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न्याय, न्याय की परंपरा और समाज : दो

सामान्य

सोशल कांट्रेक्ट (सामाजिक संविदा) की अवधारणा

न्याय के संदर्भ में हॉब्स के विचारों को हम प्राचीन धर्माधारित विधानों तथा आधुनिक गणतांत्रिक राजनीतिक दर्शन के संधिस्थल के रूप में भी देख सकते हैं. हॉब्स ने परिवर्ती विचारकों की पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया. ‘सामाजिक संविदा’(सोशल कांट्रेक्ट) का उसका विचार जान लॉक, रूसो, डेविड ह्यूम, इमानुएल कांट, जैरमी बैंथम आदि के राजनीतिक दर्शन की पृष्ठभूमि बना. अपने युगांतरकारी लेखन द्वारा उसने परंपरा एवं आधुनिकता के बीच तालमेल स्थापित करने की कोशिश की. फलस्वरूप न्यायव्यवस्था जो पहले नियतिवादी थी, उसे मानवीय स्वतंत्रता, समानता एवं अधिकारिता के संदर्भ में देखापरखा जाने लगा. वह बड़ा परिवर्तन था, जिससे आधुनिक गणतांत्रिक राज्यों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ. ध्यातव्य है कि ‘सामाजिक संविदा’ यानी सामाजिक करारनामे का विचार हॉब्स की मौलिक स्थापना नहीं थी. इसके बीजतत्व भारतीय चिंतन परंपरा सहित प्लेटो और अरस्तु के दर्शन में पहले से ही मौजूद थे. सभी ने नागरिक, समाज और राज्य के मध्य सामंजस्य बनाए रखने पर जोर दिया था. यहां तक कि राजा की नियुक्ति भी निःशर्त न थी. उसके पीछे सामाजिक सोद्देश्यता और करार की भावना आरंभ से ही जुड़ी थी. आरंभिक समाजों में राजा मनोनीत किया जाता था. उसका प्रथम कर्तव्य होता था, प्रजा हित को अपना हित समझकर कार्य करना. अथर्ववेद में कहा गया है—

प्रजा के सुख में ही राजा का सुख निहित है। प्रजा के कल्याण में ही राजा का कल्याण संभव है।’1

बीच में शताब्दियों लंबा दौर ऐसा भी आया जब ‘राजा’ नामक सत्ता को पूर्णतः दैवीय मान लिया गया. व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा विकसित हुई तो भौतिक संपदा की भांति राज्य को भी उत्तराधिकार में सौंपा जाने लगा. अयोग्य प्रतिनिधियों के कंधों पर शासनभार आने से राजनीति का स्तर गिरा. अनुबंध के आधार पर राजन्य की स्थापना के संबंध में प्राप्त प्राचीन उल्लेखों के अध्ययन से पता चलता है कि सभ्यता के आरंभिक दिनों में ‘राजा’ कोई विशेषाधिकार संपन्न संस्था नहीं थी. उसकी स्वीकार्यता लोगों की सहमति पर निर्भर थी. उसे वही अधिकार प्राप्त थे, जो कार्यों के निष्पादन के लिए आवश्यक माने जाते थे. उस विधान में समूह या समाज अपने निर्वाचित प्रतिनिधि से अधिक शक्तिशाली होता था. यह व्यवस्था हजारों साल तक कायम रही. इसमें बदलाव धर्म के आने के बाद उस समय सामने आया, जब राज्याश्रय में पलने वाले पुरोहितों और पंडितों ने निहित स्वार्थ के लिए राजा को पृथ्वी का स्वामी और सर्वेसर्वा घोषित करना आरंभ किया. धीरेधीरे धर्म, राजनीति और अर्थसत्ता का ऐसा गठजोड़ बनता गया, जो न केवल बुद्धि बल्कि संसाधनों के मामले में भी आगे था. उसने जनसाधारण को एकदम किनारे कर दिया. इसमें सबसे बड़ी भूमिका धर्म की रही.

राजा की नियुक्ति के संबंध में प्राचीनतम उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण(1/14) में मिलता है. उसके अनुसार देवताओं और राक्षसों का युद्ध चल रहा था. देवता पराजय की कगार पर थे. उस समय देवताओं ने विचार किया कि एक राजा होना चाहिए, जो उनकी सेना का नेतृत्व कर सके. तब ‘इंद्र’ को देवसम्राट मनोनीत किया गया. इस कहानी के अनुसार राजा नामक संस्था की उत्पत्ति सैन्य उद्देश्य से हुई. इससे मिलतीजुलती कहानी आगे चलकर ‘तैत्तीरीय उपनिषद’ में मिलती है. तदनुसार देवासुर संग्राम में पराजय सम्मुख देख देवताओं ने मदद के लिए प्रजापति से प्रार्थना की. तब उन्होंने प्रसन्न होकर अपने पुत्र इंद्र को देवताओं की मदद के लिए भेजा. प्रजापति के अनुसार, ‘इंद्र अपेक्षित कार्य के निष्पादन हेतु सर्वाधिक सक्षम, शक्तिशाली, स्वस्थ, सर्वोत्तम तथा सभी तरह से पूर्ण था.’ ‘शुक्रनीतिसारदोनों की अपेक्षा काफी बाद की रचना है. उसमें लिखा है कि ‘जब सभी भयाकुल होकर इधरउधर दौड़ने लगे, जब विश्व में कोई किसी का स्वामी नहीं था, तब विधाता की ओर से नृप की नियुक्ति की गई.’(शुक्रनीतिसार,1/71). इस तरह राजा धरती पर विधाता का प्रतिनिधि बना. कालांतर में उसके फैसलों को देवाज्ञा माना जाने लगा. तीसरी कहानी का कथानक कुछ अलग अवश्य लगता हो, मगर संकेत उसका भी यही है कि राजा समाज की राजनीतिक और सामरिक आवश्यकता है. इसलिए शारीरिक और मानसिक सर्वश्रेष्ठता को उसके चयन का आधार बनाया गया. बिहार के गया, सोनपुर आदि क्षेत्रों के उत्खनन से ज्ञात होता है कि भारत में कृषिकर्म की शुरुआत लगभग दस हजार वर्ष पहले हो चुकी थी. हड़प्पा सभ्यता के अवशेष बताते हैं कि उस क्षेत्र में ईसा से 1500-3000 वर्ष पहले तक समृद्ध नागरी संस्कृति विकसित हो चुकी थी, जिनके व्यापारिक रिश्ते दूरदराज की सभ्यताओं से थे. समूह की एकता और नेतृत्व हेतु सम्राट की नियुक्ति की शुरुआत का वही दौर रहा होगा. उसके सापेक्ष ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ आदि ऊपरोल्लिखित कृतियां बहुत बाद की रचना हैं. जाहिर है इनकी रचना उस समय हुई जब देश में राज्य बड़ी और केंद्रीय सत्ता के रूप में ढल चुका था. वर्णव्यवस्था रूढ़ होकर जाति में ढलने लगी थी. आश्रयदाताओं को प्रसन्न करने के लिए तत्कालीन बुद्धिजीवी वर्ग उनके सत्ताधिकार को वैध ठहराने में लगा था. राजा की नियुक्ति को देवताओं का निर्णय घोषित करना, इसी दिशा का संकेतक है. वे अपने समय की साहित्यिक रचनाएं रही होंगी, जिनके रचनाकर अपने अतीत से प्रेरणा लेकर उन्हें गढ़ रहे थे. आगे चलकर जब मनुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासाएं धर्म और तज्जनित कर्मकांडों के रूप में रूढ़ होने लगीं, तब उन्हें धर्मशास्त्र का दर्जा दे दिया गया.

विशुद्ध लौकिक उद्देश्य के लिए जनता द्वारा राजा के चयन का उल्लेख ऋग्वेद के अलावा पुराणों में भी मौजूद है. जनसहमति के आधार पर निर्वाचित पहले सम्राट की कहानी हमें उस कालखंड तक ले जाती है जब पशुआधारित अर्थव्यवस्था, कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में ढलने को उत्सुक थी. खेती के प्रति रुझान में तेजी आ रही थी. हालांकि व्यक्तिगत भूसंपत्ति की अवधारणा तब तक नहीं पनपी थी. सम्मिलित खेती में कृषि उत्पाद पर सामूहिक अधिकार माना जाता था. धीरेधीरे यह समस्या सामने आने लगी कि अनाज का समूह के बीच बंटवारा कैसे किया जाए? उसका आधार क्या हो? क्योंकि कुछ लोग जहां आवश्यकता से अधिक अनाज एकत्र कर लेते थे, वहीं कुछ ऐसे भी होते थे जिन्हें अपनी आवश्यकता के अनुसार अन्न मिल ही नहीं पाता था. उनके बीच अनाज को लेकर परस्पर छीनाझपटी होती थी. बंटवारे के दौरान विवाद उत्पन्न होना बहुत सामान्य बात थी. समस्या के समाधान हेतु ऐसे व्यक्ति के चयन का निश्चय किया गया, जो बुद्धिमान होने के साथसाथ निष्पक्ष और निर्विवाद भी हो. जो कुशलतापूर्वक सदस्यों के बीच अनाज का बंटवारा कर सके. बदले में उस व्यक्ति को कृषि उत्पाद का एक हिस्सा देने का प्रावधान किया गया, जो बहुत कारगर सिद्ध हुआ. लेकिन गणप्रमुख या विश के मुखिया की सफलता तभी तक संभव थी, जब लोगों के पास उनकी जरूरत लायक अनाज मौजूद हों. किसी कारण यदि भरपूर अनाज उत्पन्न न हो, तब लोगों के मन में क्षोभ उभरना स्वाभाविक था. कुछ ऐसा ही सम्राट वेन के प्रकरण में हुआ था. वेन की कथा2 विष्णु पुराण, भागवत पुराण तथा पदम पुराण में आती है, हालांकि उनमें प्रक्षेपण एवं रूपांतरण की बहुत अधिक संभावना है. वेन के बारे में अलगअलग जगह मौजूद कहानियों में अंतर है. तथापि सभी जगह उसे जनता द्वारा पहला निर्वाचित राजा माना गया है. सम्राट मनोनीत होने के पश्चात वेन ने कृषि को बढ़ावा देने के लिए यथोचित उपाय किए. लेकिन परिस्थितियों ने ऐसी करवट ली कि जिन लोगों ने उसको अपना राजा घोषित किया था, उन्हीं के हाथों उसका अंत भी हुआ.

पुराणों में पृथु का मुक्त गुणगान है. पृथु वें का पुत्र था. पिता की हत्या के बाद वह समझ चुका था कि ऋषिगणों को नाराज करके राजकर्म करना आसान नहीं है. अतः राज्याभिषेक के समय ही उसने ऋषिगणों को आश्वस्त करते हुए कहा—‘मैं स्वधर्म, आश्रमधर्म एवं वर्णाश्रम धर्म की स्थापना करूंगा तथा राजदंड द्वारा उन्हें कार्यान्वित करूंगा.’3 वह जनतंत्र की पहली पराजय और पुरोहितवाद की पहली बड़ी जीत थी. पृथु ने ब्राह्मणों को सभी राज्यादेशों से ऊपर रखने की घोषणा की थी. कुल मिलाकर उसने वही किया था, जो ऋषिगण चाहते थे. माना जाता है कि पृथ्वी का नामकरण उसी के नाम पर पड़ा. इन प्रसंगों से यह संकेत भी मिलता है कि प्राचीनकाल में राजा का चयन केवल दैवी प्रेरणा या नियुक्ति तक सीमित नहीं था.

राज्य की उत्पत्ति को लेकर अनुबंध का सिद्धांत बौद्ध ग्रंथों में भी मौजूद है. ‘दीर्घनिकाय’, ‘महावस्तु’ आदि बौद्ध ग्रंथ राजा की नियुक्ति से संबंधित अनुबंध के सिद्धांत की पुष्टि करते हैं. ‘दीर्घनिकाय’ में राजा की नियुक्ति को लेकर एक निर्देश प्राप्त होता है. उसमें मनोनीत राजा अपनी प्रजा के साथ करार करता है कि वह केवल ‘वहीं पर क्रोध करेगा, जहां उसे करना चाहिए. उसी की भर्त्सना करेगा, जो भर्त्सनायोग्य है. उसी को देश निकाला देगा, जिसे देश निकाला मिलना चाहिए.’4 बौद्ध समर्थित राजदर्शन लोककल्याण के आदर्श के इर्दगिर्द घूमता है. ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ में राजा के चरित्र में ओज और साहस जैसे गुणों को महत्त्वपूर्ण बताया गया है. वहीं ‘दीर्घनिकाय’ में राजा की लोकप्रियता, सौंदर्यबोध, बुद्धिमत्ता आदि को उसका प्रमुख गुण माना गया है. राजा पर प्रजा के खेतों, धनधान्य और पशुओं की सुरक्षा का दायित्व होता था. बदले में प्रजा उसे अपनी आय का एक हिस्सा देने का वचन देती थी. ‘महावस्तु’, दीर्घनिकाय से लगभग तीन शताब्दी बाद की रचना है. लौकिक संस्कृत में लिखा गया यह ग्रंथ अपने भीतर बौद्ध दर्शन की अनेक आदर्श स्थापनाओं को समेटे है. ‘दीर्घनिकाय’ की भांति ‘महावस्तु’ भी राजा की नियुक्ति को लेकर ‘आपसी सहमति’ के लौकिक सिद्धांत की पुष्टि करता है—

सृष्टि के आरंभ में सभी प्राणी एक दिव्य स्थल पर निवास करते थे. वे सुगंधित का आनंद लेते. सुरम्य धरा पर मग्नमन नृत्य करते. उस समय उन्हें न तो भोजन की आवश्यकता थी, न वस्त्रों की, न निजी संपत्ति थी, न सरकार, न ही किसी प्रकार का कानून. और तब सृष्टि का पतन आरंभ हुआ. मनुष्य उस पुनीत लोक से पतित होकर पृथ्वी पर आ गिरा. मनुष्य का पतन आरंभ हो चुका था. अब उसे भोजन और आवास की आवश्यकता महसूस हुई. मनुष्य अपनी आरंभिक पवित्रता को खो चुका था. वर्णव्यवस्था का आरंभ हुआ और लोगों ने एक दूसरे के साथ अनुबंध के आधार पर रहना आरंभ किया. परिवार और निजी संपत्ति उस अनुबंध का हिस्सा बने. इसी के साथ चोरी, हत्या, लूटमार, परस्त्रीगमन जैसे अपराध होने लगे. समस्या से मुक्ति पाने के लिए सब मनुष्य एक बार एकत्र हुए, उन्होंने मिलजुलकर एक राजा चुना, जो उनकी फसल का वाजिब हिस्सा उन्हें बांट सके. उस चयन को उन्होंने ‘अनेक द्वारा एक का चयन’ यानी ‘महासम्मत’ की संज्ञा दी. उस व्यक्ति से अनेक लोगों को खुशी प्राप्त हुई थी, इसलिए उन्होंने उसे ‘राजा’ कहना आरंभ कर दिया. उसी से ‘राजनीति’ का विकास हुआ.’5

उपर्युक्त उद्धरणों से वैदिक परंपरा और बौद्ध परंपरा के बीच राजा की नियुक्ति संबंधी अंतर को समझा जा सकता है. वैदिक परंपरा में राजा निर्वाचित न होकर, कभी धर्म तो कभी देवताओं के नाम पर ऊपर से थोपा जाता है. राजपद की आवश्यकता विशुद्ध राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पड़ती है. वह आर्यों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं का संकेतक है. बौद्ध परंपरा में राजा की नियुक्ति का उद्देश्य उन लौकिक कर्तव्यों की पूर्ति करना है, जो समाज में सुख, समृद्धि और शांति की स्थापना के लिए आवश्यक माने जाते हैं. दोनों ही मान्यताओं में इतना स्पष्ट है कि राजा के रूप में मनोनीत व्यक्ति सत्यनिष्ठा, विश्वसनीयता और नेतृत्व के विशिष्ट गुणों से संपन्न होता था. उसका मुख्य कर्तव्य लोककल्याण के निमित्त उन कर्तव्यों का निष्पादन करना था, जो उसकी प्रजा के हितों के लिए आवश्यक हों. यह बात अलग है कि खुद को ईश्वरीय प्रतिनिधि घोषित करने वाला व्यक्ति अवसर आने पर स्वयं को प्रजा से बहुत ऊपर, यहां तक कि ईश्वरतुल्य समझने लगता था. इससे राजनीति में विकार आना स्वाभाविक था.

सुकरात, प्लेटो, अरस्तु आदि विचारकों ने राजसत्ता एवं समाज के कर्तव्यों एवं दायित्वों में तालमेल बनाए रखने के लिए न्यूनतम अनुबंध का समर्थन किया था. प्लेटो ने तो दार्शनिक सम्राट की परिकल्पना पेश की थी. उसका विचार था कि केवल दार्शनिक ही सत्ता के अहंकार, विलासिता तथा अन्य विकारों से स्वयं को बचा सकता है. अपने ग्रंथ ‘रिपब्लिक’ और लॉज में राज्य एवं समाज के कर्तव्यों की विस्तृत व्याख्या करते हुए उसने आदर्श राज्य की रूपरेखा प्रस्तुत की थी. अरस्तु राज्य के उच्च नैतिक स्तर को बनाए रखने का समर्थक था. उनके कुछ शताब्दी पश्चात पश्चिम की वैचारिक चेतना अपना तेज खोने लगी थी. मध्यकाल तक वहां भी धर्मसत्ता और राजसत्ता का ऐसा गठजोड़ बन चुका था, जिसमें जनसाधारण की नियति केवल आदेशानुपालन करना तथा परंपराओं का बोझ ढोनाभर रह गया. इंग्लेंड में जेम्स प्रथम ने राजा को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि और सर्वेसर्वा माना. उसका मानना था कि राज्य और समाज दोनों के लिए राजा का होना अपरिहार्य है. बगैर राजा के न तो राज्य चल सकता है न ही समाज—‘राजा के बिना नागरिक समाज की कोई गति नहीं है. बिना नेतृत्व के समाज बुद्धिहीन भीड़ बनकर रह जाता है.’ राजा को अतिमानवीय सत्ता मानते हुए जेम्स प्रथम ने उसके अधिकारों और कर्तव्यों को राज्य की समीक्षा से ऊपर माना था. 1616 ईस्वी में न्यायाधीशों की बैठक को संबोधित करते समय उसने कहा था—‘राजा की शक्ति से संबंधित बातों पर चर्चा करना विधिसंगत नहीं है. ऐसा करना राजा की दुर्बलता को दर्शाना तथा उसके प्रति अपने सम्मान भाव को नष्ट करने जैसा होगा. राजा ईश्वर के सिंहासन पर बैठता है.’

जाहिर है समाज में राजा का स्थान ऊंचा रखा गया है. उसकी इच्छा की अवहेलना या अपमान अपराध की श्रेणी में आता था और उसके लिए दंड का प्रावधान था. राजा को ईश्वरीय प्रतिनिधि घोषित करने का ध्येय समाज में उसके निर्णयों के प्रति सम्मानभाव पैदा करने तक सीमित न था. किसी एक या कुछ लोगों को सामान्य से बहुत ऊंचा उठा देने की परिणति दूसरों को, खासकर उन्हें जो सत्ताकेंद्र से दूर हैं, स्वतः ही नीचे ले आती है. यह अंतर सत्ताकेंद्र में दूरी के अनुपात में बढ़ता ही जाता है. उत्तराधिकार प्रणाली का लाभ उठाते हुए शिखर पर यदि ऐसा व्यक्ति आ बैठे जो औसत से बहुत कम प्रतिभाशाली और स्वार्थी हो तो इस प्रणाली के बहुत भयावह परिणाम निकलते हैं. इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब केंद्रीय नेतृत्व की अकुशलता और अदूरदर्शिता का नुकसान जनसाधारण को उठाना पड़ा है. कुल मिलाकर वह निषेधात्मक व्यवस्था थी. उसका मानना था कि बगैर दंड के शांति और सुव्यवस्था असंभव है. दूसरे शब्दों में प्राचीन विधिसंहिता का गठन, समाज के बड़े वर्ग के प्रति अविश्वास की भावना के साथ हुआ था. उसकी कमजोरी थी कि वह समाज को शासक एवं शासित में बांट देती थी, जबकि न्याय की आधुनिक अवधारणा में मानवीय स्वतंत्रता, समानता और सुरक्षा अनिवार्य शर्तें हैं.

