Category Archives: जनसंस्कृति एवं न्याय

न्याय, न्याय की परंपरा और समाज

सामान्य

राज्य के नेतृत्व में अदालतों के जरिये सामान्यतः जो फैसले होते हैं, प्रायः उन्हीं को न्याय मान लिया जाता है. जबकि उनमें से कुछ को छोड़कर जिनका संबंध संविधान, कानून या किसी अदालती निर्णय की लोकहित में समीक्षा करना है, अधिकांश का न्याय की मूलभावना से दूर का भी संबंध नहीं होता. अधिकतर मामले वकीलों के दमखम तथा कानूनी दांवपेच में उलझे होते हैं. उनके अंबार के बीच न्याय और न्यायभावना कहीं दबसी जाती है. कानून अपना काम करे, लोगों को न्याय समय पर मिले, न्याय प्रणाली निष्पक्ष तथा उसकी प्रक्रिया पूर्णतः पारदर्शी हो—यह देखना राज्य का कर्तव्य भले हो, उसके गठन का वास्तविक लक्ष्य नहीं है. राज्य का गठन प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा अपने सुख, शांति, समृद्धि एवं शुभता के विस्तार हेतु किया जाता है. अपने नागरिकों के जानमाल की रक्षा करना राज्य का दायित्व है. इस दायित्वपूर्ति हेतु कानून राज्य के सहायक की भूमिका निभाता है. तदनुसार किसी अदालती निर्णय को न्याय तभी कहा जा सकता है, जब पीडि़त को हुए नुकसान की भरपाई संभव हो. बावजूद इसके अधिकांश अदालती मामले इन्हीं मुद्दों पर केंद्रित होते हैं. उनमें अदालतें अपराधी को केवल दंड सुनाती हैं, न्याय नहीं करतीं. मान लीजिए किसी घर में चोरी होती है. चोर पकड़ा जाता है, किंतु माल बरामद नहीं हो पाता. चोरी होने तथा चोर के गिरफ्तार होने के मध्य जो अंतराल है, उसमें चोर माल को ठिकाने लगा चुका है. अदालत उस चोर को कानून के अनुसार दंड सुनाकर न्यायप्रक्रिया को संपन्न मान लेती है. ठीक इसी प्रकार यदि किसी परिवार के सदस्य की हत्या हो, हत्यारा पकड़ा जाए तो अदालत अपराधी को काराग्रह भेजकर; अथवा मृत्युदंड सुनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है. दोनों मामलों में पीडि़त परिवारों को सिवाय इस तसल्ली के कि जिन्होंने अपराध किया, वे कारावास में हैं, कुछ भी प्राप्ति नहीं होती. मृतक को वापस लाना तो वैसे भी संभव नहीं होता. इस तरह कानून की मदद से किया गया न्याय, सामान्यतः निषेधात्मक होता है. इससे न्याय का उद्देश्य पूरा नहीं होता. वास्तविक न्याय तब कहा जा सकता था, जब राज्य व्यक्ति को हुए नुकसान की भरपाई या तो स्वयं करे अथवा अपराधी को उसके लिए बाध्य करे. परंतु ऐसा हो नहीं पाता. नुकसान की भरपाई करना अदालत को अव्यावहारिक लगता है. कदाचित वह सोचती है कि इस तरह के मामलों से राज्य के खजाने पर अनावश्यक बोझ पड़ेगा. दूसरा सोच यह होता है कि इस तरह के मामलों में यदि अदालतें नुकसान की भरपाई करने लगें तो पीडि़त व्यक्ति अपने नुकसान को बढ़ाचढ़ाकर पेश करेगा. अपराधी पर नुकसान की भरपाई के लिए दबाव डालना भी उसे अव्यावहारिक लगता है. साफ है कि अदालतें अपने ही देशवासियों पर अविश्वास करती हैं. दूसरो शब्दों में राज्य के संरक्षण में चलाई जा रही अदालतें प्रथमतः राज्य का ही हित साधन करती हैं.

न्याय शुभत्व की व्याप्ति और उसका प्रसार है. यह तभी संभव है, जब न्यायाधीश स्वयं नैतिकता के उच्चतम मानकों पर आसीन होकर उच्चतम मापदंडों के अनुसार न्याय करें. लेकिन न्यायाधीश को चाहे वे कितने ही विद्वान, निष्पक्ष और न्यायसमर्पित क्यों न हों, उन्हें अपना प्रत्येक निर्णय राज्य द्वारा बनाई गई दंडसंहिता के अनुसार करना पड़ता है. ऐसे में निर्णय सुनाने वाले न्यायाधीश का कार्य केवल दंडाधिकारी तक सीमित होकर रह जाता है. दंडविधान अथवा दंड की प्रक्रिया को न्याय जैसे शब्द से महिमा मंडित करना, राज्य के शक्तिप्रदर्शन का ही रूप है. न्यायालयों की कार्रवाही न्याय की परिभाषा तथा उसकी मूलभावना से भी मेल नहीं खाती है. इसके बावजूद लोकव्यवहार और अदालती कामकाज में ‘न्याय’ शब्द का उल्लेख जमकर किया जाता है. न्याय की सैद्धांतिक जानकारी के अभाव में सामान्य ‘दंडाधिकारी’ से भी ‘न्यायविद्, ‘न्यायमूर्ति’ जैसे लुभावने संबोधन जोड़ दिए जाते हैं. असल में वह राज्य की ताकत और उसकी सर्वोच्चता को प्रकट करने का एक माध्यम है. प्रकारांतर में यह वर्चस्वकारी सत्ताओं के खेल को आसान बनाते हैं. न्याय राज्य की सार्वभौमिक उदारता की कसौटी होता है. कल्याण राज्य होने का दावा करने वाले राज्य में तो उसकी हैसियत मुख्य दिशानिर्देशक की होनी चाहिए. उसकी व्याप्ति कर्तव्य विभाजन से लेकर नागरिकों के बीच कल्याण के बंटवारे तक यथाआवश्यक रूप में होनी चाहिए. प्लेटो ने इसी को लेकर ‘रिपब्लिक’ में लिखा है—

समाज के प्रत्येक सदस्य को वह कार्य सौंपना चाहिए, जिसके लिए वह स्वयं को सर्वाधिक उपयुक्त मानता है.’1

इस कोटि की न्यायभावना के अभाव में राज्य अपने नागरिकों के साथ छल करता है. ‘न्याय की अनुपस्थिति में राज्य की स्वयंप्रभुता को संगठित डकैती’ बताते समय संत अगस्ताइन के मन में भी कुछ इसी प्रकार के विचार उमड़े होंगे. न्यायविहीन समाज में असंतोष पनपते हैं. परिणामस्वरूप उसके प्रति नागरिकों का विश्वास धीरेधीरे क्षीण होता जाता है. नागरिकों के विश्वास से रहित राज्य एवं निरंकुश राज्य में कोई अंतर नहीं होता. जिस राज्य में न्याय न हो, वहां निरंकुशता स्वतः पनपने लगती है. उसकी प्रवृत्ति बहुआयामी होती है. निरंकुशता वैयक्तिक भी हो सकती है और राज्य के नाम पर गठित संस्थाओं की भी. दोनों ही स्थितियों में उसका शिकार जनसाधारण को बनना पड़ता है. परिणामस्वरूप जनसाधारण के लिए न्याय निरंतर दुर्लभ होता जाता है.

न्याय व्यक्तिमात्र के प्रति संवेदना, करुणा एवं समानता की भावना से जन्मता है. वही समाज में शुभत्व की स्थापना करता है. आधुनिक संदर्भों में वह पश्चिम में विकसी एक महत्त्वपूर्ण नैतिक एवं राजनीतिक संकल्पना है. न्याय के अंग्रेजी पर्याय Justice शब्द की उत्पत्ति लैटिन मूल के Jus शब्द से हुई है, जिसका अभिप्राय ‘विधि’ अथवा ‘सन्मार्ग’ से है. आ॓क्सफोर्ड शब्दकोश के अनुसार Just शब्द का आशय ऐसे व्यक्ति से है जो नैतिकता के उच्च मानदंड के अनुसार सही है; तथा दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार करता है, जो नैतिकता की दृष्टि से खरा और प्रभावी है. प्रकारांतर में श्रनेज शब्द से भी उसी धारणा की ओर संकेत मिलता है. कुल मिलाकर jus तथा justice दोनों न्याय और न्यायभावना को दर्शाते हैं. इसके मायने केवल कानून और अदालतों तक सीमित नहीं हैं. बल्कि उससे कहीं अधिक व्यापक, मनुष्यता के शिखर की ओर इशारा करने वाले हैं. न्याय मानवीकरण की सफलता को दर्शाता है. कभीकभी fair शब्द को भी न्याय के पर्यायवाची के रूप में प्रयुक्त किया जाता है. इनका अभिप्राय है ‘प्रत्येक को वह मिले जो उसका अधिकार है.’, ‘उतना मिले जितनी उसको आवश्यकता है’, ‘जिसको जो मिले, पूरी पारदर्शिता के साथ मिले.’, ‘ईमानदारी से मिले और अविलंब मिले.’ श्रेष्ठ न्याय समाज के विक्षोभों का शमन करता है, समाज और व्यक्ति की दूरी घटाता तथा कानून के प्रति नागरिकों के भरोसे में वृद्धि करता है. निष्पक्षता और पारदर्शिता न्याय की अनिवार्य शर्तें हैं. ‘बतौर निष्पक्षता न्याय हमें वह देता है, जो हम उससे चाहते हैं.’2 न्याय में विलंब भी अन्याय को दर्शाता है. प्लेटो के अनुसार समाज में शुभत्व की व्याप्ति, नैतिकता का संचार ही न्याय है. वही समाज न्याय पथ पर है जिसमें नागरिक अपने कर्तव्यों का पालन बगैर किसी बाहरी दबाव और स्वार्थभावना के करते हैं, जहां नागरिकों में परस्पर मेल हो, जो संकट में एकदूसरे का साथ निभाने को तत्पर रहते हों तथा इतने अनुशासित एवं आत्ममर्यादित हों कि शासन की मौजूदगी केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाए.

भारत में धर्म से इतर न्याय की कोई स्वतंत्र अवधारणा नहीं है. यहां न्याय के पर्याय के रूप में धर्म को रखा गया है, जिसकी हालत काठ के उस जूते की भांति है जिसमें हर कोई पांव डालकर देखना चाहता है. देखता है, लेकिन पूरी तरह से पहनना कोई नहीं चाहता. न ही पहन पाता है. पश्चिम में न्याय पर सुकरात से लेकर जॉन राउल तक गंभीर चिंतन देखने को मिलता है. प्लेटो की महत्त्वपूर्ण कृति ‘रिपब्लिक’ में साथियों के साथ चर्चा के दौरान सुकरात ‘न्याय’ के विभिन्न पक्षों पर विचार करता है. अंत में वह इस निर्णय पर पहुंचता है कि ‘न्याय सदगुण है.’ ऐसा गुण जिसे प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर रखना चाहिए. उसमें आदर्श और व्यवहार का भेद मिट जाता है. सुकरात के अनुसार वही समाज न्याय पर है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति वह करता है, जो वह दूसरों से अपने प्रति अपेक्षा रखता है. प्लेटो कवि हृदय और आदर्शवादी था. आदर्श समाज को लेकर उसका एक सपना था. ‘न्याय’ के लिए उसने ग्रीक भाषा के शब्द Dikaisyne का प्रयोग किया है, जिसका अभिप्राय ‘नैतिकता’ और ‘शुभता’ से है. उसके अनुसार न्याय वह अवस्था है जब व्यक्ति अपनी तात्कालिक इच्छाओं को शेष समाज की शुभता और भलाई के नाते स्थगित कर देता है. बदले में समाज उसकी इच्छाओं, आकांक्षाओं पर अपनी प्राथमिकताओं के मद्देनजर विचार करता है. प्लेटो के लिए न्याय मानवीय सद्गुणों का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, जो समाज और व्यक्ति की आपसी प्रतिबद्धताओं को दर्शाता है. वह स्पष्ट और स्वतंत्र होता है, और उसका ध्येय समाज में सचाई, शुभता एवं आपसी मेलजोल को बढ़ावा देना है. वह हमारे आत्म की शक्ति, उसका विधान है. आत्मा के लिए न्याय का वही महत्त्व होता है, जो देह के लिए स्वास्थ्य का. न्याय मार्गदर्शक होता है. वह हमें रास्ता दिखाता है. विशेष परिस्थितियों में कौनसा निर्णय मनुष्यता के अनुकूल है, यह बताता है. वह केवल शक्ति नहीं होता, बल्कि शक्तियों, अधिकारों एवं कर्तव्यों की सामंजस्यपूर्ण व्याप्ति है. वह शक्तिशाली का अधिकार न होकर संपूर्ण समाज की प्रभावी एकता और सौहार्द है. न्याय स्वयं एक निर्देशक सत्ता है, जो बल के बजाय करुणा एवं संवेदना से संचालित होती है. समाज की सुदृढ़ता के संदर्भ में वह आत्मरूप है. वह समाज की संपूर्ण संगठित एवं समन्वित शक्ति का प्रतीक होता है. न्याय शक्तिशाली का अधिकार न होकर संपूर्ण समाज की समन्वित एकता और संवेदनशीलता में झलकता है.

प्लेटो के चिंतन का दायरा बड़ा था. उसने अनेक विचारकों को प्रभावित किया. प्लेटो की अपेक्षा अरस्तु नैतिक व्यवहारवाद का समर्थक था. उसकी न्यायसंबंधी अवधारणा व्यावहारिकता से परे न थी. उसका विचार था कि न्याय विधिमान्य व्यवस्था के पारदर्शी और समानतापूर्ण व्यवहार का लक्षण है. राज्य की पारदर्शिता, उसका अपने नागरिकों के प्रति समानतापूर्णपक्षपातरहित व्यवहार—समाज में न्याय के संवितरण की स्थिति को दर्शाता है. दिखाता है कि समाज अपने नागरिकों के प्रति कितना उदार है. जो वस्तु सबके उपयोग की है, उसका सभी में समान वितरण हो, यह उसका मानना था. न्याय से उसका आशय प्रत्येक वस्तु को सभी मनुष्यों में बराबरबराबर बांट देना नहीं है. यह तो परोक्ष रूप में राज्य की मनमानी ही कही जाएगी. उस समय व्यक्ति की रुचि, आवश्यकता तथा समाज के विकास में उसके द्वारा किए गए योगदान को ध्यान में रखा जाना ही न्याय संगत है. लेकिन यह कार्य इतनी खूबी से होना चाहिए कि समाज में कोई भी स्वयं को उपेक्षित अनुभव न करे. राज्य की उदारता एवं न्यायशीलता में सभी का भरोसा बना रहे. अरस्तु और प्लेटो दोनों पर सुकरात की ‘सद्गुण’ और ‘शुभत्व’ संबंधी मान्यता का प्रभाव था. अंतर केवल इतना है कि प्लेटो का समाज और विचार दोनों को परखने का नजरिया नितांत आदर्शवादी था. अरस्तु इसके लिए मानवीय सीमाओं को भी ध्यान में रखता है. लक्ष्य उसका भी समाज में नैतिकता और शुभता का संचार करना है.

अरस्तु के अनुसार संवैधानिक शासन की तीन प्रमुख विशेषताएं हैं—पहला संवैधानिक शासन का प्रमुख ध्येय जनकल्याण होता है. वह किसी एक व्यक्ति समूह या दल के लिए काम नहीं करता. न ही वह किसी एक दल अथवा व्यक्ति द्वारा संचालित ऐसा शासन होता है जो किसी व्यक्ति अथवा समूह के भले के लिए काम करे. दूसरा, संवैधानिक शासन विधिसम्मत शासन होता है. वह किसी एक व्यक्ति अथवा समूह की मर्जी से संचालित नहीं होता, बल्कि ऐसे कानूनों के माध्यम से शासनकर्म करता है, जिनको शासित वर्गों की सहमति प्राप्त हो. वह समन्वयवादी भी होता है. प्राचीन रूढि़यों, रीतिरिवाजों और परंपरा का तिरष्कार करने के बजाय वह उनके साथ तालमेल बनाकर चलने में विश्वास रखता है. तीसरा और सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि वह इच्छुक नागरिकों का शासन है. उसके प्रति नागरिकों की सहमति होती है. लोग समाज के सदस्य के रूप में बृहद हितों की खातिर अपनी प्राकृतिक स्वच्छंदता के एक हिस्से की बलि चढ़ाकर शासित होने को तैयार होते हैं. इस तरह का शासन लोगों से परे न होकर, नागरिक संस्था होती है. प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में दार्शनिक सम्राट की अवधारणा प्रस्तुत की थी. अरस्तु ने उससे असहमति जाहिर की थी. उसके अनुसार न्याय और निष्पक्षता के लिए शासन के निर्णयों में निर्वेयक्तिकता आवश्यक है. व्यक्ति चाहे कितना ही निष्पक्ष और विवेकवान क्यों न हो, उसका पूरी तरह निर्वेयक्तिक होना असंभव है. ऐसा राज्य लंबे समय तक निष्पक्ष नहीं रह पाता. अरस्तु ने न्याय के लिए कानून के राज्य पर जोर दिया है. उसके अनुसार नागरिकों के कल्याण को समर्पित शासन कानून का शासन भी होता है.

अरस्तु पर प्लेटो की महान कृति ‘दि लॉज’ का प्रभाव था. वह अपने गुरु की विलक्षण मेधा का सम्मान तो करता था, मगर किसी भी प्रकार के वैचारिक दबावों से मुक्त था. इसलिए उसकी स्थापनाएं अपने प्लेटो से प्रेरित होने के बावजूद स्वतंत्र एवं मौलिक हैं. लेकिन प्लेटो के विचारों में जहां आदर्श और कल्पना का पुट है, अरस्तु का दर्शन व्यावहारिकता के निकट है. दोनों के विचारों के अंतर को इससे भी समझा जा सकता है कि अरस्तु जिसे आदर्श राज्य मानता है, प्लेटो की निगाह में वह द्वितीय सर्वश्रेष्ठ राज्य है. जबकि प्लेटो की आदर्श राज्य संबंधी संकल्पना अरस्तु की निगाह में अव्यावहारिक है. अरस्तु के समय तक विभिन्न राजनीतिक दर्शन सामने आ चुके थे. उसने अपने समय के सभी प्रचलित शासनतंत्रों यथा राजशाही, गणतंत्र, निरंकुश शासन, कुलीन तंत्र, सौम्य प्रजातंत्र, भीड़ का शासन, अतिवादी लोकतंत्र आदि पर खुलकर विचार किया था. इनमें से निरंकुश शासन, अतिवादी लोकतंत्र, भीड़ के शासन को उसने निकृष्ट शासन पद्धति माना था. बाकी के बारे में उसका विचार था कि प्रत्येक प्रणाली की कुछ न कुछ दुर्बलताएं हैं. राज्य के आदर्श को नागरिक और शासन के कुशल तालमेल से ही प्राप्त किया जा सकता है. इसके लिए उसने लिखित संवैधानिक व्यवस्थाओं पर जोर दिया था. वह शासन को नागरिकों की जीवनशैली मानता था. उसका विचार था कि राज्य अपने लक्ष्य में तभी सफल हो सकता है, जब उसे अपने नागरिकों का संपूर्ण समर्थन प्राप्त हो.

ईसा से पांचछह शताब्दी वर्ष पहले का समय राजनीतिक दर्शनों के विकास का दौर था. बड़े राज्यों के गठन का सिलसिला आरंभ नहीं हुआ था और छोटे राज्य जिन्हें नगर राज्य भी कहा जा सकता है, धर्म की जकड़बंदी से बाहर थे. असल में वह दुनियाभर में बौद्धिक जागरण का समय था. भारत में महावीर स्वामी, अजित केशकंबली, कौत्स, गौतम बुद्ध, यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, पेरामेनडिस, चीन में कन्फ्यूशियस जैसे मानवतावादी चिंतक उसी दौर में जन्मे थे. मगध सम्राट अजातशत्रु द्वारा भेजे गए दूत महामंत्री वस्सकार के समक्ष उन्होंने गणतंत्रों का समर्थन किया था. जाहिर है उस समय तक राजनीति और दर्शन दोनों के केंद्र में मनुष्य था. गौतम बुद्ध द्वारा गणतांत्रिक संघों भी प्रशंसा, महावीर स्वामी का किसी भी प्रकार की हिंसा से बचने का संदेश, सुकरात का ‘शुभत्व’ एवं ‘सदगुण’ का विचार, प्लेटो की आदर्श राज्य की संकल्पना, अरस्तु का व्यावहारिक नैतिकता के आधार पर राज्यों के गठन का सुझाव तथा कन्फ्यूशियस की नैतिक शिक्षाएं—अलगअलग दिखने के बावजूद ये परस्पर मिलीजुली, एकदूसरे का पर्याय कही जाने वाली धाराएं थीं. उस दौर में जब सारे कामकाज ईश्वर तथा अन्य देवताओं के नाम पर किए जाते हों—मानवकल्याण को राज्य के गठन का औचित्य बताना बड़ी बात थी. इस आधार पर हम उस कालखंड को हम मानवइतिहास का सबसे परिवर्तनकारी दौर भी कह सकते हैं. उस समय तक साम्राज्यवाद भी महज एक अवधारणा तक सीमित था. हालांकि राजाओं की महत्त्वाकांक्षाएं नजर आने लगी थीं. रामायण और महाभारत को ईसा से 800—1500 ईस्वी पूर्व की रचना माना जाता है. दोनों में साम्राज्यवाद को जगह मिली है. ‘सम्राट’, ‘विराट’, ‘चक्रवर्ती’ जैसी संज्ञाएं साम्राज्यवादी भावनाओं की देन ही हैं. मगर अपने आदि स्वरूप में ये दोनों महाकाव्यों से प्रेरित हैं, जिनके कथानक नगरराज्यों के संघर्ष की कल्पना के आधार पर रचे गए थे.

दोनों महाकाव्य आज जिस रूप में मौजूद हैं, वह मात्र 2000—2200 वर्ष पुराना है. इस बीच उनमें इतना ज्यादा प्रक्षेपण हुआ है कि मूल रचना और वर्तमान स्वरूप में अंतर कर पाना असंभव हो चुका है. दरअसल इन महाकाव्यों को, उनके वर्तमान रूप तक आतेआते अनेक सामाजिकराजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों से गुजरना पड़ा है. उनके कथ्य और कथानक दोनों ही में समयानुसार बदलाव होते रहे हैं. जिस कालखंड की हम बात कर रहे हैं, उसमें धर्म और राजनीति का वैसा, मूल्यविहीन गठजोड़ नहीं हुआ था, जैसा परिवर्ती शताब्दियों में देखने को मिलता है. उस दौर में धर्म सामान्य नैतिकता से जुड़ा हुआ था. इस कारण वह समाज और राजनीति दोनों का मार्गदर्शक बना था. मगर बुद्ध के रहते साम्राज्यवाद को पर्याप्त जमीन न मिल सकी थी, किंतु उनके निधन के एक शताब्दी बाद ही भारत में साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाएं जोर पकड़ने लगी थीं. उससे समूची व्यवस्था केंद्राभिमुखी हो गई. महाकाव्यों के बहाने धार्मिकराजनीतिक साम्राज्यवाद का महिमामंडन किया जाने लगा. उसका असर न्याय पर भी पड़ा था. प्रकृति आधारित जीवन में समाज में पर्याप्त समानता थी. लेकिन केंद्र के मजबूत होने से अभिजन वर्ग तेजी से मजबूत होने लगा था. परिणामस्वरूप वे संस्थान जिनकी जिम्मेदारी समाज में न्याय का संवितरण करने की थी, कुछ शीर्षस्थ लोगों की मनमर्जी से चलने लगे. इससे उनकी नीतियां और कार्यशैली भी अभिजनोन्मुखी होती गईं. इस केंद्रवाद के विरुद्ध समयसमय पर आवाजें भी उठती रहीं. यत्किंचित सफलता मिली, मगर हालात कुल मिलाकर अभिजात वर्ग के पक्ष में ही बने रहे.

