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रूढ़ियों के शिकार धर्म-दर्शन

सामान्य

आधुनिकता की ओर बढ़ती आज की दुनिया के आगे सर्वाधिक ज्वलंत प्रश्न है—क्या दुनिया को धर्म की सचमुच जरूरत है? क्या उसके बिना दुनिया का कारोबार एकदम थम जाएगा? धर्म के आलोचक आज भी कम नहीं हैं। धर्मानुयायी मानते हैं कि उनके आलोचक धर्म के मर्म को समझ ही नहीं पाते। यह बात अलग है कि स्वयं धर्म के अनुयायी भी उसे पूरी तरह समझने का दावा नहीं करते। धर्म की आलोचना, अन्वीक्षा से वे प्रायः यह कहकर पीछे हट जाते हैं कि उसे  समझना आसान नहीं है। इसके पीछे उनकी मंशा धर्म के नाम पर गुरुडम को थोपने तथा उसे ‘नेति-नेति’ कहते हुए इतना महान बना देने की होती है कि सामान्य आलोचना-समीक्षा को भी समाज और राष्ट्रीय भावना के विरुद्ध मान लिया जाता है। असल में वे तयशुदा सीमाओं से, उन सीमाओं से जो उन्होंने धर्म से बंधकर अपने लिए सहर्ष चुनी हैं, अथवा किसी न किसी बहाने उनपर थोप दी गई हैं, बाहर आना ही नहीं चाहते। न ही वे चाहते हैं कि उनका कोई अनुयायी उस सीमा रेखा को लांघने की हिमाकत करे। हम धर्म को ऐसी हवेली मान सकते हैं, जिसके अनेकानेक दावेदार हैं। कदाचित इसी कारण वह हजारों वर्षों से बंद है। ताजी हवा का प्रवेश उसमें निषिद्ध है। उसके भीतर झांकने की इजाजत तक किसी को नहीं है। यदि कोई उस हवेली के भीतर जाकर झाड़-पौंछ करना चाहे तो उसके दावेदार नाराज हो जाते हैं। डरते हैं कि हवेली साफ हुई तो उनकी सत्ता गई। बाहरी हस्तक्षेप को रोकने के लिए वे कई बार इतनी कुटिल चालें चलते हैं कि बड़े-बड़े प्रतिभाशाली उनके आगे घुटने टेक देते हैं। जनसाधारण को बस इतनी अनुमति होती है कि अपने विवेक को गिरवी रखकर उस हवेली के दूर से ही दर्शन कर सके।

ऐसा आज से नहीं, सैकड़ों वर्षों से है। मध्यकाल में इसका सटीक उदाहरण मीमांसक कुमारिल भट्ट हैं। अपने समय के विलक्षण प्रतिभाशाली कुमारिल भट्ट ने बौद्ध विद्वानों को शास्त्रार्थ में परास्त करने के लिए बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया था। वे अपने मकसद में कामयाब भी हुए। बौद्ध पराजित हुए। लेकिन कुमारिल भट्ट अपनों से हार गए। प्रायश्चित स्वरूप उन्हें धीमी आंच में तपकर मृत्यु का वरण करना पड़ा। केवल इसलिए कि उन्होंने गुरु की अनुमति लिए बिना बौद्धमत का अध्ययन किया था। हिंदू धर्म में व्याप्त जड़ता, गुरुडम तथा नए और समकालीन ज्ञान-विज्ञान से जान-बूझकर बनाई गई दूरी को समझने के लिए यहाँ उनकी विशेष चर्चा प्रासंगिक है।

शंकराचार्य से एक पीढ़ी, लगभग 650 ईस्वी पूर्व जन्मे कुमारिल भट्ट वैदिक परंपरा में विश्वास रखते थे। तिब्बतीय बौद्ध ग्रंथों के हवाले से यह भी बताया गया है कि कुमारिल भट्ट के पास धान का विशाल खेत था, जिसमें 500 पुरुष और इतनी ही स्त्रियां दास के रूप में काम करते थे। उन दिनों भारत में बौद्ध दर्शन का बोलबाला था। कुमारिल भट्ट मानते थे कि बिना बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के वैदिक परंपरा का पुनर्जीवन असंभव है। वैदिक धर्म को पुनःस्थापित करने की प्रेरणा उन्हें एक राजकुमारी से मिली थी। राजकुमारी बौद्ध दर्शन से घबराई हुई थी। बौद्ध दर्शन सनातन वर्ण-व्यवस्था और वंशगत अधिकारों का विरोध करता था। द्विज वर्ग की परंपरागत श्रेष्ठता के विचार को अस्वीकार करते हुए वह निर्वाण(मोक्ष) को सर्वसाधारण के लिए संभव बताता था। समानता आधारित दर्शन के कारण बौद्ध दर्शन का प्रभाव, भारत के अलावा आसपास के देशों पर भी था। राजकुमारी को डर था कि बौद्ध धर्म के प्रभाव के चलते उसके वंशगत अधिकार उससे छिन सकते हैं। अद्वितीय प्रतिभा के धनी कुमारिल भट्ट उन दिनों वैदिक परंपरा के ग्रंथों के अध्ययन-अनुशीलन में लगे थे। गुरुजन उनकी मेधा से अत्यंत प्रभावित थे। वंशानुगत अधिकारों के छिन जाने की आशंका से बुरी तरह घबराई राजकुमारी कुमारिल भट्ट से मिलते ही रो पड़ी। उसने रोते-रोते ही अपनी व्यथा प्रकट की—

‘क्या करूं, कहां जाऊं, वेदों का उद्धार कौन करेगा?’

‘हे सुकुमारे! रो मत!! वेदों का उद्धार कुमारिल भट्ट करेगा।’1 

राजकुमारी के आंसुओं से विगलित युवा कुमारिल भट्ट के मुख से सहसा निकला। कहते हैं कि कुमारिल भट्ट ने उसी दिन से बौद्ध धर्म-दर्शन की प्रतिष्ठा को कम करना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन दिनों बिना गुरु की अनुमति के किसी और धर्म-दर्शन की शिक्षा लेना अपराध माना जाता था। लक्ष्य-सिद्धि हेतु कुमारिल भट्ट ने पहले तो बौद्ध धर्म का गहरा अध्ययन किया। तदनंतर, राजकुमारी को दिए गए वचन का निर्वहन करते हुए उन्होंने बौद्ध धर्म-दर्शन की जमकर आलोचना की। यहां तक कि नालंदा जाकर उस समय के प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों को शास्त्रार्थ में पराजित भी किया। लेकिन अपने गुरु से छिपकर बौद्ध दर्शन की शिक्षा लेने की ग्लानि उन्हें लगातार सालती रही। इसलिए प्रायश्चित स्वरूप उन्होंने खुद को धीमी अग्नि शिखाओं के समर्पित कर दिया। बौद्ध धर्म-दर्शन के पराभव के लिए उन्होंने जो जमीन तैयार की, उसी पर चलते हुए वेदांती शंकराचार्य ने अपनी कीर्ति-कथा लिखी। इस योगदान हेतु वैदिक परंपरा के अनुयायी कुमारिल भट्ट को पहला बलिदानी ब्राह्मण मानते हैं।

कहते हैं कि वेदांत की ध्वजा फहराने के लिए निकले शंकराचार्य काशी-मार्ग में कुमारिल भट्ट से भी मिले थे। अपने मत को स्थापित करने के लिए वे उनसे शास्त्रार्थ करना चाहते थे। जिस समय शंकराचार्य कुमारिल के पास पहुंचे, वे स्वयं को धीमी अग्नि युक्त चिता को समर्पित कर चुके थे। उनकी टांगें और शरीर का निचला हिस्सा जल चुका था। उस अवस्था में वे शंकराचार्य से शास्त्रार्थ नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने अपने शिष्य मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ करने का सुझाव दिया। कुमारिल भट्ट को अग्नि-शैय्या पर झुलसता हुआ छोड़, शंकराचार्य वहां से चल दिए। धार्मिक दृष्टिकोण से वह भले ही कुमारिल भट्ट का प्रायश्चित रहा हो, लेकिन व्यापक अर्थों में क्या वह अवसाद-जनित आत्महत्या नहीं थी? यदि ऐसा है तो शंकराचार्य का कुमारिल भट्ट को अग्नि-चिता पर छोड़कर जाना क्या उचित था? क्या उनका यह कर्तव्य नहीं था कि वे कुमारिल भट्ट से आत्महत्या का इरादा त्याग देने का निवेदन करते? उन्हें उस आत्म-ग्लानि से बाहर लाने की कोशिश करते, जिसने आत्महत्या जैसा घृणित कदम उठाने को विवश किया था? सामान्य नैतिकता कहती है कि आत्महत्या को उद्यत व्यक्ति को, वह चाहे जिस कारण से प्राणांत चाहता हो, किसी भी प्रकार से रोका जाए। लेकिन जिस दौर की यह घटना है, उसमें धार्मिक आग्रह हठधर्मी की सीमा तक प्रभावी होते थे। धार्मिक वाद-विवाद प्रायः जीवन-मरण का सवाल बन जाता था। ऐसे में व्यक्ति के साथ उसके विचार का अंत भी स्वाभाविक था। शंकराचार्य से हारकर मींमासक मंडन मिश्र, वेदांती सुरेश्वराचार्य बनकर उसके प्रचार-प्रसार में लग जाते हैं। उसके बाद मीमांसा दर्शन बौद्धिक विमर्श और जीवन दोनों से गायब हो जाता है।

इस प्रसंग के कुछ खास संकेत हैं। पहला प्राचीन गुरु नहीं चाहते थे कि उनका शिष्य ज्ञान और यश में उनसे आगे जाए। दूसरे प्राचीन ऋषियों के लिए बौद्धिक शास्त्रार्थ शारीरिक कुश्ती से भी गया-गुजरा था। कुश्ती में हारा हुआ पहलवान नई तैयारी और हौसले के साथ उसी पहलवान को दुबारा चुनौती दे सकता है। लेकिन शास्त्रार्थ में विजेता, पराजित व्यक्ति के तन और मन दोनों पर अधिकार जमा लेता था। व्यक्ति के साथ उसकी विचारधारा भी पराजित मान ली जाती थी। केवल विजेता का धर्म रह जाता है। कुल मिलाकर विचार को भी अखाड़े में उतर कर प्रतिद्विंद्वी विचारधारा को चुनौती देनी पड़ती थी।

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जैन और बौद्ध धर्म-दर्शन इसके अपवाद थे। यहाँ जैन दर्शन की तो हमें खास तौर पर प्रशंसा करनी होगी। वैदिक हिंसा और गलाकाट बौद्धिक स्पर्धा के बीच उसने ‘स्याद्वाद’ का सिद्धांत सामने रखा था। वह विभिन्न विचारों को स्वतंत्र रूप से, एक-दूसरे के समानांतर बहने की अनुमति देने का उदारतापूर्ण विधान था। इसके अनुसार कोई भी विचार अंतिम सत्य नहीं है। प्रत्येक विचार अपने भीतर सत्य का कोई न कोई अंश छिपाए रखता है। वह पूरा सत्य हो ही नहीं सकता। चार अंधे एक ही बार में हाथी के पूर्ण रूप का बयान नहीं कर सकते। इसलिए उनमें से प्रत्येक द्वारा दिया गया विवरण, सत्य होने के बावजूद सत्य नहीं है। वह पूर्ण सत्य की एकांगी अथवा आंशिक अनुभूति है। ‘स्याद्वाद’ का दर्शन, वैदिक दर्शन की वैचारिक हिंसा के विरोध में उपजा था। लेकिन राजाओं के साम्राज्यवादी मनसूबे साधने के लिए युद्ध आवश्यक थे; और बगैर हिंसा के युद्ध लड़ना संभव ही नहीं था। ऐसे समाज में वैचारिक अहिंसा का कोई व्यावहारिक महत्व न था। अतः कालांतर में हिंसा को उसके स्थूल रूप; यानी केवल जैविक हिंसा तक सीमित मान लिया गया।

‘स्याद्वाद’ से पता चलता है कि जैन दर्शन में अहिंसा का अर्थ कहीं व्यापक था। उसकी कामना थी कि समाज में विभिन्न मतांतर वाले लोग, एक-दूसरे का सम्मान करते हुए जीवन जिएं। उनमें कोई द्वैष न हो। यदि वैचारिक लोकतंत्र होगा, तो लोग एक-दूसरे की भावनाओं का ख्याल रखेंगे, तभी समाज में वैचारिकता के प्रति अनुराग होगा। मगर केवल अपने विचारों को सर्वोपरि समझने, बताने की जिद के चलते, ‘स्याद्वाद’ का विचार समाज में गहरी जड़ें न जमा सका। यह बात भुला दी गई कि हिंसा प्रधान समाज में वैचारिक अहिंसा का टिके रहना असंभव है। वैचारिक लोकतंत्र के समर्थक, ‘स्याद्वाद’ जैसे दर्शन के कमजोर पड़ने का परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मणों ने न केवल दूसरे विचारों की ओर से अपने आँख-नाक-कान बंद कर लिए, अपितु गैर-ब्राह्मण उनके धर्म-ग्रंथों के पढ़ न पाएँ, इसके लिए भी उनपर बड़े-बड़े प्रतिबंध थोप दिए।

हम पुनः कुमारिल भट्ट की कहानी पर लौटते हैं। हमने जाना कि कुमारिल भट्ट को अग्नि-शिखाओं पर आसीन देखकर भी शंकराचार्य का हृदय मोम न हुआ। शायद उनकी उत्कृष्ट मेधा का भय शंकराचार्य को रहा हो; यह आशंका कि कुमारिल भट्ट जैसे विद्वान को पराजित करना शायद उनके लिए संभव न हो! यह भी संभव है कि  वेदोक्त धर्म-दर्शन के शीर्ष-पुरुष बनने की महत्वाकांक्षा के साथ निकले शंकराचार्य, ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहते हों, जिससे उनपर वैदिक परंपरा का दोषी होने का आरोप लगाया जा सके। इसलिए उन्होंने कुमारिल भट्ट को बचाने की कोई कोशिश न की। आज शंकराचार्य के समर्थक उस प्रसंग को गोल-मोल कर जाते हैं। हिंदू परंपराओं के जानकार के लिए इसमें कुछ भी अजूबा नहीं है। परंपरानुगामी भारतीय मेधा घटनाओं के निष्पक्ष विवेचन के बजाय श्रद्धा को महत्व देती है। उसकी कोशिश व्यक्तिगत श्रद्धा को सामूहिक श्रद्धा में बदल देने की रहती है। उस समय यदि शंकराचार्य कुमारिल भट्ट को चिता से उबार लेते तो वेदांत भले ही न जीतता, लेकिन इंसानियत अमर हो जाती।

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यहां एक किस्सा याद आ रहा है। बताते हैं कि रामानुजाचार्य को उनके गुरु ने एक मंत्र दिया था। मंत्र देते समय उन्होंने शिष्य रामानुज के कान में कहा—

‘बहुत पवित्र मंत्र है। जिसे बताओगे वह तर जाएगा।’

‘जी….गुरु जी।’ रामानुज ने गुरु का धन्यबाद किया।

‘लेकिन एक शर्त है। इस मंत्र को किसी अपात्र के समक्ष कभी प्रकट मत करना।’

‘अपात्र कौन?’

‘शूद्र, अछूत, स्त्री….शास्त्रों में उनका उल्लेख है।’

‘यदि मैं ऐसा करूं तो….’

‘घोर पाप….घोर पाप। सीधे रौरव नर्क में जाओगे।’

गुरुजी को दंडवत कर रामानुज वहां से चल दिए। रास्ते में उन्हें जो भी पात्र व्यक्ति दिखाई दिया, सभी को मंत्र दिया। गुरु को जब पता चला कि रामानुजाचार्य पात्र-अपात्र का ध्यान रखे बिना ही दीक्षा दे रहे हैं तो उन्होंने उन्हें बुलवाया, बरजा। गुरु के आदेश का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। तब रामानुजाचार्य ने कहा—

‘आप ही ने कहा था कि जो भी व्यक्ति इस मंत्र का पाठ करेगा, उसका उद्धार होगा?’

‘मैंने यह भी कहा था कि अपात्र को इस मंत्र की दीक्षा दी तो तुम सीधे रौरव नर्क में जाओगे।’

‘यदि मुझ अकेले के नर्क में जाने से इतने सारे लोगों को मुक्ति मिलती है तो मुझे सौ-सौ जन्मों तक नर्क स्वीकार्य है।’ रामानुज का उत्तर था।

इसकी प्रतिक्रिया में रामानुज के गुरु ने क्या कहा होगा, मालूम नहीं। लेकिन उनके साथ अप्रत्यक्ष स्पर्धा में जीत शंकराचार्य की हुई थी। कैसे? रामानुज विशिष्टाद्वैत दर्शन के प्रवर्त्तक थे, और शंकराचार्य अद्वैत के। रामानुज मानते थे कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं, मगर संसार में आकर उनकी अलग-अलग प्रतीति होती है। शंकराचार्य आत्मा और परमात्मा को एक मानते थे। ब्राह्मणों ने घोषित रूप से शंकराचार्य के मत को स्वीकार किया। इस्लाम के सूफीवाद की और से मिल रही चुनौती से निपटने के लिए यह जरूरी था। किंतु आत्मा और परमात्मा एक हैं, इस आधार पर सभी मनुष्य बराबर हैं—इस सत्य को वे कभी गले से नहीं उतार पाए।  

हम यह नहीं कहते कि रामानुज का विशिष्टाद्वैत आदर्श दर्शन है। असल में न तो स्वर्ग होता है, न ही नर्क। मुक्ति स्वयं एक मिथ है। अतएव ऊपर दी गई कहानी को उसकी प्रतीकात्मकता, यानी सामाजिक संदर्भों में समझना चाहिए। कहानी बताती है कि किसी काम से यदि एक व्यक्ति को नुकसान, मगर अनेक को लाभ पहुंचता है तो वह कार्य करणीय हो सकता है, और व्यावहारिक नैतिकता के दायरे में आता है। पूर्ण नैतिकता तब होगी जब बाकी सब लोग, व्यक्ति विशेष को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करने की ठान लें।

अपने मान-अपमान और आलोचनाओं की चिंता किए बिना शंकराचार्य कुमारिल भट्ट जैसे मनीषी की प्राण रक्षा को आगे आते; तो वे मनुष्यता के लिए आदर्श उदाहरण पेश करते। मगर परंपरा से भयभीत शंकराचार्य उस अवसर की जानबूझकर उपेक्षा कर जाते हैं। बहरहाल, बौद्ध दर्शन के अध्ययन हेतु प्रस्थान करते समय कुमारिल भट्ट की मनःस्थिति को लेखक और क्रांतिकारी यशपाल ने खूब समझा था। वे लिखते हैं—

‘कुमारिल भट्ट दो बातें खूब समझते थे। पहली बात यह कि बौद्ध दर्शन उनकी प्रतिपालक और रक्षक द्विज श्रेणी के हित और अधिकारों पर आघात कर रहा है; और दूसरी बात, द्विज श्रेणी के सामाजिक और आर्थिक शासन की वेदोक्त व्यवस्था….द्विज श्रेणी के शासन के अधिकारों का विरोध करने वाले बौद्ध दर्शन की सत्य, अहिंसा और न्याय की मांग—द्विज श्रेणी के अधिकारों की हिंसा करती है। अतः बौद्ध दर्शन से ‘फाइट’ करना आवश्यक है।’2 

कुमारिल भट्ट के प्रायश्चित की घटना द्वारा हम, न केवल उनकी मनोरचना, अपितु तत्कालीन समाज के मनोविज्ञान को  भी समझ सकते हैं। उन दिनों धर्म, दर्शन और विचार की प्रामाणिकता को परखने के उपाय कभी-कभी इतने विचित्र, अविचारी और अस्वाभाविक होते थे कि आज उनपर विश्वास करना कठिन जान पड़ता है। बताते हैं कि नालंदा में बौद्ध दर्शन के अध्ययन के लिए कुमारिल भट्ट ने छद्म नाम से प्रवेश लिया था। वहां के विद्यार्थियों को जब पता चला तो वे बहुत कुपित हुए। उन्होंने कुमारिल को सबक सिखाने की ठान ली। कुछ शरारती लड़कों ने उन्हें विश्वविद्यालय की छत से फैंकने का निश्चय किया।  बौद्ध विचारक वेदों को अप्रामाण्य और मानवकृत मानते थे। बौद्ध दर्शन को मिटाने के कुमारिल भट्ट के संकल्प के पीछे यही मुख्य वजह थी। जब वे लड़के उन्हें कुमारिल को ढकेलने जा रहे थे तब उन्होंने उन सभी को सुनाते हुए कहा था—‘यदि वेद प्रामाण्य हैं तो मुझे कोई भी चोट नहीं पहुंचेगी।’

संयोगवश वे सकुशल बच गए। उसी दिन से कुमारिल ने मान लिया कि वेद स्वतः प्रामाण्य हैं। वह विवेक पर  अंधश्रद्धा की जीत थी। आत्मदहन से पहले कुमारिल भट्ट ने विपुल वाङ्मय की रचना की थी। लेकिन विलक्षण मेधा के बावजूद वे मीमांसा दर्शन को वह सम्मान दिलाने में नाकाम रहे, जिसके वे आचार्य थे। जिसके लिए उन्होंने बौद्धों को पराजित करने की कामना के साथ गुरु-द्रोह किया था। मंडन मिश्र के पराजित होते ही मीमांसा दर्शन लगभग पूरी तरह उखड़ गया। बाद में ब्राह्मणों ने उनके प्रायश्चित का खूब महिमामंडन किया। उससे दर्शन में विचार को जो सम्मान मिलना चाहिए, वह लगातार कम होता गया। उसके स्थान पर कर्मकांड और रूढ़ियां अपनी पकड़ बनाते गए।

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शब्द की कसौटी शब्द; और विचार की कसौटी केवल विचार बन सकता है। बावजूद इसके चमत्कारों और संयोगों के माध्यम से किसी विचार या वस्तु को प्रमाणित करने की प्रवृत्ति भारतीय समाज में बहुत पुरानी है। रूढ़ियों को विचारधारा का रूप देने तथा विरोधी विचारों से सीख लेने के बजाय उन्हें मिटा देने के उदाहरण भी कई हैं। कहीं पढ़ा था कि उज्जैन नगरी में एक ऐसा तालाब था, जिसका उपयोग शास्त्रीय ग्रंथों की जांच के लिए कहा जाता था। तरकीब निराली थी। यदि ग्रंथ तैर जाए तो उसको मौलिक और महत्वपूर्ण मानकर सम्मान मिलता था। अगर डूब जाए तो उसे स्थायी जल-समाधि के लिए छोड़ दिया जाता था। समझ सकते हैं कि वह गुणवत्ता जांच के नाम पर ग्रंथ को ही मिटा देने की बौद्धिक वर्ग की साजिश थी। लोकश्रुति के अनुसार उस तालाब में पांच हजार से अधिक ग्रंथों को इसी तरह डुबोया गया था। बाद में उस तालाब को पाट दिया गया। इस तरह न जाने कितनी बहुमूल्य पांडुलिपियां, केवल इसलिए कि उनमें व्यक्त विचार शासन और उसके चहेते बुद्धिजीवी वर्ग की विचारधारा से मेल नहीं खाते थे, हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर दिए गए। बौद्ध काल में चार्वाक, लोकायत और आजीवक धर्म जैसी भौतिकवादी विचारधाराएं विमर्श में थीं। अजित केशकंबलि, मक्खलि घोषाल, पूर्ण कस्सप जैसे विचारक उनके पोषण में लगे थे। वैदिक परंपरा के पुरोहितों और आचार्यों से उनका शास्त्रार्थ चलता रहता था। इसके बावजूद इन विचारधाराओं से संबंधित स्वतंत्र ग्रंथ हमें प्राप्त नहीं होता। इसके पीछे तत्कालीन आचार्यों की विरोधी विचारधारा के प्रति असहिष्णुता रही है।

संवैधानिक व्यवस्थाओं और लोकतंत्र के इस दौर में होना तो यह चाहिए कि हम इतिहास से कुछ सबक लें, किंतु विचार के नाम पर जड़ता और धर्म-दर्शन के नाम पर असहिष्णुता निरंतर बढ़ती ही जा रही है। शायद ऐसी ही परिस्थितियां डॉ.  आंबेडकर की बहुचर्चित पुस्तक ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ लिखने की प्रेरणा बनी थीं।

ओमप्रकाश कश्यप 

1.   किं करोमि क्वगच्छामि को वेदानुधरिष्यति.

मा रुदसि बाले, कुमारिलभट्टोवेदानुद्धारिष्यति. —यशपाल द्वारा ‘अपने संपर्कों के प्रति मेरे देय’ से उद्धृत, यशपाल के निबंध, पृष्ठ 431.

2 .   यशपाल के निबंध, अपने संपर्कों के प्रति मेरे देय, 431।

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद (Libertarianism)

सामान्य

धर्म और अभिजन संस्कृति—15

 
सम्मानजनक जीवन जीने का एकमात्र रास्ता है, किसी को हानि मत पहुंचाओ, प्रत्येक व्यक्ति को वह सब दो, जो उसकी अपनी कमाई है.1
                                                                         अल्पीनियस(170—235 ईस्वी).

मनुष्य स्वतंत्र प्रकृति की स्वतंत्र संतान है. परतंत्र रहना उसका स्वभाव नहीं है. सामाजिकता की भावना उसमें विवेक और सुरक्षा की चाहत के साथ फूटी है. इस बोध से फूटी है कि अपनी शारीरिक और बौद्धिक सीमाओं के बीच वह अपने लिए सभी सुखों का प्रबंध करने में अक्षम है. यह अपूर्णताबोध केवल मनुष्य की समस्या नहीं है. प्रकृति में हर कोई किसी न किसी प्रकार के अपूर्णताबोध द्वारा ग्रस्त है. उसी के प्रभाव में विराट, विलक्षण और तबीयत से स्वतंत्र प्रकृति स्वयं अनेक मर्यादाओं से आबद्ध होती है. जैसे सूरज समयानुसार उदय-अस्त होता है. ऋतुएं तय समय के अनुरूप बदलती हैं. वनस्पतियां निर्धारित समय पर फलती-फूलती हैं. ऐसे ही मनुष्य की मर्यादाएं भी निर्धारित हैं. समाज मर्यादाओं का सांस्थानिक रूप है; सभ्यता और संस्कृति उनकी तारतम्यता की विकास यात्रा. इस विकासयात्रा की उपलब्धियों में मनुष्य की जरूरतों का बहुत बड़ा योगदान है. मनुष्य की आवश्यकताएं केवल जैविक नहीं हैं. बौद्धिक प्राणी होने के नाते वह आवश्यकताओं का सृजन भी करता है. यह विशेषता उसको अन्य प्राणियों से अलग करती है. यही मनुष्य तथा शेष प्राणियों में अंतर का आधार है. दूसरे प्राणी प्रायः उतना अर्जित करते हैं, जितना उनके तात्कालिक भोग के लिए जरूरी हो. अपने स्वाद और रुचि के अनुसार वे व्यंजन तैयार नहीं करते. भविष्य की ओर से वे लगभग निश्चिंत होते हैं. मनुष्य के साथ ऐसा नहीं है. उसे प्रकृति की ओर से स्मृति का उपहार मिला हुआ है. उसकी मदद से वह अनुभवों को सहेज सकता है. प्राणिजगत में सबसे तेज-तर्रार मस्तिष्क का वह स्वामी है. अनुभवों का विश्लेषण, संश्लेषण आदि कर, वह उनसे सीख ले सकता है. यह गुण उसको श्रेष्ठ उत्पादक बनाता है. एक उत्पादक के रूप में वह अपनी तात्कालिक आवश्यकता से अधिक अर्जित करने में सक्षम होता है. मनुष्य की यह विशेषता उसकी सुदीर्घ सांस्कृतिक यात्रा का आधार रही है. एक प्रश्न और भी है जिसे हम उपर्युक्त विशेषता की निष्पत्ति कह सकते हैं. प्रश्न कुछ यों है कि मनुष्य यदि श्रेष्ठ उत्पादक है तो उसके अतिरिक्त श्रम-कौशल का लाभ किसे प्राप्त होना चाहिए? मनुष्य को, जिसने अपनी सूझबूझ और कठिन परिश्रम से उत्पादन को संभव बनाया है? अथवा उस समाज को जिसका वह सदस्य है, जिसमें रहकर वह ज्ञानानुभव ग्रहण करता है. अपनी निरंतरता में जो मनुष्य के शिक्षण-प्रशिक्षण एवं मानवीकरण में सहायक होता है, जिससे परे मनुष्य की अपनी महत्ता शून्य है. जो उसकी अस्मिता, उसके आत्मगौरव का परिचायक है तथा जिसके आधार पर वह प्राणिजगत से अलग और विशिष्ट होने का दावा करता है. लाभ यदि मनुष्य को मिलना चाहिए तो किस अनुपात में?

यह प्रश्न आज का नहीं है. सभ्यताकरण के आरंभ से ही उत्पादन पर अधिकार तथा उसके न्यायपूर्ण वितरण को लेकर एक चुनौती इंसान के सामने हमेशा रही है. विद्वानों के बीच इसे लेकर मतभेद हैं. एक वर्ग का मानना है कि मनुष्य के श्रम-लाभ पर सबसे पहला अधिकार श्रम-कर्ता का ही होता है. तदनुसार मनुष्य अपने श्रम एवं बुद्धिबल द्वारा जो भी अर्जित करता है, उसका लाभ उसको मिलना ही चाहिए. यह तर्क अपने आप में महत्त्वपूर्ण हैं. लेकिन मनुष्यता की विविधता वैचारिक स्वातंत्र्य में भी है. विद्वानों के दूसरे वर्ग का मानना है कि संसार अनुभवों का विशाल महासागर है. इस महासागर में पीढ़ी-दर-पीढ़ी नया जल अंतरित होता रहता है. नई पीढ़ी अपने अनुभवों का सफर वहां से आरंभ करती है, जहां उसकी पिछली पीढ़ी ने छोड़ा था. इस आधार पर प्रत्येक पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की कर्जमंद होती है, वह जिस अनुभव और ज्ञान-संपदा के बल पर आगे बढ़ती है, वह पिछली पीढ़ियों की ओर से सभ्यता, संस्कृति एवं संचित ज्ञान-संपदा के रूप में प्राप्त होता है. इन्हें सहेजने वाली व्यवस्था का नाम ही समाज है. वह परंपरा एवं सांस्कृतिक प्रवाह के बीच वर्तमान की यात्रा और भविष्य का सपना है. उसका दायित्व मनुष्य को संरक्षण प्रदान करना तथा विकास हेतु अनुकूल वातावरण का सृजन करना है. साथ में उसे भावनात्मक रूप से समृद्ध करते रहना है, ताकि वह योग्य नागरिक बनकर समाज-विकास में अपना अधिकतम योगदान दे सके. अगर समाज यह सब न करे? अगर वह अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट जाए तब? हालांकि समाज के लिए ऐसा करना आसान नहीं होगा, क्योंकि मनुष्य उसकी रचना का आधारस्रोत है. उसकी उपेक्षा करना खुद को संकट में डालना होगा. यदि ऐसा हो जाए तो समाज अस्तित्वहीन हो जाएगा. बिना समाज के मनुष्य और पशु के बीच किसी प्रकार का अंतर ही न रहेगा. इसलिए मनुष्य का कर्तव्य है कि वह समाज, जिसने उसकी कदम-कदम पर सहायता की है—के विकास में अपना भरपूर योगदान दे. इस वर्ग का मानना है कि समस्त संसाधन समाज की सांझी धरोहर हैं. उनके उपयोग अथवा परिशोधन द्वारा मनुष्य जो अर्जित करता है, उसपर संपूर्ण समाज का अधिकार होता है. सभ्यता के आरंभिक वर्षों से लेकर आजतक सामाजिक न्याय के नाम पर जितने भी विचार जन्मे हैं, सभी संसाधनों और अवसरों के न्यायिक वितरण की मांग करते आए हैं. उनमें दृश्यमान अंतर का आधार संसाधनों के वितरण तथा व्यक्ति-स्वातंत्र्य को लेकर उनके स्वतंत्र दृष्टिकोण हैं.

अपनी सीमाओं में मनुष्य समाज से सामंजस्य बनाए रखने का यथासंभव प्रयत्न करता है. स्वतंत्र सामाजिक इकाई के रूप में वह प्रायः यही चाहता है कि अपने योगदान के रूप में कुछ न कुछ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी छोड़ता चले. कुछ ऐसा करे जो समाज के अधिकतम वर्गों के लिए लाभकारी हो. कह सकते हैं कि मनुष्य समाज से यदि कुछ ग्रहण करता है, तो कदाचित परिष्कृत-परिवर्धित रूप में कुछ न कुछ लौटा भी देता है. इसे माटी का कर्ज उतारना कह सकते हैं. सामाजिकता के निर्वाह के लिए यह जरूरी भी है. मगर इस दायित्व का इकतरफा निबाह सरासर असंभव है. यह ठीक है कि मनुष्य के दायित्व बड़े हैं. उनसे वह भाग नहीं सकता. उनका अनुपालन करना मनुष्यता का लक्षण है. लेकिन इससे समाज की जिम्मेदारियां कम होने के बजाय और भी बढ़ जाती हैं. समाजीकरण की प्रक्रिया में मनुष्य को अपनी आजादी का एक अंश कुर्बान करना पड़ता है. यह अंश समाज एवं शासन को शक्तिशाली बनाने में मदद करता है. इस तरह राज्य की कुल शक्ति उनके नागरिकों का विशिष्ट प्रदेय होती हैं. इसकी सफलता हेतु व्यक्ति को समाज के साथ हितों का अनुकूलन भी करना पड़ता है. दूसरे शब्दों में समाज से जुड़ना भले ही मनुष्य की अपनी आवश्यकता हो, सर्वथा निःशुल्क नहीं होता. अपनी स्वतंत्रता के एक हिस्से के रूप में मनुष्य के उसकी कीमत चुकानी पड़ती है. यह कार्य वह समाज की मर्यादा, उसमें सुख और शांति की स्थापना के लिए करता है. इसलिए समाज का कर्तव्य है कि व्यक्ति-हितों का ध्यान रखे. ऐसी व्यवस्था बनाए ताकि संबंधित इकाइयां उससे जुड़ा होने पर गर्व का अनुभव करें. बड़ी, संगठित इकाई होने के नाते समाज के दायित्व भी बड़े हैं. उसका सर्वप्रथम दायित्व है कि वह अपनी सदस्य इकाइयों के सुख का ख्याल रखे. उन्हें कभी अन्याय की प्रतीति न होने दे. उदारतापूर्वक उनकी स्वतंत्रता के अधिकार को बनाए रखे. ध्यान रखे कि शांति और व्यवस्था हेतु लोकहित में कानून आवश्यक हैं, किंतु मनुष्यता किसी भी प्रकार के कानून से ऊपर है. कानूनों का अतिस्त्व मनुष्य से है. मनुष्य उनपर निर्भर नहीं है. मानवीय अस्मिता एवं स्वतंत्रता के आगे हर कानून बौना है. अल्पीनियस की यह नेक सलाह महत्त्वपूर्ण है कि परिस्थितियां चाहे जो भी हों, मनुष्य की ‘स्वतंत्रता को कानून से आबद्ध नहीं होना चाहिए.’2 कानून का ध्येय होना चाहिए, अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख और स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना. ऐसे वातावरण का निर्माण करना, जिसमें मनुष्य अधिकतम स्वतंत्रता के साथ अधिकतम सुखोपभोग कर सके. यह तभी संभव है जब समाज अपनी प्रत्येक इकाई की इच्छाओं का सम्मान करे. व्यक्ति को अपना मंतव्य खुलकर प्रकट करने की आजादी हो.

उत्तरोत्तर बढ़ती सामाजिक जटिलताओं के बीच जहां आधुनिकीकरण और सभ्यताकरण के नाम पर निरंतर नई संस्थाओं का गठन होता रहता हो, वहां मानवीय स्वतंत्रता का संरक्षण असंभव भले न हो, मगर चुनौती-भरा कार्य है. इसलिए भी कि सभ्यताकरण के नाम पर नई संस्थाओं और विधानों का गठन जितनी जल्दबाजी के साथ होता है, वैसी जल्दबाजी लोगों को उससे परचाने, नई व्यवस्था से उसका अनुकूलन करने हेतु नहीं की जाती. जन और अभिजन में विभाजित समाजों में उसके लिए कोई कोशिश भी नहीं होती. मानवीकरण की कोशिशों को पूरी तरह परिस्थिति के भरोसे छोड़ दिया जाता है. परिणामस्वरूप यथार्थ एवं आदर्श; यानी ‘जो है’ और ‘जो होना चाहिए’—का अंतराल निरंतर बढ़ता ही जाता है. लोक-स्वातंत्र्य एवं मानवाधिकारिता के पक्ष में बढ़ती मांगों के दबाव में शासन और शीर्षस्थ अभिजन मिलकर निगरानी संस्थाएं तो खड़ी कर देते हैं, किंतु उनके शिखर पर उन्हीं वर्चस्वकारी शक्तियों का कब्जा होता है, जो जनसाधारण के दमन और दुर्दशा के लिए जिम्मेदार रही हैं; तथा जिनसे मुक्ति की कामना उन संस्थाओं के गठन का मूल उद्देश्य होता है. जिसकी मनमानी के चलते व्यवस्था का अभिजात संस्कृति की ओर झुकाव वर्ष-दर-वर्ष बढ़ता ही जाता है, जिससे आमजन के लिए न्याय निरंतर दुर्लभ और दुरूह होने लगता है. समस्या है कि न तो यह प्रवृत्ति नई है, न संस्थाएं आज पैदा हुई हैं. इतिहास साक्षी है कि समाजीकरण के आरंभ से ही व्यवस्था का चरित्र मूलतः लोक-विरोधी रहा है. उससे पहले परिवार ही समाज था. उसका मुखिया मर्यादाएं निर्धारित कर लेता था. जनसंख्या कम थी, जरूरतें सीमित. ऊपर से पूर्णतः प्रकृति-आधारित जीवन की अनिश्चितता. इसके बावजूद परिवार या कबीलाई गुट में बंटे मनुष्य आपसी संबंधों का युक्ति-युक्त ढंग से निर्वाह कर लेते थे.

जरूरतों को मिल-बांटकर पूरा करने की प्रवृत्ति समाजीकरण की आरंभिक प्रेरणा थी. कालांतर में जनसंख्या बढ़ी. जरूरतें विस्तार लेती गईं. व्यक्ति एक स्थान पर टिककर रहने लगा. तब समस्या के निदान के लिए व्यक्ति की आध्यात्मिक जिज्ञासा, सामाजिक आचारसंहिता तथा सामान्य नैतिकता के योग से धर्म का गठन किया गया, जो एक सर्वथा कल्पित, कथितरूप से सर्वाधिक शक्तिशाली और सर्वेसर्वा परमात्मा की मनमानी के इर्द-गिर्द घूमता है. प्रकृति से डरे, अशीक्षित जनसमाज में धर्म को पूरी जगह मिली. बाद में तो उसे बलात् थोपा जाने लगा था. राजसत्ता और धर्मसत्ता के संयुक्त प्रयासों के परिणामस्वरूप राजा को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि मान लिया गया. अपनी मूल प्रवृत्ति में धर्म ठेठ सामंतवादी था. अपनी विशिष्ट संरचना के कारण ही वह शिखर की ओर देखता था. शिखरस्थ अभिजन उसमें लाभ की अवस्था में थे. धर्म की वर्चस्ववादी, केंद्रोन्मुखी, परंपरानुयायी प्रवृत्ति ने ही सामाजिक स्तरीकरण और ऊंच-नीच की भावना को स्थायित्व देने का काम किया था. लोग धीरे-धीरे उसी में मग्न होते गए. इस बीच समाज और मनुष्य की जरूरतों का दायरा और भी फैलता गया. पंद्रहवीं शताब्दी के वैज्ञानिक प्रबोधन तक यह सिलसिला अबाध चलता रहा. उसके बाद धार्मिक संस्थाओं के औचित्य पर जोर-शोर से सवाल उठाए जाने लगे थे. नए ज्ञान की रोशनी में धर्म के लिए यह संभव न रहा कि वह समाज को पूरी तरह अनुशासित रख सके. उस जरूरत ने आर्थिक साम्राज्यवाद के विचार को जन्म दिया. बहरहाल सभ्यता की यात्रा में मनुष्य निरंतर नई-नवेली संस्थाएं गढ़ता गया. उनसे संतुलन बनाए की चाहत में मनुष्य को हर बार नई अनुशासन प्रणाली को अपनाना पड़ा. हर बार उसे अपनी स्वतंत्रता के एक हिस्से की बलि देनी पड़ी. यह जानते हुए भी कि ‘प्रत्येक व्यक्ति को उसके अधिकार दिलाने की दृढ़ और स्थायी इच्छा ही न्याय है.’3 समाज अपनी सभी इकाइयों को एकसमान न्याय उपलब्ध कराने, उसकी स्वतंत्रता के अधिकतम स्तर को अक्षुण्ण रखने के अपने मूलभूत ध्येय से निरंतर दूर होता गया.

सामान्य परिस्थितियों में मनुष्य दो प्रकार की स्वतंत्रता की परिकल्पना करता है. पहली राजनीतिक स्वतंत्रता, यानी सामाजिक मर्यादाओं के भीतर स्वतंत्र नागरिक जीवन जीने की स्वतंत्रता. स्वतंत्र, सामाजिक जीवन के लिए अर्थ भी महत्त्वपूर्ण होता है, अतएव आर्थिक स्वतंत्रता का भाव भी इसी में सन्निहित है. तदनुसार दूसरी स्वतंत्रता है, अवसरों की समानता के बीच विधिपूर्ण ढंग से संपत्ति उपार्जन करने तथा उसका बगैर किसी प्रतिबंध के इच्छानुसार भोग करने की स्वतंत्रता. अपने नागरिकों के लिए दोनों स्वतंत्रताओं को सुनिश्चित करना किसी भी कल्याण राज्य का प्रथम-संकल्प होना चाहिए. न्याय के इस रूप की व्याख्या को इच्छा-स्वातंत्र्यवाद या ‘लिबरटेरियनिज्म’ कहा जाता है. इस न्यायवादी विचारधारा के अनुसार सभी मनुष्य एकसमान है. अतएव राज्य का कर्तव्य है कि वह व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता को बनाए रखे. यहां स्वतंत्रता का अर्थ उसके सामान्य अर्थों से कहीं व्यापक है. उसमें अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य, अवसरों की समानता के साथ संपत्ति अधिकार भी सम्मिलित हैं. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों के अनुसार आर्थिक स्वतंत्रता एवं उपयुक्त संपत्ति प्राधिकार के बगैर राजनीतिक स्वतंत्रता अर्थहीन है. इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार संपत्ति अर्जित करने तथा उसका इच्छानुसार भोग करने का अधिकार मिलना ही चाहिए. जान हास्पर्स के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का स्वामी है. किसी भी व्यक्ति को किसी दूसरे के जीवन का स्वामित्व हासिल नहीं है. इसलिए एक व्यक्ति का दूसरे के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप सर्वथा अनुचित है. इच्छा-स्वातंत्र्यवाद आधुनिक मानवतावादी दर्शन है. पुरानी विचारधाराओं से हटकर. ‘प्राचीन एवं आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत परंपरागत रूप से इस बात पर ध्यान देते थे कि कौन स्वामी होगा और कौन दास और कौन दास….’4 इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों के अनुसार, ‘न तो कोई किसी का स्वामी है, न ही कोई किसी का दास. जिस प्रकार अपने बारे में एकमात्र मुझे यह तय करने का अधिकार है कि मेरा जीवन किस प्रकार का हो, उसी प्रकार तुम्हें अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने का पूरा-पूरा अधिकार है. मैं चाहे जितना शक्तिशाली होऊं, या फिर सत्ता मेरी मुट्ठी में हो, इसके बावजूद तुम्हें दास बनाकर तुम्हारा स्वामी बन बैठने का कतई अधिकार नहीं है, इसी तरह तुम्हें भी यह अधिकार नहीं है कि मुझे गुलाम बनाकर मेरे हाकिम बन जाओ. दासता बलात् ताबेदारी है.’5 अतएव प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह अपने पसंदीदा कार्यक्षेत्र को चुने और इच्छानुसार काम भी करे. बशर्ते उसके कार्य से किसी अन्य व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित न होती हो.

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद का जन्म बीसवीं शताब्दी के उस दौर में हुआ, जब पूंजीवाद समाजार्थिक एवं राजनीतिक सत्ताओं पर अपना प्रभुत्व जमा चुका था. साम्राज्यवाद अपने पराभव के दौर में था, वैज्ञानिक प्रबोधन के बीच पुरानी विचारधाराओं के आगे प्रश्न-चिह्न लग चुका था. नई प्रौद्योगिकी के आगमन से परंपरागत उत्पादन प्रविधियों पर संकट मंडराने लगा था. बड़ी पूंजीपति कंपनियां लोगों के दिलो-दिमाग पर कब्जा कर, उसको अनुगामी उपभोक्ता में ढाल देना चाहती थीं. राजनीतिक अस्थिरता एवं अदूरदर्शिता के बीच महत्त्वपूर्ण निर्णयों पर पूंजीपति घरानों का असर साफ नजर आने लगा था. उनकी ओर से निहित स्वार्थ हेतु उपभोक्ताकरण का अभियान जोर-शोर से चलाया जा रहा था. तेजी से उभरता मीडिया उनका सबसे बड़ा मददगार बना हुआ था. ऐसे प्रलोभनकारी परिवेश में मनुष्य की भौतिक इच्छाओं का फैलाव अवश्यंभावी था. यही पूंजीवादी शक्तियां भी चाहती थीं कि मनुष्य परंपरागत विधानों, विशेषकर उन व्यवस्थाओं के जो उसे संयम और त्याग का पाठ पढ़ाती हैं, सांसारिक सुखामोदों को निस्सार समझती हैं—के नियंत्रण से मुक्त हो. उससे पहले धर्म और सामंती संस्कारों के रूप में अनेक बेड़ियां मनुष्य अनेक को जकड़े हुए थी. विचारकों का बड़ा वर्ग उनसे बाहर लाने को कटिबद्ध था. फलस्वरूप बीसवीं शताब्दी तक मानवीय स्वतंत्रता और समानता के पक्ष में माहौल पूरी तरह बन चुका था. नए विचारों के आलोक में विश्व-भर में लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत हुईं. उनका संघर्ष किसी भी प्रकार के वर्चस्ववाद के विरुद्ध था. इस बीच अपनी अनुकूलनवादी प्रवृत्ति के कारण पूंजीवादी ताकतें भी लोकतांत्रिक परिवेश का लाभ उठाने में कामयाब हुईं. शती के मध्याह्न तक पूंजीवाद दुनिया के आधे से अधिक देशों को अपने प्रभाव में ले चुका था. दूसरे विश्वयुद्ध में हुई भीषण जनहानि और पश्चातापग्रस्त राजनीति ने उसे अपने पांव फैलाने का कुछ और मौका दिया. फलस्वरूप मानवाधिकार समर्थक ऐसे अनेक बुद्धिजीवी प्रकाश में आए, जो पूंजीवाद की चमक-दमक से प्रभावित थे और उसी में मानवीय समस्याओं का हल खोजते थे. इच्छा-स्वातंत्र्यवाद जैसी मुखर विचारधाराओं का उभार उसी दौर की घटना है.

‘इच्छा-स्वातंत्र्यवाद’ का अभिप्राय केवल रुचियों की स्वतंत्रता पर विचार करना नहीं है. अपने समर्थकों की निगाह में यह सामाजिक न्याय की उदात्त भावना पर केंद्रित व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का विधान है. आदमी स्वतंत्र होगा, तभी वह स्वयं को अभिव्यक्त करने का साहस जुटा पाएगा, तभी वह अधिकतम इच्छाओं को अभिव्यक्त कर, उनकी पूर्ति के लिए आखिर तक, समर्पित भाव से काम करने में सक्षम होगा. इच्छा-स्वातंत्र्यवाद नागरिकों को वैचारिक आजादी देता है. उनका विवेकीकरण कर, स्वतंत्रता से प्रेम करना सिखाता है. उसमें मनुष्य को विश्वास होता है कि समाज में उसकी इच्छा के विरुद्ध यदि कुछ भी अप्रिय होगा, तो पूरा समाज मददगार की भूमिका में उसके साथ खड़ा नजर आएगा. स्वेच्छानुसार तय की गई मर्यादाओं के बावजूद वह इतना स्वाधीन और मुक्त होगा कि बगैर किसी बाहरी प्रतिबंधों के अपने लक्ष्य का निर्धारण कर सके. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों का मानना है कि उस व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति हर वह वस्तु प्राप्त करने में सक्षम होगा, जिसको वह अपने लिए जरूरी मानता है. उसे अपने भविष्य को ऐच्छिक दिशा देने की भरपूर स्वतंत्रता होगी. राज्य का एकमात्र उद्देश्य अपने नागरिकों के हितों की सुरक्षा करना है. यह कार्य मनुष्य की अधिकतम स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने की भावना के साथ किया जाना चाहिए. इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों के अनुसार प्रत्येक नागरिक के सामान्य अधिकार होते हैं. वही कल्याणराज्य की परिकल्पना को साकार करने में सक्षम है. उनके अनुसार मानवाधिकार केवल मनुष्य को उसके नागरिक अधिकारों से ही नहीं परचाते. उनकी उपस्थिति दूसरे व्यक्तियों को भी उतने ही अधिकार देती है जितने मनुष्य को स्वतंत्र और सम्मानजनक जीवन जीने के लिए आवश्यक हों. उन्हें ‘कुदरती राज्य’ की स्वच्छदतावादी अवधारणा प्रिय है. उसे वे राज्य के न्यूनतम नियंत्रण के बीच आधुनिक राष्ट्र-राज्यवादी चेतनाओं के बीच भी जिलाए रखना चाहते हैं. प्रकारांतर में वे स्वच्छंद आचरण यानी स्वतंत्रता को स्वच्छंदता मान लेने से भी रोकते हैं. मगर स्वतंत्रता कोई नया प्रत्यय नहीं है. लॉक की ‘प्राकृतिक राज्य’ की अवधारणा के अनुसार वह मनुष्य को जन्म से ही प्राप्त होती है. उसी तरह संपत्ति भी प्रकृति का अंश है. स्वतंत्रता के सिद्धांत के अनुसार दूसरों पर अधिकर करना भी अनुचित एवं प्रकृति-विरुद्ध आचरण है. फिर इच्छा-स्वातंत्र्यवादी अभिव्यक्ति और संपत्ति अधिकार की स्वतंत्रता पर इतना जोर क्यों देते हैं? उनमें और दूसरे स्वतंत्रतावादियों में प्रमुख अंतर क्या हैं? इसपर विचार करने के लिए इच्छा-स्वातंत्र्यवाद की वैचारिकी में गहरे उतरना पड़ेगा.

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद के प्रमुख विचारक जॉन हॉस्पर्स(1918—2011) तथा राबर्ट नॉजिक(1938—2002) रहे हैं. अपनी पुस्तक ‘लिबरटेरियन मेनीफेस्टो’ में हॉस्पर्स लिखता है—‘प्रत्येक मनुष्य अपना स्वामी है. सभी स्वतंत्र हैं. किसी को किसी पर अधिकार नहीं है.’ उसके अनुसार प्रत्येक मनुष्य अपनी रुचि एवं जरूरत के अनुसार कार्य करने के लिए स्वतंत्र है, बशर्ते उस कदम से किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन में किसी प्रकार का अवांछित हस्तक्षेप न होता हो. न ही उस व्यक्ति को लगे कि उसकी उपेक्षा की जा रही है. वह इस बात पर जोर देता है कि समाज में न तो कोई स्वामी है, न दास. या तो सभी स्वामी हैं अथवा सभी दास. दूसरे शब्दों में प्रत्येक मनुष्य अपना स्वामी है. इसलिए किसी भी मनुष्य को यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरे के जीवन में हस्तक्षेप कर सके. यह स्वतंत्रताबोध ही इच्छा-स्वातंत्र्यवाद की आधारशिला है. रूसो से लेकर लॉक तक इसी का समर्थन करते आए हैं. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक इसका जोरदार समर्थन करते हैं. इतना कि कई बार उनका स्वातंत्र्यबोध नकारात्मक दिखने लगता है. अधिकारों को लेकर भी इच्छा-स्वातंत्र्यवादी काफी उदार हैं. उसमें वे सभी अधिकार सम्मिलित हैं जिन्हें आधुनिक विचारक मानवाधिकार के अंतर्गत सम्मिलित करते हैं. उनका मानना है कि मनुष्य को संपत्ति अर्जित करने का पूरा अधिकार प्राप्त होना चाहिए. प्रकारांतर में उन्हें पूंजीवाद से भी परहेज नहीं हैं. संपत्ति अधिकार को वे मानवीय स्वतंत्रता और अस्मिता की सुरक्षा के लिए अनिवार्य मानते हैं. उनके लिए संपत्ति अधिकार के बगैर नागरिक अधिकार की परिकल्पना अनौचित्यपूर्ण है.

इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों के लिए संपत्ति का आशय महज जमीन-जायदाद या नकदी तक सीमित नहीं है. उनके लिए हर वह वस्तु जिसे कोई व्यक्ति अपना होने का दावा करते हुए, गर्वानुभूति करता है—संपत्ति की श्रेणी में आती है. जैसे आभूषण, पुस्तक, वस्त्राभरण आदि. यही नहीं ज्ञान, कला-कौशल, क्षेत्र-विशेष में अर्जित विशेष योग्यता और बौद्धिक संपदा को भी वे संपत्ति की श्रेणी में रखते हैं. उनके अनुसार ऐसी बहुत-सी चीजें संपत्ति कही जा सकती हैं, जिन्हें केवल कुछ चुने हुए लोग पसंद करते हों. उन्हें लेकर समाज में बहुत स्पर्धा की भावना भी न हो. चूंकि उनके होने से व्यक्ति को कुछ होने की गर्वानुभूति होने लगती है, इसलिए वे संपत्ति का ही अपररूप हैं. विचारधारा के रूप में इच्छा-स्वातंत्र्यवाद का उद्भव बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अमेरिका में हुआ. तब तक लोकतंत्र पर पूंजीवादी ताकतें अपना प्रभुत्व जमा चुकी थीं. लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कारपोरेट संस्कृति का असर साफ दिखने लगा था. संभवतः उसी से सम्मोहित इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक व्यक्तिवाद का महिमा-मंडन करते हुए, सर्वस्वातंत्र्य की भावना को उदार-समाज के प्रमुख लक्षण के रूप में देखते हैं. लेकिन किसी भी विचार को सामाजिक मान्यता दिलाना सामान्य नैतिकता को बीच में लाए बिना असंभव है. तदनुसार संपत्ति पर अधिकार का आशय यह हरगिज नहीं है कि किसी की भी संपत्ति को कब्जाकर उसपर अपना दावा ठोक दिया जाए. जैसा कि प्राचीन काल में साम्राज्यवादी सोच के चलते होता था. जब कोई सम्राट अपनी सैन्य-शक्ति या कूटनीति द्वारा किसी राज्य पर कब्जा कर ले तो वह उसका अधिकार मान लिया जाता था. संपत्ति अधिकार की प्राचीन परिभाषा में वह उचित माना जाता है. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी इस मायने में व्यावहारिक नैतिकता का समर्थन करते हुए नजर आते हैं. उनके अनुसार संपत्ति अधिकारिता का अभिप्राय वैध तरीकों द्वारा अर्जित संपत्ति पर अधिकार, फिर उसका सकारात्मक ढंग से समाज की कुल उत्पादन क्षमता में वृद्धि हेतु उपयोग किए जाने से है. ताकि समाज विकास की ओर अग्रसर रह सके. कुल मिलाकर संपत्ति से उनका आशय उस धन से है जो आसानी से, स्वैच्छिक आदान-प्रदान की सीमा में आता है. और उसपर अधिकारिता के मायने संपत्ति का अपने संपूर्ण सामर्थ्य से, अपने साथ-साथ लोकहित में उपयोग करने से है. लोगों को संपत्ति अधिकार से वंचित करना, उनसे उनके मूलभूत अधिकार जो उन्हें मनुष्य होने का बोध कराते हैं—छीन लेना है. व्यक्तिमात्र के लिए स्वतंत्रता अपने भविष्य की बेहतरी के लिए सोचने तथा उसके लिए पर्याप्त योजनाएं विकसित करने में देखी जाती है.