राजतंत्र, भले ही उसके शिखर पर मौजूद व्यक्ति चाहे जितना उदार एवं मानवमूल्यों को समर्पित क्यों न हो, कुल मिलाकर व्यक्तिवादी संस्था है. वह एक व्यक्ति को सर्वेसर्वा मानकर काम करती है. वहां शक्तियां किसी एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के हाथों में सीमित रहती हैं, जिसमें बाकी लोग निर्णय प्रक्रिया से कट जाते हैं. ऐसे में यदि राजपद पर कोई कुटिल और स्वार्थी व्यक्ति मौजूद हो तो जनसाधारण एकदम अलगथलग पड़ जाता है. राजतंत्र में समानता और सभी की स्वतंत्रता जैसी बातों को हवाई माना जाता है. उसके अनुसार मनुष्य जन्म से असमान होते हैं. उनमें से कुछ श्रेष्ठ और सर्वगुण संपन्न होते हैं, जबकि कुछ निष्कृष्ट और अल्प बुद्धि संपन्न. जो निष्कृष्ट अथवा अल्प बुद्धिमान हैं, उन्हें मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है. इसके लिए ईश्वर कुछ व्यक्तियों को शासन का अधिकार देकर पृथ्वी पर भेजता है. समाज की एकता एवं अखंडता के लिए बाकी लोगों द्वारा उसके आदेश का पालन करना, ईश्वरीय आज्ञा होती है. राजा ईश्वर के नाम पर राज्य करता है. इस कार्य में धर्म उसके मार्गदर्शन की जिम्मेदारी निभाता है. धार्मिक शक्तियां एक ओर तो राजा के अतिरिक्त अधिकारसंपन्न होने का समर्थन करती हैं. दूसरी ओर यह दावा भी किया जाता है कि ईश्वर की निगाह में सभी बराबर हैं. उस समय वे प्रकृति और ईश्वर में भेद नहीं कर पातीं. जबकि प्रकृति की विशेषता है कि वह भेद नहीं करती. सभी के साथ समानतापूर्ण एवं पारदर्शी व्यवहार करती है. इसके बावजूद वे अवसर मिलते ही न्याय प्रदाता शक्ति के रूप में ईश्वर को बीच में ले आते हैं. उस समय प्रकृति को ईश्वर में समाहित मान लिया जाता है, जो न तो दृश्यमान है, न ही प्रामाणिक. परिणामस्वरूप मूर्त्त सत्य अमूर्त्तन में ढल जाता है. जनसाधारण को भरमाने के लिए सहज प्राकृतिक घटनाओं की मनमानी और स्वार्थपूर्ण व्याख्याएं चलती रहती हैं. जनसाधारण उनके वितंडा में उलझकर रह जाता है. इससे धर्माधारित विधानों की कमजोरी को समझा जा सकता है. विभिन्न किस्म की आस्थाओं और वितंडाओं में उलझा व्यक्ति यह समझ ही नहीं पाता कि ईश्वर की निगाह में यदि सब बराबर हैं तो समाज में भीषण असमानता क्यों है? किसी व्यक्ति के पास दूसरे को दंडित करने का अधिकार कहां से आता है? और शिखर पर विराजमान, खुद को स्वयंभू, सर्वशक्तिमान, सर्वोपरि और निरंकुश समझने वाला ईश्वर समानता का समर्थन भला कैसे कर सकता है. लोगों को उलझाने के लिए प्रायः वे कहते हैं कि सबकुछ नियतिबद्ध होता है. आदमी के बस के बाहर. कठपुतली की भांति मनुष्य की नियति उसको बस सहते जाना है.

यदि यह मान लिया जाए कि समाज को व्यवस्थित रखने के लिए राजा का होना आवश्यक है, ईश्वर स्वयं उसका विधान रचता है, तो राजा के औचित्य पर सवाल नहीं उठाए जा सकते. बावजूद इसके यहां एक प्रश्न अनायास सामने आता है कि यदि सभी कुछ पूर्वनिर्धारित और नियतिबद्ध है तो दोषी को, उसका अपराध चाहे जो भी हो, दंडित करने का औचित्य नहीं रह जाता. इस विचार के साथ ही न्यायआधारित समाज की संकल्पना भी सवालों के घेरे में आ जाती है. चूंकि धार्मिक स्थापनाएं आस्था और विश्वास पर चलती हैं, इसलिए वहां तर्क की कोई गुंजाइश नहीं रहती. बल्कि कई बार तो संदेह करना भी कुफ्र मान लिया जाता है. उसकी खूबी भी यही है कि अपनी सहजता और किस्सेकहानियों की मदद द्वारा वह बहुत आसानी से लोकसंस्कृति का हिस्सा बन जाती है. मनुष्य उन्हें इतनी गहराई से आत्मसात् करता है कि उनपर किसी भी प्रकार के संदेह, शंका आदि का विचार उसके दिमाग में नहीं आता. लोक की जुबान पर चढ़ी ये कहानियां शिखर पर मौजूद लोगों तथा बेमेलकारी विचारों का गुणगान करती हैं. जनसाधारण अपने रोजमर्रा के कार्यों के संपादन हेतु इन्हीं से प्रेरणाएं लेता हैं. सामान्य परिस्थितियों में इससे कोई अंतर नहीं पड़ता. लेकिन यदि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की चुनौती का मसला हो या ऐसा ही कोई दूसरा मसला, जिसमें नागरिकअस्मिता दाव पर लगी हो, तथा उसके समाधान के लिए तर्क और विश्वसनीयता जरूरी आन पड़े—वहां यह व्यवस्था असफल होती जाती है.

यह कहना तो ज्यादती होगी कि समाज में धर्म की भूमिका हमेशा नकारात्मक रही है. संगठित धर्म भले ही दोढाई हजार वर्ष पुराने हों, मनुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासाएं उसी समय से उसके साथ जुड़ी हैं, जब उसने सोचनासमझना आरंभ किया था. आध्यात्मिक जिज्ञासाओं को स्थायी रूप देने की कोशिश के फलस्वरूप ही धर्म का विकास हुआ था. बाद में आध्यामिक शक्तियों के प्रति मनुष्य के सम्मानभाव एवं डर को देखते हुए उनका उपयोग समाज को अनुशासित करने के लिए किया जाने लगा. उससे एक वर्ग ऐसा पनपा, जिसने ईश्वर को जाननेसमझने से अधिक उसके महिमामंडन पर जोर दिया. उससे समाजीकरण के साथसाथ विकसित होते नैतिक मूल्यों की व्याख्या भी धर्म और राजसत्ता के स्वार्थानुरूप की जाने लगी. सामंती संस्कार और जीवन की बढ़ती चुनौतियों के बीच लोगों को यह सहज भी लगा. कालांतर में नैतिक मूल्य और आध्यात्मिक विश्वास एकदूसरे में इतने गड्डमड्ड हो गए कि धर्म और नैतिकता को परस्पर पर्याय मान लिया गया. वह संस्कृति और विकास दोनों की दृष्टि से प्रतिगामी चलन था. अध्यात्म एवं संस्कृति दोनों सतत नवोन्मेषी और पुरोगामी रहें, तभी उनकी सार्थकता है. आस्था और विश्वास में ढल जाने से उनकी स्वाभाविक वृद्धि रुक जाती है. यही हाल नैतिकता का भी है. मनुष्य नैतिक मूल्यों से प्रेरित होता है. उनसे अपनी सभ्यता और संस्कृति का अलंकरण करता है. लेकिन नैतिक मूल्य, कुछ प्राकृतिक मूल्यों को छोड़कर सतत परिवर्तनशील रहते हैं. इसी में उनकी गरिमा है. धर्म का हिस्सा बन जाने के बाद मनुष्य के विवेकीकरण की प्रक्रिया अवरुद्ध होने लगती है. परिणामस्वरूप समाजीकरण की प्रक्रिया में भी अवमंदन का दौर शुरू हो जाता है. धर्म की इस दुर्बलता को सहस्राब्दियों पहले समझ लिया गया था. भारत में मक्खलि घोषाल, अजित केशकंबलि, कौत्स ने धर्म को गुरुडम और पाखंड में ढालने के और पुरोहितवर्ग की जमकर आलोचना की थी. वहीं बुद्ध ने धर्म के नाम पर चलने वाले कर्मकांडों एवं आडंबरों का तर्कसम्मत प्रतिकार किया. लेकिन वास्तविक सफलता 15वीं शताब्दी के बाद, उस समय मिलनी शुरू हुई जब प्रौद्योगिकीकरण ने वैकल्पिक अर्थव्यवस्था की राह प्रशस्त की. उससे जनसाधारण के लिए सामंतवाद के चंगुल से बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त हुआ. मशीनीकरण से नए मध्यवर्ग का विकास हुआ. कालांतर में उसने अपने बुद्धिजीवी पैदा किए, जिन्होंने असमानताकारी व्यवस्थाओं के विरोध में बौद्धिक एवं राजनीतिक आंदोलनों का सूत्रपात किया.

हॉब्स, लॉक, रूसो आदि प्राचीन विचारकों का योगदान यह भी है कि उन्होंने न्याय और सुशासन जैसी व्यवस्थाओं को धर्म और सामंतवाद के चंगुल से निकालकर तर्कसम्मत बनाने का काम किया. उसके फलस्वरूप लोगों ने प्रश्न करना सीखा. हॉब्स यद्यपि राजतंत्र का समर्थक था. लेकिन वह उसमें सुधार चाहता था. उसने राजा के दैवी अधिकारों का निषेध किया है. इस तरह वह जेम्स प्रथम, राबर्ट फिल्मर आदि की उस विचारधारा को खारिज करता है, जो उस समय प्रचलित थी. जेम्स प्रथम की भांति फिल्मर का भी विश्वास था कि राजा की सत्ता तथा उसकी शक्तियां ईश्वरप्रदत्त होती हैं. कि राजा का आदेश और उसकी इच्छा अपने आप में स्वतः प्रमाण है. फिल्मर राजनीति को धर्म में समाहित कर देता है. समकालीन उदारवादियों की भांति हॉब्स यह मानने को तैयार नहीं था कि राज्य की शक्तियां सम्राट और सांसदों के बीच विकेंद्रीकृत होनी चाहिए. इसके समानांतर हॉब्स जो वैचारिकी प्रस्तुत करता है, वह अपने समय का कदाचित सबसे क्रांतिकारी सोच था. वह जोर देकर कहता है कि राज्य की शक्तियां तथा उसके संकल्प उसकी सदस्य इकाइयों की निजी इच्छाओं और आकांक्षाओं पर निर्भर करते हैं. समाज में किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरों पर शासन करे. उसकी इच्छाओं का दमन कर अपनी इच्छाएं थोपे. हॉब्स नागरिकों को अधिकार देता है कि अपने सुख, स्वतंत्रता और समानता की रक्षा के लिए वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं. इस तरह नागरिकों की स्वतंत्रता एवं सुरक्षा उसकी प्राथमिकता है, लेकिन स्वतंत्रता का आशय कुछ भी करने की स्वच्छंदता नहीं है. आधुनिक विचारकों की भांति हॉब्स का भी मानना था व्यक्ति की आजादी अन्य नागरिकों के सुख और सुविधा पर निर्भर करती है. समाज में किसी को भी यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि अपने सुख के लिए वह दूसरों के हितों की बलि चढ़ाए अथवा उन्हें किसी भी प्रकार से कष्ट दे. इस परिस्थिति में हॉब्स राज्य के समर्थन में खड़ा नजर आता है. समाज में अनुशासन बनाए रखने के लिए वह राज्य को असीमित अधिकार दे देता है. इस तरह हम उसके विचारों में परंपरा और आधुनिकता के बीच झूलता हुआ पाते हैं. असल में वह विचारों के इतिहास का वह क्रांतिकारी दौर है, जब पुराने विचार अप्रासंगिक लगने लगते हैं, जबकि नए विचार केंद्र में आने के संघर्षरत होते हैं. वैचारिक संवेदनशीलता का परिचय देता हुआ हॉब्स दोनों के बीच संतुलन बिठाने की सफल कोशिश करता है, और अपने उत्तरवर्त्ती विचारकों के लिए मार्गदर्शक का कार्य करता है.

हॉब्स के पश्चात न्याय और सामाजिक समानता के ध्येय को लेकर जिन विचारकों का उल्लेखनीय योगदान है, उनमें जान लॉक, रूसो, डेविड ह्यूम, इमानुएल कांट, बैंथम, जान रॉल्स आदि का नाम लिया जा सकता है. इनमें से लॉक एवं रूसो ने न्याय को लेकर स्वतंत्र रूप से विचार नहीं किया, उनका मुख्य योगदान राजनीतिक दर्शन के क्षेत्र में है. लेकिन जिस आग्रह और तर्कसम्मत ढंग से वे स्वतंत्रता और समानतासंबंधी मुद्दों को उठाते हैं, और विशेषकर मानवस्वातंत्र्य के लिए जमीन तैयार करते हैं, आगे चलकर उन्हीं से सामाजिक न्याय की नई संकल्पनाएं जन्म लेती हैं. मसलन आदर्श राज्य को कैसा होना चाहिए? आदर्श राज्य में नागरिकों के क्या कर्तव्य हैं? समानता, सुरक्षा और स्वतंत्रता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए राजनीति का स्वरूप कैसा हो? इन सब विषयों पर उन्होंने विस्तार से लिखा है. कहने की आवश्यकता नहीं कि आधुनिक राजनीति पर उनका गहरा प्रभाव पड़ा है. कालांतर में उन्हीं की प्रेरणा से आधुनिक विधिसंहिता के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ. इस आधार पर लॉक एवं रूसो को युग प्रवर्त्तक दार्शनिकों की श्रेणी में कहा जा सकता है. जान लॉक(1632—1704) अनुभववादी दार्शनिक था. मानता था कि मनुष्य अपने अनुभवों से सीखता है तथा अपने विवेक द्वारा ज्ञान को आगे बढ़ाता है. प्राकृतिक रूप से सभी मनुष्य समान हैं. जन्म के आधार पर न तो किसी को शासक घोषित किया जा सकता है, न ही यह मान लेना चाहिए कि कोई व्यक्ति केवल शासित होने के लिए जन्मा है. प्रकृति सभी प्राणियों के साथ समभाव का प्रदर्शन करती है. स्वतंत्रता स्वयं प्राकृतिक देन है. आदर्श राज्य वही है जो मनुष्य की अधिकतम स्वतंत्रता का संरक्षण करने में सक्षम हो. जिसमें नागरिक अपनी अधिकतम सुख और सुरक्षा का अनुभव कर सकें. इसके लिए व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार कार्य करने की पूरीपूरी स्वतंत्रता आवश्यक है. इसका आशय यह नहीं है कि प्राकृतिक विधान सभी को सभी कुछ करने की आजादी देता है. न ही किसी नागरिक को यह अधिकार होता है कि अपने सुख के लिए ऐसे कार्य करे, जिससे दूसरों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप होता हो. आदर्श राज्य का अभिप्राय ऐसे भूराजनीतिक क्षेत्र से है जहां व्यक्ति को वह सब कुछ करने की स्वतंत्रता हो, जिसमें वह दूसरे के सुख एवं स्वतंत्रता को बाधित किए बिना अपने सुख और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अधिकतम स्तर तक कर सके. लॉक मानता था कि मनुष्य मूलतः स्वार्थी होता है. इसलिए उसने किसी कदम की सीधी व्याख्या संभव नहीं है. प्रकृति हालांकि सभी प्राणियों के साथ समानता का भाव रखती है, लेकिन उन लोगों के सुधार हेतु जो स्वार्थवश प्राकृतिक नियमों की अवहेलना करते हैं, कोई तर्कसम्मत व्यवस्था उसके पास नहीं होती. प्राकृतिक न्याय अकेले व्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करता है. किंतु समाज में रहते हुए अधिकतम स्वतंत्रता के भोग की उसमें कोई व्यवस्था नहीं होती. यही कारण है कि प्राचीन न्यायसंहिताओं में जो प्राकृतिक न्याय के अपेक्षाकृत करीब थीं, मृत्युदंड और अंगभंग जैसी सजाओं को सामान्य समझा जाता था.

लॉक के अनुसार प्राकृतिक न्याय ईश्वरीय भाव से प्रेरित होता है. इसलिए उसमें प्राणिमात्र के प्रति समानता और स्वतंत्रता का भाव होता है. यदि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता अथवा अस्मिता पर संकट आ पड़े तो ईश्वरीय न्यायव्यवस्था चरमराने लगती है. उस अवस्था में पुरोहितवर्ग या तो नियतिवादी समाधान सुझाने लगता है अथवा किसी चमत्कार की उम्मीद में वास्तविकता से कट जाता है. दोनों अवस्थाओं में पीडि़त व्यक्ति को न्याय नहीं मिल पाता. समाधान की धर्मसम्मत व्यवस्था, चुनौतियों का सामना करने के बजाय उनसे पलायन की प्रेरणा देती है. समस्या के विधिसम्मत समाधान हेतु लॉक हॉब्स की ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की अवधारणा को आगे कर देता है. अपनी महत्त्वपूर्ण कृति ‘सेकिंड ट्रटीज आफ दि गवर्नमेंट’ में वह लिखता है कि जीवन, संपत्ति एवं स्वतंत्रता की सुरक्षा हेतु नागरिकों को परस्पर एकजुट होकर सामान्य हितों के लिए ‘सामाजिक संविदा’ के अनुरूप कार्य करना चाहिए. वह कामना करता है कि नागरिकगण बजाय व्यक्तिगत लाभ के संपूर्ण समाज के लाभों के लिए एकजुट होंगे. उस समय उनके समक्ष दो उद्देश्य हो सकते हैं. पहला उस समाज की रूपरेखा बनाना या सपना देखना, जैसे समाज की कामना वे अपने लिए करते हैं. दूसरी उस लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु अनिवार्य संकल्पबद्धता. प्राकृतिक एवं धर्मकेंद्रित समाजों में यह काम दैवी शक्ति के भरोसे होता है. इसलिए वहां नागरिकों में आत्मविश्वास की कमी सहज ही देखने को मिलती है. आकस्मिक चुनौती के समय वे प्रायः बिखर जाते हैं और उद्धार के लिए चमत्कारों की उम्मीद में जीने लगते हैं, जो विकास को नकारात्मक दर से प्रभावित करती है. चूंकि इतिहास चक्र में वापस लौटना संभव नहीं होता, इसलिए समाज में दो प्रकार की शक्तियां प्रभावी होती हैं. लोगों की परिवर्तन की वांछा जो चमत्कारों और जनसंकल्प के बीच कहीं झूलती रहती है. दूसरा अतीत के प्रति अतिरेकी लगाव जो धर्म और परंपरा के जरिये मानवस्वभाव का जटिल हिस्सा बन जाता है. अंतर्द्वंद्वों में फंसा समाज इन्हीं के बीच कहीं झूलता रहता है.

प्राकृतिक अथवा धर्मकेंद्रित समाजों के राजनीतिकरण का आरंभ सामान्य हितों की पहचान तथा उनके लिए एकजुटता बरतने से होता है. उसके अगले चरण में नागरिकों को अपने मूलभूत अधिकारों की सुरक्षा एवं संरक्षा के लिए कुछ हितों का बलिदान देना पड़ सकता है. जिसमें उनकी स्वतंत्रता के एक हिस्से में कटौती भी संभव है. किंतु समाजीकरण के वृहद उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए यह अनिवार्य अवस्था है. समाजीकरण की यह प्रक्रिया सामान्य सहमति के आधार पर गठित सरकार के तत्वावधान में होनी चाहिए. उसमें नागरिकों की सविवेक भागीदारी भी अपेक्षित है. थामस हॉब्स ‘सामाजिक संविदा’ का प्रमुख सिद्धांतकार है. उसका समर्थन करने के साथसाथ लॉक उसके परिष्करण की संभावनाओं का भी विवेचन करता है. उसे आगे बढ़ाते हुए रूसो व्यक्ति, समाज एवं राज्य के संबंधों को लेकर आदर्शोन्मुखी व्यवस्था की कामना के साथ सही मायने में ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की रचना करता है. उसे विश्वास था कि नागरिकगण अपनी स्वतंत्रता, समानता और जीवन के लिए एकजुट होकर संघर्ष करेंगे. रूसो का जीवनकाल यूरोपीय इतिहास का ऐसा दौर है, जब वह अपनी बौद्धिक चेतना के एकदम शिखर पर था. लॉक की भांति वह भी व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता, समानता और संपत्ति अधिकारों का तीव्र समर्थक था. आस्था, विश्वास और परंपरा के स्थान पर वह मानवीय विवेक को महत्त्व देता है. ऐसे समाज की रूपरेखा पेश करता है, जो आपसी सहयोग और सामान्य विवेक द्वारा अनुशासित होता है. व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता और समानता का समर्थक होने के कारण लॉक और रूसो का न्याय की आधुनिक अवधारणा को विकसित करने में बड़ा योगदान है. जबकि रूसो की कृति ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की गिनती कार्ल मार्क्स की ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ के साथ विश्व की उन तीनचार अतिमहत्त्वपूर्ण पुस्तकों में की जाती है, जिनकी आधुनिक विश्व को गढ़ने में विलक्षण भूमिका रही है.