सुकरात आदि विचारकों ने मनुष्य की सर्वोच्चता को स्वीकारा, उसे दुनिया में किसी भी वस्तु के सापेक्ष वरीयता दी थी. स्थापित किया था कि मनुष्य शक्तिशाली होने के कारण श्रेष्ठतम नहीं है. श्रेष्ठता का आधार उसका विवेक है. अपने अंतःकरण की शुभता के विस्तार के साथ ही मनुष्य अपने श्रेष्ठत्व की रक्षा कर सकता है. सुकरात के समकालीन प्रोटेगोरस का मानना था कि सृष्टि में—‘सामान्य वस्तुजगत जैसा वह है, और जैसा वह नहीं है. उन वस्तुओं का भी जो नहीं हैं. और जैसी वे नहीं हैं—के मूल्यांकन की एकमात्र कसौटी मनुष्य है.’4 मानवतावाद का उदय, जिसे सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, कन्फ्यूशियस जैसे विचारकों ने आवाज दी थी. वह धर्म और राजनीति में पनप रहे वर्चस्ववाद के विरुद्ध बड़ी आवाज थी, उसका नेतृत्व यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, प्रोटेगोरस, जीनो, चीन में कन्फ्यूशियस, ताओ आदि कर रहे थे. भारत में बौद्ध, जैन, आजीवक, लोकायत आदि दर्शन व्यक्ति को मानववैचारिकी के केंद्र में लाने की कोशिश कर रहे थे. उन्हें किंचित सफलता भी मिली थी. किंतु भिन्न परिस्थितियों के कारण उनका परिणाम ठीक वैसा नहीं निकला, जैसा पश्चिम में निकला था. इस बहाने हम भारतीय और पश्चिमी चिंतन के मूल अंतर पर विचार कर सकते हैं. वहां धर्म सामान्य नैतिकता को प्राप्त करने का एक माध्यम है. मृत्युपार जीवन एवं अमरता जैसे बिंदुओं पर वहां ज्यादा जोर नहीं दिया जाता. सुकरात, प्लेटो, कन्फ्यूशियस, जीनो से लेकर अरस्तु और तत्कालीन अन्य पश्चिमी विद्वानों के चिंतन की धुरी मनुष्य है. वे ईश्वर जैसी पराशक्ति की कल्पना तो करते हैं, मगर वह मनुष्य की सामान्य पहुंच से बाहर नहीं रहती. बुद्ध और सुकरात दोनों का मानना था कि ‘शुभत्व’ एवं ‘सद्गुणों’ में पैठ मनुष्य को इसी जीवन में पराशक्ति जितना महत्त्वपूर्ण बना सकती है. प्रोटेगोरस भी वस्तु जगत को मानवीय उपयोगिता की दृष्टि से देखता है. उसके अनुसार कोई वस्तु उतनी ही उपयोगी है, जितनी मनुष्य उसे उपयोगी मानता है. इसमें भौतिकवाद के बीजतत्व देखे जा सकते हैं. यह संकल्प एक तरफा नहीं हो सकता. वस्तुजगत मानवमात्र के लिए तभी उपयोग रह सकता है जब मनुष्य भी उसके प्रति अपनी भूमिका को पहचाने. चूंकि प्रत्येक मनुष्य की दृष्टि स्वतंत्र होती है, इसलिए वह वस्तुओं का आकलन अपने विवेक और सुख के आधार पर करने को स्वतंत्र है.

भारतीय धर्मदर्शन में पराशक्ति के आगे मनुष्य और वस्तुजगत दोनों का महत्त्व गौण हो जाता है. यहां शुभता और सद्गुणों को ईश्वरीय लक्षण माना गया है. जिसके लिए ईश्वरीय इच्छा का होना आवश्यक है. ईश्वरीय क्या है? यह बताने के लिए व्यक्ति और परमात्मा के बीच पुरोहित मौजूद है. वह प्रत्येक स्थिति की स्वार्थानुकूल व्याख्या करता है. जाति के आधार पर बंटे भारतीय समाज में बौद्धिक नेतृत्व ब्राह्मण के अधीन रहा है, जिसकी प्राथमिकता लोकहित न होकर, वर्गीय स्वार्थ रहते हैं. परिणामस्वरूप भारतीय समाज शोषक और शोषित में बंटता गया. एक वर्ग जो किन्हीं कारणवश सत्ता से विलग था, वह शोषण और उत्पीड़न का शिकार होने लगा. आज स्थितियां बदली हैं, लेकिन स्थिति कमोबेश वैसी ही है. उल्लेखनीय है कि भारत में जो कार्य पुरोहित वर्ग कर रहा था, यूनान में वही सोफिस्ट कर रहे थे. उन्हें पहली चुनौती सुकरात की ओर से मिली. अपने समय का वह विलक्षण विद्वान, विमर्शयोगी वर्षों तक अकेला ही सोफिस्टों के साथ बौद्धिक बहस करता रहा. उसने अपने समर्थकों और शिष्यों की पूरी पीढ़ी तैयार की. सुकरात और उसके साथियों के प्रभामंडल में सोफिस्टों के बौद्धिक पाखंड की कलई खुलने लगी थी, लेकिन उस संघर्ष में आरंभिक जीत सोफिस्टों के हाथ लगी. सुकरात को मृत्युदंड झेलना पड़ा. बाद में प्लेटो, अरस्तु, जीनो आदि विचारकों ने बौद्धिक क्रांति का ऐसा आगाज किया कि सोफिस्ट बेचारे बगलें झांकने लगे. उस क्रांति का असर कई शताब्दियों तक बना रहा. लेकिन मध्यकाल तक आतेआते उस वैचारिकी की आंच मद्धिम पड़ने लगी थी. धर्म का प्रभामंडल बढ़ने लगा था. उससे सारी नैतिकताएं और आदर्श ईश्वर तथा उसके प्रतिनिधियों में अवस्थित कहे जाने लगे.

एक प्रवचन के दौरान सेंट पॉल(The Act-xvii 28) कहता है—‘हम उसमें ही रहते हैं, उसमें ही विचरण करते हैं. उसमें ही हमारा अस्तित्व है.’ भारतीय दर्शनों में इसे ‘सर्व खाल्विदं ब्रह्म’ कहा गया है. मान्यता रही है कि उसे केवल ईश्वरीय कृपा से प्राप्त किया जाता है. आगे चलकर पूरब की तरह पश्चिम में भी न्याय को धर्म के संबंध में परिभाषित किया जाने लगा. मध्यकाल में वहां भी ईश्वर को समस्त जागतिक शुभता का केंद्र मान लिया गया. मानवकल्याण तथा सद्गुणों का महत्त्व ईश्वर को प्रसन्न करने की मनोकामना तक सिमट गया. धीरेधीरे धर्म के घटाटोप में न्याय शब्द विलीन होने लगा. या यूं कहें कि कुछ कर्मकांडों, ऊपरी आवरण तक सिमटकर रह गया. भारत जैसे देशों में तो धर्म को ही न्याय कहा जाने लगा था. हालांकि धर्म का कोई स्थायी रूप न था. न ही लोग उसे लेकर एकमत थे. उसकी अलगअलग परिभाषाएं थीं, अलगअलग मापदंड. अधिकांश लोग पुरोहितों और पंडितों द्वारा किए जाने वाले कर्मकांड को ही धर्म समझ लेते थे. इस कारण धर्म का स्वरूप, देश, काल, समय और व्यक्ति की अपनी भावनाओं के अनुसार बदलता रहता था. धार्मिक होने की कोई कसौटी तक न थी. व्यक्ति कुछ और न करे, बस इतना कह भर दे कि वह धार्मिक है, तो भी उसको धर्मविशेष का अनुयायी मान लिया जाता है. जिंदगीभर आधीअधूरी आरती गाकर या माला फेरकर भी धार्मिक होने का गौरव हासिल किया जा सकता है. इस तरह धर्म का दूसरा अर्थ अपने पूर्वाग्रहों या विश्वास का खुलासा कर देना भर है. यह भी न हो तो जन्म के आधार पर भी व्यक्ति का धर्म सुनिश्चित हो जाता है. यह उस समय तक बना रहता है, जब तक व्यक्ति स्वयं धर्म से बाहर जाने की विधिवत घोषणा न कर दे. धर्म की परिसीमा को लांघना लगभग असंभव है. अनेक व्यक्तियों के लिए धर्मानुसरण मजबूरी या परंपरापोषण बनकर रह जाता है. यदि धर्म जन्म से लादा न जाए, व्यक्ति को अपनी रुचि या आजीविका के अनुसार धर्म चुनने की भी आजादी हो, तो आधे से अधिक लोग खुद को धर्म के दायरे में लाने की कोशिश तक न करे करें. संभव हो तो अपनी रुचि, जरूरत और विश्वास के अनुसार एकाधिक धर्मों में साझा करें. वह स्थिति पुरोहितों और धर्म के नाम पर धंधा करने वाले धर्माचार्यों के प्रतिकूल सिद्ध होगी. हो सकता है इसकी घोषणा के सालभर के भीतर ही उनकी सारी दुकानदारी बंद हो जाए. इस बात को धर्म की धंधागिरी करने वाले भी भलीभांति जानते हैं. इसलिए जन्म के साथ ही शिशु को धर्म के खूंटे से बांध देने के प्रति सहमति हर धर्म, प्रत्येक संपद्राय में है. कुल मिलाकर धर्म अपने अनुयायियों की मूक सहमति पर भी बना रहता है, जबकि न्याय के लिए प्रबुद्ध नागरिकों की मुखर सहमति अनिवार्य है. यदि समाज में न्याय को लेकर सर्वसम्मति नहीं है, तो कहा जाना चाहिए कि उस समाज में या तो बहुत अधिक मतभेद हैं अथवा न्यायप्रणाली पर लोगों का भरोसा नहीं है. दूसरे यह भी संभव है कि शासन ने लोगों को अपनी न्यायव्यवस्था से परचाने में कोताई बरती है. कुल मिलाकर न्याय की सर्वस्वीकार्यता ही उसे न्याय बनाती है.

प्लेटो और अरस्तु दोनों की न्याय संबंधी अवधारणाओं में विरोधाभास भी कम न थे. उन दोनों ने ही दास प्रथा का समर्थन किया था. उसे वे समाज की आवश्यकता के रूप में देखते थे. कह सकते हैं कि प्लेटो का आदर्श राज्य तथा अरस्तु का नैतिकता समर्पित राज्य दोनों अभिजनोन्मुखी व्यवस्थाएं थीं. दोनों व्यवस्थाओं में दासों को न्यूनतम मानवीय अधिकारभी अप्राप्य थे. यहां तक कि उन्होंने दासों की स्थिति को विचारयोग्य भी नहीं माना था. इसका कारण यह भी हो सकता है कि प्लेटो और अरस्तु दोनों उच्च कुल से संबंधित थे. प्लेटो तो एथेंस की सत्ता के प्रमुख दावेदारों में से था. जबकि अरस्तु को सिंकदर का गुरु होने का गौरव प्राप्त है. वह स्वयं मकदूनिया के कुलीन परिवार से था. जाहिर है, भारतीय ब्राह्मणों की भांति यूनानी विचारक भी वर्गीय पूर्वाग्रहों से मुक्त न थे. स्त्रियों के संदर्भ में प्लेटो अपने समकालीन विचारकों की अपेक्षा उदार था. वह उन्हें पुरुषों के बराबर अधिकार दिए जाने के पक्ष में था, जबकि अरस्तु की लैंगिक आधार पर समाज के विभाजन के प्रति सहमति थी. उसका मानना था कि बौद्धिक और प्राकृतिक स्तर पर पिछडे़ व्यक्ति, सामाजिक स्तर पर भी पिछड़े होंगे. अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ’पा॓लिटिक्स’ में वह लिखता है, ‘सुशासित राज्य में ऐसे नागरिक जो बौद्धिक और शारीरिक रूप से अक्षम हैं, उनके सामाजिकराजनीतिक अधिकार भी आनुपातिक रूप में सीमित हो जाते हैं.’

न्याय की सार्वभौमिकता को लेकर प्राचीन भारत में भी कमोबेश यही स्थिति थी, मगर ईसा से सातआठ सौ वर्ष पहले वर्णव्यवस्था निकृष्ट जातिप्रथा का रूप लेने लगी थी. मनुस्मृति, कात्यायन स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि ग्रंथों में न केवल वर्णव्यवस्था के जाति में बदलने के प्रति मौन सहमति है, बल्कि उन समाजार्थिक असमानताओं को भी स्वाभाविक मान लिया गया है, जो धर्म और जाति की जकड़बंदी की देन थीं. मनुस्मृति में स्त्री को दोयम दर्जे का नागरिक माना गया है. उन्हें किसी मुकदमे के दौरान साक्षी नहीं बनाया जा सकता था. मनु महाराज को स्त्री की बौद्धिक क्षमताओं पर भी भरोसा न था. इसलिए स्त्री की अवमानना का कोई अवसर वह चूकना नहीं चाहता—‘निर्लोभ मनुष्य अकेला भी साक्षी के लिए पर्याप्त है. किंतु स्त्रियां अनेक होकर भी गवाही नहीं दे सकतीं. क्योंकि स्त्री चंचल, उसकी बुद्धि अस्थिर होती है.’5 स्त्रीअधिकारिता को लेकर समकालीन भारतीय विचारकों की मान्यताएं भी इसी प्रकार की थीं. मनु सहित तत्कालीन आचार्यों का यह असमानताकारी विधान केवल स्त्रियों तक सीमित न था. समाज के तीनचौथाई हिस्से को भी शूद्र की श्रेणी में रखकर उसे सामान्य न्याय से वंचित कर दिया गया था. उस व्यवस्था में धार्मिकराजनीतिक अभिजन को जो अधिकार प्राप्त थे, उनका शतांश भी महिलाओं और शूद्रों को प्राप्त नहीं था. कह सकते हैं कि न्याय की अपेक्षाओं के साथ लागू आरंभिक धर्माधारित विधान तथा शीर्षस्थ शक्तियों के वर्गीय स्वार्थ में घिरकर न्याय पटरी से उतर चुका था. परिणामस्वरूप पूरी व्यवस्था समाज के बड़े वर्ग के लिए शोषणकारी तंत्र का रूप ले चुकी थी.

आरंभ में आर्थिक अभिजन का विकास नहीं हो पाया था. उसके अवसर भी कम ही थे. आय का स्रोत या तो पशुधन होता था, अथवा भूसंपदा. दोनों ही पर समाज के शीर्षस्थ वर्गों का अधिकार था. वह व्यवस्था शताब्दियों तक बनी रही. धीरेधीरे शिल्पकर्म का विकास हुआ. समाज में शिल्पकारों की मांग बढने लगी. आरंभ में शिल्पकार वर्ग स्वयं अपनी बनाई कृतियों का व्यापार करता था. उनके संगठन देशदेशांतर में समूहबद्ध होकर व्यापार करते थे. कालांतर में मांग बढ़ने के साथ निर्माण और व्यापार दोनों को साधना कठिन होने लगा. इससे बिचौलिये के रूप में व्यापारी वर्ग का उदय हुआ जो उत्पादक और क्रेता के बीच पुल की तरह काम करने लगा. 2600—2700 वर्ष पहले तक इस वर्ग ने अपनी आर्थिक हैसियत इतनी मजबूत कर ली कि राजनीतिक और धार्मिक अभिजनों के लिए उसकी उपेक्षा करना असंभव हो गया. राजकीय आयोजनों में श्रेष्ठि वर्ग को ससम्मान आमंत्रित किया जाने लगा था. परिणाम यह हुआ कि समाज में तीसरे वर्ग को भी अभिजन की श्रेणी में शामिल करना पड़ा. उससे शिल्पवर्ग, किसान और मजदूर जो समाज का वास्तविक उत्पादक वर्ग था, चैथी श्रेणी में खिसक गया. धार्मिक शक्तियों ने चतुराईपूर्वक चार वर्णो को मान्यता दे दी. यह मात्र 2200-2300 वर्ष पुरानी घटना है. उस समय तक न केवल, भारत बल्कि दुनिया के सभी देशों में धर्म का प्रभुत्व कायम हो चुका था. परिणामस्वरूप सभी कार्य तीसरीचैथी अदृश्य शक्तियों, जिन्हें ईश्वर, देवता आदि कहा जाता था, जबकि असलियत में उनका अपना कोई अस्तित्व न था, के नाम पर होने लगे. इससे व्यक्ति और व्यक्ति कल्याण जैसे शब्द विमर्श से गायब होने लगे; अथवा उन्हें खास संदर्भ में देखा जाने लगेगा.

चूंकि ईश्वर अभिजन मनोरचना थी तथा उसे सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञाता, संसार के सर्जक के रूप में प्रयुक्त किया था, इसलिए उसका व्याख्याता होने का दावा करने वाला ब्राह्मण हमेशा ही शीर्ष पद का दावेदार बना रहा. बाकी वर्गों की सामाजिक हैसियत ब्राह्मणों द्वारा की गई व्याख्या द्वारा निर्धारित थी. अपनेअपने स्वार्थ के वशीभूत शेष दोनों वर्ग ब्राह्मणों द्वारा विनिर्मित व्यवस्था का समर्थनसंवर्धन करते रहे. शीर्षस्थ तीनों वर्गों वैश्य, ब्राह्मण एवं क्षत्रिय की संख्या कुल जनसंख्या के चैथेपांचवे हिस्से तक सीमित थी, जबकि निर्णय लेने के सारे अधिकार और अस्सी प्रतिशत संसाधन इन्हीं वर्गों के अधिकार में थे. चौथे वर्ग के शेष तीनचौथाई से अधिक लोग उनकी मनमानी सहने को विवश थे. यहां एक बात विचारणीय है. यह कि जातिप्रथा का प्रभाव केवल भारत तक सीमित था, किंतु किसी न किसी आधार पर समाज का लगभग ऐसा ही स्तरीकरण दुनिया के उन सभी देशों में हुआ जहां संस्कृति धर्म की चेरी बन चुकी थी; और धर्म सभ्यता के प्रत्येक चरण पर छाया हुआ था. जहां और कुछ न मिला, वहां पूजापद्धति और विश्वास के आधार पर धर्म के भीतर ही अनेक पंथ बना दिए गए. पूजापद्धति, परंपरा, टोटम और आराध्य के नाम पर एकदूसरे को मरनेमारने पर उतारू लोग समाज के जातीय विभाजन तथा उसके माध्यम से होने वाले उत्पीड़न के आगे मौन रहते थे. सही मायने में वे अभिजनसंस्थाएं थीं. जिनका गठन समाज के अभिजात वर्ग द्वारा अभिजन हितों की सुरक्षा के लिए किया गया था. भारत में धर्म सांस्कृतिक बदलावों के अलावा निकृष्ट जातीय विभाजन का भी आधार बना था, जिसने सामाजिक असमानता को स्थायी रूप देने में मदद की. कालांतर में धर्म और जातिप्रथा का संबंध नाभिनाल का बन गया. अपनेअपने स्वार्थ के लिए दोनों एकदूसरे का समर्थनसंबर्धन करने लगे. ऐसा नहीं है कि धर्म और जातिप्रथा का कभी विरोध ही नहीं हुआ. जातिप्रथा पर बड़ी चोट गौतम बुद्ध की ओर से पड़ी थी. जैन धर्म ने भी अपनी तरह से ब्राह्मणों के कर्मकांड और जाति प्रथा को चुनौती देने की कोशिश की. किंतु कालांतर में वह स्वयं एक जाति के रूप में सिमटकर रह गया. बुद्ध के अनुयायी भी जाति, वर्ण, तंत्रमंत्र आदि में विश्वास करने लगे. चूंकि धर्म और जातिप्रथा दोनों ही सामाजिक असमानता के पोषक और संवर्धक थे, अतएव इनके चलते भारत में सांस्कृतिकसामाजिक न्याय सदैव एक सपना बना रहा. निहित स्वार्थ के लिए भारतीय मनीषी धर्म का महिमामंडन करते रहे. इससे भारत में सामाजिक न्याय के लक्ष्य को छूना सदैव चुनौतीपूर्ण रहा है. सामाजिकसांस्कृतिक असमानताओं के चलते भारतीय समाज सदैव आंतरिक संघर्ष और विक्षोभों की संघर्षस्थली बना रहा. आशय है कि जिस धर्म को समाज में न्याय और नैतिकता की स्थापना हेतु उपकरण के तौर पर अपनाया गया था, कालांतर में उसके आगे न्याय एवं नैतिकता का महत्त्व गौण पड़ने लगा. निरर्थक कर्मकांड और जड़ विश्वास न्याय एवं नैतिकता का स्थान लेने लगे. यह समाज में धार्मिक शक्तियों के बलशाली होते जाने का प्रमाण था. आगे चलकर यह भारतीय चिंतन परंपरा के प्रमुख चरित्र में ढलता गया. ऐसे बुद्धिविरोधी परिवेश में वाराहमिहिर जैसा खगोलशास्त्री और गणितज्ञ भी यदि अपनी प्रतिभा मूर्तियों की कदकाठी और रूपाकार तय करने में खपाने लगे तो आश्चर्य क्यों हो. उसने मौलिक चिंतन को अवरुद्ध करने का काम किया.

मध्यकालीन यूरोप में संत अगस्ताइन(13 नवंबर, 354—28 अगस्त 430), थाॅमस एक्वीनस(1225—7 मार्च 1274) आदि ने न्याय की व्याख्या के लिए ईसाइयत को आधार बनाया. ईसा मसीह का चरित्र समाज के विपन्न और सर्वहारा का प्रतिनिधित्व करता था. इसलिए उसमें न्याय एवं नैतिकता को लेकर मौलिक चिंतन लगातार होता रहा. संत अगस्ताइन और एक्वीनस दोनों ही मध्यकालीन धर्म और न्याय के बीच सेतु बनाने के समर्थक थे. दोनों में से एक आदर्शवादी था, दूसरा व्यवहारवादी. प्लेटो से प्रभावित अगस्ताइन मानवादर्शों को महत्त्व देता था, मगर ईसाइयत से परे झांकने का उसमें साहस न था. वह न्याय को धर्म की उपलब्धि के रूप में देखता था. अगस्ताइन के अनुसार ‘न्याय उन चार चीजों में प्रमुख है, जिनके माध्यम से ईश्वर को प्यार किया जा सकता है.’ मानवादर्श एवं नैतिकता की उठान को दर्शाने वाले अन्य बुनियादी सद्गुणों से भेद करते हुए अगस्ताइन ने न्याय को व्यक्ति एवं शेष समाज के मध्य ‘पवित्र रिश्ते’ की संज्ञा दी है. न्याय पथ पर गतिमान व्यक्ति ही अपने और शेष समाज के बीच पवित्र रिश्ता बना सकता है. न्याय न केवल व्यक्ति के भीतर सहिष्णुता और समरसता पैदा करता है, बल्कि अन्य सद्गुणों की भांति यह भी हमें ईश्वरीय साक्षात का पात्र बनाकर उत्तरोत्तर उसके करीब ले जाता है. न्याय पथ पर बढ़ रहे व्यक्ति की पहली लड़ाई अपने आप से ही होती है. उसका पहला चरण अपने मन में छिपे ‘शुभत्व’ की पहचान से शुरू होता है, ‘न्याय मनुष्य के अंतर्मन में छिपा होता है.’ अच्छे और बुरे के बीच मानवमन का अंतद्र्वंद्व हमेशा चलता रहता है. सामान्य नैतिकता मनुष्य के आत्मसंघर्ष के दौरान नकारात्मक वृत्तियों के शमन में सहायक होती है. जब तक यह संघर्ष समाप्त नहीं हो जाता, तब तक न्याय की प्राप्ति भी अलभ्य बनी रहती है. इसलिए न्याय की चाहत रखने वाले मनुष्य को उसकी शुरुआत अपने आप से ही करनी पड़ती है.