इच्छा-स्वांतत्र्यवादियों के अनुसार मानवीय इच्छा और कर्तव्य को निर्धारित करने वाले अधिकार उदार होने चाहिए. उनका स्वरूप ऐसा होना चाहिए कि समाज का कमजोर से कमजोर व्यक्ति उनका लाभ उठा सके. संपत्ति जुटाने तथा उसके हस्तांतरण संबंधी अधिकार मनुष्य की पसंद तथा उसकी कार्यशैली की स्वतंत्रता के लिए आवश्यक हैं. यदि व्यक्ति को अपने जीवन के बारे में उपयुक्त निर्णय लेने, विकास के लिए योजनाएं बनाने या अपने ही श्रम के लाभों से वंचित कर दिया जाए? यदि उसको स्वतंत्र बताते हुए उससे अभिव्यक्ति के अधिकार को ही छीन लिया जाए? उस अवस्था में स्वतंत्रता और समानता के कोई मायने ही नहीं रहेंगे. यहां विचारणीय है कि बौद्धिक संपदा, शिल्प-कौशल, व्यावसायिक हुनर, श्रम आदि को छोड़ दिया जाए तो संपत्ति प्रायः प्रकृति का हिस्सा होती है. इस नाते वह पूरे समाज की है. बल्कि उन समाजों की है जो धरती पर कहीं भी किसी भी रूप में मौजूद हैं. जड़ वस्तुओं की भांति मनुष्य भी कहीं न कहीं प्रकृति के नियमों से अनुशासित होता है. सवाल है कि क्या एक प्राकृतिक वस्तु या प्राणी का दूसरी प्राकृतिक वस्तु या प्राणी पर अधिकार न्यायोचित है. बीसवीं शताब्दी में जितनी भी मानवतावादी विचारधाराएं उभरीं, वे इस इसके पक्ष, विपक्ष और समन्वय का ही लेखा हैं. मनुष्य हालांकि अन्य प्राणियों और वस्तुजगत की भांति प्रकृति का ही हिस्सा हैं. घर्षण, जड़त्व, गुरुत्वाकर्षण आदि प्रभाव जैसे जड़ वस्तुओं और जीवजगत को प्रभावित करते हैं, मनुष्य भी उनसे उसी तरह प्रभावित होता है. अंतर केवल इतना है कि सहस्राब्दियों के अंतराल में मनुष्य ने अपनी बुद्धि विकसित की है. यही वह गुण है जिसके आधार पर वह शेष प्राणियों और वस्तुजगत पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करता आया है. उसी के आधार पर वह प्राकृतिक संसाधनों का अपने हित में शोधन, परिशोधन करता रहता है. चूंकि प्रत्येक मनुष्य का बौद्धिक सामर्थ्य और समाज निर्माण में उसका योगदान भिन्न होता है, यह मनुष्य की अपनी योग्यता पर भी निर्भर करता आया है, इसलिए मनुष्य के संबंध में संपत्ति अधिकारों की स्वतंत्र व्याख्या की आवश्यकता हमेशा रही है. मनुष्य की सीमा है कि वह प्रकृति में मौजूद पदार्थ को केवल वस्तु में बदल सकता है. उसका शोधन-परिशोधन कर सकता है. पदार्थ को बना नहीं सकता. यदि किसी मनुष्य का संपत्ति पर अधिकार है तो वह संबंधित वस्तु के शोधन-प्रशोधन में किए गए योगदान तक सीमित रहना चाहिए. जॉन लॉक की ओर से आए ये विचार कालांतर में इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों की प्रेरणा बने. उनमें से अधिकांश का मानना था कि अभिव्यक्ति या अभिमत के अधिकार के बिना स्वतंत्रता असंभव है. इसलिए संपत्ति अधिकारों की रूपरेखा, योजनावद्ध तरीके से, कुल समाज के दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए. यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी का संपत्ति अधिकार दूसरों के अधिकार में बाधा न बने.

इच्छा-स्वांतत्र्यवादी विचारकों के अनुसार संपत्ति उपार्जन की दो मान्य विधियां हैं. पहला दो व्यक्तियों अथवा दो समूहों अथवा व्यक्ति और समूह के बीच हुआ अंतरण. उसके अनुसार संपत्ति का यह अंतरण न्यायसंगत होना चाहिए. समाज द्वारा घोषित ऐसे तरीके से संपत्ति अंतरण ही कानून सम्मत कहा जाएगा. जिसमें क्रेता और विक्रेता दोनों के बीच विश्वास की भावना हो. अंतरण के बाद भी क्रेता को लगे कि उसके साथ कोई धोखा या छल नहीं हुआ है. वहीं विक्रेता को यह विश्वास होना चाहिए कि वह किए गए भुगतान के बदले उपयुक्त मूल्य की संपत्ति प्राप्त कर चुका है. श्रम, बौद्धिक संपदा तथा ऐसे सभी उपार्जन जो पूर्ण संपत्ति-प्राधिकार के साथ संपन्न होते हैं, इसी श्रेणी में आते हैं. उपार्जन की दूसरी श्रेणी में अस्वामित्व युक्त संपत्ति से स्वामित्व युक्त संपत्ति का अंतरण आता है. यानी ऐसा उपार्जन जो किसी व्यक्ति द्वारा ऐसी संपत्ति के माध्यम से किया गया हो, जिसका वह स्वामी ही नहीं है. उल्लेखनीय है कि श्रम पर सबसे पहला अधिकार श्रमिक का होता है. यदि कोई व्यक्ति श्रम का वाजिब मूल्य, यानी श्रम के मूल्यांकन का अधिकार छीनकर उसके उत्पाद पर कब्जा कर लेता है. तब उसका मामला दूसरी श्रेणी में आता है. यह कुछ ऐसा ही है जैसे कोई जमींदार उस जमीन की फसल को घर ले जाए, जो उसने अपनी दबंगई के आधार पर कब्जाई हुई है. इच्छा-स्वातंत्र्यवाद के अनुसार व्यक्ति का संपत्ति पर अधिकार तभी मान्य है, जब उसे विधि-मान्य तरीकों द्वारा अर्जित किया गया हो. इसमें न्यायपूर्ण आधार पर अर्जित संपत्ति के वे सभी अपररूप सम्मिलित हैं, जिन्हें मनुष्य इस श्रेणी में सम्मिलित करता आया है. उनकी निगाह में संपत्ति अर्जन का दूसरा तरीका निकृष्ट है. यह मानवीय स्वतंत्रता के दायरे में अनावश्यक और अनुचित हस्तक्षेप करता है. यदि संपत्ति का अंतरण न्यायपूर्ण ढंग से हुआ है, तो उसके आधार पर समाज में असमान आर्थिक वितरण को भी मान्यता देनी होगी. इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों को ऐसी आर्थिक असमानता से भी गुरेज नहीं है. यहां वे मानवीय इच्छा के निर्माण में उन वर्चस्वकारी शक्तियों की अदृश्य भूमिका की उपेक्षा कर देते हैं, जो समाजार्थिक असमानता तथा तज्जनित ऊंच-नीच की भावना के वास्तविक कारण होते हैं. वे सामाजिक असमानताओं की बीच पनपते हैं; तथा मनुष्य के सोच पर नकारात्मक असर डालते हैं. जिनके चलते श्रमिक से उसके श्रम के मूल्यांकन का वैध अधिकार देखते ही देखते छीन लिया जाता है. उसके अभाव में मनुष्य का स्वातंत्र्य-बोध शीर्षस्थ शक्तियों का विशेषाधिकार उनकी अनुकंपा तक सिमट जाता है. तदनुसार इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों के लिए संपत्ति का असमान वितरण कोई महत्त्व नहीं रखता. चाहे हर व्यक्ति को उसकी आवश्यकतानुरूप संपत्ति प्राप्त हो अथवा वह कुछेक हाथों में सिमट जाए. वे इसे व्यक्ति-स्वातंत्र्य के उपहार के रूप में देखते हैं.

इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों की दृष्टि में नियोजित अर्थव्यवस्था उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितनी निजी स्वतंत्रता तथा व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा का मान-सम्मान. उसमें व्यक्ति को न केवल संपत्ति-अधिकार, बल्कि संगठन बनाने, मुक्त व्यापार करने की आजादी प्राप्त होती है. शर्त केवल इतनी है कि उसके द्वारा किया गया कार्य विधि-सम्मत होना चाहिए. निजी-अधिकारिता पर जरा-सा अंकुश, मामूली नियंत्रण उन्हें स्वीकार्य नहीं है. पूंजीवाद भी कुछ ऐसा ही चाहता है. उनका मानना है कि व्यक्ति जितना नियंत्रण मुक्त होगा, उतना उसके उपभोक्ताकरण में आसानी रहेगी. यदि वह अकेलापन अनुभव करेगा तो उसके खालीपन को भरने के लिए नई वस्तुओं का बाजार बढ़ेगा. इससे कुल मिलाकर पूंजीपतियों का ही लाभ होगा. उल्लेखनीय है कि उनीसवीं शताब्दी में सुखवादी विचारक भी पूंजीवाद को व्यक्तिमात्र के सुख के विस्तार के लिए जरूरी मानते थे. उनका मानना था कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से समाज-कल्याण में वृद्धि होगी और सुख जो प्रत्येक मनुष्य के जीवन का ध्येय है, उसका लोग अधिकाधिक भोग कर सकेंगे. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी भी पूंजीवाद का समर्थन करते हैं, लेकिन केवल सुख के लिए नहीं. उनकी दृष्टि में व्यक्ति-स्वातंत्र्य का मूल्य ‘व्यक्तिमात्र के सुख’ से कहीं अधिक है. अधिकारों की समानता को बढ़ावा दिए बगैर भ्रष्टाचार, धोखादड़ी और बाजार की मनमानियों पर रोकथाम असंभव है. इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों को कल्याण राज्य की अवधारणा भी अमान्य है. कल्याण राज्य के मूल लक्ष्य अर्थात लोगों के भले के लिए अनिवार्य संस्थाओं का गठन, सामाजिक सुरक्षा, श्रम-कल्याण, स्वास्थ्य संबंधी देखभाल, स्वास्थ्य बीमा, रंगभेद तथा लैंगिक पक्षपात पर रोकथाम वाले कानून बना देने से उन्हें संतोष नहीं है. इसके बजाय वे व्यक्तिमात्र की संपूर्ण स्वतंत्रता पर जोर देते हैं. सब आजाद होंगे, परस्पर बराबर होंगे तो समाज में शोषण के लिए जगह न बचेगी—ऐसा वे मानते हैं. उनका यह भी मानना है कि लोगों को पूर्ण संपत्ति अधिकार देने के साथ-साथ इच्छानुसार संगठन बनाने, अपनी निधियों का अपने भले के लिए उपयोग करने की संपूर्ण आजादी होनी चाहिए. मगर उनकी कमजोरी है कि व्यक्ति-स्वातंत्र्य का पक्ष लेते-लेते कई बार वे अपनी सीमा के पार निकल जाते हैं. ‘अति सर्वत्र वज्र्यते’ की चेतावनी उन्हें याद नहीं रहती. यदि कोई व्यक्ति रंगभेद समर्थक सोच के कारण अपने संस्थान में केवल गोरों को नौकरी पर रखना चाहता है तो, इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों के अनुसार उसे इसका भी अधिकार है. शेष समाज को उसके अधिकार का सम्मान करना चाहिए. बशर्ते उसके कृत्य से किसी हिंसक व्यवहार या दूसरों के जीवन में हस्तक्षेप न होता हो. ऐसे ही यदि कोई गृह-स्वामी अपने भवन को अपने ही वर्ण के किसी व्यक्ति को बेचना चाहता है, तो उसको भी इसका अधिकार है. उनके अनुसार न्याय की मांग है कि यह अधिकार उन्हें मिलना ही चाहिए. बशर्ते वह दूसरों के जीवन का उतना ही सम्मान करता हो, जितने सम्मान की अपेक्षा वह दूसरों से अपने लिए रखता है. यहां वे भूल जाते हैं कि वर्णभेद या किसी अन्य प्राकृतिक या सामाजिक कारण जो व्यक्ति के नियंत्रण में न हो, से लोगों को उनके वाजिब अधिकारों से वंचित कर देना—उनके जीवन में अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप है. चूंकि कोई व्यक्ति नहीं चाहता कि उसे उन कारणों के लिए दंडित किया जाए, जो प्राकृतिक होने के कारण उसके नियंत्रण से बाहर हैं, इसलिए इच्छा-स्वातंत्र्यवादियों की स्वतंत्रता संबंधी अवधारणा में किंचित दोषपूर्ण नजर आती है.

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद की विशेषता जिसे उसका नकारात्मक पक्ष कहा जाएगा, यह है कि रंगभेद, जाति, धर्म अथवा क्षेत्रीयता की भावना से ग्रस्त कोई व्यक्ति यदि अपनी इच्छा और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य के बहाने किसी प्रकार का पूर्वाग्रह रखता है, तो इच्छा-स्वातंत्र्यवादी उसे व्यक्ति-स्वातंत्र्य की सीमा में रखकर स्वीकार्य मान लेता है. व्यक्ति रंगभेद की भावनाओं से मुक्त हो, इसके लिए भी व्यक्ति-स्वातंत्र्य की भावना को परम के स्तर तक ऊपर उठाना होगा. यह केवल व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है. समाज का भी दायित्व है कि वह ऐसा वातावरण निर्मित करे जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता और समानता का अधिकतम आनंद ले सके. आशय यही है कि मनुष्य अच्छे हों, इसके लिए समाज को अपनी अच्छाई के उच्च मापदंड स्थापित करने होंगे, ताकि उसके सदस्य अपने भीतर से ही प्रेरणाएं ग्रहण कर सकें. समाज में समानता एवं स्वतंत्रता का उच्चतम स्तर बना रहा तो व्यक्ति की रंग अथवा लिंग के आधार पर पक्षपातपूर्ण निर्णय लेने की इच्छा ही नहीं रहेगी. इस तरह इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक मानव-मात्र के सुख की कल्पना करते हुए उसके आधार पर आदर्श समाज की रचना का सपना देखते हैं. अपनी विचारधारा के प्रति उनका गजब का सम्मोहन है. मानते हैं कि इच्छा-स्वातंत्र्यवाद के माध्यम से ही मानवीकरण के उच्चतम लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. दूसरी ओर उसके आलोचकों का मानना है कि वह व्यक्ति-स्वातंत्र्य की आड़ में रंग-भेद, लैंगिक असमानता आदि का समर्थन कर, परोक्ष रूप में नकारात्मक अधिकारों की स्थापना करता है. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक अर्थव्यवस्था के उदारीकरण तथा मुक्त बाजार व्यवस्था का अति की सीमा तक समर्थन करते हैं. ‘लेजेज फेयर’ उनके लिए न केवल अर्थव्यवस्था, बल्कि राजनीति और समाज के लिए भी सर्वाधिक अपेक्षित दर्शन है. व्यक्ति-स्वातंत्र्य का समर्थन करते-करते वे अप्रकट रूप में लोक-शिक्षा, नियोजित अर्थव्यवस्था, लोकतंत्र आदि को ही नकारने लगते हैं. यही उनकी विशेषता है और कदाचित यही उनकी सीमा भी.

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद के समर्थक विद्वानों में जॉन हास्पर्स के अलावा राबर्ट नॉजिक का नाम भी लिया जा सकता है. बीसवीं शताब्दी का यह अराजकतावादी विचारक न्याय की स्थापना के लिए संपूर्ण स्वाधीनता का समर्थन करता है. इस लक्ष्य-प्राप्ति की राह में वह राज्य की सीमित भूमिका का समर्थन करता है. इसलिए कुछ विद्वान उसे अर्ध-अराजकतावादी भी मानते हैं. जॉन हॉस्पर्स पूर्ण स्वतंत्रता का समर्थक था. उसने जोर देकर कहा था कि अपने जीवन पर सर्वाधिक अधिकार संबंधित व्यक्ति का है. परिवार, समाज और देश बाद में आते हैं. व्यक्ति-स्वातंत्र्य का आधार ही यह भावना है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा का मान रखने, उसको लक्ष्य मानकर उसके अनुरूप आचरण करने का पूरा-पूरा अधिकार है. यह एक व्यक्तिवादी द्रष्टिकोण है. चूंकि सुखवाद और व्यक्तिवाद परस्पर पूरक और सहायक विचारधाराएं हैं, इसलिए अधिकांश इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक स्वयं को सुखवादी दर्शन के करीब मानते थे. वे पूंजीवाद का सीधे समर्थन नहीं करते. सर्व-स्वातंत्र्य का पक्ष एक मुक्त, आत्मनिर्णयी व्यक्ति और समाज की रचना उनका ध्येय है. लेकिन पूंजी के आधार पर समाज में जिस प्रकार का विभाजन स्वाभाविक रूप से आ जाता है, उसपर भी वह कोई विचार नहीं करते. इस तरह वे जाने-अनजाने पूंजीवाद का अप्रत्यक्ष समर्थन करते हुए नजर आते हैं. वे सुखवाद का समर्थन भी इसलिए करते हैं क्योंकि यह व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता की राह को आसान बनाता है. मगर कोरे सुखवादी द्रष्टिकोण से समाज में न्याय की स्थापना असंभव है. राबर्ट नॉजिक स्वयं यह मानता था कि सुखवाद न्याय की राह का सबसे बड़ा पत्थर है. यदि सब अपने-अपने सुख की स्पर्धा में होंगे तो उन लोगों के सुख की चिंता जो किसी कारणवश दौड़ से बाहर हैं, अथवा दौड़ में पिछड़ चुके हैं—कौन करेगा! इस तर्क के साथ नॉजिक सुखवादी दर्शन को, विशेषकर न्याय के संदर्भ में, करीब-करीब नकार ही देता है. उसकी पुस्तक ‘अनार्की, स्टेट और यूटोपिया’ जॉन लाक(1632—1704) के मानवाधिकार संबंधी विचारों के आगे का चिंतन है. राजनीतिक दर्शन के अंतर्गत मानवाधिकारों का पक्ष लेते हुए उसने लिखा था कि मनुष्य प्रकृति से ही मुक्त और समान होता है. प्रकृति से उसे जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति-संबंधी अधिकार प्राप्त होते हैं. उन्हीं के आधार पर वह समाज से जुड़ता है. समाज व्यक्ति की निजी एवं सार्वजनिक इच्छा-आकांक्षाओं का विस्तार है. उसकी स्थिरता, संपन्नता तथा अपनी स्वाधीनता के सुखमय भोग हेतु मनुष्य अपनी नैसर्गिक स्वतंत्रता के एक हिस्से को समाज और सरकार को सौंप देता है. उसी से उन दोनों को वैधता और ताकत प्राप्त होती है. चूंकि सरकार लोगों की इच्छा से बनती तथा उनकी सहमति से चलती है, इसलिए उसका प्रथम कर्तव्य लोगों की स्वाधीनता तथा अधिकारों की रक्षा करना है. राबर्ट नॉजिक जॉन लॉक के प्राकृतिक अधिकारों को स्वीकारता है. उसके अनुसार ये अधिकार मनुष्य होने की कसौटी हैं, इसलिए इनका किसी प्रकार से उल्लंघन मनुष्यता के प्रति अक्षम्य अपराध है. चूंकि सभी के जीवन-संबंधी अधिकार बराबर हैं, इसलिए मनुष्य के संपत्ति-संबंधी अधिकार सामाजिक नैतिकता से बंधे होते हैं. वे तभी तक मान्य हैं जब तक संपत्ति का अर्जन और हस्तांतरण विधिमान्य तरीके से, बगैर किसी हिंसा, धोखादड़ी और क्षोभ के संभव हो सके. नॉजिक के अनुसार संपत्ति अधिकार तथा उनके अंतरण की संबंधी न्याय के तत्संबंधी तीन सामान्य सिद्धांतों द्वारा समझी जा सकती है—

1. यदि कोई व्यक्ति न्याय के सिद्धांतों के अनुसार संपत्ति अर्जित करता है, तो उसको अर्जित संपत्ति को अपने अधीन रखने का अधिकार है, अथवा
2. कोई व्यक्ति किसी संपत्ति को न्याय के सिद्धांत के अनुसार ऐसे व्यक्ति की ओर से अंतरण के दौरान प्राप्त करता है, जिसका उस संपत्ति पर विधिक अधिकार था, तब भी प्राप्तकर्ता अर्जित संपत्ति को अपने अधीन रखने का अधिकारी है.
3. उपर्युक्त दो प्रविधियों के अलावा किसी भी अन्य तरीके से अर्जित की गई संपत्ति अनाधिकृत कब्जे के भीतर मानी जाएगी.

नॉजिक कराधान व्यवस्था का विरोध करता है. सरकार और प्रशासन द्वारा उसके पक्ष में दिए जाने वाले अनेक तर्कों के बावजूद, वह इसे लागू रखने के लिए कतई तैयार नहीं था. उसके अनुसार कराधान की पद्धति ही दोषपूर्ण है. वह मनुष्य की स्वतंत्रता और संपत्ति संबंधी अधिकारों में सेंध लगाती है. ऐसा प्रतीत होता है कि वह कराधान को एक प्रकार की चोरी मानता है. ऐसी चोरी जो सरकार अथवा राज्य द्वारा कानून और अधिकार के नाम पर की जाती है. सरकार टैक्स वसूलने के लिए बलप्रयोग का सहारा ले सकती है. उसके अनुसार मनुष्य के वैध संपत्ति-अधिकार पर, उसकी इच्छा के बगैर हस्तक्षेप करने का अधिकार सरकार समेत किसी को भी नहीं है. तदनुसार गरीबों के लिए निःशुल्क शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, भोजन, आवास आदि संबंधी कोई भी गतिविधि जो कराधान के नाम पर जनता से बलपूर्वक ऐंठी गई धनराशि द्वारा संचालित है, अवैध मानी जाएगी. अराजकतावादी नॉजिक का मानना था कि राज्य को अल्पाधिकार संपन्न होना चाहिए. उसका दायित्व नागरिक-कल्याण के लिए बनाए गए विधान को लागू करना तथा अपराध जैसे डकैती, चोरी, धोखादड़ी, लूट-खसोट, मारपीट आदि के मामलों में समाज की रक्षा तक सीमित है. बाकी दायित्व नागरिकों द्वारा अपने विवेक, संगठन, सहकार, स्वातंत्र्यबोध एवं समानता की भावना से संपन्न होने चाहिए. नॉजिक के ये विचार हास्पर्स की भावनाओं से मेल खाते हैं. उसके अनुसार, ‘सरकार की जरूरत केवल विद्रोह या उपद्रव को शांत करने के लिए पड़ती है. विकास अथवा दुनिया को बेहतर बनाने जैसे कार्यों में उसकी कोई भूमिका नहीं है. न ही सरकार का काम फैसला करना है कि उसे किस व्यवसाय से कितना मुनाफा मिल सकता है. उसका कार्य कानून की सहायता से आक्रामक कार्यवाही को नियंत्रित करना है.’6

इन विचारों पर हम ‘लैजेज फेयर’ की छाया देख सकते हैं. नॉजिक के अनुसार ‘राजनीतिक दर्शन की मूलभूत समस्या’ इस तथ्य पर विचार करना नहीं है कि ‘सरकार का स्वरूप कैसा होना चाहिए.’ बल्कि यह देखना है कि ‘क्या सभी के लिए एक राज्य होना चाहिए.’ नॉजिक राज्य के औचित्य पर हालांकि उतनी गंभीरता से सवाल नहीं उठाता, जिस तरह पियरे जोसेफ प्रूधों, मिखाइल बकुनिन जैसे अराजकतावादी उठाते हैं, मगर नागरिक कल्याण और विकास के क्षेत्र में उसकी भूमिका को बहुत सीमित कर देना चाहता है. नॉजिक राज्य तथा उसके उद्देश्यों की समीक्षा को आधुनिक राजनीतिक दर्शन की प्रमुख समस्या मानता था. इस संबंध में वह सतरहवीं शताब्दी के महान अनुभववादी दार्शनिक जॉन लॉक के बेहद करीब था. लॉक का कहना था—‘कुदरती राज्य को शासित करने के लिए प्रकृति के अपने नियम होते हैं.’7 लॉक के अनुसार वह नियम है—‘न्याय.’ जाहिर है कि न्याय यहां व्यापक संदर्भों में प्रयुक्त हुआ है. उसका मूल संदेश है कि दुनिया में, ‘किसी को भी दूसरे के जीवन, स्वतंत्रता तथा संपत्ति को हानि पहुंचाने का कोई अधिकार नहीं है.’8 ‘कुदरती राज्य’ की अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए नॉजिक आधुनिक राष्ट्र-राज्य के अधिकारक्षेत्र में कटौती का सुझाव देता है. उसका कहना था कि नागरिकों में यह भ्रम नहीं फैलाया जाना चाहिए कि उनकी सुरक्षा सरकार के शक्तिशाली होने पर निर्भर है और सरकार जैसे-जैसे शक्तिशाली होगी, उनकी स्वतंत्रता, सुरक्षा और समृद्धि उसी अनुपात में बढ़ती जाएंगी. मनुष्य दूसरे मनुष्य से राज्य के आधार पर नहीं, मुख्यतः प्रकृति, समाज तथा अपनी जरूरतों के आधार पर जुड़ा होता है. उसके अनुसार राज्य की शक्तियों का उपयोग नागरिकों को एक-दूसरे की मदद करने, अपने हितों की स्वयं सुरक्षा करने की सहज-स्वाभाविक प्रवृत्ति के उत्प्रेरक के रूप में किया जाना चाहिए, न कि उनके विरुद्ध अवरोधक शक्ति के रूप में. व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता तथा अपने संसाधनों का अपने सुख और स्वतंत्रता के लिए प्रयोग किए जाने के अधिकार को वह खिलाड़ी का उदाहरण देकर समझाने की कोशिश करता है—‘मान लीजिए कोई व्यावसायिक खिलाड़ी किसी टीम के लिए अपनी शर्तों पर खेलने के लिए तैयार होता है. शर्त के अनुसार वह तय कर लेता है कि वह खेल के लिए बिके टिकटों से प्राप्त धनराशि का पांच प्रतिशत लेगा. आयोजक खिलाड़ी के मानदेय या कमीशन को लेकर सौदेबाजी कर सकते हैं. लेकिन बाद में अनुबंध के अंतर्गत प्राप्त होने वाली धनराशि को इच्छानुसार खर्च करने का सर्वाधिकार केवल उस खिलाड़ी को होगा. एक बार अनुबंध कर लेने के बाद टीम प्रबंधन अथवा किसी भी अन्य को यह अधिकार नहीं रह जाता कि वह खिलाड़ी से अनुबंध के तहत मिलने वाली धनराशि के खर्च को लेकर किसी प्रकार का सवाल-जवाब करे.’

बीसवीं शताब्दी में पूंजीवाद के औचित्य को दर्शाने के लिए उसको मानवीय स्वतंत्रता के साथ जोड़कर देखने की कोशिशें लगातार होने लगी थीं. मनुष्य स्वतंत्र है. वह अपनी मर्जी का मालिक है. उसके अपने अधिकार हैं. किसी को उसकी स्वतंत्रता में दखल देने का अधिकार नहीं है—मानवीय स्वतंत्रता और अस्मिता के नाम पर ये बातें खूब उछाली जा रही थीं. राज्य चूंकि जनता की सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए व्यक्ति-स्वातंत्र्य के नाम पर व्यक्तिवाद का नारा तभी सफल हो सकता था, जब राज्य के अधिकार क्षेत्र को सीमित कर दिया जाए. यदि व्यक्तिमात्र अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है, वह स्व-चेता, स्व-अनुशासित है तो राज्य की भूमिका अपने आप ही सिमट जाती है. लेकिन आजादी का अभिप्राय यदि केवल अपनी संपत्ति और संसाधनों का मनमाना उपयोग है तब, यह माना जाएगा कि व्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग उसको पूंजीवादी ताकतों के हाथों का खिलौना बनाने के लिए किया जा रहा है. नॉजिक व्यक्ति को अपनी संपत्ति और संसाधनों के निर्बंध उपयोग का अधिकार देने का जोरदार समर्थन करता है. अप्रत्यक्ष रूप से वह स्वीकार लेता है कि मनुष्य अकेला है. वह भूल जाता है कि स्वतंत्रता का ध्येय व्यक्ति को उसकी निजता के दायरे में कैद कर देना नहीं है, बल्कि समाज में सबके साथ रहते हुए अपने सम्मान, अस्मिताबोध एवं अभिव्यक्ति कौशल को बचाए रखने का अधिकार है. यह स्वतंत्रता की नकारात्मक व्याख्या है. इसपर विचार करते समय नॉजिक समाज कल्याण, शिक्षा जैसे सकारात्मक मूल्यों की एकाएक उपेक्षा कर देता है. दूसरे इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों की भांति कराधान प्रणाली की आलोचना करते हुए वह उसको सरकार की ओर से अवरोधक कार्रवाही मान लेता है, जो उसके अनुसार संपत्ति पर मनुष्य के नैतिक अधिकार में कटौती का काम करती है. तो क्या समाज कल्याण जैसी कोई अवधारणा नहीं है? और जो स्पर्धा में किसी कारण पिछड़ चुके हैं, उनके विकास को लेकर राज्य और समाज की कोई जिम्मेदारी नहीं है? नॉजिक इन प्रश्नों को नजरंदाज कर जाता है. उसका मानना है कि जब राज्य की ओर से न्यूनतम प्रतिबंध होंगे, मनुष्य-मात्र को अपने द्वारा अर्जित की गई संपदा पर अधिकार होगा, तब सभी लोग अपने-अपने विकास के लिए समर्पित भाव से कार्य करेंगे. समाज में सभी को विकास के समान अवसर और स्वतंत्रता रहेगी तो एक भी व्यक्ति विकास के लाभों से वंचित न रहेगा. और समाज उस आदर्श की ओर अग्रसर होगा जो मनुष्यता का सबसे बड़ा सपना है. इसके लिए वह मनुष्य के अधिकारों की व्याख्या करता है. कहने की आवश्यकता नहीं है कि नॉजिक की मानवाधिकार संबंधी अवधारणा मुख्यतः संपत्ति पर अधिकार एवं तत्संबंधी स्वतंत्रता पर केंद्रित है.

इच्छा-स्वातंत्र्यवाद एवं मानवाधिकार

व्यक्ति विशेष के संदर्भ में स्वतंत्रता सम्मानजनक व्यवहार, जीवन-सुरक्षा, अवसरों की समानता, अभिव्यक्ति तथा अर्जित संपत्ति के ऐच्छिक उपयोग का अधिकार है. किसी समाज में इन अधिकारों की अनुपस्थिति में माना जाएगा कि वहां व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता खतरे में हैं. यहां जिन अधिकारों को स्वतंत्रता का पर्याय माना गया है, वे व्यक्ति के मूलभूत अधिकार हैं. समाज में सम्मिलित होने से पूर्व भी वे मनुष्य को प्राप्त होते हैं. समाजीकरण की आनुपातिक सफलता, समाज में नागरिक अधिकारों की उपलब्धता के स्तर पर निर्भर करती है. उसी से समाज में न्याय की पैठ का अनुमान लगाया जा सकता है. दूसरे शब्दों में अधिकार समाज में न्याय की स्थापना को संभव बनाते हैं. चूंकि ये व्यक्ति के मौलिक अधिकार हैं, इसलिए व्यक्ति को उनके लिए आवाज उठाने तथा आवश्यकता पड़ने पर संघर्ष करने का अधिकार भी सहज प्राप्त होता है. नॉजिक समाज में न्याय के स्वरूप को लेकर बहुत स्पष्ट न हो, किंतु अधिकारों की उसने जोरदार वकालत की है. वह अधिकारों को न्याय का पर्याय मानता हैं. समाज में, ‘न्याय की पकड़ तभी तक संभव है जब तक वहां मानवाधिकारों का सम्मान होता है.’9—यह बात उसने अनेक संदर्भों के साथ, कई बार-घुमा-फिराकर कही है. उसका मानना है कि अधिकार मनुष्य की स्वतंत्रता का प्रतीक हैं, आदर्श समाज में ये व्यक्ति को सहजरूप में प्राप्त होने चाहिए. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा संपत्ति संबंधी अधिकारों ज्यादा महत्त्व देते हैं. उनका मानना है कि अर्जित संपत्ति पर मनुष्य का पूरा अधिकार है. और राज्य समेत किसी को भी इस अधिकार में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है. जो कानूनी रूप से जिसका है, वह उसको सहज-स्वाभाविक रूप में प्राप्त हो—यह इच्छा-स्वातंत्र्यवादी न्याय का आधार-सिद्धांत है. संपत्ति संबंधी अधिकारों को लेकर उनका आग्रह इतना अधिक है कि अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य जो मानवीय स्वतंत्रता का असली पहचान है, कदाचित पीछे छूटा प्रतीत होता है. आगे हम नॉजिक की न्यायाधारित समाज की परिकल्पना में अधिकारों के महत्त्व पर विचार करेंगे. यह जानने की कोशिश करेंगे कि उसकी ‘स्वत्व’ अथवा ‘आत्म-स्वामित्व’ की सैद्धांतिकी क्या है? साथ ही हम इसपर भी विचार करेंगे कि नॉजिक के लिए संपत्ति अधिकार, संपत्ति के मायने तथा उसकी विशिष्टयां क्या हैं?

1. सर्वसुलभ मौलिक अधिकार

नॉजिक के लिए न्यायाधारित समाज की पहली विशेषता है कि उसमें व्यक्ति के मूलभूत अधिकार सुरक्षित होने चाहिए. हालांकि वहां उसका चिंतन केवल संपत्ति संबंधी अधिकारों की विवेचना तक सीमित होकर रह जाता है. उसके अनुसार प्रत्येक मनुष्य का अर्जित संपत्ति पर पूर्णाधिकार है. वह उसको अपनी मर्जी के अनुसार खर्च कर सकता है, दान में दे सकता है. इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक मानते आए हैं कि मनुष्य अपना मालिक स्वयं होता है. नॉजिक की पुस्तक ‘अनार्की, स्टेट एंड यूटोपिया’ में ‘आत्म-स्वामित्व’(सेल्फ आनरशिप) शब्द केवल एक बार, उस समय आता है, जब वह कराधान और बेगार पर चर्चा करता है. उसकी परिभाषा में आत्म-स्वामित्व वह अवस्था है जब स्वामी और वस्तु एक और समान हो. अपने शरीर पर सबसे पहला अधिकार मनुष्य का है. अपने श्रम एवं योग्यता के बल पर वह जो भी अर्जित करता है, उसका लाभ उसे मिलना ही चाहिए. आत्मस्वामित्व के अलावा वह ‘संपूर्ण स्वामित्व’ की अवधारणा को भी स्पष्ट करता है. उसके अनुसार समाज में न्याय की उपस्थिति तभी संभव है जब व्यक्ति को अपने कमाई पर पूरा अधिकार हो. वह अर्जित संपत्ति को बेचने, अंतरित करने को पूरी तरह स्वतंत्र हो. आत्मरक्षा और संपत्ति की सुरक्षा के लिए शत्रु का प्रतिकार करने, हिंसा को टालने, नुकसान की वैध तरीकों से भरपाई करने का अधिकार व्यक्ति को मिलना चाहिए. यह भी ‘संपूर्ण स्वामित्व की श्रेणी में आता है. संपूर्ण स्वामित्व की दूसरी घटनाएं संपत्ति के अंतरण, सुरक्षा, दंगों तथा किसी भी अन्य प्रकार की आपदा से संपत्ति को होने वाले नुकसान से बचाव के अधिकार के रूप में आता है. यह संपत्ति अधिकार के प्रति दूसरों की विनम्र सहमति, नैतिक सामर्थ्य, तथा संपत्ति के उपयोग को लेकर स्वामी के असीमित अधिकार का प्रतीक होती है. लेकिन ‘संपूर्ण स्वामित्व’ का आशय अर्जित संपत्ति के मनमाने प्रयोग का अधिकार नहीं है. हाकी खिलाड़ी को मैदान में इस बात का पूरा अधिकार होता है कि वह अपनी स्टिक का कमाल दिखाकर प्रतिद्विंद्वी टीम को मैदान में पूरी तरह छका दे. उससे लगातार गोल दागे. लेकिन उसको हाकी स्टिक से प्रतिद्विंद्वी का सिर फोड़ने का अधिकार नहीं दिया जा सकता. व्यक्ति इस बात के लिए पूर्ण स्वतंत्र है कि अर्जित संपत्ति का विधिमान्य ढंग से अपने सुख एवं स्वतंत्रता के विस्तार हेतु प्रयोग करे, लेकिन दूसरों को उसके माध्यम से हानि पहुंचाए, यह स्वतंत्रता उसे हरगिज नहीं दी जा सकती. क्योंकि प्रकारांतर में ऐसा करना, दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप है, जिसका इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारक विरोध करते हैं. साफ है कि संपत्ति पर संपूर्ण अधिकारिता का भाव भी दूसरे के अधिकार और जीवन का सम्मान करने की भावना से जुड़ा है. उसमें केवल वे वैध उपयोग सम्मिलित हैं, जो बिना दूसरे के जीवन और स्वतंत्रता में अवांछित, अनाधिकार हस्तक्षेप किए बगैर विधिमान्य ढंग से प्रदान किए जाते हैं. इसलिए संपूर्ण स्वामित्व भी समाज द्वारा मर्यादित, नियंत्रित उपयोग लिए होता है. इसलिए कुछ विद्वानों ने इसके लिए ‘सीमित निजी-स्वामित्व’ भी कहा है. हालांकि स्वयं नॉजिक इस शब्द-युग्म के प्रयोग से बचा है. वह निजी संपत्ति को जरूरी मानता है. उसका जोरदार तरीके से समर्थन भी करता है. साथ ही जोड़ देता है कि व्यक्ति बिना दूसरों को किसी भी प्रकार भी प्रकार की क्षति पहुंचाए, उग्रता दिखाए या दूसरों की स्वतंत्रता को बाधित किए निजी संपत्ति के उपयोग हेतु पूरी तरह स्वतंत्र है.

2.  न्यायसंगत अधिग्रहण

संपत्ति के अर्जन को लेकर इच्छा-स्वातंत्र्यवादी दृष्टिकोण पूरी तरह स्पष्ट है. मनुष्य का केवल उसी संपत्ति के उपयोग पर नैतिक अधिकार है, जो उसने न्याय संगत ढंग से अर्जित की हो. ऐसी संपत्ति जो उसने बलपूर्वक हथियाई गई हो, जिसके अर्जन में उसका कोई योगदान न हो, उसके उपयोग का व्यक्ति को कोई नैतिक अधिकार नहीं है. मगर समाज में हर बार आदर्श से काम नहीं चलाया जा सकता. कुछ व्यावहारिक दृष्टिकोण भी अपनाना पड़ता है. मनुष्य दूसरे के श्रम से से अर्जित वस्तु का उपयोग करे, यह उचित नहीं है. किंतु यदि उस अस्वामित्व युक्त संसाधनों, यानी ऐसे संसाधनों द्वारा जिनपर व्यक्ति का वैध अधिकार न हो, की मदद से यदि वह कुछ अर्जित करता है, तब उस उत्पाद पर किसका अधिकार माना जाएगा? न्यायसंगत अधिग्रहण में इसी पर विचार किया गया है. उसके अनुसार ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो अस्वामित्वयुक्त संपत्ति पर अपना दावा करते हुए उससे कुछ अर्जित करता है, उसके लिए उचित है कि अर्जित उत्पाद के बड़े हिस्से को दूसरों के लिए छोड़ दे. यह सीधा-सा व्यावहारिक द्रष्टिकोण है. जिसको मानवीय कमजोरियों के बीच सामंजस्य तथा समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने की अनुकरणीय कोशिश के रूप में भी देख सकते हैं. यह व्यावहारिकता के दबाव ही हैं कि प्रायः सभी इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विद्वान अस्वामित्वयुक्त संपत्ति पर कब्जे की स्थिति को स्वीकारते हैं. लेकिन वे उस अस्थायी अधिकार या व्यवस्था को उसी सीमा तक मान्यता देते हैं, जब तक वह कुछ न्यूनतम शर्तों का पालन करता है. उनके इस द्रष्टिकोण की आलोचना भी होती रही है. ‘अनाधिकृत संपत्ति पर अधिकार’ की तीन भिन्न स्थितियों की चर्चा इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों ने की है. उनके अनुसार मान लीजिए कोई व्यक्ति किसी ऐसे संसाधन पर जो उसके स्वामित्त्व से बाहर है, श्रम करते हुए कुछ अर्जित करता है. अथवा जिसका वह संसाधन है, उसके साथ मिलकर श्रम करते हुए उत्पादन में सहायक बनता है—तब उसका उस उत्पाद पर कितना और किस सीमा तक अधिकार होगा?

बिलकुल भी नहीं….शून्य.’ आलोचक खरा जवाब देते हैं. उनके अनुसार यदि कोई व्यक्ति चैराहे पर खड़ी कार के शीशों की, बगैर उसके स्वामी की अनुमति के आकर सफाई करने लगे तो उसको उस कार का स्वामित्व नहीं दिया जा सकता. इसके समर्थन में यदि कोई यह दावा करे कि इस प्रकार मिला-जुला श्रम आवश्यक है, और समाज में बिना श्रम का साझा किए काम नहीं चलता, तब तो न्याय-संगत अधिकारिता की अवधारणा ही अर्थहीन होकर रह जाएगी. क्योंकि तीसरा अचानक बीच में आकर दूसरे व्यक्ति द्वारा संपत्ति पर बलात् कब्जे को भी बैध घोषित कर सकता है. इससे उस व्यक्ति के अधिकारों का सीधा हनन होगा, जो उत्पादन के लिए वाकई जिम्मेदार है, दूसरे व्यक्ति ने दबंगई दिखाकर जिसके उत्पाद को कब्जाने की कोशिश की है. राजशाही और साम्राज्यवाद में यही होता था. अपने सम्राट या आश्रयदाता को प्रसन्न करने के लिए ऐसा सुझाव उनके मुंह-लगे दरबारी प्रायः देते ही रहते थे. यात्रा के दौरान जंगल में एक रात बिता लेने का मतलब यह नहीं है कि आप उसपर स्वामित्व का दावा ठोकने लगें. तीसरे अधिग्रहण अथवा कब्जे के माध्यम से अर्जित संपत्ति पर आवश्यक नहीं कि वह आपके संपूर्ण स्वामित्व वाली ही हो. उनके स्वामित्व को लेकर दूसरे लोगों की भी वैसी ही दावेदारी संभव है. उस अवस्था में वास्तविक स्वामी जानबूझकर या अनजाने ही अपनी दावेदारी पेश करने में चूक भी सकता है. साफ है कि सांसारिक वस्तुओं पर संपत्ति अधिकारिता ऐतिहासिक संदर्भ लिए रहते हैं. यह समस्याएं इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों के समक्ष पहले से ही थीं. नॉजिक ने उसकी सरल और सटीक विवेचना की है.

संपत्ति अधिग्रहण को लेकर राबर्ट नॉजिक ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाता. इस विषय में उसका मन संशयग्रस्त है. वह लॉक से सहमति दर्शाते हुए श्रम के सम्मिश्रण पर अपना ध्यान केंद्रित रखता है. उल्लेखनीय है कि ईसाई परंपरा में समस्त भूमि परमात्मा की मानी जाती है. राजा धरती पर परमात्मा के परम-पुत्र का प्रतिनिधि है. राजा को दैवीय-अधिकार से संपन्न मानने वाले सोलहवीं शताब्दी के अंग्रेजी लेखक राबर्ट फिल्मर ने लिखा था कि परमात्मा ने समस्त भूमि ईसा मसीह को सौंपी थी. मसीह ने उसको नागरिकों के बीच विभाजित कर दिया. फिल्मर के कथन कि परमात्मा ने संपूर्ण धरा ईश्वर के प्रतिनिधि यानी राजा को सौंपी गई थी, का विरोध करते हुए लॉक ने ‘सैकिंड टिट्रीज आन गवर्नमेंट’ में लिखा कि ईश्वर के सामने राजा और प्रजा के प्रश्न उठाने का कोई औचित्य नहीं है. उसके अनुसार परमात्मा ने जमीन सीधे जनसाधारण को उसकी सामान्य देखभाल के लिए सौंपी थी. इसलिए वह स्वामित्व से परे है. प्रत्येक व्यक्ति का उसपर उतना ही अधिकार है, जितना किसी दूसरे का है. किसी व्यक्ति द्वारा शेष समाज की मर्जी के बगैर प्राकृतिक संपत्ति और संसाधनों पर किसी भी प्रकार की दावेदारी अवैध कही जाएगी. तब मनुष्य के बस में क्या है? भू-उत्पाद पर उसकी दावेदारी का आधार क्या हो? लॉक का मानना है कि मनुष्य परिश्रम के जरिये अस्वामित्व युक्त धरा पर निजी अधिकारिता का दावा कर सकता है. ‘सैकिंड ट्रिटीज आन दि सिविल गवर्नमेंट’ के पांचवे अध्याय में वह तर्क देता है—

1. यदि कोई व्यक्ति अपने स्वामित्व युक्त वस्तु को किसी ऐसी वस्तु में मिलाता है, जिसका कोई स्वामी नहीं है, तो वह वस्तु उस व्यक्ति की मान ली जाती है.
2. प्रत्येक मनुष्य को अपने श्रम पर पूरा अधिकार है.
3. इसलिए जब कोई व्यक्ति अपने श्रम को जिसका वह स्वामी है, अस्वामित्व युक्त भूमि से योग करता है तो वह उसपर स्वामित्व प्राप्त कर लेता है.11

लॉक का ‘श्रम-सम्मिश्रण’ के आधार पर संपत्ति-अधिकार के पक्ष में दिया गया यह तर्क दोषपूर्ण था. चूंकि अन्यान्य प्राणियों, वस्तुजगत की भांति मनुष्य भी प्रकृति का ही हिस्सा है. इसलिए शोधन, परिशोधन अथवा रूपांतरण के बहाने व्यक्ति द्वारा प्राकृतिक संसाधनों पर जिन तर्कों के आधार पर निजी अधिकारिता का दावेदारी की जाती है, उसी तरह, उन्हीं तर्कों के आधार पर प्राकृतिक संपदा होने के कारण मनुष्य पर भी प्रकृति या समाज की दावेदारी संभव है. उस अवस्था में मनुष्य की अविकल स्वतंत्रता की अवधारणा खटाई में पड़ सकती है. इन कमियों के बावजूद लॉक का विचार आधुनिक इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विद्वानों को आकर्षित करता है. स्वयं नॉजिक ने भी श्रम-सम्मिश्रण के विचार को दोषपूर्ण माना था. हालांकि वह उसका सार्थक विकल्प देने में असमर्थ रहा था. नॉजिक के अनुसार ‘श्रम-सम्मिश्रण’ के सिद्धांत की कमजोरी है कि इस आधार पर हुए संपत्ति अंतरण पर स्वामित्व की सीमा के बारे में ठोस समाधान नहीं देता. उदाहरण के लिए मान लीजिए मंगलग्रह की यात्रा पर निकला यात्री उस ग्रह पर उतरने में कामयाब हो जाता है. मंगल की सतह पर उतरने के बाद वह उस स्थल की सफाई करता है. लंबे परिश्रम के बाद वह उस स्थल को साफ और समतल करने में कामयाब हो जाता है. अब यदि मंगलग्रह पर उतरने वाला वह पहला अंतरिक्ष यात्री है तो सवाल उठता है कि श्रम-सम्मिश्रण के सिद्धांत के अनुसार उसका कितनी भूमि पर अधिकार होगा. क्या पूरा मंगल ग्रह उसका मान लिया जाना चाहिए, अथवा केवल वह स्थल जितना उसने साफ किया है? नॉजिक इस प्रश्न को यहीं छोड़ देता है. उत्तर नहीं देता. उसकी ओर एक सुझाव यह भी आता है कि ‘श्रम-सम्मिश्रण’ के विचार को ही किनारे कर अधिकारिता की समस्या पर व्यक्तिमात्र की मौजूदगी तथा उसकी मूलभूत आवश्यकता को ध्यान में रख, उपयोगितावादी द्रष्टिकोण से विचार किया जाए.

आगे बढ़ने से पहले उचित होगा कि उस समस्या पर विचार कर लिया जाए जिसका हमने ऊपर उल्लेख किया है. यानी अस्वामित्वयुक्त यानी नैसर्गिक संपदा पर निजी अधिकारिता को किस प्रकार परिभाषित किया जाए? उसके वर्गीकरण का आधार क्या हो? ‘श्रम-सम्मिश्रण’ के आधार पर व्यक्ति की संपत्ति कितनी और किस सीमा तक उचित है. कुछ विद्वान इसे सीमाहीन मानते हैं. उनके अनुसार यह मनुष्य पर है कि अपनी योग्यता और सामर्थ्य के बल पर वह अस्वामित्वयुक्त वस्तुओं के जितने बड़े हिस्से पर दावा ठोंक सकता है, वह उसका अधिकार है—जो उसको मिलना ही चाहिए. लेकिन उनके आगे भी व्यावहारिक समस्याएं कम नहीं है. ‘श्रम-सम्मिश्रण’ के आधार पर मनुष्य जिस संपत्ति पर अपनी दावेदारी प्रस्तुत करना चाहता है, संभव है उसके पहले से ही लोग उसका किसी ओर रूप में उपयोग कर चुके हों. उदाहरण के लिए एक किसान जंगल को साफ कर, उसको खेती लायक बनाता है. वह साफ की गई जमीन पर अपने स्वामित्व का दावा भी करता है. लेकिन किसान जमीन को उपयोग में लाने वाला अकेला पहला व्यक्ति नहीं है. यह पूरी तरह संभव है कि उससे पहले भी कुछ लोग उसका उपयोग कर चुके हों. गांव के आसपास खाली पड़ी जमीन का उपयोग लोग पशुओं को बांधने, उपले थापने के लिए करते हैं. बाद में उस जमीन पर कोई व्यक्ति घर बना लेता है, अथवा खेती या कुछ और करने लगता है. यदि प्रथम उपयोग ही स्वामित्व की शर्त है तो बाद में जिसने उस जमीन पर गृह-निर्माण किया है, उसका अधिकार अवैध माना जाना चाहिए. किंतु अवैध कहे जाने की बात तब तक निराधार है, जब तक कि बाकी लोगों को उससे कोई आपत्ति न हो. यदि वह समाज द्वारा मान्य चलन है तो ऐसे संपत्ति अधिकार को मान्यता देनी होगी. हालांकि यह भी संभावना है कि उस संपत्ति अधिकार से शेष लोगों को कोई शिकायत न हो, किंतु हमेशा ही उन्हें कोई शिकायत या नुकसान न होगा, यह कहना बहुत ही कठिन है. यह भी संभव है कि उस कब्जे से केवल संबंधित व्यक्ति को लाभ हो, जबकि बाकी गांव वालों को नुकसान उठाना पड़ रहा हो. क्या उस अवस्था में भी उस व्यक्ति के संपत्ति प्राधिकार को वैध माना जाएगा. इस तर्क के बाद समाधान के लिए नॉजिक पुनः लॉक की ओर देखने लगता है और लॉक ऐसे संपत्ति प्राधिकार को, जिससे दूसरों को हानि पहुंचने की संभावना हो, इस शर्त के साथ स्वीकृति देता है कि दूसरों के लिए भी श्रेष्ठ और पर्याप्त हिस्सा छोड़ दिया जाना चाहिए—

‘बहती नदी से पानी पी लेने से किसी को नुकसान पहुंच सकता है? इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. भले किसी ने उससे आकंठ जल पिया हो. क्योंकि नदी वैसी की वैसी वहां होगी, दोनों की प्यास बुझाने के लिए पर्याप्त. यदि बात दोनों के लिए ठीक-ठाक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध भूमि के बारे में भी कही जा सकती है.’12 नॉजिक के अनुसार अस्वामित्वयुक्त संपत्ति पर अधिकार दर्शाने के लिए लॉक के उपर्युक्त प्रतिबंध का पालन किया जाना चाहिए. हालांकि इस तर्क में इतनी खामियां हैं कि स्वयं नॉजिक ही उससे संतुष्ट नहीं हो पाता. अपने तर्क को आगे बढ़ाता हुआ वह लिखता है, ‘किसी भी व्यक्ति का स्वामित्व उससे अधिक भला क्यों हो, जितना उसने किसी पदार्थ की मूल्यवत्ता को बढ़ाने में योगदान दिया है.’13 अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले वह स्थिति की पूरी व्याख्या करता है. कोई व्यक्ति किसी वस्तु का स्वामित्व हासिल करने के लिए अपना श्रम क्यों लगाता है. शायद इसलिए कि उसके पास केवल उसका श्रम है. उसी के माध्यम से वह अपनी उपयोगिता दर्शा सकता है. जब कोई व्यक्ति अस्वामित्वयुक्त वस्तु पर अपना श्रम लगाता है, जो उसका श्रम उस वस्तु पर छा जाता है. उसका प्रभाव वस्तु पर स्पष्ट झलकने लगता है. श्रम के पश्चात वस्तु ठीक पहले जैसी नहीं रहती. श्रम का यही प्रसार दूसरों के मुकाबले वस्तु पर श्रमिक की दावेदारी को पुष्ट करता है. लेकिन श्रम का स्वरूप क्या हो? क्या किसी भी प्रकार के श्रम से वस्तु पर दावेदारी कर पाना नैतिक होगा. नॉजिक इस एक उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट करता है, ‘मान लीजिए मेरे हाथ में टमाटर के सूप से भरी एक केन है. उस केन को मैं यदि समुद्र की लहरों पर बहा दूं तो सूप के कण समुद्र में दूर तक फैल जाएंगे. क्या उसके आधार पर समुद्र के उतने हिस्से पर, जहां तक टमाटर सूप के कण फैले हैं, मैं अपने स्वामित्व का दावा कर सकता हूं. जाहिर है यह मूर्खतापूर्ण बात होगी.’ इसके बाद वह निष्कर्ष पर आता है कि वही श्रम स्वामित्व दिलाने में सहायक है, जिससे वस्तु के मूल्य में वृद्धि होती है. वह अपनी और समाज की नजरों में अधिक मूल्यवान होता हो. यह एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष है. जो जीवन के उद्देश्य तथा समाज में मनुष्य की उपयोगिता के लिए मार्गदर्शक का काम करता है. कोई कार्य जो केवल व्यक्ति विशेष के लिए मूल्यवान है, बाकी लोगों के लिए व्यर्थ, बल्कि नुकसानदेह तो उसका संसार में उसका वास्तविक मूल्य शून्य है. उदाहरण के लिए उपर्युक्त उदाहरण में ऐसा हो सकता है कि टमाटर सूप को पानी पर बहाना किसी व्यक्ति के लिए खेल हो, उसे उससे खुशी मिलती हो. लेकिन यदि उससे समुद्र में किसी प्रकार का प्रदूषण फैलता है, तो उसका नुकसान पूरे समाज को होगा. जाहिर है कि व्यक्ति का श्रम-उत्पाद न केवल उसके लिए, बल्कि बाकी समाज उपयोगी होना चाहिए, तभी व्यक्ति की उसपर दावेदारी वैध मानी जाएगी. श्रम का सकारात्मक उपयोग, अपने साथ-साथ दूसरों का भी भला देखना ही स्वत्वाधिकार की पहली और आखिरी शर्त है.

