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भारतीय भौतिकवादी चिंतन : पुरोहितवाद के विरुद्ध पहला मोर्चा

सामान्य

नास्ति दत्तम् नास्ति हूतम् नास्ति परलोकम् इति।। मेधातिथि , लोकायत, 30

(प्रसाद चढ़ाना, यज्ञों में आहुतियां देना व्यर्थ है. परलोक जैसा कुछ भी नहीं है.)

.)

वैदिक संस्कृति के कर्मकांड, बलिप्रथा, पुरोहितवाद का उल्लेख जबजब होता है, उसके प्रतिरोधी स्वरों की खोज हमें सीधे बौद्ध दर्शन तक ले जाती है. हम वैदिक समाज की कुरीतियों का प्रतिकार बुद्ध के दर्शन में खोजने लगते हैं. भारतीय संस्कृति के इतिहास में बौद्ध दर्शन का उदय निश्चय ही युगांतरकारी घटना थी. जैन दर्शन की भांति उसका निकास भी श्रमण परंपरा से हुआ था. दोनों स्वतंत्रसमृद्ध दार्शनिक परंपरा से अनुप्रेत थे. ईश्वर, आत्मा, परमात्मा जैसी ध्यान भटकाने वाली अवधारणाएं दोनों को अस्वीकार थीं. बावजूद इसके ध्यान सीधे बौद्ध दर्शन की ओर जाता है तो इसलिए कि उसकी सफलता के अनुपात में उसके समकालीन दर्शनों को मिली सफलता नगण्य थी. स्वयं बुद्ध अपनी सफलता के प्रति आश्वस्त थे. कुछ अवसरों पर तो आत्ममुग्धता की हद तक. भिक्षुसंघ के प्रति उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता था. महावीर के निधन के उपरांत उनके अनुयायियों के आपसी लड़ाईझगड़े का समाचार जब चुंड द्वारा उन्हें दिया गया तो उनका कहना था, ‘चुंड अब संसार में कितने उपदेशक हैं जिन्हें इतनी प्रतिष्ठा और मानसम्मान प्राप्त हुआ है, जितना मुझे? मुझे तो ऐसा कोई उपदेशक दिखाई नहीं पड़ता. हे चुंड! आज संसार में अनेक धार्मिक संघ हैं. लेकिन मुझे तो ऐसा कोई संघ दिखाई नहीं पड़ता जिसके भिक्षु संघ ने बौद्ध संघ के समान सफलता और लोकसिद्धि अर्जित की हो.’ यदि कोई व्यक्ति किसी धर्म को हर प्रकार से सफल, पूर्ण, त्रुटिहीन, सुगठित एवं सुस्थापित बताना चाहेगा, तो वह इसी संघ का उदाहरण देगा.’ अपनी विचारधारा, धर्म और संप्रदाय के प्रति इतना सघन विश्वास, अनपेक्षित नहीं है. बौद्ध संघ को मिली प्रतिष्ठा और लोकव्याप्ति की दृष्टि से बुद्ध को ऐसा सोचने का अधिकार भी था. यह बात अलग हैं कि बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के महज ढाई सौ वर्ष के भीतर बौद्ध धर्म भी 18 संप्रदायों में बंट चुका था. उसके विभिन्न धड़ों के बीच गहरे मतभेद थे.

बुद्ध को मध्यमार्गी कहा जाता है. माना जाता है कि यह बोध उन्होंने लोकपरंपरा से ग्रहण किया था. इस बारे में एक रोचक कहानी है. बोधप्राप्ति के लिए घर से निकलते समय दूसरे तापसों की भांति बुद्ध भी शरीर को मुक्तिमार्ग की सबसे बड़ी बाधा मानते थे. उन्होंने अराड़ मुनि को अपना गुरु माना और भद्रजित आदि के साथ छह वर्षों तक कठिन साधना करते रहे. उस दौरान उन्होंने भोजन, पानी, स्नानदान, फूलफल आदि सब त्याग दिया. लेकिन उस कठिन साधना का कोई अनुकूल परिणाम नहीं निकला. नतीजा यह हुआ कि देह सूखकर कांटा बन गई. एक दिन जब वे साधनारत थे तो गीत गाती स्त्रियों का दल उधर से गुजरा. गीत के बोल थेᅳ‘वीणा के तारों को साधे रहो/उन्हें न तो ढीला छोड़ो/न ज्यादा कसो/तार ढीले रहे तो स्वर नहीं निकलेंगे/अत्यधिक कसने पर वे टूट भी सकते हैं.’ गीत सुनते ही बुद्ध की आंखें खुल गईं. तपस्या छोड़कर वे उठ खड़े हुए. उन्हें लगा कि आत्मापरमात्मा के प्रश्न अंतहीन हैं. मनुष्य सहस्राब्दियों से उनपर तर्क करता आया है. आगे भी अनंतकाल तक करता रहेगा. उनके जरिए किसी सर्वसम्मत समाधान पर पहुंच पाना असंभव है. ऐसे प्रश्नों को छोड़ देने की अनुशंसा के साथसाथ बुद्ध ने आचरण की शुद्धता पर जोर दिया. कहा कि सच्चे संकल्प द्वारा मन के विकार मिट सकते हैं. अपने विचारों को लेकर संघ की स्थापना की. बुद्ध वैदिक संस्कृति के केंद्रीय विषयों, आत्मा और परमात्मा को नकारते नहीं हैं. केवल अंतहीन प्रश्न मानकर उन्हें किनारे कर देने को कहते हैं. सामान्य नैतिकता जिसे ब्राह्मण दर्शनों में पूरी तरह किताबी बना दिया गया था, जिसका निर्धारण शिखरस्थ वर्गों की मर्जी से, उनके स्वार्थानुसार किया जाता था उसे उन्होंने गणतांत्रिक स्वरूप देने की कोशिश की थी. खासकर भिक्षु संघों में ऐसी व्यवस्था की जिससे समाज में फैले जातिभेद की उनपर छाया तक न पड़े. वुद्ध विहारों को समाज के सभी वर्गों के लिए खोलते हुए उन्होंने समानता के विचार को महत्त्वपूर्ण माना. उस समय तक वर्ण जाति में ढलकर रूढ़ हो चुके थे. कुल मिलाकर बौद्ध दर्शन की महत्ता जीवन और दर्शन के केंद्र में मनुष्य को वापस ले आने में है. जिसे ब्राह्मणवादियों ने मायावाद के भ्रम में उपेक्षित कर रहा था. इससे वे लोग भी बौद्ध संघों से जुड़ने लगे जिन्हें वर्णव्यवस्था के चलते समानता, स्वतंत्रता एवं जीवन के मूलभूत अधिकारों से वंचित किया गया था. समय के हिसाब से वह क्रांतिकारी घटना थी. उसके थोड़ेसे अंतराल के पश्चात यही कार्य सुकरात ने यूनान में किया था.

बावजूद इसके पुरोहित संस्कृति का असल विरोध बौद्ध दर्शन में नहीं था. सवाल है बुद्ध को मध्यममार्गी माने तो पुरोहित संस्कृति का वास्तविक प्रतिपक्ष कौनसा दर्शन था? क्या अहिंसा पर असंभाव्य की सीमा तक जोर देने वाले जैन दर्शन को इसका श्रेय दिया जाए? बुद्ध की भांति महावीर भी भारत की प्राचीन श्रमण परंपरा की देन थे. वैदिकी हिंसा और कर्मकांडों के आलोचक. उन्होंने भी वेदों को अप्रामाण्य मानकर ईश्वरत्व को नकारा था. बावजूद इसके जैन दर्शन, वैदिक दर्शन का वास्तविक प्रतिपक्ष नहीं था. बौद्ध दर्शन की भांति वह भी मध्यमार्गी था. अहिंसा को लेकर वह अव्यावहारिक की सीमा तक चला जाता है. जबकि ‘स्याद्वाद’ की उसकी अवधारणा विरोधी विचारों के लिए भी पर्याप्त स्पेस रखती है. ब्राह्मणवादी दर्शन का असल विरोध भौतिकवादी विचारधारा में था, जिसके बुद्ध के जीवनकाल में कम से कम पांच प्रखर विचारक थे. मक्खलि गोसाल, अजित केशकंबलि, संजय वेलट्ठपुत्त, पूर्ण कस्सप और पुकुद कात्यायन. इस बात के पर्याप्त प्रमाण है कि बुद्ध को बोध प्राप्ति, या उनके प्रसिद्ध होने से बहुत पहले ही वे पांचों काफी प्रतिष्ठा और जनसमर्थन बटोर चुके थे. उनकी विद्वता की धाक उनके विरोधियों पर भी थी. इनके अलावा छठा नाम निगंठ नाथपुत्त का है. आगे चलकर वह जैन दर्शन के प्रवर्त्तक महावीर स्वामी के रूप में ख्यात हुए. विडंबना है कि निगंठ नाथपुत्त को छोड़कर किसी भी विद्वान का उसके जीवन और विचारों को लेकर कोई स्वतंत्र, मौलिक ग्रंथ उपलब्ध नहीं है. उनके जीवन और विचारों का संक्षिप्त परिचय हमें बौद्ध एवं जैन ग्रंथों से प्राप्त होता है. वह पूर्वाग्रहों से भरा पड़ा है. प्राप्त वर्णन में पर्याप्त भिन्नता है, किंतु इस बात से दोनों एकमत हैं कि वे भौतिकवादी दार्शनिक ब्राह्मण दर्शन के प्रबल विरोधी थे.

भौतिकवादी विचारकों को लेकर ‘दीघनिकाय’ के ‘समन्न्फल्सुत्र सुत्त’ में गौतम बुद्ध एवं अजातशत्रु के बीच लंबी चर्चा है, जिसमें उन्हें ‘संघ स्वामी’, ‘गणाध्यक्ष’, ‘बहुपूज्य’, ‘गणाचार्य’, ‘परमप्रज्ञ’, ‘अनुभवी विद्वान’, ‘साधु’, ‘मतसंस्थापक’, ‘तत्ववेत्ता’, ‘असंख्य समर्थकों वाला’ जैसे लगभग एक समान विशेषणों से संबोधित किया गया है. उसके लिए भूमिका कहानी के रूप में रची गई हैपूर्णमासी का दिन था. बुद्ध राजगृह में वैद्य जीवक के आम्रक्षुओं के साथ विश्राम कर रहे थे. उधर मगध का बलशाली सम्राट अजातशत्रु अपने मंत्रियों और दरबारियों के साथ उत्तम आसन पर विराजमान था. चारों ओर चांदनी छितराई हुई थी, ‘‘अहो, कैसी रमणीय चांदनी रात है! कैसी सुंदर चांदनी रात है!! कैसी दर्शनीय चांदनी रात है!!! कैसी प्रासादिक चांदनी रात है!!! कैसी लक्षणीय चांदनी रात है!!!’’(दीघ निकाय, अनुवादराहुल सांकृत्यायन एवं जगदीश काश्यप) संपूर्ण वातावरण उल्लासमय होने के बावजूद राजा अप्रसन्न है. उसका मन अवसाद से भरा है. वातावरण की रमणीयता, दरबारी वैभवविलास, सुख एवं सुरक्षा की भरपूर अनुभूति भी उसे संतुष्ट नहीं कर पाती. वह किसी विलक्षण मेधावी ‘श्रमण या ब्राह्मण के तत्वज्ञान द्वारा चित्त को प्रसन्न’ करना चाहता है. धर्म कबीलाई युग यानी उस समय की उपज है जब पराजित का जीवन, चाहे वह राजनीतिक हो या वैचारिक, विजेता के अधिकार में होता था. प्रत्येक धर्म की आधारशिला सांसारिक सुखोपभोग को हेय और निस्सार दिखाने पर टिकी होती है. इस कसौटी पर बौद्ध धर्म भी बाकी धर्मों से अलग नहीं रहा. ‘समन्न्फाफलसुत्त’ का ध्येय ‘श्रमण जीवन के फल’ को दर्शाते हुए सम्राट अजातशत्रु को धर्ममार्ग की ओर प्रवृत्त करना है. अंतर केवल इतना है कि ब्राह्मणवादी धर्मों में मोक्ष की अवधारणा मृत्यु पश्चात मुक्ति के लिए रची गई है. बौद्ध धर्म के अनुसार निर्वाण इसी जन्म में संभव है. आगे छह भौतिकवादी दार्शनिकों के मत का संक्षिप्त उल्लेख है, जिसे भौतिकवाद के सापेक्ष बुद्धमार्ग की श्रेष्ठता स्थापित करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है. संवाद की शुरुआत में विकल अजातशत्रु दरबारियों से प्रश्न करता हैᅳ‘क्या आप हमें ऐसे विद्वान का नाम बता सकते हैं जिसके पास बैठकर कुछ तत्व चर्चा की जा सके?’

उत्तर देते हुए एक राजदरबारी पूर्ण कस्सप का नाम लेता है, ‘महाराज! पूर्ण कस्सप, संघस्वामी, गणाध्यक्ष, गणप्रमुख, बहुसम्मानित, वयोवृद्ध, ज्ञानी, यशस्वी, मतसंस्थापक और बहुप्रज्ञ हैं. आप उन्हीं से ज्ञानचर्चा करें.’ अजातशत्रु के शांत रहने पर दूसरे दरबारी बारीबारी से मक्खलि गोसाल, पुकुद कात्यायन, अजित केशकंबलि, निगंठ नाथपुत्त तथा संजय वेलट्ठिपुत्त का नाम लेते हैं. अजातशत्रु उनसे प्रभावित होने के बजाय जीवक से पूछता है, ‘सौम्य जीवक तुम चुपचाप क्यों बैठे हो?’ उत्तर में जीवक अपने आम्रकुंज में ठहरे हुए गौतम बुद्ध के बारे में बताता है, ‘वह भगवान अर्हंत्, सम्यक संबुद्ध, विद्या एवं सदाचरण से युक्त, सुगत, सदोपदेशक, प्रबुद्ध और प्रज्ञावान हैं. उनके साथ धर्मचर्चा करके आपको शांति अवश्य प्राप्त होगी. सम्राट कोई प्रश्न या शंका जाहिर करने के बजाय आम्रकुंज तक चलने का आदेश देता है. तैयारी होते ही वह अपनी पांच सौ पत्नियों को हथिनियों पर बिठा, स्वयं राजसी हाथी पर सवार होकर, पूरे ठाठबाट के साथ बुद्ध से भेंट करने हेतु प्रस्थान कर देता है.

आम्रकुंज में संपूर्ण शांति देख अजातशत्रु के मन में संदेह उमड़ आता है. संदेह जिनसे मिलने जा रहा है उनके बुद्धत्व को लेकर नहीं है. उसका आधार वह सामान्य भय है जो हर व्यक्ति के मन में छिपा होता है. डर से मुक्ति के साधनों की खोज ही व्यक्ति को धर्म की ओर प्रवृत्त करती है. अजातशत्रु सम्राट है, इसलिए उसे राजनीतिक दुश्मनों का भी भय है, ‘सौम्य जीवक! कहीं तुम मुझसे छल तो नहीं कर रहे हो? कहीं इसके पीछे मेरे शत्रुओं की कोई चाल तो नहीं है? तुमने बताया कि शास्ता के साथ 1250 भिक्षु भी हैं. पर यहां तो गहन सन्नाटा है! जरासी हलचल तक नहीं है! कहीं मुझे धोखा तो नहीं दिया जा रहा?’ जीवक के आश्वासन देने पर सम्राट आम्रकुंज में प्रवेश करता है. फिर हाथी से उतरकर पैदल ही उस स्थान तक पहुंचता है, जहां बुद्ध अपने शिष्यों के साथ निर्मलशांत जलाशय के समान भिक्षुसंघ के बीच दिव्य कमल की भांति विराजमान हैं. पूरा वातावरण अजातशत्रु का मन मोह लेता है. वह सोचता हैᅳ‘यह भिक्षुसंघ जिस पवित्र शांति से युक्त है, क्या ऐसी ही शांति मेरे पुत्र उभयभद्र को भी प्राप्त हो सकती है?’ वह शास्ता को नमन करता है.

कुशलक्षेम जानने के पश्चात शास्ता गौतमबुद्ध उससे संबोधित होते हैं. अवसर मिलते ही अजातशत्रु प्रश्न करता है. उसकी जिज्ञासा एकदम स्पष्ट हैᅳ‘भंते जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के शिल्प यथा हस्तिआरोहण, अश्वारोहण, धनुर्विद्या, रथिक तथा शिल्पकार जैसे कि युद्धध्वज धारक, उग्र योद्धा, महानाग(हाथी से युद्ध करने वाले), दास, कल्पक(नाई), नहापक(नहलाने वाले), काष्ठकार, चर्मकार, रजक, मालाकार, पेशकार, लौहकर्मी आदि अपनेअपने कर्तव्य द्वारा स्वयं को तृप्त करते हैं, उनका फल प्राप्त करते हैं, अपने सगेसंबंधियों, मित्रों, अमात्यों को भी लाभ पहुंचाते हैं, क्या वैसा ही फल इसी जन्म में श्रामण्य जीवन द्वारा भी संभव है?’ प्रश्न सुनकर बुद्ध के चेहरे का तेज बढ़ जाता है. सीधे उत्तर देने के बजाय वे राजा से प्रतिप्रश्न करते हैंᅳ‘क्या यही प्रश्न तुमने दूसरे श्रमणों के सम्मुख भी रखा है?’ अजातशत्रु के ‘हां’ कहने पर वे उनके उत्तर बताने को कहते हैं. आगे एकएक कर सभी छह प्रमुख मतावलंबियों के दर्शन पर चर्चा होती है. चर्चा का एकमात्र ध्येय समकालीन दर्शनों के सापेक्ष बुद्ध के दर्शन की श्रेष्ठता को स्थापित करना है.

सर्वप्रथम पूर्ण कस्सप के विचारों का जिक्र होता है. अजातशत्रु बताता है कि जब उसने पूर्ण कस्सप से यही प्रश्न किया तो उसका कहना थाᅳ‘कार्य करतेकराते हुए, छेदन करतेकराते, शोक करतेकराते, चलतेचलाते, परेशान करतेकराते, गांव लूटते, चोरीसैंधमारी करतेकराते, हत्या करतेकराते, गंगा के उत्तर या दक्षिण जाते, दान देतेदिलाते रहने से कभी कोई पाप नहीं होता. यहां तक कि यदि कोई व्यक्ति छुरे से किसी दूसरे व्यक्ति की गर्दन भी तराश दे, तब भी उससे कोई पाप नहीं होता. दान देने, दान लेने या सत्य बोलने से न पुण्य का आगम होता न ही पाप का….’ पूर्ण कस्सप के अनुसार जीवजगत की संपूर्ण हलचल सहित ब्रह्मांड की अनेकानेक क्रियाअभिक्रियाएं भौतिक घटनाएं मात्र हैं. उनसे मानव जीवन भौतिक स्तर पर भले प्रभावित हो, मगर उनका कोई नैतिक या दैवीय आधार नहीं होता. प्राकृतिक घटनाओं का कोई परोक्ष संदेश भी नहीं है. जो है, जैसा है वह स्वतः गतिमान है. पूर्ण कस्सप का संदेश संपूर्ण ‘अक्रियावाद’ में सिमटा हुआ है. उसके अनुसार मनुष्य स्वयं भौतिक परिवेश का हिस्साभर है और उसी के नियमों से पूरी तरह अनुशासित होता है. घटनाएं उसके नियंत्रण से बाहर होती हैं. इसलिए जो होता है उसका मनुष्य के नैतिक या पराभौतिक जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. पूर्ण कस्सप के विचारों से असंतुष्ट अजातशत्रु कहता है, ‘भंते जैसे कोई पूछे आम, जवाब मिले कटहल, और पूछे कटहल, जवाब मिले आम. ऐसे ही मैंने जो पूछा था, उसके स्थान पर पूर्ण कस्सप ने ‘अक्रियावाद’ का बखान किया. उनके कथन की मैंने न तो प्रशंसा की, न ही निंदा. मैंने न तो उनका अभिनंदन किया, न ही तिरस्कार. केवल शांतभाव से वहां से उठकर चला आया.’

पूर्ण कस्सप के पश्चात अगला नंबर मक्खलि गोसाल का आता है. अजातशत्रु पुनः अपने प्रश्न को उठाता है, ‘भंते अगले दिन मैं मक्खलि गोसाल के यहां गया. वहां कुशलक्षेम पूछने के पश्चात पूछा, ‘महाराज, जिस प्रकार दूसरे शिल्पों का लाभ व्यक्ति अपने इसी जन्म में प्राप्त करता है, क्या श्रामण्य जीवन का लाभ भी मनुष्य इसी जन्म में प्राप्त कर सकता है?’ मक्खलि गोसाल की ओर से जो उत्तर मिलता है, उसमें उनके जीवनदर्शन की झलक मिलती हैᅳ‘घटनाएं स्वतः घटती हैं. उनका न तो कोई कारण होता है, न ही कोई पूर्वनिर्धारित विधान. उनके क्लेश और शुद्धि का कोई हेतु नहीं है. प्रत्यय भी नहीं है. बिना हेतु और प्रत्यय के सत्व क्लेश और शुद्धि प्राप्त करते हैं. न तो कोई बल है, न ही वीर्य, न ही पराक्रम. सभी भूत जगत, प्राणिमात्र आदि परवश और नियति के अधीन हैं. निर्बल, निर्वीर्य भाग्य और संयोग के फेर से सब छह जातियों में उत्पन्न हो सुखदुख का भोग करते हैं…..संसार में सुख और दुख बराबर हैं. घटनाबढ़ना, उठनागिरना, उत्कर्षअपकर्ष जैसा कुछ नहीं होता. जैसे गेंद फेंकने पर उछलकर गिरती है और फिर शांत हो जाती है. वैसे ही ज्ञानी और मूर्ख सांसारिक कर्मों से गुजरते हुए अपने दुख का अंत करते रहते हैं.’ इस तरह ‘दीघनिकाय’ में मक्खलि गोसाल थोड़े ऐरफेर के साथ पूर्ण कस्सप के विचारों को ही दोहराता है. अजातशत्रु की प्रतिक्रिया पहले जैसी होती है. ‘भंते! जैसे किसी से आम के बारे में पूछा जाए और वह कटहल के बारे में बताने लगे और कटहल के बारे में पूछने पर आम का गुणगान करने लगे, ऐसे ही मैंने जो प्रश्न किया था, उसके उत्तर में मक्खलि गोसाल ने ‘दैववाद’ का बखान किया. मैं असंतुष्ट था. फिर भी बिना कोई प्रतिवाद किए वहां से चला आया.

अगले चरण में अजित केशकंबलि के विचारांे की झलक है. अजातशत्रु कहता है, ‘हे राजन! अजित केशकंबलि के समक्ष पहुँचकर मैंने वही प्रश्न किया जो मक्खलि गोसाल एवं पूर्ण कस्सप के समक्ष किया था. उत्तर में उसने बतायाᅳ‘महाराज! न दान है न यज्ञ है, न होम है न ही पापपुण्य. न लोक है, न ही परलोक है, न माता हैं न ही पिता. न तो अयोनिज सत्व हैं, न ही ज्ञानी पुरुष जो इस लोक को जानकर इसकी व्याख्या करेंगे. मानवमात्र चार तत्वों के योग से बना है. जब कोई मरता है तो पृथ्वी महापृथ्वी में, विलीन हो जाती है, जल, तेज, वायु आदि आकाश में विलीन हो जाते हैं. मृत देह को लोग खाट पर डालकर ले जाते हैं. उसकी निंदा या प्रशंसा की होती है. थोड़ी देर बार सबकुछ भस्म हो जाता है. हड्डियां उजली हो श्वेत कपोतों की भांति छितरा जाती हैं. न आत्मा है न ही परमात्मा. केवल मूर्ख लोग दान देते हैं, जिसका कोई फल नही होता. पंडित हो या मूर्ख, मरने के बाद सबकुछ नष्ट हो जाता है. कुछ भी शेष नहीं बचता.’ महाबोधि को संबोधित होकर अजातशत्रु फिर उसी प्रतिक्रिया पर लौट आता है, ‘भंते! जैसे कोई कटहल पूछने पर आम के बारे में बतावे और आम पूछने पर कटहल का वर्णन करने लगे, वैसा ही मुझे लगा. फिर भी बगैर कोई प्रतिवाद किए, शांतमन वहां से चला आया. अगले दिन मैं पुकुद कात्यायन के सान्निध्य में पहुंचा. उनसे भी वही प्रश्न किया.

पुकुद कात्यायन का मानना है कि संपूर्ण सृष्टि, ‘कुल सात पदार्थों से बनी है. उन्हें न तो बदला जाता है, न ही विकारग्रस्त किया जा सकता है. सातों पदार्थ एकदूसरे से स्वतंत्र और निरपेक्ष हैं. वे न तो एकदूसरे को हानि पहुंचाते हैं, न ही किसी और तरह से प्रभावित करते हैं. वे सात पदार्थ हैंपृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश, सुख, दुख एवं जीवन. मनुष्य को इन सातों को लेकर हर्षशोक से बचना चाहिए. सातों मूल पदार्थ हैं. वे अचल, अखंड, निरपेक्ष और अपरिवर्तनीय हैं. इस तरह वे पूरी तरह अजर, अमर, अविनाशी और अपरिवर्तनीय हैं. यदि कोई तेज धार के हथियार से किसी की गर्दन तराश देता है तब भी वह कोई अपराध नहीं करता. केवल अपने हथियार से शरीर के दो हिस्सों के बीच कुछ अंतराल बना देता है.’ पुकुद के विचारों के उल्लेख के पश्चात अजातशत्रु तथागत से कहता हैᅳ‘हे भंते! मैंने तो केवल श्रामण्य जीवन के फल के बारे में पूछा था. उत्तर में पकुद ने इधरउधर की बातें कीं. उसके अनुसार सृष्टि के बीच कोई अंतर्संबद्धता नहीं है. सबकुछ निरपेक्ष और स्वतंत्र है. ऐसा भला कैसे हो सकता है!’

इसके पश्चात वह निगंठ नाथपुत्त के विचारों पर टिप्पणी करता हैᅳ‘भंते! जब मैंने वही प्रश्न निगंठ नाथपुत्त से किया तो उसने चर्तुआयामी संवर(अवरोध) का उपदेश दिया. उसका कहना था, ‘निगंठ(निर्गंथ: जिसमें कोई गांठ न हो) चार प्रकार के संवरों से घिरा होता है. वे चार प्रकार के संवर क्या हैं? तो सुनिए, पहला वह जल की भांति व्यवहार करता है. दूसरे वह सभी प्रकार के पापों का वारण करता है. तीसरा, पापों का वारण करने के बावजूद वह निष्पाप होता है. चौथा, वह सभी पापों का वारण करने में लगा रहता है. चार संवरों से संवृत होने के कारण ही वह निर्गंठ, निष्पाप, अनिच्छुक, संयमी और स्थितात्मा कहलाता है.’

संजय वेलट्ठिपुत्त का उत्तर अनेक संशयों से भरा था. ‘महाराज यदि आप पूछें कि क्या इस लोक अलावा भी कहीं जीवन(मृत्यु पश्चात) है? यदि मैं यह सोचता भी हूं कि मृत्युपश्चात भी जीवन है. तो मैं आपको क्यों बताऊं! यदि मैं सोचता हूं कि परलोक है तो मैं आपको क्यों बताऊं कि परलोक है. इसलिए मैं ऐसा नहीं कहता. मैं वैसा भी नहीं कहता. मैं किसी और तरह से भी नहीं कहता. मैं ऐसा भी नहीं कहता कि यह नहीं है. मैं नहीं कहता कि नहीं, नहीं है. मैं नहीं कहता कि परलोक है. मैं नहीं कहता कि परलोक नहीं है. मैं नहीं कहता कि तथागत मरने के बाद भी होते हैं. मैं नहीं कहता कि तथागत मरणोपरांत नहीं होते हैं. कोई मुझसे पूछे कि क्या तथागत मरने के बाद होते हैं? तो मैं वैसा भी नहीं कहता.’ यानी संदेह ही संदेह. कुछ भी निश्चित नहीं. जिस संसार में हम रहते हैं, वहां जीवन को सुखी एवं सुरक्षित बनाने के लिए कुछ विश्वास भी करना पड़ता है. किंतु संजय वेलट्ठिपुत्त के विचार तो पूरी तरह संदेह में लिपटे थे.

इन विचारों का गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया जाए तो कोई खास अंतर दिखाई नहीं पड़ता. लगता है कि सभी दार्शनिक एक ही बात को घुमाफिराकर कह रहे हैं. जहां कुछ अंतर है, वहां भी स्पष्टता का अभाव है. जिस कारण उनकी ओर से किसी परीपक्व दार्शनिक विचारधारा की तस्वीर नहीं बन पाती. दूसरा अंतर प्रवृत्ति को लेकर भी है. अजातशत्रु का प्रश्न श्रमण जीवन की उपयोगिता को लेकर है. वह जानना चाहता है कि जो लोग सश्रम आजीविका कमाकर लोकजीवन में अपना योगदान देते हैं, तथा वे लोग जो सांसारिक जीवन को त्यागकर निष्पृह, निर्लिप्त, असांसारिक और यायावर जीवन अपनाते हैंदोनों के फल में क्या अंतर है? लोकजीवन में सीधे सहयोग करने वालों का योगदान स्पष्ट दिखता है. जबकि श्रमण जीवन को अपनाने वाले लोगों का योगदानभले ही उनके अपने निमित्त हो अथवा कुल समाज के, नजर नहीं आता. अजातशत्रु की यह जिज्ञासा ही उसे छह दार्शनिकों तक ले जाती है. मगर उत्तर देने के बजाय वे सब अपनेअपने दार्शनिक विचारों का वर्णन करने लगते हैं. उनके उत्तर संवाद की काल्पनिकता की ओर संकेत करते हैं. क्योंकि निगंठ नाथपुत्त को छोड़कर जिन्होंने आगे चलकर जैन मत का प्रवत्र्तन किया, शेष पांचों दार्शनिकों के लिए श्रमण संस्कृति को लेकर खास उत्साह नहीं था. ‘दीघनिकाय’ में उन्हें ‘संघ प्रमुख’, गणाध्यक्ष, ज्ञानी, अनुभवी, यशस्वी, तीर्थंकर(मतसंस्थापक) आदि बताया गया है. यहां संघ प्रमुख से लेखक का आशय अनुयायियों के समुच्चय से है. नास्तिक दार्शनिकों में सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर भले ही मतांतर हो, किंतु वे जीवन से भागने के बजाय उसे भोगने में विश्वास रखते थे. इस संबंध में वे सभी एकमत थे. सुख उनके लिए मायावी अथवा हेय वस्तु नहीं था. बल्कि वह तत्व था(और है भी), जो जीवन को उत्सव में ढालने के लिए आवश्यक होता हैᅳ‘दुख के डर से हमें उस सुख से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए, जिसे हमारी बुद्धि अपने लिए अनुकूल समझती है. पशुओं द्वारा चर लिए जाने के भय से लोग धान बोना बंद नहीं कर देते. न ही भिखारियों के भय से भोजन पकाना रोक देते हैं.(माधवाचार्य, सर्वदर्शन संग्रह, 9.3). धर्म और मोक्ष के नाम पर जब समस्त संसाधन ब्राह्मणों और क्षत्रियों ने बांट लिए हों, तथा अपने श्रमकौशल के आधार पर आजीविका कमाने वाले लोगों को दास का जीवन जीना पड़ता हो, अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए ब्राह्मण वर्ग उन्हें त्याग और मोह पाठ पढ़ाता हो तथा स्वयं यज्ञ और बलियों के नाम पर भोगविलास में लिप्त रहता हो, तब ऐसा सोच क्रांतिकारी ही कहा जाएगा.