मानवीय स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक रूसो की प्रसिद्ध उक्ति है—‘मनुष्य आजाद जन्मता है, किंतु वह हर जगह बेडि़यों में है.’ ये बेडि़यां कहां से आती हैं? कैसे प्रभावी हो जाती है और कैसे अल्पसंख्यक अभिजन, बहुसंख्यक जनसामान्य को छोटेछोटे हिस्सों में बांटकर उन्हें अपना दास और आश्रित बना लेता है? यदि रूसो की माने तो बंधन मनुष्य के चारों ओर से प्रभावी रहते हैं. हर कोई मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता पर डाका डालने को तत्पर रहता है. जबकि प्राकृतिक राज्य में मनुष्य अपनी स्वाधीनता के अधिकतम हिस्से भोग कर रहा होता है. कानून और समाज की मर्यादाएं वहां आड़े नहीं आतीं. प्रौद्योगिकी द्वारा नियंत्रित समाज में प्राकृतिक राज्य की वापसी सुदूर इतिहास का हिस्सा बन चुकी है. मनुष्य तकनीक पर इतना आश्रित है कि उनसे मुक्त जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता. चूंकि आधुनिक प्रौद्योगिकी महंगी है. उसपर निरंतर ऐसे लोगों का अधिकार बना रहता है, जिनके वर्गीय स्वार्थ मानवकल्याण की भावनाओं पर सदैव भारी पड़ते हैं. प्रौद्योगिकी के बल पर वे अकूत मुनाफा बटोरते हैं. फिर उसका एक हिस्सा शोध और प्रौद्योगिकीय प्रौन्नति हेतु करते हैं. उससे आर्थिक और सामाजिक अंतर बढ़ता ही जाता है. संक्षेप में आधुनिक समाज की समस्याएं आधुनिक जीवनशैली की देन हैं, जिसके प्रति मनुष्य का बेहद लगाव है. हमारी कमजोरी है कि विचारधाराओं के मामले में प्रायः रूढ़ दृष्टिकोण अपनाते हैं. यह जान ते हुए भी कि आधुनिक समाज की समस्याओं के समाधान हेतु आधुनिक विचार आवश्यक है, हम समाधान के लिए प्राचीन धर्मग्रंथों और परंपराओं में झांकते रहते हैं. प्राकृतिक राज्य की महत्ता अपनी जगह स्वयंसिद्ध है, लेकिन यदि कोई आधुनिकता द्वारा उत्पन्न समस्याओं का समाधान प्राकृतिक राज्य में चाहे तो सिवाय पलायन के उसके कुछ और हाथ नहीं लगने वाला. दूसरी ओर यह भी सच है कि शिक्षा और संसाधनों ने मनुष्य को पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक बनाया है. इसलिए परंपरागत राज्य की नीतियां, जिसमें निर्णय ऊपर से थोप दिए जाते थे, उसे रास नहीं आतीं.

थोरो, एडबर्ड कारपेंटर, गांधी, रसेल आदि का विचार था कि आधुनिक समाज की अनेक समस्याएं अतिरेकी मशीनीकरण की देन है. सुविधाओं की चाहत तथा उसके लिए अंधाधुंध मशीनीकरण ने अनियोजित विकास को जन्म दिया है. रूसो ने इसकी कल्पना करीब ढाई सौ वर्ष पहले ही कर ली थी. उसका विचार था कि प्राकृतिक राज्य में मनुष्य इच्छाओं के संबंध में मुक्त होता था. जरूरत की वस्तुओं पर किसी का एकाधिकार नहीं था. आवश्यक श्रम के उपरांत मनुष्य उन्हें जुटा ही लेता था. इस कारण उन दिनों गलाकाट स्पर्धा भी नहीं थी. आधुनिक मनुष्य की इच्छाएं उसकी आवश्यकता के आधार पर जन्मने के बजाए बाजारवादी प्रलोभनों, दूसरों से पिछड़ जाने के भय तथा भौतिक लालसाओं द्वारा पैदा होती हैं. वे समाज में अनावश्यक स्पर्धा को जन्म देती हैं. रूसो के अनुसार आधुनिक समाज की समस्याएं मुक्ति की न होकर स्वतंत्रता के हृास के कारण जन्मी है. ऐसे में मनुष्य परस्पर सहयोग तथा एकदूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए अधिकतम स्वतंत्रता का भोग कर सकता है. प्राकृतिक राज्य की प्रशंसा करने के बावजूद वह उसकी ओर लौटने पक्ष में न था. उसका मानना था कि उसमें सबकुछ अव्यवस्थित रहता है. उसे हम ऐसा भूक्षेत्र मान सकते हैं जिसमें प्रत्येक नागरिक अपनी शक्ति के सर्वोच्च शिखर पर हो सकता है. लेकिन संगठन के अभाव में व्यक्ति की शक्तियां, एकदूसरे के साथ क्षुद्र स्पर्धा में अकसर व्यर्थ चली जाती हैं. कई बार तो व्यक्ति अपनी शक्तियों और कार्यक्षमता का अनुमान तक नहीं लगा पाता. आकस्मिक संकट के समय ऐसे समाज में व्यक्ति एकदम अकेला पड़ जाता है. मानवीय स्वतंत्रता और विकास की दृष्टि से भी प्राकृतिक राज्य सर्वथा निरापद नहीं है. उसकी अपनी कमजोरियां हैं. रूसो के अनुसार प्राकृतिक राज्य में मनुष्य का नैतिक स्तर अपने चरम पर हो सकता है. लेकिन समाज का कोई स्पष्ट चरित्र नहीं बन पाता. इससे व्यक्ति और समूह के स्तर पर असंतोष पलता रहता है. परिणामस्वरूप व्यक्ति की उच्च नैतिकता भी निष्प्रभावी होकर रह जाती है. परंपरा और आधुनिकता के बेमेल गठबंधन से पैदा द्वंद्व उसे ‘सोशल कांट्रेक्ट’ की प्रेरणा बनता है.

रूसो के जीवनकाल तक मशीनी क्रांति आरंभ हो चुकी थी. मध्यवर्ग का उभार तेजी पर था. उसके फलस्वरूप सामाजिक उथलपुथल जारी थी. इसी के साथ जारी था, नए सामाजिक संबंधों के गठन का सिलसिला. प्रमुख चुनौती मशीनों के आगमन से उत्पन्न मानवीय अवमूल्यन की चुनौतियों से निपटने की थी. रूसो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को बडे़ पूंजीपतियों के हाथों में देखकर भविष्य का अंदाजा लगा चुका था. उसका विचार था कि मनुष्य की सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याएं आधुनिक विकासमान समाजों की देन हैं. वह ‘सोशल कांट्रेक्ट’ का आरंभ ही इन शब्दों से करता है—‘मनुष्य मुक्त जन्म लेता है, लेकिन हर जगह वह बेड़ियों में हैं.’ ये बेड़ियां कभी सामाजिक शुचिता के नाम पर थोपी जाती हैं, कभी कानून, तो कभी मनुष्यता की भलाई के नाम पर. लेकिन हर बार ये मनुष्य की स्वतंत्रता का एक हिस्सा हड़प लेती हैं. मानवीय स्वतंत्रता की सलामती के लिए आवश्यक है कि उन श्रंखलाओं को तोड़ा जाए. पुस्तक में वह उन सभी विसंगतियों की विवेचना करता है जो मानवीय स्वतंत्रता को बाधित कर सकती हैं. उसके अनुसार राजनीति का मुख्य उद्देश्य मनुष्य की स्वतंत्रता, जो समाजार्थिक असमानता, विद्वैष भाव आदि से संकटग्रस्त है, को वापस दिलाना है. यह कार्य किसी सरकार या सत्ता के भरोसे संभव नहीं है. क्योंकि वे वर्चस्व की भावना को कभी त्यागने वाली नहीं है. उसके लिए पीड़ित पक्षों को स्वयं आगे आना होगा. अधिकतम स्वतंत्रता का लक्ष्य एकदूसरे की स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा के साथ ही प्राप्त किया जा सकता है. हॉब्स और लॉक की भांति रूसो भी इच्छाओं के सामान्यीकरण पर बल देता है. उसके अनुसार सामान्यीकृत इच्छा का आशय समाज की ऐसी सम्मिलित इच्छा से है जिसे वह विकास के अन्यान्य अवसरों, तकनीकों के बीच से अधिकतम लाभकामना के साथ चुनता है. रूसो उस समय पूर्ववर्ती प्रकृतिवादी विचारकों के समर्थन में उतर आता है, जिनका विचार था कि प्राकृतिक रूप से सभी बराबर हैं. प्रकृति की ओर से सभी मुक्त भी हैं. जिस तरह प्रकृति में सामंजस्य की अनूठी भावना और तालमेल है, वह चाहती हैं प्राणिमात्र में भी इसी प्रकार के सहयोग और सामंजस्य की भावना हो. सृष्टि का एकमात्र विवेकवान प्राणी होने के नाते मनुष्य का दायित्व अन्य प्राणियों से कहीं अधिक है. इसलिए उसे चाहिए कि वह ऐसे कार्य करे, जिससे प्राणिमात्र की स्वतंत्रता और समानअधिकारिता की रक्षा हो सके. ध्यान रखे कि प्रकृति सभी को एकदूसरे के साथ सहयोग करने की अनुमति तो देती है, मगर एकल अधिकार किसी का भी पसंद नहीं करती. तदनुसार पृथ्वी के जितने भी उपहार हैं, वे सबके लिए हैं. मगर वह स्वयं भी किसी एक की न होकर सबकी है. चाहती है कि लोग उसके उपहारों का मिलजुलकर भोग करें. किसी भी प्रकार का दुराव या स्पर्धा उनमें न हो.

रूसो का विश्वास था कि व्यवस्थित समाज की रचना केवल आपसी सहमति के आधार पर संभव है. समाज की वास्तविक स्थापना ही तब होती है जब अलगअलग नागरिक मिलकर प्रबुद्ध जनता में ढल जाते हैं. यहां ‘प्रजा’ और ‘जनता’ के सूक्ष्म भेद पर कुछ चर्चा प्रासंगिक होगी. दोनों में वही अंतर है जो बाड़े में बंद भेड़ों तथा जंगल में मुक्त विचरने वाले प्राणियों के बीच होता है. प्रजा अपने अधिकतम अधिकार राजा को सौंपकर उसकी इच्छा की अनुगामी हो जाती हैं. यहां तक कि उसके जीवन पर भी उसका अधिकार नहीं रहता. उसमें राजा और राजकुल के सदस्यों का जीवन साधारण प्रजाजन के जीवन से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है. इसलिए राजा अथवा राजकुल के किसी सदस्य को बचाने के लिए एक या अनेक प्रजाजनों की बलि पर भी वहां कोई सवाल खड़े नहीं करता. प्रायः ‘स्वामीभक्ति’ या ‘राजभक्ति’ कहकर उसका महिमामंडन किया जाता है. प्रजा के उलट जनता अधिकतम अधिकार अपने पास रखती है. जागरूक जनता को दास नहीं बनाया जा सकता. यदि कहीं ऐसा प्रतीत होता तो समझ लेना चाहिए कि वहां की जनता बनावटी किस्सों को सुनतेसुनते अपने आत्मबल को बिसरा चुकी है. प्रबुद्ध जनता अपने सामान्य हितों लिए संगठित होती है. उसके लिए वह अपने शासक स्वयं चुनती है. बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करते हुए चुने हुए अपने प्रतिनिधि को उतने ही अधिकार सौंपती है, जितने शासकीय कर्तव्यों के निष्पादन हेतु आवश्यक हों. वह अपने शासकों पर नजर भी रखती है. यदि उसे लगे कि निर्वाचित प्रतिनिधि कर्तव्यच्युत हैं तो वह उन्हें वापस बुलाने में भी देर नहीं करती. शीर्षस्थ स्वार्थी शक्तियों की कोशिश होती है कि जनता अपना आत्मगौरव बिसराकर प्रजा में ढल जाए. जनताकरण विवेकीकृत जनसमूह की खुद के उत्थान हेतु स्वयंस्फूर्त्त प्रक्रिया है. आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के बाद, प्रजा जनताकरण का सपना देखना आरंभ करती है और फिर धीरेधीरे उस दिशा की ओर अग्रसर होती है. लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उसे अनेक जनांदोलनों से गुजरना पड़ता है. उसकी यह गति उसकी आर्थिकसामाजिक स्वतंत्रता के स्तर से तय होती है. कह सकते हैं कि जनता नागरिकों का समूह होने के साथसाथ उसकी उपलब्धि भी है. वह सामूहिकता में विश्वास रखती है. अपने निर्णय स्वयं लेती है. उसके सदस्य नागरिक बहुमत के निर्णयों का सामान्यीकरण करने में माहिर होते हैं. चालाक राजनीतिज्ञ जनता की जागरूकता, विशेषकर ‘बहुमत के निर्णयों का सामान्यीकरण करते रहने की कला’ से घबराते हैं. इसलिए समाज में असमानता के प्रतीकों को इस चतुराई से रोपते हैं कि जनता की एकता प्रभावित हो. वह अलगअलग समूहों में बंट जाए. जिससे उसकी शक्ति एवं ऊर्जा निर्दिष्ट लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश के बजाए एकदूसरे पर संदेह करने लगे. धीरेधीरे लोग उस षड्यंत्र का शिकार होने लगते हैं.

आशय है कि जनता विवेकवान न हो, या उसका नेतृत्व अकुशल और बेईमान हो तो वह दिग्भ्रमित होकर बड़ी आसानी से भीड़ में ढल जाती है. लोकतंत्र में शासन जनप्रतिनिधियों के माध्यम से चलता है. भीड़ की मानसिकता से प्रभावित जनता अपने प्रतिनिधियों के निर्वाचन तथा उन्हें अनुशासित रखने में चूक जाती है. उस समय जनता की समस्त सर्जनात्मक शक्तियां छोटेछोटे समूहों की विशेषताओं में ढलकर, एकदूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश में दम तोड़ने लगती हैं. इससे सामाजिक असंतोष पनपता है और शासन को शांति और सुरक्षा के नाम पर बल प्रयोग करने का बहाना मिल जाता है. स्थिति का लाभ उठाकर स्वार्थी शीर्षस्थ वर्ग जनता द्वारा दी गई शक्तियों का उपयोग स्वयं जनता के ऊपर करने लगते हैं. छोटेछोटे समूहों में विभाजित, भीड़ की मानसिकता से ग्रस्त मनोबलविहीन जनता अपने प्रतिनिधियों पर आश्रित होकर रह जाती है. परिणामस्वरूप लोकतंत्र कुछ लोगों की मर्जी से संचालित होने लगता है. सामाजिक विकास प्रतिगामी रूप ले लेता है और मनुष्य स्वतंत्रता और समानता के अपने वास्तविक लक्ष्य से भटक जाता है. सवाल है कि जनता यदि जागरूक है तो विभाजनकारी शक्तियों का शिकार कैसे हो जाती है? यदि उसे इतनी जल्दी बरगलाया जा सकता है तो प्रजाऔर जनतामें कुछ अंतर ही नहीं रह जाता. यह कठिन पहेली है. दरअसल उन समाजों में जहां भारी असमानता हो, जनसाधारण को संसाधनों की भारी कमी से गुजरना पड़ता हो, वहां रोजमर्रा की वस्तुओं का अभाव अनावश्यक स्पर्धा को जन्म देता है. जिससे उनका ध्यान दूरगामी हितों के बजाए रोजमर्रा की समस्याओं पर केंद्रित होकर रह जाता है. इससे उसके विवेकीकरण की प्रक्रिया अवरुद्ध हो सकती है. ऐसी समस्याओं से उबरने के लिए जनता को कुशल नेतृत्व और मजबूत संगठन की आवश्यकता पड़ती है.

रूसो न्याय को लेकर सीधे विचार नहीं करता, किंतु सामाजिक असमानता और अन्याय को जन्म देने वाली स्थितियों की गहन विवेचना करता है. वह लिखता है कि स्वतंत्र समाज में व्यक्तिमात्र की इच्छाओं का सम्मान होता है. अन्योन्याश्रितता की भावना से संगठित समाज में, व्यक्तिगत इच्छाएं सदस्य इकाइयों को व्यक्तिमात्र के हितों की रक्षा हेतु प्रेरित करती हैं. ध्यातव्य है कि रूसो जब व्यक्तिगत हित की बात करता है तो उसकी निगाह में कोई व्यक्ति अथवा समूहविशेष नहीं होता. मानवमात्र के सम्मान, समानता और न्याय की रक्षा हेतु वह पूरे समाज को विराट मानव के रूप में कल्पित करता है. जो भलीभांति जानता है कि उसकी सफलता उसके सभी अंगों के परस्पर तालमेल और मिलजुलकर कार्य करने की योग्यता पर निर्भर है. इसलिए वह अपने प्रत्येक अंग का बराबर ध्यान रखता है. सभी को सम्मान की दृष्टि से देखता है. महसूस करता है कि यदि एक की स्वतंत्रता भी बाधित होती है तो पूरी देह की स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है.

रूसो की दृष्टि में व्यक्तिस्वातंत्र्य का मसला सर्वोपरि था. वह किसी भी स्थिति में मानवमात्र की स्वतंत्रता को खतरे में नहीं डालना चाहता. न ही उसमें किसी भी कारण किसी तरह की कटौती की कामना करता है. उसके अनुसार समाज के नियंताओं, जिन्हें जनता की ओर से निर्णय लेने का दायित्व सौंपा गया है, को चाहिए कि वे व्यक्तिमात्र की इच्छा की अवमानना करने के बजाय, इच्छाओं के सामान्यीकरण पर जोर दें. इस कार्य में कुछ समय लग सकता है. किंतु एक बार आदत विकसित हो जाने के पश्चात सामान्य इच्छाएं सामान्य हितों का मार्ग प्रशस्त करने लगती हैं. इनमें से कौनसा रास्ता हितकारी है पहली स्थिति समाज में व्यक्तिवाद को बढ़ावा देने वाली लग सकती है. इसलिए कोई भला व्यक्ति दूसरी स्थिति, यानी ‘सामान्य इच्छाओं को सामान्य हितों का मार्ग प्रशस्त’ करते हुए देखना चाहेगा. यहां रूसो का विचार अलग है. या यूं कहें कि वह इस लक्ष्य पर सीधे और एकाएक नहीं पहुंचता. यही ‘सामाजिक संविदा’ का प्राणतत्व भी है. रूसो के अनुसार सुव्यवस्थित समाज में कर्तव्य अन्योन्याश्रित होते हैं. अपनी कला और योग्यता के अनुसार मनुष्य जो उत्पादित करता है, वह केवल उसके लिए नहीं होता. उत्पादन के समय उसके दिलोदिमाग में हमेशा यह बोध समाया होता है कि उसके उत्पाद दूसरों के काम आएंगे और उनके ऐवज में वह उन सुविधाओं को प्राप्त कर सकेगा, जिन्हें अकेले अर्जित कर पाना उसके लिए असंभव है. पूंजीवादी समाज में यह इच्छा होड़ में बदल जाती है. उसमें व्यक्ति अपने श्रमकौशल एवं बौद्धिक ज्ञान का लाभ तो उठाना चाहता है, किंतु दूसरे व्यक्तियों के श्रमकौशल का लाभ उन्हें देने में कंजूसी करता है. इस तरह उस तंत्र में हर कोई केवल अपने लिए काम करने लगता है. उससे अपने काम के प्रति उसका अनुराग तथा उसके पीछे निहित सामाजिक लाभ की वांछा पीछे छूट जाती है. परिणामस्वरूप सामाजिक संबंध बजाए नैतिकता और मानवीय मूल्यों के, बाजार तथा उत्पादों के आधार पर बनने लगते हैं. मानवीय स्वतंत्रता की रक्षा के लिए यह बेहद खतरनाक स्थिति है क्योंकि उस अवस्था में मनुष्य की पहचान उत्पादों में सिमटकर रह जाती है. उन्हीं के आधार पर अपने संबंधों का निर्धारण करने लगता है. इससे सामान्य राय बनाने में मुश्किलें आती हैं.

रूसो के अनुसार समाज और व्यक्ति दोनों की स्वयंप्रभुता इसमें है कि पूरा समाज व्यक्तिमात्र के हितों की संपूर्ति को समर्पित हो, वहीं व्यक्तिमात्र का कर्तव्य है कि वह संपूर्ण समाज के कल्याण के निमित्त कार्य करे. यदि पूरा समाज व्यक्तिमात्र के हितों की पूर्ति के लिए समर्पित है तो क्या प्रत्येक आदमी को केवल अपने स्वार्थ की दिशा में काम करने की अनुमति दी जा सकती है? रूसो इसका जोरदार खंडन करता है. उसके अनुसार यह ‘सामाजिक संविदा’ की अवधारणा के विरुद्ध होगा. व्यक्तिमात्र का कर्तव्य है कि वह सामान्य हितों को ही अपना कर्तव्य माने. केवल हितों की अन्योन्याश्रितता ‘सामाजिक संविदा’ को स्थायित्व प्रदान कर सकती है. अतएव ‘सामाजिक अनुबंध’ का सबसे पहली शर्त एक ऐसे प्रस्ताव पर सहमति है जिसमें लोग व्यक्तिगत रूप से सम्मिलित होकर जागरूक ‘जनता’ के रूप में ढलने लगते हैं. उनमें से हर कोई दो बातें भलीभांति जानता है. पहली यह कि व्यक्तिगत स्तर पर उन सभी की जरूरतें तथा रुचियां भिन्न हैं. दूसरी बात उसे यह भी भरोसा होता है कि भिन्न रुचियों, जरूरतों और कार्यक्षमताओं के बावजूद समाज में सामान्य ‘रुचि’ एवं ‘आवश्यकता’ का निर्धारण किया जा सकता है. इस कार्य को वे सब मिलकर, एकदूसरे के अधिकारों का समर्थन और संवर्धन करते हुए आसानी से कर सकते हैं.