3.  न्यायसंगत अंतरण

न्यायसंगत अंतरण संपत्ति पर संपूर्ण स्वामित्व की स्थिति को दर्शाता है. समाज में संपत्ति अंतरण के निकृष्ट रूप भी प्रचलित हैं. उदाहरण के लिए कुछ व्यक्ति चोरी कर, दूसरे के धन को घर ले आते हैं. कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इसके लिए धोखादड़ी जैसे आसान किंतु हेय रास्ते का चयन करते हैं. इससे संपत्ति अंतरित होकर उनके कब्जे में चली जाती है. लेकिन उसपर न्यायिक दावेदारी संभव नहीं है. चोर यह कहकर कि उसने संपत्ति संचय के लिए चोरी का सहारा लिया है, उसपर अपनी दावेदारी नहीं कर सकता. न ही कोई धोखेबाज व्यक्ति दूसरों के साथ छल-प्रपंच के आधार पर जुटाई गई संपत्ति को अपना बना सकता है. इसी प्रकार यदि कोई संपत्ति का स्वामी है, मगर उसके अंतरण के लिए तैयार नहीं है. उसकी असहमति के बावजूद यदि उसे संपत्ति-अंतरण हेतु बाध्य किया जाता है, तो उस अवस्था में, भले ही अंतरण की प्रक्रिया विधि-सम्मत हो, स्वामी के इच्छा-विरुद्ध वस्तु के अंतरण को न्यायिक नहीं कहा जा सकता. यदि उस वस्तु से व्यापक लोकहित जुड़े हैं तथा अंतरण की प्रक्रिया विधि-सम्मत है तब भी व्यक्ति को उस अंतरण के लिए राजी करना न्याय-भावना के अनुसार अपेक्षित होगा. ऐसे राज्य में जो न्याय-मार्ग पर होने की दावेदारी करता है, अंतरण हेतु वैध प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है. तदनुसार संपत्ति पर स्वामित्व के अंतरण के लिए आवश्यक है कि उसे स्वेच्छापूर्वक, वैध, न्याय-सम्मत प्रक्रिया के माध्यम से संपन्न किया जाए. यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति या संसाधन पर अधिकार रखता है, उसका अधिकार विधिसम्मत तथा समाज द्वारा मान्य है, तभी वह उसको किसी दूसरे को अंतरित करने का अधिकार भी रखता है. श्रमिक के मामले में यदि कोई श्रमिक किसी कार्य को स्वेच्छापूर्वक करने के लिए तैयार नहीं है, तब उसकी मर्जी के बिना कार्य करने के लिए बाध्य किया जाना, इस विचारधारा के अंतर्गत अमान्य है.

एक स्थिति यह भी हो सकती है कि कोई व्यक्ति अपने स्वामित्वयुक्त वस्तु को न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से किसी व्यक्ति को अंतरित करना चाहता हो, किंतु दूसरा व्यक्ति उसे लेने के लिए तैयार न हो. नॉजिक जोर देकर कहता है कि संपत्ति अंतरण की वैधता हेतु दाता की सहमति अनिवार्य है. लेकिन लेने वाले की सहमति? यदि कोई व्यक्ति किसी दान या उपहार को लेना न चाहे, तब? इस स्थिति को वह पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर पाता. लेकिन वह जोर देकर कहता है कि क्रेता को उस अवसर पर उपस्थित अवश्य होना चाहिए. मौन को सहमति का पर्याय मानते हुए वह इस निर्णय पर पहुंचता है कि संपत्ति अंतरण की प्रक्रिया के दौरान क्रेता की सहमति भी अनिवार्य है. यानी कोई व्यक्ति कहे कि उसने संपत्ति का स्वेच्छापूर्वक अंतरण किया है, मगर संबंधित व्यक्ति उसे स्वीकार करने से इन्कार कर दे, तब अंतरण की प्रक्रिया को अपूर्ण माना जाएगा. दूसरे शब्दों में अंतरण-प्रक्रिया को भली-भांति संपन्न होने के लिए क्रेता के साथ-साथ विक्रेता की सहमति भी अनिवार्य है. यह कार्य दोनों के हितों को ध्यान में रखकर शांतिपूर्वक और विधिसम्मत ढंग से किया जाना चाहिए. नॉजिक के अनुसार जो शर्तें किसी वस्तु के अर्जन पर लागू होती हैं, वही शर्तें उसकी बिक्री या अन्य किसी अंतरण पर भी लागू होती हैं. उदाहरण के लिए यदि किसी शर्त के अधीन किसी को दुनिया में कहीं से भी पेयजल लेने से प्रतिबंधित कर दिया है, तो इस नियम की पूर्वापेक्षा और शर्त के अनुसार उस व्यक्ति के लिए पेयजल की बिक्री भी स्वाभाविक रूप से प्रतिबंधित होगी. दूसरे शब्दों में यदि किसी व्यक्ति के लिए कोई वस्तु निषिद्ध मान ली गई है, तो उसके उपयोग की छूट, उस व्यक्ति को किसी भी प्रकार से नहीं दी जा सकती. कुछ स्थानों पर हम नॉजिक को अस्पष्ट और धुंधला पाते हैं. वस्तुविशेष के स्वामित्व को लेकर यह दावा प्रायः किया जाता है कि उसमें सभी अधिकार पूर्ण अंतरणीय हैं. लेकिन यह सोचा-विचारा सत्य नहीं है. ऐसे अनेक उदाहरण खोजे जा सकते हैं जिसके अनुसार व्यक्ति के पास किसी वस्तु को अपने पास रखने का अधिकार हो, किंतु उसके अंतरण का अधिकार उसके पास न हो. मसलन, किराये का मकान, जिसमें व्यक्ति रह सकता है, उसपर अपने तात्कालिक कब्जे की दावेदारी कर सकता है, अपने सामर्थ्य के अनुसार उसकी मरम्मत, सजावट आदि पर धनराशि भी खर्च कर सकता है, किंतु उसे बेचना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर होता है. आशय है कि यदि व्यक्ति का संपूर्ण स्वामित्व किसी वस्तु पर है, तभी उसे उस वस्तु को बेचने अथवा इच्छानुसार अंतरित करने के वाजिब अधिकार प्राप्त होंगे. एक तरह से वह वस्तु उसकी दास के समान होगी. उसके बारे में संपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार, उसका स्वामी होने के कारण उसके पास माना जाएगा. किसी को अनाधिकार बेचना, अथवा वैध स्वामी की इच्छा के बिना, वस्तु का मूल्य चुकाए बगैर उसे अपने स्वामित्व में लेना अनैतिक एवं स्वामित्व के सिद्धांत का उल्लंघन है. दूसरे शब्दों में वस्तु का संपूर्ण स्वामित्व प्राप्त करने के लिए वस्तु के वर्तमान स्वामी की सहमति जुटाना, फिर उसका उपयुक्त मूल्य चुकाना आवश्यक है. इनमें से एक भी अभाव, अथवा आंशिक विचलन से भी संपूर्ण स्वामित्व खतरे में पड़ सकता है. न्याय की मांग है कि वस्तु का अंतरण संपूर्ण स्वामित्व से संपूर्ण स्वामित्व के लिए हो. यदि कोई सोचता है कि न्याय का मुख्य उद्देश्य वस्तु-विशेष पर संपूर्ण स्वामित्व की रक्षा करना, अथवा स्वामित्व को बढ़ावा देना, अथवा उसके लिए प्रभावी कोशिश करना है, उस अवस्था में स्वैच्छिक दासत्व समस्या हो सकती है. इसपर यदि कोई यह सोचता है कि न्याय का मूल उद्देश्य केवल स्वायत्तता को बचाए रखने की कवायद है, तब भी वह गलती पर है. उदाहरण के लिए अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए सोच-समझकर खुद की बोली लगवाना, खुद की नीलामी पर उतर आना—केवल स्वायत्तता की कवायद मानी जाएगी. हालांकि इस तरह से किसी व्यक्ति द्वारा अपनी स्वायत्तता के विचार को लागू करना, उसकी चरम कार्रवाही कहा जाएगा. आदर्श समाज में ऐसी स्थिति की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

4.  न्यायिक संशोधन एवं निवारण

न्याय सौगात नहीं है. न ही समाज में हमेशा सब कुछ शुभ और शांतिमय होता है. प्रत्येक समय समाज में अनुकूल एवं विरोधी शक्तियां कार्यरत रहती हैं. वे कभी मनुष्य के कर्तव्य पालन में सहायक बनती हैं तो कभी विरोध पर उतर आती हैं. इसलिए न्याय का एक रूप संघर्ष का भी है. समाज चाहता है कि वहां न्याय के लिए कभी कोई खतरा न हो. यानी न तो व्यक्ति किसी दूसरे के अधिकारों के लिए संकट का कारण बने, न ही कोई उसके अधिकारों के लिए संकट की जमीन तैयार करे. यह आदर्श स्थिति है. व्यवहार में समाज में संघर्ष की स्थितियां बनी रहती हैं. राज, समाज किसी के लिए भी यह संभव नहीं होता कि वह चैबीस घंटे व्यक्ति के अधिकार-संरक्षण तथा कर्तव्यपालन के प्रेरणा में लगा रहे. इसलिए व्यक्ति को अपने अधिकारों और अस्तित्व पर संकट के समय, आत्मरक्षा अथव संपत्ति की सुरक्षा के लिए समयानुसार प्रतिकार करने की छूट दे दी जाती है. यह सामाजिक गतिविधियों में संशोधन एवं निवारण के दौरान न्याय की स्थिति को दर्शाती है. राबर्ट नॉजिक के अनुसार व्यक्तिमात्र को यह आजादी होती है कि वह अपने अधिकार, संपत्ति और जीवन की रक्षा के लिए आवश्यकता पड़ने पर उपयुक्त बलप्रयोग कर सके, मगर यह ध्यान रखते हुए कि संकट अथवा आसन्न आपदा की स्थिति में दूसरों को भी वही अधिकार उपलब्ध होंगे. यदि ‘क’ को ‘ख’ द्वारा किए गए दुराचरण से नुकसान उठाना पड़ा है तब, ‘क’ को उसका समयानुसार प्रतिरोध करने तथा नुकसान की स्थिति में ‘ख’ से क्षतिपूर्ति का दावा करने का पूरा अधिकार होगा. इसके बावजूद यदि ‘ख’ का दुराचरण बना रहता है, तब ‘क’ को उसे कानून द्वारा अथवा सीधे ही दुराचरण के लिए दंडित करने का अधिकार होगा. ये अधिकार सामाजिकता की नींव हैं तथा सभी सदस्यों को बराबर होते हैं. उपर्युक्त उदाहरण की ही बात करें तो यदि किसी भी क्षण ‘क’, ‘ख’ के साथ दुराचरण में लिप्त पाया जाता है तो ‘ख’ को भी अधिकार होगा कि वह ‘क’ को दंडित कर सके, और यदि उसके आचरण से उसको क्षति पहुंची है तो अपनी क्षतिपूर्ति के लिए दावा कर सके.

नॉजिक की खूबी है कि अपने विवेचन में वह न केवल मानव-व्यवहार की दुर्बलताओं पर विचार करता है, बल्कि मानवीय स्वतंत्रता के दायरे में उनका समाधान भी सुझाता है. अपने सूक्ष्म विवेचन सामर्थ्य से वह जहां अनेक गंभीर मुद्दों का समाधान देता है, वहीं कुछ मुद्दों को अनसुलझा ही छोड़ जाता है. व्यक्ति को अपनी प्राणरक्षा, संपत्ति रक्षा का अधिकार है, आवश्यकता पड़ने पर वह अपने ऊपर होने वाले किसी भी प्रकार के हमले का प्रतिकार कर सकता है. और यदि किसी के आचरण से उसको नुकसान पहुंचा है तो उस नुकसान की भरपाई की दावेदारी भी कर सकता है. मनुष्य को ये अधिकार कुछेक परंपरागत समाजों को छोड़कर, प्रायः सभी आधुनिक समाजों में प्राप्त हैं. इसके बावजूद विद्वानों के एक वर्ग को नॉजिक के अति-व्यक्तिवादी सोच से आपत्ति है. यह आपत्ति अकेले नॉजिक से नहीं, लगभग सभी इच्छा-स्वातंत्र्यवादी विचारकों से है. उन्हें लगता है कि संपत्ति अधिकार को लेकर व्यक्ति-स्वातंत्र्य का समर्थन करते हुए वे इतनी आगे निकल जाते हैं कि उसके विचारों में व्यक्तिवाद उन्मुक्त और उच्छ्रंखल दिखने लगता है. इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षतिपूर्ति की दावेदारी का अधिकार है. लेकिन क्षतिपूर्ति की सीमा क्या हो? इसको तय करने का अधिकार किसे होगा? क्या केवल उसको जिसे क्षति पहुंची है? यदि वह अपनी क्षति का बढ़-चढ़कर मूल्यांकन करता है तब क्या होगा? ऐसे में यदि सरकार कानून के माध्यम से हस्तक्षेप करती है तो क्या उसका प्रयास व्यक्ति-स्वातंत्र्य के दायरे में अनावश्यक माना जाएगा? ऐसे प्रश्नों पर प्रतिक्रिया बहुत विलंब से मिल पाती है. राबर्ट नॉजिक की ओर से अपराध के लिए दूसरे को दंडित करने का सुझाव पर बहुतों को आपत्ति है. उनके अनुसार व्यक्ति को अपने ही स्तर पर दंड सुनाने का कोई अधिकार नहीं है. क्योंकि नुकसान की भरपाई किस सीमा तक हो? यदि यह उस व्यक्ति पर छोड़ दी जाए जिसका नुकसान हुआ है, तो वह सही है या गलत इसका निर्णय कौन करेगा? अभियुक्त को दंडित करने का अधिकार प्रभावित मनुष्य को एकाएक नहीं दिया जाता. ऐसे मामलों में राज्य की उपस्थिति जरूरी मानने से हालांकि व्यक्ति-स्वातंत्र्य की भावना को ठेस पहुंच सकती है, लेकिन इससे स्वार्थ के वशीभूत हो, एक व्यक्ति द्वारा दूसरे को हानि पहुंचाए जाने की संभावना में भी कमी आती है. यह ऐसा मोड़ है जहां इच्छा-स्वातंत्र्यवाद की सीमा साफ नजर आने लगती है. नॉजिक बड़े परिश्रम से व्यक्तिमात्र के संपूर्ण स्वातंत्र्य का पक्ष लेता है, किंतु संपत्ति के संरक्षण तथा समस्याओं के सीधे निवारण में इच्छा-स्वातंत्र्यवाद की जो दुर्बलताएं हैं, वे थोड़ा-सा विचार करने पर सामने आ ही जाती हैं..

राबर्ट नॉजिक ने कराधान पद्धति की आलोचना की है. लोगों से कराधान जुटाकर उसी धनराशि से पुलिस को पोसना, यह लोगों की नैसर्गिक स्वाधीनता पर डाका डालना है. लेकिन शासन और सरकार चलाने के लिए तो धन चाहिए. नॉजिक इसके लिए लोगों को जागरूक करने की बात करता है. लोगों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों का बोध होगा, साथ में यह विश्वास होगा कि उनकी स्वाधीनता अक्षुण्ण है. समाज में रहकर उनकी संपत्ति और अधिकारों को कोई खतरा नहीं है, तो वे स्वयं अनुशासित होकर काम करेंगे. लेकिन समाज में अनुशासन और शांति-व्यवस्था बनाए रखने के अतिरिक्त राज्य के और भी दायित्व होते हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, अभिरक्षा जैसे बहुत से मामले हैं जिन्हें बढ़ावा देना राज्य का पुनीत कर्तव्य माना जाता है. उनके लिए धन की आपूर्ति कहां से होगी? नॉजिक इसके लिए दान और स्वैच्छिक सहयोग का समर्थन करता है. यहां नॉजिक और हास्पर्स के विचारों में समानता देखी जा सकती है. जॉन हास्पर्स भी मानता था कि सरकार का एकमात्र कार्य ‘उपद्रव आदि के समय लोगों के जान-माल की रक्षा करना है.’ लेकिन उपद्रवियों पर काबू पाने के सरकार के पास समुचित शक्ति और अधिकारों का होना जरूरी है, ताकि अवसर पड़ने पर वह न्यायकर्ता की भूमिका भी निभा सके. इन सब कार्यों के लिए सरकार के पास धन आना चाहिए. हास्पर्स के अनुसार उपयुक्त तो यही है कि कानून और व्यवस्था के लिए सरकार को धन की आपूर्ति नागरिकों के स्वैच्छिक सहयोग और दान की भावना से हो. यदि कराधान का सहारा लेती है तो कर-राशि का उपयोग केवल समाज में शांति और सुरक्षा के विस्तार के लिए किया जाना चाहिए. वह जोर देकर कहता है—‘समाज में कानून और व्यवस्था कायम रखने के अलावा किसी और कार्य के लिए जनता से धन जुटाने का सरकार को कोई अधिकार नहीं है.’ नॉजिक का न्यायदर्शन एक आदर्शवादी उद्गार है. एक भावुक मन का सर्वशुद्धतावादी सपना. एक ऐसा विचार जिसे मानवतावादी समय-समय पर देखते आए हैं. उसकी कुछ सीमाएं हैं. अनेक समस्याएं ऐसी हैं जिनपर नॉजिक विचार करने से बचा है. इसके बावजूद उसके विचारों में एक आदर्श, मानवतावादी समाज के गठन का सपना मौजूद है. कुल मिलाकर इच्छा-स्वातंत्र्यवाद मनुष्य के अधिकार, स्वतंत्रता और एक आदर्श समाज के सपने को बहुत ही आसान भाषा में दुनिया के सामने लाता है. नथानियल ब्रांडेन के शब्दों में, ‘इच्छा-स्वातंत्र्यवाद बहुत सरल, स्पष्ट, आसान भाषा में लिखा हुआ दर्शन है, जिसे समझने के लिए किसी विशेष तकनीकी योग्यता की आवश्यकता नहीं है. यह जानकारीपरक और आनंददायक पाठ है.’14

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका

1. To live honorably, to harm no one, to give to each his own.” Ulpianus in Digesta of Justinianus Augustus, 1.1.10.1
2. The sovereign is not bound by the laws.-Ulpianus, Digesta 1.3.31.
3. Justice is the constant and perpetual will to render to every man his due.” Digesta 1.1.10.
4. Political theories past and present have traditionally been concerned with who should be the master (usually the king, the dictator, or government bureaucracy) and who should be the slaves, -John Hospers, What Libertarianism Is.
5. No one is anyone else master, and no one is anyone else slave. Since I am the one to decide how my life is to be conducted, just as you decide about yours, I have no right (even if I had the power) to make you my slave and be your master, nor have you the right to become the master by enslaving me. Slavery is forced servitude. Ibid
6. Government should intervene only in a RETALIATORY situation. The government must never INITIATE an action to create a better world — it is not the business of government to make an advance decision about what counts as benefit. Through laws, government can prohibit various aggressive actions, but it cannot require the bringing about of supposedly beneficial ones. John Hospers, What Libertarianism Is.
7. The state of Nature has a law of Nature to govern it.- John Locke, Second Treatise on Civil Government.
8. …no one ought to harm another in his life, liberty, and or property-Ibid.
9. justice to hold just in case rights are respected. -Peter Vallentyne in Nozick’s Libertarian Theory of Justice
10. a right is something for which one can demand or enforce compliance” Nozick in Philosophical Explanations ,1981, p. 499.
11. a. If one mixes what one owns with something that is unowned, one thereby comes to own the unowned thing.
b. Each person owns her own labor.
c. If one mixes one’s labor with unowned land, one thereby comes to own the land.
12. No body could think himself injured by the drinking of another man, though he took a good drought, who had a whole river of the same water left him to quench his thirst: and the case of land and water, where there is enough of both, is perfectly the same.-John Locke: Second Treatise of Civil Government, Chapter 5.
13. Why should one’s entitlement extend to the whole object rather than just to the added value one’s labor has produced?- Nozick, Anarchy, State, and Utopia, p. 175.
14. “Libertarianism is very simply and clearly written and requires no technical knowledge on the part of the reader. Enjoyable, informative reading.”- Nathaniel Branden, as quoted by John Hospers in Libertarianism: A Political Philosophy for Tomorrow.

सापेक्षिक न्याय : राज्य और समाज का सदाचरण

सामान्य

धर्म और अभिजन संस्कृति — 14

 
ब्रह्मांड में ऐसा कोई सद्गुण नहीं है, जो सही मायने में इतना महान और ईश्वर-तुल्य हो, जितना न्याय….अतएव सर्वज्ञों और सर्वसत्तावादियों से प्रार्थना है कि वे समाज में न्याय की स्थापना हेतु यथासंभव प्रयत्न करें.’1— एडीसन.

राज्य नागरिकों का सर्वसम्मत विधान है. उसका औचित्य सबका बना रहने में है. यह तभी संभव है, जब लोगों का उसमें विश्वास हो. यह विश्वास हो कि राज्य उनकी अपेक्षाओं की पूर्ति करने में सक्षम है. यह काम राज्य और नागरिकों के बीच दूरी अथवा दुराव के रहते संभव नहीं. यदि राज्य तथा नागरिकों के बीच दूरी होगी तो नागरिक अपने मनोभावों, सपनों और सचाइयों को खुद तक सीमित रखेंगे. उन्हें राज्य या उसके प्रतिनिधियों के समक्ष खुलकर रख ही नहीं पाएंगे. इससे प्रकारांतर में राज्य की गतिविधियों में उनकी रुचि का हृास होगा. अवसर का लाभ उठाकर राज्य का कामकाज संभाल रहे लोग, स्वयं को साधारणजन से ऊपर रखकर अपने लिए विशिष्ट सुख-साधनों की मांग करने लगेंगे. परिणामस्वरूप राज्य में समाजार्थिक स्तरीकरण बढ़ेगा, जन तथा अभिजन के अविश्वास में वृद्धि होगी. उसका दोनों के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. नागरिकों का राज्य में विश्वास अक्षुण्ण रहे. उसके साथ जुड़कर वे गर्व का अनुभव करें, इसके लिए राज्य की अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों की ओर सतत प्रयत्नशीलता अत्यावश्यक है. साथ में जरूरी है समाज द्वारा समान, स्थिर समाजार्थिक विकास के साथ सामाजिक समरसता की ओर अग्रसर रहना. सामाजिक अतर्द्वद्वों को न्यूनतम रखने हेतु ध्यान रखना कि राज्य में जन और अभिजन जैसे टापू न बनने पाएं. यदि कुछ बनें भी तो उनमें आपसी विश्वास, लेन-देन और संचरण का रिश्ता हो. लेकिन राज्य एक जटिल संरचना है. उसके बहुत-से मामले होते हैं, जिनके संचालन हेतु विशेषज्ञ योग्यता आवश्यक होती है. विकास के लिए भी नए ज्ञान और प्रौद्योगिकी की जरूरत पड़ती है. इसलिए राज्य को यह छूट देनी होगी कि विकास और उत्पादन-स्तर बनाए रखने हेतु उसे जिस तरह की तकनीक और प्रौद्योगिकीय कौशल चाहिए, उसका सर्वकल्याण हेतु उत्पादन और उपयोग करे. आवश्यकतानुसार वैज्ञानिक शोध और आविष्कारों को बढ़ावा दे. इस सावधानी के साथ कि समाज, राजनीति, शिक्षा, प्रौद्योगिकी अथवा किसी अन्य किस्म की विशेषज्ञता के आधार पर नागरिकों के बीच किसी भी प्रकार का स्थायी भेदभाव अथवा स्तरीकरण न पनप सके. नागरिकों को उनकी आवश्यकता की वस्तुएं आसानी से उपलब्ध हों, ताकि समाज में कल्याण के न्यूनतम स्तर को बनाए रखना संभव हो. यह लक्ष्य समानता और समरसता के बगैर संभव नहीं. कई बार, विकास की चुनौतियों तथा निरंतर बढ़ती लोकेष्णाओं के बीच, राज्य के लिए एक ही समय में अपने सभी नागरिकों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति कर पाना असंभव-सा होता है. विशेषकर तब जब समाज में अलग-अलग सोच, रुचि एवं असमान बौद्धिक सामर्थ्य वाले लोग रहते हों. उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अलग-अलग हो. ऐसे में राज्य के लिए अपने सभी नागरिकों के विकास के एक समान स्तर को बनाए रखना असंभव प्रतीत होने लगता है. उसमें से कुछ के लिए राज्य जिम्मेदार होता है. कुछ कारण उसके भी नियंत्रण से बाहर होते हैं. उनके समाहार हेतु राज्य केवल अनुकूल परिवेश का सृजन कर सकता है.

सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, संसाधनों की अतिरिक्त उपलब्धता, विरासत में प्राप्त शिल्प-कौशल, धन-संपदा आदि के आधार पर समाज में कुछ नागरिक दूसरों की अपेक्षा सदैव वरीयता की स्थिति में होते हैं. ऐसे में राज्य का समान, सर्वतोन्मुखी विकास सभी नागरिकों को बराबर संसाधन उपलब्ध करा देने-भर से संभव नहीं है. तदनुसार जो व्यक्ति संसाधन, शिल्प-कौशल, शिक्षा अथवा विशिष्ट पारिवारिक-सामाजिक पृष्ठभूमि, विरासत से प्राप्त संपदा-संसाधनों के मामले में दूसरों से आगे होंगे, अवसर मिलते ही वे उन्हें पीछे छोड़कर आगे निकल सकते हैं. उदाहरण के लिए उत्पादकता में सहायक योग्यताओं जैसे शिक्षा, संसाधन, पारिवारिक पृष्ठभूमि, तकनीक-कौशल, अनुभव आदि में से प्रत्येक को यदि एक-एक अंक दे दिया जाए तो ऊपरोल्लिखित पांचों गुणों से संपन्न व्यक्ति को पूरे पांच अंक प्राप्त होंगे. तब अनुभवहीन अथवा सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़े हुए व्यक्ति को उपर्युक्त सभी विशेषताओं से संपन्न व्यक्ति की अपेक्षा कम अंकों से समझौता करना पड़ेगा. यदि आरंभिक बिंदू को बलपूर्वक एकसमान कर दिया जाए? कोई अनुदार अथवा कट्टर समानतावादी राज्य लोगों को परिवार एवं विरासत के आधार पर मिलनेवाले वाले लाभों से वंचित करते हुए, समस्त संपत्ति को राज्य की घोषित कर व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा को ही समाप्त कर दे तब? प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में अनुशंसा की है कि बालक को जन्म से ही परिवार से दूर रखकर राज्य के नियंत्रण में उनका पालन-पोषण किया जाए, संतान की पहचान को उसके माता-पिता से भी गोपनीय रखा जाए. उसी अवस्था में बच्चों को उनकी रुचि अनुसार अनुकूल शिक्षा के अलावा आवश्यक हस्त-कौशल की जानकारी दी जानी चाहिए. इस अतिसमानतावादी द्रष्टिकोण को अव्यावहारिक मानकर प्लेटो के शिष्य अरस्तु ने ही नजरंदाज कर दिया था. वह उचित भी था. इसलिए कि न्याय का उद्देश्य व्यक्ति को किसी भी प्रकार की दासता से बाहर लाकर मुक्ति का एहसास कराना है, ताकि समाज में रहकर वह अपनी योग्यता का भरपूर उपयोग कर सके तथा उसके माध्यम से अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सके. प्लेटो के विचारों से राज्य की तानाशाही झलकती थी, व्यक्ति की निजी पसंदों और रुचियों को उसमें उपेक्षित रखा गया था. इसके बावजूद समाजार्थिक वैषम्य को कम करने के लिए व्यक्तिगत संपत्ति के उन्मूलन की मांग समानतावादी विचारकों की ओर से निरंतर उठती रही है. उनीसवीं शताब्दी में तो बड़े-बड़े समाजवादी दार्शनिकों द्वारा इसका समर्थन किया गया था. तब, समानतावादियों की मांग के चलते आज भी क्या यह उचित होगा कि प्रत्येक बालक को उसकी रुचि के अनुसार शिक्षण-प्रशिक्षण के समान अवसर दिए जाएं और वयस्कता की उम्र में प्रवेश करते ही उसे सुविधाओं और संसाधनों के पूर्वनिर्धारित पैकेट के साथ समाज में आगे बढ़ने के लिए छोड़ दिया जाए? समाज में समानता की स्थापना की दिशा में यह प्रथम दृष्टया आदर्श प्रणाली हो सकती है. मगर इससे शत-प्रतिशत समानता के लक्ष्य को प्राप्त करना असंभव ही होगा. उस अवस्था में व्यक्ति की रुचियां, अनुभव, सीखने की प्रवृत्ति, परिवेश, राजनीति तथा परिस्थितियां भविष्य में उसकी प्रगति की दिशा को तय करेंगी.

आशय है कि किसी भी ज्ञात प्रविधि द्वारा समानता के लक्ष्य को शत-प्रतिशत प्राप्त करना नामुमकिन है. लोगों की, भले ही वे संख्या में कितने कम क्यों न हों, मर्जी के बगैर समानता के नाम पर की गई अतिवादी कार्रवाही राज्य का निरंकुश आचरण माना जाएगा. उसका प्रतिकूल असर लोगों की उत्पादन क्षमता पर पड़ेगा. ऐसे में सामाजिक समानता तथा व्यक्ति की अधिकतम उत्पादकता के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए राज्य का क्या कर्तव्य है? मनुष्य के व्यक्तिगत और सामाजिक कर्तव्य के बीच तालमेल कैसे संभव हो? कोई व्यक्ति तभी पूरी तरह स्वतंत्र कहा जा सकता है, जब उसका अपने श्रम पर अधिकार हो. सामाजिक नैतिकता भी यही कहती है कि अपने बुद्धि-कौशल तथा श्रम-सामर्थ्य से व्यक्ति जो अर्जित करता है, उसका लाभ उसे मिलना ही चाहिए. दूसरे शब्दों में यदि कोई व्यक्ति अपने पड़ोसी की अपेक्षा अधिक परिश्रमी और बुद्धिमान; तथा अपने श्रम और बुद्धि-कौशल द्वारा अतिरिक्त धनार्जन करने में सक्षम है—तब यह अनुचित होगा कि उसके द्वारा युक्तियुक्त ढंग से अर्जित की गई संपदा को ऐसे व्यक्तियों में बांट दिया जाए जो स्वभाव से ही कम परिश्रमी, आलसी तथा बुद्धि-कौशल में पिछड़े हुए हैं. यदि राज्य ऐसा करने का आदेश देता है, तो मानना होगा कि वह न केवल व्यक्ति-स्वातंत्रय की सीमाओं में अवांछित और अनैतिक हस्तक्षेप कर रहा है. साथ में व्यक्ति को अपने श्रम के लाभों से भी वंचित कर रहा है, जिनपर उसका नैतिक और सामाजिक अधिकार है. फिर भी आदर्श राज्य के लिए यह संभव नहीं कि सभी कुछ परिस्थितियों के हवाले कर दिया जाए. उस अवस्था में राज्य के संसाधन तथा विकास की बागडोर ऐसे लोगों तक सिमटने लगेगी, जो वरीयताक्रम में पहले से ही आगे हैं. यह न केवल राज्य के अस्तित्व की अवमानना होगी, बल्कि माना जाएगा कि राज्य व्यक्तिमात्र को विकास की धारा में दृढ़तापूर्वक बने रहने में सक्षम बनाने के अपने दायित्व को पूरा करने में भी असफल रहा है. तब ऐसी कौन-सी प्रेरणाएं हो सकती हैं, जो व्यक्ति को अपने और शेष समाज के हित में अधिकतम योगदान के लिए उत्सुक करें! इस तरह की सकारात्मक प्रेरणाओं की पहचान तथा उनका लोकहित में समयानुसार एवं न्यायपूर्ण ढंग से उपयोग, राज्य की सफलता को निर्धारित करता है. इसके लिए व्यक्ति तथा राज्य के बीच विश्वास और संबंधों की अंतरंगता आवश्यक है, जो राज्य की सत्ता पर आरूढ़ शक्तियों के अहंकार के कारण संभव नहीं हो पाती. प्रायः देखा जाता है कि व्यक्ति की अपने परिवार और समाज के साथ जैसी अंतरंगता होती है, वैसी निकटता राज्य के साथ नहीं बन पाती. लोग भूल जाते हैं कि राज्य समाज से पृथक न होकर, समाज की ही अधिरचना है. प्रबुद्ध नागरिक तथा जनसमाज आंतरिक-बाह्यः सुरक्षा, शांति, खुशहाली, विकास की निरंतरता तथा अंतरराष्ट्रीय संबंध हेतु राज्य का गठन करते हैं. व्यवस्था को बनाए रखने के लिए समाज राज्य को पर्याप्त मात्रा में कानून तथा संसाधनों के उपयोग का अधिकार प्रदान कर, सक्षम बनाता है. समाज की अनुमति से ही राज्य को कानून बनाने तथा उन्हें लागू करने के लिए आवश्यक संस्थाओं के गठन का अधिकार मिल जाता है. लोग सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकलापों को अपना समझकर उसमें हिस्सेदारी करते हैं, किंतु अज्ञानतावश यह मान लेते हैं कि राज्य का संचालन विशिष्ट लोगों का कार्य है. इसलिए वे राज्य के निर्णयों में हस्तक्षेप करने से उस समय तक दूर बने रहते हैं, जब तक कि उन्हें इसके लिए बार-बार आमंत्रित नहीं किया जाता. कई बार इसमें बहुत देर हो जाती है. अकसर धर्म के वायवी प्रलोभन व्यक्ति की प्राथमिकताओं को बदल देते हैं. उनमें फंसकर व्यक्ति राज्य के कार्यकलापों की ओर से उदासीन हो जाता है. जनसाधारण का राज्य की गतिविधियों का मूक दृष्टा बन जाना, सत्तारूढ़ शक्तियों को मनमानी का अवसर देता है. परिणामस्वरूप वे संस्थाएं जिनके गठन के लोककल्याण की प्रेरणा थी, अपने सरोकार भुलाकर स्वार्थी तत्वों की ख्वाबगाह बनने लगती हैं,

दरअसल हर समाज की विशिष्ट परंपरा और संस्कृति होती है. उन्हें वह किसी भी प्रकार के कानून और संविधान से अधिक महत्त्व देता है. निजी व्यवहार में वह उन्हीं से अनुशासित भी होता है. इसलिए राज्य की पैत्रिक संस्था होने के बावजूद समाज उसकी ओर से उदासीन बना रहता है. समाज के अंकुश, उपेक्षा अथवा अज्ञान के अभाव में राज्य स्वयं को स्वयंभू सत्ता समझने लगता है. भुला देता है कि वह समाज की ही संरचना है. व्यवहार में प्रत्येक व्यक्ति दो भिन्न संस्थाओं यथा राज्य एवं समाज से अनुशासित होने लगता है. चूंकि पुलिस, कानून, सैन्य-बल आदि राज्य के अधीन होते हैं, इसलिए प्रकारांतर में वह स्वयं को असीमित अधिकार संपन्न, समाज की अपेक्षा वरिष्ठ सत्ता मानने लगता है. चूंकि मनुष्य सामाजिक प्राणी है, अपने रोजमर्रा के जीवन में मनुष्य का वास्ता राज्य की अपेक्षा समाज से ज्यादा पड़ता है, जहां जाति, धर्म, समुदाय जैसे प्रलोभन तथा दैनिक जीवन की समस्याएं उसे उलझाए रखती हैं. इसलिए राज्य के अधिकार-क्षेत्र पर कोई सवालिया निशान लगाने के बजाय वह सामाजिकता के अपने दायरे में ही खुश रहता है. राज्य की गतिविधियों की ओर से स्वाभाविक-सी उदासीनता उसे घेरे रहती है. वह मान लेता है कि राजनीतिक निर्णय लेना सरकार तथा उसके चुने हुए प्रतिनिधियों का कार्य है, जिन्हें उसने यह जिम्मेदारी सौंपी है. अवसर का लाभ उठाकर राज्य ऐसे कानून बनाने में सफल हो जाता है, जो उसकी अधिसत्ता को और ज्यादा मजबूत तथा समाज-निरपेक्ष बनाते हों. चूंकि राज्य के कानून सत्ता पर विद्यमान लोगों, जो जनता की उदासीनता के चलते उसे अपना अधिकार समझने का भ्रम पाल बैठते हैं, द्वारा बनाए जाते हैं, इसलिए वे शक्तिशाली का समर्थन करते हुए नजर आते हैं. फिर जैसे-जैसे राज्य शक्तिशाली होता है, वह न्याय, नीति और निष्पक्षता की भावना से निरंतर दूर खिसकता जाता है.

निष्पक्षता दो प्रकार से संभव है. एक तो राज्य स्वयं अपने नागरिकों के साथ समानतावादी द्रष्टिकोण अपनाए, उनके लिए ऐसा वातावरण विरचित करे, जिसमें व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का संपूर्ण अनुभव करते हुए अपने निर्बंध विकास की ओर अग्रसर हो सके. राज्य स्वयं व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए स्वयं प्रेरक सत्ता बना रहे. दूसरे उन कारकों का समाधान खोजे, जो परोक्ष रूप में व्यक्ति की उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं, जैसे धर्म, जाति, संप्रदाय, क्षेत्रीयतावाद, भाई-भतीजावाद आदि—और इनका निराकरण करते हुए बगैर किसी भेदभाव के सर्वांगीण विकास हेतु कार्य करे. किंतु राज्य की निष्पक्षता एकदम वस्तुनिष्ट नहीं हो सकती. दो और दो चार का सीधा-सा गणित यहां उपयोगी नहीं होता. हम ऊपर भी देख चुके हैं कि निरा समानतावादी द्रष्टिकोण समाज में न्याय की स्थापना के लिए अपर्याप्त है. खासकर तब जब समाज में जाति, धर्म, आय-विभाजन तथा संसाधनों के वितरण में पहले से ही घोर असमानताएं हों. हमें यह समझना होगा कि समाज में व्याप्त असमानता, स्वार्थपरकता, अलगाववाद के लिए केवल व्यक्ति या समाज जिम्मेदार नहीं होते. वे विभेदकारी, सांप्रदायिक राजनीति के चलते कई बार ऊपर से भी थोप दिए जाते हैं. मनुष्य समाज में रहकर जो विचारदृष्टि ग्रहण करता है, उसमें राज-समाज का भी बड़ा योगदान होता है. दूसरे शब्दों में व्यक्ति के सोच में अलगाव पैदा करने, उसे स्वार्थी और शंकालु बनाने में राज्य भी बराबर का जिम्मेदार होता है. ‘यथा राजा, तथा प्रजा’ के मुहावरे के साथ हर कोई शिखरस्थ शक्तियों का अनुसरण करना चाहता है. बकौल पाउलो फ्रेरा परिवर्तन के आरंभिक चरण में उत्पीड़ित जन उत्पीड़क का अंधानुकरण करता है. जाहिर है व्यक्ति कुछ अपने अनुभव से सीखता है, कुछ बाहरी प्रेरणाओं से तथा कुछ राज्य के स्वार्थपूर्ण आचरण के प्रतिकारस्वरूप सोचने-करने को बाध्य होता है. शंकालु अवस्था में वह उचित-अनुचित का निर्णय कर पाने में असमर्थ रहता है. राज्य का दायित्वों की ओर से भटकाव प्रकारांतर में व्यक्ति को जिम्मेदारियों से पलायन को उकसाता है, जिससे अव्यवस्थाएं जन्म लेती हैं.

उपर्युक्त विवेचन द्वारा समाज में न्याय की स्थापना में व्यक्ति और राज्य की भूमिकाओं को समझा जा सकता है. तदनुसार राज्य का प्रथम दायित्व है कि लोकहित तथा नागरिक इच्छाओं में तालमेल बनाया जाए. यदि मनुष्य को लगता है कि धन के आधार पर उसके हितों को सुरक्षा मिल सकती है और उसके द्वारा कमाए गए धन पर केवल उसी का अधिकार होना चाहिए, तब समाज का कर्तव्य है कि उसके विश्वास की रक्षा करे. कम से कम उस सीमा तक जब तक उसको लगता है कि व्यक्ति का योगदान शेष समाज के लिए भी मंगलकारी है. यदि समाज यह मानता है कि धन के बजाय, विशिष्ट सुविधाओं का पैकेज व्यक्ति और समाज दोनों के लिए अधिक लाभकारी है, तो वह उन व्यक्तियों को भी विश्वास के दायरे में लाने का प्रयास करे, जो धन को अपने सुख-साधन के लिए जरूरी मानते हैं. यह कार्य धैर्यपूर्वक और लोगों को विश्वास में लेकर किया जाना चाहिए. इस बीच राज्य को सामाजिक समानता एवं समरसता की दिशा में प्रयास करते रहना चाहिए. यह तभी संभव है, जब राज्य की निर्णय-प्रक्रिया पारदर्शी हो; और व्यक्तिमात्र को यह विश्वास हो कि कुछ भी ऊपर से थोपा नहीं जा रहा है. नागरिकों का विश्वास अर्जित करने के लिए आवश्यक है कि राज्य, कल्याण के विभाजन में एकदम निष्पक्ष, निरपेक्ष, कार्यसक्षम और न्यायसंगत बना रहे.

न्याय जैसा कि हम जानते हैं राष्ट्र और नागरिकों को एक-दूसरे के प्रति विश्वसनीय और संवेदनशील बनाता है. वह राज्य और समाज के बीच स्नायुतंत्र की भांति काम करता है. किसी भी संवेदनशील राज्य से उसके नागरिकों की समस्याएं छिपी नहीं रहतीं. समस्याओं के समाधान को वह न्याय के रूप में लौटाता है. समाज में न्याय की पैठ का स्तर, उसकी आत्मनिर्भरता के स्तर को दर्शाता है. उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि राज्य अपने दायित्व पालन की ओर कितनी गंभीरता से अग्रसर है. यह अन्यत्र भी साफ कर चुके हैं कि मनुष्य समाज में बेहतर जीवन की उम्मीद के साथ सम्मिलित होता है. उस समय मनुष्य अपनी स्वतंत्रता के एक हिस्से की बलि यह सोचकर चढ़ाता है कि समाज के साथ रहते हुए वह अपनों के सान्निध्य सुख के साथ-साथ, अपनी अवशिष्ट स्वतंत्रता को भली-भांति भोग सकेगा. अर्जित संपत्ति पर उसका अपना नियंत्रण होगा और समाज उसके जीवन और संपत्ति की सुरक्षा करेगा. समाज उसके लिए ऐसा वातावरण भी बनाएगा, जहां वह अपनी उत्पादकता के आदान-प्रदान द्वारा अधिकतम सुख और स्वतंत्रता भोग सके. दूसरे शब्दों में उत्पादकता के लाभों पर अधिकार व्यक्ति का सबसे बड़ा प्रेरक-तत्व है. लेकिन समाज के अपने लक्ष्य होते हैं. प्रत्येक व्यक्ति को मनमाना आचरण करने की छूट समाज नहीं दे सकता. इसलिए भी कि वह जानता है कि प्रत्येक व्यक्ति की रुचियों और कार्यक्षमता में अंतर होता है. दूसरे समाज के लिए ऐसी वस्तुएं भी जरूरी होती हैं, जिनका निर्माण काफी श्रम-साध्य, अप्रीतिकर और अल्पलाभकारी हो. यदि सभी व्यक्तियों को मनमानी करने की छूट दे दी जाए तो ऐसे कार्यों में जहां अत्यधिक श्रम के बावजूद उत्पादकता न्यूनतम है उन्हें, जब तक कोई मजबूरी न हो, कम ही लोग अपनाने को उद्यत होंगे. वह स्थिति न केवल आर्थिक, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक असमानता का कारण भी बनेगी.

राज्य चूंकि नागरिकों का सर्वसम्मत विधान, उनकी सम्मिलित चेतना की अनुकृति है, इसलिए होना यह भी चाहिए कि उसकी व्याप्ति लोगों की संचेतना और भावभूमि का हिस्सा बने. राज्य के गठन के पीछे जो औचित्य है, उसका नागरिकों को भली-भांति बोध हो. ताकि स्पर्धा के बीच भी उनमें अविकल सहयोग की भावना बनी रहे. लोग दूसरों को पीछे ढकेलकर खुद आगे निकल जाने की कोशिश करने के बजाय, सभी को साथ लेकर चलने को प्रतिबद्ध हों. इस तरह की प्रेरणा, उत्प्रेरणा के लिए राज्य की आवश्यकता पड़ती है. इसके बावजूद राज्य का संचालन कर रहे लोग, अनेक अवसरों पर खुद को दूसरों से विशिष्ट मानकर उसके संसाधनों पर अधिकार जमाने लगते हैं. उनके विशिष्टताबोध अथवा अभिजात संस्कारों के चलते जीवन और समाज में राज्य की उपस्थिति केवल सरकार तथा उसके द्वारा गढ़े गए पुलिस, कानून, सुरक्षाबल आदि संस्थाओं में नजर आती है. चूंकि सरकार और उसके सभी विधान, चुने हुए लोगों द्वारा गढ़े जाते हैं तथा प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के चलते उन्हें विशिष्ट महत्त्च प्राप्त होता है, अतएव समाज की सामूहिक चेतना का प्रतीक नजर आने के बजाए समस्त विधान तथा उनके आधार पर गठित संस्थाएं, जिनमें संसद और विधायिकाएं भी सम्मिलित हैं, शक्तिशाली समूह के हितों के संरक्षक नजर आते हैं. परिणामस्वरूप आमजन स्वयं को आहत और उपेक्षित समझने लगता है. प्रकारांतर में उसका राज्य की ओर से विश्वास घटने लगता है. धीरे-धीरे लोग भूलने लगते हैं कि राज्य उन्हीं का कार्य है. लोक-निगरानी घटने से सत्तारूढ़ शक्तियां निरंकुश आचरण करने लगती हैं, जिससे सामाजिक असंतोषों में वृद्धि होती है.

निष्पक्षतावाद या न्यायवाद कम से कम 2500 वर्ष पुराना विचार है. उसका आशय राज्य की सुख-समृद्धि तथा सुरक्षा के लिए नागरिक कर्तव्यों, अधिकारों तथा सामाजिक आचार-संहिताओं का समायोजन करना है. लेकिन जिस न्यायवाद पर हम यहां विचार करने जा रहे हैं, उसका सीधा-सा मंतव्य है कि न्याय कानूनी मर्यादाओं से आगे बढ़कर कार्य करे. उन लोगों के लिए कल्याण में भागीदारी सुनिश्चित करे जो जन्म, प्रकृति, धर्म, रंग-भेद या अन्य किसी कारण से विकास की धारा से बाहर हैं. यह अपने औचित्य में जनसाधारण का विश्वास लौटाने के लिए लिया गया राज्य का संकल्प है. उसके माध्यम से राज्य नागरिकों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास करता है कि वह सभी का है तथा बिना किसी भेदभाव के, अपने संपूर्ण सामर्थ्य के साथ, सभी के विकास हेतु सतत तत्पर है. उसकी निगाह में सभी नागरिक बराबर हैं. जो कुछ उसके अधिकार में है, उसपर सभी नागरिकों का समानाधिकार है. साथ ही ऐसे सभी व्यक्तियों पर राज्य की विशेष संवेदन-दृष्टि है, जो जन्म अथवा अन्य किसी सामाजिक या प्रकृतिजन्य कारण से विकास की स्पर्धा में पिछड़ चुके हैं. वितरणात्मक न्याय का यह उदार चेहरा है, जो विकास के अंतिम छोर पर मौजूद नागरिकों को अतिरिक्त सहायता देने का आश्वासन देता है. इसके विचारक जॉन राउल्स हैं. ‘जस्टिस फा॓र फेयरनेस’ अर्थात ‘निष्पक्षता के लिए न्याय’ नाम से प्रसिद्ध राउल्स का यह सिद्धांत असल में उपयोगितावाद का ही संशोधित संस्करण है. गौरतलब है कि बैंथम के बाद से ही उपयोगितावाद न्यायवादी विचारकों का पंसदीदा दर्शन था. धीरे-धीरे इस विचारधारा की कमजोरियां सामने आने लगीं, जो सैद्धांतिक कम, व्यावहारिक ज्यादा थीं. बैंथम समेत अधिकांश उपयोगितावादी विचारकों के मतानुसार सुख का आशय, दूसरों के सुख में अपना सुख खोजने से था. उसके कथन, ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख’ का यही निहितार्थ है. इसमें परोक्षतः सर्वकल्याण की भावना छिपी थी. कालांतर में पूंजीवादी होड़ के बीच व्यक्तिवादी दर्शन खूब पनपा, जिससे उपयोगितावादी मंतव्य दूसरों की चिंता से बेपरवाह, व्यक्तिगत सुख को महत्त्व देने वाली विचारधारा तक सिमटने लगा. यह मान लिया गया कि अगर उद्योग तथा आय के दूसरे साधन बढ़ेंगे तो उनका लाभ रिसकर निचले वर्गों तक भी पहुंचेगा. पूंजीवाद समर्थक अर्थशास्त्रियों ने इसका बढ़-चढ़कर प्रचार किया, जिसके चलते इसे पूर्णतः स्वाभाविक प्रक्रिया मान लिया गया. पूंजीपति उद्यमियों की मांग थी कि उत्पाद तथा उससे जुड़ी गतिविधियों पर सरकार का न्यूनतम हस्तक्षेप हो. इस विचार को अर्थशास्त्रियों ने मुहावरेदार भाषा में ‘लेजेज फेयर’ का नाम दिया. सरकार से कहा गया कि उसका उत्पादन तथा उससे जुड़ी गतिविधियों से दूर रहना ही श्रेयस्कर है. राजनीति अस्थिरता तथा राजसत्ताओं के शोषणकारी रवैये ने इसे खूब फैलाव दिया. भाड़े के बुद्धिजीवियों तथा अर्थशास्त्रियों की मदद से यह मुहावरा बीसवीं शताब्दी के दौरान लगातार चर्चा में बना रहा. उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि उत्पादन जरूरत के बजाय लार्भाजन को ध्यान में रखकर किया जाने लगा. इससे ऊपरले वर्गों की ओर पूंजी के प्रवाह में तेजी आई. छोटे-छोटे उद्योग दम तोड़ने लगे और उत्पादन कुछ हाथों तक सिमटता गया. आगे चलकर पूरी दुनिया उत्पादक और उपभोक्ता नाम के दो वर्गों में बंटती चली गई.

उपयोगितावाद और सुखवाद जैसे दर्शन भले ही पुराने हों, मगर इन्हें वास्तविक सम्मान बीसवीं शताब्दी में मिला. उस समय जब तीव्र मशीनीकरण से उत्पादन व्यवस्था में तेजी आई थी. नए उत्पादों को खपाने के लिए नए बाजारों की जरूरत थी. यह काम पुरानी विचारधाराओं के चलते, जिनका जन्म सामंतवाद और साम्राज्यवादी विस्तार के दिनों में हुआ था—असंभव था. इसलिए औपनिवेशीकरण को बल मिला. वैचारिक संक्रमण के बीच व्यक्ति-स्वातंत्रय, मानवाधिकार, सुखवाद, उपयोगितावाद जैसी विचारधाराओं ने उनीसवीं शताब्दी में जन्म लिया, जिनका उस शती के मानस को बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा. सामंतवादी दौर में टकराव सीधा और स्पष्ट होता था. औपनिवेशीकरण के बीच टकराव के मायने ही बदल गए. वहां समर्थन और विरोध साथ-साथ थे. बाजार पर छाए रहने के लिए इतनी महीन और कूटनीतिक चालें चली जातीं कि उनकी स्वतंत्र पहचान करना, अलग-अलग हों तो वे कब गड्ड-मड्ड हो जाएं—इसका अनुमान लगाना, बहुत ही कठिन था. पूंजीवाद सीधे-सीधे मुनाफे की संस्कृति पर टिका था. वही उसका एकमात्र मंत्र था. उससे अलग उसका कोई विचार ही नहीं था. मुनाफे के लिए हर विचारधारा को अनुकूल मोड़ देना, उससे काम लेना उसे बाखूबी आता था. नतीजा यह हुआ कि पूंजीवाद समर्थक विचारकों ने व्यक्ति-स्वातंत्रय, मानवाधिकार, उपयोगितावाद को निरे व्यक्तिवाद में ढालने की कोशिश की. उसमें वे सफल भी हुए. इसलिए आधुनिक सभ्यता को औद्योगिक क्रांति का कर्जमंद कहा जा सकता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि औद्योगिक क्रांति को सफल बनाने में पूंजीवाद की बड़ी भूमिका थी. लेकिन अधिक से अधिक लाभार्जन की लालसा ने पूंजीवाद को दुबारा उन्हीं सामंती संस्कारों के करीब ला दिया था, जिनसे मुक्ति की कामना, पूंजीवाद के समर्थन में उतरी आरंभिक प्रेरणाओं में से एक थी. स्मरणीय है कि पूंजीवाद के उठान को मशीनीकरण ने संभव बनाया था. उसके मूल में वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय क्रांति थी. वह स्वयं में वैचारिक क्रांति की देन थी. उसने यूरोप में अनेक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों को जन्म दिया था. लेकिन राज्य-प्रमुखों की निजी महत्त्वाकांक्षा तथा विश्व-युद्धों के बीच मिले अवसर ने पूंजीवाद को अनपेक्षित सफलता दी. परिणामस्वरूप परिवर्तनकामी विचारधाराओं का प्रभाव घटने लगा. उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए चलाए गए प्रचार अभियान मनुष्य को विवेकवान बनाने के बजाय, उसे भरमाने वाले सिद्ध हुए. उनके उभार के फलस्वरूप बने राज्यों की संख्या घटने लगी. इस सफलता से उत्साहित पूंजीवाद के समर्थक अवधूत, बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ‘विचारधारा के अंत’ की भविष्यवाणी करने लगे थे.

