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न्याय की पाश्चात्य अवधारणा—दो

सामान्य

‘न्याय क्या है’ पर सबसे पहली प्रतिक्रिया केफलस की ओर से ही आती है. केफलस मैटिक(विदेशी) है. उसके विचार कुछ-कुछ परंपरागत किस्म के हैं. उसके अनुसार न्याय का अर्थ है—‘अपने कथन और कर्म में सच्चा रहना तथा मनुष्यों एवं देवताओं के प्रति ऋण चुकाना.’ सुकरात इस परिभाषा से संतुष्ट नहीं होता. उसके अनुसार सत्य सापेक्षिक होता है. यानी एक व्यक्ति के लिए जो सत्य है, आवश्यक नहीं कि दूसरे व्यक्ति की परिस्थितियों में भी ठीक वैसा ही सत्य स्वीकार्य हो. इसलिए केफलस के विचारों की आलोचना वह यह कहकर करता है कि विशेष परिस्थितियों में सत्य और समुचित व्यवहार को न्याय माना जा सकता है. परंतु उसे सार्वभौमिक सत्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. उधार को समय पर चुकाना अच्छी बात है. उसे मानव-चरित्र के विशिष्ट गुण के रूप में लिया जा सकता है. परंतु इस नियम की भी सीमा है. यह प्रत्येक परिस्थिति में निरापद नहीं है. केफलस के मत के विरोध में अपना तर्क प्रस्तुत करते समय सुकरात उदाहरण देता है—‘मान लीजिए आपके दोस्त ने अपना घातक हथियार आपके पास सुरक्षित रख छोड़ा है. उसे वह उस समय वापस मांगता है, जब वह अत्यंत क्रोधावस्था में है; तथा हथियार द्वारा किसी तीसरे व्यक्ति की हत्या करना चाहता है. उस क्षण हथियार लौटाकर ऋण-मुक्त होना क्या न्याय की परिसीमा में आएगा?’ इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर केफलस के पास नहीं है. परिस्थिति चाहे जो हो, शुभ यदि अशुभ का जन्मदाता अथवा उसे प्रोत्साहित करता है—तो वह न्याय नहीं माना जा सकता. न्याय की कसौटी उसकी सार्वभौमिकता में है. वही न्याय है जो अधिकतम व्यक्तियों को न्याय जंचे और अधिकतम परिस्थितियों में न्याय-संगत सिद्ध हो. समय पर उधार लौटाने का गुण व्यक्ति को जिम्मेदार तो दर्शाता है, परंतु वह न्याय की कसौटी नहीं बन सकता.

केफलस वयोवृद्ध है. उस पीढ़ी का प्रतीक जो सुकरात के समय बूढ़ी हो चली थी. उसका ज्ञान सुदीर्घ अनुभव पर आधारित है. उसकी पीढ़ी के लिए न्याय और नैतिकता के अर्थ बहुत सीमित थे. सत्य-भाषण एवं समय पर उधार चुकाने का मामला भी व्यावहारिक नैतिकता से जुड़ा था. लोगों में उधार लेन-देन चलता रहता था. उसके कारण झगड़े भी होते थे. प्रकारांतर में केफलस उस न्याय की ओर इशारा करता है, जिसके लिए न्यायालय या किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की आवश्यकता पड़ती है. जबकि सुकरात न्याय को उसके वृहद संदर्भों में देख रहा था. सबकुछ जानते-समझते हुए भी सुकरात केफलस के विचारों को पुराना मानकर उसका उपहास नहीं करता. अच्छे विमर्शकार की भांति वह धैर्यपूर्वक सुनता और बाद में विनयपूर्वक उसका प्रतिवाद करता है. इसके लिए सिसरो ने सुकरात की प्रशंसा की है—‘सुकरात का आचरण एक उदाहरण है, जिसे अरस्तु ने दर्शन के अध्येता के लिए अनुकरणीय बताया है.’ न्याय की दृष्टि से सुकरात ने केफलस को भले ही निरुत्तर कर दिया हो, परंतु उसके अनुभवों से हमें व्यावहारिक नैतिकता की झलक मिलती है. जिनका दर्शन की दृष्टि से भले ही बहुत ज्यादा महत्त्व न हो, परंतु समाज का समूचा कार्य-भार सामान्यतः उसी पर केंद्रित होता है. प्रकारांतर में वह सुकरात को चरित्र की महत्ता से परचाना चाहता है. वह बताना चाहता है कि गरीबी निश्चित रूप से मनुष्य के सुख में बाधक बनती है. जीवन में अनेक परेशानियां और दुश्वारियां धनाभाव के कारण पैदा होती हैं. बावजूद इसके यह मान लेना कि जो अमीर हैं, जिन्हें कोई अभाव नहीं है, वे पूरी तरह प्रसन्न हैं अनुचित होगा. मनुष्य के लिए उसका चरित्र ही सच्ची दौलत है—इस तरह का सोच लंबे अनुभव और समाज के साथ सतत संवाद के बाद ही पनप सकता है. इसलिए व्यावहारिक न्याय और नैतिकता को देखते हुए केफलस के विचार मायने रखते हैं, हालांकि न्याय की परिभाषा की दृष्टि से उनका खास महत्त्व नहीं है.

केफलस को निरुत्तर देख उसका बेटा पोलीमार्क बहस में कूद पड़ता है. पोलीमार्क की न्याय संबंधी अवधारणा सीधी-सरल है. वह सोफिस्ट विचारकों से प्रभावित है. एक तरह से वह अपने पिता के न्याय संबंधी सहज बोध को ही आगे बढाता है. उसके अनुसार, ‘न्याय का अभिप्राय है—मित्रों को लाभ पहुंचाना और दुश्मनों को हानि.’ इस प्रकार का भेदभाव न्याय की आधारभूत मान्यता के विपरीत है. उसके आधार पर न्याय की कसौटी का निर्माण असंभव है. गौरतलब है कि उन दिनों यूनान के छोटे-छोटे राज्य परस्पर युद्ध करते रहते थे. युद्धक संस्कृति पूरे यूनान पर बढ़त बनाए थी. मित्र राज्यों की मदद तथा दुश्मन राज्यों का विरोध करना उस संस्कृति का सामान्य लोकाचार था. मित्रों के प्रति अनुराग और शत्रु से राग-विराग प्राचीन यूनानी समाज की सामान्य नैतिकता का हिस्सा था. सोलन की कविताओं में मिलता है—‘मुझे अपने मित्रों के प्रति सुखद तथा शत्रुओं के प्रति उदार बना दो.’ इसी तरह ईसा पूर्व आठवीं शताब्दी के कवि हेसियाद ने एक जगह लिखा था—‘वे हमें देंगे तो हम भी देंगे. वे यदि नहीं देंगे तो हम भी नहीं देंगे.’ प्राचीन भारत में न्याय की यही स्थिति थी. देवताओं से कुछ प्राप्त करने के लिए उन्हें अर्घ्य, भेंट-पूजा चढ़ाना. एक चढ़ाकर दस लाख की उम्मीद न करना. नहीं तो देवता के कोप-भाजन बनने से भयभीत रहना. यही व्यवस्था तत्कालीन राजनीति के न्याय-सिद्धांत की मुख्य प्रेरणा थी. राजा प्रसन्न हो तो भेंट-सौगात से मालामाल कर देता था. राजा के अप्रसन्न होने पर दंड सुनिश्चित था. दंड की मात्रा भी राजा के कोप और उसकी मर्जी पर निर्भर करती थी. कोई लिखित विधान न था. बाद में धर्मसूत्रों में हालांकि दंड संबंधी व्यवस्था देखने को मिलती है. परंतु उसका अनुसरण आवश्यक न था. राजा की मर्जी ही दंड विधान था. उसके विरोध में कहीं, कोई सुनवाई न थी.

पोलीमार्क का तर्क भी उससे प्रभावित है. परम जिज्ञासु सुकरात उसके तर्कां से आश्वस्त नहीं है. वह बताता है कि निष्पक्षता न्याय की कसौटी है. यदि नैतिकता की दृष्टि से सभी मनुष्य बराबर हैं, तो समान परिस्थितियों में उनके साथ एक जैसा व्यवहार करना ही न्यायिक उत्कृष्टता की कसौटी है. यदि दो व्यक्ति समान अपराध में लिप्त हों तथा उनमें से एक शासक का मित्र तथा दूसरा उसका शत्रु हो तो दोनों के अपराध का दंड क्या अलग-अलग होना चाहिए? व्यक्ति मित्रों के प्रति सामान्यतः उदार होता है, जबकि अमित्रों तथा दुश्मनों के प्रति अनुदार. ऐसे में उसका निर्णय निजी धारणाओं से प्रभावित होगा, जो न्याय-भावना के विपरीत है. पूर्वाग्रहवश वह मित्रों का पक्ष लेगा. जो मित्र नहीं हैं, उनके प्रति उसके निर्णय उपेक्षा से भरे, पक्षपातपूर्ण होंगे. पक्षपात जहां किसी अपात्र को लाभ पहुंचाता है, वहीं किसी अन्य व्यक्ति से जो उसका न्यायपूर्ण अधिकारी है, उचित अवसर छीन लेता है. सुकरात के अनुसार किसी को नुकसान पहुंचाना अथवा उसका बुरा करना न्याय की मूल अवधारणा के विपरीत है. फिर मित्रता कोई स्थायी संबंध नहीं है. दो व्यक्तियों के बीच संबंधों में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं. आज जो मित्र हैं, कल वही दुश्मन भी बन सकते हैं. तदनुसार एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्तियों के प्रति व्यवहार भिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग हो सकता है. अपने मत के समर्थन में प्लेटो सुकरात के माध्यम से कई तर्क प्रस्तुत करता है.

न्याय को यदि अच्छाई और बुराई से अभिव्यक्त होने वाला गुण मान लिया जाए तो कोई भी व्यक्ति उसका मनमाना उपयोग करने को स्वतंत्र हो जाएगा. एक डॉक्टर जो अपने उपचार द्वारा किसी रोगी को सही कर सकता है, उपचार न करके या जानबूझकर गलत उपचार द्वारा उसे नुकसान भी पहुंचा सकता है. प्रत्येक अवस्था में वह अपेने ज्ञान का उपयोग कर रहा होगा, हालांकि उसके परिणाम भिन्न-भिन्न होंगे. मगर जानबूझकर नुकसान पहुंचाने अथवा उपचार में लापरवाही बरतने की अवस्था में रोगी के प्रति उसके व्यवहार को न्यायपूर्ण नहीं माना जाएगा. न्याय कला भी नहीं है. कोई भी कलाकार अपनी कृति को रूपाकार देने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होता है. जबकि न्याय का न तो मनचाहा उपयोग संभव है, न ही मनमाने ढंग से उसे तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है. कलाएं अनुभव के साथ-साथ निरंतर परिष्कृत होती जाती हैं. जबकि न्याय के साथ ऐसा नहीं है. किसी भी समाज में न्याय उसकी आदर्शोन्मुखता का प्रतिरूप होता है. उसे अनुभव के आधार पर परिष्कृत नहीं किया जा सकता. सुकरात के अनुसार न्याय का सीमित अर्थों एवं संदर्भों में प्रयोग निषिद्ध है. वह बृहत्तर ज्ञान का विषय है. पोलीमार्क्स के तर्क के विरोध में सुकरात की अनेक शंकाएं हैं. उसके अनुसार मित्र को लाभ पहुंचाने और शत्रु का अहित करने की बात करना जितना आसान है, वास्तविक मित्र और शत्रु की पहचान करना उतना ही कठिन है. मनुष्य का व्यवहार बदलता रहता है. कुछ मनुष्य इतने तेज-तर्रार होते हैं कि उनके व्यवहार से पता ही नहीं चलता कि वे मित्र हैं या शत्रु? ऐसे लोग सामने हितैषी होने का दावा करते हैं, परंतु पीठ पीछे वे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं. ऐसे मनुष्य के प्रति कैसा व्यवहार न्यायोचित होगा—यह समझ पाना आसान नहीं होता. ऐसे व्यक्तियों के लिए जिनकी मैत्री केवल दिखावा है, हमेशा लाभ की बात करना उन लोगों के प्रति प्रति सरासर अन्याय होगा जिनका व्यवहार आपको पसंद नहीं है, परंतु उन्होंने आपको या किसी अन्य को कभी भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की है. ऐसे व्यक्ति के साथ जो मन से बुरा नहीं है, या परिस्थितिवश बुराई अपनाने को विवश हुआ है—यदि दुर्व्यवहार किया जाए तो समाज के प्रति उसके विश्वास में कमी आएगी. दूसरी ओर जो व्यक्ति सचमुच बुरा है, यदि उसके अहित को न्याय मान लिया जाए तो वह अपने पक्ष को ही न्यायपूर्ण मान लेगा. इस प्रकार उसके सुधार की समस्त संभावनाओं का अंत हो जाएगा. न्याय की पहली शर्त करने वाले और जिसके साथ न्याय किया जा रहा है, स्पष्टता है. उसमें समिष्ठि की भावना अंतनिर्हित होती है. न्याय परिस्थिति-निरपेक्ष, व्यक्ति निरपेक्ष और देश-काल निरपेक्ष होता है. सार्वदैशिकता उसका गुण होता है. देश-काल के अनुसार अपराध की प्रवृत्ति, परिभाषाएं और उनके अनुरूप दंड विधान बदल सकता है, न्याय नहीं. उसे तो पक्षपात रहित और इन सभी से ऊपर, सर्वकल्याणकारी होना चाहिए. इसलिए न्यायशील व्यक्ति मित्र या शत्रु का भेद किए बगैर सर्वकल्याण की भावना के साथ न्याय को अपनाएगा. अतएव मित्र को लाभान्वित करने तथा अमित्र को नुकसान पहुंचाने की भावना न्यायसंगत नहीं कही जा सकती. किसी भी प्रकार का भेदभाव न्याय की मूल-भावना के पूरी तरह विपरीत है. सुकरात के तर्कों के बाद पॉलीमार्क्स तर्क छोड़कर बहस से बाहर आ जाता है. उस तर्क-शृंखला का समापन प्लेटो यह कहकर करता है कि ‘मित्रों के भलाई और दुश्मन के साथ बुराई जैसी धारणा पेरियांडर जैसे निरंकुश सम्राट ने बनाई होगी. प्रसंगवश बता दें कि पेरियांडर की गिनती यूनान के सात प्रसिद्ध संतों में की जाती है. यह उन दिनों की बात है जब वहां दार्शनिक का राजा होना श्रेष्ठतर माना जाता था. पेरियांडर ने कोरिंथ पर ईसापूर्व 625 से 585 ईस्वीपूर्व तक शासन किया था. आरंभ में उसका शासन बहुत दयालुतापूर्ण था. लेकिन बाद में वह दमन का रास्ता अपनाने लगा था.

‘रिपब्लिक’ को पढ़ते हुए कभी-कभी यह लगता है कि उसके पात्र प्लेटो की कल्पना की उपज हैं. उनकी भूमिका किसी न किसी विचार के पक्ष-विपक्ष को आगे बढ़ाने तक सीमित है. सुकरात का योगदान कहीं सूत्रधार का है, कहीं महत्त्वपूर्ण वक्ता के रूप में तो कहीं विभिन्न विचारधाराओं में समन्वयक का. संवाद के बीच अनेक व्यक्तियों की सहभागिता का उद्देश्य है कि उनके माध्यम से प्लेटो, अंतिम निष्कर्ष से पहले किसी एक विचार या अवधारणा के यथासंभव सभी पक्षों पर खुलकर विचार कर लेना चाहता है. वह लगातार यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि न्याय को लेकर परंपरागत किस्म की धारणाएं व्यावहारिक दृष्टि के लिए उपयोगी कही जा सकती हैं. परंतु विशिष्ट परिस्थितियों में उनकी उपयोगिता सीमित तथा अलाभकारी हो जाती है. व्यापक परिदृश्य में उनके अंतर्विरोध और सीमाएं सामने आने लगती हैं. न्याय पर चर्चा करते हुए सुकरात केवल अपने साथियों की न्याय-संबंधी अवधारणा में खोट नहीं निकालता. परिचर्चा के दौरान वह खुद का भी अविकल परिमार्जन करता जाता है. ‘रिपब्लिक’ में हम प्लेटो न्याय-संबंधी प्रारंभिक संकल्पना में एक के बाद एक सुधार हुआ पाते हैं. न्याय की अवधारणा पर शुरू हुई बहस में तीसरे पात्र के रूप में थ्रेचाइमच्स का आगमन होता है. प्लेटो ने उसे वाग्मिता में निपुण ऐसा व्यक्ति बताया है तो श्रोताओं की वासनाओं को उत्तेजित करने में दक्ष था. शिक्षा का प्राथमिक ध्येय ज्ञानार्जन है. जबकि सोफिस्टों के लिए वह केवल वाक्-कौशल अथवा वाक्-चातुर्य तक सीमित था. तो भी सोफिस्टों की ग्रीक संस्कृति में महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. सुकरात और प्लेटो के आगमन से पहले सोफिस्ट ही थे, जिनसे ग्रीक संस्कृति का बोध होता था. वे अपनी विचारधारा और तर्क-सामर्थ्य के आधार पर जाने जाते थे. तर्क-नैपुण्य उनके लिए इतना महत्त्वपूर्ण था कि आगे चलकर उन्होंने उसी को अपना व्यवसाय बना लिया था. यूनानी समाज में उनकी हैसियत ठीक ऐसी ही थी जैसी भारत में पुरोहित वर्ग की. थ्रेचाइमच्स के विचार ‘सत्ता-सर्वेसर्वा’ का प्रतिनिधित्व करते हैं. बहस में उतरने के पश्चात वह दावा करता है कि शक्तिशाली की हित-सिद्धि ही न्याय है. उसके अनुसार—‘सबल सर्वदा सही होता है.’ ‘राजा जो करे वही न्याय’—ऐसी मान्यता भारत में भी रही है. तुलसी ने लिखा है, ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं.’ इसी से शायद यह कहावत भी बनी है—‘जिसकी लाठी उसकी भैंस.’ अपने मंतव्य को स्पष्ट करता हुआ थ्रेचाइमच्स कहता है—

‘विभिन्न प्रकार के राजदर्शनों यथा जनतंत्रात्मक, निरंकुश, कुलीनतंत्री आदि के आधार पर गठित सरकारें इस प्रकार के कानून बनाती हैं, जिनके द्वारा उनकी अपनी स्वार्थ-सिद्धि होती है. निहित स्वार्थ के लिए बनाए गए कानूनों को ही वे न्याय की संज्ञा देती हैं और चाहती हैं कि लोग बिना कोई प्रश्न उठाए उनका पालन करें. जो व्यक्ति उनके आदेश की अवहेलना करता है उसे वे कानून के उल्लंघन का तर्क देते हुए दंडित करती हैं. सभी राज्यों में न्याय का एकमात्र उद्देश्य है शासकीय वर्गों का हित. चूंकि राज्य अपने आप में शक्तिशाली तंत्र होता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि न्याय सर्वत्र एक ही है, वह है—शासक वर्ग का हित और शक्तिशाली का स्वार्थ.’

थ्रेचाइमच्स के अनुसार न्याय शक्तिशाली का अधिकार है. जो शक्तिसंपन्न है, वह न्याय को अपने पक्ष में कर लेता है. शक्तिशाली हमेशा अपने पक्ष में कानून बनाता है. सवाल है शक्ति कैसी? देह की, मन की या किसी और प्रकार की? सुकरात प्रश्न करता है. थ्रेचाइमच्स इस बारे में स्पष्ट है. वह शारीरिक शक्ति से इन्कार करता है. भूल जाता है कि शारीरिक शक्तियों, जिनमें बौद्धिक सामर्थ्य भी सम्मिलित है, से इतर जितनी भी शक्तियां हैं, वे सभी व्यक्ति को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में समाज की ओर से प्राप्त होती हैं, भले ही समाज अपनी इस देन को गंभीरता से न लेता हो. उसमें व्यक्ति की अपनी प्रतिभा एवं परिश्रम का भी योगदान होता है, परंतु इतना नहीं कि समाज के योगदान की बराबरी कर सके. अध्ययन-अध्यापन, अनुभव आदि के माध्यम से मनुष्य जो ज्ञान अर्जित करता है, वह उसकी पूर्ववर्त्ती पीढ़ियों के अनुभवों का निचोड़ होता है. परंतु अहंभाव के चलते व्यक्ति समाज की देन को अपनी मान बैठता है. यह उसका अहंभाव है. अपने ज्ञान पर गर्व करने का अधिकार उसे है. लेकिन पूर्ववर्त्ती पीढ़ियों के योगदान को बिसरा देना भी अनैतिक कर्म है. थ्रेचाइमच्स नेतृत्व के अधिकार को शक्ति मानता है. उसके अनुसार जिसके पास कानून बनाने की शक्ति है, उसे दूसरों पर नियंत्रण का अधिकार और अवसर स्वतः प्राप्त हो जाते हैं. थ्रेचाइमच्स की कसौटी है कि जो शक्ति-संपन्न है, वह न्याय-संपन्न भी है. कानून-निर्माता होने के कारण शक्तिशाली सदैव लाभ की अवस्था में रहता है. उस गड़हरिया की भांति जो अपनी भेड़ों को इसलिए पालता है ताकि समय आने पर वह उनसे काम ले सके. जिसमें जरूरत पड़ने पर उसकी बलि भी शामिल है. थ्रेचाइमच्स का विचार प्राचीन राजनीति के बेहद करीब है. प्राचीन सम्राट अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए प्रजा को कभी भी युद्ध में उतार सकते थे, लोगों से मनचाहा काम या बेगार ले सकते थे. थ्रेचाइमच्स के अनुसार जो लोग शासन से दूर हैं, जिन्हें कानून बनाने या बदलने का कोई अधिकार नहीं है, वे सामान्यतः नुकसान में रहते हैं. शिखर पर मौजूद व्यक्ति यदि जनता की भलाई के लिए काम भी करता है तो इसलिए कि उसके पीछे उसका कहीं बड़ा स्वार्थ निहित है. सुकरात को यह तर्क मंजूर नहीं है. उसके अनुसार ऐसा करना राज्य की नीयत को कठघरे में लाना तथा उसके औचित्य के आगे प्रश्न-चिह्न लगाना है, शिखर पर मौजूद लोग अपना स्वार्थ देखते हैं. परंतु वे ऐसा हमेशा करें, यह आवश्यक नहीं है. डॉक्टर अपनी प्रक्टिश केवल धन जुटाने के लिए नहीं करता. लोग सेवाभाव से भी चिकित्सक के पेशे को अपनाते आए हैं. यही बात शिक्षक पर भी लागू होती है. कलाकार भी लोक-कल्याण का भाव लेकर कला-साधना करता है.

सुकरात को विपरीत-कथन या व्याजोक्ति के लिए भी जाना जाता है. बहस के दौरान ऐसा ही विपरीत-कथन जैसा थ्रेचाइमच्स भी करता है. हालांकि वह अपने विचारों पर दृढ़ है और उसका यह कथन ‘शक्तिशाली सदा सही’ का ही विस्तार है. वह कहता है—‘अन्याय करना न्याय करने से बेहतर है.’ अपने तर्क को नई दिशा में बढ़ाता हुआ थ्रेचाइमच्स कहता है कि न्याय को शक्तिशाली की इच्छा या उसके लाभ तक सीमित कर देने से प्रत्येक व्यक्ति को उसका लाभ नहीं मिल पाएगा. बल्कि जो अन्यायी है वह अधिक प्रसन्न और संतुष्ट दिखाई पड़ेगा. इन परिस्थितियों में अन्याय अधिक सुखदायी और आश्वस्तिकारक हो सकता है. इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति केवल अपने स्वार्थानुरूप कार्य करेगा, जिसके लिए उसे अन्यायी मान लिया जाएगा. जबकि वह वही कर रहा है, जिसे करने में वह सक्षम है और जिसके द्वारा उसकी स्वार्थ-सिद्धि संभव है. कुल मिलाकर व्यक्ति का हित अन्यायी बनने में है. अपने तर्क की पुष्टि के लिए थ्रेचाइमच्स के पास अपने तर्क हैं. आप उन्हें कुतर्क सकते हैं; और चाहें तो वाग्जाल भी. लेकिन अन्य सोफिस्टों की भांति थ्रेचाइमच्स को भी अपनी इस कला पर गर्व था. अपने तर्क को आगे बढ़ाता हुआ वह कहता है—‘यदि न्यायी और अन्यायी दो व्यक्ति साथ-साथ व्यापार करें तो लाभ की गणना के समय यह कहना बहुत कठिन होगा कि न्यायी को अधिक लाभ हुआ हो. संभावना इसी की है जो अन्यायी है, उसने अधिक लाभ कमाया हो. व्यवहार में प्रायः देखा जाता है कि न्यायी व्यक्ति हमेशा घाटे में रहता है, जबकि अन्यायी ज्यादा ऐंठ ले जाता है. कराधान के समय भी अन्यायी कर-चोरी कर लाभ की अवस्था में रहता है. दूसरी ओर न्यायी व्यक्ति ईमानदारी बरतते हुए अधिक कराधान कर अपेक्षाकृत घाटे में रहता है. राज्य की ओर कोई सुविधा प्राप्त करनी हो तो अन्यायी आगे बढ़कर ज्यादा हाथ मार ले जाता है, जबकि न्यायी वहां भी पिछड़ जाता है. इन तर्कों से वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि न्यायी व्यक्ति से अन्यायी होना अच्छा है. थ्रेचाइमच्स के अनुसार, ‘न्याय बलवान का स्वार्थ’ अथवा ‘सबल की स्वार्थ दृष्टि है.’ जनसाधारण को न्याय सिवाय आत्मतुष्टि के, कुछ नहीं दे पाता. थ्रेचाइमच्स का तर्क यहीं समाप्त नहीं होता. वह आगे बढ़कर शासकीय पदों पर विराजमान व्यक्तियों की तुलना करते हुए कहता है कि अन्यायी व्यक्ति, न्यायी की अपेक्षा सदैव अधिक लाभ कमाते हैं. अन्यायी व्यक्ति न केवल अपने परिजनों को अधिक सुख दे पाता है, बल्कि न्यायी की अपेक्षा अधिक यश-लाभ का भी भागी बनता है. अन्याय जितना बड़ा हो, लाभ में रहने की संभावना भी उतनी ही बढ़ जाती है. छोटी-मोटी चोरी या लूट करने वाले चोर-डकैत कहे जाते हैं और समाज में अपमान और दंड के भागी बनते हैं. जबकि अपनी सेना और शक्ति के भरोसे यदि कोई नरेश दूसरे राज्य को लूटकर ले जाता है तो वह यश का भागी बनता है. चारणवृंद उसकी गौरव-गाथाएं लिखते हैं. इसलिए थ्रेचाइमच्स कहता है कि—‘हे सुकरात! पर्याप्त रूप से बड़े स्तर पर किया गया अन्याय, न्याय की अपेक्षा अधिक गौरवशाली, स्वच्छंद एवं यश-लाभ देने वाला कार्य है.’ उस समय थ्रेचाइमच्स न्याय के साथ-साथ लाभ को भी बहुत सीमित संदर्भों में ले रहा होता है. या यह कहें कि न्याय और लाभ को लेकर शक्तिशाली की जो दृष्टि है, वह उसी को आगे बढ़ाता है. आदर्श राज्य में लाभ का अभिप्रायः केवल मौद्रिक लाभ तक सीमित नहीं रहता. बल्कि उसके सारे कारोबार और संकल्प सामाजिक लाभ की दृष्टि के साथ रचे जाते हैं. राज्य व्यक्तियों से इतर संस्था नहीं है. वह अपने नागरिकों की सामूहिक इच्छा और संकल्पशक्ति का ही रूप है. राज्य की समस्त शक्तियां, संसाधन तथा लक्ष्य उसके नागरिकों के सामूहिक श्रम तथा इच्छा का सुफल होते हैं. इसलिए जो व्यक्ति ईमानदारी से अपना अपना काम करते हुए यथानिर्दिष्ट कराधान देता है, वह परोक्ष रूप में उन कार्यों को पूरा करने में भी सहभागी बनता है, जिनके लिए राज्य का गठन किया गया है. ऐसा व्यक्ति मौद्रिक अवदान के बदला सामाजिक लाभ के अपेक्षाकृत वृहत्तर संदर्भों में प्राप्त करता है.

थ्रेचाइमच्स का कथन सर्वथा गलत भी नहीं है. सामान्य धारणा यही है कि न्याय सदैव सबल का पक्ष लेता है. शक्तिशाली के आगे अदालतें भी झुक जाया करती हैं. रोजमर्रा के सामान्य अनुभवों से न्याय को लेकर एक दृष्टिकोण यह भी बनता है कि न्याय का जन्म दुर्बलों को शक्तिशाली वर्ग की लोभ, लालच और स्वार्थपरता से बचाने के लिए हुआ है. समाज में यदि सभी सबल हों अथवा सभी दुर्बल हो तो न्याय की कदाचित आवश्यकता ही न पड़े. इसलिए न्याय एक कृत्रिम व्यवस्था है, जो असमानताओं के अन्याय को पाटने के लिए जरूरी मानी गई है. उसे ‘भय की संतान’ या कमजोर का ‘रक्षाकवच’ भी कहा जा सकता है. प्रकृति में भी हम देखते हैं कि वहां जो शक्तिशाली है, वह सदैव लाभ की अवस्था में रहता है. इसलिए न्याय और कानून जैसी कृत्रिम व्यवस्थाएं कमजोर वर्ग की सुरक्षा और बेहतरी के लिए की गई हैं. वे शक्तिशाली वर्ग की मनमानी पर रोक लगाने तथा दुर्बल वर्ग को संरक्षण देने का काम करती हैं. ‘रिपब्लिक’ के अगले ‘संवाद’ में प्लेटो गलाकॉन के मुंह से कहलवाता है—‘जनसाधारण की मान्यता है कि न्याय को वास्तविक अच्छाई और शुभता का पर्याय कभी नहीं माना जा सकता. असल में वह ऐसी चीज है जिसको अन्याय न कर पाने की क्षमता के कारण स्वीकार्य माना जाता है.’ ग्लाकॉन के अनुसार न्याय की जरूरत कमजोर व्यक्ति की अन्याय न कर पाने की क्षमता तथा अन्यायी का सामना न करने की अक्षमता के कारण पड़ती है. दूसरे शब्दों में न्याय कमजोर की बैशाखी है, और शक्तिशाली की राह की बाधा. थ्रेचाइमच्स जहां न्याय को शक्तिशाली व्यक्तियों का हित स्वीकारता है, ग्लाकॉन उसे भय की भावना के कारण दुर्बल वर्ग के हित में बनाई कई अनिवार्यता की संज्ञा देता है. दोनों ही न्याय को बनावटी और दुर्बल वर्ग की रक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्था स्वीकारते हैं. दोनों का मानना है कि न्याय को अपने आप में नैतिक या शाश्वत सिद्धांत नहीं माना जा सकता. अपने पक्ष को प्रस्तुत करते हुए थ्रेचाइमच्स कुतर्क की सीमा तक चला जाता है. उसके कहने का आशय है कि मनुष्य अपनी शक्ति के बल पर जितना समेट सकता है, उतना समेट लेने का उसे अधिकार है और यह काम उसे करते रहना चाहिए. इसी में उसका सुख है. वह संतोष को दुर्बल व्यक्ति द्वारा किया गया समझौता मानता है. लोकतंत्र में भी जनता यदि शासन की ओर से मुंह मोड़ ले, पूरी तरह निर्वाचित प्रतिनिधियों पर छोड़कर शासन की ओर से उदासीन हो जाए तो लोकतंत्र के अल्पतंत्र में बदलने में देर नहीं लगती. ऐसे राज्यों के कानून केवल अल्पतंत्र के हितों का ही रक्षण करते हैं. लोकतांत्रिक सरकारें निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा संचालित होती हैं. उनमें निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में जो संख्या में अत्यल्प होते हैं—कानून बनाने के अधिकार होते हैं. संयोग से अल्पतंत्र में भी कानून बनाने का अधिकार सीमित वर्ग के अधीन होता है. इसलिए जनता की उदासीनता अथवा जनमत के बंटा होने पर शासन-शिखर पर मौजूद लोगों को मनमानी का अधिकार मिल जाता है. परिणामतः जनतंत्र के अल्पतंत्र में बदलते देर नहीं लगती.

थ्रेचाइमच्स के अनुसार द्वारा ‘शक्तिशाली सदा सही’ कहना अनुभव-सिद्ध निर्णय था. जिस दौर में सोफिस्ट विचारधारा पनपी थी, उस दौर के शासकों के लिए शक्ति की सबकुछ थी. यूनान ही क्यों, प्राचीन सभी सभ्यताओं में लगभग वही स्थिति थी. भारत में इसे धर्म कहा गया है; और धर्म के नाम पर सत्ता के प्रत्येक धत्तकर्म को श्रेय की कोटि में रख दिया जाता था. राम जब शंबूक को मृत्युदंड देता है, निर्दोष पत्नी को वनवास की सजा सुनाता है अथवा बालि की छिपकर हत्या करता है, तो तत्कालीन विधान उसे दोष नहीं देता. उल्टे उसका महिमा-मंडन करता है. चूंकि राम वर्चस्वकारी संस्कृति का महानायक है, इसलिए उसके दोष पर पर्दा डालने के लिए समर्थन में तर्क गढ़ लिए जाते हैं. धर्म-विजय कहकर शक्तिशाली के वर्चस्व को अधिमान्य ठहराया जाता है. महाभारत युद्ध को जीतने के लिए कृष्ण कदम-कदम पर छल करता है. उसकी हर चतुराई और छल का भी धर्म बताकर महिमामंडन कर दिया जाता है. अपने स्तर पर यही काम संस्कृति भी करती है. इसे विजेता संस्कृति का दर्प भी कह सकते हैं, जो इतिहास और सांस्कृतिक प्रतीकों की व्याख्या अपने स्वार्थ के अनुरूप करती रहती है. प्लेटो का ध्येय न्याय संबंधी प्रचलित अवधारणाओं पर विचार करते हुए उसके वास्तविक रूप की पहचान करना है. थ्रेचाइमच्स का तर्क तत्कालीन यूनानी प्रभुवर्ग की सामान्य मानसिकता को दर्शाता है. चर्चा के दौरान सवाल करने पर वह कहता है—‘न्याय असल में दूसरों के कल्याण से ही संबंधित है. शासकवर्ग नियम बनाता है, इसलिए वह सदैव लाभ की अवस्था में रहता है.’ किसी न किसी रूप में वह उन्हीं नियमों को मान्यता देता है जो उसके लिए हितकारी हैं. जो व्यक्ति उन नियमों को एकतरफा मानकर उसका विरोध करता है, उन्हें वह दंडित करता है; अथवा उपेक्षित कर हाशिये पर ढकेल देता है.’ उस समय वह बड़ी चतुराई से संस्कृति, समाज तथा कानूनी प्रावधानों की अपने पक्ष में व्याख्या करता है. न्याय की यह अवधारणा सुकरात की निगाह में उचित नहीं है. यदि शक्तिशाली द्वारा मनमाने ढंग से, केवल अपने हितों में काम करने को न्याय मान लिया जाए तो उसकी मूल अवधारणा ही खतरे में पड़ जाएगी. न्याय को परखने के लिए वह तीन कसौटियां बनाता है—‘कौन-सा कार्य बुद्धिमत्तापूर्ण है?’ ‘सबसे सुरक्षित रास्ता क्या है?’ तथा ‘जीवन में शुभत्व की स्थापना किस प्रकार संभव है?’ सुकरात के लिए इनमें तीसरा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है.