अगस्ताइन प्लेटो के आदर्श राज्य की संकल्पना को पसंद करता था. लेकिन प्लेटो का आदर्श राज्य जहां श्रेष्ठतम मनुष्यों की मिलीजुली सर्वोत्तम रचना थी, वहीं अगस्ताइन का आदर्श राज्य ईश्वरीय अनुकंपा और उसकी उपस्थिति से बनता है. अपनी इस आदर्शवादी कल्पना को अगस्ताइन ईसाइयत के माध्यम से संभव बनाना चाहता था. उसका कहना था कि प्लेटो के आदर्शवाद एवं अरस्तु के नैतिकता केंद्रित व्यवहारवाद को धर्म के संदर्भ में देखना चाहिए. उसके अनुसार धर्म मनुष्य को विनम्र बनाता है. धर्म में विश्वास रखते हुए ही न्याय के लक्ष्य को संभव बनाया जा सकता है. इसके लिए आंतरिक शुद्धता अपरिहार्य है. न्याय का ध्येय प्रत्येक व्यक्ति को वह सबकुछ देना है, जो उसका है, जिसकी उसे आवश्यकता है; या जो उसे मिलना चाहिए. ईश्वर सत्य और मानवउद्धार की भावना के परे कुछ नहीं है. जो लोग न्याय और सचाई के रास्ते पर हैं, वही ईश्वर के रास्ते पर भी हैं. जागतिक संसार ईश्वरीय चेतना का विस्तार है. न्याय ईश्वर के प्रति प्रार्थना है. जबकि अन्याय पाप और ईश्वर के प्रति अपराध. ईश्वरीय न्याय ही दैविक न्याय है, जिसमें न्यायपथ पर चल रहे व्यक्ति के हिस्से ईश्वरीय अनुकंपाएं आती हैं, जबकि न्याय की अवमानना करने वालों के प्रति ईश्वर का कोप. न्याय की कामना करने वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह खुद को पहले अपने आप से, फिर पड़ोसी से और उसके बाद शहर या गांव से जोड़े. अगस्ताइन को न्याय बिना ईश्वरीय अनुकंपा के कहीं दिखाई नहीं पड़ता. इसके पीछे उसके जीवन की त्रासदी को देखा जा सकता है. अगस्ताइन का जन्म अफ्रीका मे हुआ था. उसका बचपन बड़ी संघर्षमयी परिस्थितियों में बीता था. अतएव जीवन की प्रत्येक उपलब्धि, अप्रत्याशित की प्राप्ति उसे ईश्वरीय अनुकंपा प्रतीत होती थी. सिसरो के शब्दों में राज्य, ‘अधिकारों तथा सामान्य हितों पहचान तथा सामान्य कल्याण की प्राप्ति हेतु— मानवीय संबंधों का सुदृढ़ एवं बहुआयामी अनुबंध है.6 रोमन साम्राज्य के वैभव एवं उसकी बौद्धिक उपलब्धियों की प्रायः सभी विचारकों ने प्रशंसा की है. लेकिन अगस्ताइन को उससे संतोष न था. उसका मानना था कि रोमन साम्राज्य सिवाय एक बेहतर राजनीतिक बस्ती के और कुछ न था. अपनी चर्चित पुस्तक ‘सिटी आफ गाड’ में अगस्ताइन ने लिखा था कि रोमवासी बुतपरस्त और दुनियावी लोग थे. सच्चा न्याय केवल ‘ईश्वर के राज्य’ में संभव हो सकता है. स्थायी न्याय के लिए राज्य को ईश्वरीय अनुराग पर टिका होना चाहिए. कानून का राज्य जैसी कोई अवधारणा नहीं हो सकती. जिस राज्य में न्याय नहीं हैं, मान लेना चाहिए कि वहां कोई कानून भी नहीं है.’

अगस्ताइन ईसाई धर्म की करुणा को राज्य की न्यायभावना का आदर्श मानता था. इसलिए सिसरो द्वारा दी गई राज्य की परिभाषा जिसके अनुसार राज्य वस्तुतः ‘राज्य सामान्य हितों की प्राप्ति तथा मानव अधिकारों की पहचान हेतु नागरिकों का मजबूत बहुआयामी गठजोड़ है’—का उसने समर्थन किया था. उसके अनुसार न्याय का अभीष्ट है कि कोई भी व्यक्ति किसी को भी नुकसान न पहुंचाए; तथा उनमें से प्रत्येक को जरूरतमंद की इतनी मदद करनी चाहिए, जितनी वह कर सकता है. लेकिन राज्य का काम अपने नागरिकों की मदद करने मात्र से नहीं चल पाता. राज्य की उदारता तो उसकी नीतियों तथा उसके लिए किए गए गंभीर प्रयत्नों में नजर आनी चाहिए. राज्य को हमेशा यह कोशिश करनी चाहिए कि उसके प्रत्येक नागरिक को अपने विकास का अवसर मिले. किसी आपदा अथवा संकट के समय नागरिकों की मदद करना अच्छे राज्य का लक्षण हो सकता है. लेकिन चैरिटी को ही न्याय का पर्याय मान लेना भारी भूल होगी. ‘खैरात ऐसा विकल्प नहीं है, जिससे न्याय की पूर्ति हो सके.’7 अगस्ताइन के अनुसार आदर्श समाज का गठन बिना ईश्वरीय प्रेरणा के असंभव है. इसके लिए वह सामाजिक अनुशासन से अधिक व्यक्तिगत अनुशासन को महत्त्व देता है. उसका मानना था कि समाज परिवर्तनशील है. वह घूमफिर कर फिर उसी स्थान पर लौट आता है. व्यक्ति को इससे बचना चाहिए. उसके अनुसार, ‘यदि नागरिक स्वयं मर्यादित नहीं होंगे तो निश्चित रूप से उनसे बनी सभा भी मर्यादित नहीं रह पाएगी.’8

अगस्ताइन और एक्वीनस के बीच लगभग आठ शताब्दियों का अंतर है. वैचारिक दृष्टि से देखें तो इस अंतराल को हम ठहरा हुआ पाते हैं. उस समय तक धर्म और साम्राज्यवाद एक हो चुके थे. मनुष्य की आध्यात्मिक चेतना एवं जिज्ञासाओं के समाधान के रूप में उभरा धर्म साम्राज्यवादियों के लिए बड़ा हथियार सिद्ध हुआ था. जनसाधारण को बताया जाने लगा कि उनकी सत्य की तलाश पूरी हो चुकी है. उस सत्य के कई रंग थे. वह भारत में जाति और वर्ण के अलगअलग खानों में बंटा हुआ था. उनके बीच अलंघ्य दूरियां थीं. बुद्धिजीवी वर्ग का भी उसे समर्थन था. परिणाम यह हुआ कि पूरब और पश्चिम में हर जगह समाज की मेधा का बड़ा हिस्सा अपनेअपने धर्म के महिमामंडन में जुट गया. लोगों की रुचि और जरूरत के अनुसार देवता गढ़े जाने लगे. धर्म जीवन की उपयोगिता तीसरी शक्ति को प्रसन्न करने में खोजता था. उसके प्रभाव में प्रयाण गीत के स्थान पर प्रार्थनाएं गाई जाने लगीं. पुरुषार्थ के स्थान पर दैन्य छाने लगा. चाटुकारिता के उस दौर में स्वाभिमान मरने लगा. मनुष्य मनुष्य को महत्त्व दे, पूरे समाज की खुशी के लिए काम करे—इस विचार का अब कोई महत्त्व नहीं रह गया था. शुभता और सद्गुण जिन्हें गौतम बुद्ध, सुकरात, कन्फ्यूशियस जैसे महान विचारकों ने मनुष्य में अवस्थित मानते हुए मानवीय पहचान से जोड़ा था, वे ईश्वर में अवस्थित कहे जाने लगे. न्याय और समानता के दुर्दिनों की शुरुआत वहीं से हुई. धर्म के केंद्रीयवाद ने साम्राज्यवाद को शक्तिशाली बनाया था. इससे उसके निर्णयों पर निरंकुशता छाने लगी. धर्म के नाम पर, देवता के नाम पर शोषण के नएनए तरीके खोजे जाने लगे. उन्हें पुरोहित वर्ग का पूरा समर्थन हासिल था. इससे असमानता पनपी. समाज साधारण, विशिष्ट और अतिविशिष्ट लोगों में बंटने लगा. जो विशिष्ट और अतिविशिष्ट श्रेणी के थे, उनके लिए जनसाधारण का, सिवाय इसके कि वे शासित रहकर उसके शासक होने के दर्प की पूर्ति करते थे—कोई महत्त्व न था.

क्षीण होती नैतिकता के प्रभाव में न्याय के मायने दंड और पुरस्कार तक सीमित रह गए. मौलिकता से कट जाने के कारण बारबार पीछे मुड़कर देखने की प्रवृत्ति ने जन्म लिया. भारत में बारबार वेदों, उपनिषदों, पुराणों और महाकाव्यों की दुहाई दी जाने लगी तो पश्चिम में किसी न किसी बहाने सुकरात, प्लेटो और अरस्तु से संदर्भ लेकर ज्ञानसाधना की भूख का समाधान किया जाने लगा. 2500—2600 वर्ष पहले ज्ञान का जो प्रकाश पूर्व और पश्चिम दोनों जगह लगभग साथसाथ फैला हुआ था, उसका तेज दोनों ही जगह मद्धिम पड़ने लगा. प्रकृति के सान्निध्य में पलने वाले आदिम मनुष्य की आध्यात्मिक जिज्ञासा जो कभी बहते नीर के समान निर्मलपावन थी, वह धर्म और संप्रदाय के नाम पर बने तालाबों, पोखरों में फंसकर गंदली होने लगी. शताब्दियों बाद भी प्लेटो, अरस्तु, सुकरात, गौतम बुद्ध आदि प्रासंगिक बने रहे तो इसका कारण यह भी है कि धर्म हमारे दिलोदिमाग पर कब्जा कर, हमारे मौलिक चिंतन पर कब्जा कर चुका था. अगस्ताइन ने प्लेटो के आदर्शवाद पर जोर दिया था. उससे आठ सौ वर्ष बाद जन्मा थाॅमस एक्वीनस अरस्तु के नैतिक दर्शन का समर्थक था. उसने मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों पर जोर दिया था. लेकिन ईश्वर के नाम पर. यह कहते हुए कि ईश्वर ऐसा चाहता है. न कि इसलिए कि मानवीय स्वतंत्रता की गरिमा हेतु मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों की सुरक्षासंरक्षा आवश्यक है. कुछ खूबियां भी उसकी विचारधारा में थीं. यदि वे न होतीं तो आठ सौ वर्ष लंबे अंतराल में विस्मृति उसे कभी का शिकार बना चुकी होती. एक्वीनस का जोर मानवीय नैतिकता पर था. धर्म को वह समाज में न्याय एवं नैतिकता की स्थापना के लिए आवश्यक मानता था. उसकी आस्था शुभत्व की भावना से प्रेरित थी. एक्वीनस का सुझाव था कि मनुष्य को स्वयं को नैतिकता की कसौटी पर लगातार कसते रहना चाहिए. प्रकृति के सापेक्ष लोक उत्तरवर्ती रचना है. अतएव ईश्वरीय नियमों की महत्ता लौकिक नियमों से अधिक है. तदनुसार मनुष्य के मौलिक अधिकार किसी राज्य अथवा समाज के अधिकार से बढ़कर नहीं होने चाहिए. उसके अनुसार न्याय सदैव ईश्वरीय सत्ता पर निर्भर होता है. अरस्तु की न्याय की परिभाषा को आगे बढ़ाते हुए एक्वीनस ने लिखा था—न्याय मानव समाज का हिस्सा है. जिसके अनुसार प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि नागरिक कल्याण के लिए वह सब करे, जीजान से करे, जो वह कर सकता है.

फिर न्यायाधीश किसे माना जाए? एक्वीनस इसके बारे में भी आश्वस्त है. न्यायाधीश को ‘न्यायमूर्ति’ की संज्ञा दी है—‘न्यायाधीश वह है जो अपने आदेश और निर्देश के माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति को वह सब देता है, जिसका वह अधिकारी है. उसके अनुसार न्याय का मानवीकरण ही न्यायाधीश है. वही न्याय का संरक्षक भी है.’9 वह हमेशा यह ध्यान रखता है कि मनुष्य को जो अधिकार प्राकृतिक रूप से प्राप्त हैं, उनमें किसी भी प्रकार की कटौती न हो. ईश्वर प्रथम न्यायकर्ता, सबसे बड़ा न्यायाधीश है. वह सबको प्राकृतिक न्याय का बोध कराता है, जिसमें सबके लिए समानता और स्वतंत्रता है. यही कारण है कि प्राकृतिक न्याय, लौकिक न्याय से सदैव ऊपर होता है. उनमें कोई विरोधाभास भी नहीं है. समाज का गठन ही सामान्य अधिकारों की पहचान के साथसाथ परस्पर सहयोग करते हुए आगे बढ़ते रहने के लिए हुआ है. अरस्तु ने न्याय को संवितरणात्मक और योग्यतानुपाती माना था. संवितरणात्मक न्याय राज्य की उदारता, कार्यक्षमता और सामाजिक दायित्वों के प्रति उसकी गंभीरता का द्ययोतक है. वह सामाजिक विषमताओं के समाधान हेतु राज्य की गंभीरता तथा उसके कौशल को दर्शाता है. योग्यतानुपाती न्याय राज्य की नागरिकों की योग्यता और आवश्यकता के अनुसार, कारगर निर्णय लेने की योग्यता का प्रदर्शन करता है. इसका संबंध नागरिकों की योग्यता तथा उनके द्वारा समाज के हित में किए गए योगदान से है. न्याय की परिभाषा को लेकर एक्वीनस की अरस्तु से सहमति थी. उसके अनुसार न्याय सभी सद्गुणों में सर्वोत्तम है. मानवमात्र का कर्तव्य है कि समाज में न्याय की श्रीवृद्धि के लिए निरंतर प्रयत्नरत रहे. यह दूसरों से अपेक्षा के चलते हरगिज नहीं हो सकता. मनुष्य स्वयं न्याय की ओर तत्पर होगा, तभी न्यायआधारित समाज का गठन संभव है. चुनौती बड़ी है. लेकिन मनुष्यता के सर्वांग कल्याण हेतु सिवाय इसके दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है. बकौल एक्वीनस समाज की अनेकानेक समस्याओं की जड़ उसमें न्याय की अनुपस्थिति है. यूं तो सारी सृष्टि परमात्मा की, परमात्मा में ही अवस्थित है. लेकिन विभिन्न प्रकार के दबावों के विरुद्ध अपने श्रमकौशल और परिश्रम से मनुष्य जो कुछ अर्जित करता है, उसके सुखोपभोग का अधिकार उसे मिलना ही चाहिए. इसके लिए एक्वीनस ने व्यक्तिगत संपत्ति के विचार का समर्थन किया था. व्यक्तिगत संपत्ति ईश्वरीय अनुकंपा है. लेकिन दूसरे की संपत्ति पर कब्जा करना. उसे चुराना या हड़प लेना दोनों ही अन्याय के प्रतिमान हैं. ईसाई धर्म कहता है—तुम अपने पड़ोसी को उतना ही प्यार करो, जितना अपने आप से करते हो. ईश्वर से भी उतना ही प्यार करना चाहिए, जितना स्वयं से करते हैं. बस यहीं हमारे विरोधाभास सामने आने लगते हैं. हम कथित ईश्वर से उतना प्यार कर ही नहीं सकते, जितना स्वयं से करते हैं. इस तरह हम खुद और ईश्वर की सृष्टि के बीच के अंतर करने लगते हैं. एक्वीनस की दृष्टि में यह ईश्वरीय सत्ता में अविश्वास करने जितना बड़ा पाप है. निजी संपत्ति पर अधिकारिता को वह प्राकृतिक मानता था. उसके अनुसार किसी को उसकी संपत्ति से वंचित कर देना या उससे बलात् छीन लेना दोनों ही पाप हैं.

अरस्तु की भांति एक्वीनस ने भी दासप्रथा का समर्थन किया था. मगर स्त्रियों को उपयुक्त अधिकार दिए जाने चाहिए, इसे लेकर दोनों ही सहमत थे. एक्वीनस के अनुसार चूंकि ईश्वर सर्वोत्तम है, अतः मनुष्य केवल ईश्वर के साम्राज्य में खुश हो सकता है. मनुष्य का राज्य उसे असंतोष और पीड़ा के सिवाय कुछ नहीं दे सकता. इसके लिए मनुष्य को अपनी आस्था केवल परमात्मा और उसकी नैतिक सर्वोच्चता में बनाई रखनी चाहिए. सामाजिकआर्थिक विषमता का होना भी ईश्वरीय मान्यता के अनुसार पाप है. प्रकृति प्राणिमात्र के प्रति समभाव रखती है. राज्य और उसके नागरिकों की कोशिश होनी चाहिए कि समाज में किसी भी प्रकार की विषमता न फैले. अतः जो व्यक्ति ईश्वर के प्यार को सचमुच प्राप्त करना चाहता है, उसका प्राकृतिक समानता के मूलभूत दर्शन में विश्वास रखना अत्यावश्यक है. अगस्ताइन और एक्वीनस दोनों के लिए न्याय आस्था का विषय है. वह इसलिए आवश्यक है क्योंकि ईश्वर ऐसा चाहता है; या उससे कथित ईश्वर को खुशी मिलती है. आखिर ये बड़ेबड़े विचारक व्यक्ति के लिए न्याय की खोज करतेकरते लोग ईश्वर तक क्यों चले जाते हैं? ईश्वर की खुशी व्यक्तिमात्र की खुशी का पर्याय भला कैसे हो सकती है? ईश्वर को यदि किसी ने देखा नहीं, यदि वह केवल अवधारणा तक सीमित है, तो क्यों नहीं व्यक्ति की खुशी को ही न्याय की कसौटी मान लिया जाए? दूसरे शब्दों में न्याय यदि मनुष्य की जरूरत है तो उसको मनुष्य की इच्छा और रुचि के अनुरूप क्यों नहीं होना चाहिए? अगस्ताइन, एक्वीनस हो या कोई और अध्यात्मवादी, ऐसे सवालों पर विचार नहीं करते? अनेक तो ऐसा सोचना भी ‘कुफ्र’ मानते हैं. उनके लिए कथित ईश्वर प्रत्येक समस्या का समाधान है. हालांकि सिवाय आस्था के, जैसा दूसरे अध्यात्मवादी दावा करते हैं, वे कथित ईश्वरीय इच्छा अथवा समस्या के समाधान को लेकर दूसरों को आश्वस्त कर पाना तो दूर, खुद भी डांवाडोल रहते हैं. धर्म के इन विरोधाभासों पर जो न्यायभावना पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, यशपाल का कहना है—

जो लोग विद्वान हैं, शक्ति संपन्न हैं, उनके लिए ईश्वर का होना न होना बराबर है. ईश्वर का भय या विश्वास उन्हीं लोगों के लिए आवश्यक है जो सत्य, धर्म और उचित को स्वयं नहीं पहचान सकते. सत्य, धर्म और उचित को कौन पहचान सकता है, और कौन नहीं पहचान सकता; यह बात बहुत हद तक इस बात पर भी निर्भर करती है कि सत्य, धर्म और उचित क्या है और उसे निश्चित किसने किया है. जो व्यक्ति या श्रेणी सत्य, धर्म, उचित और न्याय का निश्चय करती है, सत्य, धर्म और न्याय को समझने में कोई कठिनाई उस श्रेणी को नहीं हो सकती. क्योंकि सत्य, धर्म और न्याय स्वयं उन्हीं की इच्छा के अनुसार, स्वयं उन्हीं के मस्तिष्क से, उनकी आवश्यकताओं और हितों को पूरा करने के लिए पैदा होते हैं. इस प्रकार के धर्म और न्याय का पालन करने के लिए इन लोगों को किसी भय की आवश्यकता नहीं, न समाज में कायम शासन की, न ही ईश्वर की आज्ञा की.’11

फिर आस्था को ढोते रहने का कारण? इसके पीछे सामाजिक परिस्थितियों की भूमिका कम नहीं है. दो सहस्राब्दी पूर्व बड़े राज्यों के गठन में धर्म की भूमिका सकारात्मक रही थी. पूरब हो या पश्चिम हर जगह मनुष्य को लगा था कि समाज में शांति और सुव्यवस्था के लिए धर्म अपरिहार्य है. एक सीमा तक धर्म ने इस जिम्मेदारी को संभाला भी. लेकिन धर्म की ताकत के भरोसे नहीं. बल्कि जो शक्तियां धर्म के माध्यम से समाज के शिखर पर विराजमान थीं, जनाक्रोश से बचने के लिए उन्हें उतना करते हुए दिखना आवश्यक था. दूसरा कारण परिपक्व राजनीतिक दर्शन का अभाव था, जो उनीसवीं शताब्दी तक बना रहा.