आजीवक दार्शनिकों के बारे में गहन शोध करने वाले ए. एल बाशम का तो यहां तक मानना है कि निगंठ नाथपुत्त सहित सभी छह उपदेशक एक ही ‘उपदेश समवाय के अंश थे.’ जैन और बौद्ध लेखकों ने उनके विचारों को घुमाफिराकर प्रस्तुत किया है. पांचवी शताब्दी के बौद्ध विद्वान बुद्धघोष के अनुसार पूर्ण कस्सप दास थे. जिस स्वामी के यहां रहते थे, उसके पास पहले से ही 99 दास थे. कस्सप के शामिल होने के पश्चात संख्या बढ़कर 100 हो गई. इस संख्या को पूर्ण मानते हुए उनका नामकरण किया गया था. जैन परंपरा में बताया गया है कि वे संपूर्ण ज्ञानी होने के कारण ही वे ‘पूर्ण’ कहलाए. ‘कस्सप’ उपनाम को देखते हुए वेणीमाधव बरुआ उन्हें ब्राह्मण गौत्रीय बताते हैं. यह बात हजम नहीं होती. क्योंकि जिस काल में पूर्ण कस्सप का जन्म हुआ, उसमें ब्राह्मण को, वह चाहे जितना विपन्न हो, दास नहीं बनाया जा सकता था. दूसरे कस्सप गोत्रनाम के शूद्रों में भी होते हैं. मक्खलि का जन्म गोशाला में हुआ था. इसी से उनके नाम के साथ ‘गोसाल’ जुड़ा. जैन परंपरा के अनुसार ‘मक्खलि’ ‘मंख’ से बना है. मंख एक पिछड़ी जाति थी. जिसके सदस्य चारण या भाट जैसा जीवन यापन करते हैं. जैन साहित्य के अनुसार मक्खलि हाथ में मूर्ति लेकर भटका करता था. अजित केशकंबलि के बारे में बताया जाता है कि वह शरीर पर हमेशा मोटा कंबल लिपेटे रखता था. पुकुद कात्यायन और संजय वेलट्ठिपुत्त के बारे में अधिक पता नहीं है. बुद्धघोष ने पकुध को सनकी बताया है. उसके अनुसार वह हमेशा गर्म पानी ही ग्रहण करता था. नदीनाले को पार करना पाप समझता था. यदि करना ही पड़े तो बाद में प्रायश्चित करता था. यदि गर्म पानी न मिले तो वह नहाना छोड़ देता था. संजय वेलट्ठिपुत्र को कुछ विद्वान ‘संजय परिब्बाक’ कहते हैं. संजय के साथी जब अपने गुरु का साथ छोड़ देते हैं. इससे निराश होकर वह आत्महत्या कर लेता है. पूर्ण कस्सप भी बुद्ध से जादू के खेल में पराजित आत्महत्या का मार्ग चुनता है. कुछ विद्वानों का मानना है कि लोकायत दर्शन, जिसे वे अपनीअपनी तरह से परिभाषित करते हैं, का ईसा से 250-300 साल पहले तक एक विशिष्ट ग्रंथ था. इन दिनों उसका कोई अस्तित्व नहीं है. संभव है उसे नष्ट कर दिया गया हो. पोंगा पंथी पुरोहितों के लिए यह बहुत सामान्य बात थी.

हो सकता है अजातशत्रु और छह भौतिकवादी विचारकों की भंेट बौद्ध लेखकों की कल्पना की उपज हो. अपने विचारों को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए उन्होंने भौतिकवादी विचारकों का नाम जोड़ दिया हो. लेकिन छह नास्तिक विचारकों का उल्लेख जैन और बौद्ध दर्शनों में अनेक जगह हुआ है. इससे उन विचारकों को कल्पित नहीं कहा जा सकता. बल्कि इससे उनकी समाज में व्यापक स्वीकार्यता का पता चलता है. इसलिए कि अपने मत की संस्थापना के लिए बौद्ध दार्शनिकों को न केवल अपने पूर्ववत्र्ती दार्शनिकों के मत का खंडन अनिवार्य जान पड़ता है, बल्कि खंडन के लिए शक्तिशाली मगध सम्राट अजातशत्रु को बीच में लाना पड़ता है. वस्तुतः ‘दीघनिकाय’ के जिस अध्याय में छह भौतिकवादी नास्तिक दार्शनिकों का उल्लेख है, उसका ध्येय इन विचारकों के दर्शन का वर्णन या व्याख्या करना नहीं है, अपितु ‘श्रामण्य जीवन के फल’ की समीक्षा करते हुए बौद्ध धर्मदर्शन एवं भिक्षु संघ के प्रति सम्मानभाव उत्पन्न करना है. अपने धर्मसंप्रदाय के लिए दूसरे धर्मसंप्रदाय को कमतर आंकना, उनमें जानबूझकर खोट निकालना लोगों की पुरानी प्रवृत्ति रही है. बौद्ध विचारक भी इस प्रवृत्ति से मुक्त न थे. विडंबना है कि प्राचीन भौतिकवादी दर्शनों के अध्ययनमनन के लिए कोई स्वतंत्र ग्रंथ प्राप्त नहीं होता. विवश होकर हमें उन्हीं जैन और बौद्ध स्रोतों की ओर लौटना पड़ता है जिनके लेखक उनके प्रतिद्विंद्वी और आलोचक रहे हैं.

वस्तुतः ढाई हजार वर्ष पहले तक, वर्णव्यवस्था के चलते भारत में ब्राह्मणेत्तर वर्गों में पढ़नेलिखने के प्रति जागरूकता का अभाव था. स्वयं बुद्ध ने अपने विचारों के बारे में कुछ नहीं लिखा. वे आजीवन भिक्षु वेश में घूमघूमकर उपदेश देते रहे. अपने मत के प्रचार के लिए वे अनेक सम्राटों से भी मिले. शिष्यों, यहां तक कि अपने पुत्रपुत्रियों को भी उन्होंने धर्मप्रचार में लगा दिया. बुद्ध के विचारों से प्रभावित होकर अनेक क्षत्रिय सम्राट, विशेषकर वे जो यज्ञों में दी जाने वाली बलियों का विरोध कर रहे थे, संघ के समर्थन में आए. यह उनकी प्रतिष्ठा ही थी कि मगध जैसे बलशाली साम्राज्य का अधिपति अजातशत्रु, उनकी सहमति के अभाव में वज्जिसंघों पर आक्रमण का इरादा टाल देता है. बाद में भी सीधे आक्रमण करने के बजाय कूटनीति से काम लेता है. बुद्ध और उनके शिष्यों के प्रयास के फलस्वरूप भिक्षु संघ बुद्ध के जीवनकाल में ही इतना संगठित हो चुका था कि उनके जीवनकर्म को संकलित करना, उसके अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए आवश्यक था. लेकिन हमारी जिज्ञासा यहीं शांत नहीं होती. कुछ प्रश्न अब भी अनुत्तरित रह जाते हैं. क्योंकि ‘दीघनिकाय’ के अनुसार संघ तो नास्तिक दार्शनिकों के भी थे. ‘संयुत्त निकाय’(1/69) के एक प्रसंग के अनुसार कोशल सम्राट प्रसेनदि मक्खलि गोसाल तथा अन्य नास्तिक विचारकों की तुलना में गौतमबुद्ध को नौसीखिया मानता था. क्यों न हो, उस समय तक आजीवक धर्म के समर्थकों की संख्या बौद्ध के अनुयायियों से अधिक थी. बावजूद इसके अपने प्रवत्र्तक और शास्ता के जीवन संबंधी घटनाओं एवं विचारों को संग्रहीत करने का जो युगांतरकारी कार्य बुद्ध के शिष्यों ने किया, वैसा कार्य पूर्ण कस्सप, मक्खलि गोसाल, अजित केशकंबलि, पकुध आदि के शिष्यों ने क्यों नहीं किया? यह ऐसी पहेली है, जिसका समाधान हमें भारतीय समाज की अंतग्र्रंथियों को सुलझाने में मदद कर सकता है.

दीघनिकाय’ में जिन छह नास्तिक विचारकों का जिक्र हुआ है, उनमें केवल निगंठ नाथपुत्त ऐसे हैं जो आगे चलकर जैन दर्शन के प्रवत्र्तक महावीर स्वामी के रूप में ख्यात हुए. हालांकि उन्हें मिली सफलता बुद्ध की सफलता के आगे नगण्य थी. लेकिन जैन दर्शन को लेकर विपुल वाङ्मय आज उपलब्ध है. उसके माध्यम से महावीर के जीवन के बारे में हमें प्रामाणिक जानकारी प्राप्त है. बाकी के बारे में जैन, बौद्ध और तमिल ग्रंथों में यत्रतत्र उपलब्ध सामग्री के अलावा प्रामाणिक सूचनाओं का अभाव है. जो जानकारी मिलती है, उसमें भी अंतर हैं. उदाहरण के लिए ‘दीघनिकाय’ में पांचों नास्तिक विचारकों को बुद्ध का समकालीन बताया गया है. जबकि ‘महाबोधि जातक’ के अनुसार वे पांचों बुद्ध के पूर्ववर्ती थे. अपने पूर्वजन्मों में बुद्ध ने उन पांचों को अलगअलग परास्त किया था. नास्तिक दार्शनिकों का जिक्र ‘मिलिंद प्रश्न’ में भी हुआ है, जो ‘दीघनिकाय’ से 250-300 वर्ष बाद की रचना है. अंतर मात्र इतना है कि ‘दीघनिकाय’ में संवाद सम्राट अजातशत्रु और गौतम बुद्ध के बीच है, ‘मिलिंद प्रश्न’ में अजातशत्रु की जगह ग्रीक मूल का भारतीय सम्राट मिनांडर ले लेता है. दोनों की शब्दावलि एक समान है. मिनांडर ने भारत में ईसा पूर्व पहलीदूसरी शताब्दी के बीच राज्य किया था. ‘मिलिंद प्रश्न’ को तभी की रचना बताया जाता है. विषयवस्तु के आधार पर वह किसी अधपके लेखक की रचना लगती है. इसलिए उसकी मौलिकता पर संदेह है. मल्लशेखर, दुर्गाप्रसाद चट्टोपाध्याय आदि विद्वानों का मानना है कि मिलिंद प्रश्न का संबंधित प्रकरण ‘दीघनिकाय’ के समन्न्फल सुत्तकी सस्ती नकल है.

इस विवरण के बावजूद हमारा एक प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है. आखिर क्या कारण है कि पांचों नास्तिक दार्शनिकों के जीवन और कर्म के बारे में आवश्यक जानकारी का अभाव है? महाभारतकाल तक वर्णव्यवस्था जाति व्यवस्था के रूप में रूढ़ हो चुकी थी. ब्राह्मण समाज के शीर्ष पर आसीन थे. बिना उनकी सहमति के किसी भी निर्णय को लागू कर पाना असंभव था. निहित स्वार्थ के लिए वे नास्तिक विचारधारा को नापसंद करते थे. चूंकि नास्तिक विचारक न केवल ईश्वर और उसकी सत्ता, बल्कि सभी प्रकार के कर्मकांडों का, जिनके चलते ब्राह्मणों को विशेषाधिकार प्राप्त थे, विरोध करते थे. अतएव ब्राह्मणों द्वारा जो उस समय का पढ़ालिखा वर्ग थाउनकी उपेक्षा स्वाभाविक थी. यही कारण कि नास्तिक विचारकों के साथ ही उनके विचार भी इस तरह विला गए कि उनके कुछ अवधि बाद किसी ने उन्हें आगे बढ़ाने की आवश्यकता नहीं समझी. कुछ विद्वानों का मानना है कि लोकायत दर्शन, जिसे वे अपनीअपनी तरह से परिभाषित करते हैं, का ईसा से 250-300 साल पहले तक एक विशिष्ट ग्रंथ था. इन दिनों उस ग्रंथ का कोई अस्तित्व नहीं है. इसलिए नास्तिक दार्शनिकों के विचारों को लेकर अधिक जानकारी प्राप्त नहीं होती. फिर भी कुछ बातें हैं जो उनकी बौद्धिक पैठ और लोकप्रियता को दर्शाती हैं. जैसे कि गोसाल को महावीर से दो वर्ष पहले ही ‘जिन्’ की पदवी प्राप्त हो चुकी थी. और अपने समय में गोसाल के अनुयायियों की संख्या गौतम बुद्ध के समर्थकों से अधिक थी. जैन और बौद्ध ग्रंथों में उनके विचारों को तोड़मरोड़कर पूर्वाग्रह के साथ पेश किया गया है. कई जगह तो इतने हल्के तरीके से कि मामला सुलझने के बजाय और भी उलझता चला जाता है. इसका कारण भारतीय समाज की जातीय संरचना है, जो गैरद्विजों की बौद्धिक क्षमता को लेकर जानबूझकर संशयग्रस्त रही है.

महावीर स्वामी और बुद्ध दोनों क्षत्रिय कुलोत्पन्न थे. समाज के शीर्ष वर्गों पर उनका प्रभाव था. बुद्ध के प्रमुख शिष्य आनंद, सारिपुत्र, मोदग्लायन आदि ब्राह्मण वर्ग से आए थे. बुद्ध जानते थे कि प्रजा अपने राजा का अनुसरण करती है. इसलिए वे सम्राटों और समाज के श्रेष्ठि वर्ग को अपने प्रभाव में लेने की सीधी कोशिश करते हैं. इसका लाभ भी उन्हें मिलता है. उनका धर्मदर्शन उनके जीवनकाल में ही काफी प्रतिष्ठा बटोर चुका था. इसलिए बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के तुरंत बाद उनके शिष्यों ने उनके विचारों और जीवनयात्रा को शब्दबद्ध करना आरंभ कर दिया था. बुद्ध ने अपने शिष्यों को धर्मप्रचार करने उन देशों में भी भेजा था, जिनमें जाति और वर्ण व्यवस्था का नामोनिशां न था.

बुद्ध द्वारा स्थापित भिक्षुसंघ दिखावे और कर्मकांड की संस्कृति से मुक्त था. सहजता के साथसाथ वह उस सामूहिकताबोध की भी रक्षा करता था, जो ब्राह्मण धर्म के नेतृत्व में वर्णव्यवस्था के मजबूत होने के साथसाथ छीजता जा रहा था. इसलिए जनसाधारण को जैसे ही बुद्ध मार्ग के रूप में पुरोहितवाद से मुक्ति का रास्ता दिखाई दिया, उसने ब्राह्मणवाद से किनारा करना आरंभ कर दिया. श्रेष्ठिवगण, शिल्पकार, श्रमिक वर्ग यज्ञादि आयोजनों तथा बलिप्रथा से होने वाले नुकसान से बचने के लिए पहले आजीवक धर्म की ओर मुड़े. मजदूर, शिल्पकार, नाई, धोबी, काष्ठकार, किसान, तेली, बुनकर जैसे किसानों, मजदूरों और शिल्पकारों के संगठनों ने खुलकर आजीवकों का साथ दिया. आगे चलकर बुद्ध के नेतृत्व में नए धर्मदर्शन का विकास हुआ तो वे उसकी ओर पलायन करने लगे. जातीय भेदभाव एवं पुरोहितवाद के सताए लोगों ने भी घोर नास्तिकतावाद तथा विशेषाधिकार संपन्न ब्राह्मणवाद के बीच मध्य मार्गी बौद्ध धर्म को अपनाना ही उचित समझा था. उसके फलस्वरूप जैन और बौद्ध दर्शन स्वयं को ब्राह्मण धर्म का विकल्प प्रस्तुत करने में सफल सिद्ध हुए. बावजूद इसके नास्तिक विचारकों की महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. क्योंकि बौद्ध और जैन धर्म के उदय से पहले नास्तिक विचारकों ने ही ब्राह्मणवादी दर्शनों के विरोध की जमीन तैयार की थी, जिसपर आगे चलकर उन दोनों दर्शनों ने अपनी सफलता की महागाथा लिखी और मानवतावादी दर्शन कहलाए. नास्तिक विचारकों के जीवन के बारे में अधिक जानकारी मौजूद नहीं है. लेकिन जितना मौजूद है, उससे भी पता चलता है कि नास्तिक विचारकों के लिए अपने आप को संगठित कर चुके ब्राह्मणवाद के किले में सैंध लगाना आसान नहीं था. यह धारा के विरुद्ध चलने जैसा चुनौतीपूर्ण कार्य था, जिसे उन्होंने अपनी अद्वितीय प्रतिभा और लोकसमर्थन के दम पर संपन्न किया था. उन विचारकों के बारे में जानना भारतीय सभ्यता, संस्कृति और दर्शन के सबसे परिवर्तनकारी दौर से संवाद करने जैसा है.

अजातशत्रु का द्वैध

आलेख के इस हिस्से में हम जो लिखने जा रहे हैं वह जिन स्रोतोंं पर आधारित है, उनमें एक ही घटना और पात्र को लेकर भिन्न प्रकार के संदर्भ मौजूद हैं. अतः हमारे इस प्रयास को सचाई की तहों में जाने की कोशिश समझना चाहिए. जिन स्रोतों पर यह आधारित है, उसके लेखकों और प्रस्तोताओं की मंशा, नास्तिक विचारकों तथा उनकी विचारधारा को लेकर ईमानदार विमर्श की थी ही नहीं. अगर वे ईमानदार होते तो उस विचारधारा को लेकर उनकी राय चाहे जो भी हो, सामग्री के आधारतथ्यों में पर्याप्त एकरूपता होती. उस अवस्था में वे उस विचारधारा के समानांतर लंबी लकीर खींच सकते थे. आखिरकार यह कतई आवश्यक नहीं कि अपनी लकीर को लंबा दिखाने के लिए पहले से मौजूद लकीर में कांटछांट की जाए. असली जीत तब है जब पहले से मौजूद लकीर की भलीभांति नापजोख कर, उसके समानांतर लंबी लकीर खींच दी जाए. परंतु, कदाचित विचारों के ढुलमुलपन अथवा आत्मविश्वास की कमी के चलते, उन्हें लगा होगा कि बिना लोकप्रियता की ऊंचाइयों को छू रही विचारधारा की ओर उंगली उठाए, उनकी अपनी विचारधारा की स्वीकार्यता असंभव है. वस्तुतः यह उनका युगसंस्कार था. राजनीति हो या विचार, उस दौर में विरोध को आत्मसात् करने के लिए बहुत सीमित आयाम थे. युद्ध में ‘जीत’ तभी मानी जाती थी जब दुश्मन को या तो कैद कर लिया जाए अथवा उसे मौत के घाट उतार दिया जाए. विरोधों और असहमतियों के साथ जीवन जीने के उस युग में बहुत सीमित अवसर थे. विचार भी राजनीति से अछूता न था. इसलिए नास्तिक दर्शन को लेकर बौद्ध एवं जैन स्रोतोंं से प्राप्त सामग्री में भारी अंतर है. क्योंकि वह उन विद्वानों द्वारा रची गई है, जो न केवल पहले से लोकमानस में जगह बना चुकी नास्तिक विचारधारा के, बल्कि आपस में भी वैचारिक प्रतिद्विंद्वी थे और मान चुके थे कि बगैर समानांतर विचारधाराओं को कठघरे में लाए, उनके विचारों की स्वीकार्यता असंभव है. मुश्किल यह भी कि हमारे पास ऐसा कोई जरिया नहीं है, जिससे हम नास्तिक विचारधारा के प्रमुख चिंतकों के जीवनकर्म के बारे में सहीसही जान सकें. साहित्य और संस्कृति के दस्तावेजीकरण का काम जब दूसरों को, खासकर उन्हें जिनकी उसमें कोई निष्ठा न हो, सौंप दिया जाए तो यही होता है. लिखने वाला अपने हितों और वर्गीय दृष्टिकोण को केंद्र में रखकर ही लिखता है. यानी इतिहास उसका होता है जो उसे लिखनालिखवाना जानता है. जो इतिहास की उपेक्षा करता है, वक्त उसे उपेक्षित छोड़कर आगे बढ़ जाता है. हमारी मुश्किल है कि ढाई हजार वर्ष पहले की उस बौद्धिक क्रांति के अतिमहत्त्वपूर्ण पक्ष की पड़ताल करने के लिए प्रामाणिक स्रोतों का सरासर अभाव है.

तमाम कमियों के बावजूद भारतीय नास्तिक दर्शनों की पहचान के कुछ चिह्न बाकी हैं तो इसका श्रेय भी बौद्ध एवं जैन ग्रंथों को जाता है. ठीक है, अपने दार्शनिक मतों को श्रेष्ठतर जताने के उन्होंने नास्तिक विचारों को तोड़मरोड़कर पेश किया था. लेकिन ब्राह्मणलेखकों की भांति उन्हें राक्षस, दैत्य, दानव, बेडौल, उच्छ्रंखल, विकारी और बुद्धिहीन बताकर उनके बौद्धिक सामथ्र्य को नकारने की कभी कोशिश भी नहीं की. आलोचना की, विचारों को आधाअधूरा पेश किया. तथापि विरोधी विचारधारा को बिसराया नहीं. आज यदि हम उनके नाम से परिचित हैं, पूर्वाग्रहों के साथ ही सही उनके विचारों की झलक प्राप्त कर सकते हैं, तो इसका श्रेय प्राचीन बौद्ध एवं जैन लेखकों को ही जाता है. यह ठीक है कि नास्तिक दार्शनिकों को लेकर अलगअलग ग्रंथों में प्राप्त जानकारी में भारी अंतर है. परंतु हमें याद रखना होगा कि ये ग्रंथ अलगअलग दौर में, विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि के लेखकों द्वारा रचे गए हैं. इसमें श्रुति परंपरा का भी योगदान रहा है. इसलिए प्रस्तुतीकरण में विविधता का होना स्वाभाविक है. इन परिस्थितियों में लिखे से ज्यादा महत्त्व अनलिखे का होता है. पाठकीय विवेक महत्त्वपूर्ण हो जाता है. अपेक्षा की जाती है कि पढ़ते समय पाठक अपने दिमाग की खिड़कियों, रोशनदानों को पूरी तरह से खुला रखे. जो लिखा गया है उसपर तो ध्यान दे ही, जो नहीं लिखा गया है, वह क्यों नहीं लिखा जा सका, इसपर भी विचार करता चले. चिंतन की लंबी यात्रा बताती है कि जो ‘क्यों’ का उत्तर खोजने में सफल रहता है, देरसबेर ‘क्या’ के बारे में सटीक आकलन तक पहुंच ही जाता है.

अब हम अजातशत्रु की समस्या पर लौटते हैं. उस समस्या पर विचार करते हैं जो उसे पहले नास्तिक विचारकों तथा अंत में गौतम बुद्ध तक ले जाती है. हर जगह वह एक ही बात जानना चाहता हैᅳ‘जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के शिल्प यथा हस्तिआरोहण, अश्वारोहण, धनुर्विद्या, रथिक तथा शिल्पकार जैसे कि युद्धध्वज धारक, उग्र योद्धा, महानाग, दास, कल्पक, नहापक, काष्ठकार, चर्मकार, रजक, मालाकार, पेशकार, लौहकर्मी आदि अपनेअपने कर्तव्य द्वारा स्वयं को तृप्त करते हैं, उनका फल प्राप्त करते हैं, अपने सगेसंबंधियों, मित्रों, अमात्यों को भी लाभ पहुंचाते हैं, क्या वही फल इस जन्म में श्रामण्य जीवन द्वारा संभव है?’ यह प्रश्न अपने आप में महत्त्वपूर्ण है. यह कोई बड़ी आध्यात्मिक समस्या खड़ी नहीं करता. अजातशत्रु श्रामण्य जीवन द्वारा उन्हीं फलों को प्राप्त करना चाहता है, जिन्हें साधारण शिल्पकार, योद्धा, महावत आदि सहज प्राप्त कर लेते हैं. बुद्ध को यदि सामान्य अर्थों में आध्यात्मिक व्यक्तित्व मान लिया जाए तो उनके आगे इस प्रश्न को उठाना विचित्र लग सकता है. लेकिन बुद्ध का अध्यात्मबोध परंपरा से हटकर था. वह लोककल्याण से विलग न था. लोककल्याण से जुड़ा होना, यानी नीतिसंगत होना बुद्ध के लिए इतना जरूरी था कि इसके लिए उन्होंने उन अनेेक आध्यात्मिक समस्याओं से भी किनारा कर लिया था, जो उन दिनों विभिन्न दार्शनिक संप्रदायों के बीच गर्मागरम बहस का माध्यम बनी हुई थीं. तब वे कौनसे दबाव हो सकते थे, जिन्होंने अजातशत्रु जैसे शक्तिशाली सम्राट को इसी जन्म में सुकून के लिए भटकने पर विवश कर दिया था. एक सम्राट होकर क्यों वह साधारण श्रमिकशिल्पकार, कृषक, कर्मकार आदि को मिलने वाली छोटीछोटी खुशियों के लिए आकुल है? यह ऐसी समस्या है जिसके समाधान से न केवल अजातशत्रु की आकुलता के कारण को समझा जा सकता है, बल्कि मक्खलि गोसाल सहित अन्यान्य आजीवकों को मिली व्यापक लोकस्वीकार्यता तथा उनके बरक्स बुद्ध को मिली आपेक्षिक सफलता पर भी रोशनी डाली जा सकती है.

उन दिनों बौद्ध दर्शन के उदय का आरंभिक चरण था. गौतम बुद्ध का हालांकि समकालीन सम्राटों और जनसाधारण पर प्रभाव था, लेकिन ब्राह्मण धर्म भी पूरी तरह मिटा नहीं था. ऋषिगण यज्ञों और दूसरे कर्मकांडों के जरिये लोगों को ‘कल्याण’ का पाठ पढ़ा रहे थे तो मुनिगण उपनिषदों, स्मृतियों, पुराणों तथा अन्यान्य ब्राह्मण ग्रंथों की रचना में व्यस्त थे. साधारण सम्राट के लिए यह संभव न था कि वह ब्राह्मण तथा उसके बताए मार्ग की उपेक्षा कर सके. मंत्री, अमात्य, पुरोहित, वैद्य, चिकित्सक, प्रशिक्षक, अध्यापक, ज्योतिषी जैसे शीर्ष पद केवल ब्राह्मण के लिए आरक्षित थे. क्षत्रिय का काम राजा के लिए युद्ध करना था. उनकी शिक्षादीक्षा युद्धकौशल तक सीमित रहती थी. युद्ध किससे हो? कब हो? पड़ोसी राज्यों को लेकर कैसी नीति अपनाई जाए? यह सब निर्णय लेना सामान्यतः ब्राह्मण पदाधिकारियों का काम था. इनके अलावा तीसरा वर्ग व्यापारियों का था, जिनका राजनीति से कोई संबंध न था. वे व्यापार करते और समयसमय पर सम्राट को कर, भेंट, उपहार आदि देकर राजा को प्रसन्न रखते थे. उनकी निष्ठा सिंहासन के प्रति रहती थी. उसपर बैठे व्यक्ति की ओर उनका ध्यान कम ही जाता था. चौैथा वर्ग दास, भृत्य, किसान, मजदूर, शिल्पकर्मी, छोटे व्यापारियों और साधारण योद्धाओं का था. उनका कार्य विभिन्न प्रकार की सेवाओं द्वारा शीर्षस्थ वर्गों को प्रसन्न रखना था.

अजातशत्रु का मंत्री चतुर ब्राह्मण वस्सकार था. कूटनीति में चाणक्य सरीखा. बुद्ध के मुंह से यह सुनकर कि वज्जि गणतंत्र जब तक संगठित हैं, उनको जीतना असंभव हैवह फूट डलवाकर अजातशत्रु की जीत को संभव बना देता है. बावजूद इसके अजातशत्रु ब्राह्मण पुरोहितों के फेर में नहीं पड़ता. यही उसका युगबोध है. उसके चरित्र की इन विशेषताओं के कारण उसे केंद्र में रखकर न जाने कितने ग्रंथ रचे गए हैं. उसे इसी जन्म में मोक्ष की तलाश है. ऐसा क्यों है? अजातशत्रु के जीवन में झांके तो इस रहस्य की पर्तें खुलती चली जाती हैं. मगध की सत्ता उसने अपने पिता की हत्या करके हथियाई थी. कहा जाता है कि पिता की हत्या के बाद अजातशत्रु को इतनी आत्मग्लानि हुई कि जीवनभर कभी ढंग से सो नहीं पाया था. अनजाना डर भीतर ही भीतर उसे कचोटता रहता था. जीवक के आम्रवन में बुद्ध से मिलने पहुंचा तो बुरी तरह घबराया हुआ था. भारतीय राजनीति के इतिहास में उसे अभिशप्त सम्राट भी माना जाता है. यह अभिशाप जन्म से ही उसके साथ जुड़ा था. उसके जन्म को लेकर जैन और बौद्ध ग्रंथों में अलगअलग कहानियां हैं. एकदूसरे से मिलतीजुलती. अजातशत्रु के पिता का नाम बिंबसार था. मां का नाम कोसल देवी, जिन्हें वैदेही भी कहा गया है. कहते हैं, रानी जब गर्भवती हुई तो उसकी इच्छा मनुष्य का मांस खाने की हुई. यह बहुत ही अनोखी, घिनौनी और पाशविक अनायास प्रकटी इच्छा थी. जिसने भी सुना सहम गया. फौरन ज्योतिषी को बुलवाया गया. कालगणना का दिखावा करने के बाद उसने बताया कि जातक पितृहंता होगा. एक दिन अपने ही जन्मदाता की मृत्यु का कारण बनेगा. घबराई रानी ने गर्भ को गिराने के कई उपाय किए. लेकिन सफलता नहीं मिली. इसी से उसका नामकरण हुआ, अजातशत्रु. अपने जन्मदाता का दुश्मन.

चाहे जितनी बुरी हो, पर मांस खाने की इच्छा मां के मन में कौंधी थी, फिर भी शिकार बना अबोध अजातशत्रु. हम उस व्यक्ति की मनस्थिति और यंत्रणा का अनुमान लगा पाने में असमर्थ हैं, जिसे जन्म के साथ ही कलंकित मान लिया गया हो. और जन्म के साथ ही जिसे मातापिता ने अपशकुनी मानकर कूड़े के ढेर पर फिंकवा दिया हो. मगध में सब कुछ चुपचाप हुआ था. किसी को खबर न होने दी थी. लेकिन अजातशत्रु की नियति तो मगधसम्राट बनना था. शिशु अजातशत्रु जब कूड़े में पड़ा था तो एक कौए ने उसकी कनिष्ठा अंगुली काट ली. पीड़ा से व्यथित शिशु जोरजोर से रोने लगा. पिता के कानों में आवाज पड़ी तो उसके हृदय में वात्सल्य उमड़ आया. राजा ने अबोध शिशु को गोदी में उठा लिया. घायल अंगुली से खून बहते देख सम्राट पिता ने उसे मुंह में डाल लिया और तब तक चूसता रहा, जब तक कि खून बहना बंद नहीं हो गया. उसके बाद अजातशत्रु का लालनपालन राजकुमार की तरह होने लगा. बड़ा होकर वह प्रतापी सम्राट बना. बहुत जल्दी उसने काशी, कोसल जैसे राज्यों को अपने राज्य में मिला लिया. उसकी नजर वज्जि गणतंत्रों पर थी. किंतु बुद्ध द्वारा मना किए जाने पर उसने तात्कालिक रूप से निर्णय टाल दिया. अजातशत्रु की मैत्री बुद्ध के फुफेरे भाई देवदत्त से थी. निहित स्वार्थ के लिए देवदत्त अजातशत्रु को सम्राट बनते देखना चाहता था. उसने अजातशत्रु को भड़काना आरंभ कर दिया. एक दिन देवदत्त की बातों में आकर उसने अपने पिता को कैद कर लिया और स्वयं मगधसम्राट बन बैठा. कुछ दिनों बाद बिंबसार की कारावास में ही मृत्यु हो गई.