‘रिपब्लिक’ की शैली में दार्शनिक गांभीर्य है. प्लेटो न तो व्यंजना का सहारा लेता है, न ही अनपेक्षित संवेदना को बीच में हालात है. ध्रेचाइमच्स के माध्यम से वह सोफिस्टों की न्याय-संबंधी अवधारणा को हमारे सामने लाता है. सोफिस्ट शक्ति का आराधन करने वाले थे. लेकिन उनके राज्य बड़े नहीं थे. जब चारों और शक्ति का बोलबाला हो और लोग समाज की समन्वित शक्ति के बजाय अपनी-अपनी शक्ति पर नाज करते हों तो संघर्ष की स्थितियां बनेंगी ही. सो उस समय तक राज्य नगरीय सीमाओं में सिमटे हुए थे. थ्रेचाइमच्स शक्ति के सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण को हमारे सामने रखता है. सुकरात को माध्यम बनाकर प्लेटो उसका प्रतिवाद करता है. बताता है कि केवल शक्ति-आराधन से राज्य नहीं बनते. प्रत्येक समाज में ऐसे लोग होते हैं जो दूसरों के लिए समर्पण-भाव से जीना जानते हैं. डॉक्टर अपना पेशा दूसरों के भले के लिए चलाता है. अध्यापक ज्ञान बांटता है. दर्जी दूसरों के लिए वस्त्र सिलता है, कलाकर लोककल्याण की भावना के साथ चित्र बनाता है. ठीक है ये सब अपने-अपने कार्य के बदले में समाज से कुछ वसूलते हैं. डॉक्टर रोगी से फीस लेता है. अध्यापक को पढ़ाई के बदले वेतन मिलता है. इसी तरह दर्जी, कलाकार आदि भी अपने-अपने श्रम-कौशल के बदले समाज से कुछ न कुछ प्राप्त करते हैं. परंतु यह सब तो इसलिए आवश्यक है ताकि वे समाज को अपनी अनवरत सेवाएं प्रदान कर सकें. इससे उनके योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता. ‘रिपब्लिक’ में थ्रेचाइमच्स सुकरात के तर्कों के आगे शांत हो जाता है. परंतु जिस प्रकार वह शक्ति का पक्ष लेता है, उसके सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण का समर्थन करता है, उसका प्रभाव पीढ़ियों तक बना रहता है. थ्रेचाइमच्स के दृष्टिकोण का विस्तार उनीसवीं शताब्दी में, नीत्शे के दर्शन में नजर आता है. प्लेटो ने जहां दार्शनिक सम्राट की परिकल्पन की थी, नीत्शे ने महामानव की परिकल्पना की, जो प्लेटो के दार्शनिक सम्राट जैसा ही सर्वगुणसंपन्न, विराट व्यक्त्वि का स्वामी है. अपनी पुस्तक The genealogy of morals में वह  ‘दास नैतिकता’ और ‘स्वामी नैतिकता’ की बात करता है. उसके अनुसार स्वामी के नैतिक मूल्य शक्ति, सदाचरण, सज्जनता, अच्छे और बुरे को परखने की दृष्टि से देखे जा सकते हैं, जो दास की नैतिकता ‘समर्पण’, दयालुता, मानवता, करुणा और संवेदना से परखी जा सकती है.

प्लेटो मानता है कि सृष्टि में पूर्ण समानता असंभव है. जितने भी प्राणी हैं उनमें परस्पर अनेक भिन्नताएं हैं. प्रकृति में देखा जाता है कि शक्तिशाली कमजोर पर राज्य करता है. उसपर अधिकार जमाकर किसी न किसी रूप में उसके अधिकारों का हनन करता है. ऐसे में राज्य की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है. राज्य प्राकृतिक असमानताओं की खाई को पाटते हुए लोगों को समान धरातल पर लाने का प्रयास करता है. यही उसके गठन का उद्देश्य भी है. साधारण सोच यही है कि शक्तिशाली को दुर्बल पर राज्य करना चाहिए. वृहद सामाजिक हितों के लिए यह अत्यावश्यक है. सोफिस्ट चिंतक यही मानते थे. ‘जार्जियस’ नामक संवाद में प्लेटो स्वयं यूनानी विचारक केलीक्लिस के विचारों से सहमत नजर आता है. वह स्वीकारता है कि प्राकृतिक आधार पर असमानताओं की भरपाई के लिए शक्तिशाली को समाज के कमजोर पक्षों का समर्थन, प्रोत्साहन करते हुए शासन करना चाहिए. इसी से प्राकृतिक स्तर पर गैरबराबरी को कम किया जा सकता है. सुकरात वहां भी प्रतिवादी के रूप में उपस्थित हो जाता है. वह उसी प्रश्न को दोहराता है, जो उसने थ्रेचाइमच्स से किया था कि श्रेष्ठतम के चयन की कसौटी क्या हो? शक्ति या फिर बुद्धिमत्ता? केवल ताकत के भरोसे शासन करना संभव नहीं है. जनता की सामूहिक शक्ति किसी भी शक्तिशाली शासक के कुल सैन्य-सामर्थ्य से अधिक होती है. प्रजा ही कभी समर्थन तो कभी निष्क्रिय रहकर राज्य के सर्वसत्तासंपन्न होने का भ्रम पैदा करती है. युद्ध तक में शारीरिक बल से अधिक बुद्धिबल की आवश्यकता पड़ती है. दूसरे शारीरिक बल को श्रेष्ठता का पर्याय मान लेना प्रकारांतर में प्राकृतिक न्याय को सामाजिक न्याय मान लेने जैसा ही है. यदि मान लिया जाए कि शक्ति ही सबकुछ है तो उसके आधार पर प्रतिफल की अपेक्षा से कौन रोक सकता है. सुकरात के अनुसार केलीकिल्स न्याय की मूल-भावना को पकड़ने में असमर्थ है. केवल शक्ति को न्याय का पर्याय बताकर वह अन्याय का पक्ष लेने की गलती कर जाता है. पहले चरण की बहस बेनतीजा समाप्त होती है. उससे हम यह तो जान लेते हैं कि ‘न्याय क्या नहीं है’, परंतु यह नहीं जान पाते कि ‘न्याय वास्तव में क्या है?’

© ओमप्रकाश कश्यप

न्याय की पाश्चात्य अवधारणा

सामान्य
न्यायमूलक भावना ही मनुष्यता के साथ प्रेम संबंधों का नैरन्तर्य है.1जॉन रॉल्स

न्याय बड़ा खूबसूरत शब्द है. साथ में सम्मानित भी. परंपरा में वह शब्दों का ‘अभिजन’ है. इसीलिए जो व्यक्ति ईमानदार और न्यायकर्ता है, जिसके पास न्याय करने का अधिकार है. किसी भी दबाव, विशेषकर सत्ता के दबावों से जो मुक्त है, ‘दूध को दूध और पानी को पानी’ सिद्ध करने की कला जिसे आती है—जनसाधारण उसकी ओर उम्मीद-भरी निगाह से देखता है. आवश्यकता पड़ने पर वह अपने जीवन में ऐसे ही न्याय की कामना करता है. किसी भी समाज में न्याय का स्तर उस समाज में मानवीय अधिकारों की पहुंच का भी संकेतक होता है. समृद्ध न्याय-बोध हेतु परिपक्व अधिकारबोध आवश्यक है. परंपरागत समाजों में मनुष्य का अधिकारबोध, सामूहिकताबोध के दबावों से मुक्त नहीं हो पाता था. सामूहिकता का दायरा परिवार, बस्ती, जाति-समूह, पंचायत वगैरह कुछ भी हो सकता था. साधारणजन उन्हीं के बीच रहते हुए प्रचलित सांस्कृतिक प्रतीकों, लोकगाथाओं, रूपकों और मिथों से अपने न्यायबोध का संस्कार करता था. हालात आज भी वही हैं. आज भी किस्से-कहानियां जनसाधारण के न्यायबोध को बनाते हैं. बचपन से ऐसे अनेकानेक किस्सों, मिथों, धार्मिक प्रतीकों और गाथाओं से उसका वास्ता पड़ता है, जो उसे न्याय की प्रतीति कराते हैं. या जिन्हें उसके समक्ष न्याय के मानक के रूप में पेश किया जाता है. ‘जहांगीर का न्याय’, ‘अकबर-बीरबल’, ‘खोजा-बादशाह’, ‘मुल्ला नसरुद्दीन’, उपनिषदों और महाकाव्यों की कहानियों के अलावा समाज में लोक-किस्सों की भरमार हैं. उलझनों के बीच वही हमारी प्रेरणा बनते हैं. वही हमारे लोकमानस को बनाते हैं. उन्हीं से हमारे भीतर न्याय का संस्कार बनता है. भारतीय धर्मग्रंथों में यमराज को भी न्याय-प्रिय बताया गया है. उसे लेकर अनेक कहानियां और मिथ समाज में विद्यमान हैं. चूंकि उनके मूल में मिथकीय अंश ज्यादा हैं, इसलिए वे न्यायबोध को निखारने के बजाय तयशुदा निष्पत्तियों को थोपने का ही काम करते हैं. अपने समग्र प्रभाव में वे व्यक्ति को न्याय की मूल अवधारणा से दूर ले जाते हैं. जिस न्याय पर हम फिलहाल विचार करने जा रहे हैं, उसका दायरा विस्तृत है. वह बादशाह, काजी, अदालत, यमराज या किसी दयालु सम्राट के परंपरागत न्याय-बोध से परे है. न्याय के विविध रूपों पर विचार करने से पहले दो किस्से, बतौर उद्धरण यहां प्रस्तुत हैं—

‘महमूद गजनबी का पिता सुबुक्तगीन गजनी के बादशाह का गुलाम था. कहते हैं कि प्रतिभा किसी की चेरी नहीं होती. गरीब के घर विद्वान जन्म ले सकता है, और तमाम इंतजामात के बावजूद बादशाह का बेटा निकम्मा, आलसी, दुर्व्यसनी और मंदबुद्धि हो सकता है. तुर्की मूल के गुलाम सुबुक्तगीन की प्रतिभा को देखते हुए गजनी के बादशाह ने उसे अपना दामाद बना लिया था. अवसर मिला तो सुबुक्तगीन की साम्राज्यवादी लालसाएं जोर मारने लगीं. उसने भारत पर आक्रमण कर कांधार पर कब्जा कर लिया और वहां अपनी छावनी बना दीं. सुबुक्तगीन भारतीय इतिहास में खुद तो ज्यादा हस्तक्षेप न कर सका. लेकिन उसके बेटे महमूद गजनवी ने भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा कर अपनी सलनत कायम कर ली. महमूद गजनवी भले ही सुलतान हो, हजारों सैनिकों की फौज का बेड़ा रखता हो. परंतु यह बात वह भी भली-भांति जानता था कि राजा-महाराजाओं को तलवार के दम पर दबाया जा सकता है. परंतु प्रजा को तलवार के बल पर लंबे समय तक दबा पाना असंभव होता है. निहत्थी जनता यदि अपनी पर आ जाए तो बड़े-बड़े साम्राज्य भू-लुंठित होने लगते हैं. हां, उसे भुलावे में जरूर रखा जा सकता है. धर्म, परंपरा, संस्कृति, राष्ट्रवाद जनता को भुलावे में रखने के ही उद्यम हैं. निजी मंसूबों को साधने के लिए चालबाज लोग इन्हीं का सहारा लेते आए हैं. भारतीय राजाओं का इतिहास रहा है कि वे आपसी फूट द्वारा प्रतिपक्षी की विजय को खुद आसान बना देते थे. सुबुक्तगीन को इसी का लाभ मिला था. अपनी छोटी-सी सेना की मदद से उसने युद्ध में स्थानीय राजा जयपाल को बुरी तरह पराजित किया था. उस युद्ध में जयपाल ने एक लाख सैनिक उतारे थे. परंतु युद्ध कौशल का अभाव और आपस की फूट ने उसे हथियार डालने को विवश कर दिया था.

बड़ी सलतनत खड़ी करने और लंबे समय तक बनाए रखने के लिए प्रजा का भरोसा जीतना भी आवश्यक है. सो मोहम्मद गजनवी ने प्रजा को न्याय का भरोसा दिलाया. विश्वास दिलाया कि न्याय के आगे बादशाह हो या फकीर सब बराबर हैं. ‘मनुस्मृति’ के विधान के जरिये ऊंच-नीय और गैरबराबरी में जीने वाले भारतीय जनसमाज के लिए ‘इस्लाम का बराबरी का सिद्धांत’ बड़ा ही आकर्षक सिद्ध हुआ. वर्ण-व्यवस्था के सताए लोग इस्लाम में दीक्षित होने लगे. नए धर्म में शामिल होने के बाद उनके हालात में क्या सुधार हुआ, यह कहना कठिन है. परंतु यह बात सही है कि इस्लाम अपने साथ कई आकर्षक परंपराएं भी लेकर आया था. प्राचीन फारस में न्याय के लिए काजी नियुक्त करने की व्यवस्था थी. काजी उसे बनाया जाता था जो अनुभवी हो. निडर हो. राजा-प्रजा के भेद से जिसका न्याय प्रभावित न होता हो. महमूद का काजी था—मोहतसिब. वह सुलतान के किसी भी आदेश से बरी था. न्याय के लिए उसे किसी खास समय की दरकार न थी. इसलिए लोग उसे चलता-फिरता न्यायालय मानते थे. उसका देखा-सुना ही प्रमाण था. घटना का यदि वह स्वयं साक्षी हो तो बिना किसी औपचारिकता के घटना-स्थल पर अदालत लगा, मामले को वहीं निपटा देता था. राज्य में सामाजिक स्थलों पर शराब पीने या शराब पीकर बाहर निकलने पर पूरी पाबंदी थी. एक दिन सुलतान और उसके सरदार ने शराब पी. नशे से दोनों झूमने लगे. शराब पीने के बाद सरदार ने घर जाने की इच्छा जाहिर की. इस पर सुलतान ने उसे रोका. समझाया कि नशा उतरने के बाद बाहर निकलना. लेकिन सरदार न केवल शराब का बल्कि रुतबे का नशा भी सवार था. सो सुलतान की सलाह की परवाह किए बिना वहां से चल दिया. संयोग ऐसा कि उसी समय काजी मोहतसिब खाना खाने के बाद घूमने के लिए निकला था. उसने सरदार को डगमगाते कदमों से गुजरते देखा तो गुस्सा आ गया. तत्क्षण सरदार को गिरफ्तार कर कोड़े लगाने का दंड सुनाया गया. न्याय हुआ, स्वयं बादशाह अपने चहेते सरदार को बचा न सका.’

ऐसे किस्सों में कितना सच होता है कितना झूठ, यह ठीक-ठीक बता पाना आसान नहीं है. सभी राजा-महाराजा, बादशाह-सुलतान दरबार में भाटों को नियुक्त रखते थे. उनका काम ही था, राजा की महिमा का बखान करते रहना. ताकि जनता को अपने राजा पर भरोसा बना रहे. उस समय तक ‘राजा’ और ‘राज्य’ में बड़ा अंतर नहीं था. राजा एक व्यक्ति के साथ-साथ संस्था भी होता था. उसकी इच्छा ही न्याय होती थी. जाहिराना तौर पर उसका झुकाव राजा के करीबियों की ओर अधिक होता था. न्याय के दूसरे स्वरूप को जानने के लिए दूसरा किस्सा प्रस्तुत है. यह न्याय से जुड़े नैतिक पक्ष की ओर संकेत करता है. महाभारत के वनपर्व में राजा उशीनर के न्याय की कहानी आई हैं. कुछ पुराणों इस कहानी को महान असुरराज बलि की दानवीरता से भी जोड़ा गया है—

‘एक दिन उशीनर दरबार में बैठे हुए थे कि एक घबराया हुआ कबूतर उनकी गोद में आकर गिरा. पीछे-पीछे एक बाज भी वहां आ पहुंचा. शरणागत की रक्षा के लिए उशीनर ने तलवार उठा ली. इस पर बाज बोला—‘महाराज! यह मेरा भोजन है. इसपर मेरा अधिकार है.’ उशीनर ने कबूतर की आंखों में झांककर देखा, वहां भय ही भय था. उसे देख राजा ने कहा—‘यह मेरी शरण में आया है और शरणागत की रक्षा करना मेरा धर्म है.’ बाज इस प्रश्न के उत्तर के लिए तैयार था. बोला—‘आपकी दया और दानवीरता के अनेक किस्से मैं सुन चुका हूं. इस समय मैं भूख से व्याकुल हूं. अगर जल्द कुछ इंतजाम न हुआ तो मैं यहीं दरबार में सबके सामने अपने प्राण त्याग दूंगा. राज्य में भूख के कारण मेरी अकाल मृत्यु के जिम्मेदार एकमात्र आप होंगे.’

उशीनर पेशोपेश में पड़ गया. कबूतर भयभीत था. राज्य-धर्म कहता था, शरण में आए की रक्षा करना. दूसरी ओर बाज भी अपनी जगह सही है. सृष्टि में ऐसे अनेक प्राणी है जिनका आहार दूसरे जीव हैं. प्रकृति की इस व्यवस्था को भी नहीं बदला जा सकता. सहसा राजा ने निर्णय लिया. उसका दायां हाथ उठा. कटार चली. राजा ने जांघ पर प्रहार कर मांस का एक हिस्सा शरीर से अलग कर दिया—‘कबूतर के मांस के बराबर मेरा मांस लेकर तुम अपनी क्षुधा शांत कर सकते हो.’

पहले किस्से में न्याय का लोक-प्रचलित रूप है. न्याय को लेकर सामान्य धारणा इसी प्रकार की होती है. राज्य का कर्तव्य है कि वह प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा करे. प्राणरक्षा करना कबूतर का भी अधिकार है. बाज के सामने जब वह खुद को बचा नहीं पाता तो राजा की शरण लेता है. तभी बाज अपने दावे के साथ उपस्थित हो जाता है. एक तरह से दोनों का जीवन दाव पर लगा है. बाज सोचता है कि भोजन नहीं मिला तो उसके प्राण चले जाएंगे. दूसरी ओर कबूतर भी जानता है कि यदि वह बाज के प्राकृतिक अधिकार के आगे झुका तो वह स्वयं अपने जीवन से हाथ धो बैठेगा. उशीनर कबूतर और बाज दोनों के जीवन के अधिकार का सम्मान करता हुआ, तीसरा जो अपेक्षाकृत निरापद रास्ता है, अपनाता है. कबूतर के भार के बराबर अपना मांस देकर वह बाज के जीवन की रक्षा करता है. यह न्याय की पराकाष्ठा है, जिसमें राज्य(उशीनर) किसी भी पक्ष को हानि पहुंचाए बिना उन्हें संतुष्ट कर देता है. यह अपेक्षाकृत दुर्बल प्राणियों के प्रति राज्य के कर्तव्य को दर्शाता है. ऐसी अवस्था में वकील, अदालत आदि की भूमिका अप्रासंगिक हो जाती है. पहले किस्म के न्याय का परिष्कृत रूप हम अदालतों में देखते हैं. न्याय के प्रति जनसाधारण का दृष्टिकोण न्यायालयों में होने वाले न्याय तक सीमित होता है. कई बार क्षोभ और हताशा में डूबा व्यक्ति पुकार उठता है—‘दुनिया से न्याय मानो उठ-सा गया है.’ उस समय उसकी शिकायत पूरे समाज, देश और व्यवस्था से होती है. दूसरी कहानी में न्याय का स्वरूप परिष्कृत है. वहां भौतिक संसाधनों की अपेक्षा अधिकार और कर्तव्य पर चर्चा होती है. न्याय करते हुए उशीनर सामान्य दंडाधिकारी से बहुत ऊपर उठ जाता है. वादी और प्रतिवादी में से किसी को कष्ट न हो, इसलिए वह स्वयं कष्ट-पीड़ा सहकर न्याय का संकल्प उठाता है. हालांकि न्याय की आधुनिक सैद्धांतिकी पर ऐसे उद्धरण पूरी तरह खरे नहीं उतरते.

धर्म-केंद्रित समाजों की सामान्य धारणा होती है कि केवल परमात्मा की कृपा और उसका डर मनुष्य को धर्म की ओर प्रवृत्त कर सकता है. इसलिए हर धर्म के साथ कुछ न कुछ सिद्ध-निषिद्ध जुड़े होते हैं. मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि जो सामाजिक रूप से अनुमन्य है, उसका पालन करे तथा जिन कार्यों को निषिद्ध घोषित किया गया है—उनसे अपेक्षित दूरी बनाए रखे. ये शिक्षाएं विभिन्न सांस्कृतिक कार्यकलापों, किस्से-कहानियों, गाथाओं और मिथकों के माध्यम से जनता तक पहुंचती हैं. उपर्युक्त दोनों कहानियां धर्म के न्यायशील पक्ष को दर्शाती हैं. दोनों राजशाही के दौर की हैं. जिस दौर की ये कहानियां हैं वहां असहमतियों के लिए बहुत कम गुंजाइश थी. इसलिए वर्षों-वर्ष राज्य की मर्जी को ही धर्म और न्याय कहकर महिमा-मंडित किया जाता रहा. प्रकारांतर में ये कहानियां न्याय के दो भिन्न रूपों की ओर हमारा ध्यानाकर्षित करती हैं. जैसा कि अध्याय के आरंभ में ही कहा गया है, इस तरह की कहानियां ही जनसाधारण की चेतना का निर्माण करती हैं. यदि यह सच है तो न्याय को धर्म का विस्तार अथवा उसका प्रतिफल मानने में संकोच कैसा? वैसे भी धर्म जनसाधारण के बीच न्याय की अपेक्षा कहीं लोकप्रिय शब्द है. धर्म का इतिहास भले ही खून-खराबे का रहा हो, पुरोहितों ने उसके सहारे अपना धंधा खूब चमकाया हो, परंतु उसे सामाजिकता का आधार बनाने वाले आरंभिक मनीषियों की नीयत पर संदेह नहीं किया जा सकता. यदि उन्होंने समाज की सुख-शांति के लिए डर को आवश्यक माना तथा समाज उसके कारण शताब्दियों तक अनुशासित रहा तो आगे भी उसका अनुसरण करने में बुराई क्या है! प्रश्न जितना आसान दीखता है, उत्तर उतना सरलीकृत नहीं है. धर्म-प्रधान राज्यों की न्याय व्यवस्था को देखकर इस वास्तविकता को समझा जा सकता है. अपना औचित्य सिद्ध करने के लिए प्रत्येक धर्म नैतिकता का समर्थन करता है. यह बात अलग है कि धर्म-प्रेरित नैतिकता स्वयं स्फूर्त्त नहीं होती. वहां ईश्वर या परमात्मा के रूप में तीसरी सत्ता अवश्य होती है. ऐसी सत्ता जो सर्वोपरि है. सर्वशक्तिमान भी है. जिसका स्वरूप अनिश्चित और अदृश्य है. सर्वोपरि और सर्वशक्तिमान बताकर उसका हर निर्णय अंतिम मान लिया जाता है. वहीं स्वरूप निश्चित न होने के कारण व्यक्ति को यह अवसर मिलता है, कि वह ईश्वर के नाम पर अपनी इच्छाएं थोप सके. धर्मप्राण मनुष्य के सद्कर्म और इच्छाएं बिना ईश्वर को बीच में लाए पूरी नहीं होतीं. परिणामस्वरूप उसके लिए जीवन और व्यक्ति दोनों का महत्त्व घट जाता है. वह अपने फैसले व्यक्ति और समाज की जरूरत के बजाय तीसरी शक्ति को प्रसन्न करने की चाहत के साथ लेने लगता है. ‘रिपब्लिक’ में सुकरात के साथ चर्चा करते हुए ग्लाकॉन नामक पात्र धर्माधारित न्याय की इसी कमजोरी की ओर इशारा करता है. इससे विकास के मायने और लक्ष्य दोनों बदल जाते हैं. प्राचीन सम्राट धर्मालयों के निर्माण पर जितना खर्च करते थे, लोकमहत्त्व के निर्माण यथा सड़क, चिकित्सालय, नहर, स्कूल आदि पर बहुत कम खर्च होता था. भारतीय राजाओं ने देश में जितनी बड़ी संख्या में मंदिर बनवाए, उसका दसवां हिस्सा भी यदि विद्यालय बनवाए होते तो समाज की हालत दूसरी होती. उन्होंने शिक्षा की जिम्मेदारी उस वर्ग को सौंपी हुई थी, जिसके वर्गीय स्वार्थ प्रबल थे. यही कारण है कि शिक्षा भारत में सदा ही धर्म का पूरक संस्कार बनी रही, उसके प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण कभी नहीं पनप सका. बावजूद इसके प्राचीन समाजों में जनविद्रोह की घटनाएं विरल हैं. यह भी संभव है कि जानबूझकर उनका उल्लेख करने से बचा गया हो. इतिहासकारों, लेखकों और कवियों ने उनके दस्तावेजीकरण में उपेक्षा बरती हो. क्योंकि उस दौर में सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं को धर्म और सत्ता की दृष्टि से देखने का चलन था. धर्म का जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हस्तक्षेप था. यह जानते हुए भी कि जिसे धर्मानुशासन कहा जाता है, वह स्वयं-स्फूर्त्त नहीं होता. मनुष्य को उसकी कीमत अपने विवेक के रूप में चुकानी पड़ती है, जिससे अपने बुद्धि-विवेक से निर्णय लेने का अभ्यास निरंतर कम होता जाता है.

उपर्युक्त के बावजूद लंबे समय तक न्याय का धर्म-केंद्रित होना ही ‘श्रेष्ठतम न्याय’ माना जाता रहा. वैदिक युग से लेकर दो-ढाई सौ वर्ष पहले तक भारत में यही व्यवस्था काम करती रही. हालांकि ईश्वर को किसी ने देखा नहीं था, धर्म की परिभाषाएं आपस में गड्ड-मड्ड थी, फिर भी लोग एक-दूसरे को समझाते—‘दुनिया धर्म पर टिकी है. ईश्वर सच्चा न्यायकर्ता है.’ यह सोचते हुए वे अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण निर्णय भी दूसरों के हवाले कर देते. बिना यह सोचे-विचारे कि ईश्वर के नाम पर स्वार्थ का सारा कारोबार उसके चेले-चपाटों ने कब्जाया हुआ है. चूंकि तीसरी शक्ति का कल्पना से बाहर कोई अस्तित्व नहीं है, इसलिए जनसाधारण ईश्वरेच्छा के नाम पर चंद लोगों की मनमानी का दास होकर रह जाता है, जिन्हें वह अपना गुरु अथवा अधीश्वर मानता है. उनके प्रभाव में न्याय व्यक्ति का अधिकार न रहकर शीर्ष पर बैठे लोगों की अनुकंपा मान लिया जाता है. इसी के साथ व्यक्ति से निर्णय की आलोचना का अधिकार छिन जाता है. कई बार तो न्याय की आलोचना या विरोध को दैवीय इच्छा का अपमान मान लिया जाता है. इस कोशिश में मानवीय अस्मिता को पीछे ढकेल दिया जाता है. मनुष्य के मान-सम्मान, आत्मगौरव, सहज विश्वास यहां तक कि स्वतंत्र पहचान को भी धर्म की राह में बाधक मान लिया जाता है. यह नजरंदाज कर दिया जाता है कि न्याय व्यक्ति का अधिकार, राज्य का अपने नागरिकों के प्रति पवित्रतम दायित्व है. उसे राज्य की अनुकंपा मानना समाजीकरण के उद्देश्यों पर पानी फेरने जैसा है. न्यायशीलता राज्य और राजा दोनों का अभीष्ट गुण है. यदि किसी धर्म में यह गुण मौजूद है तो निश्चित रूप से वह प्रशंसनीय है. फिर भी न्याय को धर्म का प्रतिफल मानना सर्वथा अनुचित होगा. उसे लोकचेतना का विस्तार अवश्य कहा जा सकता है. अरस्तु के शब्दों में न्याय, ‘समाज का शुभत्व है, वही राज्य को शुभत्व प्रदान करता है.’

अभी तक के विश्लेषण से न्याय की दो प्रवृत्तियां उभरती हैं. अदालतों में वकील, जज आदि के माध्यम से होने वाला न्याय. दूसरे अपने नागरिकों के प्रति राज्य के कर्तव्य के रूप में निरूपायित न्याय. भारतीय धर्मग्रंथों में न्याय के प्रथम रूप पर पर्याप्त चर्चा है. ब्राह्मण ग्रंथों, स्मृतियां और धर्मसूत्रों में इसपर खुलकर विचार किया गया है. उसे राज्य का कर्तव्य बताया गया है. परंतु न्याय के दूसरे पक्ष जो नागरिक-समाज के प्रति राज्य के दायित्व को दर्शाता है, को लेकर भारतीय वाङ्मय में गहरी चुप्पी पसरी है. अर्थशास्त्र में राजा के सामने हालांकि लोकहित का बड़ा आदर्श रखा गया है. जोर देकर कहा गया है—‘प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है. प्रजाहित में राजा का हित सन्निहित है.’2 ‘विष्णु धर्मसूत्र’ में भी इस भावना को विस्तार दिया गया है. तदनुसार—‘जो राजा प्रजा के सुख में सुखी, उसके दुख में दुखी हो जाता है. उसे संसार में अपनी कीर्ति बनाए रखने के लिए यज्ञ और तपादि की आवश्यकता नहीं है.’3 लेकिन यही ग्रंथ जब राजा को पृथ्वी का ईश्वर या देवता घोषित करते हैं, और उसके हाथ में सारे अधिकार सौंप देते हैं, और उत्तराधिकार में अंतरित राजन्य जब अयोग्य हाथों में पहुंचकर मनमानी का अवसर देता है, तब वह एक ऐसी निरंकुश शक्ति का प्रतीक बन जाता है, जिसका निर्णय समीक्षा और आलोचना से परे है. इन ग्रंथों के अनुसार राजा अकेला ही रक्षक, प्रजापालक, अन्नदाता, दंडाधिकारी वगैरह सबकुछ होता था. फैसले पर कोई सवाल न उठे, इसलिए उसके निर्णय को देववाणी घोषित कर दिया जाता था.

न्याय की दृष्टि से पश्चिमी दर्शन अपेक्षाकृत उदार रहे हैं. विशेषकर सुकरात और उसके बाद के यूनानी विचारक. मानव-केद्रित होने के कारण वे नियतिवाद से उतने प्रभावित नजर नहीं आते, जितने भारतीय धर्म-दर्शन. ऐसा नहीं है कि यूनानी साहित्य मिथकीय प्रभावों से सर्वथा मुक्त रहा है. इस आधार पर यूनानी दर्शनों को सुकरात पूर्व और सुकरात के बाद के दर्शनों में बांटा जा सकता है. सुकरात पूर्व के यूनानी दर्शनों पर मिथकीय चरित्रों का वैसा ही प्रभाव है, जैसा भारतीय धर्म-दर्शनों पर. कुछ अंशों में यह प्लेटो के विचारों पर भी बना रहता है. लेकिन प्लेटो उससे सिर्फ प्रेरणा लेता है. अपने विचारों को परंपरा से बांधता नहीं है. अरस्तु सहित उत्तरवर्ती विचारक उसे और भी विस्तार देते हैं. वस्तुतः ईसा पूर्व छठी शताब्दी का समय पूरी दुनिया में बौद्धिक क्रांति का था, जिसमें विश्वास को तर्क की कसौटी कसा जाने लगा था. भारत में उसके सूत्रधार थे— गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी तथा यूनान में सुकरात, प्लेटो, जेनोफीन, डेमीक्रिटिस आदि. भारत में जैन एवं बौद्ध दर्शन के अलावा अनीश्वरवादी विचारक यथा आजीवक, लोकायत, वैनायिक भी वैदिक परंपरा के धर्म-दर्शनों का तार्किक विरोध कर रहे थे. फिलहाल उनके पक्ष में शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध न होने के कारण कुछ भी कहना अनुचित होगा. बुद्ध और सुकरात दोनों ने अपने-अपने देश में ठेठ परंपरावाद, आडंबर और दिखावे का जोरदार विरोध किया था. दोनों ने दर्शन के क्षेत्र में व्यावहारिकता को समर्थन दिया. यूनान में सुकरात आदि के नेतृत्व में उभरे बौद्धिक आंदोलनों ने मिथकीय विश्वासों को दर्शन के क्षेत्र से करीब-करीब अलग-थलग कर दिया था. इससे न्याय के क्षेत्र में स्वतंत्र चिंतन को बल मिला.

एक प्रसिद्ध ग्रीक कहावत है—‘मनुष्य अपने लिए न्याय का दरवाजा स्वयं खोलता है.’ इसका मंतव्य एकदम स्पष्ट है. जब भी कोई मनुष्य अपने मित्रों, सगे-संबंधियों, पड़ोसियों तथा परिजनों के प्रति न्याय-भाव से परिपूर्ण आचरण करता है, तो उसके अपने लिए न्याय के रास्ते प्रशस्त हो जाते हैं. उसे न्याय के लिए भटकना नहीं पड़ता. आवश्यकता पड़ने पर न्याय स्वयं उस तक चला आता है. दूसरे शब्दों में ‘न्याय ही न्याय को कमाता है.’ कदाचित इसीलिए सुकरात ने कहा था—‘न्याय समाज का सद्गुण है. वह समाज में शुभत्व की उपस्थिति को दर्शाता है.’ सुकरात की यह अवधारणा न्याय की आधुनिक परिभाषा के काफी निकट है. हालांकि यूनान में सुकरात के पहले से ही न्याय को समझने की कोशिश होती रही है. सोलोन की कविता में कहा गया है कि ‘बिना कानून के राज्य को कानून एवं व्यवस्था के राज्य में बदल देना चाहिए.’4 यूनानी धर्मशास्त्रों में ‘दाइक’ को न्याय की देवी बताया गया है. हेसियद की कविता में ‘दाइक’ को ‘क्रूरता को समाप्त करने के लिए जीयस की ओर से उपहार’ बताया गया है. प्लेटो ने ‘दाइक’ को दंड के निषेध के रूप में, उदारता एवं विवेक से न्याय करने वाली पराशक्ति के रूप में परिभाषित किया है. ‘दाइक’ की प्रतिपक्षी के रूप में ‘अदाइका’ का उल्लेख है, जिसे यूनानी धर्मशास्त्रों में ‘अन्याय’ की देवी माना गया है. मिथकीय गाथा के अनुसार ‘दाइका’ अन्याय की देवी ‘अदाइका’ को छड़ी से पीटकर भगा देती है. रोमन धर्मशास्त्रों में ‘दाइक’ की समकक्ष देवी ‘जस्टीटिया’ है. दोनों अपने हाथ में न्याय के प्रतीक के रूप में ‘तराजू’ को उठाए रहती हैं. स्पष्ट है कि भारतीय धर्मशास्त्रों की भांति प्राचीन यूनानी एवं रोमन धर्मशास्त्रों में भी न्याय की आरंभिक अवधारणा रूढ़ ही रही है. उसमें बदलाव ईसा पूर्व छठी शताब्दी के बाद से दिखाई पड़ता है. सुकरात उसका प्रमुख सूत्रधार है.

उन दिनों का यूनानी समाज युद्ध-प्रिय समाज था. यूनानी द्वीप समूह पर छोटे-छोटे राज्य थे. उनके बीच आपस में युद्ध होता रहता था. स्पार्टा और एथेंस के बीच तो शताब्दियां पुराना वैर-भाव था. वहां का पूरा समाज युद्धक मानसिकता में जीता था. वास्तविक नायकों की पूजा के दौर में मिथकों का अप्रासंगिक हो जाना स्वाभाविक भी था. उस समय के सभी प्रमुख विचारकों हिरोटोडस, एनेक्सिमेंडर, पेरामेनीडिस, प्लेटो, जेनोफीन, हेराक्लाट्स आदि के विचार युद्धक भावनाओं से भरे हैं. एनेक्सिमेंडर(610—546 ईस्वीपूर्व), हेराक्लाइट्स जैसे विद्वान युद्ध को सकारात्मक अर्थ में देखते थे. वह न्याय को ऐसे ही अंत:संघर्षों का परिणाम मानता था. उसका मानना था, ‘युद्ध सामान्य बात है. न्याय दो पक्षों में विक्षोभ की परिणति है. उसके परिणाम विवाद की प्रवृत्ति और आवश्यकता के अनुसार बदलते रहते हैं.’ एनेक्सिमेंडर भी न्याय को व्यवहार की श्रेष्ठता के रूप में देखता था. उसके अनुसार मनुष्य का कर्तव्य है—‘परस्पर न्याय-भावना के साथ पेश आना और एक-दूसरे के अन्याय को भूलते चले जाना.’ उसके अनुसार न्याय को उस रूप में देखना चाहिए जिसके अनुसार वस्तुएं अपने स्वाभाविक रूप में आकार ग्रहण करती हैं तथा किसी समय विशेष में दूसरी वस्तुओं पर प्रभाव डालती हैं. उल्लेखनीय है कि एनेक्सिमेंडर की न्याय-संबंधी अवधारणा में समानता और स्वतंत्रता के लिए कोई जगह नहीं थी. उसका महत्त्व न्याय को दार्शनिक विवेचना की विषय-वस्तु बनाने के कारण है.