सामान्य सहमति के आधार पर अर्जित सुविधाएं व्यक्ति को स्वार्थपूर्ण ढंग से जुटाई गई सुविधाओं की अपेक्षा अधिक सुखसंतोष प्रदान कर सकती हैं. ये प्रेरणाएं उन्हें ‘सामाजिक अनुबंध’ को अपनाने के लिए उमगाती हैं. ‘सामाजिक अनुबंध’ के तहत एकजुट होते समय वे सामान्य रुचि और हितों का चयन करते हैं. उसमें संभव है कि कुछ लोगों को अपने हितों की उपेक्षा होती दिखाई पड़े. लेकिन यह बात उनसे छिपी नहीं रहती. वे जानते हैं कि ऐसा इसलिए हुआ है कि जो व्यवस्था निर्मित की गई है, वह उनसे कहीं अधिक लोगों को लिए हितकारी है. साथ में उन्हें यह भरोसा भी होता है कि समूह के लोग उनसे अलग नहीं हैं. वे अवश्य उनके हितों का ख्याल रखेंगे. यानी संख्या में कम होकर भी वे उपेक्षित नहीं है. सामान्य इच्छा का हिस्सा न होने पर भी समाज उनकी जरूरतों और चाहतों के प्रति संवेदनशील है—यह विश्वास ही इस व्यवस्था की जान है. इस दायित्व के सफल निष्पादन की जिम्मेदारी ऐसी संस्थाओं की होती है, जिसपर समूह के सभी या अधिकतम सदस्यों का विश्वास हो. प्रत्येक जनसमूह या जनसमुदाय अपने आप में स्वयंभू निकाय होता है. उसकी खूबी है कि उसे अपनी शक्तियां किसी सरकार या सत्ता प्रतिष्ठानों की ओर से प्राप्त नहीं होतीं. बल्कि नागरिकों की ओर से प्राप्त होती हैं. सरकार तथा सत्ता प्रतिष्ठान, यह मानते हुए कि उसे अपनी शक्तियां नागरिकों की ओर से प्राप्त हैं, केवल उन्हें मान्यता प्रदान करते हैं. इसे संस्थान तथा सामाजिक अनुबंध’ की कसौटी कैसे माना जाए? कैसे तय किया जाए कि वह व्यवस्था सफल सिद्ध हुई है? इस प्रश्न का उत्तर देते समय रूसो जरा भी नहीं हिचकता. वह अपने आप में पूरी तरह स्पष्ट है. उसके अनुसार यदि ये प्रबंध सामाजिक विकास की विकृतियों का समाधान खोजने में कामयाब हैं, यदि उसमें ताकत की नहीं, लोगों की सामूहिक इच्छा की चलती है, और समूह किसी व्यक्ति या व्यक्ति समूह के बजाए संपूर्ण समाज के विकास हेतु अपने विवेक एवं ऊर्जा का उपयोग करता है—तो मानना चाहिए कि ‘सामाजिक अनुबंध’ की व्यवस्था सफल हुई है. सहमति के आधार पर क्रियाशील समाजों में शक्ति के प्रयोग को मान्यता नहीं दी जा सकती. यदि फिर भी उनमें महत्त्वपूर्ण फैसले शक्ति के आधार पर लिए जाते हैं, तो मान लेना चाहिए कि उसमें कुछ व्यवस्थागत खोट है. जिसका समाधान समाज के सभी लोगों को गणतांत्रिक भावना के अनुसार खोजना आवश्यक है.

रूसो जब यह कहता है कि ‘मनुष्य आजाद जन्मा है, लेकिन हर जगह जंजीरों में जकड़ा है.’6 तब वह सीधेसीधे प्राकृतिक समाज से आधुनिक समाज तक हुए बदलाव की ओर संकेत कर रहा होता है. अपने सवालों के माध्यम से वह आधुनिक प्रौद्योगिकी युक्त संस्कृति को अनेक सवालों के घेरे में ले आता है. वह बताता है कि प्रकृति आधारित समाज के आधुनिक समाज में बनने तक मनुष्य को अपनी स्वतंत्रता और समानता के बड़े हिस्से का बलिदान करना पड़ा है. मानवीय गरिमा की पुनर्वापसी आधुनिकता की सबसे बड़ी चुनौती है. वह तभी संभव है जब लोगों में एकदूसरे पर पूरी तरह विश्वास हो. वे सामान्य जरूरतों के आधार पर एकदूसरे से जुड़े हों. साथ ही अपनी और दूसरों की स्वतंत्रता की रक्षा हेतु समर्पित हों. रूसो प्राकृतिक राज्य की प्रशंसा करता है, किंतु पूरी तरह प्राकृतिक राज्य की ओर जाने से इन्कार कर देता है. उसके अनुसार यह न तो वांछित है न ही उपयोगी है. चूंकि प्राकृतिक राज्य का सबसे बड़ा गुण सामूहिकता था. रूसो उसे आधुनिक राज्यों के लिए भी आवश्यक मानता है. उसके अनुसार मनुष्य को चाहिए कि आधुनिक समाज में रहते हुए प्राकृतिक राज्य की विशेषताओं को प्राप्त करने का लक्ष्य रखे. तदनुसार मनुष्य की अधिकतम स्वतंत्रता को लौटाना आधुनिक राजनीति का प्रमुख हिस्सा तथा जीवन का मुख्य उद्देश्य भी होना चाहिए.

सोशल कांट्रेक्ट’ की सैद्धांतिकी ने जिन विद्वानों को प्रभावित किया, उनमें जान रॉल्स प्रमुख हैं. रॉल्स ने समाज को आत्मनिर्भर बनाने, उसमें न्याय की व्याप्ति के लिए रूसो के विचारों का समर्थन किया है. लेकिन ऐसे समाजों में जहां सामाजिकआर्थिक और राजनीतिक स्तर पर भारी असमानताएं हों, न्याय की स्थापना हेतु वह कल्याणकारी शासन की भूमिका को महत्त्वपूर्ण मानता है. लेकिन बिना अनुशासन के अच्छे से अच्छा शासक भी निरंकुश हो जाता है. आधुनिक गणतांत्रिक समाजों में बेहतर शासन चुनने की जिम्मेदारी जनता पर होती है. बेहतर शासन की संभावनाएं कम न हों, उसके लिए जनता के सतत प्रबोधीकरण की आवश्यकता हमेशा बनी रहती है. कुल मिलाकर समाजीकरण की पहली चुनौती है कि मनुष्य को उसकी अधिकतम स्वतंत्रता किस तरह लौटाई जाए. कैसे लोगों को तैयार किया जाए कि वे अधिकतम लोगों की इच्छाओं के साथ अपनी इच्छा का मेल कर सकें और बहुसंख्यक लोग बराबर यह ध्यान रखें कि समूह का कोई सदस्य अपने आपको उपेक्षित न समझे. रूसो के राजनीतिक दर्शन में राज्य अधिकतम लोगों की हितरक्षण को समर्पित संस्था से अधिक कुछ नहीं है. अपने पूर्ववर्ती विचारकों हॉब्स, जान लॉक की भांति वह मानता है कि प्राकृतिक रूप में सभी मनुष्य समान हैं. प्रकृति किसी को भी किसी पर शासन करने का अधिकार नहीं देती. अतएव शासन यदि आधुनिक राज्यों की अनिवार्यता है तो वही संस्था शासन करने योग्य है जो लोगों की सहमति से बंधी हो. लोग ऐसी संस्था का गठन कर सकें, इसके लिए उनका पूरी तरह मुक्त होना आवश्यक है. रूसो इसके लिए प्रत्यक्ष गणतांत्रिक व्यवस्था का समर्थन करता है, जिसमें नागरिकों की सीधी और सक्रिय भागीदारी हो. ऐसे समाज में लोगों को न्याय के लिए राज्य को ओर ताकना नहीं पड़ता. न्याय नागरिक पहल पर स्वतः हासिल होता रहता है. यही ‘सोशल कांट्रेक्ट’ का अभीष्ट है.

© ओमप्रकाश कश्यप

  1. प्रजा सुखे सुख राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्!— अथर्ववेद।

  2. राजा निर्वाचित होते ही वेन ने खेती में सुधार को अपना लक्ष्य बना लिया. वह ‘विश’ के निवासियों को खेती के लिए प्रेरित करने लगा. पशु पहले भी मनुष्य के साथी थे. खेती के विकास के साथ समाज में उनकी उपयोगिता बढ़ती ही जा रही थी. वेन ने देखा कि यज्ञ में होने वाली बलि से हजारों निर्दोष पशु अकारण मारे जाते हैं. उन्हें बचाकर ‘विश’ को और भी समृद्ध बनाया जा सकता है. यही सोचकर उसने ऋषिगणों से यज्ञों के नाम पर होने वाली पशुबलि पर रोक लगाने को कहा. परिणामस्वरूप ऋषिगण वेन से नाराज रहने लगे. वेन को अपने ऊपर विश्वास था. इसलिए उसने पशुबलि का विरोध करना जारी रखा. वेन का यही आग्रह आगे चलकर उसपर भारी सिद्ध हुआ.

    ऋषियों के आश्रम नदी तट पर बने थे. इस कारण नदी से सटी जमीन पर भी उनका कब्जा था. वेन के प्रयत्नों से ‘विश’ तेजी से विकास की ओर अग्रसर था. अचानक प्राकृतिक आपदा ने उसके सारे सपनों पर पानी फेर दिया. एक के बाद एक कई मौसम बीते, बारिश न हुई. सूखे से नदी तट से दूर की भूमि पपड़ाने लगी. आसमान सूना पड़ने लगा. फसलें झुलस गईं. जिन जनों के अधिकार में वह भूमि थी, उनपर भूख का संकट मंडराने लगा. नदी तट से लगे ऋषिगणों के खेत अब भी लहलहा रहे थे. अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए वेन ने पुरोहितों को बैठक के लिए आमंत्रित किया. उनसे प्राकृतिक आपदा में साथ देने का अनुरोध किया. कहा कि जरूरतमंदों की मदद के लिए आगे आएं. जो है, जितना है, उसे मिलबांटकर संकटग्रस्त लोगों की मदद करें. ऋषिगणों ने मना करने पर वेन ने अपने अधिकार का प्रयोग करना चाहा. नाराज ऋषिगणों ने जनता को वेन के विरुद्ध भड़काना आरंभ कर दिया. भूख से पीडि़त जन अपना संयम खोते जा रहे थे. नीरक्षीर का विवेक समाप्त हो चुका था. लगातार बढ़ता जनाक्रोश वेन की हत्या के बाद ही शांत हुआ. जनता ने अपने ही चुने राजा की बलि ले ली. ऋषिगणों का काम हो चुका था. सत्ता से निर्लिप्तता दर्शाते हुए उन्होंने वेन के पुत्र पृथु को ‘विश’ का राजा घोषित कर दिया.

  3. विष्णु पुराण, स्कंध प्रथम, अध्याय 13, प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थाएं, रामशरण शर्मा, पृष्ठ 67 से उद्धृत.

  4. दीर्घनिकाय 3, पृष्ठ 93.

  5. In the early days of cosmic cycle mankind live on an immaterial plane, dancing on air in the sort of fairyland, where there was no need of food or clothing, and no private property, family, Government or laws. Then gradually process of cosmic decay began its work and mankind become earthbound, and felt the need of food and shelter. All men lost their primeval glory, distinctions of class(verna) arose, and they entered in agreement with on another, accepting the institutions of private property and the family. With this theft, murder, adultery, and other crime began, and so the people met and decided to appoint one man among them to maintain in return for a share of produce of their fields and herds. He was called ‘the great choosen one’ (Mahasammta), and he received the title of ‘raja’ because the pleased the people.-THE WONDER THAT WAS INDIA, A. L. Basham, page-82.

  6. Man was born free, and he is everywhere in chains” -Rousseau in Social Contract

न्याय, न्याय की परंपरा और समाज

सामान्य

राज्य के नेतृत्व में अदालतों के जरिये सामान्यतः जो फैसले होते हैं, प्रायः उन्हीं को न्याय मान लिया जाता है. जबकि उनमें से कुछ को छोड़कर जिनका संबंध संविधान, कानून या किसी अदालती निर्णय की लोकहित में समीक्षा करना है, अधिकांश का न्याय की मूलभावना से दूर का भी संबंध नहीं होता. अधिकतर मामले वकीलों के दमखम तथा कानूनी दांवपेच में उलझे होते हैं. उनके अंबार के बीच न्याय और न्यायभावना कहीं दबसी जाती है. कानून अपना काम करे, लोगों को न्याय समय पर मिले, न्याय प्रणाली निष्पक्ष तथा उसकी प्रक्रिया पूर्णतः पारदर्शी हो—यह देखना राज्य का कर्तव्य भले हो, उसके गठन का वास्तविक लक्ष्य नहीं है. राज्य का गठन प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा अपने सुख, शांति, समृद्धि एवं शुभता के विस्तार हेतु किया जाता है. अपने नागरिकों के जानमाल की रक्षा करना राज्य का दायित्व है. इस दायित्वपूर्ति हेतु कानून राज्य के सहायक की भूमिका निभाता है. तदनुसार किसी अदालती निर्णय को न्याय तभी कहा जा सकता है, जब पीडि़त को हुए नुकसान की भरपाई संभव हो. बावजूद इसके अधिकांश अदालती मामले इन्हीं मुद्दों पर केंद्रित होते हैं. उनमें अदालतें अपराधी को केवल दंड सुनाती हैं, न्याय नहीं करतीं. मान लीजिए किसी घर में चोरी होती है. चोर पकड़ा जाता है, किंतु माल बरामद नहीं हो पाता. चोरी होने तथा चोर के गिरफ्तार होने के मध्य जो अंतराल है, उसमें चोर माल को ठिकाने लगा चुका है. अदालत उस चोर को कानून के अनुसार दंड सुनाकर न्यायप्रक्रिया को संपन्न मान लेती है. ठीक इसी प्रकार यदि किसी परिवार के सदस्य की हत्या हो, हत्यारा पकड़ा जाए तो अदालत अपराधी को काराग्रह भेजकर; अथवा मृत्युदंड सुनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है. दोनों मामलों में पीडि़त परिवारों को सिवाय इस तसल्ली के कि जिन्होंने अपराध किया, वे कारावास में हैं, कुछ भी प्राप्ति नहीं होती. मृतक को वापस लाना तो वैसे भी संभव नहीं होता. इस तरह कानून की मदद से किया गया न्याय, सामान्यतः निषेधात्मक होता है. इससे न्याय का उद्देश्य पूरा नहीं होता. वास्तविक न्याय तब कहा जा सकता था, जब राज्य व्यक्ति को हुए नुकसान की भरपाई या तो स्वयं करे अथवा अपराधी को उसके लिए बाध्य करे. परंतु ऐसा हो नहीं पाता. नुकसान की भरपाई करना अदालत को अव्यावहारिक लगता है. कदाचित वह सोचती है कि इस तरह के मामलों से राज्य के खजाने पर अनावश्यक बोझ पड़ेगा. दूसरा सोच यह होता है कि इस तरह के मामलों में यदि अदालतें नुकसान की भरपाई करने लगें तो पीडि़त व्यक्ति अपने नुकसान को बढ़ाचढ़ाकर पेश करेगा. अपराधी पर नुकसान की भरपाई के लिए दबाव डालना भी उसे अव्यावहारिक लगता है. साफ है कि अदालतें अपने ही देशवासियों पर अविश्वास करती हैं. दूसरो शब्दों में राज्य के संरक्षण में चलाई जा रही अदालतें प्रथमतः राज्य का ही हित साधन करती हैं.

न्याय शुभत्व की व्याप्ति और उसका प्रसार है. यह तभी संभव है, जब न्यायाधीश स्वयं नैतिकता के उच्चतम मानकों पर आसीन होकर उच्चतम मापदंडों के अनुसार न्याय करें. लेकिन न्यायाधीश को चाहे वे कितने ही विद्वान, निष्पक्ष और न्यायसमर्पित क्यों न हों, उन्हें अपना प्रत्येक निर्णय राज्य द्वारा बनाई गई दंडसंहिता के अनुसार करना पड़ता है. ऐसे में निर्णय सुनाने वाले न्यायाधीश का कार्य केवल दंडाधिकारी तक सीमित होकर रह जाता है. दंडविधान अथवा दंड की प्रक्रिया को न्याय जैसे शब्द से महिमा मंडित करना, राज्य के शक्तिप्रदर्शन का ही रूप है. न्यायालयों की कार्रवाही न्याय की परिभाषा तथा उसकी मूलभावना से भी मेल नहीं खाती है. इसके बावजूद लोकव्यवहार और अदालती कामकाज में ‘न्याय’ शब्द का उल्लेख जमकर किया जाता है. न्याय की सैद्धांतिक जानकारी के अभाव में सामान्य ‘दंडाधिकारी’ से भी ‘न्यायविद्, ‘न्यायमूर्ति’ जैसे लुभावने संबोधन जोड़ दिए जाते हैं. असल में वह राज्य की ताकत और उसकी सर्वोच्चता को प्रकट करने का एक माध्यम है. प्रकारांतर में यह वर्चस्वकारी सत्ताओं के खेल को आसान बनाते हैं. न्याय राज्य की सार्वभौमिक उदारता की कसौटी होता है. कल्याण राज्य होने का दावा करने वाले राज्य में तो उसकी हैसियत मुख्य दिशानिर्देशक की होनी चाहिए. उसकी व्याप्ति कर्तव्य विभाजन से लेकर नागरिकों के बीच कल्याण के बंटवारे तक यथाआवश्यक रूप में होनी चाहिए. प्लेटो ने इसी को लेकर ‘रिपब्लिक’ में लिखा है—

समाज के प्रत्येक सदस्य को वह कार्य सौंपना चाहिए, जिसके लिए वह स्वयं को सर्वाधिक उपयुक्त मानता है.’1

इस कोटि की न्यायभावना के अभाव में राज्य अपने नागरिकों के साथ छल करता है. ‘न्याय की अनुपस्थिति में राज्य की स्वयंप्रभुता को संगठित डकैती’ बताते समय संत अगस्ताइन के मन में भी कुछ इसी प्रकार के विचार उमड़े होंगे. न्यायविहीन समाज में असंतोष पनपते हैं. परिणामस्वरूप उसके प्रति नागरिकों का विश्वास धीरेधीरे क्षीण होता जाता है. नागरिकों के विश्वास से रहित राज्य एवं निरंकुश राज्य में कोई अंतर नहीं होता. जिस राज्य में न्याय न हो, वहां निरंकुशता स्वतः पनपने लगती है. उसकी प्रवृत्ति बहुआयामी होती है. निरंकुशता वैयक्तिक भी हो सकती है और राज्य के नाम पर गठित संस्थाओं की भी. दोनों ही स्थितियों में उसका शिकार जनसाधारण को बनना पड़ता है. परिणामस्वरूप जनसाधारण के लिए न्याय निरंतर दुर्लभ होता जाता है.

न्याय व्यक्तिमात्र के प्रति संवेदना, करुणा एवं समानता की भावना से जन्मता है. वही समाज में शुभत्व की स्थापना करता है. आधुनिक संदर्भों में वह पश्चिम में विकसी एक महत्त्वपूर्ण नैतिक एवं राजनीतिक संकल्पना है. न्याय के अंग्रेजी पर्याय Justice शब्द की उत्पत्ति लैटिन मूल के Jus शब्द से हुई है, जिसका अभिप्राय ‘विधि’ अथवा ‘सन्मार्ग’ से है. आ॓क्सफोर्ड शब्दकोश के अनुसार Just शब्द का आशय ऐसे व्यक्ति से है जो नैतिकता के उच्च मानदंड के अनुसार सही है; तथा दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार करता है, जो नैतिकता की दृष्टि से खरा और प्रभावी है. प्रकारांतर में श्रनेज शब्द से भी उसी धारणा की ओर संकेत मिलता है. कुल मिलाकर jus तथा justice दोनों न्याय और न्यायभावना को दर्शाते हैं. इसके मायने केवल कानून और अदालतों तक सीमित नहीं हैं. बल्कि उससे कहीं अधिक व्यापक, मनुष्यता के शिखर की ओर इशारा करने वाले हैं. न्याय मानवीकरण की सफलता को दर्शाता है. कभीकभी fair शब्द को भी न्याय के पर्यायवाची के रूप में प्रयुक्त किया जाता है. इनका अभिप्राय है ‘प्रत्येक को वह मिले जो उसका अधिकार है.’, ‘उतना मिले जितनी उसको आवश्यकता है’, ‘जिसको जो मिले, पूरी पारदर्शिता के साथ मिले.’, ‘ईमानदारी से मिले और अविलंब मिले.’ श्रेष्ठ न्याय समाज के विक्षोभों का शमन करता है, समाज और व्यक्ति की दूरी घटाता तथा कानून के प्रति नागरिकों के भरोसे में वृद्धि करता है. निष्पक्षता और पारदर्शिता न्याय की अनिवार्य शर्तें हैं. ‘बतौर निष्पक्षता न्याय हमें वह देता है, जो हम उससे चाहते हैं.’2 न्याय में विलंब भी अन्याय को दर्शाता है. प्लेटो के अनुसार समाज में शुभत्व की व्याप्ति, नैतिकता का संचार ही न्याय है. वही समाज न्याय पथ पर है जिसमें नागरिक अपने कर्तव्यों का पालन बगैर किसी बाहरी दबाव और स्वार्थभावना के करते हैं, जहां नागरिकों में परस्पर मेल हो, जो संकट में एकदूसरे का साथ निभाने को तत्पर रहते हों तथा इतने अनुशासित एवं आत्ममर्यादित हों कि शासन की मौजूदगी केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाए.

