीं था. फिर भी उस नेता के कंठ से निकली आवाज को देश के नागरिकों ने दूर-दराज तक सुना था. फिर जैसे-जैसे जहां तक भी संदेश पहुंचा, लोगों ने सप्ताह में एक दिन व्रत रखने का नियम बना लिया था. आखिर क्यों? इसलिए कि वह जैसा था, वैसा ही दिखता था. किसी को उसकी ईमानदारी पर संदेह नहीं था. उसके पास केवल तीन-चार जोड़ी वस्त्र होते थे. पूरे वर्ष वह उन्हीं से काम चलाता था. रोज पांच-पांच बार वस्त्र बदलकर ‘फकीरी’ का दावा नहीं करता था. आज के नेता आत्ममोह को आत्मविश्वास मानते हैं. बड़बोले भाषणों से जनता के दिलों पर छाने का भ्रम पाले रहते हैं. पूंजी, प्रचार और पाखंड के भरोसे राजनीति करते हैं. ऐसे नेता जनता पर भरोसा करने का साहस नहीं जुटा पाते. न ही जनता उनपर विश्वास करती है. इसलिए राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाने के लिए न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा है.

क्या किसी को राष्ट्रभक्ति का पाठ सचमुच पढ़ाया जा सकता है? कुछ भाव मन में स्वतः उमड़ते हैं. लोगों को सिखाए नहीं जा सकते. जैसे कि प्रेम करना. हम किसी को इस बात के लिए विवश नहीं कर सकते कि वह हमारी बताई वस्तु या प्राणी से प्रेम करे. प्रेम करने के लिए जरूरी है कि व्यक्ति जिससे प्रेम करे, वह उसके किसी अभाव की पूर्णता का एहसास कराती हो. जमीन किसान का पेट भरती है. इसलिए किसान उससे प्रेम करता है. मां का दर्जा देता है. 1857 में राष्ट्रीय भावनाओं के प्रस्फुटन के मूल में कोई नेता नहीं था. उस समय तो देश में एक-राष्ट्र की भावना का उदय भी नहीं हुआ था. केवल सामूहिक अस्मिताबोध था. जिसमें प्रत्येक सैनिक खुद को नेता मान बैठा था. अपने उत्साह के बूते उन्होंने पूरे उत्तर भारत को अंग्रेजों के विरुद्ध जंग के लिए खड़ा कर दिया था. वह संघर्ष नाकाम हुआ, इसलिए कि इतने बड़े आंदोलन को संभालने के लिए जैसी मानसिक तैयारी चाहिए, वह उनके पास नहीं थी. लेकिन वह नाकाम संघर्ष भी देश में राष्ट्रीयताबोध जगाने में सफल सिद्ध हुआ.

ऐसा नहीं कि न्यायालय का निर्णय एकदम हवा से पैदा हुआ है. आजादी के बाद से ही यह देश भीतरी और बाहरी चुनौतियों से जूझ रहा है. पिछले कुछ दशकों से चुनौतियां तेजी से बढ़ी हैं. इस फैसले के मूल में ऐसी कई बातें हैं जो देश की आंतरिक उथल-पुथल को सामने लाती हैं. उत्तर में कश्मीर, पूर्वोत्तर के आतंकवाद पीड़ित राज्यों को छोड़ दें तो भी बिहार, झारखंड, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश जैसे राज्य हैं, जहां भारत नामक राज्य के विरुद्ध आवाजें उठ रही हैं. आप उन्हें ‘नक्सलाइट’ कहें, ‘चरमपंथी’ कहें या कुछ और—वे निर्विवाद रूप से भारतीय गणराज्य के लिए चुनौती बने हैं. इसका प्रमुख कारण लोकतांत्रिक समाधान के प्रति अविश्वास को जन्म लेना है. विडंबना यह है कि समस्या के कारणों को समझे बिना मीडिया उन्हें केंद्र के विरुद्ध चुनौती के रूप में पेश करता आया है. जबकि राज्य के विरुद्ध हथियार उठाने का अभिप्राय हमेशा यह नहीं होता कि विद्रोहियों को अपनी राष्ट्रीय पहचान से शिकायत है. प्रायः वह राज्य और नागरिक समूहों के बीच बढ़ते अविश्वास को दर्शाता है. इसलिए इस प्रकार की समस्याओं का समाधान राष्ट्रीयता की सीमा में, लोकतांत्रिक सूझबूझ के साथ किया जाना चाहिए. विडंबना है कि भारतीय राज्य की ओर से ऐसी कोई रचनात्मक कोशिश नजर नहीं आती. विकास का मतलब अर्थव्यवस्था को पूंजीपतियों, जिनकी गिद्ध-दृष्टि देश के संसाधनों पर है—के हवाले कर देने तक सीमित रह गया है. मुनाफे की बंदरबांट, लूट और उसके कारण बढ़ती आर्थिक विषमता सामाजिक असंतोष का मूल कारण है. 1857 के संग्राम में जितने लोग अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार लेकर निकले थे, उनसे कहीं बड़ी संख्या आज उन लोगों की है जो ‘नक्सलाइट’ या ‘चरमपंथी’ के रूप में राज्य के विरुद्ध संघर्ष छेड़े हुए हैं. अपनी असफलता को राज्य कई बार राष्ट्रभक्ति के नाम पर दबाने की कोशिश करता है. उस समय वह खुद को राष्ट्र के पर्याय के रूप में पेश करता है. परिणामस्वरूप राजतंत्र के विरुद्ध उठी आवाजें, राष्ट्र-राज्य के विरुद्ध जंग मान ली जाती हैं. जेएनयू मामले में कन्हैया कुमार के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था.

