Category Archives: टीम अन्ना के नाम खुली चिट्ठी

ईश्वर : एक अवैज्ञानिक धारणा

सामान्य

क्या ईश्वर बुराई पर अंकुश लगाना चाहता है, लेकिन लगा नहीं सकता?

तब वह सर्वशक्तिमान नहीं है.

क्या वह अंकुश लगा सकता है, लेकिन उसकी इच्छा नहीं है?

तब वह विद्वेषी है.

वह कर सकता है और करने की इच्छा भी रखता है?

तब ये ढेर सारी बुराइयां कहां से आती हैं?

वह न तो कर सकता है, न ही करने की इच्छा रखता है?

तब उसे ईश्वर क्यों माना जाए?

              —एपीक्यूरस, लेक्टेंटियस द्वारा ”आ॓न दि एंगर आ॓फ गॉड”, 13.19.

स्पर्धा आधुनिक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का सबसे कारगर उपकरण है. एक तरह से मूलमंत्र. मान लिया गया है कि स्पर्धा रहेगी, तब तरक्की होगी. प्रतिभाशाली लोग आगे आएंगे. लोगों को अच्छे उत्पाद सस्ते मूल्य पर प्राप्त हो सकेंगे. इसलिए जो इस व्यवस्था को अपनाता है, जाने-अनजाने स्पर्धा में शामिल हो ही जाता है. लोग स्पर्धा को विकास का मूलमंत्र मानना चाहते हैं, मानें. उसमें सफलता व्यक्ति के प्रतिभा-कौशल से तय नहीं होती. वास्तविक परिणाम स्पर्धारत व्यक्ति/व्यक्ति-समूहों की आर्थिक-सामाजिक हैसियत पर निर्भर करते हैं. उन प्रक्रियाओं द्वारा तय होते हैं, जिन्हें साधारण भाषा में मौकापरस्ती कहा जाता है. दो उद्योगपति इसलिए स्पर्धा में रहते हैं, ताकि बाजार के अधिकतम हिस्से पर कब्जा कर, वहां अपने एकाधिकार का परचम लहरा सकें. भूखों की स्पर्धा उन्हें अपनी थाली में कटौती के साथ जैसे-तैसे जीते जाने की मजबूरी की ओर ढकेल देती है. मार्क्स के अलावा मिखाइल बकुनिन, विल्फ्रेद परेतो, जीतान मोसका आदि ने स्पर्धा की प्रवृत्ति का विद्वतापूर्ण विश्लेषण किया है. उनके अनुसार स्पर्धा असमान व्यक्तियों की बेमेल प्रतियोगिता है. उसका परिणाम असमानता की खाई के उत्तरोत्तर चौड़े होने के रूप में सामने आता है. चूंकि स्पर्धा लोकतांत्रिक मूल्यों एवं समानाधिकार के प्रसाद के रूप में व्यवहृत होती है, इसलिए उसका विरोध लोकतंत्र का प्रतिवाद मान लिया जाता है. शिखर तक पहुंचने तथा वहां टिके रहने की स्पर्धा में व्यक्ति को अनेक समझौते करने पड़ते हैं. कई बार सामान्य नैतिकता सहित उन मूल्यों को भी दांव पर लगाना पड़ता है, जिनके प्रति प्रतिबद्धता उस अभियान का औचित्य रही है. यह सब याद आया हिंदी के चर्चित ब्लॉग ‘साइंटिफिक वर्ल्ड’ चल रही एक बहस को पढ़कर. इस ब्लॉग पर एक चौंकाऊ, विज्ञान के नाम पर अवैज्ञानिक बहस पिछले दिनों ऐसे देखने को मिली, जैसे टीआरपी बढ़ाने के लिए टीवी चैनल सामान्य सूचनाओं को भी ‘न भूतो न भविष्यति’ कहकर परोस देते हैं. भले ही यह अनजाने में हुआ हो अथवा अतिउत्साह में, नजर साफ आ रहा था.

पिछले दिनों ‘साइंटिफिक वर्ल्ड’ पर दो आलेख प्रकाशित हुए हैं, उनमें पहला आलेख के पी सिंह का ‘क्या ईश्वर को वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित किया जा सकता है?’ दूसरे आलेख, ‘ईश्वर की अवधारणा: विज्ञान की कसौटी!’ के लेखक विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी हैं. दोनों आलेख ईश्वरवादियों की ओर से लिखे गए हैं, इसलिए उनमें ईश्वर की सत्ता पर संदेह कम, विश्वास और आस्था की अभिव्यक्ति अधिक है. दोनों विद्वान आस्था-मंडित हैं. ईश्वरत्व में संदेह उन्हें छू भी नहीं पाया है. इसलिए दोनों अपनी-अपनी तरह से ईश्वर को प्रमाणित करने की कोशिश करते हैं. मगर इकतरफा होने के कारण दोनों लेख ईश्वर-प्रचारक मंडली के प्रवचन बन जाते हैं. विज्ञान के नाम पर अवैज्ञानिकता का आशय यही है. लेखों में दिए गए तर्क भी नए नहीं हैं. कथावाचक किस्म के ‘गुरु महाराज’ ऐसे तर्क देते ही रहते हैं. के. पी. सिंह जिस आस्था को प्रश्नवाचक चिह्न के साथ आरंभ करते हैं, वैसी ही आस्था चतुर्वेदी जी के लेख में विस्मयादिबोधक चिह्न के साथ नजर आती है. गोया लेखों को विज्ञान की श्रेणी में लाने के लिए वे संदेह का हिस्सा पाठक के लिए छोड़ देना चाहते हैं. आपत्तिजनक यह नहीं है कि ब्ला॓ग पर दो ईश्वरवादियों ने अपने-अपने तर्क जुटाए हैं. निस्संदेह जैसा वे सोचते और महसूस करते हैं, उसको अभिव्यक्त करने का उन्हें पूरा-पूरा अधिकार है. आपत्तिजनक यह है कि इन लेखों को ऐसे ब्ला॓ग पर जगह मिली है जो स्वयं को विज्ञान के प्रति समर्पित बताकर बौद्धिक जड़ता एवं पाखंड के विरोध का अभियान चला रहा है. इसी प्रतिबद्धता के चलते उसको हजारों पाठक मिले हैं.

इन लेखों की कमजोरी है कि उनकी सामग्री उनके अपने ही शीर्षक से मेल नहीं खाती. शीर्षक से लगता है कि उनमें विषय का वस्तुनिष्ट विवेचन देखने को मिलेगा, मगर असलियत में सारे तर्क एकतरफा होने से लेख पूरी तरह आत्मपरक, निजी आस्था की प्रस्तुति तक सिमट गए है. दोनों में कहीं भी शंका अथवा संदेह को जगह नहीं है. इस विषय पर ऐसे लेखों की कमी नहीं है जिनमें लेखक पूर्वाग्रह अथवा पूर्व निष्पत्ति के साथ लिखना आरंभ करता है. अपने मत के समर्थन में जो भी तर्क जंचते हैं उन्हें सामने रखता जाता है. मगर पूर्वाग्रहों के दबाव में उस सामग्री की वस्तुनिष्ट समीक्षा करना भूल जाता है, जिसे उसने अपने मत के समर्थन में बतौर उद्धरण प्रयुक्त किया है. विचाराधीन आलेखों में से पहले में भारतीय संदर्भ अधिक हैं तो दूसरे में पाश्चात्य विद्वानों को अपने समर्थन में दिखाने की कोशिश की गई है.

 विज्ञान संदेह के साथ शुरू होता तथा उसी के साथ आगे बढ़ता है. उसमें ठहराव की स्थिति कभी नहीं आती. किसी वैज्ञानिक सत्य पर भरोसा करने से पहले प्रत्येक को उसे जांचने-परखने तथा प्रयोगों की कसौटी पर कसने की छूट प्राप्त होती है. ईश्वर एवं मानवीय आस्था के बीच विज्ञान को न लाएं तो भी उसके अस्तित्व पर संदेह एवं तदनुरूप उठनेवाली बहस नई नहीं है. भारत में भी ढाई-तीन हजार वर्षों से यह बहस लगातार चली आ रही है. वैदिक काल में ईश्वरवादी धारणा का खंडन करने वाले आजीवक और लोकायती संप्रदाय थे. वहीं आस्थावादियों के समर्थन में वैदिक धर्म की अनेक शाखाएं थीं. दर्शन की दृष्टि से वह भारतीय मेधा का सबसे प्रस्फुटनकारी दौर था. उसी दौर में वेदों को आप्त-ग्रंथ की संज्ञा दी गई. उन्हें दैवी उपहार माना गया. श्रद्धालु आचार्यों का एक वर्ग ‘आस्तिक’ बनाम ‘नास्तिक’ की बहस में वेदों को आप्तग्रंथ मनवाने जुटा रहा. बावजूद इसके नास्तिक दर्शनों की प्रतिष्ठा उतनी ही बनी रही, जितनी आस्तिक दर्शनों की थी. विचारों के उस लोकतंत्र ने सांख्य जैसे निरीश्वरवादी दर्शन को जगह थी तो कर्मकांड प्रधान मीमांसा दर्शन को भी. वैदिक धर्मों के विचलन के दौर में उभरे जैन और बौद्ध दर्शन ने ‘आत्मा’ और ‘ईश्वर’ पर केंद्रित बहसों में उलझने के बजाए मनुष्य के आचरण को महत्त्वपूर्ण माना. उन्होंने सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह आदि पर जोर देकर नैतिक एवं समाजोन्मुखी, जीवन जीने का आवाह्न किया. मानो सभ्यताओं के तार आपस में जुड़े हुए थे. लगभग उन्हीं दिनों भारत से हजारों मील दूर यूनान में भी कुछ वैसा ही हुआ. ईसा पूर्व छठी शताब्दी में वहां सुकरात, प्लेटो, जीनोफेन जैसे विचारकों ने अभिजन संस्कृति का पोषण करने वाले परंपरावादी सोफिस्टों को चुनौती दी. सुकरात ने ईश्वर को शुभ का पर्याय माना तथा उसकी प्राप्ति के लिए सद्गुण और सदाचरण पर जोर दिया. गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, सुकरात, कन्फ्यूशियस, प्लेटो जैसे दार्शनिकों का नैतिक प्रभामंडल इतना तेजोमय था कि उसका प्रभाव शताब्दियों तक बना रहा. आज भी ईसा से तीन से छह शताब्दी पूर्व का वह समय विश्व-इतिहास में बौद्धिक क्रांति का सफलतम दौर माना जाता है. आगे चलकर जितने भी राजनीतिक-सामाजिक दर्शन सामने आए, वे भी जो विश्व-परिदृश्य में परिवर्तन के वाहक बने, सभी की नींव इस दौर में पड़ चुकी थी.

विद्वान लेखकों द्वारा दिए गए तर्कों में प्रत्येक पर स्वतंत्र रूप से चर्चा संभव है. तथापि इस लेख की सीमा को ध्यान में रखते हुए मैं केवल स्टीफन डी. अनविन के उद्धरण की ओर दिलाना चाहूंगा. स्टीफन अनविन ने विशेषरूप से पुस्तक लिख, ‘ईश्वर के पक्ष-विपक्ष में आंकड़े जुटाकर ईश्वर के होने की प्रायिकता 67 प्रतिशत’ सिद्ध की है.’ मैंने वह पुस्तक नहीं पढ़ी है, किंतु उसपर पर्याप्त समालोचनात्मक सामग्री इंटरनेट पर उपलब्ध है. इस आलेख में आए गणितीय संदर्भ वहीं से लिए गए हैं. मेरी कोशिश उसी को आगे बढ़ाने की है, ताकि अनविन द्वारा प्राकलित ईश्वर की 67% प्रायिकता का सच पाठकों के सामने आ सके. अनविन भौतिक विज्ञानी हैं. डा॓क्ट्रेट उन्होंने सैद्धांतिकी भौतिकी की शाखा ‘क्वांटम गुरुत्च’ में की है. प्रसंगवश बता दें कि यह विज्ञान की वही शाखा है जिसके अंतर्गत आजकल विश्व-प्रसिद्ध ‘लार्ज हैड्रा॓न कोलीडर’ नाम का दीर्घकालिक और महत्त्वाकांक्षी प्रयोग चल रहा है. उससे जुड़े वैज्ञानिकों ने द्रव्यमान का कारण कहे जानेवाले मूलकण यानी ‘हिग्स बोसोन’ की खोज का दावा किया, जिसे वस्तुओं में भारता के लिए जिम्मेदार माना जाता है. विज्ञान की चुनौतियों के आगे लड़खड़ा रहे आस्थावादी यहां भी क्यों चूकने वाले थे. वैज्ञानिक अपने प्रयोग के आरंभिक निष्कर्षों के पुनरीक्षण में जुटे ही थे कि आस्थावादियों ने उसे तुरत-फुरत ‘गॉड पार्टिकिल’ का नाम दे दिया. जिसका हिग्स बोसोन की खोज में जुटी प्रयोगशाला सर्न के वैज्ञानिकों ने जोरदार विरोध किया. प्रयोगशाला से जुड़े वरिष्ठ अमेरिकी वैज्ञानिक पोलीन गा॓नन से 2011 में यूरोप के रेडियो पत्रकार ने जिनेवा में एक साक्षात्कार के दौरान जब कहा, ‘मैं मीडिया से हूं और मैं उसे यही(गॉड पार्टिकिल) कहता रहूंगा.’ तब गा॓नन का जवाब था, ‘यह सब आप ही का दिया गया नाम है….मैं इससे घृणा करता हूं.’ वैज्ञानिकों के न चाहने के बावजूद हिग्स बोसोन को ‘गॉड पार्टिकिल’ कहने का षड्यंत्र आज भी चल रहा है. षड्यंत्र इसलिए क्योंकि धर्मसत्ता, राजसत्ता, अर्थसत्ता और उनसे पालित-पोषित मीडिया में से कोई नहीं चाहता कि जनता विज्ञान को विज्ञान की तरह जाने. उसका विवेकीकरण हो. इसलिए वैज्ञानिक शोधों को तत्काल अपने पाले में खींच लेने, उनका तेज कम करने तथा उनसे लाभ उठाने की प्रवृत्ति प्रायः सभी समाजों में रही है. इससे धर्मग्रंथों का मूल संदेश गंडे-ताबीजों में कैद होकर रह जाता है. कंप्यूटर जन्मपत्री बनाने लगता है और टेलीविजन पर बाबा लोग भविष्य सुधारने का धंधा करने लगते हैं.