एक महत्त्वाकांक्षी सम्राट जिसके नाम कई राजनीतिक सफलताएं थीं, वह अपने ही अपराधबोध के बीच जीने लगा. ब्राह्मण धर्म कर्मभोग के सिद्धांत पर टिका था. मानता था कि जो किया है उसका फल भोगना ही पड़ेगा. मगर इस जन्म में नहीं, अगले जन्म में. उनके अनुसार स्वर्गभोग या नर्कवास मृत्युपश्चात ही संभव है. अंतरपीड़ा से आकुल अजातशत्रु को संगठित ब्राह्मण धर्म से कोई उम्मीद न थी. उसके पास सबकुछ था. राजशाही ठाठबाट, सेवक, दासदासियां, विलासिता की सामग्री, सुरक्षा के लिए बेहद शक्तिशाली सेना. भोग के लिए पांच सौ से अधिक रानियां. मगर मन की शांति गायब थी. ग्लानिभाव उसे खाए जाता था. नास्तिक विचारक कार्यकारण संबंध पर विश्वास नहीं करते थे. उनके लिए सबकुछ नियतिबद्ध था. वे सबकुछ भुलाकर प्रकृस्थ हो जाने का उपदेश देते थे. यह दर्शन जनसाधारण के लिए कारगर था. उसका जीवन ही प्रकृति से बंधा था. लेकिन चारों ओर सुरक्षा सैनिकों के बीच असुरक्षा के एहसास के शिकार सम्राट को शांति प्रदान करने में वह अधिक कारगर न था. कदाचित ऐसे ही संतापग्रस्त लोगों के लिए बुद्ध निर्वाण के नाम से अपने समय का सबसे बड़ा संभ्रम रच रहे थे. ब्राह्मण दर्शनों में मोक्ष केवल मृत्योपरांत संभव था, बुद्ध उसे इसी जन्म में संभव बताते थे. सो ऐसे लोगों के लिए जिन्हें विलासवैभव के बीच भी मन की शांति नसीब न होती हो, निर्वाण बड़ा आकर्षण था.

कदाचित अजातशत्रु भी समझता था कि ब्राह्मण पुरोहित मोक्ष के नाम पर जो मायाजाल रचते हैं, वह दिखावा है. फिर उसे महावत, घुड़सवार, नाई, धोबी, जैसे पेशेवरों का ध्यान आता है जो अपने श्रम के बल पर जीवित रहते हैं; तथा शांति, सम्मान एवं आत्मनिर्भरता का जीवन जीते हैं. आखिर क्यों? बुद्धकालीन भारत के सामाजिकसांस्कृतिक इतिहास में इस प्रश्न का उत्तर खोजना मुश्किल नहीं है. बुद्ध पूर्व भारत में यज्ञ के नाम पर सैंकड़ों पशु बलि चढ़ा दिए जाते थे. कैथरीन मेयो ने अपनी पुस्तक ‘मदर इंडिया’ में कोलकाता के एक ऐसे मंदिर का उल्लेख किया है जहां प्रतिदिन 150200 मासूम जानवरों की बलि चढ़ाई जाती थी. प्राचीनकाल में हालात और भी बुरे थे. तेजी से बढ़ती कृषिनिर्भरता को देखते हुए उपयोगी पशुधन का सुरक्षित रहना बहुत बड़ी उपलब्धि थी. जैन और बौद्ध दर्शन अहिंसा पर केंद्रित थे. उनके बढ़ते प्रभाव से यज्ञों में दी जाने वाली बलियों तथा उनपर होने वाले अकूत खर्च में कमी आई थी. खानपान संबंधी शुचिता में भी ढील पड़ी थी. ब्राह्मणकाल में खानपान संबंधी नियम सख्त थे. उच्च जाति का व्यक्ति निचले वर्गों के व्यक्ति के साथ भोजन नहीं कर सकता था. इससे उनके धर्मखंडित होने का डर था. इससे बाहरी लोगों से उनका संपर्क कम ही हो पाता था. परिणामतः दूरदराज की संस्कृतियों के साथ व्यापार असंभव था. बुद्ध के आगमन के बाद जाति और खानपान भेद में भी कमी आई थी. इसका अनुकूल प्रभाव व्यापार पर पड़ा. लोग मिलजुलकर दूरदराज की संस्कृतियों के साथ व्यापार करने लगे. फलस्वरूप व्यापार में तेजी आई.

उन दिनों किसानों, व्यापारियों, शिल्पकारों जैसे बुनकर, रंगरेज, ब्याज पर उधार देने वालों, तेली, नाविक, किसान, सुनार, बढ़ई, कसाई यहां तक कि ठगों के भी अपने सहकारी संगठन थे. रमेश मजूमदार ने अपनी पुस्तक ‘कोआॅपरेटिव्स इन एन्शिएंट इंडिया’ में विभिन्न जातक कथाओं, उपनिषदों आदि के हवाले से 18 प्रकार के सहयोगी संगठनों का उल्लेख किया है और माना है कि यह संख्या अधिक भी हो सकती है. वे इतने मजबूत थे कि सम्राट भी आवश्यक मामलों में उनसे सलाह लिया करते थे. आवश्यकता पड़ने पर वे राजाओं को भी उधार दिया करते थे. आजीवक और चार्वाक मतावलंबियों द्वारा भौतिक सुखों को महत्ता देना, जहां उनके व्यापारिक हितों के अनुरूप था. जबकि जैन एवं बौद्ध दर्शन का अहिंसा का विचार उनके आर्थिकसामाजिक हितों की रक्षा करता था. इसलिए वे इन धर्मों की ओर तेजी से आकर्षित हुए थे. उसके फलस्वरूप 2500 वर्ष पहले तक देश में श्रमकौशल, शिल्प और संगठन के आधार जीविका कमाने वाले लोगों का एक खुशहाल वर्ग पनप चुका था. इसलिए यह हैरानी की बात नहीं कि अपनी ही आत्मग्लानि में डूबा, असुरक्षा के एहसास का मारा हुआ अजातशत्रु बुद्ध की सभा में पहुंचकर उनके जैसी शांति की कामना बुद्ध के आगे करता है. अंत तक वह न तो पूरी तरह बौद्ध बन पाता है, न ही जैन. हालांकि दोनों धर्मावलंबी अजातशत्रु के अपना समर्थक होने का दावा करते हैं. दोनों के धर्मग्रंथों में उसकी दानशीलता का बखान किया गया है.

भारत में भौतिकवादी दर्शन की परंपरा बहुत पुरानी है. वह अध्यात्मवादी दर्शनों से भी पहले से चली आ रही है. ‘चार्वाक’, ‘लोकायत’ और ‘आजीवक’ इसी परंपरा के दर्शन हैं. इनमें लोकायत दर्शन को आचार्य बृहश्पति से जोड़ा जाता है. उन्हें ‘बृहश्पति सूत्र’ का रचियता भी माना जाता है. मूल ‘बृहश्पति सूत्र’ आज अनुपलब्ध है. उसके नाम से जिस कृति के फुटकर अंश हमें प्राप्त हैं, विद्वानों के अनुसार वह छठी शताब्दी की रचना है. ‘बृहश्पति सूत्र’ में लोकायत दर्शन की प्राचीनता का समर्थन करते हुए लिखा गया हैᅳ‘आरंभ में जब मनुष्य ने अन्न जुटाना आरंभ ही किया था, तब यह संपूर्ण ब्रह्मांड लोकायती था.’(सर्वथा लौकायतिकमेव शास्त्रमर्थसाधनकाले, बृहश्पति सूत्र 2/5). भारत में कृषिकला का विस्तार लगभग 8000-10000 वर्ष पहले ही हो चुका था. इससे देश में भौतिकवादी विचारधारा को कम से कम 8000 वर्ष पुराना कहा जा सकता है. मक्खलि गोसाल ने भी इसका समर्थन किया है. उसने स्वयं को आजीवक परंपरा का 24वां तीर्थंकर माना है. देवताओं में सोमरस को ऊर्जा और स्फूत्र्ति दायक कहा गया है. वह नशीला मगर बहुप्रचलित पेय था. ‘बृहश्पति सूत्र’ उसे ‘सुरा’ कहा गया है. चूंकि विष्णु आदि देवता सोमरस का सेवन करते हैं, इसलिए आचार्य बृहश्पति ने मद्यपान के कारण उन्हें भी ‘लोकायती’ माना है. (विष्णवादायः सुरापानिन इति कापालिकाः। बृहश्पति सूत्र 2/21). सोमदेव सूरि तथा उसके टीकाकार श्रुतसागर सूरि ने बृहश्पति को चार्वाक संप्रदाय का आदि प्रवत्र्तक बताया है. बृहश्पति को अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र और लोकव्यवहार का ज्ञाता तथा लोकायत परपंरा का विद्वान भी बताया गया है. यहां ध्यान रखना चाहिए कि ‘बार्हस्पत्य सूत्र’ में जो सूत्र प्राप्त होते हैं, वे अलगअलग समय की रचनाएं हैं.

बृहश्पति को देवताओं का गुरु भी बताया गया है. देवगुरु के पद पर रहते हुए लोकायत परंपरा का लेखन संभव नहीं है. देवराज इंद्र के दरबार में निरंतर नृत्य, संगीत, सुरापान, अप्सराओं के नृत्य आदि के किस्से चलते हैं. हो सकता है है उसी से प्रेरित होकर बाद में किसी लेखक ने ‘बृहश्पति सूत्र’ लिखकर लेखक के रूप में कथित देवगुरु का नाम दे दिया हो. वैसे भी ब्राह्मण लेखकों के यहां लेखक न होकर लेखकीय परंपरा होती है, जिसमें बिना नामोल्लेख किए अपनी ओर से कुछ जोड़ दिया जाता है. व्यास, वाल्मीकि, वशिष्ट, भरद्वाज, शुक्राचार्य, आचार्य बृहश्पति आदि इसी लेखकीय परंपरा के नाम हैं.

भारतीय वाङ्मय में नास्तिक दार्शनिकों की मौजूदगी को लेकर तो इतने प्रमाण मौजूद हैं, कि उनके अस्तित्व और वैचारिकता के इतिहास में उनकी उपस्थिति को लेकरसंदेह नहीं किया जा सकता. वे थे और समाज में भरपूर मानसम्मान, अपनी खूबियों, कमजोरियों के साथ थे. यह भी कि उनका ज्ञान, संप्रेषण का माध्यम उस युग की रवायत से कुछ ज्यादा ही श्रुतिआधारित रहा होगा. उनमें से अधिकांश समाज के उन वर्गों से थे जिनके जीवन की सिद्धि सेवाकर्म में मानी जाती थी. जिनका कर्तव्य उपदेश सुनना और उनका पालन करना था, उपदेश देना नहीं. जिनका पेशा जन्म लेने से पहले ही निर्धारित कर दिया जाता था. जिनके लिए पढ़नालिखना आवश्यक नहीं था. या उतना जरूरी माना जाता था, जिससे वे उच्चस्थ जातियों का सेवाकर्म बिना किसी शिकायत का अवसर दिए पूरा कर सकें. इस कारण उनका ज्ञान शास्त्रसम्मत होने के बजाय अनुभवसिद्ध अधिक होता था. लेकिन अपने स्वार्थ के लिए समाज चाहे जैसी व्यवस्थाएं चुन ले. मनुष्य की जन्मजात प्रतिभा और सपनों पर अंकुश लगा पाना उसके बस में नहीं होता. मौलिकता दिमाग की उर्वरा शक्ति को पहचानती है, उसकी जात नहीं देखती. नास्तिक विचारधारा के प्रवत्र्तक दार्शनिक उन वर्गों से थे, जिनके बारे में माना जाता है कि सोचनेसमझने से उनका कोई संबंध नहीं होता. पांच नास्तिक विचारकों में से संजय वेलट्ठपुत्त और पुकुद कात्यायन के जीवन के बारे में ठोस जानकारी अनुपलब्ध है. बाकी तीन यानी पूर्ण कस्सप, मक्खलि गोसाल और अजित केशकंबलि के बारे में उपलब्ध विवरण के आधार पर पता चलता है कि उनका संबंध समाज के निचले वर्गों से था. पेट खाली हो तो दिमाग परमात्मा के नहीं, रोटी के बारे में सोचता है. उसे अर्जित कैसे किया जाए, इस बारे में सोचता है. इन परिस्थितियों में जनसाधारण केवल अपनी भूख के बारे में सोचते हैं. लेकिन जो अपने पूरे समाज के भूख और संघर्ष को अनुभव करते हैं वे पूरे समाज यहां तक कि आने वाली पीढि़यों के दुख से निजात के बारे में सोचते हैं. इसलिए भौतिकवादी दर्शन रूमानियत के चक्कर नहीं काटता. बल्कि जीवन की ठोस सच्चाइयों के आधार पर खड़ा होता है.

क्रमशः

© ओमप्रकाश कश्यप

गांधी और आइंस्टाइन

सामान्य

अहिंसा और इंसानियत के दो दावेदार

उन दोनों के देश अलग थे, धर्म अलग थे, भाषाएं और कार्यक्षेत्र अलगअलग थे. दोनों आमनेसामने कभी मिल भी न पाए थे. आपसी पत्रव्यवहार भी न के बराबर था. इसके बावजूद उनके मन में एकदूसरे के प्रति अगाध श्रद्धा थी. उनमें से एक विज्ञान के क्षेत्र की शिखरतम प्रतिभा था. नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर वह विश्व का विलक्षण मेधासंपन्न वैज्ञानिक माना गया. विज्ञान जगत उसकी अकूत मेधा और अद्वतीय कल्पनाशीलता से इतना अभिभूत था कि उसकी बौद्धिक विलक्षणता को समझने के लिए मरणोपरांत उसके मस्तिष्क को संरक्षित रखा गया. दूसरा पुरस्कारसम्मान से बहुत ऊपर था. इतना ऊपर कि हर सम्मान, पुरस्कार उसके नाम से जुड़कर सम्मानित होता था. वह लोगों के दिलों पर आजीवन राज करता रहा. दोनों ही विश्वशांति के समर्थक थे. एक के शोध को आधार बनाकर कुछ सिरफिरे वैज्ञानिकों ने परमाणु बम का निर्माण किया, जो दूसरे विश्वयुद्ध में तबाही का कारण बना. दूसरे की कथनीकरनी में एकता थी. वह आजीवन सत्य और अहिंसा की बात करता और उस पथ पर चलता रहा. फिर भी उसकी मृत्यु एक सिरफिरे राष्ट्रवादी की गोली से हुई. एक को नवगठित देश का राष्ट्रपति बनने का न्योता मिला. तब उसने यह कहकर कि वह राजनीति के लिए नहीं बना है, प्रस्ताव विनम्रतापूर्वक लौटा दिया. दूसरा बना ही राजनीति के लिए था. उसके लिए राजनीति समाजसेवा थी और समाजसेवा राजनीति. अतः आजादी के बाद जब उसके देश में अपनी सरकार बनी तो जनसेवा के प्रति अपनी संकल्पबद्धता दोहराकर वह सत्ता के प्रलोभन से हमेशा के लिए मुक्त हो गया. वह हर समय अपने समर्थकों, कार्यकर्ताओं से घिरा रहता था. उसके समर्थकों में हर वर्ग के आदमी थे. वह उनके सुखदुख और संघर्षों को समझता था. इस कारण लोगों का उससे गहरा जुड़ाव था. दूसरे को ‘एकांतसेवी’ कहा जाता है. गणित और भौतिक विज्ञान की जटिलतम गुत्थियों को सुलझाने में संलिप्त रहने हेतु उसका आमजन से कटाव स्वाभाविक ही था. पहला जिस ओर कदम बढ़ाता सैकड़ों लोग कतार बांधे उसका अनुसरण करने लगते. दूसरे की कल्पनाशक्ति जब मुक्ताकाश में डोलती तो उसमें हजारों ग्रहनक्षत्र और ब्रह्मांडीय स्फुर्लिंग ज्योतिवान हो उठते थे. दोनों में अनेक समानताएं थीं और अंतर भी. उनमें से प्रत्येक ने अपने समय और समाज को गहराई से प्रभावित किया. बेशुमार ख्याति, मानसम्मान पाया. अपने जीवनआचरण में दोनों मनुष्यता के पक्षधर, पवित्रता, सादगी, नैतिकता की मिसाल और इंसानियत के दावेदार बने रहे.

इतने विवरण के बाद अपने समय की इन विरलतम प्रतिभाओं का नामोल्लेख आवश्यक नहीं है. पाठकगण जान चुके होंगे कि उनमें से एक का नाम थामोहनदास करमचंद गांधी, दूसरे का—अल्बर्ट आइंस्टाइन. आइंस्टाइन का जन्म 1879 में हुआ था. गांधी के जन्म के दस वर्ष बाद. बचपन में दोनों ही संकोची थे. विद्यार्थी भी साधारण ही माने गए. आइंस्टाइन को स्कूल में साथियों का उपहास सहना पड़ता था. गांधी पोरबंदर के दीवान के बेटे थे. इसलिए उनका वैसा उपहास तो नहीं होता था, मगर विद्यार्थी वे औसत ही थे. दोनों की शुरुआत साधारण ही थी. पढ़ाई पूरी करने के बाद आइंस्टाइन ने पेटेंट कार्यालय में नौकरी कर ली. लंदन से बैरिस्टर बनकर लौटे अवश्य, किंतु वकालत के लिए जरूरी लंदफंद से दूर रहने के कारण आरंभ में असफलता ही उनके हिस्से आई. दोनों ने अपनी दुर्बलताओं को हथियार बनाया. आइंस्टाइन कल्पनाजगत में डूबे रहने वाले विद्यार्थी थे. औपचारिक पढ़ाईलिखाई पर कम ध्यान दे पाते थे. सापेक्षिकता के सिद्धांत की खोज उनकी अद्वितीय कल्पनाशक्ति के बल पर संभव हो सकी थी. प्रकाशवेग की अपरिवर्तनीयता, पदार्थ और ऊर्जा की अंतःपरिर्वतनीयता(E=MC2) प्रारंभ में परिकल्पना के रूप में ही जन्मे थे. गांधी ने अपनी सहनशक्ति को ताकत बनाया था. अपने आचरण से उन्होंने सिद्ध किया कि अहिंसा, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा जैसे विचार केवल कागजी नहीं हैं. पर्याप्त नैतिक सामथ्र्य हो तो उन्हें आचरण में भी उतारा जा सकता है. दोनों को अपने ऊपर अटूट विश्वास था. आइंस्टाइन ने सापेक्षिकता के सिद्धांत की परिकल्पना दुनिया के सामने रखी तो उनका खूब मजाक उड़ाया गया. अधिकांश वैज्ञानिकों का मानना था कि डॉप्लर प्रभाव जैसे ध्वनि पर असरकारक होता है, वैसे ही प्रकाश पर भी उसका असर पड़ता है. लेकिन आइंस्टाइन अपनी धारणा पर अडिग रहे. खिल्ली उड़ाने वालों को उनका एक ही जवाब था—‘गलत सिद्ध करके दिखाओ?’ गांधी की अहिंसा को आलोचकों ने भीरूपन कहा था. मगर वे स्थिरमना अपने काम में लगे रहे. आखिर खुद को दुनिया की महाशक्ति समझने वाला ब्रिटिश साम्राज्य एक अधनंगे फकीर के आगे घुटने टेकने को मजबूर हो गया. आइंस्टाइन विलक्षण की सीमा तक अंतर्मुखी थे. वे खुद से घंटों संवाद कर सकते थे. मस्तिष्क गणित की पहेलियों को हल करने में उलझा रहता था. अकेलापन उन्हें पसंद था मगर उनका काम, अनूठी उपलब्धियां उन्हें बारबार लोगों के बीच ले आती थीं. गांधी अपने अनूठे प्रयोगों, कथनीकरनी की एकता तथा आचरण की पवित्रता के दम पर, लोगों के चहेते थे. इसलिए भीड़ में सबसे अलग नजर आते थे.

गांधी और आइंस्टाइन के बीच सीधी मुलाकात तो कभी संभव न हो सकी. पत्रव्यवहार भी अत्यल्प था. उनके अहिंसावादी दृष्टिकोण, जीवन की सादगी, सत्य के प्रति अटूट निष्ठा, जनांदोलनों की गहरी समझ तथा लोगों के दिलों में पैठ बनाने के अकूत सामथ्र्य ने आइंस्टाइन को प्रभावित किया था. संभवतः ऊर्जा के अजस्र, विराट स्रोत की खोज के रूप में दुनिया को परमाणु बम का आधारसिद्धांत देने वाला भावुक, संवेदनशील, मनुष्यता का हितचिंतक, नैतिकबोध से संपन्न सरलमना वैज्ञानिक अपने आविष्कार के दुरुपयोग की संभावनाओं की कल्पनामात्र से खुद को दोषी मान बैठा था. स्मरणीय है कि सापेक्षिकता के सिद्धांत की व्याख्या करते समय आइंस्टाइन ने सिद्ध किया था कि ऊर्जा और पदार्थ परस्पर अंतपर्रिवर्तनीय हैं. पदार्थ को ऊर्जा में बदला जा सकता है. इस प्रक्रिया में विपुल ऊर्जा उत्पन्न होती है. इसके बाद से ही परमाणु विखंडन द्वारा ऊर्जा के चिरंतन स्रोत को प्राप्त करने की कोशिशें तेज हो चली थीं. प्रथम विश्वयुद्ध में चोट खाए देश गुपचुप अपनी ताकत का विस्तार करने में लगे थे. 1933 में हिटलर द्वारा जर्मनी की सत्ता संभालते ही उनमें और भी तेजी आई. राष्ट्रों के बीच हथियारों की अंधस्पर्धा तथा भीतर ही भीतर उमड़ता असंतोष, नए विश्वयुद्ध की भविष्यवाणी कर रहा था. अपनी दूरद्रष्टि से आइंस्टाइन ने शायद यह भांप लिया था कि कोई सिरफिरा वैज्ञानिक परमाणु ऊर्जा संबंधी उनके शोध का दुरुपयोग कर, मनुष्यता के समक्ष भयावह संकट प्रस्तुत कर सकता है. इसीलिए गांधी, जो दक्षिणी अफ्रीका में सत्याग्रह का सफल प्रयोग कर चुके थे और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व करते समय भी अहिंसा पर पूर्णतः अडिग थे, का मानवतावादी द्रष्टिकोण उन्हें आकर्षित करता था. विश्वशांति की चाहत रखनेवाले आइंस्टाइन निरस्त्रीकरण के सबसे मुखर समर्थकों में थे. उसके पीछे बर्ट्रेंड रसेल, रवींद्रनाथ ठाकुर के अलावा गांधी की प्रेरणा भी प्रमुख थी. विश्वशांति के प्रति आइंस्टाइन की प्रतिबद्धता का एक और प्रमाण था—अनिवार्य सैन्यसेवा एवं युद्ध प्रशिक्षण के विरोध में जारी घोषणापत्र, जिसपर उनके और महात्मा गांधी के अलावा रवींद्रनाथ ठाकुर, सिगमंड फ्रायड, रोमन रोलेंड, एच. जी. वेल्स आदि के हस्ताक्षर थे.

आइंस्टाइन का विज्ञान पर भरोसा था. वह मानते थे कि विज्ञान की मदद से विश्व की भीषण समस्याओं यथा गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा आदि का उपचार संभव है. इसके लिए पर्याप्त जनसहभागिता और नियोजित कार्यक्रम जरूरी हैं. अनियोजित मशीनीकरण की आलोचना करते हुए आइंस्टाइन ने कहा था कि पूंजीवादी तंत्र के नेतृत्व में होने वाली प्रौद्योगिकीय क्रांति ने लोगों की गरीबी और अन्यान्य समस्याओं का समाधान करने के बजाय उन्हें बेरोजगारी की ओर ढकेला है. ऐसे तंत्र में उत्पादक का ध्यान केवल अपने मुनाफे पर होता है. इससे समाज में पूंजी का निचले वर्ग से ऊपर के वर्ग की ओर अंतरण लगातार बढ़ता जाता है. फलस्वरूप शीर्षस्थ वर्ग की खुशहाली बढ़ती जाती है, जो पूरी तरह से निम्नस्थ वर्गों के श्रम और कौशल की देन होती है. उच्च स्तर पर बढ़ती स्पर्धा निचले वर्गों के लिए और बड़ी चुनौतियां पेश करती है, जिससे बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है. उच्च प्रौद्योगिकीकरण की सबसे बड़ी बुराई है कि वह अपनी कीमत मनुष्य की कार्यक्षमता एवं कौशल से वसूलता है. जिससे श्रम के मूल्यांकन का अधिकार श्रमिक के हाथों से खिसककर पूंजीपति के अधीन चला जाता है. वे उस अधिकार का मनमाना दुरुपयोग करते हैं. अपने ही जैसे शोषितों, उत्पीड़ितों के साथ स्पर्धा और शोषणकारी स्थितियों से घिरा श्रमिक खुद को उनके आगे पंगु और लाचार अनुभव करता है. आपसी अविश्वास, कुंठा, हताशा, दैन्य और अवसाद जैसे अवगुण उसे घेर लेते हैं. पूंजीवादी समाज की ऐसी अनेकानेक नकारात्मक स्थितियों और संभावनाओं के बीच सर्वोदय, अहिंसा, आर्थिक आत्मनिर्भरता तथा विश्वबंधुत्व को समर्पित गांधी के विचार, उनका समाज के प्रति सकारात्मक और नीतिसम्मत सोच आइंस्टाइन को उम्मीद के ताजे झोंके की तरह लगता था.

आइंस्टाइन के मन में गांधी के प्रति सम्मान भाव पहली बार जुलाई-1929 में ‘क्रिश्चन सेंच्युरी’ को दिए गए साक्षात्कार में प्रकट हुआ, जिसमें उन्होंने गांधी द्वारा अहिंसापूर्ण ढंग से चलाए जा रहे आंदोलन की सराहना की थी. हालांकि उस समय तक दोनों के बीच कोई संवाद नहीं था. उनके बीच इकलौते पत्रव्यवहार की शुरुआत आइंस्टाइन की ओर से होती है. घटना 1931 की है. गांधी उस दिनों लंदन की यात्र पर थे. वहां भारत में संवैधानिक सुधारों को लेकर गोलमेज सम्मेलन की तैयारियां चल रही थीं. गांधी भारतीयों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. आइंस्टाइन उन दिनों बर्लिन में थे. वहीं, उनके आवास पर गांधी का शिष्य सुंदरम उनसे मिला. उसके माध्यम से आइंस्टाइन ने एक पत्र गांधी को भेजा था. 27 सितंबर, 1931 को लिखे उस पत्र में उन्होंने गांधी के प्रति अपनी श्रद्धा को बिना लागलपेट प्रस्तुत किया था—

परम आदरणीय गांधी जी,

इस पत्र को आप तक पहुंचाने के लिए मैंने आपके मित्र का सहारा लिया है, जो इस समय मेरे घर मेरे मेहमान हैं. अपने कार्यकलापों द्वारा आपने दिखा दिया कि उन सभी आदर्शों को जिनकी हम केवल कल्पना कर सकते हैं, हिंसा का सहारा लिए बिना भी प्राप्त किया जा सकता है और उन्हें जिनको हिंसा पर भरोसा है, अहिंसा के माध्यम से आसानी से जीता जा सकता है. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि आपका संदेश आपके देश की सीमाओं के पार भी फैलेगा. उसके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मतभेदों का स्थायी समाधान संभव होगा. यही एकमात्र रास्ता है जो वैश्विक शांति एवं खुशहाली की ओर जाता है, जिससे हम अपने मतभेदों को आसानी से सुलझा सकते हैं.

पुनश्चः आपके प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धा और सम्मानभाव के साथ मैं उम्मीद करता हूं कि बहुत जल्दी हम आमनेसामने होंगे.’(गांधी सेवा फाउंडेशन).1

पत्र में गांधी के अहिंसावादी द्रष्टिकोण के प्रति एक उदारमना वैज्ञानिक के उद्गार थे. गांधी विश्वशांति हेतु आइंस्टाइन के कार्यकलापों से परिचित थे. उनके प्रति मन में अगाध श्रद्धा भी थी. इसलिए पत्र का त्वरित प्रत्युत्तर देते हुए उन्होंने 18 अक्टूबर को आइंस्टाइन को लिखा—

सुंदरम के हाथों आपका खूबसूरत पत्र मुझे मिला. मुझे यह जानकर अत्यधिक संतोष है कि आप मेरे कार्यों का समर्थन करते हैं. मेरी उत्कट अभिलाषा है कि हमारी आमनेसामने की भेंट हो और आप भारत में मेरे आश्रम का आतिथ्य ग्रहण करें.’(गांधी सेवा फाउंडेशन).2

आइंस्टाइन गांधी के आमंत्रण पर भारत भले न आ सके, मगर गांधीजी द्वारा भारत में किए जा रहे सत्य एवं अहिंसा के प्रयोगों से निरंतर प्रेरणा लेते रहे. वे मूलतः वैज्ञानिक थे. विज्ञान के उपयोग को लेकर उनका मत ‘पश्चिमी विज्ञान का पितामह’ कहे जाने वाले दार्शनिक फ्रांसिस बेकन(1561—1626) से मेल खाता था. पंद्रहवीं शताब्दी की वैज्ञानिक क्रांति से उत्साहित बेकन का कहना था कि मशीनें मनुष्य को जानलेवा श्रम से मुक्ति दिलाकर उसके कल्याण की राह प्रशस्त करेंगी. ‘ज्ञान ही शक्ति है’ कहकर उसने विज्ञान और प्रौद्योगिकीय सुधारों का स्वागत किया था. आगे चलकर विज्ञान ने खूब तरक्की की. लेकिन उसके लोकोपकारी उपयोग को लेकर बेकन की भविष्यवाणी पूर्ण सच न हो सकी. खर्चीला उद्यम होने के नाते वैज्ञानिक शोधों की धारा उस दिशा में अग्रसर रही, जो केवल समाज के प्रभुवर्ग की स्वार्थानुरूप थी, या जैसा पूंजीपति और सरमायेदार वर्ग चाहता था. इससे श्रमविरोधी मशीनों के विकास को बढ़ावा मिला. कालांतर में उससे समाजार्थिक स्तरीकरण और बेरोजगारी में वृद्धि हुई. पूंजी की मनमानी के फलस्वरूप हुए मशीनीकरण ने उन कारीगरों और शिल्पकर्मियों के समक्ष अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया था, जो परंपरागत अर्थव्यवस्था में, सामंतवादी दबावों के बावजूद अपने श्रम एवं कौशल के दम पर सम्मानित जीवन जीते आए थे. यह बेकन की उस मनोवांछा के विपरीत था, जो वैज्ञानिक क्रांति का स्वागत करते हुए प्रकट हुई थी. वस्तुतः वैज्ञानिक शोधों का लाभ देश के आमजन तक कैसे पहुंचाया जाए, यह चिंता अठारहवीं शताब्दी से ही समाजविज्ञानियों और दार्शनिकों को परेशान करने लगी थी. कालांतर में यह चुनौती और भी कठिन, कठिनतर होती गई. आगे चलकर इसी ने यूरोप के वैचारिक आंदोलनों के लिए नई जमीनें तैयार कीं.