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक बेहतरीन कविता, देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता.’ बहुत कुछ कह देती है—‘इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा/कुछ भी नहीं है/न ईश्वर/न ज्ञान/न चुनाव….जो विवेक/खड़ा हो लाशों को टेक/वह अंधा है/जो शासन/चल रहा हो बंदूक की नली से/हत्यारों का धंधा है.’ राष्ट्रभक्ति के नाम पर नारेबाजी करने वाले लोगों को भी समझना चाहिए कि राष्ट्र का अभिप्राय नदी-नाले, सागर, पहाड़, विशाल भूक्षेत्र या कल-कारखाने तक सीमित नहीं है. न ही वह केवल इतिहास, संस्कृति और सीमाओं के बोध का नाम है. यह बोध तो हम भारतवासियों को हजारों वर्षों से रहा है—उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रेः चैव दक्षिणम्/वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र संततिः‘(विष्णुपुराण). धर्मशास्त्रों की दृष्टि से हम अलबेले हैं. यदि इन्हीं से सच्ची राष्ट्रभक्ति उत्पन्न होती तो हम संभवतः कभी गुलाम न होते. कोई भी देश अपने नागरिकों से बनता है. उनके सामूहिक सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक बोध से बनता है. देश से प्रेम करने के लिए एक-दूसरे से प्रेम और परस्पर भरोसा करना आवश्यक है. सच्ची देशभक्ति सामाजिक एकता और विश्वास में बसती है. उसके लिए आवश्यक है कि लोगों के मन एक हों. सब एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हों; तथा सुख-दुख में साझा करने को सदैव तत्पर रहते हों.बावजूद इसके राष्ट्रीयबोध की मूल-भूत अनिवार्यता के रूप में जिस चीज को हम आरंभ से ही उपेक्षित करते आए हैं, वह है सामाजिक एकता और समानता. सत्ता-शिखर पर बैठे मुट्ठी-भर लोग अपने ही समाज के बहुसंख्यक लोगों का, उन्हें उनके न्यूनतम मानवीय अधिकारों से भी वंचित कर, कभी धर्म तो कभी जाति के नाम पर, शोषण करते आए हैं. नतीजा यह हुआ कि भारतीय समाज आरंभ से ही छोटे-छोटे वर्गां में बंटा रहा. जिनके पास शक्ति थी, साधन थे, उनके अपने स्वार्थ प्रबल थे. उसके लिए वे हर आक्रमणकारी से समझौता करते रहे. और जो समाज के लिए कुछ कर सकते थे, जिनके पास संख्याबल था. जो ईमानदार और मेहनती थे, उन्हें लगातार दुत्कार कर, उनके मनोबल को खंडित किया जाता रहा. परिणामस्वरूप इतना बड़ा देश इतिहास के कुछ हिस्सों को छोड़कर शायद ही कभी बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा हो. छोटे-छोटे राज्यों के बीच वर्चस्व का संघर्ष हमेशा रहा है. बाहर के मुल्कों में देश की छवि यदि बनी तो बौद्ध धर्म के कारण, जो विभिन्न समुदायों के बीच एकता और समानता का संदेश लेकर दुनिया-जहान तक पहुंचा था. उसका संदेश था कि व्यक्ति का चरित्र और सदाचरण उसे लोक-प्रतिष्ठित बनाता है.