अनविन संयुक्त राष्ट्र के ऊर्जा विभाग के दूत रह चुके है. आजकल वे एक सलाहकार फर्म का संचालन करते हैं, जिसका काम विश्व की नामी-गिरामी पूंजीपति कंपनियों को आपदा प्रबंधन के मामले में सलाह देना है. अनविन की एक चर्चित पुस्तक The Probability of God: A Simple Calculation That Proves the Ultimate Truth. 2003 का उल्लेख चतुर्वेदी जी ने अपने आलेख में किया है. यह उनकी अध्ययनशीलता को दर्शाता है. अपनी पुस्तक में अनविन ने ईश्वर के अस्तित्व की संभाव्यता को गणित के माध्यम से सिद्ध किया है. इस निष्कर्ष में उनके व्यावसायिक स्वार्थ छिपे होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता. आपदा को ईश्वरीय कर्म सिद्ध कर देने से प्रबंधकीय कौशल पर लगनेवाले आरोप कम हो जाते हैं. शायद इसलिए वे ईश्वर के विचार को उसी प्रकार जीवित रखना चाहते हैं, जैसे अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए ज्योतिषी प्रारब्ध की संकल्पना को ऊल-जुलूल तर्क देकर पालता-पोषता है. हालांकि अनविन ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने जो समीकरण दिए हैं, वे आवश्यक नहीं कि पूरी तरह खरे, अंतिम सत्य हों. वे केवल एक पक्ष यानी उस पक्ष को जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखता है, अपनी बात को और अच्छी तरह स्पष्ट करने के लिए कुछ उपकरण उपलब्ध करा रहे हैं. वे यह भी लिखते हैं कि ईश्वर विषयक विज्ञान की सभी मान्यताएं अधूरी हैं. अर्थात जिन संकल्पनाओं पर चलते हुए अनविन ईश्वरत्व की संभावना को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 67 प्रतिशत तक आंकते हैं, दूसरा उन्हीं संकल्पनाओं को अपनी तरह से प्रस्तुत कर, उनसे नए निष्कर्ष निकाल सकता है. वे भी गणितीय मापदंड पर उतने ही खरे उतरेंगे, जितने स्वयं अनविन के. कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसा हुआ है. उसकी चर्चा हम यथास्थान करेंगे. कुल मिलाकर मामला वहां भी आस्था का और आस्थावादियों के लिए है, गणित का नहीं.

अब बात उस गणित की जिसके आधार पर अनविन ने ईश्वर की प्रायिकता को कथितरूप से 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 67 प्रतिशत कर दिया है. पहले तो यह जान लें कि अनविन ईश्वर की 50 प्रतिशत संभाव्यता तक किस प्रकार पहुंचे हैं. इसके लिए उन्होंने न तो कोई सर्वे किया है, जो सांख्यिकी का मूल कर्म है, न ही किसी और माध्यम से आंकड़े जमा किए हैं. केवल काम-चलाऊ प्रतीतियों के सहारे अपने मंतव्य को गढ़ा है. यह साधारण से साधारण व्यक्ति भी जानता है कि ईश्वर को लेकर दो प्रकार की संभावनाएं बनती हैं. पहली, ईश्वर हो सकता है. और दूसरी ईश्वर नहीं हो सकता. इस तरह ईश्वर के होने या न होने की मूल प्रायिकता बराबर-बराबर अर्थात पचास प्रतिशत है. सिवाय संभाव्यता के अलावा इसके पीछे कोई और तर्क नहीं है. एक तरह से यह अनविन की मजबूरी भी थी. क्योंकि प्रायिकता को बढ़ाने के अनविन जिस गणितीय सूत्र का सहारा लेता है, वह सांख्यिकी-विद् रेवरेंड थामस बा॓यस का है. वह सूत्र तभी काम कर सकता है जब उसके लिए आधार अथवा प्राथमिक संभाव्यता मौजूद हो. इसलिए उन लोगों के लिए जो ईश्वर की संभावना को शून्य अथवा नगण्य मानते हैं, यह सूत्र और प्रकारांतर में अनविन के निष्कर्ष, किसी काम के नहीं हैं. उल्लेखनीय है कि जब कोई गणितज्ञ सांख्यिकीय आकलन करता है तो उसके आंकड़े किसी न किसी रूप में समाज से, अथवा किसी वैज्ञानिक प्रयोग द्वारा ठोस परिगणनाओं के आधार पर जुटाए गए होते हैं. वे किसी व्यक्ति-विशेष के बारे में सत्य भले ही न हों, मगर वास्तविकता का एक सामान्य चित्र हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं, जो सामाजिक अध्ययन में बहुत कारगर सिद्ध होते हैं. उससे प्राप्त निष्कर्ष किसी न किसी सामाजिक यथार्थ का प्रतिनिधित्व करते हैं. आगे बढ़ने से पहले बा॓यस के सूत्र के बारे में जान लेना आवश्यक है. इसके लिए पहले कुछ उदाहरण—

मान लीजिए एक घर है. जिसका दरवाजा खुला हुआ है. एक आदमी उस घर में घुसता है. उसको किसी ने बाहर आते हुए नहीं देखा. तब उस व्यक्ति की, जब तक कोई और साक्ष्य न हो, घर में होने तथा न होने की संभावना बराबर-बराबर यानी पचास प्रतिशत होगी. सूत्र के गणितीय हिस्से पर आने से पहले एक और स्थिति. मान लीजिए एक व्यक्ति हर रोज घर में कुछ न कुछ फल लेकर अवश्य आता है. परिवार में दो बच्चे हैं. उनमें एक को केला पसंद हैं, दूसरे को अनार. व्यक्ति दोनों का मन रखने के लिए एक दिन केले लेकर आता है, दूसरे दिन अनार. इस तरह उसके किसी एक दिन केला या अनार लाने की संभावना 0.5 अर्थात 50 प्रतिशत होगी. पापा केला लाएंगे या अनार, यह बात बच्चे भी जानते हैं. एक दिन भाई-बहन छत पर थे कि पापा को हाथ में थैला लिए आते देखा. दोनों बच्चे बहस करने लगे—

‘आज पापा केला लाए हैं.’

‘नहीं अनार.’

‘पापा का फोन आया था, उस समय वे केले वाले के पास खड़े थे.’

‘तो क्या हुआ, जरूरी थोड़े ही पापा केले वाले के पास से केला लेकर ही आएं. वे केला बेचनेवाले से मना करके अनार वाले के पास भी जा सकते हैं.’

‘पापा जिस ठेली के पास खडे़ होते हैं, वहीं से फल खरीद लेते हैं.’

‘हमेशा ऐसा नहीं होता. एक बार मैंने स्वयं पापा को केले वाले को छोड़ अनारवाले के पास जाते हुए देखा था.’

अब मान लीजिए जहां से उन बच्चों के पिता फल खरीदते हैं, वहां केवल दो फलवाले खड़े होते हैं. उनमें से एक अनार बेचता है और दूसरा केला, तो जो बच्चा अपने पक्ष में अतिरिक्त तर्क दे पाएगा, उस दिन उस फल को लाने की संभावना उतनी ही बढ़ जाएगी. अनविन का 50 प्रतिशत वाला विचार यही कहता है. मान लीजिए लोगों से पूछा जाए कि ईश्वर है? कुछ लोग कहेंगे—‘हां’, कुछ कहेंगे—‘नहीं.’ जरूरत इस कवायद की भी नहीं है. आप एक सिक्का लीजिए, उछालिए. हेड और टेल आने की प्रायिकता बराबर होगी. अनविन ईश्वर न होने की संभावना को किनारे कर, शेष पचास प्रतिशत को उसके पक्ष में प्रमाण मान लेता है. यही उसके अनुसार ईश्वर की आधार प्रायिकता है. इस 50 प्रतिशत को 67 प्रतिशत तक पहुंचाने के लिए वह आगे भी ऐसी ही पूर्वापेक्षाओं का सहारा लेता है. जबकि बायस संभावनाओं की पड़ताल के लिए स्थितिजन्य साक्ष्य प्रस्तुत करता है. ठीक ऐसे ही जैसे कोई चतुर पुलिस अधिकारी किसी घटना की पड़ताल करता है.

कल्पना कीजिए प्लेटफार्म पर उतरता हुआ कोई आदमी चलती ट्रेन में खिड़की के बराबर बैठे एक पुरुष को अपने सहयात्री से बातचीत करते हुए देखता है. इससे पहले कि वह दूसरे व्यक्ति को पहचान पाए कि वह स्त्री है अथवा पुरुष, ट्रेन आगे बढ़ जाती है. दृष्टा इतना तो जान चुका है कि खिड़की के बराबर में बैठा यात्री पुरुष था. लेकिन जिससे वह बात कर रहा था, वह पुरुष भी हो सकता है, स्त्री भी. उसके स्त्री अथवा पुरुष होने की प्रायिकता बराबर, अर्थात पचास प्रतिशत होगी. अब यदि कोई तीसरा व्यक्ति दृष्टा से उन यात्रियों के बारे में पड़ताल करना चाहे तो उनकी बातचीत कुछ इस प्रकार होगी—

‘अच्छी तरह याद करके बताओ, दूसरा व्यक्ति पुरुष था अथवा स्त्री?’

‘मुझे याद नहीं आ रहा.’

‘ठीक है, दिमाग पर जोर डालो, याद करने की कोशिश करो. तुमने उसके बाल तो देखे ही होंगे. वे लंबे था या छोटे?’ पड़ताल कर रहा व्यक्ति अपनी तकनीक आजमाता है. जांचकर्ता का तर्क उसके ठोस अनुभवों पर आधारित है.

‘लंबे.’ दृष्टा को याद आता है. जांच करने वाला जानता है कि सामान्यतः स्त्रियां लंबे बाल रखती हैं. लेकिन सभी स्त्रियां बाल नहीं रखतीं. औसतन कितनी स्त्रियां लंबे बाल रखती हैं, इसके आंकड़े उसके पास हैं. यदि नहीं तो जुटाए जा सकते हैं. वह प्राप्त आंकड़ों से मिलान करके देखता है. लंबे बाल रखनेवाले हर चार व्यक्तियों में से आमतौर पर एक पुरुष होता है, तीन स्त्रियां. वह हिसाब लगाता है. उसके अनुसार जिस व्यक्ति से वह बातचीत कर रहा था उसके स्त्री होने की संभावना चार में से तीन, यानी 75 प्रतिशत है. प्रायिकता को बढ़ाने के लिए जांचकर्ता कुछ और सवाल कर सकता है. जैसे क्या उसने हाथ रचाए हुए थे? ऐसे साक्ष्यों के साथ प्रायिकता में आनुपातिक रूप से वृद्धि अथवा कमी आती जाएगी. बा॓यस के सूत्र का यही आधार है. इसी को विस्तार देते हुए वह स्थिति-विशेष के समर्थन में साक्ष्य जुटाता है और विशुद्ध गणितीय पद्धति का अनुपालन करते हुए सामान्य निष्कर्ष तक पहुंचता है.

बा॓यस के अनुसार यदि हम मान लें कि बातचीत स्त्री ‘स’ के साथ हो रही थी, तब यह मानते हुए कि समाज में स्त्री-पुरुष की संख्या लगभग बराबर है, बगैर किसी गहराई में जाए मान सकते हैं कि सहयात्री के स्त्री होने की प्राथमिक संभाव्यता सप्रथम= 0.5 होगी. जिसका आशय है कि पुरुष की बगल में बैठे सहयात्री के स्त्री अथवा पुरुष होने की संभावना बराबर-बराबर है. यदि यह मान लिया जाए कि उस सहयात्री के बाल लंबे थे और आंकड़ों से यह सिद्ध हो कि प्रत्येक चार स्त्रियों में से तीन(75 प्रतिशत) लंबे बाल रखती हैं तो बा॓यस के अनुसार लंबे बालों के आधार पर पुरुष के सहयात्री के, स्त्री होने की संभावना सलंब/म = 0.75 होगी. इसे बायस ने सशर्त प्रायिकता कहा है. अर्थात वह प्रायिकता जो घटना के लक्षणों तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार से तय होती है. ऐसे ही जैसे मान लीजिए कि 25 प्रतिशत पुरुष लंबे बाल रखते हैं तो उपर्युक्त घटना में सहयात्री के लंबे बालों के आधार पर पुरुष होने की संभावना स/पु= 0.25 होगी. यहां यह मान लिया गया है कि बातचीत केवल स्त्री अथवा पुरुष के साथ हो रही थी, अन्य किसी प्राणी के साथ नहीं. बायस इससे अंतिम संभाव्यता अथवा कुल लाक्षणिक संभाव्यता को जानना चाहता है. इसके लिए वह निम्नलिखित सूत्र देता है—

                                                   सप्रथम x   सलंब/म

                     सअंतिम       =         ……………………….