जॉन स्टुअर्ट मिल जैसे बाद के सुखवादी विचारकों ने सुखवाद और नैतिकता के बीच की दूरी को पाटने की भरपूर कोशिश की. शासन समाज की स्वैच्छिक अनुशासन पद्धति है. लोकानुभव से संपन्न राजनीतिक संस्थाएं विराट सामाजिक संदर्भों का हिस्सा होती हैं, वही संदर्भ उन्हें अनुशासित करते हैं. इसलिए यदि व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना है, साथ में यह तय करना है कि राज्य उसकी स्वतंत्रता में किसी प्रकार की बाधा न बने तो समाज में भी शांति, स्वतंत्रता और सहिष्णुता की भावना होनी चाहिए. मिल का मानना था कि उदारवादी शासन के पीछे उदारवादी समाज भी होना चाहिए. उसकी निगाह में स्वतंत्रता का महत्त्व इसलिए नहीं है कि वह मनुष्य के लिए सुखों को संभव बनाती है अथवा उसे भौतिक सिद्धियां अर्जित करने का अवसर देती है, बल्कि उसका महत्त्व इसलिए है कि वह उत्तरदायी मनुष्य की सहज और स्वाभाविक अवस्था है. लेकिन मिल की सामान्य उपभोग और सुख को नैतिकता से आबद्ध करने की तमाम कोशिशों के बावजूद, उपयोगितावाद और सामान्य नैतिकता के बीच उतनी ही दूरी बनी रही, जितनी व्यवहार और आदर्श के बीच होती है. इसकी संभावना मिल को भी थी. एक परिपक्व बुद्धिजीवी और संवेदनशील इंसान के रूप में वह व्यावहारिक राजनीति की समस्याओं से भी परिचित था. उसका मानना था कि समाज का लोकतंत्रीकरण, व्यक्तिगत गौरव के असंगत सिद्ध होगा. सत्ता-लोलुप समाजार्थिक, राजनीतिक शक्तियां व्यक्ति के विवेक को अपने स्वार्थ के अनुकूल मोड़ने की कोशिश करेंगी. आगे चलकर समाज में सत्ता, पूंजी और धर्म का जैसा गठजोड़ बना, उसने मिल की इस संभावना को पूरी तरह सच सिद्ध कर दिया. लोकतंत्र भीड़तंत्र में ढलते गए. उत्तरदायी राज्य का सपना धूमिल होता गया. यह औद्योगिक विकास की असफलता थी, जिसने ने बीसवीं शताब्दी में अनेक जनक्रांतियों को जन्म दिया. उनके स्वरूप भले अलग-अलग हों, ध्येय केवल एक था, समाज में न्याय की स्थापना. विकास से वंचित उसी से आगे चलकर वितरणात्मक न्याय की अवधारणा विकसित हुई. उसका ध्येय पूंजी और ताकत के इशारे पर नाचती राजसत्ताओं का नैतिक मार्गदर्शन करना था, उस सामाजिक नैतिकता को वापस लाना था जिसे साम्राज्यवाद के लंबे दौर में करीब-करीब बिसरा दिया गया था.

उपयोगितावादी न्याय के अनुसार समाज में सरकार की भूमिका व्यवस्थापक अथवा समन्वयक की होनी चाहिए. उसका दायित्व ऐसे परिवेश का निर्माण करना है, जिसमें सदस्य इकाइयां अपनी अधिकतम उत्पादकता को बनाए रख सकें. यह तभी संभव है जब सरकार कल्याण के वितरण हेतु संसाधनों को स्वयं खपाने के बजाय लोगों को उसके लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करे. ऐसे प्रबंध करे ताकि लोग पूरे आत्मविश्वास के साथ समाज और संसाधनों के प्रबंधन के लिए आगे आएं; और स्वयं-स्फूत्र्त भाव से अधिकतम उत्पादकता के लिए कार्य करें. विकास ऊपर से आरोपित न होकर लोगों के स्वैच्छिक सहयोग, आपसी विश्वास और आकांक्षाओं सहित स्वयं-स्फूत्र्त हो. वह कदाचित ऐसे समाज में संभव है, जहां आदर्श स्तर की समानता हो. समाज में न केवल संसाधनों और अवसरों की बराबरी हो, बल्कि वे शिक्षा, अनुभव, योग्यता, रुचि, विकास आदि के मामले में भी परस्पर तालमेल रखते हों. जहां ज्ञान और अनुभव का वैविध्य प्रतिस्पर्धी होने के बजाय एक-दूसरे का सहयोगी और सहायक हो. विकास के समांगीकृत अथवा अधिकतम समांगीकृत स्तर को बनाए रखने की ये आवश्यक शर्तें हैं. व्यवहार में ऐसा संभव नहीं है. विशेषकर ऐसे समाजों में जो विभेदकारी सामाजिक-राजनीतिक नीतियों के शिकार रहे हों, वहां समांगीकृत विकास के लिए असमानता के कारणों की खोज तथा उनका समयानुसार निराकरण जरूरी है. यह काम कानूनों के जखीरे में कुछ नए कानून शामिल कर देने से संभव नहीं है. प्रत्येक कानून, ऊपर से वह चाहे जितना सुरक्षित नजर आता हो, अपने भीतर अनेक छेद लिए रहता है. चालाक लोग उन्हीं का लाभ उठाकर अपने लिए सुरक्षित गलियारे बना लेते हैं. वास्तविक परिवर्तन हेतु लोगों के सोच और जीवनशैली में बदलाव जरूरी है. उदार जनसंस्कृति के विकास द्वारा इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि समाज की वास्तविक शोभा रुचि-वैभिन्न्य, चारित्रिक विविधताओं, संस्कृति तथा ज्ञान की अनेकानेक धाराओं को सहेजकर रखने में है. यही कारण है कि जीवंत समाजों में विकास की अनेक छटाएं विद्यमान होती हैं. व्यक्तिगत रुचियों के अलावा भौगोलिक और परिस्थितिगत कारण भी विकास की दर और दिशाओं को प्रभावित करते हैं. उस अवस्था में विकास को निरे उपयोगितावादी द्रष्टिकोण से परिभाषित करना, समाज की सतही या कहें कि निर्जीव व्याख्या करना है. इसलिए उपयोगितावादी विचारकों का जोर आमतौर पर आय के संसाधनों और अवसरों में समुचित तालमेल बनाए रखने तक सीमित रहता है. उन्हें लगता है कि न्यूनतम आय की सुनिश्चितता द्वारा समाज में अपेक्षित जीवन-स्तर को बनाए रखा जा सकता है. उनकी निगाह में प्रत्येक वस्तु जो मनुष्य के सुख में इजाफा करती है, उपभोग्य है. चूंकि वे मानते हैं निश्चित आय से सुख की निश्चित मात्रा या पैकेज खरीदा जा सकता है. इसलिए उनके अनुसार सुख के सातत्य हेतु उपयुक्त आय की निरंतरता अनिवार्य है. इस सिद्धांत का सामान्यीकरण करते हुए वे मान लेते हैं कि उपयुक्त आय होने पर आनुपातिक सुख की उपलब्धता भी बनी रहेगी. इससे हर कोई अधिकाधिक सुख की चाहत में अधिकाधिक आय के स्रोत तलाशने में जुट जाता है. इस तरह वे चाहे-अनचाहे समाज को अंतहीन स्पर्धा की ओर ढकेल देते हैं, जिसमें हर कोई सुख की दौड़ में दिखाई पड़ता है. वे आय को भी उपभोग्य इकाई के रूप में देखने लगते हैं. परिणामस्वरूप सहयोग, सहिष्णुता, उदारता, करुणा, संवेदना जैसे जीवनमूल्य गायब होने लगते हैं.

उपयोगितावादी मानते हैं कि समाज या व्यक्ति के अधीन उपभोग्य वस्तुओं की औसत मात्रा बढ़ने से सुख की समानुपातिक वृद्धि भी संभव है. चूंकि समाज का ध्येय सदस्य इकाइयों के लिए सुख-सुविधाओं के न्यूनतम स्तर को बनाए रखने के साथ-साथ उनके स्तर में निरंतर सुधार करना है, अतएव उनके सुख में वृद्धि के लिए वह सुविधाओं की आनुपातिक वृद्धि में जुटा रहता है. सुख को आय अथवा सुविधाओं के पैकेज पर आश्रित करते समय वे मान लेते हैं कि समाज की सभी इकाइयों में चाही-अनचाही एकरूपता है. लोग रुचियों, विचार-शक्ति, अनुभव, संसाधन, योग्यता आदि के मामले में एकसमान हैं. जबकि सचाई इसके ठीक उलट होती है. सुख एक अनुभूति है. कुछ खास सुविधाएं इस अनुभूति को उत्पे्ररित कर सकती हैं, किंतु सदैव ऐसा ही हो, यह असंभव है. यदि ऐसा होता तो समाज में असमानताओं के लिए खास जगह ही नहीं होती. उस अवस्था में संभव है, न्याय की आवश्यकता ही नहीं होती. ‘थ्योरी आ॓फ जस्टिस्स’ में जॉन राउल्स इसका कुछ यूं खुलासा करते हैं—

‘समाज में कुछ लोग बहुत जल्दी इस निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं कि उपयोगितावाद न्याय की सवार्धिक नीतिसंगत और तार्किक संकल्पना है. उदाहरण के लिए प्रत्येक मनुष्य चाहता है कि उसके हितों को किसी प्रकार का कोई नुकसान न पहुंचे. यदि उस कुछ खोना भी पड़े तो उसकी भरपाई के लिए वह बदले में कुछ न कुछ तत्काल प्राप्त कर लेना चाहता है. व्यक्तिगत-लाभ की दिशा में प्रयत्नरत मनुष्य किसी क्षण यदि कुछ त्याग भी करता है तो महज इसलिए कि वह सोचता है कि आगे चलकर उसकी भरपाई बहुत आसानी से कर सकेगा. देखा जाए तो मानव-मात्र की स्वार्थ की यह वांछा कहीं से भी अनुचित नहीं है. प्रत्येक मनुष्य को यह अधिकार है कि वह अपने अधिकतम हितों को आगे रखकर कार्य करे. दूसरे के हितों को आघात पहुंचाए बगैर जितनी भी संभव और तर्कपूर्ण है, उतनी सुख-सुविधाएं अपने लिए अर्जित करे. समाज व्यक्तियों से मिलकर बना है. उसका ध्येय भी अपनी सदस्य इकाइयों के कल्याण के स्तर को बढ़ाना है. इसलिए यदि व्यक्ति को अपने अधिकतम सुख की दिशा में प्रयत्न करने का अधिकार है तो समाज को भी यह अधिकार स्वतः प्राप्त है. जैसे मनुष्य के कल्याण का स्तर उसे अलग-अलग अवसरों पर, मिलने वाली आत्मतुष्टि, अथवा भोगे गए सुख-संसाधनों की मात्रा से आंकी जा सकती है. इसी तरह समाज के कल्याण का स्तर उसकी सदस्य-इकाइयों की सुखाकांक्षाओं तथा सम्मिलित सुख-साधनों की आपूर्ति से आंका जाता है. चूंकि अकेले व्यक्ति का लक्ष्य अपने कल्याण के उच्चतम स्तर को प्राप्त करना है, ठीक इसी प्रकार समाज का संगठित लक्ष्य सदस्य इकाइयों की कुल इच्छाओं, आकांक्षाओं को प्राप्त करना है. मानवमात्र अपने वर्तमान और भविष्य की प्राप्तियों एवं हानियों के बीच जिस प्रकार संतुलन बनाए रखना चाहता है, ठीक इसी प्रकार समाज भी अपने वर्तमान और भविष्य के लाभ-हानि के बीच संतुलन कायम करने को प्रतिबद्ध होता है. अंतर केवल इतना है कि व्यक्ति अकेला होता है. और समाज व्यक्तियों का समुच्चय. इसलिए समाज की इच्छा में उसकी सदस्य इकाइयों की इच्छा की अभिव्यक्ति होती है. समाज की तरह उसकी इच्छा भी अनेक व्यक्तियों की इच्छाओं का समुच्चय अथवा पैकेज होती है. सुख की नैसर्गिक लालसा व्यक्तिमात्र को अपनी रुचि के अनुरूप सुख-प्राप्ति के लिए प्रेरित करती है. ठीक इसी प्रकार एक समाज तभी संगठित और विकासरत रह सकता है, जब वह अपनी अपनी सदस्य इकाइयों की इच्छा-आकांक्षाओं तथा आत्मतुष्टि के बीच तालमेल कायम कर सके.’2

राउल्स के अनुसार व्यक्तिमात्र के सुख और समाज के सुख में केवल ‘एक’ और ‘अनेक’ का अंतर है. हम जानते हैं कि ‘अनेक’ में ‘एक’ भी समाया होता है. इसलिए यदि समाज की कोई एक इकाई भी सुख से वंचित रहती है, तो उससे ‘अनेक’ की मर्यादा पर असर पड़ता है. उसका कुल विकास, भले ही सीमित अंशों में हो, प्रभावित होता है. आदर्श समाज के लिए यह चुनौती कम नहीं होती. ‘एक’ की उपेक्षा ‘अनेक’ के आत्ममुग्ध और गैरजिम्मेदार होने की ओर संकेत करती है. साफ है कि व्यक्ति-स्वातंत्रय पर अतिरिक्त जोर देते हुए उपयोगितावादी विचारक समाज के कुल लक्ष्य को बिसरा देते हैं. समाज की व्यापकता और बहुलता से सम्मोहित हो, उसे बड़ी इकाई और वरीयता प्राप्त इकाई मानने लगते हैं तथा व्यक्ति और समाज के हितों को परस्पर पूरक की भांति प्रस्तुत करने के बजाय, ‘छोटी इकाई’ और ‘बड़ी इकाई’ के भिन्न-भिन्न हित के रूप में देखने लगते हैं. फलस्वरूप व्यक्ति और समाज के हित एक-दूसरे के पूरक, अन्योन्याश्रित लगने के बजाय, परस्पर प्रतिस्पर्धी नजर आने लगते हैं. इसका उपयोग कर स्वार्थी समाजार्थिक शक्तियां समाज और व्यक्ति को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने में कामयाब हो जाती है. धर्म इसमें मददगार की भूमिका निभाता है. परिणामस्वरूप दोनों के बीच अनबूझी प्रतिद्विंद्वता जन्म ले लेती है. उपयोगितावादी दर्शन की इस कमजोरी को जॉन राउल्स ने पकड़ा था. उसके अनुसार उपयोगितावाद की सीमा है कि वह मनुष्य के सुख का सबसे बड़ा हित-चिंतक होने का दावा करते-करते उसे, केवल सुख पैदा करने तथा भोगने की मशीन समझने लगता है. उसके ‘सिस्टम’ में मनुष्य भी पुर्जा बनकर रह जाता है. इस कोशिश में वह मानवीय उच्चादर्शों तथा लोकसंवेदनाओं से अकसर दूर खिसक जाता है, जिनका समाज में न्याय की व्याप्ति हेतु सुरक्षित रहना अत्यावश्यक होता है. राउल्स का निरपेक्ष न्याय का सिद्धांत व्यावहारिक रूप से सभी के सुख को केंद्र में रखते हुए राज्य समेत ऐसी संस्थाओं के गठन पर जोर देता है, जिनके माध्यम से अधिकाधिक लोगों को अधिकाधिक सुख पहुंचाया जा सके. चूंकि स्वतंत्रता, सुख-प्राप्ति एवं सुखोपभोग की प्रमुख अवस्था है, अतएव अधिक से अधिक व्यक्तियों को, अधिक से अधिक सुख पहुंचाने की नीति के चलते उपयोगितावादी अनुशासन के मामले में ढील देते जाते हैं. इससे राज्य में संपन्न, शीर्षस्थ अभिजात तथा सुविधा-साधन से वंचित जनसामान्य के बीच अघोषित स्पर्धा आरंभ हो जाती है. इस बेमेल स्पर्धा में जनसाधारण सदैव घाटे में रहते हैं. परिणामस्वरूप समाज में सुख-सुविधाओं के समान विभाजन के बजाय, उनके छोटे-बड़े टापू बनने लगते हैं. वर्चस्ववादी ताकतों के नेतृत्व में पल रहा राज्य चूंकि स्वयं सुख-सुविधा, वैभव विलास और शक्ति का अविचारी केंद्र होता है, इसलिए निहित स्वार्थों के लिए वह विषमता के प्रतीक उन टापूओं को संरक्षण प्रदान करता है. देखा यह भी जाता है कि पूरे समाज को सुखी बनाने की अपनी सिद्धांतनिष्ठा के चलते, उपयोगितावादी विचारक कुछ व्यक्तियों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार करने लगते हैं. सुख की उनकी अवधारणा आमजन एवं शिखरस्थ अभिजन के लिए अलग-अलग होती है. मनुष्य समाज के लिए उपयोगी है तो इसका परोक्ष अभिप्राय यह भी है कि उसकी उत्पादकता और कार्यकुशलता का लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग को समान रूप से उपलब्ध होना चाहिए. दूसरे मानवमात्र की उत्पादकता और उत्साह बना रहे, इसके लिए समाज का अपनी प्रत्येक इकाई के साथ न्यायपूर्ण ढंग से पेश आना जरूरी है. उधर व्यक्तिमात्र को यह एहसास होना जरूरी है कि समाज और व्यक्ति का संबंध अन्योन्याश्रित है. समाज से कटे मनुष्य का आचरण पशुवत जान पड़ेगा तो मनुष्य के बगैर समाज मकड़ी के बहुत पुराने, धूल-अटे जाले की तरह बेजान दिखने लगेगा. इसलिए मनुष्यता का तकादा है कि प्रत्येक नागरिक अपने श्रम-कौशल एवं बुद्धि-सामर्थ्य का लाभ समाज के अधिकतम लोगों तक पहुंचाने के लिए कृतसंकल्प हो. दूसरी ओर समाज की जिम्मेदारी है कि वह व्यक्तिमात्र के सुखों और अधिकारों का ख्याल रखे तथा उन्हें अकेलेपन और उपेक्षा की अनुभूति न होने दे.

उपयोगितावादी विचारक उत्पादन और वितरण के सामान्य सिद्धांत को बिसराकर लोगों को अपने विकास के लिए प्रयत्नरत रहने की प्रेरणा देने से ज्यादा जोर इस बात पर देते हैं कि सरकार समाज में कल्याण के संवितरण पर ध्यान दे. इसके लिए वे सरकार से वस्तुनिष्ठ किस्म की तटस्थता की अपेक्षा करते हैं. परिणामस्वरूप उन लोगों के प्रति जो अतिरिक्तरूप से परिश्रमी तथा ईमानदार हैं, उत्पादकता के मामले में बाकी लोगों से बढ़कर हैं, किंतु जन्म, विरासत या किसी और कारण से विकास की धारा में पिछड़ चुके हैं—अन्याय होता है. उन्हें राज्य के विकास का पूरा लाभ मिल नहीं पाता. प्रायः उन्हें उन लोगों पर आश्रित रहना पड़ता है, जो उनके श्रम-कौशल का पूरा मूल्य चुकाए बगैर उनसे कार्य लेते हैं. नतीजा यह होता है कि पात्रता एवं विकास की जरूरतों के बावजूद वे विकास की मुख्यधारा में निरंतर पिछड़ते जाते हैं. राउल्स के अनुसार शासन को ऐसे लोगों पर विशेष ध्यान देना चाहिए जो जन्म के आधार पर ही सुविधा अथवा अवसरों से वंचित हैं. उदाहरण के लिए जो धनी परिवार में जन्म लेते हैं, उन्हें आगे बढ़ने के लिए संसाधनों की कमी नहीं झेलनी पड़ती. वे विकास की दौड़ में निर्धन परिवार में जन्मे व्यक्ति को आसानी से पछाड़ देते हैं. इसी तरह बचपन में बेहतर शैक्षिक वातावरण में पढ़े व्यक्ति उन लोगों को पीछे छोड़ देते हैं जिनके माता-पिता अनपढ़ हैं; या जिनमें शिक्षा के प्रति जागरूकता का अभाव है. शराब, जुए या ऐसी ही किसी लत से घिरे माता-पिता के बच्चों की भी यही दुर्दशा होती है. इस विसंगति को राउल्स उदाहरण के माध्यम से समझाने की कोशिश करता है. मान लीजिए उनमें से पहला अनुकूल परिस्थितियों में जन्म लेता है, जबकि दूसरे को जन्म से ही प्रतिकूल स्थितियों से जूझना पड़ा है. पहले को अच्छा भोजन, अच्छे वस्त्र और स्वास्थ्य के अनुकूल आवास मिलता है. परिवार की ओर से उसके लिए बेहतरीन शिक्षा की व्यवस्था भी कर दी जाती है. वह आजीविका की ओर से भी निश्चिंत होता है. अध्यापन पूरा होते ही उसके सक्षम माता-पिता उसकी सम्मानित आजीविका का प्रबंध कर देते हैं. दूसरी ओर वह गरीब है, जिसके माता-पिता अनपढ़ है. परिवार में शिक्षा का कोई माहौल नहीं है. न ही उसके माता-पिता अच्छी शिक्षा दे पाने की स्थिति में हैं. कष्टमय जीवन जीता हुआ वह आधी-अधूरी शिक्षा ही पूरी कर पाता है. आर्थिक समस्याओं के चलते पढ़ाई बीच में छोड़ जीविकोपार्जन के लिए जुटना पड़ता है. जाहिर है, कैरियर की स्पर्धा में पहले का आरंभ-बिंदू चूंकि दूसरे से बहुत आगे था, इसलिए वह शुरुआत से ही लाभ की स्थिति में होगा. वह न केवल बड़े सपने देखेगा, बल्कि उन्हें पाने की भरपूर कोशिश करेगा. समस्याओं से ग्रस्त दूसरा व्यक्ति स्पर्धा में उसके आगे टिक नहीं पाएगा. निष्कर्षतः दोनों के बीच का अंतर निरंतर बढ़ता जाएगा.

सत्ता और संसाधनों के आधार पर सामाजिक विभाजन की स्थिति को विल्फर्ड परेतो जॉन राउल्स से करीब एक शताब्दी पहले ही सिद्ध कर चुका था. अलग-अलग देशों के लगभग पांच सौ वर्ष के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए वह इस नतीजे पर पहुंचा था कि सभी युगों और लगभग सभी समाजों में 80 प्रतिशत आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक शक्ति केंद्रों पर 20 प्रतिशत अभिजनों का अधिकार रहा है. अभिजनेत्तर समुदाय अपनी स्थिति से उबरने के लिए निरंतर प्रयास करते रहते हैं, लेकिन जब तक वे विकास की एक सीढ़ी को पार करते हैं, उस अवधि में अभिजन समुदाय जो संख्या में उनसे कम तथा संसाधनों के मामले में कई गुना आगे है—उनसे बहुत ऊपर उठ चुका होता है. इस विश्लेषण के आधार पर ही परेतो इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि ‘जनतंत्र महज भ्रम है. शिखरस्थ सत्ताधारी अभिजन सदैव लाभ की स्थिति में रहता है. परेतो वस्तुस्थिति से कुछ ज्यादा ही निराश था. उसने तानाशाह मुसोलिनी के शासन का स्वागत इस उम्मीद के साथ किया था कि वह ‘वास्तविक उत्पादक शक्तियों’ यानी श्रमिक वर्ग की स्वतंत्रता को संभव कर सकेगा. परेतो का अनुमान गलत सिद्ध हुआ था. एक तानाशाह से लोककल्याण की वांछा रखना, यह सोचना कि वह समाज के अधिसंख्यक वर्ग की वास्तविक स्वतंत्रता और समानता को लौटा सकेगा, पूरी तरह गलत था. परेतो के बाद एक शताब्दी में बहुत कुछ बदला था. हाब्स, ग्रीन, जॉन स्टुअर्ट मिल, थाॅमस पेन, जेफरसन जैसे स्वतंत्रतावादी-मानवतावादी विचारकों ने लोकतंत्र की जड़ें मजबूत की थीं, जिससे कालांतर में मानवाधिकारवादी आंदोलनों को बल मिला. यह बात अलग है कि इस बीच पूंजीवाद ने भी तेजी से पंख पसारे तथा अपनी पूंजी एवं प्रलोभनकारी नीतियों के दम पर, तमाम किस्म के अवरोधों के बावजूद वह निरंतर फलता-फूलता रहा.

अपनी महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘ए थ्योरी आ॓फ जस्टिस’, जिसे न्याय-शास्त्र के क्षेत्र में रूसो के ग्रंथ ‘दि सोशल कांट्रेक्ट’ जैसी महत्ता प्राप्त है—में राउल्स दुर्भाग्यों की सीमारेखा को चिन्हित करता है. उसमें प्रथम छोर पर जन्म दुर्भाग्य हैं, जो जन्म से ही मनुष्य के साथ चिपक जाते हैं. जिनमें व्यक्ति का अपना कोई योगदान नहीं होता. उनसे मुक्ति दिलाना, राज्य का दायित्व है. दूसरे छोर पर ऐसे ‘दुर्भाग्य’ हो सकते हैं, जो व्यक्ति की अपनी लापरवाही अथवा कमजोरी के कारण जन्म लेते हैं. उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति अपने जीवन भर की कमाई को शराब या जुए की लत पर गंवा सकता है. ऐसे ‘दुर्भाग्य’ के प्रति राज्य की सीधी जिम्मेदारी नहीं होती. इसके बावजूद समाज का यह दायित्व होता है कि वह अपनी सदस्य इकाइयों को ऐसा वातावरण उपलब्ध कराए, जिसमें नकारात्मक वृत्तियों के उभार के लिए कम से कम अवसर हों. साथ में जरूरी है कि लोगों को सामाजिक बुराइयों के बारे में समयानुसार चेतावनी देता रहे. राउल्स के अनुसार जो पहली श्रेणी के ‘दुर्भाग्य’ हैं, वे समाज में व्याप्त असमानता से जन्मते हैं. एक तरह से वह समाज की मूल संरचना पर सवाल उठाते हैं. उदाहरण के लिए यदि किसी समाज में जाति अथवा रंग-भेद के नाम पर विभाजन है, तो उसका दुष्प्रभाव समाज में आर्थिक-सामाजिक विषमता और सामाजिक असंतोषों के रूप में देखने को मिलेगा. दूसरे श्रेणी के ‘दुर्भाग्य’ के लिए व्यक्ति और समाज दोनों जिम्मेदार होते हैं. व्यक्ति अपने चारित्रिक विचलनों और समय पर उचित निर्णय न ले पाने के कारण नुकसान उठाता है, तो समाज इस बहाने कि वे व्यक्ति-विशेष की कमजोरियों का नतीजा थे, अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता. इसलिए कि व्यक्ति की मनोरचना पर उसके परिवेश का भी प्रभाव पड़ता है. समाज में व्याप्त स्तरीकरण संवेदनशीन मनुष्य को उकसाता है. निरंतर उपेक्षा और उत्पीड़न से उसके मन में आक्रोश पनपने लगता है. उसी से दूसरी कमजोरियां और विकार जन्म लेते हैं. वही प्रकारांतर में व्यक्ति के ‘दुर्भाग्य’ का कारण बनते हैं. जन्माधारित अभावों और बुरे वातावरण का बालक के भावी जीवन पर असर न पड़े, यह सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है. सरकार का यह भी दायित्व है कि वह ऐसे व्यक्तियों से जो जन्म के आधार पर आगे हैं, जिनके पास संसाधनों का अतिरेक है, कुछ सुविधाएं समाज के पिछड़े वर्गों तथा सुविधा-वंचित लोगों तक पहुंचाए.

राउल्स की निगाह में सामाजिक असमानताएं भी स्वीकार्य हैं, बशर्ते उनका समायोजन इस प्रकार किया गया है कि समय आने पर वे सुविधा-साधन वंचित वर्गों के विकास में मददगार सिद्ध होंगी. आखिर वे कौन-सी वस्तुएं हैं जिनके आधार पर एक व्यक्ति विकास के मामले में दूसरे से आगे मान लिया जाता है. राउल्स ने समाजार्थिक वरीयता के कारकों को सूचीबद्ध करने की कोशिश की है तथा उन्हें ‘प्राथमिक सामाजिक वस्तुएं’ का नाम दिया है. इसमें वे वस्तु और अवसर सम्मिलित हैं, जिनके अभाव में कोई व्यक्ति स्वयं को पिछड़ा मानने को तैयार होता है. यह बात किसी को भी चैंका सकती है कि राउल्स प्राथमिक सामाजिक वस्तुओं की श्रेणी में ‘स्वाधीनता’ को सम्मिलित नहीं करता. जबकि लोकतंत्र में समानाधिकार और अवसरों की समानता का लक्ष्य पहले से ही निर्धारित होता है. संभवतः वह स्वाधीनता को लोकतंत्र में अंतनिर्हित मान लेता है. अपने न्याय सिद्धांत में वह जिस तरह व्यक्ति के अधिकारों को विस्तार देता है, उसमें इसपर कोई संदेह भी नहीं रह जाता कि राउल्स के लिए लोकतंत्र और स्वाधीनता अलग-अलग न होकर, न्याय की मूलभूत अपेक्षाएं हैं. उसका न्याय-संबंधी दर्शन इन्हीं अपेक्षाओं को संभव बनाने की बौद्धिक छटपटाहट का नतीजा है.

समाज में न्याय की स्थापना के लिए राउल्स सामाजिक संस्थाओं के वर्तमान ढांचे से कोई उम्मीद नहीं रखता. बजाय इसके उसे राजनीतिक संस्थाओं से काफी अपेक्षाएं हैं. सार्वत्रिक कल्याण और वंचितों को न्याय की मुख्यधारा में लाने के लिए वह समाज की सभी प्रमुख संस्थाओं के पुनर्मूल्यांकन का सुझाव देता है. इस प्रक्रिया में भी उसका पूरा आग्रह स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करने के साथ, प्रशासनिक प्रणाली को और अधिक चुस्त-दुरुस्त, उत्तरदायी एवं पारदर्शी बनाने पर रहता है, ताकि उन नागरिकों के प्रति जो जन्म, परिवार, समाज, धर्म, समाज या राजनीतिक कारणों से विकास की मुख्यदारा में पिछड़ चुके हैं, उन्हें आवश्यक प्रोत्साहन, समर्थन, सहायता आदि देकर मुख्यधारा का हिस्सा बनाया जा सके. राउल्स लोकतंत्र समर्थित आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं को मनुष्य की स्वातंत्रय चेतना की परिणति मानता है. उसका विश्वास है कि ‘परिपक्व स्वातंत्रयबोध के साथ न्याय’ की अवधारणा विशुद्ध राजनीतिक है. उसको इसी रूप में बेहतर समझा जा सकता है. न्याय को धार्मिक और नैतिक प्रत्यय मान लेना राउल्स को स्वीकार न था. पुनश्चः वह कहना चाहता है कि न्याय की अवधारणा की सटीक व्याख्या केवल राजनीतिक मूल्यों के संदर्भ सहित संभव है. दूसरे शब्दों में राउल्स के लिए न्याय राज्य की विषयवस्तु है. लोकतंत्र-सम्मत, उदार राजनीतिक प्रणाली के माध्यम से उसको सर्वसुलभ बनाया जा सकता है. 1971 में प्रकाशित पुस्तक ‘दि थ्योरी आ॓फ जस्टिस’ में वह सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार, समान स्वतंत्रता, समान एवं पर्याप्त अवसर सहित, राज्य के निष्पक्ष आचरण पर जोर देता है. उसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी स्वाधीनता, मूलभूत अधिकार, भरण-पोषण हेतु पर्याप्त संसाधनों पर दावेदारी तथा उपयुक्त योजनाओं में हिस्सेदारी का पूरा अधिकार है. राज्य का दायित्व है कि जन्म, वर्ण, धर्म, संप्रदाय, कद-काठी, लिंग आदि के कारण जन्म लेने वाली सभी प्रकार की असमानताओं, चाहे वे कृत्रिम हों या प्रकृतिजन्य, जो पक्षपातपूर्ण आचरण के लिए जिम्मेदार हैं या उसका कारण बन सकती हैं—का निराकरण कर सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करे.

राउल्स के लिए न्याय सांस्कृतिक और नैतिक से ज्यादा राजनीतिक लक्ष्य है. उसी रूप में वह उसका समाधान चाहता है. उल्लेखनीय है कि अतीत में न्याय को अधिदैविक, अधिभौतिक, नैतिक-व्युत्पत्ति कहकर राजनीतिक दर्शन से परे सिद्ध करने की कोशिश की जाती रही है. राउल्स का मानना था कि इस तरह की आध्यात्म-केंद्रित और नीतिवादी अवधारणाएं व्यक्ति एवं समाज दोनों को भटकाती हैं. इससे राज्य को अपने दायित्वों से बच निकलने, कर्तव्य से पलायन करने का अवसर मिल जाता है. इस सर्वमान्य तथ्य को भुलाकर कि राज्य जनता की सम्मिलित इच्छा की अनुकृति है—पुराने साम्राज्यवादी राज्य अपनी सत्ता को लोकेच्छा के बजाय ईश्वरीय इच्छा अथवा वरदान की परिणति मानते थे. राज्य के विस्तार और सुरक्षा के लिए वे हजारों-लाखों सैनिकों को जो सामान्य परिवारों से आते थे, और निस्संदेह बहुत साहसी और बहादुर भी होते थे, बिना उनका खास एहसान माने, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की बलि चढ़ा देते थे. धर्म उनके पाखंडों का महिमामंडन करता था. चूंकि जनसाधारण धर्म के सम्मोहन में फंसा था, इसलिए राजकोष का बड़ा हिस्सा दैवी शक्तियों को प्रसन्न रखने में, उनकी अभ्यर्थना के नाम पर खर्च हो जाता था. उनकी देखा-देखी समाज का सुविधा-वंचित वर्ग भी अपने त्राण के लिए दैवीय कृपा की अपेक्षा रखने लगा. राज्य को दैवीय सत्ता तथा राजन्यों के वैभव-विलास को ईश्वरीय अनुकंपा मामने का कुफल ही था कि जनसाधारण की अपनी दुर्दशा के वास्तविक कारणों पर नजर ही नहीं जाती थी. अपनी दुश्वारियों के लिए भाग्य और परिस्थितियों को दोष देकर वह आजीवन कुढ़ता रहता था. दूसरी ओर कथित अधि-दैविक शक्तियों की कृपा से कल्याण के प्रबंधन का दावा करने वाला एक वर्ग ऐसा भी था, जो भौतिक सुख-सुविधाओं, वैभव और ताकत का भरपूर उपयोग करता था. धार्मिक शक्तियों का एक वर्ग न्याय को धार्मिक नैतिकता से जोड़कर देखता है. यद्यपि करुणा और दया जैसे मानवीय प्रत्यय धार्मिक नैतिकता से जुड़े हैं. दान, जकात, खैरात जैसे शब्द धार्मिक नैतिकता के चलते ही अस्तित्व में आए हैं. इनसे उपकार और करुणा की भावनाएं झलकती हैं, जो मानवीय उदारता का प्रतीक हैं. किंतु दान, जकात या खैरात के बहाने धार्मिक शक्तियां बड़ी चालाकी से समाजार्थिक असमानता, राजनीतिक-व्यापारिक लूट तथा उसके पीछे छिपे विभेदकारी सोच पर पर्दा डाल देती हैं. इसलिए धर्मसम्मत नैतिकता, जिसमें समाज का बड़ा वर्ग अपने विवेक को दूसरों के यहां गिरवी रख देता है, और अपने पुरुषार्थ के बजाय दूसरों की दया पर जीने का सपना पाल बैठता है, न्याय का प्रतीक नहीं कहा जा सकता.

समाज यदि मनुष्य का वरण है तो उसमें अधिकारों के आधार पर ऊंच-नीच या किसी और कारण से असमानता की भावना, अनैतिक और अप्राकृतिक मानी जाएगी. समानता के इस लक्ष्य को कोरी नैतिकता के सहारे प्राप्त कर पाना संभव नहीं है. उसके लिए समाज में पर्याप्त अधिकार चेतना भी चाहिए. न्याय को नैतिक, दार्शनिक अथवा धार्मिक मूल्यों से जोड़कर, उसका दैवीकरण करने से न्याय के जनसाधारण की पहुंच से दूर जाने की संभावना रहेगी. शताब्दियों से यही होता आ रहा है. ढाई-तीन हजार वर्ष पहले जब धर्म का उदय हुआ तो यह माना गया था कि धार्मिक आचार-संहिताएं, मनुष्य को अनुशासन तथा नैतिकता का पाठ पढ़ाती रहेंगी. परंतु आस्था, जिसे अंध-आस्था कहना भी अनुचित न होगा, पर टिका होने के कारण धर्म मनुष्य के विवेक को परिपक्व होने का अवसर ही नहीं देता. अंध-आस्था और जड़ विश्वासों से भ्रमित मनुष्य अनुसरण की वृत्ति अपना लेता है. अपने कर्तव्य और अधिकारों को बिसराकर वह भाग्य के भरोसे जीने लगता है. जाहिर है उसके परिणाम प्रतिगामी होते हैं, जिनकी निरंतरता राज्य को गुलामी को ढकेल देती है. भारत में इसका कुफल देश को लंबी गुलामी तथा सामंती संस्कारों के लंबे इतिहास के रूप में झेलना पड़ा था. आशय है कि न्याय की गहन दार्शनिक व्याख्याएं उसे आम आदमी के लिए दुरूह और जटिल बना देती हैं. इससे न्याय के रास्ते में आ रही अड़चनों से मुक्ति उसके लिए काफी कठिन होती है. समस्याओं के समाधान के लिए उसे ऐसे लोगों की शरण में जाना पड़ता है, जिनके अपने स्वार्थ प्रबल होते हैं. ऐसे लोग मदद करने या उचित राह दिखाने के बजाय स्थितियों की व्याख्या अपने स्वार्थ के अनुरूप करते हैं. उसी के आधार पर कालांतर में शोषण के नए-नए तरीके इंजाद कर लिए जाते हैं.

सुख की वांछा जितनी व्यक्ति में होती है, उतनी ही समाज में भी होती है. अंतर केवल इतना है कि व्यक्ति केवल निजी सुख तक सीमित होता है, अपनी सीमाओं में वह उन्हीं के लिए प्रयास करता है. जबकि समाज की इच्छा में उसकी सदस्य इकाइयों की इच्छा की अभिव्यक्ति होती है. इस तरह राउल्स व्यक्ति और समाज को, परिमाण की दृष्टि से नजरंदाज करते हुए, न्याय की दृष्टि करीब-करीब बराबर मान लेता है. उसका मंतव्य यहां व्यक्ति और समाज के द्वंद्व अथवा उसकी मूलभूत समानताओं को दर्शाना नहीं है. बल्कि एक बारीक अंतर की ओर इशारा करना है. उसके अनुसार अपने वर्तमान के लाभ-हानि के लिए प्रयत्नरत अकेला व्यक्ति केवल एक इकाई होता है. अपने हानि-लाभ के लिए वह स्वयं उत्तरदायी होता है. यदि उसके किसी निर्णय से हानि होती है, तो उसे हानि का सामना स्वयं करना पड़ेगा. और यदि लाभ होता है, तो खुशी-खुशी वह स्वयं लाभ को घर ले जा सकेगा. सामान्य परिस्थिति में उसे किसी तीसरे व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं पहुंचता. लेकिन समाज के मामले में ऐसा नहीं है. समाज या सामाजिक समूहों में यह आवश्यक नहीं कि जो व्यक्ति किसी खास काम की शुरुआत करता है, उसकी सफलता या असफलता का लाभ या हानि उसी को हो. समाज व्यक्तियों का समुच्चय है. उसके प्रयास दीर्घायामी होते हैं. समाज के किसी निर्णय का लाभ या हानि तत्काल या कुछ समयांतराल से ऐसे लोगों को उठानी पड़ सकती है, जिनका उन निर्णय में कोई योगदान न हो.

यहां आकर उपयोगितावादी विचारधारा की सीमाएं स्पष्ट होने लगती है. जॉन राउल्स की खूबी थी कि उसने दर्शन और राजनीति विज्ञान दोनों को न्याय के पक्ष में खड़ा कर दिया था. उसके लिए न्याय का आशय कानून, अदालत और उस न्यायिक प्रक्रिया से एकदम भिन्न था, जिसे सामान्यतः समाज में न्याय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. न्याय से उसका अभिप्राय सुख और शुभता की सर्वोपलब्धता एवं सर्वव्याप्ति से था. न्याय को कल्याण के पर्याय के रूप में देखने वाला राउल्स हालांकि पहला विचारक नहीं था. स्वयं प्लेटो ने ‘दि लाॅज’ नामक विशाल ग्रंथ में न्याय के इसी कल्याणकारी स्वरूप की व्याख्या की थी. उसके बाद अरस्तु ने यह कहकर कि ‘राजनीतिक विज्ञान मानवीय ज्ञान-विज्ञान की सभी धाराओं में सर्वोत्तम है, वही समाज को शुभता के उस शिखर तक ले जा सकता है, जिसे हम न्याय कहते हैं’—समाज में न्याय की महत्ता की ओर संकेत किया था. अरस्तु के बाद इटली के विधिवेत्ता इनेरियस(लगभग 1050—1130) ने भी वितरणात्मक न्याय का पक्ष लिया. उससे लगभग पांच शताब्दी बाद जन्मे जोसेफ एडीसन, जिसे यूरोप में ‘न्यायशास्त्र का दीपस्तंभ’ कहा जाता है, ने यह कहकर कि ‘न्याय जैसा कोई सद्गुण नहीं है’, समाज में पुनः एकजुट होने का आवाह्न किया था. तदनंतर डेनियल बेवस्टर, इमानुएल कांट, हाब्स, जोसेफ हीगेल, जॉन लाक, जॉन स्टुअर्ट मिल, था॓मस जेफरसन जैसे विचारकों की लंबी संख्या है. जिन्होंने समाज में वितरणात्मक न्याय को सम्मान सहित स्थापित करने की कोशिश की थी. डेनियल बेवस्टर का मानना था कि, ‘न्याय धरती पर मानवमात्र का सबसे बड़ा लक्ष्य है. यह अस्थि-मज्जा का वह ढांचा है जो सभ्य मनुष्य तथा सभ्य समाज को परस्पर निकट लाता है. जहां-जहां जब तक उसके मंदिर और उनका सम्मान रहेगा, वहां-वहां सामाजिक सुरक्षा एवं शांति, सुखामोद तथा आनेवाली पीढ़ियों के विकास की गारंटी रहेगी.’3

© ओमप्रकाश कश्यप

1. There is no virtue so truly great and godlike as justice…. Omniscience and omnipotence are requisites for the full exercise of it.”-Addison,
2. ….there is…a way of thinking of society which makes it very easy to suppose that the most rational conception of justice is utilitarian. For consider: each man in realizing his own interests is certainly free to balance his own losses against his own gains. We may impose a sacrifice on ourselves now for the sake of a greater advantage later. A person quite properly acts, at least when others are not affected, to achieve his own greatest good, to advance his rational ends as far as possible. Now why should not a society act on precisely the same principle applied to the group and therefore regard that [decision- making procedure] which is rational for one man as right for an association of men? Just as the well- being of a person is constructed from the series of satisfactions that are experienced at different moments in the course of his life, so in very much the same way the well-being of society is to be constructed from the fulfillment of the systems of desires of the many individuals who belong to it. Since the principle for an individual is to advance as far as possible his own welfare, his own system of desires, the principle for society is to advance as far as possible the welfare of the group, to realize to the greatest extent the comprehensive system of desire arrived at from the desires of its members. Just as an individual balances present and future gains against present and future losses, so a society may balance satisfactions and dissatisfaction between different individuals. And so by these reflections one reaches the principle of utility in a natural way: a society is properly arranged when its institutions maximize the net balance of satisfaction.- John Rawls in A Theory of Justice (Cambridge, MA: Harvard University Press, 1971), pp. 23-4.
3. “Justice is the great interest of man on earth. It is the ligament which holds civilized beings and civilized nations together. Wherever her temple stands and so long as it is duly honored, there is a foundation for social security, general happiness, and the improvement and progress of our race.” Daniel Webster

वितरणात्मक न्याय का उपयोगितावादी द्रष्टिकोण

सामान्य

धर्म एवं अभिजन संस्कृति—13

मुक्त बाजार में स्वतंत्र अभिव्यक्ति भी न्याय, मानवाधिकार, पेयजल तथा स्वच्छ हवा की तरह ही उपभोक्ता-सामग्री बन चुकी है. यह उन्हें ही हासिल हो पाती हैं, जो उन्हें खरीद पाते हैं. वे मुक्त अभिव्यक्ति का प्रयोग भी उस तरह का उत्पादन बनाने में करते हैं जो सर्वथा उनके अनुकूल होता है.— अरुंधती राय

जब हम कहते हैं कि ‘श्रेष्ठतम जनता ही श्रेष्ठतम शासन दे सकती है’—तब इसका अर्थ है कि सुशासन के लिए जनता को शासकों पर नहीं, स्वयं पर भरोसा करना होगा. खुद को इस योग्य बनाना होगा कि बगैर किसी बाहरी मदद के अपना नेतृत्व स्वयं कर सके. देश और समाज से जुड़े मसलों में फैसला करते समय उसे दूसरों से न्यूनतम मदद की अपेक्षा हो. जनता स्वयं शासन को सन्नद्ध होगी तो उसके लिए गठित भारी-भरकम तथा खर्चीले संस्थानों की अनिवार्यता ही नहीं रहेगी. किंतु यह काम क्या इतना ही सरल है! विशेषकर तब जब हम जानते हैं कि शासकवर्ग की उत्पत्ति अनायास नहीं हुई है. आठ-दस हजार वर्षों से, जब से मनुष्य ने सभ्यता की सीढ़ियां चढ़ना सीखा, किसी न किसी रूप में समाज में नेतृत्व की मौजूदगी हमेशा से रही है. जिन दिनों मनुष्य शिकार पर जीवनयापन करता था, खुले जंगलों में रहता था, तब वन्य पशुओं का शिकार अथवा उनके हमलों से समूह की रक्षा करने के लिए कुशल नेतृत्व की आवश्यकता पड़ती थी. उस स्पर्धा में जो स्वयं को कुशल सिद्ध करता, खुद जान पर खेलकर समूह की प्राण-रक्षा करता, वह सम्मान का पात्र बनता था. संभवतः तभी से यह धारणा बनी कि ‘कोई हमसे श्रेष्ठ है….और जो श्रेष्ठ है, वह चुनौती का सामना भी बेहतर कर सकता है.’ उसके अनुसार बाकी लोग उसका अनुसरण करने लगे. यह जीवनानुभवों से उपजा सहज बोध था. कालातंर में इसी ने समाजीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद की.

उन दिनों संबंध सरल थे. कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि सामूहिक कल्याण हेतु निःस्वार्थ भाव से नेतृत्व की डगर अपनाने वाले लोग दूसरों को छोटा मानकर उनकी उपेक्षा करने लगेंगे तथा चाहे-अनचाहे नेतृत्व में पीछे रह जाना समाज के बड़े वर्ग का स्वभाव, उनकी आगे आने वाली पीढ़ियों के गले की फांस बन जाएगा. नैसर्गिक कारणों से कुछ मामलों में दूसरों पर आश्रित हो जाने की प्रवृत्ति कालांतर में समाज को शासक एवं शासित में बांट देगी. ऊंच-नीच में बंटे समाज में, अधिसंख्यक निम्नवर्ग की निष्क्रियता तथा अल्पसंख्यक उच्चवर्ग की सक्रियता से होनेवाले विकास की ये स्वाभाविक विसंगतियां हैं. उनमें ताकतवर समूह कमजोर को पीछे ढकेल देता है. परिणामस्वरूप समाज में असमानता पनपती है. निर्णय प्रक्रिया में हिस्सेदारी घटने से अधिकांश लोग दूसरों पर निर्भर होने लगते हैं. उनका खंडित आत्मविश्वास उनके आत्मनिर्भर बनने में बाधा उत्पन्न करता है. उधर शीर्ष पर मौजूद लोग चाहते हैं कि यथास्थिति बनी रहे. उनकी सत्ता पर कोई आंच न आए. उसके लिए वे किस्म-किस्म के षड्यंत्र रचते रहते हैं. चूंकि वे सत्ता के शिखर पर विराजमान होते हैं, अधिकांश संसाधनों पर उनका अधिकार होता है. इसलिए वे जनसाधारण पर, जो अपनी जरूरतों के आधार पर छोटे-छोटे वर्गों में बंटे होते हैं, अपनी स्वार्थपूर्ण हठों को थोपने में कामयाब हो जाते हैं. इससे विपन्नता का शिकार समाज का बड़ा हिस्सा उनपर आश्रित हो जाता है. इन हालात में किसी भी प्रकार का सार्थक हस्तक्षेप उसके सामर्थ्य से परे होता है. परिणामस्वरूप समाज में शीर्षस्थ वर्गों की मनमानी लंबे समय तक चलती रहती है.

इन परिस्थितियों में जनता की वास्तविक मुक्ति का एक ही उपाय है. बौद्धिक नेतृत्व के लिए बाहरी वर्गों पर निर्भरता को समाप्त करना. धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों से अपने बूते निपटना. यह तभी संभव है जब जनता यह जान ले कि कुछ व्यक्तियों के हाथों में नेतृत्व खिसक जाने का अभिप्राय है, अधिकांश का निर्णय-प्रक्रिया से बाहर हो जाना. इससे सामाजिक प्रतिभा का बड़ा हिस्सा उसके विकास में अपना योगदान देने से वंचित रह जाता है. इसका आरंभ भले ही सर्वसम्मिति के आधार पर होता हो, मगर वंचित समूह धीरे-धीरे अभ्यास से कटने लगता है. उस समय बिना यह सोचे-जाने कि योग्यता जन्मजात नहीं होती, वह केवल अर्जित की जा सकती है, विशाल जनसमूह यह मान लेता है कि वह ‘राज करने के लिए नहीं बना है.’ आमजन की यह धारणा नेतृत्वकारी अभिजनों के लिए यथास्थिति बनाए रखने में मदद करती है. स्थिति-परिवर्तन के लिए व्यक्ति की आंतरिक प्रेरणाएं दिशा-निर्देशक सिद्ध होती हैं. लेकिन हालात से अनुकूलन के पश्चात जनसाधारण बदलाव के सपने देखना ही छोड़ देता है. सामान्यतः वह मान लेता है कि ‘राज करने की योग्यता रखने वाले दूसरे वर्ग के लोग हैं ….उसका दायित्व केवल उन लोगों की आज्ञा का पालन करना है.’ शीर्षस्थ अभिजन चाहते हैं, जनसाधारण के ये पूर्वाग्रह बने रहें. उसके लिए वे तरह-तरह के आयोजन रचते हैं. उस समय धर्म और संस्कृति उनके सर्वाधिक भरोसेमंद तथा कारगर हथियार सिद्ध होते हैं. आमूल परिवर्तन के लिए आवश्यक होता है कि विकासोन्मुखी आंतरिक प्रेरणाओं को समाज की कार्यकारी ऊर्जा से जोड़ा जाए, किंतु शीर्षस्थ शक्तियां जिस तरीके से भी संभव हो, यथास्थिति बनाए रखने के लिए प्रयत्नरत रहती हैं. परंपरावादी दबावों के बीच अपने सत्तामोह का औचित्य सिद्ध करने के लिए उनके तर्क बहुत पुराने तथा घिसे-पिटे होते हैं. वे बताते हैं कि नकारात्मक शक्तियों के दमन तथा सकारात्मक को प्रोत्साहित करते हुए, समाज को विकास-पथ पर अग्रसर रखने हेतु शक्तिशाली तंत्र की आवश्यकता पड़ती है. सत्ता की उनकी परिकल्पना कुछ लोगों को अधिकतम अधिकार देकर विभेदकारी व्यवस्थाओं को बनाए रखने की होती है. कभी-कभार लोकतंत्र का नाम लेकर वे अधिकारों की बराबरी की बात अवश्य करते हैं. मगर सामान्यतः उनका आचरण वर्गीय सोच तथा पक्षपात से भरपूर होता है. अपने शीर्षत्व को बचाए रखने के लिए वे सत्ता और संसाधनों का सहारा लेते हैं. इस तरह किसी न किसी बहाने दमन और बलप्रयोग को बढ़ावा देते हैं. उनके नेतृत्व में राज्य आमजन की सामान्य अपेक्षाओं से निरंतर दूर जाता रहता है, परिणामस्वरूप सामाजिक असमानता लगातार बढ़ती जाती है.

यह ठीक है कि समाज में सभी प्रकार के मनुष्य होते हैं. उनमें पुष्ट भी होते हैं और निर्बल भी. सज्जन भी होते हैं, दुर्जन भी. किंतु यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि वे अपनी समस्त अच्छाई-बुराई समाज में रहकर ही ग्रहण करते हैं. जन्म के समय बालक कोरे मस्तिष्क के साथ संसार में आता है. परिवार और समूह के बीच रहते हुए वह सबकुछ जानता-समझता है. उसके और समाज के विकास की धारा एक हो, व्यक्ति एवं समाज के हितों में कोई टकराव न आने पाए, वह सामाजिकता की नींव कहे जानेवाले नैतिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों को भली-भांति ग्रहण कर सके—इसके लिए उसकी उपयुक्त शिक्षा और अनुकूल परिवेश की आवश्यकता पड़ती है. यानी कोरी स्लेट पर इबारत लिखना, मासूम बालक को सभ्यता, संस्कृति तथा जीवनमूल्यों से परचाकर जिम्मेदार नागरिक बनाना, उसे इस योग्य बनाना कि बड़ा होने पर वह अपना दायित्व स्वयं वहन करते हुए अपने और समाज के विकास में यथासंभव योगदान दे सके—यह उसके परिवार और समाज का दायित्व होता है. यह भी सच है कि समाज में अधिकतम व्यक्ति शांतिप्रिय तथा अपने काम से काम रखने वाले होते हैं. वे परंपरा और कानून के दायरे से बाहर निकलने से बचते हैं. उसके लिए अपने मान-सम्मान और हितों से छोटे-मोटे समझौते करने पड़ें तो भी पीछे नहीं रहते. फलस्वरूप समाज में सामान्य शांति बनी रहती है. इससे कहा जा सकता है कि समाजीकरण के अधिकांश मामलों में परिवार और समाज सफल होते हैं. बहुत थोड़े मामलों में परिवार या समाज को लगता है कि व्यक्ति-विशेष का आरचण उसके हितों के प्रतिकूल है. परिवार तो जहां तक संभव हो, सुधार और समझौते की संभावना के साथ काम करता है. किंतु समाज, जो दरअसल बड़ा परिवार है तथा किसी भी मामले में उसके दायित्व और अधिकार परिवार से कम नहीं हैं—यह भूलकर कि अपने सदस्यों के व्यक्तित्व निर्माण में उसका भी पर्याप्त योगदान रहा है, एकाएक उसकी ओर से मुंह फेर लेता है. न्याय करते समय वह आत्मावलोकन की भावना से प्रायः दूर ही रहता है. अपराधी पर विचार करते समय कानून भी इस तथ्य पर ध्यान नहीं देता कि उसके व्यक्तित्व निर्माण में समाज का भी योगदान रहा है. दंड देते समय मनुष्य को एकदम अकेला छोड़ दिया जाता है. कानून के नाम पर राज्य का निस्पृह आचरण, प्रकारांतर में व्यक्ति और समाज के संबंधों में दरार डालने का काम करता है. उसपर समयानुसार ध्यान न देने से व्यक्ति और समाज के अंतद्र्वंद्व बढ़ते ही जाते हैं.