उल्लेखनीय है कि पश्चिम में अनियंत्रित मशीनीकरण के विरुद्ध आवाजें सतरहवीं शताब्दी से ही उठने लगी थीं. उनीसवीं शताब्दी आतेआते उसमें और भी तेजी आ चुकी थी. पूंजीवाद के प्रति विरोधी वातावरण और चौतरफा आलोचनाओं के बावजूद पश्चिम को अपनी प्रगति पर गर्व था. वह इसको आधुनिकता की निशानी मानता था. इसका कारण भी था. अठारहवीं शताब्दी में नए बाजारों की तलाश में निकले व्यापारी काफिलों ने ब्रिटेन के लिए नए उपनिवेश निर्मित किए थे. ब्रिटेन की आर्थिक समृद्धि में उसके उपनिवेशों का बड़ा योगदान था. औपनिवेशिक शोषण के लिए जिम्मेदार और विज्ञान के इकतरफा लाभों पर इतराने वाली कथित पश्चिमी सभ्यता को गांधी ने ‘शैतानी सभ्यता’ कहा था. यह बात अलग है कि पूरब में जाति, धर्म, परंपरा और संस्कृति के नाम पर फैला हुआ मकड़जाल, मानवमात्र की स्वाधीनता और खुशहाली की राह में, कथित ‘शैतानी सभ्यता’ से कहीं अधिक नुकसानदेह था. और गांधी जिसे शैतानी सभ्यता कहते थे, उसमें मानवाधिकारवादी आंदोलनों के विस्तार की भारत की दैवी सभ्यता से अधिक संभावनाएं थीं. गांधी की प्रमुख राजनीतिक, आर्थिक प्रेरणाएं धर्मदर्शन से निकली थीं. वैज्ञानिक बोध के बजाय उनमें भावबोध प्रबल था. पूंजी की मनमानी और तज्जनित बेलगाम मशीनीकरण को वे धार्मिक और सांस्कृतिक संकट के रूप में देखते और उसके निदान के लिए रहरहकर परंपरा की शरण में लौट जाते थे. यही कारण है कि आर्थिक विषमताओं तथा उसके कारणों को लेकर उनकी आलोचना वैसी तथ्यात्मक, तर्कसंगत और तेजवंत न थी जैसी बर्ट्रेंड रसेल, मार्क्स, बकुनिन, पीटर क्रोप्टोकिन, मानवेंद्रनाथ राय आदि विचारकों की. धर्म, विज्ञान एवं समाजवाद के बारे में आइंस्टाइन का विश्लेषण तुलनात्मक रूप से अधिक सुसंगत, वैज्ञानिक, तथ्यपरक एवं पारदर्शी है. लेकिन अपने विचारों, मान्यताओं को जिस गंभीरता और सत्यनिष्ठ भाव से गांधी अपने रोजमर्रा के आचरण का हिस्सा बना लेते हैं, यह आइंस्टाइन से संभव नहीं हो पाता.

गांधी के सत्य और अहिंसा के आदर्श के प्रति आइंस्टाइन की अटूट श्रद्धा थी. उत्तरोत्तर बढ़ते वैश्विक तनाव तथा वैमनस्यकारी स्थितियों के बीच गांधी का रास्ता उनकी एकमात्र उम्मीद थी. बावजूद इस श्रद्धाभाव के कुछ मुद्दों को लेकर गांधी से उनका मतभेद था. ऐसा ही मुद्दा उत्पादन क्षेत्र में मशीनों के प्रयोग को लेकर है, जिनका पश्चिमी देशों की आर्थिक प्रगति के पीछे बड़ा योगदान था. गांधी मशीनीकरण का विरोध करते हैं. उसे समाज में व्याप्त अनेकानेक बीमारियों की जड़ बताते हैं. ‘हिंद स्वराज’ में वे लिखते हैं—‘मशीनें यूरोप को उजाड़ने में लगी हैं. वहां की हवा अब हिंदुस्तान में चल रही है.’ मशीनों की आलोचना से उन्हें यहीं तोष नहीं. आगे वे चेतावनी वाले अंदाज में लिखते हैं, ‘मशीन की हवा अगर ज्यादा चली तो हिंदुस्तान की बुरी दिशा होगी….यंत्र तो सांप का ऐसा बिल है जिसमें एक नहीं बल्कि सैकड़ों सांप होते हैं.’ गांधी द्वारा मशीनों का विरोध केवल उत्पादकता जुड़े यंत्रों तक सीमित नहीं रहता. आगे बढ़कर रेलों, डॉक्टरों और वकीलों को भी अपने दायरे में समेट लेता है. ट्राम को वे स्वास्थ्य रक्षा से जोड़कर देखते हैं. उनकी दृष्टि में जहां मशीनें हैं, वहां अव्यवस्था है, दुख और सांस्कृतिक संकट हैं. मशीनें बीमारी और कमजोर स्वास्थ्य का कारण हैं—‘जहां रेलगाड़ी, ट्राम गाड़ी वगैरह साधन बढ़े हैं, वहां लोगों की सेहत गिरी होती है….यूरोप के एक शहर में जब पूंजी की तंगी हो गई थी तब ट्रामों, वकीलों और डॉक्टरों की आमदनी घट गई थी.’ इसके तुरंत बाद वे फैसलाकुन अंदाज में लिखते हैं, ‘यंत्र का गुण तो मुझे एक भी याद नहीं आता, मगर उसके अवगुणों पर मैं पूरी किताब लिख सकता हूं.’ यहां साफ कर दें कि मशीनों की आलोचना करने वाले गांधी पहले व्यक्ति न थे. उनसे पहले रूसो, थोरो, एडवर्ड कारपेंटर, इमर्सन आदि प्रख्यात विचारकों ने जीवन में मशीनों के बढ़ते दखल को गैरजरूरी माना था.

मानवीय स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक, ‘मनुष्य आजाद जन्मा है, लेकिन हर जगह वह बेड़ियों में है’ कहनेवाले रूसो ने भी कला एवं विज्ञान के विकास को मनुष्य के नैसर्गिक विकास में बाधक बताया था. यूरोप की वैज्ञानिक उपलब्धियों पर कटाक्ष करने हुए अपने सुप्रसिद्ध निबंध ‘डिस्कार्स आन दि आर्ट एंड साइंसिज’ में उसने कहा था कि विज्ञान एवं आधुनिक कलाओं के विकास ने मनुष्य और समाज के आगे नैतिक संकट खड़े किए हैं. मानवीय गरिमा और शुभत्व की स्थापना के लिए उनके पास न तो कोई कार्यक्रम है, न ही तैयारी. विकास के नाम पर मची आपाधापी ने मनुष्य और समाज के बीच दीवार खड़ी कर दी है. ऐसे संद्धिग्ध, विश्वासशून्यता से भरे समाज में, ‘हमारे पास भौतिक विज्ञानी हैं, गणितज्ञ हैं, रसायनज्ञ, कवि, संगीतकार यहां तक कि पेंटर भी भारी संख्या में हैं. ये सब हैं बस मनुष्य’ की कमी है. यदि वह हैं भी तो वे देश के विभिन्न समाजों में यहांवहां छिपे हुए हैं. इस व्यवस्था ने उन्हें उपेक्षित, बेचारा और अकेला बनाकर रख दिया है.’3 दरअसल रूसो जब सवाल करता है तो उसके जहन में मनुष्यमात्र की स्वतंत्रता और अस्मिता की सुरक्षा जैसे बड़े सवाल होते हैं. अपनी शीर्ष स्थिति का लाभ उठाते हुए पूंजीपति वर्ग विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुए शोध एवं आविष्कार का उपयोग अपनी स्वार्थसिद्धि हेतु करना चाहता था. रूसो के अनुसार ज्ञान के नाम पर रचे गए आयोजन प्रकारांतर में केवल समाज के शीर्षस्थ वर्ग लिए लाभकारी सिद्ध होते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि वैज्ञानिक आविष्कारों का जितना लाभ समाज के शीर्षस्थ वर्गों को मिला, उतना जनसाधारण के हिस्से में नहीं आ पाया था. इसके बावजूद यातायात, चिकित्सा, शिक्षा, आवास आदि क्षेत्रों में विज्ञान के माध्यम से जो तरक्की हुई थी, उसका कम ही सही, जनसाधारण को भी लाभ पहुंचा था. गांधी विज्ञान की सभी उपलब्धियों की उपेक्षा कर उच्च प्रौद्योगिकी को परंपरा और संस्कृति पर संकट के रूप में देखते थे. मानते थे कि किसी कारीगर से उसका रोजगार छीन लेना भी हिंसा है. इसलिए उन्होंने रोजगार के लिए नुकसानदेह सिद्ध हो चुकी मशीनों को चलनबाह्यः कर उनकी जगह ग्रामोद्योगों लाने का समर्थन किया था.

गांधी का निजी संपत्ति से दुराव न था. वे मात्र इतना चाहते थे कि ‘वे(जमींदार और राजामहाराजा) अपने लोभ और संपत्ति के बावजूद उन लोगों के समकक्ष बन जाएं जो मेहनत करके रोटी कमाते हैं. मजदूरों को भी यह समझना होगा कि मजदूरों का काम करने की शक्ति पर जितना अधिकार है, मालदार आदमी का अपनी संपत्ति पर उससे भी कम है.’ (हरिजन सेवक 3 जून, 1939). गोया समझ लेने मात्र से हकीकत बदल जाएगी! गांधी पूंजीवादी विकृतियों का समाधान संरक्षकता के सिद्धांत में खोजते थे. उन्होंने पूंजीपतियों से अपील की थी वे खुद को संपत्ति का स्वामी मानने के बजाय उसका संरक्षक समझें और लोककल्याण के निमित्त उसका उपयोग करें. हालांकि यह बात भी दूर की कौड़ी के समान थी कि कोई पूंजीपति अपनी संपत्ति स्वेच्छा से छोड़ने को तैयार हो जाएगा. स्वयं गांधी को भी इसमें संदेह था, इसलिए वे व्यवस्था करते हैं कि कोई पूंजीपति यदि अपनी संपत्ति का उपयोग लोककल्याण के लिए करने में कतराता है तो राज्य को उसकी संपत्ति न्यूनतम बलप्रयोग के आधार पर हस्तगत कर लेने का अधिकार है—‘लोग स्वेच्छा से ट्रस्टियों की तरह व्यवहार करने लगें तो मुझे सचमुच बड़ी खुशी होगी. लेकिन यदि वे ऐसा न करें तो मेरा ख्याल है कि हमें राज्य के द्वारा भरसक कम हिंसा का सहारा लेकर उनसे उनकी संपत्ति (मुआवजा देकर अथवा मुआवजा दिए बगैर, जहां जैसा उचित हो) अपने हाथ में कर लेनी चाहिए(मेरे सपनों का भारत).’

आइंस्टाइन सामाजिक विकास की व्याख्या के लिए वैज्ञानिक द्रष्टिकोण अपनाते हैं. इतिहास की वस्तुपरक व्याख्या करते हुए वे लिखते हैं—‘इतिहास का बड़ा हिस्सा आक्रामकों ने कब्जाया हुआ है. उसमें शक्तिसंपन्न वर्ग की स्तुतियां और उनका गुणगान है. साम्राज्यवादी मंसूबों से भरी वे ताकतें अवसर मिलते ही दूसरे राज्यों पर अधिकार कर वहां की भूमि तथा उत्पादन के संसाधनों पर कानूनी, सामाजिक अधिकार प्राप्त कर लेती थीं. समाज के बौद्धिक निदेशन, उसकी शिक्षादीक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाला पुजारी वर्ग साम्राज्यवादी शक्तियों से हाथ मिलाकर उनकी अधिसत्ता को धार्मिकसामाजिक एवं कानूनी रूप से स्वीकार्य बनाता था. संस्कृति और धर्म के प्रलोभनों से यह वर्ग समाज के बहुसंख्यक वर्ग को अपने साथ जोड़े रखता था. पुजारी वर्ग की समाज पर पकड़ का लाभ उठाने के लिए साम्राज्यवादी शक्तियां उन्हें तरहतरह के प्रलोभन देकर अपने साथ मिलाए रखती थीं—

पुजारी, शिक्षा पर नियंत्रण के माध्यम से समाज के वर्गविभाजन को स्थायी रचना का रूप दे देता है. तथा सामाजिक आचार संहिता के नाम पर ऐसा ढांचा तैयार करता है, जिसमें समाज का बहुसंख्यक वर्ग सामाजिक मामलों में भीड़ की तरह आचरण करने लगता है.’4

आइंस्टाइन के अनुसार समाजवाद का लक्ष्य समाज को नैतिक सामाजिक लक्ष्य की ओर अग्रसर करना है. जबकि पूंजीवादी केवल और उद्योगस्वामी के लाभ की उच्चाकांक्षा से संचालित होता है. उसमें बड़ी मछली छोटी को निगलती जाती है. इसलिए पूंजीवादी व्यवस्था में शीर्षस्थ वर्ग की ओर लाभानुपात निरंतर बढ़ता जाता है. जिसके परिणामस्वरूप उसमें पूंजी का पलायन उच्च वर्ग की ओर होता रहता है. गांधी अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में बड़ी मशीनों के उपयोग को लेकर संकोची थे. आइंस्टाइन ने हालांकि समाज कल्याण के क्षेत्र में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल को जरूरी माना है. उसका विश्वास था कि विज्ञान की सहायता से सामाजिक समस्याओं का निदान खोजना अतिरेकी कामना है. समाजवाद व्यक्ति एवं समाज दोनों को सामाजिकनैतिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रयत्नरत रहता है. जबकि पूंजीवाद अपने एकमात्र लक्ष्य पूंजीस्वामी के लाभ पर जोर देता है. जिसमें लाभार्थी वर्ग निरंतर सिकुड़ता जाता है. आइंस्टाइन के अनुसार यह जानना बहुत जरूरी है कि केवल नियोजित अर्थव्यवस्था समाजवाद का उद्दिष्ट नहीं है. बल्कि उसका लक्ष्य मानवमात्र की मुक्ति है. ऐसा कहते हुए वे विचारदर्शन में गांधीवाद के करीब चले आते हैं.

निजी पूंजी को लेकर आइंस्टाइन के विचार अपेक्षाकृत स्पष्ट हैं. सीमा से अधिक व्यक्तिगत संपत्ति के वे विरोधी थे. मानते थे कि संपत्ति के कुछ हाथों में सिमट जाने से उसपर प्रभावी नियंत्रण असंभव हो जाता है. उन्होंने माना कि पूंजी की ताकत के आगे लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा चुनी गई सरकारें भी बेबस सिद्ध होती हैं. इसलिए कि लोकतांत्रिक समाजों में जो भी जनप्रतिनिधि चुनकर आते हैं, वे किसी न किसी रूप में पूंजीपतियों पर निर्भर होते हैं. इससे वे गरीब और शोषित वर्ग के अधिकारों का संरक्षण करने में असफल सिद्ध होते हैं. अपने ऐतिहासिक लेख ‘समाजवाद क्यों?’ में वे कुशल आर्थिक व्याख्याकार की भांति पूंजीवादी समाज की विकृतियों पर न केवल गंभीर विचार करते हैं, बल्कि उससे निदान की राह भी सुझाते हैं. आइंस्टाइन के अनुसार पूंजीवादी समाज की कमजोरी है कि वहां ‘उत्पादन का आधार पूजीपति द्वारा लाभ की अंतहीन कामना’ होती है, न कि लोगों की जरूरत. ‘उत्पादन लाभार्जन की दृष्टि से निर्धारित किया जाता है न कि उपयोगिता और लोगों की आवश्यकता के आधार पर’. पूंजीवादी उत्पादन तंत्र में श्रमिकों पर प्रायः छंटनी की दीवार अटकी रहती है—

पूंजीवादी समाज में ऐसा कोई रास्ता नहीं कि उन सभी लोगों को रोजगार मिल सके, जो काम करना चाहते हैं. श्रमिकों के दिल पर छंटनी की तलवार तनी होती है….जैसेजैसे प्रौद्योगिकीय विकास होता है, बेरोजगारों की संख्या भी लगातार बढ़ती जाती है. लाभकेंद्रित उत्पादन व्यवस्था पूंजीपतियों के बीच आभासी स्पर्धा खड़ी कर देती है….असीमित स्पर्धा श्रम की बरबादी को बढ़ावा देती है, जिससे उनकी संवेदना और सामाजिकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. पूंजीवादी की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह पूरे शिक्षातंत्र को प्रदूषित कर देता है. विद्यार्थियों के बीच स्पर्धा नामक बुराई का प्रवेश होने से शिक्षा का मकसद ही बदल जाता है….’5

मतवैभिन्नय के बावजूद गांधी और आइंस्टाइन इस बात पर एकमत हैं कि समस्या का निदान बलप्रयोग या हिंसा नहीं है. केवल अहिंसक समाधान ही सर्वाधिक स्थायी और बहुउपयोगी हो सकता है, लेकिन विकास, अर्थनीति और आदर्श समाज की स्थापना को लेकर आइंस्टाइन का विश्लेषण तुलनात्मक रूप से अधिक संतुलित एवं उपयोगी जान पड़ता है. वे विज्ञान के लोकहित में प्रयुक्त करने के समर्थक थे. ज्ञान यदि शक्ति है तो उसका अधिकतम लाभ पूरे समाज को पहुंचना चाहिए. इस बिंदू पर आतेआते दोनों के बीच मतवैभिन्नय साफ झलकने लगता है. ‘ग्राफिक सर्वे’ के लिए दिए 1935 के एक इंटरव्यू में आइंस्टाइन के माध्यम से उद्धृत किया गया है—

मैं गांधी से अत्यधिक प्रभावित हूं. मगर उनके कार्यक्रम में दो कमजोरियां मुझे एकदम साफ नजरआती हैं. असहयोग हालांकि अपने विरोधियों से निपटने का बुद्धिमानीभरा रास्ता है. लेकिन यह केवल आदर्श स्थितियों में ही संभव है. यह भारत में अंगे्रजों के विरुद्ध उपयोगी हो सकता है, लेकिन जर्मनी में नाजियों के विरुद्ध इसका कारगर प्रयोग संभव नहीं है. गांधी उस समय भी गलत है, जब वे आधुनिक सभ्य समाज में मशीनों के बहिष्कार अथवा उनको न्यूनतम बनाए रखने पर जोर देते हैं. मशीनें समाज की जरूरत बन चुकी हैं, यह उन्हें स्वीकार लेना चाहिए.’6

गांधी के प्रति अपनी सम्मानभाव के बावजूद उनकी आलोचना आइंस्टाइन की वैचारिक दृढ़ता की ओर इशारा करती है. गांधी की भांति आइंस्टाइन का चिंतन भी बहुआयामी था. तभी वे गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ और मशीनीकरण विरोध की सुस्पष्ट और शालीन आलोचना कर पाते हैं. वे मानते थे कि समाजवाद पूंजीवाद की कमजोरियों का समाधान करने में सक्षम है. वह मानवीय नैतिकता का दर्शन है, जो ‘सामाजिकनैतिक लक्ष्य की ओर निरंतर अग्रसर’ रहता है. ध्यातव्य है कि श्रमिक या कारीगर की मूल समस्या मशीनें नहीं हैं. वास्तविक समस्या प्रौद्योगिकी तथा उत्पादन के अन्य साधनों का कुछ लोगों के हाथों में सिमट जाना है, जिससे उनकी उपयोगिता के मायने ही बदल जाते हैं. न केवल उनका लाभ मुट्ठीभर सरमायेदारों तक सीमित रह जाता है, बल्कि प्रकारांतर में वे समाज के बहुसंख्यक वर्ग के शोषण का कारण भी बनते हैं. उनकी मदद से पूंजीवादी तंत्र पहले तो श्रमकौशल को खुद पर निर्भर बनाता है, फिर उसके संभावित विकल्पों को शून्य कर श्रम के मूल्यांकन का अधिकार अपने हाथों में ले लेता है. परिणामस्वरूप शोषण श्रमिक की नियति बन जाता है. पूंजीपति वर्ग की मनमानी के कारण श्रमिक को उसके श्रमकौशल का वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाता. प्रौद्योगिकी के विकास के साथसाथ बेरोजगारी बढ़ती है, साथ में कारीगरों, श्रमिकों का शोषण और उत्पीड़नकारी परिस्थितियां भी. एक कुशल समाजविज्ञानी की भांति आइंस्टाइन इन स्थितियों को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं—

मेरी दृष्टि में पूंजीवादी समाज की आर्थिक अराजकता, आधुनिक समाज में व्याप्त समस्त बुराइयों की असली जड़ है. हम देख सकते हैं कि हमारे सामने उत्पादकों की बड़ी संख्या है जिसके सदस्य एकदूसरे की मेहनत की कमाई को हड़प लेने पर उतारू हैं. यह कार्य वे ताकत के बूते नहीं, बल्कि कानूनी तौर पर स्थापित विधिसम्मत व्यवस्थाओं की मदद से कर रहे हैं.’7

उल्लेखनीय है कि आइंस्टाइन के समाजवाद विषयक विचार उस समय सामने आए थे जब सोवियत संघ की प्रेरणा से चीन, लातिनी अमेरिका, वियतनाम आदि देशों में समाजवादी क्रांति का बिगुल बजा हुआ था. आहत मनुष्यता परमाणु बम की विभीषिका से कराह रही थी. प्रथम विश्वयुद्ध की स्थितियों का लाभ उठाकर पूंजीवाद अपनी जड़ें पक्की कर रहा था. राष्ट्रों के बीच व्याप्त हिंसा, प्रतिहिंसा तथा साम्राज्यवादी होड़ के बीच उसे अपना भविष्य सुरक्षित जान पड़ता था. बड़ेबड़े पूंजीपति जिन्होंने सतरहवींअठारहवीं शताब्दी में मशीनीकरण के कारण लोहे और इस्पात की बढ़ती मांग के कारण उसके कारखाने लगाए थे, उनमें से कई हथियार निर्माण की ओर मुड़ चुके थे. पूंजीवादी स्पर्धा से समाज में आर्थिकसामाजिक विषमता की खाई उत्तरोत्तर चैड़ी हो रही थी. इसके फलस्वरूप सामाजिक असंतोष बढ़ता ही जा रहा था. नई शिक्षा एवं लोकतांत्रिक विचारों की रोशनी में लोग अपने अधिकारों की रक्षा हेतु एकजुट होने लगे थे. समाज में नए विचारों का आगमन बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार कर चुका था.

गांधी चाहते थे कि ग्राम स्वावलंबी हों. वहां के लोग आत्मनिर्भर बनें. ताकि अपनी सीमित अर्थक्षमता से सम्मानित जीवन जी सकें. यह आवश्यक भी है. इससे अर्थव्यवस्था और प्रकारांतर में सत्ता के विकेंद्रीकरण का स्वप्न सच होता है. लेकिन जब पूरी दुनिया में प्रौद्योगिकीय क्रांति का नगाड़ा गूंज रहा हो, विज्ञान के क्षेत्र में नित नए आविष्कार सामने आ रहे हों—तब कोई समाज, सभ्यता या समूह उससे वंचित भला कैसे रह सकता है. विशेषकर तब जब संचार प्रौद्योगिकी ने दुनिया को जोड़ दिया हो, यातायात के साधनों द्वारा समस्त विश्व एक परिवार में ढल चुका हो. फिर बढ़ती जनसंख्या के साथ गांवों में जोतें सिकुड़ रही हैं, जिससे कृषिभूमि पर दबाव बढ़ता ही जा रहा है. यदि मान लिया जाए कि ग्रामोद्योग अतिरिक्त श्रमऊर्जा को खपाने में मददगार सिद्ध होंगे तो भी एक समस्या बनी रहेगी कि जब बड़ी संख्या में ग्रामोद्योग होंगे तब उनके उत्पाद की खपत के लिए अतिरिक्त बाजार की आवश्यकता भी पड़ेगी. चीन का ही उदाहरण लें. वहां उत्पादन का बड़ा हिस्सा स्थानीय इकाइयों के माध्यम से होता है. भारत समेत दुनिया के अनेक विकसित और विकासशील बाजारों में उसे खपाया जाता है. इस काम में राज्य उनकी मदद करता है. यदि गांव बाहर बाजार की खोज करना अपरिहार्य हुआ तो स्वाभाविक रूप से ग्रामोद्योग इकाइयों के बीच बाजार को कब्जाने की होड़ भी पैदा होगी. तब स्पर्धा में बने रहने के लिए वे नई वैचारिकी और प्रौद्योगिकी के संपर्क में आएंगे ही. उस समय जो समस्याएं पैदा होंगी, गांधी का अर्थशास्त्राीय दृष्टिकोण हमें उसका निदान नहीं देता. दूसरे गांधीवाद के अपने अंतर्विरोध हैं. उनसे यह प्रतीति भी संभव है कि अपने संरक्षकता के सिद्धांत की ओट में गांधी पूंजीपतियों को बचाए रखना चाहते हैं. जब बड़े उद्यमी, भले ही संरक्षक के रूप में, रहेंगे तो बड़ी मशीनें और उनकी प्राणवायु उच्च प्रौद्योगिकी भी रहेगी ही. उन्हें भी अपने उत्पादों को खपाने के लिए बाजार की आवश्यकता पड़ेगी. उस समय छोटी पूंजी वाले ग्राम एवं कुटीर उद्योग जो पहले ही अपने अस्तित्व के संकट एवं आपसी स्पर्धा से जूझ रहे हैं, बड़ी पूंजीवाले उद्योगों के सामने बाजार में कैसे टिक पाएंगे—संरक्षकता का सिद्धांत इसका कोई समाधान नहीं देता.

कामगार को बेहतर उत्पादन परिस्थितियां देना, जानलेवा श्रम से उसे मुक्ति दिलाना प्रत्येक उधोमुखी सभ्यता का लक्ष्य होता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि उच्च प्रौद्योगिकी अपने साथ अनेक समस्याएं और चुनौतियां लेकर आई थी. इसके बावजूद समाज को उसकी देन कम न थी. शिक्षा और रोजगार के वैकल्पिक संसाधनों के माध्यम से उसने सामंतवाद और उसकी मददगार धार्मिक संस्थानों पर गहरी चोट की थी. जिससे सतरहवींअठारहवी शताब्दियों का वैचारिक विस्फोट संभव हो सका. नए विचारों ने परंपरा एवं संस्कृति के नाम पर शताब्दियों से चली आ रही रूढ़ियों पर चोट की थी, जिससे परंपरावादी शक्तियों का तिलमिला उठना स्वाभाविक था. आइंस्टाइन पर नई वैचारिक चेतना का प्रभाव था, जबकि धर्म और परंपरा से आबद्ध गांधी का संस्कारग्रस्त मन बारबार अतीत की शरण में लौट जाता है. हालांकि वे स्वयं बैरिस्टर थे. फिर भी शिक्षा के प्रति उनके विचार दकियानूसी की भांति परंपरा से बंधे थे. आधुनिक सभ्यता की भांति आधुनिक शिक्षा भी उन्हें अस्वीकार्य थी‘धर्मिक शिक्षा जरूरी मानी जाए. वह शिक्षक के आचरण और उसके मुंह से निकलनी चाहिए. एवं उसके आचरण द्वारा निकलनी चाहिए.’

चूंकि महान व्यक्तित्वों की चूकों का प्रभाव भी बड़ा होता है. इसलिए गांधी के देखतेदेखते प्रथम विश्वयुद्ध के बाद की परिस्थितियों का लाभ उठाकर देश में एक नवउद्योगपति वर्ग तेजी से उभरा था. बिरला, टाटा, डालमिया, बजाज जैसे औद्योगिक घराने उसके प्रमुख कर्णधारों में से थे. वे सब कांग्रेस के प्रमुख संरक्षकों में से थे. और कांग्रेस से वे इसलिए नहीं जुड़े थे कि उन धनकुबेरों को देश की आजादी से कुछ लेनादेना था. ना ही गांधी के संपर्क से उनका कायाकल्प हुआ था, वे गांधी से इसलिए जुड़े थे क्योंकि रूस और बरास्ते चीन से आती समाजवादी क्रांति की गर्म हवाएं उन्हें भयभीत करती थीं. गांधी उनके लिए सुरक्षित आड़ थे. यह डर आजादी मिलते ही जाता रहा. 1947 के बाद धनकुबेरों को ऐसे माहौल आवश्यकता थी, जिसमें वे खुलकर पांव पसार सकें. उस समय गांधी को किनारे कर दिया गया. दूसरे शब्दों में गांधी के संरक्षकतावाद के विचार को कांग्रेस और उनके करीबी धनकुबेरों ने उसी समय नकार दिया था.

आइंस्टाइन की खूबी है कि वे समाजवाद का समर्थन करते हैं, मनुष्यमात्र के विकास के लिए उसे अपरिहार्य मानते हैं, मगर इसके लिए किसी भी प्रकार की हिंसा उन्हें अस्वीकार्य है. इस लक्ष्य को वे लोकतांत्रिक परिवर्तनों के माध्यम से साधना चाहते हैं. समाजवाद, बरास्ते अहिंसा—उनका स्वप्न है. उनकी निगाह में मनुष्य सर्वोपरि है. अपनी इस धारणा पर वे अडिग हैं. गांधी के लेखों में समाजवाद का जिक्र आता है. मगर इसके लिए वे समाज और अर्थव्यवस्था के मूल ढांचे में अधिक बदलाव के पक्षधर नहीं हैं. अहिंसा, धर्म और परंपरा की सीमाओं में जितना संभव हो, उससे वे संतोष कर लेते हैं. ध्यातव्य है समाजवाद की जड़ों की खोज के लिए धर्म की शरण में चले जाने वाले दार्शनिक विचारकों में गांधी अकेले न थे. जार्ज बनार्ड शॉ, विलियम मॉरिस, जॉन रस्किन, इमर्सन, एडवर्ड कारपेंटर आदि विद्वानों की समाजवाद प्रेरणाएं बाइबिल तथा अन्य ईसाई धर्मग्रंथों से ही निकली थीं. स्वयं गांधी का ‘अंत्योदय’ का विचार रस्किन की पुस्तक ‘अन्टू दिस लास्ट’ से प्रभावित था, जबकि रस्किन को यह प्रेरणा बाइबिल से मिली थी. ‘अनटू दिस लास्ट’ के आरंभ में बाइबिल का एक पद उद्धृत किया गया है, जिसके अनुसार एक किसान यह तर्क देते हुए कि जरूरतें तो सभी की समान हैं, देर से आए श्रमिक को भी दूसरे मजदूरों के बराबर मजदूरी देता है.8 समाजवाद के विश्लेषण हेतु आइंस्टाइन वैज्ञानिक की दृष्टि से काम लेते हैं. उनके लिए समाजवाद संसाधनों, अवसरों की समानता और समान भागीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि मनुष्यता के उच्चतम आदर्शों से युक्त नैतिक व्यवस्था है. गांधी संरक्षतावाद के शास्त्रीय नाम से, नए विचारों की रोशनी में संदेह के घेरे में आ चुकी दान और शोषण के सांस्कृतिकरण की परंपरा को पुनर्जीवित करना चाहते थे. माजवाद बरास्ते अहिंसा का समर्थन करते हैं. वे संसाधनों और अवसरों के समान वितरण पर उतना जोर नहीं देते जितने कल्याण के संवितरण पर—

यदि समाजवाद बिना किसी हिंसा के आए तो हम उसका स्वागत करेंगे. क्योंकि तब मनुष्य किसी भी तरह की संपत्ति जनता के प्रतिनिधि की तरह और जनता के हित के लिए ही रखेगा; अन्यथा नहीं. करोड़पति के पास उसके करोड़ रहेंगे तो सही, लेकिन वह उन्हें अपने पास धरोहर के रूप में जनता के हित के लिए ही रखेगा.’9

इस लक्ष्य को पाने के लिए गांधी अहिंसा और मानवीय प्रेम की तरफदारी करते हैं—‘मैं घृणा से नहीं अपितु प्रेम की शक्ति से लोगों को अपनी बात समझाऊंगा और अहिंसा के द्वारा आर्थिक समानता पैदा करूंगा.’ विश्लेषण के दौरान गांधी घूमफिरकर धर्म और परंपरा की शरणागत होते हैं. संभवतः यहीं वे चूक जाते हैं. इसलिए कि दुनिया के प्रायः सभी धर्मों का स्वरूप सामंतवादी और केंद्रोन्मुखी रहा है. खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए धर्म नैतिकता का सहारा लेता है, लेकिन अवसर मिलते ही वह नैतिक प्रतिबद्धताओं को बिसराकर सत्तापक्ष की गोद में जा बैठता है और प्रायः उसके हर धत्कर्म का साक्षीसमर्थक बनता है.