                                                            स

                                                                     (स = कुल संभाव्यता)

                                                     सप्रथम x   सलंब/म

                                =       …………………………………………

                                             सप्रथम x   सलंब/म +   सप्रथम x स/पु

                                                0.75 x 0.50                        0.375

                                =   …………………………………… =     …………….

                                           0.50 x 0.75 + 0.50 x 0.25         0.500

                                                                                     = 75 % लगभग

इस तरह लंबे बाल के साक्ष्य के आधार पर उपर्युक्त उदाहरण में सहयात्री के स्त्री होने की संभावना 50% से बढ़कर 75% हो जाती है. साक्ष्यों की संख्या तथा उनकी कोटि का प्रभाव संभाव्यता के स्तर पर पड़ता है. डा॓क्टर रोगी से तथा पुलिस मुजरिम से जांच-पड़ताल के दौरान इसी तरह संभाव्यता को आगे बढ़ाती जाती है. अनविन उसी सूत्र को ईश्वर की संभाव्यता पुष्ट करने के लिए अपनाता है. बा॓यस के सूत्र को ईश्वर की परिगणना के लिए आधार बनाते समय अनविन यह दावा कतई नहीं करता कि उसने जो सूत्र दिया है, उससे सभी सहमत होंगे. वह स्वयं मानता है कि विज्ञान और गणित के माध्यम से ईश्वर की संभाव्यता को सिद्ध करना बहुत मुश्किल भरा काम है. उसका बस इतना दावा है कि वे लोग जो ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखते हैं, उसके तथाकथित गणितीय सूत्र का सहारा लेकर अपने मत को बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर सकते हैं. वह जानता है कि उसके निष्कर्षों से लोग अपनी मान्यताएं बदलने को राजी नहीं होंगे. इसलिए अपने बचाव हेतु वह पर्याप्त संभावनाएं पहले ही सोच कर चलता है. कहने की आवश्यकता नहीं कि ईश्वरवादियों को अनविन के तर्क अपनी आस्था के प्रति चमत्कारी समर्थन प्रतीत होते हैं. ईश्वर की आधार-संभावना(सपूर्व = 50 प्रतिशत) तय कर लेने के पश्चात, बा॓यस के सूत्र में किंचित संशोधन के साथ वह अपना सूत्र प्रस्तुत करता है. निष्कर्ष संभाव्यता(सपश्चात) तक पहुंचने के लिए अनविन द्वारा प्रयुक्त सूत्र निम्नवत है—

                                                               सपूर्व x द

                सपश्चात            =                  ………………………….

                                                                सपूर्व x द + 1—सपूर्व

अनविन के अनुसार ‘द’ दिव्यता सूचकांक है. वह अपने दिव्यता सूचकांक को अलग-अलग अंक देकर गणना करता है. वे अंक भी अनविन द्वारा प्राकल्पित हैं. अलग-अलग स्थितियों के अनुरूप अनविन द्वारा प्रकल्पित दिव्यता सूचकांक निम्नलिखित हैं—

  1. पहली स्थिति में यह मानते हुए कि ईश्वर है और अकाट्य रूप से है, उसके विरोध के समस्त तर्कों को नकारते तथा पक्ष की प्रत्येक संभावना को स्वीकारते हुए वह दिव्यता सूचकांक ‘द’ को उच्चतम 10 अंक देता है. इससे वह दर्शाना चाहता है कि ईश्वर है और दस बार है.

2 दूसरी गणना के लिए वह यह मानते हुए कि ईश्वर है, एक नहीं दो बार है, वह दिव्यता सूचकांक ‘द’ को 2 अंक देता है.

  1. तीसरी गणना में वह दिव्यता सूचकांक को केवल 1 अंक देता है. इसका आशय है कि ईश्वर हो भी सकता है, नहीं भी.
  2. चौथी परिकल्पना में इस संभावना को मानते हुए कि ईश्वर नहीं है, वह दिव्यता सूचकांक को मात्र 0.5 अंक देता है.
  3. पांचवी स्थिति में वह दिव्यता सूचकांक ‘द’ को 0.01 अंक देता है. उस संभावना को और बढ़ा लेता है, जो मानती है कि ईश्वर नहीं है.

दिव्यता सूचकांक को तय करने का अनविन का अलग मापदंड हैं. सांख्यिकी आंकड़ों के साथ साक्ष्य पर भी विश्वास करती है, जबकि अनविन के यहां ऐसा कुछ भी नहीं है. दिव्यता सूचकांक के अलग-अलग निर्धारण हेतु वह पुनः प्रतिज्ञप्तियों की कल्पना करता है. जाहिर है ये प्रतिज्ञप्तियां आस्था के आधार गढ़े गए उसके छह भिन्न स्तर हैं—

  1. शुभत्व(द=10): अंकों के आधार पर यदि ध्यान से देखा जाए तो शेष संभावनाओं के मुकाबले यह शक्तिशाली संभावना है. कम से काम तुलनात्मक अंकों के आधार पर. यह कुछ ऐसा ही है कि तराजू के एक पलड़े में एक भारी-भरकम पत्थर तथा दूसरे में बिल्ली, खरगोश, चूहा, बकरी, बंदर को एक साथ चढ़ाकर यह निष्कर्ष निकाल लिया जाए कि वह पत्थर जंगल के सभी जानवरों से अधिक वजनदार है.
  2. सामान्य बुराइयां: यानी ऐसी बुराइयां जिनका होना समाज की विकास प्रक्रिया को गति देने के लिए आवश्यक है(द=0.5).
  3. प्राकृतिक बुराइयां : जैसे जंगलराज की स्थिति, महामारी आदि. जंगल में शक्तिशाली प्राणी अपने से छोटे प्राणी को खा जाता है. महामारी से मासूम बच्चे तक चल बसते हैं. यह नैतिकता की दृष्टि में अपराध है. यद्यपि जंगल में उत्तरजीविता के नियम के चलते यह स्वाभाविक अवस्था है. अनविन इसके लिए दिव्यता सूचकांक को 0.1 अंक देता है.
  4. आध्यात्मिक अनुभूतियां/अंतःप्राकृतिक चमत्कार : जैसे पूजा-पाठ, प्रार्थना, अंतरानुभूति आदि. जिससे मनुष्य को अपने अंतर्मन में झांकने से शांति की अनुभूति होती है(द=2).
  5. धार्मिक अनुभूतियां : स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित कर देने के बाद इस प्रकार की अनुभूतियां कथित रूप से साधक को होती रहती हैं. अनविन इसे भी 2 अंक देता है.
  6. पुनर्जीवन /पराभौतिक चमत्कार : धर्म की नींव मृत्यु पश्चात सुख की लालसा पर टिकी हुई है. अधिकांश धर्मों में माना गया है कि मनुष्य मरने के बाद पुनः जन्म लेता है. इस चमत्कारपूर्ण धारण को अनविन अपने दिव्यता सूचक पैमाने पर मात्र 1 अंक देता है.

उपर्युक्त दिव्यता सूचकांकों को वह अपने सूत्र अलग-अलग रखकर गणना करता है. तदनुसार—‘ईश्वर के होने की प्रायिकता 67 प्रतिशत सिद्ध होती है.’ आगे वह जोर देकर कहता है, ‘यह संख्या व्यक्तिपरक है. इसलिए कि यह मेरे निजी साक्ष्यों के आकलन पर आधारित है.’ उदारता का प्रदर्शन करते हुए वह कहता है कि सूचकांकों को प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने हिसाब से आकलित कर सकते हैं. मगर उस अवस्था में अनविन का सूत्र लड़खड़ा जाता है. ‘साइंटिफिक अमेरिकन’ पत्रिका के जुलाई 2004 अंक में प्रकाशित एक आलेख में Skeptic के प्रकाशक मिशेल शर्मर अनविन के दिव्यता सूचकांकों को 1 से 10 अंक अपनी ओर से देते हैं. फिर उसी सूत्र के आधार पर ईश्वर की संभाव्यता का आकलन करते हैं, तो वह घटकर मात्र 2 प्रतिशत रह जाती है. एक अन्य गणना का उल्लेख पुस्तक की आलोचना के दौरान बा॓ब सीडेंस्टकर ने अपने लेख ‘कंप्यूटिंग दि प्रोबेबिलिटी आ॓फ गा॓ड’ में किया है. बा॓ब अनविन के दिव्यता सूचकांक में जैसे ही ऐच्छिक मान रखता है, ईश्वर की संभाव्यता और भी घटकर नगण्य(10—16) तक रह जाती है.

स्पष्ट है कि अनविन का आकलन उसकी व्यक्तिगत धारणा की अभिव्यक्ति है. हालांकि उसने कभी दावा नहीं किया कि वह ईश्वर को वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित कर रहा है. और कोई भी उसको जांचकर वैसे ही निष्कर्ष पर पहुंच सकता है, जैसा कि दूसरे वैज्ञानिक प्रयोगों में होता है. इस पुस्तक को एक-दो को छोड़कर अधिकांश आलोचकों ने मजाक के रूप में लिया है. उनके अनुसार यह पुस्तक गणित के लिए पढ़ी जा सकती है, मनोरंजन के लिए पढ़ी जा सकती है, यदि आप ईश्वर के अस्तित्व पर भरोसा करते हैं, तब थोड़ी-बहुत तसल्ली के लिए पढ़ी जा सकती है. लेकिन यदि आप किसी दार्शनिक समस्या का समाधान इससे चाहते हैं, तब वह व्यर्थ की कवायद सिद्ध होगी. पुस्तक के समीक्षकों में से एक हेमंत मेहता लिखते हैं—‘पढ़ने में मजेदार. वैचारिकी का आश्चर्यजनक प्रयोग….अनविन को ऐसे लोगों की ओर खड़ा कर देता है, जिनका गणित से कोई वास्ता नहीं है.’ अनविन अपनी धारणाओं को लादने के लिए गणित का सहारा लेता है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर बच निकलने का रास्ता भी तैयार रखता है. यह कोशिश कृति को मनोरंजक प्रयोग से आगे नहीं बढ़ने देती. बा॓यस के सूत्र का उपयोग चिकित्सा से लेकर अपराध-जांच तक कहीं भी किया जा सकता है, जहां प्रायिकता को बढ़ाने के लिए ठोस साक्ष्य उपलब्ध हों. जबकि अनविन के दिव्यता सूचकांक का कोई तार्किक आधार नहीं है. वह केवल उसकी मनोरचना है, जिसे उसने बेहिचक स्वीकारा भी है. उल्लेखनीय है कि विज्ञान को धर्म से जोड़ने अथवा धर्म और विज्ञान का साम्य दिखाने की कोशिश करनेवाले अनविन अकेले नहीं हैं. इस विषय पर पिछली दशाब्दियों में और भी पुस्तकें आई हैं. उनमें स्टीवन ब्रम्स की ‘सुपीरियर बीईंग्स : इफ दे एक्जिस्ट’, रिचर्ड दाकिन की ‘दि गार्ड डिल्यूजन’ आदि प्रमुख हैं. इनमें किसी न किसी प्रकार ईश्वर के विचार को विज्ञान से जोड़ने की असफल कोशिश की गई है.