कह सकते हैं कि समाज की व्यवस्थाएं सभी के लिए होती हैं. उन्हीं के बीच से अच्छे व्यक्ति जन्म लेते हैं, उन्हीं से वे जिन्हें समाज दायित्वहीन और अपराधी मानकर तिरष्कृत करता है. चूंकि आनुपातिक रूप में कानून और समाज की मर्यादाओं का पालन करने वाले लोग ही अधिक होते हैं, अतएव समाजीकरण की प्रक्रिया को दोषपूर्ण ठहराना या कुछ लोगों के विचलन के लिए पूरे समाज को कठघरे में खड़ा कर देना अनुचित है—इस तर्क का स्वागत किया जा सकता है. इसलिए भी कि व्यक्ति एक स्वतंत्र जैविक इकाई है. वह अपने अनुभवों और शिक्षा को ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं करता, बल्कि अपनी रुचि एवं आवश्यकता के अनुसार उनमें आवश्यक संशोधन करता है. इसी से ज्ञान की विभिन्न धाराएं जन्म लेती हैं. और इसी से संस्कृति की बहुरंगी छटाएं फूटती हैं. इसके बावजूद व्यक्ति की रुचियों और विचारों में नकारात्मक तत्वों का प्रवेश उस समय तक असंभव है, जब तक समाज में सीधे अथवा प्रच्छन्न रूप से उनकी उपस्थिति न हो. समाज में नकारात्मक तत्वों की यदि किसी भी रूप में उपस्थिति है, तब यह मान लेना चाहिए समाजीकरण की प्रक्रिया कहीं न कहीं दोषपूर्ण रही है. व्यक्ति और समाज के संबंधों के नकारात्मक संस्कार अंततः उनके हितों के टकराव का कारण बनते हैं. ये सब समाज के जाने-पहचाने सत्य हैं.

मानवमन में पनपने वाले असंतोष के मूल में सामाजिक असमानता होती हैं. वह मानने लगता है कि समाज अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में नाकाम रहा है. ध्यातव्य है कि समाज का कार्य अपने सदस्यों के लिए न केवल न्याय सुनिश्चित करना है, बल्कि यह ध्यान भी रखना है कि किसी के साथ, किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो. इसके लिए आवश्यक है कि शिखर पर बैठे लोग राज्य के अधिकार तथा कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाए रखें. किंतु यह एकतरफा कार्रवाही नहीं है. न ही मात्र प्रशासनिक कार्रवाही द्वारा राज्य के अधिकारों एवं कर्तव्यों के बीच तालमेल संभव है. राज्य जनता का कार्य है. केवल जनता ही उसे नियंत्रित कर सकती है. इसके लिए समाज की चेतना का ऊर्ध्वमुखी रहना अत्यावश्यक है. वह तभी संभव है जब समाज के आदर्श उसकी सदस्य इकाइयों के स्वभाव में रच-बस चुके हों. लोग अपने विचारों को जीने के अभ्यस्त हों. उनका जनसंस्कृति में अटूट भरोसा हो, ताकि वे अपने समाजार्थिक विकास के साथ-साथ, संस्कृतियों के छोटे-छोटे टापुओं को उभारने के बजाय—विराट, बहुआयामी और समावेशी जनसंस्कृति के उत्थान हेतु समर्पित भाव से काम कर सकें.

यह भी ध्यान रखना होगा कि सांस्कृतिक बदलाव, तदनंतर अनुकूल संस्कृतियों का सृजन, समाज के सभी वर्गों की सम्मिलित इच्छाशक्ति के बगैर असंभव है. न्याय के संबंध में कानून और अदालतें यदि राज्य का अधिकार पक्ष दर्शाती हैं, तो समाज के अंतःसंघर्षों को न्यूनतम रखने के लिए न्याय का संवितरण उसके कर्तव्य पक्ष की ओर संकेत करता है. अधिकारपक्ष एवं कर्तव्यपक्ष के बीच संतुलन कायम करने के लिए समाज को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे राज्य अपनी सदस्य इकाइयों की मनोवांछाओं को समझकर उनका समयानुसार समाधान कर सके. साथ ही व्यक्ति का भी दायित्व है कि वह समाज में रहते हुए उसके लिए कोई चुनौती पेश न करे. स्वयं को समाज के लिए अधिकतम उपयोगी सिद्ध करे. समाज को अतिरिक्त बोझ से बचाने के लिए अपनी आवश्यकताओं को लोगों की सामान्य रुचियों के यथासंभव निकट रखे. जहां संसाधनों का टोटा हो, कमी को पाटने के लिए उनकी राशनिंग पर जोर दिया जाता हो, वहां बृहद लोकहित में उनका लाभ समाज के अधिकतम लोगों तक पहुंचाने की अनकूल व्यवस्था हो, ताकि अधिसंख्यक लोग विकास में भागीदारी कर सकें. लोगों को लगे कि राज्य उनकी इच्छाओं का सम्मान करता है और उन्हें अपने विकास के लिए वांछित अवसर बगैर किसी अवरोध और पक्षपात के प्राप्त हैं. न्याय के संवितरण हेतु शासन, प्रशासन की भूमिका को हम दो वर्गों में बांट सकते हैं—

1. समावेशी विकास के लिए उपयुक्त वातावरण बनाना. समाज में शांति और सुरक्षा की भावना पैदा करना.
2. उत्पादकता के कुल लाभों को समाज के सभी सदस्यों तक पहुंचाने की अनुकूल व्यवस्था करना अर्थात वितरणात्मक न्याय.

उपर्युक्त में से पहला कानून व्यवस्था यानी सरकार के अधिकार पक्ष से संबंधित है. अरस्तु ने इसे प्रतिकारात्मक न्याय कहा है. उसके अनुसार सामाजिक आचारसंहिता की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक अपराधी को उसके अपराध के अनुसार दंडित किया जाए तथा पीड़ित की उसी अनुपात में क्षतिपूर्ति हो, ताकि समाज में शांति और व्यवस्था बनी रहे. इस तरह प्रतिकारात्मक न्याय का लक्ष्य है—कानून का निर्माण तथा निष्पक्ष परिपालन. वितरणात्मक न्याय का संबंध राज्य के कर्तव्य पक्ष से है. अपने नागरिकों के बीच ‘कल्याण’ का समविभाजन आदर्श राज्य का सपना होता है. कल्याण राज्य की विशेषता बताते हुए प्लेटो ने कहा था कि वही राज्य न्यायपूर्ण है, जिसमें सब अपना-अपना कार्य करें. शासक शासन करें, श्रमिक मजदूरी, और व्यापारी व्यापार को संभालें. वितरणात्मक न्याय की इस परिभाषा में असंतुलन का दोष है, क्योंकि कार्य के चयन की स्वतंत्रता को लेकर इसमें कोई उल्लेख नहीं है. दरअसल प्लेटो और सुकरात दोनों शासक वर्ग से थे. प्लेटो तो एथेंस की सत्ता के मुख्य दावेदारों में से एक था. दोनों दास प्रथा को यूनान की प्रगति के लिए आवश्यक मानते थे. इस कारण दासों के अधिकार एवं उनकी न्यायिक समानता की ओर उनका ध्यान ही नहीं था. जबकि अरस्तु न्याय को राजनीतिक दर्शन की मुख्य विषय-वस्तु मानता था. न्याय की अपरिहार्यता और सभी के लिए समान उपलब्धता पर जोर देते हुए उसने कहा था कि राज्य का प्रमुख दायित्व अपने नागरिकों के बीच न्याय को सर्वसुलभ बना देना है. ज्ञान-विज्ञान की समस्त धाराओं, विद्याओं का अंतिम लक्ष्य अपने साथ-साथ दूसरों को भी सुख पहुंचाना तथा लोककल्याण का मार्ग प्रशस्त करना है. वह मानता था कि राजनीति स्वयं में सर्वश्रेष्ठ विद्या है. उसका एकमात्र लक्ष्य मनुष्यमात्र के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना है. अपने इसी विश्वास को सूत्रबद्ध करते हुए उसने ‘पालिटिक्स’ में लिखा है—‘राजनीति का सच्चा सद्गुण है—न्याय! तथा न्याय का अभिप्राय है, सर्वसाधारण का सामान्य हित.’ कहा जा सकता है कि अरस्तु का संपूर्ण वाङमय इसी सूत्र का बहुआयामी विस्तार है.

‘सर्वसाधारण का सामान्य हित’ व्यापक निहितार्थ वाला पद है, किंतु अरस्तु के लिए इससे कोई उलझन न थी. उसके न्यायसिद्धांत का मूल सिद्धांत था—‘जो योग्यतम है, वही सर्वोत्तम का अधिकारी है’. इस मामले में अपने पूर्ववत्र्ती विचारकों से भिन्न था. अरस्तु के लिए योग्यतम का अभिप्राय विपुल धन-संपदा का स्वामी अथवा श्रेष्ठ कुलोद्भव होने तक सीमित नहीं था. अपने लेखन में उसने धन-संपदा को महत्त्व दिया था. दास-प्रथा के समर्थन से ही स्पष्ट हो जाता है कि उसकी निगाह में धन-संपदा तथा सामाजिक पदानुक्रम का विशिष्ट महत्त्व था. उन्हें वह समाज में मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा आदि अर्जित करने का माध्यम मानता था. इसके बावजूद उसने इन्हें दूसरे स्थान पर रखा है. इनकी अपेक्षा मानवीय सद्गुण एवं नैतिक आचरण उसके लिए कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण थे. उसका संपूर्ण लेखन सार्वजनिक जीवन में नैतिकता की प्रतिष्ठा को समर्पित है. ‘पालिटिक्स’ में उसने उदाहरण के साथ समझाने की कोशिश की है कि अच्छी बांसुरियां केवल अच्छे बांसुरीवादक को दी जानी चाहिए. वह लिखता है—‘यदि बहुत से बांसुरीवादक इस कला में समान रूप में निपुण हों तो उनमें केवल उच्चकुल में जन्म लेने के कारण किसी को भी अच्छी या अधिक बांसुरियां नहीं मिलनी चाहिए. क्योंकि अच्छे बांसुरीवादन के लिए उच्च कुल में जन्म लेना अनिवार्य नहीं है. घटिया बांसुरीवादक अच्छी बांसुरी का सदुपयोग कर ही नहीं पाएगा. अतएव सर्वोत्तम वाद्य को सर्वोत्तम कलाविद् के लिए सुरक्षित रखना ही न्यायसंगत है.’ किसी को कोई संदेह न रहे, इसलिए इसे और स्पष्ट करते हुए वह लिखता है—‘यदि कोई व्यक्ति ऐसा हो जो बांसुरी बजानेवालों की कला में दूसरों से अधिक निपुण हो, किंतु कुल और सुंदरता में दूसरों की अपेक्षा कमतर हो तो बावजूद इसके कि उच्चकुल एवं सुंदरता जैसे गुण समाज में सम्मान का कारण माने जाते हैं, बांसुरीवादकों के बीच इन गुणों की तुलना करने पर श्रेष्ठतम(और अधिकतम) बासुरियां बांसुरीवादन कला में सर्वाधिक निपुण वादक को ही दी जानी चाहिए.’

अरस्तु के अनुसार न्याय इसलिए न्याय है क्योंकि वह व्यक्तियों के बीच पक्षपात नहीं करता. दूसरे शब्दों में राज्य तभी न्याय-पथ पर रह सकता है, जब वह पक्षपातरहित होकर अपने सभी नागरिकों के साथ समानतापूर्ण व्यवहार करता है. यही वितरणात्मक न्याय की कसौटी है. उसका अंतिम और एकमात्र लक्ष्य है—संपूर्ण समानतावाद. संपूर्ण समानतावाद में ‘कल्याण’ के वितरण में समानता के सिद्धांत का कड़ाई से पालन किया जाता है. यह मानते हुए कि कुल संपदा राज्य की है, और नागरिकों में सभी बराबर हैं, वह संसाधनों के एकसमान बंटवारे पर जोर देता है. लेकिन संपूर्ण समानतावादी द्रष्टिकोण में विचारकों को अनेक खोट नजर आते हैं. उनके अनुसार जरूरी नहीं कि समानतावाद में जिसे व्यक्ति की जरूरत या सुख मानकर बांटा गया हो, उससे सभी को एक समान संतुष्टि प्राप्त होती हो. मान लीजिए बीस व्यक्तियों में सौ अमरूद समानतावादी द्रष्टिकोण के आधार पर बांटे जाते हैं. तब उनमें से प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से में पांच अमरूद आते हैं. ठेठ समानतावादी द्रष्टिकोण के अनुसार इससे सभी को सुख की बराबर अनुभूति होनी चाहिए. किंतु ऐसा नहीं है. यह संभव है कि किसी व्यक्ति को अमरूद बिलकुल पसंद न हो, अथवा दूसरे व्यक्ति का काम केवल दो अमरूदों से चल जाए. तीसरा व्यक्ति ऐसा भी हो सकता है जिसे केले अधिक पसंद हों और पांच अमरूद उसे उतनी संतुष्टि न दे पाएं, जितनी वह केवल दो केलों से पा सकता है. मनुष्य अपने व्यक्तित्व और रुचियों के मामले में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं. उन्नत समाजीकरण का ध्येय चरित्रों की भिन्नता को बचाए रखने में है, उसको मिटा देने में नहीं. दूसरे शब्दों में समाज में ज्ञान की विभिन्न धाराओं के पोषण-प्रेषण के लिए रुचि-वैभिन्न्य की रक्षा भी जरूरी है. उसको मिटाने की कोशिश व्यक्ति की नैसर्गिक स्वतंत्रता को कठघरे में लाना होगा. इस समस्या के समाधान के लिए विशिष्ट सुविधाओं के बजाय सुविधाओं के पैकेज की भी सलाह दी जाती है. इसके अलावा कुछ और भी सुझाव हैं, जिनके आधार वितरणात्मक न्याय को हम निम्नलिखित उपधाराओं में बांट सकते हैं—

1. उपयोगितावाद (Utilitarianism)
2. निष्पक्षतावाद या न्यायवाद (Justice as Fairness)
3. स्वाधीनतावाद (Libertarianism)
4. असादृश्य समानतावाद (Difference Principle)

उपर्युक्त के बारे में स्वतंत्ररूप से विचार करने से पूर्व हम जान लें कि न्याय का वितरणात्मक सिद्धांत अपने आप में बहुलार्थी एवं विविध आयामी विस्तार लिए होता है. उसे किसी एक परिभाषा अथवा कसौटी से जोड़ना संभव नहीं है. वितरणात्मक न्याय की की परिकल्पना समाज में ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख’ के उपयोगितावादी लक्ष्य को मूत्र्तरूप देने हेतु, सुख-संसाधनों के पक्षपातरहित बंटवारे के लक्ष्य को ध्यान में रखकर की जाती है. तदनुसार उसमें सदस्य इकाइयों की सकल आय, धन, विकास के अवसर, रोजगार, आर्थिक संसाधन, सुख-सुविधा आदि की उपलब्धता के अनुसार परिवर्तन होता रहता है. न्यायपूर्ण, समरस समाज की स्थापना हेतु वितरणात्मक न्याय के योगदान को लेकर अधिकांश विचारक एकमत हैं, हालांकि उसके कार्यान्वन को लेकर उनके किंचित मतभेद हैं. उनकी व्याख्या के आधार पर हम इसकी विशेषताओं का आकलन कर सकते हैं. वितरणात्मक न्याय को विद्वानों ने अपने-अपने तरीके से परिभाषित करने की कोशिश की है. किसी ने मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं की उपलब्धता को इसकी कसौटी माना है, तो किसी ने व्यक्तिमात्र के सुख एवं स्वातंत्रय को इसका लक्ष्य स्वीकार किया है. कुछ विद्वानों का द्रष्टिकोण सुखवाद से प्रेरित रहा है. इनके मिले-जुले अपररूप भी हैं. अर्थशास्त्र का सामान्य नियम, ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है’—आवश्यकता को पहले पायदान पर रखता है. आविष्कार का नंबर उसके बाद में आता है. किंतु आवश्यकताओं का आविष्कारों की अपेक्षा तीव्र विस्तार मनुष्य को संसाधनों के मोर्चे पर भारी पड़ता है. ऐसा क्यों होता है? समाज अपनी उन आवश्यकताओं की ओर कैसे अग्रसर होता है, जिनका अभी तक न तो आविष्कार हुआ है, न ही उसके जीवन और समस्याओं से दूर का संबंध है. जैसे मोबाइल, संचार और मनोरंजन के क्षेत्र में हो रहे निरंतर नए शोध, जो मनुष्य की किसी मूलभूत आवश्यकता का हिस्सा नहीं हैं, मगर समाज का बड़ा वर्ग उनकी ओर ललचाई दृष्टि से देखता है. भले ही वह नई प्रौद्योगिकी के प्रयोग से अनजान हो, फिर भी आधुनिकतम प्रौद्योगिकी-युक्त उपकरण को खरीदकर वह स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है. ऐसी घटनाएं मनुष्य के निर्णय-सामर्थ्य पर उत्पादक शक्तियों के प्रभुत्व को दर्शाती हैं, जिनकी दृष्टि में मनुष्य की कीमत उपभोक्ता जितनी होती है. वे निहित स्वार्थ के लिए जैसे भी हो उपभोक्ता के मानस पर छाए रहना चाहते हैं. वितरणात्मक न्याय का लक्ष्य व्यक्ति के विवेक को सम्मुनत करना भी है, ताकि व्यापक लोकहित को ध्यान में रखते हुए वह स्वयं को ऐसे अनावश्यक प्रलोभनों से दूर रख सके.

पूंजीप्रेरित समाजों में उत्पादन पर बड़े उद्योगपतियों और सरमायेदारों का कब्जा होता है. आविष्कारों की दिशा बहुसंख्यक की आवश्यकता को ध्यान में रखकर तय नहीं की जाती. न ही विज्ञान एवं तकनीकी शोध के समय कल्याण के न्यायिक विभाजन पर ध्यान दिया जाता है. यही क्यों अर्थशास्त्र के जितने भी लोकप्रिय सिद्धांत हैं, सभी वितरणात्मक न्याय पर विचार करते समय संद्धिग्ध लगने लगते हैं. इसका कारण है कि अर्थशास्त्र के प्रमुख सिद्धांत लोककल्याण की अपेक्षा राज्य की अर्थव्यवस्था को गतिमान रखने के लिए बनाए जाते हैं. विशेषकर पूंजीवादी समाजों में यह मान लिया जाता है कि ऊपर के स्तर पर संपन्नता रहेगी तो वह प्रकारांतर में, रिसते-रिसते निचले समूहों तक भी पहुंचेगी. इससे निचले वर्गों को विकास के लिए उच्चस्थ वर्गों पर आश्रित रहना पड़ता है. दरअसल समाज में व्याप्त आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर भारी असमानता, समाज में पूंजी का बढ़ता वर्चस्व आदि ऐसे कारण हैं जो मनुष्य की निर्णय प्रक्रिया यहां तक कि उसके क्रय-सामर्थ्य तथा क्रय-प्रयोजन को प्रभावित करते हैं. आर्थिक रूप से शक्तिशाली समूह, जो अपने निजी हितों को शेष समाज के हितों से ऊपर मानते हैं, वे समाज की सर्वोत्तम मेधा को अपनी स्वार्थ-सिद्धि के कार्यों में लगाए रखते हैं. विशिष्ट प्रतिभाओं के शिखरस्थ समूहों की सेवा में जुट जाने से समाज का बौद्धिक संतुलन गड़बड़ाने लगता है. निचले स्तर पर मौलिक प्रतिभाओं की कमी उनमें अनुसरण की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है. परिणामस्वरूप समाज में असमानता बढ़ने लगती है. स्तरीकरण की प्रतीक तथा असमानता को बढ़ावा देने वाली संस्थाओं का प्रभाव सरकार पर बढ़ता जाता है. आर्थिक असमानता अनेकानेक सामाजिक अंतर्विरोधों का कारण बनती है. उनपर काबू गांठने के लिए विकास के लाभ को जन-जन तक पहुंचाना, सरकारों के लिए मुश्किल काम रहा है. इसलिए जब-जब शासक अथवा शासन बदले हैं, समाज की आर्थिक-राजनीतिक नीतियों में भी बदलाव आया है. शासन के स्तर पर होने वाले लगभग सभी परिवर्तन चाहे वे टैक्स को लेकर हों अथवा उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि से संबंधित, सभी कहीं न कहीं वितरणात्मक न्याय को प्रभावित करते हैं. चूंकि जनाकांक्षाएं विकास के अनुपात में तेजी से बढ़ती हैं, इसलिए सरकारों के समक्ष सदैव यह चुनौती होती है कि परंपरागत नियमों में कितना और किस प्रकार का संशोधन करें, ताकि समाज में बढ़ रहे विक्षोभों को न्यूनतम रखा जा सके. ऐसे वातावरण में वितरणात्मक न्याय सरकारों का नैतिक मार्गदर्शन करता है. यह कोरा आदर्श नहीं है. बल्कि व्यावहारिक सत्य है और सीधे सरकार के कर्तव्य पक्ष से जुड़ा है. यदि कोई सरकार इसे अपनाने से पीछे रहती है, तो माना जाएगा कि वह अपने ‘होने’ के औचित्य से बहुत पीछे है. यह ऐसी कसौटी है, जिसके आधार पर कल्याण सरकार की सदेच्छाओं को जांचा-परखा जा सकता है.

प्रत्येक समाज के कुछ आदर्श होते हैं, जो परोक्षरूप में उसके नैतिक लक्ष्य की ओर संकेत करते हैं. यह भी सत्य है कि पूर्ण स्वतंत्रता किसी भी समाज के लिए सदैव सपना होती है. लेकिन यह सोचकर कि यथार्थ और नैतिकता की दूरी अवश्यंभावी है; अथवा संपूर्ण स्वतंत्रता महज एक सपना है—कोई समाज न तो नैतिकता की ओर से आंख फेरता है, न ही पूर्ण स्वतंत्रता की कामना करना छोड़ देता है. अपनी स्थिति से निरंतर ऊपर उठते जाना ही न ही मनुष्यता का लक्षण है. वितरणात्मक न्याय की आवश्यकता मनुष्यता के इसी चिर-परिचित स्वप्न को साकार करने के लिए पड़ती है. यह भी सच है कि अभी तक ऐसी प्रणाली की खोज संभव नहीं हो पाई है, जिसके द्वारा जीवन में मानवादर्शों की शत-प्रतिशत स्थापना तथा विसंगतियों का संपूर्ण निदान संभव हो. इसके बावजूद इसकी अपनी महत्ता है. यह शिखरस्थ शक्तियों का नैतिक मार्गदर्शन प्रदान करती हैं. उन्हें राह दिखाती हैं ताकि समाज में व्याप्त असमानताओं को दूर करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकें. वितरणात्मक न्याय आधुनिक समाजों की अनिवार्यता है. इसलिए यह कहना कि समाज अथवा व्यक्ति इसको पूरी तरह नजरंदाज कर सकते हैं, सरासर भ्रांति होगी. वर्तमान समाजों में संचारक्रांति के विकास तथा उपभोक्तावादी प्रचारतंत्र ने लोगों को सूचनाओं के करीब ला दिया है. ऐसी अवस्था में कानून और शासन का एकतरफा मा॓डल, जो केवल अधिकार की बात करता हो, कर्तव्य की ओर जिसका कोई ध्यान न हो—चल ही नहीं सकता. आवश्यकता सरकार और जनता के स्तर पर विकास के सकारात्मक द्रष्टिकोण को अपनाने की है. समाज विशेष के लिए वितरणात्मक न्याय की कौन-सी पद्धति श्रेष्ठ और प्रभावकारी होगी, इसके लिए भी सकारात्मक द्रष्टिकोण आवश्यक है. यह हमें नैतिक मूल्यों से बंधे रहने, उनकी ओर निरंतर अग्रसर होने के लिए प्रेरित एवं दिशा-निर्देशित करता है. यह हमें अधिक से अधिक लोगों को अधिक से अधिक सुखी और संतुष्ट करने की नैतिक दृष्टि देता है. इसका अभाव अथवा समाजीकरण के उद्देश्यों के प्रति हताशा प्रायः हमें भटका देती है. कई बार हम विकास की धारा तथा उसके उद्देश्य को लेकर उलझन में पड़ जाते हैं.

उदाहरण के लिए यदि बाकी स्थितियां एक समान हों तो प्रायः यह मान लिया जाता है कि ब्याजदर में वृद्धि के दुहरे परिणाम होते हैं. पहला मुद्रा-स्फीति तथा दूसरा रोजगार के अवसरों में गिरावट. इनमें मुद्रा-स्फीति में गिरावट को सामान्यतः अच्छा माना जाता है, रोजगार के अवसरों में गिरावट को सरकार की अर्थनीतियों की असफलता के रूप में देखने का चलन है. इसलिए सामान्य सलाह यही होगी कि मुद्रा-स्फीति पर नियंत्रण के लिए बैंक को ब्याजदर में कमी करनी चाहिए. यह माना जाता है कि इससे वस्तुएं सस्ती होकर आम आदमी की पहुंच में आ जाएंगी. यानी प्रथम आग्रह उपभोक्ता वस्तुओं के सस्ती होने तथा उन्हें जनसाधारण की पहुंच में बनाए रखने का होता है. पूरक परिणाम यानी रोजगार में गिरावट की ओर अकसर ध्यान ही नहीं दिया जाता. जबकि रोजगार अवसरों में कमी समाज की आय में कमी लाकर उसके क्रय-सामर्थ्य को प्रभावित करती है. चूंकि रोजगार अवसरों में गिरावट के परिणाम देर से सामने आते हैं, इसलिए लोकप्रियता बनाए रखने के लिए अर्थशास्त्री मुद्रा-स्फीति को नियंत्रण में रखने की सलाह देते हैं. यह कुछ ऐसा ही है जैसे यह मान लेना कि समाज में जितने अधिक चिकित्सक होंगे, वह उतना ही स्वस्थ एवं खुशहाल रहेगा. फिर इस मान्यता को सिद्ध करने के लिए सभी प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को चिकित्सक बनने के लिए बाध्य करना. इससे निस्संदेह चिकित्सा के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं के आने की संभावना बढ़ेगी, किंतु यह कदम बाकी क्षेत्रों में मौलिक प्रतिभाओं के अभाव का कारण बनेगा. अनिच्छापूर्वक चिकित्सा क्षेत्र में ढकेले गए विद्यार्थी अनमने भाव से कार्य करेंगे. अपनी समग्रता में यह निर्णय समाज के लिए नुकसानदेह सिद्ध होगा. आशय है कि जल्दबाजी में, समस्याओं पर समग्र दृष्टि से विचार किए बगैर खोजे गए समाधान दूसरी अन्य समस्याओं को जन्म दे सकते हैं. उदाहरण के लिए सामाजिक संपदा के प्रबंधन करने के लिए अर्थशास्त्र के सिद्धांत एक टूल की तरह होते हैं. अर्थशास्त्री ज्ञान के उपकरणों का उतना ही प्रयोग करता है, जो अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों की कसौटी पर खरे उतरते हों. उसका असली ध्येय पूंजी के आवागमन द्वारा विकास की रफ्तार को बनाए रखना होता है. दूसरी ओर विकास को लेकर दार्शनिक के सोच का दायरा बड़ा होता है. वह भौतिक आवरण के पीछे अंतनिर्हित नैतिक सत्य को भी महत्त्व देता है. इसलिए दार्शनिक विचारों की महत्ता सार्वकालिक होती है. वितरणात्मक न्याय की सफलता के लिए आवश्यक है कि फैसले खूब सोच-समझकर लिए जाएं. वस्तुनिष्ट सत्य के अलावा सामाजिक आदर्शों को भी ध्यान में रखा जाए. लेकिन सभी अर्थशास्त्री दार्शनिक नहीं हो सकते. इसलिए समस्या के दीर्घायामी समाधान हेतु आवश्यक है कि लिए गए निर्णयों में दार्शनिक गहनता हो. वितरणात्मक न्याय को प्रतिष्ठा उसकी दार्शनिकी के कारण मिली है. यह कार्यक्रम न होकर एक वैचारिकी है. इस कारण हर विद्वान ने वितरणात्मक न्याय की संकल्पना अपनी वैचारिक कसौटी के आधार पर की है. आगे हम उसके विविध स्वरूपों पर संक्षेप में चर्चा करेंगे—

उपयोगितावादी द्रष्टिकोण

मनुष्य समाज में अपने सुख एवं सुरक्षा के लिए सम्मिलित होता है. कामना करता है कि ये दोनों उसको निर्बाध प्राप्त होते रहेंगे. इसके लिए वह अपनी नैसर्गिक स्वतंत्रता के एक हिस्से की बलि चढ़ाकर, सामाजिक आचारसंहिता के अनुसार अनुशासित जीवनयापन का भरोसा दिलाता है. समाज में शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए वह आवश्यक कानून गढ़ता है. राज्य में कानून के गठन तथा उनके अनुपालन का दायित्व हालांकि सरकार का होता है. कानून एवं सामाजिक आचारसंहिता के परिपालन हेतु उपयुक्त वातावरण बनाने के लिए सरकार को आवश्यक अधिकार भी दिए जाते हैं, जिनसे वह ऐसे प्रभावशाली तंत्र का गठन कर सके, जिसपर सभी को विश्वास हो, जो नागरिकों को अपने सामर्थ्य के सदुपयोग तथा विकास के उपयुक्त अवसर प्रदान करने में सक्षम हो. अपेक्षा की जाती है कि जिन्हें सरकार के भीतर मनोनीत किया गया है, वे अपने कर्तव्यों को भली-भांति समझेंगे तथा व्यापक लोकहित में जो दायित्व उन्हें सौंपे गए हैं, उनका उसी भावना के साथ पालन करेंगे. शासन-प्रशासन की सफलता कानून के समुचित पालन तथा विकासोन्मुखी अर्थव्यवस्था के गठन से आंकी जाती है. इसके साथ वह वैचारिकी भी महत्त्वपूर्ण होती है, जिसपर सरकार तथा उसकी सहयोगी संस्थाओं का ढांचा खड़ा होता है. समाजार्थिक असमानता के निराकरण तथा समावेशी विकास हेतु सरकार की प्राथमिकताएं क्या हों, इस प्रश्न का उत्तर स्वाधीनतावादी, सुखवादी, उपयोगितावादी, आदर्शवादी, यथार्थवादी आदि विभिन्न मत-मतांतरों वाले विद्वान अपनी-अपनी तरह से देते हैं. उपयोगितावादी विचारकों के अनुसार समाजीकरण का परम लक्ष्य ‘अधिकतम लोगों की अधिकतम प्रसन्नता’ सुनिश्चित करने में है. मगर मात्र कह देने से तो यह लक्ष्य-सिद्धि संभव नहीं. सुख तो किसी न किसी रूप में पशु-पक्षी भी प्राप्त करते हैं. उनके व्यवहार से कभी उनका दुख या असंतोष प्रकट नहीं होता. हम प्रायः मान लेते हैं कि वे अपनी स्थिति से संतुष्ट हैं.

उपयोगितावाद की मुख्य समस्या यह पता लगाना है कि व्यक्ति के सुख तथा प्रसन्नता के आकलन का आधार क्या हो? हम यह कैसे तय करें कि ‘अमुक’ व्यक्ति पूरी तरह सुखी और संतुष्ट है. वे कौन-सी कसौटियां हैं, जिनसे माना जाए कि समाज ने अपने अधिकतम सदस्यों के लिए अधिकतम सुख का प्रबंध कर लिया है. सुख न तो बिजली है, न टेलीफोन, न द्रव्यमान है, न ही यह कुछ और जिसे आंकड़ों में अभिव्यक्त किया जा सके. दूसरे शब्दों में सुख चाहे जितना सुखकारी हो, उसकी अवधारणा बहुत जटिल है. विशेषकर उसको परिभाषा में बांधना. इससे सुख तथा उसकी कसौटी का निर्धारण बहुत कठिन हो जाता है. तब और भी जब हम देखते हैं कि उसे लेकर प्रत्येक व्यक्ति की चाहत तथा मान्यताएं अलग-अलग हैं. किसी व्यक्ति को सुबह-शाम दाल-रोटी मिल जाए तो वह खुद को सुखी मान लेता है. उसको समाज या सरकार से कोई गिला-शिकवा नहीं रहता. दूसरा व्यक्ति पांच-तारा होटल में भोजन करने के बाद भी चिड़चिड़ा और असंतुष्ट बना रहता है, चार बार पेट-भर खा लेने के बाद भी उसकी क्षुधा शांत नहीं होती. क्या इसे केवल मावन-प्रवृत्ति अथवा स्वभाव का अंतर मानकर उपेक्षित किया जा सकता है! जाहिर है उपयोगितावाद को चुनौती बाहर से नहीं, अपने ही भीतर से प्राप्त होती है. इस समस्या के निदान के लिए उपयोगितावादी विचारकों की राय है कि जो मानवमात्र के लिए ‘शुभ’ है, अथवा जिससे समाज में ‘शुभता’ की वृद्धि हो, वही असली सुख है. फिर भी सवाल रह जाता है कि समाज में ‘शुभ’ की सार्वत्रिक उपस्थिति कैसे संभव हो! कैसे उसको बढ़ावा दिया जाए! इस बारे में लोगों से बात की जाए तो वे पुनः अलग-अलग रास्ते बताएंगे. अर्थात ‘शुभ’ के प्रति अपनी असहमति के बावजूद, यदि उनसे इसकी स्वतंत्र व्याख्या करने को कहा जाए तो वे किसी एक मुद्दे पर शायद ही एकमत हो पाते हैं. शुभ के स्वरूप की व्याख्या केवल जनसाधारण की समस्या नहीं है? कलाकार, बुद्धिजीवी, राजनेता, मंत्री, संतरी, कारपोरेट सेक्टर में काम करने वाले प्रखर अधिकारी, अड़ियल नौकरशाह, दुकानदार, इंजीनियर सब उसे लेकर असमंजस में जान पड़ेंगे. एक भी विश्वास के साथ यह नहीं कह पाएगा कि सुख की उसकी अवधारणा क्या है? मनुष्य का असली सुख किसमें है! कुछ लोग सुख के òोत के रूप में कुछ वस्तुओं या उपकरणों का नाम लेंगे. कुछ का जवाब दार्शनिक अंदाज वाला भी हो सकता है. ऐसे लोग कहेंगे कि जीवन में दुखों का अभाव ही सुख है. लेकिन दुखों का अभाव तो अभौतिक घटना है. दूसरे शब्दों में सुख की परिभाषा तथा उसका आकलन बहुत चुनौती-भरा कार्य है. उपयोगितावाद की ये समस्याएं उसके समर्थकों के लिए भी अजानी नहीं थीं. इसलिए इसे विचारधारा के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत करने से पहले, उन्हें सुख की परिभाषा में आने वाली चुनौतियों का सामना करना पड़ा था, अंततः उन्हें ‘शुभ अमूत्र्तन किंतु सर्वकल्याणकारी है’ के विचार से समझौता करना पड़ा.

उपयोगितावादी विचारकों के अनुसार सुख की अवधारणा चाहे जितनी वैविध्यपूर्ण हो, फिर भी जीवन में सुख और खुशहाली के मापदंड के लिए सुविधाओं के न्यूनतम ‘पैकेज’ की परिकल्पना की जा सकती है. उनमें ऐसी सुविधाओं को शामिल किया जा सकता है, जिनके अभाव में मनुष्य को सामान्य जीवन जीना भी दूभर लगने लगे. भोजन, भवन, वस्त्र जैसी कुछ आवश्यकताएं ऐसी हैं, जिनकी कमी मनुष्य के अस्तित्व पर संकट ला सकती है. उसको शारीरिक और मानसिक स्तर पर रोगी बना सकती है. लेकिन न्याय की अपेक्षा यह भी है कि आवश्यकताओं के आकलन में देश-भर में सामान्य एकरूपता बरती जाए. उदाहरण के लिए भूखा व्यक्ति रोटी-दाल मिलने पर तीव्र सुखानुभूति की घोषणा कर सकता है. किंतु धनवान के मामले में स्थिति इससे अलग होगी. इसलिए गरीब के लिए साधारण भोजन और धनवान के लिए उसके पसंदीदा व्यंजनों का प्रबंध कर देना न्याय नहीं है. भूखा व्यक्ति दाल-रोटी को अपने सुख का आधार मान लेता है, तो केवल इसलिए कि उसका तात्कालिक संघर्ष भूख से है. उससे आगे सोच पाने में वह असमर्थ है. इसलिए जीवन की न्यूनतम आवश्यकता दाल-रोटी पाकर भी उसके चेहरे पर संतुष्टि के भाव देखे जा सकते हैं. भूखे व्यक्ति के लिए दाल-रोटी का इंतजाम कर देने से उसकी जीवन संभाव्यता को बढ़ाया जा सकता है, किंतु यह अंतरिम राहत होगी. व्यक्ति और समाज दोनों की जिम्मेदारी उस समय तक समाप्त नहीं होती, जब तक वह व्यक्ति स्वयं-स्फूत्र्त और आत्मनिर्भरता के साथ विकास की मुख्यधारा में सम्मिलित नहीं हो जाता. यह वितरणात्मक न्याय की पहली स्थिति है. इसमें स्थायित्व उस समय तक असंभव है, जब तक व्यक्ति समाजार्थिक भेद-भाव का शिकार बना हुआ है. लोग शासक और शासित में बंटे हुए हैं. फैसले सर्वसम्मति से लेने के बजाय ऊपर से थोप दिए जाते हैं. इस उपलब्धि पर समाज और सरकार अपनी पीठ ठोंक सकते हैं. मगर उन्हें यहीं संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए. यहां से आगे की उनकी यात्रा समाज में विषमता की खाई को पाटकर एक समरस समाज की स्थापना तक जारी रहनी चाहिए, ऐसा समाज जिसमें जिसमें व्यक्ति को न केवल अवसर समान हों, बल्कि संसाधनों में भी समान हिस्सेदारी हो.

यहां आते-आते उपयोगितावाद की तस्वीर साफ होने लगती है. तय हो जाता है कि समाज में न्याय की आदर्श उपस्थिति तभी संभव है, जब मनुष्य को आवश्यकता की सभी ऐच्छिक वस्तुएं आसानी से उपलब्ध हों. ताकि वह अपने शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए खुद को विकास की मुध्यधारा से जोड़ सके. ऐच्छिक वस्तुएं तथा मूलभूत आवश्यकता में अंतर है. ऐच्छिक वस्तुओं में वे सभी संसाधन और अवसर सम्मिलित हैं, जो किसी व्यक्ति को विकास की स्पर्धा में बनाए रखने के लिए जरूरी होते हैं. अभी तक रोटी, कपड़ा और मकान को मनुष्य की मूल आवश्यकताओं की उपलब्धता को सरकार के कर्तव्य में गिना जाता रहा है. सामान्यतः यह उचित भी है. किंतु इससे व्यक्ति का विकास की दौड़ में बने रहना संभव नहीं है. केवल उम्मीद की जा सकती है कि मूल आवश्यकताओं की पूर्ति के आश्वासन के बाद मनुष्य निश्चिंत होकर अपने भविष्य के बारे में सोच सकेगा, किंतु समाज में व्यक्ति के विकास हेतु पर्याप्त अवसर ही न हों तो? अथवा जितने अवसर हैं, उनपर पहले से समृद्ध वर्गों का कब्जा हो तब? अथवा अवसर हों और व्यक्ति को निर्णय लेने की स्वतंत्रता न हो तब? यानी केवल मूलभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति से विकास की संभावना न्यूनतम बनी रहती है. विकास से वंचित व्यक्ति मूल आवश्यकताओं का कोई संकट न होने के बावजूद, स्वयं को असंतुष्ट, असहाय और दुखी महसूस करेगा. इससे समाज में अशांति और अव्यवस्था संबंधी चुनौतियां भी जन्म लेंगी. समस्या के स्थायी समाधान के लिए उपयोगितावादी विचारकों का द्रष्टिकोण है कि मनुष्य को उसकी आवश्यकता की मूलभूत वस्तुएं यथा भोजन, वस्त्र, आवास, दवाएं, सुरक्षा, पारिवारिक सान्निध्य आदि आसानी से प्राप्त होना चाहिए. साथ में उसे यह भरोसा होना चाहिए कि उसके विकास हेतु समाज में समुचित अवसर भी आसानी से उपलब्ध हैं. इनके अलावा समाज की विकासवादी परंपरा से जोड़ने या जोड़े रखने के लिए व्यक्ति में इच्छाशक्ति का होना भी आवश्यक है. इच्छाओं के चयन में अरस्तु से प्रेरणा ली जा सकती है. उसके अनुसार विवेक-संपन्न होने के नाते यह स्वाभाविक है कि इच्छाओं के निर्माण तथा उनके निर्वहन के समय मनुष्य के निर्णय तर्कपद्धति के अनुरूप हों. इच्छा मनुष्य की न्याय-चेतना तथा कर्तव्यों की दिशा का निर्धारण करती है. दूसरे शब्दों में इच्छा भविष्य की पूर्ववत्र्ती, विकासपथ को रोशन करनेवाली मशाल है. मनुष्य जिस जीवन की अपने लिए कामना करता है, जैसा भविष्य वह अपने लिए गढ़ना चाहता है, पहले वैसा सपना, वैसी इच्छा और वैसा ही संकल्प-भाव उसके भीतर पनपना चाहिए. इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य को मनोवांछित कार्यक्षेत्र में प्रवेश की पूरी-पूरी स्वतंत्रता हो. साथ में यह विश्वास भी जरूरी है कि उस दिशा में प्रयास करने पर सरकार और शेष समाज भी उसकी सहायता को उपलब्ध होंगे.

यदि मनुष्य परतंत्र होता, उसकी निर्णय-शक्ति किसी अन्य से प्रभावित होगी तो वह इच्छा, सपनों, संकल्पों और संसाधनों के बावजूद उस दिशा में कुछ भी कर पाने में असमर्थ रहेगा. इसलिए समाज में न्याय की स्थापना के लिए स्वतंत्रता अपरिहार्य है. दूसरे शब्दों में समाज और सरकार न्याय का वातावरण बना सकते हैं, उसको ऊपर से थोप पाना नामुमकिन है. कह सकते हैं कि न्याय की प्रेरणा चाहे जिस दिशा से मिले, उसकी आकांक्षा को उसकी मानवीय चेतना से उद्भूत तथा स्वतंत्र कार्यशैली से समर्थित होना चाहिए. अरस्तु की यह विचारधारा उपयोगितावाद की आधारशिला तथा उसकी सफलता की कसौटी है. हर मनुष्य अपने लिए सुखी तथा खुशहाल जीवन की कामना करता है. इसके लिए अवश्यक है कि समाज में पर्याप्त रोजगार हों. उनके माध्यम से व्यक्तिमात्र के लिए इतनी आय सुनिश्चित हो, ताकि वह अपने लिए न्यूनतम सुविधाओं का इंतजाम कर सके. ऐसे अवसर हों, जिनमें वह अपने अपने भविष्य के सपने सजा सके. इतनी स्वतंत्रता हो कि आगे बढ़कर अपने सपनों को अंजाम तक पहुंचा सके. इस सबके लिए लोकोन्मुखी और जवाबदेह व्यवस्था का होना जरूरी है. ऐसी व्यवस्था जो न केवल संसाधनों के न्यायिक विभाजन के प्रति ईमानदार हो, बल्कि प्रतिव्यक्ति आय, रोजगार अवसर तथा समाज की कुल संपदा में वृद्धि के माध्यम से सदस्य इकाइयों की महत्त्वाकांक्षाओं को मूत्र्तरूप दे सके. सुख की अवधारणा को लेकर जेरमी बैंथम, हेनरी सिडविक, जान स्टुअर्ट मिल आदि उपयोगिता विचारकों में हल्के-फुल्के मतभेद हैं, किंतु वे सभी इसपर सहमत थे कि जीवन में सुख का नैरंतर्य सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता के बिना असंभव है. इसके लिए आवश्यक है कि शासन जवाबदेह हो. मनुष्य को अपना मत-अभिव्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता हो. उसको अपने हित के अनुसार निर्णय लेने, उसके लिए उपलब्ध संसाधनों की वांछित क्षेत्र में निवेश करने की आजादी हो. यह भी जरूरी है कि संविधान निर्माण से लेकर, कानून, शासन-प्रशासन की आचारसंहिता तथा कार्यकारी संस्थाओं के गठन में जनसाधारण के हितों, इच्छा और आकांक्षाओं का पूरा-पूरा ध्यान रखा गया हो. इसके लिए उपयोगितावादी विचारक तीन प्रकार की संस्थाओं के गठन को जरूरी मानते हैं—

1. सार्वजनिक खर्च पर चलने वाली ऐसी शिक्षण संस्थाएं जो सभी के लिए खुली हों, जिनमें सभी प्रकार की आधुनिक शिक्षा के व्यापक इंतजाम हों.
2. मुक्त स्पर्धात्मक बाजार, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने, अपने श्रम-कौशल का पूरा लाभ उठाने की स्वतंत्रता हो. उल्लेखनीय है कि प्रतिस्पर्धी बाजार के लिए आरंभिक उपयोगितावादी विचारक ‘लेजेज फेयर’ तथा उदार पूंजीवादी तंत्र की प्रशंसा करते थे. मगर पिछले कुछ दशकों में पूंजीवादी ताकतों ने निहित स्वार्थ के लिए जिस तरह से लोगों की निर्णय-प्रक्रिया को प्रभावित करना आरंभ किया है, उपयोगितावादी विचारकों का उससे मोह भंग हुआ है. इन दिनों वे समाजवादी अर्थव्यवस्था का समर्थन करने लगे हैं.
3. नागरिक अधिकारों का संरक्षण; जिससे व्यक्ति अपने विकास को लेकर स्वयं निर्णय लेने में सक्षम हो तथा अर्जित सुख-सुविधाओं का स्वतंत्र भोग कर सके.
4. जबावदेह लोकतंत्र. शिक्षा के प्रति समानतावादी द्रष्टिकोण, सभी वर्गों तक उसकी समान पहुंच, नागरिक अधिकारों के संरक्षण हेतु उत्तरदायी न्याय प्रणाली की सफलता, मुक्त और सकारात्मक स्पर्धायुक्त बाजार की स्थापना केवल लोकतांत्रिक परिवेश में संभव है. दूसरे शब्दों में उपयोगितावादी न्याय और लोकतंत्र एक-दूसरे के पूरक तथा कदाचित समानार्थी भी हैं.

यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो ऊपरोल्लिखित सब किसी आधुनिक समाज की विशेषताएं जान पड़ेंगी. आधुनिक समाज सामान्यतः लोकतंत्र को महत्त्व देते हैं. घोषितरूप से नागरिक अधिकारों के संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं. उसके लिए आमतौर पर संविधान में उपयुक्त व्यवस्था भी करते हैं. वे सिद्धांततः मानते हैं कि शिक्षा सभी के लिए एक समान हो. उसका तमाम खर्च सरकार वहन करे. दूसरे शब्दों में माना जा सकता है कि आधुनिक समाजों के गठन पर उपयोगितावादी विचारधारा का गहरा प्रभाव रहा है. इससे पूरी तरह इन्कार भी नहीं किया जा सकता. किंतु यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो चाहे वह अमेरिका जैसे अतिआधुनिक समाज हों; अथवा भारत जैसे त्वरित परिवर्तन से गुजर रहे परंपरा-पोषी देश—सभी में संवैधानिक व्यवस्थाओं तथा विचारधाराओं का ईमानदार अनुसरण संभव नहीं हो पाता. क्योंकि न्याय की जरूरत समाज के बहुसंख्यक गरीबों, बेरोजगारों तथा दूसरे संघर्षशील वर्गों को पड़ती है, जबकि उसको लागू करने का अधिकार अल्पसंख्यक अभिजनों का होता है, जो संसाधनों और अवसरों पर कुंडली मारे बैठा रहते हैं. वे इतनी आसानी से अपने कब्जे को छोड़ने को तैयार नहीं होते. धर्म, कानून, राजनीति, सामाजिक आचारसंहिता और संस्थाएं, सभी पर उनका अधिकार होता है. भारत जैसे देशों में तो जाति नाम की अतिरिक्त संस्था विकास के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा है. धार्मिक जड़ता, ऊंच-नीच और तरह-तरह के पाखंडों को बनाए रखने में वह प्रमुख भूमिका निभाती है. ऐसी यथास्थितिवादी संस्थाओं के चलते शीर्षस्थ अभिजनों को वास्तविक चुनौती बहुत कम मिल पाती है. परिणामस्वरूप जनसाधारण और न्याय के बीच अंतराल बढ़ता ही जाता है. दरअसल उपयोगितावादी न्याय की संकल्पना एक ऐसी अर्थ-प्रणाली पर निर्भर करती है जो सभी के साथ उदारता से पेश आए. जिसका उपयोग समाज के बहुसंख्यक वर्ग के कल्याण के लिए उसकी इच्छा, आकांक्षाओं के अनुरूप किया गया हो. उसके लिए जब आमूल परिवर्तन की बारी आती है, तो शीर्षस्थ अभिजन समूह एकजुट होकर उसका विरोध करने लगते हैं. अपने प्रभाव का उपयोग कर, प्रायः वे यथास्थिति बनाए रखने में सफल भी होते हैं. उनकी शोषणकारी नीतियों के चलते विकास का लाभ समाज के शीर्षस्थ वर्गों तक सिमटकर रह जाता है. लोकतंत्र और स्वतंत्रता आभासी बनकर रह जाते हैं. लोगों का उस ओर ध्यान न जाए, इसके लिए वे उनके दिलो-दिमाग पर कब्जा जमा लेते हैं. इसमें मीडिया तथा लाकसंपर्क के अन्य सभी माध्यम की मदद ली जाती है. लोकतांत्रिक संस्थाओं में केंद्रीय पदों पर आसीन होकर वे उनका स्र्वार्थानुरूप संचालन करने लगते हैं. परिणामस्वरूप जनसाधारण के लिए न्याय की संभावना क्रमशः क्षीण होती जाती है. इसका परिणाम सामाजिक विषमता की उत्तरोत्तर चैड़ी होती खाई के रूप में सामने आता है.

मुक्त, उदार एवं बाजारवादी अर्थव्यवस्था के समर्थक दावा करते हैं कि स्पर्धात्मक अर्थव्यस्था मानवमात्र के उपयोग को केंद्र में रखकर बनाई गई है. इसमें जो जितना योग्य है, वह समाज के विकास में उतना ही योगदान कर अपने लिए उपयुक्त सुख-सामग्री जुटा सकता है. उद्यमियों के बीच स्पर्धा होने पर उपभोक्ता को चीजें सस्ती मिलने की संभावना बन जाती है. लेकिन वे इस तथ्य को नजरंदाज कर जाते है कि बाजार के अधिकतम हिस्से पर कब्जा जमाने के लिए बाजारवादी शक्तियां मनुष्य का उपभोक्ताकरण करती हैं, तरह-तरह के प्रलोभन, आकर्षण एवं चमक-दमक के माध्यम से वे उपभोक्ताओं के मन-मस्तिष्क पर कब्जा जमाकर उसके निर्णय-सामर्थ्य को अपने बस में कर लेती हैं. निर्णय क्षमता में कमी आने पर व्यक्ति शोषणकारी व्यवस्था से अनुकूलन करने लगता है. स्पर्धा भले ही मानवीय गरिमा को ठेस पहुंचाती हो, भले ही वह पूंजीवाद के हाथ का सबसे ताकतवर औजार हो, भले ही वर्चस्वकारी शक्तियों को सत्ता में बने रहने के तर्क उपलब्ध कराता हो, सच यह भी कि स्पर्धा पूंजीवाद की खोज नहीं है. परंपरागत अर्थव्यवस्थाओं में भी वह मौजूद थी. मगर तब और आजकल पूंजीवाद की सफलता का पर्याय बन चुकी स्पर्धा में अंतर है. पहले वह मुख्यतः उत्पादकों अथवा विक्रेताओं के बीच होती थी. क्रेता का महत्त्व था, किंतु कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो, आमतौर पर वह स्पर्धा से बाहर होता था. आजकल उत्पादक और विक्रेता दोनों की भूमिका परस्पर पूरक और सहायक की है. विक्रेता भी उत्पादन-प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण सदस्य है, इसलिए कह सकते हैं कि प्राचीन स्पर्धा केवल उत्पादनकर्म तक सीमित थी. उपभोक्ता उस समय तक उतना महत्त्वपूर्ण नहीं था. इसलिए उसे स्पर्धा से बाहर रखा जाता था. त्वरित उत्पादन प्रणाली में उपभोक्ता का स्थान भी निर्णायक है. उसके पास चयन के वाजिब अवसर भी हैं. इसलिए आधुनिक विद्वान बाजार को आर्थिक गतिविधियों के ऐसे केंद्र के रूप में देखते हैं, जहां क्रेता और विक्रेता अपने-अपने हितों की स्पर्धा में होते हैं. विक्रेता और उत्पादक तो स्वयं को एक-दूसरे का पूरक और सहयोगी मान ही चुके हैं. उपयोगितावाद बाजार में मुक्त स्पर्धा का समर्थक है, लेकिन वह स्पर्धा बाजार में मौजूद क्रेता और विक्रेता दोनों के लिए लाभकारी होनी चाहिए. वह इसे सकारात्मक स्पर्धा का नाम देता है. सकारात्मक स्पर्धा की कुछ स्थितियां निम्नवत हो सकती हैं—

1. बाजार में क्रेता और विक्रेता पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हों. दोनों में से कोई भी मूल्यों में हस्तक्षेप कर पाने में असमर्थ होगा. फलस्वरूप उत्पादक को वस्तु का पूरा दाम प्राप्त होगा तथा उपभोक्ता को वाजिब मूल्य में अपेक्षित वस्तु इच्छानुसार समय पर उपलब्ध होगी. यह आदर्श अवस्था है. जिसमें स्पर्धा के लिए कुछ खास नहीं है. प्राचीन अर्थव्यवस्थाएं कुछ इसी प्रकार की होती थीं.
2. बाजार उत्पादकों तथा ग्राहकों के लिए पूरी तरह से खुला हो. नया उत्पादक जब चाहे बाजार में अपने उत्पाद की बिक्री की संभावना खोजने के लिए प्रवेश कर सके. साथ ही असफल अथवा ऐसे उत्पादक जो किसी कारणवश बाजार छोड़कर जाना चाहते हैं, उन्हें स्वतंत्रता हो कि अपनी इच्छानुसार बाजार को छोड़कर जा सकें.
3. बाजार की सफलता उत्पादक एवं विक्रेता दोनों के हितों की रक्षा में है. अतः वहां उत्पाद की गुणवत्ता तथा उसके मूल्य में तालमेल होना चाहिए. साथ ही उत्पादक को लगे कि उसे अपने श्रम-कौशल का पूरा मूल्य प्राप्त किया है और उपभोक्ता को विश्वास हो कि उसे चुकाई गई कीमत के बदले में उपयुक्त वस्तु प्राप्त हुई है. कोई भी स्वयं को छला हुआ या आहत महसूस न करे. केवल लाभार्जन को ध्यान में रखकर उत्पाद की गुणवत्ता से किया गया समझौता बाजार को नकारात्मक स्पर्धा की ओर ढकेल देगा. अमर्यादित स्पर्धा दूसरे दुकानदारों को कम समय में अधिकाधिक लाभार्जन के उकसाएगी. उससे केवल मुनाफे के लिए वस्तुओं के निर्माण और विपणन की प्रवृत्ति बढ़ेगी. इससे उत्पादक को मनमानी मूल्यबृद्धि का अधिकार देना होगा. यदि ऐसा नहीं हुआ तो वे अवसर मिलते ही गुणवत्ता से समझौता करने लगेंगे. अथवा आकर्षक पैकिंग, फैशन आदि बहानों से उत्पाद की अतिरिक्त कीमत वसूलने लगेंगे, जिसका उत्पाद की उपयोग से कोई लेना-देना न हो. इससे उपभोक्ता स्वयं को छला हुआ महसूस करेगा. उसे खर्चे गए मूल्य का वाजिब माल नहीं मिल पाएगा. इससे न्याय की अवधारणा ही गड़बड़ा जाएगी. और कालांतर में बाजार अराजक होकर मुनाफाखोरों की मनमानी का अखाड़ा बनकर रह जाएगा.