उस समय पूरे यूनान में दास प्रथा थी. अर्थव्यवस्था में दासों की संख्या का बड़ा योगदान था. सुकरात के समय एथेंस की कुल जनसंख्या लगभग तीन लाख थी. उसमें से 125000 दास तथा लगभग 25000 कृषिदास अथवा अर्धदास थे. कृषिदास मुख्यतः कृष्ट भूमि से जुड़े किसान थे. भू-अधिकार में परिवर्तन के साथ ही उनका स्वामित्व भी नए भू-स्वामी के हाथों में अंतरित हो जाता था. अर्धदासों में छोटे शिल्पकार और कारीगर भी आते थे. एथेंस और रोम की संपन्नता का सारा दारोमदार उन्हीं के कंधों पर था. इसलिए दर्शन के क्षेत्र में शुभत्व और सदगुण की मांग करने वाले सुकरात, प्लेटो और अरस्तु जैसे विचारक भी दास प्रथा के समर्थक थे. वे उसे समाज की आवश्यकता के रूप में देखते थे. अभिजात वर्ग में जन्मे विचारकों के लिए उस व्यवस्था का विरोध एकाएक संभव भी न था. न्याय संबंधी उनकी अवधारणा जीवन में सामान्य नैतिकता के अनुपालन तक सीमित थी. एनेक्सिमेंडर के लिए न्याय का सामान्य अर्थ था—व्यक्ति के संपत्ति-अधिकारों की सुरक्षा. उन दिनों यूनानी देशों की परंपरा थी कि यदि किसी कुलीन परिवार की स्त्री का पति मर जाता था, तो उसकी संपत्ति राज्य के अधीन मान ली जाती थी. इस कानून के विरोध में स्त्रियां मोर्चा निकाल चुकी थीं. एनेक्सिमेंडर जैसे कुछ विचारक कुलीन परिवार की विधवाओं को संपत्ति अधिकार देने के पक्ष में थे. दूसरे की संपत्ति पर अधिकार को अनैतिक माना जाने लगा था. सुकरात के समकालीन थियोगनिस की काव्य-पंक्तियों में तत्कालीन समाज में न्याय एवं कानून-व्यवस्था के प्रति क्षोभ समाया हुआ है—

‘उन्होंने हिंसा द्वारा संपत्ति कब्जा ली है. यह पूरे विश्व के लिए संकट की स्थिति है. वास्तविक न्याय अब संभव नहीं दिखता.’5

हेराक्लाइट्स(535—475 ईस्वीपूर्व) न्याय को उसके सामान्य अर्थों से बढ़कर मानता था. उसका मानना था कि न्याय ब्रह्मांड का सर्वाधिक क्रियाशील तत्व है. हेराक्लाइट्स की न्याय संबंधी अवधारणा को एनेक्सिमेंडर के विचारों के तत्वावधान में समझा जा सकता है. एनेक्सिमेंडर विश्व को दो ध्रुवी मानता था. उसका मानना था कि समय विशेष में दोनों ध्रुवों से कोई एक सक्रिय रहता है. उस दौरान दूसरा शांत बना रहता है. कभी-कभी दोनों में एक जीत की ओर अग्रसर रहता है तो दूसरा पराजित होता दिखाई पड़ता है. द्वंद्व के बीच ऐसा अवसर भी आता है जब दूसरे पक्ष की सहनशक्ति समाप्त हो जाती है. वह पलटकर प्रहार करता है. इससे परिवर्तन की स्थिति उत्पन्न होती है. इस धारा का विस्तार हीगेल के ‘द्वंद्ववाद’ तथा मार्क्स के सुप्रसिद्ध दर्शन ‘ऐतिहासिक भौतिकवाद’ में देखा जा सकता है. एनेक्सिमेंडर द्वंद्व को न्याय की स्वाभाविक अवस्था मानता था. उसके अनुसार विपरीत विचारधाराओं का द्वंद्व समाज को न्याय की ओर ले जाता है. उन्हें सार्थक परिणाम तक पहुंचाने में समय की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है. अपने मंतव्य को स्पष्ट करने के लिए वह धनुष का उदाहरण देता है. उसके अनुसार धनुष में खिंचाव उत्पन्न होने पर उसके दोनों सिरे डोर को अपनी-अपनी ओर खींचते हैं. उनके खिंचाव की दिशा परस्पर विरोधी होती है. खिंचाव से धनुष असामान्य अवस्था में आ जाता है. फिर भी धनुष ठीक से काम करे उसके लिए खिंचाव आवश्यक है. बगैर तन्यता के धनुष काम नहीं कर पाएगा. लक्ष्य भेदने के लिए खिंचाव की मात्रा तथा उसकी दिशा महत्त्वपूर्ण होती है.

हेराक्लाट्स के अनुसार विपरीतधर्मियों का द्वंद्व सदैव बाहर की ओर नहीं होता. मनुष्य के भीतर भी अंतर्द्वंद्व प्रभावी रहते हैं. अच्छे और बुरे का बोध मानवीकरण की प्रक्रिया का प्रथम चरण होता है. वही उस प्रक्रिया को आसान बनाता है. हेराक्लाइट्स के लिए द्वंद्व ही सृष्टि की समस्त गतियों का उत्प्रेरक है. द्वंद्वात्मकता का सबसे बड़ा प्रमाण है, सृष्टि में नर और मादा जैसे विपरीतलिंगी जीवधारियों की मौजूदगी. यदि यह नहीं तो दुनिया में सब कुछ थम-सा जाए. हेराक्लाइट्स यह मानने को तैयार नहीं था कि दुनिया में अन्याय है. बल्कि उसका मानना था कि यह न्याय ही है जो दुनिया की हर चीज को संवारे हुए है. उसके अनुसार संसार में द्वंद्व से मुक्ति असंभव है. द्वंद्व सृष्टि को संवारता तथा उसके विकास को गति देता है. उसका समकालीन पेरामेनीडिस न्याय को समाज के लिए उत्प्रेरक शक्ति के रूप में देखता था. न्याय-केंद्रित समाजों में मनुष्य को यह विश्वास होता है कि समाज में रहते हुए उसके हित सुरक्षित है. आवश्यकता पड़ने पर पूरा समाज मदद के लिए उसके साथ होगा. उसने न्याय को समाज की प्रमुख मार्गदर्शक शक्ति माना है. तदनुसार न्याय मनुष्य का समाज में विश्वास बढ़ाता है. उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है. एक कविता में उसने देवी के मुंह से कहलवाया है—

‘सुनो! बुराई तुम्हें आगे नहीं ले जाएगी. इस रास्ते पर मनुष्य को आगे बढ़ने से रोकने के लिए बाधाएं अनेक हैं. केवल न्याय और कानून ही तुम्हें राह दिखा सकते हैं.’6

एनेक्सिमेंडर, हेराक्लाट्स, पेरामेनिडस आदि जितने भी सुकरात पूर्व तथा उसके समकालीन यूनानी चिंतक हैं, सभी ने न्याय को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित करने की कोशिश की थी. परंतु लगभग सुकरात पूर्व के सभी विचारक न्याय को ईश्वर के संदर्भ में देख रहे थे. उनके लिए न्याय या तो ईश्वर का उपहार था अथवा दैवीय विधान, जिसमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप अवांछनीय है. कह सकते हैं कि जिस तरह भारतीय चिंतक न्याय को धर्म के उपांग या उपहार के रूप में देखते थे, वैसे ही पश्चिम में भी न्याय ईश्वरीय प्रेरणा या उपहार तक सीमित था. इसके लिए वहां ‘न्याय की देवी’ जैसी मिथकीय कल्पना भी मौजूद है. हालात में परिवर्तन सुकरात के आगमन से होता है. सुकरात ने सत्य को सद्गुण और सद्गुणों को शुभत्व की यात्रा का पाथेय मानकर उसे सामाजिक नैतिकता का विषय बना दिया. भारत में व्यावहारिक नैतिकता पर जोर देने का काम सुकरात से थोड़ा पहले बुद्ध ने किया था. बुद्ध की न्याय-संबंधी अवधारणा व्यैक्तिक एवं सामूहिक हितों से मिलकर बनी थी. उनके अनुसार व्यक्तिमात्र की खुशी आत्मलाभ में होती है. यानी हर कोई अपनी खुशी चाहता है. यह मनुष्य की सामान्य प्रवृत्ति है. दूसरी ओर समाज का हित सामूहिक लाभ में होता है. चूंकि समाज व्यक्ति-सापेक्ष रचना है. उसमें व्यक्ति स्वयं समाहित हैं, इसलिए समाज-हित तभी संभव है जब उसमें व्यक्तिमात्र के हितों की सुरक्षा होती हो. इसलिए न्याय का अभिप्रायः ‘सामूहिक आत्मलाभ’ है. ऐसी व्यवस्था जिसमें समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने तथा बाकी सदस्यों के सुख एवं सुरक्षा के प्रति आश्वस्त हो.

प्लेटो का न्याय-दर्शन

प्लेटो के विपुल लेखन को देखते हुए विद्वानों की यह धारणा रही है कि जो प्लेटो के दर्शन में नहीं है, वह कहीं भी नहीं है. न्याय के बारे में भी सबसे पहले और विशद् विवरण प्लेटो के दर्शन में प्राप्त होता है. न्याय के पर्यायवाची के रूप में उसने ग्रीक भाषा के शब्द ‘दिकायसने’(Dikaisyne) का प्रयोग किया है, जिसका अभिप्राय है—‘नैतिकता’ अथवा ‘न्याय-परायणता’ से है. ग्रीक साहित्य में ‘दाइक’ मिथकीय कल्पना है, जिसे ‘न्याय’ की देवी’ कहा जाता रहा है. परंतु प्लेटो का ‘दिकायसने’ मिथकीय न होकर न्याय को समर्पित राज्य की आदर्श व्यवस्था है. वह न्याय को मनुष्य की संपूर्ण कर्तव्यपरायणता के रूप में देखता है. कर्तव्यपरायणता से उसका आशय उन सभी कार्यों से है, जिनसे कोई व्यक्ति अपने साथ-साथ दूसरों को भी प्रभावित करता है; अथवा जिनके परिणाम किसी न किसी रूप में समाज पर असर डालते हैं. उसके अनुसार व्यक्ति का चयन ऐसा होना चाहिए जिससे समाज में शुभत्व का विस्तार हो. वह न्याय को ‘आत्मा का विशिष्ट गुण’ मानता था.’ उसका मानना था कि सभी मनुष्य अपने-अपने कर्तव्य को समर्पित होंगे तो समाज स्वतः ही अपने दायित्वों के प्रति सजग रहेगा. अतएव न्याय व्यक्ति-मात्र की ऐसी नैतिक साधना है जिसमें वह उन सभी वस्तुओं से दूरी बनाने लगता है, जो उसके निर्णय सामर्थ्य को नितांत व्यक्तिगत बनाती हैं. यहां तक कि वह अपनी उन सभी इच्छाओं भी से दूरी बना लेता है, जो वृहद सामाजिक हितों का अवरोधक है तथा जिनमें स्वार्थपरता की गंध बसी हो. समाज को शुभत्व की ओर अग्रसर करने के लिए उसकी प्रत्येक इकाई का सहयोग अत्यावश्यक है. इस अवधारणा में ‘सोशल कांट्रेक्ट’ के बीजतत्व देखे जा सकते हैं, जिन्हें आगे चलकर हॉब्स और रूसो के लेखन में विस्तार मिला.

प्लेटो का न्याय इकतरफा नहीं है. न ही, उसके अनुसार न्याय के स्वत्व को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी केवल मनुष्य की है. समाज की भी जिम्मेदारी है कि अपनी नागरिक इकादयों को वह सब प्राप्त करने में मदद करे जो उनका अधिकार है. समाज और व्यक्ति दोनों का भला इसी में है कि व्यक्तिमात्र को वही कार्य सौंपा जाना चाहिए जिसके वह सर्वाधिक योग्य है.7 न्याय को परिभाषित करते हुए वह लिखता है—‘व्यक्ति को समाज में वह सब कुछ प्राप्त होना चाहिए, जो उसका प्राप्य है.’ अब व्यक्ति का ‘प्राप्य’ क्या है. यदि सभी मनुष्य केवल अपने प्राप्य का ध्यान केंद्रित कर लें तो समाज का क्या होगा? जार्ज हॉलेंड सेबाइन के अनुसार, ‘प्राप्य’ में कर्तव्य और दायित्व दोनों सन्निहित हैं. ‘हिस्ट्री ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी’ में ‘प्राप्य’ की विवेचना करता है—‘व्यक्ति के लिए उसका प्राप्य क्या है?’ इससे प्लेटो का अभिप्राय है कि व्यक्ति के साथ उसकी योग्यता, रुचि, शिक्षा-दीक्षा और कार्यकुशलता के अनुसार व्यवहार किया जाना चाहिए. सेबाइन के अनुसार इसमें यह भी अंतर्निहित है कि व्यक्ति को उसकी योग्यता के अनुसार समाज की ओर से जो भी कर्तव्य सौंपे जाएंगे, उनका पालन वह अपनी संपूर्ण कार्यनिष्ठा, संकल्प और क्षमता के साथ करेगा.’ प्लेटो स्पष्ट करता है कि राज्य का दायित्व नागरिकों की सुरक्षा, शांति-व्यवस्था एवं स्वतंत्रता की रक्षा करने तक सीमित नहीं है. राज्य का यह भी कर्तव्य है कि अपने नागरिकों के सामाजिक-आर्थिक जीवन में सुधार के लिए वह वे सभी प्रयत्न करे, जो आवश्यक हैं और जिन्हें वह अपने सामर्थ्य के अनुसार करने में सक्षम है. लेकिन राज्य तो अमूर्त्त है. नागरिकों से इतर उसका कोई वजूद नहीं है. इसलिए प्लेटो के अनुसार राज्य के जो अधिकार एवं दायित्व हैं, वे अप्रत्यक्ष रूप से उसके नागरिकों के अधिकार एवं दायित्वों के आधार पर ही जाने जाते हैं. राज्य अपने नागरिकों की योग्यता एवं कार्यकुशलता को देखते हुए उनके लिए कर्तव्य विहित करता है, जिनका अनुपालन नागरिकों की जिम्मेदारी है. बदले में राज्य अपने नागरिकों के सुख, सुविधा, स्वतंत्रता एवं सुरक्षा के लिए वह सभी करने के लिए वचनबद्ध होता है, जिसे करने में वह सक्षम है.

प्लेटो का न्याय-दर्शन सुकरात की शुभता की अवधारणा से प्रभावित था, जिसने ज्ञान को सद्गुण की संज्ञा दी थी. सुकरात ने स्वयं कोई ग्रंथ नहीं लिखा. परंतु प्लेटो के दर्शन में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में हर जगह उसकी उपस्थिति है. इसलिए यह तय करना बड़ा ही कठिन है कि ‘रिपब्लिक’ आदि ग्रंथों में जो विचार सुकरात के हवाले से आए हैं, क्या वे सचमुच सुकरात के विचार हैं; अथवा प्लेटो ने अपने विचार, गुरु सुकरात को अतिरिक्त सम्मान देने के लिए, उसके माध्यम से व्यक्त किए हैं? समानांतर प्रश्न यह भी हो सकता है कि यदि वे विचार सुकरात के ही हैं, तो क्या प्लेटो ने उन्हें उसी रूप में, वस्तुनिष्ठ भाव से अभिव्यक्त किया है, अथवा अपनी ओर से उनमें कुछ फेर-बदल किया है. इस बारे में विश्वास के साथ कुछ भी कहना कठिन है. इतना अवश्य है कि प्लेटो अपने गुरु से बेहद प्रभावित था. उन दिनों एथेंस में गणतंत्र को आदर्श राजदर्शन के रूप में मान्यता प्राप्त थी. प्लेटो ने गणतंत्र को भीड़तंत्र में बदलते हुए भी देखा था. सुकरात को गणतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा ही मृत्युदंड दिया गया था. यह प्लेटो के लिए व्यक्तिगत रूप से बहुत भारी क्षति थी. इन घटनाओं का उसके व्यक्तित्व पर इतना अधिक प्रभाव पड़ा था कि सक्रिय राजनीति से ही अरुचि हो चली थी. उसके लेखन का बड़ा हिस्सा आदर्श राजदर्शन की खोज को समर्पित है. इसी क्रम में वह न्याय को अलग-अलग दृष्टि से परिभाषित करता है. न्याय को लेकर ‘रिपब्लिक’ का पहला और चौथा खंड तथा ‘दि लॉज’ जैसा विशद् ग्रंथ विशेषरूप से दृष्टव्य है. ‘दि लॉज’ प्लेटो द्वारा वृद्धावस्था में रचा गया ग्रंथ है, जब उसपर किंचित निराशा हावी होने लगी थी. ‘रिपब्लिक’ की गिनती राजनीतिक दर्शन के प्रमुखतम ग्रंथों में ही जाती है. ग्रंथ में प्लेटो जिस गंभीरता के साथ ‘न्याय’ पर विचार करता है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि उसका मुख्य विषय ‘राजनीतिक दर्शन’ अथवा ‘गणतंत्र’ न होकर ‘न्याय’ है.

न्याय की पर्त-दर-पर्त व्याख्या करता हुआ प्लेटो स्पष्ट करता है कि राज्य की सफलता तभी सुनिश्चित है, जब उसके नागरिक निर्दिष्ट कर्तव्यों का संपूर्ण निष्ठा के साथ पालन करें. व्यापारी निष्ठापूर्ण ढंग से व्यापार करें, सेनाएं युद्ध में वीरता का प्रदर्शन कर राज्य की गरिमा को सुरक्षित रखें तथा संरक्षक वर्ग अपने दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वाह करे. समाज के ये सभी वर्ग बिना दूसरे के काम में बाधा उत्पन्न किए अपने कर्तव्य का पालन करें, तभी राज्य की समृद्धि और सुरक्षा संभव है. इसके साथ-साथ वह यह भी कहता है कि यदि सभी नागरिक अपने-अपने कर्तव्य-पालन के प्रति सचेत हों तो ‘कानून’ और ‘न्याय’ जैसे मुद्दों का कोई अर्थ ही न रहे. जीवन में राज्य की भूमिका सिमट जाए. राज्य और नागरिकों के संबंधों की व्याख्या प्लेटो के लगभग 2100 वर्ष बाद जॉन लॉक, थॉमस हॉब्स और रूसो के दर्शन में देखने को मिलती है. रूसो का ग्रंथ ‘सोशल कांट्रेक्ट’ प्लेटो के दर्शन-चिंतन का विस्तार है. प्लेटो मानता था कि अज्ञानता और स्वार्थपरता के चलते लोग कर्तव्य-पालन में चूक करते रहते हैं. मानवीय कमजोरियां उसके कर्तव्यपालन में विचलन का कारण बनती हैं. वही समाज में शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बाहरी शक्तियों की आवश्यकता को जन्म देती हैं. इससे राज्य को शक्तिशाली होने का अवसर मिलता है. शक्तिशाली राज्य खुद को और शक्तिमान बनाने के लिए नागरिक अधिकारों का हनन करता है. इस समस्या के समाधान हेतु प्लेटो प्रचलित राज्य प्रणालियों पर विचार करता है और अंततः दार्शनिक सम्राट के विचार पर जाकर ठहरता है. उसके अनुसार केवल दार्शनिक ही सत्ता-मोह ने निर्लिप्त, निष्पक्ष, दूरदृष्टा और ईमानदार हो सकता है.

‘न्याय’ को राज्य की नैतिकता से जोड़ने वाला प्लेटो अकेला यूनानी चिंतक नहीं है. बल्कि उसे जमीन देने और आगे बढ़ाने वाले विचारकों की लंबी परंपरा है. आरंभिक यूनानी दर्शन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति तथा वस्तु का पूर्व निर्धारित स्थान और कर्तव्य होता है. व्यक्ति अपने कर्तव्य को पूरे मनोयोग तथा विवेक सम्मत ढंग से करे, इसके लिए उसकी किसी भी पराभौतिक शक्ति के बंधन और तत्संबंधी पूर्वाग्रहों से मुक्ति अनिवार्य है. प्लेटो परमसत्ता को कर्मशील मानता था, जो अपने कर्तव्य से उसी प्रकार आबद्ध है, जैसे सृष्टि की बाकी वस्तुएं तथा प्राणी. इसलिए अपने दायित्व का निर्वहन करना समाज के प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पद अथवा प्रतिष्ठा से जुड़ा क्यों न हो, की जिम्मेदारी है. यह पराभौतिक शक्तियों पर भी, यदि वे हैं तो, उतनी ही गंभीरता से लागू होता है. समस्या तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति शक्ति के उन्माद में अपने कर्तव्य की उपेक्षा करने लगता है. शक्ति की अनुभूति अथवा शक्तिकेंद्रों पर अल्पतम लोगों का अधिकतम नियंत्रण सत्तासीन वर्ग में श्रेष्ठता का दर्प पैदा करता है. यही दर्प उसको नियमों की अवहेलना के लिए उकसाता है. यह भ्रम पैदा करता है कि वह दूसरों पर शासन करने, नियम बनाने के लिए जन्मा है, न कि बंधे-बंधाए नियमों के अनुपालन हेतु. इसलिए जो व्यक्ति उस जैसे या उतने शक्ति-संपन्न नहीं हैं, उनका कर्तव्य है कि उसका आदेश मानें. श्रेष्ठता-दंभ का प्रभाव आंतरिक भी होता है. सामान्यतः मनुष्य विवेक से अधिक अहं से निर्देशित होते हैं. कभी-कभी ऐसा अवसर भी आता है जब शक्ति के उन्माद तथा घमंड में डूबा व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख हो, मनमानी पर उतारू हो जाता है. परिणामस्वरूप समाज में अंतर्द्वंद्व पैदा होते हैं. किसी भी सत्ता की संपूर्ण शक्तियां समाज की समेकित शक्ति के सापेक्ष नगण्य होती हैं. इस कारण प्रत्येक सत्ता वह चाहे जितनी शक्तिशाली हो, दूसरों पर शासन चलाने के लिए उसकी शक्तियां लंबे समय तक कारगर नहीं होतीं. शिखर पर बने रहने के लिए उसे जनता के सामान्य समर्थन की जरूरत पड़ती है. शासन के किसी भी निर्णय, वह चाहे जितना महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, की सफलता तब तक संद्धिग्ध रहती है, जब तक समाज के सभी वर्गों का उसे खुला समर्थन प्राप्त न हो. अतः यह कहना कि कानून राज्य बनाता है, और केवल राज्य के भरोसे वे कारगर सिद्ध होते हैं, सर्वथा अनुचित है. राज्य कानून बनाता है. लेकिन कानून बनाने की शक्ति उसे जनसमाज की ओर से प्राप्त होती है. इसलिए कानून की सफलता व्यापक जनसहयोग पर निर्भर करती है. धर्म और सांस्कृतिक प्रतीक तथा उनसे जन्मे संस्कार अधिकतम जनता द्वारा समर्थित होने के कारण ही लोकप्रिय बने रहते हैं. अतएव शिखर पर मौजूद लोगों का दायित्व है कि वे जनता, जो उनकी शक्तियों का एकमात्र स्रोत एवं वास्तविक अधिमान्य सत्ता है, के प्रति ईमानदार तथा कर्तव्यनिष्ठ रहें. परंतु व्यक्ति या समूह का दर्प उसे कानून या अनुशासन में बंधने से रोकता है. इसलिए प्राचीन यूनानी विधिशास्त्र में दर्प को कुचल डालने की अनुशंसा की गई है. यह माना गया है कि दूसरों से श्रेष्ठता का दर्प मनुष्य को कर्तव्य से विमुख होने तथा उनके कार्य में बाधा खड़ी करने के लिए उकसाता है. प्लेटो की ‘न्याय’ संबंधी अवधारणा इसी यूनानी चेतना से बनी थी. उसके लिए ‘न्याय’ का मतलब था—‘सामाजिक आदर्श का बोध तथा कर्तव्यपरायणता. वह मानता था कि आदर्श राज्य की परिकल्पना को साकार करने के लिए आंतरिक शुभता अपरिहार्य है. व्यापक स्तर पर यह कैसे संभव हो इसके लिए वह प्रचलित राजदर्शनों की विवेचना करता है.

‘रिपब्लिक’ के माध्यम से हमारा सामना प्लेटो की बड़ी समस्या से होता है. सुकरात को एथेंस की न्याय प्रणाली के आधार पर दंडित किया गया था. जूरी के सदस्यों के चयन हेतु कोई विधि-सम्मत प्रक्रिया न थी. उसमें व्यक्ति की आर्थिक समृद्धि का बड़ा योगदान था. वाक्-चातुर्य और दूसरों को प्रभावित करने की कला उसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी. जिस जूरी ने सुकरात को मृत्युदंड सुनाया था, उसके सदस्यों अपने दुराग्रह प्रबल थे. उनमें से अधिकांश सुकरात की साफगोई के कारण उससे ईर्ष्या करते थे. सुकरात के विचार उनके लिए चुनौती बने थे. इसलिए सुकरात पर चलाए जा रहे मुकदमे का वास्तविक उद्देश्य उसकी अवमानना या उसे दंडित करने से अधिक उस वैचारिकी को परास्त होते देखना था, जो उनके वर्चस्व के लिए चुनौती बन चुकी थी. सारा तमाशा आधी-अधूरी गणतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से, न्याय के नाम पर हुआ था. यहीं से प्लेटो के मन में सवाल उठा था कि ‘न्याय क्या है?’ क्या जिसे बहुत से लोग मान लें वह न्याय है. अथवा जिसे राज्य अपनी शक्ति के बल पर लागू करे, वह न्याय है? इस समस्या को वह सुकरात के माध्यम से ‘रिपब्लिक’ में उठाता है. अपने स्वभाव के अनुरूप सुकरात अपनी शिष्य-मंडली के बीच प्रश्न उठाता है. चर्चा के पहले चरण में सुकरात के अलावा केफलस, पोलीमार्क, थ्रेचाइमच्स, लीसियस और केल्सीडॉन प्रमुख सहभागी बनते हैं. चर्चा-स्थल केफलस का आवास है. उन सबको केफलस की ओर से एक उत्सव में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया गया है. मित्रों के आगमन पर बूढ़ा केफलस स्वयं उनका स्वागत करता है. प्रकारांतर में चर्चा का मुख्य सूत्रधार भी वही बनता है. अपने लंबे जीवनानुभवों को याद करते हुए वह ग्रीक कवि पिंडोरयस को उद्धृत करता है, जिसका आशय है—‘जब कोई मनुष्य अपना जीवन न्याय एवं श्रद्धा के साथ व्यतीत करता है तो उसके जीवन को आह्लादित करने तथा वृद्धावस्था में उसको सहारा देने के लिए ‘आशा’ जीवन-संगिनी की भांति सदैव उसके साथ रहना चाहती है.’ इसपर परम जिज्ञासु सुकरात प्रश्न करता है—‘क्या यही न्याय है?’ सुकरात का यही कौतूहल ‘रिपब्लिक’ की चर्चा का केंद्रीय विषय बन जाता है. उससे पहले तक न्याय को व्यक्ति और राज्य के व्यवहार और अंतर्संबंधों के अनुसार देखने की प्रथा थी, जिसमें राज्य की इच्छा और उसका अधिकार पक्ष प्रबल रहता था. चर्चा बढ़ती है तो न्याय पर नए-नए विचार आते चले जाते हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ

  1. The sense of justice is continuous with the love of mankind.-Rowls.
  2. प्रजासुखे सुख राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्।। — अर्थशास्त्र-1/19
  3. प्रजासुखे सुखी राजा. तद्दुःखे यश्च दुःखित। सः कीर्तियुक्तो लोकेस्मिन् प्रेत्य यस्य महीस्यते।।— विष्णुधर्मसूत्र 3,
  4. A-nomia, lawlessness, must be replaced by eunomia, law and order-The Greek Concept of Justice, Eric A. Havelock, page 298.
  5. they seize property by violence; kosmos has perished

Equitable distribution no longer obtains.-Theognis, as quoted by Andrew    Gregory    in  Anaximander: A Re-assessment, Page 77

  1. Welcome! for it is no evil fate [trzoira] that escorted you forth to travel along this way: for indeed it lies [estin] far outside of the treading of men.

No, it was the law [themis] and justice [dike].-Parmenides, from The Greek Concept      of Justice, page 269.

  1. every member of the community must be assigned to the class for which he finds himself best fitted. Plato, The Republic.

 

 

न्याय, न्याय की परंपरा और समाज

सामान्य

राज्य के नेतृत्व में अदालतों के जरिये सामान्यतः जो फैसले होते हैं, प्रायः उन्हीं को न्याय मान लिया जाता है. जबकि उनमें से कुछ को छोड़कर जिनका संबंध संविधान, कानून या किसी अदालती निर्णय की लोकहित में समीक्षा करना है, अधिकांश का न्याय की मूलभावना से दूर का भी संबंध नहीं होता. अधिकतर मामले वकीलों के दमखम तथा कानूनी दांवपेच में उलझे होते हैं. उनके अंबार के बीच न्याय और न्यायभावना कहीं दबसी जाती है. कानून अपना काम करे, लोगों को न्याय समय पर मिले, न्याय प्रणाली निष्पक्ष तथा उसकी प्रक्रिया पूर्णतः पारदर्शी हो—यह देखना राज्य का कर्तव्य भले हो, उसके गठन का वास्तविक लक्ष्य नहीं है. राज्य का गठन प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा अपने सुख, शांति, समृद्धि एवं शुभता के विस्तार हेतु किया जाता है. अपने नागरिकों के जानमाल की रक्षा करना राज्य का दायित्व है. इस दायित्वपूर्ति हेतु कानून राज्य के सहायक की भूमिका निभाता है. तदनुसार किसी अदालती निर्णय को न्याय तभी कहा जा सकता है, जब पीडि़त को हुए नुकसान की भरपाई संभव हो. बावजूद इसके अधिकांश अदालती मामले इन्हीं मुद्दों पर केंद्रित होते हैं. उनमें अदालतें अपराधी को केवल दंड सुनाती हैं, न्याय नहीं करतीं. मान लीजिए किसी घर में चोरी होती है. चोर पकड़ा जाता है, किंतु माल बरामद नहीं हो पाता. चोरी होने तथा चोर के गिरफ्तार होने के मध्य जो अंतराल है, उसमें चोर माल को ठिकाने लगा चुका है. अदालत उस चोर को कानून के अनुसार दंड सुनाकर न्यायप्रक्रिया को संपन्न मान लेती है. ठीक इसी प्रकार यदि किसी परिवार के सदस्य की हत्या हो, हत्यारा पकड़ा जाए तो अदालत अपराधी को काराग्रह भेजकर; अथवा मृत्युदंड सुनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है. दोनों मामलों में पीडि़त परिवारों को सिवाय इस तसल्ली के कि जिन्होंने अपराध किया, वे कारावास में हैं, कुछ भी प्राप्ति नहीं होती. मृतक को वापस लाना तो वैसे भी संभव नहीं होता. इस तरह कानून की मदद से किया गया न्याय, सामान्यतः निषेधात्मक होता है. इससे न्याय का उद्देश्य पूरा नहीं होता. वास्तविक न्याय तब कहा जा सकता था, जब राज्य व्यक्ति को हुए नुकसान की भरपाई या तो स्वयं करे अथवा अपराधी को उसके लिए बाध्य करे. परंतु ऐसा हो नहीं पाता. नुकसान की भरपाई करना अदालत को अव्यावहारिक लगता है. कदाचित वह सोचती है कि इस तरह के मामलों से राज्य के खजाने पर अनावश्यक बोझ पड़ेगा. दूसरा सोच यह होता है कि इस तरह के मामलों में यदि अदालतें नुकसान की भरपाई करने लगें तो पीडि़त व्यक्ति अपने नुकसान को बढ़ाचढ़ाकर पेश करेगा. अपराधी पर नुकसान की भरपाई के लिए दबाव डालना भी उसे अव्यावहारिक लगता है. साफ है कि अदालतें अपने ही देशवासियों पर अविश्वास करती हैं. दूसरो शब्दों में राज्य के संरक्षण में चलाई जा रही अदालतें प्रथमतः राज्य का ही हित साधन करती हैं.

न्याय शुभत्व की व्याप्ति और उसका प्रसार है. यह तभी संभव है, जब न्यायाधीश स्वयं नैतिकता के उच्चतम मानकों पर आसीन होकर उच्चतम मापदंडों के अनुसार न्याय करें. लेकिन न्यायाधीश को चाहे वे कितने ही विद्वान, निष्पक्ष और न्यायसमर्पित क्यों न हों, उन्हें अपना प्रत्येक निर्णय राज्य द्वारा बनाई गई दंडसंहिता के अनुसार करना पड़ता है. ऐसे में निर्णय सुनाने वाले न्यायाधीश का कार्य केवल दंडाधिकारी तक सीमित होकर रह जाता है. दंडविधान अथवा दंड की प्रक्रिया को न्याय जैसे शब्द से महिमा मंडित करना, राज्य के शक्तिप्रदर्शन का ही रूप है. न्यायालयों की कार्रवाही न्याय की परिभाषा तथा उसकी मूलभावना से भी मेल नहीं खाती है. इसके बावजूद लोकव्यवहार और अदालती कामकाज में ‘न्याय’ शब्द का उल्लेख जमकर किया जाता है. न्याय की सैद्धांतिक जानकारी के अभाव में सामान्य ‘दंडाधिकारी’ से भी ‘न्यायविद्, ‘न्यायमूर्ति’ जैसे लुभावने संबोधन जोड़ दिए जाते हैं. असल में वह राज्य की ताकत और उसकी सर्वोच्चता को प्रकट करने का एक माध्यम है. प्रकारांतर में यह वर्चस्वकारी सत्ताओं के खेल को आसान बनाते हैं. न्याय राज्य की सार्वभौमिक उदारता की कसौटी होता है. कल्याण राज्य होने का दावा करने वाले राज्य में तो उसकी हैसियत मुख्य दिशानिर्देशक की होनी चाहिए. उसकी व्याप्ति कर्तव्य विभाजन से लेकर नागरिकों के बीच कल्याण के बंटवारे तक यथाआवश्यक रूप में होनी चाहिए. प्लेटो ने इसी को लेकर ‘रिपब्लिक’ में लिखा है—

समाज के प्रत्येक सदस्य को वह कार्य सौंपना चाहिए, जिसके लिए वह स्वयं को सर्वाधिक उपयुक्त मानता है.’1

इस कोटि की न्यायभावना के अभाव में राज्य अपने नागरिकों के साथ छल करता है. ‘न्याय की अनुपस्थिति में राज्य की स्वयंप्रभुता को संगठित डकैती’ बताते समय संत अगस्ताइन के मन में भी कुछ इसी प्रकार के विचार उमड़े होंगे. न्यायविहीन समाज में असंतोष पनपते हैं. परिणामस्वरूप उसके प्रति नागरिकों का विश्वास धीरेधीरे क्षीण होता जाता है. नागरिकों के विश्वास से रहित राज्य एवं निरंकुश राज्य में कोई अंतर नहीं होता. जिस राज्य में न्याय न हो, वहां निरंकुशता स्वतः पनपने लगती है. उसकी प्रवृत्ति बहुआयामी होती है. निरंकुशता वैयक्तिक भी हो सकती है और राज्य के नाम पर गठित संस्थाओं की भी. दोनों ही स्थितियों में उसका शिकार जनसाधारण को बनना पड़ता है. परिणामस्वरूप जनसाधारण के लिए न्याय निरंतर दुर्लभ होता जाता है.

न्याय व्यक्तिमात्र के प्रति संवेदना, करुणा एवं समानता की भावना से जन्मता है. वही समाज में शुभत्व की स्थापना करता है. आधुनिक संदर्भों में वह पश्चिम में विकसी एक महत्त्वपूर्ण नैतिक एवं राजनीतिक संकल्पना है. न्याय के अंग्रेजी पर्याय Justice शब्द की उत्पत्ति लैटिन मूल के Jus शब्द से हुई है, जिसका अभिप्राय ‘विधि’ अथवा ‘सन्मार्ग’ से है. आ॓क्सफोर्ड शब्दकोश के अनुसार Just शब्द का आशय ऐसे व्यक्ति से है जो नैतिकता के उच्च मानदंड के अनुसार सही है; तथा दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार करता है, जो नैतिकता की दृष्टि से खरा और प्रभावी है. प्रकारांतर में श्रनेज शब्द से भी उसी धारणा की ओर संकेत मिलता है. कुल मिलाकर jus तथा justice दोनों न्याय और न्यायभावना को दर्शाते हैं. इसके मायने केवल कानून और अदालतों तक सीमित नहीं हैं. बल्कि उससे कहीं अधिक व्यापक, मनुष्यता के शिखर की ओर इशारा करने वाले हैं. न्याय मानवीकरण की सफलता को दर्शाता है. कभीकभी fair शब्द को भी न्याय के पर्यायवाची के रूप में प्रयुक्त किया जाता है. इनका अभिप्राय है ‘प्रत्येक को वह मिले जो उसका अधिकार है.’, ‘उतना मिले जितनी उसको आवश्यकता है’, ‘जिसको जो मिले, पूरी पारदर्शिता के साथ मिले.’, ‘ईमानदारी से मिले और अविलंब मिले.’ श्रेष्ठ न्याय समाज के विक्षोभों का शमन करता है, समाज और व्यक्ति की दूरी घटाता तथा कानून के प्रति नागरिकों के भरोसे में वृद्धि करता है. निष्पक्षता और पारदर्शिता न्याय की अनिवार्य शर्तें हैं. ‘बतौर निष्पक्षता न्याय हमें वह देता है, जो हम उससे चाहते हैं.’2 न्याय में विलंब भी अन्याय को दर्शाता है. प्लेटो के अनुसार समाज में शुभत्व की व्याप्ति, नैतिकता का संचार ही न्याय है. वही समाज न्याय पथ पर है जिसमें नागरिक अपने कर्तव्यों का पालन बगैर किसी बाहरी दबाव और स्वार्थभावना के करते हैं, जहां नागरिकों में परस्पर मेल हो, जो संकट में एकदूसरे का साथ निभाने को तत्पर रहते हों तथा इतने अनुशासित एवं आत्ममर्यादित हों कि शासन की मौजूदगी केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाए.