अनविन के इस आत्मपरक लेखन के कई सामाजिक पहलु भी हैं. दिव्यता सूचकांक में शुभता को ईश्वर में स्थापित करना मनुष्यता के रास्ते अवरुद्ध करने जैसा है. आज हम पूंजीवादी अर्थतंत्र पर आरोप लगाते हैं कि उसने मनुष्य को भौतिकवादी बना दिया है. इतना स्वार्थी बना दिया है कि मनुष्य को सिवाय अपने सुख के, भोग और स्वार्थ-लिप्सा के कुछ भी नजर नहीं आता. इसी आधार पर अपसंस्कृतिकरण का रोना भी रोया जाता है. उस समय हम भूल जाते हैं कि जिसे हम बाजारवाद की देन बताते हैं, वैसी स्वार्थपरता, अकेले-अकेले सुख पाने की कामना का उपदेश तो धर्म सहस्राब्दियों से देता आया है. धर्म की ओर प्रवृत्त करने के लिए गुरु आमतौर पर अपने शिष्यों को समझाता है—‘यह संसार माया है. इसमें कोई भी तुम्हारा अपना नहीं है. भाई, बहन, पत्नी, माता-पिता, सभी से तुम्हारा स्वार्थ का नाता है. वे भी तुमसे स्वार्थ से बंधे हैं. कोई तुम्हारा साथ नहीं देने वाला. इसलिए यदि स्वर्ग का सुख पाना है, तो इस मोह-ममता को त्याग कर परमात्मा की शरण में आ.’ थोड़े-बहुत फेरबदल के साथ गीता में कृष्ण ने यही कहा है. गीता निष्काम कर्म का संदेश देकर उसे संतुलित करने का प्रयास करती है. केवल अपने लिए सुख-समृद्धि और स्वर्ग की कामना, अनेक बार मनुष्य को सामाजिक दायित्वों की ओर से उदासीन बनाकर, घोर स्वार्थी आचरण की ओर प्रवृत्त कर देती है. दूसरे केवल अपने सुख की कामना तथा स्वार्थसिद्धि के लिए काम करना, सामाजिक नैतिकता को बिसार देना है. यह भुला देना है कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है. भले ही वह समाज में अपने सुख और सुरक्षा के लिए शामिल हुआ हो, समाज के प्रति उसकी भी पर्याप्त जिम्मेदारियां हैं. प्रकट में प्रत्येक धर्म अपने माता-पिता, पड़ोसी, मित्र-सखा के प्रति उदारतापूर्वक पेश आने की सलाह देता है. लेकिन मोक्ष एवं कल्याण के नाम पर वही धर्म संसार को माया और विभ्रम बताकर मनुष्य को ऐसी अंध-स्पर्धा से जोड़ देता है, जिसकी अति उसे सामाजिक कर्तव्यों की ओर से उदासीन बनाती है. इसलिए हम देखते हैं कि भारत जैसे समाजों जहां सामान्य नैतिकता को भी धर्म के भरोसे छोड़ दिया जाता है, नागरिकबोध बहुत कम होता है. पूरा समाज एक भीड़ के आचरण को अपने स्वभाव का हिस्सा बना लेता है.

फिर एक अवैज्ञानिक कार्य को विज्ञान जितना महत्त्व दिए जाने का कारण? दरअसल, आस्तिक को उतना डर धर्म, ईश्वर या पापकर्म से नहीं लगता, जितना नास्तिक से लगता है. उस विचार से लगता है, जो ईश्वर को नकारता है. इसलिए जब भी वह किसी नास्तिक को देखता है, नकलीपन का एहसास उसे कचोटने लगता है. वह उसे बार-बार उकसाता है—‘अरे! यह ईश्वर को नहीं मानता! अगर नहीं मानता तो जीवित कैसे है?’ सामंती समाजों के देवता और भी बड़े सामंत होते हैं. देवत्व की अवमानना करने, यहां तक कि प्रसाद तक न खाने अथवा प्रसाद लेकर उसको खाना भूल जाने से भी उनकी त्योरियां चढ़ जाती हैं. आस्तिक यही सोचकर हैरान होता है कि ऐसे कोपवंत देवताओं के चलते उनके अस्तित्व को नकारनेवाला धरती पर सुरक्षित कैसे है? जरूर वह दिखावा करता है. अगर यह सचमुच ईश्वर को नकारता है तब तो ईश्वर का कोप उसे सताएगा ही. उस समय मैं भी इसका साथी न मान लिया जाऊं? ऐसे न जाने कितने अनजाने भय उस व्यक्ति को घेर लेते हैं. पक्ष में दिखने के लिए वह ईश्वर पर सवाल उठाने की संभावना को ही धिक्कारने लगता है. फिर चाहे कोई कितना ही कहे कि वह नास्तिक है—वह विश्वास ही नहीं करता. लोग यह मानने को तैयार ही नहीं होते कि नास्तिक होना भी भारतीय दर्शन-परंपरा का हिस्सा है. उस समय सौ में से अस्सी का एक ही जवाब होता है—‘हं…हं! नास्तिक में भी तो अस्तिः(नः+अस्तिः) छिपा हुआ है. उस समय कोई लाख तर्क दे कि ‘‘भइया, ‘अस्तिः’ को नकारने के लिए ही ‘नः’ उपसर्ग लगाया गया है.’’—बात उनके गले नहीं उतरती. जिद पर कायम रहने के लिए ईश्वरवादियों के रटे-रटाए तर्क होते हैं. उनके दिमाग की सुई हजार-दो-हजार साल पहले के समय पर अटकी होती है, जब साम्राज्यवादी लालसा में दर्शन का धार्मिकीकरण कर मनुष्य के सहजबोध को उससे बांध दिया गया था.

ईश्वरवादियों का दूसरा तर्क होता है, इस दुनिया को किसी ने तो बनाया है! वही शक्ति ईश्वर है. फिर ईश्वर को किसने बनाया है? ईश्वर को भला कौन बनाएगा? वह तो अनादि-अनंत और सर्वशक्तिमान है. यही बात हम इस सृष्टि के लिए कहें तो? कार्य-कारण का उनका नियम ईश्वर तक जाकर ठहर जाता है. उससे पीछे ले जाने में उनके पसीने छूटने लगते हैं. यदि उनपर जोर डाला जाए, कहा जाए कि यदि ईश्वर अनादि-अनंत हो सकता है तो सृष्टि क्यों नहीं? यदि ब्रह्मांड का विस्तार ही कल्पनातीत है तब उसके कथित निर्माता की कल्पना कैसे संभव है? उस समय बहस से कन्नी काटते हुए वे सृष्टि को ही ईश्वर मान लेंगे. यानी चिपके अपनी बात से रहेंगे. डरे हुए लोग ठहरे. उनका डर उनके किस पापबोध की परिणति है, वे जानें. विज्ञान और धर्म के रास्ते एकदम अलग हैं. विज्ञान संदेह का रास्ता है. ईश्वर आस्था का मसला. दिमाग की सुई एक जगह ठहर जाए, तब आदमी धार्मिक कहलाता है. उदाहरण के लिए इन दिनों भारत की ओर से भेजा गया मंगलयान रास्ते में है. सब कुछ ठीक ठाक रहा तो अगले कुछ दिनों में मंगल की कक्षा में होगा. मान लीजिए उस यान को किसी सुदूर ग्रह पर बैठा ऐसा व्यक्ति देखे जिसके दिमाग की सुई रामायण काल पर अटकी हुई है तो वह यही कहेगा—देखों धरती से फेंगी गई पवनपुत्र हनुमान की गदा आसमान में उड़ रही है.’ ऐसे ही दूसरा व्यक्ति जो किसी कारणवश महाभारत युग पर अटका हुआ है, उसे भीम की गदा बताएगा. इसे आप मजाक की तरह भी ले सकते हैं. लेकिन अशोक की लाट को भीम की गदा बतानेवाले लोग भी इसी देश-समाज में होते आए हैं.

अतिप्राचीन समाजों में धर्म की चाहे जो प्रासंगिकता रही हो, आज वह सामाजिक भेदभाव और ऊंच-नीच का कदाचित सबसे बड़ा मददगार है. शीर्षस्थ वर्गों के साम्राज्यवादी मंसूबों ने धर्म को राजनीति और समाज में प्रासंगिक बनाए रखा. करीब ढाई-तीन हजार वर्ष पहले यह महसूस किया जाने लगा था कि छोटे-छोटे राज्यों से काम नहीं चलनेवाला. हमलावर दुश्मनों से सुरक्षा के लिए बड़ी ताकत बनना होगा. ऐसे में धर्म ने आसंजक और संसजक दोनों का काम किया. इस अवधि में कुछ अच्छे परिणाम भी धर्म के कारण देखने को मिले. भौतिकता की आड़ के रूप में वह अनेक व्यक्तिगत और सामाजिक तनावों को कम करने का माध्यम बना है. धर्म का औचित्य बनाए रखने के लिए उसको नैतिक मूल्यों से जोड़ा गया था, लेकिन बाद में उन्हें धर्म का पर्याय बताना आरंभ कर दिया. उसकी सबसे बड़ी भूमिका सामजिक-आर्थिक और राजनीतिक विभाजन को शास्त्रीय रूप देने में रही, जिससे कालांतर में बड़े आर्थिक-सामाजिक विभाजनों को जगह मिली. धर्म का अतिवादी रूप महाभारतकाल में भी दिखाई पड़ता है, जब आर्यवर्त पर एकक्षत्र राज्य कायम करने के लिए कृष्ण चतुराई पूर्वक समस्त आर्यवर्त के राजाओं को परस्पर लड़वा देते हैं. सभी छोटे-बड़े राजा खेत रहते हैं. कौरवों को पराजित कर, देर-सवेर पांडव भी महाप्रयाण पर चले जाते हैं. आगे चलकर कुछ ऐसी ही कोशिश चाणक्य के नेतृत्व में नजर आती है.

सवाल है कि यदि कि विज्ञान ही सबकुछ है तो जीवन, मृत्यु जैसे प्रश्न अनुत्तरित क्यों हैं. इसके अलावा भी ऐसे अनेकानेक प्रश्न हैं जिनका उत्तर विज्ञान नहीं दे पाया है. लेकिन विज्ञान ने कभी दावा भी नहीं किया कि उसने सबकुछ जान लिया है. धार्मिक प्रवृत्ति के लोग दुनिया के सारे ज्ञान को परमात्मा में अवस्थित मान लेते हैं. धीरे-धीरे अधिकांश के लिए यह परमात्मा को प्रसन्न रखने का कर्मकांड बन जाता है. धीरे-धीरे वह सुबह-शाम की आरती में सिमट जाता है. ऐसे आस्थावादी समाज में लोग 24—25 पृष्ठ रटकर सत्यनारायण की कथा सुनाने वाले पुरोहित को ‘पंडित’ मान लें, तो आश्चर्य कैसा! वैज्ञानिक को अपने ज्ञान का कभी गुमान नहीं होता. सच्चा वैज्ञानिक भली-भांति जानता है कि उसका अज्ञान उसके ज्ञान कहीं अधिक बड़ा है. इसलिए वह निरंतर और जानने के लिए प्रयासरत रहता है. अपने ही ज्ञान पर निरंतर संदेह करता है. इसी में उसकी सिद्धि है. इसके लिए विज्ञान की आलोचना करना उचित नहीं. अनसुलझे सवालों के उत्तर की खोज के लिए वैज्ञानिकों को पर्याप्त समय देना होगा. यूं भी सृष्टि की उम्र छोडि़ए, पृथ्वी की आयु के समक्ष भी विज्ञान की उम्र शिशु जितनी नहीं है. इस बारे में अमेरिकी लेखक हावर्ड बूस फ्रेंकलिन ने एक मजेदार उदाहरण दिया है—

‘‘पृथ्वी की उम्र लगभग साढ़े चार अरब है. हिम युग को पूरी तरह समाप्त हुए लगभग 10000 साल हुए हैं. तदनुसार पृथ्वी की उम्र हिम युग बीतने की अवधि के लगभग 4,50,000 गुना अधिक है. इसे समझने के लिए हम एक तस्वीर की कल्पना करते हैं. हम मान लेते हैं कि पृथ्वी की उम्र 45,000 फुट के समतुल्य है ठीक उतनी ही जिसपर कोई जेट वायुयान उड़ान भर सकता है. उस पैमाने पर यदि हिम युग की अवधि को दर्शाया जाए तो वह मात्र 1.2 इंच को दर्शाएगा. अब यदि आधुनिक विज्ञान के अवधि, जब उसने तकनीक और प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में कदम रखा, मात्र 200 वर्ष पुरानी घटना है. वह हमारे पैमाने पर मात्र 0.024 की ऊंचाई को दर्शाएगी. यह इतनी बारीक रेखा होगी, जैसे मामूली बाल पाइंट पेन द्वारा खींची गई रेखा की मोटाई.’’

सत्य से परे होने के बावजूद मैं अनविन के प्रयासों की सराहना करूंगा. उन्होंने ईश्वरत्व को गणित के आधार पर आकलित करने का विचार तो दिया. आगे और लोग भी आएंगे. जिसके फलस्वरूप पारंपरिक धर्म ने अपने चारों ओर जो बाड़ें लगाई हैं, वे कमजोर होंगी; तथा धर्म की वैज्ञानिकता पर बहस का सिलसिला आगे बढ़ेगा. तब शायद लोग महाभारत के इस सत्य को स्वीकारने को राजी हो जाएं—

गुह्यं ब्रह्म तदिदं वो ब्रीवीमि। न हिं मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचितः। (महाभारत, शांतिपर्व, 299/20)—एक बात बताता हूं, संसार में मनुष्य से श्रेष्ठ, मनुष्य के लिए मनुष्य से उपयोगी कुछ भी नहीं है. सच मानिए, ईश्वर भी नहीं.

