Category Archives: डॉ. आंबेडकर का आर्थिक चिंतन

डॉ. आंबेडकर और बौद्ध धर्म : कुछ सवाल

सामान्य

चातुर्वर्ण्य न केवल श्रम का विभाजन है, अपितु श्रमिकों का भी विभाजन है। इसलिए वर्गहीन अर्थात जात-पात विरहित समाज की संरचना हेतु संघर्ष किया जाना चाहिए। इसकी प्रारंभिक आवश्यकता है कि उच्च जातियों की अनुकंपा, दया, सहानुभूति तथा सामंजस्यपूर्ण सक्रिय सहयोग उम्मीद छोड़कर समस्त निचली जातियां दलित शक्ति के रूप में संगठित हों। फिर आंतरिक और बाह्यः दोनों मोर्चों पर संघर्ष के वरण से, वर्गवाद-वर्णवाद के उन्मूलन प्रक्रिया को तेज करते हुए, मनुष्यत्व की स्थापना के संघर्ष को आगे बढ़ाएं─डॉ. आंबेडकर। 

डॉ. आंबेडकर ऐसे महामानव थे जो शताब्दियों में जन्म लेते हैं। वे भारतीय गणतंत्र के वास्तुकार और संविधान निर्माता थे। यह संविधान प्रदत्त अधिकारों की ही देन है कि वे फासीवादी शक्तियां, जिनकी आंखों में भारतीय लोकतंत्र बुरी तरह खटकता है, अपने तमाम षड्यंत्रों और मनोरथों के बावजूद संविधान में छेड़छाड़ का साहस नहीं कर पा रही हैं। लेकिन आंबेडकर साहब के प्रति अपनी कुल श्रद्धा और सम्मान के बावजूद मैं उनके धर्मांतरण संबंधी फैसले से सहमत नहीं हो पाता। हालांकि मैं जानता हूं कि हिंदू धर्म से बौद्ध धर्म तक की उनकी यात्रा एक गाड़ी से उतरकर, दूसरी में सवार हो जाने जितनी आसान नहीं थी। वह पूरी तैयारी के साथ उठाया गया कदम था। फिर भी वह हिंदू धर्म पर वैसी चोट नहीं कर पाया, जैसी अपेक्षित थी; या जिसकी भारतीय समाज को जरूरत थी।  

हिंदू धर्म से नाराजगी और संघर्ष

जाति आरंभ से ही हिंदू धर्म की आलोचना का कारण रही है। वह जन्म के आधार पर मनुष्य-मनुष्य में भेद करती है। रुचि और कार्यक्षमता के बजाए वह मनुष्य की योग्यता का आकलन उसकी जाति देखकर करती है। इस विकृति के कारण हिंदुओं के तीन-चौथाई हिस्से को दुख, हताशा, नैराश्य, अभाव और अपमान से भरपूर जीवन जीना पड़ता है। अछूत कही जाने वाली जाति में जन्म लेने के कारण डॉ. आंबेडकर को भी जीवन में अनेक बार अपमान का सामना करना पड़ा था। बचपन में जब वे स्कूल जाते थे, तब कक्षा में बैठने से लेकर पानी पीने तक उनके साथ भेदभाव किया जाता था। महाराजा गायकबाड़ द्वारा दी गई सैन्य सचिव की नौकरी उन्हें जातिगत भेदभाव के कारण छोड़नी पड़ी थी। उसके बाद परिवार के भरण-पोषण हेतु उन्होंने और भी नौकरियों की तलाश की। किंतु अछूत होने के कारण हर बार नाकाम रहना पड़ा। अक्टूबर 1929 में खानदेश(महाराष्ट्र) के दौरे पर ‘चालीस गांव’ के दौरे पर पहुंचे तो तांगेवालों ने उन्हें गंतव्य स्थल तक पहुंचाने से मना कर दिया था।

डॉ. आंबेडकर समझते थे कि यदि उन जैसे पढ़े-लिखे व्यक्ति के साथ हिंदू असहनीय दुर्व्यवहार कर सकते हैं, तो साधारण अछूत का भला क्या हाल होता होगा। इसलिए लंदन में पढ़ाई पूरी करके भारत लौटने के बाद उन्होंने खुद को अछूतों के मुक्ति-समर में झोंक दिया था। 20 मार्च 1927 को महाड़ सत्याग्रह के दौरान चवदार तालाब का पानी पीकर उन्होंने शताब्दियों से चली आ रही छूआछूत की प्रथा को चुनौती दी थी। 25 दिसंबर 1927 को जाति एवं जातिभेद को दैवीय घोषित करने वाली ‘मनुस्मृति’ का दहन किया। अछूतों और शूद्रों में जागरूकता लाने के लिए अखबार निकाले।

उन दिनों गांधी और कांग्रेस के उदारवादी नेता, दलितों के मंदिर प्रवेश का समर्थन करने लगे थे। आंबेडकर के लिए मंदिर प्रवेश कोई महत्वपूर्ण मुद्दा न था। वैसे भी जो धर्म रूढ़ियों, कर्मकांडों, मूर्तिपूजा और जड़-विश्वासों पर टिका हो, उसमें दलितों को मंदिर प्रवेश का अधिकार मिल जाने से उनकी सामाजिक स्थिति पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था। इसलिए 1933 में गांधी द्वारा सुब्ब्रायन विधेयक के समर्थन की मांग पर आंबेडकर का उत्तर था─‘मैं महात्मा को बताना चाहता हूं कि यह केवल हिंदुओं तथा हिंदू धर्म की विफलता ही नहीं है, जिसने मुझमें घृणा और अवमानना की भावना पैदा की है। मुझे हिंदुओं और हिंदू धर्म दोनों से घृणा है। क्योंकि मुझे विश्वास है कि वे गलत आदर्शों और अनुचित सामाजिक जीवन का नेतृत्व करते हैं। हिंदुओं और हिंदू धर्म के साथ मेरा वैर, उनके सामाजिक आचरण की खामियों के कारण नहीं है। बल्कि यह उससे भी अधिक मौलिक है। मेरा उनसे दुराव उनके आदर्शों के कारण है।’