भारत में धर्म से इतर न्याय की कोई स्वतंत्र अवधारणा नहीं है. यहां न्याय के पर्याय के रूप में धर्म को रखा गया है, जिसकी हालत काठ के उस जूते की भांति है जिसमें हर कोई पांव डालकर देखना चाहता है. देखता है, लेकिन पूरी तरह से पहनना कोई नहीं चाहता. न ही पहन पाता है. पश्चिम में न्याय पर सुकरात से लेकर जॉन राउल तक गंभीर चिंतन देखने को मिलता है. प्लेटो की महत्त्वपूर्ण कृति ‘रिपब्लिक’ में साथियों के साथ चर्चा के दौरान सुकरात ‘न्याय’ के विभिन्न पक्षों पर विचार करता है. अंत में वह इस निर्णय पर पहुंचता है कि ‘न्याय सदगुण है.’ ऐसा गुण जिसे प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर रखना चाहिए. उसमें आदर्श और व्यवहार का भेद मिट जाता है. सुकरात के अनुसार वही समाज न्याय पर है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति वह करता है, जो वह दूसरों से अपने प्रति अपेक्षा रखता है. प्लेटो कवि हृदय और आदर्शवादी था. आदर्श समाज को लेकर उसका एक सपना था. ‘न्याय’ के लिए उसने ग्रीक भाषा के शब्द Dikaisyne का प्रयोग किया है, जिसका अभिप्राय ‘नैतिकता’ और ‘शुभता’ से है. उसके अनुसार न्याय वह अवस्था है जब व्यक्ति अपनी तात्कालिक इच्छाओं को शेष समाज की शुभता और भलाई के नाते स्थगित कर देता है. बदले में समाज उसकी इच्छाओं, आकांक्षाओं पर अपनी प्राथमिकताओं के मद्देनजर विचार करता है. प्लेटो के लिए न्याय मानवीय सद्गुणों का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, जो समाज और व्यक्ति की आपसी प्रतिबद्धताओं को दर्शाता है. वह स्पष्ट और स्वतंत्र होता है, और उसका ध्येय समाज में सचाई, शुभता एवं आपसी मेलजोल को बढ़ावा देना है. वह हमारे आत्म की शक्ति, उसका विधान है. आत्मा के लिए न्याय का वही महत्त्व होता है, जो देह के लिए स्वास्थ्य का. न्याय मार्गदर्शक होता है. वह हमें रास्ता दिखाता है. विशेष परिस्थितियों में कौनसा निर्णय मनुष्यता के अनुकूल है, यह बताता है. वह केवल शक्ति नहीं होता, बल्कि शक्तियों, अधिकारों एवं कर्तव्यों की सामंजस्यपूर्ण व्याप्ति है. वह शक्तिशाली का अधिकार न होकर संपूर्ण समाज की प्रभावी एकता और सौहार्द है. न्याय स्वयं एक निर्देशक सत्ता है, जो बल के बजाय करुणा एवं संवेदना से संचालित होती है. समाज की सुदृढ़ता के संदर्भ में वह आत्मरूप है. वह समाज की संपूर्ण संगठित एवं समन्वित शक्ति का प्रतीक होता है. न्याय शक्तिशाली का अधिकार न होकर संपूर्ण समाज की समन्वित एकता और संवेदनशीलता में झलकता है.

प्लेटो के चिंतन का दायरा बड़ा था. उसने अनेक विचारकों को प्रभावित किया. प्लेटो की अपेक्षा अरस्तु नैतिक व्यवहारवाद का समर्थक था. उसकी न्यायसंबंधी अवधारणा व्यावहारिकता से परे न थी. उसका विचार था कि न्याय विधिमान्य व्यवस्था के पारदर्शी और समानतापूर्ण व्यवहार का लक्षण है. राज्य की पारदर्शिता, उसका अपने नागरिकों के प्रति समानतापूर्णपक्षपातरहित व्यवहार—समाज में न्याय के संवितरण की स्थिति को दर्शाता है. दिखाता है कि समाज अपने नागरिकों के प्रति कितना उदार है. जो वस्तु सबके उपयोग की है, उसका सभी में समान वितरण हो, यह उसका मानना था. न्याय से उसका आशय प्रत्येक वस्तु को सभी मनुष्यों में बराबरबराबर बांट देना नहीं है. यह तो परोक्ष रूप में राज्य की मनमानी ही कही जाएगी. उस समय व्यक्ति की रुचि, आवश्यकता तथा समाज के विकास में उसके द्वारा किए गए योगदान को ध्यान में रखा जाना ही न्याय संगत है. लेकिन यह कार्य इतनी खूबी से होना चाहिए कि समाज में कोई भी स्वयं को उपेक्षित अनुभव न करे. राज्य की उदारता एवं न्यायशीलता में सभी का भरोसा बना रहे. अरस्तु और प्लेटो दोनों पर सुकरात की ‘सद्गुण’ और ‘शुभत्व’ संबंधी मान्यता का प्रभाव था. अंतर केवल इतना है कि प्लेटो का समाज और विचार दोनों को परखने का नजरिया नितांत आदर्शवादी था. अरस्तु इसके लिए मानवीय सीमाओं को भी ध्यान में रखता है. लक्ष्य उसका भी समाज में नैतिकता और शुभता का संचार करना है.

अरस्तु के अनुसार संवैधानिक शासन की तीन प्रमुख विशेषताएं हैं—पहला संवैधानिक शासन का प्रमुख ध्येय जनकल्याण होता है. वह किसी एक व्यक्ति समूह या दल के लिए काम नहीं करता. न ही वह किसी एक दल अथवा व्यक्ति द्वारा संचालित ऐसा शासन होता है जो किसी व्यक्ति अथवा समूह के भले के लिए काम करे. दूसरा, संवैधानिक शासन विधिसम्मत शासन होता है. वह किसी एक व्यक्ति अथवा समूह की मर्जी से संचालित नहीं होता, बल्कि ऐसे कानूनों के माध्यम से शासनकर्म करता है, जिनको शासित वर्गों की सहमति प्राप्त हो. वह समन्वयवादी भी होता है. प्राचीन रूढि़यों, रीतिरिवाजों और परंपरा का तिरष्कार करने के बजाय वह उनके साथ तालमेल बनाकर चलने में विश्वास रखता है. तीसरा और सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि वह इच्छुक नागरिकों का शासन है. उसके प्रति नागरिकों की सहमति होती है. लोग समाज के सदस्य के रूप में बृहद हितों की खातिर अपनी प्राकृतिक स्वच्छंदता के एक हिस्से की बलि चढ़ाकर शासित होने को तैयार होते हैं. इस तरह का शासन लोगों से परे न होकर, नागरिक संस्था होती है. प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में दार्शनिक सम्राट की अवधारणा प्रस्तुत की थी. अरस्तु ने उससे असहमति जाहिर की थी. उसके अनुसार न्याय और निष्पक्षता के लिए शासन के निर्णयों में निर्वेयक्तिकता आवश्यक है. व्यक्ति चाहे कितना ही निष्पक्ष और विवेकवान क्यों न हो, उसका पूरी तरह निर्वेयक्तिक होना असंभव है. ऐसा राज्य लंबे समय तक निष्पक्ष नहीं रह पाता. अरस्तु ने न्याय के लिए कानून के राज्य पर जोर दिया है. उसके अनुसार नागरिकों के कल्याण को समर्पित शासन कानून का शासन भी होता है.

अरस्तु पर प्लेटो की महान कृति ‘दि लॉज’ का प्रभाव था. वह अपने गुरु की विलक्षण मेधा का सम्मान तो करता था, मगर किसी भी प्रकार के वैचारिक दबावों से मुक्त था. इसलिए उसकी स्थापनाएं अपने प्लेटो से प्रेरित होने के बावजूद स्वतंत्र एवं मौलिक हैं. लेकिन प्लेटो के विचारों में जहां आदर्श और कल्पना का पुट है, अरस्तु का दर्शन व्यावहारिकता के निकट है. दोनों के विचारों के अंतर को इससे भी समझा जा सकता है कि अरस्तु जिसे आदर्श राज्य मानता है, प्लेटो की निगाह में वह द्वितीय सर्वश्रेष्ठ राज्य है. जबकि प्लेटो की आदर्श राज्य संबंधी संकल्पना अरस्तु की निगाह में अव्यावहारिक है. अरस्तु के समय तक विभिन्न राजनीतिक दर्शन सामने आ चुके थे. उसने अपने समय के सभी प्रचलित शासनतंत्रों यथा राजशाही, गणतंत्र, निरंकुश शासन, कुलीन तंत्र, सौम्य प्रजातंत्र, भीड़ का शासन, अतिवादी लोकतंत्र आदि पर खुलकर विचार किया था. इनमें से निरंकुश शासन, अतिवादी लोकतंत्र, भीड़ के शासन को उसने निकृष्ट शासन पद्धति माना था. बाकी के बारे में उसका विचार था कि प्रत्येक प्रणाली की कुछ न कुछ दुर्बलताएं हैं. राज्य के आदर्श को नागरिक और शासन के कुशल तालमेल से ही प्राप्त किया जा सकता है. इसके लिए उसने लिखित संवैधानिक व्यवस्थाओं पर जोर दिया था. वह शासन को नागरिकों की जीवनशैली मानता था. उसका विचार था कि राज्य अपने लक्ष्य में तभी सफल हो सकता है, जब उसे अपने नागरिकों का संपूर्ण समर्थन प्राप्त हो.

ईसा से पांचछह शताब्दी वर्ष पहले का समय राजनीतिक दर्शनों के विकास का दौर था. बड़े राज्यों के गठन का सिलसिला आरंभ नहीं हुआ था और छोटे राज्य जिन्हें नगर राज्य भी कहा जा सकता है, धर्म की जकड़बंदी से बाहर थे. असल में वह दुनियाभर में बौद्धिक जागरण का समय था. भारत में महावीर स्वामी, अजित केशकंबली, कौत्स, गौतम बुद्ध, यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, पेरामेनडिस, चीन में कन्फ्यूशियस जैसे मानवतावादी चिंतक उसी दौर में जन्मे थे. मगध सम्राट अजातशत्रु द्वारा भेजे गए दूत महामंत्री वस्सकार के समक्ष उन्होंने गणतंत्रों का समर्थन किया था. जाहिर है उस समय तक राजनीति और दर्शन दोनों के केंद्र में मनुष्य था. गौतम बुद्ध द्वारा गणतांत्रिक संघों भी प्रशंसा, महावीर स्वामी का किसी भी प्रकार की हिंसा से बचने का संदेश, सुकरात का ‘शुभत्व’ एवं ‘सदगुण’ का विचार, प्लेटो की आदर्श राज्य की संकल्पना, अरस्तु का व्यावहारिक नैतिकता के आधार पर राज्यों के गठन का सुझाव तथा कन्फ्यूशियस की नैतिक शिक्षाएं—अलगअलग दिखने के बावजूद ये परस्पर मिलीजुली, एकदूसरे का पर्याय कही जाने वाली धाराएं थीं. उस दौर में जब सारे कामकाज ईश्वर तथा अन्य देवताओं के नाम पर किए जाते हों—मानवकल्याण को राज्य के गठन का औचित्य बताना बड़ी बात थी. इस आधार पर हम उस कालखंड को हम मानवइतिहास का सबसे परिवर्तनकारी दौर भी कह सकते हैं. उस समय तक साम्राज्यवाद भी महज एक अवधारणा तक सीमित था. हालांकि राजाओं की महत्त्वाकांक्षाएं नजर आने लगी थीं. रामायण और महाभारत को ईसा से 800—1500 ईस्वी पूर्व की रचना माना जाता है. दोनों में साम्राज्यवाद को जगह मिली है. ‘सम्राट’, ‘विराट’, ‘चक्रवर्ती’ जैसी संज्ञाएं साम्राज्यवादी भावनाओं की देन ही हैं. मगर अपने आदि स्वरूप में ये दोनों महाकाव्यों से प्रेरित हैं, जिनके कथानक नगरराज्यों के संघर्ष की कल्पना के आधार पर रचे गए थे.

दोनों महाकाव्य आज जिस रूप में मौजूद हैं, वह मात्र 2000—2200 वर्ष पुराना है. इस बीच उनमें इतना ज्यादा प्रक्षेपण हुआ है कि मूल रचना और वर्तमान स्वरूप में अंतर कर पाना असंभव हो चुका है. दरअसल इन महाकाव्यों को, उनके वर्तमान रूप तक आतेआते अनेक सामाजिकराजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों से गुजरना पड़ा है. उनके कथ्य और कथानक दोनों ही में समयानुसार बदलाव होते रहे हैं. जिस कालखंड की हम बात कर रहे हैं, उसमें धर्म और राजनीति का वैसा, मूल्यविहीन गठजोड़ नहीं हुआ था, जैसा परिवर्ती शताब्दियों में देखने को मिलता है. उस दौर में धर्म सामान्य नैतिकता से जुड़ा हुआ था. इस कारण वह समाज और राजनीति दोनों का मार्गदर्शक बना था. मगर बुद्ध के रहते साम्राज्यवाद को पर्याप्त जमीन न मिल सकी थी, किंतु उनके निधन के एक शताब्दी बाद ही भारत में साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाएं जोर पकड़ने लगी थीं. उससे समूची व्यवस्था केंद्राभिमुखी हो गई. महाकाव्यों के बहाने धार्मिकराजनीतिक साम्राज्यवाद का महिमामंडन किया जाने लगा. उसका असर न्याय पर भी पड़ा था. प्रकृति आधारित जीवन में समाज में पर्याप्त समानता थी. लेकिन केंद्र के मजबूत होने से अभिजन वर्ग तेजी से मजबूत होने लगा था. परिणामस्वरूप वे संस्थान जिनकी जिम्मेदारी समाज में न्याय का संवितरण करने की थी, कुछ शीर्षस्थ लोगों की मनमर्जी से चलने लगे. इससे उनकी नीतियां और कार्यशैली भी अभिजनोन्मुखी होती गईं. इस केंद्रवाद के विरुद्ध समयसमय पर आवाजें भी उठती रहीं. यत्किंचित सफलता मिली, मगर हालात कुल मिलाकर अभिजात वर्ग के पक्ष में ही बने रहे.

सुकरात आदि विचारकों ने मनुष्य की सर्वोच्चता को स्वीकारा, उसे दुनिया में किसी भी वस्तु के सापेक्ष वरीयता दी थी. स्थापित किया था कि मनुष्य शक्तिशाली होने के कारण श्रेष्ठतम नहीं है. श्रेष्ठता का आधार उसका विवेक है. अपने अंतःकरण की शुभता के विस्तार के साथ ही मनुष्य अपने श्रेष्ठत्व की रक्षा कर सकता है. सुकरात के समकालीन प्रोटेगोरस का मानना था कि सृष्टि में—‘सामान्य वस्तुजगत जैसा वह है, और जैसा वह नहीं है. उन वस्तुओं का भी जो नहीं हैं. और जैसी वे नहीं हैं—के मूल्यांकन की एकमात्र कसौटी मनुष्य है.’4 मानवतावाद का उदय, जिसे सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, कन्फ्यूशियस जैसे विचारकों ने आवाज दी थी. वह धर्म और राजनीति में पनप रहे वर्चस्ववाद के विरुद्ध बड़ी आवाज थी, उसका नेतृत्व यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, प्रोटेगोरस, जीनो, चीन में कन्फ्यूशियस, ताओ आदि कर रहे थे. भारत में बौद्ध, जैन, आजीवक, लोकायत आदि दर्शन व्यक्ति को मानववैचारिकी के केंद्र में लाने की कोशिश कर रहे थे. उन्हें किंचित सफलता भी मिली थी. किंतु भिन्न परिस्थितियों के कारण उनका परिणाम ठीक वैसा नहीं निकला, जैसा पश्चिम में निकला था. इस बहाने हम भारतीय और पश्चिमी चिंतन के मूल अंतर पर विचार कर सकते हैं. वहां धर्म सामान्य नैतिकता को प्राप्त करने का एक माध्यम है. मृत्युपार जीवन एवं अमरता जैसे बिंदुओं पर वहां ज्यादा जोर नहीं दिया जाता. सुकरात, प्लेटो, कन्फ्यूशियस, जीनो से लेकर अरस्तु और तत्कालीन अन्य पश्चिमी विद्वानों के चिंतन की धुरी मनुष्य है. वे ईश्वर जैसी पराशक्ति की कल्पना तो करते हैं, मगर वह मनुष्य की सामान्य पहुंच से बाहर नहीं रहती. बुद्ध और सुकरात दोनों का मानना था कि ‘शुभत्व’ एवं ‘सद्गुणों’ में पैठ मनुष्य को इसी जीवन में पराशक्ति जितना महत्त्वपूर्ण बना सकती है. प्रोटेगोरस भी वस्तु जगत को मानवीय उपयोगिता की दृष्टि से देखता है. उसके अनुसार कोई वस्तु उतनी ही उपयोगी है, जितनी मनुष्य उसे उपयोगी मानता है. इसमें भौतिकवाद के बीजतत्व देखे जा सकते हैं. यह संकल्प एक तरफा नहीं हो सकता. वस्तुजगत मानवमात्र के लिए तभी उपयोग रह सकता है जब मनुष्य भी उसके प्रति अपनी भूमिका को पहचाने. चूंकि प्रत्येक मनुष्य की दृष्टि स्वतंत्र होती है, इसलिए वह वस्तुओं का आकलन अपने विवेक और सुख के आधार पर करने को स्वतंत्र है.

भारतीय धर्मदर्शन में पराशक्ति के आगे मनुष्य और वस्तुजगत दोनों का महत्त्व गौण हो जाता है. यहां शुभता और सद्गुणों को ईश्वरीय लक्षण माना गया है. जिसके लिए ईश्वरीय इच्छा का होना आवश्यक है. ईश्वरीय क्या है? यह बताने के लिए व्यक्ति और परमात्मा के बीच पुरोहित मौजूद है. वह प्रत्येक स्थिति की स्वार्थानुकूल व्याख्या करता है. जाति के आधार पर बंटे भारतीय समाज में बौद्धिक नेतृत्व ब्राह्मण के अधीन रहा है, जिसकी प्राथमिकता लोकहित न होकर, वर्गीय स्वार्थ रहते हैं. परिणामस्वरूप भारतीय समाज शोषक और शोषित में बंटता गया. एक वर्ग जो किन्हीं कारणवश सत्ता से विलग था, वह शोषण और उत्पीड़न का शिकार होने लगा. आज स्थितियां बदली हैं, लेकिन स्थिति कमोबेश वैसी ही है. उल्लेखनीय है कि भारत में जो कार्य पुरोहित वर्ग कर रहा था, यूनान में वही सोफिस्ट कर रहे थे. उन्हें पहली चुनौती सुकरात की ओर से मिली. अपने समय का वह विलक्षण विद्वान, विमर्शयोगी वर्षों तक अकेला ही सोफिस्टों के साथ बौद्धिक बहस करता रहा. उसने अपने समर्थकों और शिष्यों की पूरी पीढ़ी तैयार की. सुकरात और उसके साथियों के प्रभामंडल में सोफिस्टों के बौद्धिक पाखंड की कलई खुलने लगी थी, लेकिन उस संघर्ष में आरंभिक जीत सोफिस्टों के हाथ लगी. सुकरात को मृत्युदंड झेलना पड़ा. बाद में प्लेटो, अरस्तु, जीनो आदि विचारकों ने बौद्धिक क्रांति का ऐसा आगाज किया कि सोफिस्ट बेचारे बगलें झांकने लगे. उस क्रांति का असर कई शताब्दियों तक बना रहा. लेकिन मध्यकाल तक आतेआते उस वैचारिकी की आंच मद्धिम पड़ने लगी थी. धर्म का प्रभामंडल बढ़ने लगा था. उससे सारी नैतिकताएं और आदर्श ईश्वर तथा उसके प्रतिनिधियों में अवस्थित कहे जाने लगे.

एक प्रवचन के दौरान सेंट पॉल(The Act-xvii 28) कहता है—‘हम उसमें ही रहते हैं, उसमें ही विचरण करते हैं. उसमें ही हमारा अस्तित्व है.’ भारतीय दर्शनों में इसे ‘सर्व खाल्विदं ब्रह्म’ कहा गया है. मान्यता रही है कि उसे केवल ईश्वरीय कृपा से प्राप्त किया जाता है. आगे चलकर पूरब की तरह पश्चिम में भी न्याय को धर्म के संबंध में परिभाषित किया जाने लगा. मध्यकाल में वहां भी ईश्वर को समस्त जागतिक शुभता का केंद्र मान लिया गया. मानवकल्याण तथा सद्गुणों का महत्त्व ईश्वर को प्रसन्न करने की मनोकामना तक सिमट गया. धीरेधीरे धर्म के घटाटोप में न्याय शब्द विलीन होने लगा. या यूं कहें कि कुछ कर्मकांडों, ऊपरी आवरण तक सिमटकर रह गया. भारत जैसे देशों में तो धर्म को ही न्याय कहा जाने लगा था. हालांकि धर्म का कोई स्थायी रूप न था. न ही लोग उसे लेकर एकमत थे. उसकी अलगअलग परिभाषाएं थीं, अलगअलग मापदंड. अधिकांश लोग पुरोहितों और पंडितों द्वारा किए जाने वाले कर्मकांड को ही धर्म समझ लेते थे. इस कारण धर्म का स्वरूप, देश, काल, समय और व्यक्ति की अपनी भावनाओं के अनुसार बदलता रहता था. धार्मिक होने की कोई कसौटी तक न थी. व्यक्ति कुछ और न करे, बस इतना कह भर दे कि वह धार्मिक है, तो भी उसको धर्मविशेष का अनुयायी मान लिया जाता है. जिंदगीभर आधीअधूरी आरती गाकर या माला फेरकर भी धार्मिक होने का गौरव हासिल किया जा सकता है. इस तरह धर्म का दूसरा अर्थ अपने पूर्वाग्रहों या विश्वास का खुलासा कर देना भर है. यह भी न हो तो जन्म के आधार पर भी व्यक्ति का धर्म सुनिश्चित हो जाता है. यह उस समय तक बना रहता है, जब तक व्यक्ति स्वयं धर्म से बाहर जाने की विधिवत घोषणा न कर दे. धर्म की परिसीमा को लांघना लगभग असंभव है. अनेक व्यक्तियों के लिए धर्मानुसरण मजबूरी या परंपरापोषण बनकर रह जाता है. यदि धर्म जन्म से लादा न जाए, व्यक्ति को अपनी रुचि या आजीविका के अनुसार धर्म चुनने की भी आजादी हो, तो आधे से अधिक लोग खुद को धर्म के दायरे में लाने की कोशिश तक न करे करें. संभव हो तो अपनी रुचि, जरूरत और विश्वास के अनुसार एकाधिक धर्मों में साझा करें. वह स्थिति पुरोहितों और धर्म के नाम पर धंधा करने वाले धर्माचार्यों के प्रतिकूल सिद्ध होगी. हो सकता है इसकी घोषणा के सालभर के भीतर ही उनकी सारी दुकानदारी बंद हो जाए. इस बात को धर्म की धंधागिरी करने वाले भी भलीभांति जानते हैं. इसलिए जन्म के साथ ही शिशु को धर्म के खूंटे से बांध देने के प्रति सहमति हर धर्म, प्रत्येक संपद्राय में है. कुल मिलाकर धर्म अपने अनुयायियों की मूक सहमति पर भी बना रहता है, जबकि न्याय के लिए प्रबुद्ध नागरिकों की मुखर सहमति अनिवार्य है. यदि समाज में न्याय को लेकर सर्वसम्मति नहीं है, तो कहा जाना चाहिए कि उस समाज में या तो बहुत अधिक मतभेद हैं अथवा न्यायप्रणाली पर लोगों का भरोसा नहीं है. दूसरे यह भी संभव है कि शासन ने लोगों को अपनी न्यायव्यवस्था से परचाने में कोताई बरती है. कुल मिलाकर न्याय की सर्वस्वीकार्यता ही उसे न्याय बनाती है.

प्लेटो और अरस्तु दोनों की न्याय संबंधी अवधारणाओं में विरोधाभास भी कम न थे. उन दोनों ने ही दास प्रथा का समर्थन किया था. उसे वे समाज की आवश्यकता के रूप में देखते थे. कह सकते हैं कि प्लेटो का आदर्श राज्य तथा अरस्तु का नैतिकता समर्पित राज्य दोनों अभिजनोन्मुखी व्यवस्थाएं थीं. दोनों व्यवस्थाओं में दासों को न्यूनतम मानवीय अधिकारभी अप्राप्य थे. यहां तक कि उन्होंने दासों की स्थिति को विचारयोग्य भी नहीं माना था. इसका कारण यह भी हो सकता है कि प्लेटो और अरस्तु दोनों उच्च कुल से संबंधित थे. प्लेटो तो एथेंस की सत्ता के प्रमुख दावेदारों में से था. जबकि अरस्तु को सिंकदर का गुरु होने का गौरव प्राप्त है. वह स्वयं मकदूनिया के कुलीन परिवार से था. जाहिर है, भारतीय ब्राह्मणों की भांति यूनानी विचारक भी वर्गीय पूर्वाग्रहों से मुक्त न थे. स्त्रियों के संदर्भ में प्लेटो अपने समकालीन विचारकों की अपेक्षा उदार था. वह उन्हें पुरुषों के बराबर अधिकार दिए जाने के पक्ष में था, जबकि अरस्तु की लैंगिक आधार पर समाज के विभाजन के प्रति सहमति थी. उसका मानना था कि बौद्धिक और प्राकृतिक स्तर पर पिछडे़ व्यक्ति, सामाजिक स्तर पर भी पिछड़े होंगे. अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ’पा॓लिटिक्स’ में वह लिखता है, ‘सुशासित राज्य में ऐसे नागरिक जो बौद्धिक और शारीरिक रूप से अक्षम हैं, उनके सामाजिकराजनीतिक अधिकार भी आनुपातिक रूप में सीमित हो जाते हैं.’

न्याय की सार्वभौमिकता को लेकर प्राचीन भारत में भी कमोबेश यही स्थिति थी, मगर ईसा से सातआठ सौ वर्ष पहले वर्णव्यवस्था निकृष्ट जातिप्रथा का रूप लेने लगी थी. मनुस्मृति, कात्यायन स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि ग्रंथों में न केवल वर्णव्यवस्था के जाति में बदलने के प्रति मौन सहमति है, बल्कि उन समाजार्थिक असमानताओं को भी स्वाभाविक मान लिया गया है, जो धर्म और जाति की जकड़बंदी की देन थीं. मनुस्मृति में स्त्री को दोयम दर्जे का नागरिक माना गया है. उन्हें किसी मुकदमे के दौरान साक्षी नहीं बनाया जा सकता था. मनु महाराज को स्त्री की बौद्धिक क्षमताओं पर भी भरोसा न था. इसलिए स्त्री की अवमानना का कोई अवसर वह चूकना नहीं चाहता—‘निर्लोभ मनुष्य अकेला भी साक्षी के लिए पर्याप्त है. किंतु स्त्रियां अनेक होकर भी गवाही नहीं दे सकतीं. क्योंकि स्त्री चंचल, उसकी बुद्धि अस्थिर होती है.’5 स्त्रीअधिकारिता को लेकर समकालीन भारतीय विचारकों की मान्यताएं भी इसी प्रकार की थीं. मनु सहित तत्कालीन आचार्यों का यह असमानताकारी विधान केवल स्त्रियों तक सीमित न था. समाज के तीनचौथाई हिस्से को भी शूद्र की श्रेणी में रखकर उसे सामान्य न्याय से वंचित कर दिया गया था. उस व्यवस्था में धार्मिकराजनीतिक अभिजन को जो अधिकार प्राप्त थे, उनका शतांश भी महिलाओं और शूद्रों को प्राप्त नहीं था. कह सकते हैं कि न्याय की अपेक्षाओं के साथ लागू आरंभिक धर्माधारित विधान तथा शीर्षस्थ शक्तियों के वर्गीय स्वार्थ में घिरकर न्याय पटरी से उतर चुका था. परिणामस्वरूप पूरी व्यवस्था समाज के बड़े वर्ग के लिए शोषणकारी तंत्र का रूप ले चुकी थी.

आरंभ में आर्थिक अभिजन का विकास नहीं हो पाया था. उसके अवसर भी कम ही थे. आय का स्रोत या तो पशुधन होता था, अथवा भूसंपदा. दोनों ही पर समाज के शीर्षस्थ वर्गों का अधिकार था. वह व्यवस्था शताब्दियों तक बनी रही. धीरेधीरे शिल्पकर्म का विकास हुआ. समाज में शिल्पकारों की मांग बढने लगी. आरंभ में शिल्पकार वर्ग स्वयं अपनी बनाई कृतियों का व्यापार करता था. उनके संगठन देशदेशांतर में समूहबद्ध होकर व्यापार करते थे. कालांतर में मांग बढ़ने के साथ निर्माण और व्यापार दोनों को साधना कठिन होने लगा. इससे बिचौलिये के रूप में व्यापारी वर्ग का उदय हुआ जो उत्पादक और क्रेता के बीच पुल की तरह काम करने लगा. 2600—2700 वर्ष पहले तक इस वर्ग ने अपनी आर्थिक हैसियत इतनी मजबूत कर ली कि राजनीतिक और धार्मिक अभिजनों के लिए उसकी उपेक्षा करना असंभव हो गया. राजकीय आयोजनों में श्रेष्ठि वर्ग को ससम्मान आमंत्रित किया जाने लगा था. परिणाम यह हुआ कि समाज में तीसरे वर्ग को भी अभिजन की श्रेणी में शामिल करना पड़ा. उससे शिल्पवर्ग, किसान और मजदूर जो समाज का वास्तविक उत्पादक वर्ग था, चैथी श्रेणी में खिसक गया. धार्मिक शक्तियों ने चतुराईपूर्वक चार वर्णो को मान्यता दे दी. यह मात्र 2200-2300 वर्ष पुरानी घटना है. उस समय तक न केवल, भारत बल्कि दुनिया के सभी देशों में धर्म का प्रभुत्व कायम हो चुका था. परिणामस्वरूप सभी कार्य तीसरीचैथी अदृश्य शक्तियों, जिन्हें ईश्वर, देवता आदि कहा जाता था, जबकि असलियत में उनका अपना कोई अस्तित्व न था, के नाम पर होने लगे. इससे व्यक्ति और व्यक्ति कल्याण जैसे शब्द विमर्श से गायब होने लगे; अथवा उन्हें खास संदर्भ में देखा जाने लगेगा.

चूंकि ईश्वर अभिजन मनोरचना थी तथा उसे सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञाता, संसार के सर्जक के रूप में प्रयुक्त किया था, इसलिए उसका व्याख्याता होने का दावा करने वाला ब्राह्मण हमेशा ही शीर्ष पद का दावेदार बना रहा. बाकी वर्गों की सामाजिक हैसियत ब्राह्मणों द्वारा की गई व्याख्या द्वारा निर्धारित थी. अपनेअपने स्वार्थ के वशीभूत शेष दोनों वर्ग ब्राह्मणों द्वारा विनिर्मित व्यवस्था का समर्थनसंवर्धन करते रहे. शीर्षस्थ तीनों वर्गों वैश्य, ब्राह्मण एवं क्षत्रिय की संख्या कुल जनसंख्या के चैथेपांचवे हिस्से तक सीमित थी, जबकि निर्णय लेने के सारे अधिकार और अस्सी प्रतिशत संसाधन इन्हीं वर्गों के अधिकार में थे. चौथे वर्ग के शेष तीनचौथाई से अधिक लोग उनकी मनमानी सहने को विवश थे. यहां एक बात विचारणीय है. यह कि जातिप्रथा का प्रभाव केवल भारत तक सीमित था, किंतु किसी न किसी आधार पर समाज का लगभग ऐसा ही स्तरीकरण दुनिया के उन सभी देशों में हुआ जहां संस्कृति धर्म की चेरी बन चुकी थी; और धर्म सभ्यता के प्रत्येक चरण पर छाया हुआ था. जहां और कुछ न मिला, वहां पूजापद्धति और विश्वास के आधार पर धर्म के भीतर ही अनेक पंथ बना दिए गए. पूजापद्धति, परंपरा, टोटम और आराध्य के नाम पर एकदूसरे को मरनेमारने पर उतारू लोग समाज के जातीय विभाजन तथा उसके माध्यम से होने वाले उत्पीड़न के आगे मौन रहते थे. सही मायने में वे अभिजनसंस्थाएं थीं. जिनका गठन समाज के अभिजात वर्ग द्वारा अभिजन हितों की सुरक्षा के लिए किया गया था. भारत में धर्म सांस्कृतिक बदलावों के अलावा निकृष्ट जातीय विभाजन का भी आधार बना था, जिसने सामाजिक असमानता को स्थायी रूप देने में मदद की. कालांतर में धर्म और जातिप्रथा का संबंध नाभिनाल का बन गया. अपनेअपने स्वार्थ के लिए दोनों एकदूसरे का समर्थनसंबर्धन करने लगे. ऐसा नहीं है कि धर्म और जातिप्रथा का कभी विरोध ही नहीं हुआ. जातिप्रथा पर बड़ी चोट गौतम बुद्ध की ओर से पड़ी थी. जैन धर्म ने भी अपनी तरह से ब्राह्मणों के कर्मकांड और जाति प्रथा को चुनौती देने की कोशिश की. किंतु कालांतर में वह स्वयं एक जाति के रूप में सिमटकर रह गया. बुद्ध के अनुयायी भी जाति, वर्ण, तंत्रमंत्र आदि में विश्वास करने लगे. चूंकि धर्म और जातिप्रथा दोनों ही सामाजिक असमानता के पोषक और संवर्धक थे, अतएव इनके चलते भारत में सांस्कृतिकसामाजिक न्याय सदैव एक सपना बना रहा. निहित स्वार्थ के लिए भारतीय मनीषी धर्म का महिमामंडन करते रहे. इससे भारत में सामाजिक न्याय के लक्ष्य को छूना सदैव चुनौतीपूर्ण रहा है. सामाजिकसांस्कृतिक असमानताओं के चलते भारतीय समाज सदैव आंतरिक संघर्ष और विक्षोभों की संघर्षस्थली बना रहा. आशय है कि जिस धर्म को समाज में न्याय और नैतिकता की स्थापना हेतु उपकरण के तौर पर अपनाया गया था, कालांतर में उसके आगे न्याय एवं नैतिकता का महत्त्व गौण पड़ने लगा. निरर्थक कर्मकांड और जड़ विश्वास न्याय एवं नैतिकता का स्थान लेने लगे. यह समाज में धार्मिक शक्तियों के बलशाली होते जाने का प्रमाण था. आगे चलकर यह भारतीय चिंतन परंपरा के प्रमुख चरित्र में ढलता गया. ऐसे बुद्धिविरोधी परिवेश में वाराहमिहिर जैसा खगोलशास्त्री और गणितज्ञ भी यदि अपनी प्रतिभा मूर्तियों की कदकाठी और रूपाकार तय करने में खपाने लगे तो आश्चर्य क्यों हो. उसने मौलिक चिंतन को अवरुद्ध करने का काम किया.

मध्यकालीन यूरोप में संत अगस्ताइन(13 नवंबर, 354—28 अगस्त 430), थाॅमस एक्वीनस(1225—7 मार्च 1274) आदि ने न्याय की व्याख्या के लिए ईसाइयत को आधार बनाया. ईसा मसीह का चरित्र समाज के विपन्न और सर्वहारा का प्रतिनिधित्व करता था. इसलिए उसमें न्याय एवं नैतिकता को लेकर मौलिक चिंतन लगातार होता रहा. संत अगस्ताइन और एक्वीनस दोनों ही मध्यकालीन धर्म और न्याय के बीच सेतु बनाने के समर्थक थे. दोनों में से एक आदर्शवादी था, दूसरा व्यवहारवादी. प्लेटो से प्रभावित अगस्ताइन मानवादर्शों को महत्त्व देता था, मगर ईसाइयत से परे झांकने का उसमें साहस न था. वह न्याय को धर्म की उपलब्धि के रूप में देखता था. अगस्ताइन के अनुसार ‘न्याय उन चार चीजों में प्रमुख है, जिनके माध्यम से ईश्वर को प्यार किया जा सकता है.’ मानवादर्श एवं नैतिकता की उठान को दर्शाने वाले अन्य बुनियादी सद्गुणों से भेद करते हुए अगस्ताइन ने न्याय को व्यक्ति एवं शेष समाज के मध्य ‘पवित्र रिश्ते’ की संज्ञा दी है. न्याय पथ पर गतिमान व्यक्ति ही अपने और शेष समाज के बीच पवित्र रिश्ता बना सकता है. न्याय न केवल व्यक्ति के भीतर सहिष्णुता और समरसता पैदा करता है, बल्कि अन्य सद्गुणों की भांति यह भी हमें ईश्वरीय साक्षात का पात्र बनाकर उत्तरोत्तर उसके करीब ले जाता है. न्याय पथ पर बढ़ रहे व्यक्ति की पहली लड़ाई अपने आप से ही होती है. उसका पहला चरण अपने मन में छिपे ‘शुभत्व’ की पहचान से शुरू होता है, ‘न्याय मनुष्य के अंतर्मन में छिपा होता है.’ अच्छे और बुरे के बीच मानवमन का अंतद्र्वंद्व हमेशा चलता रहता है. सामान्य नैतिकता मनुष्य के आत्मसंघर्ष के दौरान नकारात्मक वृत्तियों के शमन में सहायक होती है. जब तक यह संघर्ष समाप्त नहीं हो जाता, तब तक न्याय की प्राप्ति भी अलभ्य बनी रहती है. इसलिए न्याय की चाहत रखने वाले मनुष्य को उसकी शुरुआत अपने आप से ही करनी पड़ती है.