न्याय के संदर्भ में मध्यकाल के दौरान भारत और पश्चिमी जगत की स्थिति को देखें तो दोनों में पर्याप्त समानता दृष्टिगत होती है. दोनों ही जगह न्याय की मांग या उसकी अपेक्षा किसी तीसरी शक्ति यानी ईश्वर के नाम पर की जाती है. अंतर केवल इतना है कि पश्चिम में अगस्ताइन, एक्वीनस आदि विद्वान जिसे ईश्वरीय अनुकंपा मानते हैं, भारतीय ग्रंथकार उसे धर्म की संज्ञा देकर कर्मकांडों में ढाल देते हैं. तार्किक वस्तुनिष्ठता न यहां है न वहां. दोनों में अंतर उत्तर मध्यकाल के दौरान सामने आता है. उसे हम वास्तविक परिवर्तन का बीजारोपण भी कह सकते हैं. उसके परिणाम क्रांतिकारी सिद्ध हुए. चूंकि धर्म और सामंतवाद अपने उद्भवकाल से ही एकदूसरे को मजबूत करते आए थे, उन दिनों भी वे निर्णायक भूमिका में थे—इसलिए वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत के लिए अभी कुछ और शताब्दियों तक प्रतीक्षा करनी थी. यूरोप की वैचारिक क्रांति को हवा देने वाला वह दौर वैज्ञानिक क्रांति का था, जिसने समाज के सभी वर्गों को प्रभावित किया था. उसकी नींव रखने वाले दो प्रमुख वैज्ञानिक थे. पहला निकोलस कापरनिकस, जिसने सूर्य को सौरमंडल का केंद्र सिद्ध कर, अनेक रूढि़यों और जड़मान्यताओं पर प्रहार किया था. दूसरा भौतिक विज्ञानी आइजक न्यूटन. कापरनिकस की पुस्तक ‘दि रिबोल्युशन आरबिट’(1543) तथा न्यूटन की पुस्तक ‘दि प्रंसीपिया मेथमैटिका’(1657) ने धर्म और रूढि़यों के मकड़जाल में फंसे समाजों में ऐसा क्रांतिकारी आगाज किया, जिसे झुठलाने या उपेक्षित करने की हिम्मत किसी में न थी. उससे पूरे यूरोप में वैचारिक क्रांति की लहर उठी. इतनी तेज कि एक ही झटके में अनेकानेक जड़ मान्यताओं और पूर्वाग्रहों को अपनी रौ में बहा ले गई. उससे आगे चलकर एक वैज्ञानिक समाज का जन्म हुआ. भारतीय विद्वानों का दावा है कि जो कार्य पश्चिम में काॅपरनिकस ने सोलहवीं शताब्दी में किया था, अपने यहां उसकी शुरुआत आर्यभट्(476—550 ईस्वी) और ब्रह्मगुप्त(598—670 ईस्वी) बहुत पहले कर चुके थे. इसमें सचाई हो सकती है. यदि ऐसा है तो उसके लिए दोषी स्वयं भारतीय मनीषा है, जो धर्म और रूढि़यों में फंसकर अपनी मौलिकता गंवा चुकी थी. वह बात ईश्वरीय न्याय की करती है, लेकिन यदि किसी पर स्वतंत्रता, समानता और अस्मिता पर संकट आ पड़े तो उसे भगवान भरोसे छोड़ देती है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि आर्यभट् प्रतिभावान खगोलशास्त्री और गणितज्ञ था. कापरनिकस से बहुत पहले वह इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका था कि सौरमंडल का केंद्र पृथ्वी न होकर सूर्य है, जो पृथ्वी अपने कक्ष पर चक्रण करती रहती है. उसी से रातदिन का मेला लगता है—

जिस तरह आगे बढ़ रही नाव में बैठा व्यक्ति किनारे पर मौजूद पेड़पौधे आदि स्थायी वस्तुओं को विपरीत दिशा में गति करता हुआ देखता है, उसी प्रकार श्रीलंका में स्थिर किसी प्रेक्षक को तारे पश्चिम की ओर जाते हुए दिखाई देंगे.’12

भारतीय मनीषियों की कमजोरी रही कि उनकी भाषा या तो बहुत आलंकारिक रही अथवा अत्यंत प्रतीकात्मक. सीधीसधी भाषा और विवेचनात्मक शैली में तथ्यात्मक लेखन के उदाहरण यहां बहुत विरल हैं. उपर्युक्त उदाहरण में आर्यभट् पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने का सीधेसीधे उल्लेख नहीं करता, बल्कि पाठक को स्वयं निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए छोड़ देता है. इससे उनकी टीका करने वालों को मनमानी व्याख्या करने का अवसर मिल जाता है. कापरनिकस तथ्यों को वैज्ञानिक की भांति प्रस्तुत करता है. मौलिक गणितज्ञ होने के साथसाथ आर्यभट् प्रतिभा में किसी से पीछे न था. बावजूद इसके, कदाचित तथ्यों के प्रस्तुतीकरण की कमी के चलते, श्रेय काॅपरनिकस और न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों को मिला, जिसने वैज्ञानिक सत्यों का सुसंगत अन्वेषण किया था. वैज्ञानिक क्रांति से प्रकृति के नएनए रहस्य सामने आने लगे. इससे प्राकृतिक उपादानों को देखने की नई दृष्टि का विकास हुआ. धीरेधीरे यह तथ्य भी सामने आया कि जो ऊर्जा एक पहाड़ के भीतर है, वही एक कण में भी अंतर्निहित है. प्रकृति केवल माया नहीं है. बल्कि उसका अस्तित्व है. उसे प्रयोगशाला में सिद्ध किया जा सकता है. शोध के दौरान यह तथ्य भी जगजाहिर हुआ कि कण मात्र में वैसी ही ऊर्जा है, जैसी कल्पना आध्यात्मशास्त्री पुराणों, धार्मिक गल्पों, टोटमों, देवताओं और दानवों आदि में करते आए थे. यूं तो जैन दर्शन का ‘पुद्गलवाद’ चर्चित रहा है, जिसे जीवन ऊर्जा से सराबोर माना गया है. लेकिन भारत में ईश्वर का मिथक हर प्रतीक पर सवार रहा है. कण को कण की तरह देखने वाली दृष्टि, सृष्टि को इस मिथक से परे देख ही नहीं पाती. इस कारण जैन दर्शन का ‘पुद्गलवाद’ एवं वैशेषिक का ‘अणुवाद’ केवल दार्शनिक ग्रंथों की शोभा बने जाते हैं. विज्ञान की ताकत तथ्यों की वस्तुनिष्ठ एवं तर्कसम्मत विवेचना में है. वैज्ञानिक जो कह रहे थे, वह प्रयोगशाला में सिद्ध था. इसीलिए सही मायने में जनवादी सोच का बीज वहीं से पड़ा. कालांतर में वही बड़े सामाजिक, राजनीतिक परिवर्तनों का कारण बना.

बहरहाल, सांस्कृतिक प्रतीकों और मिथकों के समर्थनविरोध में चाहे जितने वैज्ञानिक तथ्य हों, उनसे जुड़े प्रभाव और दुराग्रह इतनी जल्दी पीछा छोड़ने वाले नहीं थे. विज्ञान के क्षेत्र में होने वाला कोई शोध, पूर्वस्थापित तथ्य को कभी भी झुठला सकता है. विज्ञान जगत उसके लिए सदैव तैयार रहता है. किंतु सामाजिक बदलाव हमेशा क्रमानुक्रम में होते है. वैज्ञानिक अन्वेषणों की गति के सापेक्ष सामाजिक परिवर्तनों की गति सदैव धीमी होती है. संस्कृति और वैचारिकी पर उनका प्रभाव पड़तेपड़ते ही पड़ता है. एक परिवर्तन को आत्मसात कर, दूसरे तक पहुंचने में समाज समय लेता है. यही कारण है कि पंद्रहवींसोलहवीं शताब्दी में हुई वैज्ञानिक क्रांति का वास्तविक असर सतरहवींअठारहवीं शताब्दी में देखने को मिलता है.

मध्यकाल के न्यायवादी विचारकों में थामस हाब्स का नाम प्रमुख है. वह पहला विचारक था जिसने राजनीतिक सिद्धांत और आधुनिक विचारधाराओं में सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश की. अपने राजनीतिक दर्शन की रूपरेखा प्रस्तुत करते समय उसने, प्रकृति के तमाम तथ्यों, जिनमें मानव व्यवहार के मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक सभी पहलू सम्मिलित थे, विचार किया. सुकरात, प्लेटो, अरस्तु से लेकर संत अगस्ताइन और एक्वीनस सभी का दर्शन सोफिस्टों की विचारधारा के विरोध में जन्मा था. लेकिन हाब्स ने अपनी बात अमूर्त्तन को नकारते हुए, मूर्त्तन की ओर वापस लौटने से शुरू की. उसने जोर देकर कहा कि जो वास्तविक है, उसको दृश्यमान होना ही चाहिए. इसका श्रेय भी उसको मिलना चाहिए. मनुष्य केवल आत्मा नहीं है. वह ‘जीवित शरीर’ भी है. देह न केवल व्यक्ति और शेष प्रकृतिजगत के बीच पृथकत्व का कारण है, बल्कि उसी के कारण मनुष्य एवं शेष प्राणिजगत में अनूठा नैकट्य है. वही मनुष्य एवं शेष विश्व के बीच संबंधों और प्रतिसंबंधों का कारण है. देह के कारण ही प्राणिमात्र स्वयं को दूसरों से अलग और विशिष्ट मानता है. उसी के कारण उसे दूसरों की उपस्थिति, उनकी विशेषताएं आकर्षित करती हैं. दूसरे शब्दों में बहिर्जगत, बहिर्जगत है ही इसलिए, क्योंकि उसका कोई अंतर्जगत है. वही मनुष्य अंतर्मन में झांकने के लिए उकसाता है. जो भी ‘जीवित शरीर है.’ उसकी समाज में स्वतंत्र हैसियत है. ऐसे संसार में स्वतंत्र हैसियत है, जहां उस जैसे करोड़ों मनुष्य अपनी स्वतंत्र व्याप्ति के साथ मौजूद हैं. ऐसे में उसकी अस्मिता और उपस्थिति का सम्मान, उसकी स्वतंत्रता की रक्षा तभी संभव है—जब वह खुद भी दूसरों की स्वतंत्रता और अस्मिता का सम्मान करे. इसलिए आत्म की कीमत पर देह की उपेक्षा उचित नहीं है. हाब्स के अनुसार व्यक्ति समाज के बीच रहकर ही सुख और सुरक्षा प्राप्त कर सकता है. मनुष्यता की रक्षा भी दूसरों के साथ सामंजस्य रखते हुए संभव है. वह लिखता है—

मनुष्य के सामने प्रथम लक्ष्य अपनी सुरक्षा अथवा शक्ति के रक्षण का होता है. उसके लिए दूसरे मनुष्यों का उसी सीमा तक महत्त्व है, जब तक वे असर डालते हैं. चूंकि बुद्धिविवेक एवं शक्ति के मामले में सभी मनुष्य लगभग एकसमान हैं, इसलिए जब तक उसे अनुशासित रखने के लिए कोई नागरिक शक्ति न हो, तब तक हर मनुष्य की हर मनुष्य के साथ लड़ाई है. इस तरह की स्थिति यद्यपि सभ्यता के प्रतिकूल है. लेकिन यदि ऐसा न हो तो नौवहन, कृषिकला, शिल्पकर्म, कला और साहित्य, उद्योग आदि में से किसी की भी उन्नति असंभव है. उस स्थिति में मनुष्य का जीवन, एकांत, निर्धन, घृणित, जंगली और अल्पकालिक होगा. उस अवस्था में न तो न्याय होता है, न ही अन्याय. न तो उचित होता है, न ही अनुचित. वैसे हालात में जीवन का एकमात्र यह नियम काम करता है कि मनुष्य को जो प्राप्त करना कर ले, और उसमें से जितना पास रखना चाहता है, रख ले.’13

हाब्स का आशय था कि यदि समाज न हो, स्पर्धा न हो, हितों का टकराव न हो तो विकास असंभव है. विकास मनुष्य की चेतना और प्रतिचेतना दोनों पर निर्भर होता है. लेकिन मनुष्य की सफलता उसे ज्यों का त्यों बनाए रखने में नहीं है. यदि ऐसा हो तो उसके विवेकीकरण का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा. उसने जोर देकर कहा था कि आत्मरक्षा के लिए हिंसा और प्रतियोगिता के स्थान पर, शांति और सहयोग अपेक्षाकृत ज्यादा कारगर हैं. शांति के लिए पारस्पिरिक विश्वास और सहयोग की आवश्यकता पड़ती है. भय और असुरक्षा की भावना शांति और विश्वास बनाए रखने में सबसे बड़ी बाधाएं हैं. सामान्य मानवप्रवृत्ति भय से मुक्ति पाने की है. प्रत्येक व्यक्ति सुख एवं सुरक्षा की कामना करता है. शाश्वत सुख की चाहत उसे समाज की शरण में ले आती है. अब यदि समाज अपने दायित्व की पूर्ति में चूक जाए. आवश्यकता पड़ने पर मनुष्य को समाज में शांति और सुरक्षा की प्राप्ति न हो, तब मनुष्य को यह अधिकार है कि वह अपनी शांति और सुरक्षा के लिए जो आवश्यक है, वह करे. कह सकते हैं कि समाज की चूक व्यक्ति को मनमानी का अवसर देती है. यह स्थिति उत्पन्न न हो, उसके लिए समाज और उसकी सदस्य इकाइयों के बीच तालमेल आवश्यक है. व्यक्ति की अपने अधिकारों के प्रति उदासीनता समाज को निष्ठुर और व्यक्ति को आत्मलीन बनाने का काम करती है. कुल मिलाकर पारस्परिक हितों की सुरक्षा की दृष्टि से काम करना, प्रथम दृष्टया संतुलित सुझाव लगता है. किंतु गंभीरतापूर्वक विचार करने पर उसका खोखलापन, यानी इसके पीछे किसी नैतिक प्रेरणा का न होना सामने आ जाता है. यह सीधेसीधे एक सौदे जैसा है. व्यक्ति और समाज के बीच स्पष्ट लेनदेन का मामला. जिसमें व्यक्ति से कम से कम उस समय तक शांतिप्रयास की अपेक्षा की जा सकती है, जब तक दूसरे व्यक्ति भी उस काम में लगे हों. यह दर्शाता है कि सामाजिक शांति एवं सुख की स्थापना सामूहिक दायित्व है तथा व्यक्ति की सुरक्षा और स्वतंत्रता अन्योन्याश्रित है.

हाब्स के अनुसार कर्तव्य और अधिकारों परस्पर पूरक हैं. इन्हें अलगअलग देखना अनुचित है. दोनों का साथसाथ पालन करते हुए ही समाज को सुस्थिर किया जा सकता है. इसलिए किसी को तभी तक सुरक्षा का आश्वासन दो, जब तक वह आपकी सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है. प्रत्येक व्यक्ति को उस समय तक अपनी स्वतंत्रता एवं सुरक्षा का भरोसा होना चाहिए, जब तक वह दूसरों की स्वतंत्रता और सुरक्षा की प्रतिबद्ध भाव से रक्षा करता है. दूसरों की स्वतंत्रता में अवांछित हस्तक्षेप के साथ ही व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का अधिकार खो बैठता है. हाब्स के अनुसार ‘शासन में यह शक्ति होनी चाहिए कि वह शांति की स्थापना कर सके.’ इस तरह हाब्स एक ओर व्यक्ति को अपनी स्वतंत्रता और सुरक्षा की रक्षा के लिए असीमित अधिकार देता है. यहां तक कि उसके लिए राज्य की उपेक्षा करने का सुझाव भी दे जाता है. दूसरी ओर राज्य को भी असीमित अधिकारों की छूट दे देता है. उसके अनुसार जब तक कोई मूर्त्त शासन न हो, जब तक अपनी इच्छा को लागू करने की शक्ति से संपन्न कोई व्यक्ति न हो, तब तक न तो राज्य होता है, न ही समाज, प्रत्युत् एक ‘प्रधानहीन’ भीड़ होती है. उसे नियंत्रित करने के लिए शक्ति की आवश्यकता पड़ती है. हाब्स के शब्दों में, ‘बिना तलवार के समस्त प्रसंविदाएं कोरे शब्द हैं, उनमें इतनी शक्ति नहीं होती कि मनुष्य उनका पालन करने को विवश हो.’14

इससे हाब्स को निरंकुशता का समर्थक मान लेना भूल होगी. दरअसल वह राज्य एवं समाज दोनों को इतना संगठित और शक्तिशाली देखना चाहता है कि दोनों की शक्तियां, सम्मिलित विवेक एकदूसरे को संतुलित कर सकें. व्यक्तिगत रूप से वह राजतंत्र का समर्थक था. किंतु उसके प्रस्तावित राजतंत्र में प्रजा अपने अधिकारों से सर्वथा वंचित नहीं है. बल्कि वह प्रजा को इतनी संगठित, शक्तिशाली और विवेकवान देखना चाहता था कि आवश्यकता पड़ने पर राज्य को भी नियंत्रित कर सके. उसके अनुसार शक्ति केवल राज्य के हाथ में हो तो उसके निरंकुश होने की संभावना बढ़ जाती है. और राज्य निर्बल हो तो उसके अस्थिर होकर लक्ष्य से भटक जाने की संभावना बढ़ जाती है. नागरिक और प्रशासन में संतुलन के लिए समाज में शक्ति का विकेंद्रीकरण आवश्यक है. अपनी महान कृति Leviathan(The Matter) में समाज एवं राजनीति के संबंधों की गहन समीक्षा के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि—

समस्त मानवजाति शक्ति की शाश्वत एवं अविश्रांत इच्छा से प्रेरित है. इस लालसा का अंत मृत्यु के साथ ही होता है. इसका कारण यह नहीं है कि मनुष्य के पास जितनी खुशी है उससे अधिक खुशी वह चाहता है या मौजूदा शक्ति से कम में उसका काम नहीं चल सकता. इसका कारण है कि मनुष्य के पास अपनी जीविका के जितने साधन तथा शक्तियां है, उससे अधिक की लालसा रखे बगैर उसे अपनी सुरक्षा का भरोसा नहीं होता.’15

हाब्स की दृष्टि में विधि का शासन सत्ता की ओर से प्रस्तुत की गई वह इच्छा या उसकी ओर से प्रचलित ऐसे नियम हैं, जो नागरिकों को उचितअनुचित का बोध कराते हैं. विधान दो प्रकार के होते हैं. एक वह जो व्यक्ति या समुदाय द्वारा बनाए जाते हैं. हाब्स ने उन्हें नागरिक विधान कहा है. दूसरे प्राकृतिक विधान. जिनसे प्रकृति का हिस्सा होने के कारण प्रत्येक प्राणी स्वाभविक रूप से बंधा होता है. हाब्स के अनुसार प्राकृतिक विधान नागरिक विधान की अपेक्षा श्रेष्ठतर होता है. लेकिन समाज में रहते हुए केवल प्राकृतिक विधान से काम नहीं चलता. उसके लिए नागरिक विधान को भी अपनाना पड़ता है. नागरिक विधान का गठन हालांकि नागरिकों की सहमति के आधार पर होता है. लेकिन नागरिकों की सामान्य सहमति मिलने के बाद वह राज्य की इच्छा का रूप ले लेता है. जिसे राज्य शासनादेश के रूप में लागू करता है. ऐसे में प्राकृतिक विधान का केवल आलंकारिक महत्त्व रह जाता है. लेकिन प्राकृतिक विधान की कुछ खूबियां ऐसी होती हैं, जिन्हें अपनाकर कोई भी समाज सभ्य होने का दावा कर सकता है. इसी कारण उन्हें नागरिक विधान का हिस्सा बनाया जाता है, लेकिन कुछ इस प्रकार कि नागरिक विधान उनकी पवित्रता को भंग करने के बजाय उनकी सुरक्षा में खड़ा हुआ नजर आए. प्रकारांतर में नागरिक विधि में बल प्रयोग का भाव निहित है. प्राकृतिक विधान की कमजोरी है कि उसके सभी नियम समाज को आगे नहीं ले जा सकते. हाब्स का विचार था कि उपयोगितावादी दृष्टि से शासन, कोई भी शासन—निरंकुशता से बेहतर होता है. तो क्या निरंकुशता में शासन नहीं होता. बल्कि बहुत कठोर शासन होता है. वह इसलिए कामयाब होता है क्योंकि नागरिक संगठन कमजोर पड़ जाते हैं. निरंकुश शासन में नागरिक स्वयं को राज्य की इच्छा के आगे समर्पित कर देते हैं. इससे समाज का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. आधुनिक विचारक ऐसे राजनीतिक दर्शन का समर्थन करते हैं, जो समाज की सामान्य चेतना द्वारा अनुशासित हो. हाब्स हालांकि राजतंत्र का समर्थक था, लेकिन अपने दर्शन में वह समाज की सामान्य चेतना को भी पर्याप्त महत्त्व देता है. वह जो सुझाव देता है, परिवर्ती विद्वान उन्हें गणतंत्रात्मक शासन पर भी लागू करते हैं.

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भ:

1. every member of the community must be assigned to the class for which he finds himself best fitted. Plato, The Republic .

2. Justice as fairness provides what we want. -John Rawls, A Theory of Justice.

3. Justice is the first virtue of social institutions, as truth is of systems of thought. -John Rawls, A Theory of Justice. pg. 3.

4. Man is the measure of all things: of the things that are, that they are, of the things that are not, that they are not.” Plato’s Theaetetus, trans. Bostock, D (1988), Oxford.

5. एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्वाद्वह्व शुच्योपि न स्त्रियः

त्री बुद्धेरस्थिरत्वाच्च दौषे श्वाश्चेऽपि तः वृताः—मनुस्मृति, 8/77.

6. A multitude bound together by a mutual recognition of rights and a mutual cooperation for the common good.”-Cicero.

7. Charity is no substitute for justice withheld. -Augustine.

8. If a man has no order within himself, then there is certainly no justice in assembly made. Augustine, City of God.

9. a judge renders to each one what belongs to him by way of command and direction, because a judge is personification of justice and sovereign is its guardian.- St Thomas Aquinas, Summa Theologica, Volume 3 (Part II, Second Section), 2013

10. the habit whereby a man renders to each one his due by a constant and perpetual will.” St Thomas Aquinas, Summa Theologica, Volume 3 (Part II, Second Section), 2013.

11. यशपाल, गांधीवाद की शव परीक्षा, विपल्व प्रकाशन, 1941

12. अनुलोमगतिनौंस्थः पश्यत्यचलं विलोमर्ग यद्वत्

अचलानि भानि तद्वत् समपश्चिमगानि लंकायाम्. आर्यभट्टीयम्, गोलापद, 9.

13. From this account of human motives Hobbes’s description of the state of man outside society follows as a matter of course. Each human being is actuated only by considerations that touch his own security or power, and other human beings are of consequence to him only as they affect this. Since individuals are roughly equal in strength and cunning, none can be secure, and their condition, so long as there is no civil power to regulate their behavior, is a “war of every man against every man.” Such a condition is inconsistent with any kind of civilization: there is no industry, navigation, cultivation of the soil, building, art, or letters, and the life of man is “solitary, poor, nasty, brutish, and short.” Equally there is neither right nor wrong, neither justice nor injustice, since the rule of life is “only that to be every man’s that he can get; and for so long, as he can keep it.”- George H. Sabine, A HISTORY OF POLITICAL THEORY, page 463.

14. Covenants, without the sword, are but words, and of no strength to secure a man at all.-Thomas Hobbes, Leviathan, chapter17.

15. I put for a general inclination of all mankind, a perpetual and restless desire of power after power, that ceaseth only in death. And the cause of this, is not always that a man hopes for a more intensive delight, than he has already attained to; or that he cannot be content with a more moderate power: but because he cannot assure the power and means to live well, which he hath present, without the acquisition of more. Thomas Hobbes, Leviathan, chapter-11.

ईश्वर : एक अवैज्ञानिक धारणा

सामान्य

क्या ईश्वर बुराई पर अंकुश लगाना चाहता है, लेकिन लगा नहीं सकता?

तब वह सर्वशक्तिमान नहीं है.

क्या वह अंकुश लगा सकता है, लेकिन उसकी इच्छा नहीं है?

तब वह विद्वेषी है.

वह कर सकता है और करने की इच्छा भी रखता है?

तब ये ढेर सारी बुराइयां कहां से आती हैं?

वह न तो कर सकता है, न ही करने की इच्छा रखता है?

तब उसे ईश्वर क्यों माना जाए?

              —एपीक्यूरस, लेक्टेंटियस द्वारा ”आ॓न दि एंगर आ॓फ गॉड”, 13.19.

स्पर्धा आधुनिक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का सबसे कारगर उपकरण है. एक तरह से मूलमंत्र. मान लिया गया है कि स्पर्धा रहेगी, तब तरक्की होगी. प्रतिभाशाली लोग आगे आएंगे. लोगों को अच्छे उत्पाद सस्ते मूल्य पर प्राप्त हो सकेंगे. इसलिए जो इस व्यवस्था को अपनाता है, जाने-अनजाने स्पर्धा में शामिल हो ही जाता है. लोग स्पर्धा को विकास का मूलमंत्र मानना चाहते हैं, मानें. उसमें सफलता व्यक्ति के प्रतिभा-कौशल से तय नहीं होती. वास्तविक परिणाम स्पर्धारत व्यक्ति/व्यक्ति-समूहों की आर्थिक-सामाजिक हैसियत पर निर्भर करते हैं. उन प्रक्रियाओं द्वारा तय होते हैं, जिन्हें साधारण भाषा में मौकापरस्ती कहा जाता है. दो उद्योगपति इसलिए स्पर्धा में रहते हैं, ताकि बाजार के अधिकतम हिस्से पर कब्जा कर, वहां अपने एकाधिकार का परचम लहरा सकें. भूखों की स्पर्धा उन्हें अपनी थाली में कटौती के साथ जैसे-तैसे जीते जाने की मजबूरी की ओर ढकेल देती है. मार्क्स के अलावा मिखाइल बकुनिन, विल्फ्रेद परेतो, जीतान मोसका आदि ने स्पर्धा की प्रवृत्ति का विद्वतापूर्ण विश्लेषण किया है. उनके अनुसार स्पर्धा असमान व्यक्तियों की बेमेल प्रतियोगिता है. उसका परिणाम असमानता की खाई के उत्तरोत्तर चौड़े होने के रूप में सामने आता है. चूंकि स्पर्धा लोकतांत्रिक मूल्यों एवं समानाधिकार के प्रसाद के रूप में व्यवहृत होती है, इसलिए उसका विरोध लोकतंत्र का प्रतिवाद मान लिया जाता है. शिखर तक पहुंचने तथा वहां टिके रहने की स्पर्धा में व्यक्ति को अनेक समझौते करने पड़ते हैं. कई बार सामान्य नैतिकता सहित उन मूल्यों को भी दांव पर लगाना पड़ता है, जिनके प्रति प्रतिबद्धता उस अभियान का औचित्य रही है. यह सब याद आया हिंदी के चर्चित ब्लॉग ‘साइंटिफिक वर्ल्ड’ चल रही एक बहस को पढ़कर. इस ब्लॉग पर एक चौंकाऊ, विज्ञान के नाम पर अवैज्ञानिक बहस पिछले दिनों ऐसे देखने को मिली, जैसे टीआरपी बढ़ाने के लिए टीवी चैनल सामान्य सूचनाओं को भी ‘न भूतो न भविष्यति’ कहकर परोस देते हैं. भले ही यह अनजाने में हुआ हो अथवा अतिउत्साह में, नजर साफ आ रहा था.