आइंस्टाइन के लिए परंपरा का महत्त्व तभी तक है जब तक वह तर्कसम्मत हो और विज्ञान की कसौटी पर खरी उतर सके. उनकी प्राथमिकता विज्ञान का लाभ जनसाधारण तक पहुंचाने की थी. विज्ञान की सीमाओं से भी वे परिचित थे. विज्ञान मनुष्य की सभी समस्याओं का निदान कर सकता है—इस प्रकार का कोई भ्रम उन्हें नहीं था. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. जैविक इकाई के रूप में जहां वह अपने सुख की कामना करता है, बौद्धिक प्राणी होने के नाते वह अपना मानसम्मान और अस्मिता की सुरक्षा चाहता है, वहीं सामाजिक प्राणी के रूप में वह दूसरों के हर्षविषाद में सम्मिलित भी होता है. अकेले व्यक्ति की उपलब्धियां अर्थहीन होती हैं. अतः अपने सामथ्र्य और उपलब्धियों के प्रदर्शन के लिए मनुष्य समाज का सदस्य बनने को बाध्य होता है. मनुष्य और समाज का संबंध एकदूसरे की सामान्य आवश्यकताओं और सामाजिक नैतिकता के आधार पर बनता है. संबंधों में स्थायित्व एवं सफलता के आवश्यक है कि उनका नैतिक आधार आवश्यकताओं की अपेक्षा विस्तृत हो. क्या समाजवाद से मानव जीवन की समस्याओं का समाधान संभव है. आइंस्टाइन इससे आश्वस्त हैं,

इन गंभीर बुराइयों से बचाव का एकमात्र रास्ता है, लोकोन्मुखी शिक्षा प्रणाली की स्थापना तथा अर्थव्यवस्था का समाजवादी नजरिये के अनुरूप निर्धारण, जिसमें उत्पादन के साधन समुदाय के अधीन हों. उत्पादन का स्वरूप लोगों की आवश्यकता के अनुसार तय होना चाहिए और काम का विभाजन इस तरह से हो कि स्त्रीपुरुष, बच्चे जो भी काम कर सकते हैं, उन्हें काम मिले और किसी के सामने आजीविका संबंधी संकट न हो.’10

आइंस्टाइन ने समाजवाद का पक्ष लिया था. परंतु उसके नाम पर समाज में जो हो रहा है, उसके प्रति वे बहुत आश्वस्त नहीं थे. वे मान रहे थे कि समाज में समाजवाद को लेकर अत्यधिक अस्पष्टता है. सबसे बड़ा संकट ईमानदार विमर्श का है. उन्हें लगता था कि समाजवाद के नाम पर प्रचलित विभिन्न परिभाषाओं, अवधारणाओं तथा अर्थहीन बहसों ने उसको बहुत नुकसान पहुंचाया है. जिससे समाजवादी राज्य का सपना एक टोटम में सिमट चुका है. आइंस्टाइन के इस तर्क से उपन्यासकार जार्ज आरवेल की याद आने लगती है. समाजवाद को लेकर बुद्धिजीवियों की अनर्थक बहसों पर कटाक्ष करते हुए आरवेल ने कहा था—‘अंग्रेज बुद्धिजीवियों के साम्यवाद को समझने की कोशिश की जाए तो वह बहुत कुछ पागलों की देशभक्ति के समान है.’11 यह कोई नई बात नहीं है, समाजवाद और उसके विविध संकायों को लेकर इस प्रकार की अचरजनुमा टिप्पणियां शताब्दियों से होती आ रही हैं. आइंस्टाइन का आशय उदार और विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था से था. ऐसे समाजवादी राज्य का सपना उनके दिमाग में था जो अधिकतम लोकतांत्रिक और आर्थिकसामाजिक समानता के सिद्धांत पर टिका हो. जिसमें राज्य की नियंत्रणकारी शक्तियां अधिक जिम्मेदार और लोकप्रतिबद्ध हों.

गांधी की भांति आइंस्टाइन की करुणा भी मानव समाज तक सीमित न थी. उसमें प्राणिमात्र के प्रति करुणाभाव अंतर्निहित था. गांधी शाकाहार के समर्थक थे. भारतीय आमतौर पर, शाकाहारी न हों तो भी, उसे लेकर संवेदनशील होते हैं. इस संबंध में आइंस्टाइन की भावनाएं गांधी से मेल खाती थीं. शाकाहार का समर्थन करते हुए उन्होंने लिखा था—‘मानवीय स्वास्थ्य एवं पृथ्वी पर जीवन की उत्तरजीविता के निमित्त कोई भी इतना सहायक नहीं है, जितना शाकाहार को बढ़ावा देना.’12 इसलिए कि मनुष्यता की कसौटी वर्चस्व में न होकर सहयोगभावना में है. सबके साथ मिलजुलकर रहने में है. अपने साथसाथ दूसरे के अस्तित्व की रक्षा और मानसम्मान में है. न केवल मनुष्य, बल्कि प्राणिमात्र के प्रति करुणा की भावना से भरपूर यह नैतिक संदेश प्रायः हर संस्कृति का मूल स्वर रहा है. ‘सर्वे सुखिन भवंतु, सर्वे संतु निरामया’—गांधी इस औपनिषदिक कामना को राष्ट्रराज्य की प्रमुख पहचान के रूप देखना चाहते हैं. यह भावना गांधी द्वारा शाकाहार के समर्थन से भी अभिव्यक्त होती है—‘किसी राष्ट्र की महानता उसके द्वारा पशुओं के प्रति किए गए व्यवहार से आंकी जा सकती है.’13 जीवदया के प्रति धार्मिक द्रष्टिकोण इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना करुणा का संस्कार. करुणा का यही संस्कार गांधीवाद की आत्मा है. यही वह गुण है जो आइंस्टाइन को बारबार गांधी की ओर खींच लाता था. गांधी के प्रति अपनी श्रद्धा और सम्मान को आइंस्टाइन ने कई अवसरों पर व्यक्त किया था. आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक एस. राधाकृष्णन गांधी के सत्तरवें जन्मदिन पर एक पुस्तक संपादित करना चाहते थे. उन्होंने पत्र लिखकर आइंस्टाइन से उसमें सहयोग देने को कहा. उस अवसर पर आइंस्टाइन ने गांधी की प्रशस्ति में लिखा—

राजनीतिक इतिहास के क्षेत्र में महात्मा गांधी का योगदान अन्यतम है. उन्होंने अपने देश के गरीब, वंचित एवं दमित लोगों की स्वतंत्रता हेतु एकदम नए और मानवीय औजार विकसित कर उनका प्रयोग अपनी संपूर्ण निष्ठा और कर्तव्यबोध के साथ किया है. दुनिया के आधुनिक सभ्य समाजों तथा उनके चिंतनधर्मा बुद्धिजीवियों पर उनका जो प्रभाव पड़ा है, वह तलवार के जोर पर की गई कार्रवाहियों की अपेक्षा कहीं अधिक गहरा और स्थायी है. इस कसौटी पर केवल उन्हीं राजनयिकों का योगदान सराहनीय हो सकता है जो शिक्षा, लोकचेतना तथा नैतिकता की स्थापना द्वारा अपने लोगों के लिए नैतिक राज्य की स्थापना कर सकते हैं. यह हम सभी के लिए अत्यंत प्रसन्नता और सम्मान का विषय है कि हम ऐसी महान, प्रतिभा संपन्न शख्सियत से सीधे संवाद करने में सक्षम हैं.’14

गांधी की कथनी और करनी में अद्भुत एकता थी. उन्हें अपने ऊपर विश्वास था और खुद के निर्णयों पर वे इतने दृढ़ रहते थे कि उनके अपने ही साथी कभीकभी उन्हें हठी और दुराग्रही तक कह देते थे. अपवादस्वरूप ही सही परिस्थितियों के आगे गांधी को भी झुकना पड़ा और आइंस्टाइन को भी. दूसरी ओर यह भी सच है कि जब भी इन महापुरुषों को समझौते के लिए बाध्य किया गया, उसका नुकसान पूरे समाज को झेलना पड़ा. गांधी देश के विभाजन के विरोधी थे. उन्होंने कहा था कि हिंदुस्तान का बंटवारा उनकी लाश से गुजरकर होगा. मगर तत्कालीन नेताओं के आगे उनकी एक न चली. आजादी के बाद तो वे पूरी तरह किनारे कर दिए गए. जिन धनकुबेरों से वे कामना करते थे कि वे आजाद भारत में सरंक्षकतावाद के आदर्श को अपनाएंगे, खुद को संपत्ति का सरंक्षक मानकर व्यवहार करेंगे, जो गांधीवादी होने का दिखावा करते थे, वे अपने ही जैसे स्वार्थी नेताओं के संग मिलकर आजादी के बाद के माहौल को भुनाने में लग गए. इससे आजादी के बाद देश के वास्तविक निर्माण का जो सपना गांधी ने देखा था, और जिसकी कामना इस देश का आम नागरिक करता था, वह उत्तरोत्तर दूर होता चला गया. नवनिर्माण के बहाने देश के संसाधन धनकुबेरों के हवाले किए जाने लगे. इससे देश में आर्थिक विभाजन में तेजी आई और वह आर्थिकराजनीतिक विकेंद्रीकरण के लक्ष्य से दिनांेदिन दूर होता गया. सत्ता चंद राजनीतिक परिवारों तक और संसाधन मुट्ठीभर धनकुबेरों तक सिमटते चले गए.

कुछ ऐसा ही आइंस्टाइन के साथ हुआ. वे नहीं चाहते थे कि उनकी खोज का उपयोग परमाणु बम के लिए किया जाए. लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्थितियां इतनी तेजी से बदलीं कि उन्हें उसके लिए अनुमति देनी ही पड़ी. जर्मनी में हिटलर परमाणु शक्ति हासिल करने के लिए रातदिन एक किए था, जिसने अमेरिका की चिंता बढ़ा दी थी. एक प्रकार से वह भी स्पर्धा ही थी, मारक हथियारों की होड़ में आगे निकलने की. दूसरे विश्वयुद्ध की आहट के बीच अमेरिकी भौतिक विज्ञानी लियो सिजलॉर्ड तथा यूजीन विगनर राष्ट्रपति रूजवेल्ट का संदेश लेकर आइंस्टाइन से मिले. उन्होंने उनसे परमाणु बम बनाने के लिए सहमतिपत्र पर हस्ताक्षर करने को कहा था. आइंस्टाइन से कहा गया कि बम दुनिया में शक्ति संतुलन कायम करने के काम आएगा. परमाणु बम होगा तो किसी दुश्मन की युद्ध छेड़ने की हिम्मत ही नहीं पड़ेगी. आइंस्टाइन उसके लिए भी तैयार न थे. लेकिन जब उनसे कहा गया कि यदि अवसर चूके तो हिटलर अमेरिका से पहले परमाणु बम बनाने में सफल हो जाएगा, तो वे सोच में पड़ गए. यहूदी होने के कारण उन्हें जर्मनी छोड़कर अमेरिका में शरण लेनी पड़ी थी. इसका उन्हें मलाल था. ‘तानाशाह के हाथों में अकूत ताकत आने से अच्छा है कि बम अमेरिका के हाथों में रहे, जो एक लोकतांत्रिक राज्य है.’ आइंस्टाइन का कुछ ऐसा ही सोचना था. असल में यह उनका खुद को दिया गया भरोसा था. यह आभास उन्हें था कि यदि हस्ताक्षर न भी करेंगे तो भी युद्धोन्मत्त शक्तियां एक न एक दिन बम का आविष्कार कर ही लेंगी. इसलिए पत्र पर हस्ताक्षर कर लौटा दिया. रूजवेल्ट को लिखे पत्र के बाद अमेरिका में मेनहट्टन परियोजना में गति आई. आखिर बम बना. उस समय उन्होंने शायद ही यह कल्पना की हो कि उनकी खोज हिरोशिमा और नागसाकी की भीषण तबाही, मनुष्यता के कलंक का कारण बनेगी. यह अपराधबोध उन्हें आजीवन बना रहा. नबंवर 1954 में अपनी मृत्यु से पांच महीने पहले परमाणु बम बनाने की अनुमति देने को आइंस्टाइन ने जीवन की सबसे बड़ी भूल स्वीकार किया था. हालांकि यह भी माना कि वह उस समय की परिस्थितियों की मांग थी. इसके बावजूद वे इस आत्मग्लानि से कभी न उबर सके. इसी ने उन्हें गांधी के करीब लाने का काम किया. उन्हें लगता था कि युद्धोन्मत्त राजसत्ताओं के बीच गांधी का अहिंसा रास्ता ही श्रेय की ओर ले जा सकता है. उसी पर चलकर लोकतंत्र को बचाया जा सकता है. जापान में बमबारी के वर्षों बाद वहां के एक दैनिक ‘कैजो’ ने आइंस्टाइन से परमाणु बम के प्रयोग पर टिप्पणी करने को कहा. प्रत्युत्तर में पत्र संपादक के नाम 1952 में आइंस्टाइन ने जो पत्र लिखा, उसमें एक बार फिर गांधी के प्रति आस्था और विश्वास झलकता था. हालांकि उस समय तक गांधी की हत्या को तीन वर्ष बीत चुके थे. पत्र में आइंस्टाइन गांधी को सम्मानपूर्वक याद किया था—

गांधी, हमारे समय के महानतम राजनीतिज्ञ प्रतिभा ने हम सत्य और अहिंसा के उस रास्ते से परचाया है, जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए. उन्होंने यह प्रमाणित कर दिया कि एक व्यक्ति के मन में सत्य के लिए उत्सर्ग की भावना हो तथा रास्ता सही हो तो वह कुछ भी प्राप्त कर सकता है. भारतीय स्वाधीनता के लिए उनका कार्य इस बात का स्वतः प्रमाण है कि अदम्य विश्वास से युक्त मनुष्य की दृढ़ इच्छाशक्ति अजेय समझी जाने वाली सैन्य ताकतों से कहीं अधिक ताकतवार है.’15

एक वैज्ञानिक के रूप में आइंस्टाइन को जो लोकप्रियता मिली, वह अद्वितीय थी. उतनी ख्याति मानसम्मान उससे पहले शायद ही किसी और वैज्ञानिक को मिला हो. यूं भी जनसाधारण प्रायः ऐसे चरित्रों को पूजतासराहता है, जिनका उसके अपने जीवन से वास्ता हो. या जो लोकप्रियता की उसकी कसौटी पर खरे उतरते हों. आइंस्टाइन, उनके द्वारा प्रस्तुत सापेक्षिकता का सिद्धांत, समय का वेग आदि जनसाधारण की समझ से ऊपर की चीजें थीं. फिर भी आइंस्टाइन को इतनी मिली असाधारण ख्याति के आगे न्यूटन की चमक भी फीकी पड़ गई, जिनकी पुस्तक ‘दि प्रंसीपिया मैथेमेटिका’ को वैज्ञानिकों के धर्मग्रंथ का दर्जा प्राप्त है. और जिसके आविष्कारों ने पंद्रहवींसोहलवीं शताब्दी की वैज्ञानिकसामाजिक क्रांति की नींव तैयार की थी. लोकहित के हिसाब से देखा जाए तो एडवर्ड जेनर(1749—1823) द्वारा वैक्सीन तथा एलेक्जेंडर फ्लेमिंग(1881—1955) द्वारा पेनसिलीन की खोज मनुष्यता के इतिहास की सबसे चामत्कारिक और कल्याणधर्मी खोजें थीं. उनकी सहायता से महामारियों पर काबू पाना संभव हो सका. आइंस्टाइन के बाद भी अनेक प्रतिभासंपन्न वैज्ञानिक हुए हैं, जिन्होंने चिकित्सा, भौतिक विज्ञान और जीन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विलक्षण आविष्कार किए हैं. इसके बावजूद एडवर्ड जेनर, फ्लेमिंग, लुई पाश्चर, नील रदरफोर्ड अथवा आइंस्टाइन से पहले और बाद में जन्मे अन्य वैज्ञानिकों को वैसी लोकप्रियता प्राप्त न हो सकी, जो उन्हें सहज रूप से प्राप्त थी. उन्हें शताब्दी का ‘जीनियस’ कहकर पुकारा गया. उससे पहले यह सम्मान शायद ही किसी को मिला था. इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि आइंस्टाइन ने समय के वेग के बारे में जो अनूठी जानकारी दी थी, उसमें परीकथाओं जैसा रोमांच था. अतः समय की जादुई गति को आधार मानकर विश्वविख्यात उपन्यास लिखे गए. समय को तेज गति से दौड़ते हुए दर्शाना, उसके वेग का आकलन करना फंतासीनुमा खोजें थीं. उनके फलस्वरूप आइंस्टाइन को भी लोकप्रियता हासिल हुई. दूसरे वे खुद अच्छे लेखक थे. उनके लिखे गए करीब 500 शोधपत्रों में से लगभग 150 समाजविज्ञान तथा मानविकी की दूसरे विषयों पर थे. तीसरा और महत्त्वपूर्ण और बड़ा कारण था—डर का मनोविज्ञान. आइंस्टाइन की खोज के फलस्वरूप परमाणु ऊर्जा के रूप में एक विराट शक्ति मनुष्य के हाथ में आ गई, जो मनुष्य को सहलाती नहीं, डराती थी. और डर का प्रभाव अपेक्षाकृत स्थायी होता है. इसलिए आइंस्टाइन का नाम जनसाधारण के दिलोदिमाग पर छाता चला गया. इसी तरह देखा जाए तो ‘सविनय अवज्ञा’, ‘सत्याग्रह’ अथवा ‘अंत्योदय’ जैसे विचार भी गांधी की मौलिक खोज भले न हों, मगर जिस निष्ठा और अटल विश्वास के साथ उन्होंने उनको जीवन में उतारा उससे इतना तो कहा ही जा सकता है कि यदि गांधी न होते तो ये विचार भी पुस्तकों में कैद अनगिनत विचारों की भांति कहीं दबे रह गए होते.

डरा हुआ आदमी दूसरों को सावधान रहने की सलाह देता है. आइंस्टाइन का आविष्कार लोगों को डराता था. परंतु यह डर खुद आइंस्टाइन का भी था. उनका डर अकारण भी नहीं था. अल्फ्रेड नोबेल का उदाहरण उनके आगे था. प्रसंगवश बता दें कि मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मा अल्फ्रेड नोबेल बड़ा होकर अपने समय का सबसे हथियार निर्माता बना. एक कामयाब पूंजीपति जिसने युद्धोन्मत्त शक्तियों को हथियार बेचकर बेशुमार दौलत बटोरी थी. विस्फोटक ‘डायनामाइट’ के अलावा करीब 350 हथियारों के पेटेंट नोबेल के हाथ में थे. परंतु एक घटना ने नोबेल का ऐसा हृदयपरिवर्तन किया कि उसका मकसद ही बदल गया. वह घटना 1888 की है. अल्फ्रेड नोबेल का भाई लुडविग नोबेल फ्रांस में केंस की यात्र के लिए पहुंचा हुआ था. वहीं उसका देहांत हो गया. एक फ्रांसिसी समाचारपत्र को यह समाचार मिला तो बगैर ज्यादा जांचपड़ताल किए, उतावलेपन में समाचार छाप मारा. यह समझकर कि डायनामाइट का आविष्कारक स्वयं अल्फ्रेड नोबेल मारा गया है, अपने समाचारपत्र में मोटे हरफों में छापा. शीर्षक था—‘मौत के सौदागर की मौत.’ संयोगवश वह समाचारपत्र नोबेल के हाथों में पहुंचा. पढ़ते ही उसके दिल को जबरदस्त धक्का लगा. तब मृत्योपरांत अपनी प्रतिष्ठा और मानसम्मान को बचाए रखने तथा समाज के बुद्धिजीवी वर्ग को अपने अधिकार में रखने के लिए उसने एक ट्रस्ट का गठन किया, उसके माध्यम से नोबेल पुरस्कारों की शुरूआत हुई. अल्फ्रेड नोबेल के साथ घटी इस घटना ने आइंस्टाइन को भी प्रभावित किया. परमाणु शक्ति के आविष्कारक होने के कारण उनके आलोचक भी कम न थे. ऐसे लोग भी थे जो उनके शांति प्रस्तावों को दिखावा कहा करते थे. 1933 में मैकुले रेमंड ने उनका एक कार्टून बनाया था. जिसमें आइंस्टाइन के हाथ में तलवार थी. और वे ताकत के मद में अपनी बांह चढ़ाते दिखाए गए हैं. वह आइंस्टाइन के शांतिप्रस्तावों पर आलोचक की नजर थी, जिसमें उनकी शांतिवादी नीतियों पर कटाक्ष किया था. आलोचक गलत नहीं हैं, यह आइंस्टाइन भी समझते थे. अपने आविष्कार के दुरुपयोग का डर उन्हें गांधी के करीब लाता रहा. इसके लिए जब, जहां भी उन्हें अवसर मिला, गांधी के प्रति अपने स्नेहसम्मान का उन्होंने मुक्तकंठी बयान किया. अपनी पुस्तक ‘आउट आॅफ माई लेटर ईयर्स’ में गांधी पर प्रशंसात्मक टिप्पणी करते हुए उन्होंने लिखा है—

जनसाधारण का नेता, जिसको लगातार कमजोर पड़तीं औपनिवेशिक शक्तियों का समर्थन प्राप्त है. एक ऐसा जननेता जिसकी सफलता कूटनीति, राजनयिक चातुर्य अथवा दूसरों पर अधिकार जमाने के लिए छिछले राजनीतिक दांवपेंच पर निर्भर नहीं है. उसके पास केवल सच को अभिव्यक्त करने की कला है, एक काया है जिनमें इंसानियत और ज्ञान दोनों साथसाथ विद्यमान हैं. उसके हथियार संवेदना और सहिष्णुता हैं, जो उसने अपने समाज को सुरक्षित और सुदृढ़ बनाने के लिए गढ़े हैं. ऐसा इंसान जो आमजन का प्रतीक है. जिसने यूरोपीय नृशंसता और क्रूरता का सामना किया है, और जो जनसाधारण का मसीहा है. इस तरह उसका प्रभाव अमिट है….पीढ़ियों के बाद इस बात पर शायद ही कोई विश्वास करेगा कि इस प्रकार का सचमुच जीताजागता मनुष्य इस धरती पर था. इस तरह वह सार्वकालिक उदीयमान सितारा है.’16

गांधी नेता भी थे और सामाजिक कार्यकर्ता भी. लोकमानस से जुड़े मुद्दों पर उनकी कितनी गहरी पकड़ थी, वैसी शायद ही किसी और नेता की रही हो. उन्होंने कुशल राजनयिक की भांति सरकार और जनता से संवाद किया और एक दक्ष समाजविज्ञानी की भांति लोकहित से जुड़े विषयों पर बोलते रहे. गांधी के व्यक्तित्व की भांति उनकी शैली भी सरल है. चाहे भाषण हों या पत्रकारिता, हर जगह उनका कुशल शैलीकार छाया रहता है. उनकी बनिस्पत आइंस्टाइन लेखनशैली विवेचनापरक है. उसमें गंभीरता है. वाक्य अपेक्षाकृत लंबे हैं, भाषा अपेक्षाकृत जटिल. इसके बावजूद एक प्रवाह उनकी शैली में है, जिसके कारण वे पठनीय बने रहते हैं. गांधी एक प्रवाह से साथ अपने विचारों में बहा ले जाते हैं, आइंस्टाइन की शैली में मुग्ध कर देने वाली परिनिष्ठता है. अपनी बहुमुखी प्रतिभा से दार्शनिकवैज्ञानिक आइंस्टाइन हमें उस युग की याद दिला देते हैं, जब विज्ञान, इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्रा आदि सब एक ही विषय के अंतर्गत आते था—वह था दर्शन. पारमेनिडिस, डेमोक्रिटिस, पाइथागोरस, अरस्तु, जेनो आदि आरंभिक यूनानी दार्शनिकों की जितनी पैठ दर्शन के क्षेत्र में थी, उतनी ही विज्ञान में. आइंस्टाइन को विज्ञान और धर्म के सहसंबंध से बड़ी उम्मीद थी. ईश्वर उनके लिए रूढ़ विश्वास न होकर, आध्यात्मिक विवेचना का विषय था, जिसे वे अपने लेख ‘धर्म और विज्ञान’ में विस्तार देते हैं. ‘समाजवाद क्यों?’ में वे चारों और व्याप्त आर्थिक विसंगतियों तथा उनके कारण जनसाधारण को जो दुश्वारियां झेलनी पड़ती हैं, उनके प्रति चिचिंत नजर आते हैं. आइंस्टाइन को गांधी का अहिंसापथ स्वीकार्य है तो अर्थदर्शन को लेकर वे बर्ट्रेंड रसेल के बहुत करीब नजर आते हैं. रसेल की पुस्तक ‘ए रोड टू फ्रीडम’ में जिस लोकतांत्रिक, विकेंद्रीकृत, समानताधारित और जनसहयोगात्मक अर्थव्यवस्था की ओर संकेत किया गया है, आइंस्टाइन के लेखों में उसी चेतना का प्रवाह है. विज्ञान और दर्शन के समन्वय से उन्हें जो उम्मीदंे थीं, उनकी छाया आइंस्टाइन के चिंतन पर एकदम साफ नजर आती है.

आइंस्टाइन के दिलोदिमाग पर गांधी कितने छाए हुए थे, इसका एक और उदाहरण नीचे दी गई टिप्पणी है. यूरोशलम की हिब्रू यूनीवर्सिटी के आइंस्टाइन संग्रहालय से प्राप्त यह टिप्पणी जिस कागज पर है, उसके आधे से अधिक हिस्से पर वे गणित की पहेली को हल करने में जुटे हैं. निचले हिस्से पर एकदम अनौपचारिक और आकस्मिक ढंग से लिखी गई यह टिप्पणी है, मानो गणित में डूबा हुआ मन अचानक गांधी की ओर बढ़ चला हो. ऐसा तभी होता है, जब व्यक्ति अपने को आदर्श मान चुका हो. आइंस्टाइन की गांधी के प्रति श्रद्धाभाव कुछ ऐसा ही था—

राजनीति के इतिहास में महात्मा गांधी की उपलब्धियां अद्वितीय हैं. उन्होंने एक पराधीन देश की स्वतंत्रता के लिए नए और इंसानियत से भरपूर रास्ते की खोज की. तथा उसपर अपनी निष्ठा और संपूर्ण आत्मविश्वास के साथ बढ़ते गए. मानवता पर उनके विचारों का प्रभाव हमारी कल्पना से, जो अन्यायी की ताकत का बढ़चढ़कर आंकने की अभ्यस्त है, से कहीं अधिक चिरस्थायी है. क्योंकि अंत तो केवल उस राजनेता का होगा जिसने अपने लोगों को अपनी शिक्षा और नैतिक आचरण से ऊपर उठाने की कोशिश की है. हमें इस बात के लिए खुश होना चाहिए कि उन्होंने जो नैतिक ऊंचाई हमें दी है, वह आने वाली पीढ़ियों को भी प्रभावित करेगी. उनके लिए आदर्श होगी.’17

गांधी के प्रति आइंस्टाइन का सम्मान इस मृत्युलेख से भी होता है, जो उन्होंने गांधी की हत्या के तीन सप्ताह बाद वाशिंग्टन में आयोजित एक स्मृतिसभा के लिए लिखा था, ‘केवल सत्यानुयायी, अहिंसक और पवित्र समाजवादी ही दुनिया में या हिंदुस्तान में समाजवाद फैला सकता है. जहां तक मैं जानता हूं, दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है जो पूरी तरह समाजवादी हो. मेरे बताये हुए साधनों के बिना ऐसा समाज कायम करना असंभव है.’ आगे गांधी को सम्मानपूर्वक याद करते हुए आइंस्टाइन लिखते हैं—‘हर वह इंसान जो मनुष्यता की बेहतरी का सपना देखता है, उसको गांधी की असामयिक, त्रसद हत्या ने हिला दिया है. उन्होंने अपने आदर्शों के लिए, अहिंसा के पक्ष में मृत्यु का वरण किया है, इसलिए उन्हें मार डाला गया. इसलिए भी कि देश में अशांति और अव्यवस्था के वातावरण के बावजूद वह किसी भी प्रकार की सुरक्षा लेने को तैयार न था. यह उसका अटूट विश्वास था कि ताकत का उपयोग अपने आप में ही बुराई है.’ आज न तो गांधी हैं न आइंस्टाइन, परंतु आइंस्टाइन की बौद्धिक प्रखरता और गांधी की सत्य को परखने और उसके लिए हर जोखिम उठाने का साहस हमें निरंतर कुछ नया सोचने, आगे बढ़ने और मनुष्यता में विश्वास रखने की प्रेरणा देता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

अनुक्रमणिका

1. You have shown by all you have done that we can achieve the ideal even without resorting to violence. We can conquer those votaries of violence by the non-violent method. Your example will inspire and keep humanity to put an end to a conflict based on violence with international help and cooperation guaranteeing peace of the world. With this expression of my devotion and admiration I hope to be able to meet you face to face. Einstein and the Indian minds: Tagore, Gandhi and Nehru, Rasoul Sorkhabi.

2. I was delighted to have your beautiful letter sent through Sundaram. It is a great consolation for me that the work I am doing finds favor in your sight. I do indeed wish that we could meet face to face and that too in India at my Ashram. 10 October 1931.—Ibid.

3. We have physicists, geometricians, chemists, astronomers, poets, musicians, and painters in plenty; but we have no longer a citizen among us; or if there be found a few scattered over our abandoned countryside, they are left to perish there unnoticed and neglected. Such is the condition to which we are reduced, and such are our feelings towards those who give us our daily bread, and our children milk.- Rousseau, Discourse on the Arts and Sciences

4. The priests, in control of education, made the class division of society into a permanent institution and created a system of values by which the people were thence forth, to a large extent unconsciously, guided in their social behavior.— Albert Einstein in Why Socialism?, Monthly Review (May 1949).

5. Production is carried on for profit, not for use. There is no provision that all those able and willing to work will always be in a position to find employment; an “army of unemployed” almost always exists. The worker is constantly in f ear of losing his job. Since unemployed and poorly paid workers do not provide a profitable market, the production of consumers’ goods is restricted, and great hardship is the consequence. Technological progress frequently results in more unemployment rather than in an easing of the burden of work for all. The profit motive, in conjunction with competition among capitalists, is responsible for an instability in the accumulation and utilization of capital which leads to increasingly severe depressions. Unlimited competition leads to a huge waste of labor, and to that crippling of the social consciousness of individuals which I mentioned bef ore. This crippling of individuals I consider the worst evil of capitalism. Our whole educational system suffers from this evil. An exaggerated competitive attitude is inculcated into the student, who is trained to worship acquisitive success as a preparation for his future career.—Albert Einstein, Monthly Review (May 1949).