उपयोगितावादी विचारकों के अनुसार जब बाजार में विशुद्ध स्पर्धा का माहौल हो, क्रेता और विक्रेता के संबंध सौहार्दपूर्ण तथा विश्वास से भरे हों तो बाजार अपने स्वाभाविक विकास की ओर अग्रसर होता है. पूंजी वहां सहज उपलब्ध होती है. श्रमिकों के लिए पर्याप्त रोजगार होते हैं. मालिक-मजदूर संबंधों में आत्मीयता होती है. श्रमिकों अपनी अधिकतम उत्पादकता के साथ काम कर पाते हैं, फलस्वरूप वस्तु-निर्माण में न्यूनतम लागत आती है और उत्पादक उन्हें पर्याप्त लाभांश के साथ बेच पाता है. ऐसे परिवेश में संसाधनों का अधिकतम सदुपयोग संभव होता है. समाज जिन वस्तुओं की अपेक्षा करता है, वे आसानी से उपलब्ध होती हैं. इसके लिए उत्पादक को उपयुक्त लाभ होता है. सभी कामगारों को संतोषजनक रोजगार मिलता है. इस तरह उपयोगितावादी विचारक न्याय को बगैर किसी बाहरी प्रयास के स्थापित करना चाहते हैं. सरकार की भूमिका न्यूनतम हस्तेक्षप द्वारा देश, समाज में अनुकूल वातावरण बनाने की है, जिसमें उत्पादक और उपभोक्ता सौहार्दपूर्ण परिवेश में काम कर सकें.

उपर्युक्त से यह भी संकेत मिलता है कि सुखवादी विचारक वितरणात्मक न्याय को बाजार के भरोसे छोड़ देना चाहते हैं. उनका मानना है कि सरकार यदि अपने हस्तक्षेप को न्यूनतम रखे, बाजार को अपने भरोसे आगे बढ़ने का अवसर दे तो स्थितियां स्वतः सुधरती जाएंगी. उनके अनुसार प्रत्येक मनुष्य सुख की कामना करता है. व्यक्ति दूसरे के सुख के लिए धनराशि का भुगतान कर, अपने लिए सुख खरीद लेना चाहता है. सुख का यह आदान-प्रदान सौहार्दपूर्ण वातावरण ही संभव है. चूंकि एकमात्र सुख प्राप्त करना मनुष्य का ध्येय है, इसलिए जीवन में बाहरी हस्तक्षेप कम होना चाहिए. उल्लेखनीय है कि सुखवाद नई विचारधारा नहीं है. प्लेटो से लेकर अरस्तु तक ने इसपर विचार किया है. आधुनिक सुखवादी विचारकों का प्रेरणास्रोत जा॓न काल्विन है, जिसका मानना था कि दुनिया में मनुष्य को सुख प्रदान करने वाली एक भी वस्तु ऐसी नहीं है, जिसका उपयोग उसके लिए निषिद्ध हो. जा॓न काल्विन के बाद बैंथम ने सुखवाद को एक दर्शन के रूप में विस्तार दिया. लेकिन सुखवाद या उपयोगितावाद के साथ मुक्त बाजार का समर्थन करते हुए उसके समर्थक विद्वान बाजार को एक तरह से पूंजीवादी शक्तियों के हवाले कर देना चाहते हैं. लेकिन मुक्त बाजार में बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के सुख का न्यायिक वितरण कैसे संभव होगा, इस बारे में वे कोई ठोस और आश्वस्तिकारक जवाब नहीं दे पाते. उपयोगितावाद पर आधारित न्याय की स्वीकार्यता में यह सबसे बड़ी अड़चन है.

जारी…..

© ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com

गत्यात्मक जनसंस्कृति यानी समावेशी आधुनिकता

सामान्य

धर्म एवं अभिजन संस्कृति—12

ऐसा चाहूं राज मैं यहां मिले सभन को अन्न
छोटे-बड्डे सभ सम्म बसें, रविदास रहे प्रसन्न
— संत रविदास

जनसंस्कृति का अभिप्राय आधुनिकता से पलायन नहीं है. न उन अतिरेकी मान्यताओं को महत्त्व देना है जिनके अनुसार जो पुराना तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है; अथवा जिसे बहुसंख्यक माने वही सर्वदा वरेण्य है. न यह दर्शाना है कि पिछला समय ही श्रेष्ठ था और अब यह पूरा समाज पतनशील अवस्था में, निरंतर सांस्कृतिक अपसंस्करण की ओर बढ़ रहा है. इससे भारतीय समाज के आगे जो अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता पर गर्व करता आया है, कोई बड़ा संकट खड़ा होने वाला है. सच तो यह है कि पिछली संस्कृतियों की भांति आधुनिक संस्कृति में भी बहुत कुछ श्रेष्ठ है. इसमें यदि कुछ कमियां हैं तो परंपरागत संस्कृतियां भी सर्वथा दोषमुक्त नहीं थीं. यह भी भ्रांति ही है कि भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठतम छटा गांवों में देखने को मिलती है; तथा वैज्ञानिक क्रांति एवं प्रौद्योगिकीय विकास के फलस्वरूप विकसित हुई आधुनिक नागरीय सभ्यता में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है. सच यह है कि गत चार-पांच हजार वर्षों से मानव-संस्कृतियां निरंतर विकासमान अवस्था में रही हैं. संभव है उन दिनों के समाजों में सकारात्मक तत्वों की उपस्थिति आनुपातिक रूप से ज्यादा हो. शायद इसलिए कि तत्कालीन जीवन आज जितना जटिल नहीं था. मनुष्य की आवश्यकताएं सीमित थीं. उनके अनुपात में प्रकृति का प्रांगण बहुत विशाल था. इंसान संपत्ति-संग्रह की बुरी लत से भी दूर था. इसके बावजूद तत्कालीन समाजों की आपेक्षिक श्रेष्ठता को लेकर कोई भी बात सप्रमाण नहीं कही जा सकती. तब से आज तक राजनीतिक, सामाजिक विचारधाराओं के साथ उत्पादन-प्रविधियों में भी वैश्विक स्तर पर बदलाव आया है, जिसने लोगों की जीवन-शैली और सोच में व्यापक बदलाव किया है. तमाम विवादों और असहमतियों के बावजूद यह विकास की स्वाभाविक अवस्था है. विकास कभी इकहरा नहीं आता, अतः यदि प्राचीन संस्कृति और सभ्यता में कुछ अनुकरणीय था, तो सामंतवाद, निरंकुश साम्राज्यवाद तथा पूंजीवाद की शोषणकारी प्रवृत्तियों से निरंतर संघर्ष के उपरांत आधुनिक मनुष्य ने भी ऐसा बहुत-कुछ अर्जित किया है, जिसके आदर्शों पर नए समाज का ढांचा खड़ा किया जा सकता है. कमियां आधुनिक संस्कृति में भी हैं. वे मुख्यतः इसलिए हैं कि शिखर पर विराजमान शक्तियां सामाजिक-राष्ट्रीय हितों के आगे स्वार्थ को वरीयता देती रही हैं. व्यवस्था कोई रही हो, शिखरस्थ शक्तियों के वर्चस्वकारी चरित्र में बहुत कम बदलाव आया है. परिणामस्वरूप जनसाधारण को सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों का लाभ उतना नहीं मिल पाया है, जितना अपेक्षित था. यह दोषपूर्ण समाजीकरण का परिणाम है, मगर इसकी पूरी जिम्मेदारी किसी एक वर्ग के कंधों पर डाल देना अनुचित होगा. यदि एक वर्ग को बहुसंख्यक के उत्पीड़न का अपराधी कहा जाए तो दूसरे वर्ग का दोष उस व्यवस्था से अनुकूलन कर लेना, अन्याय को सहते जाना है. उसमें यदि कभी कोई हलचल हुई भी तो उत्पीड़ित द्वारा उत्पीड़क की स्थिति में पहुंचने के लिए—समाज को बदलने के लिए नहीं.

समाजीकरण का उद्देश्य परंपराओं और जीवनमूल्यों को सहेजकर रखना तथा बदलती परिस्थितियों के अनुकूल आदर्शों का सृजन करना है. इस प्रक्रिया से गुजरते हुए मनुष्य अपने समाज की परंपराओं, सांस्कृतिक भाव-भूमियों, आदर्शों, जीवनमूल्यों को आत्मसात करता है. इस बीच समाज में अपनी उपयोगिता दर्शाने के लिए शिक्षा-दीक्षा, अनुभव आदि के माध्यम से वह अपनी कार्यक्षमताओं में भी निखार लाता रहता है. विकासमान अवस्था में पुराने जीवनमूल्य अप्रासंगिक होते जाते हैं. रिक्त स्थान की पूर्ति हेतु नए जीवनमूल्य समयानुसार जन्मते रहते हैं. उनकी प्रतिष्ठा के लिए सामाजिक व्यवस्था में कुछ परिवर्तन अपरिहार्य हो जाते हैं. समाजीकरण और मानवीकरण के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए अपेक्षित होता है कि समाज अपने सभी नागरिकों के साथ समानतापूर्ण व्यवहार करे. बिना किसी भेदभाव के अपनी सुविधाओं, संसाधनों और अवसरों को सभी के लिए खुला रखे. समाजीकरण की प्रक्रिया को आत्मसात करने, उसके अनुसार अपने विकास हेतु सामंजस्य बिठाने तथा आवश्यकतानुसार मोड़ देने की सभी को स्वतंत्रता हो. मगर मनुष्यता के ज्ञात इतिहास की हमेशा यह विडंबना रही है कि समाजीकरण की प्रक्रिया कुछेक वर्गों द्वारा नियंत्रित-निर्देशित होती है. उसका ढांचा ऐसा बना है कि शिखर पर विराजमान कुछ अतिसक्रिय, चालाक किस्म के लोग बहुसंख्यक जन के निर्णय-सामर्थ्य को प्रभावित करने तथा उसको अपने स्वार्थानुरूप दिशा देने में कामयाब हो जाते हैं. खासकर मानवीय विकास के क्षेत्रों में. चूंकि संसाधनों पर शीर्षस्थ अभिजन वर्ग का अधिकार होता है, अतएव उसके निर्णय को स्वीकार करना, अभिजनेत्तर वर्गों की विवशता होती है. उन्हें अपने आसपास विकास के चिह्न भले ही दिखाई न दें, लेकिन बार-बार आश्वासन दिए जाने पर वे शीर्षस्थ अभिजनों के झांसे में आ ही जाते हैं. विकल्पहीन अवस्था में उनकी बातों पर विश्वास करने के अलावा उनके पास दूसरा कोई रास्ता ही नहीं होता.

लोक अमूर्त्तन और रूमानी अवधारणा है. उसका नाम लेते समय मनुष्यता का कोई खास चेहरा हमारे दिमाग में नहीं आता, न हमें ऊंच-नीच से ग्रस्त समाजों का सच तथा विरूपताएं नजर आती हैं. उस समय मानव-समाज का काल्पनिक, कुछ-कुछ ब्रह्मांड जैसा निरा काल्पनिक चित्र हमारे मस्तिष्क में बनता है. दूसरे शब्दों में केवल ‘लोक’ के माध्यम से हम वास्तविक जगत का आकलन करने में असमर्थ रहते हैं. दूसरी ओर समाजीकरण को मनमाफिक दिशा देने के लिए शीर्षस्थ शक्तियां जनसाधारण को निरंतर यह विश्वास दिलाती रहती हैं कि वे लोक का प्रतिनिधित्व करती हैं और उनका प्रत्येक कार्य लोककल्याण की भावना से अनुप्रेत है. ऐसा वे जनसाधारण का विश्वास जीतने के लिए करती हैं. हालांकि उनकी परिकल्पना ‘जन’ का, जिसे ‘कल्याण’ की वास्तविक जरूरत है, जो जीवन-संघर्ष में बुरी तरह उलझा हुआ है, भूख और बेकारी जैसी व्याधियां जिसे सदैव त्रस्त रखती हैं—का वास्तविक हित साधना नहीं होता. इसलिए उनके नेतृत्व में आया विकास ‘जन’ को प्रभावित किए बगैर उसके ऊपर से गुजर जाता है. इस हकीकत को अभिजन शक्तियां भी समझती हैं, अतएव ‘जन’ को भरमाए रखने के लिए वे तरह-तरह के प्रपंच रचती हैं. इससे उनके दिलों में पैठे डर का अनुमान लगाया जा सकता है. इसका अभिप्राय यह भी है कि अभिजन शक्तियों का शिखरत्व भले वे कितनी ही संगठित और ताकतवर हों, असंगठित अभिजनेत्तर वर्गों के सहयोग और समर्थन पर निर्भर होता है. कोई और विकल्प न देख जनसाधारण उनपर विश्वास कर भी लेता है. शीर्षस्थ शक्तियों का जादू हमेशा चले, लोग अमूर्त्तन विकास के फरेब पर हमेशा भरोसा किए रहें—यह अनिवार्य नहीं है. निरंतर छले जाने से जनसाधारण शीर्षस्थ अभिजन की धूर्त्तताओं को समझने लगता है. अभिजनेत्तर समूहों में चल रही हलचलों से अभिजन शक्तियां अनजान नहीं होतीं. अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए वे हर संभव-असंभव तरीका अपनाती हैं. तरह-तरह के षड्यंत्रों द्वारा वे अभिजनेत्तर वर्गों में फूट डालने में सफल हो जाती हैं. अभिजन शक्तियों की सफलता में अभिजनेत्तर समूहों की फूट तथा समान हितों के मुद्दों पर एकता का अभाव होता है. चूंकि समाज से भागना उसके परिवर्तन की संभावनाओं को कम करना है, अतएव समाज में रहते हुए उसकी विकृतियों को समझकर, उनका समाधान खोजना ही वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती है. इसके लिए अभिजन वर्ग की उस शब्दावली को समझना आवश्यक है, जिसके माध्यम से वह जनसाधारण को बरगलाने में सफल होता है. और परंपरा के दबावों के चलते, जिनमें अपनी समस्याओं के समाधान हेतु साधारणजन शासन-प्रशासन अथवा समाज के शीर्षस्थ वर्गों की ओर देखता आया है—अभिजनेत्तर समूह पुनः शीर्षस्थ अभिजनों की शरण में लौटने लगते हैं. समाजीकरण की प्रक्रिया के ये अनपेक्षित विवर्तन, समाज में असमानता, अविश्वास एवं असुरक्षा की भावनाएं पनपाते हैं.

जनसंस्कृति को मैं आत्मविश्वास से भरे, आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर बहुसंख्यक अभिजनेत्तर समूहों की कार्यशैली कहना चाहूंगा, जिसमें वे अपने विकास हेतु शीर्षस्थ वर्गों की ओर देखने के बजाय अपने ही बूते आगे बढ़ने का संकल्प लेते हैं. यह जनसाधारण की एकता और हितों को लेकर प्रतिबद्धता का नवगीत, मानवीकरण की चिर-परिचित शैली है. वर्तमान समाज में व्याप्त ऊंच-नीच समेत जो अनेकानेक विसंगतियां, विरूपताएं विद्यमान हैं, उनके पीछे समाजार्थिक विषमताओं का बहुत बड़ा योगदान है. शीर्षस्थ वर्ग जिसपर समाज के नेतृत्व और विकास की जिम्मेदारी होती है, वह अपने स्वार्थ से हटकर उसी समय सोचता है, जब उसे उससे भी बड़ी स्वार्थ-सिद्धि की संभावना हो. अतएव अपने विकास के लिए जनसाधारण को शीर्षस्थ अभिजन अथवा किसी दैवी सत्ता की अनुकंपा की प्रतीक्षा किए बिना अपने ही भरोसे प्रयास करना होगा. यह कार्य पूर्णतः आत्मनिर्भर, विकासमान और परस्पर सहयोगात्मक जनसंस्कृति के माध्यम द्वारा संभव है. उसकी सफलता के लिए ऐसी समावेशी आधुनिकता की आवश्यकता है जो नए-पुराने उच्चादर्शों तथा मानवीय संवेदनाओं पर टिकी हो. आदर्श जनसंस्कृति को खुला, परिवर्तनोन्मुखी और विकासमूलक किंतु जनसंख्या, राजनीति, अर्थव्यवस्था के तात्कालिक परिवर्तनों से मुक्त होना चाहिए. उसमें यह सामर्थ्य होना चाहिए कि इन स्वाभाविक बदलावों को बिना किसी विक्षोभ के झेल सके.

वर्तमान विश्व सभ्यता और संस्कृति के अनगिनत खानों में बंटा है. उसमें धर्म, राष्ट्रीयता, राजनीति, अर्थनीति आदि को लेकर अनेकानेक भेद और तज्जनित अंतर्द्वंद्व हैं. सही मायने में ये आधुनिक असमानताग्रस्त समाज और संस्कृति की विफलताएं भी हैं. सभ्यताकरण के दौर में मनुष्य नए और पुराने के बीच चयन को लेकर सदैव ऊहापोह का शिकार रहा है. परिणामस्वरूप परिवर्तनों की गति अनेक स्तरीय रही है. यह स्तरीकरण सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न उपादानों के बीच भी साफ नजर आता है. जनसंस्कृति में इन कृत्रिम परिवर्तनों से ऊपर उठकर एक समरस समाज की स्थापना का गुण होना चाहिए. उसे इतना व्यापक भी होना चाहिए कि हर सदस्य को लगे कि समाज के संचालन और दिशा-निर्धारण में उतना ही योगदान है, जितना दूसरों का. उसमें छोटे-छोटे जनसमूह मिलकर समाज की दीर्घजीविता एवं अधिकतम के कल्याण हेतु, स्थानीय मुद्दों को लेकर ऐसी संस्थाओं का गठन करेंगे, जिनकी कार्यशैली एवं रूपरेखा सामान्य सहमति के आधुनिकतम सिद्धांत के अनुसार स्वैच्छिक सहभागिता एवं सर्वांगीण विकास के आधार पर निर्धारित की जाएगी. उन संस्थाओं की सफलता का आधार ‘अधिकतम लोगों का अधिकतम विकास’ की कसौटी होगी. इस तरह जनसंस्कृति का आशय जनसामान्य के आचार-विचार, रहन-सहन, जीवन-शैली, रीति-रिवाज, हितों की प्रतिबद्धता सहित उन सभी कृत्यों-व्यवहारों से है, जिन्हें वह समाज का सदस्य होने के नाते अपनाता तथा आवश्यक संशोधन, परिवर्धन अथवा उनके बगैर भी आगामी पीढ़ी को सौंपता चला जाता है. न्याय की सर्वसुलभता हेतु आमूल परिवर्तन यदि वर्तमान की जरूरत है तो उसका लक्ष्य ऐसी जनसंस्कृति की स्थापना हो सकता है, जिसमें आदर्श स्वतः समाहित हों, लोग स्वयं-स्फूर्त्त भाव से उन्हें अपनाएं और एक-दूसरे का साथ देते हुए सामान्य हितों की प्राप्ति हेतु सहर्ष तत्पर हों.

जनसमाज के बारे में सामान्य धारणा है कि वह प्रौद्योगिकी के साथ-साथ विचारधारा के स्तर पर भी पिछड़ा हुआ होता है, इस कारण बुद्धि के मामले में अग्रणी अभिजन आसानी से केंद्र में जगह बना लेते हैं. अभिजन अभिजनेत्तर से बुद्धि-विवेक में सदैव अग्रणी हों, यह आवश्यक नहीं है. मगर उस अवस्था में वे अपने संसाधनों के बल पर, समाज की विशिष्ट प्रतिभाओं को अपने साथ जोड़ लेते हैं तथा उनके सहयोग-समर्पण द्वारा अभिजनेत्तर समूहों से आगे निकलने में सफल हो जाते हैं. दूसरी ओर गैर अभिजन अपनी विशिष्ट पृष्ठभूमि, शिक्षा तथा संसाधनों के अभाव जैसे कारणों से आधुनिक उत्पादन प्रौद्योगिकी तथा ज्ञान-विज्ञान के उपयोग में पिछड़ जाता है. बावजूद इसके सामाजिक सौहार्द, समानता, बंधुत्व, स्वैच्छिक सहयोग, सहअस्तित्व आदि अनेक जीवनमूल्य ऐसे हैं, जिनके अनुपालन में वह अपने समकालीन नागरीय समाजों से कहीं आगे होता है. इसकी भरपाई यानी अपनी सामाजिकता का प्रदर्शन करने हेतु नागरीय समाज विभिन्न प्रकार के औपचारिक संगठनों की मदद लेते हैं. उनमें किसी न किसी रूप में पूंजी का हस्तक्षेप होता है, जो समय के साथ-साथ बढ़ता ही जाता है. अभिजन शक्तियां उनपर अधिकार जमाकर उनका संचालन अपने स्वार्थानुरूप करने लगती हैं. इससे उनका उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है. बहुत-से सदस्य पूंजीगत लाभ न देख संस्था के लक्ष्य की ओर से उदासीन होने लगते हैं. इस कारण वे संगठन एक न एक दिन अपने उद्देश्य से भटकने को अभिशप्त होते हैं.

सामान्य व्यवहार में प्रायः ग्रामीण संस्कृति को ही जनसंस्कृति का पर्याय मान लिया जाता है, जबकि जनसमाज केवल गांवों तक सीमित नहीं होता. शहरों में भी ‘जन’ को जीवन-संघर्ष में उलझते तथा अभिजन हितों के लिए पसीना बहाते देखा जा सकता है. अपने जीवन में वह प्रायः अभिजन के पक्षपातपूर्ण निर्णयों का शिकार होता है, फिर भी वर्गीय चेतना के अभाव, संगठन की कमी, अपने अज्ञान एवं भ्रांतियों के चलते वह अभिजन का समर्थन करता है. दूसरे शब्दों में अभिजन के श्रेष्ठत्व पर भरोसा करके और यह जानते हुए कि उसकी विकास-दृष्टि स्वार्थ की सीमाएं लांघने में असमर्थ रहती है, ‘जन’ उसे खुशी-खुशी अपने ऊपर शासन करने का अधिकार सौंप देता है. ग्रामीण समाज भी, भले ही ऊपर से एक दिखे, भीतर से वह भी ‘जन’ और ‘अभिजन’ में बंटा होता है. यह भी देखने में आया है कि ग्रामीण अभिजन, शहरी अभिजन की अपेक्षा कहीं अधिक मुखर तथा आक्रामक होते हैं. उनका अभिजात्यबोध धर्म, जाति, कुल-गोत्र, वंशानुक्रम, भूमि-स्वामित्व, सामंती संस्कार जैसे परंपरागत प्रतीकों से प्रकट होता है. पुरोहित, जमींदार, सरकार तथा उसके शीर्षस्थ अधिकारी जो गांव में बसते अथवा उससे किसी भी प्रकार का संबंध रखते हों, ग्राम्यः समाज के अभिजन की श्रेणी में आते हैं. शहरी अभिजन की भांति वे भी निर्णयकारी भूमिका में होते हैं. अपनी पक्षपातपूर्ण कार्यशैली द्वारा वे ग्रामीण जीवन में असमानता और वर्चस्व की स्थापना करते हैं. ग्रामीण अभिजनेत्तर समाज में किसान, मजदूर, दस्तकार, साधारण नौकरीपेशा लोग आते हैं. उन्हें अभिजन के निर्देश अथवा उसकी इच्छा के अनुरूप अपनी जीवनशैली को साधना पड़ता है.

अभिजनेत्तर समाज में आर्थिक विकल्प बहुत सीमित होते हैं. उत्पादक के रूप में उसके सदस्य परंपरागत अथवा पिछड़ी उत्पादन प्रणाली से जुड़े होते हैं. जीविकोपार्जन हेतु उनमें से अधिकांश का सहारा या तो उनका श्रम होता है, अथवा हस्त-कौशल. इस कारण जनसंस्कृति हालांकि नागरिक संस्कृति की अपेक्षा सरल और कम उलझी हुई होती है, लेकिन आर्थिक पिछड़ेपन के कारण उन्हें उत्पाद और समाज की दिशा-दशा तय करने के अवसर नहीं मिल पाते. शीर्ष पर विराजमान अभिजन अपनी स्थिति का फायदा उठाते हुए शासन-प्रशासन में मनमाना हस्तक्षेप करते रहते हैं. श्रम तथा अपने सामान्य उत्पादों की खपत के लिए भी जनसामान्य अभिजन अथवा अभिजन हित हेतु कार्य करने वाली संस्थाओं का अनुकरण करते हैं. संसाधनों के अभाव में वे आधुनिकतम प्रौद्योगिकी का उपयोग भी ढंग से नहीं कर पाते. यद्यपि वे ऐसे उद्योगों और व्यवसायों से संबद्ध हो सकते हैं, जहां प्रौद्योगिकी एवं प्रबंधन के आधुनिकतम सिद्धांतों का उपयोग होता हो. मगर वहां उनकी उपस्थिति एक निर्जीव उपकरण जैसी होती है. निर्णयकारी अवस्था में न होने के कारण वे अपने प्रौद्योगिकीय कौशल का अपने हितों के अनुसार उपयोग करने से वंचित रह जाते हैं. इस कारण उनके जीवन में अपेक्षाकृत ठहराव होता है. यद्यपि शिक्षण-प्रशिक्षण, व्यापारिक सूझबूझ जैसी विशिष्ट योग्यताओं के बल पर जनसामान्य के बीच से कुछ सदस्य अभिजन वर्ग में सम्मिलित होते रहते हैं, किंतु अभिजनेत्तर से अभिजन की ओर संचरण प्रायः बहुत धीमी गति से—श्रेणीबद्ध आधार पर होता है. सामान्य स्थिति में अभिजन तक पहुंचने के लिए ‘जन’ को ‘मध्यवर्ग’ अथवा ‘अर्ध-अभिजन’ के स्तर से गुजरना पड़ता है.

अर्ध-अभिजन अभिजनेत्तर वर्ग से निकले होते हैं, जो अपनी शिक्षा अथवा अन्य किसी विशिष्ट योग्यता के बल पर अभिजन को प्रभावित कर, समाज में विशिष्ट स्थान बना लेते हैं. उन्हें अपने मूल वर्ग यानी अभिजनेत्तर समूहों के विकास से ज्यादा खुद को जल्दी से जल्दी अभिजन की कतार में सम्मिलित करने का उतावलापन होता है. अतः अभिजन का विश्वास जीतने के लिए वे उसे यथासंभव सहयोग प्रदान करते हैं. अभिजन वर्ग के स्थायित्व तथा उनके अबाध विकास में इन अर्ध-अभिजन सदस्यों का बहुत योगदान होता है. अभिजनेत्तर समूह से अर्ध-अभिजन अथवा अभिजन के स्तर तक उठकर पहुंचे सदस्य, कायाकल्पन की त्वरित प्रक्रिया से गुजरकर अपने मूल समूह से अलंघ्य दूरी बना लेते हैं. प्रकारांतर में वे अभिजन संस्कृति के सच्चे उपासक सिद्ध होते हैं. इस तरह ‘जन’ से ‘अभिजन’ की श्रेणी तक पहुंचे सदस्यों की प्रतिभा का लाभ उनकी श्रेणी के लोगों को नहीं पाता. परिणामस्वरूप जनसमाजों में विकास की दर अभिजन समाजों की अपेक्षा कम होती है. कई बार अभिजन समाज के सदस्य भी परिस्थितियों से टकराकर अथवा दूसरे अभिजन समूहों द्वारा बहिष्कृत होकर निम्नस्थ समूहों में खिसक जाते हैं. इस तरह चाहे-अनचाहे ‘जन’ और ‘अभिजन’ के बीच अंतरण का सिलसिला बना रहता है. अंतरण की इस सहज-स्वाभाविक प्रक्रिया में ‘जन’ और ‘अभिजन’ का अनुपात लगभग अपरिवर्तित रहता है. विल्फ्रेड परेतो अपनी पुस्तक ‘माइंड एंड सोसाइटी’ में इसे ‘दोनों स्तर, अर्थात अभिजन एवं अभिजनेत्तर व्यक्तियों के बीच संचरण’ की संज्ञा देता है. इसे वह समाज के विकास एवं स्थायित्व के लिए अत्यावश्यक मानता है. उसके अनुसार संचरण की प्रक्रिया में अवमंदन की अवस्था में समाज में विक्षोभ की संभावना बनी रहती हैं. यहां विक्षोभ का अभिप्राय समाज में परिवर्तन की उथल-पुथल से है. उससे समाज में वास्तविक परिवर्तन हों, यह आवश्यक नहीं है. इसका कारण है कि लंबे समय तक एक समान स्थितियों में रहने के कारण जनसाधारण अपनी स्थिति से अनुकूलित हो जाते हैं. वे अपना आत्मविश्वास खो देते हैं. मान लेते हैं कि वे केवल अभिजन के संरक्षण में ही सुख-समृद्धि-भरा जीवन जी सकते हैं. उस अवस्था में उन्हें परिवर्तन की संभावना से ही घबराहट होने लगती है. परिवर्तन की सामान्य प्रक्रिया में एक अभिजन समूह का स्थान दूसरा अभिजन समूह ले लेता है. परिणामस्वरूप समाज का ढांचा लगभग अपरिवर्तनीय बना रहता है. समाज में नए वर्गों के उदय एवं पुराने वर्गों के पराभव की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए परेतो लिखता है—

‘व्यक्ति के इस परिसंचार की मंदता के परिणामस्वरूप शीर्षस्थ वर्गों में विकृत तत्वों की भरमार हो सकती है. दूसरी ओर निरंतर शासित हो रहे वर्गों में श्रेष्ठतर तत्वों की वृद्धि हो सकती है. उस अवस्था में समाज में असंतोष की वृद्धि होती है और छोटा-सा आघात भी अवस्था में परिवर्तन में ला सकता है. एक देश के दूसरे देश पर प्रभुत्व अथवा आंतरिक क्रांति से भी सत्ता-शिखर पर उथल-पुथल हो सकती है, इससे जो शासक हैं, वे शासित होकर निम्नस्थ स्थिति में पहुंच सकते हैं, दूसरी और परिस्थितियों का साथ मिलने पर शासित स्वयं को शासक अभिजन के रूप में स्थापित कर सकते हैं.’ (दि सोश्लिष्ट सिस्टम, पृष्ठ 30).

कभी-कभी जनक्रांतियों के माध्यम से शीर्ष पर तीव्र बदलाव होते हैं. अवसर का लाभ उठाते हुए अभिजनेत्तर वर्गों के वास्तविक प्रतिनिधि सत्ता-शिखर पर आसीन हो जाते हैं. अपने अतीत से वे अभिजनेत्तर वर्गों से संबद्ध होते हैं. प्रायः अपने ही वर्गों का विश्वास जीतकर, उन्हें यह भरोसा दिलाते हुए कि सत्ता केंद्र पर कब्जा कर लेने के बाद वे अभिजन और अभिजनेत्तर समूहों के बीच की दूरी को पाटने का प्रयत्न करेंगे तथा सत्ता के अभिजनोन्मुखी चरित्र में आमूल बदलाव लाकर उसे जनोन्मुखी बनाएंगे—वे अपना शासकीय ‘कैरियर’ आरंभ करते हैं. किंतु जनमत के सीधे दबाव के अभाव में, शासनाधिकार प्राप्त होते ही वे अपने वचन और प्रतिबद्धताओं से पीछे हटने लगते हैं. ऐसा हमेशा उनके स्वार्थवश नहीं होता. शक्ति केंद्रों का वर्चस्वकारी माहौल और उसमें अकेला पड़ जाने का डर उन्हें परिस्थितियों से सामन्जस्य बनाने के लिए बाध्य करता है. क्योंकि वहां पहले से ही विद्यमान अभिजन सदस्य अपने हितों को लेकर एकजुट होते हैं. सत्ताकेंद्रों पर प्रतिगामी शक्तियां हावी न हों, अभिजनेत्तर समूहों के निर्वाचित सदस्य निश्चिंत होकर कार्य कर सकें, इसके लिए उनकी अपने समूह के प्रति आस्था और विश्वास जरूरी है. वैकल्पिक जनसंस्कृति के माध्यम से अभिजन वर्गों की मनमानी पर अंकुश लगाया जा सकता है. ऐसी संस्कृति जो न केवल अभिजन संस्कृति के दबावों से सर्वथा मुक्त रहे, बल्कि स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता एवं लोकतंत्र को अनुकूल विस्तार दे सके. ऊपर से इतनी गत्यात्मक भी हो कि समकालीन परिवर्तनों, ज्ञान-विज्ञान संबंधी अधुनातन खोजों, रीति-रिवाजों, परंपराओं तथा लोकेषणाओं को आत्मसात कर उनका लाभ उठा सके. यह कार्य वर्तमान आभासी लोकतंत्र को वास्तविक जनतंत्र में बदलने तथा अभिजनेत्तर समूहों के जनशक्ति के सामर्थ्य से परचाने पर संभव है.

इस अनुच्छेद में हम समावेशी आधुनिकता की अवधारणा पर विचार करेंगे. आधुनिकता नवीनतम ज्ञान, विचार-शैलियों, उत्पादन पद्धतियों को अपनाते हुए निरंतर विकासमान रहने अथवा दिखने की अवस्था है. यह जीवन की गतिशीलता का पर्याय होती है. यह दर्शाती है कि प्राकृतिक रूप से उपलब्ध संसाधनों का शोधन-परिशोधन कर मनुष्य ने उन्हें अपने सुख-स्वार्थ के अनुरूप किस स्तर तक परिवर्तित, परिमार्जित किया है. यह जरूरी नहीं कि संसाधनों के शोधन-परिशोधन का लाभ समाज के सभी वर्गों को समानरूप से प्राप्त हो, किंतु लाभ की मात्र से ही आधुनिकता की कसौटी तय होती है. तदनुसार जो व्यक्ति वैज्ञानिक-तकनीकी आविष्कारों का जितना अधिक लाभ अपने स्वार्थ के लिए उठाता है, वह उतना ही आधुनिक मान लिया जाता है. आधुनिकता सामान्यतः दो प्रकार की हो सकती है. पहली विचारगत, दूसरी परिवेशगत. विचारगत आधुनिकता में नवीनतम ज्ञान तथा उसके अनुप्रयोग को सम्मिलित किया जा सकता है. उसका दायरा बड़ा होता है. विचारगत आधुनिकता व्यक्ति के विवेक, अनुभव, शिक्षा-दीक्षा तथा अन्यान्य स्थितियों पर निर्भर करती है. विचारगत आधुनिकता का दायरा विस्तृत होता है. आवश्यक नहीं कि अभिजन जिसके पास संसाधनों का प्राचुर्य है वह वैचारिक रूप से भी आधुनिक हो. कई बार तो संसाधनों का प्राचुर्य ही अभिजन को ज्ञानार्जन की ललक से दूर ले जाता है. पुराने नवाब, जमींदार, सामंत आदि पढ़ने-लिखने या ज्ञानार्जन की दूसरी गतिविधियों में स्वयं हिस्सा लेने से इसलिए बचते थे, क्योंकि वे मानते थे कि ज्ञानार्जन उनके मातहत वजीर, मंत्री, महामंत्री आदि का धर्म है, जिन्हें वे अपनी हैसियत के अनुसार आसानी से जुटा सकते हैं. वे मानते हैं कि केवल राज करने के लिए बने हैं और उनका यह अधिकार ही उनका गुण है. अपनी वेशभूषा, रहन-सहन आदि में आधुनिक दिखने वाले बहुत से लोग असल जीवन में बेहद कर्मकांडी, रूढ़िवादी और वैचारिक स्तर पर अत्यंत पिछड़े हो सकते हैं. इसके बावजूद विचारगत आधुनिकता यानी ज्ञानानुभव के आधुनिकतम साधनों का सर्वाधिक लाभ अभिजन समूह को प्राप्त होता है. क्योंकि अपने समय के ख्यात बुद्धिजीवी एवं दक्ष पेशेवर निहित स्वार्थ के लिए अभिजन की सेवा के लिए सहर्ष खिंचे चले आते हैं. अभिजनेत्तर समूहों के इन बुद्धिजीवियों की कोशिश अपने समूह के समग्र विकास हेतु आमूल परिवर्तन के बजाय येन-केन-प्रकारेण स्वयं को अभिजन अथवा अर्ध-अभिजन समूह में शामिल कर लेने की होती है. अभिजन शक्तियों की निकटता प्राप्त करने के लालच में वे जनसाधारण के हितों से समझौते करने लगते हैं. अवसर आने पर वे अपने ही वर्ग के बुद्धिजीवियों से स्पर्धा करने में पीछे नहीं रहते. शीर्षस्थ शक्तियों वे आर्थिक, राजनीतिक अथवा धार्मिक चाहे जो हों—की सफलता का रहस्य भी यही होता है कि अपने-अपने मकसद को लेकर वे ऊपर से चाहे जितनी भिन्न और परस्पर असंगत नजर आती हों, भीतर से पूर्णतः एकजुट तथा लक्ष्योन्मुखी होती हैं.

दूसरी ओर अभिजनेत्तर समाज अपनी शिक्षा, तकनीकी कौशल, धर्म, जाति आदि को लेकर छोटे-छोटे अनेक टुकड़ों में बंटा होता है. उदाहरण के लिए एक धर्माचार्य अपने धर्म के समर्थन में विधर्मी आचार्य की आलोचना करेगा, उसके धर्म और मान्यताओं में मीन-मेख निकालेगा. दोनों अपने विचारों के अनुसार समाज को अलग-अलग समूहों में बांटकर परस्पर प्रतिद्वंद्वी नजर आएंगे. उनपर विश्वास करके बहुसंख्यक वर्ग की कुल शक्तियां छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटकर प्रभावहीन हो जाती हैं. दूसरी ओर शिखर पर विराजमान धर्माचार्यों में उन्हीं मुद्दों को लेकर एक-दूसरे से न झगड़ने, सहयोगी रवैया अपनाए रखने तथा एक-दूसरे के अस्तित्व को समर्थन देने का आश्चर्यजनक और अप्रत्याशित समझौता होता है. यही बात राजनीतिक, आर्थिक शक्तियों के बारे में कही जा सकती है. बाजार कब्जाने के लिए दो उद्योगपति आपस में गलाकाट स्पर्धा करते नजर आते हैं. विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च कर वे उपभोक्ता के दिलोदिमाग पर छाने की हर-संभव कोशिश भी करते हैं. दोनों ही बार-बार यह दावा करते हैं कि उन्होंने उपभोक्ता के हितों तथा जरूरतों का ध्यान रखा है. लेकिन उनमें से एक भी न तो उपभोक्ता तक सस्ती वस्तु पहुंचाने के लिए अपने मुनाफे में कटौती करता है, न ही पूंजीगत लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ से संतुष्ट हो जाने का आश्वासन देता है. दोनों उपभोक्ता हितों के संरक्षक होने का दावा करते हुए लाभ को अधिकार मानकर उत्पादन गतिविधि में हिस्सा लेते हैं. अभिजन उत्पादक समूहों की ये चालाकियां उपभोक्ता आमतौर पर समझता है. इसके बावजूद संगठन अथवा सार्थक प्रतिरोध के तरीकों से अनजान होने के कारण वह चुपचाप सहता जाता है. परिर्वतनकामी आंदोलनों की सफलता अभिजनेत्तर समूहों की एकता पर निर्भर करती है. उसके लिए वर्गीय हितों की पहचान कर उनके बीच सामंजस्य बनाए रखना जरूरी है. इसके लिए उन्हें बौद्धिक समर्थन की आवश्यकता पड़ती है. दूसरे शब्दों में वैकल्पिक संस्कृति अथवा जनसंस्कृति की नींव ऐसी आधुनिकता पर निर्भर करती है, जो अभिजनेत्तर वर्गों को हितों की एकता तथा उनके लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देती हो.

परिवेशगत आधुनिकता, आधुनिकता का प्रदर्शनकारी रूप है. उसमें नवीनतम ज्ञान, उत्पादन पद्धतियों तथा प्रौद्योगिकीय लाभों को सम्मिलित किया जा सकता है. यह अभिजन वर्ग के जीवन-स्तर, रुचियों, आपसी व्यवहार, सामाजिक, लाभाकांक्षा आदि से प्रकट होती है. अपनी त्वरा और सफलता के लिए यह भी आधुनिक ज्ञान पर निर्भर होती है. अतः इसकी निरंतरता को बनाए रखने के लिए अभिजन सदैव ज्ञान के नवीनतम स्रोतों की तलाश में रहते हैं. नया ज्ञान जहां भी, जैसे भी मिले, उसको अपने स्वार्थानुरूप प्रयुक्त करना—इसी पर उनकी सफलता निर्भर करती है. जनसाधारण के पिछड़ेपन का यह भी कारण है कि वह ज्ञान के आधुनिकतम प्रकल्पों का अपने वर्गीय हितों के अनुरूप इस्तेमाल करने में अक्षम होता है. इसलिए नहीं कि उसमें प्रतिभा की कमी होती है, बल्कि जैसा ऊपर भी संकेत किया गया है, अभिजन जो कार्य संपादित करता है, अथवा अपनी व्यावसायिक सफलता हेतु योजना-निर्माण से लेकर लार्भाजन तक वह जितने भी कार्यक्रम संचालित करता है, सभी के लिए आवश्यक प्रतिभाएं जनसामान्य के बीच से ही उभरती हैं. अभिजनेत्तर समूहों की कमी होती है कि वे अपने ज्ञान और अनुभव का अपने हितों के अनुरूप उपयोग करने से कतराते हैं. इसके प्रमुख कारणों में से एक संसाधनों की कमी भी है. अन्य कारण है आत्मविश्वास की कमी, जो निरंतर शासित होने, दमन और उत्पीड़न को सहते जाने, गरीबी, बेरोजगारी, संगठन की कमी तथा आपसी अविश्वास के चलते पैदा होता है. संसाधनों की कमी तथा संकट की स्थिति में मदद की अनिश्चितता अभिजनेत्तर वर्गों को खतरा उठाने से रोकती है. परिणामस्वरूप वह अपनी स्थिति से समझौता करने में ही अपनी भलाई समझने लगता है. वर्ग चेतना का अभाव भी अभिजनेत्तर समूहों की एकता में बाधा बनता है. जबकि संगठन एवं ठोस विचार-दृष्टि द्वारा संसाधनों की कमी को काफी हद तक दूर किया जा सकता है. उनीसवीं शताब्दी के मध्य में लंदन के रोशडेल कस्बे के 28 गरीब बुनकरों का उदाहरण हमारे सामने है. उन्होंने अपने उपभोक्ता भंडार की शुरुआत मात्र 28 पाउंड की पूंजी से की थी. गरीब बुनकरों को सदस्यता राशि के रूप में एक पाउंड जुटाने के लिए भी दो से तीन महीने तक अतिरिक्त श्रम करना पड़ा था. उसके बाद अपनी सामूहिक निष्ठा, संगठन सामर्थ्य और संकल्प के बल पर उन्होंने उपभोक्ता भंडार सहित अनेक सहयोगाधारित उद्यमों की शुरुआत कर बेमिसाल कामयाबी प्राप्त की. फलस्वरूप वे दुनिया-भर के सहकार-प्रेमियों की प्रेरणा बने. उनकी सफलता अधिलाभ की संकल्पना; यानी मौद्रिक लाभ के स्थान पर सामाजिक लाभ को वरीयता देने पर निर्भर थी. ऐसा नहीं है कि रोशडेल पार्यनियर्स के उन सदस्यों को उपभोक्ता भंडार से कोई आर्थिक लाभ नहीं पहुंचा था. समिति के सदस्यों ने अपनी सदस्यता राशि से कई गुना मौद्रिक लाभ अर्जित किया था, किंतु सहकारी उपभोक्ता भंडार के माध्यम से लाभार्जन उनका ध्येय नहीं था, उनका मकसद गरीब बुनकरों, मजदूरों को बड़े दुकानदारों, पूंजीपतियों की मनमानी से छुटकारा दिलाना था, जो मिलावटी सामान को मनमाने दामों पर बेचते थे. उनकी सफलता से एक नए विचार की स्थापना हुई, जिसके अनुसार संगठन के दम पर वड़ी से वड़ी सत्ता को न केवल चुनौती दी जा सकती है, बल्कि उसको अपने हितों के अनुरूप बदला भी जा सकता है. इसके साथ-साथ सहकार संस्कृति को बल मिला जो प्राचीनतम समाजों की विशेषता थी, मगर कालांतर में साम्राज्यवाद, सामंतवाद और पूंजीवाद के वर्चस्वकारी दौर में यह नेपथ्य की ओर खिसकती गई.

दरअसल इतिहास में ऐसे अवसर बहुत कम आते हैं, जब परिवर्तन की इच्छा को उत्सुक समाज के असंतुष्ट वर्ग अपनी दुर्दशा के कारणों को जानने को उत्सुक हो जाते हैं. इस कोशिश में वे परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझने तथा उनका लाभ उठाने की कोशिश करते हैं. उस समय यदि सही नेतृत्व एवं परिवर्तनकामी विचारधारा का साथ मिले तो वे अपने हितानुकूल परिवर्तन लाने में कामयाब भी होते हैं. फ्रांस, रूस, चीन, क्यूबा, वियतनाम आदि देशों की जनक्रांतियां इसी जागरण का सुफल थीं. जनक्रांतियों की सफलता क्रांति के आवेग, नेतृत्व कुशलता, जनसमर्थन तथा तत्कालीन परिस्थितियों पर निर्भर करती है. किंतु क्रांति के बाद आए बदलावों को दीर्घकालिक और जनोन्मुखी बनाए रखना, पूरी तरह अभिजनेत्तर समूहों की बौद्धिक सक्रियता, एकता, क्रांति के लक्ष्य के प्रति निष्ठा तथा नेतृत्वकारी शक्तियों की सदेच्छाओं पर निर्भर करता है. उसके अभाव में क्रांति का प्रभाव धुंधला पड़ने लगता है. उसके फलस्वरूप सत्ता में आए लोग अभिजन समूहों में ढलने लगते हैं. इस बीच अभिजन भी शांत नहीं बैठता. क्रांति की संभावना को टालने के लिए शीर्षस्थ अभिजन योजनाबद्ध तरीके से काम लेते हैं. वे धर्म, मीडिया, राजनीति, शासन-प्रशासन सहित खरीदे गए बुद्धिजीवियों के सभी वैध-अवैध तरीकों का उपयोग करते हैं. जनसामान्य के हितों का सामान्यीकरण कर उसको एकजुट करने के बजाय वे उसे छोटे-छोटे अनगिनत समूहों में बांट देते हैं. उससे उनकी प्रभावी शक्ति छिन्न-भिन्न हो जाती है. समान परिस्थितियों में जी रहे समूह एक हों, इस संभावना को टालने के लिए अभिजन उनके बीच हितों की स्पर्धा पैदा करने का दुष्चक्र चलाता है. फलस्वरूप वे समूह आपस में ही टकराने लगते हैं. उसका सीधा असर उनके आत्मविश्वास पर पड़ता है. इसके चलते वे अपने विकास के लिए स्वतंत्र निर्णय लेने अथवा समान परिस्थितियों में रह रहे अपने ही जैसे लोगों के साथ मिलकर समाधान हेतु संगठित प्रयास करने के बजाय सरकार अथवा समाज के शिखरस्थ वर्गों से मदद की उम्मीद करने लगता है. इस प्रवृत्ति को स्थायी रूप देने, व्यक्ति का स्वभाव बनाकर स्थितियों से अनुकूलन कराने में पूंजीवाद-पोषित-संरक्षित मीडिया का भी बड़ा योगदान होता है. किंचित विषयांतर का खतरा उठाते हुए, मीडिया के अभिजनोन्मुखी चरित्र की चर्चा, अभिजनेत्तर समूहों की चौतरफा जकड़बंदी को समझने के लिए जरूरी है.

उनीस सौ पचास-साठ के दशकों को याद करने की याद करने की कोशिश करें. पूरा देश आजादी के पश्चात देश के नवनिर्माण में जुटा था. गांधी के अधूरे सपनों को पूरा करने की आस लेकर विनोबा भूदान यात्रा पर निकल चुके थे. लोग उनकी बातों से प्रभावित होकर खुले दिल से भूदान आंदोलन को सफल बनाने में जुटे थे. भूदान की भावना घनीभूत होते-होते ‘ग्रामदान’ तक व्यापक हो चुकी थीं. मात्र एक दशक की यात्रा में विनोबा चालीस लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि भूमिहीनों के लिए जुटा चुके थे. यह पूरी दुनिया में किसी भी अहिंसक प्रयास के माध्यम से किया गया, अब तक सबसे बड़ा भू-अंतरण था. लेकिन गांव में सभी के पास तो जमीन न थी. विनोबा के आवाह्न पर यदि भू-स्वामी भूमिहीनों की सहायता के लिए आगे आ रहे थे, तो भूमिहीनों की भी इच्छा थी कि वह अपने गांव-ज्वार के विकास में अपना योगदान दे सकें. गरीब मजदूर, भूमिहीन किसान, जिनके पास उनकी एकमात्र पूंजी उनका श्रम था, अभी तक दूसरों के कहने पर पसीना बहाते आए थे. ऐसे लोगों का गांव के विकास के लिए स्वैच्छिक योगदान क्या हो? इसी से श्रमदान का विचार सामने आया. फिर क्या था, भूदान, ग्रामदान के साथ श्रमदान की लहर भी उठने लगी. इनमें श्रमदान सवार्धिक सुलभ था. इसलिए मेहनतकश लोग श्रमदान को निकल पड़े. धीरे-धीरे उनके साथ गांव के दूसरे स्त्री-पुरुष भी सम्मिलित होते गए. कालांतर में स्कूल के विद्यार्थियों को भी उससे जोड़ दिया, ताकि उनमें सामुदायिकता की भावना बलवती हो. यह कार्य गांवों में सातवें-आठवें दशक तक चलता रहा. मुझे याद है 80 के दशक में पॉलिटेक्नीक के अंतिम वर्ष में एक पर्चा रचनात्मक कार्य का होता था. जिसमें विद्यार्थियों को अपनी संकल्प-भावना विकेंद्रीकृत विकास के संदर्भ में दर्शानी पड़ती थी. 1980 में हमारे टीम भी एक गांव में पहुंची थी. दल का उद्देश्य ग्रामीण लोगों की समस्या जानने के अलावा उनके बीच ‘श्रमदान’ का प्रचार-प्रसार करना था, ताकि छोटे-छोटे कार्यों के लिए सरकार का मुंह देखने के बजाय अपने बूते उनका समाधान खोज सकें. गांव जाने के बाद जो देखने को मिला उसने हमें चौंकने को मजबूर कर दिया. जिस ‘श्रमदान’ के संदेश को हम ग्रामीणों तक पहुंचाना चाहते थे, गांववाले उससे भलीभांति परिचित थे, गांव में एक नाला श्रमदान के अंतर्गत परस्पर सहयोग के आधार पर बनाया जा रहा था. यह वह दौर था जब लोगों के मनोमस्तिष्क पर स्वाधीनता संग्राम के नैतिकतावादी आंदोलन का असर था और उसके आधार पर एक सहयोगात्मक, एक-दूसरे पर भरोसे का सम्मान करने तथा समस्याओं के बीच से ही समाधान खोज निकालनेवाली जनसंस्कृति पनप चुकी थी. कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दलों में अभिजन चरित्रों की भरमार थी, इसके बावजूद अभिजनेत्तर वर्गों का उनमें भरोसा था. लोग अपने नेता के आवाह्न पर कुछ भी त्याग करने को तैयार थे. गांधी और विनोबा को मिली अप्रत्याशित सफलता का रहस्य भी यही था कि दोनों ने अपने अभिजात्य चरित्र का परित्याग कर अभिजनेत्तर समूह के रहन-सहन और साधारण जीवन-शैली को अपनाया था. फलस्वरूप अभिजन और अभिजनेत्तर समूहों के बीच की दूरियां घटी थीं. जनता का आत्मविश्वास वापस लौटा था. जो लोग कभी ‘कोऊ नृप होय हमें का हानि’ कहकर राजनीति से मुंह मोड़ लिया करते थे, वे निहत्थे ही दुनिया की महाशक्ति कहलाने वाले अंगे्रजों को ललकारने लगे थे.

उन दिनों समाचारपत्रों में भी देश समाज को अलग-अलग खंडों में बांटकर देखने की परंपरा न थी. उनके पूरे देश में एक अथवा अधिक से अधिक प्रांतवार संस्करण होते थे. मगर नव्वे के दशक में नई अर्थनीतियों के लागू होने के पश्चात उनका तेजी से स्थानीयकरण हुआ था. स्थानीयता पर जोर देते हुए एक शहर के कई-कई परिशिष्ट निकलने लगे. एक क्षेत्र की समस्या तथा उसके विरोध में चल रही हलचलों के बारे में दूसरे क्षेत्र के नागरिकों को भी जानकारी हो, यह अब अनिवार्य नहीं रह गया था. समाचारपत्रों द्वारा यह कार्य स्थानीय समस्याओं को प्रशासन की नजर में लाने के नाम पर किया गया था. इसका जनता को कितना लाभ हुआ, यह तो आकलन का विषय है, लेकिन समाचारपत्र मालिकों को इससे अवश्य दुहरा लाभ पहुंचा था. एक तो स्थानीय मुद्दों पर जोर देने से नए पाठक बनाना आसान था. इससे उनकी आय में जबरदस्त तेजी आई. अखबार निकालना जो कभी मिशन हुआ करता था, उसे इस दौर में लाभकारी उद्यम के रूप में देखा जाने लगा. लोकतंत्र के चैथे स्तंभ के रूप में ख्यात पत्रकारिता उद्योग में ढलने लगी. अब उनका नियंत्रण संपादकों और पत्रकारों के हाथों से खिसककर बड़े पूंजीपतियों के हाथों में जा पहुंचा था, जिनका हित सरकार को चारों ओर से घेरकर राजनीतिक अस्थिरता बनाए रखने में था, ताकि उसके माध्यम से सरकार और उनके नेताओं को ब्लेकमेल कर सकें. दूसरा लाभ उन नेताओं को हुआ जो किसी न किसी बहाने सत्ता प्राप्त करना चाहते थे. अखबारों में प्रोपेगेंडा कर वह अपनी राजनीति को चमका सकते थे. बहरहाल, स्थानीयता के आधार पर समस्या खंड-खंड में सामने आती थी. यदि दूसरे क्षेत्र में भी वैसी ही समस्या हो, तो भी उसके समाधान के लिए पूरे समाज के एकजुट होने की संभावना कम थी. यह अल्पसंख्यक अभिजन द्वारा बहुजन अभिजनेत्तर समूहों को टुकड़ों में बांट देने की रणनीति का नतीजा था. उल्लेखनीय है कि जनता की समस्याओं की ओर सरकार का ध्यान दिलाना अनुचित न था. किंतु जलभराव, गंदगी, आपसी झगड़े, गुटबंदी, जातिगत भेदभाव आदि कुछ ऐसी समस्याएं हैं जो स्थानीय लोगों द्वारा बिना किसी बाहरी सहायता के, निजी संसाधनों, सहयोग आदि के आधार पर आसानी से दूर की जा सकती हैं. चूंकि संगठन-शक्ति का बोध जनसाधारण को आत्मविश्वास से भर देता है. प्रकारांतर में वह बड़े प्रतिरोधों की संभावनाओं को जन्म दे सकता है. यह डर अभिजन ताकतों को था. इसलिए उन्हीं के इशारे पर शीर्षस्थ ताकतों द्वारा समाचारपत्रों के माध्यम से अभिजनेत्तर समूहों को बांट देने की रणनीति सफल हुई. लोग उनके बहकावे में आकर स्थानीय समस्याओं का समाधान स्वयं तलाशने के बजाय उनके समाधान के लिए सरकार का मुंह ताकने लगे. अब एक जैसी समस्याओं के बावजूद उनके लिए सरकार के आगे फरियाद करने वाले अलग-अलग थे. इससे हितों की स्पर्धा तथा आपसी अविश्वास को बढ़ावा मिला. अपने ही समूहों पर संदेह करने की प्रवृत्ति बढ़ी, साथ ही संगठित प्रतिरोध की भावना उत्तरोत्तर कमजोर पड़ती गई. उन गांवों में भी जहां सामुदायिक भावना प्रबल थी, लोगों ने भूदान, श्रमदान जैसे जनांदोलनों में आगे बढ़कर सहर्ष हिस्सेदारी की थी, जो अपनी समस्याओं का समाधान मिल-जुलकर सामुदायिक भावना के साथ खोज लिया करते थे. खेतों की बुवाई, कटाई से लेकर त्योहारों, उत्सवों आदि में सहकार-भाव के प्रदर्शन से बड़े-बड़े कार्य अपने बूते साध लेते थे, वे भी छोटी और मामूली समस्याओं के समाधान हेतु सरकार की ओर देखने लगे. अखबार सहित बाकी संचार माध्यमों का दायित्व समाज में अच्छे विचारों की खेती करना भी था. लेकिन लोगों को उनके कर्तव्य की याद दिलाने के बजाय वे मामूली समस्याओं के लिए भी सरकार पर निर्भर होने तथा उसपर दबाव बनाए रखने को उकसाने लगते हैं. इसके पीछे पूजीपतियों की मंशा थी कि सरकार कमजोर और ढुलमुल नजर आए, ताकि उसकी अनमनस्यकता लाभ उठाकर उससे अपने स्वार्थानुकूल कानून बनवा सकें. आशय है कि जनसाधारण जिसे सहज-स्वाभाविक मान लेता है, वह सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. उसे बनाए रखने के लिए वैसे ही सुविचारित, सुव्यवस्थित प्रबंध अभिजन वर्ग की ओर से किए जाते हैं, ताकि बहुसंख्यक अभिजनेत्तर वर्गों के श्रम-कौशल तथा प्राकृतिक संसाधनों पर अभिजन वर्ग का एकाधिकार बना रहे तथा उसे कम से कम चुनौतियां मिलें.