पिछले दिनों ‘साइंटिफिक वर्ल्ड’ पर दो आलेख प्रकाशित हुए हैं, उनमें पहला आलेख के पी सिंह का ‘क्या ईश्वर को वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित किया जा सकता है?’ दूसरे आलेख, ‘ईश्वर की अवधारणा: विज्ञान की कसौटी!’ के लेखक विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी हैं. दोनों आलेख ईश्वरवादियों की ओर से लिखे गए हैं, इसलिए उनमें ईश्वर की सत्ता पर संदेह कम, विश्वास और आस्था की अभिव्यक्ति अधिक है. दोनों विद्वान आस्था-मंडित हैं. ईश्वरत्व में संदेह उन्हें छू भी नहीं पाया है. इसलिए दोनों अपनी-अपनी तरह से ईश्वर को प्रमाणित करने की कोशिश करते हैं. मगर इकतरफा होने के कारण दोनों लेख ईश्वर-प्रचारक मंडली के प्रवचन बन जाते हैं. विज्ञान के नाम पर अवैज्ञानिकता का आशय यही है. लेखों में दिए गए तर्क भी नए नहीं हैं. कथावाचक किस्म के ‘गुरु महाराज’ ऐसे तर्क देते ही रहते हैं. के. पी. सिंह जिस आस्था को प्रश्नवाचक चिह्न के साथ आरंभ करते हैं, वैसी ही आस्था चतुर्वेदी जी के लेख में विस्मयादिबोधक चिह्न के साथ नजर आती है. गोया लेखों को विज्ञान की श्रेणी में लाने के लिए वे संदेह का हिस्सा पाठक के लिए छोड़ देना चाहते हैं. आपत्तिजनक यह नहीं है कि ब्ला॓ग पर दो ईश्वरवादियों ने अपने-अपने तर्क जुटाए हैं. निस्संदेह जैसा वे सोचते और महसूस करते हैं, उसको अभिव्यक्त करने का उन्हें पूरा-पूरा अधिकार है. आपत्तिजनक यह है कि इन लेखों को ऐसे ब्ला॓ग पर जगह मिली है जो स्वयं को विज्ञान के प्रति समर्पित बताकर बौद्धिक जड़ता एवं पाखंड के विरोध का अभियान चला रहा है. इसी प्रतिबद्धता के चलते उसको हजारों पाठक मिले हैं.

इन लेखों की कमजोरी है कि उनकी सामग्री उनके अपने ही शीर्षक से मेल नहीं खाती. शीर्षक से लगता है कि उनमें विषय का वस्तुनिष्ट विवेचन देखने को मिलेगा, मगर असलियत में सारे तर्क एकतरफा होने से लेख पूरी तरह आत्मपरक, निजी आस्था की प्रस्तुति तक सिमट गए है. दोनों में कहीं भी शंका अथवा संदेह को जगह नहीं है. इस विषय पर ऐसे लेखों की कमी नहीं है जिनमें लेखक पूर्वाग्रह अथवा पूर्व निष्पत्ति के साथ लिखना आरंभ करता है. अपने मत के समर्थन में जो भी तर्क जंचते हैं उन्हें सामने रखता जाता है. मगर पूर्वाग्रहों के दबाव में उस सामग्री की वस्तुनिष्ट समीक्षा करना भूल जाता है, जिसे उसने अपने मत के समर्थन में बतौर उद्धरण प्रयुक्त किया है. विचाराधीन आलेखों में से पहले में भारतीय संदर्भ अधिक हैं तो दूसरे में पाश्चात्य विद्वानों को अपने समर्थन में दिखाने की कोशिश की गई है.

 विज्ञान संदेह के साथ शुरू होता तथा उसी के साथ आगे बढ़ता है. उसमें ठहराव की स्थिति कभी नहीं आती. किसी वैज्ञानिक सत्य पर भरोसा करने से पहले प्रत्येक को उसे जांचने-परखने तथा प्रयोगों की कसौटी पर कसने की छूट प्राप्त होती है. ईश्वर एवं मानवीय आस्था के बीच विज्ञान को न लाएं तो भी उसके अस्तित्व पर संदेह एवं तदनुरूप उठनेवाली बहस नई नहीं है. भारत में भी ढाई-तीन हजार वर्षों से यह बहस लगातार चली आ रही है. वैदिक काल में ईश्वरवादी धारणा का खंडन करने वाले आजीवक और लोकायती संप्रदाय थे. वहीं आस्थावादियों के समर्थन में वैदिक धर्म की अनेक शाखाएं थीं. दर्शन की दृष्टि से वह भारतीय मेधा का सबसे प्रस्फुटनकारी दौर था. उसी दौर में वेदों को आप्त-ग्रंथ की संज्ञा दी गई. उन्हें दैवी उपहार माना गया. श्रद्धालु आचार्यों का एक वर्ग ‘आस्तिक’ बनाम ‘नास्तिक’ की बहस में वेदों को आप्तग्रंथ मनवाने जुटा रहा. बावजूद इसके नास्तिक दर्शनों की प्रतिष्ठा उतनी ही बनी रही, जितनी आस्तिक दर्शनों की थी. विचारों के उस लोकतंत्र ने सांख्य जैसे निरीश्वरवादी दर्शन को जगह थी तो कर्मकांड प्रधान मीमांसा दर्शन को भी. वैदिक धर्मों के विचलन के दौर में उभरे जैन और बौद्ध दर्शन ने ‘आत्मा’ और ‘ईश्वर’ पर केंद्रित बहसों में उलझने के बजाए मनुष्य के आचरण को महत्त्वपूर्ण माना. उन्होंने सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह आदि पर जोर देकर नैतिक एवं समाजोन्मुखी, जीवन जीने का आवाह्न किया. मानो सभ्यताओं के तार आपस में जुड़े हुए थे. लगभग उन्हीं दिनों भारत से हजारों मील दूर यूनान में भी कुछ वैसा ही हुआ. ईसा पूर्व छठी शताब्दी में वहां सुकरात, प्लेटो, जीनोफेन जैसे विचारकों ने अभिजन संस्कृति का पोषण करने वाले परंपरावादी सोफिस्टों को चुनौती दी. सुकरात ने ईश्वर को शुभ का पर्याय माना तथा उसकी प्राप्ति के लिए सद्गुण और सदाचरण पर जोर दिया. गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, सुकरात, कन्फ्यूशियस, प्लेटो जैसे दार्शनिकों का नैतिक प्रभामंडल इतना तेजोमय था कि उसका प्रभाव शताब्दियों तक बना रहा. आज भी ईसा से तीन से छह शताब्दी पूर्व का वह समय विश्व-इतिहास में बौद्धिक क्रांति का सफलतम दौर माना जाता है. आगे चलकर जितने भी राजनीतिक-सामाजिक दर्शन सामने आए, वे भी जो विश्व-परिदृश्य में परिवर्तन के वाहक बने, सभी की नींव इस दौर में पड़ चुकी थी.

विद्वान लेखकों द्वारा दिए गए तर्कों में प्रत्येक पर स्वतंत्र रूप से चर्चा संभव है. तथापि इस लेख की सीमा को ध्यान में रखते हुए मैं केवल स्टीफन डी. अनविन के उद्धरण की ओर दिलाना चाहूंगा. स्टीफन अनविन ने विशेषरूप से पुस्तक लिख, ‘ईश्वर के पक्ष-विपक्ष में आंकड़े जुटाकर ईश्वर के होने की प्रायिकता 67 प्रतिशत’ सिद्ध की है.’ मैंने वह पुस्तक नहीं पढ़ी है, किंतु उसपर पर्याप्त समालोचनात्मक सामग्री इंटरनेट पर उपलब्ध है. इस आलेख में आए गणितीय संदर्भ वहीं से लिए गए हैं. मेरी कोशिश उसी को आगे बढ़ाने की है, ताकि अनविन द्वारा प्राकलित ईश्वर की 67% प्रायिकता का सच पाठकों के सामने आ सके. अनविन भौतिक विज्ञानी हैं. डा॓क्ट्रेट उन्होंने सैद्धांतिकी भौतिकी की शाखा ‘क्वांटम गुरुत्च’ में की है. प्रसंगवश बता दें कि यह विज्ञान की वही शाखा है जिसके अंतर्गत आजकल विश्व-प्रसिद्ध ‘लार्ज हैड्रा॓न कोलीडर’ नाम का दीर्घकालिक और महत्त्वाकांक्षी प्रयोग चल रहा है. उससे जुड़े वैज्ञानिकों ने द्रव्यमान का कारण कहे जानेवाले मूलकण यानी ‘हिग्स बोसोन’ की खोज का दावा किया, जिसे वस्तुओं में भारता के लिए जिम्मेदार माना जाता है. विज्ञान की चुनौतियों के आगे लड़खड़ा रहे आस्थावादी यहां भी क्यों चूकने वाले थे. वैज्ञानिक अपने प्रयोग के आरंभिक निष्कर्षों के पुनरीक्षण में जुटे ही थे कि आस्थावादियों ने उसे तुरत-फुरत ‘गॉड पार्टिकिल’ का नाम दे दिया. जिसका हिग्स बोसोन की खोज में जुटी प्रयोगशाला सर्न के वैज्ञानिकों ने जोरदार विरोध किया. प्रयोगशाला से जुड़े वरिष्ठ अमेरिकी वैज्ञानिक पोलीन गा॓नन से 2011 में यूरोप के रेडियो पत्रकार ने जिनेवा में एक साक्षात्कार के दौरान जब कहा, ‘मैं मीडिया से हूं और मैं उसे यही(गॉड पार्टिकिल) कहता रहूंगा.’ तब गा॓नन का जवाब था, ‘यह सब आप ही का दिया गया नाम है….मैं इससे घृणा करता हूं.’ वैज्ञानिकों के न चाहने के बावजूद हिग्स बोसोन को ‘गॉड पार्टिकिल’ कहने का षड्यंत्र आज भी चल रहा है. षड्यंत्र इसलिए क्योंकि धर्मसत्ता, राजसत्ता, अर्थसत्ता और उनसे पालित-पोषित मीडिया में से कोई नहीं चाहता कि जनता विज्ञान को विज्ञान की तरह जाने. उसका विवेकीकरण हो. इसलिए वैज्ञानिक शोधों को तत्काल अपने पाले में खींच लेने, उनका तेज कम करने तथा उनसे लाभ उठाने की प्रवृत्ति प्रायः सभी समाजों में रही है. इससे धर्मग्रंथों का मूल संदेश गंडे-ताबीजों में कैद होकर रह जाता है. कंप्यूटर जन्मपत्री बनाने लगता है और टेलीविजन पर बाबा लोग भविष्य सुधारने का धंधा करने लगते हैं.

अनविन संयुक्त राष्ट्र के ऊर्जा विभाग के दूत रह चुके है. आजकल वे एक सलाहकार फर्म का संचालन करते हैं, जिसका काम विश्व की नामी-गिरामी पूंजीपति कंपनियों को आपदा प्रबंधन के मामले में सलाह देना है. अनविन की एक चर्चित पुस्तक The Probability of God: A Simple Calculation That Proves the Ultimate Truth. 2003 का उल्लेख चतुर्वेदी जी ने अपने आलेख में किया है. यह उनकी अध्ययनशीलता को दर्शाता है. अपनी पुस्तक में अनविन ने ईश्वर के अस्तित्व की संभाव्यता को गणित के माध्यम से सिद्ध किया है. इस निष्कर्ष में उनके व्यावसायिक स्वार्थ छिपे होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता. आपदा को ईश्वरीय कर्म सिद्ध कर देने से प्रबंधकीय कौशल पर लगनेवाले आरोप कम हो जाते हैं. शायद इसलिए वे ईश्वर के विचार को उसी प्रकार जीवित रखना चाहते हैं, जैसे अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए ज्योतिषी प्रारब्ध की संकल्पना को ऊल-जुलूल तर्क देकर पालता-पोषता है. हालांकि अनविन ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने जो समीकरण दिए हैं, वे आवश्यक नहीं कि पूरी तरह खरे, अंतिम सत्य हों. वे केवल एक पक्ष यानी उस पक्ष को जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखता है, अपनी बात को और अच्छी तरह स्पष्ट करने के लिए कुछ उपकरण उपलब्ध करा रहे हैं. वे यह भी लिखते हैं कि ईश्वर विषयक विज्ञान की सभी मान्यताएं अधूरी हैं. अर्थात जिन संकल्पनाओं पर चलते हुए अनविन ईश्वरत्व की संभावना को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 67 प्रतिशत तक आंकते हैं, दूसरा उन्हीं संकल्पनाओं को अपनी तरह से प्रस्तुत कर, उनसे नए निष्कर्ष निकाल सकता है. वे भी गणितीय मापदंड पर उतने ही खरे उतरेंगे, जितने स्वयं अनविन के. कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसा हुआ है. उसकी चर्चा हम यथास्थान करेंगे. कुल मिलाकर मामला वहां भी आस्था का और आस्थावादियों के लिए है, गणित का नहीं.

अब बात उस गणित की जिसके आधार पर अनविन ने ईश्वर की प्रायिकता को कथितरूप से 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 67 प्रतिशत कर दिया है. पहले तो यह जान लें कि अनविन ईश्वर की 50 प्रतिशत संभाव्यता तक किस प्रकार पहुंचे हैं. इसके लिए उन्होंने न तो कोई सर्वे किया है, जो सांख्यिकी का मूल कर्म है, न ही किसी और माध्यम से आंकड़े जमा किए हैं. केवल काम-चलाऊ प्रतीतियों के सहारे अपने मंतव्य को गढ़ा है. यह साधारण से साधारण व्यक्ति भी जानता है कि ईश्वर को लेकर दो प्रकार की संभावनाएं बनती हैं. पहली, ईश्वर हो सकता है. और दूसरी ईश्वर नहीं हो सकता. इस तरह ईश्वर के होने या न होने की मूल प्रायिकता बराबर-बराबर अर्थात पचास प्रतिशत है. सिवाय संभाव्यता के अलावा इसके पीछे कोई और तर्क नहीं है. एक तरह से यह अनविन की मजबूरी भी थी. क्योंकि प्रायिकता को बढ़ाने के अनविन जिस गणितीय सूत्र का सहारा लेता है, वह सांख्यिकी-विद् रेवरेंड थामस बा॓यस का है. वह सूत्र तभी काम कर सकता है जब उसके लिए आधार अथवा प्राथमिक संभाव्यता मौजूद हो. इसलिए उन लोगों के लिए जो ईश्वर की संभावना को शून्य अथवा नगण्य मानते हैं, यह सूत्र और प्रकारांतर में अनविन के निष्कर्ष, किसी काम के नहीं हैं. उल्लेखनीय है कि जब कोई गणितज्ञ सांख्यिकीय आकलन करता है तो उसके आंकड़े किसी न किसी रूप में समाज से, अथवा किसी वैज्ञानिक प्रयोग द्वारा ठोस परिगणनाओं के आधार पर जुटाए गए होते हैं. वे किसी व्यक्ति-विशेष के बारे में सत्य भले ही न हों, मगर वास्तविकता का एक सामान्य चित्र हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं, जो सामाजिक अध्ययन में बहुत कारगर सिद्ध होते हैं. उससे प्राप्त निष्कर्ष किसी न किसी सामाजिक यथार्थ का प्रतिनिधित्व करते हैं. आगे बढ़ने से पहले बा॓यस के सूत्र के बारे में जान लेना आवश्यक है. इसके लिए पहले कुछ उदाहरण—

मान लीजिए एक घर है. जिसका दरवाजा खुला हुआ है. एक आदमी उस घर में घुसता है. उसको किसी ने बाहर आते हुए नहीं देखा. तब उस व्यक्ति की, जब तक कोई और साक्ष्य न हो, घर में होने तथा न होने की संभावना बराबर-बराबर यानी पचास प्रतिशत होगी. सूत्र के गणितीय हिस्से पर आने से पहले एक और स्थिति. मान लीजिए एक व्यक्ति हर रोज घर में कुछ न कुछ फल लेकर अवश्य आता है. परिवार में दो बच्चे हैं. उनमें एक को केला पसंद हैं, दूसरे को अनार. व्यक्ति दोनों का मन रखने के लिए एक दिन केले लेकर आता है, दूसरे दिन अनार. इस तरह उसके किसी एक दिन केला या अनार लाने की संभावना 0.5 अर्थात 50 प्रतिशत होगी. पापा केला लाएंगे या अनार, यह बात बच्चे भी जानते हैं. एक दिन भाई-बहन छत पर थे कि पापा को हाथ में थैला लिए आते देखा. दोनों बच्चे बहस करने लगे—

‘आज पापा केला लाए हैं.’

‘नहीं अनार.’

‘पापा का फोन आया था, उस समय वे केले वाले के पास खड़े थे.’

‘तो क्या हुआ, जरूरी थोड़े ही पापा केले वाले के पास से केला लेकर ही आएं. वे केला बेचनेवाले से मना करके अनार वाले के पास भी जा सकते हैं.’

‘पापा जिस ठेली के पास खडे़ होते हैं, वहीं से फल खरीद लेते हैं.’

‘हमेशा ऐसा नहीं होता. एक बार मैंने स्वयं पापा को केले वाले को छोड़ अनारवाले के पास जाते हुए देखा था.’

अब मान लीजिए जहां से उन बच्चों के पिता फल खरीदते हैं, वहां केवल दो फलवाले खड़े होते हैं. उनमें से एक अनार बेचता है और दूसरा केला, तो जो बच्चा अपने पक्ष में अतिरिक्त तर्क दे पाएगा, उस दिन उस फल को लाने की संभावना उतनी ही बढ़ जाएगी. अनविन का 50 प्रतिशत वाला विचार यही कहता है. मान लीजिए लोगों से पूछा जाए कि ईश्वर है? कुछ लोग कहेंगे—‘हां’, कुछ कहेंगे—‘नहीं.’ जरूरत इस कवायद की भी नहीं है. आप एक सिक्का लीजिए, उछालिए. हेड और टेल आने की प्रायिकता बराबर होगी. अनविन ईश्वर न होने की संभावना को किनारे कर, शेष पचास प्रतिशत को उसके पक्ष में प्रमाण मान लेता है. यही उसके अनुसार ईश्वर की आधार प्रायिकता है. इस 50 प्रतिशत को 67 प्रतिशत तक पहुंचाने के लिए वह आगे भी ऐसी ही पूर्वापेक्षाओं का सहारा लेता है. जबकि बायस संभावनाओं की पड़ताल के लिए स्थितिजन्य साक्ष्य प्रस्तुत करता है. ठीक ऐसे ही जैसे कोई चतुर पुलिस अधिकारी किसी घटना की पड़ताल करता है.

कल्पना कीजिए प्लेटफार्म पर उतरता हुआ कोई आदमी चलती ट्रेन में खिड़की के बराबर बैठे एक पुरुष को अपने सहयात्री से बातचीत करते हुए देखता है. इससे पहले कि वह दूसरे व्यक्ति को पहचान पाए कि वह स्त्री है अथवा पुरुष, ट्रेन आगे बढ़ जाती है. दृष्टा इतना तो जान चुका है कि खिड़की के बराबर में बैठा यात्री पुरुष था. लेकिन जिससे वह बात कर रहा था, वह पुरुष भी हो सकता है, स्त्री भी. उसके स्त्री अथवा पुरुष होने की प्रायिकता बराबर, अर्थात पचास प्रतिशत होगी. अब यदि कोई तीसरा व्यक्ति दृष्टा से उन यात्रियों के बारे में पड़ताल करना चाहे तो उनकी बातचीत कुछ इस प्रकार होगी—

‘अच्छी तरह याद करके बताओ, दूसरा व्यक्ति पुरुष था अथवा स्त्री?’

‘मुझे याद नहीं आ रहा.’

‘ठीक है, दिमाग पर जोर डालो, याद करने की कोशिश करो. तुमने उसके बाल तो देखे ही होंगे. वे लंबे था या छोटे?’ पड़ताल कर रहा व्यक्ति अपनी तकनीक आजमाता है. जांचकर्ता का तर्क उसके ठोस अनुभवों पर आधारित है.

‘लंबे.’ दृष्टा को याद आता है. जांच करने वाला जानता है कि सामान्यतः स्त्रियां लंबे बाल रखती हैं. लेकिन सभी स्त्रियां बाल नहीं रखतीं. औसतन कितनी स्त्रियां लंबे बाल रखती हैं, इसके आंकड़े उसके पास हैं. यदि नहीं तो जुटाए जा सकते हैं. वह प्राप्त आंकड़ों से मिलान करके देखता है. लंबे बाल रखनेवाले हर चार व्यक्तियों में से आमतौर पर एक पुरुष होता है, तीन स्त्रियां. वह हिसाब लगाता है. उसके अनुसार जिस व्यक्ति से वह बातचीत कर रहा था उसके स्त्री होने की संभावना चार में से तीन, यानी 75 प्रतिशत है. प्रायिकता को बढ़ाने के लिए जांचकर्ता कुछ और सवाल कर सकता है. जैसे क्या उसने हाथ रचाए हुए थे? ऐसे साक्ष्यों के साथ प्रायिकता में आनुपातिक रूप से वृद्धि अथवा कमी आती जाएगी. बा॓यस के सूत्र का यही आधार है. इसी को विस्तार देते हुए वह स्थिति-विशेष के समर्थन में साक्ष्य जुटाता है और विशुद्ध गणितीय पद्धति का अनुपालन करते हुए सामान्य निष्कर्ष तक पहुंचता है.