हिंदू धर्म में दलितों के अपमान तथा अत्याचारों से आहत डॉ. आंबेडकर ने 1935 में उसे छोड़ने की घोषणा कर दी। उस समय उन्होंने कहा था─‘मैं जन्म से हिंदू था क्योंकि मेरा इस पर कोई नियंत्रण नहीं था, लेकिन मैं हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं।’ धर्मांतरण, डॉ. आंबेडकर के लिए निजी आस्था का विषय नहीं था। प्रबुद्ध व्यक्ति धर्म की बैशाखी के बिना भी नैतिक जीवन जी सकता है। लेकिन अशिक्षा और रूढ़ियों में डूबे जिस समाज का वे नेतृत्व करते थे, वह अपनी अच्छी-बुरी सभी प्रेरणाओं के लिए धर्म पर निर्भर था। धर्म-रहित जीवन की एकाएक परिकल्पना करना उसके लिए असंभव था। बावजूद इसके हिंदू धर्म से बौद्ध धर्म तक जाने में आंबेडकर ने पूरे बीस वर्ष लगाए थे। इस बीच हिंदू धर्म से अपनी शिकायतों को लेकर उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की थी। उनमें जातिवाद का उच्छेद(1936), ‘शूद्र कौन थे?’(1946) तथा ‘हिंदू धर्म की पहेलियां(1956) दस्तावेजी महत्व की कृतियाँ हैं।

डॉ. आंबेडकर और बुद्ध का धर्म

1935 में जब डॉ. आंबेडकर ने हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा की थी, गांधी सहित अनेक नेता हिंदू धर्म में सुधार में लगे थे। उनके अलावा कई समाज-सेवी संस्थाएं भी उनके नेतृत्व में जमीनी स्तर पर कार्यरत थीं। उन सबके प्रयासों को देखकर हिंदू धर्म में सुधार की क्षीण-सी उम्मीद डॉ. आंबेडकर को थी। मगर आजादी के बाद वह उम्मीद खत्म होने लगी थी। आखिरकार 1956 में, यह मानते हुए कि हिंदू धर्म के कर्ताधर्ता सुधार के लिए तैयार नहीं हैं, अपनी मृत्यु से कुछ ही महीने पहले, लाखों समर्थकों के साथ उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली। उन्हीं दिनों उन्होंने ‘भगवान बुद्ध और उनका धर्म’ शीर्षक से पुस्तक की रचना भी की थी। यह पुस्तक कई मायनों में मौलिक थी। 

अधिकांश विद्वानों ने गौतम बुद्ध के संन्यास को जीवन-जगत के प्रति उपजी निराशा की परिणति माना है। उनके अनुसार कपिलवस्तु के मार्गों से गुजरते हुए युवा सिद्धार्थ की नजर सबसे पहले बूढ़े, फिर एक बीमार व्यक्ति पर पड़ी। परिणामस्वरूप उनके मन में जीवन-जगत को लेकर निराशा पैदा होती है। उस निराशा से वे उबर भी नहीं पाए थे कि अगली बार एक व्यक्ति की शवयात्रा देखकर उनका मन संसार से पूरी तरह उचट गया। उसके बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पूरा संसार ही दुखमय है। इसी से उनके मन में वैराग्य जन्म लेता है; और वे अर्धरात्रि में, बगैर किसी को बताए, पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को सोते हुए छोड़, घर से निकल पड़ते हैं। बुद्ध के संन्यास के बारे में हर जगह यही कहानी सुनने को मिलती है, जिससे बुद्ध और संसार के प्रति निराशाजनक तस्वीर बनती है। डॉ. आंबेडकर इस व्याख्या को स्वीकार नहीं करते। उन्हें यह स्वीकार्य नहीं कि 29 वर्षीय राजकुमार सिद्धार्थ ने उससे पहले किसी बीमार, वृद्ध और मृत व्यक्ति का साक्षात ही न किया हो। बुद्ध द्वारा ‘बूढे-रोगी-मृत-साधु’ को देखकर घर छोड़ देने का विवरण त्रिपिटक साहित्य में भी नहीं है। इसलिए बुद्ध के गृह-निष्क्रमण संबंधी मान्यताओं का खंडन करते हुए वे लिखते हैं─‘जीवन स्वाभावतः दुख है, यह सिद्धांत बौद्ध धर्म की जड़ पर ही कुठाराघात करता प्रतीत होता है। यदि जीवन ही दुख है, मरण भी दुख है, पुनरुत्पत्ति भी दुख है, तब तो सभी कुछ समाप्त हो जाता है। न धर्म ही किसी आदमी को संसार में सुखी बना सकता है और न दर्शन ही। यदि दुख से मुक्ति ही नहीं है तो फिर धर्म भी क्या कर सकता है और बुद्ध भी किसी व्यक्ति को दुख से मुक्ति दिलाने के लिए क्या कर सकता है, क्योंकि जन्म ही स्वाभावतः दुखमय है।’1

अहिंसा और गणतंत्र के प्रति सकारात्मक रवैया तथा बुद्धिवादी दृष्टिकोण─बौद्ध धर्म की ये विशेषताएं उसे आधुनिक धर्म बनाती हैं। इन्हीं के कारण डॉ. आंबेडकर उसकी ओर आकर्षित हुए थे। उनके  अनुसार, ‘जो बात बुद्धि-संगत है, जो बात तर्क-संगत है─वही बुद्ध वचन है।’ इसलिए, ‘कोई भी ऐसी बात जिसका मानव कल्याण से कोई संबंध न हो, यदि भगवान बुद्ध के सिर मढ़ी जाती है तो उसे बुद्ध-वचन नहीं कहा जा सकता।’2