अगस्ताइन प्लेटो के आदर्श राज्य की संकल्पना को पसंद करता था. लेकिन प्लेटो का आदर्श राज्य जहां श्रेष्ठतम मनुष्यों की मिलीजुली सर्वोत्तम रचना थी, वहीं अगस्ताइन का आदर्श राज्य ईश्वरीय अनुकंपा और उसकी उपस्थिति से बनता है. अपनी इस आदर्शवादी कल्पना को अगस्ताइन ईसाइयत के माध्यम से संभव बनाना चाहता था. उसका कहना था कि प्लेटो के आदर्शवाद एवं अरस्तु के नैतिकता केंद्रित व्यवहारवाद को धर्म के संदर्भ में देखना चाहिए. उसके अनुसार धर्म मनुष्य को विनम्र बनाता है. धर्म में विश्वास रखते हुए ही न्याय के लक्ष्य को संभव बनाया जा सकता है. इसके लिए आंतरिक शुद्धता अपरिहार्य है. न्याय का ध्येय प्रत्येक व्यक्ति को वह सबकुछ देना है, जो उसका है, जिसकी उसे आवश्यकता है; या जो उसे मिलना चाहिए. ईश्वर सत्य और मानवउद्धार की भावना के परे कुछ नहीं है. जो लोग न्याय और सचाई के रास्ते पर हैं, वही ईश्वर के रास्ते पर भी हैं. जागतिक संसार ईश्वरीय चेतना का विस्तार है. न्याय ईश्वर के प्रति प्रार्थना है. जबकि अन्याय पाप और ईश्वर के प्रति अपराध. ईश्वरीय न्याय ही दैविक न्याय है, जिसमें न्यायपथ पर चल रहे व्यक्ति के हिस्से ईश्वरीय अनुकंपाएं आती हैं, जबकि न्याय की अवमानना करने वालों के प्रति ईश्वर का कोप. न्याय की कामना करने वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह खुद को पहले अपने आप से, फिर पड़ोसी से और उसके बाद शहर या गांव से जोड़े. अगस्ताइन को न्याय बिना ईश्वरीय अनुकंपा के कहीं दिखाई नहीं पड़ता. इसके पीछे उसके जीवन की त्रासदी को देखा जा सकता है. अगस्ताइन का जन्म अफ्रीका मे हुआ था. उसका बचपन बड़ी संघर्षमयी परिस्थितियों में बीता था. अतएव जीवन की प्रत्येक उपलब्धि, अप्रत्याशित की प्राप्ति उसे ईश्वरीय अनुकंपा प्रतीत होती थी. सिसरो के शब्दों में राज्य, ‘अधिकारों तथा सामान्य हितों पहचान तथा सामान्य कल्याण की प्राप्ति हेतु— मानवीय संबंधों का सुदृढ़ एवं बहुआयामी अनुबंध है.6 रोमन साम्राज्य के वैभव एवं उसकी बौद्धिक उपलब्धियों की प्रायः सभी विचारकों ने प्रशंसा की है. लेकिन अगस्ताइन को उससे संतोष न था. उसका मानना था कि रोमन साम्राज्य सिवाय एक बेहतर राजनीतिक बस्ती के और कुछ न था. अपनी चर्चित पुस्तक ‘सिटी आफ गाड’ में अगस्ताइन ने लिखा था कि रोमवासी बुतपरस्त और दुनियावी लोग थे. सच्चा न्याय केवल ‘ईश्वर के राज्य’ में संभव हो सकता है. स्थायी न्याय के लिए राज्य को ईश्वरीय अनुराग पर टिका होना चाहिए. कानून का राज्य जैसी कोई अवधारणा नहीं हो सकती. जिस राज्य में न्याय नहीं हैं, मान लेना चाहिए कि वहां कोई कानून भी नहीं है.’

अगस्ताइन ईसाई धर्म की करुणा को राज्य की न्यायभावना का आदर्श मानता था. इसलिए सिसरो द्वारा दी गई राज्य की परिभाषा जिसके अनुसार राज्य वस्तुतः ‘राज्य सामान्य हितों की प्राप्ति तथा मानव अधिकारों की पहचान हेतु नागरिकों का मजबूत बहुआयामी गठजोड़ है’—का उसने समर्थन किया था. उसके अनुसार न्याय का अभीष्ट है कि कोई भी व्यक्ति किसी को भी नुकसान न पहुंचाए; तथा उनमें से प्रत्येक को जरूरतमंद की इतनी मदद करनी चाहिए, जितनी वह कर सकता है. लेकिन राज्य का काम अपने नागरिकों की मदद करने मात्र से नहीं चल पाता. राज्य की उदारता तो उसकी नीतियों तथा उसके लिए किए गए गंभीर प्रयत्नों में नजर आनी चाहिए. राज्य को हमेशा यह कोशिश करनी चाहिए कि उसके प्रत्येक नागरिक को अपने विकास का अवसर मिले. किसी आपदा अथवा संकट के समय नागरिकों की मदद करना अच्छे राज्य का लक्षण हो सकता है. लेकिन चैरिटी को ही न्याय का पर्याय मान लेना भारी भूल होगी. ‘खैरात ऐसा विकल्प नहीं है, जिससे न्याय की पूर्ति हो सके.’7 अगस्ताइन के अनुसार आदर्श समाज का गठन बिना ईश्वरीय प्रेरणा के असंभव है. इसके लिए वह सामाजिक अनुशासन से अधिक व्यक्तिगत अनुशासन को महत्त्व देता है. उसका मानना था कि समाज परिवर्तनशील है. वह घूमफिर कर फिर उसी स्थान पर लौट आता है. व्यक्ति को इससे बचना चाहिए. उसके अनुसार, ‘यदि नागरिक स्वयं मर्यादित नहीं होंगे तो निश्चित रूप से उनसे बनी सभा भी मर्यादित नहीं रह पाएगी.’8

अगस्ताइन और एक्वीनस के बीच लगभग आठ शताब्दियों का अंतर है. वैचारिक दृष्टि से देखें तो इस अंतराल को हम ठहरा हुआ पाते हैं. उस समय तक धर्म और साम्राज्यवाद एक हो चुके थे. मनुष्य की आध्यात्मिक चेतना एवं जिज्ञासाओं के समाधान के रूप में उभरा धर्म साम्राज्यवादियों के लिए बड़ा हथियार सिद्ध हुआ था. जनसाधारण को बताया जाने लगा कि उनकी सत्य की तलाश पूरी हो चुकी है. उस सत्य के कई रंग थे. वह भारत में जाति और वर्ण के अलगअलग खानों में बंटा हुआ था. उनके बीच अलंघ्य दूरियां थीं. बुद्धिजीवी वर्ग का भी उसे समर्थन था. परिणाम यह हुआ कि पूरब और पश्चिम में हर जगह समाज की मेधा का बड़ा हिस्सा अपनेअपने धर्म के महिमामंडन में जुट गया. लोगों की रुचि और जरूरत के अनुसार देवता गढ़े जाने लगे. धर्म जीवन की उपयोगिता तीसरी शक्ति को प्रसन्न करने में खोजता था. उसके प्रभाव में प्रयाण गीत के स्थान पर प्रार्थनाएं गाई जाने लगीं. पुरुषार्थ के स्थान पर दैन्य छाने लगा. चाटुकारिता के उस दौर में स्वाभिमान मरने लगा. मनुष्य मनुष्य को महत्त्व दे, पूरे समाज की खुशी के लिए काम करे—इस विचार का अब कोई महत्त्व नहीं रह गया था. शुभता और सद्गुण जिन्हें गौतम बुद्ध, सुकरात, कन्फ्यूशियस जैसे महान विचारकों ने मनुष्य में अवस्थित मानते हुए मानवीय पहचान से जोड़ा था, वे ईश्वर में अवस्थित कहे जाने लगे. न्याय और समानता के दुर्दिनों की शुरुआत वहीं से हुई. धर्म के केंद्रीयवाद ने साम्राज्यवाद को शक्तिशाली बनाया था. इससे उसके निर्णयों पर निरंकुशता छाने लगी. धर्म के नाम पर, देवता के नाम पर शोषण के नएनए तरीके खोजे जाने लगे. उन्हें पुरोहित वर्ग का पूरा समर्थन हासिल था. इससे असमानता पनपी. समाज साधारण, विशिष्ट और अतिविशिष्ट लोगों में बंटने लगा. जो विशिष्ट और अतिविशिष्ट श्रेणी के थे, उनके लिए जनसाधारण का, सिवाय इसके कि वे शासित रहकर उसके शासक होने के दर्प की पूर्ति करते थे—कोई महत्त्व न था.

क्षीण होती नैतिकता के प्रभाव में न्याय के मायने दंड और पुरस्कार तक सीमित रह गए. मौलिकता से कट जाने के कारण बारबार पीछे मुड़कर देखने की प्रवृत्ति ने जन्म लिया. भारत में बारबार वेदों, उपनिषदों, पुराणों और महाकाव्यों की दुहाई दी जाने लगी तो पश्चिम में किसी न किसी बहाने सुकरात, प्लेटो और अरस्तु से संदर्भ लेकर ज्ञानसाधना की भूख का समाधान किया जाने लगा. 2500—2600 वर्ष पहले ज्ञान का जो प्रकाश पूर्व और पश्चिम दोनों जगह लगभग साथसाथ फैला हुआ था, उसका तेज दोनों ही जगह मद्धिम पड़ने लगा. प्रकृति के सान्निध्य में पलने वाले आदिम मनुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासा जो कभी बहते नीर के समान निर्मलपावन थी, वह धर्म और संप्रदाय के नाम पर बने तालाबों, पोखरों में फंसकर गंदली होने लगी. शताब्दियों बाद भी प्लेटो, अरस्तु, सुकरात, गौतम बुद्ध आदि प्रासंगिक बने रहे तो इसका कारण यह भी है कि धर्म हमारे दिलोदिमाग पर कब्जा कर, हमारे मौलिक चिंतन पर कब्जा कर चुका था. अगस्ताइन ने प्लेटो के आदर्शवाद पर जोर दिया था. उससे आठ सौ वर्ष बाद जन्मा थाॅमस एक्वीनस अरस्तु के नैतिक दर्शन का समर्थक था. उसने मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों पर जोर दिया था. लेकिन ईश्वर के नाम पर. यह कहते हुए कि ईश्वर ऐसा चाहता है. न कि इसलिए कि मानवीय स्वतंत्रता की गरिमा हेतु मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों की सुरक्षासंरक्षा आवश्यक है. कुछ खूबियां भी उसकी विचारधारा में थीं. यदि वे न होतीं तो आठ सौ वर्ष लंबे अंतराल में विस्मृति उसे कभी का शिकार बना चुकी होती. एक्वीनस का जोर मानवीय नैतिकता पर था. धर्म को वह समाज में न्याय एवं नैतिकता की स्थापना के लिए आवश्यक मानता था. उसकी आस्था शुभत्व की भावना से प्रेरित थी. एक्वीनस का सुझाव था कि मनुष्य को स्वयं को नैतिकता की कसौटी पर लगातार कसते रहना चाहिए. प्रकृति के सापेक्ष लोक उत्तरवर्ती रचना है. अतएव ईश्वरीय नियमों की महत्ता लौकिक नियमों से अधिक है. तदनुसार मनुष्य के मौलिक अधिकार किसी राज्य अथवा समाज के अधिकार से बढ़कर नहीं होने चाहिए. उसके अनुसार न्याय सदैव ईश्वरीय सत्ता पर निर्भर होता है. अरस्तु की न्याय की परिभाषा को आगे बढ़ाते हुए एक्वीनस ने लिखा था—न्याय मानव समाज का हिस्सा है. जिसके अनुसार प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि नागरिक कल्याण के लिए वह सब करे, जीजान से करे, जो वह कर सकता है.

फिर न्यायाधीश किसे माना जाए? एक्वीनस इसके बारे में भी आश्वस्त है. न्यायाधीश को ‘न्यायमूर्ति’ की संज्ञा दी है—‘न्यायाधीश वह है जो अपने आदेश और निर्देश के माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति को वह सब देता है, जिसका वह अधिकारी है. उसके अनुसार न्याय का मानवीकरण ही न्यायाधीश है. वही न्याय का संरक्षक भी है.’9 वह हमेशा यह ध्यान रखता है कि मनुष्य को जो अधिकार प्राकृतिक रूप से प्राप्त हैं, उनमें किसी भी प्रकार की कटौती न हो. ईश्वर प्रथम न्यायकर्ता, सबसे बड़ा न्यायाधीश है. वह सबको प्राकृतिक न्याय का बोध कराता है, जिसमें सबके लिए समानता और स्वतंत्रता है. यही कारण है कि प्राकृतिक न्याय, लौकिक न्याय से सदैव ऊपर होता है. उनमें कोई विरोधाभास भी नहीं है. समाज का गठन ही सामान्य अधिकारों की पहचान के साथसाथ परस्पर सहयोग करते हुए आगे बढ़ते रहने के लिए हुआ है. अरस्तु ने न्याय को संवितरणात्मक और योग्यतानुपाती माना था. संवितरणात्मक न्याय राज्य की उदारता, कार्यक्षमता और सामाजिक दायित्वों के प्रति उसकी गंभीरता का द्ययोतक है. वह सामाजिक विषमताओं के समाधान हेतु राज्य की गंभीरता तथा उसके कौशल को दर्शाता है. योग्यतानुपाती न्याय राज्य की नागरिकों की योग्यता और आवश्यकता के अनुसार, कारगर निर्णय लेने की योग्यता का प्रदर्शन करता है. इसका संबंध नागरिकों की योग्यता तथा उनके द्वारा समाज के हित में किए गए योगदान से है. न्याय की परिभाषा को लेकर एक्वीनस की अरस्तु से सहमति थी. उसके अनुसार न्याय सभी सद्गुणों में सर्वोत्तम है. मानवमात्र का कर्तव्य है कि समाज में न्याय की श्रीवृद्धि के लिए निरंतर प्रयत्नरत रहे. यह दूसरों से अपेक्षा के चलते हरगिज नहीं हो सकता. मनुष्य स्वयं न्याय की ओर तत्पर होगा, तभी न्यायआधारित समाज का गठन संभव है. चुनौती बड़ी है. लेकिन मनुष्यता के सर्वांग कल्याण हेतु सिवाय इसके दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है. बकौल एक्वीनस समाज की अनेकानेक समस्याओं की जड़ उसमें न्याय की अनुपस्थिति है. यूं तो सारी सृष्टि परमात्मा की, परमात्मा में ही अवस्थित है. लेकिन विभिन्न प्रकार के दबावों के विरुद्ध अपने श्रमकौशल और परिश्रम से मनुष्य जो कुछ अर्जित करता है, उसके सुखोपभोग का अधिकार उसे मिलना ही चाहिए. इसके लिए एक्वीनस ने व्यक्तिगत संपत्ति के विचार का समर्थन किया था. व्यक्तिगत संपत्ति ईश्वरीय अनुकंपा है. लेकिन दूसरे की संपत्ति पर कब्जा करना. उसे चुराना या हड़प लेना दोनों ही अन्याय के प्रतिमान हैं. ईसाई धर्म कहता है—तुम अपने पड़ोसी को उतना ही प्यार करो, जितना अपने आप से करते हो. ईश्वर से भी उतना ही प्यार करना चाहिए, जितना स्वयं से करते हैं. बस यहीं हमारे विरोधाभास सामने आने लगते हैं. हम कथित ईश्वर से उतना प्यार कर ही नहीं सकते, जितना स्वयं से करते हैं. इस तरह हम खुद और ईश्वर की सृष्टि के बीच के अंतर करने लगते हैं. एक्वीनस की दृष्टि में यह ईश्वरीय सत्ता में अविश्वास करने जितना बड़ा पाप है. निजी संपत्ति पर अधिकारिता को वह प्राकृतिक मानता था. उसके अनुसार किसी को उसकी संपत्ति से वंचित कर देना या उससे बलात् छीन लेना दोनों ही पाप हैं.

अरस्तु की भांति एक्वीनस ने भी दासप्रथा का समर्थन किया था. मगर स्त्रियों को उपयुक्त अधिकार दिए जाने चाहिए, इसे लेकर दोनों ही सहमत थे. एक्वीनस के अनुसार चूंकि ईश्वर सर्वोत्तम है, अतः मनुष्य केवल ईश्वर के साम्राज्य में खुश हो सकता है. मनुष्य का राज्य उसे असंतोष और पीड़ा के सिवाय कुछ नहीं दे सकता. इसके लिए मनुष्य को अपनी आस्था केवल परमात्मा और उसकी नैतिक सर्वोच्चता में बनाई रखनी चाहिए. सामाजिकआर्थिक विषमता का होना भी ईश्वरीय मान्यता के अनुसार पाप है. प्रकृति प्राणिमात्र के प्रति समभाव रखती है. राज्य और उसके नागरिकों की कोशिश होनी चाहिए कि समाज में किसी भी प्रकार की विषमता न फैले. अतः जो व्यक्ति ईश्वर के प्यार को सचमुच प्राप्त करना चाहता है, उसका प्राकृतिक समानता के मूलभूत दर्शन में विश्वास रखना अत्यावश्यक है. अगस्ताइन और एक्वीनस दोनों के लिए न्याय आस्था का विषय है. वह इसलिए आवश्यक है क्योंकि ईश्वर ऐसा चाहता है; या उससे कथित ईश्वर को खुशी मिलती है. आखिर ये बड़ेबड़े विचारक व्यक्ति के लिए न्याय की खोज करतेकरते लोग ईश्वर तक क्यों चले जाते हैं? ईश्वर की खुशी व्यक्तिमात्र की खुशी का पर्याय भला कैसे हो सकती है? ईश्वर को यदि किसी ने देखा नहीं, यदि वह केवल अवधारणा तक सीमित है, तो क्यों नहीं व्यक्ति की खुशी को ही न्याय की कसौटी मान लिया जाए? दूसरे शब्दों में न्याय यदि मनुष्य की जरूरत है तो उसको मनुष्य की इच्छा और रुचि के अनुरूप क्यों नहीं होना चाहिए? अगस्ताइन, एक्वीनस हो या कोई और अध्यात्मवादी, ऐसे सवालों पर विचार नहीं करते? अनेक तो ऐसा सोचना भी ‘कुफ्र’ मानते हैं. उनके लिए कथित ईश्वर प्रत्येक समस्या का समाधान है. हालांकि सिवाय आस्था के, जैसा दूसरे अध्यात्मवादी दावा करते हैं, वे कथित ईश्वरीय इच्छा अथवा समस्या के समाधान को लेकर दूसरों को आश्वस्त कर पाना तो दूर, खुद भी डांवाडोल रहते हैं. धर्म के इन विरोधाभासों पर जो न्यायभावना पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, यशपाल का कहना है—

जो लोग विद्वान हैं, शक्ति संपन्न हैं, उनके लिए ईश्वर का होना न होना बराबर है. ईश्वर का भय या विश्वास उन्हीं लोगों के लिए आवश्यक है जो सत्य, धर्म और उचित को स्वयं नहीं पहचान सकते. सत्य, धर्म और उचित को कौन पहचान सकता है, और कौन नहीं पहचान सकता; यह बात बहुत हद तक इस बात पर भी निर्भर करती है कि सत्य, धर्म और उचित क्या है और उसे निश्चित किसने किया है. जो व्यक्ति या श्रेणी सत्य, धर्म, उचित और न्याय का निश्चय करती है, सत्य, धर्म और न्याय को समझने में कोई कठिनाई उस श्रेणी को नहीं हो सकती. क्योंकि सत्य, धर्म और न्याय स्वयं उन्हीं की इच्छा के अनुसार, स्वयं उन्हीं के मस्तिष्क से, उनकी आवश्यकताओं और हितों को पूरा करने के लिए पैदा होते हैं. इस प्रकार के धर्म और न्याय का पालन करने के लिए इन लोगों को किसी भय की आवश्यकता नहीं, न समाज में कायम शासन की, न ही ईश्वर की आज्ञा की.’11

फिर आस्था को ढोते रहने का कारण? इसके पीछे सामाजिक परिस्थितियों की भूमिका कम नहीं है. दो सहस्राब्दी पूर्व बड़े राज्यों के गठन में धर्म की भूमिका सकारात्मक रही थी. पूरब हो या पश्चिम हर जगह मनुष्य को लगा था कि समाज में शांति और सुव्यवस्था के लिए धर्म अपरिहार्य है. एक सीमा तक धर्म ने इस जिम्मेदारी को संभाला भी. लेकिन धर्म की ताकत के भरोसे नहीं. बल्कि जो शक्तियां धर्म के माध्यम से समाज के शिखर पर विराजमान थीं, जनाक्रोश से बचने के लिए उन्हें उतना करते हुए दिखना आवश्यक था. दूसरा कारण परिपक्व राजनीतिक दर्शन का अभाव था, जो उनीसवीं शताब्दी तक बना रहा.

न्याय के संदर्भ में मध्यकाल के दौरान भारत और पश्चिमी जगत की स्थिति को देखें तो दोनों में पर्याप्त समानता दृष्टिगत होती है. दोनों ही जगह न्याय की मांग या उसकी अपेक्षा किसी तीसरी शक्ति यानी ईश्वर के नाम पर की जाती है. अंतर केवल इतना है कि पश्चिम में अगस्ताइन, एक्वीनस आदि विद्वान जिसे ईश्वरीय अनुकंपा मानते हैं, भारतीय ग्रंथकार उसे धर्म की संज्ञा देकर कर्मकांडों में ढाल देते हैं. तार्किक वस्तुनिष्ठता न यहां है न वहां. दोनों में अंतर उत्तर मध्यकाल के दौरान सामने आता है. उसे हम वास्तविक परिवर्तन का बीजारोपण भी कह सकते हैं. उसके परिणाम क्रांतिकारी सिद्ध हुए. चूंकि धर्म और सामंतवाद अपने उद्भवकाल से ही एकदूसरे को मजबूत करते आए थे, उन दिनों भी वे निर्णायक भूमिका में थे—इसलिए वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत के लिए अभी कुछ और शताब्दियों तक प्रतीक्षा करनी थी. यूरोप की वैचारिक क्रांति को हवा देने वाला वह दौर वैज्ञानिक क्रांति का था, जिसने समाज के सभी वर्गों को प्रभावित किया था. उसकी नींव रखने वाले दो प्रमुख वैज्ञानिक थे. पहला निकोलस कापरनिकस, जिसने सूर्य को सौरमंडल का केंद्र सिद्ध कर, अनेक रूढि़यों और जड़मान्यताओं पर प्रहार किया था. दूसरा भौतिक विज्ञानी आइजक न्यूटन. कापरनिकस की पुस्तक ‘दि रिबोल्युशन आरबिट’(1543) तथा न्यूटन की पुस्तक ‘दि प्रंसीपिया मेथमैटिका’(1657) ने धर्म और रूढि़यों के मकड़जाल में फंसे समाजों में ऐसा क्रांतिकारी आगाज किया, जिसे झुठलाने या उपेक्षित करने की हिम्मत किसी में न थी. उससे पूरे यूरोप में वैचारिक क्रांति की लहर उठी. इतनी तेज कि एक ही झटके में अनेकानेक जड़ मान्यताओं और पूर्वाग्रहों को अपनी रौ में बहा ले गई. उससे आगे चलकर एक वैज्ञानिक समाज का जन्म हुआ. भारतीय विद्वानों का दावा है कि जो कार्य पश्चिम में काॅपरनिकस ने सोलहवीं शताब्दी में किया था, अपने यहां उसकी शुरुआत आर्यभट्(476—550 ईस्वी) और ब्रह्मगुप्त(598—670 ईस्वी) बहुत पहले कर चुके थे. इसमें सचाई हो सकती है. यदि ऐसा है तो उसके लिए दोषी स्वयं भारतीय मनीषा है, जो धर्म और रूढि़यों में फंसकर अपनी मौलिकता गंवा चुकी थी. वह बात ईश्वरीय न्याय की करती है, लेकिन यदि किसी पर स्वतंत्रता, समानता और अस्मिता पर संकट आ पड़े तो उसे भगवान भरोसे छोड़ देती है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि आर्यभट् प्रतिभावान खगोलशास्त्री और गणितज्ञ था. कापरनिकस से बहुत पहले वह इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका था कि सौरमंडल का केंद्र पृथ्वी न होकर सूर्य है, जो पृथ्वी अपने कक्ष पर चक्रण करती रहती है. उसी से रातदिन का मेला लगता है—

जिस तरह आगे बढ़ रही नाव में बैठा व्यक्ति किनारे पर मौजूद पेड़पौधे आदि स्थायी वस्तुओं को विपरीत दिशा में गति करता हुआ देखता है, उसी प्रकार श्रीलंका में स्थिर किसी प्रेक्षक को तारे पश्चिम की ओर जाते हुए दिखाई देंगे.’12

भारतीय मनीषियों की कमजोरी रही कि उनकी भाषा या तो बहुत आलंकारिक रही अथवा अत्यंत प्रतीकात्मक. सीधीसधी भाषा और विवेचनात्मक शैली में तथ्यात्मक लेखन के उदाहरण यहां बहुत विरल हैं. उपर्युक्त उदाहरण में आर्यभट् पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने का सीधेसीधे उल्लेख नहीं करता, बल्कि पाठक को स्वयं निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए छोड़ देता है. इससे उनकी टीका करने वालों को मनमानी व्याख्या करने का अवसर मिल जाता है. कापरनिकस तथ्यों को वैज्ञानिक की भांति प्रस्तुत करता है. मौलिक गणितज्ञ होने के साथसाथ आर्यभट् प्रतिभा में किसी से पीछे न था. बावजूद इसके, कदाचित तथ्यों के प्रस्तुतीकरण की कमी के चलते, श्रेय काॅपरनिकस और न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों को मिला, जिसने वैज्ञानिक सत्यों का सुसंगत अन्वेषण किया था. वैज्ञानिक क्रांति से प्रकृति के नएनए रहस्य सामने आने लगे. इससे प्राकृतिक उपादानों को देखने की नई दृष्टि का विकास हुआ. धीरेधीरे यह तथ्य भी सामने आया कि जो ऊर्जा एक पहाड़ के भीतर है, वही एक कण में भी अंतर्निहित है. प्रकृति केवल माया नहीं है. बल्कि उसका अस्तित्व है. उसे प्रयोगशाला में सिद्ध किया जा सकता है. शोध के दौरान यह तथ्य भी जगजाहिर हुआ कि कण मात्र में वैसी ही ऊर्जा है, जैसी कल्पना आध्यात्मशास्त्री पुराणों, धार्मिक गल्पों, टोटमों, देवताओं और दानवों आदि में करते आए थे. यूं तो जैन दर्शन का ‘पुद्गलवाद’ चर्चित रहा है, जिसे जीवन ऊर्जा से सराबोर माना गया है. लेकिन भारत में ईश्वर का मिथक हर प्रतीक पर सवार रहा है. कण को कण की तरह देखने वाली दृष्टि, सृष्टि को इस मिथक से परे देख ही नहीं पाती. इस कारण जैन दर्शन का ‘पुद्गलवाद’ एवं वैशेषिक का ‘अणुवाद’ केवल दार्शनिक ग्रंथों की शोभा बने जाते हैं. विज्ञान की ताकत तथ्यों की वस्तुनिष्ठ एवं तर्कसम्मत विवेचना में है. वैज्ञानिक जो कह रहे थे, वह प्रयोगशाला में सिद्ध था. इसीलिए सही मायने में जनवादी सोच का बीज वहीं से पड़ा. कालांतर में वही बड़े सामाजिक, राजनीतिक परिवर्तनों का कारण बना.

बहरहाल, सांस्कृतिक प्रतीकों और मिथकों के समर्थनविरोध में चाहे जितने वैज्ञानिक तथ्य हों, उनसे जुड़े प्रभाव और दुराग्रह इतनी जल्दी पीछा छोड़ने वाले नहीं थे. विज्ञान के क्षेत्र में होने वाला कोई शोध, पूर्वस्थापित तथ्य को कभी भी झुठला सकता है. विज्ञान जगत उसके लिए सदैव तैयार रहता है. किंतु सामाजिक बदलाव हमेशा क्रमानुक्रम में होते है. वैज्ञानिक अन्वेषणों की गति के सापेक्ष सामाजिक परिवर्तनों की गति सदैव धीमी होती है. संस्कृति और वैचारिकी पर उनका प्रभाव पड़तेपड़ते ही पड़ता है. एक परिवर्तन को आत्मसात कर, दूसरे तक पहुंचने में समाज समय लेता है. यही कारण है कि पंद्रहवींसोलहवीं शताब्दी में हुई वैज्ञानिक क्रांति का वास्तविक असर सतरहवींअठारहवीं शताब्दी में देखने को मिलता है.

मध्यकाल के न्यायवादी विचारकों में थामस हाब्स का नाम प्रमुख है. वह पहला विचारक था जिसने राजनीतिक सिद्धांत और आधुनिक विचारधाराओं में सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश की. अपने राजनीतिक दर्शन की रूपरेखा प्रस्तुत करते समय उसने, प्रकृति के तमाम तथ्यों, जिनमें मानव व्यवहार के मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक सभी पहलू सम्मिलित थे, विचार किया. सुकरात, प्लेटो, अरस्तु से लेकर संत अगस्ताइन और एक्वीनस सभी का दर्शन सोफिस्टों की विचारधारा के विरोध में जन्मा था. लेकिन हाब्स ने अपनी बात अमूर्त्तन को नकारते हुए, मूर्त्तन की ओर वापस लौटने से शुरू की. उसने जोर देकर कहा कि जो वास्तविक है, उसको दृश्यमान होना ही चाहिए. इसका श्रेय भी उसको मिलना चाहिए. मनुष्य केवल आत्मा नहीं है. वह ‘जीवित शरीर’ भी है. देह न केवल व्यक्ति और शेष प्रकृतिजगत के बीच पृथकत्व का कारण है, बल्कि उसी के कारण मनुष्य एवं शेष प्राणिजगत में अनूठा नैकट्य है. वही मनुष्य एवं शेष विश्व के बीच संबंधों और प्रतिसंबंधों का कारण है. देह के कारण ही प्राणिमात्र स्वयं को दूसरों से अलग और विशिष्ट मानता है. उसी के कारण उसे दूसरों की उपस्थिति, उनकी विशेषताएं आकर्षित करती हैं. दूसरे शब्दों में बहिर्जगत, बहिर्जगत है ही इसलिए, क्योंकि उसका कोई अंतर्जगत है. वही मनुष्य अंतर्मन में झांकने के लिए उकसाता है. जो भी ‘जीवित शरीर है.’ उसकी समाज में स्वतंत्र हैसियत है. ऐसे संसार में स्वतंत्र हैसियत है, जहां उस जैसे करोड़ों मनुष्य अपनी स्वतंत्र व्याप्ति के साथ मौजूद हैं. ऐसे में उसकी अस्मिता और उपस्थिति का सम्मान, उसकी स्वतंत्रता की रक्षा तभी संभव है—जब वह खुद भी दूसरों की स्वतंत्रता और अस्मिता का सम्मान करे. इसलिए आत्म की कीमत पर देह की उपेक्षा उचित नहीं है. हाब्स के अनुसार व्यक्ति समाज के बीच रहकर ही सुख और सुरक्षा प्राप्त कर सकता है. मनुष्यता की रक्षा भी दूसरों के साथ सामंजस्य रखते हुए संभव है. वह लिखता है—

मनुष्य के सामने प्रथम लक्ष्य अपनी सुरक्षा अथवा शक्ति के रक्षण का होता है. उसके लिए दूसरे मनुष्यों का उसी सीमा तक महत्त्व है, जब तक वे असर डालते हैं. चूंकि बुद्धिविवेक एवं शक्ति के मामले में सभी मनुष्य लगभग एकसमान हैं, इसलिए जब तक उसे अनुशासित रखने के लिए कोई नागरिक शक्ति न हो, तब तक हर मनुष्य की हर मनुष्य के साथ लड़ाई है. इस तरह की स्थिति यद्यपि सभ्यता के प्रतिकूल है. लेकिन यदि ऐसा न हो तो नौवहन, कृषिकला, शिल्पकर्म, कला और साहित्य, उद्योग आदि में से किसी की भी उन्नति असंभव है. उस स्थिति में मनुष्य का जीवन, एकांत, निर्धन, घृणित, जंगली और अल्पकालिक होगा. उस अवस्था में न तो न्याय होता है, न ही अन्याय. न तो उचित होता है, न ही अनुचित. वैसे हालात में जीवन का एकमात्र यह नियम काम करता है कि मनुष्य को जो प्राप्त करना कर ले, और उसमें से जितना पास रखना चाहता है, रख ले.’13

हाब्स का आशय था कि यदि समाज न हो, स्पर्धा न हो, हितों का टकराव न हो तो विकास असंभव है. विकास मनुष्य की चेतना और प्रतिचेतना दोनों पर निर्भर होता है. लेकिन मनुष्य की सफलता उसे ज्यों का त्यों बनाए रखने में नहीं है. यदि ऐसा हो तो उसके विवेकीकरण का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा. उसने जोर देकर कहा था कि आत्मरक्षा के लिए हिंसा और प्रतियोगिता के स्थान पर, शांति और सहयोग अपेक्षाकृत ज्यादा कारगर हैं. शांति के लिए पारस्पिरिक विश्वास और सहयोग की आवश्यकता पड़ती है. भय और असुरक्षा की भावना शांति और विश्वास बनाए रखने में सबसे बड़ी बाधाएं हैं. सामान्य मानवप्रवृत्ति भय से मुक्ति पाने की है. प्रत्येक व्यक्ति सुख एवं सुरक्षा की कामना करता है. शाश्वत सुख की चाहत उसे समाज की शरण में ले आती है. अब यदि समाज अपने दायित्व की पूर्ति में चूक जाए. आवश्यकता पड़ने पर मनुष्य को समाज में शांति और सुरक्षा की प्राप्ति न हो, तब मनुष्य को यह अधिकार है कि वह अपनी शांति और सुरक्षा के लिए जो आवश्यक है, वह करे. कह सकते हैं कि समाज की चूक व्यक्ति को मनमानी का अवसर देती है. यह स्थिति उत्पन्न न हो, उसके लिए समाज और उसकी सदस्य इकाइयों के बीच तालमेल आवश्यक है. व्यक्ति की अपने अधिकारों के प्रति उदासीनता समाज को निष्ठुर और व्यक्ति को आत्मलीन बनाने का काम करती है. कुल मिलाकर पारस्परिक हितों की सुरक्षा की दृष्टि से काम करना, प्रथम दृष्टया संतुलित सुझाव लगता है. किंतु गंभीरतापूर्वक विचार करने पर उसका खोखलापन, यानी इसके पीछे किसी नैतिक प्रेरणा का न होना सामने आ जाता है. यह सीधेसीधे एक सौदे जैसा है. व्यक्ति और समाज के बीच स्पष्ट लेनदेन का मामला. जिसमें व्यक्ति से कम से कम उस समय तक शांतिप्रयास की अपेक्षा की जा सकती है, जब तक दूसरे व्यक्ति भी उस काम में लगे हों. यह दर्शाता है कि सामाजिक शांति एवं सुख की स्थापना सामूहिक दायित्व है तथा व्यक्ति की सुरक्षा और स्वतंत्रता अन्योन्याश्रित है.