6. I admire Gandhi greatly but I believe there are two weaknesses in his program; while nonresistance is the most intelligent way to cope with adversity, it can be practiced only under ideal conditions. It may be feasible to practice it in India against the British but it could not be used against the Nazis in Germany today. Then, Gandhi is mistaken in trying to eliminate or minimize machine production in modern civilization. It is here to stay and must be accepted. —‘Peace Must Be Waged,’ Interview with Robert Merrill Bartlett in the Survey Graphic, August 1935, Nathan and Norden (1968), ref. 15, p. 261.

7. The economic anarchy of capitalist society as it exists today is, in my opinion, the real source of the evil. We see before us a huge community of producers the members of which are unceasingly striving to deprive each other of the fruits of their collective labor—not by force, but on the whole in faithful compliance with legally established rules. In this respect, it is important to realize that the means of production—that is to say, the entire productive capacity that is needed f or producing consumer goods as well as additional capital goods—may legally be, and f or the most part are, the private property of individuals.—Why Socialism?

8. Friend, I do thee no wrong.

Didst not thou agree with me for a penny?

Take that thine is, and go thy way.

I will give unto this last even as unto thee.”

“If ye think good, give me my price;

And if not, forbear.

So they weighed for my price thirty pieces of silver.”— John Ruskin‘s Unto This Last.

9. हरिजन, 13 मार्च 1937, मेरे सपनों का भारत, पृष्ठ—31

10. I am convinced there is only one way to eliminate these grave evils, namely through the establishment of a socialist economy, accompanied by an educational system which would be oriented toward social goals. In such an economy, the means of production are owned by society itself and are utilized in a planned fashion. A planned economy, which adjusts production to the needs of the community, would distribute the work to be done among all those able to work and would guarantee a livelihood to every man, woman, and child.—Why Socialism?

11. The Communism of the English intellectual is something explicable enough. It is the patriotism of the deracinated. Orwell, George, Inside the Whale(1940)

12. Nothing will benefit human health and increase chances for survival of life on Earth as much as the evolution to a vegetarian diet”. ~Albert Einstein.

13. The greatness of a nation…can be judged by the way its animals are treated”. –Mahatma Gandhi.

14. Mahatma Gandhi’s life’s work is unique in political history. He has devised a quite new and humane method for fostering the struggle for liberation of his suppressed people and has implemented it with greatest energy and devotion. The normal influence which it has exerted on the consciously thinking people of the entire civilized world might be far more lasting than may appear in our time of overestimation of brutal methods of force. For only the work of such statesmen is lasting who by example and educational action awaken and establish the moral forces of their people. We may all be happy and grateful that fate has given us such a shining contemporary, an example for coming generations. –Radhakrishnan, S. (ed.), Birthday Volume to Gandhi, George Allen & Unwin, London, 1939. (Mahatma Gandhi: s and Reflections on His Life and Work: Presented to Him on His Seventieth Anniversary, 2 October 1939, 2nd edn, 1949, p. 557).

15. Gandhi, the greatest political genius of our time, indicated the path to be taken. He gave proof of what sacrifice man is capable once he has discovered the right path. His work in behalf of India’s liberation is living testimony to the fact that man’s will, sustained by an indomitable conviction, is more powerful than material forces that seem insurmountable.-Reply to the Editor of Kaizo”, 1952, Rowe 488-489.

16. A leader of his people, unsupported by any outward authority: a politician whose success rests not upon craft nor the mastery of technical devices, but simply on the convincing power of his personality; a victorious fighter who has always scorned the use of force; a man of wisdom and humility, armed with resolve and inflexible consistency, who has devoted all his strength to the uplifting of his people and the betterment of their lot; a man who has confronted the brutality of Europe with the dignity of the simple human beings, and thus at all times risen superior.

Generations to come, it may be, will scarce believe that such a one as this ever in flesh and blood walked upon this earth. – Einstein, A., Out of My Later Years, Philosophical Library, New York, 1950, p. 240.

17. Mahatma Gandhi’s life achievement stands unique in political history. He has invented a completely new and humane means for the liberation war of an oppressed country, and practised it with greatest energy and devotion. The moral influence he had on the conciously thinking human being of the entire civilized world will probably be much more lasting than it seems in our time with its overestimation of brutal violent forces. Because lasting will only be the work of such statesmen who wake up and strengthen the moral powerof their people through their example and educational works.We may all be happy and grateful that destiny gifted us with such an enlightened contemporary, a role model for the generations to come. source : http://streams.gandhiserve.org/einstein.html.


जैन और बौद्धदर्शन में समाजवादी चेतना

सामान्य

हितोपदेश की एक सुभाषित है : अयं निज परोवेति गणना लघुचैतसाम्। उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम् यानी ‘यह अपना है, वह पराया हैयह सोच क्षुद्र वृत्ति की उपज है. उदारचरितों, सज्जनों के लिए तो पूरा विश्व एक परिवार के समान है, पृथ्वी पर रहने वाले सभी नरनारी उनके परिजन हैं.’जिस दौर की यह उक्ति है वह मानवीय मेधा के प्रस्फुटन का था. जैन और बौद्ध दर्शन का उदय उससे करीब तीन सौ वर्ष पहले हो चुका था. जिन दिनों पंचतंत्रादि ग्रंथों की रचना हुई ये दोनों दर्शन देश की सीमाओं से बाहर निकलकर दुनिया को अपनी कल्याणकारी मेधा से प्रभावित कर रहे थे. उल्लेखीय है कि बौद्ध दर्शन का उद्भव वैदिक धर्म की प्रतिक्रिया में हुआ था. वेदों में बहुदेववाद, कर्मकांड और युद्धों का इतना विशद् वर्णन है कि उनके आगे उनकी दार्शनिक, नैतिक, आध्यात्मिक चिंतनधारा म्लान दिखने लगती है. इसलिए वे तत्वचिंतन के नाम पर कर्मकांड, धर्म के बजाय पाखंड, नीति के स्थान पर ऊंचनीच और आडंबर रचते हुए नजर आते हैं. पुरोहित वर्ग उनके माध्यम से धर्मदर्शन की स्वार्थानुकूल और मनमानी व्याख्याएं थोपने का प्रयास करता है. राजनीति के सहयोग से वह इस धृष्टता में कामयाब भी होता है. धर्म और राजसत्ता परस्पर मिलकर लोगों के शोषण के लिए नएनए विधान गढ़ते हैं. समाजार्थिक शोषण का यह सिलसिला लगभग पांच शताब्दियों तक निरंतर चलता है. ऐसा भी नहीं है कि शेष समाज शोषण को अपनी नियति मान चुका था. बल्कि जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, ब्राह्मणवाद का विरोध उसके आरंभिक दिनों से ही होने लगा था. मगर उसको रचनात्मक दिशा देने का काम किया था, जैन और बौद्ध दर्शन ने. इन दोनों दर्शनों ने वेदों की बुद्धिवाद की उस धारा को नई एवं युगानुकूल दिशा देने का काम किया, जो कर्मकांड और मिथ्याडंबरों के बीच अपनी पहचान लगभग गंवा चुकी थी.

जैन और बौद्ध धर्म के प्रवर्त्तक क्रमशः महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध, ईसा से छह शताब्दी पहले, क्षत्रिय कुल में जन्मे थे. अपनेअपने दर्शन में दोनों ने ही कर्मकांड और आडंबरवाद का जमकर विरोध किया था. दोनों ही यज्ञों में दी जाने वाली पशुबलियों के विरुद्ध थे. दोनों ने शांति और अहिंसा का पक्ष लिया था, और भरपूर ख्याति बटोरी. जैन और बौद्ध, दोनों ही दर्शनों को भारतीय चिंतनधारा में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. इनमें से जैन धर्म अहिंसा को लेकर अत्यधिक संवेदनशील था, जबकि जीवन को लेकर बुद्ध का दृष्टिकोण व्यावहारिक था. अहिंसा के प्रति अत्यधिक आग्रहशीलता के कारण जैन दर्शन प्रचारप्रसार के मामले में बौद्ध दर्शन से पिछड़ता चला गया. व्यावहारिक होने के कारण बौद्ध दर्शन को उन राजाओं आ समर्थन भी मिला जो ब्राह्मणवाद से तंग हो चुके थे; और उपयुक्त विकल्प की तलाश में थे.

गौतम बुद्ध ने कर्मकांड के स्थान पर ज्ञानसाधना पर जोर दिया था. पशुबलि को हेय बताते हुए वे अहिंसा के प्रति आग्रहशील बने रहे. वेदवेदांगों में आत्मापरमात्मा आदि को लेकर इतने अधिक तर्कवितर्क और कुतर्क हो चुके थे कि बुद्ध को लगा कि इस विषय पर और विचार अनावश्यक है. इसलिए उन्होंने आत्मा, परमात्मा, ईश्वर आदि विषयों को तात्कालिक रूप से छोड़ देने का तर्क दिया. उसके स्थान पर उन्होंने मानवजीवन को संपूर्ण बनाने पर जोर दिया. समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए उन्होंने पंचशील का सिद्धांत दिया. जिसमें पहला शील है, अहिंसा. जिसके अनुसार किसी भी जीवित प्राणी को कष्ट पहुंचाना अथवा मारना वर्जित कर दिया गया था. दूसरा शील था, अचौर्य. जिसका अभिप्राय था कि किसी दूसरे की वस्तु को न तो छीनना न उस कारण उससे ईर्ष्या करना. तीन शील सत्य था. मिथ्या संभाषण भी एक प्रकार की हत्या है. सत्य की हत्या. इसलिए उससे बचना, सत्य पर डटे रहना. तीसरे शील के रूप में तृष्णा न करना शामिल था. व्यक्ति के पास जो है, जो अपने संसाधनों द्वारा अर्जित किया गया, उससे संतोष करना. आवश्यकता से अधिक की तृष्णा न करना. इसलिए कि यह पृथ्वी जरूरतें तो सबकी पूरी कर सकती है, मगर तृष्णा एक व्यक्ति की भी भारी पड़ सकती है. पांचवा शील मादक पदार्थों के निषेद्ध को लेकर है. पंचशील को पाने के लिए उन्होंने अष्ठांगिक मार्ग बताया था, जिसमें उन्होंने सम्यक दृष्टि(अंधविश्वास से मुक्ति), सम्यक वचन(स्पष्ट, विनम्र, सुशील वार्तालाप), सम्यक संकल्प(लोककल्याणकारी कर्तव्य में निष्ठा, जो विवेकवान व्यक्ति से अभीष्ट होता है), सम्यक आचरण(प्राणीमात्र के साथ शांतिपूर्ण, मर्यादित, विनम्र व्यवहार), सम्यक जीविका(किसी भी जीवधारी को किसी भी प्रकार का कष्ट न पहुंचाना), सम्यक परिरक्षण(आत्मनियंत्रण और कर्तव्य के प्रति समर्पण का भाव), सम्यक स्मृति(निरंतर सक्रिय एवं जागरूक मस्तिष्क) तथा सम्यक समाधि(जीवन के गंभीर रहस्यों पर सुगंभीर चिंतन) पर जोर दिया था.

बुद्ध की चिंता थी कि किस प्रकार मानवजीवन को सुखी एवं समृद्ध बनाया जाए. सुख से उनका अभिप्राय केवल भौतिक संसाधनों की उपलब्धता से नहीं था. इसके स्थान पर वे न केवल मानवजीवन के लिए सुख की सहज उपलब्धता चाहते थे, बल्कि समाज के बड़े वर्ग के लिए सुख की समान उपलब्धता की कामना करते थे. यह वैदिक ब्राह्मणवाद के समर्थकों से एकदम भिन्न था. जिन्होंने परलोक की काल्पनिक भ्रांति के पक्ष में भौतिक सुखों की उपेक्षा की थी, जबकि उनका अपना जीवन भोग और विलासिता से भरपूर था. यही नहीं वर्णाश्रम व्यवस्था के माध्यम से उन्होंने समाज के बहुसंख्यक वर्गों, जो मेहनती और हुनरमंद होने के साथसाथ समाज के उत्पादन को बनाए रखने के लिए कृतसंकल्प थे, सुख एवं समृद्धि से दूर रखने की शास्त्राीय व्यवस्था की थी. शूद्र कहकर उसको अपमानित करते थे. और इस आधार पर उन्हें अनेक मानवीय सुविधाओं से वंचित रखा गया था.

उल्लेखनीय है कि वेदों के आडंबरवाद का विरोध उन्हीं दिनों शुरू हो चुका था. उस समय के महानतम विद्वान कौत्स तो वैदिक ऋचाओं को शब्दाडंबर मात्र मानते थे. समाज का बड़ा वर्ग वैदिक परंपराओं का खंडन करता था. इस कारण वेद समर्थकों और उनके विरोधियों के बीच घमासान भी होते रहते थे. जिनसे कूटनीति और छल के कारण ब्राह्मणवादियों को विजय प्राप्त हुई थी. दरअसल यह बुद्ध ही थे जिन्होंने दर्शन को वायवी आडंबर से बाहर लाकर आचरण और व्यवहार के धरातल पर लाकर अवस्थित किया था. उन्होंने दर्शन को निरर्थक और अनुपयोगी प्रश्नों के चक्र से बाहर लाकर जीवन से जोड़ा. मानव मन की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं के सापेक्ष नैतिकता को केंद्र में लेकर आए. पंडितों और पुरोहितों से अलग भाषा अपनाते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि धर्म और दर्शन, दोनों का उद्देश्य इस विश्व का पुनर्निर्माण करना है, ब्रह्मांड की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं. आज प्रयोगों द्वारा सिद्ध हो चुका है कि ब्रह्मांड की व्याख्या वैज्ञानिक नियमों द्वारा ही सटीक ढंग से की जा सकती है. नैतिकता से कटा हुआ धर्म महज आडंबर है. विरोधियों की आलोचना की परवाह न करते हुए उन्होंने आगे कहा कि सृष्टि का केंद्र मनुष्य है, न कि ईश्वर. धर्म के बारे में उनका कहना था कि उसका केंद्रविषय नैतिकता है. वे जीवन में दुःख को अवश्यंभावी मानते थे. साथ ही उनका मानना था कि दुःखों से मुक्ति संभव है. इसके लिए जीवन के प्रति संपूर्ण समर्पण अनिवार्य है.

पुरोहितों और पंडितों के चंगुल से आमजन को बचाने के लिए उन्होंने अष्ठांग मार्ग का प्रवर्त्तन किया. जीवन की पवित्रता के लिए उन्होंने उसको संपूर्णता के साथ अपनाने की सलाह दी. बातबात पर पुरोहितों और धर्माचार्यों की शरण में जाने वाले लोगों को उन्होंने नेक सलाह दी—अप्प दीपो भवः! अपना दीपक स्वयं बनो. उन्होंने जोर देकर कहा कि सुख केवल शीर्षस्थ वर्गों की बपौती नहीं है. गृहस्थ के लिए धनार्जन न तो पाप है, न कोई अभिशाप. जीवन के प्रति मध्यमार्गी दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने धर्नाजन को गृहस्थ के लिए अनिवार्य उपक्रम माना. वे पहले धर्माचार्य थे, जिन्होंने गणतंत्र का पक्ष लिया, यह उस युग में एकदम क्रांतिकारी था. परिणाम यह हुआ कि सांसारिक सुखों के प्रति जनसामान्य पापबोध लगातार घटने लगा. शिल्पकर्मियों को शूद्र का दर्जा देकर उन्हें तरहतरह से प्रताड़ित किया जाता था. बौद्ध धर्म में जातिवर्ण के लिए कोई स्थान न था. बल्कि सभी के लिए सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार था. इसलिए जातीय उत्पीड़न का शिकार रही जातियां बड़ी तेजी से बौद्धधर्म में शामिल होने लगीं. देखते ही देखते वह देश की सीमाएं पार कर, विदेशी भूमियों पर अपनी पकड़ बनाता गया.

बुद्ध स्वयं क्षत्रिय थे. उनके समकालीन महावीर स्वामी भी क्षत्रिय ही थे. दोनों ने ही राजनीतिक सुखसुविधाओं को ठुकराकर अध्यात्मचिंतन का मार्ग चुना था. राजघराना छोड़कर उन्होंने चीवर धारण किया था. इसलिए बाकी वर्गों में विशेषकर उन लोगों में जो ब्राह्मणों और उनके कर्मकांडों से दूर रहना चाहते थे, जैन और बौद्धधर्म की खासी पैठ बनती चली गई. मगर सामाजिक स्थितियां बौद्ध धर्म के पक्ष में थीं. इसलिए कि एक तो वह व्यावहारिक था. दूसरे जैन दर्शन में अहिंसा आदि पर इतना जोर दिया गया था कि जनसाधारण का उसके अनुरूप अपने जीवन को ढाल पाना बहुत कठिन था. यज्ञों एवं कर्मकांडों के प्रति जनसामान्य की आस्था घटने से उनकी संख्या में गिरावट आई थी. उनमें खर्च होने वाला धर्म विकास कार्यों में लगने लगा था. पहले प्रतिवर्ष हजारों पशु यज्ञों में बलि कर दिए जाते थे. महात्मा बुद्ध द्वारा अहिंसा पर जोर दिए जाने से पशुबलि की कुप्रथा कमजोर पड़ी थी. उनसे बचा पशुधन कृषि एवं व्यापार में खपने लगा. शुद्धतावादी मानसिकता के चलते ब्राह्मण समुद्र पार की यात्रा को निषिद्ध और धर्मविरुद्ध मानते थे. बौद्ध धर्म में ऐसा कोई बंधन न था. इसलिए अंतरराज्यीय व्यापार में तेजी आई थी. चूंकि अधिकांश राजाओं द्वारा अपनाए जाने से बौद्ध धर्म राजधर्म बन चुका था, इसलिए युद्धों में कमी आई थी, जो राजीनितिक स्थिरता बढ़ने का प्रमाण थी. व्यापारिक यात्राएं सुरक्षित हो चली थीं. जिससे व्यापार में जोरदार उछाल आया था.

ये सभी स्थितियां जनसामान्य के लिए भले ही आह्लादकारी हों, मगर ब्राह्मणधर्म के समर्थकों के लिए अत्यंत अप्रिय और हितों के प्रतिकूल थीं. इसलिए उसका छटपटाना स्वाभाविक ही था. अतएव महात्मा बुद्ध को लेकर वे ओछे व्यवहार पर उतर आए थे. बुद्ध का जन्म शाक्यकुल में हुआ था, जो वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार क्षत्रियों में गिनी जाती थी. ब्राह्मणों ने उन्हें शूद्र कहकर लांछित किया, जिसको बुद्ध इन बातों से अप्रभावित बने रहे. दर्शन को जनसाधारण की भावनाओं का प्रतिनिधि बनाते हुए उन्होंने दुःख की सत्ता को स्वीकार किया. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि दुःख निवृत्ति संभव है. उसका एक निर्धारित मार्ग है. दुःख स्थायी और ताकतवर नहीं है. बल्कि उसको भी परास्त किया जा सकता है.

बुद्ध का दर्शन वर्जनाओं का दर्शन है. सबसे पहले वह वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रहार करते हैं. उस व्यवस्था पर प्रहार करते हैं, जो ब्राह्मणों को विशेषाधिकार संपन्न बनाती है. पुरोहितवाद की जरूरत को नकारते हुए वे कहते हैं‘अप्प दीपो भव!’ अपना दीपक आप बनो. तुम्हें किसी बाहरी प्रकाश की आवश्यकता नहीं हैं. किसी मार्गदर्शक की खोज में भटकने से अच्छा है कि अपने विवेक को अपना पथप्रदर्शक चुनो. समस्याओं से निदान का रास्ता मुश्किलों से हल का रास्ता तुम्हारे पास है. सोचो, सोचो और खोज निकालो. इसके लिए मेरे विचार भी यदि तुम्हारे विवेक के आड़े आते हैं, तो उन्हें छोड़ दो. सिर्फ अपने विवेक की सुनो. करो वही जो तुम्हारी बुद्धि को जंचे. उन्होंने पंचशील का सिद्धांत दुनिया को दिया. उसके द्वारा मर्यादित जीवन जीने की सीख दुनिया को दी. कहा कि सिर्फ उतना संजोकर रखो जिसकी तुम्हें जरूरत है. तृष्णा का नकारहिंसा छोड़, जीवमात्र से प्यार करो. प्रत्येक प्राणी को अपना जीवन जीने का उतना ही अधिकार है, जितना कि तुम्हें है. इसलिए अहिंसक बनो. झूठ भी हिंसा है. इसलिए कि वह सत्य का दमन करती है. झूठ मत बोलो. सिर्फ अपने श्रम पर भरोसा रखो. उसी वस्तु को अपना समझो जिसको तुमने न्यायपूर्ण ढंग से अर्जित किया है. पांचवा शील था, मद्यपान का निषेध. बुद्ध समझते थे वैदिक धर्म के पतन के कारण को. उन कारणों को जिनके कारण वह दलदल में धंसता चला गया. दूसरों को संयम, नियम का उपदेश देने वाले वैदिक ऋषि खुद पर संयम नहीं रख पा रहे थे. अपने आत्मनियंत्रण को खोते हुए उन्होंने खुद ही नियमों को तोड़ा. मांस खाने का मन हुआ तो यज्ञों के जरिये बलि का विधान किया. कहा कि ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’और अपनी जिव्हा के स्वाद के लिए पशुओं की बलि देते चले गए. नशे की इच्छा हुई तो सोम को देवताओं का प्रसाद कह डाला और गले में गटागट मदिरा उंडेलने लगे. ऐसे में धर्म भला कहां टिकता. कैसे टिकता!

बुद्ध पहले महात्मा थे, साहचर्य का पाठ दुनिया को पढ़ाया. उससे पहले आश्रम सहजीवन की पहचान हुआ करते थे. लेकिन वहां गुरु का नाम चलता था. सारे आश्रम गुरु के नाम से जाने जाते थे. वौद्ध विहार किसी एक भिक्षु की संपत्ति नहीं थे. वे सबसे साझे थे. बुद्ध का कहना था कि जो है, सबका है. जितना है, उसको मिलबांटकर उपयोग करो. उनके भिक्षुसंघ की व्यवस्था ही ऐसी थी. प्रारंभ में गौतम बुद्ध का शिष्यत्व धारण करने वाले अधिकांश भिक्षु राजपरिवारों से आए थे. संघ के नियमानुसार प्रत्येक भिक्षु को चीवर धारण करना पड़ता था. जिसका अर्थ है जीर्णशीर्ण परिधान. उस समय आम आदमी के यही वस्त्र थे. वह मेहनत मजदूरी करता और अपने राजा के लिए कमाता था. जमीन या संपत्ति पर उसका अधिकार न था. वह राजा की मानी जाती थी. लगान चुकाने के बाद जो बचता उससे वह सिर्फ आधा तन ही ढक पाता था. बहुत बाद में अपने राजनीतिक गुरु गोविंदवल्लभ पंत के कहने पर गांधी जी जब ‘भारत को जानने’ के लिए यात्रा पर निकले तो उन्होंने भी एक नदी तट पर ऐसे ही अंधनंगे स्त्रीपुरुषों को देखकर अपने वस्त्र उनकी ओर बहा दिए थे. उसके बाद साबरमती का वह फकीर अधनंगे तन की अंग्रेजों से जूझता रहा. वह जनता के दुःखदर्द को पहचानकर उसके करीब आने की, राजा से रंक बनने की कोशिश थी. बिना इसके लोगों के दिल में बनाना आसान न था. बौद्ध संघों के नियम भी ऐसे थे कि जो भी वहां आए, अतीत के वैभव को बिसराकर सच्चे मन से आए.

बुद्ध के कुछ शिष्यों को अच्छा नहीं लगा कि उनका गुरु ऐसे जीर्णशीर्ण वस्त्र धारण करे. यह उनका प्रेरक रहा होगा. मगर यह उस सत्ता की प्रतीति का भी परिणाम था, जो धर्मसत्ता के संगठित होतेहोते आकार ले लेता है. ऐसे शिष्यों ने बुद्ध के लिए नए कपड़े से बुना चीवर लाकर दिया. प्रार्थना की कि उसको पहनें. बुद्ध ने अपने शिष्यों पर निगाह डाली. वे भी जीर्णशीर्ण चीवर में थे. ‘मुझे कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन संघ में तो सभी बराबर हैं. बाकी भिक्षु भी पुराने वस्त्र क्यों धारण करें. उस दिन के बाद से संघ में पुराने कपड़े का बना चीवर पहनने की शर्त हटा दी गई.

ऐसा ही एक और उदाहरण है. गौतम बुद्ध की मां माया तो उन्हें जन्म देने के नवें दिन ही मर चुकी थीं. उन्हें मां का स्नेह देकर पालने वाली थी, गौतमी, जिन्हें वे सदैव मां का सम्मान देते रहे. गौतम बुद्ध ने भिक्षु संघ की स्थापना की तो गौतमी भी उसमें सम्मिलित हो गई. सर्दी का मौसम था. गौतमी ने बुद्ध को एकमात्र चीवर में देखा तो उनका वात्सल्य मचलने लगा. जानती थीं कि राजपाट को ठोकर मार चुका उनका संन्यासी बेटा सर्दी से बचाव के लिए भी अन्य वस्त्र धारण नहीं करेगा. इसलिए उन्होंने रातदिन लगकर बुद्ध के लिए एक गुलुबंद तैयार किया. उसको लेकर वे खुशीखुशी उनके पास पहुंची और उनसे पहनने का आग्रह किया. बुद्ध ने बाकी भिक्षुओं की ओर देखा. वे सभी एकमात्र चीवर में थे. उन्होंने गुलुबंद लेने से इनकार कर दिया. बोले कि यदि यह उपहार है तो सभी भिक्षुओं के लिए होना चाहिए. सिर्फ उन्हीं के लिए क्यों? गौतमी ने बहुत अनुनयविनय की. लेकिन बुद्ध नहीं माने. समाजवाद की, सहजीवन की पहली शर्त है, संसाधनों में बराबर की हिस्सेदारी. इसके लिए उनका राष्ट्रीयकरण. बुद्ध ने भिक्षु संघ की जो व्यवस्था की थी, उसके अनुसार समस्त संपत्ति संघ की मानी जाती थी. संपत्ति और संसाधनों के समान बंटवारे के अतिरिक्त भिक्षु संघ में अधिकारों का भी एकसमान विभाजन था. सभी निर्णय सहमति के आधार पर लिए जाते थे. भिक्षु संघ के बीच महात्मा बुद्ध की हैसियत अधिक से अधिक एक प्रधान सचिव जैसी थी. किसी को भी मनमानी करने अथवा अपना निर्णय थोपने का अधिकार नहीं था. महात्मा बुद्ध वैशाली गणतंत्र के प्रशंसक थे. ऐसी ही व्यवस्था वे भिक्षु संघ में चाहते थे. जीवन के उत्तरार्ध में कम से कम दो अवसर ऐसे आए, जब उनसे उनके उत्तराधिकारी के बारे में पूछा गया था. कहा गया कि जिसको वे उपयुक्त समझते हों उसको संघ की व्यवस्था सौंप सकते हैं. उस समय यदि वे चाहते तो किसी भी व्यक्ति को यह दायित्व सौंपकर उपकृत कर सकते थे. मगर हर बार उन्होंने यही कहा कि धम्म ही संघ का सेनापति है. और आजकल के कथावाचक टाइप स्वयंभू भगवानों को देखें, जो धर्म के नाम पर बने अपने संगठन को भी किसी कारपोरेट कंपनी की भांति चलाते हैं. धर्म के नाम पर जनसाधारण की भावनाओं का दोहन कर मुनाफा बटोरना और पूंजी बटोरना ही उनका ही उनका व्यवसाय है. शंकराचार्य की गद्दी पाने के लिए षड्यंत्र किए जाते हैं, हत्याएं तक होती हैं.

बुद्ध कोरे अध्यात्म पर जोर नहीं देते. बल्कि व्यक्ति की दैनंदिन की समस्याओं पर भी विचार करते हैं. बुद्ध का दुःख की शाश्वतता को स्वीकारना और उसे अपने चिंतन की परिधि में लाना उन्हें व्यावहारिक और जनसाधारण के निकट लाता है. मगर दुःख की बात कहकर, वे डराते नहीं हैं. वे स्पष्ट कहते हैं कि दुःख की सत्ता है, और उसका कारण भी है. कारण का निवारण कर दुःख से मुक्ति संभव है. इसके लिए बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है. खुद को पहचानो. अपने भीतर छिपे प्रकाश को पकड़ो.

यूं तो हिंदू दर्शन भी चार पुरुषार्थों को मान्यता देता है. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. लेकिन काम और मोक्ष को लेकर भारतीय परंपरा विरोधाभासों का शिकार रही है. एक ओर तो व्यक्ति को अर्थ और काम के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहा है, दूसरे उन्हें माया और भ्रांति कहकर पारलौकिक सुख का लालच दिया जाता रहा. बुद्ध मुक्ति की बात नहीं कहते. मुक्ति का अभिप्राय वैदिक आचार्यों को लिए आत्मा का परमात्मा से सम्मिलन रहा है. बुद्ध आत्मा और परमात्मा को अचिंत्य मानते थे. इसलिए उन्होंने निर्वाण का पक्ष लिया. मुक्ति के लिए मृत्यु अनिवार्य है. निर्वाण इसी जीवन में संभव है. बस उसके लिए चित्तवृत्तिनिरोध और आत्मसंयम की आवश्यकता है. भिक्षु के लिए उन्होंने किंचित कठोर नियम बनाए थे. संन्यासी को संचय की आवश्यकता ही क्या. यदि संचय से लगाव था तो संन्यास की आवश्यकता ही क्या थी. अतः भिक्षु को चाहिए कि वह प्रतिदिन पहनने के लिए तीन वस्त्र(त्रीचीवर), एक कटिबांधनी यानी कमर में बांधने वाली पेटी, एक भिक्षापात्र, वाति यानी उस्तरा, सुईधागा तथा पानी साफ करने के लिए एक छननी अथवा छन्ना के अतिरिक्त कुछ और न रखे. भिक्षु के लिए महंगी धातुएं यथा सोना, चांदी पहनना या पास में रखना निषिद्ध था. डर था कि सोने को बेचकर वह विलासिता का प्रतीक बाकी वस्तुएं भी खरीद सकता है.

एक ओर जहां भिक्षु के लिए इतने सख्त नियम थे, वहीं गृहस्थ को उन्होंने उदारतापूर्वक संपत्ति संचय की छूट दी थी. इस संबंध में एक कथा है

अनाथ पिंडक गौतम बुद्ध का प्रिय शिष्य था. एक बार उसने सोचा कि गौतम बुद्ध ने भिक्षुओं की संचय की प्रवृत्ति के निषेध के लिए काफी कठोर नियम बनाए हैं. इसलिए उसके मन में जिज्ञासा जगी कि बुद्ध से व्यक्तिगत संपत्ति के बारे में उनका मत जाना जाए. निर्वाण की लालसा तो जितनी भिक्षु को है, करीबकरीब उतनी ही गृहस्थ को भी होती है. इसलिए अभिवादन करने के बाद उसने गौतम बुद्ध से पूछा—

क्या भगवन, यह बताएंगे कि गृहस्थ के लिए कौनसी बातें स्वागतयोग्य, सुखद एवं स्वीकार्य हैं, परंतु जिन्हें प्राप्त करना दुष्कर है?’

प्रश्न सुनने के उपरांत बुद्ध ने कहा—

इनमें प्रथम विधिपूर्वक धन अर्जित करना है. दूसरी बात यह देखना है कि आपके संबंधी भी विधिपूर्वक धनसंपत्ति अर्जित करें. तीसरी बात है दीर्घकाल तक जीवित रहो और लंबी आयु प्राप्त करो.’