कोरा राष्ट्रवाद वर्चस्वकारी सत्ताओं का सबसे बड़ा पाखंड है. नागरिकों को भुलावे में रखने के लिए स्वार्थी सत्ताएं सदैव यह चाहती हैं कि लोग राज्य को, जो महज राजनीतिक संस्था है, राष्ट्र का पूरक और पर्याय माने रहें. ताकि वे अपने प्रत्येक फैसले को राष्ट्र का निर्णय बताकर, उसे बहस और आलोचना के दायरे से बाहर रख सकें. वे हमेशा यह समझाने में लगी रहती हैं कि लोगों के हित केवल और केवल उन्हीं के मार्गदर्शन में सुरक्षित हैं. उनकी कोशिश राष्ट्रभक्ति को धर्म बना देने की होती है. कदाचित इसीलिए सैमुअल जानसन ने देशभक्ति को ‘बदमाशों का अंतिम आश्रय’(Patriotism is the last refuge of a scoundrel) माना है. थोड़े परिवर्तन के साथ ऑस्कर वाइल्ड ने भी दुहराया था, ‘देशभक्ति शातिरों का गुण है’(Patriotism is the virtue of the vicious). राष्ट्रीयताबोध स्वतंत्र नागरिक चेतना में बसता है. परिपक्व राष्ट्रीयताबोध के लिए आवश्यक है कि लोग अपने अधिकारों तथा दूसरे के अधिकारां का भी सम्मान करें. इसके लिए राज्य का स्वयंप्रभुता संपन्न होना आवश्यक नहीं है. परतंत्र राज्य में भी मुखर राष्ट्रीयताएं पनपती रही हैं. भारतीय स्वाधीनता आंदोलन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है. सोवियत संघ में अनेक राज्य प्रभुतासंपन्न राज्य नहीं थे. परंतु उनके नागरिकों के हृदय मैं तीव्र राष्ट्रीयताबोध हिलोर मारता था. सोवियत राज्य ने उसे उपेक्षित रखा, जिसका दुष्परिणाम उसके विघटन के रूप में सामने आया. राष्ट्रीयताबोध के मूल में सांस्कृतिक चेतना और एैक्य-भाव अनिवार्य है. क्या भारतीय समाज के बारे में ऐसा कहा जा सकता है?

विद्वान भारत की सांस्कृतिक-सामाजिक एकता की निरंतर दुहाई देते रहे हैं. इसके लिए वे महाकाव्यों और होली, दीपावली जैसे त्योहारों का नाम लेते हैं. तर्क देते हैं कि महाकाव्य देश के सभी भागों में पढ़े-पढ़ाए जाते हैं, होली, दीपावली जैसे त्योहार सभी जगह प्रचलित हैं, इसलिए यह देश भू-सांस्कृतिक इकाई यानी एकराष्ट्र है. जबकि महाकाव्यों में, होली, दिवाली जैसे त्योहारों के मूल में जो विश्वास है, वह स्वयं विरोधाभासी है. लोकतंत्र की कसौटी पर न तो महाकाव्य खरे हैं, न ही इन त्योहारों की अंतर्कथाएं. किसी न किसी रूप में वे सभी धर्म-केंद्रित राजतंत्र का समर्थन करते हैं. जिसमें निर्णय ऊपर से थोपे जाते हैं. लोकतांत्रिक विमर्श के लिए वहां कोई गुंजाइश नहीं होती. इसलिए उसके सहारे विकसित संस्कृति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में सामाजिक-सांस्कृतिक असमानता का समर्थन करने लगती है. धर्म और राष्ट्रवाद की कई विशेषताएं एक-दूसरे से मेल खाती हैं. दोनों में एक अपेक्षाकृत आधुनिक अवधारणा है. दूसरी लगभग तीन सहस्राब्दी पुरानी. दोनों की ही खूबी है कि वे व्यक्ति-स्वातंत्र्य की दुश्मन हैं. उनके चयन में मनुष्य का अपना कोई योगदान नहीं होता. अधिसंख्यक मामलों में दोनों जन्म के साथ थोप दी जाती हैं.