हाब्स के अनुसार कर्तव्य और अधिकारों परस्पर पूरक हैं. इन्हें अलगअलग देखना अनुचित है. दोनों का साथसाथ पालन करते हुए ही समाज को सुस्थिर किया जा सकता है. इसलिए किसी को तभी तक सुरक्षा का आश्वासन दो, जब तक वह आपकी सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है. प्रत्येक व्यक्ति को उस समय तक अपनी स्वतंत्रता एवं सुरक्षा का भरोसा होना चाहिए, जब तक वह दूसरों की स्वतंत्रता और सुरक्षा की प्रतिबद्ध भाव से रक्षा करता है. दूसरों की स्वतंत्रता में अवांछित हस्तक्षेप के साथ ही व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का अधिकार खो बैठता है. हाब्स के अनुसार ‘शासन में यह शक्ति होनी चाहिए कि वह शांति की स्थापना कर सके.’ इस तरह हाब्स एक ओर व्यक्ति को अपनी स्वतंत्रता और सुरक्षा की रक्षा के लिए असीमित अधिकार देता है. यहां तक कि उसके लिए राज्य की उपेक्षा करने का सुझाव भी दे जाता है. दूसरी ओर राज्य को भी असीमित अधिकारों की छूट दे देता है. उसके अनुसार जब तक कोई मूर्त्त शासन न हो, जब तक अपनी इच्छा को लागू करने की शक्ति से संपन्न कोई व्यक्ति न हो, तब तक न तो राज्य होता है, न ही समाज, प्रत्युत् एक ‘प्रधानहीन’ भीड़ होती है. उसे नियंत्रित करने के लिए शक्ति की आवश्यकता पड़ती है. हाब्स के शब्दों में, ‘बिना तलवार के समस्त प्रसंविदाएं कोरे शब्द हैं, उनमें इतनी शक्ति नहीं होती कि मनुष्य उनका पालन करने को विवश हो.’14

इससे हाब्स को निरंकुशता का समर्थक मान लेना भूल होगी. दरअसल वह राज्य एवं समाज दोनों को इतना संगठित और शक्तिशाली देखना चाहता है कि दोनों की शक्तियां, सम्मिलित विवेक एकदूसरे को संतुलित कर सकें. व्यक्तिगत रूप से वह राजतंत्र का समर्थक था. किंतु उसके प्रस्तावित राजतंत्र में प्रजा अपने अधिकारों से सर्वथा वंचित नहीं है. बल्कि वह प्रजा को इतनी संगठित, शक्तिशाली और विवेकवान देखना चाहता था कि आवश्यकता पड़ने पर राज्य को भी नियंत्रित कर सके. उसके अनुसार शक्ति केवल राज्य के हाथ में हो तो उसके निरंकुश होने की संभावना बढ़ जाती है. और राज्य निर्बल हो तो उसके अस्थिर होकर लक्ष्य से भटक जाने की संभावना बढ़ जाती है. नागरिक और प्रशासन में संतुलन के लिए समाज में शक्ति का विकेंद्रीकरण आवश्यक है. अपनी महान कृति Leviathan(The Matter) में समाज एवं राजनीति के संबंधों की गहन समीक्षा के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि—

समस्त मानवजाति शक्ति की शाश्वत एवं अविश्रांत इच्छा से प्रेरित है. इस लालसा का अंत मृत्यु के साथ ही होता है. इसका कारण यह नहीं है कि मनुष्य के पास जितनी खुशी है उससे अधिक खुशी वह चाहता है या मौजूदा शक्ति से कम में उसका काम नहीं चल सकता. इसका कारण है कि मनुष्य के पास अपनी जीविका के जितने साधन तथा शक्तियां है, उससे अधिक की लालसा रखे बगैर उसे अपनी सुरक्षा का भरोसा नहीं होता.’15

हाब्स की दृष्टि में विधि का शासन सत्ता की ओर से प्रस्तुत की गई वह इच्छा या उसकी ओर से प्रचलित ऐसे नियम हैं, जो नागरिकों को उचितअनुचित का बोध कराते हैं. विधान दो प्रकार के होते हैं. एक वह जो व्यक्ति या समुदाय द्वारा बनाए जाते हैं. हाब्स ने उन्हें नागरिक विधान कहा है. दूसरे प्राकृतिक विधान. जिनसे प्रकृति का हिस्सा होने के कारण प्रत्येक प्राणी स्वाभविक रूप से बंधा होता है. हाब्स के अनुसार प्राकृतिक विधान नागरिक विधान की अपेक्षा श्रेष्ठतर होता है. लेकिन समाज में रहते हुए केवल प्राकृतिक विधान से काम नहीं चलता. उसके लिए नागरिक विधान को भी अपनाना पड़ता है. नागरिक विधान का गठन हालांकि नागरिकों की सहमति के आधार पर होता है. लेकिन नागरिकों की सामान्य सहमति मिलने के बाद वह राज्य की इच्छा का रूप ले लेता है. जिसे राज्य शासनादेश के रूप में लागू करता है. ऐसे में प्राकृतिक विधान का केवल आलंकारिक महत्त्व रह जाता है. लेकिन प्राकृतिक विधान की कुछ खूबियां ऐसी होती हैं, जिन्हें अपनाकर कोई भी समाज सभ्य होने का दावा कर सकता है. इसी कारण उन्हें नागरिक विधान का हिस्सा बनाया जाता है, लेकिन कुछ इस प्रकार कि नागरिक विधान उनकी पवित्रता को भंग करने के बजाय उनकी सुरक्षा में खड़ा हुआ नजर आए. प्रकारांतर में नागरिक विधि में बल प्रयोग का भाव निहित है. प्राकृतिक विधान की कमजोरी है कि उसके सभी नियम समाज को आगे नहीं ले जा सकते. हाब्स का विचार था कि उपयोगितावादी दृष्टि से शासन, कोई भी शासन—निरंकुशता से बेहतर होता है. तो क्या निरंकुशता में शासन नहीं होता. बल्कि बहुत कठोर शासन होता है. वह इसलिए कामयाब होता है क्योंकि नागरिक संगठन कमजोर पड़ जाते हैं. निरंकुश शासन में नागरिक स्वयं को राज्य की इच्छा के आगे समर्पित कर देते हैं. इससे समाज का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. आधुनिक विचारक ऐसे राजनीतिक दर्शन का समर्थन करते हैं, जो समाज की सामान्य चेतना द्वारा अनुशासित हो. हाब्स हालांकि राजतंत्र का समर्थक था, लेकिन अपने दर्शन में वह समाज की सामान्य चेतना को भी पर्याप्त महत्त्व देता है. वह जो सुझाव देता है, परिवर्ती विद्वान उन्हें गणतंत्रात्मक शासन पर भी लागू करते हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ:

1. every member of the community must be assigned to the class for which he finds himself best fitted. Plato, The Republic .

2. Justice as fairness provides what we want. -John Rawls, A Theory of Justice.

3. Justice is the first virtue of social institutions, as truth is of systems of thought. -John Rawls, A Theory of Justice. pg. 3.

4. Man is the measure of all things: of the things that are, that they are, of the things that are not, that they are not.” Plato’s Theaetetus, trans. Bostock, D (1988), Oxford.

5. एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्वाद्वह्व शुच्योपि न स्त्रियः

त्री बुद्धेरस्थिरत्वाच्च दौषे श्वाश्चेऽपि तः वृताः—मनुस्मृति, 8/77.

6. A multitude bound together by a mutual recognition of rights and a mutual cooperation for the common good.”-Cicero.

7. Charity is no substitute for justice withheld. -Augustine.

8. If a man has no order within himself, then there is certainly no justice in assembly made. Augustine, City of God.

9. a judge renders to each one what belongs to him by way of command and direction, because a judge is personification of justice and sovereign is its guardian.- St Thomas Aquinas, Summa Theologica, Volume 3 (Part II, Second Section), 2013

10. the habit whereby a man renders to each one his due by a constant and perpetual will.” St Thomas Aquinas, Summa Theologica, Volume 3 (Part II, Second Section), 2013.

11. यशपाल, गांधीवाद की शव परीक्षा, विपल्व प्रकाशन, 1941

12. अनुलोमगतिनौंस्थः पश्यत्यचलं विलोमर्ग यद्वत्

अचलानि भानि तद्वत् समपश्चिमगानि लंकायाम्. आर्यभट्टीयम्, गोलापद, 9.

13. From this account of human motives Hobbes’s description of the state of man outside society follows as a matter of course. Each human being is actuated only by considerations that touch his own security or power, and other human beings are of consequence to him only as they affect this. Since individuals are roughly equal in strength and cunning, none can be secure, and their condition, so long as there is no civil power to regulate their behavior, is a “war of every man against every man.” Such a condition is inconsistent with any kind of civilization: there is no industry, navigation, cultivation of the soil, building, art, or letters, and the life of man is “solitary, poor, nasty, brutish, and short.” Equally there is neither right nor wrong, neither justice nor injustice, since the rule of life is “only that to be every man’s that he can get; and for so long, as he can keep it.”- George H. Sabine, A HISTORY OF POLITICAL THEORY, page 463.

14. Covenants, without the sword, are but words, and of no strength to secure a man at all.-Thomas Hobbes, Leviathan, chapter17.

15. I put for a general inclination of all mankind, a perpetual and restless desire of power after power, that ceaseth only in death. And the cause of this, is not always that a man hopes for a more intensive delight, than he has already attained to; or that he cannot be content with a more moderate power: but because he cannot assure the power and means to live well, which he hath present, without the acquisition of more. Thomas Hobbes, Leviathan, chapter-11.

जाति और सामाजिक गतिशीलता

सामान्य

जीवन सभी का होता है. इतिहास भी सभी का होता है. जो लोग अपने इतिहास के प्रति उदासीन होते हैं, वे लुटेरों और आक्रामकों के इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं. लेकिन तब उनकी भूमिकाएं बदल जाती हैं. लुटेरे और आक्रामक इतिहास में दयालु और देशभक्त बन जाते हैं. जबकि कमजोर और अपने इतिहास के प्रति उदासीन सीधेसादे लोग लुटेरे, बेईमान और संस्कृति के दुश्मन घोषित कर दिए जाते हैं. इसीलिए गुणीजन कहते हैं, अपना इतिहास स्वयं लिखने की आदत डालो. लिखेलिखाए इतिहास पर भरोसा मत करो. यदि उसे पढ़ना मजबूरी है तो उसके पात्रों की भूमिका को बदलकर पढ़ो. उपलब्ध इतिहास का सच जानना है तो उसकी भूमिकाएं बदलकर पढ़ो.

भारतीय समाज, विशेषकर हिंदुओं में जाति के प्रश्न बहुत पुराने हैं. यह ऐसी हकीकत है जिसके कारण हिंदू धर्म को अनेकानेक आलोचनाएं झेलनी पड़ी हैं. इसका सहारा लेकर कथित ऊंची जातियां शताब्दियों से निम्नस्थ जातियों का शोषण करती आई हैं. इस कारण कुछ आलोचक जातिप्रथा को भारतीय समाज का कलंक मानते हैं. वे गलत नहीं हैं. आज भी समाज में जो भारी असमानता और ऊंचनीच है, आदमीआदमी के बीच गहरा भेदभाव हैजाति उसका बड़ा कारण है. समाजार्थिक समानता के लक्ष्य की यह आज भी सबसे बड़ी बाधा है. जातीय उत्पीड़न के शिकार समाज के दोतिहाई से अधिक लोग, निरंतर इसकी जकड़बंदी से बाहर आने को छटपटाते रहे हैं. यदाकदा उन्हें आंशिक सफलता भी मिली है. मगर आत्मविश्वास की कमी और बौद्धिक दासता की मनःस्थिति उन्हें बारबार कथित ऊंची जातियों का वर्चस्व स्वीकारने को बाध्य करती रही है. भारतीय समाज में जातिविधान इतना अधिक प्रभावकारी है कि सिख और इस्लाम जैसे धर्म भी, जिनमें जाति के लिए सिद्धांततः कोई स्थान नहीं हैइसके प्रभाव से अछूते नहीं हैं. इनमें सिख धर्म का तो जन्म ही जाति और धर्म पर आधारित विषमताओं के प्रतिकारस्वरूप हुआ था, जबकि इस्लाम की बुनियाद बराबरी और भाईचारे पर रखी गई थी. भारत में आने के बाद इस्लाम पर भी जातिभेद का रंग चढ़ चुका है.

जाति आधारित विभाजन पूरी तरह अमानवीय है. यह मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता में अवरोध उत्पन्न करता है. जाति और वर्ण की संकल्पना सामान्य मनोविज्ञान के भी विपरीत है, जिसके अनुसार जन्म के समय सभी शिशु एक समान होते हैं. उनका मस्तिष्क कोरी सलेट जैसा होता है. एकदम साफ. इबारत उसपर बाद में लिखी जाती है. ब्राह्मण और शूद्र के शिशुओं को यदि एक साथ, एक ही जंगल में छोड़ दिया जाए और उनसे किसी भी प्रकार का संपर्क न रखा जाए; तो समान अवधि के उपरांत दोनों की बौद्धिक परिपक्वता का स्तर लगभग एकसमान होगा. जो भी अंतर होगा, उसके पीछे उनकी देहयष्टि का योगदान होगा. लगभग वैसा ही विकास जैसा पशुओं और वन्य प्राणियों में दिखाई पड़ता है. जाहिर है मनुष्य अपने गुणकर्म और प्रवृत्तियां समाज में रहते हुए ग्रहण करता है. जातिव्यवस्था के अनुसार मान लिया जाता है कि फलां शिशु ‘पंडित’ के घर में जन्मा है, इसलिए उसमें जन्मजात पांडित्य है. जबकि शूद्र के घर में जन्म लेने वाले शिशु सामान्य बुद्धिविवेक से भी वंचित मान लिए जाते हैं. इसलिए उनका काम बताया जाता हैविप्र वर्ग की सेवा करना, उनकी चाकरी करते हुए जीवन बिताना. यह थोपी हुई दासता है, परंतु हिंदू परंपरा में इसे धर्म बताया गया है. बिना कोई शंका किए, चुपचाप परंपरानुसरण करते जाने को पुरुषार्थ की संज्ञा दी जाती रही है. इस तरह जो धर्म बुद्धिमत्तापूर्ण व्यवहार की अपेक्षा के साथ ब्राह्मण को शीर्ष पर रखता है, और प्रकांतर में मानवीय विवेक का सम्मान करता हैव्यवस्था बनते ही समाज के अस्सी प्रतिशत लोगों से बौद्धिक हस्तक्षेप और पसंदों का अधिकार छीनकर, पूरे समाज को नए ज्ञान का विरोधी बना देता है. हिंदू धर्म की यही विडंबना समयसमय पर उसके बौद्धिक एवं राजनीतिक पराभव का कारण बनी है. आज भी समाज में जो भारी असमानता और असंतोष है, उसके मूल में भी जाति ही है. जाति का लाभ उठा रहे वर्गों और जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे लोगों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि संस्कृति को लेकर जरासी बहस भी चले तो जनता का बड़ा हिस्सा उसपर संदेह करने लगता है. इससे कई बार धार्मिकसांस्कृतिक सुधारवादी आंदोलन भी खटाई में पड़ जाते हैं.

वैसे भी पांडित्य, चिंतनमनन और स्वाध्याय की उपलब्धि होता है. वह न तो बैठेठाले आ सकता है, न ही व्यक्ति का जन्मजात गुण हो सकता है. कथित दैवी अनुकंपा भी जड़बुद्धि व्यक्ति को पंडित नहीं बना सकती. दूसरी ओर जाति है कि उसके माध्यम से एक वर्ग जन्मजात पांडित्य के दावे के साथ हाजिर होता है तो दूसरा वर्ग ‘शासक’ के रूप में. फिर निहित स्वार्थ के लिए ये दोनों वर्ग संगठित होकर शेष समाज के लिए शोषक की भूमिका में आ जाते हैं. ‘पांडित्य’ को यदि ज्ञान का पर्याय भी मान लिया जाए तो वह स्वाभाविक रूप से व्यवहार का विषय होगा, अनुभव का विषय होगा, प्रदर्शन की वस्तु वह हरगिज नहीं हो सकता. यदि हम प्राचीन पुराणों और टीकाओं की बात करें तो उनमें दर्शित ज्ञान प्रदर्शन और महिमामंडन से आगे नहीं बढ़ पाता. पूरी की पूरी ब्राह्मण मेधा, कुछ अपवादों को छोड़कर, देवताओं के नखसिख वर्णन और उनके छलप्रपंच भरे काल्पनिक विजय अभियानों के बखान में लगी रहती है. मनुष्य का अस्तित्व, जिसने विषम परिस्थितियों से जूझकर, आपदाओं से निरंतर संघर्ष करते हुए इस धरती को रहने लायक बनाया है, इन ग्रंथों में बस एक दास जितना है. उपनिषदों में अवश्य कुछ श्रेष्ठ, श्रेष्ठतर और श्रेष्ठतम है, मगर उनमें भी जबरदस्त दोहराव है. बाकी सब आत्मरति और मनःरंजन का विषय तो हो सकता है. समाज का वास्तविक हित उससे सध ही नहीं सकता. इस वास्तविकता को जातिव्यवस्था के शीर्ष पर मौजूद लोग जानते जरूर थे, मगर निहित स्वार्थ की खातिर सत्य की ओर से मुंह फेरे रहते थे. उन्होंने शूद्रों के लिए धर्मग्रंथों का अध्ययन केवल इसलिए निषिद्ध नहीं किया कि वे उन्हें अपात्र मानते थे. डर यह भी था कि शूद्र यदि वेदादि धर्मग्रंथ पढे़ंगे तो उनमें दर्ज देवों की सत्ता लोलुपता, वासनाएं, साधारण सम्राट की तरह किए गए छलप्रपंच पर विमर्श करने का अधिकार भी उन्हें मिल जाएगा. क्योंकि धर्म और शास्त्र के नाम पर मनमानी तभी तक चल सकती है, जब तक सामनेवाला अनपढ़ हो, या उसे जानबूझकर अनपढ़ रखा गया हो. जब व्यक्ति जानने लगता है तो सवाल भी उठाने लगता है. संभवतः वे भूल गए थे कि नदी की तरह विचार भी निरंतर गतिशील रहने पर ही शुद्ध रह पाते हैं. ठहराव आते ही उनमें अशुद्धियां पनपने लगती हैं. आलोचना, विमर्श न हो तो परंपरा के नाम पर आडंबरों को खुली छूट मिल जाती है. जाति, धर्म और संस्कृति के नाम पर इस देश में यही हुआ. आड़ंबरपूर्ण शास्त्रीयता धीरेधीरे सभ्यता और संस्कृति के पाखंड में ढलती चली गई. ऐसा नहीं कि इसका विरोध नहीं हुआ. आडंबरवाद को प्रत्येक युग में लताड़ा गया, किंतु सत्ता के शिखर पर मौजूद लोग विरोध को हमेशा नजरंदाज करते रहे. विरोध में रचे गए साहित्य और कलाओं को पुराने जमाने के ‘गजनवियों’ द्वारा निमर्मतापूर्वक मिटाया जाता रहा.

कुछ देर के लिए यदि मान भी लिया जाए कि वर्णविभाजन तत्कालीन समाज में कार्यविभाजन के लिए आवश्यक था. हमारे पूर्वजों ने समाज की आवश्यकताओं, सुख एवं संसाधनों की वृद्धि हेतु बड़े ही बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से उसे चार वर्णों में विभाजित किया था. उनका ध्येय समाज के संपूर्ण सुख एवं संसाधनों में वृद्धि करना था. दूसरे शब्दों में जाति और वर्ण को यदि कार्यविभाजन की बेहतरीन पद्धति मान लिया जाए तो उन्हें अर्थशास्त्र का विषय होना चाहिए था. धर्म और संस्कृति का हिस्सा बनाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता. यदि यह कहा जाए कि प्राचीनकाल में सभी कुछ धर्म और संस्कृति का हिस्सा था….कि ‘अर्थशास्त्र’ में अर्थनीति, राजनीति, व्यवहारशास्त्र आदि सभी कुछ हैतो भी जातीयता की संकल्पना के चारपांच हजार वर्षों में उसपर कभी तो अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से विचार किया जाना था? आकलन किया जाता कि कार्यविभाजन की उस परंपरागत भारतीय प्रणाली की समसामयिक उपयोगिता कैसी और कितनी है? निष्पक्ष समीक्षा के बाद ही उन्हें बनाए रखने या हटाने का निर्णय लेना चाहिए था. जैसे यूनान में हुआ था. प्लेटो ने मनुष्यों को स्वर्ण, रजत और लौह वर्गों में बांटा था. उसने जन्म को उसके लिए आधार नहीं बनाया था. उसके द्वारा किए गए वर्गीकरण का आधार व्यक्ति के अपने गुण और प्रवृत्तियां थीं. तो भी अरस्तु को अपने गुरु का यह विचार जमा नहीं. उसने यह मानते हुए कि मानवव्यक्तित्व जटिल रचना है, और उसका इस तरह सरलीकरण नहीं किया जाना चाहिए, प्लेटो द्वारा किए गए वर्गीकरण को अनुपयुक्त मानकर उसे आधी शताब्दी से भी कम समय में नकार दिया था. भारत में ऐसा नहीं हुआ. इसलिए नहीं हुआ क्योंकि उस अवैज्ञानिक कार्यविभाजन को शिखरस्थ वर्गों का समर्थन प्राप्त था. सत्ताधारी वर्गों के स्वार्थ उससे जुड़े थे. उसके बहाने वे समाज के अधिकांश संसाधनों पर कब्जा जमाए रखते थे. इसलिए एक के बाद एक स्मृतिग्रंथ वर्णव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए रचे गए. सांस्कृतिक वैविध्य के मुखौटे में जातीय भेदभाव को बचाया गया.

गौरतलब है कि कार्यविभाजन समाज की आवश्यकता है. मनुष्य की अनेकानेक भौतिकअभौतिक आवश्यकताएं उससे जुड़ी होती हैं. इसलिए वही कार्यविभाजन श्रेष्ठ माना जाता है, जो मनुष्य की अधिकतम उत्पादकता को सामने लाए और जरूरत पड़ने पर उसमें सुधार भी कर सके. उत्पादकता के आकलन के नियम आज के नहीं है. कम से कम दो शताब्दियों से तो उनपर खुलकर विचार किया जा रहा है. जातिव्यवस्था उनके आगे कहीं नहीं टिकती. इसलिए वह आधुनिक विमर्श से बाहर है. केवल चलन में है. वह भी इसलिए कि जो वर्ग इससे लाभान्वित हैं, वे इसे छोड़ना नहीं चाहते. प्रत्यक्ष या परोक्ष हठ के द्वारा इसे अपनाए हुए हैं. अच्छा होता जातिव्यवस्था का मूल्यांकन भी व्यक्ति की सामाजिकआर्थिक और भौतिक जरूरतों के आधार पर किया जाता. यदि ऐसा होता तो उसकी परिभाषाओं पर बहस होती. उसकी समाजेतिहासिकता को बहुत पहले विमर्श में शामिल किया जाता. तब उन विसंगतियों से बचा जा सकता था, जो वर्ण के जाति में रूढ़ होने के साथसाथ जन्मीं और लगातार बढ़ती गईं. मगर भारत में कार्य(वर्ण) विभाजन को सामाजिकसांस्कृतिक सवाल बनाकर जानबूझकर समीक्षा से काट दिया. नतीजा यह हुआ कि जाति और वर्ण को लेकर पूरा समाज दो हिस्सों में बंट गया. एक वे जो उसका समर्थन करते हैं, दूसरे वे जो शताब्दियों तक जातीय शोषण का शिकार रहने के बाद आज उससे नफरत करते हैं. संख्या जातिव्यवस्था के आलोचकों की अधिक और निर्णायक है. लोकतांत्रिक दौर में विचार बहुमत को प्रभावित ही नहीं करते, उससे प्रभावित भी होते हैं, इसलिए जातिसमर्थकों के स्वर दबेदबे होते हैं. चूंकि मन से वे जातिभेद के समर्थक हैं तथा किसी न किसी रूप में उससे लाभान्वित भी हैं, इसलिए उनका अपना जीवन और चिंतन अंतर्विरोधों से भरा होता है. समाज का यह वर्ग आज भी जाति को अपनी अस्मिता का पर्याय समझता है; और वह चाहता है कि दूसरे वर्ग भी जाति की मर्यादाओं को समझें, इसलिए उन वर्गों के पास जो जातिअनुक्रम में निचले स्तर पर हैं, सीधे विरोध के अलावा और कोई रास्ता रह ही नहीं जाता. यह विरोध कभी धर्मांतरण के रूप में सामने आता है तो कभी जातीय संघर्ष के रूप में.

सवाल है कि चौतरफा विरोध और आलोचनाओं के बावजूद जाति जीवित क्यों है? विरोधों में डटे रहने की खुराक उसे कहां से मिलती है? प्रश्न भले ही नए लगें, इनका उत्तर अनजाना नहीं है. जैसा ऊपर कहा गया है, जाति यदि सचमुच कार्यविभाजन की जरूरत होती तो वह अर्थशास्त्र के विमर्श का विषय भी होती; या देरसवेर अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से उसकी समीक्षा की जाती. उस अवस्था में उसे बहुत पहले अप्रासंगिक मान लिया गया होता. मगर ऐसा कभी नहीं किया गया. इसलिए कि वह कार्यविभाजन की प्रणाली थी ही नहीं. असल में वह अभिजन हितों की सुरक्षा के लिए की गई असमानताकारी और स्वार्थपरक व्यवस्था थी, जिसमें शक्तिशाली वर्ग केवल अपनी जरूरतों के हिसाब से लोगों को अलगअलग पेशे में बांट रहे थे. फिर जैसेजैसे उस वर्ग की जरूरतें बढ़ी, जातियों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी होती गई. वह एक चालाकीभरा कदम था. उन अनेक कदमों में से एक जिन्हें अभिजन वर्ग शेष समाज पर अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए उठाता है. आर्थिकसामाजिक असमानता से ग्रस्त समाजों में मुट्ठीभर अभिजन सत्ताप्रतिष्ठानों पर कब्जा जमाए होते हैं. बाकी जनसमाज उनसे कहीं अधिक शक्तिशाली होने के बावजूद, बंटा होने के कारण अपनी वास्तविक शक्ति से अपरिचित होता है. शीर्षस्थ अभिजन उसे छोटेछोटे वर्गों में बांटकर उसकी प्रभावी शक्ति को कमजोर कर देते हैं, और उस बंटी हुई शक्ति को अपने हितों की सुरक्षा के लिए काम में लाते हैं. इससे गैरअभिजन वर्ग की शक्तियां अपने ही समूहों से टकराकर जाया होती रहती हैं. बंटा हुआ जनसमाज अपने ही सदस्यों पर संदेह करना है. चूंकि उत्पादकता के अधिकांश संसाधनों पर अभिजन समुदाय का अधिकार होता है, इसलिए रोजीरोटी की मजबूरियां भी गैरअभिजन समाज को अभिजनों के आदेशानुपालन हेतु विवश करती हैं. इस काम में धर्म और संस्कृति मददगार बनते हैं. अतः इस प्रश्न के उत्तर में कि जाति को विरोधों के बीच डटे रहने की खुराक कहां से मिलती है, विश्वासपूर्वक कहा जा सकता हैधर्म और संस्कृति से.

ऋग्वेद का पुरुषसूक्त जातिभेदवर्गभेद का बीजमंत्र है. उसमें लिखा है कि ब्राह्मण, ब्रह्मा के मुख से, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य उदर से तथा शूद्र उसके पैरों से जन्मे हैंꟷ‘ब्राह्मणोऽस्य मुखामासीद्वाहू राजन्यः कृतः. ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत.’ ब्रह्मा यहां समाज का प्रतीक हैं. इसका लक्ष्यार्थ है कि समाज में ज्ञान, व्यापार तथा सेवाकर्म चार प्रमुख अंग होते हैं. रूपक के चयन में भी चतुराई देखी जा सकती है. यदि सीधेसीधे कार्यविभाजन किया जाता तो देरसवेर लोगों का ध्यान उसके औचित्य पर भी जाता. ऐसा न हो इसलिए अभिजन वैदिक मनीषियों ने उसे सांस्कृतिक रूपक के माध्यम से प्रस्तुत किया था. ताकि उसको आस्था और विश्वास की साम्रगी के रूप में देखा जाए. आलंकारिक भाषा केवल कविता में ही फबती है. बौद्धिक विमर्श को उससे दूर रखने की सलाह दी जाती है. दरअसल मिथकों और बिंबों की विशेषता होती है कि उन्हें सामान्य विवेक के सहारे मनचाहा आकार दिया जा सकता है. वे सर्वसाधाराण की चेतना का हिस्सा भले हों, मगर समयसमय पर उनकी ऐसी व्याख्याएं होती रहती हैं जो उनकी मूल संकल्पना से एकदम अलग होती हैं. जैसे इंद्र का मिथक. वह एक ओर देवराज है. दूसरी ओर देवताओं में ही सबसे बड़ा खलनायक. गिरे हुए चरित्र का स्वामी, जिसे अपने सिंहासन के खिसकने का भय हमेशा सताता रहता है. इसकी प्रतीकात्मकता को देखें तो सत्ता छिन जाने का भय केवल इंद्र का भय नहीं था. यह हर उस राजा का डर हो सकता है, जो प्रजा कल्याण से दूर, केवल भोगविलास में लिप्त रहता है. बावजूद इसके देवराज इंद्र के मिथक के जरिये उस ओर हमारा ध्यान नहीं जाता. इसलिए कि वह भौतिक जगत का न होकर, सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा है; और संस्कृति को प्रायः आस्था और विश्वास का विषय माना जाता है. इंद्र उन देवताओं का सम्राट है जिन्हें मत्र्य जीवन के कष्टों का सामना नहीं करना पड़ता. मिथकों के विरूपण या उनकी नवव्याख्याओं के पीछे सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही प्रकार के दृष्टिकोण हो सकते हैं. कुल मिलाकर मिथक उससे अपने परंपरागत संदर्भों से कट सकता है. अतएव मिथक को यथार्थ मानना, ‘ईश्वर की मूर्ति है, इसलिए ईश्वर भी है’जैसा ही भ्रांत धारणा है. इसके बावजूद परंपरावादियों का जातीय विभाजन को लेकर ब्रह्मा के मिथक में विश्वास आज भी बना हुआ है. गीता में कृष्ण स्वयं को विराट पुरुष के रूप में पेश कर, वर्णभेद की इसी संकल्पना को आगे बढ़ाते हैंꟷ‘चातुर्वर्णमरूपक मयास्रष्ठं गुणकर्म विभागभ्य’….‘मैंने चार प्रकार के मनुष्यों की रचना की है. उनके गुण, स्वभाव के आधार पर उन्हें वर्णों में विभाजित किया है.’ दबे स्वर में ही सही, परंपरावादी आज भी इन घिसेपिटे तर्कों को आगे बढ़ाकर असमानताकारी जातिव्यवस्था के पोषण में लगे रहते हैं.

कुछ विद्वानों के अनुसार पुरुषसूक्त ऋग्वेद का प्रक्षेपित हिस्सा है. इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता. ऋग्वेद आर्यों की कई शताब्दियों की यादों को समेटे हुए है. उसका आरंभिक हिस्सा तब का है जब आर्य भारतभूमि पर पांव जमाने का प्रयास ही कर रहे थे. उस समय तक वर्णव्यवस्था इतनी जटिल नहीं हुई थी. वैसे भी ब्रह्मा प्राचीनतम देवता नहीं है. भारत में शिव और बाकी सभ्यताओं में सूर्य प्राचीनतम देवता रहे हैं. आरंभ में शूद्र राजन्य और ब्राह्मण केवल तीन वर्ण थे. इसके साथ ही ऋक्, यर्जु, साम तीन वेद. वेद त्रयी और वर्णत्रयी का साम्य था. कालांतर में जब शूद्रों के एक वर्ग ने स्वयं को आर्थिक रूप से संपन्न कर लिया तो उसकी उपेक्षा कर पाना असंभव हो गया. चौथे वर्ग की कल्पना करनी पड़ी. यजुर्वेद में वैश्य और क्षत्रियों को सजातीय कहा गया है. इसलिए जब तक वेद तीन रहे, तब तक तीन वर्ण भी मान्य रहे होंगे. कालांतर में चौथे वर्ण को मान्यता मिली तो अथर्ववेद के रूप में चौथे वेद को भी स्वीकार किया जाने लगा. हालांकि इनमें पहले क्या हुआ? पहले चौथे वर्ण को मान्यता मिली या चौथे वेद को यह शोध का विषय है. कल्पना की जा सकती है कि दोनों का समय आसपास का रहा होगा. ऐसे में परमपुरुष की अवधारणा; यानी पुरुष सूक्त की रचना ईसा से पांच से आठ सौ वर्ष पहले तक की हो सकती है.

आरंभ में वर्ण इतने रूढ नहीं थे. आरंभिक ग्रंथों में अनुलोम और विलोम दोनों ही प्रकार के अंतरण के उदाहरण मिलते हैं. यह अंतरण तत्कालीन परिस्थितियों में जब आर्य और मूल निवासी घुलनेमिलने की कोशिश में थे, स्वाभाविक था. आर्यों ने भारत भूमि पर आक्रामक के रूप में प्रवेश किया. वे यहां पहले से रह रहे मूल निवासियों की अपेक्षा निपुण लड़ाके, रणकौशल में पारंगत थे. उत्तरी एशिया से भारत तक पहुंचने में उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. उनकी अपेक्षा इस देश के मूल निवासी शांतिप्रिय और अपने संतोष के साथ जीवन जीने वाले थे. मूल निवासी अनेक कबीलों में बंटे थे, किंतु लंबे समय तक साथ रहने के बाद वे सहअस्तित्व की कला में निपुण होने लगे थे. धर्मशास्त्रों में देवासुर संग्राम के अनेक उल्लेख हैं, मगर ऐसा कोई उल्लेख नहीं है जो दैत्यों के आपसी वैमनस्य को दर्शाता हो. बहरहाल एक लंबी संघर्षपूर्ण यात्रा के अनुभव के बाद आर्यों का कुशल रणनीतिकार के रूप में उभरना स्वाभाविक था. बावजूद इसके भारत के मूल निवासियों को अपने साथ जोड़ना, उनपर अपना सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करना आसान नहीं था. हड़प्पा और मोनजोदाड़ो से प्राप्त अवशेष बताते हैं कि भारतीय मूल निवासी एक समृद्ध संस्कृति के वासी थे. कदाचित उनकी समृद्धि ही आर्यों को मध्यएशिया से भारत तक खींच कर लाई थी. यात्रा के दौरान आर्यों ने जहां आवश्यक समझा, वहां युद्ध किया. जहां लगा कि युद्ध के माध्यम से ऐच्छिक परिणाम तक पहुंचना असंभव है, वहां उन्होंने युद्धेत्तर नीतियों का सहारा लिया.

उदाहरण के लिए शिव भारत की आदिम जातियों के आराध्य थे. उनका सभी समूहों पर प्रभाव था. मूल निवासी कबीलों को प्रसन्न करने के लिए शिव को प्रसन्न करना अनिवार्य था. इसके लिए आर्यों ने उनके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए. उन्हें महादेव की पदवी दी. पार्वती आर्य सम्राट हिमवान की पुत्री थी. शिव को अपना जामाता बना लेने के बाद आर्यों की मुश्किलें आसान होने लगीं. शिव का स्थानीय कबीलों के सर्वमान्य मुखिया थे. मिलीजुली सभ्यता की खातिर उन्होंने आर्यों तथा प्राचीन कबीलों के मध्यस्थ का काम किया. शिव के सहयोगी के रूप में भूत, पिशाच, प्रेत आदि को हम भारत के आदिम कबीलों के प्रतीक के रूप में देख सकते हैं. चतुराईपूर्वक आर्यों ने शिव को तो अपनाया, उन्हें अपने आराध्य और ‘महादेव’ का दर्जा दिया. अपनी प्रवृत्ति के अनुसार उनसे हितसाधन किया. लेकिन शिव के सहयोगी भारत की प्राचीन कबीलों को, जिनके वे नेता और आराध्य थे, पूरी तरह उपेक्षा की. उन्हें असभ्य मानते हुए भूत, प्रेत, कापालिक आदि कहा गया. नतीजा यह हुआ कि शिव का तो दैवीकरण हुआ, किंतु उनके सहयोगी कबीलों की पूरी तरह उपेक्षा हुई. उन्हें ऐसा ही दर्शाया जैसा विकसित सभ्यता पर गर्वाए सत्ताधीश करते हैं. बख्शा शिव को भी नहीं गया. उन्हें आक, धतूरा खाने वाला, भभूत लगाकर रमने वाले अवधूत की तरह दर्शाया गया. इससे सृष्टि को चलाने की जिम्मेदारी ‘ब्राह्मण ब्रह्मा’ तथा उसके सहयोगी ‘क्षत्रिय विष्णु’ पर आ गई. इसके बावजूद एक डर उनके मन में हमेशा बना रहा. उस डर ने ही शिव को मृत्यु के देवता का पद देने को बाध्य किया. शिव की तीसरी आंख दरअसल जनसंस्कृति के वाहक उन कबीलों की सम्मिलित ताकत और विद्रोह शक्ति का प्रतीक है, जिन्हें भूत, प्रेत, कापालिक आदि कहा जाता है और जिनके मुखिया शिव थे. किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसकी जनता में निहित होती है. राज्य केवल उसका प्रतीक होता है. जनता यदि कुपित हो जाए तो बड़ी से बड़ी सामरिक शक्ति को मिट्टी में मिला सकता है. चूंकि शिव के पीछे कबीलों की शक्ति थी, इसलिए उन्हें महादेव, मृत्यु का देवता जैसा पद दिया गया. उनकी तीसरी आंख खुलने का अभिप्राय था, समर्थक कबीलों के साथ विद्रोह पर उतर आना, जिनसे अल्पसंख्यक अभिजात तथा उनके कथित देवता भय खाते थे.