[पुनश्चः: मुझे एक बात जानकर हैरानी होती है कि धर्म के नाम पर, अपने समय के शीर्षस्थ महारथियों, अठारह अक्षौहिणी सेना, देवता-राक्षस तथा यादव कुल का विनाश लिख देने के पश्चात महाभारतकार ने कानाफूसी के अंदाज में ही क्यों कहा कि ‘इस संसार में मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है.’ युद्ध में अपनों से लड़ाई छेड़ने के लिए अर्जुन को उकसानेवाले कृष्ण भी इस ‘परमसत्य’ को लोगों से छिपा ले जाते हैं और गीता इससे वंचित रह जाती है. अगर यह उपदेश पहले ही दे दिया होता तो क्या युद्ध होता? प्रजा यदि जानती कि मनुष्य के लिए एकमात्र श्रेष्ठतम मनुष्य है तो क्या वह दूसरों के कहने पर अपनों का गला काटने को तैयार होती? हरगिज नहीं! दरअसल शिखर पर विराजमान लोगों के लिए केवल वही मनुष्य होते हैं, जो उनके सगे या सत्ता के आसपास होते हैं. बाकी या तो सेवक होते हैं अथवा प्रजा. वे सुन न लें, इसलिए अच्छी बात हमेशा चुपके-चुपके कानाफूसी के अंदाज में, केवल अपनों के बीच कही जाती है, और उकसाने की जरूरत आ पड़े तो ‘धर्म-धर्म चिल्लाया जाता है.]

© ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com

विचारहीन क्रांति का दिशाहीन अंत

सामान्य

अन्ना हजारे तथा उनके साथियों से उम्मीद पहले भी कम थी. आस थी तो बस इतनी कि अपने आंदोलन के माध्यम से वे इस देश के आमजन को लोकतंत्र की ताकत याद दिलाने तथा उसकी सैद्धांतिकी से रूरू करने का काम करेंगे. इसलिए कि स्वाधीन भारत में आमजन के लोकतांत्रिक प्रशिक्षण के प्रयास बहुत कम, लगभग ‘न’ के बराबर हुए हैं. इस बीच आमजन ने अपने मताधिकार के आधार पर कुछ प्रबुद्ध निर्णय लिए तो उसका प्रमुख कारण उसके मानस में स्वाधीनता आंदोलन की अवशेष स्मृतियां थीं. इस देश को स्वाधीनता प्राप्ति के लिए बहुत लंबा, अनथक संघर्ष करना पड़ा था. वास्तविक सफलता गांधीजी के आजादी की लड़ाई में उतरने के बाद तब संभव हो पाई, जब उन्होंने आमजन को आंदोलन से जोड़ा. भारतीय स्वाधीनता संग्राम में गांधी और आंबेडकर के नेतृत्व वाले बाद के तीस वर्ष बहुत महत्त्व रखते हैं. यही वह कालखंड हैं जिसमें इस देश के आमजन यानी किसान, मजदूर, दस्तकार तथा शोषितउत्पीड़ित जन ने स्वतंत्रता, समानता और सम्मान की लड़ाई में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था. उसका अहिंसक जनसंघर्ष विश्वइतिहास में अनूठा था. उससे जनसाधारण को पहली बार अपनी ताकत और पहुंच का एहसास हुआ था. पहली बार उसको लगा था कि स्वार्थी सत्तासीन वर्गों पर भरोसा न करते हुए, अपनी मुक्ति का बीड़ा उसे स्वयं उठाना चाहिए. यही उसने किया भी, जिसका सुफल आजादी और लोकतंत्र के रूप में सामने आया.

 स्वाधीनता पूर्व की यह लोकचेतना आजाद भारत में राष्ट्रीय चेतना का रूप ले सके, इसके लिए सरकारी तथा गैरसरकारी स्तर पर बड़े कार्यक्रमों की आवश्यकता थी. आजादी के बाद ऐसी ईमानदार कोशिशें, बहुत कम, लगभग ’न’ के बराबर हुई हैं. इसके प्रमुख कारणों में पहला तो यह कि देश की आजादी अपने साथ विभाजन की त्रासदी को लेकर आई थी. इस कारण स्वाधीनता आंदोलन जिसने एकराष्ट्र के सिद्धांत के आधार पर जन्म लिया था, बहुत आसानी से और जल्दी ही द्विराष्ट्र के औचित्यअनौचित्य संबंधी बहसों में उलझ गया. इससे समाज में सांप्रदायिक विद्वेष पनपा, जिसका फायदा उन अलगाववादी सांप्रदायिक ताकतों ने उठाया, जिन्हें लोकतंत्र में कोई विश्वास न था. जो धार्मिकसांस्कृतिक पुनरुत्थान के नाम पर पुरातनपंथी सामंती संस्थाओं को वापस लाना चाहती थीं. हैरानी की बात तो यह है कि आमजन के कंधों पर सवार होकर सफलता की ओर सतत अग्रसर कांग्रेस के बड़े नेताओं में भी लोकतांत्रिक चेतना का अभाव था. स्वयं गांधी जी ’रामराज्य’ के बहाने पुरानी ग्रामीण शासन प्रणाली को चुस्त करना चाहते थे, जो लोकतंत्र की आधुनिक सैद्धांतिकी से कोसों दूर थी. उनके अनन्य शिष्य कहे जाने वाले विनोबा, जिनके बारे में माना जाता है कि ‘गांधीवाद’ के प्रति उनकी निष्ठा गांधीजी से भी ज्यादा दृढ़ थी, तो लोकतंत्र के कटु आलोचकों में थे. पुरी सर्वोदयसम्मेलन में वे इसका जमकर मखौल उड़ाते हैं

 ‘हम सुझाते यह हैं कि हमारे जो भाई भिन्नभिन्न संस्थाओं में हैं, वे यह कोशिश करें कि जिसको वे अहिंसात्मक, रचनात्मक कार्य समझते हैं, वे उन संस्थाओं के प्रधान हो जाएं और बाकी बातें गौण हो जाएं. चुनाव को कितना भी महत्त्व क्यों न दिया जाए, आखिर वह ऐसी चीज नहीं है कि उससे समाज के उत्थान में हम कुछ मदद पहुंचा सकें. वह ‘डेमोक्रेसी’ में खड़ा किया हुआ एक यंत्र है, एक फारमल डेमोक्रेसी, एक औपचारिक लोकसत्ता आई है. वह मांग करती है कि राजकार्य में हर मनुष्य का हिस्सा होना चाहिए. इस वास्ते हर एक की राय पूछनी चाहिए और मतों की गिनती करनी चाहिए. यह तो हर कोई जानता है कि ऐसी कोई समानता परमेश्वर ने पैदा नहीं की है कि जिसके आधार पर एक मनुष्य के लिए जितना एक वोट है, उतना ही दूसरे मनुष्य के लिए भी हो, इस बात का हम समर्थन कर सकें. ऐसी कोई योजना ईश्वर ने भी नहीं की. लेकिन यह स्पष्ट है कि पंडित नेहरू को एक वोट है, तो उनके चपरासी को भी एक ही वोट है, इसमें क्या अक्ल है, हम नहीं जानते.’ (शक्ति सत्ता में नहीं, लोकसेवा मेविनोबा, 25 मार्च 1655 को दिया गया भाषण, राजनीति से लोकनीति की ओर, पृष्ठ 20)

 ऊपर विनोबा सर्वोदयी कार्यकर्ताओं को विभिन्न संस्थाओं के शीर्षपद पर कब्जा कर लेने का आवाह्न करते हैं. बिना किसी चुनाव या नैतिकता के. विनोबा के अलावा उनके सहयोगियों में दादा धर्माधिकारी, धीरेंद्र मजूमदार, शंकरराव देव जैसे तत्कालीन कांग्रेसी, जिन्हें कांग्रेस में विचारवान नेता होने का गौरव प्राप्त था, भी संसदीय लोकतंत्र के आलोचकों में थे. स्वयं गांधीजी की वर्णाश्रम धर्म में आस्था उन्हें पूर्ण लोकतांत्रिक होने से रोकती थी. इसके बावजूद यदि देश में लोकतंत्र को जगह मिली तो इसलिए कि वह समय पूरी दुनिया में बदलाव का था. साम्राज्यवादी लालसा के रूप में दुनिया दो विश्वयुद्ध झेल चुकी थी, जिसकी परिणति हिरोशिमा और नागाशाकी की तबाही के रूप में सामने आई थी. इससे भी ज्यादा अहम् था, डा॓. आंबेडकर के नेतृत्व में दलित चेतना का उभार. नई शिक्षा के आलोक में सहस्राब्दियों से शोषितउत्पीड़ित पिछड़े जन अपने विकास तथा आत्मसम्मान हेतु सत्ता में भागीदारी चाहते थे. उनकी भावनाओं को नकारने का मतलब था, देश के बड़े वर्ग के भविष्य को फिर सामंती ताकतों के हवाले कर देना. प्रकारांतर में एक और विभाजन. कहने का आशय है कि आजाद भारत के लिए लोकतंत्र कांग्रेस या गांधी की देन न होकर परिस्थितियों के अनुसार अपरिहार्य हो चुका था. किसी भी नेता के लिए उसकी उपेक्षा कर पाना संभव नहीं रह गया था.

 लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक था कि आजादी पूर्व की लोकचेतना राष्ट्रीय चेतना का रूप ले सके, ताकि इस इस देश में मतदाताओं को जाति, धर्म, सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयता जैसे अलगावकारी मुद्दों के आधार पर बांटा न जा सके. आजादी के बाद ऐसी ईमानदार कोशिशें ‘न’ के बराबर हुई थीं. परिणामस्वरूप भारतीय लोकतंत्र पूंजी, जातीयता, क्षेत्रीयता, दलगत स्वार्थपरता और सांप्रदायिकता का शिकार होकर अपने लक्ष्य से भटकता गया. अन्ना हजारे के आंदोलन से मामूली उम्मीद थी तो बस इतनी कि शायद यह आंदोलन, गांधीवाद की पुरानी सीमाओं का उत्क्रमण करते हुए वह लोकतांत्रिक चेतना के विस्तार के लिए सचमुच कार्य करेगा. आखिर देश में संसदीय लोकतंत्र अपने साठवें वर्ष में था. इस अवधि में उसने कई सफलताएं अर्जित की थीं. उम्मीद थी कि अन्ना हजारे के विचारों से प्रेरित होकर चुनावों में एक भीड़ की तरह व्यवहार करने वाली जनता, भविष्य में प्रबुद्ध संगठित निर्णायक लोकशक्ति होने के आत्मविश्वास से लैस होकर व्यवहार करेगी. राजनीति में कुलीनतावाद का जो नया दौर पनपा है, उसपर लगाम लगेगी. आंदोलन की शतप्रतिशत सफलता का विश्वास तो कभी था ही नहीं.

 इस अविश्वास के पीछे टीम अन्ना का दुराग्रही रवैया था. पिछला अगस्त आंदोलन टीम अन्ना ने केवल जनलोकपाल के मुद्दे पर चलाया था. उसको आंदोलन को युवाओं का भरपूर समर्थन प्राप्त हुआ था. परंतु इसलिए नहीं कि वे भ्रष्टाचार से सचमुच आजिज आ चुके थे और अवसर मिलते ही उसकी बांह मरोड़ने को कृतसंकल्प थे. भ्रष्टाचार और जातिप्रथा इस देश की ऐसी दो कुरीतियां हैं जिससे इस देश की जनता पूरी तरह अनुकूलन कर चुकी है. बल्कि देखा जाए तो जातिप्रथा स्वयं एक बड़ा सामाजिकसांस्कृतिक भ्रष्टाचार है जो किसी व्यक्ति की योग्यता को जांचेपरखे बिना, केवल जन्म के आधार पर उसे विशिष्ट सुविधाओं का अधिकारी बना देता है. भ्रष्टाचरण की सुविधाजनक परिभाषा गढ़ते हुए उसको केवल आर्थिक स्वार्थपरता तक सीमित कर दिया गया, जिसपर रोकथाम के लिए वर्तमान कानूनों में ही पर्याप्त प्रावधान है. उसमें कामयाबी नहीं मिल पाती तो इसलिए कि अधिकांश लोग भ्रष्टाचार को लेकर दोहरे मापदंड के शिकार हैं. ज्यादातर को भ्रष्टाचार से शिकायत सिर्फ इसलिए है कि वे उसके अवसरों से वंचित हैं. ऊंचे पदों पर विराजमान शक्तियों में अपनेअपने स्वार्थ को लेकर समझौता है. वे एकदूसरे के भ्रष्टाचार पर पर्दा डाले रखती हैं.

 उचित होता कि टीम अन्ना भ्रष्टाचार तथा दूसरे मुद्दों की उपयोगिता पर व्यापक बहस चलाती. इसके बावजूद अगस्त आंदोलन केवल ‘जनलोकपाल’ लाने की जिद तक सिमटा रहा. हाल का आंदोलन भी तथाकथित भ्रष्ट मंत्रियों को सजा दिलवाने के लिए विशेष जांच दल गठित करने की मांग से आगे नहीं बढ़ पाया. इससे जाहिर होता है कि स्वयं अन्ना हजारे और उनके साथियों का मौजूदा लोकतांत्रिक संस्थाओं पर संदेह है. उल्लेखनीय है कि टीम अन्ना को अगर इन मंत्रियों के भ्रष्टाचार से सचमुच अत्यधिक पीड़ा है तो वह इनके विरुद्ध न्यायालय में जा सकती थी. उसके सदस्यों में दो इस देश के वरिष्ठ और जानेमाने वकील हैं, जो सरकार को वैधानिक तरीके से चुनौती पेश कर सकते थे. अगस्त आंदोलन की सफलता को दोहराने के मोह में उन्होंने आंदोलन का रास्ता चुना, जो सरकार की हठधर्मी के कारण विफल सिद्ध हुआ.