अश्वघोषकृत ‘बुद्धचरित’ तथा धम्मानंद कोसंबी से प्रेरणा लेते हुए वे बुद्ध के गृह-त्याग की नवीन व्याख्या करते हैं। तदननुसार शाक्यों के राज्य से सटा हुआ कोलियों का राज्य था। रोहिणी नदी दोनों के बीच विभाजक रेखा थी। नदी के पानी के बंटवारे को लेकर दोनों के बीच संघर्ष चलता ही रहता था। समस्या के स्थायी समाधान हेतु शाक्यों ने सभा बुलाई। उसमें सेनापति ने कोलियों के राज्य पर हमला कर देने की सलाह दी। इसपर सिद्धार्थ ने सेनापति के प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा─‘युद्ध से कभी किसी समस्या का हल नहीं होता। युद्ध छेड़ देने से हमारे उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी। इससे एक दूसरे युद्ध का बीजारोपण हो जाएगा….केवल अवैर से ही वैर शांत हो सकता है।’3

यह जानते हुए भी कि बहुमत सेनापति के साथ है, बुद्ध न केवल युद्ध के प्रस्ताव का विरोध करते हैं, बल्कि अनिवार्य सैन्य भर्ती को भी गैर-जरूरी बताकर युद्ध में शामिल न होने की घोषणा कर देते हैं। लगातार विरोध से नाराज सेनापति संघ के नियमों का हवाला देकर, सिद्धार्थ तथा उनके परिवार के सामाजिक बहिष्कार की धमकी देता है। इसपर वे परिवार को दंडित करने के बजाय, खुद नगर छोड़ देने का वचन देते हैं। पूरी बहस लोकतांत्रिक विमर्श का शानदार नमूना है। उसके माध्यम से आंबेडकर केवल बुद्ध के चरित्र का नवोन्मेष करते हैं, बल्कि पाठकों को लोकतांत्रिक विमर्श का महत्व भी समझा रहे होते हैं। केवल आंबेडकर जैसा तर्कवादी लेखक ही ऐसा कर सकता था।

बुद्ध के गृह-त्याग की यह व्याख्या इतनी अनूठी और क्रांतिधर्मी है कि उसने अनेक बौद्ध विद्वानों को भी नाराज कर दिया था। 1957 में जब यह पुस्तक पहली बार प्रकाशित होकर बाजार में आई तो न केवल भारत, अपितु विश्व के बौद्ध विद्वानों ने भी उसकी जोरदार आलोचना की थी। लोग यहां तक कहने लगे थे कि पुस्तक ‘बुद्धिज्म नहीं अबेंडकरिज्म है’। आरोप था कि बुद्ध ने अपनी बात की पुष्टि हेतु के लिए आवश्यक संदर्भ नहीं दिए हैं। बाद में जब उस पुस्तक का भदंत आनंद कौसल्यायन ने हिंदी अनुवाद को संदर्भ के साथ प्रकाशित कराया तो आलोचकों के मुंह बंद हो गए।

क्या धर्मांतरण अपरिहार्य था

ऊपर हमने हिंदू समाज में जातिवाद और छुआछूत की बुराई की चर्चा की। उन कारणों पर विचार किया, जिन्होंने डॉ. आंबेडकर को हिंदू धर्म छोड़ने पर विवश किया था। उसके बाद बौद्ध धर्म की उन विशेषताओं की चर्चा भी की, जिन्होंने उन्हें बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित किया था। सवाल है कि क्या बौद्ध धर्म को अपनाना उतना ही अपरिहार्य था? हिंदू धर्म की जिन बुराइयों से बचने के लिए उन्होंने उसका त्याग किया था, क्या बौद्ध धर्म उनसे सर्वथा मुक्त रह सका? ‘भगवान बुद्ध और उनका धम्म’ में डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म की जिन विशेषताओं को रेखांकित किया, जरूरत पड़ने पर उनकी मौलिक व्याख्या की लोकतांत्रिक छूट भी ली थी─उनकी प्रेरणा से बौद्ध धर्म अपनाने वाले दलित उन मूल्यों को कितना आत्मसात कर पाए? बौद्ध धर्म को अपना चुके दलित क्या जातिभेद की भावना से मुक्त हो पाए? यदि हिंदू धर्म ब्राह्मणवादी राजनीति का औजार रहा है तो क्या बौद्ध धर्म अतीत में दलित राजनीति तथा वर्तमान में बहुजन राजनीति का औजार नहीं है? उत्तर में कहा जा सकता है कि यह कांटे से कांटा निकालने की युक्ति है। लेकिन क्या इससे बुद्धिवाद और लोकतंत्र, जो ब्राह्मणवादी वर्चस्व से मुक्ति के कारगर औजार हो सकते हैं─की उपेक्षा नहीं हो रही है? धर्म के समानांतर दूसरे धर्म को खड़ा करने का ही दुष्परिणाम है कि बीते वर्षों में भारतीय राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर अनेक हमले हुए, तो दलित-बहुजन उसके विरुद्ध बड़ा मोर्चा नहीं खोल पाए।    