बा॓यस के अनुसार यदि हम मान लें कि बातचीत स्त्री ‘स’ के साथ हो रही थी, तब यह मानते हुए कि समाज में स्त्री-पुरुष की संख्या लगभग बराबर है, बगैर किसी गहराई में जाए मान सकते हैं कि सहयात्री के स्त्री होने की प्राथमिक संभाव्यता सप्रथम= 0.5 होगी. जिसका आशय है कि पुरुष की बगल में बैठे सहयात्री के स्त्री अथवा पुरुष होने की संभावना बराबर-बराबर है. यदि यह मान लिया जाए कि उस सहयात्री के बाल लंबे थे और आंकड़ों से यह सिद्ध हो कि प्रत्येक चार स्त्रियों में से तीन(75 प्रतिशत) लंबे बाल रखती हैं तो बा॓यस के अनुसार लंबे बालों के आधार पर पुरुष के सहयात्री के, स्त्री होने की संभावना सलंब/म = 0.75 होगी. इसे बायस ने सशर्त प्रायिकता कहा है. अर्थात वह प्रायिकता जो घटना के लक्षणों तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार से तय होती है. ऐसे ही जैसे मान लीजिए कि 25 प्रतिशत पुरुष लंबे बाल रखते हैं तो उपर्युक्त घटना में सहयात्री के लंबे बालों के आधार पर पुरुष होने की संभावना स/पु= 0.25 होगी. यहां यह मान लिया गया है कि बातचीत केवल स्त्री अथवा पुरुष के साथ हो रही थी, अन्य किसी प्राणी के साथ नहीं. बायस इससे अंतिम संभाव्यता अथवा कुल लाक्षणिक संभाव्यता को जानना चाहता है. इसके लिए वह निम्नलिखित सूत्र देता है—

                                                   सप्रथम x   सलंब/म

                     सअंतिम       =         ……………………….

                                                            स

                                                                     (स = कुल संभाव्यता)

                                                     सप्रथम x   सलंब/म

                                =       …………………………………………

                                             सप्रथम x   सलंब/म +   सप्रथम x स/पु

                                                0.75 x 0.50                        0.375

                                =   …………………………………… =     …………….

                                           0.50 x 0.75 + 0.50 x 0.25         0.500

                                                                                     = 75 % लगभग

इस तरह लंबे बाल के साक्ष्य के आधार पर उपर्युक्त उदाहरण में सहयात्री के स्त्री होने की संभावना 50% से बढ़कर 75% हो जाती है. साक्ष्यों की संख्या तथा उनकी कोटि का प्रभाव संभाव्यता के स्तर पर पड़ता है. डा॓क्टर रोगी से तथा पुलिस मुजरिम से जांच-पड़ताल के दौरान इसी तरह संभाव्यता को आगे बढ़ाती जाती है. अनविन उसी सूत्र को ईश्वर की संभाव्यता पुष्ट करने के लिए अपनाता है. बा॓यस के सूत्र को ईश्वर की परिगणना के लिए आधार बनाते समय अनविन यह दावा कतई नहीं करता कि उसने जो सूत्र दिया है, उससे सभी सहमत होंगे. वह स्वयं मानता है कि विज्ञान और गणित के माध्यम से ईश्वर की संभाव्यता को सिद्ध करना बहुत मुश्किल भरा काम है. उसका बस इतना दावा है कि वे लोग जो ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखते हैं, उसके तथाकथित गणितीय सूत्र का सहारा लेकर अपने मत को बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर सकते हैं. वह जानता है कि उसके निष्कर्षों से लोग अपनी मान्यताएं बदलने को राजी नहीं होंगे. इसलिए अपने बचाव हेतु वह पर्याप्त संभावनाएं पहले ही सोच कर चलता है. कहने की आवश्यकता नहीं कि ईश्वरवादियों को अनविन के तर्क अपनी आस्था के प्रति चमत्कारी समर्थन प्रतीत होते हैं. ईश्वर की आधार-संभावना(सपूर्व = 50 प्रतिशत) तय कर लेने के पश्चात, बा॓यस के सूत्र में किंचित संशोधन के साथ वह अपना सूत्र प्रस्तुत करता है. निष्कर्ष संभाव्यता(सपश्चात) तक पहुंचने के लिए अनविन द्वारा प्रयुक्त सूत्र निम्नवत है—

                                                               सपूर्व x द

                सपश्चात            =                  ………………………….

                                                                सपूर्व x द + 1—सपूर्व

अनविन के अनुसार ‘द’ दिव्यता सूचकांक है. वह अपने दिव्यता सूचकांक को अलग-अलग अंक देकर गणना करता है. वे अंक भी अनविन द्वारा प्राकल्पित हैं. अलग-अलग स्थितियों के अनुरूप अनविन द्वारा प्रकल्पित दिव्यता सूचकांक निम्नलिखित हैं—

  1. पहली स्थिति में यह मानते हुए कि ईश्वर है और अकाट्य रूप से है, उसके विरोध के समस्त तर्कों को नकारते तथा पक्ष की प्रत्येक संभावना को स्वीकारते हुए वह दिव्यता सूचकांक ‘द’ को उच्चतम 10 अंक देता है. इससे वह दर्शाना चाहता है कि ईश्वर है और दस बार है.

2 दूसरी गणना के लिए वह यह मानते हुए कि ईश्वर है, एक नहीं दो बार है, वह दिव्यता सूचकांक ‘द’ को 2 अंक देता है.

  1. तीसरी गणना में वह दिव्यता सूचकांक को केवल 1 अंक देता है. इसका आशय है कि ईश्वर हो भी सकता है, नहीं भी.
  2. चौथी परिकल्पना में इस संभावना को मानते हुए कि ईश्वर नहीं है, वह दिव्यता सूचकांक को मात्र 0.5 अंक देता है.
  3. पांचवी स्थिति में वह दिव्यता सूचकांक ‘द’ को 0.01 अंक देता है. उस संभावना को और बढ़ा लेता है, जो मानती है कि ईश्वर नहीं है.

दिव्यता सूचकांक को तय करने का अनविन का अलग मापदंड हैं. सांख्यिकी आंकड़ों के साथ साक्ष्य पर भी विश्वास करती है, जबकि अनविन के यहां ऐसा कुछ भी नहीं है. दिव्यता सूचकांक के अलग-अलग निर्धारण हेतु वह पुनः प्रतिज्ञप्तियों की कल्पना करता है. जाहिर है ये प्रतिज्ञप्तियां आस्था के आधार गढ़े गए उसके छह भिन्न स्तर हैं—

  1. शुभत्व(द=10): अंकों के आधार पर यदि ध्यान से देखा जाए तो शेष संभावनाओं के मुकाबले यह शक्तिशाली संभावना है. कम से काम तुलनात्मक अंकों के आधार पर. यह कुछ ऐसा ही है कि तराजू के एक पलड़े में एक भारी-भरकम पत्थर तथा दूसरे में बिल्ली, खरगोश, चूहा, बकरी, बंदर को एक साथ चढ़ाकर यह निष्कर्ष निकाल लिया जाए कि वह पत्थर जंगल के सभी जानवरों से अधिक वजनदार है.
  2. सामान्य बुराइयां: यानी ऐसी बुराइयां जिनका होना समाज की विकास प्रक्रिया को गति देने के लिए आवश्यक है(द=0.5).
  3. प्राकृतिक बुराइयां : जैसे जंगलराज की स्थिति, महामारी आदि. जंगल में शक्तिशाली प्राणी अपने से छोटे प्राणी को खा जाता है. महामारी से मासूम बच्चे तक चल बसते हैं. यह नैतिकता की दृष्टि में अपराध है. यद्यपि जंगल में उत्तरजीविता के नियम के चलते यह स्वाभाविक अवस्था है. अनविन इसके लिए दिव्यता सूचकांक को 0.1 अंक देता है.
  4. आध्यात्मिक अनुभूतियां/अंतःप्राकृतिक चमत्कार : जैसे पूजा-पाठ, प्रार्थना, अंतरानुभूति आदि. जिससे मनुष्य को अपने अंतर्मन में झांकने से शांति की अनुभूति होती है(द=2).
  5. धार्मिक अनुभूतियां : स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित कर देने के बाद इस प्रकार की अनुभूतियां कथित रूप से साधक को होती रहती हैं. अनविन इसे भी 2 अंक देता है.
  6. पुनर्जीवन /पराभौतिक चमत्कार : धर्म की नींव मृत्यु पश्चात सुख की लालसा पर टिकी हुई है. अधिकांश धर्मों में माना गया है कि मनुष्य मरने के बाद पुनः जन्म लेता है. इस चमत्कारपूर्ण धारण को अनविन अपने दिव्यता सूचक पैमाने पर मात्र 1 अंक देता है.

उपर्युक्त दिव्यता सूचकांकों को वह अपने सूत्र अलग-अलग रखकर गणना करता है. तदनुसार—‘ईश्वर के होने की प्रायिकता 67 प्रतिशत सिद्ध होती है.’ आगे वह जोर देकर कहता है, ‘यह संख्या व्यक्तिपरक है. इसलिए कि यह मेरे निजी साक्ष्यों के आकलन पर आधारित है.’ उदारता का प्रदर्शन करते हुए वह कहता है कि सूचकांकों को प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने हिसाब से आकलित कर सकते हैं. मगर उस अवस्था में अनविन का सूत्र लड़खड़ा जाता है. ‘साइंटिफिक अमेरिकन’ पत्रिका के जुलाई 2004 अंक में प्रकाशित एक आलेख में Skeptic के प्रकाशक मिशेल शर्मर अनविन के दिव्यता सूचकांकों को 1 से 10 अंक अपनी ओर से देते हैं. फिर उसी सूत्र के आधार पर ईश्वर की संभाव्यता का आकलन करते हैं, तो वह घटकर मात्र 2 प्रतिशत रह जाती है. एक अन्य गणना का उल्लेख पुस्तक की आलोचना के दौरान बा॓ब सीडेंस्टकर ने अपने लेख ‘कंप्यूटिंग दि प्रोबेबिलिटी आ॓फ गा॓ड’ में किया है. बा॓ब अनविन के दिव्यता सूचकांक में जैसे ही ऐच्छिक मान रखता है, ईश्वर की संभाव्यता और भी घटकर नगण्य(10—16) तक रह जाती है.

स्पष्ट है कि अनविन का आकलन उसकी व्यक्तिगत धारणा की अभिव्यक्ति है. हालांकि उसने कभी दावा नहीं किया कि वह ईश्वर को वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित कर रहा है. और कोई भी उसको जांचकर वैसे ही निष्कर्ष पर पहुंच सकता है, जैसा कि दूसरे वैज्ञानिक प्रयोगों में होता है. इस पुस्तक को एक-दो को छोड़कर अधिकांश आलोचकों ने मजाक के रूप में लिया है. उनके अनुसार यह पुस्तक गणित के लिए पढ़ी जा सकती है, मनोरंजन के लिए पढ़ी जा सकती है, यदि आप ईश्वर के अस्तित्व पर भरोसा करते हैं, तब थोड़ी-बहुत तसल्ली के लिए पढ़ी जा सकती है. लेकिन यदि आप किसी दार्शनिक समस्या का समाधान इससे चाहते हैं, तब वह व्यर्थ की कवायद सिद्ध होगी. पुस्तक के समीक्षकों में से एक हेमंत मेहता लिखते हैं—‘पढ़ने में मजेदार. वैचारिकी का आश्चर्यजनक प्रयोग….अनविन को ऐसे लोगों की ओर खड़ा कर देता है, जिनका गणित से कोई वास्ता नहीं है.’ अनविन अपनी धारणाओं को लादने के लिए गणित का सहारा लेता है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर बच निकलने का रास्ता भी तैयार रखता है. यह कोशिश कृति को मनोरंजक प्रयोग से आगे नहीं बढ़ने देती. बा॓यस के सूत्र का उपयोग चिकित्सा से लेकर अपराध-जांच तक कहीं भी किया जा सकता है, जहां प्रायिकता को बढ़ाने के लिए ठोस साक्ष्य उपलब्ध हों. जबकि अनविन के दिव्यता सूचकांक का कोई तार्किक आधार नहीं है. वह केवल उसकी मनोरचना है, जिसे उसने बेहिचक स्वीकारा भी है. उल्लेखनीय है कि विज्ञान को धर्म से जोड़ने अथवा धर्म और विज्ञान का साम्य दिखाने की कोशिश करनेवाले अनविन अकेले नहीं हैं. इस विषय पर पिछली दशाब्दियों में और भी पुस्तकें आई हैं. उनमें स्टीवन ब्रम्स की ‘सुपीरियर बीईंग्स : इफ दे एक्जिस्ट’, रिचर्ड दाकिन की ‘दि गार्ड डिल्यूजन’ आदि प्रमुख हैं. इनमें किसी न किसी प्रकार ईश्वर के विचार को विज्ञान से जोड़ने की असफल कोशिश की गई है.

अनविन के इस आत्मपरक लेखन के कई सामाजिक पहलु भी हैं. दिव्यता सूचकांक में शुभता को ईश्वर में स्थापित करना मनुष्यता के रास्ते अवरुद्ध करने जैसा है. आज हम पूंजीवादी अर्थतंत्र पर आरोप लगाते हैं कि उसने मनुष्य को भौतिकवादी बना दिया है. इतना स्वार्थी बना दिया है कि मनुष्य को सिवाय अपने सुख के, भोग और स्वार्थ-लिप्सा के कुछ भी नजर नहीं आता. इसी आधार पर अपसंस्कृतिकरण का रोना भी रोया जाता है. उस समय हम भूल जाते हैं कि जिसे हम बाजारवाद की देन बताते हैं, वैसी स्वार्थपरता, अकेले-अकेले सुख पाने की कामना का उपदेश तो धर्म सहस्राब्दियों से देता आया है. धर्म की ओर प्रवृत्त करने के लिए गुरु आमतौर पर अपने शिष्यों को समझाता है—‘यह संसार माया है. इसमें कोई भी तुम्हारा अपना नहीं है. भाई, बहन, पत्नी, माता-पिता, सभी से तुम्हारा स्वार्थ का नाता है. वे भी तुमसे स्वार्थ से बंधे हैं. कोई तुम्हारा साथ नहीं देने वाला. इसलिए यदि स्वर्ग का सुख पाना है, तो इस मोह-ममता को त्याग कर परमात्मा की शरण में आ.’ थोड़े-बहुत फेरबदल के साथ गीता में कृष्ण ने यही कहा है. गीता निष्काम कर्म का संदेश देकर उसे संतुलित करने का प्रयास करती है. केवल अपने लिए सुख-समृद्धि और स्वर्ग की कामना, अनेक बार मनुष्य को सामाजिक दायित्वों की ओर से उदासीन बनाकर, घोर स्वार्थी आचरण की ओर प्रवृत्त कर देती है. दूसरे केवल अपने सुख की कामना तथा स्वार्थसिद्धि के लिए काम करना, सामाजिक नैतिकता को बिसार देना है. यह भुला देना है कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है. भले ही वह समाज में अपने सुख और सुरक्षा के लिए शामिल हुआ हो, समाज के प्रति उसकी भी पर्याप्त जिम्मेदारियां हैं. प्रकट में प्रत्येक धर्म अपने माता-पिता, पड़ोसी, मित्र-सखा के प्रति उदारतापूर्वक पेश आने की सलाह देता है. लेकिन मोक्ष एवं कल्याण के नाम पर वही धर्म संसार को माया और विभ्रम बताकर मनुष्य को ऐसी अंध-स्पर्धा से जोड़ देता है, जिसकी अति उसे सामाजिक कर्तव्यों की ओर से उदासीन बनाती है. इसलिए हम देखते हैं कि भारत जैसे समाजों जहां सामान्य नैतिकता को भी धर्म के भरोसे छोड़ दिया जाता है, नागरिकबोध बहुत कम होता है. पूरा समाज एक भीड़ के आचरण को अपने स्वभाव का हिस्सा बना लेता है.

फिर एक अवैज्ञानिक कार्य को विज्ञान जितना महत्त्व दिए जाने का कारण? दरअसल, आस्तिक को उतना डर धर्म, ईश्वर या पापकर्म से नहीं लगता, जितना नास्तिक से लगता है. उस विचार से लगता है, जो ईश्वर को नकारता है. इसलिए जब भी वह किसी नास्तिक को देखता है, नकलीपन का एहसास उसे कचोटने लगता है. वह उसे बार-बार उकसाता है—‘अरे! यह ईश्वर को नहीं मानता! अगर नहीं मानता तो जीवित कैसे है?’ सामंती समाजों के देवता और भी बड़े सामंत होते हैं. देवत्व की अवमानना करने, यहां तक कि प्रसाद तक न खाने अथवा प्रसाद लेकर उसको खाना भूल जाने से भी उनकी त्योरियां चढ़ जाती हैं. आस्तिक यही सोचकर हैरान होता है कि ऐसे कोपवंत देवताओं के चलते उनके अस्तित्व को नकारनेवाला धरती पर सुरक्षित कैसे है? जरूर वह दिखावा करता है. अगर यह सचमुच ईश्वर को नकारता है तब तो ईश्वर का कोप उसे सताएगा ही. उस समय मैं भी इसका साथी न मान लिया जाऊं? ऐसे न जाने कितने अनजाने भय उस व्यक्ति को घेर लेते हैं. पक्ष में दिखने के लिए वह ईश्वर पर सवाल उठाने की संभावना को ही धिक्कारने लगता है. फिर चाहे कोई कितना ही कहे कि वह नास्तिक है—वह विश्वास ही नहीं करता. लोग यह मानने को तैयार ही नहीं होते कि नास्तिक होना भी भारतीय दर्शन-परंपरा का हिस्सा है. उस समय सौ में से अस्सी का एक ही जवाब होता है—‘हं…हं! नास्तिक में भी तो अस्तिः(नः+अस्तिः) छिपा हुआ है. उस समय कोई लाख तर्क दे कि ‘‘भइया, ‘अस्तिः’ को नकारने के लिए ही ‘नः’ उपसर्ग लगाया गया है.’’—बात उनके गले नहीं उतरती. जिद पर कायम रहने के लिए ईश्वरवादियों के रटे-रटाए तर्क होते हैं. उनके दिमाग की सुई हजार-दो-हजार साल पहले के समय पर अटकी होती है, जब साम्राज्यवादी लालसा में दर्शन का धार्मिकीकरण कर मनुष्य के सहजबोध को उससे बांध दिया गया था.

ईश्वरवादियों का दूसरा तर्क होता है, इस दुनिया को किसी ने तो बनाया है! वही शक्ति ईश्वर है. फिर ईश्वर को किसने बनाया है? ईश्वर को भला कौन बनाएगा? वह तो अनादि-अनंत और सर्वशक्तिमान है. यही बात हम इस सृष्टि के लिए कहें तो? कार्य-कारण का उनका नियम ईश्वर तक जाकर ठहर जाता है. उससे पीछे ले जाने में उनके पसीने छूटने लगते हैं. यदि उनपर जोर डाला जाए, कहा जाए कि यदि ईश्वर अनादि-अनंत हो सकता है तो सृष्टि क्यों नहीं? यदि ब्रह्मांड का विस्तार ही कल्पनातीत है तब उसके कथित निर्माता की कल्पना कैसे संभव है? उस समय बहस से कन्नी काटते हुए वे सृष्टि को ही ईश्वर मान लेंगे. यानी चिपके अपनी बात से रहेंगे. डरे हुए लोग ठहरे. उनका डर उनके किस पापबोध की परिणति है, वे जानें. विज्ञान और धर्म के रास्ते एकदम अलग हैं. विज्ञान संदेह का रास्ता है. ईश्वर आस्था का मसला. दिमाग की सुई एक जगह ठहर जाए, तब आदमी धार्मिक कहलाता है. उदाहरण के लिए इन दिनों भारत की ओर से भेजा गया मंगलयान रास्ते में है. सब कुछ ठीक ठाक रहा तो अगले कुछ दिनों में मंगल की कक्षा में होगा. मान लीजिए उस यान को किसी सुदूर ग्रह पर बैठा ऐसा व्यक्ति देखे जिसके दिमाग की सुई रामायण काल पर अटकी हुई है तो वह यही कहेगा—देखों धरती से फेंगी गई पवनपुत्र हनुमान की गदा आसमान में उड़ रही है.’ ऐसे ही दूसरा व्यक्ति जो किसी कारणवश महाभारत युग पर अटका हुआ है, उसे भीम की गदा बताएगा. इसे आप मजाक की तरह भी ले सकते हैं. लेकिन अशोक की लाट को भीम की गदा बतानेवाले लोग भी इसी देश-समाज में होते आए हैं.

अतिप्राचीन समाजों में धर्म की चाहे जो प्रासंगिकता रही हो, आज वह सामाजिक भेदभाव और ऊंच-नीच का कदाचित सबसे बड़ा मददगार है. शीर्षस्थ वर्गों के साम्राज्यवादी मंसूबों ने धर्म को राजनीति और समाज में प्रासंगिक बनाए रखा. करीब ढाई-तीन हजार वर्ष पहले यह महसूस किया जाने लगा था कि छोटे-छोटे राज्यों से काम नहीं चलनेवाला. हमलावर दुश्मनों से सुरक्षा के लिए बड़ी ताकत बनना होगा. ऐसे में धर्म ने आसंजक और संसजक दोनों का काम किया. इस अवधि में कुछ अच्छे परिणाम भी धर्म के कारण देखने को मिले. भौतिकता की आड़ के रूप में वह अनेक व्यक्तिगत और सामाजिक तनावों को कम करने का माध्यम बना है. धर्म का औचित्य बनाए रखने के लिए उसको नैतिक मूल्यों से जोड़ा गया था, लेकिन बाद में उन्हें धर्म का पर्याय बताना आरंभ कर दिया. उसकी सबसे बड़ी भूमिका सामजिक-आर्थिक और राजनीतिक विभाजन को शास्त्रीय रूप देने में रही, जिससे कालांतर में बड़े आर्थिक-सामाजिक विभाजनों को जगह मिली. धर्म का अतिवादी रूप महाभारतकाल में भी दिखाई पड़ता है, जब आर्यवर्त पर एकक्षत्र राज्य कायम करने के लिए कृष्ण चतुराई पूर्वक समस्त आर्यवर्त के राजाओं को परस्पर लड़वा देते हैं. सभी छोटे-बड़े राजा खेत रहते हैं. कौरवों को पराजित कर, देर-सवेर पांडव भी महाप्रयाण पर चले जाते हैं. आगे चलकर कुछ ऐसी ही कोशिश चाणक्य के नेतृत्व में नजर आती है.

सवाल है कि यदि कि विज्ञान ही सबकुछ है तो जीवन, मृत्यु जैसे प्रश्न अनुत्तरित क्यों हैं. इसके अलावा भी ऐसे अनेकानेक प्रश्न हैं जिनका उत्तर विज्ञान नहीं दे पाया है. लेकिन विज्ञान ने कभी दावा भी नहीं किया कि उसने सबकुछ जान लिया है. धार्मिक प्रवृत्ति के लोग दुनिया के सारे ज्ञान को परमात्मा में अवस्थित मान लेते हैं. धीरे-धीरे अधिकांश के लिए यह परमात्मा को प्रसन्न रखने का कर्मकांड बन जाता है. धीरे-धीरे वह सुबह-शाम की आरती में सिमट जाता है. ऐसे आस्थावादी समाज में लोग 24—25 पृष्ठ रटकर सत्यनारायण की कथा सुनाने वाले पुरोहित को ‘पंडित’ मान लें, तो आश्चर्य कैसा! वैज्ञानिक को अपने ज्ञान का कभी गुमान नहीं होता. सच्चा वैज्ञानिक भली-भांति जानता है कि उसका अज्ञान उसके ज्ञान कहीं अधिक बड़ा है. इसलिए वह निरंतर और जानने के लिए प्रयासरत रहता है. अपने ही ज्ञान पर निरंतर संदेह करता है. इसी में उसकी सिद्धि है. इसके लिए विज्ञान की आलोचना करना उचित नहीं. अनसुलझे सवालों के उत्तर की खोज के लिए वैज्ञानिकों को पर्याप्त समय देना होगा. यूं भी सृष्टि की उम्र छोडि़ए, पृथ्वी की आयु के समक्ष भी विज्ञान की उम्र शिशु जितनी नहीं है. इस बारे में अमेरिकी लेखक हावर्ड बूस फ्रेंकलिन ने एक मजेदार उदाहरण दिया है—

‘‘पृथ्वी की उम्र लगभग साढ़े चार अरब है. हिम युग को पूरी तरह समाप्त हुए लगभग 10000 साल हुए हैं. तदनुसार पृथ्वी की उम्र हिम युग बीतने की अवधि के लगभग 4,50,000 गुना अधिक है. इसे समझने के लिए हम एक तस्वीर की कल्पना करते हैं. हम मान लेते हैं कि पृथ्वी की उम्र 45,000 फुट के समतुल्य है ठीक उतनी ही जिसपर कोई जेट वायुयान उड़ान भर सकता है. उस पैमाने पर यदि हिम युग की अवधि को दर्शाया जाए तो वह मात्र 1.2 इंच को दर्शाएगा. अब यदि आधुनिक विज्ञान के अवधि, जब उसने तकनीक और प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में कदम रखा, मात्र 200 वर्ष पुरानी घटना है. वह हमारे पैमाने पर मात्र 0.024 की ऊंचाई को दर्शाएगी. यह इतनी बारीक रेखा होगी, जैसे मामूली बाल पाइंट पेन द्वारा खींची गई रेखा की मोटाई.’’