टीम अन्ना के अनुसार वह लोकशक्ति को जागरूक करना चाहती है. लेकिन उसकी सीमा है कि वह समाज के सभी वर्गों विश्वास जीतने में असफल रही है. अगस्त आंदोलन की कामयाबी के पीछे एक सच यह भी था कि उसके साथ आरक्षण व्यवस्था से स्वयं को घाटे में समझने वाला युवावर्ग उत्साहपूर्वक जुड़ा था. जनांदोलन के नाम पर दबाव की राजनीति उसके लिए लिटमस टेस्ट की तरह थी. यदि उस आंदोलन में अन्ना पूरी तरह कामयाब हो पाते तो निश्चय ही वह वर्ग ऐसे किसी आंदोलन का प्रयोग दबाव की राजनीति के रूप में आगे भी करता. इस मुद्दे को लेकर टीम अन्ना का सोच क्या है यह तो वही जाने, लेकिन वह अपने समर्थन में उतरे उन युवकों के मन को समझ रही थी, इसलिए जनलोकपाल आंदोलन से देश के सभी वर्गों को जोड़ने की अपील अगस्त आंदोलन के सबसे अंतिम दिन, बहुत ही दबे मन से की गई थी. तब तक दलित वर्ग रामलीला मैदान में उमड़ी युवाओं की भीड़ के मन को समझ चुका था. मन में शंका लिए वह निरंतर अन्ना के आंदोलन से कटता चला गया.

 टीम अन्ना को चाहिए था कि वह उस अविश्वास को दूर करने का प्रयास करती. लेकिन विचारहीनता के संकट और दूरदृष्टि की कमी में उलझी टीम अन्ना अपनी नीति स्पष्ट न कर सकी. रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के समर्थन में उमड़ी भीड़ को देख सरकार आंदोलन के दबाव में जरूर नजर आई थी, लेकिन बाद में कूटनीतिक तरीके से उसने जनलोकपाल को ठंडे बस्ते में डाल दिया. साथ ही फेसबुक पर होने वाली अनर्गल, भड़ासनुमा टिप्पणियों की रोकथाम के लिए उसने कानून का सहारा लिया. फलस्वरूप छद्म पहचान के जरिए अनर्गल टिप्पणियां करने वाला समूह, जो अगस्त आंदोलन में सक्रिय था, फेसबुक से नदारद होने लगा.

अब जब टीम अन्ना सक्रिय राजनीति में जाने की घोषणा कर चुकी है तो एक बार फिर उसकी निष्ठा और वैचारिक प्रतिबद्धता को लेकर सवाल उठाए जाएंगे. इसलिए कि देश में नेताओं की कमी नहीं है. टीम अन्ना को अपने आंदोलन के लिए कार्यकर्ता मिलें न मिलें, चुनावों में मतदाताओं के लिए उसको भले ही तरसना पड़े, लेकिन नेताओं की उसके पास कमी नहीं होगी. एक बार आवाह्न करने की देर है, हजारों लोग उसके बैनर के नीचे चुनाव लड़ने को खड़े होंगे. अपनीअपनी ईमानदारी की तख्ती उठाए, आत्ममुग्ध और बड़ेबड़े प्रशस्तिपत्र हाथ में लिए. उस समय टीम अन्ना किस आधार पर निर्णय लेगी! कैसे उनमें से सत्यनिष्ठ और प्रतिबद्ध नेताओं को खोज निकालेगी, यही उसकी सफलता की कसौटी होगी. आज विधायकी का चुनाव लड़ने के लिए भी कम से कम तीसचालीस लाख की जरूरत पड़ती है. उनके लिए धन कहां से लाएगी. अभी तक जो कारपोरेट घराने उसकी आर्थिक मदद करते आए हैं, राजनीति में आमनेसामने होने पर वे कितने सहायक होंगे, यह आने वाला समय ही बताएगा.

 ऐसा नहीं है कि अच्छे लोग चुनाव मैदान में आते ही नहीं हैं. किशन पटनायक, प्रकाश झा जैसे प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता चुनावों में उतरते ही रहे हैं. लेकिन लोकप्रिय राजनीति पर पकड़ न होने के कारण उनकी उपस्थिति केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाती है. इसके लिए टीम अन्ना कौनसे हथकंडे अपनाएगी, यह तो वही जाने, फिलहाल उसके सामने अपने उद्देश्य की प्रामाणिकता और लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता को दर्शाने की बड़ी चुनौती होगी. इससे भी बड़ी चुनौती होगी, स्पष्ट विचारधारा, ठोस एजेंडे और सार्थक विकल्प के साथ जनता के सामने उपस्थित होने की, जिससे वह अभी तक बचती रही है. फिलहाल तो टीम अन्ना का आंदोलन दिशाहीन हो, बिखर गया लगता है.

 © ओमप्रकाश कश्यप

इस आंदोलन को सफल होना ही चाहिए

सामान्य

अन्ना हजारे गांधी नहीं हैं. पर वे अच्छे उद्देश्य के लिए अड़ जाने वाले नेता हैं. ऐसे व्यक्ति उन चुनौतियों को आसानी से पार करने में सफल हो जाते हैं, जहां लक्ष्य का एका हो तथा समूह की बागडोर पूरी तरह अपने हाथों में हो. जहां बहुत से शक्तिकेंद्र हों, उलझावभरी, जटिल सत्तासंरचना हो, जहां मौजूद लोगों में अधिकांश का उद्देश्य महज स्वार्थसिद्धि हो, ऐसे लोगों को सही रास्ते पर लाने के लिए जैसा बुद्धिचातुर्य तथा रणनीतिक कौशल चाहिए, उसका उनमें अभाव है. इसलिए यह संघर्ष अन्ना हजारे और सरकार के बीच न होकर टीम अन्ना और सरकार के बीच है. टीम अन्ना के दूसरे सदस्य अरविंद केजरीवाल राजनीति के क्षेत्र में व्याप्त अराजकता, अनैतिकता, अनाचार तथा भ्रष्टाचार से आहत, भावुक और संवेदनशील इंसान दिखते हैं. कई बार वे अपने जज्बात पर काबू नहीं रख पाते. किरन बेदी ने अपनी छवि सख्त पुलिस अधिकारी की बनाई थी. बाद में प्रशासन से पटरी न बैठ पाने के कारण वे नौकरी से इस्तीफा देकर समाज सेवा के क्षेत्र में गईं. उन्हें वहां प्रतिष्ठा भी मिली. परंतु कुछ अति उत्साह, कुछ उनकी गलती से सरकार उनकी छवि को दागदार करने में कामयाब रही है. इकानॉमी क्लॉस में यात्रा करके, बिजनिस क्लॉस का किराया लेना उनकी नैतिकता पर सवाल बनकर आया. इससे भी भारी पड़ा था रामलीला मैदान में किरन बेदी छाप प्रहसन, जिसने उनकी गंभीरता को सवालों के घेरे में ला दिया. शांति भूषण और प्रशांत भूषण पितापुत्र का योगदान आंदोलन से जुड़े कानूनी मुद्दे देखना है. अभी तक उन्होंने अपनी भूमिका का सफल निर्वाह किया है. पिछले वर्ष अगस्त आंदोलन में अन्ना हजारे द्वारा रिहाई की पेशकश को ठुकराकर थाने में धरना देने की घोषणा उनकी रणनीतिक जीत थी. मनीष सिशौधिया प्रायः लोप्रोफाइल दिखते हैं. जनलोकपाल से इतर राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक सुधार के लिए उनके पास भी कोई ठोस रणनीति नहीं है. बाकी सदस्य बाड़ के समान हैं. संख्या बढ़ाने वाले. भ्रष्टाचार जो टीम अन्ना का केंद्रीय मुद्दा है, को लेकर भी जनलोकपाल बिल पर मौन सहमति से आगे नहीं जाते. यही कारण है कि सरकार को घेरने के लिए टीम अन्ना पुराने मुद्दों से आगे नहीं बढ़ पाई है. वह अभी तक जनलोकपाल पर अटकी हुई है, जिसे लेकर सरकार और बुद्धिजीवियों में अनेक मतभेद हैं. उसी का लाभ उठाकर सरकार मुद्दे को लगातार टालती आ रही है.

एक कानून के रूप ‘जनलोकपाल’ एक प्रतिबंधात्मक व्यवस्था है. वह अपराधियों को दंड दिलवाने पर केंद्रित है. अपराध की स्थितियां पैदा ही न हों, उसकी यह कोई व्यवस्था नहीं करता. दूसरे यह केवल आर्थिक अपराधों पर विचार तथा उनके निषेध तक सीमित रहता है. सामाजिक कदाचार, निजी क्षेत्र के भ्रष्टाचार पर वह चुप्पी साधे हुए है. जो कदाचित आर्थिक भ्रष्टाचार से भी खतरनाक है. उनके सहयोगी बाबा रामदेव का मुख्य मुद्दा विदेशों में जमा धन वापस लाना है. आगे क्या होगा, इस बारे में वे भी कोई विचार नहीं रखते. विदेशी बैंकों में जमा धनराशि को वापस लाना अव्वल तो आसान नहीं है. यदि यह चमत्कार संभव भी हो जाए तब क्या होगा? क्या गारंटी है कि उस धन को लेकर उनके नएपुराने दावेदार परोक्षरूप में कोर्ट में दावेदारी पेश नहीं करेंगे! तब क्या यह संभव नहीं कि पद्मनाभ मंदिर के खजाने की तरह वह भी दिखावटी बनकर रह जाए! विनोबा ने भूदान में चालीस लाख एकड़ से अधिक भूमि जुटाई थी. ठोस एवं सक्षम कार्यनीति के अभाव में वह, पचाससाठ वर्षों के बाद आज तक, भूमिहीनों में नहीं बांट पाई है. परिणामस्वरूप अधिकांश भूमि पर दबंगों ने कब्जा कर लिया है.

इधर सरकार तथा जनलोकपाल आंदोलन का विरोध कर रहे दलों को लगता है कि वे टीम अन्ना के सदस्यों से लोगों का विश्वास डिगाने में कामयाब हो चुके हैं. इसलिए वे पूरी तरह जनलोकपाल के विरोध में उतर आए हैं. कानून मंत्री का हालिया कथन कि आंदोलनकारी सरकारी रवैये से असहमत हैं तो वे संयुक्त राष्ट्र में जा सकते हैं, बहुत ही बचकानी और गैरजिम्मेदराना टिप्पणी है. यह लोकपाल या जनसरोकारों से युक्त अन्य मसलों पर बिल के प्रति सरकार की उपेक्षा और उसकी दीठता को दर्शाता है. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि गत वर्ष अगस्त आंदोलन के बाद अन्ना हजारे की रैलियों में लोगों की उपस्थिति घटी है. इस बार टीम अन्ना का फेसबुक अभियान भी पहले जैसा नहीं है. संभव है उसको सेंसर किया जा रहा हो. लेकिन यदि टीम अन्ना का कथित ‘सोशल’ साइट्स से भरोसा टूटा है तो यह अच्छा ही है. जिसे सोशल मीडिया कहा जाता है, वह प्रायः समाज से कटे या ऐसा महसूस कर रहे व्यक्तियों के लिए आभासी संबंधों का मंच है. उससे सूचनाओं का त्वरित आदानप्रदान तो संभव है. लेकिन समुचित विवेकनिर्माण और समाज की संगठित ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग संभव नहीं है. आभासी समूहों का प्रत्येक सदस्य स्वयं को समूह का नायक अथवा नायकजैसा माने रहता है. वह काल्पनिक और गढ़ी हुई आभासी दुनिया होती है, जिसमें सहमति या असहमति कंप्यूटर की मात्र एक ‘क्लिक’ जितना महत्त्व रखती है. अव्वल तो वह व्यावहारिक चुनौतियों से दूर रहता है, लेकिन उसकी स्थिति बने भी तो उनका नायकत्व एक झटके में बिखर जाता है. सोशल मीडिया द्वारा समाज का ऐसा विवेक निर्माण संभव नहीं है, जिससे वह अपने अंतद्र्वंद्वों से उभरकर एकजुट हो, विकास के रास्ते पर आगे बढ़ सके. 2011 के आरंभ में अरब देशों में हुई क्रांति इसका उदाहरण है. सालडेढ़ साल के भीतर वहां नई पोशाक में पुराना निजाम वापस आ चुका है.

ऐसी परिस्थितियों में क्या टीम अन्ना से मोह भंग हो जाना चाहिए? उनके चालू आंदोलन को चंद सिरफिरों की उछलकूद मानकर क्या हमें स्वयं को उससे पूरी तरह अलग कर लेना चाहिए? यदि यह हुआ तो वह बहुत ही बुरा होगा. टीम अन्ना के हम प्रशंसक हों या आलोचक, परंतु हमें यह हरगिज नहीं मानना चाहिए कि जनता में बदलाव की इच्छा मर चुकी है. न सरकार को यह लगने देना चाहिए कि जनता का मनोबल टूट चुका है. बल्कि अधिक विचारवान ढंग से, अधिक जागरूकता, समर्पण एवं चेतनाशक्ति से लोगों को मतभेद भुलाकर इस आंदोलन में साथ देना चाहिए. जिन लोगों की टीम अन्ना से सैद्धांतिक असहमति है, उन्हें सकारात्मक विरोध की नई संभावनाओं के बारे में सोचना चाहिए. मेधा पाटकर, अरुंधति राय, सुंदरलाल बहुगुणा जैसे आंदोलनकारी इससे पहले भी जनसहभागिता के बल पर निरंतर आंदोलन करते रहे हैं, लेकिन लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप पर सवाल खड़ा करने वाला यह शायद अकेला आंदोलन है. इसकी सफलता देश में लोकतंत्र की बुनियादी मजबूती के लिए अपरिहार्य है.