यह ठीक है कि बुद्ध ने जातिभेद को नकारा। भिक्षु-विहारों में सभी जाति-वर्ग के लोगों को शामिल होने की अनुमति थी। प्रवज्या ग्रहण करने वालों में उपालि(नाई), सुणीत(वाल्मीकि), सोपाक तथा सुप्पिय(अछूत), सुमंगल(अतिशूद्र), प्रकृति(चांडाल) के अलावा अंगुलिमाल जैसे डाकू भी शामिल थे।  इसके बावजूद यह भी सत्य है कि बुद्ध को केवल जाति और वर्ण-व्यवस्था पर आधारित भेदभाव से शिकायत थी। समाज में जाति और वर्ण के आधार पर विभाजन की पद्धति समाप्त हो, इसे लेकर बुद्ध का कोई निर्देश नहीं है। बुद्ध द्वारा मना करने के बावजूद भिक्षु संघों में जातिभेद कायम था। यही कारण है कि बौद्ध धर्म के रास्ते सभी जाति-वर्गों के लिए खोल देने के बावजूद बहुत कम शूद्रातिशूद्र, मात्र 8 प्रतिशत उसकी ओर आकर्षित हुए थे। जातक कथाओं में बुद्ध के पूर्वजन्मों की कहानियां दी गई हैं। उनमें बुद्ध के विभिन्न जातियों में पुनर्जन्म लेने के उल्लेख है। लेकिन उनमें जितना उल्लेख ब्राह्मणों का हुआ है, उतना किसी और जाति का नहीं। अपने पूर्वजन्मों में खुद बुद्ध भी सबसे ज्यादा बार ब्राह्मणों के घर ही जन्म लेते हैं।

पीछे संकेत किया गया है कि डॉ. आंबेडकर जैसी विलक्षण प्रतिभा, ऐसे विद्वान के लिए जो ज्ञान तक पहुंचाने वाली संश्लेष्णात्मक और विश्लेषणात्मक, दोनों प्रकार की प्रविधियों में दक्ष हो, को सदाचारी और नैतिक बने रहने के लिए, जिसे धर्म का उद्देश्य बताया जाता है─बौद्ध धर्म या किसी भी अन्य धर्म की कतई आवश्यकता नहीं थी। वे कबीर और रैदास की संत-परंपरा से निकले थे, जो हर तरह के कर्मकांड को ललकारने की साहस रखती थी। मुझे लगता है कि धर्मांतरण संबंधी घोषणा के मूल में ‘बुद्धत्व’ के प्रति विश्वास से अधिक, हिंदू धर्म को छोड़ देने की अपनी वर्षों पुरानी घोषणा का दबाव था। संभव है इसके पीछे हिंदू धर्म के चंगुल में फंसे लाखों-करोड़ों बहुजनों को निकालने का संकल्प भी रहा हो। कदाचित वे सोचते थे हजारों वर्षों से आस्था के गुलाम रहे बहुजनों के हाथ से धर्म की बैशाखी एकाएक छीन लेना, उचित न होगा। इसलिए धर्मांतरण के पक्ष में लिया गया उनका निर्णय आस्था और विश्वास का विषय न होकर, राजनीतिक था। धर्मांतरण के स्थान पर यदि वे धर्म को ही त्याग देने का फैसला करते तो वह युगांतरकारी कदम होता। बुद्ध के समय में भी निचली जातियाँ आजीवक दर्शन में विश्वास रखती थीं।

गौरतलब है कि ब्राह्मणों के लिए भी धर्म मूलतः राजनीति है, जो उनके विशेषाधिकारों का संरक्षण करती है। किंतु अशिक्षित समाज जब सामान्य राजनीति को नहीं समझ पाता तो धर्म के नाम पर चली जाने वाली राजनीति की महीन चालें वह भला कैसे समझ पाता! अधिसंख्यक बहुजनों के धर्मांतरण का महत्व एक नाव से दूसरी नाव में सवार हो जाने जितना है। यही कारण है कि दलित और बहुजन राजनीति के शोर-शराबे के बावजूद बौद्ध धर्म की प्रगति पूरी तरह ठहरी हुई है। 1951 में भारत में बौद्धों की संख्या मात्र 0.05 प्रतिशत थी। डॉ. आंबेडकर द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद, 1961 में कुल जनसंख्या का 0.74 प्रतिशत बौद्ध धर्मावलंबी थे। 1991 में वे बढ़कर 0.76 प्रतिशत हो गए। उसके बाद उनका जनसंख्या-अनुपात निरंतर गिर रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार दलितों की कुल जनसंख्या 20.14 करोड़ थी। उनमें से मात्र 84.43 लाख, लगभग 0.70 प्रतिशत ने खुद को बौद्ध घोषित किया था। नए-नए बने बौद्धों में से 87 प्रतिशत अछूत जातियों से थे।

समाधान क्या हो?

उपर्युक्त आंकड़ों से साफ है कि हिंदू धर्म की ब्राह्मणवादी राजनीति का सामना बौद्ध धर्म से करने का प्रयोग असफल सिद्ध हो चुका है। वैसे भी हर धर्मसत्ता की कोई न कोई केंद्रीय शक्ति होती है, जो मानव स्वभाव के लोकतांत्रिकरण का निषेध करती है। उससे मनुष्य और समाज दोनों के प्रबोधीकरण की प्रक्रिया अवरुद्ध होती है। इसलिए जिन्हें बौद्ध धर्म या किसी और धर्म में आस्था है, वे उस धर्म का चयन करें। लेकिन जिन्हें समाज में व्याप्त असमानता, असुरक्षा, सामाजिक भेदभाव आदि से शिकायत है, जो मनुष्य को अधिकाधिक स्वतंत्र और खुशहाल देखने चाहते हैं─उनके लिए अच्छा होगा कि वे बुद्धिवादी बनें, आधुनिक जीवन मूल्यों को अपनाएं जिनकी व्याख्या भारतीय संविधान में मौजूद है। अन्यथा वे कभी धर्म, कभी जाति, कभी अर्थ तो कभी राजनीति की राजनीति का शिकार होते ही रहेंगे।

ओमप्रकाश कश्यप

  1. डॉ. आंबेडकर, भगवान बुद्ध और उनका धर्म, बुद्धभूमि प्रकाशन, नागपुर, अनुवाद भदंत आनंद कौसल्यायन,  1997, पृष्ठ 28।
  2. उपर्युक्त, पृष्ठ-279।
  3. उपर्युक्त, पृष्ठ-279।