महाकाव्य काल में ही वर्ण जातियों में ढलने लगे थे. व्यक्ति के अपने कौशल का कोई महत्त्व नहीं रह गया था. कर्ण और एकलव्य ऐसे ही उदाहरण हैं. जो उस समय की व्यवस्था के अनुसार क्षत्रिय नहीं थे. लेकिन दोनों ने ही स्वयं को धनुर्विद्या में अत्यंत निपुण बना लिया था. महाभारत युद्ध में दुर्योधन के पक्ष में होने के बावजूद कर्ण को बारबार आहत और अपमानित होना पड़ता है. वहीं एकलव्य के वाणकौशल से विस्मित द्रोणाचार्य उसका अंगूठा ही मांग लेता है. हालांकि इस युग तक जाति को रूढ बनाने का विरोध भी जारी रहा. लोग जातिविहीन सभ्यता की याद भी दिलाते रहते थे, जैसे महाभारत के शांतिपर्व में कहा गयाꟷ‘असलियत में वर्णविभाजन जैसी कोई चीज नहीं है. यह पूरी सृष्टि ब्रह्म है, क्योंकि इसे ब्रह्मा ने बनाया है.’ इस प्रसंग की यदि एकलव्य और कर्ण के प्रकरण से तुलना की जाए तो उस सभ्यता के विरोधाभास सामने आने लगते हैं. लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि ‘जय’ से ‘विजय’, ‘विजय’ से ‘भारत’ और फिर ‘महाभारत’ तक की यात्रा अनेक विरोधाभासों से भरी है. इसलिए कि हर मनीषी ने सत्य को अपनी तरह से देखा और उसे प्रक्षेपण का हिस्सा बना दिया.

बाद के धर्मग्रंथों में रक्तशुद्धता एवं कुलीनता पर काफी जोर दिया गया, लेकिन आरंभ में ऐसा न था. आर्यों के आगमन के साथ ही उनका यहां रह रही प्राचीन जातियों के साथ सम्मिलन शुरू हो चुका था. भारत में आर्यों का आगमन एक समूह में नहीं रहा. वे अनेक बार टुकड़ोंटुकड़ों में आए थे. इस बात की प्रबल संभावना है कि जो आरंभिक कबीले भारत तक पहुंचे हों उनमें स्त्री सदस्यों की संख्या आनुपातिक रूप से कम रही हो; या हो सकता है कि लंबी यात्रा के पश्चात भारत तक पहुंचने में उनका लिंगानुपात गड़बड़ा गया हो. इसलिए आरंभ में ही हम अंतवर्गीय संबंधों की बहुलता देखते हैं. व्यवस्था की गई कि स्त्री किसी भी वर्ग की हो, उससे उत्पन्न संतान पिता के गौत्र की होगी. मनुस्मृति में कहा गया, ‘वैध दांपत्य में बंधने के बाद स्त्री अपने पति के वर्ण में सम्मिलित हो जाती है, ठीक ऐसे ही जैसे नदी सागर में मिलकर उसके गुणों को धारण कर लेती है.’(मनुस्मृति 9/22). उदाहरण कई हैं. वशिष्ट की पत्नी अक्षमाला निम्न जाति की स्त्री थी. इसी प्रकार सारंग मुनि की पत्नी भी निम्न वर्ण से आती थी. भविष्य पुराण के अनुसार शृंग ऋषि हरिणी के गर्भ से उत्पन्न थे. पराशर चांडाल स्त्री की संतान हैं, व्यास केवट पुत्री मत्स्यगंधा की. वशिष्ट वेश्या के गर्भ से जन्मते हैं. अपनी लग्न और प्रतिभा के बल पर वे ब्राह्मण बनते हैं. भिन्न वर्णों के बीच विवाह सामान्य थे. क्षत्रिय सम्राट ययाति की एक पत्नी देवयानी ब्राह्मणसुता थी, दूसरी असुर राज की बेटी. बाद में रक्त शुद्धता की अवधारणा विकसित होने पर, आर्यों ने प्राचीन अंतर्जातीय संबंधों को वैध बनाने अथवा चमत्कार सिद्ध करने के लिए उन्हें मिथकीय आख्यानों का हिस्सा बना लिया. लोग उन दिनों चमत्कार पर भरोसा भी खूब करते थे. यदि आकस्मिक रूप से कुछ हो जाए तो उसे दैवी कृपा मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेते थे. इसके फलस्वरूप लोकमहत्त्व के विभिन्न मुद्दों को लेकर ब्राह्मणवादी नजरिये से कहानियां गढ़ी जाने लगीं.

अपनी प्रतिभा और लगन के बल पर दूसरे वर्ग में अंतरण के भी अनेक उदाहरण धर्मग्रंथों में उपलब्ध हैं. विश्वामित्र के क्षत्रिय कुल से ब्राह्मण वर्ग में दाखिल होने का किस्सा तो जानापहचाना है. क्षत्रिय दिवोदास का पुत्र मैत्रेय ब्राह्मण बनता है. हरिवंश पुराण के अनुसार वैश्य पुत्र नाभाग और अरिष्ट ब्राह्मण कुल में शामिल होते हैं. वर्णअंतरण को लेकर सत्यकाम जाबाल का किस्सा भी खूब चर्चित है. सत्यकाम दासीपुत्र था. उसने गुरु की शरण में जाकर शिक्षा लेने की इच्छा व्यक्त की तो गुरु ने उसका नाम, गौत्र आदि पूछा. सत्यकाम ने घर आकर यही प्रश्न अपनी मां से किया. तब मां ने बताया, ‘पुत्र, दासी होने के कारण मुझे अनेक घरों में काम के लिए जाना पड़ता है. एक घर से दूसरे घर की यात्रा के दौरान तू कब मेरे गर्भ में आ गया, मुझे नहीं पता. तू सत्यकाम है. मेरा नाम जाबाला है. सो तू सत्यकाम जाबाल हुआ.’ सत्यकाम यही बात गुरु से बता देता है. गुरु उसके सत्यवाचन से प्रसन्न होकर दीक्षा देने के लिए तैयार हो जाते हैं. यही सत्यकाम जाबाल आगे चलकर वेदमंत्रों के रचियता के रूप में उभरता है.

जाति प्रथा चलते ही यह संभव हुआ कि पंडित के घर पंडितजी जन्म लेने लगे. यदि सबकुछ बिना किए जन्म ही से प्राप्त है तो कुछ और पाने के लिए गुणवत्ता को क्यों बढ़ाया जाए! इसलिए तप और स्वाध्याय का अभिप्राय रामराम जपने तक सिमट गया और अध्यापन कर्मकांड तक. लोग सोलह पृष्ठ की पंजिका पढ़कर ‘पंडित’ कहलाने लगे. बिना ‘सत्य’ और ‘सत्यनारायण’ वाली ‘सत्यनारायण की कथा’ घरघर बंचीबंचवाई जाने लगी. उन कहानियों में आदमी की पहचान जाति से जुड़ी थी. जानते सब थे कि जन्म आधारित वर्गीकरण मनुष्य के मूल स्वभाव के विरुद्ध है. दो व्यक्ति कभीभी पूरी तरह से एक हो ही नहीं सकते. इसलिए किसी एक की परिस्थितियों पर विचार कर हूहू वही निर्णय दूसरे के लिए नहीं लिया जा सकता. चूंकि यह मनुष्य की प्रवृत्ति के विरुद्ध है, समाजीकरण की धारा के विरुद्ध है, इसलिए व्यक्ति केवल परंपराएं ढोता रहा. समाज जड़ और लोग यथास्थितिवादी बन गए. जाति ने लोगों से उनका विवेक, चयन का अधिकार छीनकर उन्हें एक नशा थमा दिया. बिना कुछ किएधरे खास होने का नशा. जाति आधारित विभाजन की खूबी है कि उसमें हर कोई खास होता है. हालांकि खासियत के लिए उसका अपना कोई योगदान नहीं होता. बस अपनी लकीर के बराबर में मनमाफिक थोड़ी छोटी लकीर खींच लेता है. इसलिए कि वह जातीय पायदान पर अपने से नीचे के किसी कम खास की उपस्थिति मानकर मन को तसल्ली देने लगता है. दूसरा चाहे उसका विरोध करे, और विरोध होता ही है, फिर भी वह खुद को ‘अपने मुंह मिंया मिट्ठू’ बनने से रोक नहीं पाता. चूंकि जाति पर उसका जोर नहीं चलता, इसलिए जिस जाति वर्ग में वह जन्म लेता है, उसे अपनी नियति मानकर जीवन से समझौता किए रहता है. इससे भाग्यवाद और नियतिवाद को बढ़ावा मिलता है, जो परिवर्तनकामी आंदोलनों की आंच पर राख डालते रहने का काम करता है.

विद्वानों ने जातिप्रथा की आलोचना की. कहा कि जाति ऐसी व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति अपनी मर्जी से शामिल नहीं होता. जन्म व्यक्ति की जाति निर्धारित करता है, फिर मनुष्य मृत्युपर्यंत उसके चंगुल से निकल नहीं पाता. दूसरे शब्दों में जाति व्यक्ति की नैसर्गिक स्वतंत्रता का हनन करती है. यह कार्यविभाजन की असमानताकारी निकृष्ट शैली है. यह व्यक्ति के चयन के अधिकार को बाधित करती है. जन्मना जाति मनुष्य का कुदरत के नाम पर लगाया गया बदसूरत ठप्पा है, जो मनुष्यता का अवमूल्यन करता है. कहीं आनेजाने, पेशा बदल देने से व्यक्ति की जाति में कोई बदलाव नहीं आता. फिर भी कुछ विद्वान जाति के जड़ स्वभाव के कारण ही उसे पसंद करते रहे. जाति उनके द्वारा भारतीय समाज और संस्कृति के महिमामंडन का कारण बनी. उनमें प्रायः वही लोग थे, जो समाज के शीर्ष पर विराजमान, समस्त संसाधनों पर कुंडली मारे नजर आते हैं. समयसमय पर ऐसे कार्यकर्ता और विद्वान भी हुए हैं जिन्होंने जाति प्रथा का जमकर विरोध किया. जाति और जन्म के आधार पर पक्षपात करनेवालों को बुरी तरह से लताड़ा. समयसमय पर जातिविरोधी आंदोलन चले. कह सकते हैं जाति का जब से जन्म हुआ, जब से उसने समाज को जकड़ना आरंभ किया, तभी से उसपर हमले आरंभ हो चुके थे.

ज्ञात इतिहास में जाति प्रथा को सबसे पहली चुनौती गौतम बुद्ध ने दी थी. उन्होंने भिक्षु संघ की स्थापना की, जिसमें जाति संबंधी किसी भी प्रकार का पक्षपात न था. मध्यकाल में संत कवियों ने जाति को भारतीय समाज का कलंक मानते हुए जन्म के आधार पर आदमीआदमी में भेद करने वालों को धिक्कारा. तीखे शब्दों में उनकी आलोचना कीꟷ‘जो तू कहे बाहमन का जाया, और मार्ग ने क्यों न आया.’(कबीर). बावजूद इसके जाति का बाल भी बांका न हुआ. इसलिए कि बहुत पहले से इसे रोजीरोटी से जोड़ दिया गया था. उस व्यवस्था में समस्त संसाधनों पर कथित ऊंची जातियों का कब्जा था. क्षत्रिय को हथियार उठाने का अधिकार दिया गया था. ब्राह्मण को सलाह देने का. इन दोनों ने बाकी वर्गों को उभरने ही नहीं दिया. जिसने विरोध किया, उसको दंडित किया गया. धीरेधीरे ये जातियां व्यवस्था से अनुकूलित होती गईं. धर्म ने इसमें मदद की. पिछला जन्म किसी ने देखा नहीं था, न उसका कोई प्रमाण ही था. बावजूद इसके हिंदुओं में कर्मसिद्धांत की ऐसी आंधी चली कि अच्छेअच्छों के विवेक को उड़ाकर ले गईं. लोग लकीर पीटने के अभ्यासी होते चले गए. शताब्दियों तक ऐसा ही चलता रहा.

गौरतलब है कि गौतम बुद्ध ने जाति व्यवस्था के विरोध में सीधे कुछ नहीं कहा था. केवल भिक्षुसंघ में सभी जातिवर्ग के लोगों को प्रवेश देकर बराबरी का संदेश दिया था. लेकिन उसका चामत्कारिक असर हुआ. धार्मिक बंधन शिथिल पड़ने से लोग, विशेषकर कर्मकार जातियां भविष्य के बारे में नए सिरे से सोचने को उद्धत हुए. संसाधनों की कमी को उन्होंने अपने संगठनसामथ्र्य से पाटा. भारतीय शिल्पकार संगठन हालांकि पहले से ही अंतद्र्वीपीय बाजार में आगे थे. गौतम बुद्ध के समय में उसमें बहुत तेजी से वृद्धि हुई. तेली, चर्मकार, बुनकर, काष्ठकार, रंगरेज, राजमिस्त्री, गुड़ बनाने वाले, रथवाह आदि जितने भी शिल्पकार वर्ग थे, उन सबके अपनेअपने व्यावसायिक संगठन थे. वैदिक परंपरा में प्रतिवर्ष लाखों पशुओं की यज्ञों में दी जानेवाली बलियों के कारण तत्कालीन समाज की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ा था. बौद्ध और जैन दर्शन के प्रभाव में बलि में कमी आई थी. बचा हुआ पशुधन किसानों और पशुपालन द्वारा आजीविका चलाने वाली जातियों के लिए आर्थिक रूप से बहुत मददगार सिद्ध हुआ था. इसका प्रभाव उस समय के व्यापार पर पड़ा था. उसमें तेजी आई. सहयोगाधारित उन व्यापारिक संगठनों को श्रेणि, पूग, गिल्ड, व्रात्य, संघ आदि कहा जाता था. चंद्रगुप्त मौर्य तक तो श्रेणियां खुद को प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित कर चुकी थीं. श्रेणियों की शक्ति का आकलन इससे भी किया जा सकता था कि कौटिल्य उनके संगठनों को राज्य पर संकट की संभावना के रूप में देखता है. इसलिए उसने श्रेणियों पर नजर रखने की अनुशंसा ‘अर्थशास्त्र’ में की थी. श्रेणियों की आर्थिक हैसियत ऊंची थी. वे जरूरतमंद राजाओं की आर्थिक मदद भी खूब करती थीं. ईसा पूर्व दोतीन सौ वर्ष के समय को अनेक विद्वान भारत का स्वर्णकाल मानते हैं. उसके पीछे शिल्पकार संगठनों का बड़ा योगदान था. अर्थव्यवस्था विकेंद्रीकृत थी. गांव संपन्न, आत्मनिर्भर इकाई. धीरेधीरे श्रेणियों का पतन होने लगा. दूसरीतीसरी शताब्दी में उनके कारोबार में मंदी आने लगी थी. इसका पहला कारण बौद्ध धर्म के कमजोर पड़ते ही जातिवादी बंधनों का एक बार फिर मजबूत हो जाना था. व्यापारी संगठन को चलाने के लिए अनेक प्रकार के शिल्पकारों की जरूरत पड़ती थी. पहले वे अपनी जातीय शुचिता को बिसराकर साथसाथ काम करते थे. जातीय अनुशासन मजबूत होने से एकजुट होकर काम करना कठिन हो गया. देश छोटेछोटे राज्यों में बंटने लगा था. खुलकर व्यापार करना कठिन होता गया. श्रेणियों के कारोबार में कमी आई. शिल्पकार संगठन बिखरने से लोग एक बार फिर अपनीअपनी जाति के दड़बों में लौटने लगे. इस तरह जातीयता के बंधनों के शिथिल पड़ने की जो शुरुआत बुद्ध के समय हुई थी, उसपर पानी फिरने लगा. आगे चलकर वर्णव्यवस्था और भी रूढ़ होने लगी. उससे नईनई जातियां बनने लगीं. जातीय शुचिता के नाम पर भेदभाव परोसा जाने लगा.

मध्यकाल में जाति विरोधी आंदोलन के सूत्रधार संतकवि थे. संत रैदास, कबीर, दादू, आदि समाज के निचले वर्गों से आए थे. जो जातीय उत्पीड़न का शिकार थे. इसलिए उन्होंने जातिआधारित ऊंचनीच को अपनी समानताधारित समाज की स्थापना के सपने का अवरोधक माना था. लेकिन समानता से उनका आशय बस इतना था कि गरीबगरीब रहे, अमीरअमीर और सब अपनेअपने संतोष के साथ जीना सीख लें. बावजूद इसके संत कवि जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे लोगों की उम्मीद का केंद्र थे. इसलिए वे संत कवियों के आसपास जुटने लगे. जातिभेद को बढ़ावा देने के लिए संत कवियों ने ब्राह्मणों एवं जाति के पैरोकारों को ललकारा. लेकिन कुछ खास नहीं कर पाए. बहुत जल्दी उनके आंदोलन को संस्कृति का हिस्सा बनाकर हिंदू धर्म में समाहित कर लिया गया. सामंतवादी दौर में उनकी आर्त्त पुकार झोपडि़यों और चौराहों पर दम तोड़ने लगी. जाति को सामाजिक असमानता एवं अंतर्द्वंद्वों का कारण मानते हुए विवेकानंद, दयानंद आदि ने भी उसकी आलोचना की. लेकिन परिणाम लगभग शून्य ही निकला. उनकी असफलता के कारण एकदम स्पष्ट थे. वे विचारक चाहते थे कि कथित ऊंची जातियां अपने से निम्न जातियों के प्रति करुणाभाव लाएं और अपने मन से ऊंचनीच की भावना को निकाल फैंकें. प्रकारांतर में जाति उन्मूलन उनके लिए शीर्षस्थ जातियों की कृपा पर टिका ऐच्छिक प्रश्न था. विचारक शीर्ष जातियों से अपेक्षा करते थे कि वे अपना बड़प्पन दिखाते हुए जातीय भेदभाव को दिल से निकाल फेंकें और पिछड़े वर्गों के साथ करुणा के साथ पेश आएं. यह ठीक ऐसा ही था, जैसे ‘ट्रस्टीशिप’ के सहारे गांधी जी ने जमींदारों और पूंजीपतियों से दुर्बल और आर्थिक रूप से विपन्न लोगों के पक्ष में, अपने संपत्ति अधिकार समाज को सौंप देंने का आवाह्न किया था. जबकि मुफ्त में मिलने वाला सम्मान हो या सुविधाएं, शिखरस्थ वर्ग अपनी मर्जी से कुछ भी छोड़ने को तैयार न थे. अतएव इन महापुरुषों की सदेच्छाओं तथा वक्त की जरूरत होने के बावजूद जाति की सामाजिक सत्ता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. फिर भी उन महापुरुषों के प्रयास निरर्थक नहीं गए. उनके अनथक प्रयत्नों के फलस्वरूप समाज में थोड़ी हलचल अवश्य मची. लोग धर्म और जाति के नाम पर होने पाखंड के प्रति एकजुट होने लगे. जिससे समाज सुधार के आंदोलनों को प्रेरणा मिली. उसके फलस्वरूप विचारकों का ध्यान निचले वर्गों समस्याओं की ओर गया.

जाति विरोधी प्रयासों की असफलता के कुछ कारण एकदम साफ थे. जातीय संरचना के संगठन से जुड़ी, उसके बनाए रखने की समर्थक जातियों की मूल प्रवृत्ति कछुए के समान थी. परिस्थितियां प्रतिकूल हों तो वे कछुए की भांति अपने अंगप्रत्यंगों को धर्म के कवच में ढक लेती थीं. परिस्थितियां अनुकूल होते ही अपने पैने नखदंतों के साथ वे अपने आलोचकों पर आक्रामक होकर जातीयता के बंधनों को और भी कसने लगती थीं. जैसा लगभग 1900 वर्ष पहले बौद्ध धर्म के अवसान के समय देखने को मिला. बुद्ध ने जाति का सीधे विरोध नहीं किया था. मगर उनके बौद्ध विहारों के दरबार सभी जातिवर्गों के लिए खुले थे. उन्होंने हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों और बलिप्रथा के माध्यम से उसपर गहरी चोट की. बावजूद इसके बौद्ध दर्शन ने जितनी चोट वैदिक धर्मदर्शन पर की थी, उतनी चोट जाति प्रथा पर नहीं कर सका. उनका विरोध मुख्यतः हिंदू धर्म में व्याप्त कर्मकांड तथा बलि प्रथा से था. जो सामाजिक असमानता को सांस्थानिक बनाते थे. इसलिए जाति उन्हें अपनी संघीय मान्यताओं की अवरोधक लगी. चूंकि बौद्ध दर्शन धर्म की अधीनता में जाति व्यवस्था का विरोध करता था, इसलिए उसका जाति पर वास्तविक प्रभाव बहुत ही कम पड़ा.

जाति और सामाजिक गतिशीलता

जाति हिंदू धर्म की मानस रचना है. उसका पूरा कारोबार धर्म के सहारे चलता है. हिंदू धर्म मजबूत, तो जाति मजबूत. हिंदू धर्म शिथिल तो जाति बंधन शिथिल. बौद्ध धर्म ने हिंदू धर्म को पाश्र्व में ढकेला तो जाति भी नेपथ्य में जाने लगी थी. अठारहवीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के कमजोर होने के साथ हिंदू धर्म ने अपनी जड़ें दुबारा मजबूत कीं तो जाति भी सिर उठाने लगी. महाराष्ट्र, दक्षिण भारत, बंगाल यानी जहांजहां हिंदू धर्म पुनर्जागरण की ओर बढ़ा, वहांवहां जाति भी पांव पसारने लगी. हिंदू धर्माचार्यों में से अनेक आज भी जाति को हिंदू धर्म का आभूषण समझते हैं. उन्हें आज भी लगता है कि जाति के न रहने पर धर्म संकट में पड़ सकता है. इसलिए आजादी के सातवें दशक में भी दलितों को मंदिर की चौखट पर देख उन्हें अपना धर्म संकट में नजर आने लगता है. विषम परिस्थितियों में भी वे शांत नहीं बैठते. जबतब जाति विरोधी आंदोलन होते हैं, जब उनमें लगे लोगों को लगता है कि वे बस जीतने ही वाले हैं, जाति का जनाजा अब उठा कि बस अब उठा; तब तब वे ऐसी चाल चलते हैं कि परिवर्तन और सुधार की सारी संभावनाओं पर पानी फिर जाता है. जाति समर्थक लोग धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीयता की आड़ में, बहुत तसल्ली के साथ जाति को तरहतरह से मजबूत कर, सामाजिक व्यवहार के केंद्र में बनाए रखने हेतु जुटे होते हैं. उनके प्रयास बहुत ही महीन, आसानी से न समझ में आनेवाले होते हैं. जिन दिनों बौद्ध धर्म प्रभाव में था, उन दिनों पुराणों और स्मृतियों के लेखन में तेजी आई थी. मध्यकाल में किस्सेकहानियों के माध्यम से ब्राह्मणवाद में जान फूंकी गई तो भक्ति साहित्य में जाति को बचाए रखने का काम तुलसी, सूरदास, मीरा, हरिदास जैसे भक्त कवियों ने किया. इन दिनों कानून के दखल से जाति संबंधी आचारविचार शिथिल पड़े हैं तो जातिवादी संगठन उसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का कवच पहनाने की तैयारी में लगे हैं. धर्म और जाति के इस नाभिनाल संबंध को सर्वप्रथम महामना ज्योतिबा फुले ने समझा था. इसलिए उन्होंने जाति के मूल यानी धर्म की विकृतियों पर प्रहार किया. उनके आंदोलन को जमीन शाहू जी महाराज ने दी. दलितोंशोषित वर्गों को आत्मविश्वास से लैस करने, अपने अधिकारों के लिए खड़े होने तथा दलित आंदोलन को सही दिशा देकर नई युगचेतना लाने का सबसे महत्त्वपूर्ण काम डॉ. अंबेडकर ने किया. फलस्वरूप अस्मितावादी आंदोलनों को जमीन मिली. दबेकुचले लोग अपने अधिकारों के लिए आगे आने लगे.

पहले जाति प्रथा की आलोचना वे लोग करते थे जो खुद जातीय उत्पीड़न और असमानता का शिकार थे. तब उत्पीडि़त वर्ग जाति का उच्छेद चाहता था. उसके लिए ‘जातितोड़क’ आंदोलन चलाए गए थे. स्वयं डॉ. अंबेडकर ने ‘जाति का उच्छेद’ पुस्तक लिखकर जाति और जातिवादी शोषण दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया था. अब हालात बदले हुए हैं. जातीय शोषण का शिकार रहे वर्ग अब जाति को ही हथियार बना रहे हैं. ऐसा नहीं है कि जातिआधारित शोषण समाप्त हो चुका है? या उन्होंने उन्होंने जाति के नाम पर सामाजिक ऊंचनीच से समझौता कर लिया है. जातीय आधार पर ऊंचनीच की भावना तो आज भी बरकार है. लेकिन वह केवल सामाजिक संबंधों तक सीमित है. लोकतंत्र ने जाति आधारित भेदभाव को सिद्धांततः समाप्त किया है. अस्पृश्यता आज एक कानूनी अपराध है, भले ही सामाजिक स्तर पर उसके अवशेष आज चिंता का विषय हों. कानून हालांकि बराबरी का अधिकार देता है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भेदभाव पूरी तरह बना हुआ है. इसलिए नए परिवेश में जातीय शोषण का शिकार रहे वर्गों को अपनी रणनीतियों में संशोधन करना पड़ा है. दलितों और पिछड़ों की समझ में आ चुका है कि केवल कानूनी प्रावधान होने से समानता के लक्ष्य को प्राप्त कर पाना असंभव है. कल्याण राज्य की अवधारणा के चलते सरकार से कुछ उम्मीद की जा सकती है, लेकिन अपनी पैठ और राजनीतिक हैसियत का लाभ उठाकर सत्ता में बारीबारी से वही लोग आते रहते हैं, जो जातीय शोषण के लिए जिम्मेदार हैं. ऐसी परिस्थितियों में शोषित वर्ग का नया संघर्ष आनुपातिक हिस्सेदारी को लेकर है. दलित और पिछड़े वर्ग अब संसाधनों और अवसरों में आनुपातिक हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं. चूंकि यह मांग न्याय सम्मत है, इसलिए संवैधानिक स्थितियां भी उनके पक्ष में हैं. इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा है. जाति को लेकर हीनताबोध समाप्त हो चुका है. दबीकुचली जातियां पहले सरकार और शीर्षस्थ वर्गों से अपनी जरूरतों की भरपाई की उम्मीद करती थीं, दैन्य दिखाती थीं, उनसे विकास के समुचित अवसरों की मांग करती थीं. अब उन्हें लगता है कि दैन्य दिखाने, गिड़गिड़ाने की अपेक्षा संगठित संघर्ष द्वारा, अपने अधिकारों को ससम्मान प्राप्त किया जा सकता है.

पेशागत आधार पर भी जातीय विभाजन बेमानी सिद्ध हो रहा है. ब्राह्मण चमड़े का काम करने लगे हैं. जबकि चर्मकार जाति के होनहार पढ़लिखकर दूसरों को पढ़ाने लगे हैं. दूसरी दबीकुचली जातियां भी मुख्यधारा की ओर बढ़ रही हैं. गति बहुत धीमी है, मगर जैसेजैसे लोग शिक्षित हो रहे हैं, उनमें अपने अधिकारों के प्रति चेतना भी बढ़ती जा रही है. यदि आधुनिक समाज में परिवर्तन की ललक है और कुछ समूह तेजी से विकास की ओर अग्रसर हैं तो इसका एक कारण यह भी है कि वे लोग जो शताब्दियों तक शोषितउत्पीडि़त होते आए थे, जिन्होंने पीढ़ीदरपीढ़ी जातीय आधार पर भेदभाव, उत्पीड़न, और असमानता का दंश सहा है, जिन्हें जाति के आधार पर विकास के अवसरों से वंचित रखा गया थाअब संगठित होकर विकास में साझेदारी चाहते हैं. प्रौद्योगिकी के अलावा जाति आज सामाजिक गतिशीलता की सबसे बड़ी उत्पेरक है. कुछ मामलों में तो यह प्रौद्योगिकी से अधिक प्रभावशाली है. आधुनिक प्रौद्योगिकी की क्षमताएं अनंत हैं. मगर पूंजीपतियों के नियंत्रण के कारण वह फैशन का हिस्सा बन चुकी है. वह मनुष्य को तकनीक के स्तर पर समृद्ध, किंतु मनोभौतिक स्तर पर बौद्धिकविपन्न बना रही है. एक तरह से जीतेजागते मनुष्यों को मशीन में तबदील कर रही है. दूसरी ओर जाति नएनए विमर्श छेड़कर मानवसमाज को नए विचारों से लैस कर रही है. जाति के पीछे कोई कल्याणकारी विचारधारा नहीं है. हो भी नहीं सकती. किंतु जाति के माध्यम से संघर्षरत आंदोलनकारियों को लगता है कि केवल संगठित प्रतिकार ही उन्हें समाजार्थिक शोषण से मुक्ति दिला सकता है. कुछ लोग जाति के उभार से खिन्न हैं. वे लगातार आरोप लगा रहे हैं कि जातिवादी आंदोलन देश को शताब्दियों पीछे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसा सोचने वालों में वही लोग हैं जिन्हें अस्मितावादी आंदोलनों से खतरा है. जो जाति के नाम पर संगठित होते युवाओं को संस्कृति और राष्ट्र के वास्ते जाति से अलग होने को उपदेश दे रहे हैं. जबकि जाति स्वयं उनके आचारव्यवहार का हिस्सा है. समाचारपत्रों में छपने वाले वैवाहिक विज्ञापनों से उनकी मनस्थिति और द्वैध को आसानी से समझा जा सकता है. कुल मिलाकर जातीय शोषण का शिकार रहे वर्गों के लिए आज जाति ही सबसे बड़ा हथियार है. वे कांटे से कांटा निकालना चाहते हैं. जाति उन्हें संगठित होने में मदद करती है. इसलिए कार्यविभाजन की अवैज्ञानिक शैली होने के बावजूद अधिकांश मानवसमूह जाति को संगठनकारी औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.

इन दिनों एक ओर तो विभिन्न जातियों के बीच अस्मिता की पहचान को लेकर होड़ मची हुई है. दूसरी ओर आरएसएस जैसे संगठन धर्म और संस्कृति को रोपने में लगे हुए हैं. इसलिए जो लोग भारतीय समाज को जातिमुक्त देखना चाहते हैं, उन्हें धर्म की संकल्पना में आमूलचूल बदलाव करना पड़ेगा. जो समझते हैं कि हिंदू धर्म अपने वर्तमान स्वरूप में, लुंजपुंज देवताओं की फौज के रूप में रहे और जाति चली जाए? वे या तो बहुत भोले हैं या जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति अगंभीर हैं. बहुजन राजनीति के पैरोकार इस तथ्य को बाखूबी समझते हैं. इसलिए वे इस बार जाति के सवालों को सीधे नहीं उठा रहे हैं. देखा जाए तो उठा ही नहीं रहे हैं. शताब्दियों से जो जाति के औचित्य पर सवाल उठाते थे, अब उन्होंने इसे भारतीय समाज की हकीकत के रूप में, भले ही अस्थायी तौर पर, स्वीकार कर लिया है. इसलिए जाति के आधार पर सवाल उठाने के बजाय उसके आधार पर हुए समाजार्थिक शोषण और गैरबराबरी पर सवाल उठाए जा रहे हैं. जाति का सहारा लेकर शोषित और वंचित वर्गों को संगठित किया जा रहा है. लंबे अर्से के बाद यह समझ लिया है कि लोकतंत्र में राजनीतिक सहभागिता सामाजिक अन्याय को मेटने वाले प्रमुख उपकरणों में से है. इससे आर्थिक समानता के उस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है, जो मनुष्यता का अभीष्ट है. इस विभेदकारी समस्या के निदान के लिए शिक्षा और संसाधनों में साझेदारी की आवाज बुलंद की जा रही है. चूंकि इस बार जाति भी समानता के संघर्ष का एक हथियार है, इसलिए उससे सबसे अधिक तखलीफ उन लोगों को हो रही है, जो अभी तक जाति प्रथा का लाभ उठाते आए हैं. और जिसका सहारा लेकर उन्होंने बहुसंख्यक समाज को अपना आश्रित बनाए रखा है.

एक समय था जब आर्थिक सुदृढ़ीकरण देश के विकास की धुरी था. विशेषकर देश की आजादी के समय. तब आर्थिक उन्नति को लेकर नईनई योजनाएं बनाई जा रही थीं. इन दिनों सामाजिक न्याय जैसी समसामयिक अवधारणा विकास के साथ जुड़ चुकी है. विकास हो और उसका लाभ देश के सभी वर्गों तक पहुंचेꟷ˹ऐसी अपेक्षा की जाती है. सामाजिक न्याय के संघर्ष में जाति एक तात्कालिक माध्यम बन सकती है. लेकिन यह एकदम आसान भी नहीं है. जाति की अवधारणा ही अपने आप में नकारात्मक है. अतएव जाति को औजार की तरह इस्तेमाल कर रहे वर्गों और समूहों को समझना चाहिए कि औजार केवल माध्यम होता है. वह लक्ष्य को अपेक्षाकृत सुगम तो बनाता है, लेकिन स्वयं लक्ष्य नहीं होता. इसलिए अस्मितावादी आंदोलनों की मूल प्रवृत्ति छोटे जातिसमूहों को बड़े जाति समूहों में ढालने, जन से बहुजन और बहुजन से सर्वजन की ओर ले जाने वाली होनी चाहिए. ऐसा होगा, तभी जाति के कलंक से मुक्ति पाई जा सकती है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सामना वैकल्पिक जनसंस्कृति और श्रमसंस्कृति के उभार द्वारा आसानी से किया जा सकता है. वह ऐसी संस्कृति होगी जिसमें लोग धर्म के आधार पर नहीं हितों की समानता के आधार पर एकजुट होंगे तथा परस्पर सहयोग करते हुए आगे बढ़ेंगे. उस समय धर्म और उसपर टिकी विभेदक संस्कृति उनके रास्ते के सबसे बड़े अवरोधक होंगे. तब यह याद रखना उन्हें विशेष बल देगा कि प्रकृति ने अधिकार तो सभी को दिए हैं, बराबर दिए हैं, मगर विशेषाधिकार संपन्न किसी को भी नहीं बनाया है.