पर्याप्त लोकचेतना के अभाव में राजनेता मनमानी पर उतर आए हैं. उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने अपने पुत्र अखिलेश यादव को प्रदेश के मुख्यमंत्री की गद्दी देकर वंशवाद की राजनीति में एक नया आयाम जोड़ा है. वही काम अब कांग्रेस करने जा रही है. राहुल गांधी को सरकार में अतिरिक्त जिम्मेदारी देने की घोषणा इसी का संकेत है. उत्तर प्रदेश के दो चुनावों में असफलता का मुंह देर चुके राहुल की कामयाबी पर पूरा भरोसा तो खुद कांग्रेसियों को भी नहीं है. मंच पर बांह चढ़ाकर दो हाथ करने की मुद्रा में भाषण देने से संभव है एकदो प्रतिशत वोट और अधिक मिल जाएं. लेकन पार्टी और देश को सफलतापूर्वक चलाने के लिए दूरदर्शी सोच और विवेक की जरूरत पड़ती है. उसका कोई प्रमाण राहुल ने अभी तक नहीं दिया है. लोकतंत्र के नाम पर वंशवाद की अमरबेलि, राजनीति के नाम पर अनाचार, विकास योजनाओं के पीछे छिपे भ्रष्टाचार पर यदि अंकुश लगाना है तो उसका केवल एक ही उपाय है, सरकार को लगे कि जनता उसके प्रत्येक धत्कर्म पर नजर रखे है. इसके लिए आवश्यक है कि सरकार जनलोकपाल जैसे परिवर्तनकामी आंदोलनों को कामयाबी मिले. उससे जनता के आत्मविश्वास में वृद्धि हो. सरकार को लगे कि सर्वकल्याणकारी राजनीति की मांग को अब और टालना असंभव है. फिलहाल ‘जनलोकपाल’ आंदोलन संभवतः अकेला ऐसा उदाहरण है जिसने इस देश के लोकतांत्रिक विकारों को लेकर बहस की शुरुआत की है. ऐसे आंदोलनों का बचे रहना, देश में लोकतंत्र अच्छी सेहत के लिए बहुत जरूरी है, फिर बहाना चाहे जनलोकपाल बिल हो या कुछ और.

ओमप्रकाश कश्यप

टीम अन्ना के नाम खुली चिट्ठी

सामान्य

प्रिय अन्ना जी,

आपसे मैंने चौबीस वसंत कम देखे हैं. फिर भी यदि मैंने आपको प्रिय संबोधन किया है, तो इसलिए कि आप मेरे उन अति प्रिय नायकों में से हैं, जिन्होंने इस छलप्रपंच से भरी दुनिया में भी इंसानियत और नैतिकता को बचाए रखा है. आपके द्वारा रालेगणसिद्धि में किए गए कार्यों की भनक मेरे कानों तक डेढ़ दशक पहले ही पहुंच चुकी थी. उन दिनों मैं सहकारिता की वैचारिकी को समझने के प्रयत्न में था. सरकार मीडिया और पूंजीपतियों के साथ मिलकर नवउदारवाद के गीत गा रही थी. पूंजीवाद का सांड भारत की धरती पर छोटेछोटे उद्यमियों, व्यापारियों, शिल्पकर्मियों को कुचलता हुआ आगे बढ़ रहा था. छोटेछोटे धंधे तबाह हो रहे थे. मेहनतमशक्कत द्वारा रोजीरोटी कमाने वाले कामगारों का बुरा हाल था. टेलीविजन और समाचारपत्रों पर नवउदारवाद का रंग चढ़ा हुआ था. दोनों एक स्वर में स्पर्धा का गुणगान कर रहे थे. सहस्राब्दियों से सहयोग, सहअस्तित्व और सद्भाव में जीते आए भारतीयों को समझाया जा रहा था कि स्पर्धा से चीजें सस्ती होंगी, तरक्की के नए रास्ते खुलेंगे और जानलेवा महंगाई से मुक्ति मिलेगी. सोवियत संघ के पतन के पीछे वहां के नेताओं की निजी महत्त्वाकांक्षाएं, अदूरदर्शिता, लालच और अन्यान्य कमजोरियां थीं. लेकिन उसके पतन से लोगों ने समाजवाद को समयबाह्यः विचारधारा मान लिया. अमेरिका को विकल्पहीन मान भारत जैसे देश उसकी आरती उतारने लगे थे. बिका हुआ मीडिया स्पर्धा के गुणगान में जुटा था. महानगरों की चमकदमक से परे जो चंद अच्छे सहयोगाधारित प्रयास किए जा रहे थे, उन्हें जाननेसमझने के लिए उसके पास न तो समय था न समझ. उस दौर में पांडुरंग आठवले, राजस्थान की ‘कुल्हड़ी’ संस्था की कर्मठ और दूरद्रष्टा महिलाओं तथा रालेगण सिद्धि में आपके सहयोगाधारित प्रयोगों के प्रति श्रद्धा मन में जगी, जो वर्षों तक बनी रही. इसलिए जब जनलोकपाल आंदोलन की हवा चली तो अंधेरे में लौ की किरण की तरह मैंने उस आंदोलन का मन ही मन स्वागत किया था. जब आपने ‘जनता सर्वोपरि’ कहा तो दिनकर की आपातकाल के दौरान लिखी वे पंक्तियां सहसा याद आने लगीं, जिनमें उन्होंने कहा था‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है.’ लेकिन बहुत जल्दी लगने लगा कि जिन लोगों के कंधों का सहारा लेकर आप उम्र के आठवें दशक में आंदोलन को बढ़ाना चाहते हैं, वे प्रदर्शन प्रिय, नामलिप्सा के मारे हुए लोग हैं. कैमरे और माइक की भूख उनमें आपसे कहीं अधिक है. ऐसे लोग तमाशा तो खड़ा कर सकते हैं, एक परिवर्तनकामी आंदोलन में रचनात्मक सहभागिता उनसे संभव नहीं है.

गांधी जी के बारे में आप मुझसे कहीं अधिक जानते हैं. उनका काम पहले दिखता था. वही जनता को अपनी ओर खींचता था. लेकिन आपकी टीम के सदस्य सबकुछ पलटने पर उतारू हैं. वे माइक पर अपना चेहरा दिखाने के लिए मचलते रहते हैं. भारतीय जनता इतनी समझदार तो है कि वह समझ ले कि माइक और कैमरों की ओर ललचाई दृष्टि से देखने वाले चेहरों में राजनीति की कितनी भूख है. राजनीतिक क्षेत्रों में पैठ बनाने का आपके सहयोगियों का उतावलनापन हरियाणा के चुनावों में कांग्रेस विरोध के माध्यम से नंगे सच की तरह सामने आया था. आप अच्छी तरह जानते हैं कि जनलोकपाल के समर्थन में घरों से निकले लोगों के मन में भ्रष्टाचार को लेकर आक्रोश था, जिससे कोई भी राजनीतिक दल बचा नहीं है. नेताओं के लिए राजनीति एक व्यापार है. सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के बीच वंशवाद को मौन सहमति मिल चुकी है. ऐसे में कोई नहीं कह सकता था कि केवल कांग्रेसी भ्रष्ट हैं और भाजपा, प्रकारांतर में आप जिसका समर्थन कर रहे थे, वह दूध के धुले नेताओं की पार्टी है. यह बात तो आपकी टीम के सदस्य भी नहीं मानते थे. इसलिए वे ‘किंतुपरंतु’ का सहारा लेते हैं. ‘देश में कांग्रेस पार्टी की सरकार है, इसलिए कांग्रेस को हराना है’—अरविंद केजरीवाल का यह तर्क बेतुका और तथ्यों से परे था. क्या वे नहीं जानते कि देश में कांग्रेस की न होकर ‘संयुक्त जनतांत्रिक मोर्चा’ की सरकार है. कांग्रेस के बहुमत के बावजूद यह संभव नहीं कि जब तक संजमो के बाकी दल न चाहें, अकेली सोनिया या कांग्रेस कोई बिल पास करा ही नहीं सकती. दूसरे लोकसभा में बिल पास होने से ही वह कानून नहीं बन जाएगा. इसके लिए उसको राज्यसभा से भी पास कराना जरूरी है. जहां कांग्रेस पार्टी अल्पमत में है. आपके चुनावी तीर का सामना कांग्रेस और संजमो के सहयोगी दलों ने चुनावी रणनीति से ही किया. उन्होंने लोकसभा में बिल पास करवा दिया. लेकिन राज्यसभा में, जहां भाजपा और उसके सहयोगी दलों का बहुमत है, उसके बड़े नेता मौन साधे रहे. वहां जिस तरह बहस चली, जनता समझ गई कि राजनीतिक दलों में से कोई भी लोकपाल अथवा जनलोकपाल जैसा बिल पास कराना नहीं चाहता. परिस्थितियों में आमूल परिवर्तन की जरूरत है, यह आप और आपके सहयोगी भी मानते हैं. इसके बावजूद उनके भाषण तथा रामलीला मैदान में किरन बेदी की नौटंकी से संदेश गया कि आप केवल कांग्रेस को हराने की राजनीति कर रहे हैं. यह भी कारगर होता यदि विपक्ष की जनता के बीच कुछ साख होती. संसद में विपक्ष की मान्यता प्राप्त भाजपा जनता के बीच पहले ही साख गंवा चुकी है, ऐसे में लोग आपके समर्थन में बारबार घर से क्यों निकलते? खासकर उस मुंबई में जहां शिवसेना का प्रभाव हो और उसके नेता बाल ठाकरे खुलकर आपका विरोध करते आ रहे हों.

अन्ना जी, एक गांव का सुधार करने और देश को सुधारने में बड़ा अंतर होता है. भारत के गांवों का चेहरामोहरा आज भी सामंतवादी है. धर्म से साथ स्वार्थपूर्ण गठजोड़ कर वह समाज के बड़े वर्ग को सत्ता और संसाधनों से बेदखल कर देता है. शिखर पर गिनेचुने लोग बचे रह जाते हैं. जिन्हें उनके आपसी हित एकदूसरे से जोड़े रखते हैं. वस्तुस्थिति से अनजान लोग इसी को विकास मान लेते हैं. देश में न केवल बहुरंगी सांस्कृतिक छटा है, बल्कि विभिन्न राजनीतिक दांवपेच, मान्यताएं और अनेक धार्मिक प्रपंच हैं. उनसे एक झटके में पार पाना संभव नहीं है. विशेषकर उस आंदोलन के जरिये जिसका स्वरूप ही प्रतिक्रियात्मक हो. जो दावा अराजनैतिक होने का करता हो, लेकिन आंदोलन का स्वरूप, भाषणबाजी, जनता को चेहरा दिखाने की ललक, आरोपप्रत्यारोप ठीक वैसे ही हों, जैसे दूसरी राजनीतिक पार्टियों के हैं. जिसका कोई रचनात्मक कार्यक्रम न हो. ऐसी उखाड़पछाड़ से कुछ दिनों के लिए गहमागहमी का माहौल जरूर बनाया जा सकता है, वास्तविक परिवर्तन जिसके लिए लंबे संघर्ष की आवश्यकता पड़ती है, इसके द्वारा सर्वथा असंभव है.