डॉ. आंबेडकर का आर्थिक चिंतन

सामान्य

अर्थशास्त्री के रूप में डॉ. आंबेडकर के योगदान की ओर बहुत कम विद्वानों का ध्यान गया है. प्रायः लोग उन्हें संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं. यह भी जानते हैं कि दलितों के उद्धार के लिए उन्होंने अनथक संघर्ष किया. उसके लिए अनेक समकालीन नेताओं की आलोचनाएं सहीं. वे अपने समय के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मगर विवादित नेताओं में रहे. उनकी विद्वता विरोधियों को पस्त करने वाली थी. वस्तुतः राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में उनका योगदान इतना महान एवं युगांतरकारी है कि उनके जीवन के बाकी पहलुओं तक लोगों की नजर जा ही नहीं पाती. यहां तक कि दलित विद्वानों का लेखन भी उनके सामाजिकराजनीतिक क्षेत्रों में योगदान तक सिमटा रहा है. अर्थशास्त्री के रूप में आंबेडकर के योगदान को केवल एक लेख या लेखांश से आंकना असंभव है. अपने एक व्याख्यान में प्रख्यात अर्थशास्त्री श्रीनिवास अंबीराजन ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र से राजनीति और कानून के क्षेत्र में अंतरण को अर्थशास्त्र की भारी क्षति बताया था. उनके अनुसार अगर वे राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में नहीं आते तो दुनियाभर में दिग्गज अर्थशास्त्री के रूप में स्थान पाते. इस बात में काफी सचाई भी है. 1947 आतेआते राजनीतिक क्षेत्र में उनकी व्यस्तता काफी बढ़ चुकी थी. लेकिन उन दिनों भी उनका मन अर्थशास्त्र के क्षेत्र में छूटे हुए काम को आगे बढ़ाने का था. उसी वर्ष ‘प्रॉब्लम ऑफ रुपी’ के संशोधित संस्करण की भूमिका में उन्होंने अर्थशास्त्र के क्षेत्र में 1923 के बाद हुए बदलावों को लेकर पुस्तक का दूसरा खंड यथाशीघ्र तैयार करने का आश्वासन दिया था. मगर आजादी के बाद राजनीतिक जिम्मेदारियां बढ़ने की वजह से वे छूटे हुए कार्य को पूरा नहीं कर सके.

अर्थशास्त्र आंबेडकर का सर्वाधिक प्रिय विषय था. कोलंबिया विश्वविद्यालय में अध्ययन करते समय उनके पास कुल 29 विषय ऐसे थे, जिनका सीधा संबंध अर्थशास्त्र से था. वहां से उन्होंने ‘इवोल्यूशन ऑफ पब्लिक फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ विषय में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की थी. आगे चलकर लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स से उन्होंने ‘प्राब्लम ऑफ रुपया : इट्स ओरिजिन एंड इट्स सोल्यूशन’ विषय पर डीएससी की डिग्री हेतु शोध प्रबंध लिखा. उस ग्रंथ की भूमिका महान अर्थशास्त्री एडविन केनन ने लिखी थी. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उनकी विद्वता का अनुमान लगाने के लिए अमर्त्यसेन की टिप्पणी भी मददगार सिद्ध हो सकती है. 2007 में दिए गए एक व्याख्यान में अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर की गुरुता को स्वीकारते हुए हमारे समय के इस महान अर्थशास्त्री ने कहा था—

आंबेडकर अर्थशास्त्र के क्षेत्र में मेरे जनक हैं. वे दलितोंशोषितों के सच्चे और जानेमाने महानायक हैं. उन्हें आजतक जो भी मानसम्मान मिला है वे उससे कहीं ज्यादा के अधिकारी हैं. भारत में वे अत्यधिक विवादित हैं. हालांकि उनके जीवन और व्यक्तित्व में विवाद योग्य कुछ भी नहीं है. जो उनकी आलोचना में कहा जाता है, वह वास्तविकता के एकदम परे है. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उनका योगदान बेहद शानदार है. उसके लिए उन्हें सदैव याद रखा जाएगा.’1

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर के योगदान की चर्चा करने से पहले इस विषय में उनकी प्रतिष्ठा को दर्शाने वाली एक और घटना का उल्लेख प्रासंगिक होगा. 1930 का दशक पूरे विश्व बाजार में भीषण मंदी लेकर आया था. ब्रिटिश सरकार के सामने भी गंभीर चुनौतियां थीं, खासकर उपनिवेशों में जहां आजादी की मांग जोड़ पकड़ती जा रही थी, वहां औपनिवेशिक सरकार की पकड़ को बनाए रखने के लिए स्थानीय समस्याओं का समाधान आवश्यक था. समस्याओं के मूल में कुछ वैश्विक मंदी का हाथ था और कुछ स्थानीय रोजगारों के उजड़ जाने से उत्पन्न मंदी का. इसलिए अगस्त 1925 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की मुद्रा प्रणाली का अध्ययन करने के लिए ‘रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस’ का गठन किया था. इस आयोग की बैठक में हिस्सा लेने के लिए जिन 40 विद्वानों को आमंत्रित किया गया था, उनमें आंबेडकर भी थे. वे जब आयोग के समक्ष उपस्थित हुए तो वहां मौजूद प्रत्येक सदस्य के हाथों में उनकी लिखी पुस्तक ‘इवोल्यूशन ऑफ पब्लिक फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया’ की प्रतियां थीं. बात यहीं खत्म नहीं होती. उस आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1926 में प्रकाशित की थी. उसकी अनुशंसाओं के आधार पर कुछ वर्षों बाद ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ की स्थापना हुई. इस बैंक की अभिकल्पना नियमानुदेश, कार्यशैली और रूपरेखा आंबेडकर की शोध पुस्तक ‘प्राब्लम ऑफ रुपया’ पर आधारित है. उस समय तक उनका मुख्य लेखन अर्थशास्त्र जैसे गंभीर विषय को लेकर ही था. मात्र 27 वर्ष की उम्र में उन्हें मुंबई के एक कॉलिज में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर की नौकरी मिल चुकी थी. अध्यापन के अलावा वे विषय से संबंधित सैकड़ों लेख और व्याख्यान दे चुके थे. एक सभा में विद्यार्थियों के बीच पढ़े गए उनके लेख ‘रेस्पांसिबिल्टी ऑफ रेसपांसिबिल गवर्नमेंट’ की प्रशंसा उस समय के महान राजनीतिक विज्ञानी, चिंतक हेराल्ड लॉस्की ने भी की थी. लॉस्की का कहना था कि ‘लेख में आए आंबेडकर के विचार क्रांतिकारी स्वरूप’ के हैं.