गृहस्थ को इन चार चीजों की प्राप्ति करनी है, जो कि संसार में स्वागतयोग्य, सुखकारक तथा स्वीकार्य हैं. परंतु जिन्हें प्राप्त करना कठिन है. चार अवस्थाएं भी हैं, जो कि इनसे पूर्ववर्ती हैं. वे हैं, श्रद्धा, शुद्ध आचरण, स्वतंत्रता और विवेक. शुद्ध आचरण दूसरे का जीवन लेने अर्थात हत्या करने, चोरी करने, व्यभिचार करने तथा मद्यपान करने से रोकता है.

स्वतंत्रता ऐसे गृहस्थ का गुण होती है, जो धनलोलुपता के दोष से मुक्त, उदार, दानशील, मुक्तहस्त, दान देकर आनंदित होने वाला और इतना शुद्ध हृदय का हो कि उसे उपहारो का वितरण करने के लिए कहा जा सके.

बुद्धिमान कौन है?

जो यह जानता हो कि जिस गृहस्थ के मन में लालच, धन लोलुपता, द्वेष, आलस्य, उनींदापन, निद्रालुता, अन्यमनस्कता तथा संशय है और जो कार्य उसको करना चाहिए, उसकी उपेक्षा करता है, और ऐसा करने वाला प्रसन्नता तथा सम्मान से वंचित रहता है.

लालच, कृपणता, द्वेष, आलस्य तथा अन्यमनस्कता तथा संशय मन के कलंक हैं. जो गृहस्थ मन के इन कलंकों से छुटकारा पा लेता है, चह महान बुद्धि, प्रचुर बुद्धि एवं विवेक, स्पष्ट दृष्टि तथा पूर्ण बुद्धि व विवेक प्राप्त कर लेता है.

अतएव, न्यायपूर्ण ढंग से तथा वैध रूप में धन प्राप्त करना, भारी परिश्रम से कमाना, भुजाओं की शक्ति व बल से धन संचित करना, तथा भौहों का पसीना बहाकर परिश्रम से प्राप्त करना, एक महान वरदान है. ऐसा गृहस्थ स्वयं को प्रसन्न तथा आनंदित रखता है तथा अपने मातापिता, पत्नी तथा बच्चों, मालिकों और श्रमिकों, मित्रों तथा सहयोगियों, साथियों को भी प्रसन्नता तथा प्रफुल्लता से परिपूर्ण रखता है.’

उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि बुद्ध का दर्शन मानव जीवन को संपूर्ण और परिपक्व बनाने के लिए आग्रहशील है. वह सीधेसीधे उस ब्राह्मणवाद के विरोध में जन्मा था, जिसके केंद्र में जनसाधारण था ही नहीं. जो आत्ममोह से ग्रस्त समाज था, एक प्रकार से लड़ाकू कबीला. जो सिर्फ वर्चस्व की भाषा जानता था. बुद्ध गणतंत्र के प्रशंसक थे. इसलिए उनके दर्शनचिंतन में भी गणतंत्र की खूबियां हैं. वे न केवल सामाजिक समानता पर जोर देते हैं, और उसके लिए सामाजिक समाज के जातीय विभाजन को दोषी ठहराते हैं, वहीं आर्थिक अधिकार देकर व्याक्ति को उन सामंती संस्कारों से बचाए रखना चाहते हैं, जो धर्म और राजनीति की कुटिल संधियों की उपज थे. इन सब कारणों से बुद्ध का दर्शन समाजवादी भावनाओं से ओतप्रोत जान पड़ता है. कई मायने में तो वह माक्र्स के वैज्ञानिक समाजवाद तथा व्यक्ति से भी आगे ले जाता है. इसलिए कि भौतिक द्वंद्ववाद का विश्लेषण करता हुआ माक्र्स उत्साह के साथ शुरू तो करता है, मगरउसका चिंतन आर्थिक पहलुओं से आगे नहीं बढ़ पाता. वह आर्थिक समस्याओं को जीवन की मूल समस्याओं के रूप में देखता है. जबकि ऐसा नहीं है. दूसरी ओर बुद्ध का दर्शन राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक समानता यानी समानता के सभी पहलुओं की विस्तार से चर्चा करता है. और आर्थिक मानवीकरण के मुद्दे पर कई जगह से मार्क्स के समाजवाद से आगे निकल जाता है.

जैन दर्शन में समाजवादी तत्त्व

जैन धर्म के चैबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी, बुद्ध के समकालीन, उनसे लगभग तीस वर्ष बड़े थे. दोनों के दर्शन में काफी समानता है. जैसे कि दोनों ही क्षत्रिय परिवार में जन्मे थे. दोनों ने ही अपना दर्शन ब्राह्मणवाद के विरोध में प्रस्तुत किया था. दोनों ही कर्मकांड के बजाय आचरण की पवित्रता के प्रति अधिक आग्रहशील थे. आत्मापरामात्मा और ईश्वर आदि की वैदिक मताब्लंबियों की बंधीबंधाई धारणा पर उन्हें विश्वास नहीं था. वैदिक ग्रंथों में श्रमणों का जगहजगह उल्लेख हुआ है. ये श्रमण कर्मकांड के विरोधी थे. अपनी जिज्ञासा के समाधान हेतु अधिकांश प्रकृति के सान्न्ध्यि में रहकर सृष्टि के रहस्यों की खोज में लगे रहते थे. जैन धर्म में विश्वास करने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि नदी को पाटने का पहला चमत्कार प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जी किया था. इसके अतिरिक्त लिपिकला, कुंभकारी, चित्रकारी तथा मूर्तिशिल्प का भी आविष्कार उन्होंने ही किया था. ऋषभदेव का नाम यजुर्वेद तथा श्रीमद् भागवत में भी आया है. ईसा से लगभग 900 वर्ष पूर्व जन्मे बाइसवें तीर्थंकर अरिष्ठनेमि भी क्षत्रिय वंशज तथा कृष्ण के चचेरे भाई थे. कृष्ण के प्रयासों के फलस्वरूप ही राजकुमारी राजमती से उनका विवाह तय हुआ था. लेकिन अरिष्ठनेमि ने जब अपने विवाह में हिरन समेत अन्य निरीह प्राणियों को बलि होते देखा तो उनका मन उचट गया, उसके बाद उन्होंने अपना समस्त जीवन बलि की कुप्रथा को समाप्त करने पर झोंक दिया. तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ भी अहिंसा पर जोर देते थे. एक किवदंति के अनुसार उन्होंने एक सर्प की उस समय प्राणरक्षा की थी, जब ब्राह्मण उस वृक्ष को जहां वह रहता था, जला देने का प्रयास कर रहे थे. उनका विवाह एक राजकुमारी के साथ हुआ था. तीस वर्ष तक सुखी गृहस्थ का जीवन जीने के बाद एक दिन उन्हें वैराग्य सूझा और अपनी समस्त संपत्ति दान देकर प्रवज्या ले ली. पार्श्वनाथ अपने शिष्यों के बीच बहुत प्रिय थे. उन्हें जैन साधुओं एवं साध्वियों को संगठित कर उन्हें संगठन का रूप देने का श्रेय दिया जाता है. उनके आदर्श ऊंचे थे. जीवन नैतिकता के उच्च मापदंडों ये युक्त एवं अनुशासित होता था.

जीवन परिचय

जैन धर्म के प्रवर्त्तक चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म ईसा से 599 वर्ष पहले वैशाली के निकट कुंदपुरा नामक स्थान पर हुआ था. बुद्ध की भांति वे भी क्षत्रिय परिवार से संबंधित थे. उस समय पुरोहितों के कर्मकांड अपने शिखर पर थे. यज्ञादि अनुष्ठानों के बीच पोंगापंथी, बुद्धि के नाम पर वितंडा रचना, ज्ञान के स्थान पर पौरोहित्य का प्रशिक्षण देना और तर्क की जगह तंत्रमंत्र साधना ही उस समय अध्यात्म चिंतन मान लिया जाता था. चारों ओर ब्राह्मणवाद का बोलबाला था, जो स्वयं छोटेछोटे गुटों में बंटे थे. उनके बीच ढेर सारे मतांतर थे. उनमें आपस में बहसें चलती रहती थीं. सिर्फ वर्गीय श्रेष्ठता के दावे और स्वार्थ संबंधी मुद्दों को छोड़कर दूसरा शायद की कोई ऐसा पक्ष था, जिसपर वे सभी एकमत होते हों. देश छोटेछोटे राज्यों में बंटा था. राजा अन्यान्य कारणों से परस्पर लड़तेझगड़ते रहते थे. पूरी श्रमण परंपरा, जिनमें कौत्स एवं सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि जैसे विद्वान, चार्वाक दार्शनिक उनके विरोध में थे. प्रजा मन से लोकायतों और श्रमणों के साथ थी, किंतु ब्राह्मणवादी कर्मकांडों से गुजरना उसकी व्यावहारिक मजबूरी थी.

महावीर स्वामी के पिता का नाम सिद्धार्थ और मां त्रिशला थीं. पिता पाश्र्वनाथ के अनुयायी थे. त्रिशला देवी वैशाली के राजा की बहन थी. महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्धमान था. इस नामकरण के पीछे भी एक रहस्य था. बताते हैं कि जब वे गर्भ में थे, उन दिनों राजकोष में तीव्र वृद्धि हुई थी. यही उनके वर्धमान नामकरण का कारण बना. बचपन में उनका लालनपालन राजकीय वैभव के बीच हुआ. वे स्वभाव से उदार, निडर और शक्तिशाली थे. एक बार उत्तेजित हाथी की सूंड पकड़कर उसपर सवारी गांठने और दूसरी घटना में विषैले नाग को पूंछ पकड़कर एक ओर फेंक देने जैसे साहसपूर्ण कार्य दिखाने के बाद सभी उन्हें ‘महावीर’ कहने लगे थे. उनका विवाह राजकुमारी यशोदा के साथ हुआ, जिनसे एक बेटी भी जन्मी. राजसी वैभव के बीच पलनेबढ़ने के बावजूद वहां का वातावरण उन्हें पसंद न था. सारे ठाठबाट, नौकरचाकर, वैभवविलास बनावटी लगने लगे. मातापिता की मृत्यु के बाद महावीर का संसार से मन उचट गया. उन्होंने संन्यास लेने का निर्णय लिया. उस समय उनकी अवस्था मात्र अठाइस वर्ष की थी. मगर अपने बड़े भाई के आग्रह पर उन्होंने दो वर्ष और परिवार के साथ बिताने के लिए सहमत हो गए.

अगले दो वर्ष महावीर ने खुद को सुखसुविधाओं से मुक्त करने का अभ्यास करते हुए बिताए. उन्होंने एकएक कर अपनी सारी वस्तुएं भिखारियों को दान कर दीं. राजकीय वैभवविलास से परे रहकर अपने मन और शरीर को तापसी जीवन के लिए तैयार करने लगे. तीस वर्ष की अवस्था तक वे अपनी समस्त धनसंपत्ति, विलासितापूर्ण साम्रगी, परिवार यहां तक कि पत्नी से भी किनारा कर चुके थे. अपने गांव कुंदपुरा में दो दिनों तक निराहार, निर्जल, मौन रहते हुए उन्होंने अपने सिर के बाल उखाड़ लिए. देह से वस्त्राभरण दूर करने के उपरांत उन्हें अद्भुत शांति की प्रतीति हुई. एकमात्र उत्तरीय को कंधों पर डाल उन्होंने गृहस्थान छोड़ने का संकल्प कर लिया. जिस समय वे प्रस्थान कर रहे थे, ठीक उसी समय एक भिखारी वहां उपस्थित हुआ. यह कहकर कि गत दो वर्षों से वे जो दान करते आ रहे हैं, उससे वह वंचित रहा है, उसने महावीर से दान की अपेक्षा की. इसपर महावीर ने कंधे पर पड़े उत्तरीय में से आधा फाड़कर उस भिखारी को थमाया और वहां से प्रस्थान कर गए.

वास्तविक ज्ञान और आत्मशांति की खोज करते हुए महावीर मोरेगा पहुंचे. वहां एक मठ के अधिपति उनके पिता के मित्र थे. मठाधीश के आग्रह पर महावीर ने वर्षाकाल को वहीं ठहरकर बिताने का निश्चय किया. ठहरने के लिए मठ की ओर से उन्हें एक झोपड़ी भी मिल गई. उससे पिछले वर्ष मोरेगा और आसपास के क्षेत्र में भयानक सूखा पड़ा था. उसकी भीषण मार से समस्त वनस्पतियां झुलस चुकी थीं. जंगली पशुपक्षियों के समक्ष भीषण खाद्यसंकट था. एक दिन आश्रम में अपेक्षाकृत हरियाली देख, भूख से व्याकुल पशुओं का रेला वहां आ धमका. मठ में रह रहे बाकी संन्यासी पशुओं को भगाने के लिए बलप्रयोग करने लगे. मगर महावीर क्षुधापीड़ित पशुओं को देख करुणा से आद्र हो गए. बजाय भगाने के लिए वे स्वयं झोपड़ी से एक ओर हो गए. भूखे पशुओं ने कुछ ही देर में सारा छप्पर साफ कर दिया. उनकी शिकायत मठाधिपति तक पहुंची. इसपर महावीर स्वामी ने आश्रम छोड़ दिया. वर्षाकाल बिताने के लिए निकटवर्ती गांवों की ओर प्रस्थान कर गए. एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते हुए महावीर स्वामी को विचित्र अनुभव हुए. उन्हें समाज को करीब से देखनेसमझने का अवसर प्राप्त हुआ. ज्ञान की खोज में वे उन ब्राह्मण साधुओं से भी मिले जिनका जीवन के नाम पर खुद को सांसारिक सुखों से दूर रखने के लिए उन्होंने अपने लिए पांच कठोर नियम बनाए. वे नियम थे: किसी अस्नेही, अनुदार व्यक्ति का आथित्य ग्रहण न करना. प्रस्तर प्रतिमा की भांति, एक ही स्थान पर देर तक अडोल खड़े रहना, शांत रहना. बिना बर्तनों के भोजन करना तथा गृहस्थों के साथ विनम्रता से पेश न आना.

पांचवा नियम कुछ विचित्र था, मगर खुद को सांसारिक सुखों से वंचित रखना, किसी भी प्रकार की श्रद्धा के अतिरेक से स्वयं को बचाए रखना ही उसका उद्देश्य था. गर्मियों में तपते मैदान में नंगे पैर एक ही स्थान पर खड़ेखड़े वे पूरी दोपहरी बिता देते थे. सर्दियों में खुले आसमान के नीचे नंगे तन रहकर शीतमार झेल जाते. रास्ता चलते हुए एकएक कदम बहुत सावधानी से रखते, ताकि निरीह जीवों की हत्या न हो. सायं होने पर वे सुनसान खंडहर, शमशान घाट, वन, उपवन अथवा जहां भी एकांत मिलता ठहर जाते. मन सृष्टि के रहस्यों की अन्वीक्षा में लीन रहता. भोजन वे बहुत कम करते. भिक्षा भी सिर्फ उतनी ही लेते, जितने से न्यूनतम भोजन की जरूरत पूरी हो सके. भीख वे मांगते नहीं थे. बस घर के सामने से मूक गुजर जाते. उस समय यदि गृहस्वामी बुलाकर स्वेच्छा से कुछ देना चाहता, तो चुपचाप रख लेते. नहीं तो आगे बढ़ जाते. कई बार तो पूरा गांव पार हो जाता. उस अवस्था में उन्हें निराहार रहना पड़ता था. निराहार रहने का उन्हें अभ्यास था. वे लंबेलंबे उपवास रखते. कभीकभी तो पूरा महीना ही निराहार रहकर बिता देते. भोजन करते समय भी यदि कोई भिखारी, पशुप्राणी भोजन की चाहत में सामने पड़ जाता तो अपना भोजन उसको सौंप, निर्लिप्त भाव से आगे प्रस्थान कर जाते थे.

उन दिनों देश छोटेछोटे राज्यों में बंटा हुआ था. राजाओं के बीच युद्ध और संघर्ष चलते ही रहते थे. शीतयुद्ध की स्थिति बनना तो सामान्य बात थी. महावीर स्वामी को यहां से वहां भटकते देख कुछ लोग उनपर संदेह करते. उन्हें दुश्मन देश का जासूस समझकर पकड़ लिया जाता. कुछ लोग उनपर संदेह भी करते. एक बार बंगाल में चोरेगा नामक स्थान पर राजा के जासूसों ने उन्हें पकड़कर जेल में डाल दिया. एक अन्य अवसर पर रस्सी से बांधकर उनकी पिटाई की गई. वहां से छूटे तो कुइया नामक स्थान पर एक बार फिर जासूसों के चक्कर में फंस गए. उस समय उनके सहयोगी और समर्थक गोसला उनके साथ थे. अंततः राजकर्मियों की गलतफहमी दूर हुई और क्षमायाचना करते हुए उन्हें छोड़ दिया गया. उस घटना के बाद लोग महावीर स्वामी को जानने लगे थे. अपने सहयोगी गोसला के साथ वे पांच वर्ष तक सत्य की खोज में यहां से वहां भटकते रहे. छठे वर्ष में गोसला उनसे अलग हुए. मगर यह अभिन्नता मात्र छह महीने ही रह पाई. अवधि बीतते ही गोसला वापस लौट आए. तत्पश्चात वे चार वर्ष और महावीर स्वामी के साथ रहे. बाद में उन्होंने स्वयं को आजीवक संप्रदाय का प्रवत्र्तक घोषित कर दिया.

महावीर वैशाली लौट गए. उस समय वहां का अधिपति शंख था. जंगल में यहां से वहां भटकते हुए उनक वस्त्र जर्जर हो चुके थे. मगर उन्हें अपनी देह तक सुध न थी. जिस समय वे वैशाली से गुजर रहे थे, कुछ शैतान बच्चों ने उन्हें घेर लिया. वे उन्हें परेशान करने लगे. शंख के प्रयास से ही महावीर स्वामी मुक्त हो सके. बोध की तलाश में यहां से वहां भटकते हुए उन्हें बारह वर्ष बीत गए. अंततः उन्हें सफलता मिली. आत्मबोध हुआ. इस बीच घोर साधना में उनका शरीर सूखकर कांटा हो चुका था. देह के वस्त्र तारतार होकर लटक चुके थे. मगर आत्मलीन महावीर को उसकी सुध ही नहीं थी. आत्मबोध के आनंद में वे एक ही स्थान पर बिना हिलेडुले छह महीने तक लगातार बैठे रहे. मगर उनकी वह साधना सफल न हो सकी. उनकी पत्नी उन्हें खोजती हुई वहां आ पहुंचीं. इसे अपनी साधना में विघ्न मानकर वे प्रायश्चित में डूब गए.

धीरेधीरे एक वर्ष और बीत गया. महावीर ने उपवास साधा हुआ था. निर्जल रहते हुए ढाई दिन बीत चुका था. वे मौन साधनारत थे कि अचानक उन्हें निर्वाण की अनुभूति हुई. महावीर स्वामी ने उस अवस्था को कैवल्य कहा है, विदेह हो जाने की उच्चतम स्थिति जब शरीर में रहते हुए भी शरीर का बोध, उसकी सीमाएं समाप्त हो जाता है. व्यक्ति परमज्ञान की अवस्था में होता है. निर्वाण प्राप्ति के उपरांत महावीर स्वामी ने पहला उपदेश दिया. उनके आत्मबोध की प्रथम अनुभूति का विवरण मज्झिम निकाय में है—‘मुझे सबकुछ समझ आ रहा है, मैं सबकुछ पूरी तरह साफसाफ देख रहा हूं. मुझे पवित्र आत्मज्ञान की प्रतीति हो चुकी है. अब चाहे मैं चलता रहूं अथवा एक ही स्थान पर स्थिर होकर खड़ा रहूं. चाहे सो जाऊं अथवा जागता रहूं, परमज्ञान और उसकी अंतरानुभूति प्रतिपल मेरे साथ है…’

उच्चतम ज्ञान प्राप्त करने के उपरांत उन्होंने लिजुवेलिया नदी के तट पर धार्मिक सभा को संबोधित किया. यह उनका पहला जनसंबोधन था. मगर पहला प्रभाव बहुत कम रहा. वहां से वे महसाणा के लिए प्रस्थान कर गए. रास्ते में उनकी ब्राह्मणों के एक दल से भेंट हुई जो आत्मबलिदान करने जा रहे थे. उनकी संख्या ग्यारह थी. उन्होंने संस्कृत में बोलने की परंपरा को तोड़ा था, यही उनका अपराध था, जिसके प्रायश्चित के लिए उन्हें आत्मबलिदान करना था. भाषा तो संवादवहन का माध्यम होती है. इसके बावजूद भाषाविशेष के प्रति इतना दुराग्रह. महावीर को यह बहुत विचित्र जान पड़ा. उन्होंने उन्हें अर्धमागधी भाषा में उपदेश दिया, जिससे प्रभावित होकर सभी उनके शिष्य बन गए. यह उनकी ब्राह्मणवाद पर पहली विजय थी. जैन दर्शन के प्रथम ग्रंथ अर्धमागधी भाषा में ही लिखे गए हैं.

इस घटना के बाद महावीर स्वामी का यश चतुर्दिक फैलने लगा. लोग उन्हें सिद्ध पुरुष मानने लगे. इंद्रभूति गौतम नाम के एक ब्राह्मण के कानों में जब उनकी ख्याति पहुंची तो वह ईष्र्या से भर उठा और उनसे मिलने के लिए चल दिया. उस समय महावीर स्वामी एक बाग में ठहरे हुए थे. जैसे ही इंद्रभूति बाग तक पहुंचा, महावीर स्वामी ने अपनी अंतर्दृष्टि से उसको पहचान लिया. उन्होंने उसका स्वागत करते हुए कहा—

आइए गौतम! मैं जानता हूं कि इस समय आपके मस्तिष्क में आत्मा की सत्ता को लेकर संदेह है. हम उसपर चर्चा कर सकते हैं.’

उसके पश्चात स्वामी महावीर ने उन्हें उपदेश दिया. भारतीय दर्शन में आत्मा की उपस्थिति को लेकर जो विशद चिंतन किया गया है, उसका संदर्भ लेते हुए उन्होंने आत्मतत्व की विवेचना की. इंद्रभूति उनका प्रवचन सुनकर अभिभूत हो गया. उसी दिन उसने महावीर स्वामी का शिष्यत्व ग्रहण कर लिया. यह सूचना जैसे ही इंद्रभूति के बड़े भाई अग्निभूति तक पहुंची, वह उद्धिग्न हो उठा. अग्निभूति शास्त्रज्ञ पंडित था. अपने तत्वचिंतन पर उसे बड़ा गुमान था. भाई द्वारा महावीर स्वामी का शिष्यत्व ग्रहण करना उसको सहन न हुआ. सूचना मिलते ही वह उनसे शास्त्रार्थ करने के लिए चल पड़ा. उसने कर्म की वास्तविकता और आत्मा से उसके संबंध को लेकर महावीर स्वामी के समक्ष कई प्रश्न किए, जिनका उन्होंने तथ्यपरक उत्तर दिया. अग्निभूति उनका ज्ञान देख प्रभावित हुआ और अपने छोटे भाई की भांति वह भी उनका शिष्य बन गया. तत्पश्चात एक के बाद एक नौ विद्वान महावीर स्वामी से शास्त्रार्थ पहुंचे और परास्त होकर उनके शिष्य बन गए. उनके शिष्यों की संख्या बढ़कर ग्यारह हो गई. जैन पंरपरा के अनुसार ग्यारह शिष्य अपने साथ अपने अनुयायियों को भी लाए थे, जिनको मिलाकर महावीर के शिष्यों की कुल संख्या 4400 तक पहुंच गई.

कुछ दिनों के बाद अपने शिष्यों के साथ महावीर स्वामी वहां से प्रथान कर गए. रास्ते में न कोई प्रवचन न सभा. उनकी मौन यात्रा 66 दिन तक चलती रही. लगातार चलते हुए वे राजगृह पहुंचे, जो उस समय के शक्तिशाली राज्य मगध की राजधानी था. उस समय बिंबसार वहां का सम्राट था. महावीर स्वामी द्वारा प्रवत्तित नए धर्म को लेकर सम्राट बिंबसार ने उनसे अनेक प्रश्न किए. जिनका उन्होंने संतोषजनक उत्तर दिया. इंद्रभूति ने महावीर स्वामी का शिष्यत्व अवश्य ग्रहण किया था. मगर अपनी विद्वता पर उसको अब भी बड़ा घमंड था. मगध प्रवास के दौरान ही एक वृद्ध व्यक्ति अपनी शंकाएं लेकर महावीर स्वामी के सामने पहुंचा. उसने संस्कृत में एक श्लोक पढ़कर उसकी विवेचना का अनुरोध किया. महावीर उस समय मौन अवस्था में थे. तब आगंतुक ने अपनी जिज्ञासा इंद्रभूति के समक्ष प्रकट की. मगर इंद्रभूति अपने उत्तर से वृद्ध को संतुष्ट न कर सका. वहां उपस्थित अन्य विद्वानों को भी उसकी व्याख्या आधीअधूरी जान पड़ी. उस समय तक महावीर स्वामी का मौनव्रत पूरा हो चुका था. उन्होंने वृद्ध का प्रश्न सुनकर उसकी शास्त्रसम्मत व्याख्या की. उससे वृद्ध संतुष्ट हो गया. यह देख इंद्रभूति का रहासहा दंभ भी जाता रहा.

जैन दर्शन को आरंभिक पहचान मिलने के साथ उसके अनुयायियों को संगठित करना भी अत्यावश्यक था. उन्होंने कुल शिष्यों को भिक्षु, साध्वी, गृहस्वामी और गृहस्वामिनी नामक चार वर्गों में विभाजित किया. धर्म में अनुशासन एवं नैतिकता के स्तर को बनाए रखने के लिए पांच व्रत साधने होते थे. ये हैं: अहिंसा, सत्य, अचौर्य, अपरिग्रह तथा पवित्रता. इनमें से प्रथम चार पाश्र्वनाथ के विचारों से अनुप्रेरित थे. राजगृह में वर्षाकाल व्यतीत करने के उपरांत महावीर ने वैशाली के लिए प्रस्थान कर दिया. वहां उन्होंने अपनी पुत्री और दामाद जामाली को धर्माेपदेश दिया. इसी दौरान उन्हें पूर्वाभास हुआ कि सम्राट रुद्रायण उनसे मिलना चाहते हैं, वे सिंधुसौवीर स्थित उनकी राजधानी पहुंचे. रुद्रायण महावीर के विचारों से प्रभावित होकर जैनश्रमण बन गया. सिंधुसौवीर से वापसी का रास्ता बहुत कठिनाइयोंभरा था. रास्ते में लंबा रेगिस्तान पड़ता था. भिक्षुदल के साथ उस रास्ते से गुजरते हुए महावीर को भोजन एवं पानी की समस्या का सामना करना पड़ा. किंतु कठिन साधना की अभ्यस्त हो चुकी देह ऐसी भीषण चुनौतियों से भी निकलना जानती थी. वहां से वे अपनी छोटीसी शिष्य मंडली के साथ वाराणसी पहुंचे, जिसे वैदिक परंपरा में पवित्र नगरी माना जाता था. वाराणसी में उन्होंने एक अरबपति सेठ को अपना शिष्य बनाया और फिर राजगृह के लिए प्रस्थान कर गए, जहां उन्होंने दो वर्षाकाल बिताए. इस अवधि में उन्होंने युवराज और उनके 25 भाईबहनों को जैन धर्म की दीक्षा दी. महावीर स्वामी का यशकीर्ति लगातार बढ़ती ही जा रही थी. उनसे प्रभावित होकर अनेक लोग मिलने आते और श्रमण परंपरा में सम्मिलित होते जाते थे. इस बीच वैदिक ब्राह्मणों से भी शास्त्रार्थ हुआ, जिसमें उन्होंने अपनी विद्वता से सभी को प्रभावित किया. जैन मत ब्राह्मणपंथ के लिए लगातार चुनौती बनता जा रहा था.

मगध प्रवास के दौरान ही उन्हें कोशांबी सम्राट का निमंत्रण मिला. वहां पहुंचकर उन्होंने सम्राट प्रद्योत तथा अनेक साम्राज्ञियों को जैनमत की दीक्षा दी. उस वर्ष का वर्षाकाल उन्होंने वैशाली में व्यतीत किया. चातुर्मास पूरे होते ही वे मगध वापस लौट गए. राजगृह में उन्होंने फिर सैकड़ों श्रद्धालुओं को श्रमणपरंपरा में सम्मिलित किया. इस बीच अजातशत्रु ने मगध पर आक्रमण कर उसपर अधिपत्य जमा लिया. राजनीतिक उथलपुथल से स्वयं के दूर रखते हुए उन्होंने राजगृह छोड़ दिया. वहां से वे चंपा पहुंचे, वहां उन्होंने राजकुमार सहित अनेक नगरवासियों को जैन धर्म में सम्मिलित किया. मगधसम्राट अजातशत्रु महावीर स्वामी का सम्मान करता था. किंतु यह आस्था उसकी साम्राज्यवादी भावनाओं पर नियंत्रण करने में अपर्याप्त थी. उसने भारी संख्याबल के साथ वैशाली गणतंत्र पर आक्रमण कर दिया. भीषण युद्ध में सम्राट चेतक की मृत्यु के बाद वैशाली पर मगध के कब्जे में आ गई. युद्ध में हुए भारी नरसंहार ने महावीर स्वामी को आहत कर दिया. उन्होंने स्वयं को एकांत तपश्चर्या में लीन कर दिया. अंततः 72 वर्ष की अवस्था में उन्हें निर्वाण की प्राप्ति हुई. संयोग देखिए कि महावीर स्वामी के मृत्यु के अगले ही दिन उनका पहला शिष्य इंद्रभूति गौतम भी निर्वाण प्राप्त हो गया. मगर उस समय तक लाखों श्रद्धालु जैन धर्म को अपना चुके थे.

 

जैनदर्शन परदुःखकातरता और करुणा पर केंद्रित दर्शन है. इसमें व्यक्तिगत संपत्ति की भावना का निषेध किया गया है. गृहस्थों के लिए तो संपत्तिसंबंधी मान्यताओं में फिर भी किंचित छूट है. किंतु जैन तापसों के लिए तो देह पर वस्त्र धारण करना भी विलासिता की श्रेणी में आता है. यह मान लिया जाता है कि शरीर ढकने के लिए वस्त्र का लालच भी मोक्ष प्राप्ति की अवधि को लंबा खींचने का काम करता है. जैन दर्शन में आवश्यकता से अधिक संचय को पाप माना गया है. समझा गया है कि यह भी एक प्रकार की हिंसा है. जैन दर्शन का संपत्ति संबंधी अवधारणा समाजवादी विचारधारा से मेल खाती है. समाजवाद भी हर व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के अनुरूप देने का आश्वासन देता है. वहां संपत्ति कल्याणकारी राज्य के अधीन सुरक्षित मानी जाती है, जिसका उपयोग नागरिकों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर व्यापक लोककल्याण की कामना के निमित्त किया जाता है. जैनमत के संपत्तिसंबंधी सिद्धांत और समाजवाद में महज इतना अंतर है कि समाजवाद राजनीतिकसंवैधानिक व्यवस्था है. जबकि जैन दर्शन नैतिक आचरण है. वह त्याग और सर्वकल्याण की भावना पर टिका है. यह आत्मानुशासन के बिना संभव नहीं. समाजवाद में अनुशासन के लिए राजनीति की मदद ली जाती है. जोकि बाहरी और खर्चीला उपक्रम है. उसकी अपेक्षा अपरिग्रह नैतिकता की जमीन पर खड़ा होता है. जाहिर है कि यह उच्च मानवादर्श है.