राष्ट्रवाद का नकार राष्ट्रप्रेम का नकार नही है. वह राष्ट्रभक्ति के नाम पर मनमानी, उग्रता, पक्षपात तथा एकाधिकार की भावना का नकार है. राज्य की असफलता है कि वह अपने नागरिकों को यह विश्वास दिलाने में नाकाम रहा है कि वह संकट में उसके साथ है. इससे सामाजिक अंतर्द्वंद्वों में वृद्धि हुई. हताश राज्य शांति-व्यवस्था के नाम पर कानून की ताकत का तरह-तरह से इस्तेमाल करता है. हाल का अदालती निर्णय भी इसी दिशा में जाता है. इन दिनों भारत में झंडा उठाऊ राष्ट्रवाद का बोलबाला है. उसके नाम पर शोर-शराबा वे लोग कर रहे हैं जिनके पास ताकत है. साथ में सत्ता का समर्थन. सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा करते हुए जो समाज को अर्से से अपनी तरह हांकते आए हैं. ऐसे लोगों का ‘राष्ट्रवाद’ आवश्यक नहीं कि लोकतंत्र और नागरिकता के मानकों के अनुरूप हो. छदम् राष्ट्रवाद का झंडा उठाए वे दिखाना चाहते हैं कि वे बाकी लोगों से बेहतर हैं. उसमें समानता और स्वतंत्रता से अधिक बल और आक्रामकता प्रभावी होते हैं. यदि राज्य ऐसे ही राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित करता है तो स्थिति उन लोगों के प्रति अन्यायकारी हो जाती है, जिनका राष्ट्रीयताबोध समानता, नैतिकता, स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र जैसे मूल्यों से बना है. यही कसौटी देशप्रेम पर भी लागू होती है. देशभक्ति का अभ्रिप्राय राज्य की प्रत्येक गतिविधि को गर्व की निगाह से देखना नहीं है. इसके लिए आलोचनात्मक विवेक अनिवार्य है. राष्ट्र के प्रति अनुराग तभी तक उचित है, जब तक नागरिकों को यह भरोसा हो कि उनका राष्ट्र समानता, स्वतंत्रता और मानवीय आदर्शों का सम्मान करते हुए उन्हें पाने के लिए सतत प्रयत्नशील है. यदि उन्हें लगता है कि उनका राष्ट्र मानवीय आदर्शां को भुला चुका है, तो नागरिकों को ऐसे राष्ट्र से शिकायत करने, यहां तक कि उससे घृणा करने अधिकार भी प्राप्त होता है. यह जिम्मेदारी राज्य की है कि वह ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न न होने दे, जिससे नागरिकों को अपने ही राष्ट्र-राज्य के विरोध हेतु मुखर होना पड़े.

—ओमप्रकाश कश्यप

 

  1. Imagine there’s no countries/It isn’t hard to do/Nothing to kill or die /And no religion too/Imagine all the people/Living life in peace You may say that I’m a dreamer/But I’m not the only one/I hope someday you’ll join us/And the world will be as one.―John Lennon, Imagine.
  2. उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रेः चैव दक्षिणम्।

वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र संततिः।।

गायंति देवाः किल गीतिकानि, धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पद—मार्गभूते, भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।।

समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले।

विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे।।

   (वह देश जो महासागर के उत्तर में बसा है, जिसके दक्षिण में हिमगिरि विद्यमान है. उसी का नाम भारतवर्ष है, वहां बसनेवाले भरत के वंशज हैं/देवता गीत गाते हैं कि स्वर्ग और अपवर्ग की मार्गभूत भारत भूमि के भाग में जन्मे लोग देवताओं की अपेक्षा भी अधिक धन्य हैं।/हे देवी पृथ्वी! आप समुद्र रूपी वस्त्रों को धारण करने वाली हैं, पर्वतरूपी स्तनों से सुशोभित हैं तथा भगवान विष्णु कि आप पत्नी हैं, आपको पैरों से स्पर्श करने के लिए मैं क्षमा चाहता हूं. विष्णुपुराण.)