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आंबेडकर के योगदान को और गहराई से समझने के लिए प्राचीन भारत की मुद्रा विनिमय प्रणाली के बारे में जानना आवश्यक है. 1893 तक भारत में केवल चांदी के सिक्कों का प्रयोग किया जाता था. 1841 में स्वर्ण मुद्रा का उपयोग भी होने लगा था. चांदी के सिक्के का मूल्य उसमें उपलब्ध चांदी के द्रव्यमान से आंका जाता था. इस तरह एक स्वर्णमुद्रा का मूल्य 15 चांदी के सिक्कों के बराबर था. 1853 में आस्ट्रेलिया और अमेरिका में स्वर्णभंडार मिलने से सोने की आमद बढ़ी. उसके बाद स्वर्णमुद्राओं में विनिमय का प्रचलन बढ़ने लगा. हालांकि उसका विधिवत चलन 1873 के बाद की संभव हो पाया. लगभग उसी समय चांदी के नए भंडार मिलने से उसकी आमद भी बढ़ने लगी, परंतु भारत में स्वर्ण उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई थी. परिणामस्वरूप स्वर्णमुद्रा के मुकाबले भारतीय रजतमुद्रा का निरंतर अवमूल्यन होने लगा. उस खाई को पाटने के लिए अधिक मात्रा में रजतमुद्राएं ढाली जाने लगीं. लेकिन वह समस्या का अस्थायी समाधान था. दूसरे उससे उन व्यक्तियों के लेनदेन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला था जो केवल रजत मुद्रा का इस्तेमाल करते थे. जनसामान्य के लिए वह प्रतिकूल स्थिति थी. मुद्रा का अवमूल्यन होने से महंगाई में वृद्धि हुई थी. जबकि आय ज्यों की त्यों बनी हुई थी. आंतरिक स्तर पर उससे प्रत्येक वर्ग को घाटा हो रहा था. 1872 से लेकर 1893 तक यही हालात बने रहे. आखिर 1893 में सरकार ने रजतमुद्रा ढालने का काम अपने नियंत्रण में ले लिया.

उस समय तक मुद्राओं का मूल्यांकन उनमें उपलब्ध धातु की मात्रा से आंका जाता था. 1899 में सरकार ने एक समिति का गठन किया, जिसने स्वर्णस्टेंडर्ड के स्थान पर स्वर्णमुद्रा के उपयोग की सलाह दी थी. तदनुसार मुद्रा का मूल्यांकन उसमें उपलब्ध धातुमूल्य के बजाए सरकार द्वारा अधिकृत मूल्य जितना आंका जाने लगा. सरकार ने रजतमुद्रा का मूल्य 1 शिलिंग, 4 पेंस के बराबर कर दिया. नए नियम के अनुसार स्वर्णमुद्रा का मूल्य लगभग स्थिर था. उसके मूल्यांकन का अधिकार सीधे ब्रिटिश सरकार के अधीन था, जबकि रजतमुद्रा के मूल्यनियंत्रण के लिए उस समय तक कोई व्यवस्था न थी. मुद्राओं के मूल्यांकन को लेकर आंबेडकर का दृष्टिकोण मानवीय था. कल्याणकारी अर्थशास्त्रियों से मिलता हुआ. उनका कहना था लोगों के लिए मुद्रा का वास्तविक मूल्य उसके बदले मिलने वाली आवश्यक वस्तुओं से तय होता है. सोना बेशकीमती हो सकता है. लेकिन वह आदमी की सामान्य जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता. वह न तो किसी भूखे का पेट भर सकता है, न ही उससे किसी नंगे तन को ढका जा सकता है. यदि एक रजत मुद्रा से उन्हें जरूरत की सभी चीजें प्राप्त हो जाती हैं, तो उन्हें स्वर्णमुद्रा की दरकार न होगी. इसके लिए मुद्रा का भरोसेमंद होने के साथसाथ विनिमय प्रणाली में स्थायित्व भी जरूरी है. मुद्रा के प्रति जनता का अविश्वास तथा उसकी मूल्यअस्थिरता आर्थिक संकट को जन्म देती है. रजतमुद्रा के उतारचढ़ाव को देखते हुए आंबेडकर ने स्वर्णमुद्रा को अपनाने का सुझाव दिया; तथा एक रजतमुद्रा का मूल्य एक शिलिंग तथा छह पैंस रखने की सलाह दी. उनकी अधिकांश अनुशंसाओं को सरकार ने ज्यों की त्यों अपना लिया था. उन्हीं के आधार पर आगे चलकर भारतीय रिजर्व बैंक की मूलभूत सैद्धांतिकी का विकास हुआ.