सत्य से परे होने के बावजूद मैं अनविन के प्रयासों की सराहना करूंगा. उन्होंने ईश्वरत्व को गणित के आधार पर आकलित करने का विचार तो दिया. आगे और लोग भी आएंगे. जिसके फलस्वरूप पारंपरिक धर्म ने अपने चारों ओर जो बाड़ें लगाई हैं, वे कमजोर होंगी; तथा धर्म की वैज्ञानिकता पर बहस का सिलसिला आगे बढ़ेगा. तब शायद लोग महाभारत के इस सत्य को स्वीकारने को राजी हो जाएं—

गुह्यं ब्रह्म तदिदं वो ब्रीवीमि। न हिं मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचितः। (महाभारत, शांतिपर्व, 299/20)—एक बात बताता हूं, संसार में मनुष्य से श्रेष्ठ, मनुष्य के लिए मनुष्य से उपयोगी कुछ भी नहीं है. सच मानिए, ईश्वर भी नहीं.

[पुनश्चः: मुझे एक बात जानकर हैरानी होती है कि धर्म के नाम पर, अपने समय के शीर्षस्थ महारथियों, अठारह अक्षौहिणी सेना, देवता-राक्षस तथा यादव कुल का विनाश लिख देने के पश्चात महाभारतकार ने कानाफूसी के अंदाज में ही क्यों कहा कि ‘इस संसार में मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है.’ युद्ध में अपनों से लड़ाई छेड़ने के लिए अर्जुन को उकसानेवाले कृष्ण भी इस ‘परमसत्य’ को लोगों से छिपा ले जाते हैं और गीता इससे वंचित रह जाती है. अगर यह उपदेश पहले ही दे दिया होता तो क्या युद्ध होता? प्रजा यदि जानती कि मनुष्य के लिए एकमात्र श्रेष्ठतम मनुष्य है तो क्या वह दूसरों के कहने पर अपनों का गला काटने को तैयार होती? हरगिज नहीं! दरअसल शिखर पर विराजमान लोगों के लिए केवल वही मनुष्य होते हैं, जो उनके सगे या सत्ता के आसपास होते हैं. बाकी या तो सेवक होते हैं अथवा प्रजा. वे सुन न लें, इसलिए अच्छी बात हमेशा चुपके-चुपके कानाफूसी के अंदाज में, केवल अपनों के बीच कही जाती है, और उकसाने की जरूरत आ पड़े तो ‘धर्म-धर्म चिल्लाया जाता है.]

© ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com

जनसंस्कृति एवं न्याय

सामान्य

धर्म एवं अभिजन संस्कृति—11

न्याय की संकल्पना इतनी नैसर्गिक और मनुष्यता की इतनी सार्वभौमिक, सार्वजनीन चाहत है कि इसका स्थान सभी कानूनों, दलों तथा धर्मों से ऊपर दिखाई पड़ता है.वाल्तेयर.

जब सभी स्वतंत्र हैं, अधिकारों के मामले में एकदूसरे के बराबर हैं, एक ही मिट्टी में जन्मे, एक ही हवापानी पाकर पले हैं, तब समाज में इतनी विषमताएं क्यों हैं? यदि एक ओर करोड़ों ‘स्वतंत्र’ नागरिक भीषण विपन्नता का जीवन जीने के लिए विवश हैं, तब दूसरी ओर कुछ सौ या हजार लोगों को धनवैभव, विलासिता और अकूत सुखसमृद्धि से भरपूर जीवन जीने का अवसर कैसे मिल जाता है? यदि सामाजिक असमानता कड़वा सच है, और निस्संदेह वह है भी, क्योंकि एकदम साफ नजर आता है, तो स्वतंत्रता और समानाधिकारिता के दावों को संद्धिग्ध होना ही चाहिए. साफ है असमानता के शिकार करोड़ों नागरिक जिसे अपनी स्वतंत्रता मानते हैं, वह दरअसल यथास्थिति में बने रहने, मूक सहते जाने और जो, जैसा, जितना दिया गया हैउसी में संतोष करने की स्वतंत्रता है. सच कहें तो आभासी स्वतंत्रता. उसका मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त असमानता को लेकर उठने वाले प्रश्नों को टालते रहना है. ताकि वर्चस्वकारी सत्ताओं के स्वार्थ और शोषणकारी चरित्र पर कम से कम सवालात हों. उससे आगे यदि वे कामना करें तो यह आधीअधूरी स्वतंत्रता भी, जिसे इससे पहले हमने आभासी स्वतंत्रता कहा है, खतरे में पड़ सकती है. वरना यह क्या हुआ कि श्रम किसी का, मूल्यांकन कोई और करे. पसीना मजदूर बहाए और मुनाफा मालिक की जेब में चला जाए. और क्या यह स्वतंत्रता और समान अधिकारिता का लक्षण है कि जमीन किसान की, फसल उसके खूनपसीने की कमाई, अनाज की बोली सरकार या व्यापारी लगाएं! यदि यही स्वतंत्रता है तो ऐसी स्वतंत्रता के बारे में सोचना भी भद्दे मजाक जैसा है. लेकिन यह भी कटु सत्य है कि असमानताग्रस्त समाजों में, जहां निर्णय ऊपर से थोपे जाते हैं, आम आदमी के हिस्से महज आभासी स्वतंत्रता ही आती है—या यूं कहो कि स्वतंत्रता का कंकाल, अथवा पुरानी किस्सागोइयों में बंद तोता, जिसकी जान किसी राक्षस अथवा चालाक जादूगरनी की मुट्ठी में होती थी. असमानताग्रस्त समाजों में व्यक्ति राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होता है. मानसिक स्तर पर दास. दासता भी इकहरी नहीं, बहुरूपी और बहुआयामी. आस्था में डूबा हुआ एक व्यक्ति मंदिर जाता है. जिस आरती को पुजारी गाता है, उसे वह घर पर सुबहशाम संपूर्ण श्रद्धा और भक्तिभाव से गाता है. जिस दुकान से पुजारी मंदिर के लिए धूपदीपनैवेद्य आदि खरीदता है, उसी से वह श्रद्धालु भी घर में अपनी आस्था को खादपानी देता है. ईश्वर के बारे में पुजारी और भक्त दोनों के विचार भी समान हैं. दोनों उसे कणकण व्यापी और अंतर्यामी बताते हैं. बावजूद इसके उस व्यक्ति का पूजाधर्म मंदिर जाए बगैर संपन्न नहीं होता. मंदिर में पुजारी उससे सीधे पूजा का अधिकार छीन लेता है. देवता और भक्त के बीच मध्यस्थ बना पुजारी मंदिर की व्यवस्था में विशेषज्ञ है. क्यों? क्या यह अधिकार भक्तों ने उसे दिया है? शायद नहीं. यदि तथाकथित ईश्वर से मुलाकात ही पूजाअर्चना का एकमात्र अभीष्ट है तो हर भक्त उससे सीधे अथवा अपने प्रियजनों के साथ मिलना चाहेगा. जरूरी नहीं है कि पुजारी उसके प्रियजनों की सूची में सम्मिलित हो. पुजारी इन कर्मकांडों जो पीढ़ीदरपीढ़ी दोहराये जाते रहे हैं, और उन नैतिकतावादी कहावतों, बातचीत आदि जिन्हें समाज में लोग आपस में एकदूसरे से अकसर करते हैं, कुछ नया नहीं कह पाता. इसके बावजूद धर्म के मामले में उसका निर्णय अंतिम माना जाता है. यह बिना किसी गुण के स्वयंस्थापित विशेषज्ञता है, जिसकी जड़ें दो से तीन हजार वर्ष पुरानी हैं.

एक अन्य व्यक्ति है. समान अधिकारिता, स्वतंत्रता और बराबरी का दावा करते हुए, न्यायकामना के साथ वह प्रतिपक्षी को न्यायालय में चुनौती देता है. अपनी समस्या, मुकदमे की स्थितियों तथा अपनी व्यथा को जितनी प्रामाणिकता के साथ वह स्वयं अभिव्यक्त कर सकता है, वह दूसरों के लिए असंभव है. लेकिन अदालत के आगे उसके अनुभव की प्रामाणिकता और अभिव्यक्ति का कोई मोल नहीं. इसके बावजूद व्यक्ति को प्रेरित, कभीकभी तो बाध्य किया जाता कि वह सीधे अपना पक्ष प्रस्तुत करने के बजाय वकील की मदद ले. वही कहेबोले जैसी सलाह उसका वकील देता है. वकील के लिए प्रत्येक मुकदमा कानून की विशिष्ट धारा होता है. वह मुकदमे से जुड़े घटनाक्रम को ज्यों का त्यों बयान नहीं करता, बल्कि कानून की विभिन्न धाराओं के भीतर अपने हितानुकूल उसकी व्याख्या करता है. चूंकि एक सैद्धांतिक व्याख्या को दूसरी सैद्धांतिक व्याख्या आसानी से काट देती है, अतएव मामला सच की सुनवाई का न होकर कानूनी बहस तक सीमित हो जाता है. कहा जा सकता है कि सच को तोड़नेमरोड़ने अथवा उसको आवरण में प्रस्तुत करने की पहली प्रेरणा स्वयं को न्याय एवं कानून के संरक्षक होने का दावा करने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों की ओर से ही प्राप्त होती है. जनसाधारण देश के कानून को जानेसमझे, ऐसी कोई कोशिश सरकार अथवा अदालत द्वारा नहीं की जाती. यह व्यक्तिहित के नाम पर व्यवस्था को वर्गीय स्वार्थों के अनुकूल बनाए रखने का षड्यंत्र है, जो विशेषज्ञ संस्कृति की नींव पुख्ता करता है. अभिजन के मामले में स्थिति दूसरी होती है. उसकी समाजार्थिक हैसियत ही ऐसी होती है कि नियमकानूनों को अपने स्वार्थ के निमित्त इस्तेमाल कर सके. वह अदालत जाता है. कृपा बटोरने के लिए वकील स्वयं दौड़े चले आते हैं. यहां तक कि घर से ही उसका शिक्षणप्रशिक्षण आरंभ कर देते हैं. इसका उदाहरण पिछले दिनों तब देखने में आया जब एक मुकदमे में अनिल अंबानी को अदालत में गवाही देने हाजिर होना पड़ा. उस समय अदालत में मौजूद पक्षविपक्ष के वकील मामले को सुसंगत ढंग से रखने के बजाय अंबानी को प्रभावित करने में लगे थे. इतना कि खिन्न होकर जज महोदय को उन्हें टोकना पड़ा. मजे की बात यह है कि अरबों डालर का व्यवसाय संभालने वाले अंबानी तथा अगले दिन उसी न्यायालय में पहुंची उनकी पत्नी को मुकदमे से संबंधित कोई तथ्य याद नहीं था. यहां तक कि उस कंपनी का नाम भी वह भुला चुके थे, जिसका उन्होंने कुछ ही वर्ष पहले स्पेक्ट्रम की खरीद के लिए गठन किया था. यह उदाहरण अकेला नहीं है. ऐसे अनेक मामले हैं जिनमें अर्थशक्ति एवं राजनीतिक हैसियत के अनुसार अदालतों को दबाव में लाने की कोशिश की जाती है. अपवादस्वरूप कुछ निर्णय ऐसे भी होते हैं जब अभिजन शक्तियों के सारे दांवपेच विफल हो जाते हैं, तथा न्याय एवं कानून को खेल समझने वाले अभिजन स्वयं उसके चंगुल में फंस जाते हैं. प्रायः यह मामले के सुर्खियों में आने के बाद ही हो पाता है. उस समय अपनी वर्चस्वकारी सत्ता को बचाए रखने के लिए अभिजन समुदाय अपने ही समूह के कुछ सदस्यों की बलि सहर्ष दे देता है. सामान्यतः उसका निर्णय जनाक्रोश की संभावनाओं को न्यूनतम कर, अपनी उच्च स्थिति को बनाए रखना होता है, जिसमें वह कामयाब भी होता है.

संस्कृतियों के द्वंद्व में विशेषज्ञ संस्कृति का जनसंस्कृति पर प्रहार हमेशा सीधा हो यह आवश्यक नहीं है. कई बार परोक्ष मार ज्यादा पीड़ाकर एवं दूरगामी प्रभाव लिए होती है. एक किसान जमीन से अपनी जरूरत की जिंस उगाना चाहता है. एकाएक वह पाता है कि जो वस्तु वह उगाना चाहता है, उसे सरकार ने राष्ट्रहित का हवाला देते हुए आयातकर से मुक्त कर चुकी है. आयातित जिंस किसान द्वारा उत्पादित जिंस से सस्ती पड़ती है. किसान यदि अब भी अपनी जिद पर अटल रहता है तो उसे अपनी बाकी जरूरतें पूरी करने में समस्या होगी. उस समय उसके पास एकमात्र विकल्प शेष बचता है कि जैसे भी हो, आयातित जिंस से काम चलाए और खेती को बाजार के हवाले कर दे. भले ही बाजार के मामलों में उसका अनुभव अपर्याप्त हो. आखिर बाजार इतना ताकतवर कैसे बन जाता है? उसके पास न तो नैतिकबल होता है न ही कानून बनाने का अधिकार. बाजार के दूसरे छोर पर ग्राहक होता है. बाजार का सारा कारोबार उसके ग्राहक के कंधों पर टिका होता है. होना तो यह चाहिए कि अपने संख्याबल के आधार पर ग्राहक स्वयं बाजार को नियंत्रित और दिशानिर्देशित करें. मगर होता इसके विपरीत है. बाजार की दिशा निर्धारित करते समय ग्राहक एकदम अलगथलग पड़ जाता है. यह हैरानी की बात है कि बाजार को उत्पादन की दिशा तय करने की प्रेरणा ग्राहकों से नहीं मिलती. यह प्रेरणा उसे अभिजन समूहों के लालच, उनकी धनसंपदा, वैभवविलास तथा स्वयं पूंजीपतियों के एकाधिकारवादी द्रष्टिकोण से मिलती है, जो कम से कम समय और न्यूनतम लागत में अधिकतम सुखसुविधाएं, पदप्रतिष्ठा और मुनाफा बटोर लेना चाहते हैं. इसके लिए वे ग्राहक का उपभोक्ताकरण करते हैं, सरकार का कारपोरेटीकरण. परिणामस्वरूप पूंजी का घोड़ा बेलगाम दौड़ने लगता है. यह तब होता है जब निर्वाचित सरकार अपने समस्त कानून लोकहित के दावे के साथ, कथित रूप से आम आदमी को कल्याण को केंद्र में रखकर बनाती है. कानून बनने के साथ ही सरकार का अभिजन वर्ग के प्रति विशेषानुराग स्पष्ट हो जाता है. सरकार के साथ होने का भरोसा पाकर सत्ताधारी अभिजन अपने संवैधानिक दायित्वों की ओर से उदासीन होने लगता है. शुरुआत नियमों और कानूनों की स्वार्थानुकूल व्याख्या करने से होती है. बाजार जिसके पास न तो नैतिक बल रहता है, न ही कानून की सत्ता. सरकार के परोक्ष समर्थन तथा प्रोत्साहन के बल पर वह लोगों की पसंदों को निर्धारित करने लगता जाता है. अपने ध्येय में सफल होने के लिए वह ज्ञानविज्ञान, कला, संस्कृति एवं संचार के समस्त उपादानों की आवश्यकतानुसार मदद लेता है. फिर अपनी बहुव्यापी पैठ के बूते राजनीति, अर्थव्यवस्था एवं कानून को भी अपने हिसाब से मोड़ने में कामयाब रहता है.

उपभोक्ता अधिकार जैसी कुछ व्यवस्थाओं द्वारा कभीकभी कानून भी बाजार की मनमानी के विरोध में उपभोक्ता के साथ खड़ा नजर आता है. उससे एक उम्मीद जगती है. किंतु पर्याप्त लोक निगरानी के अभाव में अंततः वह भी बाजार का हितचिंतक सिद्ध होता है. उपभोक्ता विवाद के दायरे में आने के पश्चात मामला सीधे उत्पादकउपभोक्ता अथवा वितरक और उपभोक्ता के बीच सिमट जाता है. इससे उपभोक्ता समूह पुनः दो हिस्सों में बंट जाता है. पहला वे जो अपने उपभोक्ता अधिकार से परिचित है और सेवा में खामी के लिए दोषी के विरुद्ध उपयुक्त न्यायालय में दावा करने का साहस जुटा पाते हैं. दूसरी ओर वे जो या तो उपभोक्ता अधिकार से अपरिचित हैं, अथवा उत्पाद में कमी को सहजतापूर्वक पचा जाते हैं. न्यायालय के ‘धक्के खाना’ उन्हें गवारा नहीं होता. तीसरा वर्ग उस उत्पाद से संतुष्ट उपभोक्ताओं का भी हो सकता है. भारत जैसे अशिक्षित समाजों में सेवा में कमी के बावजूद उपभोक्ता विवाद को न्यायालय तक ले जाने वाला वर्ग बहुत छोटा, करीबकरीब नगण्य होता है. असंतुष्ट उपभोक्ताओं के उस छोटेसे वर्ग को संतुष्ट करना, पूंजीपति वर्ग के लिए कठिन भी नहीं होता. इससे उनका न्याय की प्रतिष्ठा का दावा पुष्ठ होता है, जिससे उन्हें अपनी शाख बनाने में मदद मिलती है. दूसरी ओर सरकार इसे दो पार्टियों का विवाद बताकर बड़ी आसानी से अपना दामन बचा ले जाती है. निर्माण की खामी आने के बावजूद अदालत केवल न्यायालय में फरियाद देने वाले को राहत देकर संतुष्ट हो जाती है. ऐसे उपभोक्ताओं, जिन्होंने समान बैच का उत्पाद खरीदा था, किंतु अपनी अज्ञानता, लापरवाही, उदासीनता या किसी अन्य कारण से अदालत का दावा खटखटाने में असमर्थ रहे हैं, उन्हें राहत पहुंचाने का कोई प्रबंध अदालत अथवा सरकार द्वारा नहीं किया जाता. जबकि अदालत की भले ही न हो, राज्य की यह जिम्मेदारी है कि अपने प्रत्येक नागरिक के लिए उसकी मांग के बिना भी न्याय की व्यवस्था करे. जागरूक उपभोक्ता के लिए भी अदालत में न्याय पाना आसान नहीं होता. अपनी आर्थिक ताकत के बल पर बाजार पहले विशेषज्ञों तथा विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्तियों को अपने पक्ष में खड़ा कर लेता है. फिर उनके बूते जनसाधारण के जीवन में मनमाना हस्तक्षेप करने की ताकत भी पा लेता है.

जीवन में बाजार की घुसपैठ के और भी कई उदाहरण हैं—एक स्त्री है जो आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में घरेलू कारखाना लगाना चाहती है. वह काम शुरू करती है. सहसा उसको बताया जाता है कि जो वस्तु वह बना रही है, उसका उत्पादन क्षेत्रीय उत्पादननीति के तहत निषिद्ध है. अब उद्यमी बनने की चाहत रखने वाली स्त्री के पास एकमात्र विकल्प है. अपने हुनर को किनारे रख क्षेत्रीय उत्पादन नीति के अनुसार योजना बनाए, अथवा ऐसे उत्पादन क्षेत्र में जाकर कार्य करे, जहां उसकी अनुमति हो. तीसरा विकल्प यह भी हो सकता है कि अपना कारखाना लगाने का मोह त्यागकर किसी कारखाने में नौकरी कर ले. वहां मालिक के लाभ के लिए अपने हुनर को आजमाए. इनमें अंतिम विकल्प सबसे आसान और कम चुनौतीपूर्ण है. हालांकि उसमें शोषण की सर्वाधिक संभावनाएं हैं. यह भी जरूरी नहीं कि नौकरी करते हुए स्त्री अपनी कला और उद्यमशीलता का भलीभांति परिष्कार कर, आत्मतुष्टि हासिल कर सके. लेकिन उन सभी के लिए जो आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में अपने परिवार से, समाज और खुद से संघर्ष करतेकरते थक चुके हैं, यही अंतिम विकल्प शेष रह जाता है. विवश होकर व्यक्ति को उसी के लिए तैयार होना पड़ता है. यानी एक व्यक्ति जो आत्मनिर्भर और स्वावलंबी होने का इरादा रखता था, वह परिस्थितियों जो जानबूझकर समाज के विशिष्ट वर्गों को लाभ पहुंचाने के लिए पैदा की गई हैं, के चलते वर्चस्वकारी ताकतों के समक्ष घुटने टेकने को विवश हो जाता है. आशय है कि आम आदमी जिसे अपनी आजादी समझता है, वह उसकी आजादी नहीं होती. उसकी स्वतंत्रता बाबू की फाइलों, व्यापारी की तिजोरियों तथा नेताओं की खुदगर्जी में कैद रहती है. उसी के चलते मुट्ठीभर अभिजन बहुसंख्यक सामान्यजन को अपने स्वार्थ के अनुरूप निर्णय लेने को विवश करते रहते हैं. उसकी पसंदों को अपने स्वार्थ की दिशा मे मोड़ देते हैं. वही तय करते हैं कि सामान्य जन का निर्णय कितना उपयोगी है, कितना नहीं. या उसने जो श्रम किया है उसका क्या मोल होना चाहिए. ऐसी व्यवस्था विधि के शासन द्वारा मान्य होती है. इसी की ओट में वह अपने समर्थन में अभियान चलाने में सफल हो जाती है. यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि विधि का निर्माण मुख्यतः अभिजनों द्वारा अभिजन हितों की देखभाल के लिए किया जाता है.