आमूल परिवर्तन के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता अनिवार्य है. साथ ही जरूरी है नेता और जनता के बीच प्रामाणिक संवादसेतु. निरंतर जनसंवाद द्वारा ही समर्पित और सत्यनिष्ठ कार्यकर्ताओं का समूह बनाया जा सकता है. यदि विचारधारा ठोस, आचरण निष्प्रह और नेतृत्व ईमानदार हो तो आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए अधिक व्यक्तियों की आवश्यकता नहीं पड़ती. कस्तूरी गंध की भांति उसका संदेश दूर तक जाता है और लोग उससे स्वतः जुड़ने लगते हैं. भीड़ को बहलाफुसलाकर चुनावों में ठप्पा तो लगवाया जा सकता है. मतदाता के पास बेहतर विकल्प न होने से यह काम आसान भी है. वास्तविक परिवर्तन के लिए लंबे समय और संयम की दरकार होती है. वहां केवल शिखर नेतृत्व के आचरण की पवित्रता, नैतिकता और दूरंदेशी ही लोगों को बांधे रख सकती है. नमक सत्याग्रह के लिए गांधीजी ने केवल 78 कार्यकर्ताओं को चुना था. यह उनका नैतिक आभामंडल था जो बिना किसी फेसबुकिया अभियान के डांडी यात्रा को देशभर में व्यापक जनसमर्थन मिला था. 24 दिनों की 390 किलोमीटर की यात्रा पूरी करने के बाद वह यात्रा जब डांडी पर पहुंची तो वहां एक लाख से अधिक लोग जमा थे. साबरमती तट के अलावा भी देश में जगहजगह नमक बनाया जा रहा था. लाखों सत्याग्रही आंदोलन के घरों से निकले हुए थे. औपनिवेशिक सरकार के दमन का विरोध करते हुए 80,000 से अधिक सत्याग्रही जेल जा चुके थे. वह आंदोलन नैतिकता के कंधों पर सवार होकर परवान चढ़ा था. कोई प्रतिक्रियात्मक सोच उसके पीछे नहीं था. देश को नमक सत्याग्रह के तुरंत बाद आजादी नहीं मिली थी. पूरे 17 वर्ष लगे थे. लेकिन उस आंदोलन ने इस देश के आम आदमी के भीतर राजनीति का एक जज्बा पैदा किया था. यह विश्वास उसके दिल में पैदा किया था कि लोग निडर हों तो दुनिया की बड़ी से बड़ी हुकूमत उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती. यह अवसर आपको भी मिला था, लेकिन आपके सहयोगियों की निजी महत्त्वाकांक्षा और उनपर लग रहे एक के बाद एक आरोपों से जनता का विश्वास इस आंदोलन से डिगा है. लोगों को यह आंदोलन एकसूत्री और सियासी चाल लगने लगा है. आप कह सकते हैं सरकार टीम अन्ना को बदनाम कर रही है. संभव है यह सच हो. लेकिन सत्ता चाहे देशी हो या विदेशी, उसका चरित्र अमूमन एक जैसा होता है. केवल चैतन्य जनसमाज द्वारा उसे नियंत्रित किया जा सकता है. जनता को जगाने, उसका विश्वास जीतने के लिए नेता को पहले उसके करीब आना पड़ता है. इसीलिए दूरदृष्टा गांधी सार्वजनिक जीवन में आने से पहले एक लंगोटी, घड़ी, लाठी और टोपी जैसे कुछ साधारण वस्तुओं को छोड़कर बाकी सब से नाता तोड़ चुके थे.

आप कहेंगे कि बारबार गांधी को याद करना जरूरी क्यों? वह इसलिए कि आप अपने आंदोलन में गांधीजी के ‘औजार’ सत्याग्रह का इस्तेमाल कर रहे हैं. आप यह भी भलीभांति जानते हैं कि गांधी के रास्ते पर चलना साध्य और साधन की समानता के बगैर संभव ही नहीं हैं. वे जब तक दक्षिण अफ्रीका में रहे, तभी तक बेरिस्टर रहे. भारत आने के साथ ही उनका कायाकल्प हो चुका था. बेरिस्टर गांधी लंगोटीछाप बन चुका था. उन्हें मालूम था कि लोगों का विश्वास जीतने के लिए पारदर्शिता आवश्यक है. ईमानदार होना नहीं, दिखना भी चाहिए. न केवल नेता को, बल्कि उसके आसपास जुटे कार्यकर्ताओं को भी. उनके नैतिक आभामंडल ने विनोबा जैसे अनुयायी पैदा किए थे, जिनमें गांधीवाद गांधीजी के अपने आचारव्यवहार से भी ज्यादा दमदार था. गांधीजी का आंदोलन ऐसे ही समर्पित कार्यकर्ताओं के कंधों पर टिका था. गांधीजी स्वयं खास अवसर पर ही नेतृत्व की जिम्मेदारी ओटते थे. आपकी टीम में कोई ऐसा नहीं है, जिसके कंधों पर किसी आंदोलन की जिम्मेदारी डाली जा सके. न किसी में इतना आत्मविश्वास है कि आपके प्रतिनिधि के रूप में स्वतंत्र आंदोलन की बागडोर संभाल सके. इसलिए वे हर जगह, हर बार आपको अनशन और आंदोलन के बहाने आगे ले आते हैं. एक मुखैटे की भांति वे आपका इस्तेमाल कर रहे हैं. आप सत्तर पार कर चुके हैं. शतायु हों यह कामना भी है. लेकिन आमूल बदलाव के लिए लंबे आंदोलन की दरकार होती है. आपकी उम्र और सेहत को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि आप लंबे समय तक किसी रचनात्मक आंदोलन में सक्रिय भागीदारी कर सकते हैं. कहीं ऐसा न हो आपके बाद टीम अन्ना की हालत भी बिना सोनिया की कांग्रेस या बिना अटलविहारी वाजपेयी के भाजपा जैसी बनकर रह जाए.

आप जो आंदोलन लेकर चले हैं उसकी सफलता के लिए ठोस वैकल्पिक विचारधारा का होना जरूरी है. यह काम गांधी के रास्ते चलकर भी हो सकता है. बशर्ते उसमें ‘टीम अन्ना’ के सभी सदस्यों की संपूर्ण आस्था हो. साथ में अपने बूते आंदोलन को आगे बढ़ाने का जज्बा. यदि अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण, किरन बेदी में ‘गांधीवाद’ के प्रति सच्ची आस्था का अभाव है? यदि उनमें अपेक्षित आत्मविश्वास गायब है? यदि वे मंच पर अपरिग्रही और निष्प्रह दिखना चाहें और पीछे अपनेअपने संगठन के जरिये करोड़ों का अनुदान पचाएं, तो वे आपके सच्चे साथी हो ही नहीं सकते. जनता नारों की हकीकत को जानती है. वह समझती है कि ‘अन्ना’ के नाम का जयकारा लगाने वालों के दिल में नाम और नामे दोनों की भूख है. इसलिए वे बारीबारी से माइक झटककर मंच पर आते हैं. हर कोई हाथ लहरालहराकर जनता को अपना चेहरा दिखाना चाहता है. फिर बिना किसी ठोस रणनीति, वैकल्पिक राजनीतिक दर्शन या वर्तमान संसदीय लोकतंत्र में सुधार हेतु ठोस सुझावों के, सिर्फ एक जिद के लिए साल में तीनतीन अनशन! हमारे घरों में औरतें साल में साठसत्तर व्रत रख लेती हैं. वे अच्छा करती हैं या बुरा, उसपर विचार करना इस लेख का विषय नहीं है. लेकिन रोजरोज उपवास करने पर वे घर के सदस्यों तक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित नहीं करा पातीं.

आप गांधीजी के अनुयायी हैं. आपको उनके बारे में बताने की जरूरत नहीं. गांधीजी कभी इकहरे आंदोलन पर विश्वास नहीं करते थे. उनकी अहिंसक लड़ाई एक से अधिक मोर्चों पर लगातार जारी रहती थी. उनके पास समर्पित कार्यकर्ताओं और नेताओं की पूरी टीम थी. प्रत्येक आंदोलन उनके द्वारा नामित सत्याग्रही हिस्सा लेते थे. विनोबा भावे, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल, आचार्य कृपलानी, कस्तूरबा गांधी, सरोजिनी नायडू, अबुल कलाम आजाद, हरिलाल गांधी जैसे अनेक नेता गांधीजी के साथ थे. सभी का स्वतंत्र व्यक्तित्व और नैतिक आभामंडल था. दुर्भाग्य की बात है कि आपकी टीम में जितने भी सदस्य हैं, एक आपको छोड़कर किसी की जनता के बीच नैतिक छवि नहीं है. सबके दामन पर दाग लगे हैं. आंदोलन से बाहर वे सभी जुगाडू़ किस्म के लोग हैं. ऐसे में जनता उनपर विश्वास करे भी तो कैसे? ‘मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना’ का नारा लगाने हर कोई अन्ना नहीं बन जाता. न मंच की पृष्ठभूमि पर महात्मा गांधी की तस्वीर लगा देने से किसी में गांधीजी की आत्मा उतर आती है. दुनिया में ‘गांधी’ एक विचारधारा एक आंदोलन पद्धति का पर्याय बन चुका है. उनके रास्ते पर चलना बिना उनके जैसा बने संभव नहीं है.

भारतीय लोकतंत्र की आज जो अवस्था है वह अनायास नहीं है. न ऐसा है जिसके बारे में कभी सोचा न गया हो. भारत में लोकतंत्र के नाम पर बनी विभिन्न संस्थाओं की आज जो दुर्दशा है वह अकल्पित भी नहीं है. लोकतंत्र की विसंगतियों के बारे में प्लेटो ने खुलकर लिखा है. 2400 वर्ष पहले लिखे गए उसके ग्रंथ ‘रिपब्लिक’ में लोकतंत्र की विस्तृत समीक्षा को देखा जा सकता है. यह आपको तय करना है कि जो परिवर्तन आप चाहते हैं, क्या वे संसदीय लोकतंत्र की वर्तमान व्यवस्था में संभव हैं? यदि ‘हां’ तो उसके लिए कौनसे कार्यक्रम जरूरी हैं और कैसे उन कार्यक्रमों पर चरणबद्ध तरीके से अमल किया जाए? यदि वांछित परिवर्तन संसदीय लोकतंत्र द्वारा संभव नहीं है तो भावी लोकतंत्र अथवा नए राजनीतिक दर्शन का स्वरूप क्या हो? उल्लेखनीय है कि लोकतंत्र उन्हीं देशों में बचा हुआ है जो किसी न किसी प्रकार पूंजीवाद को समर्पित हैं. इसलिए पूंजीवाद का विरोध कर रहे देश लोकतंत्र के वैसे समर्थक भी नहीं है. समस्या यह भी है कि पूंजीवाद का विकल्प कही जाने वाली समाजवाद और साम्यवाद जैसी विचारधाराओं का वैश्विक प्रभाव सिकुड़ रहा है. बीसवीं शताब्दी में मार्क्सवाद के विकल्प के रूप में श्रमिक संघवाद, अराजकतावाद, समष्ठिवाद और सहजीवितावाद जैसे नए राजनीतिक दर्शन आए हैं, लेकिन उनको आजमाया जाना बाकी है. मार्क्सवाद से प्रेरितप्रभावित हैं ये सभी विचारधाराएं उसकी अपनीअपनी तरह से अधुनातन व्याख्या करती है. जहां तक भारत की बात है, धर्म, जाति, सांप्रदायिकता के आधार पर बुरी तरह विभाजित समाज में इन विचारधाराओं के आधार पर परिवर्तन असंभव है. फिलहाल जो सबसे जरूरी है वह है आम जनता को लोकतंत्र और उसके विकल्पों से परचाना. उसको परिवर्तन के लिए मानसिकशारीरिक रूप से तैयार करना, जो केवल नैतिक धरातल पर खड़े नायक द्वारा संभव हो सकता है. ऐसा नायक जो निजी नैतिकता के सम्मोहन से आगे बढ़ते हुए पूरे समाज में उसकी स्थापना करना चाहता हो. यह एक लंबा काम है, पर आमूल परिवर्तन के लिए विकल्पहीन भी है.

आधुनिक राजनीतिक दर्शन की सबसे बड़ी समस्या व्यक्तिहित तथा समाजहित में तालमेल बनाने की है. बदले हुए समय में व्यक्ति की राय और उसकी आकांक्षाओं की अवहेलना कर पाना संभव नहीं रह गया है. न ही शासक दल के लिए यह संभव है कि जनमत की उपेक्षा करते हुए वह मनमाना आचरण करे. इसलिए बदलाव अपरिहार्य हैं. लोगों के दिलों में यह विश्वास पैदा कराना जरूरी है कि यह कोरी राजनीति नहीं, वास्तविक परिवर्तन की लड़ाई है. महोदय, मुंबई में अपेक्षाकृत कम जनसमर्थन मिलने पर निराश होने की आवश्यकता नहीं है. हर आंदोलन की राह में ऐसे दौर आते हैं. परिवर्तन की लड़ाई किसी एक दिन में नहीं जीती जा सकती. सुनिश्चित जीत के लिए बारबार चाल अदलबदल कर प्रयास करने पड़ते हैं. इसलिए जरूरी है कि परिवर्तन का पहले खाका बनाया जाए. फिर ऐसे लोगों को आंदोलन से जोड़ा जाए जिनका कोई नैतिक आभामंडल हो. इसके अभाव में लोगों की भीड़ तो जुटाई जा सकती है, समर्पित और प्रतिबद्ध कार्यकर्ता पैदा नहीं होते. लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए एक मुखपत्र भी जरूरी है. फेसबुक आदि को त्वरित संदेश का माध्यम बनाया जा सकता है, सामान्य स्थिति में उनके माध्यम से सरकार पर दबाव भी बनाया जा सकता है. वैकल्पिक समाज की संरचना के लिए ठोस कार्यनीति और राजनीतिक दर्शन की पीठिका तैयार कर पाना उनसे सर्वथा असंभव है. यह अच्छा है कि आपने असफलता के कारणों की पड़ताल शुरू कर दी है. ‘टीम अन्ना’ को चूक का एहसास होना परिवर्तनकामियों को संतोष प्रदान कर सकता है. भविष्य के कार्यक्रम ऐसे हों जो जनता को उसकी उसकी ताकत और अधिकारों से परचाने के साथसाथ लोगों को संकल्पनिष्ठ एवं कर्तव्यनिष्ठ बनने की प्रेरणा भी देते हों.

©ओमप्रकाश कश्यप