© ओमप्रकाश कश्यप

गत्यात्मक जनसंस्कृति यानी समावेशी आधुनिकता

सामान्य

धर्म एवं अभिजन संस्कृति—12

ऐसा चाहूं राज मैं यहां मिले सभन को अन्न
छोटे-बड्डे सभ सम्म बसें, रविदास रहे प्रसन्न
— संत रविदास

जनसंस्कृति का अभिप्राय आधुनिकता से पलायन नहीं है. न उन अतिरेकी मान्यताओं को महत्त्व देना है जिनके अनुसार जो पुराना तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है; अथवा जिसे बहुसंख्यक माने वही सर्वदा वरेण्य है. न यह दर्शाना है कि पिछला समय ही श्रेष्ठ था और अब यह पूरा समाज पतनशील अवस्था में, निरंतर सांस्कृतिक अपसंस्करण की ओर बढ़ रहा है. इससे भारतीय समाज के आगे जो अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता पर गर्व करता आया है, कोई बड़ा संकट खड़ा होने वाला है. सच तो यह है कि पिछली संस्कृतियों की भांति आधुनिक संस्कृति में भी बहुत कुछ श्रेष्ठ है. इसमें यदि कुछ कमियां हैं तो परंपरागत संस्कृतियां भी सर्वथा दोषमुक्त नहीं थीं. यह भी भ्रांति ही है कि भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठतम छटा गांवों में देखने को मिलती है; तथा वैज्ञानिक क्रांति एवं प्रौद्योगिकीय विकास के फलस्वरूप विकसित हुई आधुनिक नागरीय सभ्यता में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है. सच यह है कि गत चार-पांच हजार वर्षों से मानव-संस्कृतियां निरंतर विकासमान अवस्था में रही हैं. संभव है उन दिनों के समाजों में सकारात्मक तत्वों की उपस्थिति आनुपातिक रूप से ज्यादा हो. शायद इसलिए कि तत्कालीन जीवन आज जितना जटिल नहीं था. मनुष्य की आवश्यकताएं सीमित थीं. उनके अनुपात में प्रकृति का प्रांगण बहुत विशाल था. इंसान संपत्ति-संग्रह की बुरी लत से भी दूर था. इसके बावजूद तत्कालीन समाजों की आपेक्षिक श्रेष्ठता को लेकर कोई भी बात सप्रमाण नहीं कही जा सकती. तब से आज तक राजनीतिक, सामाजिक विचारधाराओं के साथ उत्पादन-प्रविधियों में भी वैश्विक स्तर पर बदलाव आया है, जिसने लोगों की जीवन-शैली और सोच में व्यापक बदलाव किया है. तमाम विवादों और असहमतियों के बावजूद यह विकास की स्वाभाविक अवस्था है. विकास कभी इकहरा नहीं आता, अतः यदि प्राचीन संस्कृति और सभ्यता में कुछ अनुकरणीय था, तो सामंतवाद, निरंकुश साम्राज्यवाद तथा पूंजीवाद की शोषणकारी प्रवृत्तियों से निरंतर संघर्ष के उपरांत आधुनिक मनुष्य ने भी ऐसा बहुत-कुछ अर्जित किया है, जिसके आदर्शों पर नए समाज का ढांचा खड़ा किया जा सकता है. कमियां आधुनिक संस्कृति में भी हैं. वे मुख्यतः इसलिए हैं कि शिखर पर विराजमान शक्तियां सामाजिक-राष्ट्रीय हितों के आगे स्वार्थ को वरीयता देती रही हैं. व्यवस्था कोई रही हो, शिखरस्थ शक्तियों के वर्चस्वकारी चरित्र में बहुत कम बदलाव आया है. परिणामस्वरूप जनसाधारण को सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों का लाभ उतना नहीं मिल पाया है, जितना अपेक्षित था. यह दोषपूर्ण समाजीकरण का परिणाम है, मगर इसकी पूरी जिम्मेदारी किसी एक वर्ग के कंधों पर डाल देना अनुचित होगा. यदि एक वर्ग को बहुसंख्यक के उत्पीड़न का अपराधी कहा जाए तो दूसरे वर्ग का दोष उस व्यवस्था से अनुकूलन कर लेना, अन्याय को सहते जाना है. उसमें यदि कभी कोई हलचल हुई भी तो उत्पीड़ित द्वारा उत्पीड़क की स्थिति में पहुंचने के लिए—समाज को बदलने के लिए नहीं.

समाजीकरण का उद्देश्य परंपराओं और जीवनमूल्यों को सहेजकर रखना तथा बदलती परिस्थितियों के अनुकूल आदर्शों का सृजन करना है. इस प्रक्रिया से गुजरते हुए मनुष्य अपने समाज की परंपराओं, सांस्कृतिक भाव-भूमियों, आदर्शों, जीवनमूल्यों को आत्मसात करता है. इस बीच समाज में अपनी उपयोगिता दर्शाने के लिए शिक्षा-दीक्षा, अनुभव आदि के माध्यम से वह अपनी कार्यक्षमताओं में भी निखार लाता रहता है. विकासमान अवस्था में पुराने जीवनमूल्य अप्रासंगिक होते जाते हैं. रिक्त स्थान की पूर्ति हेतु नए जीवनमूल्य समयानुसार जन्मते रहते हैं. उनकी प्रतिष्ठा के लिए सामाजिक व्यवस्था में कुछ परिवर्तन अपरिहार्य हो जाते हैं. समाजीकरण और मानवीकरण के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए अपेक्षित होता है कि समाज अपने सभी नागरिकों के साथ समानतापूर्ण व्यवहार करे. बिना किसी भेदभाव के अपनी सुविधाओं, संसाधनों और अवसरों को सभी के लिए खुला रखे. समाजीकरण की प्रक्रिया को आत्मसात करने, उसके अनुसार अपने विकास हेतु सामंजस्य बिठाने तथा आवश्यकतानुसार मोड़ देने की सभी को स्वतंत्रता हो. मगर मनुष्यता के ज्ञात इतिहास की हमेशा यह विडंबना रही है कि समाजीकरण की प्रक्रिया कुछेक वर्गों द्वारा नियंत्रित-निर्देशित होती है. उसका ढांचा ऐसा बना है कि शिखर पर विराजमान कुछ अतिसक्रिय, चालाक किस्म के लोग बहुसंख्यक जन के निर्णय-सामर्थ्य को प्रभावित करने तथा उसको अपने स्वार्थानुरूप दिशा देने में कामयाब हो जाते हैं. खासकर मानवीय विकास के क्षेत्रों में. चूंकि संसाधनों पर शीर्षस्थ अभिजन वर्ग का अधिकार होता है, अतएव उसके निर्णय को स्वीकार करना, अभिजनेत्तर वर्गों की विवशता होती है. उन्हें अपने आसपास विकास के चिह्न भले ही दिखाई न दें, लेकिन बार-बार आश्वासन दिए जाने पर वे शीर्षस्थ अभिजनों के झांसे में आ ही जाते हैं. विकल्पहीन अवस्था में उनकी बातों पर विश्वास करने के अलावा उनके पास दूसरा कोई रास्ता ही नहीं होता.

लोक अमूर्त्तन और रूमानी अवधारणा है. उसका नाम लेते समय मनुष्यता का कोई खास चेहरा हमारे दिमाग में नहीं आता, न हमें ऊंच-नीच से ग्रस्त समाजों का सच तथा विरूपताएं नजर आती हैं. उस समय मानव-समाज का काल्पनिक, कुछ-कुछ ब्रह्मांड जैसा निरा काल्पनिक चित्र हमारे मस्तिष्क में बनता है. दूसरे शब्दों में केवल ‘लोक’ के माध्यम से हम वास्तविक जगत का आकलन करने में असमर्थ रहते हैं. दूसरी ओर समाजीकरण को मनमाफिक दिशा देने के लिए शीर्षस्थ शक्तियां जनसाधारण को निरंतर यह विश्वास दिलाती रहती हैं कि वे लोक का प्रतिनिधित्व करती हैं और उनका प्रत्येक कार्य लोककल्याण की भावना से अनुप्रेत है. ऐसा वे जनसाधारण का विश्वास जीतने के लिए करती हैं. हालांकि उनकी परिकल्पना ‘जन’ का, जिसे ‘कल्याण’ की वास्तविक जरूरत है, जो जीवन-संघर्ष में बुरी तरह उलझा हुआ है, भूख और बेकारी जैसी व्याधियां जिसे सदैव त्रस्त रखती हैं—का वास्तविक हित साधना नहीं होता. इसलिए उनके नेतृत्व में आया विकास ‘जन’ को प्रभावित किए बगैर उसके ऊपर से गुजर जाता है. इस हकीकत को अभिजन शक्तियां भी समझती हैं, अतएव ‘जन’ को भरमाए रखने के लिए वे तरह-तरह के प्रपंच रचती हैं. इससे उनके दिलों में पैठे डर का अनुमान लगाया जा सकता है. इसका अभिप्राय यह भी है कि अभिजन शक्तियों का शिखरत्व भले वे कितनी ही संगठित और ताकतवर हों, असंगठित अभिजनेत्तर वर्गों के सहयोग और समर्थन पर निर्भर होता है. कोई और विकल्प न देख जनसाधारण उनपर विश्वास कर भी लेता है. शीर्षस्थ शक्तियों का जादू हमेशा चले, लोग अमूर्त्तन विकास के फरेब पर हमेशा भरोसा किए रहें—यह अनिवार्य नहीं है. निरंतर छले जाने से जनसाधारण शीर्षस्थ अभिजन की धूर्त्तताओं को समझने लगता है. अभिजनेत्तर समूहों में चल रही हलचलों से अभिजन शक्तियां अनजान नहीं होतीं. अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए वे हर संभव-असंभव तरीका अपनाती हैं. तरह-तरह के षड्यंत्रों द्वारा वे अभिजनेत्तर वर्गों में फूट डालने में सफल हो जाती हैं. अभिजन शक्तियों की सफलता में अभिजनेत्तर समूहों की फूट तथा समान हितों के मुद्दों पर एकता का अभाव होता है. चूंकि समाज से भागना उसके परिवर्तन की संभावनाओं को कम करना है, अतएव समाज में रहते हुए उसकी विकृतियों को समझकर, उनका समाधान खोजना ही वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती है. इसके लिए अभिजन वर्ग की उस शब्दावली को समझना आवश्यक है, जिसके माध्यम से वह जनसाधारण को बरगलाने में सफल होता है. और परंपरा के दबावों के चलते, जिनमें अपनी समस्याओं के समाधान हेतु साधारणजन शासन-प्रशासन अथवा समाज के शीर्षस्थ वर्गों की ओर देखता आया है—अभिजनेत्तर समूह पुनः शीर्षस्थ अभिजनों की शरण में लौटने लगते हैं. समाजीकरण की प्रक्रिया के ये अनपेक्षित विवर्तन, समाज में असमानता, अविश्वास एवं असुरक्षा की भावनाएं पनपाते हैं.

जनसंस्कृति को मैं आत्मविश्वास से भरे, आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर बहुसंख्यक अभिजनेत्तर समूहों की कार्यशैली कहना चाहूंगा, जिसमें वे अपने विकास हेतु शीर्षस्थ वर्गों की ओर देखने के बजाय अपने ही बूते आगे बढ़ने का संकल्प लेते हैं. यह जनसाधारण की एकता और हितों को लेकर प्रतिबद्धता का नवगीत, मानवीकरण की चिर-परिचित शैली है. वर्तमान समाज में व्याप्त ऊंच-नीच समेत जो अनेकानेक विसंगतियां, विरूपताएं विद्यमान हैं, उनके पीछे समाजार्थिक विषमताओं का बहुत बड़ा योगदान है. शीर्षस्थ वर्ग जिसपर समाज के नेतृत्व और विकास की जिम्मेदारी होती है, वह अपने स्वार्थ से हटकर उसी समय सोचता है, जब उसे उससे भी बड़ी स्वार्थ-सिद्धि की संभावना हो. अतएव अपने विकास के लिए जनसाधारण को शीर्षस्थ अभिजन अथवा किसी दैवी सत्ता की अनुकंपा की प्रतीक्षा किए बिना अपने ही भरोसे प्रयास करना होगा. यह कार्य पूर्णतः आत्मनिर्भर, विकासमान और परस्पर सहयोगात्मक जनसंस्कृति के माध्यम द्वारा संभव है. उसकी सफलता के लिए ऐसी समावेशी आधुनिकता की आवश्यकता है जो नए-पुराने उच्चादर्शों तथा मानवीय संवेदनाओं पर टिकी हो. आदर्श जनसंस्कृति को खुला, परिवर्तनोन्मुखी और विकासमूलक किंतु जनसंख्या, राजनीति, अर्थव्यवस्था के तात्कालिक परिवर्तनों से मुक्त होना चाहिए. उसमें यह सामर्थ्य होना चाहिए कि इन स्वाभाविक बदलावों को बिना किसी विक्षोभ के झेल सके.

वर्तमान विश्व सभ्यता और संस्कृति के अनगिनत खानों में बंटा है. उसमें धर्म, राष्ट्रीयता, राजनीति, अर्थनीति आदि को लेकर अनेकानेक भेद और तज्जनित अंतर्द्वंद्व हैं. सही मायने में ये आधुनिक असमानताग्रस्त समाज और संस्कृति की विफलताएं भी हैं. सभ्यताकरण के दौर में मनुष्य नए और पुराने के बीच चयन को लेकर सदैव ऊहापोह का शिकार रहा है. परिणामस्वरूप परिवर्तनों की गति अनेक स्तरीय रही है. यह स्तरीकरण सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न उपादानों के बीच भी साफ नजर आता है. जनसंस्कृति में इन कृत्रिम परिवर्तनों से ऊपर उठकर एक समरस समाज की स्थापना का गुण होना चाहिए. उसे इतना व्यापक भी होना चाहिए कि हर सदस्य को लगे कि समाज के संचालन और दिशा-निर्धारण में उतना ही योगदान है, जितना दूसरों का. उसमें छोटे-छोटे जनसमूह मिलकर समाज की दीर्घजीविता एवं अधिकतम के कल्याण हेतु, स्थानीय मुद्दों को लेकर ऐसी संस्थाओं का गठन करेंगे, जिनकी कार्यशैली एवं रूपरेखा सामान्य सहमति के आधुनिकतम सिद्धांत के अनुसार स्वैच्छिक सहभागिता एवं सर्वांगीण विकास के आधार पर निर्धारित की जाएगी. उन संस्थाओं की सफलता का आधार ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम विकास’ की कसौटी होगी. इस तरह जनसंस्कृति का आशय जनसामान्य के आचार-विचार, रहन-सहन, जीवन-शैली, रीति-रिवाज, हितों की प्रतिबद्धता सहित उन सभी कृत्यों-व्यवहारों से है, जिन्हें वह समाज का सदस्य होने के नाते अपनाता तथा आवश्यक संशोधन, परिवर्धन अथवा उनके बगैर भी आगामी पीढ़ी को सौंपता चला जाता है. न्याय की सर्वसुलभता हेतु आमूल परिवर्तन यदि वर्तमान की जरूरत है तो उसका लक्ष्य ऐसी जनसंस्कृति की स्थापना हो सकता है, जिसमें आदर्श स्वतः समाहित हों, लोग स्वयं-स्फूर्त्त भाव से उन्हें अपनाएं और एक-दूसरे का साथ देते हुए सामान्य हितों की प्राप्ति हेतु सहर्ष तत्पर हों.

जनसमाज के बारे में सामान्य धारणा है कि वह प्रौद्योगिकी के साथ-साथ विचारधारा के स्तर पर भी पिछड़ा हुआ होता है, इस कारण बुद्धि के मामले में अग्रणी अभिजन आसानी से केंद्र में जगह बना लेते हैं. अभिजन अभिजनेत्तर से बुद्धि-विवेक में सदैव अग्रणी हों, यह आवश्यक नहीं है. मगर उस अवस्था में वे अपने संसाधनों के बल पर, समाज की विशिष्ट प्रतिभाओं को अपने साथ जोड़ लेते हैं तथा उनके सहयोग-समर्पण द्वारा अभिजनेत्तर समूहों से आगे निकलने में सफल हो जाते हैं. दूसरी ओर गैर अभिजन अपनी विशिष्ट पृष्ठभूमि, शिक्षा तथा संसाधनों के अभाव जैसे कारणों से आधुनिक उत्पादन प्रौद्योगिकी तथा ज्ञान-विज्ञान के उपयोग में पिछड़ जाता है. बावजूद इसके सामाजिक सौहार्द, समानता, बंधुत्व, स्वैच्छिक सहयोग, सहअस्तित्व आदि अनेक जीवनमूल्य ऐसे हैं, जिनके अनुपालन में वह अपने समकालीन नागरीय समाजों से कहीं आगे होता है. इसकी भरपाई यानी अपनी सामाजिकता का प्रदर्शन करने हेतु नागरीय समाज विभिन्न प्रकार के औपचारिक संगठनों की मदद लेते हैं. उनमें किसी न किसी रूप में पूंजी का हस्तक्षेप होता है, जो समय के साथ-साथ बढ़ता ही जाता है. अभिजन शक्तियां उनपर अधिकार जमाकर उनका संचालन अपने स्वार्थानुरूप करने लगती हैं. इससे उनका उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है. बहुत-से सदस्य पूंजीगत लाभ न देख संस्था के लक्ष्य की ओर से उदासीन होने लगते हैं. इस कारण वे संगठन एक न एक दिन अपने उद्देश्य से भटकने को अभिशप्त होते हैं.

सामान्य व्यवहार में प्रायः ग्रामीण संस्कृति को ही जनसंस्कृति का पर्याय मान लिया जाता है, जबकि जनसमाज केवल गांवों तक सीमित नहीं होता. शहरों में भी ‘जन’ को जीवन-संघर्ष में उलझते तथा अभिजन हितों के लिए पसीना बहाते देखा जा सकता है. अपने जीवन में वह प्रायः अभिजन के पक्षपातपूर्ण निर्णयों का शिकार होता है, फिर भी वर्गीय चेतना के अभाव, संगठन की कमी, अपने अज्ञान एवं भ्रांतियों के चलते वह अभिजन का समर्थन करता है. दूसरे शब्दों में अभिजन के श्रेष्ठत्व पर भरोसा करके और यह जानते हुए कि उसकी विकास-दृष्टि स्वार्थ की सीमाएं लांघने में असमर्थ रहती है, ‘जन’ उसे खुशी-खुशी अपने ऊपर शासन करने का अधिकार सौंप देता है. ग्रामीण समाज भी, भले ही ऊपर से एक दिखे, भीतर से वह भी ‘जन’ और ‘अभिजन’ में बंटा होता है. यह भी देखने में आया है कि ग्रामीण अभिजन, शहरी अभिजन की अपेक्षा कहीं अधिक मुखर तथा आक्रामक होते हैं. उनका अभिजात्यबोध धर्म, जाति, कुल-गोत्र, वंशानुक्रम, भूमि-स्वामित्व, सामंती संस्कार जैसे परंपरागत प्रतीकों से प्रकट होता है. पुरोहित, जमींदार, सरकार तथा उसके शीर्षस्थ अधिकारी जो गांव में बसते अथवा उससे किसी भी प्रकार का संबंध रखते हों, ग्राम्यः समाज के अभिजन की श्रेणी में आते हैं. शहरी अभिजन की भांति वे भी निर्णयकारी भूमिका में होते हैं. अपनी पक्षपातपूर्ण कार्यशैली द्वारा वे ग्रामीण जीवन में असमानता और वर्चस्व की स्थापना करते हैं. ग्रामीण अभिजनेत्तर समाज में किसान, मजदूर, दस्तकार, साधारण नौकरीपेशा लोग आते हैं. उन्हें अभिजन के निर्देश अथवा उसकी इच्छा के अनुरूप अपनी जीवनशैली को साधना पड़ता है.

अभिजनेत्तर समाज में आर्थिक विकल्प बहुत सीमित होते हैं. उत्पादक के रूप में उसके सदस्य परंपरागत अथवा पिछड़ी उत्पादन प्रणाली से जुड़े होते हैं. जीविकोपार्जन हेतु उनमें से अधिकांश का सहारा या तो उनका श्रम होता है, अथवा हस्त-कौशल. इस कारण जनसंस्कृति हालांकि नागरिक संस्कृति की अपेक्षा सरल और कम उलझी हुई होती है, लेकिन आर्थिक पिछड़ेपन के कारण उन्हें उत्पाद और समाज की दिशा-दशा तय करने के अवसर नहीं मिल पाते. शीर्ष पर विराजमान अभिजन अपनी स्थिति का फायदा उठाते हुए शासन-प्रशासन में मनमाना हस्तक्षेप करते रहते हैं. श्रम तथा अपने सामान्य उत्पादों की खपत के लिए भी जनसामान्य अभिजन अथवा अभिजन हित हेतु कार्य करने वाली संस्थाओं का अनुकरण करते हैं. संसाधनों के अभाव में वे आधुनिकतम प्रौद्योगिकी का उपयोग भी ढंग से नहीं कर पाते. यद्यपि वे ऐसे उद्योगों और व्यवसायों से संबद्ध हो सकते हैं, जहां प्रौद्योगिकी एवं प्रबंधन के आधुनिकतम सिद्धांतों का उपयोग होता हो. मगर वहां उनकी उपस्थिति एक निर्जीव उपकरण जैसी होती है. निर्णयकारी अवस्था में न होने के कारण वे अपने प्रौद्योगिकीय कौशल का अपने हितों के अनुसार उपयोग करने से वंचित रह जाते हैं. इस कारण उनके जीवन में अपेक्षाकृत ठहराव होता है. यद्यपि शिक्षण-प्रशिक्षण, व्यापारिक सूझबूझ जैसी विशिष्ट योग्यताओं के बल पर जनसामान्य के बीच से कुछ सदस्य अभिजन वर्ग में सम्मिलित होते रहते हैं, किंतु अभिजनेत्तर से अभिजन की ओर संचरण प्रायः बहुत धीमी गति से—श्रेणीबद्ध आधार पर होता है. सामान्य स्थिति में अभिजन तक पहुंचने के लिए ‘जन’ को ‘मध्यवर्ग’ अथवा ‘अर्ध-अभिजन’ के स्तर से गुजरना पड़ता है.

अर्ध-अभिजन अभिजनेत्तर वर्ग से निकले होते हैं, जो अपनी शिक्षा अथवा अन्य किसी विशिष्ट योग्यता के बल पर अभिजन को प्रभावित कर, समाज में विशिष्ट स्थान बना लेते हैं. उन्हें अपने मूल वर्ग यानी अभिजनेत्तर समूहों के विकास से ज्यादा खुद को जल्दी से जल्दी अभिजन की कतार में सम्मिलित करने का उतावलापन होता है. अतः अभिजन का विश्वास जीतने के लिए वे उसे यथासंभव सहयोग प्रदान करते हैं. अभिजन वर्ग के स्थायित्व तथा उनके अबाध विकास में इन अर्ध-अभिजन सदस्यों का बहुत योगदान होता है. अभिजनेत्तर समूह से अर्ध-अभिजन अथवा अभिजन के स्तर तक उठकर पहुंचे सदस्य, कायाकल्पन की त्वरित प्रक्रिया से गुजरकर अपने मूल समूह से अलंघ्य दूरी बना लेते हैं. प्रकारांतर में वे अभिजन संस्कृति के सच्चे उपासक सिद्ध होते हैं. इस तरह ‘जन’ से ‘अभिजन’ की श्रेणी तक पहुंचे सदस्यों की प्रतिभा का लाभ उनकी श्रेणी के लोगों को नहीं पाता. परिणामस्वरूप जनसमाजों में विकास की दर अभिजन समाजों की अपेक्षा कम होती है. कई बार अभिजन समाज के सदस्य भी परिस्थितियों से टकराकर अथवा दूसरे अभिजन समूहों द्वारा बहिष्कृत होकर निम्नस्थ समूहों में खिसक जाते हैं. इस तरह चाहे-अनचाहे ‘जन’ और ‘अभिजन’ के बीच अंतरण का सिलसिला बना रहता है. अंतरण की इस सहज-स्वाभाविक प्रक्रिया में ‘जन’ और ‘अभिजन’ का अनुपात लगभग अपरिवर्तित रहता है. विल्फ्रेड परेतो अपनी पुस्तक ‘माइंड एंड सोसाइटी’ में इसे ‘दोनों स्तर, अर्थात अभिजन एवं अभिजनेत्तर व्यक्तियों के बीच संचरण’ की संज्ञा देता है. इसे वह समाज के विकास एवं स्थायित्व के लिए अत्यावश्यक मानता है. उसके अनुसार संचरण की प्रक्रिया में अवमंदन की अवस्था में समाज में विक्षोभ की संभावना बनी रहती हैं. यहां विक्षोभ का अभिप्राय समाज में परिवर्तन की उथल-पुथल से है. उससे समाज में वास्तविक परिवर्तन हों, यह आवश्यक नहीं है. इसका कारण है कि लंबे समय तक एक समान स्थितियों में रहने के कारण जनसाधारण अपनी स्थिति से अनुकूलित हो जाते हैं. वे अपना आत्मविश्वास खो देते हैं. मान लेते हैं कि वे केवल अभिजन के संरक्षण में ही सुख-समृद्धि-भरा जीवन जी सकते हैं. उस अवस्था में उन्हें परिवर्तन की संभावना से ही घबराहट होने लगती है. परिवर्तन की सामान्य प्रक्रिया में एक अभिजन समूह का स्थान दूसरा अभिजन समूह ले लेता है. परिणामस्वरूप समाज का ढांचा लगभग अपरिवर्तनीय बना रहता है. समाज में नए वर्गों के उदय एवं पुराने वर्गों के पराभव की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए परेतो लिखता है—

‘व्यक्ति के इस परिसंचार की मंदता के परिणामस्वरूप शीर्षस्थ वर्गों में विकृत तत्वों की भरमार हो सकती है. दूसरी ओर निरंतर शासित हो रहे वर्गों में श्रेष्ठतर तत्वों की वृद्धि हो सकती है. उस अवस्था में समाज में असंतोष की वृद्धि होती है और छोटा-सा आघात भी अवस्था में परिवर्तन में ला सकता है. एक देश के दूसरे देश पर प्रभुत्व अथवा आंतरिक क्रांति से भी सत्ता-शिखर पर उथल-पुथल हो सकती है, इससे जो शासक हैं, वे शासित होकर निम्नस्थ स्थिति में पहुंच सकते हैं, दूसरी और परिस्थितियों का साथ मिलने पर शासित स्वयं को शासक अभिजन के रूप में स्थापित कर सकते हैं.’ (दि सोश्लिष्ट सिस्टम, पृष्ठ 30).

कभी-कभी जनक्रांतियों के माध्यम से शीर्ष पर तीव्र बदलाव होते हैं. अवसर का लाभ उठाते हुए अभिजनेत्तर वर्गों के वास्तविक प्रतिनिधि सत्ता-शिखर पर आसीन हो जाते हैं. अपने अतीत से वे अभिजनेत्तर वर्गों से संबद्ध होते हैं. प्रायः अपने ही वर्गों का विश्वास जीतकर, उन्हें यह भरोसा दिलाते हुए कि सत्ता केंद्र पर कब्जा कर लेने के बाद वे अभिजन और अभिजनेत्तर समूहों के बीच की दूरी को पाटने का प्रयत्न करेंगे तथा सत्ता के अभिजनोन्मुखी चरित्र में आमूल बदलाव लाकर उसे जनोन्मुखी बनाएंगे—वे अपना शासकीय ‘कैरियर’ आरंभ करते हैं. किंतु जनमत के सीधे दबाव के अभाव में, शासनाधिकार प्राप्त होते ही वे अपने वचन और प्रतिबद्धताओं से पीछे हटने लगते हैं. ऐसा हमेशा उनके स्वार्थवश नहीं होता. शक्ति केंद्रों का वर्चस्वकारी माहौल और उसमें अकेला पड़ जाने का डर उन्हें परिस्थितियों से सामन्जस्य बनाने के लिए बाध्य करता है. क्योंकि वहां पहले से ही विद्यमान अभिजन सदस्य अपने हितों को लेकर एकजुट होते हैं. सत्ताकेंद्रों पर प्रतिगामी शक्तियां हावी न हों, अभिजनेत्तर समूहों के निर्वाचित सदस्य निश्चिंत होकर कार्य कर सकें, इसके लिए उनकी अपने समूह के प्रति आस्था और विश्वास जरूरी है. वैकल्पिक जनसंस्कृति के माध्यम से अभिजन वर्गों की मनमानी पर अंकुश लगाया जा सकता है. ऐसी संस्कृति जो न केवल अभिजन संस्कृति के दबावों से सर्वथा मुक्त रहे, बल्कि स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता एवं लोकतंत्र को अनुकूल विस्तार दे सके. ऊपर से इतनी गत्यात्मक भी हो कि समकालीन परिवर्तनों, ज्ञान-विज्ञान संबंधी अधुनातन खोजों, रीति-रिवाजों, परंपराओं तथा लोकेषणाओं को आत्मसात कर उनका लाभ उठा सके. यह कार्य वर्तमान आभासी लोकतंत्र को वास्तविक जनतंत्र में बदलने तथा अभिजनेत्तर समूहों के जनशक्ति के सामर्थ्य से परचाने पर संभव है.

इस अनुच्छेद में हम समावेशी आधुनिकता की अवधारणा पर विचार करेंगे. आधुनिकता नवीनतम ज्ञान, विचार-शैलियों, उत्पादन पद्धतियों को अपनाते हुए निरंतर विकासमान रहने अथवा दिखने की अवस्था है. यह जीवन की गतिशीलता का पर्याय होती है. यह दर्शाती है कि प्राकृतिक रूप से उपलब्ध संसाधनों का शोधन-परिशोधन कर मनुष्य ने उन्हें अपने सुख-स्वार्थ के अनुरूप किस स्तर तक परिवर्तित, परिमार्जित किया है. यह जरूरी नहीं कि संसाधनों के शोधन-परिशोधन का लाभ समाज के सभी वर्गों को समानरूप से प्राप्त हो, किंतु लाभ की मात्र से ही आधुनिकता की कसौटी तय होती है. तदनुसार जो व्यक्ति वैज्ञानिक-तकनीकी आविष्कारों का जितना अधिक लाभ अपने स्वार्थ के लिए उठाता है, वह उतना ही आधुनिक मान लिया जाता है. आधुनिकता सामान्यतः दो प्रकार की हो सकती है. पहली विचारगत, दूसरी परिवेशगत. विचारगत आधुनिकता में नवीनतम ज्ञान तथा उसके अनुप्रयोग को सम्मिलित किया जा सकता है. उसका दायरा बड़ा होता है. विचारगत आधुनिकता व्यक्ति के विवेक, अनुभव, शिक्षा-दीक्षा तथा अन्यान्य स्थितियों पर निर्भर करती है. विचारगत आधुनिकता का दायरा विस्तृत होता है. आवश्यक नहीं कि अभिजन जिसके पास संसाधनों का प्राचुर्य है वह वैचारिक रूप से भी आधुनिक हो. कई बार तो संसाधनों का प्राचुर्य ही अभिजन को ज्ञानार्जन की ललक से दूर ले जाता है. पुराने नवाब, जमींदार, सामंत आदि पढ़ने-लिखने या ज्ञानार्जन की दूसरी गतिविधियों में स्वयं हिस्सा लेने से इसलिए बचते थे, क्योंकि वे मानते थे कि ज्ञानार्जन उनके मातहत वजीर, मंत्री, महामंत्री आदि का धर्म है, जिन्हें वे अपनी हैसियत के अनुसार आसानी से जुटा सकते हैं. वे मानते हैं कि केवल राज करने के लिए बने हैं और उनका यह अधिकार ही उनका गुण है. अपनी वेशभूषा, रहन-सहन आदि में आधुनिक दिखने वाले बहुत से लोग असल जीवन में बेहद कर्मकांडी, रूढ़िवादी और वैचारिक स्तर पर अत्यंत पिछड़े हो सकते हैं. इसके बावजूद विचारगत आधुनिकता यानी ज्ञानानुभव के आधुनिकतम साधनों का सर्वाधिक लाभ अभिजन समूह को प्राप्त होता है. क्योंकि अपने समय के ख्यात बुद्धिजीवी एवं दक्ष पेशेवर निहित स्वार्थ के लिए अभिजन की सेवा के लिए सहर्ष खिंचे चले आते हैं. अभिजनेत्तर समूहों के इन बुद्धिजीवियों की कोशिश अपने समूह के समग्र विकास हेतु आमूल परिवर्तन के बजाय येन-केन-प्रकारेण स्वयं को अभिजन अथवा अर्ध-अभिजन समूह में शामिल कर लेने की होती है. अभिजन शक्तियों की निकटता प्राप्त करने के लालच में वे जनसाधारण के हितों से समझौते करने लगते हैं. अवसर आने पर वे अपने ही वर्ग के बुद्धिजीवियों से स्पर्धा करने में पीछे नहीं रहते. शीर्षस्थ शक्तियों वे आर्थिक, राजनीतिक अथवा धार्मिक चाहे जो हों—की सफलता का रहस्य भी यही होता है कि अपने-अपने मकसद को लेकर वे ऊपर से चाहे जितनी भिन्न और परस्पर असंगत नजर आती हों, भीतर से पूर्णतः एकजुट तथा लक्ष्योन्मुखी होती हैं.

दूसरी ओर अभिजनेत्तर समाज अपनी शिक्षा, तकनीकी कौशल, धर्म, जाति आदि को लेकर छोटे-छोटे अनेक टुकड़ों में बंटा होता है. उदाहरण के लिए एक धर्माचार्य अपने धर्म के समर्थन में विधर्मी आचार्य की आलोचना करेगा, उसके धर्म और मान्यताओं में मीन-मेख निकालेगा. दोनों अपने विचारों के अनुसार समाज को अलग-अलग समूहों में बांटकर परस्पर प्रतिद्वंद्वी नजर आएंगे. उनपर विश्वास करके बहुसंख्यक वर्ग की कुल शक्तियां छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटकर प्रभावहीन हो जाती हैं. दूसरी ओर शिखर पर विराजमान धर्माचार्यों में उन्हीं मुद्दों को लेकर एक-दूसरे से न झगड़ने, सहयोगी रवैया अपनाए रखने तथा एक-दूसरे के अस्तित्व को समर्थन देने का आश्चर्यजनक और अप्रत्याशित समझौता होता है. यही बात राजनीतिक, आर्थिक शक्तियों के बारे में कही जा सकती है. बाजार कब्जाने के लिए दो उद्योगपति आपस में गलाकाट स्पर्धा करते नजर आते हैं. विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च कर वे उपभोक्ता के दिलोदिमाग पर छाने की हर-संभव कोशिश भी करते हैं. दोनों ही बार-बार यह दावा करते हैं कि उन्होंने उपभोक्ता के हितों तथा जरूरतों का ध्यान रखा है. लेकिन उनमें से एक भी न तो उपभोक्ता तक सस्ती वस्तु पहुंचाने के लिए अपने मुनाफे में कटौती करता है, न ही पूंजीगत लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ से संतुष्ट हो जाने का आश्वासन देता है. दोनों उपभोक्ता हितों के संरक्षक होने का दावा करते हुए लाभ को अधिकार मानकर उत्पादन गतिविधि में हिस्सा लेते हैं. अभिजन उत्पादक समूहों की ये चालाकियां उपभोक्ता आमतौर पर समझता है. इसके बावजूद संगठन अथवा सार्थक प्रतिरोध के तरीकों से अनजान होने के कारण वह चुपचाप सहता जाता है. परिर्वतनकामी आंदोलनों की सफलता अभिजनेत्तर समूहों की एकता पर निर्भर करती है. उसके लिए वर्गीय हितों की पहचान कर उनके बीच सामंजस्य बनाए रखना जरूरी है. इसके लिए उन्हें बौद्धिक समर्थन की आवश्यकता पड़ती है. दूसरे शब्दों में वैकल्पिक संस्कृति अथवा जनसंस्कृति की नींव ऐसी आधुनिकता पर निर्भर करती है, जो अभिजनेत्तर वर्गों को हितों की एकता तथा उनके लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देती हो.

परिवेशगत आधुनिकता, आधुनिकता का प्रदर्शनकारी रूप है. उसमें नवीनतम ज्ञान, उत्पादन पद्धतियों तथा प्रौद्योगिकीय लाभों को सम्मिलित किया जा सकता है. यह अभिजन वर्ग के जीवन-स्तर, रुचियों, आपसी व्यवहार, सामाजिक, लाभाकांक्षा आदि से प्रकट होती है. अपनी त्वरा और सफलता के लिए यह भी आधुनिक ज्ञान पर निर्भर होती है. अतः इसकी निरंतरता को बनाए रखने के लिए अभिजन सदैव ज्ञान के नवीनतम स्रोतों की तलाश में रहते हैं. नया ज्ञान जहां भी, जैसे भी मिले, उसको अपने स्वार्थानुरूप प्रयुक्त करना—इसी पर उनकी सफलता निर्भर करती है. जनसाधारण के पिछड़ेपन का यह भी कारण है कि वह ज्ञान के आधुनिकतम प्रकल्पों का अपने वर्गीय हितों के अनुरूप इस्तेमाल करने में अक्षम होता है. इसलिए नहीं कि उसमें प्रतिभा की कमी होती है, बल्कि जैसा ऊपर भी संकेत किया गया है, अभिजन जो कार्य संपादित करता है, अथवा अपनी व्यावसायिक सफलता हेतु योजना-निर्माण से लेकर लार्भाजन तक वह जितने भी कार्यक्रम संचालित करता है, सभी के लिए आवश्यक प्रतिभाएं जनसामान्य के बीच से ही उभरती हैं. अभिजनेत्तर समूहों की कमी होती है कि वे अपने ज्ञान और अनुभव का अपने हितों के अनुरूप उपयोग करने से कतराते हैं. इसके प्रमुख कारणों में से एक संसाधनों की कमी भी है. अन्य कारण है आत्मविश्वास की कमी, जो निरंतर शासित होने, दमन और उत्पीड़न को सहते जाने, गरीबी, बेरोजगारी, संगठन की कमी तथा आपसी अविश्वास के चलते पैदा होता है. संसाधनों की कमी तथा संकट की स्थिति में मदद की अनिश्चितता अभिजनेत्तर वर्गों को खतरा उठाने से रोकती है. परिणामस्वरूप वह अपनी स्थिति से समझौता करने में ही अपनी भलाई समझने लगता है. वर्ग चेतना का अभाव भी अभिजनेत्तर समूहों की एकता में बाधा बनता है. जबकि संगठन एवं ठोस विचार-दृष्टि द्वारा संसाधनों की कमी को काफी हद तक दूर किया जा सकता है. उनीसवीं शताब्दी के मध्य में लंदन के रोशडेल कस्बे के 28 गरीब बुनकरों का उदा