भारत में धर्म से इतर न्याय की कोई स्वतंत्र अवधारणा नहीं है. यहां न्याय के पर्याय के रूप में धर्म को रखा गया है, जिसकी हालत काठ के उस जूते की भांति है जिसमें हर कोई पांव डालकर देखना चाहता है. देखता है, लेकिन पूरी तरह से पहनना कोई नहीं चाहता. न ही पहन पाता है. पश्चिम में न्याय पर सुकरात से लेकर जॉन राउल तक गंभीर चिंतन देखने को मिलता है. प्लेटो की महत्त्वपूर्ण कृति ‘रिपब्लिक’ में साथियों के साथ चर्चा के दौरान सुकरात ‘न्याय’ के विभिन्न पक्षों पर विचार करता है. अंत में वह इस निर्णय पर पहुंचता है कि ‘न्याय सदगुण है.’ ऐसा गुण जिसे प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर रखना चाहिए. उसमें आदर्श और व्यवहार का भेद मिट जाता है. सुकरात के अनुसार वही समाज न्याय पर है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति वह करता है, जो वह दूसरों से अपने प्रति अपेक्षा रखता है. प्लेटो कवि हृदय और आदर्शवादी था. आदर्श समाज को लेकर उसका एक सपना था. ‘न्याय’ के लिए उसने ग्रीक भाषा के शब्द Dikaisyne का प्रयोग किया है, जिसका अभिप्राय ‘नैतिकता’ और ‘शुभता’ से है. उसके अनुसार न्याय वह अवस्था है जब व्यक्ति अपनी तात्कालिक इच्छाओं को शेष समाज की शुभता और भलाई के नाते स्थगित कर देता है. बदले में समाज उसकी इच्छाओं, आकांक्षाओं पर अपनी प्राथमिकताओं के मद्देनजर विचार करता है. प्लेटो के लिए न्याय मानवीय सद्गुणों का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, जो समाज और व्यक्ति की आपसी प्रतिबद्धताओं को दर्शाता है. वह स्पष्ट और स्वतंत्र होता है, और उसका ध्येय समाज में सचाई, शुभता एवं आपसी मेलजोल को बढ़ावा देना है. वह हमारे आत्म की शक्ति, उसका विधान है. आत्मा के लिए न्याय का वही महत्त्व होता है, जो देह के लिए स्वास्थ्य का. न्याय मार्गदर्शक होता है. वह हमें रास्ता दिखाता है. विशेष परिस्थितियों में कौनसा निर्णय मनुष्यता के अनुकूल है, यह बताता है. वह केवल शक्ति नहीं होता, बल्कि शक्तियों, अधिकारों एवं कर्तव्यों की सामंजस्यपूर्ण व्याप्ति है. वह शक्तिशाली का अधिकार न होकर संपूर्ण समाज की प्रभावी एकता और सौहार्द है. न्याय स्वयं एक निर्देशक सत्ता है, जो बल के बजाय करुणा एवं संवेदना से संचालित होती है. समाज की सुदृढ़ता के संदर्भ में वह आत्मरूप है. वह समाज की संपूर्ण संगठित एवं समन्वित शक्ति का प्रतीक होता है. न्याय शक्तिशाली का अधिकार न होकर संपूर्ण समाज की समन्वित एकता और संवेदनशीलता में झलकता है.

प्लेटो के चिंतन का दायरा बड़ा था. उसने अनेक विचारकों को प्रभावित किया. प्लेटो की अपेक्षा अरस्तु नैतिक व्यवहारवाद का समर्थक था. उसकी न्यायसंबंधी अवधारणा व्यावहारिकता से परे न थी. उसका विचार था कि न्याय विधिमान्य व्यवस्था के पारदर्शी और समानतापूर्ण व्यवहार का लक्षण है. राज्य की पारदर्शिता, उसका अपने नागरिकों के प्रति समानतापूर्णपक्षपातरहित व्यवहार—समाज में न्याय के संवितरण की स्थिति को दर्शाता है. दिखाता है कि समाज अपने नागरिकों के प्रति कितना उदार है. जो वस्तु सबके उपयोग की है, उसका सभी में समान वितरण हो, यह उसका मानना था. न्याय से उसका आशय प्रत्येक वस्तु को सभी मनुष्यों में बराबरबराबर बांट देना नहीं है. यह तो परोक्ष रूप में राज्य की मनमानी ही कही जाएगी. उस समय व्यक्ति की रुचि, आवश्यकता तथा समाज के विकास में उसके द्वारा किए गए योगदान को ध्यान में रखा जाना ही न्याय संगत है. लेकिन यह कार्य इतनी खूबी से होना चाहिए कि समाज में कोई भी स्वयं को उपेक्षित अनुभव न करे. राज्य की उदारता एवं न्यायशीलता में सभी का भरोसा बना रहे. अरस्तु और प्लेटो दोनों पर सुकरात की ‘सद्गुण’ और ‘शुभत्व’ संबंधी मान्यता का प्रभाव था. अंतर केवल इतना है कि प्लेटो का समाज और विचार दोनों को परखने का नजरिया नितांत आदर्शवादी था. अरस्तु इसके लिए मानवीय सीमाओं को भी ध्यान में रखता है. लक्ष्य उसका भी समाज में नैतिकता और शुभता का संचार करना है.

अरस्तु के अनुसार संवैधानिक शासन की तीन प्रमुख विशेषताएं हैं—पहला संवैधानिक शासन का प्रमुख ध्येय जनकल्याण होता है. वह किसी एक व्यक्ति समूह या दल के लिए काम नहीं करता. न ही वह किसी एक दल अथवा व्यक्ति द्वारा संचालित ऐसा शासन होता है जो किसी व्यक्ति अथवा समूह के भले के लिए काम करे. दूसरा, संवैधानिक शासन विधिसम्मत शासन होता है. वह किसी एक व्यक्ति अथवा समूह की मर्जी से संचालित नहीं होता, बल्कि ऐसे कानूनों के माध्यम से शासनकर्म करता है, जिनको शासित वर्गों की सहमति प्राप्त हो. वह समन्वयवादी भी होता है. प्राचीन रूढि़यों, रीतिरिवाजों और परंपरा का तिरष्कार करने के बजाय वह उनके साथ तालमेल बनाकर चलने में विश्वास रखता है. तीसरा और सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि वह इच्छुक नागरिकों का शासन है. उसके प्रति नागरिकों की सहमति होती है. लोग समाज के सदस्य के रूप में बृहद हितों की खातिर अपनी प्राकृतिक स्वच्छंदता के एक हिस्से की बलि चढ़ाकर शासित होने को तैयार होते हैं. इस तरह का शासन लोगों से परे न होकर, नागरिक संस्था होती है. प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में दार्शनिक सम्राट की अवधारणा प्रस्तुत की थी. अरस्तु ने उससे असहमति जाहिर की थी. उसके अनुसार न्याय और निष्पक्षता के लिए शासन के निर्णयों में निर्वेयक्तिकता आवश्यक है. व्यक्ति चाहे कितना ही निष्पक्ष और विवेकवान क्यों न हो, उसका पूरी तरह निर्वेयक्तिक होना असंभव है. ऐसा राज्य लंबे समय तक निष्पक्ष नहीं रह पाता. अरस्तु ने न्याय के लिए कानून के राज्य पर जोर दिया है. उसके अनुसार नागरिकों के कल्याण को समर्पित शासन कानून का शासन भी होता है.

अरस्तु पर प्लेटो की महान कृति ‘दि लॉज’ का प्रभाव था. वह अपने गुरु की विलक्षण मेधा का सम्मान तो करता था, मगर किसी भी प्रकार के वैचारिक दबावों से मुक्त था. इसलिए उसकी स्थापनाएं अपने प्लेटो से प्रेरित होने के बावजूद स्वतंत्र एवं मौलिक हैं. लेकिन प्लेटो के विचारों में जहां आदर्श और कल्पना का पुट है, अरस्तु का दर्शन व्यावहारिकता के निकट है. दोनों के विचारों के अंतर को इससे भी समझा जा सकता है कि अरस्तु जिसे आदर्श राज्य मानता है, प्लेटो की निगाह में वह द्वितीय सर्वश्रेष्ठ राज्य है. जबकि प्लेटो की आदर्श राज्य संबंधी संकल्पना अरस्तु की निगाह में अव्यावहारिक है. अरस्तु के समय तक विभिन्न राजनीतिक दर्शन सामने आ चुके थे. उसने अपने समय के सभी प्रचलित शासनतंत्रों यथा राजशाही, गणतंत्र, निरंकुश शासन, कुलीन तंत्र, सौम्य प्रजातंत्र, भीड़ का शासन, अतिवादी लोकतंत्र आदि पर खुलकर विचार किया था. इनमें से निरंकुश शासन, अतिवादी लोकतंत्र, भीड़ के शासन को उसने निकृष्ट शासन पद्धति माना था. बाकी के बारे में उसका विचार था कि प्रत्येक प्रणाली की कुछ न कुछ दुर्बलताएं हैं. राज्य के आदर्श को नागरिक और शासन के कुशल तालमेल से ही प्राप्त किया जा सकता है. इसके लिए उसने लिखित संवैधानिक व्यवस्थाओं पर जोर दिया था. वह शासन को नागरिकों की जीवनशैली मानता था. उसका विचार था कि राज्य अपने लक्ष्य में तभी सफल हो सकता है, जब उसे अपने नागरिकों का संपूर्ण समर्थन प्राप्त हो.

ईसा से पांचछह शताब्दी वर्ष पहले का समय राजनीतिक दर्शनों के विकास का दौर था. बड़े राज्यों के गठन का सिलसिला आरंभ नहीं हुआ था और छोटे राज्य जिन्हें नगर राज्य भी कहा जा सकता है, धर्म की जकड़बंदी से बाहर थे. असल में वह दुनियाभर में बौद्धिक जागरण का समय था. भारत में महावीर स्वामी, अजित केशकंबली, कौत्स, गौतम बुद्ध, यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, पेरामेनडिस, चीन में कन्फ्यूशियस जैसे मानवतावादी चिंतक उसी दौर में जन्मे थे. मगध सम्राट अजातशत्रु द्वारा भेजे गए दूत महामंत्री वस्सकार के समक्ष उन्होंने गणतंत्रों का समर्थन किया था. जाहिर है उस समय तक राजनीति और दर्शन दोनों के केंद्र में मनुष्य था. गौतम बुद्ध द्वारा गणतांत्रिक संघों भी प्रशंसा, महावीर स्वामी का किसी भी प्रकार की हिंसा से बचने का संदेश, सुकरात का ‘शुभत्व’ एवं ‘सदगुण’ का विचार, प्लेटो की आदर्श राज्य की संकल्पना, अरस्तु का व्यावहारिक नैतिकता के आधार पर राज्यों के गठन का सुझाव तथा कन्फ्यूशियस की नैतिक शिक्षाएं—अलगअलग दिखने के बावजूद ये परस्पर मिलीजुली, एकदूसरे का पर्याय कही जाने वाली धाराएं थीं. उस दौर में जब सारे कामकाज ईश्वर तथा अन्य देवताओं के नाम पर किए जाते हों—मानवकल्याण को राज्य के गठन का औचित्य बताना बड़ी बात थी. इस आधार पर हम उस कालखंड को हम मानवइतिहास का सबसे परिवर्तनकारी दौर भी कह सकते हैं. उस समय तक साम्राज्यवाद भी महज एक अवधारणा तक सीमित था. हालांकि राजाओं की महत्त्वाकांक्षाएं नजर आने लगी थीं. रामायण और महाभारत को ईसा से 800—1500 ईस्वी पूर्व की रचना माना जाता है. दोनों में साम्राज्यवाद को जगह मिली है. ‘सम्राट’, ‘विराट’, ‘चक्रवर्ती’ जैसी संज्ञाएं साम्राज्यवादी भावनाओं की देन ही हैं. मगर अपने आदि स्वरूप में ये दोनों महाकाव्यों से प्रेरित हैं, जिनके कथानक नगरराज्यों के संघर्ष की कल्पना के आधार पर रचे गए थे.

दोनों महाकाव्य आज जिस रूप में मौजूद हैं, वह मात्र 2000—2200 वर्ष पुराना है. इस बीच उनमें इतना ज्यादा प्रक्षेपण हुआ है कि मूल रचना और वर्तमान स्वरूप में अंतर कर पाना असंभव हो चुका है. दरअसल इन महाकाव्यों को, उनके वर्तमान रूप तक आतेआते अनेक सामाजिकराजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों से गुजरना पड़ा है. उनके कथ्य और कथानक दोनों ही में समयानुसार बदलाव होते रहे हैं. जिस कालखंड की हम बात कर रहे हैं, उसमें धर्म और राजनीति का वैसा, मूल्यविहीन गठजोड़ नहीं हुआ था, जैसा परिवर्ती शताब्दियों में देखने को मिलता है. उस दौर में धर्म सामान्य नैतिकता से जुड़ा हुआ था. इस कारण वह समाज और राजनीति दोनों का मार्गदर्शक बना था. मगर बुद्ध के रहते साम्राज्यवाद को पर्याप्त जमीन न मिल सकी थी, किंतु उनके निधन के एक शताब्दी बाद ही भारत में साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाएं जोर पकड़ने लगी थीं. उससे समूची व्यवस्था केंद्राभिमुखी हो गई. महाकाव्यों के बहाने धार्मिकराजनीतिक साम्राज्यवाद का महिमामंडन किया जाने लगा. उसका असर न्याय पर भी पड़ा था. प्रकृति आधारित जीवन में समाज में पर्याप्त समानता थी. लेकिन केंद्र के मजबूत होने से अभिजन वर्ग तेजी से मजबूत होने लगा था. परिणामस्वरूप वे संस्थान जिनकी जिम्मेदारी समाज में न्याय का संवितरण करने की थी, कुछ शीर्षस्थ लोगों की मनमर्जी से चलने लगे. इससे उनकी नीतियां और कार्यशैली भी अभिजनोन्मुखी होती गईं. इस केंद्रवाद के विरुद्ध समयसमय पर आवाजें भी उठती रहीं. यत्किंचित सफलता मिली, मगर हालात कुल मिलाकर अभिजात वर्ग के पक्ष में ही बने रहे.

सुकरात आदि विचारकों ने मनुष्य की सर्वोच्चता को स्वीकारा, उसे दुनिया में किसी भी वस्तु के सापेक्ष वरीयता दी थी. स्थापित किया था कि मनुष्य शक्तिशाली होने के कारण श्रेष्ठतम नहीं है. श्रेष्ठता का आधार उसका विवेक है. अपने अंतःकरण की शुभता के विस्तार के साथ ही मनुष्य अपने श्रेष्ठत्व की रक्षा कर सकता है. सुकरात के समकालीन प्रोटेगोरस का मानना था कि सृष्टि में—‘सामान्य वस्तुजगत जैसा वह है, और जैसा वह नहीं है. उन वस्तुओं का भी जो नहीं हैं. और जैसी वे नहीं हैं—के मूल्यांकन की एकमात्र कसौटी मनुष्य है.’4 मानवतावाद का उदय, जिसे सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, कन्फ्यूशियस जैसे विचारकों ने आवाज दी थी. वह धर्म और राजनीति में पनप रहे वर्चस्ववाद के विरुद्ध बड़ी आवाज थी, उसका नेतृत्व यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, प्रोटेगोरस, जीनो, चीन में कन्फ्यूशियस, ताओ आदि कर रहे थे. भारत में बौद्ध, जैन, आजीवक, लोकायत आदि दर्शन व्यक्ति को मानववैचारिकी के केंद्र में लाने की कोशिश कर रहे थे. उन्हें किंचित सफलता भी मिली थी. किंतु भिन्न परिस्थितियों के कारण उनका परिणाम ठीक वैसा नहीं निकला, जैसा पश्चिम में निकला था. इस बहाने हम भारतीय और पश्चिमी चिंतन के मूल अंतर पर विचार कर सकते हैं. वहां धर्म सामान्य नैतिकता को प्राप्त करने का एक माध्यम है. मृत्युपार जीवन एवं अमरता जैसे बिंदुओं पर वहां ज्यादा जोर नहीं दिया जाता. सुकरात, प्लेटो, कन्फ्यूशियस, जीनो से लेकर अरस्तु और तत्कालीन अन्य पश्चिमी विद्वानों के चिंतन की धुरी मनुष्य है. वे ईश्वर जैसी पराशक्ति की कल्पना तो करते हैं, मगर वह मनुष्य की सामान्य पहुंच से बाहर नहीं रहती. बुद्ध और सुकरात दोनों का मानना था कि ‘शुभत्व’ एवं ‘सद्गुणों’ में पैठ मनुष्य को इसी जीवन में पराशक्ति जितना महत्त्वपूर्ण बना सकती है. प्रोटेगोरस भी वस्तु जगत को मानवीय उपयोगिता की दृष्टि से देखता है. उसके अनुसार कोई वस्तु उतनी ही उपयोगी है, जितनी मनुष्य उसे उपयोगी मानता है. इसमें भौतिकवाद के बीजतत्व देखे जा सकते हैं. यह संकल्प एक तरफा नहीं हो सकता. वस्तुजगत मानवमात्र के लिए तभी उपयोग रह सकता है जब मनुष्य भी उसके प्रति अपनी भूमिका को पहचाने. चूंकि प्रत्येक मनुष्य की दृष्टि स्वतंत्र होती है, इसलिए वह वस्तुओं का आकलन अपने विवेक और सुख के आधार पर करने को स्वतंत्र है.

भारतीय धर्मदर्शन में पराशक्ति के आगे मनुष्य और वस्तुजगत दोनों का महत्त्व गौण हो जाता है. यहां शुभता और सद्गुणों को ईश्वरीय लक्षण माना गया है. जिसके लिए ईश्वरीय इच्छा का होना आवश्यक है. ईश्वरीय क्या है? यह बताने के लिए व्यक्ति और परमात्मा के बीच पुरोहित मौजूद है. वह प्रत्येक स्थिति की स्वार्थानुकूल व्याख्या करता है. जाति के आधार पर बंटे भारतीय समाज में बौद्धिक नेतृत्व ब्राह्मण के अधीन रहा है, जिसकी प्राथमिकता लोकहित न होकर, वर्गीय स्वार्थ रहते हैं. परिणामस्वरूप भारतीय समाज शोषक और शोषित में बंटता गया. एक वर्ग जो किन्हीं कारणवश सत्ता से विलग था, वह शोषण और उत्पीड़न का शिकार होने लगा. आज स्थितियां बदली हैं, लेकिन स्थिति कमोबेश वैसी ही है. उल्लेखनीय है कि भारत में जो कार्य पुरोहित वर्ग कर रहा था, यूनान में वही सोफिस्ट कर रहे थे. उन्हें पहली चुनौती सुकरात की ओर से मिली. अपने समय का वह विलक्षण विद्वान, विमर्शयोगी वर्षों तक अकेला ही सोफिस्टों के साथ बौद्धिक बहस करता रहा. उसने अपने समर्थकों और शिष्यों की पूरी पीढ़ी तैयार की. सुकरात और उसके साथियों के प्रभामंडल में सोफिस्टों के बौद्धिक पाखंड की कलई खुलने लगी थी, लेकिन उस संघर्ष में आरंभिक जीत सोफिस्टों के हाथ लगी. सुकरात को मृत्युदंड झेलना पड़ा. बाद में प्लेटो, अरस्तु, जीनो आदि विचारकों ने बौद्धिक क्रांति का ऐसा आगाज किया कि सोफिस्ट बेचारे बगलें झांकने लगे. उस क्रांति का असर कई शताब्दियों तक बना रहा. लेकिन मध्यकाल तक आतेआते उस वैचारिकी की आंच मद्धिम पड़ने लगी थी. धर्म का प्रभामंडल बढ़ने लगा था. उससे सारी नैतिकताएं और आदर्श ईश्वर तथा उसके प्रतिनिधियों में अवस्थित कहे जाने लगे.