अपने अर्थशास्त्र संबंधी ज्ञान के आधार पर आंबेडकर एडम स्मिथ और डेविड रिकार्डो जैसे क्लासिकल अर्थशास्त्रियों की कतार में खड़े नजर आते हैं. आगे चलकर राजनीति और समाज सुधार के क्षेत्र में उन्होंने जो काम किया, उसके आधार पर हम उनके अर्थशास्त्र संबंधी सिद्धांतों की तुलना इटली के विचारक विलफर्ड परेतो से कर हैं. परेतो ने यूरोपीय समाज में व्याप्त असमानताओं का गहरा अध्ययन किया था. उसका मानना था कि शीर्ष पर मौजूद अल्पसंख्यक अभिजन समूह अपने बुद्धिचातुर्य द्वारा बहुसंख्यक समूह को छोटेछोटे समूहों में बांटे रखता है. इस तरह संगठित अल्पसंख्यक अभिजन के आगे असंगठित बहुजन की शक्ति नगण्य हो जाती है. ‘कल्याणकारी अर्थशास्त्र’ के क्षेत्र में ‘परेतो दक्षता तुल्यांक’ की चर्चा लगभग सभी आधुनिक अर्थशास्त्री करते आए हैं. परेतो को स्पर्धात्मक उत्पादन प्रणाली से कोई शिकायत न थी. लेकिन वह चाहता था कि सरकार समाजार्थिक समानता की स्थापना के दायित्व को समझे तथा उसके लिए समयानुसार आवश्यक कदम उठाती रहे. उसके अनुसार स्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था में लाभार्जन की दर संतोषजनक बनी रहती है. न्यायभावना के साथ काम करने वाली सरकार उस लाभ का एक हिस्सा जरूरतमंदों तक पहुंचाकर असमानता की खाई को पाटते रहने का काम कर सकती है. परेतो के शब्दों में—‘समाज में किसी एक नागरिक के साथ निकृष्टतम किए बिना, कम से कम किसी एक नागरिक के साथ श्रेष्ठतम किया जा सकता है.’ आंबेडकर को भी मशीनों और स्पर्धात्मक उत्पादन व्यवस्था से कोई शिकायत न थे. लेकिन वे चाहते थे कि सभी प्रमुख और आधारभूत उद्योग सरकार के अधीन हों. वे मानते थे कि आर्थिक सुधार की कोई भी योजना बिना भूमि सुधार के असंभव है. इसके लिए उन्होंने बड़े भूस्वामियों की आय को आयकर के दायरे में लाने का सुझाव दिया था. 1946 में अखिल भारतीय स्तर पर भूमि सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि भूमि वितरण में असमानता के कारण समाज के बड़े हिस्से को बहुत छोटी जोतों से काम चलाना पड़ता है. परिणामस्वरूप एक ओर जहां श्रमशक्ति का दुरुपयोग होता है, वहीं बहुतसी श्रमशक्ति निष्क्रिय पड़ी रहती है. आवश्यकता से कई गुना भूमि के स्वामी बने जमींदार अपनी श्रमशक्ति का उपयोग इसलिए नहीं करते, क्योंकि उन्हें जरूरत से कई गुना श्रमशक्ति बेगार या मामूली मजदूरी पर उपलब्ध हो जाती है. यानी समाज का एक वर्ग संसाधनों के अभाव में अपनी श्रमशक्ति के लाभों से वंचित रह जाता है; जबकि दूसरा आवश्यकता से कहीं अधिक संसाधनों पर काबिज होने के कारण दूसरे के श्रम को कम मूल्य पर खरीदने में सफल हो जाता है. इस तरह न केवल श्रम का अवमूल्यन होता है, बल्कि समाज की बहुतसी श्रमशक्ति व्यर्थ चली जाती है. इसके लिए आंबेडकर कृषि, उद्योग, बीमा, बैंकादि का संपूर्ण राष्ट्रीयकरण चाहते थे. वे व्यापक भूमिसुधार के समर्थक थे. चाहते थे कि सरकार समस्त कृषियोग्य भूमि का अधिग्रहण कर उसे उचित आकार के फार्मों में विभाजित करे और उत्पाद का समुचित अनुपात में समाज के सभी सदस्यों के बीच संवितरण हो. समाजार्थिक समानता की स्थापना के लिए आंबेडकर का यह क्रांतिकारी सोच था.

आंबेडकर की विचारों पर हम समाजवादी चिंतन की छाया देख सकते हैं. लेकिन भारत में समाजवादी आंदोलन का जो स्वरूप रहा है, उस अर्थ में वे कतई समाजवादी न थे. हम उन्हें आमूल परिवर्तनवादी कह सकते हैं. चूंकि वे सामाजिक समानता के लक्ष्य को दलितों की वर्गीय चेतना, शैक्षणिकसामाजिक उन्नयन तथा लोकतांत्रिक परिवर्तन द्वारा प्राप्त करना चाहते थे, इसलिए उन्हें गणतांत्रिक समाजवादी कहना भी उपयुक्त होगा. वस्तुतः जिस समाज के लिए वे काम कर रहे थे, उसके कल्याण हेतु आर्थिक समरसता का विचार पर्याप्त न था. लाहौर में ‘जातपात तोड़क मंडल’ के वार्षिक अधिवेशन के लिए लिखे गए अपने लंबे भाषण ‘जाति का उन्मूलन’ में उन्होंने कई उदाहरण देकर बताया था कि आर्थिक समाधान कभी भी सामाजिक समाधान का विकल्प नहीं बन सकते. एक उदाहरण उन्होंने गुजरात के गांव का दिया था. वहां अछूत स्त्रियां घाट से पानी लाने के लिए मिट्टी के घड़ों का उपयोग करती थीं. जानूं गांव की खातेपीते दलित परिवारों की कुछ स्त्रियों ने पानी लाने के लिए पीतल के घड़ों का उपयोग करना चाहा तो सवर्ण लोगों की त्योरियां चढ़ गईं. उन्होंने विरोध किया. पूरे भारत में यही हालात थे. जयपुर रियासत के चकवारा की घटना के बारे में उन्होंने बताया कि एक रईस अछूत तीर्थ यात्रा पर गया. लौटा तो परंपरानुसार उसने मित्रोंरिश्तेदारों को भोज देने का फैसला किया. तय किया कि भोज के लिए सभी व्यंजन देशी घी में बनाए जाएंगे. सवर्णों को पता चला तो उबलने लगे. अछूत देशी घी से बने व्यंजनों का भोज दे, यह उन्हें सहन न हुआ. सो ऐन भोज के समय दर्जनों दबंग समारोह स्थल पर जा धमके. पलभर में सारा भोजन तहसनहस कर दिया. समाजवाद मुख्यतः आर्थिक समानता को अपना लक्ष्य मानता है. यही कारण है कि भारत में समाजवादी राजनीति कभी भी दलितों की मददगार नहीं बनी. न ही संसाधनों के संवितरण की न्यायपूर्ण मांग रखने वाले आंबेडकर को किसी ने समाजवादी विचारक के रूप में मान्यता दी.