इन धूर्त्तताओं के बावजूद अल्पसंख्यक अभिजन सत्ताकेंद्र पर छाया रहता है तो इसलिए नहीं कि बहुजन में नेतृत्व का अभाव होता है. नेतृत्व तो वह किसी न किसी रूप में करता ही रहता है. असल में खुद को वड़ी जिम्मेदारी के अयोग्य मानकर पीछे हटने लगता है. अपने भीतर छिपी प्रतिभा को परिष्करण का अवसर ही नहीं देता. वह अपने भविष्य के प्रति असावधान हो, नेतृत्व का दायित्व उस वर्ग को सौंप देता है, जिसकी निगाह में उसका मूल्य एक श्रम-इकाई अथवा उपभोक्ता से अधिक नहीं है. ज्ञान की परंपरा से कटकर या काट दिए जाने पर अभिजनेत्तर समूह अभिजन के हाथों का औजार बनकर रह जाते हैं. जिसका राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक अभिजन अपनी-अपनी तरह से दुरुपयोग करते हैं. धार्मिक अभिजन उसकी समस्याओं के समाधान हेतु दैवी-कृपा को अपरिहार्य बताकर समस्या के मूल कारणों से उसका ध्यान हटा देते हैं. आर्थिक अभिजन की दृष्टि में उसकी हैसियत एक श्रम-इकाई या उपभोक्ता की होती है. जबकि राजनीतिक अभिजन उसे खुद को सत्ता-शिखर तक पहुंचाने वाली सीढ़ी के एक पायदान से ज्यादा महत्त्व नहीं देते. उनकी निगाह शिखर की ओर होती है. जैसे ही एक पायदान चढ़ता है, छूट गए पायदानों को बिसरा देता है. सामाजिक अभिजन उसके समक्ष बार-बार संस्कृति तथा परंपरा का राग अलापते हैं. धर्म, संस्कृति, परंपरा, संस्कार आदि की प्राचीनता का हवाला देते हुए, वे उससे अनुकूलन की जिम्मेदारी निभाते हैं; और इस तरह समाज में यथास्थिति बनाए रखने में मददगार सिद्ध होते हैं. विडंबना है कि लोकतंत्र में भी, जिसे ‘जनता पर, जनता द्वारा जनता के लिए शासन’ जैसा गरिमामय पद दिया जाता है, कोई खास सुधार नहीं हो पाता. लोकतंत्र यह कमजोरी ऐसी भी नहीं है, जिसके बारे में पहले से सोचा न गया हो. प्लेटो के जमाने से लेकर आज तक जनप्रतिनिधियों का विचलन बुद्धिजीवियों को उसके सार्थक विकल्प की खोज के लिए प्रेरित करता आया है. लोकतंत्र की यह कमी संभवतः उसकी मूल अवधारणा में ही निहित है. लोक एक अमूर्त्तन संकल्पना है. समाज की भांति वह भी नियमों, विधानों का समुच्चय है. उसमें एक बार चुन लेने के पश्चात जनता का अपने प्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली पर नियंत्रण नहीं रह जाता. निर्वाचन के समय जनता बहुमत में होती है. किंतु उस प्रक्रिया के गुजर जाने के बाद मतदाता अल्पसंख्यक बन जाता है तथा निर्वाचित प्रतिनिधि दूसरे जनप्रतिनिधियों तथा अन्य शिखरस्थ शक्तियों के साथ मिलकर बहुमत का रूप ले लेते हैं. वे यदि किसी के प्रति जवाबदेही महसूस करते भी हैं, तो उन संस्थाओं के प्रति जिन्हें प्रत्यक्षतः अथवा परोक्ष रूप में विधायिका ने गढ़ा था. ऐसी अवस्था में कर्तव्यच्युत जनप्रतिनिधि को दोषी ठहरा पाना आसान नहीं होता. अतएव जिस ध्येय के लिए सरकार का गठन किया गया था, वह अधूरा रह जाता है. कह सकते हैं कि सामाजिक न्याय की उम्मीद में जनसाधारण जिन संस्थाओं का चयन करता है, वे पर्याप्त निगरानी व्यवस्था के अभाव में वर्गीय हितों के पोषक-संवर्धक होकर रह जाती हैं. ऐसी व्यवस्था जिसमें सरकार बनाने वाली जनता को शासन के आगे दोयम दर्जे का समझा जाता हो, लोकतांत्रिक हो जी नहीं सकती. सुकरात, प्लेटो, अरस्तु से लेकर मार्क्स, प्रूधों, परेतो तक सभी ने ऐसे लोकतंत्र की कटु आलोचना की है. परेतो ने तो उसे ‘फ्राड’ तक कहा है. जाहिर है, केवल लोकतंत्र सत्ता के चरित्र में परिवर्तन का एकमात्र विकल्प नहीं है. सत्ता के अधिकतम मानवीकरण हेतु लोकतंत्र को जनतंत्र में बदलना होगा, ताकि उसपर नागरिक संस्थाओं का प्रत्यक्ष नियंत्रण संभव हो सके. इसके लिए जनसंस्कृति के दायरे में विस्तार अपरिहार्य है. उसके दायरे में अभी तक सामाजिक लोकाचार, परंपरा, कला-साहित्य, रीति-रिवाज, मानवीय संबंध आदि आते हैं.

अभिजन प्रायः लोकलुभावन नारों और वायदों के साथ सत्ता में आते हैं. अभिजनेत्तर समूहों को विश्वास दिलाते हैं कि वे उनके सबसे बड़े और कदाचित एकमात्र हितैषी हैं. दर्शाते हैं कि उनकी छत्रछाया में वह अपने विकास की ओर से निश्चिंत हो सकता है. नेता जनसेवक होने का दावा करता है. संसद में प्रवेश करते समय वह प्रतिज्ञा करता है कि वह जनकल्याण के प्रति सत्यनिष्ठ भाव से कार्य करेगा. व्यापारी इस मामले में कुछ ज्यादा साफ होता है. वह अकसर कह देता है कि उसका सारा व्यापारिक लाव-लश्कर मुनाफे के लिए है. साथ में वह यह भी दावा करता है कि उसका मुनाफा बाकी समाज के भी हित में है. मगर वह कभी जाहिर नहीं होने देता कि उसका मुनाफा जिसे वह अपना अधिकार बताता है, सीधे जनता की जेब से आ रहा है. अपने लाभ के सामाजिक औचित्य को सिद्ध करने के लिए वह लाभ का एक हिस्सा सार्वजनिक कार्यों में लगाता है. इससे लाभार्जन के नाम पर की जा रही लूट के प्रति जनसहमति बनाने लगती है. यही बातें दूसरे अभिजन समूहों के बारे में भी सही है. सभी प्रत्यक्ष अथवा परोक्षरूप में लोककल्याण के दावे के साथ अपने औचित्य को स्थापित करते रहते हैं, किंतु शिखर पर पहुंच जाने के बाद अपने वास्तविक उद्देश्य को बिसराकर स्वार्थसिद्धि में लिप्त हो जाते हैं. जनाक्रोश की संभावनाओं को न्यूनतम रखने के लिए वे तरह-तरह के आडंबर रचते हैं. परिणाम यह होता है कि विकास का दस प्रतिशत हिस्सा साधारणजन के हिस्से आता है तथा 90 प्रतिशत अभिजन हड़प ले जाते हैं. उदाहरण के लिए 5000 रुपये मासिक वेतन पाने वाला औसत भारतीय वर्ष में 60000 रुपये जुटा लेता है. दूसरी ओर शिखरस्थ अभिजनों की आय करोड़ों में होती है. यदि इसे एक करोड़ रुपये मासिक भी मान लिया जाए तो वर्ष भर में उसकी कुल आय 12 करोड़ रुपये होगी. अब यदि दोनों की आय में 10 प्रतिशत वृद्धि होती है तो श्रमिक को वर्ष में मात्र 6000 रुपये वर्ष अतिरिक्त प्राप्त होंगे. दूसरी ओर उसी दूर से मुनाफा बढ़ने पर अभिजन को एक करोड़ बीस लाख रुपये की अतिरिक्त आमदनी होगी. श्रमिक से सीधे 2000 गुना अधिक. महंगाई और मुद्रास्फीति से भी प्रभावित होगा. किंतु वह अपनी अतिरिक्त आय को व्यापार में निवेश कर नए लाभ के अवसरों का सृजन कर सकेगा. जबकि श्रमिक की अतिरिक्त आय मुद्रास्फीति और महंगाई की भेंट चढ़ जाएगी.

समानतामूलक विकास के लिए आवश्यक है कि अभिजनेत्तर समूह इस भ्रांति से बाहर निकलें कि वे केवल शासित होने के लिए बने हैं. कि शासक और शासित प्रकृति ने निर्धारित किए हैं तथा राष्ट्र और समाज का भला कुशल शासक या सरकार पर निर्भर होता है. ऐसा ‘कुशल शासक’, जो लोगों के विवेक के बजाय भ्रांतियों या पूर्वाग्रहों द्वारा चुना गया हो, वह केवल राज्य के साम्राज्यवादी मनसूबों को पूरा कर सकता है. विकास को आंकड़ों की कारीगरी के रूप में दर्शा सकता है. समाज में व्याप्त ऊंच-नीच को मिटाने के बजाए उसे संरक्षण दे सकता है. स्वार्थ के लिए समाज को बांट सकता है और लोगों को बीच ऐसे मुद्दों को लेकर स्पर्धा करा सकता है, जिनका उनके विकास से कोई नाता न हो. अभी तक वह यही करता आया है. समाज में शासक की उपस्थिति और उसकी सर्वोच्चता के प्रति जनस्वीकृति सामाजिक विषमता और बहुआयामी स्तरीकरण का मूल कारण है. अभिजनेत्तर समूहों की शोषण से मुक्ति तभी संभव है जब वे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सचेत हों. रूसो के अनुसार बहुजन को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह अल्पजन पर शासन करें. यानी जो सरकार बने उसके प्रति बहुजन की सहमति हो. समानता और बराबरी की राह में रूसो का यह संदेश बिसरा गया. जनांदोलनों के दबाव में लोकतंत्र को अपनाया गया, कितु वह प्रभावी हो, जनता लोकतंत्र की भावनाओं के अनुसार स्वयं को ढाल पाए उससे पहले ही जनचेतना को धर्म, जाति, संपद्राय, गोत्र और क्षेत्रीयता के छोटे-छोटे खानों में बांट दिया गया. संस्कृतिकरण के नाम पर गुरुडम परोसा गया, अध्यात्म की जगह लेने पहले धर्म आया, फिर उसकी जगह कर्मकांडों, रूढ़ियों, खोखले आदर्शों और पाखंड ने ले ली. जिंदगी की जद्दोजहद में डूबे साधारणजन के पास इस षड्यंत्र को समझने का समय ही नहीं था. जो समझते थे, वे भी किसी न किसी दबाव में आकर सहते जाने को विवश थे. जनता को नकारात्मक, प्रगति-विरोधी कार्यक्रमों में उलझाकर अभिजन अपनी स्थिति को निरंतर मजबूत करते गए.

इन हालात से बचने का एकमात्र रास्ता है—समांगीकृत विकास. लोक-संस्कृति को स्वस्थ्य, चैतन्य, आत्मनिर्भर, समानता और सद्भाव की पोषक जनसंस्कृति में बदलना. समाज को परंपरा के गैरजरूरी दबावों से बाहर लाकर उसमें न्याय, समानता, मानवाधिकार, सहयोग एवं साहचर्य जैसे आधुनिक जीवनमूल्यों की स्थापना करना. मान लेना कि प्राकृतिक संसाधनों पर प्रत्येक नागरिक का समान अधिकार है. आवश्यकता से अधिक पर किसी का, किसी भी वस्तु पर अधिकार अवैध और अनैतिक है. इसलिए जो है, जितना है, सभी उसका परस्पर भोग करें. विकास को लेकर पूरे समाज का एक सपना हो. उसके लिए सभी मिल-जुलकर प्रयत्न करें. जो समस्याएं आड़े आएं उनका मिल-बैठकर सर्वसम्मत समाधान खोजें. दूसरों से विकास की उम्मीद करते हुए सबकुछ उसके भरोसे छोड़ देंगे तो समाज के मुट्ठी-भर लोग खुद को ‘सबकुछ’ मानकर बाकी को ‘कुछ नहीं’ मानने लगेंगे. अभिजन संस्कृति का बोलबाला, ऊंच-नीच, छोटे-बड़े का बोध बना रहेगा. शिखर पर बैठे अभिजन मनमानी करते रहेंगे. कभी बौद्धिक संपदा, कभी धर्म, कभी राष्ट्रीयता तो कभी पैत्रिक-अधिकार के नाम पर वे उसकी पूरी कीमत वसूलेंगे. न्याय और कानून के नाम पर संस्थाओं का अंबार खड़ा करने से अच्छा है, समाज में न्याय की प्रतिष्ठा करना. निरंतर गतिमान जनसंस्कृति में लोगों के भरोसे को लौटाना. जनसाधारण के भीतर पैठे उस संशय और अविश्वास को समाप्त करना, जिससे वह निर्णय लेने में कतराता है. अपने जीवन की बागडोर दूसरे के हाथों में सौंपकर स्वयं नियति का दास बन जाता है. इसके लिए ऐसे समावेशी समाज का गठन करना होगा जिसमें कानून की अव्वल तो जरूरत ही नहीं पड़े. यदि कानून हों भी तो ऊपर से थोपे हुए नहीं. न ऐसे जिन्हें समझने के लिए विशेषज्ञों को दावत देनी पड़े. कानून ऐसे हों जिन्हें हर कोई आसानी से समझ सके. जिन्हें लोगों ने अपनी समझ और सुविधा से अपने समाज के भले के लिए बनाया हो. जिनका परिपालन आसान हो. जो निष्पक्ष हों और जिनमें सभी की आस्था हो. इसलिए उनसे डरने के बजाय लोग उनका पालन करने में गर्व की अनुभूति करें. ‘लोक’ की भांति ‘लोकतंत्र’ भी अमूर्त्तन है. उसमें जनता से मताधिकार पाए नेता सत्ताकेंद्र पर कब्जा जमा लेते हैं. उसके बाद वे सत्ता को अपनी बपौती मान लेते हैं. जनता का उनपर कोई दखल नहीं रह जाता. इसलिए वास्तविक न्याय के लिए ‘लोकतंत्र’ को ‘जनतंत्र’ में बदलना होगा. यह कार्य निर्वाचित प्रतिनिधियों पर छोड़ देने से संभव नहीं है. उसके लिए निचले यानी जनसाधारण के स्तर पर सक्रिय होना पड़ेगा. इस बात की पक्की व्यवस्था हो कि निर्वाचित प्रतिनिधि स्वयं को समाज के प्रति उत्तरदायी मानें. ऐसी आधुनिकता जिसमें सभी की भागीदारी हो. जो भी निर्णय लें, मिल-जुलकर लें. लिए गए फैसलों के प्रति अधिकतम की सहमति हो.

अभी तक जनता यह मानकर चलती रही है कि उसके प्रतिनिधि अपने दायित्वों के प्रति जागरूक रहकर निष्ठापूर्वक उनका पालन करेंगे. किंतु व्यवहार में उसका उल्टा हुआ है. देखा यह गया है कि जनता के प्रतिनिधि संसद में जाकर अपना कर्तव्य बिसरा देते हैं. चूंकि अधिकांश मामलों में ऐसा होता है, इसलिए माना जाना चाहिए कि जिन्हें जनता श्रेष्ठतम के नारे के साथ चुनती है, वे संसद में जाकर वैसे नहीं रह जाते. वहां जाते ही उनपर अभिजन संस्कार हावी हो जाते हैं. स्वयं को जनता का सेवक बताकर चुनकर आए लोग खुद को उसका स्वामी मानने लगते हैं. चूंकि अधिकांश मामलों में ऐसा होता है, इसलिए माना जाना चाहिए कि जिन्हें जनता श्रेष्ठतम के नारे के साथ चुनती है, वे संसद जाकर श्रेष्ठतम नहीं रह जाते. चूंकि अधिकांश मामलों में हमारे ‘श्रेष्ठतम’ साधारण या उससे भी कम, अर्थात ‘निकृष्टतम’ सिद्ध होते हैं. इसलिए जनता को समझना होगा कि श्रेष्ठतम प्रतिनिधि जैसी अवधारणा में ही खोट है. जनता को शासन का श्रेष्ठतम रूप चाहिए तो उसे स्वयं सक्रिय रहकर निगरानी की सर्वोत्तम व्यवस्था कायम करनी पड़ेगी. ताकि तयशुदा लीक से हटने की किसी जनप्रतिनिधि की हिम्मत ही न पड़े. उसे जानना होगा कि जनतंत्र की सफलता श्रेष्ठतम प्रतिनिधियों को संसद भवन तक पहुंचा देना नहीं है. निर्वाचित प्रतिनिधि श्रेष्ठतम कार्य करें, तब जनतंत्र का उद्देश्य पूरा होगा. इसलिए अपने प्रतिनिधियों से श्रेष्ठतम काम लेना भी जनता का दायित्व है. जनप्रतिनिधि का रिपोर्ट-कार्ड तैयार करने का प्रथम अधिकार उसके निर्वाचकों को होना चाहिए, न कि सांसदों को अपनी ही पीठ थपथपाने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए. इसके लिए लोगों का अपने अधिकारों को जानना, समझना तथा आवश्यकता पड़ने पर उनके लिए संघर्ष को तैयार रखना भी जरूरी है. इसे यूं भी कह सकते हैं कि ‘श्रेष्ठतम प्रतिनिधि’ एक भ्रांत अवधारणा है. केवल श्रेष्ठतम जनता ही शासन को श्रेष्ठतम स्तर तक ले जाती है.

यहां एक पेंच है. आम जनता अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम करे या शासन चलाए. किसान यदि अपना वक्त शासन-प्रशासन की देखभाल करेगा तो हल चलाने के लिए समय कैसे निकाल पाएगा! इसका उत्तर बहुत आसान है. यदि जनता इस सिद्धांत कि ‘श्रेष्ठतम जनता ही श्रेष्ठतम शासन दे सकती है’—को भली-भांति समझ लें तो फिर कोई चुनौती रह ही नहीं जाती. अभी तक जनता शासन का अधिकार दूसरों के हाथों में सौंपी आई है. सभ्यता के आरंभ से आज तक वह संघवाद, राजशाही, सामंतवाद, तानाशाही, पूंजीवाद, लोकतंत्र, जैसी व्यवस्थाओं से अनुशासित होती है. इसके बावजूद उसकी समस्याएं आज भी जस की तस हैं. बल्कि हर बार उसके चारों और घेरा कसता ही रहा है. इससे मुक्ति हेतु ऐसी जनसंस्कृति की जरूरत इस देश को है जो केवल रीति-रिवाज, परंपरा, साहित्य, कला, सामाजिक आचार-व्यवहार तक सीमित न हो. जिसमें समानता, विकास, ज्ञान-विज्ञान, राजनीति, प्रशासन जैसे नए जीवनमूल्य भी सम्मिलित हों. जिसमें परपंरा और आधुनिकता का सुंदर समावेश हो. उनमें से प्रत्येक के श्रेष्ठतम जीवनमूल्य जिसमें समाहित हों. ऐसे समाज की जरूरत है जिसमें लोग समान हितों के आधार पर एक-दूसरे से जुड़े हों तथा सम्मिलित कल्याण के लिए मिल-जुलकर काम करना जानते हों. यह ‘बिना राजा का राज’ या ‘बिना शासन के शासन’ जैसी अवधारणा है, जो नई न होकर भी वर्तमान परिस्थितियों में दूर की कौड़ी या फिर दिमागी शगल लग सकती है. इसलिए कि गत चार-पांच हजार वषों के बीच शासित होते-होते, हम अपने आपको, अपनी शक्ति और योग्यता को बिसरा चुके हैं. इतने वर्षों में हमने हर प्रकार की राज्य प्रणाली को आजमाया है. पहले कबीलाई शासन देखा, राजा आए, तदनंतर महाराजाधिराज और चक्रवर्तित्व का जमाना आया. उसके बाद बादशाहत देखी, फिर औपनिवेशिक शासन और अब लोकतंत्र. जनता को सभी ने, बार-बार छला है. इतने दबाव सहे हैं कि सिर उठाकर चलने की आदत ही छूट गई है. ऐसे में समाज में न्याय तभी संभव है, जब उसे दूसरों से मांगने की अपेक्षा जनता स्वयं समाज में उसकी प्रतिष्ठा करे. कुछ लोग इसे ‘कल्पनालोक’, ‘यूटोपिया’ यह निरा आदर्शवादी द्रष्टिकोण भी कह सकते हैं. मुझे इससे भी इन्कार नहीं है, किंतु मनुष्यता की मुक्ति का रास्ता इसी ओर से जाता है. वर्तमान परिस्थितियों में यह विकल्पहीन पथ है.

© ओमप्रकाश कश्यप

जनसंस्कृति एवं न्याय

सामान्य

धर्म एवं अभिजन संस्कृति—11

न्याय की संकल्पना इतनी नैसर्गिक और मनुष्यता की इतनी सार्वभौमिक, सार्वजनीन चाहत है कि इसका स्थान सभी कानूनों, दलों तथा धर्मों से ऊपर दिखाई पड़ता है.वाल्तेयर.

जब सभी स्वतंत्र हैं, अधिकारों के मामले में एकदूसरे के बराबर हैं, एक ही मिट्टी में जन्मे, एक ही हवापानी पाकर पले हैं, तब समाज में इतनी विषमताएं क्यों हैं? यदि एक ओर करोड़ों ‘स्वतंत्र’ नागरिक भीषण विपन्नता का जीवन जीने के लिए विवश हैं, तब दूसरी ओर कुछ सौ या हजार लोगों को धनवैभव, विलासिता और अकूत सुखसमृद्धि से भरपूर जीवन जीने का अवसर कैसे मिल जाता है? यदि सामाजिक असमानता कड़वा सच है, और निस्संदेह वह है भी, क्योंकि एकदम साफ नजर आता है, तो स्वतंत्रता और समानाधिकारिता के दावों को संद्धिग्ध होना ही चाहिए. साफ है असमानता के शिकार करोड़ों नागरिक जिसे अपनी स्वतंत्रता मानते हैं, वह दरअसल यथास्थिति में बने रहने, मूक सहते जाने और जो, जैसा, जितना दिया गया हैउसी में संतोष करने की स्वतंत्रता है. सच कहें तो आभासी स्वतंत्रता. उसका मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त असमानता को लेकर उठने वाले प्रश्नों को टालते रहना है. ताकि वर्चस्वकारी सत्ताओं के स्वार्थ और शोषणकारी चरित्र पर कम से कम सवालात हों. उससे आगे यदि वे कामना करें तो यह आधीअधूरी स्वतंत्रता भी, जिसे इससे पहले हमने आभासी स्वतंत्रता कहा है, खतरे में पड़ सकती है. वरना यह क्या हुआ कि श्रम किसी का, मूल्यांकन कोई और करे. पसीना मजदूर बहाए और मुनाफा मालिक की जेब में चला जाए. और क्या यह स्वतंत्रता और समान अधिकारिता का लक्षण है कि जमीन किसान की, फसल उसके खूनपसीने की कमाई, अनाज की बोली सरकार या व्यापारी लगाएं! यदि यही स्वतंत्रता है तो ऐसी स्वतंत्रता के बारे में सोचना भी भद्दे मजाक जैसा है. लेकिन यह भी कटु सत्य है कि असमानताग्रस्त समाजों में, जहां निर्णय ऊपर से थोपे जाते हैं, आम आदमी के हिस्से महज आभासी स्वतंत्रता ही आती है—या यूं कहो कि स्वतंत्रता का कंकाल, अथवा पुरानी किस्सागोइयों में बंद तोता, जिसकी जान किसी राक्षस अथवा चालाक जादूगरनी की मुट्ठी में होती थी. असमानताग्रस्त समाजों में व्यक्ति राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होता है. मानसिक स्तर पर दास. दासता भी इकहरी नहीं, बहुरूपी और बहुआयामी. आस्था में डूबा हुआ एक व्यक्ति मंदिर जाता है. जिस आरती को पुजारी गाता है, उसे वह घर पर सुबहशाम संपूर्ण श्रद्धा और भक्तिभाव से गाता है. जिस दुकान से पुजारी मंदिर के लिए धूपदीपनैवेद्य आदि खरीदता है, उसी से वह श्रद्धालु भी घर में अपनी आस्था को खादपानी देता है. ईश्वर के बारे में पुजारी और भक्त दोनों के विचार भी समान हैं. दोनों उसे कणकण व्यापी और अंतर्यामी बताते हैं. बावजूद इसके उस व्यक्ति का पूजाधर्म मंदिर जाए बगैर संपन्न नहीं होता. मंदिर में पुजारी उससे सीधे पूजा का अधिकार छीन लेता है. देवता और भक्त के बीच मध्यस्थ बना पुजारी मंदिर की व्यवस्था में विशेषज्ञ है. क्यों? क्या यह अधिकार भक्तों ने उसे दिया है? शायद नहीं. यदि तथाकथित ईश्वर से मुलाकात ही पूजाअर्चना का एकमात्र अभीष्ट है तो हर भक्त उससे सीधे अथवा अपने प्रियजनों के साथ मिलना चाहेगा. जरूरी नहीं है कि पुजारी उसके प्रियजनों की सूची में सम्मिलित हो. पुजारी इन कर्मकांडों जो पीढ़ीदरपीढ़ी दोहराये जाते रहे हैं, और उन नैतिकतावादी कहावतों, बातचीत आदि जिन्हें समाज में लोग आपस में एकदूसरे से अकसर करते हैं, कुछ नया नहीं कह पाता. इसके बावजूद धर्म के मामले में उसका निर्णय अंतिम माना जाता है. यह बिना किसी गुण के स्वयंस्थापित विशेषज्ञता है, जिसकी जड़ें दो से तीन हजार वर्ष पुरानी हैं.

एक अन्य व्यक्ति है. समान अधिकारिता, स्वतंत्रता और बराबरी का दावा करते हुए, न्यायकामना के साथ वह प्रतिपक्षी को न्यायालय में चुनौती देता है. अपनी समस्या, मुकदमे की स्थितियों तथा अपनी व्यथा को जितनी प्रामाणिकता के साथ वह स्वयं अभिव्यक्त कर सकता है, वह दूसरों के लिए असंभव है. लेकिन अदालत के आगे उसके अनुभव की प्रामाणिकता और अभिव्यक्ति का कोई मोल नहीं. इसके बावजूद व्यक्ति को प्रेरित, कभीकभी तो बाध्य किया जाता कि वह सीधे अपना पक्ष प्रस्तुत करने के बजाय वकील की मदद ले. वही कहेबोले जैसी सलाह उसका वकील देता है. वकील के लिए प्रत्येक मुकदमा कानून की विशिष्ट धारा होता है. वह मुकदमे से जुड़े घटनाक्रम को ज्यों का त्यों बयान नहीं करता, बल्कि कानून की विभिन्न धाराओं के भीतर अपने हितानुकूल उसकी व्याख्या करता है. चूंकि एक सैद्धांतिक व्याख्या को दूसरी सैद्धांतिक व्याख्या आसानी से काट देती है, अतएव मामला सच की सुनवाई का न होकर कानूनी बहस तक सीमित हो जाता है. कहा जा सकता है कि सच को तोड़नेमरोड़ने अथवा उसको आवरण में प्रस्तुत करने की पहली प्रेरणा स्वयं को न्याय एवं कानून के संरक्षक होने का दावा करने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों की ओर से ही प्राप्त होती है. जनसाधारण देश के कानून को जानेसमझे, ऐसी कोई कोशिश सरकार अथवा अदालत द्वारा नहीं की जाती. यह व्यक्तिहित के नाम पर व्यवस्था को वर्गीय स्वार्थों के अनुकूल बनाए रखने का षड्यंत्र है, जो विशेषज्ञ संस्कृति की नींव पुख्ता करता है. अभिजन के मामले में स्थिति दूसरी होती है. उसकी समाजार्थिक हैसियत ही ऐसी होती है कि नियमकानूनों को अपने स्वार्थ के निमित्त इस्तेमाल कर सके. वह अदालत जाता है. कृपा बटोरने के लिए वकील स्वयं दौड़े चले आते हैं. यहां तक कि घर से ही उसका शिक्षणप्रशिक्षण आरंभ कर देते हैं. इसका उदाहरण पिछले दिनों तब देखने में आया जब एक मुकदमे में अनिल अंबानी को अदालत में गवाही देने हाजिर होना पड़ा. उस समय अदालत में मौजूद पक्षविपक्ष के वकील मामले को सुसंगत ढंग से रखने के बजाय अंबानी को प्रभावित करने में लगे थे. इतना कि खिन्न होकर जज महोदय को उन्हें टोकना पड़ा. मजे की बात यह है कि अरबों डालर का व्यवसाय संभालने वाले अंबानी तथा अगले दिन उसी न्यायालय में पहुंची उनकी पत्नी को मुकदमे से संबंधित कोई तथ्य याद नहीं था. यहां तक कि उस कंपनी का नाम भी वह भुला चुके थे, जिसका उन्होंने कुछ ही वर्ष पहले स्पेक्ट्रम की खरीद के लिए गठन किया था. यह उदाहरण अकेला नहीं है. ऐसे अनेक मामले हैं जिनमें अर्थशक्ति एवं राजनीतिक हैसियत के अनुसार अदालतों को दबाव में लाने की कोशिश की जाती है. अपवादस्वरूप कुछ निर्णय ऐसे भी होते हैं जब अभिजन शक्तियों के सारे दांवपेच विफल हो जाते हैं, तथा न्याय एवं कानून को खेल समझने वाले अभिजन स्वयं उसके चंगुल में फंस जाते हैं. प्रायः यह मामले के सुर्खियों में आने के बाद ही हो पाता है. उस समय अपनी वर्चस्वकारी सत्ता को बचाए रखने के लिए अभिजन समुदाय अपने ही समूह के कुछ सदस्यों की बलि सहर्ष दे देता है. सामान्यतः उसका निर्णय जनाक्रोश की संभावनाओं को न्यूनतम कर, अपनी उच्च स्थिति को बनाए रखना होता है, जिसमें वह कामयाब भी होता है.

संस्कृतियों के द्वंद्व में विशेषज्ञ संस्कृति का जनसंस्कृति पर प्रहार हमेशा सीधा हो यह आवश्यक नहीं है. कई बार परोक्ष मार ज्यादा पीड़ाकर एवं दूरगामी प्रभाव लिए होती है. एक किसान जमीन से अपनी जरूरत की जिंस उगाना चाहता है. एकाएक वह पाता है कि जो वस्तु वह उगाना चाहता है, उसे सरकार ने राष्ट्रहित का हवाला देते हुए आयातकर से मुक्त कर चुकी है. आयातित जिंस किसान द्वारा उत्पादित जिंस से सस्ती पड़ती है. किसान यदि अब भी अपनी जिद पर अटल रहता है तो उसे अपनी बाकी जरूरतें पूरी करने में समस्या होगी. उस समय उसके पास एकमात्र विकल्प शेष बचता है कि जैसे भी हो, आयातित जिंस से काम चलाए और खेती को बाजार के हवाले कर दे. भले ही बाजार के मामलों में उसका अनुभव अपर्याप्त हो. आखिर बाजार इतना ताकतवर कैसे बन जाता है? उसके पास न तो नैतिकबल होता है न ही कानून बनाने का अधिकार. बाजार के दूसरे छोर पर ग्राहक होता है. बाजार का सारा कारोबार उसके ग्राहक के कंधों पर टिका होता है. होना तो यह चाहिए कि अपने संख्याबल के आधार पर ग्राहक स्वयं बाजार को नियंत्रित और दिशानिर्देशित करें. मगर होता इसके विपरीत है. बाजार की दिशा निर्धारित करते समय ग्राहक एकदम अलगथलग पड़ जाता है. यह हैरानी की बात है कि बाजार को उत्पादन की दिशा तय करने की प्रेरणा ग्राहकों से नहीं मिलती. यह प्रेरणा उसे अभिजन समूहों के लालच, उनकी धनसंपदा, वैभवविलास तथा स्वयं पूंजीपतियों के एकाधिकारवादी द्रष्टिकोण से मिलती है, जो कम से कम समय और न्यूनतम लागत में अधिकतम सुखसुविधाएं, पदप्रतिष्ठा और मुनाफा बटोर लेना चाहते हैं. इसके लिए वे ग्राहक का उपभोक्ताकरण करते हैं, सरकार का कारपोरेटीकरण. परिणामस्वरूप पूंजी का घोड़ा बेलगाम दौड़ने लगता है. यह तब होता है जब निर्वाचित सरकार अपने समस्त कानून लोकहित के दावे के साथ, कथित रूप से आम आदमी को कल्याण को केंद्र में रखकर बनाती है. कानून बनने के साथ ही सरकार का अभिजन वर्ग के प्रति विशेषानुराग स्पष्ट हो जाता है. सरकार के साथ होने का भरोसा पाकर सत्ताधारी अभिजन अपने संवैधानिक दायित्वों की ओर से उदासीन होने लगता है. शुरुआत नियमों और कानूनों की स्वार्थानुकूल व्याख्या करने से होती है. बाजार जिसके पास न तो नैतिक बल रहता है, न ही कानून की सत्ता. सरकार के परोक्ष समर्थन तथा प्रोत्साहन के बल पर वह लोगों की पसंदों को निर्धारित करने लगता जाता है. अपने ध्येय में सफल होने के लिए वह ज्ञानविज्ञान, कला, संस्कृति एवं संचार के समस्त उपादानों की आवश्यकतानुसार मदद लेता है. फिर अपनी बहुव्यापी पैठ के बूते राजनीति, अर्थव्यवस्था एवं कानून को भी अपने हिसाब से मोड़ने में कामयाब रहता है.

उपभोक्ता अधिकार जैसी कुछ व्यवस्थाओं द्वारा कभीकभी कानून भी बाजार की मनमानी के विरोध में उपभोक्ता के साथ खड़ा नजर आता है. उससे एक उम्मीद जगती है. किंतु पर्याप्त लोक निगरानी के अभाव में अंततः वह भी बाजार का हितचिंतक सिद्ध होता है. उपभोक्ता विवाद के दायरे में आने के पश्चात मामला सीधे उत्पादकउपभोक्ता अथवा वितरक और उपभोक्ता के बीच सिमट जाता है. इससे उपभोक्ता समूह पुनः दो हिस्सों में बंट जाता है. पहला वे जो अपने उपभोक्ता अधिकार से परिचित है और सेवा में खामी के लिए दोषी के विरुद्ध उपयुक्त न्यायालय में दावा करने का साहस जुटा पाते हैं. दूसरी ओर वे जो या तो उपभोक्ता अधिकार से अपरिचित हैं, अथवा उत्पाद में कमी को सहजतापूर्वक पचा जाते हैं. न्यायालय के ‘धक्के खाना’ उन्हें गवारा नहीं होता. तीसरा वर्ग उस उत्पाद से संतुष्ट उपभोक्ताओं का भी हो सकता है. भारत जैसे अशिक्षित समाजों में सेवा में कमी के बावजूद उपभोक्ता विवाद को न्यायालय तक ले जाने वाला वर्ग बहुत छोटा, करीबकरीब नगण्य होता है. असंतुष्ट उपभोक्ताओं के उस छोटेसे वर्ग को संतुष्ट करना, पूंजीपति वर्ग के लिए कठिन भी नहीं होता. इससे उनका न्याय की प्रतिष्ठा का दावा पुष्ठ होता है, जिससे उन्हें अपनी शाख बनाने में मदद मिलती है. दूसरी ओर सरकार इसे दो पार्टियों का विवाद बताकर बड़ी आसानी से अपना दामन बचा ले जाती है. निर्माण की खामी आने के बावजूद अदालत केवल न्यायालय में फरियाद देने वाले को राहत देकर संतुष्ट हो जाती है. ऐसे उपभोक्ताओं, जिन्होंने समान बैच का उत्पाद खरीदा था, किंतु अपनी अज्ञानता, लापरवाही, उदासीनता या किसी अन्य कारण से अदालत का दावा खटखटाने में असमर्थ रहे हैं, उन्हें राहत पहुंचाने का कोई प्रबंध अदालत अथवा सरकार द्वारा नहीं किया जाता. जबकि अदालत की भले ही न हो, राज्य की यह जिम्मेदारी है कि अपने प्रत्येक नागरिक के लिए उसकी मांग के बिना भी न्याय की व्यवस्था करे. जागरूक उपभोक्ता के लिए भी अदालत में न्याय पाना आसान नहीं होता. अपनी आर्थिक ताकत के बल पर बाजार पहले विशेषज्ञों तथा विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्तियों को अपने पक्ष में खड़ा कर लेता है. फिर उनके बूते जनसाधारण के जीवन में मनमाना हस्तक्षेप करने की ताकत भी पा लेता है.

जीवन में बाजार की घुसपैठ के और भी कई उदाहरण हैं—एक स्त्री है जो आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में घरेलू कारखाना लगाना चाहती है. वह काम शुरू करती है. सहसा उसको बताया जाता है कि जो वस्तु वह बना रही है, उसका उत्पादन क्षेत्रीय उत्पादननीति के तहत निषिद्ध है. अब उद्यमी बनने की चाहत रखने वाली स्त्री के पास एकमात्र विकल्प है. अपने हुनर को किनारे रख क्षेत्रीय उत्पादन नीति के अनुसार योजना बनाए, अथवा ऐसे उत्पादन क्षेत्र में जाकर कार्य करे, जहां उसकी अनुमति हो. तीसरा विकल्प यह भी हो सकता है कि अपना कारखाना लगाने का मोह त्यागकर किसी कारखाने में नौकरी कर ले. वहां मालिक के लाभ के लिए अपने हुनर को आजमाए. इनमें अंतिम विकल्प सबसे आसान और कम चुनौतीपूर्ण है. हालांकि उसमें शोषण की सर्वाधिक संभावनाएं हैं. यह भी जरूरी नहीं कि नौकरी करते हुए स्त्री अपनी कला और उद्यमशीलता का भलीभांति परिष्कार कर, आत्मतुष्टि हासिल कर सके. लेकिन उन सभी के लिए जो आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में अपने परिवार से, समाज और खुद से संघर्ष करतेकरते थक चुके हैं, यही अंतिम विकल्प शेष रह जाता है. विवश होकर व्यक्ति को उसी के लिए तैयार होना पड़ता है. यानी एक व्यक्ति जो आत्मनिर्भर और स्वावलंबी होने का इरादा रखता था, वह परिस्थितियों जो जानबूझकर समाज के विशिष्ट वर्गों को लाभ पहुंचाने के लिए पैदा की गई हैं, के चलते वर्चस्वकारी ताकतों के समक्ष घुटने टेकने को विवश हो जाता है. आशय है कि आम आदमी जिसे अपनी आजादी समझता है, वह उसकी आजादी नहीं होती. उसकी स्वतंत्रता बाबू की फाइलों, व्यापारी की तिजोरियों तथा नेताओं की खुदगर्जी में कैद रहती है. उसी के चलते मुट्ठीभर अभिजन बहुसंख्यक सामान्यजन को अपने स्वार्थ के अनुरूप निर्णय लेने को विवश करते रहते हैं. उसकी पसंदों को अपने स्वार्थ की दिशा मे मोड़ देते हैं. वही तय करते हैं कि सामान्य जन का निर्णय कितना उपयोगी है, कितना नहीं. या उसने जो श्रम किया है उसका क्या मोल होना चाहिए. ऐसी व्यवस्था विधि के शासन द्वारा मान्य होती है. इसी की ओट में वह अपने समर्थन में अभियान चलाने में सफल हो जाती है. यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि विधि का निर्माण मुख्यतः अभिजनों द्वारा अभिजन हितों की देखभाल के लिए किया जाता है.

लोकहित का दावा करने वाली सरकारें किस तरह अभिजन हित में काम करने लगती हैं, इसके अनेक उदाहरण हैं. एक पूंजीपति जब कारखाना लगाता है तो सरकार उसके लिए रियायतों की तिजोरी खोल देती है. सस्ती जमीन, सस्ते ऋण, करमुक्त आयातित मशीनों से लेकर वर्षों तक मिलने वाली कर छूट आदि. इसके लिए पूंजीपति भरोसा दिलाता है कि वह अमुक संख्या में रोजगार देगा. उससे राष्ट्र की सकल आय में वृद्धि होगी. निर्यात बढ़ेगा आदिआदि. नए रोजगार सृजन के आश्वासन के बाद जनता भी मान लेती है कि उससे समृद्धि का ऊपर से नीचे की ओर निस्सरण होगा. अर्थशास्त्री पूंजीवाद को आदर्श बतानेवाली ट्रिकिल डाउन थ्योरी के बहाने सरकार की हर नीतिअनीति का समर्थन करने लगते हैं. किसान जिन्होंने अपने पूर्वजों की जमीन कारखाने के लिए सौंपी थी, वे सपना देखने लगते हैं कि कारखाना चलने से उनके बच्चों को बेहतर रोजगार मिलेगा और वे बेहतर जीवन जो खेतीकिसानी की अनिश्चितता के चलते संभव नहीं था, जी सकेंगे. लेकिन जैसेजैसे समय बीतता है, पूंजीपति का असली रूप सामने आने लगता है. कारखाने में स्थिरता बनाए रखने के नाम पर सबसे पहले स्थानीय नवयुवकों की भर्ती पर पाबंदी लगा दी जाती है. दिखावटी घाटे और करचोरी का लंबा सिलसिला चलता रहता है. सरकार की मदद बटोरने के लिए नकली बैलेंस शीट बनवाई जाती है. किसानों को अनुदान, छूट, सस्ते ऋण के रूप में सहायता उपलब्ध कराने के नाम पर घाटे की बात करने वाली सरकारें पूंजीपतियों के लिए अपने खजाने और सुविधाओं के दरवाजे खोल देती है. शासनप्रशासन के समर्थन और सहयोग का भरोसा पूंजीपति को प्रोत्साहित करता है. इसी विश्वास के चलते वह अपने उत्पाद की खपत के लिए सुनियोजित कार्ययोजना बनाता है, जिसमें सबसे पहला हमला उपभोक्ता के दिमाग पर किया जाता है. जनसाधारण के पास भरणपोषण के लिए प्रायः अपना श्रमकौशल होता है. उसके मूल्यांकन के लिए भी वह दूसरों पर निर्भर करता है. रोजीरोटी की अनिश्चितता उसके आत्मविश्वास को चोट पहुंचाती है. उसे योजनाबद्ध आधार पर काम करने पर रोकती है.

बड़ा पूंजीपति दवाई का कारखाना लगाता है तो माल की खपत के लिए अस्पताल भी खुलवा देता है. वह डाक्टरों को प्रभावित कर उनसे मनचाहा काम लेता है. अपने पूंजीबल पर वह बाजार का कर्ताधर्ता और सर्वनियंता होता है. इस स्थिति में होता है कि अपने उत्पाद के दाम स्वयं निर्धारित कर सके. बाजार में हालांकि जनसाधारण के श्रमकौशल की भी पर्याप्त मांग होती है. लेकिन श्रमिक और पूंजीपति की स्पर्धा में मूलभूत अंतर होता है. पूंजीपतियों में लाभ को लेकर स्पर्धा होती है. प्रत्येक पूंजीपति अधिकतम लाभ की वांछा में दूसरे को मात देने पर तुला होता है. दूसरी ओर श्रमिक और कामगारों की स्पर्धा में सीधेसीधे उनका अस्तित्व दांव पर होता है. अपनी एकमात्र पूंजी श्रम के निवेश से श्रमिक को बस इतना मिल पाता है कि किसी प्रकार अपना और अपने परिवार का भरणपोषण कर, अगले दिन के श्रम के लिए तैयार हो सकें. अपने मुनाफे के लिए दूसरे के साथ गलाकटाऊ प्रतिस्पर्धा करने वाले उद्योगपति श्रम के मूल्यांकन को लेकर एकमत होते हैं. एकजुट होकर वे शोषण की एकसमान नीति अपनाते हैं. उनकी एकता के चलते श्रमिक को झुकना पड़ता है. मजदूरी के रूप में बंटने वाली धनराशि को मुनाफे में बदलने के लिए पूंजीपति तकनीक के स्वचालीकरण पर ज्यादा से ज्यादा खर्च करता है. विशेषज्ञ अभिजनों के सहयोग के बल पर वह कामयाब भी होता है. दूसरी ओर मजदूर और कामगार वर्ग की स्वतंत्रता पूंजीपतियों के यहां गिरवी रखी होती है. उसके लिए न्याय बगैर ‘अभिजन कृपा’ के आगे नहीं बढ़ पाता. सरकार पूंजीपति को अधिकार देती है कि वह अपने उत्पाद को दुनिया की किसी भी मंडी में बेचे. अवसर मिले तो निर्यात भी करे. निर्यात पर प्रोत्साहन सुविधाएं भी उसे सरकार की ओर से प्राप्त होती हैं. किंतु किसान को अपने उत्पाद की बिक्री के लिए सरकार की शर्तों का अनुपालन करना पड़ता है. उनका उल्लंघन अपराध की श्रेणी में आता है. दमन की ऐसी घटनाएं कभीकभी जनक्रांति की उत्प्रेरक सिद्ध होती हैं. ये जनता को विरोध का ठोस आधार प्रदान करती हैं. सभ्यताओं के इतिहास से परिचित लोग जानते हैं कि ‘जनमत के आगे घुटने टेक देना अभिजन सरकारों की विशेषता होती है.’ इसलिए वे यह भी जानते हैं एक किसान यदि सरकारी मोल पर अनाज बेचने से इन्कार कर दे तो सरकार उसकी ओर सामान्यतः ध्यान न देगी. किसी इलाके के किसान अनाज बेचने से इन्कार कर दें तो वह बगावत कही जाएगी. सरकार वहां बल प्रयोग द्वारा, राष्ट्रहित एवं कानून का हवाला देते हुए किसानों को अपनी शर्तों पर अनाज बेचने के लिए विवश कर सकती है. हालांकि यह तभी संभव है जब किसान बंटे हुए हों. उनके बीच हितों को लेकर मतभेद हों. यदि किसी एक प्रदेश या देशभर के किसान अपने हितों को देखते हुए सस्ते मोल अनाज न बेचने का निर्णय ले लें तो वह क्रांति होगी. दूसरे शब्दों में जिसे क्रांति कहते हैं, वह हितों के सामान्यीकरण और अनुचित निर्णय के आगे, चाहे वह सरकार का हो अथवा किसी और शक्तिशाली वर्ग का, न झुकने तथा उसके संगठित प्रतिरोध के रूप में सामने आती है. उसके लिए बलप्रयोग आवश्यक नहीं है. बल्कि अहिंसक क्रांतियां अधिक प्रभावकारी एवं दीर्घजीवी सिद्ध होती हैं. उनमें अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है, किंतु उनका परिणाम भी उतना ही सुदीर्घ एवं बहुआयामी होता है.

विकृत लोकतंत्रों, यानी ऐसे लोकतंत्रों में जहां सामूहिक चेतना व्यापक लोकहित के बजाय धर्म, जाति, क्षेत्र, संप्रदाय, जमीनजायदाद, बाहुबल आदि से प्रभावित होती है, सरकारें दिखावे के लिए आमजन के मताधिकार से बनती हैं. असल में वे अभिजन द्वारा, अभिजन हित के लिए बनीं, अभिजन सरकारें होती हैं. जनता की फूट और अज्ञान का लाभ उठाकर स्वार्थी तत्त्व सत्ताशिखर तक पहुंच जाते हैं. ऐसी सरकारें अपने नागरिकों के साथ पक्षपातपूर्ण ढंग से पेश आती हैं. संवैधानिक प्रक्रियाओं को उत्तरोत्तर जटिल बनाकर वे आमजन तथा सरकार के बीच की दूरी को बढ़ाती रहती हैं. परिणामस्वरूप विशेषज्ञ संस्कृति को प्रोत्साहन मिलता है. विशेषज्ञ यूं तो जनता के बीच से ही उभरकर आते हैं, किंतु विशिष्टताबोध के मारे वे स्वयं को आमजन से ऊपर समझने लगते हैं. सरकार चुनते समय जनता की अपेक्षा होती है कि निर्वाचित सदस्य उसके सामान्य सपनों को सच करने के लिए उपयुक्त कदम उठाएंगे. किंतु सरकार बनते ही निर्वाचित सदस्यों की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं. आमजन की इच्छाआकांक्षाओं को समझकर उनके लिए समुचित प्रयास करने के बजाय वे अपनी इच्छाएं समाज पर लादने लगते हैं. जनसाधारण के मनोभावों को समझने के बजाय वे उसे समझाने में ज्यादा यकीन करते हैं. इस कार्य में भी उनकी सफलता संद्धिग्ध होती है. क्योंकि अतिबौद्धिकता के दबाव में उनकी भाषा आमजन की पहुंच से दूर निकलती जाती है. उसे समझना तथा उससे लाभान्वित होना आमजन के लिए अत्यंत कठिन होता है. इस समस्या को समझकर उसका निदान करने के बजाय अभिजन सत्ताधीश, जनसाधारण की राय को ‘साधारण’ कहकर उसकी उपेक्षा करने लगते हैं. यह मान लेते हैं कि साधारण मेधा सदैव साधारण बनी रहती है. अतएव ज्ञान के नए आविष्कारों को आमजन तक तत्काल पहुंचाने तथा उसका बौद्धिक परिष्कार करने की कोई कोशिश तक नहीं की जाती.

अभिजन बुद्धिजीवियों की अति बौद्धिकता निरुद्देश्य अथवा स्वयं स्फूत्र्त नहीं होती. यह प्रकारांतर में उनकी निष्ठा के खोखलेपन को ही उजागर करती है, जो लोककल्याण की आड़ में स्वार्थसिद्धि का आयोजन रचता है. इसलिए उन विचारों की अभिव्यक्ति हेतु जिन्हें वह लोकहितकारी मानता है, ऐसी भाषा का उपयोग करता है जो जनसाधारण के अनुभव तथा शैक्षिक स्तर से काफी ऊपर की हो. आमजन के लिए ऐसी भाषा को समझना तथा असमानता एवं भेदभाव के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ना बहुत कठिन हो जाता है. नतीजन न्याय उनके लिए निरंतर जटिल होता जाता है. उन्हें गफलत में देख शीर्षस्थ अभिजन अपने विशेषाधिकारों का उपयोग सीमित स्वार्थों के लिए करने लगते हैं. राज्य के इकतरफा आचरण से उसके गठन का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. न्याय के जनसामान्य के पहुंच से दूर होते ही राज्य की समस्त उपलब्धियां, धनसंपदा और सुखसाधन शीर्ष पर विराजमान अभिजन की इजारेदारी बन जाते हैं. एक समय ऐसा भी आता है जब कामयाबी के नशे में डूबे अल्पसंख्यक अभिजन को लगता है कि आगे उसकी यात्रा निर्विघ्न है. चुनौतियां समाप्त हो चुकी हैं. जनसाधारण भी लगभग मान लेता है कि अल्पसंख्यक अभिजन की मनमानी को सहते जाना ही उसकी नियति है. इस थोपे गए नियतिवाद को धर्म निरंतर हवा देता रहता है. वह बदलाव की संभावना को मृत्योपरांत स्वर्ग की लालसा तथा ईश्वरीय कृपा में बदल देता है. वर्तमान की दुर्दशा के लिए भाग्य और पूर्वजन्मों के कर्मों को जिम्मेदार ठहराकर वह लोगों के विचारकर्म की दिशा ही मोड़ देता है. इसके बावजूद शीर्षस्थ शक्तियों के षड्यंत्र तथा उनकी स्वार्थलिप्साओं के विरोध में जनमानस के बीच थोड़ीबहुत सुगबुगाहट शुरू से ही बनी रहती है. अनुकूल परिस्थितियों में वही सार्थक विरोध का रूप ले लेती है. यह बात अलग है कि छोटेछोटे समूहों में बंटे होने के कारण उसकी आरंभिक सफलता संद्धिग्ध रहती है. विशेषरूप से वैकल्पिक जनसंस्कृति के उदय तक. वैकल्पिक जनसंस्कृति लोकचेतना के स्वतंत्र विकास की वह अवस्था है, जब व्यक्तिमात्र को अपनी स्वतंत्रता की पूर्णानुभूति होने लगती है. वह किसी भी प्रकार के बाहरी दबावों और दखल से मुक्त होता है. इस अवस्था को स्थायी बनाने के लिए वह ऐसी जीवनपद्धति विकसित कर लेता है, जो उसकी स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता, निर्भीकता और सामूहिक संपन्नता को दर्शाती है. उस अवस्था में अल्पसंख्यक अभिजन की चालांकियां उजागर हो चुकी होती हैं. चैतन्य, विवेकवान, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और संगठित जनसमाज के मनमस्तिष्क में शासक और शासित का भेद समाप्त हो जाता है.