एक प्रवचन के दौरान सेंट पॉल(The Act-xvii 28) कहता है—‘हम उसमें ही रहते हैं, उसमें ही विचरण करते हैं. उसमें ही हमारा अस्तित्व है.’ भारतीय दर्शनों में इसे ‘सर्व खाल्विदं ब्रह्म’ कहा गया है. मान्यता रही है कि उसे केवल ईश्वरीय कृपा से प्राप्त किया जाता है. आगे चलकर पूरब की तरह पश्चिम में भी न्याय को धर्म के संबंध में परिभाषित किया जाने लगा. मध्यकाल में वहां भी ईश्वर को समस्त जागतिक शुभता का केंद्र मान लिया गया. मानवकल्याण तथा सद्गुणों का महत्त्व ईश्वर को प्रसन्न करने की मनोकामना तक सिमट गया. धीरेधीरे धर्म के घटाटोप में न्याय शब्द विलीन होने लगा. या यूं कहें कि कुछ कर्मकांडों, ऊपरी आवरण तक सिमटकर रह गया. भारत जैसे देशों में तो धर्म को ही न्याय कहा जाने लगा था. हालांकि धर्म का कोई स्थायी रूप न था. न ही लोग उसे लेकर एकमत थे. उसकी अलगअलग परिभाषाएं थीं, अलगअलग मापदंड. अधिकांश लोग पुरोहितों और पंडितों द्वारा किए जाने वाले कर्मकांड को ही धर्म समझ लेते थे. इस कारण धर्म का स्वरूप, देश, काल, समय और व्यक्ति की अपनी भावनाओं के अनुसार बदलता रहता था. धार्मिक होने की कोई कसौटी तक न थी. व्यक्ति कुछ और न करे, बस इतना कह भर दे कि वह धार्मिक है, तो भी उसको धर्मविशेष का अनुयायी मान लिया जाता है. जिंदगीभर आधीअधूरी आरती गाकर या माला फेरकर भी धार्मिक होने का गौरव हासिल किया जा सकता है. इस तरह धर्म का दूसरा अर्थ अपने पूर्वाग्रहों या विश्वास का खुलासा कर देना भर है. यह भी न हो तो जन्म के आधार पर भी व्यक्ति का धर्म सुनिश्चित हो जाता है. यह उस समय तक बना रहता है, जब तक व्यक्ति स्वयं धर्म से बाहर जाने की विधिवत घोषणा न कर दे. धर्म की परिसीमा को लांघना लगभग असंभव है. अनेक व्यक्तियों के लिए धर्मानुसरण मजबूरी या परंपरापोषण बनकर रह जाता है. यदि धर्म जन्म से लादा न जाए, व्यक्ति को अपनी रुचि या आजीविका के अनुसार धर्म चुनने की भी आजादी हो, तो आधे से अधिक लोग खुद को धर्म के दायरे में लाने की कोशिश तक न करे करें. संभव हो तो अपनी रुचि, जरूरत और विश्वास के अनुसार एकाधिक धर्मों में साझा करें. वह स्थिति पुरोहितों और धर्म के नाम पर धंधा करने वाले धर्माचार्यों के प्रतिकूल सिद्ध होगी. हो सकता है इसकी घोषणा के सालभर के भीतर ही उनकी सारी दुकानदारी बंद हो जाए. इस बात को धर्म की धंधागिरी करने वाले भी भलीभांति जानते हैं. इसलिए जन्म के साथ ही शिशु को धर्म के खूंटे से बांध देने के प्रति सहमति हर धर्म, प्रत्येक संपद्राय में है. कुल मिलाकर धर्म अपने अनुयायियों की मूक सहमति पर भी बना रहता है, जबकि न्याय के लिए प्रबुद्ध नागरिकों की मुखर सहमति अनिवार्य है. यदि समाज में न्याय को लेकर सर्वसम्मति नहीं है, तो कहा जाना चाहिए कि उस समाज में या तो बहुत अधिक मतभेद हैं अथवा न्यायप्रणाली पर लोगों का भरोसा नहीं है. दूसरे यह भी संभव है कि शासन ने लोगों को अपनी न्यायव्यवस्था से परचाने में कोताई बरती है. कुल मिलाकर न्याय की सर्वस्वीकार्यता ही उसे न्याय बनाती है.

प्लेटो और अरस्तु दोनों की न्याय संबंधी अवधारणाओं में विरोधाभास भी कम न थे. उन दोनों ने ही दास प्रथा का समर्थन किया था. उसे वे समाज की आवश्यकता के रूप में देखते थे. कह सकते हैं कि प्लेटो का आदर्श राज्य तथा अरस्तु का नैतिकता समर्पित राज्य दोनों अभिजनोन्मुखी व्यवस्थाएं थीं. दोनों व्यवस्थाओं में दासों को न्यूनतम मानवीय अधिकारभी अप्राप्य थे. यहां तक कि उन्होंने दासों की स्थिति को विचारयोग्य भी नहीं माना था. इसका कारण यह भी हो सकता है कि प्लेटो और अरस्तु दोनों उच्च कुल से संबंधित थे. प्लेटो तो एथेंस की सत्ता के प्रमुख दावेदारों में से था. जबकि अरस्तु को सिंकदर का गुरु होने का गौरव प्राप्त है. वह स्वयं मकदूनिया के कुलीन परिवार से था. जाहिर है, भारतीय ब्राह्मणों की भांति यूनानी विचारक भी वर्गीय पूर्वाग्रहों से मुक्त न थे. स्त्रियों के संदर्भ में प्लेटो अपने समकालीन विचारकों की अपेक्षा उदार था. वह उन्हें पुरुषों के बराबर अधिकार दिए जाने के पक्ष में था, जबकि अरस्तु की लैंगिक आधार पर समाज के विभाजन के प्रति सहमति थी. उसका मानना था कि बौद्धिक और प्राकृतिक स्तर पर पिछडे़ व्यक्ति, सामाजिक स्तर पर भी पिछड़े होंगे. अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ’पा॓लिटिक्स’ में वह लिखता है, ‘सुशासित राज्य में ऐसे नागरिक जो बौद्धिक और शारीरिक रूप से अक्षम हैं, उनके सामाजिकराजनीतिक अधिकार भी आनुपातिक रूप में सीमित हो जाते हैं.’

न्याय की सार्वभौमिकता को लेकर प्राचीन भारत में भी कमोबेश यही स्थिति थी, मगर ईसा से सातआठ सौ वर्ष पहले वर्णव्यवस्था निकृष्ट जातिप्रथा का रूप लेने लगी थी. मनुस्मृति, कात्यायन स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि ग्रंथों में न केवल वर्णव्यवस्था के जाति में बदलने के प्रति मौन सहमति है, बल्कि उन समाजार्थिक असमानताओं को भी स्वाभाविक मान लिया गया है, जो धर्म और जाति की जकड़बंदी की देन थीं. मनुस्मृति में स्त्री को दोयम दर्जे का नागरिक माना गया है. उन्हें किसी मुकदमे के दौरान साक्षी नहीं बनाया जा सकता था. मनु महाराज को स्त्री की बौद्धिक क्षमताओं पर भी भरोसा न था. इसलिए स्त्री की अवमानना का कोई अवसर वह चूकना नहीं चाहता—‘निर्लोभ मनुष्य अकेला भी साक्षी के लिए पर्याप्त है. किंतु स्त्रियां अनेक होकर भी गवाही नहीं दे सकतीं. क्योंकि स्त्री चंचल, उसकी बुद्धि अस्थिर होती है.’5 स्त्रीअधिकारिता को लेकर समकालीन भारतीय विचारकों की मान्यताएं भी इसी प्रकार की थीं. मनु सहित तत्कालीन आचार्यों का यह असमानताकारी विधान केवल स्त्रियों तक सीमित न था. समाज के तीनचौथाई हिस्से को भी शूद्र की श्रेणी में रखकर उसे सामान्य न्याय से वंचित कर दिया गया था. उस व्यवस्था में धार्मिकराजनीतिक अभिजन को जो अधिकार प्राप्त थे, उनका शतांश भी महिलाओं और शूद्रों को प्राप्त नहीं था. कह सकते हैं कि न्याय की अपेक्षाओं के साथ लागू आरंभिक धर्माधारित विधान तथा शीर्षस्थ शक्तियों के वर्गीय स्वार्थ में घिरकर न्याय पटरी से उतर चुका था. परिणामस्वरूप पूरी व्यवस्था समाज के बड़े वर्ग के लिए शोषणकारी तंत्र का रूप ले चुकी थी.

आरंभ में आर्थिक अभिजन का विकास नहीं हो पाया था. उसके अवसर भी कम ही थे. आय का स्रोत या तो पशुधन होता था, अथवा भूसंपदा. दोनों ही पर समाज के शीर्षस्थ वर्गों का अधिकार था. वह व्यवस्था शताब्दियों तक बनी रही. धीरेधीरे शिल्पकर्म का विकास हुआ. समाज में शिल्पकारों की मांग बढने लगी. आरंभ में शिल्पकार वर्ग स्वयं अपनी बनाई कृतियों का व्यापार करता था. उनके संगठन देशदेशांतर में समूहबद्ध होकर व्यापार करते थे. कालांतर में मांग बढ़ने के साथ निर्माण और व्यापार दोनों को साधना कठिन होने लगा. इससे बिचौलिये के रूप में व्यापारी वर्ग का उदय हुआ जो उत्पादक और क्रेता के बीच पुल की तरह काम करने लगा. 2600—2700 वर्ष पहले तक इस वर्ग ने अपनी आर्थिक हैसियत इतनी मजबूत कर ली कि राजनीतिक और धार्मिक अभिजनों के लिए उसकी उपेक्षा करना असंभव हो गया. राजकीय आयोजनों में श्रेष्ठि वर्ग को ससम्मान आमंत्रित किया जाने लगा था. परिणाम यह हुआ कि समाज में तीसरे वर्ग को भी अभिजन की श्रेणी में शामिल करना पड़ा. उससे शिल्पवर्ग, किसान और मजदूर जो समाज का वास्तविक उत्पादक वर्ग था, चैथी श्रेणी में खिसक गया. धार्मिक शक्तियों ने चतुराईपूर्वक चार वर्णो को मान्यता दे दी. यह मात्र 2200-2300 वर्ष पुरानी घटना है. उस समय तक न केवल, भारत बल्कि दुनिया के सभी देशों में धर्म का प्रभुत्व कायम हो चुका था. परिणामस्वरूप सभी कार्य तीसरीचैथी अदृश्य शक्तियों, जिन्हें ईश्वर, देवता आदि कहा जाता था, जबकि असलियत में उनका अपना कोई अस्तित्व न था, के नाम पर होने लगे. इससे व्यक्ति और व्यक्ति कल्याण जैसे शब्द विमर्श से गायब होने लगे; अथवा उन्हें खास संदर्भ में देखा जाने लगेगा.

चूंकि ईश्वर अभिजन मनोरचना थी तथा उसे सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञाता, संसार के सर्जक के रूप में प्रयुक्त किया था, इसलिए उसका व्याख्याता होने का दावा करने वाला ब्राह्मण हमेशा ही शीर्ष पद का दावेदार बना रहा. बाकी वर्गों की सामाजिक हैसियत ब्राह्मणों द्वारा की गई व्याख्या द्वारा निर्धारित थी. अपनेअपने स्वार्थ के वशीभूत शेष दोनों वर्ग ब्राह्मणों द्वारा विनिर्मित व्यवस्था का समर्थनसंवर्धन करते रहे. शीर्षस्थ तीनों वर्गों वैश्य, ब्राह्मण एवं क्षत्रिय की संख्या कुल जनसंख्या के चैथेपांचवे हिस्से तक सीमित थी, जबकि निर्णय लेने के सारे अधिकार और अस्सी प्रतिशत संसाधन इन्हीं वर्गों के अधिकार में थे. चौथे वर्ग के शेष तीनचौथाई से अधिक लोग उनकी मनमानी सहने को विवश थे. यहां एक बात विचारणीय है. यह कि जातिप्रथा का प्रभाव केवल भारत तक सीमित था, किंतु किसी न किसी आधार पर समाज का लगभग ऐसा ही स्तरीकरण दुनिया के उन सभी देशों में हुआ जहां संस्कृति धर्म की चेरी बन चुकी थी; और धर्म सभ्यता के प्रत्येक चरण पर छाया हुआ था. जहां और कुछ न मिला, वहां पूजापद्धति और विश्वास के आधार पर धर्म के भीतर ही अनेक पंथ बना दिए गए. पूजापद्धति, परंपरा, टोटम और आराध्य के नाम पर एकदूसरे को मरनेमारने पर उतारू लोग समाज के जातीय विभाजन तथा उसके माध्यम से होने वाले उत्पीड़न के आगे मौन रहते थे. सही मायने में वे अभिजनसंस्थाएं थीं. जिनका गठन समाज के अभिजात वर्ग द्वारा अभिजन हितों की सुरक्षा के लिए किया गया था. भारत में धर्म सांस्कृतिक बदलावों के अलावा निकृष्ट जातीय विभाजन का भी आधार बना था, जिसने सामाजिक असमानता को स्थायी रूप देने में मदद की. कालांतर में धर्म और जातिप्रथा का संबंध नाभिनाल का बन गया. अपनेअपने स्वार्थ के लिए दोनों एकदूसरे का समर्थनसंबर्धन करने लगे. ऐसा नहीं है कि धर्म और जातिप्रथा का कभी विरोध ही नहीं हुआ. जातिप्रथा पर बड़ी चोट गौतम बुद्ध की ओर से पड़ी थी. जैन धर्म ने भी अपनी तरह से ब्राह्मणों के कर्मकांड और जाति प्रथा को चुनौती देने की कोशिश की. किंतु कालांतर में वह स्वयं एक जाति के रूप में सिमटकर रह गया. बुद्ध के अनुयायी भी जाति, वर्ण, तंत्रमंत्र आदि में विश्वास करने लगे. चूंकि धर्म और जातिप्रथा दोनों ही सामाजिक असमानता के पोषक और संवर्धक थे, अतएव इनके चलते भारत में सांस्कृतिकसामाजिक न्याय सदैव एक सपना बना रहा. निहित स्वार्थ के लिए भारतीय मनीषी धर्म का महिमामंडन करते रहे. इससे भारत में सामाजिक न्याय के लक्ष्य को छूना सदैव चुनौतीपूर्ण रहा है. सामाजिकसांस्कृतिक असमानताओं के चलते भारतीय समाज सदैव आंतरिक संघर्ष और विक्षोभों की संघर्षस्थली बना रहा. आशय है कि जिस धर्म को समाज में न्याय और नैतिकता की स्थापना हेतु उपकरण के तौर पर अपनाया गया था, कालांतर में उसके आगे न्याय एवं नैतिकता का महत्त्व गौण पड़ने लगा. निरर्थक कर्मकांड और जड़ विश्वास न्याय एवं नैतिकता का स्थान लेने लगे. यह समाज में धार्मिक शक्तियों के बलशाली होते जाने का प्रमाण था. आगे चलकर यह भारतीय चिंतन परंपरा के प्रमुख चरित्र में ढलता गया. ऐसे बुद्धिविरोधी परिवेश में वाराहमिहिर जैसा खगोलशास्त्री और गणितज्ञ भी यदि अपनी प्रतिभा मूर्तियों की कदकाठी और रूपाकार तय करने में खपाने लगे तो आश्चर्य क्यों हो. उसने मौलिक चिंतन को अवरुद्ध करने का काम किया.

मध्यकालीन यूरोप में संत अगस्ताइन(13 नवंबर, 354—28 अगस्त 430), थाॅमस एक्वीनस(1225—7 मार्च 1274) आदि ने न्याय की व्याख्या के लिए ईसाइयत को आधार बनाया. ईसा मसीह का चरित्र समाज के विपन्न और सर्वहारा का प्रतिनिधित्व करता था. इसलिए उसमें न्याय एवं नैतिकता को लेकर मौलिक चिंतन लगातार होता रहा. संत अगस्ताइन और एक्वीनस दोनों ही मध्यकालीन धर्म और न्याय के बीच सेतु बनाने के समर्थक थे. दोनों में से एक आदर्शवादी था, दूसरा व्यवहारवादी. प्लेटो से प्रभावित अगस्ताइन मानवादर्शों को महत्त्व देता था, मगर ईसाइयत से परे झांकने का उसमें साहस न था. वह न्याय को धर्म की उपलब्धि के रूप में देखता था. अगस्ताइन के अनुसार ‘न्याय उन चार चीजों में प्रमुख है, जिनके माध्यम से ईश्वर को प्यार किया जा सकता है.’ मानवादर्श एवं नैतिकता की उठान को दर्शाने वाले अन्य बुनियादी सद्गुणों से भेद करते हुए अगस्ताइन ने न्याय को व्यक्ति एवं शेष समाज के मध्य ‘पवित्र रिश्ते’ की संज्ञा दी है. न्याय पथ पर गतिमान व्यक्ति ही अपने और शेष समाज के बीच पवित्र रिश्ता बना सकता है. न्याय न केवल व्यक्ति के भीतर सहिष्णुता और समरसता पैदा करता है, बल्कि अन्य सद्गुणों की भांति यह भी हमें ईश्वरीय साक्षात का पात्र बनाकर उत्तरोत्तर उसके करीब ले जाता है. न्याय पथ पर बढ़ रहे व्यक्ति की पहली लड़ाई अपने आप से ही होती है. उसका पहला चरण अपने मन में छिपे ‘शुभत्व’ की पहचान से शुरू होता है, ‘न्याय मनुष्य के अंतर्मन में छिपा होता है.’ अच्छे और बुरे के बीच मानवमन का अंतद्र्वंद्व हमेशा चलता रहता है. सामान्य नैतिकता मनुष्य के आत्मसंघर्ष के दौरान नकारात्मक वृत्तियों के शमन में सहायक होती है. जब तक यह संघर्ष समाप्त नहीं हो जाता, तब तक न्याय की प्राप्ति भी अलभ्य बनी रहती है. इसलिए न्याय की चाहत रखने वाले मनुष्य को उसकी शुरुआत अपने आप से ही करनी पड़ती है.

अगस्ताइन प्लेटो के आदर्श राज्य की संकल्पना को पसंद करता था. लेकिन प्लेटो का आदर्श राज्य जहां श्रेष्ठतम मनुष्यों की मिलीजुली सर्वोत्तम रचना थी, वहीं अगस्ताइन का आदर्श राज्य ईश्वरीय अनुकंपा और उसकी उपस्थिति से बनता है. अपनी इस आदर्शवादी कल्पना को अगस्ताइन ईसाइयत के माध्यम से संभव बनाना चाहता था. उसका कहना था कि प्लेटो के आदर्शवाद एवं अरस्तु के नैतिकता केंद्रित व्यवहारवाद को धर्म के संदर्भ में देखना चाहिए. उसके अनुसार धर्म मनुष्य को विनम्र बनाता है. धर्म में विश्वास रखते हुए ही न्याय के लक्ष्य को संभव बनाया जा सकता है. इसके लिए आंतरिक शुद्धता अपरिहार्य है. न्याय का ध्येय प्रत्येक व्यक्ति को वह सबकुछ देना है, जो उसका है, जिसकी उसे आवश्यकता है; या जो उसे मिलना चाहिए. ईश्वर सत्य और मानवउद्धार की भावना के परे कुछ नहीं है. जो लोग न्याय और सचाई के रास्ते पर हैं, वही ईश्वर के रास्ते पर भी हैं. जागतिक संसार ईश्वरीय चेतना का विस्तार है. न्याय ईश्वर के प्रति प्रार्थना है. जबकि अन्याय पाप और ईश्वर के प्रति अपराध. ईश्वरीय न्याय ही दैविक न्याय है, जिसमें न्यायपथ पर चल रहे व्यक्ति के हिस्से ईश्वरीय अनुकंपाएं आती हैं, जबकि न्याय की अवमानना करने वालों के प्रति ईश्वर का कोप. न्याय की कामना करने वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह खुद को पहले अपने आप से, फिर पड़ोसी से और उसके बाद शहर या गांव से जोड़े. अगस्ताइन को न्याय बिना ईश्वरीय अनुकंपा के कहीं दिखाई नहीं पड़ता. इसके पीछे उसके जीवन की त्रासदी को देखा जा सकता है. अगस्ताइन का जन्म अफ्रीका मे हुआ था. उसका बचपन बड़ी संघर्षमयी परिस्थितियों में बीता था. अतएव जीवन की प्रत्येक उपलब्धि, अप्रत्याशित की प्राप्ति उसे ईश्वरीय अनुकंपा प्रतीत होती थी. सिसरो के शब्दों में राज्य, ‘अधिकारों तथा सामान्य हितों पहचान तथा सामान्य कल्याण की प्राप्ति हेतु— मानवीय संबंधों का सुदृढ़ एवं बहुआयामी अनुबंध है.6 रोमन साम्राज्य के वैभव एवं उसकी बौद्धिक उपलब्धियों की प्रायः सभी विचारकों ने प्रशंसा की है. लेकिन अगस्ताइन को उससे संतोष न था. उसका मानना था कि रोमन साम्राज्य सिवाय एक बेहतर राजनीतिक बस्ती के और कुछ न था. अपनी चर्चित पुस्तक ‘सिटी आफ गाड’ में अगस्ताइन ने लिखा था कि रोमवासी बुतपरस्त और दुनियावी लोग थे. सच्चा न्याय केवल ‘ईश्वर के राज्य’ में संभव हो सकता है. स्थायी न्याय के लिए राज्य को ईश्वरीय अनुराग पर टिका होना चाहिए. कानून का राज्य जैसी कोई अवधारणा नहीं हो सकती. जिस राज्य में न्याय नहीं हैं, मान लेना चाहिए कि वहां कोई कानून भी नहीं है.’