आंबेडकर मार्क्स की आलोचना करते हुए बुद्ध को अपनाया था. अपने विचारों के कारण लगभग आधी दुनिया पर छाए रहने वाली विश्वइतिहास की इन महानतम हस्तियों में आपस में कोई स्पर्धा नहीं है. तो भी आंबेडकर के लिए बुद्ध इसलिए महत्त्वपूर्ण थे कि उन्होंने जाति पर सवालिया निशान लगाते हुए समानता आधारित समाज का सपना देखा था. साम्यवाद के रूप में समानता आधारित समाज का सपना मार्क्स का भी था. लेकिन मार्क्स की सीमा थी कि वे समानता को जीवन के आर्थिक पक्ष से आगे बढ़कर नहीं देख पाए थे. भारत के बारे में उन्होंने काफी लिखा था, तथापि वह जानकारी राजनीतिक और अखबारी सूचनाओं पर केंद्रित थी. जाति की भयावहता जिससे आंबेडकर का सीधा परिचय था और जिसकी विकृति को ढाई हजार वर्ष पहले जन्मे बुद्ध भी समझते थे, मार्क्स उतनी गहराई से नहीं समझ पाए थे. आंबेडकर मार्क्स की वर्गभेद की अवधारणा से सहमत थे. परंतु इस संशोधन के साथ कि भारतीय समाज में वर्गभेद मुख्यतः सामाजिकसांस्कृतिक रहा है. उनका मानना था कि जाति की समस्या के समाधान के बिना भारत में किसी भी सुधारवादी आंदोलन की सफलता संद्धिग्ध होगी. समाजार्थिक परिवर्तन के लक्ष्य को वे दलितों के प्रबोधीकरण द्वारा प्राप्त करना चाहते थे. इस रूप में वे अपने समय के किसी भी समाजवादी से बड़े और प्रतिबद्ध समाजवादी थे. भारतीय समाजवादी आंदोलन और राजनीति की यह विडंबना रही उसने आंबेडकर को मात्र दलितों का नेता मानकर उपेक्षित रखा. इसके लिए आंबेडकर को तो कोई नुकसान नहीं हुआ. परंतु जाति के सवालों की ओर से मुंह मोड़े रहने के कारण भारत का समाजवादी आंदोलन लगातार अपनी प्रासंगिकता खोता रहा.

आंबेडकर का पूरा जीवन एक महागाथा है. एक लेख या पुस्तक में उनके जीवनकर्म को नहीं समेटा जा सकता. वे अपने मानक आप हैं. इसलिए लेख का समापन हम उन्हीं की बात से करना चाहेंगे. यह दरअसल में एक चेतावनी है जो भारतीय संविधान को लोकार्पित करते हुए उन्होंने हम सबको दी थी. संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत उन्होंने ‘हम भारत के लोग’ से की है. इसकी व्याख्या उनके भाषण में भी मिलती है —

‘‘मुझे याद है जब राजनीतिक रूप से सक्रिय हिंदुस्तानी ‘भारत के लोग’ कहने की अपेक्षा ‘भारतीय राष्ट्र’ कहना अधिक पसंद करते थे. मेरा विचार है कि ‘हम एक राष्ट्र हैं’ ऐसा मानकर हम एक बड़े भ्रम को बढ़ावा दे रहे हैं. हजारों जातियों में बंटे लोग भला एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं? सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से हम अभी तक एक राष्ट्र नहीं हैं, इस बात को हम जितनी जल्दी समझ लें उतना ही हमारे लिए बेहतर होगा. तभी हम राष्ट्र बनने कि जरूरत को बेहतर समझ पाएंगे तथा इस लक्ष्य को हासिल करने के तरीकों और साधनों के बारे में बेहतर पाएंगे. (जातिप्रथा के रहते) इस उद्देश्य की प्राप्ति कठिन है….जातियां राष्ट्रविरोधी हैं. पहला कारण तो ये कि वे सामाजिक जीवन में अलगाव को बढ़ावा देती हैं. दूसरे वे एक जाति और दूसरी जाति के बीच ईर्ष्या और असहिष्णुता को ले आती हैं. अगर हम सच में राष्ट्र बनना चाहते हैं तो हमें इन सब मुश्किलों से मुक्ति पानी होगी. असली भाईचारा तभी कायम हो सकता है, जब राष्ट्र मौजूद हो—लेकिन बगैर बंधुत्व के समानता, स्वाधीनता और राष्ट्रीयता महज दिखावा ही होंगी.’’

ओमप्रकाश कश्यप

1. Ambedkar is my Father in Economics. He is true celebrated champion of the underprivileged. He deserves more than what he has achieved today. However he was highly controversial figure in his home country, though it was not the reality. His contribution in the field of economics is marvelous and will be remembered forever..!”