वास्तविक बदलाव की शुरुआत राज्य के स्वार्थपूर्ण आचरण की प्रतिक्रियास्वरूप नागरिकों के मन में पनपे अविश्वास से होती है. यह लोकतंत्र की ही विडंबना है कि जिस राज्य को नागरिक अपनी मर्जी से चुनते हैं, उससे शासित बनना स्वीकार कर राज्य की अधिसत्ता को संभव बनाते हैं, कालांतर में उन्हीं को राज्य की उपस्थिति खलने लगती है. राज्य तथा नागरिकों के बीच अविश्वास पनपने से लोग आहिस्ताआहिस्ता राज्य द्वारा बनाए गए कानूनों की ओर से उदासीन होने लगते हैं. चूंकि शीर्षस्थ अभिजन जिसपर कानून बनाने और उन्हें लागू करने की सर्वाधिक जिम्मेदारी होती है, स्वयं कानून के पालन के प्रति उदासीन और लापरवाह होता है, इसलिए उसके द्वारा बनाए गए कानून शेष समाज के लिए भी कोई आदर्श रह पाते. अभिजन की देखादेखी जनसाधारण भी कामना करता है कि उसके जीवन में राज्य तथा उसके द्वारा बनाए गए कानूनों का हस्तक्षेप न्यूनतम हो. राज्य अपना काम करे, वह अपना. अपनी स्वतंत्रता को वह स्वच्छंदता की सीमा तक भोग लेना चाहता है. चाहता है कि उसपर कोई बाहरी नियंत्रण न हो. कानून का सार्थक हस्तक्षेप वह तभी चाहता है जब सरकार कोई संस्था अथवा व्यक्ति उसके अधिकारक्षेत्र पर सवाल उठाता है; तथा कानूनी या गैरकानूनी तरीके से उसके आगे समस्याएं खड़ी कर देता है. दूसरे शब्दों में जब किसी व्यक्ति को अपने अस्तित्व अथवा अधिकारक्षेत्र पर संकट दिखाई पड़ता है, तब वह अपेक्षा करता है कि कानून अपने प्रभावी हस्तक्षेप द्वारा उसे संकट से उबारने की जिम्मेदारी निभाए. कानून को लेकर यह अविश्वास या दुराव कमोबेश प्रत्येक नागरिक के मन में होता है. लोग आमतौर पर यह भी चाहते हैं कि राज्य द्वारा बनाए गए कानून भी प्रभावी हों, मगर उनके प्रति कानून बनाने वाले भी उतने ही उत्तरदायी हों, जितनी वे सामान्य नागरिकों से अपेक्षा करते हैं. किंतु जब वे देखते हैं कि समाज में अभिजन का चालचलन उसी के द्वारा स्थापित मापदंडों के विरुद्ध है, तब उनका कथित ‘कानून के राज’ से विश्वास उठने लगता है. समाज में कानून को लेकर द्वंद्व की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. लोग एक ओर जीवन में कानून का न्यूनतम हस्तक्षेप चाहते हैं. दूसरी ओर वे कामना करते हैं कि कानून इतना शक्तिशाली हो कि यदि कोई उनके हितों को नुकसान पहुंचाता है तो वह उनकी तत्काल रक्षा कर सके. आशय है कि सामान्य दिनचर्या में कानून के हस्तक्षेप को अनावश्यक मानने तथा उसको बोझ की तरह देखने वाले लोग भी अपने हितों की सुरक्षा हेतु कानून और न्याय की दुहाई देने लगते हैं. यह समाज में बढ़ते अविश्वास और चरित्र के दुहरेपन को दर्शाता है. यह तब होता है जब शीर्षस्थ शक्तियों की निर्णयप्रक्रिया पर उनके स्वार्थ हावी हो जाते हैं. परिणामस्वरूप सत्तापक्ष के प्रति आमजन का विश्वास डिगने लगता है. इसके साथ ही लोगों का ध्यान कानून के सकारात्मक पक्ष से हटकर उसके निषेधात्मक पक्ष पर केंद्रित हो जाता है, जो कानून का पालन करने के बजाय उससे बचने के लिए प्रेरित करता है. यह प्रवृत्ति राष्ट्र और समाज दोनों के प्रति उदासीनता का माहौल तैयार करती है. आम आदमी को लगता है कि शासनप्रशासन के स्तर पर उसकी समस्याएं सुनी नहीं जा रही हैं. वहीं शासनप्रशासन जनसंख्या में वृद्धि, सामाजिक अंतर्द्वंद्व, संसाधनों की कमी, अशिक्षा, उद्यमशीलता का अभाव आदि का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारियों को वापस जनसमाज पर थोपने लगते हैं. लोकतांत्रिक परिवेश का लाभ उठाकर कभीकभी जनसमाज भी आगे बढ़कर शासन में हस्तक्षेप की योजनाएं बनाता है. किंतु राजनीतिक अनुभव का अभाव, आपसी तालमेल की कमी, जीवन की मामूली सुविधाओं के लिए बड़ेबड़े संघर्ष उसे तात्कालिक जरूरतों से आगे बढ़कर सोचने का अवसर ही नहीं देते.

कभीकभी यह भी होता है कि लोकतंत्र की खूबियों का लाभ उठाकर जनसाधारण के वास्तविक प्रतिनिधि चुनकर संसद तक पहुंच जाते हैं. आरंभ में उनकी वर्गीय निष्ठाएं प्रबल होती हैं. जिस संकल्प को लेकर वे संसद तक पहुंचे हैं, उसे जल्दी से जल्दी पूरा कर लेना चाहते हैं. लेकिन उनकी आगे की यात्रा भी आसान नहीं होती. संसद में उनका सामना, अभिजन वर्ग के अनुभवसिद्ध प्रतिनिधियों से होता है. आमूल परिवर्तन के लक्ष्य, जिसके लिए उनके समाज ने उन्हें निर्वाचित किया है, को प्राप्त करने के लिए जनसाधारण के वास्तविक प्रतिनिधियों को यथास्थितिवादी अभिजात्य प्रतिनिधियों के सहयोग एवं समर्थन की अपेक्षा होती है. उल्लेखनीय है कि साधारणजन संसद के बाहर भले ही बहुमत में हो, संसद में उसके चुने हुए प्रतिनिधि अभिजात वर्ग का ही प्रतिनिधित्व करते हैं. अभिजात प्रतिनिधियों के बीच जनसाधारण के वास्तविक प्रतिनिधि अपने समूह की वांछाओं को केवल अपने बल पर पूरा करने में असमर्थ होते हैं. इस बीच संसद के अभिजात्य प्रतिनिधि जनसाधारण के सच्चे प्रतिनिधियों का अनुकूलन करने में जुटे रहते हैं. उन्हें बारबार यह एहसास दिलाया जाता है कि वे अपने वर्ग और बिरादरी को बहुत पीछे छोड़ आएहैं, अब वे विधायिका के लिए चुने गए सदस्यों की बिरादरी के सम्मानित सदस्य हैं. इसलिए उनका आचरण भी उनके पद की गरिमा के अनुकूल होना चाहिए. चूंकि शासनप्रशासन दोनों का परिवेश अभिजात मनोवृत्ति के अनुकूल होता है. अतः अकेले पड़ जाने का डर, जरूरत पड़ने पर समर्थन की लालसा जैसे कारण जनसामान्य के वास्तविक प्रतिनिधियों को उस वातावरण से तादात्म्य स्थापित करने के लिए प्रेरित करते हैं. उन्हें यह भी लगता है कि अपने समूह की आकांक्षाओं की पूर्ति संसद के बहुसंख्यक सदस्यों की अनुमति या समर्थन के बगैर असंभव है, इसलिए भी चाहेअनचाहे वह उनके करीब आने लगता है. जरूरत के समय अभिजन सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो, इसके लिए इच्छा अथवा अनिच्छा से भी, उन्हें विशुद्ध अभिजनहित के मुद्दों पर सहयोग करना पड़ता है. हालांकि उनमें से कुछ उसके अपने समूह यानी जनसाधारण के हितों के प्रतिकूल हो सकते हैं. संसद में अकेला पड़ जाने का डर, अभिजात्य प्रतिनिधियों का समर्थन प्राप्त करने की विवशता, विधायिकाओं में अल्पसंख्यक होने का एहसास, राजनीतिक अस्थिरता तथा संसाधनों पर प्रभुवर्ग के अधिकार को कानून का समर्थन—जैसे परोक्ष दबावों के बीच, जनसामान्य के प्रतिनिधि व्यवस्था में आमूल परिवर्तन को बहुत कठिन—यहां तक कि असंभव मानने लगते है. विपरीत परिस्थितियां अंततः उन्हें हताश कर देती हैं.

साफ है कि लोकप्रिय राजनीति में पहले से ही पांव जमाए अभिजनों के बीच स्थान बनाने के लिए जनसाधारण को काफी संघर्ष और समझौतों से गुजरना पड़ता है. इस जद्दोजहद से बचने के लिए संसद में पहली बार निर्वाचित होकर पहुंचे अधिकांश जनप्रतिनिधि, अभिजन सदस्यों के अनुसरण की लीक अपना लेते हैं. बदलाव की उम्मीद छोड़कर वे अपने लोगों को वैसे ही बहलाने लगते है, जैसे दूसरे प्रतिनिधि. इस बीच उनका कार्यकाल भी पूरा होने के करीब होता है. पुनः जनसमर्थन हासिल करने के लिए उन्हें नए सिरे से चुनाव में उतरना पड़ता है. चूंकि अपने पहले कार्यकाल में वे जनाकांक्षाओं पर खरा उतरने में असमर्थ रहे हैं, इसलिए अपने मतदाताओं के कटु प्रश्नों से बचने के लिए उन्हें तरहतरह से बरगलाते और बहाने बनाते हैं. धीरेधीरे वे अभिजनवर्चस्व से युक्त उस लोकप्रिय राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं, जिसके विरोध में उन्होंने अपना राजनीतिक अभियान शुरू किया था. जनता की एकीकृत शक्तियों के कमजोर पड़ने से अभिजन वर्ग को मनमानी करने का अवसर पुनः मिल जाता है. माहौल का फायदा उठाकर वह व्यापक जनसमुदाय को बांट देता है. लोगों की प्राथमिकताओं को ऐसे बदल देता है, जिसका उनके विकास से दूर तक का संबंध नहीं होता. यही नहीं, संसाधनों की कमी का बहाना बनाकर वह जनसाधारण के बीच अस्तित्व की स्पर्धा को जन्म देता है, जिससे आम आदमी अपने ही संगीसाथी को संदेह की नजर से देखने लगता है. आशय है कि जनसाधारण के मतों के आधार पर शिखर पर पहुंचने वाले जनप्रतिनिधि भी प्रकारांतर में अभिजन हितों के संरक्षक सिद्ध होते हैं. इस बीच अभिजन अधिकतम को समेटने, बाजार पर छा जाने की कोशिशों में होता है. कानून, धर्म, राजनीति तथा पूंजी के साथ गठबंधन कर वह खुद को लगातार ताकतवर बनाता रहता है. वहीं जागरूकता एवं संगठन के अभाव में जनसाधारण, जिसे रोजमर्रा की जरूरतों के लिए अपने ही वर्ग के प्रतिनिधियों से कठिन स्पर्धा करनी पड़ती है, अभिजन के मुकाबले निरंतर पिछड़ता रहता है.

प्रत्युत्तर में कहा जा सकता है कि संविधान के अनुसार तो सभी बराबर हैं. सभी को समान मताधिकार है. जनादेश के लिए देश के राष्ट्रपति और साधारण नागरिक को एक ही कतार में देखा जा सकता है. फिर कैसे मान लिया जाए कि देश में लोकतंत्र दिखावटी और तत्प्रदत्त समानता आभासी है? यह भी क्यों स्वीकारा जाए कि सरकार पक्षपात करती है तथा अभिजन सामान्यजन की समाजार्थिक दुर्दशा एवं संकटों के लिए जिम्मेदार होते हैं? अभिजनों को नेतृत्व का अवसर इसलिए दिया जाता है कि वे बुद्धिसामर्थ्य में दूसरों से आगे होते हैं और दूसरों के विकास की जिम्मेदारी उठाकर एक प्रकार से वे समाज का ही भला करते हैं. इसमें कोई संदेह नहीं कि अभिजन बुद्धिसामर्थ्य में जनसाधारण से आगे तथा व्यवहारकुशल होते हैं. कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने की उनकी क्षमता भी अधिक होती है. अतएव प्राप्त अवसरों का उपयोग करते हुए वे दूसरों से आगे निकल जाते हैं. प्रकृति में भी उत्तरजीविता का सिद्धांत चलता है. वहां जो दूसरों से बलशाली है, जो अपनी सूझबूझ से प्राकृतिक चुनौतियों का सामना अधिक कुशलतापूर्वक कर सकता है, वही दीर्घजीविता को प्राप्त होता है. इस तर्क पर विश्वास किया जाए तो अभिजन वही प्राप्त करते हैं, जिसके वह योग्य हैं. योग्यता के आधार पर वे जो अर्जित करते हैं, वह उनका अधिकार है. ऐसे तर्कों का एकाएक खंडन संभव भी नहीं है.

खास बात यह नहीं है कि अभिजन बुद्धिसामर्थ्य, व्यवहारकौशल एवं शिक्षादीक्षा के मामले में जनसाधारण से काफी आगे होते हैं और इस कारण उनका आत्मविश्वास बहुत बढ़ा हुआ होता है. खास बात यह है कि श्रेष्ठत्व का दावा करते समय वे अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता और व्यवहारकुशलता का जिक्र तक नहीं करते. अपने बौद्धिक श्रेष्ठत्व पर वे न तो स्वयं चर्चा करते हैं, न ही जनसाधारण में उसे चर्चा का विषय बनने देते हैं. बजाए इसके वे ऐसे तर्क चुनते हैं, जिससे जनसाधारण ज्ञान की शक्ति से अपरिचित बना रहे. इस काम में धर्म, राजनीति और बाजार तीनों उसके मददगार होते हैं. धर्म अभिजन की शोषणकारी नीतियों पर पर्दा डालते हुए उसकी उपलब्धियों को ‘दैवी कृपा’ की श्रेणी में ले आता है. वह जनसाधारण को समझाता है कि उसकी समस्याओं की वजह उसकी अपनी गलतियां तथा आसपास के लोगों की ईष्र्या है. राजनीति उन्हें धर्म, जाति और क्षेत्रीयता के ऐसे मुद्दों में उलझा देती है, जिसका उनके विकास से कोई संबंध नहीं होता. वह जीवन की जटिल वास्तविकता को लोकप्रियता के उपादानों तक सीमित कर देती है, परिणामस्वरूप विकास के रास्ते की वास्तविक अड़चनों की ओर उनका ध्यान ही नहीं जा पाता. बाजार की निगाह में हर व्यक्ति पहले एक उपभोक्ता होता है. उसकी दृष्टि कभी भी अपने लाभ से आगे नहीं जाती. इसके चलते अभिजन विशेषज्ञ, जिन्हें उपर्युक्त तीनों का समर्थन प्राप्त होता है, अपनी उस छलपूर्ण स्थापना को समाज में बनाए रखने में सफल हो जाते हैं, जिसके अनुसार अपने जीवन की विसंगतियों, दुखों और अभावों के लिए आम आदमी को स्वयं जिम्मेदार माना जाता है. इससे जनसमूह के भीतर अविश्वास को बल मिलता है. दूसरे उनके भीतर चल रही अस्तित्व की स्पर्धा स्वाभाविक मान ली जाती है.

अपनी वर्गीय श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए अभिजन वर्ग द्वारा गढ़े गए तर्क प्रायः सुनने में बहुत सुंदर और तर्कसंगत प्रतीत होते हैं. ऐसे ही तर्कों के आधार पर शीर्षस्थ शक्तियां समाजीकरण का मूल रही, सहयोग की सहस्राब्दियों पुरानी भावना को स्पर्धा में बदलने में सफल हो जाती हैं. जैसे मजदूरी के संबंध में पूंजीवादी अभिजन का सामान्य तर्क, कानूनी रूप से मान्य, ‘अतिरिक्त कार्य के लिए अतिरिक्त मजदूरी’ के सिद्धांत पर टिका होता है—‘‘मान लीजिए दो मजदूरों को एक ट्रक पर कुछ बंडल चढ़ाने के लिए काम पर लगाया जाता है. मजदूरी तय कर दी जाती है—दस रुपये प्रति बंडल. अब एक मजदूर यदि बारह बंडल चढ़ा पाता है, जबकि दूसरा उतनी ही देर में पंद्रह बंडल चढ़ाने में सफल हो जाता है. ‘अतिरिक्त कार्य के लिए अतिरिक्त मजदूरी’ के सिद्धांत के अनुसार तो पंद्रह बंडल चढ़ाने श्रमिक को अधिक मजदूरी मिलनी ही चाहिए. श्रमकानूनी में भी यही वैध माना जाएगा. प्रथमद्रष्टया इसमें अनीति कहीं है ही नहीं. किए गए काम के अनुसार पहले को 120 रुपये मजदूरी मिलेगी, दूसरे को 150 रुपये. मजदूरों को भी इससे शिकायत न होगी. अनीति तो अधिक कार्य करने वाले को अतिरिक्त कार्य के लाभ से वंचित कर देना है.’ इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए वे कहेंगे—‘ईख के खेत में घुसे दो हाथियों में से एक सौ गन्ने खाता है, दूसरा एक सौ दस. तो यह उनकी क्षमता या आवश्यकता है. एक हाथी ज्यादा गन्ने खाने में सक्षम है तो इसका कारण है कि प्रकृति ने ही उसे ऐसा बनाया है.’’

ऐसे ही अनर्गल और आधारहीन तर्कों के आधार पर अभिजन बुद्धिजीवी मनुष्य की आभासी स्वतंत्रता को वास्तविक सिद्ध करने में सफल हो जाते हैं. वे इस तथ्य को जानबूझकर नजरंदाज कर देते हैं कि व्यक्ति की नैसर्गिक भिन्नताएं जो छोटे स्तर पर अस्तित्व की स्पर्धा को जन्म देती हैं, शीर्ष पर उन्हीं से विशेषज्ञ संस्कृति को पनपने का अवसर मिलता है. न्याय संगत यही है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसकी योग्यता और परिश्रम का पूरापूरा लाभ मिले. यदि कोई व्यक्ति सामाजिक संपदा की वृद्धि में स्वेच्छापूर्वक अधिक योगदान देता है तो समाज का भी कर्तव्य है कि उसे प्रोत्साहित करने के लिए जो भी उचित समझे कदम उठाए. प्रोत्साहन नकद पारिश्रमिक अथवा पुरस्कार के रूप में हो सकता है; अथवा किसी अन्य सम्मानित ढंग से भी. किंतु समाज की जिम्मेदारी मात्र इसी से पूरी नहीं हो जाती. बल्कि यह तो समाज की जिम्मेदारी और उसके औचित्य की कसौटी की शुरुआतभर है. समाजीकरण की पहली शर्त थी कि समाज अपनी सदस्य इकाइयों के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा. जो समाज का है, वह सबका होगा और जो सबका है, उसका लाभ समाज की प्रत्येक इकाई तक पहुंचाने की व्यवस्था समाज की ओर से की जाएगी. इसके पीछे सोचासमझा, व्यावहारिक दृष्टिकोण था. यह माना गया था कि हर व्यक्ति अपने गुण एवं स्वभाव में दूसरों से भिन्न होता है. उसकी रुचि के साथसाथ कार्यक्षमता भी दूसरों से अलग होती है. यह अंतर नैसर्गिक भले हो, मगर पर्याप्त अनुभव, प्रशिक्षण के माध्यम ये इसे आसानी से पाटा जा सकता है. यही समाजीकरण का मूल उद्देश्य भी रहा है. इसी के लिए व्यक्ति स्वेच्छापूर्वक समाज से जुड़ने को उत्सुक होता है तथा अपनी नैसर्गिक स्वाधीनता के बड़े हिस्से का बलिदान कर, सामाजिक मर्यादाओं में रहने को तैयार हो जाता है. अतएव समाज का कर्तव्य है कि वह अपनी इकाइयों के प्रति समानता स्थापित करने के लिए जो भी आवश्यक हो करे, न कि मनुष्य की नैसर्गिक भिन्नताओं को आधार बनाकर समाज में समाजार्थिक वैषम्य को बढ़ावा दे. पिछले उदाहरण की बात करें, जिसमें एक व्यक्ति अपनी शारीरिक सीमाओं के कारण मात्र 120 रुपये प्रतिदिन कमा पाता है, जबकि उतनी ही अवधि में दूसरा व्यक्ति 150 रुपये अर्जित करने में सक्षम है. ऐसे में समाज का दायित्व है कि उन कारणों का पता लगाए जो व्यक्ति की उत्पादकता को प्रभावित करते हैं, तथा समयानुसार उन्हें दूर करने की योग्यता भी बनाए. यही न्याय का वह रूप है जो किसी भी कल्याणकारी समाज में अपेक्षित होता है. इसके अभाव में समाज में असमानता पनपती है और अभिजन संस्कृति को बढ़ावा मिलता है. समानता के लक्ष्य की स्थापना केवल अभिजन की दया अथवा परोपकारभाव के द्वारा संभव नहीं है. सामान्यतः इसके दो लक्ष्य हो सकते हैं

. जनसंस्कृति अर्थात समावेशी आधुनिक संस्कृति की स्थापना.

. सामाजिक दायित्व के रूप में न्याय का संवितरण.

क्रमशः….

©ओमप्रकाश कश्यय

opkaashyap@gmail.com

न्याय की अवधारणा : दो (कानून : अभिजन का विशेषाधिकार)

सामान्य

धर्म और अभिजन संस्कृति10

वही सच्ची स्वाधीनता है जब मनुष्य स्वतंत्र जन्म लेते हैं. जनता को संबोधित करते समय वे पूर्णतः मुक्त, प्रतिबंध रहित होकर बातचीत कर सकते हैं. जो भी इस सपने को सच करते आए हैं; और करेंगे वे प्रशंसा के पात्र हैं. एक राज्य में इससे अधिक न्यायसम्मत और क्या हो सकता है.1यूरीपिड.

कानून न्याय नहीं है. किंतु वह न्याय की राह प्रशस्त करता है. विशेषज्ञों के अनुसार यह न्याय को विन्यस्त कर, आमजन को सरकार की उपस्थिति का एहसास कराता है. कानून के माध्यम से ही राज्य नागरिकों पर अपनी अधिसत्ता का प्रदर्शन करता है. इस बहाने वह उनके सरंक्षकत्व का दावा भी करता है. दूसरे शब्दों में कानून राज्य के अधिकार, उसकी शक्ति और कदाचित उसके दुस्साहस की भी भाषा है. यह दुस्साहस सत्तामद और चुनौती न होने के एहसास से जन्म लेता है. राजसत्ता और शक्ति का गठजोड़ हमेशा मनमानी करता आया है. तभी से, जब से राज्य की अवधारणा ने जन्म लिया; अथवा यूं कहें कि अपने हितों की सुरक्षा के लिए लोगों ने जब से राज्य के अधीन रहना स्वीकार किया था. कारण है कि शिखर पर मौजूद शक्तियां खुद को शेष समाज से ऊपर मानने लगती हैं. वे इस तथ्य को बिसरा देती हैं कि उनकी सारी शक्तियां एवं विशेषाधिकार जनता की ओर से लोकहित में कार्य करने के लिए प्रदान किए गए हैं. उल्लेखनीय है कि लोककल्याणकारी एवं उत्तरदायी व्यवस्था के रूप में राज्य नागरिकों का ही वरण था. प्राचीन समाजों में यह कार्य परस्पर सहयोग द्वारा, मिलजुल किया जाता था, ‘वेदों से पता चलता है, कि बिलकुल आरंभिक काल में भी….राष्ट्रीय जीवन के सब कार्य सार्वजनिक समूहों और संस्थाओं आदि के द्वारा हुआ करते थे. इस प्रकार की सबसे बड़ी संस्था हमारे वैदिक काल के पूर्वजों की समिति थी.’2 पश्चिमी समाजों में भी कमोबेश यही स्थिति थी. दास प्रथा जैसे निकृष्ट चलन के बावजूद गणतांत्रिक प्रविधियों के अनुसार शासन करने के प्रयास वहां ईसापूर्व छठी शताब्दी से होने लगे थे, लेकिन गणतंत्र और राष्ट्र की प्राचीन संकल्पनाएं तत्संबंधी आधुनिक संकल्पनाओं से भिन्न थीं.

आधुनिक राष्ट्र की संकल्पना उसकी भौगोलिक प्रस्थिति, समाज, संस्कृति तथा विकास की धाराओं से स्पष्ट होती है. सरकार का स्थान बाद में आता है. राष्ट्र की प्राचीन संकल्पना पूरी तरह केंद्रोन्मुखी थी. भारत के संदर्भ में काणे इसे और भी स्पष्ट कर देते हैं, ‘प्राचीन भारत में आधुनिक राष्ट्रीयता की भावना नहीं थी. ग्रंथकारों ने राज्य का नाम लिया है और राष्ट्र को उसका एक तत्व माना है. किंतु उन लोगों में राष्ट्रीयता की भावना का पूर्ण अभाव था और उन्होंने राष्ट्रीय एकता के लिए कोई प्रयत्न भी नहीं किया. आजकल जिसे हम राष्ट्र कहते हैं, वह भूनैतिक और आंतरिक अनुभूति का विषय है.’3उस समय बसावट ‘पुर’ अथवा ‘विश’ के रूप में थी. राज्य भी होते थे, किंतु एक अथवा कुछ निकटवर्ती नगरों तक सिमटे हुए, ‘एक राज्य में प्रायः एक ही ‘जन’ के व्यक्तियों का निवास होता था. इसलिए इन राज्यों को जनपद व जानराज्य कहा जाता था.’4एक ‘जन’ के सब व्यक्ति ‘सजात’, ‘सनाभि’ या एक ही जाति या वंश के समझे जाते थे.’5जनसमूहों के बीच वर्चस्व के लिए लड़ाइयां होती रहती थीं. इंद्र उनके लिए सम्राट होने के साथसाथ दैवी सत्ता भी है. ऋग्वेद में उसे पुरंदर कहा गया है. जिस प्रकार उससे दूसरों के दुर्गों को ध्वस्त करने की प्रार्थना की गई है, उससे पता चलता है कि वेदों तक आतेआते राजसत्ता और धर्मसत्ता का गठबंधन हो चुका था. धर्म का सहयोग पाकर राज्यसत्ता स्वयं को मजबूत करने में लगी थी. राजनीतिक वर्चस्व का संघर्ष, राजनीतिकसांस्कृतिक वर्चस्व के संघर्ष में ढल चुका था. इस बात से अनजान कि ऐतिहासिक जरूरतों एवं शासकवर्ग की महत्त्वाकांक्षाओं के दबाव में राजतंत्र जैसेजैसे फैल रहा था, वह अपने गठन के वास्तविक लक्ष्य से निरंतर दूर खिसक रहा था. आरंभ में शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि जिस राज्य का वरण व्यापक लोकहित एवं स्वाधीनता के निमित्त किया गया है, वह अपने गठन के वास्तविक लक्ष्य को बिसराकर स्वयं को इतना आत्मकेंद्रित एवं शक्तिशाली बना लेगा कि उसके गठन का औचित्य ही जाता रहेगा. यह काम एक दिन में नहीं हुआ था, न ही सीधेसीधे. बल्कि इसके लिए बहुत कूटनीतिक ढंग से काम लिया गया था. शीर्षस्थ सत्ता के किसी निर्णय की ओर उंगली न उठे, लोग उसे अपनी नियति की भांति स्वीकार कर लें, उसके लिए राजा को अधिदैविक सत्ता का दर्जा दिया गया. पृथ्वी पर उसको ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित किया गया. गीता में कृष्ण से कहलवाया गया—‘मैं उन लोगों के हाथों का दंड हूं जो दूसरों को नियंत्रित करते हैं. मैं विजेताओं की नीति हूं….’6

ईश्वर अब केवल जन्मदाता और पालक नहीं रखा था. वह स्वयंभू नियंत्रणकर्ता भी था. वह विजेता के एक साथ उनकी नीति का हिस्सा था. ‘यतो कृष्ण ततो जय!’ के साथसाथ—‘यतो जय ततो कृष्ण’ अर्थात जिधर जय है उधर कृष्ण भी हैं, जैसी भाग्यवादी धारणाएं भी समाज में पनप चुकी थीं. उनका असली मकसद था—सामदामदंडभेद यानी नीतिअनीति किसी भी प्रकार से प्राप्त विजय को दैवीय बताना. धर्म की आड़ लेकर निजी स्वार्थ को न्यायसंगत घोषित करना तथा जीत के पहले और बाद में, देवताओं को मनाने के नाम पर आनुष्ठानिक आयोजन कर लोगों पर अपना प्रभाव बनाए रखना. दावा करना कि विजय देवता का आशीर्वाद है. अंततः साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं के पीछे छिपे राजनीतिककूटनीतक अनाचार को दबा देना. इस्लाम ने इस मानसिकता को जेहाद का नाम दिया, तो रामायण और महाभारत में इसे धर्मयुद्ध बताया गया. कुल मिलाकर यह राज्य को अतिरिक्तरूप से अधिकारसंपन्न कर उसे समीक्षाआलोचना की परिधि से बाहर रखने का षड्यंत्र था. ज्ञातव्य है कि सत्ता का दैवी रूप किसी एक देवता अथवा धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं था. व्यक्ति अपने विश्वास और जरूरत के अनुसार अपना देवता चुन लेता था. यही नहीं, स्वार्थ के अनुरूप देवता गढ़े भी जाते थे. आगे चलकर जैसे ही केंद्र ने स्वयं को और मजबूत किया, राज्य की समस्त शक्तियां सम्राट में अधिष्ठित मान ली गईं. तैत्तिरीय संहिता में लिखा गया—‘समस्त मनुष्य राजा द्वारा पालित या नियंत्रित होते हैं.’7 इसके बावजूद इसमें अपेक्षित सफलता तब तक संभव न थी, जब तक जनता इसे अपनी नियति के रूप में स्वीकार न कर ले. क्योंकि राजा को सर्वोपरि तथा पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि बताने वाले आचार्य भी जानते थे कि संगठित जनशक्ति के आगे राज्य का समस्त सैन्यबल आदि नगण्य है. भड़का जनाक्रोश एक ही झटके में शक्तिशाली सत्ता को धूल चटा सकता है. इस काम के लिए धर्म की मदद ली गई. राजा को दैवीसत्ता मान लेने का उल्लेख ब्राह्मण ग्रंथों, स्मृतियों और संहिताओं जगहजगह हुआ है. इस विचार को वास्तविक लोकप्रियता रामायण और महाभारत में मिली. अलगअलग समय में लिखे और विस्तृत होते रहे इन ग्रंथों की किस्सागोई ने आमजन के दिलोदिमाग में ऐसी पैठ बनाई कि उसका प्रभाव सहस्राब्दियों के लिए स्थायी हो गया.

उल्लेखनीय है कि जिस कालखंड का उल्लेख इन महाकाव्यों में हुआ है, उस समय तक गंगायमुना के दोआब में विकसित सभ्यता जन्म ले चुकी थी. बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित, शांत और उपजाऊ क्षेत्र में उसे तेजी से विकसित होने का अवसर मिला था. उसके नगर पूर्ववत्ती सिंधु सभ्यता की अपेक्षा बड़े थे तथा धनवैभव से समृद्ध भी. राजा, पुजारी और व्यापारी की तिकड़ी ने समाज के बड़े वर्ग को निर्णयप्रक्रिया से बाहर खदेड़ दिया था. समाज का बड़ा हिस्सा मान चुका था कि वह केवल शासित होने के लिए जन्मा है. यह बोध जनाक्रोश की संभावनाओं को टालने तथा स्थिति से अनुकूलन में सहायक था. बहरहाल, धर्म के समर्थन पर थोड़ेबहुत उतारचढ़ाव के बावजूद राज्य सर्वोच्च शक्तिकेंद्र बना रहा. तब तक समाज में आर्थिकसामाजिक स्तरीकरण विभिन्न संस्थाओं में ढल चुका था. आमजन अपनी सामान्य जरूरतों के लिए समाज के प्रभुवर्ग पर आश्रित था. इसलिए आंतरिक शांति, बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा एवं सुख की सुनिश्चितता हेतु, इच्छा या अनिच्छा से राजसत्ता के समर्थन में आना उसकी विवशता थी. इसके बावजूद राजसत्ता तथा उसके अनुयायियों के मन में जनशक्ति का भय कम न था.

विधि के शासन की संकल्पना

जनाक्रोश की संभावना कम से कम हो, शिखरस्थ लोगों की मनमानी अबाध चलती रहे. यह तभी संभव था जब जनसाधारण का उसमें विश्वास हो. समाज का अधिसंख्यक वर्ग अपने भले के लिए उनकी शिखरउपस्थिति और वर्गीय श्रेष्ठता को अपरिहार्य मान ले. राजा अपने निकटवर्ती राज्यों के साथ युद्धरत रह सकता था, किंतु प्रजा की स्वीकार्यता के बगैर उसका राजत्व अर्थहीन था. राज्य के गठन का औचित्य को सिद्ध करने के लिए प्रजा को भी यह विश्वास दिलाना अत्यावश्यक था कि उसका होना प्रजा के लिए हितकारी है. अर्थात समाज एवं राजनीति के अंतर्संबंधों में स्थायित्व, बगैर आपसी विश्वास एवं पारदर्शिता के असंभव था. पारदर्शिता की मांग के चलते कालांतर में संवैधानिकरण की प्रक्रिया को बल मिला. संविधान राज्य की पूर्वनिर्धारित आचारसंहिता, जिसके माध्यम से वह सर्वकल्याणकारी होने का दावा कर सकता था, का दस्तावेज था. उसके गठन में आमजन की सीधी भूमिका नहीं थी, हालांकि यह बताया जाता था कि संविधान नागरिकों की सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति है. उसके अनुपालक के रूप में राज्य सभी के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार का आश्वासन देता था. उल्लेखनीय है कि प्राचीन सभ्यताओं के पराभव के पश्चात, पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों में नई सभ्यताओं का उदय लगभग एक साथ हुआ था. सिंधु सभ्यता के पराभव के बाद जब भारत में गंगायमुना के मैदानों में नई सभ्यता विकसित हो रही थी, उन्हीं दिनों अर्थात 1500—2000 ईस्वी पूर्व, भूमध्य सागर के टापुओं पर मानवी सभ्यता का उदय हो रहा था. उसके संस्थापक मेसापोटामिया और मिस्र की प्राचीन सभ्यताओं के पराभव से उखड़े कबीले थे. समुद्र के घिरे होने के कारण वहां अपेक्षाकृत शांति थी. टापुओं पर व्यापारियों के जहाज ठहरा करते थे. इसका लाभ उन नगरराज्यों को मिला. फलस्वरूप उनका बड़ी तेजी से विकास हुआ. कबीलों का नियंत्रण प्रायः एक व्यक्ति के अधीन होता था. वह उनका सरदार या मुखिया कहलाता था. लेकिन जनसंख्या बढ़ने तथा नएनए सामाजिकवाणिज्यिक संबंधों के उदय के बाद किसी एक व्यक्ति की मर्जी अथवा विवेक से समाज को नियंत्रित कर पाना संभव नहीं रह गया था. शासन को व्यवस्थित करने के लिए राजपरिषदों का गठन किया जाने लगा. पक्षपात का आरोप न लगे, समाज में उनकी विश्वसनीयता बनी रहे, इसके लिए सर्वमान्य व्यवस्थाओं की आवश्यकता पर जोर दिया जाने लगा. दुनिया का पहला संविधान भूमध्य सागर के बीच बसे नगरराज्य एथेंस में, डेरोस द्वारा लागू किया गया. उसमें अपराधमुक्त समाज की संकल्पना की गई थी. डरोस के संविधान की कमजोरी थी कि उसमें छोटेछोटे अपराधों के लिए भी मृत्युदंड का प्रावधान था. इसलिए कुल मिलाकर वह राज्य की निरंकुशता को दर्शाता था. इस कारण उसका विरोध भी स्वाभाविक था. कालांतर में सोलोन ने उसमें सुधार किए. सोलोन द्वारा लागू संविधान अपेक्षाकृत उदार एवं न्यायपूर्ण गणराज्य छवि पेश करता था. ईसापूर्व छठी शताब्दी में लागू वह संविधान समाज के विशिष्ट जनों को राज्यसत्ता में भागीदारी का अवसर देता था. उस समय तक भारत में धर्म, राजसत्ता पर अपनी पकड़ बना चुका था. तदनुसार संविधान का कार्य यहां स्मृतियों, आरण्यकों, धर्मसूत्रों, संहिताओं आदि के माध्यम से किया गया.

उपर्युक्त से स्पष्ट है कि संविधान की सहायता से राज्य को संचालित करने की कोशिश पूरब और पश्चिम दोनों में लगभग एक साथ हुई. लेकिन दोनों में मूलभूत अंतर था. ऋग्वेद में वर्णविभाजन के संकेत हैं. कालांतर में गंगायमुना के मैदानों में जो सभ्यता विकसित हुई उसमें वर्णविभाजन सामाजिक संस्था का रूप ले चुका था. ब्राह्मण उसके शिखर पर थे, वर्गीय श्रेष्ठता और स्वार्थ से बोझिल. वर्गीय हितों के अनुरूप सत्ता के केंद्रीकरण का लाभ उठाने को तत्पर. समाज को व्यवस्थित करने के लिए धर्मसूत्र, स्मृति, आरण्यक, पुराण, महाकाव्य, संहिता आदि की रचना इसी युग हुई. वेदों की रचना में समाज के सभी वर्गों के विद्वान आचार्यों का योगदान था. मगर अब लिखनेपढ़ने का कार्य मुख्यरूप से ब्राह्मणों तक सिमटने लगा था, जिनके वर्गीय स्वार्थ प्रबल थे. इससे भारतीय समाज ज्ञान की मौलिक परंपरा से निरंतर कटता गया. दूसरी ओर सुकरात, प्लेटो, जेनोफीन, सिसरो जैसे नीतिवादी दार्शनिकों के प्रभाव में पश्चिमी समाज में समानता, आदर्श और नैतिकता के लिए अपेक्षाकृत अधिक गुंजाइश थी. यह बात अलग है कि राजनीति पर चर्च के प्रभुत्व के बाद वहां के हालात में भी बदलाव आया था. यह मान लिया गया था कि सत्ता पर वर्चस्व बनाए रखने के लिए जनशक्ति को भरमाए रखना जरूरी है. इसके लिए अत्यावश्यक था कि संबंधित राज्य, स्वयं कानून का राज्य होने का दावा करे; और येनकेनप्रकारेण प्रजा भी उसे स्वीकार ले. अंततः अपनी चालाकियांे तथा धर्म की मदद द्वारा प्रभुवर्ग जनता का विश्वास जीतने में कामयाब हुआ. धर्म की विशेषता थी कि वह जनसाधारण का ध्यान समस्या के वास्तविक कारणों से हटाकर उस दिशा की ओर मोड़ देता था, जिसका व्यक्ति के विकास और विवेक से दूर तक का संबंध न था. परिणामस्वरूप विकास की प्रक्रिया का सच, जनसाधारण की समस्याओं का वास्तविक कारण, जनसामान्य तक नहीं पहुंच पाता. तमाम वैज्ञानिक शिक्षा एवं प्रौद्योगिकीय क्रांति के बावजूद यह स्थिति आज तक बनी हुई है.

स्वयं को लोकेच्छा का प्रतिनिधि बताकर राज्य सामान्यतः यह दावा करता है कि उसे अपनी शक्तियां नागरिकों की ओर से प्राप्त हुई हैं. जो कानून उसने गढ़े हैं, उनके प्रति जनता की सामान्य सहमति है. इसमें संदेह नहीं कि राज्य को उसकी शक्तियां जनता की ओर से ही प्राप्त होती हैं. सत्ताएं बनतीबिगड़ती हैं. राज्यों की सीमाएं भी परिवर्तित होती रहती हैं, किंतु जनता का स्वरूप, सिवाय कुछ सांस्कृतिकसामाजिक बदलावों के, सामान्यतः अपरिवर्तनीय होता है. प्रकृति की भांति वह भी अमृत्वप्राप्त होती है. उसकी हस्ती कभी मिटती नहीं. इसीलिए तो वह जनताजनार्दन कहलाती है. वही अपने श्रमसीकरों से प्रकृति को संवारती, उसको अधिकाधिक उपजाऊ बनाती है. तदनुसार प्राकृतिक संपदा के उपयोग को लेकर उसकी अधिकारिता किसी से कम नहीं होती. लेकिन यदि जनता ही अपने इस अधिकार से परिचित ही न हो, अथवा इस हकीकत को जानबूझकर बिसराने लगे, तब? शताब्दियों से यही होता आया है. शिखरस्थ शक्तियां येनकेनप्रकारेण लोगों के दिलोदिमाग में बिठा देती हैं कि शासन चलाना प्राकृतिक गुण है. वह दैवी अनुकंपा से गिनेचुने लोगों को ही प्राप्त होता है. मनुस्मृति कहती है, ‘विधाता ने इंद्र, मरुत, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चंद्र एवं कुबेर के दैवी अंशों से राजा की रचना की है. चूंकि राजा में इन सब देवताओं के गुण हैं, इसलिए वह सृष्टि के सभी प्राणियों में श्रेष्ठतम है.’8 मनु महाराज इसे और विस्तार देते हैं. वे लिखते हैं कि अपने दैवीय गुणों के कारण केवल राजा ही सर्वोत्तम न्यायकर्ता है. राजा यदि बालक है तो भी उसके आदेश की अवहेलना नहीं की जानी चाहिए. ‘नारद स्मृति’ में इसी को थोड़े भिन्न शब्दों में दोहराती है—‘पृथ्वी पर स्वयं इंद्र राजा के रूप में विचरण करता है. उसकी आज्ञाओं का उल्लंघन करके मनुष्य कहीं नहीं रह सकते. राजा सर्वशक्तिमान है. वही रक्षक है, वही सब पर कृपालु है. अतः यह निश्चित नियम है कि राजा जो कुछ करता है, वह ठीक या सम्यक् ही रहता है. जिस प्रकार दुर्बल पति को भी पत्नी की ओर से सम्मान मिलता है, उसी प्रकार गुणहीन शासक को भी प्रजा द्वारा सम्मान मिलना चाहिए.’9 राजा की सर्वोच्चता एवं स्वयंप्रभुता को लेकर पश्चिम में भी हालात भिन्न न थे. वहां भी राजा को दैवी सत्ता का प्रतीक बताकर उसे असीमित अधिकार प्रदान किए गए थे—

यदि शासकों के कार्य दोषपूर्ण हों तो भी उनकी कटुआलोचना से बचना चाहिए. यदि गलती से भी मुंह से उनके बारे में कुछ आलोचनात्मक निकले तो तत्क्षण प्रायश्चितभाव से नत हो जाना चाहिए. इस तरह कि जुबान भी अपनी गलती स्वीकार कर ले. यदि जुबान अपने से ऊपर की शक्ति की आलोचना करती है तो उसे ईश्वर के निर्णय से डरना चाहिए, जिसने उस शासकरूपी शक्ति को स्थापित किया है.’10

जब सब कुछ राजा और उसके करीबियों की निगाह से, उनके लाभ की दृष्टि से देखा जाता हो, तब वास्तविक न्याय की उम्मीद कम ही थी. इन परिस्थितियों में शोषण एवं उत्पीड़न को अपनी नियति स्वीकार लेने के अलावा दूसरा कोई रास्ता भी न था. यूं भी राजशाही में जनता और राजा के बीच सीधे संवाद की कोई सुविधा नहीं होती. वहां निर्णय प्रक्रिया मुट्ठीभर लोगों के हाथों में होती है. उनमें भी वे जिन्हें राजा आमतौर पर पसंद करता है. जिनके बारे में वह जानता है कि वे उसके निर्णयों में कम से कम हस्तक्षेप कर सकते हैं. इससे वहां निरंकुश निर्णय लिए जाते थे, जिन्हें ‘महाराज की इच्छा है’ जैसे दावों के साथ समाज पर थोप दिया जाता था. राजा की इच्छा को ही अंततः कानून मान लिया जाता है, जिससे बाद में धर्मसम्मत अथवा कुदरत के न्याय के रूप में पेश किया जाता है. न्याय के प्रति इस तरह का आचरण उसकी मूल भावना, जो मानती है कि जन्म से सभी मनुष्य समान होते हैं, के पूरी तरह विरुद्ध था. ऐसी विभेदकारी व्यवस्थाओं में शिशु के जन्म की परिस्थितियां, जिनपर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता—उसकी हैसियत और पहुंच का निर्धारण करती हैं. राजसत्ता के इन्हीं दुर्गुणों को ध्यान में रखते हुए थामस मिल ने उसको शासन का निकृष्टतम रूप माना है.

धर्मकेंद्रित आचारसंहिता की इन्हीं कमजोरियों के कारण विधि के राज्य की संकल्पना को बल मिला. ईसा से सातआठ सौ वर्ष पहले तक धर्म पूरे समाज को अपनी जकड़ में ले चुका था. उसकी एकाएक उपेक्षा संभव न थी. अतएव आरंभिक कानूनों को ईश्वरीय इच्छा का ही विस्तार माना गया. धीरेधीरे यह मांग भी जोर पकड़ने लगी कि कानून यदि देश और समाज के भले के लिए हैं तो उनका पालन छोटेबड़े सभी को समानरूप से करना चाहिए. जनसाधारण की विधि निर्माताओं से यह अपेक्षा न तो अनुचित थी, न अवांछित. सुकरात से लेकर अरस्तु तक जिस आदर्श को आगे रखकर कानून की संकल्पना की गई थी, वह कुछ ऐसा ही था. माना गया था कि उससे साधारण और विशिष्ट सभी नागरिक समानरूप में प्रभावित होंगे और वह सभी पर समानरूप से असरकारी होगा. इससे समाज में समरसता व्यापेगी. फलस्वरूप उन अनेक बुराइयों का अंत होगा जो समाजार्थिक वैषम्य की जनक हैं—

कानून देवताओं और मनुष्यों, दोनों के सभी कार्यों का नियामक है. वही तय करता है कि क्या सम्मानीय है और क्या अधम. एकमात्र कानून को ही हमारा शासक एवं पथप्रदर्शक होना चाहिए. उन सभी मनुष्यों के लिए जो प्रकृति से सामाजिक हैं, कानून का निर्देश है कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं.’11

कानून को लेकर यह सर्वसम्मत अपेक्षा थी. न्याय और कानून पर आधारित राज्य की स्थापना को लेकर उसके शुभेच्छुओं द्वारा चाहे जो सपने देखे गए हों, लेकिन उसे लेकर विद्वानों की मूल आशंका कि वह समाज के संभ्रांत वर्गों के लिए विशेष लाभकारी तथा उनका सुरक्षाकवच सिद्ध होगा, आरंभ में ही स्पष्ट नजर आने लगी थी. समस्या के निदान के लिए जरूरी था राज्य द्वारा अपने सभी नागरिकों के साथ समानतापूर्ण आचरण. सुकरात ने इसे ‘सद्गुण’ की संज्ञा दी थी. अरस्तु ने जोर देकर कहा था कि नागरिकता समान व्यक्तियों के बीच का संबंध है, न कि राज्य का प्रदेय. ‘पालिटिक्स’ में उसने नागरिक की विशेषता को नपेतुले शब्दों में व्यक्त किया है, ‘ऐसा आदमी जो न्याय के प्रतिपादन एवं शासन पदाधिकार में भागीदार हो.’ दूसरे शब्दों में ऐसा व्यक्ति जो किसी राष्ट्र की विचारपरिषद अथवा न्यायपरिषद अथवा तत्संबंधी शासन में भागीदार होने के अधिकार का उपयोग करता है, वह नागरिक है. समाज में उसकी भूमिका नाविक के समान होती है. जैसे एक नाविक किश्ती को, आवश्यकता पड़ने पर विषम परिस्थितियों से संघर्ष करता हुआ, आगे ले जाता है, ऐसे ही नागरिक चैतरफा चुनौतियों के बीच भी, अपने समाज को विकास ओर ले जाने हेतु सतत प्रयत्नरत रहता है. नागरिक की निष्ठा वैध शासन में होती है, आततायी अथवा दुराचारी सत्ता के प्रति नहीं. यह न्यायआधारित राज्य में नागरिक की सैद्धांतिक परिकल्पना है. व्यवहार में होता यह है कि वैध शासन में निष्ठा रखने वाले नागरिक, लोकहित को भुलाकर स्वार्थ के लिए काम करने लगते हैं. पर्याप्त लोकचेतना के अभाव में सत्ता से निकटता का लाभ उठाने के लिए धर्मसत्ता और अर्थसत्ता दोनों उसके आसपास सिमटने लगती हैं. अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने तथा जनता के प्रति सीधी जवाबदेही से बचने के लिए राजसत्ता भी उन्हें तरहतरह से प्रोत्साहित करती है. धर्म, राज्य एवं अर्थ सत्ताओं की तिकड़ी से बना शक्तिशाली केंद्र अपने दायित्वों के प्रति उदासीन हो, वर्गीय हितों को वरीयता देने लगता है. वह कानूनी प्रावधानों की व्याख्या निहित स्वार्थ के अनुसार करता है. परिणामस्वरूप न्याय का पलड़ा अभिजन वर्ग की ओर झुकने लगता है. समानता, समभाव, न्याय एवं कानून का दावा करने वाले राज्यों में भी जनसाधारण और विशिष्ट जन के लिए कानून का भिन्न नजरिया होता है. कई बार तो यह गठजोड़ इतना मजबूत हो जाता है कि जनता की प्रतिक्रिया की उसे परवाह तक नहीं होती. विशेषाधिकार संपन्न शीर्षस्थ शक्तियां प्रदत्त अधिकारों का दुरुपयोग करने लगती हैं. इससे न्याय एवं समानता के नाम पर बनाए गए कानून समाज के विशेषाधिकार संपन्न वर्ग के हितरक्षक सिद्ध होते हैं. चूंकि साधारणजन किसी न किसी कारण से समाज के शीर्षस्थ वर्गों पर निर्भर होता है, इसलिए अन्यायपूर्ण व्यवस्था को सहते जाना उसकी मजबूरी होती है. कानून की इस दुर्बलता को देखकर सिसरो को कहना पड़ा था कि वह कानून समानता एवं निष्पक्षता के चाहे जितने दावे करे, उसके अधिकांश प्रतिबंध केवल जनसाधारण पर लागू होते हैं. सत्ता के निकटवर्ती लोगों पर उनका कोई असर नहीं पड़ता. अपनी पुस्तक ‘आन दि रिपब्लिक’ में उसने साफ तौर पर कहा था कि दुनिया का—

एकमात्र कानून है, विवेक. वह प्रकृति के अनुसार है. वही सब मनुष्यों पर लागू होता है. वह परिवर्तन से परे तथा शाश्वत है. कानून मनुष्यों को आदेश देता है कि वे निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करें. वह मनुष्य को गलत काम करने से भी रोकता है. किंतु उसके आदेश और निषेधाज्ञाएं केवल अच्छे आदमियों पर असर डालती हैं. उनका बुरे आदमियों पर कोई असर नहीं पड़ता. ऐसे कानून को मानवी विधान द्वारा अवैध घोषित करना नैतिक दृष्टि से उचित नहीं है. इसके संचालन को सीमित करना भी अनुचित होगा. इसको पूरी तरह से रद्द कर देना संभव है….समाज में केवल एक कानून होना चाहिए. वही शाश्वत और अपरिवर्तनशील है. वह प्रत्येक युग में प्रत्येक मनुष्य के लिए बंधनकारी है. मनुष्य का केवल एक स्वामी और शासक है—ईश्वर. वही सारे कानूनों का निर्माता, व्याख्याता और प्रयोक्ता है. जो व्यक्ति इस कानून का पालन नहीं करता वह अपने उत्कृष्ट रूप से वंचित हो जाता है….12

सिसरो, क्रिस्सीप्पस आदि विचारक उस दौर में जन्मे थे, जब यूनानी विचारचेतना पर सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, जीनोफेन आदि के आदर्शवादी चिंतन का गहरा प्रभाव था. अरस्तु ने राष्ट्रीय सत्ता के औचित्य को दो वर्गों में बांटा था. पहला मानवीय स्वभाव में अंतनिर्हित सामजिकता के लक्षण को लेकर था. वह ‘भले व्यक्ति’ तथा ‘अच्छे नागरिक’ को अलगअलग देखता था. उसका मानना था कि भला व्यक्ति अपने आचरण में दूसरों का मददगार होता है. वह ईमानदार जीवन, दूसरों को कष्ट पहुंचाए बगैर जीने की कामना करता है. अच्छा नागरिक इन गुणों के साथसाथ राज्य एवं कानून के प्रति भी समर्पित होता है. अरस्तु का मानना था कि मनुष्य स्वभाव से सामाजिक प्राणी है. समाज से अलग वह रह ही नहीं सकता. समाज उसे भले आदमी से अच्छा नागरिक बनने का अवसर प्रदान करता है. अपने नागरिकों के लिए अपेक्षित सुरक्षा, शांति, सुख एवं संतोष की व्यवस्था करता है. दूसरे उसका कहना था कि राष्ट्र को अपने नागरिकों के बीच बिना भेदभाव किए सुख एवं कल्याण के समान वितरण पर ध्यान देना चाहिए. उल्लेखनीय है कि अरस्तु से पहले लोकतंत्र, राजतंत्र, तानाशाही, कुलीनतंत्र, अल्पतंत्र आदि को लेकर खूब चिंतन हो चुका था. सरकार के स्वरूप को लेकर विद्वान आपस में बंटे हुए थे. अरस्तु ने यह कहकर कि सरकार का स्वरूप चाहे जैसा हो, यदि वह शुभ को समर्पित है, नैतिक एवं न्यायपूर्ण है, तो वह वरणयोग्य है—सारी बहसों को दरकिनार कर दिया था. उसके बाद सरकार के स्वरूप को लेकर चलने वाली बहसें, उसके दायित्व एवं कर्तव्य की ओर मुड़ने लगी थीं. अरस्तु का विचार था कि समाज शुभत्व की ओर तभी अग्रसर रह सकता है, जब राज्यसत्ता नागरिकों के बीच न्याय के संवितरण को लेकर गंभीर हो. नागरिकों का भी उसपर विश्वास हो. उससे पहले प्लेटो ने न्याय को समाज के सद्गुण की संज्ञा दी थी.

सवाल उठता है कि दोढाई हजार वर्ष पहले तक जब सभी विचारक न्याय के स्वरूप को अधिकतम नैतिक बनाने पर जोर दे रहे थे, शुभत्व की प्राप्ति पर जोर दिया जाता था, तो बाद की शताब्दियों में अचानक क्या हुआ जिससे राज्य नैतिक आचरण से निरंतर दूर होकर अभिजात संस्कृति का पालकपोषक और संरक्षक बनता गया? क्या हुआ जो राजनीति जिसका प्रथम और अंतिम लक्ष्य नागरिकों के बीच विश्वास, समानता और विकास का वातावरण तैयार करना था, वह कूटनीतिक चातुर्य में ढलकर जनसाधारण की पहुंच से निरंतर दूर होती गई? पश्चिम की बात करें तो उसका कारण वहां की राजनीति में चर्च का अतिरिक्त और अवांछित दखल था. उल्लेखनीय है कि स्वाधीनता को लेकर दास योद्धा थ्रेसवासी स्पार्टकस ने रोमन साम्राज्य के विरुद्ध जंग की छेड़ी थी. आरंभिक लड़ाइयों में रोमन साम्राज्य को दास सैनिकों के आगे मुंह की खानी पड़ी थी. बाद में इटली की सेनाओं के मिल जाने से युद्ध का पासा पलट गया. स्पार्टकस के बलिदान के बाद छह हजार दास योद्धाओं को सूली पर चढ़ा दिया गया. स्पार्टकस का पराभव, मुक्ति का सपना पाल बैठे दासों के लिए बहुत बड़ा आघात था<