अगस्ताइन ईसाई धर्म की करुणा को राज्य की न्यायभावना का आदर्श मानता था. इसलिए सिसरो द्वारा दी गई राज्य की परिभाषा जिसके अनुसार राज्य वस्तुतः ‘राज्य सामान्य हितों की प्राप्ति तथा मानव अधिकारों की पहचान हेतु नागरिकों का मजबूत बहुआयामी गठजोड़ है’—का उसने समर्थन किया था. उसके अनुसार न्याय का अभीष्ट है कि कोई भी व्यक्ति किसी को भी नुकसान न पहुंचाए; तथा उनमें से प्रत्येक को जरूरतमंद की इतनी मदद करनी चाहिए, जितनी वह कर सकता है. लेकिन राज्य का काम अपने नागरिकों की मदद करने मात्र से नहीं चल पाता. राज्य की उदारता तो उसकी नीतियों तथा उसके लिए किए गए गंभीर प्रयत्नों में नजर आनी चाहिए. राज्य को हमेशा यह कोशिश करनी चाहिए कि उसके प्रत्येक नागरिक को अपने विकास का अवसर मिले. किसी आपदा अथवा संकट के समय नागरिकों की मदद करना अच्छे राज्य का लक्षण हो सकता है. लेकिन चैरिटी को ही न्याय का पर्याय मान लेना भारी भूल होगी. ‘खैरात ऐसा विकल्प नहीं है, जिससे न्याय की पूर्ति हो सके.’7 अगस्ताइन के अनुसार आदर्श समाज का गठन बिना ईश्वरीय प्रेरणा के असंभव है. इसके लिए वह सामाजिक अनुशासन से अधिक व्यक्तिगत अनुशासन को महत्त्व देता है. उसका मानना था कि समाज परिवर्तनशील है. वह घूमफिर कर फिर उसी स्थान पर लौट आता है. व्यक्ति को इससे बचना चाहिए. उसके अनुसार, ‘यदि नागरिक स्वयं मर्यादित नहीं होंगे तो निश्चित रूप से उनसे बनी सभा भी मर्यादित नहीं रह पाएगी.’8

अगस्ताइन और एक्वीनस के बीच लगभग आठ शताब्दियों का अंतर है. वैचारिक दृष्टि से देखें तो इस अंतराल को हम ठहरा हुआ पाते हैं. उस समय तक धर्म और साम्राज्यवाद एक हो चुके थे. मनुष्य की आध्यात्मिक चेतना एवं जिज्ञासाओं के समाधान के रूप में उभरा धर्म साम्राज्यवादियों के लिए बड़ा हथियार सिद्ध हुआ था. जनसाधारण को बताया जाने लगा कि उनकी सत्य की तलाश पूरी हो चुकी है. उस सत्य के कई रंग थे. वह भारत में जाति और वर्ण के अलगअलग खानों में बंटा हुआ था. उनके बीच अलंघ्य दूरियां थीं. बुद्धिजीवी वर्ग का भी उसे समर्थन था. परिणाम यह हुआ कि पूरब और पश्चिम में हर जगह समाज की मेधा का बड़ा हिस्सा अपनेअपने धर्म के महिमामंडन में जुट गया. लोगों की रुचि और जरूरत के अनुसार देवता गढ़े जाने लगे. धर्म जीवन की उपयोगिता तीसरी शक्ति को प्रसन्न करने में खोजता था. उसके प्रभाव में प्रयाण गीत के स्थान पर प्रार्थनाएं गाई जाने लगीं. पुरुषार्थ के स्थान पर दैन्य छाने लगा. चाटुकारिता के उस दौर में स्वाभिमान मरने लगा. मनुष्य मनुष्य को महत्त्व दे, पूरे समाज की खुशी के लिए काम करे—इस विचार का अब कोई महत्त्व नहीं रह गया था. शुभता और सद्गुण जिन्हें गौतम बुद्ध, सुकरात, कन्फ्यूशियस जैसे महान विचारकों ने मनुष्य में अवस्थित मानते हुए मानवीय पहचान से जोड़ा था, वे ईश्वर में अवस्थित कहे जाने लगे. न्याय और समानता के दुर्दिनों की शुरुआत वहीं से हुई. धर्म के केंद्रीयवाद ने साम्राज्यवाद को शक्तिशाली बनाया था. इससे उसके निर्णयों पर निरंकुशता छाने लगी. धर्म के नाम पर, देवता के नाम पर शोषण के नएनए तरीके खोजे जाने लगे. उन्हें पुरोहित वर्ग का पूरा समर्थन हासिल था. इससे असमानता पनपी. समाज साधारण, विशिष्ट और अतिविशिष्ट लोगों में बंटने लगा. जो विशिष्ट और अतिविशिष्ट श्रेणी के थे, उनके लिए जनसाधारण का, सिवाय इसके कि वे शासित रहकर उसके शासक होने के दर्प की पूर्ति करते थे—कोई महत्त्व न था.

क्षीण होती नैतिकता के प्रभाव में न्याय के मायने दंड और पुरस्कार तक सीमित रह गए. मौलिकता से कट जाने के कारण बारबार पीछे मुड़कर देखने की प्रवृत्ति ने जन्म लिया. भारत में बारबार वेदों, उपनिषदों, पुराणों और महाकाव्यों की दुहाई दी जाने लगी तो पश्चिम में किसी न किसी बहाने सुकरात, प्लेटो और अरस्तु से संदर्भ लेकर ज्ञानसाधना की भूख का समाधान किया जाने लगा. 2500—2600 वर्ष पहले ज्ञान का जो प्रकाश पूर्व और पश्चिम दोनों जगह लगभग साथसाथ फैला हुआ था, उसका तेज दोनों ही जगह मद्धिम पड़ने लगा. प्रकृति के सान्निध्य में पलने वाले आदिम मनुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासा जो कभी बहते नीर के समान निर्मलपावन थी, वह धर्म और संप्रदाय के नाम पर बने तालाबों, पोखरों में फंसकर गंदली होने लगी. शताब्दियों बाद भी प्लेटो, अरस्तु, सुकरात, गौतम बुद्ध आदि प्रासंगिक बने रहे तो इसका कारण यह भी है कि धर्म हमारे दिलोदिमाग पर कब्जा कर, हमारे मौलिक चिंतन पर कब्जा कर चुका था. अगस्ताइन ने प्लेटो के आदर्शवाद पर जोर दिया था. उससे आठ सौ वर्ष बाद जन्मा थाॅमस एक्वीनस अरस्तु के नैतिक दर्शन का समर्थक था. उसने मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों पर जोर दिया था. लेकिन ईश्वर के नाम पर. यह कहते हुए कि ईश्वर ऐसा चाहता है. न कि इसलिए कि मानवीय स्वतंत्रता की गरिमा हेतु मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों की सुरक्षासंरक्षा आवश्यक है. कुछ खूबियां भी उसकी विचारधारा में थीं. यदि वे न होतीं तो आठ सौ वर्ष लंबे अंतराल में विस्मृति उसे कभी का शिकार बना चुकी होती. एक्वीनस का जोर मानवीय नैतिकता पर था. धर्म को वह समाज में न्याय एवं नैतिकता की स्थापना के लिए आवश्यक मानता था. उसकी आस्था शुभत्व की भावना से प्रेरित थी. एक्वीनस का सुझाव था कि मनुष्य को स्वयं को नैतिकता की कसौटी पर लगातार कसते रहना चाहिए. प्रकृति के सापेक्ष लोक उत्तरवर्ती रचना है. अतएव ईश्वरीय नियमों की महत्ता लौकिक नियमों से अधिक है. तदनुसार मनुष्य के मौलिक अधिकार किसी राज्य अथवा समाज के अधिकार से बढ़कर नहीं होने चाहिए. उसके अनुसार न्याय सदैव ईश्वरीय सत्ता पर निर्भर होता है. अरस्तु की न्याय की परिभाषा को आगे बढ़ाते हुए एक्वीनस ने लिखा था—न्याय मानव समाज का हिस्सा है. जिसके अनुसार प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि नागरिक कल्याण के लिए वह सब करे, जीजान से करे, जो वह कर सकता है.

फिर न्यायाधीश किसे माना जाए? एक्वीनस इसके बारे में भी आश्वस्त है. न्यायाधीश को ‘न्यायमूर्ति’ की संज्ञा दी है—‘न्यायाधीश वह है जो अपने आदेश और निर्देश के माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति को वह सब देता है, जिसका वह अधिकारी है. उसके अनुसार न्याय का मानवीकरण ही न्यायाधीश है. वही न्याय का संरक्षक भी है.’9 वह हमेशा यह ध्यान रखता है कि मनुष्य को जो अधिकार प्राकृतिक रूप से प्राप्त हैं, उनमें किसी भी प्रकार की कटौती न हो. ईश्वर प्रथम न्यायकर्ता, सबसे बड़ा न्यायाधीश है. वह सबको प्राकृतिक न्याय का बोध कराता है, जिसमें सबके लिए समानता और स्वतंत्रता है. यही कारण है कि प्राकृतिक न्याय, लौकिक न्याय से सदैव ऊपर होता है. उनमें कोई विरोधाभास भी नहीं है. समाज का गठन ही सामान्य अधिकारों की पहचान के साथसाथ परस्पर सहयोग करते हुए आगे बढ़ते रहने के लिए हुआ है. अरस्तु ने न्याय को संवितरणात्मक और योग्यतानुपाती माना था. संवितरणात्मक न्याय राज्य की उदारता, कार्यक्षमता और सामाजिक दायित्वों के प्रति उसकी गंभीरता का द्ययोतक है. वह सामाजिक विषमताओं के समाधान हेतु राज्य की गंभीरता तथा उसके कौशल को दर्शाता है. योग्यतानुपाती न्याय राज्य की नागरिकों की योग्यता और आवश्यकता के अनुसार, कारगर निर्णय लेने की योग्यता का प्रदर्शन करता है. इसका संबंध नागरिकों की योग्यता तथा उनके द्वारा समाज के हित में किए गए योगदान से है. न्याय की परिभाषा को लेकर एक्वीनस की अरस्तु से सहमति थी. उसके अनुसार न्याय सभी सद्गुणों में सर्वोत्तम है. मानवमात्र का कर्तव्य है कि समाज में न्याय की श्रीवृद्धि के लिए निरंतर प्रयत्नरत रहे. यह दूसरों से अपेक्षा के चलते हरगिज नहीं हो सकता. मनुष्य स्वयं न्याय की ओर तत्पर होगा, तभी न्यायआधारित समाज का गठन संभव है. चुनौती बड़ी है. लेकिन मनुष्यता के सर्वांग कल्याण हेतु सिवाय इसके दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है. बकौल एक्वीनस समाज की अनेकानेक समस्याओं की जड़ उसमें न्याय की अनुपस्थिति है. यूं तो सारी सृष्टि परमात्मा की, परमात्मा में ही अवस्थित है. लेकिन विभिन्न प्रकार के दबावों के विरुद्ध अपने श्रमकौशल और परिश्रम से मनुष्य जो कुछ अर्जित करता है, उसके सुखोपभोग का अधिकार उसे मिलना ही चाहिए. इसके लिए एक्वीनस ने व्यक्तिगत संपत्ति के विचार का समर्थन किया था. व्यक्तिगत संपत्ति ईश्वरीय अनुकंपा है. लेकिन दूसरे की संपत्ति पर कब्जा करना. उसे चुराना या हड़प लेना दोनों ही अन्याय के प्रतिमान हैं. ईसाई धर्म कहता है—तुम अपने पड़ोसी को उतना ही प्यार करो, जितना अपने आप से करते हो. ईश्वर से भी उतना ही प्यार करना चाहिए, जितना स्वयं से करते हैं. बस यहीं हमारे विरोधाभास सामने आने लगते हैं. हम कथित ईश्वर से उतना प्यार कर ही नहीं सकते, जितना स्वयं से करते हैं. इस तरह हम खुद और ईश्वर की सृष्टि के बीच के अंतर करने लगते हैं. एक्वीनस की दृष्टि में यह ईश्वरीय सत्ता में अविश्वास करने जितना बड़ा पाप है. निजी संपत्ति पर अधिकारिता को वह प्राकृतिक मानता था. उसके अनुसार किसी को उसकी संपत्ति से वंचित कर देना या उससे बलात् छीन लेना दोनों ही पाप हैं.

अरस्तु की भांति एक्वीनस ने भी दासप्रथा का समर्थन किया था. मगर स्त्रियों को उपयुक्त अधिकार दिए जाने चाहिए, इसे लेकर दोनों ही सहमत थे. एक्वीनस के अनुसार चूंकि ईश्वर सर्वोत्तम है, अतः मनुष्य केवल ईश्वर के साम्राज्य में खुश हो सकता है. मनुष्य का राज्य उसे असंतोष और पीड़ा के सिवाय कुछ नहीं दे सकता. इसके लिए मनुष्य को अपनी आस्था केवल परमात्मा और उसकी नैतिक सर्वोच्चता में बनाई रखनी चाहिए. सामाजिकआर्थिक विषमता का होना भी ईश्वरीय मान्यता के अनुसार पाप है. प्रकृति प्राणिमात्र के प्रति समभाव रखती है. राज्य और उसके नागरिकों की कोशिश होनी चाहिए कि समाज में किसी भी प्रकार की विषमता न फैले. अतः जो व्यक्ति ईश्वर के प्यार को सचमुच प्राप्त करना चाहता है, उसका प्राकृतिक समानता के मूलभूत दर्शन में विश्वास रखना अत्यावश्यक है. अगस्ताइन और एक्वीनस दोनों के लिए न्याय आस्था का विषय है. वह इसलिए आवश्यक है क्योंकि ईश्वर ऐसा चाहता है; या उससे कथित ईश्वर को खुशी मिलती है. आखिर ये बड़ेबड़े विचारक व्यक्ति के लिए न्याय की खोज करतेकरते लोग ईश्वर तक क्यों चले जाते हैं? ईश्वर की खुशी व्यक्तिमात्र की खुशी का पर्याय भला कैसे हो सकती है? ईश्वर को यदि किसी ने देखा नहीं, यदि वह केवल अवधारणा तक सीमित है, तो क्यों नहीं व्यक्ति की खुशी को ही न्याय की कसौटी मान लिया जाए? दूसरे शब्दों में न्याय यदि मनुष्य की जरूरत है तो उसको मनुष्य की इच्छा और रुचि के अनुरूप क्यों नहीं होना चाहिए? अगस्ताइन, एक्वीनस हो या कोई और अध्यात्मवादी, ऐसे सवालों पर विचार नहीं करते? अनेक तो ऐसा सोचना भी ‘कुफ्र’ मानते हैं. उनके लिए कथित ईश्वर प्रत्येक समस्या का समाधान है. हालांकि सिवाय आस्था के, जैसा दूसरे अध्यात्मवादी दावा करते हैं, वे कथित ईश्वरीय इच्छा अथवा समस्या के समाधान को लेकर दूसरों को आश्वस्त कर पाना तो दूर, खुद भी डांवाडोल रहते हैं. धर्म के इन विरोधाभासों पर जो न्यायभावना पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, यशपाल का कहना है—

जो लोग विद्वान हैं, शक्ति संपन्न हैं, उनके लिए ईश्वर का होना न होना बराबर है. ईश्वर का भय या विश्वास उन्हीं लोगों के लिए आवश्यक है जो सत्य, धर्म और उचित को स्वयं नहीं पहचान सकते. सत्य, धर्म और उचित को कौन पहचान सकता है, और कौन नहीं पहचान सकता; यह बात बहुत हद तक इस बात पर भी निर्भर करती है कि सत्य, धर्म और उचित क्या है और उसे निश्चित किसने किया है. जो व्यक्ति या श्रेणी सत्य, धर्म, उचित और न्याय का निश्चय करती है, सत्य, धर्म और न्याय को समझने में कोई कठिनाई उस श्रेणी को नहीं हो सकती. क्योंकि सत्य, धर्म और न्याय स्वयं उन्हीं की इच्छा के अनुसार, स्वयं उन्हीं के मस्तिष्क से, उनकी आवश्यकताओं और हितों को पूरा करने के लिए पैदा होते हैं. इस प्रकार के धर्म और न्याय का पालन करने के लिए इन लोगों को किसी भय की आवश्यकता नहीं, न समाज में कायम शासन की, न ही ईश्वर की आज्ञा की.’11

फिर आस्था को ढोते रहने का कारण? इसके पीछे सामाजिक परिस्थितियों की भूमिका कम नहीं है. दो सहस्राब्दी पूर्व बड़े राज्यों के गठन में धर्म की भूमिका सकारात्मक रही थी. पूरब हो या पश्चिम हर जगह मनुष्य को लगा था कि समाज में शांति और सुव्यवस्था के लिए धर्म अपरिहार्य है. एक सीमा तक धर्म ने इस जिम्मेदारी को संभाला भी. लेकिन धर्म की ताकत के भरोसे नहीं. बल्कि जो शक्तियां धर्म के माध्यम से समाज के शिखर पर विराजमान थीं, जनाक्रोश से बचने के लिए उन्हें उतना करते हुए दिखना आवश्यक था. दूसरा कारण परिपक्व राजनीतिक दर्शन का अभाव था, जो उनीसवीं शताब्दी तक बना रहा.