जैनमत में लोकतांत्रिक समाजवाद का एक अन्य रूप ‘स्याद्वाद’ के रूप में भी मिलता है. जैन मतावलंबियों की विशेषता यह है कि वे किसी भी कोटि के दुराग्रह का संपूर्ण निषेध करते हैं. अपनी बात दूसरों से बलात् मनवाना या केवल अपने ही मत को अंतिम सत्य मानना हठधर्मी, एक प्रकार की वैचारिक हिंसा है. इसलिए वहां अहिंसा पर इतना जोर दिया गया है. जैनमत के अनुसार किसी भी जीव की हत्या करना तो पाप है ही, विचारों की हिंसा भी वहां सर्वथा वज्र्य है. इसलिए कि विचार भी जीवात्मा की देन, उसकी विशेषता हैं. वैचारिक सहिष्णुता, विरोधों को आत्मसात करने की यह प्रवृत्ति जैन मत में स्याद्वाद के सिद्धांत के उद्भव का कारण बनी. ‘स्याद्वाद’ जैनदर्शन का सर्वाधिक मौलिक एवं वैज्ञानिकता पर आधारित विचार है. इसके अनुसार किसी भी वस्तु अथवा विचार के बारे में जो कहा जाता है, वह अनेक संभावनाओं से युक्त होता है. सत्य कई रूपों में प्रकट होता है.

अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए हाथी और छह अंधों की कहानी का उदाहरण देते हैं. कहानी के छह अंधों को हाथी के सामने खड़ा कर उसकी शरीर रचना के बारे में बताने को कहा जाता है. जिस अंधे ने हाथी के कान का स्पर्श किया था, उसके अनुसार हाथी की देह पंखे के समान है. दूसरा जो हाथी की सूंड का स्पर्श करता है, वह हाथी को मोटी बेल जैसा बताता है. तीसरा अंधा जो हाथी के पैर का स्पर्श करता है, वह उसकी रचना को खंबेनुमा कहकर अपने अनुभव का बखान करता है. वे सभी अपनी जगह सही है. सभी सच्चे हैं. मगर उनका सत्य आंशिक और परिस्थितिजन्य है, जो उनकी सीमा को दर्शाता है. उन छह के अलावा एक दृष्टिसंपन्न व्यक्ति भी है. हाथी की वास्तविक देहरचना के बारे में केवल वही जानता है. ज्ञान की स्थिति केवल प्रज्ञावान को ही संभव है. यही निर्वाण की अवस्था भी है, जब कोई तापस सृष्टि के वास्तविक रहस्य को जान चुका होता है. जैनमत मानता है कि साधारण व्यक्ति की ऐंद्रियानुभूति सीमित होती है. इसलिए उसका बोध भी सीमित होता है. मगर वह गलत नहीं है. अंधों की कहानी में यदि उन सभी के अनुभवों को परस्पर मिला दिया जाए तो हाथी की संपूर्ण रचना सामने आ सकती है. यही लोकतंत्र में होता है, जो समाजवादी व्यवस्था की धुरी है. वहां अनेक नागरिक मिलकर अपने विकास के लिए उपयुक्त व्यवस्था का चयन करते हैं.

जैनदर्शन की सृष्टि संबंधी व्याख्या आधुनिक वैज्ञानिक खोजों से मेल खाती है. उसके अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति का कारण छोटेछोट पुद्गलों को माना है. ये पुद्गल परस्पर मिलकर अणु बनाते हैं. अणुओं के संयोग से संसार की विभिन्न वस्तुओं, जड़चेतनादि की उत्पत्ति होती है. जड़चेतन में पुद्गलों की उपस्थिति उसे जीवनमय बनाती है. जैन दर्शन का पुद्गल का विचार कणाद मुनि के वैशेषिक दर्शन से मेल खाता है. पुद्गल की तुलना हम परमाणुवाद के साथ के आधुनिक सिद्धांत से भी कर सकते हैं. यह भी विज्ञानप्रमाणित है कि दो परमाणु परस्पर मिलकर एक अणु की रचना करते हैं, जो सृष्टि के समस्त पदार्थों की उत्पत्ति का कारण है. लेकिन पुद्गल परमाणु नहीं है. परमाणु में जीवन है, वैज्ञानिक ऐसा कोई दावा नहीं करते. वे परमाणु की गति का आकलन कर सकते हैं. परमाणु में अंतनिर्हित ऊर्जा की खोज भी की जा चुकी है. वैज्ञानिक अवधारणा के अनुसार परमाणु जड़चेतन से परे लघुत्तम कण है, जो संसार की प्रत्येक वस्तु, जड़ और चेतन दोनों की व्युत्पत्ति का कारण है. इससे भिन्न पुद्गल चेतनामय इकाई, जीवन का लघुत्तम रूप है. तदुनुसार यह समस्त संसार छोटेछोट पुद्गलों से मिलकर बना है. अतएव जैन दर्शन के अनुसार दृश्यमान जगत के कणकण में जीवन है. उनका सम्मान करना जीवन का सम्मान करना है.

जैन शब्द ‘जिन’ धातु से बना है. यानी ऐसा व्यक्ति जिसने इंद्रियों को अधीन कर लिया हो. इंद्रियनिग्रह के लिए अपरिग्रह अस्तेय, अहिंसा, सत्य आदि की कसौटियां बनाई र्गइं. जिनका अर्थ है, जरूरत से अधिक संचय न करना. चोरी न करना. दूसरे के धन की लालसा न रखना. हिंसा का पूर्ण निषेध और सत्याचरण. यही सिद्धांत बौद्ध धर्म के भी थे. आशय यह है कि नैतिक मान्यताओं को लेकर जैन और बौद्ध धर्म एक ही कोटि के माने जा सकते हैं. इसलिए कुछ विद्वानों ने जैनधर्म को बौद्ध धर्म की ही एक शाखा माना है. हालांकि कुछ मायने में दोनों में अंतर भी है. बौद्ध दर्शन व्यावहारिक बोध को महत्त्व देता है. वह जीवन की उपेक्षा करने के बजाय, उसको संयमित ढंग से जीने पर विश्वास रखता है. ऐसा जीवन जो अपने और दूसरों के लिए समानरूप से सुखकारी हो. इसलिए जैनदर्शन का अतिअनुशासन भी वहां वज्र्य है. कामनाओं से भागने से उनसे बच पाना संभव नहीं. वे पीछा करती हैं. उनसे मुक्ति का एक ही उपाय है, कामनाओं के बीच रहकर उनसे मुक्ति. मन को साधना. यह आसान नहीं है. लेकिन अभ्यास से इसको साधा जा सकता है. इसके लिए बुद्ध ने अष्ठांग योग का विचार दुनिया के सामने रखा था. मगर उनका अष्ठांग योग भी व्यावहारिक है. वह मनुष्य की पहुंच में है. जबकि जैन मत का अहिंसा का सिद्धांत और अन्य धार्मिक अनुशासन बहुत कड़े हैं. यही कारण है कि जैन धर्मदर्शन जनसाधारण के बीच अपनी जगह बनाने में असमर्थ रहा था.

बोधि वृक्ष के नीचे साधना करते समय बुद्ध को समझ आया था कि जीवन वीणा के तारों की तरह भांति है. ढीला छोड़ने पर सुर नहीं निकलते. अधिक कसने पर तार टूट भी सकते हैं. इसलिए उन्होंने मध्यम मार्ग को अपनाने का आग्रह किया था. लेकिन अहिंसा जैसे विषय को लेकर जैन मत व्यावहारिकता की सीमा तक प्रतिबद्ध है. वहां अपरिग्रह पर इतना आशय है कि शरीर पर वस्त्र धारण करना भी मोक्ष की राह में बाधक माना गया है. बौद्ध धर्म की अहिंसा के सिद्धांत को उसकी तत्व विवेचना के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है. जैन दर्शन सम्यक व्यवहार, सम्यक बोध, तथा सम्यक आचरण पर जोर देता है.

जैन दर्शन एक भौतिकवादी दर्शन है. वह संसार की सत्ता को नकारता नहीं है. बल्कि उसकी वास्तविकता को स्वीकारते हुए कतिपय वैज्ञानिक आधार पर उसकी व्याख्या करता है. जीवनमूल्यों को वरीयता देते हुए वह मनुष्य को अपनी चिंताओं के केंद्र में रखता है. उसकी आचारसंहिता तीन प्रमुख सिद्धांतों पर टिकी है. जैन दर्शन को यदि श्रेष्ठ विचारों की एक माला स्वीकारा जाए तो इन तीन सिद्धांतों को उसके माणिकमुक्ता समझा जाता है, जिनपर माला की समस्त सुंदरता निर्भर करती है. ये हैं—सम्यक आचरण, सम्यक कर्तव्य एवं सम्यक बोध. सम्यक आचरण से अभिप्राय सृष्टि के प्रत्येक प्राणी के साथ भेदभाव रहित दयालुतापूर्ण व्यवहार से है. हर प्राणी में एक ही जीवात्मा है, इसलिए उसका सम्मान. सभी के साथ एक समान व्यवहार. सम्यक बोध मानव चेतना के विकास के पांच स्तरों को दर्शाता है. वे हैं अध्ययन, साधना, सिद्धि एवं कैवल्य. सम्यक कर्तव्य आत्मानुशासन, निश्छल व्यवहार, सदाशयता को दर्शाता है. यह मानवेंद्रियों को विचलन से बचाकर उन्हें साधना पथ पर अग्रसर करने से संभव है. वह उपदेश से अधिक आत्मनियंत्रण पर जोर देता है. जैनग्रंथ ‘उत्तरध्यान’ में आत्मानुशासन की आवश्यकता पर लिखा गया है—

खुद को जीतो

इसलिए कि आत्मविजय सबसे बड़ी साधना है

यदि तुम स्वयं को जीत लेते हो

तो संसार में रहकर भी बनोगे अनिवर्चनीय आनंद के भागी

उससे भी श्रेष्ठ है

इससे पहले कि दुनिया के प्रलोभन और मायावी शक्तियां

मेरी इंद्रियों को अपने जाल में फंसा लें

मुझे भटकाएं

प्रताड़ित करें

आत्मनुशासन एवं प्रायश्चित द्वारा खुद को जीतकर

आत्मविजयी बनना.

इन सिद्धांतों की तुलना हम बौद्ध धर्म के अष्ठांग योग से कर सकते हैं. महावीर स्वामी का जन्म बुद्ध से पहले हुआ था. मगर दोनों में अधिक अंतर नहीं है. दोनों का कार्यक्षेत्र भी भारत का पूर्वी क्षेत्र है. हम आसानी से कल्पना कर सकते हैं कि जिन दिनों महात्मा बुद्ध ने संन्यास के लिए घर छोड़ा था, उन दिनों देशभर में महावीर स्वामी के विचारों की धूम मची होगी. कर्मकांड और यज्ञ के नाम पर होने वाली जीवहत्या से उकताए हुए लोग जैन धर्म में दीक्षित हो रहे थे. उनमें हर वर्ग के लोग सम्मिलित थे. वैशाली जैसे गणराज्य जिसके महात्मा बुद्ध प्रशंसक थे, के शासक भी भी जैन धर्म की दीक्षा ग्रहण कर चुके थे. आचार्य वर्षकार जब वैशाली पर आक्रमण से पहले बुद्ध से परामर्श लेने पहुंचते हैं तो बुद्ध वैशाली गणराज्य की मिलजुलकर निर्णय लेने की गणतांत्रिक प्रणाली की प्रशंसा करते हुए वैशाली को अजेय घोषित करते हैं.

सम्यक आचरण मनुष्य के मानवीय स्वरूप को बनाए रखने की कला है. प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक ही जीवात्मा है. स्त्रीपुरुष सभी एक समान हैं. इसलिए मनुष्य का पहला धर्म है कि वह सभी के साथ एक जैसा आचरण करे. बिना किसी पक्षपात, वगैर किसी स्वार्थलिप्सा के सबके साथ समानतापूर्ण व्यवहार करते हुए प्राणीमात्र के कल्याण के निमित्त समर्पित हो. दूसरों के साथ वही व्यवहार करो, जैसा उनसे अपने प्रति अपेक्षित है. संसार में रहकर भी उसके प्रलोभन से विरक्ति. देह में रहकर भी विदेहत्व की साधना. मुक्ति का साक्षात अनुभव. वौद्धदर्शन की भांति जैन दर्शन भी वेदों को प्रामाण्य नहीं मानता. उसके स्थान पर वह व्यक्ति की सत्ता को सर्वोच्च ठहराता है. नैतिक आचरण पर जोर देता है.

संसाधनों के न्यायिक बंटवारे और प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार देना ही समाजवादी व्यवस्था का प्रमुख ध्येय है. यह कार्य वह राज्य की नियामक शक्ति की मदद से करती है. राज्य भी व्यक्तियों से परे नहीं है. वह नागरिकों की सहमति और अनुशंसा के आधार पर बनी संस्था है. अंधों की कहानी में जैसे किसी एक अंधे की राय का कोई मूल्य नहीं है, लेकिन जब उन सबके अनुभवों को मिला दिया जाता है, तो उससे वही विंब बनता है, जो एक दृष्टिसंपन्न व्यक्ति की चेतना में बनता है. राज्य भी अपने नागरिकों की संस्तुति के आधार पर बनी संस्था है, जो एक नियामक संस्था सत्ता का रूप ग्रहण कर लेती है. कह सकते हैं कि जैन दर्शन की नैतिक मान्यताएं समाजवाद की मूल आस्था के अनुकूल हैं. हालांकि इसकी कड़ी अनुशासनव्यवस्था, इसको जनसाधारण के लिए असहज बनाती है.

© ओमप्रकाश कश्यप

धर्म और अभिजन संस्कृति—दो

सामान्य

अभिजन संस्कृति के विकास में धर्म का योगदान

 

आधुनिक समाज की दृष्टि से देखा जाए तो उसमें पुरोहित, नौकरशाह, व्यापारी, राजनेता, सैन्याधिकारी, उच्च पेशेवर जैसे अभिजन समाज के कई उपवर्ग मिलेंगे. किंतु प्राचीन समाजों में जब संस्थाओं का इतना विस्तार नहीं हुआ था और सामाजिकव्यापारिक संबंध अपेक्षाकृत सरल होते थे, इनकी संख्या धार्मिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अभिजन तक सीमित थी. इनमें से पहले किसका जन्म हुआ, यह सहीसही बता पाना संभव नहीं है. इतना तय है कि सामाजिक विकास के आरंभिक दौर में ये सब एक ही वर्ग से संबंधित थे. यह भी कह सकते हैं कि सरल समाजों में अकेला व्यक्ति धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाल लेता था. चूंकि संस्कृति सामूहिकता के बीच जन्म लेती है, अतएव सरल समाजों में अभिजन संस्कृति के विकास की कल्पना नहीं की सकती. फिर भी कुछ ऐसे विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति अवश्य रहे होंगे, जिन्हें एकल सत्ताकेंद्र का आशीर्वाद प्राप्त हो या जो उसके सन्निकट रहकर सुविधालाभ पाते हों. कालांतर में, निरंतर जटिल होते समाजार्थिक संबंधों के बीच, अकेले व्यक्ति द्वारा विभिन्न प्रकार की जिम्मेदारियों को संभाल पाना कठिन हो चला था. शांतिव्यवस्था के लिए चुनौती पेश करने वाले संकट आंतरिक और बाह्यः सभी प्रकार के थे. बस्तियों में एक साथ रह रहे लोगों के बीच मनमुटाव और छोटेछोटे झगड़ों का होना सामान्य बात थी. अतः जनजीवन को सामान्य बनाने, शांतिव्यवस्था कायम करने, संकट के समय समूह की रक्षा करने तथा विभिन्न गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई के समय परस्पर विरोधी पक्षों के बीच तालमेल बनाए रखने हेतु ऐसे लोगों की आवश्यकता थी, जो नेतृत्वकुशल होने के साथसाथ दूरद्रष्टा, ईमानदार, कर्मठ, साहसी, व्यवहारकुशल तथा बुद्धिमान भी हों.

सर्वसम्मति से यह जिम्मेदारी ‘विश’ अथवा ग्रामणी को सौंपी जाने लगी. वह गांव का मुखिया होता था. आरंभ में उसका दायित्व अतिरिक्त अनाज का प्रबंधन करना तथा आवश्यकता के समय उसका समूह के सदस्यों में वितरण करना था. वह आवश्यकतानुसार बस्ती के छोटेमोटे झगड़ों को सुलझाकर विरोधी गुटों में संधिसुलह भी कराता था. उसके अलावा गांव में एक पद पुरोहित का था. उसका प्रमुख कार्य लोगों के धार्मिक मसलों में लोगों को नेतृत्व करना था. पदानुक्रम में उसे बाकी सभी पर वरिष्ठता प्राप्त थी. महत्त्वपूर्ण अवसरों पर उसका कथन निर्णायक माना जाता था. वहीं व्यवस्था का सर्वेसर्वा होता है. भारत की प्राचीनतम सभ्यता के अवशेष सिंधु घाटी से प्राप्त होते हैं. उनके विश्लेषण से पता चलता है कि उस समय तक नागर व्यवस्था पनप चुकी थी. कृषि के साथसाथ शिल्पकर्म का विकास हो चुका था. अंतर्महाद्वीपीय व्यापार में तेजी आई थी. सिंधु घाटी के उत्खनन से प्राप्त संकेतों में यद्यपि वहां की शासन व्यवस्था के बारे में सटीक अनुमान लगा पाना संभव नहीं है. लेकिन तत्कालीन मिस्र सहित पश्चिम के कई नगरराज्यों का प्रबंधन धार्मिक नेताओं तथा पुरोहितों के अधीन था. इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि उस समय धर्म प्रमुख ही नगरराज्य का वास्तविक कर्ताधर्ता होता था. उपजाऊ जमीन, समृद्ध वनसंपदा के कारण सिंधु सभ्यता के नगर अपने समकालीन नगरराज्यों की अपेक्षा अधिक सुरक्षित और शांत थे. लेकिन व्यवस्थित शासनप्रणाली का न उभर पाना उस सभ्यता की कमजोरी थी. संभवतः वही दुनिया की उस प्राचीनतम सभ्यताओं में एक के पतन का प्रमुख कारण बना था.

सिंधु घाटी के लोगों का आर्थिक जीवन मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर था. सिंधु सभ्यता के किसान गैहूं, जौ, राई, सरसों आदि की खेती करते थे. अन्नभंडारण के लिए बड़े गोदामों का उपयोग किया जाता था. यहां तक कि अनाज को पीसने के लिए भी सामूहिक प्रबंध थे. खेती के लिए औजारों का प्रचलन था. सिंधुवासियों ने सुदूर मिस्र, रोम, अरब तक व्यापार के अनुकूल जलमार्गों का अन्वेषण किया था. उनपर व्यापारिक दलों का आवागमन लगा ही रहता था. आरंभिक व्यापार असंगठित था. प्रारंभ में प्रायः कारीगर ही समूहबद्ध होकर व्यापार करते थे. उनके अलावा संभवतः एक श्रेष्ठि वर्ग भी पनप चुका था जो खुद तो निर्माण कार्य में दक्ष न था, परंतु उत्पाद को बेचने का हुनर उनके पास था. इस वर्ग ने कारीगरों से माल खरीदकर उसका दूरदराज के क्षेत्रों तक व्यापार करना आरंभ कर दिया. आर्थिक विकास की यह स्वाभाविक परिणति थी. असल में महीनों तक चलने वाली लंबी यात्राओं में व्यस्त रहने के कारण उत्पादक कर्म को स्वयं संभालना संभव भी नहीं था. इसलिए शिल्पकार वर्ग के लिए भी यही उपयुक्त था कि वह केवल उत्पादन पर ध्यान दे. दूरस्थ व्यापारकेंद्रों को बड़े व्यापारियों के लिए छोड़कर स्वयं केवल स्थानीय बाजारों में अपनी पैठ बनाए रखें. हालांकि कुछ ऐसे भी शिल्पकार संगठन अवश्य रहे होंगे जो उत्पादन और वितरण दोनों की जिम्मेदारी स्वयं संभालते थे.

इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता तक समाज में अभिजन मानसिकता जन्म ले चुकी थी. धर्म और अर्थ का नियंत्रण करने वाले शासक वर्ग का उदय हो चुका था. एक वर्ग था जो स्वयं को दूसरों से ऊपर मानता था. मोहनजोदड़ों और हड़प्पा के उत्खनन अवशेषों से सामान्य जन और अभिजन वर्ग के लिए बने अलगअलग आवासों का पता चलता है. सामान्य जनों के आवास जहां छोटे हैं, वहीं अभिजन वर्ग के आवास खासे बड़े हैं. छोटे घरों का आकार प्रायः 26 गुणा 30 फुट का है, वहीं विशिष्ट जनों के आवास उससे काफी बड़े, लगभग 242 फुट गुणा 112 फुट के थे. इसी प्रकार का भेद स्नानागार में मिला है. पुरोहित वर्ग के स्नानागार साधारण लोगों के स्नानागारों की अपेक्षा काफी बड़े हैं. इनसे जहां इन सभ्यताओं के वैभवशाली अतीत तथा सत्ता के आधार पर अभिजन और सामान्यजन में विभाजन का बोध होता है. एक निहितार्थ यह भी है कि सभ्यता और अभिजन वर्ग का उदय परस्पर, पूरक और अन्योन्याश्रित घटनाएं हैं. सांस्कृतिकसांस्कृतिक विकास की अनिवार्यता के रूप में दायित्वों के निर्वाह के लिए केंद्रीय सत्ताकेंद्रों की अभिकल्पना की गई. कालांतर में उन सत्ताकेंद्रों पर नियुक्त व्यक्तियों के भीतर विशिष्टताबोध पनपने लगा, जिसने अभिजन मानसिकता को जन्म दिया. आगे चलकर जब समाज का आर्थिक, सामाजिक विभाजन हुआ तो जनमानस ने भी उन सत्ताकेंद्रों को अपनी नियति की भांति स्वीकार कर लिया. इस बात की परिकल्पना की जा सकती है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की सभ्यता के विकास तक समाज में आर्थिक, राजनीतिक वर्ग की अलगअलग श्रेणियां बन चुकी थीं. उनमें पुरोहित शीर्षस्थ स्थान पर था.

 

ईसा से करीब 2000 वर्ष पहले सिंधु घाटी की सभ्यता का पतन हुआ. अगले एक हजार वर्षों के दौरान गंगायमुना के दोआब में जो नई सभ्यता विकसित हुई, वह अपेक्षाकृत सुस्थिर थी. उस समय तक बड़े राज्यों की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी थी. राज्यों के प्रबंधन के लिए स्वतंत्र राजनीतिक समूह जन्म ले चुका था. लोग यह भी मानने लगे थे कि राज्य की सुरक्षा का मसला धार्मिक आग्रहों से इतर है. इससे समाज को कुल मिलाकर लाभ ही हुआ था. हालांकि लोकजीवन अब भी धर्म के निर्णायक प्रभाव में था. इस कारण धार्मिक अभिजन का प्रतीक पुरोहितवर्ग समाज में अभी तक महत्त्वपूर्ण भूमिका मेें बना हुआ था. उसी के नेतृत्व में महत्त्वाकांक्षी सम्राट चक्रवर्तित्व का सपना पालने लगे थे. यह अवसर आर्थिक गतिविधियों के लिए भी अनुकूल सिद्ध हुआ. बड़े राज्यों के गठन से व्यापारिक गतिविधियों के विस्तार को अवसर मिला. यातायात के साधनों में वृद्धि ने अंतर्महाद्वीपीय व्यापार को नई ऊंचाइयां दीं. इससे कुछ ठिकाने, विशेषकर तटवर्ती स्थल महत्त्वपूर्ण व्यापारिककेंद्रों के रूप में पनपने लगे. जिसका सुखद परिणाम तत्कालीन राज्यों की तीव्र आर्थिक समृद्धि के रूप में सामने आया था. बड़े राज्य के प्रबंधन के लिए राजा को अनेक कर्मचारियों, मंत्रियों और अधिकारियों की आवश्यकता थी, जो न केवल अलगअलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ, बल्कि व्यवहारकुशल एवं भरोसेमंद भी हों. फलस्वरूप शिक्षा के नए क्षेत्रों का विकास हुआ, जिसने पुनः व्यापार के नवीनतम क्षेत्रों को जन्म दिया. उससे पहले दुर्गम रास्तों पर लुटेरों का भय बना ही रहता था. राज्यों की सीमा और चौकसी बढ़ने से वे अपेक्षाकृत अधिक दूर तक बिना कोई अतिरिक्त कर चुकाए व्यापार कर सकते थे. सुरक्षा और व्यापारिक कारणों से बड़े राज्यों में सत्ता के छोटेछोटे उपकेंद्र उभरने लगे. इससे व्यापारिक हित भी सधे और राजनीतिक अभिजन का दायरा भी विस्तृत होता गया.

व्यापारिक गतिविधियों के विस्तार से दो भिन्न संस्कृतियों को परस्पर करीब आने का अवसर मिला. अलगअलग समूहों के देवता, धर्म, रीतिरिवाज और परंपराएं भिन्न होती थीं. इसके बावजूद उनके आर्थिक, सामाजिक हित उन्हें परस्पर जोड़े रखते थे. उससे पहले केवल धर्म था, वही दो समूहों के बीच एैक्य अथवा प्राथक्य का भाव पैदा करता था. बदले हुए हालात में दो भिन्न समूहों में सहयोग या स्पर्धा दर्शाने के लिए व्यापार और राजनीति महत्त्वपूर्ण माध्यम के रूप में उभरे थे. अनुत्पादक पुरोहित कर्म में कोई अंदरूनी स्पर्धा नहीं थी. इसलिए पुरोहित वर्ग के आगे आंतरिक एवं बाह्यः चुनौतियां न्यूनतम थीं. लेकिन व्यापारी और राजनीतिक अभिजन को न केवल बाहरी बल्कि आंतरिक चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता था. यूं तो भारत में राजनीतिक और आर्थिक कार्य भी विशिष्ट जातिवर्ग के लिए निर्धारित थे. परंतु स्पर्धा में बने रहने के लिए एक व्यापारी को अपने ही सदस्यों के साथ स्पर्धा करनी पड़ सकती थी. पेशागत चुनौतियों के कारण उसका जीवन अपेक्षाकृत उथलपुथल भरा था. इसका उसको लाभ भी मिलता था. अपनी कार्यकुशलता में सुधार के जरिये वह न केवल अपने, बल्कि दूसरे समूहों को भी प्रभावित करने में सफल होता था. चूंकि अलगअलग समूहों के भिन्न देवता और कर्मकांड रहे होंगे. अतः कर्मकांडों के अंतर एवं बहुदेववादी धारणाओं के चलते एक समूह का पुरोहित दूसरे समूह में न तो उतना सम्मानेय था, न ही जरूरी. इससे धार्मिक अभिजन की सीमाएं साफ नजर आने लगी थीं. पुरोहितवर्ग का प्रभाव केवल अपने समूह तक सिमटने लगा. किंतु समूह के भीतर बीच उसका प्रभाव स्थायी तथा इतना गहरा था कि उसकी अनुशंसा के बगैर दूसरे का वहां दखल दे पाना नामुमकिन जैसा था. विशेष लोगों की जीवनचर्या तथा अन्य सामाजिक मसलों को लेकर. पुरोहित को इससे भी संतुष्टि थी. धर्म को संगठित ताकत के रूप में बदलने के लिए ऐसी ही सघन प्रभावोत्पादकता जरूरी थी. यह तभी संभव तब जनसाधारण को कर्मकांडों में इतनी बुरी तरह से उलझा दिया जाए कि वह चाहकर भी उनकी किलेबंदी को तोड़ न सके. इसके लिए पापपुण्य, स्वर्गनर्क, पुनर्जन्म आदि का मायाजाल खड़ा किया गया. ऐसे शास्त्रों की रचना की गई जो व्यक्ति के मुक्त सोच को अवरुद्ध कर उसे अनुसरण का पाठ पढ़ाते हों. जैसेजैसे समाज का विकास हुआ, धर्म के नाम पर मानवीय विवेक की किलेबंदी बढ़ती ही गई. पंद्रहवी शताब्दी में पश्चिम में वैज्ञानिक प्रस्फुटन हुआ तो पुरोहित वर्ग को अपने अस्तित्व के ऊपर खतरा नजर आने लगा. तब बड़ी चतुराई से उसने धर्म को विज्ञानसम्मत बताने का प्रोपगेंडा आरंभ कर दिया. चूंकि विज्ञान के आगमन के साथ समाज में आर्थिक विभाजन भी बढ़ा था. जो मुख्यतः उत्पादक आर्थिक अभिजन द्वारा मुनाफे के बड़े हिस्से पर अधिकार कर लेने से बढ़ा था. जिसे राजनीतिक समर्थन प्राप्त था. उस समय उत्पादक वर्ग का समर्थन करते हुए पुरोहित वर्ग ने जनसाधारण को तरहतरह से फुसलाना आरंभ कर दिया. धार्मिकराजनीतिकआर्थिक अभिजन की शीर्ष तिकड़ी के आगे जनसाधारण ने अपनी दुरवस्था को अपनी नियति मानने लगा.

 

धर्म की उत्पत्ति मूलतः आध्यात्मिक जिज्ञासा से प्रेरित थी. वह मानवीय विवेक एवं चिंतन सामथ्र्य से अनुप्रेत होती थी. मनुष्य की विचारणा उसके अनुभव और विवेक के अनुसार नित नए रूप धरती थी. इसलिए धर्म का ताकत के स्रोत में उस समय तक बदलना संभव न था, जब तक उसकी धारणाओं में स्थायित्व न हो. समूह पर दीर्घगामी पकड़ के लिए आवश्यक था कि लोग पुरोहित पर आंख मूंद कर विश्वास करें. उसके कहे को आप्त वचन का सम्मान दें. यहां तक कि उनकी निर्णय क्षमता भी पुरोहित के दिए गए दिशानिर्देशों से अनुशासित हो. इसके लिए कर्मकांडों की अंतहीन और जीवन बहुव्यापी शृंखला बनाई गई. उनका संहिताकरण किया गया. फिर संहिताओं को दैवीय बताकर उनमें संकलित तथ्यों को तरहतरह से जनता पर थोपा जाने लगा. पुराणों, स्मृतियों और महाकाव्यों के जरिये अवतारवाद का गुणगान किया गया. मौलिक ज्ञान की जगह पाखंड को दे दी गई. इससे धर्म के आस्थाकरण को बल मिला. आस्था के दायरे में कैद जनशक्ति राजनेता के काम थी. वह उससे जो चाहे वह काम ले सकता था, अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के लिए किसी भी युद्ध में झोंक सकता था. वह आर्थिक अभिजन के भी काम की थी. अपने उत्पादों की बिक्री के लिए उसको भी बाजार की आवश्यकता थी. इस प्रकार धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक अभिजन का स्वार्थी गठबंधन दिनोंदिन मजबूत होता गया. धार्मिक अभिजन ने आध्यात्मिक जिज्ञासा को आस्था में ढालने की भरपूर कोशिश की थी तो राजनीतिक और आर्थिक शक्तियों ने आस्था को अंधआस्था तथा श्रद्धा को अंधश्रद्धा में ढालने के साजिशाना काम में अपना पूरापूरा सहयोग दिया.

धर्म की अवधारणा के पीछे आरंभिक सोच शायद इतनी बुरी न थी. अकेले मनुष्य और जानवर में कोई अंतर न था. </