न्याय के संदर्भ में मध्यकाल के दौरान भारत और पश्चिमी जगत की स्थिति को देखें तो दोनों में पर्याप्त समानता दृष्टिगत होती है. दोनों ही जगह न्याय की मांग या उसकी अपेक्षा किसी तीसरी शक्ति यानी ईश्वर के नाम पर की जाती है. अंतर केवल इतना है कि पश्चिम में अगस्ताइन, एक्वीनस आदि विद्वान जिसे ईश्वरीय अनुकंपा मानते हैं, भारतीय ग्रंथकार उसे धर्म की संज्ञा देकर कर्मकांडों में ढाल देते हैं. तार्किक वस्तुनिष्ठता न यहां है न वहां. दोनों में अंतर उत्तर मध्यकाल के दौरान सामने आता है. उसे हम वास्तविक परिवर्तन का बीजारोपण भी कह सकते हैं. उसके परिणाम क्रांतिकारी सिद्ध हुए. चूंकि धर्म और सामंतवाद अपने उद्भवकाल से ही एकदूसरे को मजबूत करते आए थे, उन दिनों भी वे निर्णायक भूमिका में थे—इसलिए वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत के लिए अभी कुछ और शताब्दियों तक प्रतीक्षा करनी थी. यूरोप की वैचारिक क्रांति को हवा देने वाला वह दौर वैज्ञानिक क्रांति का था, जिसने समाज के सभी वर्गों को प्रभावित किया था. उसकी नींव रखने वाले दो प्रमुख वैज्ञानिक थे. पहला निकोलस कापरनिकस, जिसने सूर्य को सौरमंडल का केंद्र सिद्ध कर, अनेक रूढि़यों और जड़मान्यताओं पर प्रहार किया था. दूसरा भौतिक विज्ञानी आइजक न्यूटन. कापरनिकस की पुस्तक ‘दि रिबोल्युशन आरबिट’(1543) तथा न्यूटन की पुस्तक ‘दि प्रंसीपिया मेथमैटिका’(1657) ने धर्म और रूढि़यों के मकड़जाल में फंसे समाजों में ऐसा क्रांतिकारी आगाज किया, जिसे झुठलाने या उपेक्षित करने की हिम्मत किसी में न थी. उससे पूरे यूरोप में वैचारिक क्रांति की लहर उठी. इतनी तेज कि एक ही झटके में अनेकानेक जड़ मान्यताओं और पूर्वाग्रहों को अपनी रौ में बहा ले गई. उससे आगे चलकर एक वैज्ञानिक समाज का जन्म हुआ. भारतीय विद्वानों का दावा है कि जो कार्य पश्चिम में काॅपरनिकस ने सोलहवीं शताब्दी में किया था, अपने यहां उसकी शुरुआत आर्यभट्(476—550 ईस्वी) और ब्रह्मगुप्त(598—670 ईस्वी) बहुत पहले कर चुके थे. इसमें सचाई हो सकती है. यदि ऐसा है तो उसके लिए दोषी स्वयं भारतीय मनीषा है, जो धर्म और रूढि़यों में फंसकर अपनी मौलिकता गंवा चुकी थी. वह बात ईश्वरीय न्याय की करती है, लेकिन यदि किसी पर स्वतंत्रता, समानता और अस्मिता पर संकट आ पड़े तो उसे भगवान भरोसे छोड़ देती है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि आर्यभट् प्रतिभावान खगोलशास्त्री और गणितज्ञ था. कापरनिकस से बहुत पहले वह इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका था कि सौरमंडल का केंद्र पृथ्वी न होकर सूर्य है, जो पृथ्वी अपने कक्ष पर चक्रण करती रहती है. उसी से रातदिन का मेला लगता है—

जिस तरह आगे बढ़ रही नाव में बैठा व्यक्ति किनारे पर मौजूद पेड़पौधे आदि स्थायी वस्तुओं को विपरीत दिशा में गति करता हुआ देखता है, उसी प्रकार श्रीलंका में स्थिर किसी प्रेक्षक को तारे पश्चिम की ओर जाते हुए दिखाई देंगे.’12

भारतीय मनीषियों की कमजोरी रही कि उनकी भाषा या तो बहुत आलंकारिक रही अथवा अत्यंत प्रतीकात्मक. सीधीसधी भाषा और विवेचनात्मक शैली में तथ्यात्मक लेखन के उदाहरण यहां बहुत विरल हैं. उपर्युक्त उदाहरण में आर्यभट् पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने का सीधेसीधे उल्लेख नहीं करता, बल्कि पाठक को स्वयं निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए छोड़ देता है. इससे उनकी टीका करने वालों को मनमानी व्याख्या करने का अवसर मिल जाता है. कापरनिकस तथ्यों को वैज्ञानिक की भांति प्रस्तुत करता है. मौलिक गणितज्ञ होने के साथसाथ आर्यभट् प्रतिभा में किसी से पीछे न था. बावजूद इसके, कदाचित तथ्यों के प्रस्तुतीकरण की कमी के चलते, श्रेय काॅपरनिकस और न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों को मिला, जिसने वैज्ञानिक सत्यों का सुसंगत अन्वेषण किया था. वैज्ञानिक क्रांति से प्रकृति के नएनए रहस्य सामने आने लगे. इससे प्राकृतिक उपादानों को देखने की नई दृष्टि का विकास हुआ. धीरेधीरे यह तथ्य भी सामने आया कि जो ऊर्जा एक पहाड़ के भीतर है, वही एक कण में भी अंतर्निहित है. प्रकृति केवल माया नहीं है. बल्कि उसका अस्तित्व है. उसे प्रयोगशाला में सिद्ध किया जा सकता है. शोध के दौरान यह तथ्य भी जगजाहिर हुआ कि कण मात्र में वैसी ही ऊर्जा है, जैसी कल्पना आध्यात्मशास्त्री पुराणों, धार्मिक गल्पों, टोटमों, देवताओं और दानवों आदि में करते आए थे. यूं तो जैन दर्शन का ‘पुद्गलवाद’ चर्चित रहा है, जिसे जीवन ऊर्जा से सराबोर माना गया है. लेकिन भारत में ईश्वर का मिथक हर प्रतीक पर सवार रहा है. कण को कण की तरह देखने वाली दृष्टि, सृष्टि को इस मिथक से परे देख ही नहीं पाती. इस कारण जैन दर्शन का ‘पुद्गलवाद’ एवं वैशेषिक का ‘अणुवाद’ केवल दार्शनिक ग्रंथों की शोभा बने जाते हैं. विज्ञान की ताकत तथ्यों की वस्तुनिष्ठ एवं तर्कसम्मत विवेचना में है. वैज्ञानिक जो कह रहे थे, वह प्रयोगशाला में सिद्ध था. इसीलिए सही मायने में जनवादी सोच का बीज वहीं से पड़ा. कालांतर में वही बड़े सामाजिक, राजनीतिक परिवर्तनों का कारण बना.

बहरहाल, सांस्कृतिक प्रतीकों और मिथकों के समर्थनविरोध में चाहे जितने वैज्ञानिक तथ्य हों, उनसे जुड़े प्रभाव और दुराग्रह इतनी जल्दी पीछा छोड़ने वाले नहीं थे. विज्ञान के क्षेत्र में होने वाला कोई शोध, पूर्वस्थापित तथ्य को कभी भी झुठला सकता है. विज्ञान जगत उसके लिए सदैव तैयार रहता है. किंतु सामाजिक बदलाव हमेशा क्रमानुक्रम में होते है. वैज्ञानिक अन्वेषणों की गति के सापेक्ष सामाजिक परिवर्तनों की गति सदैव धीमी होती है. संस्कृति और वैचारिकी पर उनका प्रभाव पड़तेपड़ते ही पड़ता है. एक परिवर्तन को आत्मसात कर, दूसरे तक पहुंचने में समाज समय लेता है. यही कारण है कि पंद्रहवींसोलहवीं शताब्दी में हुई वैज्ञानिक क्रांति का वास्तविक असर सतरहवींअठारहवीं शताब्दी में देखने को मिलता है.

मध्यकाल के न्यायवादी विचारकों में थामस हाब्स का नाम प्रमुख है. वह पहला विचारक था जिसने राजनीतिक सिद्धांत और आधुनिक विचारधाराओं में सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश की. अपने राजनीतिक दर्शन की रूपरेखा प्रस्तुत करते समय उसने, प्रकृति के तमाम तथ्यों, जिनमें मानव व्यवहार के मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक सभी पहलू सम्मिलित थे, विचार किया. सुकरात, प्लेटो, अरस्तु से लेकर संत अगस्ताइन और एक्वीनस सभी का दर्शन सोफिस्टों की विचारधारा के विरोध में जन्मा था. लेकिन हाब्स ने अपनी बात अमूर्त्तन को नकारते हुए, मूर्त्तन की ओर वापस लौटने से शुरू की. उसने जोर देकर कहा कि जो वास्तविक है, उसको दृश्यमान होना ही चाहिए. इसका श्रेय भी उसको मिलना चाहिए. मनुष्य केवल आत्मा नहीं है. वह ‘जीवित शरीर’ भी है. देह न केवल व्यक्ति और शेष प्रकृतिजगत के बीच पृथकत्व का कारण है, बल्कि उसी के कारण मनुष्य एवं शेष प्राणिजगत में अनूठा नैकट्य है. वही मनुष्य एवं शेष विश्व के बीच संबंधों और प्रतिसंबंधों का कारण है. देह के कारण ही प्राणिमात्र स्वयं को दूसरों से अलग और विशिष्ट मानता है. उसी के कारण उसे दूसरों की उपस्थिति, उनकी विशेषताएं आकर्षित करती हैं. दूसरे शब्दों में बहिर्जगत, बहिर्जगत है ही इसलिए, क्योंकि उसका कोई अंतर्जगत है. वही मनुष्य अंतर्मन में झांकने के लिए उकसाता है. जो भी ‘जीवित शरीर है.’ उसकी समाज में स्वतंत्र हैसियत है. ऐसे संसार में स्वतंत्र हैसियत है, जहां उस जैसे करोड़ों मनुष्य अपनी स्वतंत्र व्याप्ति के साथ मौजूद हैं. ऐसे में उसकी अस्मिता और उपस्थिति का सम्मान, उसकी स्वतंत्रता की रक्षा तभी संभव है—जब वह खुद भी दूसरों की स्वतंत्रता और अस्मिता का सम्मान करे. इसलिए आत्म की कीमत पर देह की उपेक्षा उचित नहीं है. हाब्स के अनुसार व्यक्ति समाज के बीच रहकर ही सुख और सुरक्षा प्राप्त कर सकता है. मनुष्यता की रक्षा भी दूसरों के साथ सामंजस्य रखते हुए संभव है. वह लिखता है—

मनुष्य के सामने प्रथम लक्ष्य अपनी सुरक्षा अथवा शक्ति के रक्षण का होता है. उसके लिए दूसरे मनुष्यों का उसी सीमा तक महत्त्व है, जब तक वे असर डालते हैं. चूंकि बुद्धिविवेक एवं शक्ति के मामले में सभी मनुष्य लगभग एकसमान हैं, इसलिए जब तक उसे अनुशासित रखने के लिए कोई नागरिक शक्ति न हो, तब तक हर मनुष्य की हर मनुष्य के साथ लड़ाई है. इस तरह की स्थिति यद्यपि सभ्यता के प्रतिकूल है. लेकिन यदि ऐसा न हो तो नौवहन, कृषिकला, शिल्पकर्म, कला और साहित्य, उद्योग आदि में से किसी की भी उन्नति असंभव है. उस स्थिति में मनुष्य का जीवन, एकांत, निर्धन, घृणित, जंगली और अल्पकालिक होगा. उस अवस्था में न तो न्याय होता है, न ही अन्याय. न तो उचित होता है, न ही अनुचित. वैसे हालात में जीवन का एकमात्र यह नियम काम करता है कि मनुष्य को जो प्राप्त करना कर ले, और उसमें से जितना पास रखना चाहता है, रख ले.’13

हाब्स का आशय था कि यदि समाज न हो, स्पर्धा न हो, हितों का टकराव न हो तो विकास असंभव है. विकास मनुष्य की चेतना और प्रतिचेतना दोनों पर निर्भर होता है. लेकिन मनुष्य की सफलता उसे ज्यों का त्यों बनाए रखने में नहीं है. यदि ऐसा हो तो उसके विवेकीकरण का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा. उसने जोर देकर कहा था कि आत्मरक्षा के लिए हिंसा और प्रतियोगिता के स्थान पर, शांति और सहयोग अपेक्षाकृत ज्यादा कारगर हैं. शांति के लिए पारस्पिरिक विश्वास और सहयोग की आवश्यकता पड़ती है. भय और असुरक्षा की भावना शांति और विश्वास बनाए रखने में सबसे बड़ी बाधाएं हैं. सामान्य मानवप्रवृत्ति भय से मुक्ति पाने की है. प्रत्येक व्यक्ति सुख एवं सुरक्षा की कामना करता है. शाश्वत सुख की चाहत उसे समाज की शरण में ले आती है. अब यदि समाज अपने दायित्व की पूर्ति में चूक जाए. आवश्यकता पड़ने पर मनुष्य को समाज में शांति और सुरक्षा की प्राप्ति न हो, तब मनुष्य को यह अधिकार है कि वह अपनी शांति और सुरक्षा के लिए जो आवश्यक है, वह करे. कह सकते हैं कि समाज की चूक व्यक्ति को मनमानी का अवसर देती है. यह स्थिति उत्पन्न न हो, उसके लिए समाज और उसकी सदस्य इकाइयों के बीच तालमेल आवश्यक है. व्यक्ति की अपने अधिकारों के प्रति उदासीनता समाज को निष्ठुर और व्यक्ति को आत्मलीन बनाने का काम करती है. कुल मिलाकर पारस्परिक हितों की सुरक्षा की दृष्टि से काम करना, प्रथम दृष्टया संतुलित सुझाव लगता है. किंतु गंभीरतापूर्वक विचार करने पर उसका खोखलापन, यानी इसके पीछे किसी नैतिक प्रेरणा का न होना सामने आ जाता है. यह सीधेसीधे एक सौदे जैसा है. व्यक्ति और समाज के बीच स्पष्ट लेनदेन का मामला. जिसमें व्यक्ति से कम से कम उस समय तक शांतिप्रयास की अपेक्षा की जा सकती है, जब तक दूसरे व्यक्ति भी उस काम में लगे हों. यह दर्शाता है कि सामाजिक शांति एवं सुख की स्थापना सामूहिक दायित्व है तथा व्यक्ति की सुरक्षा और स्वतंत्रता अन्योन्याश्रित है.

हाब्स के अनुसार कर्तव्य और अधिकारों परस्पर पूरक हैं. इन्हें अलगअलग देखना अनुचित है. दोनों का साथसाथ पालन करते हुए ही समाज को सुस्थिर किया जा सकता है. इसलिए किसी को तभी तक सुरक्षा का आश्वासन दो, जब तक वह आपकी सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है. प्रत्येक व्यक्ति को उस समय तक अपनी स्वतंत्रता एवं सुरक्षा का भरोसा होना चाहिए, जब तक वह दूसरों की स्वतंत्रता और सुरक्षा की प्रतिबद्ध भाव से रक्षा करता है. दूसरों की स्वतंत्रता में अवांछित हस्तक्षेप के साथ ही व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का अधिकार खो बैठता है. हाब्स के अनुसार ‘शासन में यह शक्ति होनी चाहिए कि वह शांति की स्थापना कर सके.’ इस तरह हाब्स एक ओर व्यक्ति को अपनी स्वतंत्रता और सुरक्षा की रक्षा के लिए असीमित अधिकार देता है. यहां तक कि उसके लिए राज्य की उपेक्षा करने का सुझाव भी दे जाता है. दूसरी ओर राज्य को भी असीमित अधिकारों की छूट दे देता है. उसके अनुसार जब तक कोई मूर्त्त शासन न हो, जब तक अपनी इच्छा को लागू करने की शक्ति से संपन्न कोई व्यक्ति न हो, तब तक न तो राज्य होता है, न ही समाज, प्रत्युत् एक ‘प्रधानहीन’ भीड़ होती है. उसे नियंत्रित करने के लिए शक्ति की आवश्यकता पड़ती है. हाब्स के शब्दों में, ‘बिना तलवार के समस्त प्रसंविदाएं कोरे शब्द हैं, उनमें इतनी शक्ति नहीं होती कि मनुष्य उनका पालन करने को विवश हो.’14

इससे हाब्स को निरंकुशता का समर्थक मान लेना भूल होगी. दरअसल वह राज्य एवं समाज दोनों को इतना संगठित और शक्तिशाली देखना चाहता है कि दोनों की शक्तियां, सम्मिलित विवेक एकदूसरे को संतुलित कर सकें. व्यक्तिगत रूप से वह राजतंत्र का समर्थक था. किंतु उसके प्रस्तावित राजतंत्र में प्रजा अपने अधिकारों से सर्वथा वंचित नहीं है. बल्कि वह प्रजा को इतनी संगठित, शक्तिशाली और विवेकवान देखना चाहता था कि आवश्यकता पड़ने पर राज्य को भी नियंत्रित कर सके. उसके अनुसार शक्ति केवल राज्य के हाथ में हो तो उसके निरंकुश होने की संभावना बढ़ जाती है. और राज्य निर्बल हो तो उसके अस्थिर होकर लक्ष्य से भटक जाने की संभावना बढ़ जाती है. नागरिक और प्रशासन में संतुलन के लिए समाज में शक्ति का विकेंद्रीकरण आवश्यक है. अपनी महान कृति Leviathan(The Matter) में समाज एवं राजनीति के संबंधों की गहन समीक्षा के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि—

समस्त मानवजाति शक्ति की शाश्वत एवं अविश्रांत इच्छा से प्रेरित है. इस लालसा का अंत मृत्यु के साथ ही होता है. इसका कारण यह नहीं है कि मनुष्य के पास जितनी खुशी है उससे अधिक खुशी वह चाहता है या मौजूदा शक्ति से कम में उसका काम नहीं चल सकता. इसका कारण है कि मनुष्य के पास अपनी जीविका के जितने साधन तथा शक्तियां है, उससे अधिक की लालसा रखे बगैर उसे अपनी सुरक्षा का भरोसा नहीं होता.’15

हाब्स की दृष्टि में विधि का शासन सत्ता की ओर से प्रस्तुत की गई वह इच्छा या उसकी ओर से प्रचलित ऐसे नियम हैं, जो नागरिकों को उचितअनुचित का बोध कराते हैं. विधान दो प्रकार के होते हैं. एक वह जो व्यक्ति या समुदाय द्वारा बनाए जाते हैं. हाब्स ने उन्हें नागरिक विधान कहा है. दूसरे प्राकृतिक विधान. जिनसे प्रकृति का हिस्सा होने के कारण प्रत्येक प्राणी स्वाभविक रूप से बंधा होता है. हाब्स के अनुसार प्राकृतिक विधान नागरिक विधान की अपेक्षा श्रेष्ठतर होता है. लेकिन समाज में रहते हुए केवल प्राकृतिक विधान से काम नहीं चलता. उसके लिए नागरिक विधान को भी अपनाना पड़ता है. नागरिक विधान का गठन हालांकि नागरिकों की सहमति के आधार पर होता है. लेकिन नागरिकों की सामान्य सहमति मिलने के बाद वह राज्य की इच्छा का रूप ले लेता है. जिसे राज्य शासनादेश के रूप में लागू करता है. ऐसे में प्राकृतिक विधान का केवल आलंकारिक महत्त्व रह जाता है. लेकिन प्राकृतिक विधान की कुछ खूबियां ऐसी होती हैं, जिन्हें अपनाकर कोई भी समाज सभ्य होने का दावा कर सकता है. इसी कारण उन्हें नागरिक विधान का हिस्सा बनाया जाता है, लेकिन कुछ इस प्रकार कि नागरिक विधान उनकी पवित्रता को भंग करने के बजाय उनकी सुरक्षा में खड़ा हुआ नजर आए. प्रकारांतर में नागरिक विधि में बल प्रयोग का भाव निहित है. प्राकृतिक विधान की कमजोरी है कि उसके सभी नियम समाज को आगे नहीं ले जा सकते. हाब्स का विचार था कि उपयोगितावादी दृष्टि से शासन, कोई भी शासन—निरंकुशता से बेहतर होता है. तो क्या निरंकुशता में शासन नहीं होता. बल्कि बहुत कठोर शासन होता है. वह इसलिए कामयाब होता है क्योंकि नागरिक संगठन कमजोर पड़ जाते हैं. निरंकुश शासन में नागरिक स्वयं को राज्य की इच्छा के आगे समर्पित कर देते हैं. इससे समाज का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. आधुनिक विचारक ऐसे राजनीतिक दर्शन का समर्थन करते हैं, जो समाज की सामान्य चेतना द्वारा अनुशासित हो. हाब्स हालांकि राजतंत्र का समर्थक था, लेकिन अपने दर्शन में वह समाज की सामान्य चेतना को भी पर्याप्त महत्त्व देता है. वह जो सुझाव देता है, परिवर्ती विद्वान उन्हें गणतंत्रात्मक शासन पर भी लागू करते हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ:

1. every member of the community must be assigned to the class for which he finds himself best fitted. Plato, The Republic .

2. Justice as fairness provides what we want. -John Rawls, A Theory of Justice.

3. Justice is the first virtue of social institutions, as truth is of systems of thought. -John Rawls, A Theory of Justice. pg. 3.

4. Man is the measure of all things: of the things that are, that they are, of the things that are not, that they are not.” Plato’s Theaetetus, trans. Bostock, D (1988), Oxford.

5. एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्वाद्वह्व शुच्योपि न स्त्रियः

त्री बुद्धेरस्थिरत्वाच्च दौषे श्वाश्चेऽपि तः वृताः—मनुस्मृति, 8/77.

6. A multitude bound together by a mutual recognition of rights and a mutual cooperation for the common good.”-Cicero.

7. Charity is no substitute for justice withheld. -Augustine.

8. If a man has no order within himself, then there is certainly no justice in assembly made. Augustine, City of God.

9. a judge renders to each one what belongs to him by way of command and direction, because a judge is personification of justice and sovereign is its guardian.- St Thomas Aquinas, Summa Theologica, Volume 3 (Part II, Second Section), 2013

10. the habit whereby a man renders to each one his due by a constant and perpetual will.” St Thomas Aquinas, Summa Theologica, Volume 3 (Part II, Second Section), 2013.

11. यशपाल, गांधीवाद की शव परीक्षा, विपल्व प्रकाशन, 1941

12. अनुलोमगतिनौंस्थः पश्यत्यचलं विलोमर्ग यद्वत्

अचलानि भानि तद्वत् समपश्चिमगानि लंकायाम्. आर्यभट्टीयम्, गोलापद, 9.

13. From this account of human motives Hobbes’s description of the state of man outside society follows as a matter of course. Each human being is actuated only by considerations that touch his own security or power, and other human beings are of consequence to him only as they affect this. Since individuals are roughly equal in strength and cunning, none can be secure, and their condition, so long as there is no civil power to regulate their behavior, is a “war of every man against every man.” Such a condition is inconsistent with any kind of civilization: there is no industry, navigation, cultivation of the soil, building, art, or letters, and the life of man is “solitary, poor, nasty, brutish, and short.” Equally there is neither right nor wrong, neither justice nor injustice, since the rule of life is “only that to be every man’s that he can get; and for so long, as he can keep it.”- George H. Sabine, A HISTORY OF POLITICAL THEORY, page 463.

14. Covenants, without the sword, are but words, and of no strength to secure a man at all.-Thomas Hobbes, Leviathan, chapter17.

15. I put for a general inclination of all mankind, a perpetual and restless desire of power after power, that ceaseth only in death. And the cause of this, is not always that a man hopes for a more intensive delight, than he has already attained to; or that he cannot be content with a more moderate power: but because he cannot assure the power and means to live well, which he hath present, without the acquisition of more. Thomas Hobbes, Leviathan, chapter-11.