लोकहित का दावा करने वाली सरकारें किस तरह अभिजन हित में काम करने लगती हैं, इसके अनेक उदाहरण हैं. एक पूंजीपति जब कारखाना लगाता है तो सरकार उसके लिए रियायतों की तिजोरी खोल देती है. सस्ती जमीन, सस्ते ऋण, करमुक्त आयातित मशीनों से लेकर वर्षों तक मिलने वाली कर छूट आदि. इसके लिए पूंजीपति भरोसा दिलाता है कि वह अमुक संख्या में रोजगार देगा. उससे राष्ट्र की सकल आय में वृद्धि होगी. निर्यात बढ़ेगा आदिआदि. नए रोजगार सृजन के आश्वासन के बाद जनता भी मान लेती है कि उससे समृद्धि का ऊपर से नीचे की ओर निस्सरण होगा. अर्थशास्त्री पूंजीवाद को आदर्श बतानेवाली ट्रिकिल डाउन थ्योरी के बहाने सरकार की हर नीतिअनीति का समर्थन करने लगते हैं. किसान जिन्होंने अपने पूर्वजों की जमीन कारखाने के लिए सौंपी थी, वे सपना देखने लगते हैं कि कारखाना चलने से उनके बच्चों को बेहतर रोजगार मिलेगा और वे बेहतर जीवन जो खेतीकिसानी की अनिश्चितता के चलते संभव नहीं था, जी सकेंगे. लेकिन जैसेजैसे समय बीतता है, पूंजीपति का असली रूप सामने आने लगता है. कारखाने में स्थिरता बनाए रखने के नाम पर सबसे पहले स्थानीय नवयुवकों की भर्ती पर पाबंदी लगा दी जाती है. दिखावटी घाटे और करचोरी का लंबा सिलसिला चलता रहता है. सरकार की मदद बटोरने के लिए नकली बैलेंस शीट बनवाई जाती है. किसानों को अनुदान, छूट, सस्ते ऋण के रूप में सहायता उपलब्ध कराने के नाम पर घाटे की बात करने वाली सरकारें पूंजीपतियों के लिए अपने खजाने और सुविधाओं के दरवाजे खोल देती है. शासनप्रशासन के समर्थन और सहयोग का भरोसा पूंजीपति को प्रोत्साहित करता है. इसी विश्वास के चलते वह अपने उत्पाद की खपत के लिए सुनियोजित कार्ययोजना बनाता है, जिसमें सबसे पहला हमला उपभोक्ता के दिमाग पर किया जाता है. जनसाधारण के पास भरणपोषण के लिए प्रायः अपना श्रमकौशल होता है. उसके मूल्यांकन के लिए भी वह दूसरों पर निर्भर करता है. रोजीरोटी की अनिश्चितता उसके आत्मविश्वास को चोट पहुंचाती है. उसे योजनाबद्ध आधार पर काम करने पर रोकती है.

बड़ा पूंजीपति दवाई का कारखाना लगाता है तो माल की खपत के लिए अस्पताल भी खुलवा देता है. वह डाक्टरों को प्रभावित कर उनसे मनचाहा काम लेता है. अपने पूंजीबल पर वह बाजार का कर्ताधर्ता और सर्वनियंता होता है. इस स्थिति में होता है कि अपने उत्पाद के दाम स्वयं निर्धारित कर सके. बाजार में हालांकि जनसाधारण के श्रमकौशल की भी पर्याप्त मांग होती है. लेकिन श्रमिक और पूंजीपति की स्पर्धा में मूलभूत अंतर होता है. पूंजीपतियों में लाभ को लेकर स्पर्धा होती है. प्रत्येक पूंजीपति अधिकतम लाभ की वांछा में दूसरे को मात देने पर तुला होता है. दूसरी ओर श्रमिक और कामगारों की स्पर्धा में सीधेसीधे उनका अस्तित्व दांव पर होता है. अपनी एकमात्र पूंजी श्रम के निवेश से श्रमिक को बस इतना मिल पाता है कि किसी प्रकार अपना और अपने परिवार का भरणपोषण कर, अगले दिन के श्रम के लिए तैयार हो सकें. अपने मुनाफे के लिए दूसरे के साथ गलाकटाऊ प्रतिस्पर्धा करने वाले उद्योगपति श्रम के मूल्यांकन को लेकर एकमत होते हैं. एकजुट होकर वे शोषण की एकसमान नीति अपनाते हैं. उनकी एकता के चलते श्रमिक को झुकना पड़ता है. मजदूरी के रूप में बंटने वाली धनराशि को मुनाफे में बदलने के लिए पूंजीपति तकनीक के स्वचालीकरण पर ज्यादा से ज्यादा खर्च करता है. विशेषज्ञ अभिजनों के सहयोग के बल पर वह कामयाब भी होता है. दूसरी ओर मजदूर और कामगार वर्ग की स्वतंत्रता पूंजीपतियों के यहां गिरवी रखी होती है. उसके लिए न्याय बगैर ‘अभिजन कृपा’ के आगे नहीं बढ़ पाता. सरकार पूंजीपति को अधिकार देती है कि वह अपने उत्पाद को दुनिया की किसी भी मंडी में बेचे. अवसर मिले तो निर्यात भी करे. निर्यात पर प्रोत्साहन सुविधाएं भी उसे सरकार की ओर से प्राप्त होती हैं. किंतु किसान को अपने उत्पाद की बिक्री के लिए सरकार की शर्तों का अनुपालन करना पड़ता है. उनका उल्लंघन अपराध की श्रेणी में आता है. दमन की ऐसी घटनाएं कभीकभी जनक्रांति की उत्प्रेरक सिद्ध होती हैं. ये जनता को विरोध का ठोस आधार प्रदान करती हैं. सभ्यताओं के इतिहास से परिचित लोग जानते हैं कि ‘जनमत के आगे घुटने टेक देना अभिजन सरकारों की विशेषता होती है.’ इसलिए वे यह भी जानते हैं एक किसान यदि सरकारी मोल पर अनाज बेचने से इन्कार कर दे तो सरकार उसकी ओर सामान्यतः ध्यान न देगी. किसी इलाके के किसान अनाज बेचने से इन्कार कर दें तो वह बगावत कही जाएगी. सरकार वहां बल प्रयोग द्वारा, राष्ट्रहित एवं कानून का हवाला देते हुए किसानों को अपनी शर्तों पर अनाज बेचने के लिए विवश कर सकती है. हालांकि यह तभी संभव है जब किसान बंटे हुए हों. उनके बीच हितों को लेकर मतभेद हों. यदि किसी एक प्रदेश या देशभर के किसान अपने हितों को देखते हुए सस्ते मोल अनाज न बेचने का निर्णय ले लें तो वह क्रांति होगी. दूसरे शब्दों में जिसे क्रांति कहते हैं, वह हितों के सामान्यीकरण और अनुचित निर्णय के आगे, चाहे वह सरकार का हो अथवा किसी और शक्तिशाली वर्ग का, न झुकने तथा उसके संगठित प्रतिरोध के रूप में सामने आती है. उसके लिए बलप्रयोग आवश्यक नहीं है. बल्कि अहिंसक क्रांतियां अधिक प्रभावकारी एवं दीर्घजीवी सिद्ध होती हैं. उनमें अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है, किंतु उनका परिणाम भी उतना ही सुदीर्घ एवं बहुआयामी होता है.

विकृत लोकतंत्रों, यानी ऐसे लोकतंत्रों में जहां सामूहिक चेतना व्यापक लोकहित के बजाय धर्म, जाति, क्षेत्र, संप्रदाय, जमीनजायदाद, बाहुबल आदि से प्रभावित होती है, सरकारें दिखावे के लिए आमजन के मताधिकार से बनती हैं. असल में वे अभिजन द्वारा, अभिजन हित के लिए बनीं, अभिजन सरकारें होती हैं. जनता की फूट और अज्ञान का लाभ उठाकर स्वार्थी तत्त्व सत्ताशिखर तक पहुंच जाते हैं. ऐसी सरकारें अपने नागरिकों के साथ पक्षपातपूर्ण ढंग से पेश आती हैं. संवैधानिक प्रक्रियाओं को उत्तरोत्तर जटिल बनाकर वे आमजन तथा सरकार के बीच की दूरी को बढ़ाती रहती हैं. परिणामस्वरूप विशेषज्ञ संस्कृति को प्रोत्साहन मिलता है. विशेषज्ञ यूं तो जनता के बीच से ही उभरकर आते हैं, किंतु विशिष्टताबोध के मारे वे स्वयं को आमजन से ऊपर समझने लगते हैं. सरकार चुनते समय जनता की अपेक्षा होती है कि निर्वाचित सदस्य उसके सामान्य सपनों को सच करने के लिए उपयुक्त कदम उठाएंगे. किंतु सरकार बनते ही निर्वाचित सदस्यों की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं. आमजन की इच्छाआकांक्षाओं को समझकर उनके लिए समुचित प्रयास करने के बजाय वे अपनी इच्छाएं समाज पर लादने लगते हैं. जनसाधारण के मनोभावों को समझने के बजाय वे उसे समझाने में ज्यादा यकीन करते हैं. इस कार्य में भी उनकी सफलता संद्धिग्ध होती है. क्योंकि अतिबौद्धिकता के दबाव में उनकी भाषा आमजन की पहुंच से दूर निकलती जाती है. उसे समझना तथा उससे लाभान्वित होना आमजन के लिए अत्यंत कठिन होता है. इस समस्या को समझकर उसका निदान करने के बजाय अभिजन सत्ताधीश, जनसाधारण की राय को ‘साधारण’ कहकर उसकी उपेक्षा करने लगते हैं. यह मान लेते हैं कि साधारण मेधा सदैव साधारण बनी रहती है. अतएव ज्ञान के नए आविष्कारों को आमजन तक तत्काल पहुंचाने तथा उसका बौद्धिक परिष्कार करने की कोई कोशिश तक नहीं की जाती.

अभिजन बुद्धिजीवियों की अति बौद्धिकता निरुद्देश्य अथवा स्वयं स्फूत्र्त नहीं होती. यह प्रकारांतर में उनकी निष्ठा के खोखलेपन को ही उजागर करती है, जो लोककल्याण की आड़ में स्वार्थसिद्धि का आयोजन रचता है. इसलिए उन विचारों की अभिव्यक्ति हेतु जिन्हें वह लोकहितकारी मानता है, ऐसी भाषा का उपयोग करता है जो जनसाधारण के अनुभव तथा शैक्षिक स्तर से काफी ऊपर की हो. आमजन के लिए ऐसी भाषा को समझना तथा असमानता एवं भेदभाव के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ना बहुत कठिन हो जाता है. नतीजन न्याय उनके लिए निरंतर जटिल होता जाता है. उन्हें गफलत में देख शीर्षस्थ अभिजन अपने विशेषाधिकारों का उपयोग सीमित स्वार्थों के लिए करने लगते हैं. राज्य के इकतरफा आचरण से उसके गठन का औचित्य ही समाप्त हो जाता है. न्याय के जनसामान्य के पहुंच से दूर होते ही राज्य की समस्त उपलब्धियां, धनसंपदा और सुखसाधन शीर्ष पर विराजमान अभिजन की इजारेदारी बन जाते हैं. एक समय ऐसा भी आता है जब कामयाबी के नशे में डूबे अल्पसंख्यक अभिजन को लगता है कि आगे उसकी यात्रा निर्विघ्न है. चुनौतियां समाप्त हो चुकी हैं. जनसाधारण भी लगभग मान लेता है कि अल्पसंख्यक अभिजन की मनमानी को सहते जाना ही उसकी नियति है. इस थोपे गए नियतिवाद को धर्म निरंतर हवा देता रहता है. वह बदलाव की संभावना को मृत्योपरांत स्वर्ग की लालसा तथा ईश्वरीय कृपा में बदल देता है. वर्तमान की दुर्दशा के लिए भाग्य और पूर्वजन्मों के कर्मों को जिम्मेदार ठहराकर वह लोगों के विचारकर्म की दिशा ही मोड़ देता है. इसके बावजूद शीर्षस्थ शक्तियों के षड्यंत्र तथा उनकी स्वार्थलिप्साओं के विरोध में जनमानस के बीच थोड़ीबहुत सुगबुगाहट शुरू से ही बनी रहती है. अनुकूल परिस्थितियों में वही सार्थक विरोध का रूप ले लेती है. यह बात अलग है कि छोटेछोटे समूहों में बंटे होने के कारण उसकी आरंभिक सफलता संद्धिग्ध रहती है. विशेषरूप से वैकल्पिक जनसंस्कृति के उदय तक. वैकल्पिक जनसंस्कृति लोकचेतना के स्वतंत्र विकास की वह अवस्था है, जब व्यक्तिमात्र को अपनी स्वतंत्रता की पूर्णानुभूति होने लगती है. वह किसी भी प्रकार के बाहरी दबावों और दखल से मुक्त होता है. इस अवस्था को स्थायी बनाने के लिए वह ऐसी जीवनपद्धति विकसित कर लेता है, जो उसकी स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता, निर्भीकता और सामूहिक संपन्नता को दर्शाती है. उस अवस्था में अल्पसंख्यक अभिजन की चालांकियां उजागर हो चुकी होती हैं. चैतन्य, विवेकवान, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और संगठित जनसमाज के मनमस्तिष्क में शासक और शासित का भेद समाप्त हो जाता है.

वास्तविक बदलाव की शुरुआत राज्य के स्वार्थपूर्ण आचरण की प्रतिक्रियास्वरूप नागरिकों के मन में पनपे अविश्वास से होती है. यह लोकतंत्र की ही विडंबना है कि जिस राज्य को नागरिक अपनी मर्जी से चुनते हैं, उससे शासित बनना स्वीकार कर राज्य की अधिसत्ता को संभव बनाते हैं, कालांतर में उन्हीं को राज्य की उपस्थिति खलने लगती है. राज्य तथा नागरिकों के बीच अविश्वास पनपने से लोग आहिस्ताआहिस्ता राज्य द्वारा बनाए गए कानूनों की ओर से उदासीन होने लगते हैं. चूंकि शीर्षस्थ अभिजन जिसपर कानून बनाने और उन्हें लागू करने की सर्वाधिक जिम्मेदारी होती है, स्वयं कानून के पालन के प्रति उदासीन और लापरवाह होता है, इसलिए उसके द्वारा बनाए गए कानून शेष समाज के लिए भी कोई आदर्श रह पाते. अभिजन की देखादेखी जनसाधारण भी कामना करता है कि उसके जीवन में राज्य तथा उसके द्वारा बनाए गए कानूनों का हस्तक्षेप न्यूनतम हो. राज्य अपना काम करे, वह अपना. अपनी स्वतंत्रता को वह स्वच्छंदता की सीमा तक भोग लेना चाहता है. चाहता है कि उसपर कोई बाहरी नियंत्रण न हो. कानून का सार्थक हस्तक्षेप वह तभी चाहता है जब सरकार कोई संस्था अथवा व्यक्ति उसके अधिकारक्षेत्र पर सवाल उठाता है; तथा कानूनी या गैरकानूनी तरीके से उसके आगे समस्याएं खड़ी कर देता है. दूसरे शब्दों में जब किसी व्यक्ति को अपने अस्तित्व अथवा अधिकारक्षेत्र पर संकट दिखाई पड़ता है, तब वह अपेक्षा करता है कि कानून अपने प्रभावी हस्तक्षेप द्वारा उसे संकट से उबारने की जिम्मेदारी निभाए. कानून को लेकर यह अविश्वास या दुराव कमोबेश प्रत्येक नागरिक के मन में होता है. लोग आमतौर पर यह भी चाहते हैं कि राज्य द्वारा बनाए गए कानून भी प्रभावी हों, मगर उनके प्रति कानून बनाने वाले भी उतने ही उत्तरदायी हों, जितनी वे सामान्य नागरिकों से अपेक्षा करते हैं. किंतु जब वे देखते हैं कि समाज में अभिजन का चालचलन उसी के द्वारा स्थापित मापदंडों के विरुद्ध है, तब उनका कथित ‘कानून के राज’ से विश्वास उठने लगता है. समाज में कानून को लेकर द्वंद्व की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. लोग एक ओर जीवन में कानून का न्यूनतम हस्तक्षेप चाहते हैं. दूसरी ओर वे कामना करते हैं कि कानून इतना शक्तिशाली हो कि यदि कोई उनके हितों को नुकसान पहुंचाता है तो वह उनकी तत्काल रक्षा कर सके. आशय है कि सामान्य दिनचर्या में कानून के हस्तक्षेप को अनावश्यक मानने तथा उसको बोझ की तरह देखने वाले लोग भी अपने हितों की सुरक्षा हेतु कानून और न्याय की दुहाई देने लगते हैं. यह समाज में बढ़ते अविश्वास और चरित्र के दुहरेपन को दर्शाता है. यह तब होता है जब शीर्षस्थ शक्तियों की निर्णयप्रक्रिया पर उनके स्वार्थ हावी हो जाते हैं. परिणामस्वरूप सत्तापक्ष के प्रति आमजन का विश्वास डिगने लगता है. इसके साथ ही लोगों का ध्यान कानून के सकारात्मक पक्ष से हटकर उसके निषेधात्मक पक्ष पर केंद्रित हो जाता है, जो कानून का पालन करने के बजाय उससे बचने के लिए प्रेरित करता है. यह प्रवृत्ति राष्ट्र और समाज दोनों के प्रति उदासीनता का माहौल तैयार करती है. आम आदमी को लगता है कि शासनप्रशासन के स्तर पर उसकी समस्याएं सुनी नहीं जा रही हैं. वहीं शासनप्रशासन जनसंख्या में वृद्धि, सामाजिक अंतर्द्वंद्व, संसाधनों की कमी, अशिक्षा, उद्यमशीलता का अभाव आदि का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारियों को वापस जनसमाज पर थोपने लगते हैं. लोकतांत्रिक परिवेश का लाभ उठाकर कभीकभी जनसमाज भी आगे बढ़कर शासन में हस्तक्षेप की योजनाएं बनाता है. किंतु राजनीतिक अनुभव का अभाव, आपसी तालमेल की कमी, जीवन की मामूली सुविधाओं के लिए बड़ेबड़े संघर्ष उसे तात्कालिक जरूरतों से आगे बढ़कर सोचने का अवसर ही नहीं देते.

कभीकभी यह भी होता है कि लोकतंत्र की खूबियों का लाभ उठाकर जनसाधारण के वास्तविक प्रतिनिधि चुनकर संसद तक पहुंच जाते हैं. आरंभ में उनकी वर्गीय निष्ठाएं प्रबल होती हैं. जिस संकल्प को लेकर वे संसद तक पहुंचे हैं, उसे जल्दी से जल्दी पूरा कर लेना चाहते हैं. लेकिन उनकी आगे की यात्रा भी आसान नहीं होती. संसद में उनका सामना, अभिजन वर्ग के अनुभवसिद्ध प्रतिनिधियों से होता है. आमूल परिवर्तन के लक्ष्य, जिसके लिए उनके समाज ने उन्हें निर्वाचित किया है, को प्राप्त करने के लिए जनसाधारण के वास्तविक प्रतिनिधियों को यथास्थितिवादी अभिजात्य प्रतिनिधियों के सहयोग एवं समर्थन की अपेक्षा होती है. उल्लेखनीय है कि साधारणजन संसद के बाहर भले ही बहुमत में हो, संसद में उसके चुने हुए प्रतिनिधि अभिजात वर्ग का ही प्रतिनिधित्व करते हैं. अभिजात प्रतिनिधियों के बीच जनसाधारण के वास्तविक प्रतिनिधि अपने समूह की वांछाओं को केवल अपने बल पर पूरा करने में असमर्थ होते हैं. इस बीच संसद के अभिजात्य प्रतिनिधि जनसाधारण के सच्चे प्रतिनिधियों का अनुकूलन करने में जुटे रहते हैं. उन्हें बारबार यह एहसास दिलाया जाता है कि वे अपने वर्ग और बिरादरी को बहुत पीछे छोड़ आएहैं, अब वे विधायिका के लिए चुने गए सदस्यों की बिरादरी के सम्मानित सदस्य हैं. इसलिए उनका आचरण भी उनके पद की गरिमा के अनुकूल होना चाहिए. चूंकि शासनप्रशासन दोनों का परिवेश अभिजात मनोवृत्ति के अनुकूल होता है. अतः अकेले पड़ जाने का डर, जरूरत पड़ने पर समर्थन की लालसा जैसे कारण जनसामान्य के वास्तविक प्रतिनिधियों को उस वातावरण से तादात्म्य स्थापित करने के लिए प्रेरित करते हैं. उन्हें यह भी लगता है कि अपने समूह की आकांक्षाओं की पूर्ति संसद के बहुसंख्यक सदस्यों की अनुमति या समर्थन के बगैर असंभव है, इसलिए भी चाहेअनचाहे वह उनके करीब आने लगता है. जरूरत के समय अभिजन सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो, इसके लिए इच्छा अथवा अनिच्छा से भी, उन्हें विशुद्ध अभिजनहित के मुद्दों पर सहयोग करना पड़ता है. हालांकि उनमें से कुछ उसके अपने समूह यानी जनसाधारण के हितों के प्रतिकूल हो सकते हैं. संसद में अकेला पड़ जाने का डर, अभिजात्य प्रतिनिधियों का समर्थन प्राप्त करने की विवशता, विधायिकाओं में अल्पसंख्यक होने का एहसास, राजनीतिक अस्थिरता तथा संसाधनों पर प्रभुवर्ग के अधिकार को कानून का समर्थन—जैसे परोक्ष दबावों के बीच, जनसामान्य के प्रतिनिधि व्यवस्था में आमूल परिवर्तन को बहुत कठिन—यहां तक कि असंभव मानने लगते है. विपरीत परिस्थितियां अंततः उन्हें हताश कर देती हैं.

साफ है कि लोकप्रिय राजनीति में पहले से ही पांव जमाए अभिजनों के बीच स्थान बनाने के लिए जनसाधारण को काफी संघर्ष और समझौतों से गुजरना पड़ता है. इस जद्दोजहद से बचने के लिए संसद में पहली बार निर्वाचित होकर पहुंचे अधिकांश जनप्रतिनिधि, अभिजन सदस्यों के अनुसरण की लीक अपना लेते हैं. बदलाव की उम्मीद छोड़कर वे अपने लोगों को वैसे ही बहलाने लगते है, जैसे दूसरे प्रतिनिधि. इस बीच उनका कार्यकाल भी पूरा होने के करीब होता है. पुनः जनसमर्थन हासिल करने के लिए उन्हें नए सिरे से चुनाव में उतरना पड़ता है. चूंकि अपने पहले कार्यकाल में वे जनाकांक्षाओं पर खरा उतरने में असमर्थ रहे हैं, इसलिए अपने मतदाताओं के कटु प्रश्नों से बचने के लिए उन्हें तरहतरह से बरगलाते और बहाने बनाते हैं. धीरेधीरे वे अभिजनवर्चस्व से युक्त उस लोकप्रिय राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं, जिसके विरोध में उन्होंने अपना राजनीतिक अभियान शुरू किया था. जनता की एकीकृत शक्तियों के कमजोर पड़ने से अभिजन वर्ग को मनमानी करने का अवसर पुनः मिल जाता है. माहौल का फायदा उठाकर वह व्यापक जनसमुदाय को बांट देता है. लोगों की प्राथमिकताओं को ऐसे बदल देता है, जिसका उनके विकास से दूर तक का संबंध नहीं होता. यही नहीं, संसाधनों की कमी का बहाना बनाकर वह जनसाधारण के बीच अस्तित्व की स्पर्धा को जन्म देता है, जिससे आम आदमी अपने ही संगीसाथी को संदेह की नजर से देखने लगता है. आशय है कि जनसाधारण के मतों के आधार पर शिखर पर पहुंचने वाले जनप्रतिनिधि भी प्रकारांतर में अभिजन हितों के संरक्षक सिद्ध होते हैं. इस बीच अभिजन अधिकतम को समेटने, बाजार पर छा जाने की कोशिशों में होता है. कानून, धर्म, राजनीति तथा पूंजी के साथ गठबंधन कर वह खुद को लगातार ताकतवर बनाता रहता है. वहीं जागरूकता एवं संगठन के अभाव में जनसाधारण, जिसे रोजमर्रा की जरूरतों के लिए अपने ही वर्ग के प्रतिनिधियों से कठिन स्पर्धा करनी पड़ती है, अभिजन के मुकाबले निरंतर पिछड़ता रहता है.

प्रत्युत्तर में कहा जा सकता है कि संविधान के अनुसार तो सभी बराबर हैं. सभी को समान मताधिकार है. जनादेश के लिए देश के राष्ट्रपति और साधारण नागरिक को एक ही कतार में देखा जा सकता है. फिर कैसे मान लिया जाए कि देश में लोकतंत्र दिखावटी और तत्प्रदत्त समानता आभासी है? यह भी क्यों स्वीकारा जाए कि सरकार पक्षपात करती है तथा अभिजन सामान्यजन की समाजार्थिक दुर्दशा एवं संकटों के लिए जिम्मेदार होते हैं? अभिजनों को नेतृत्व का अवसर इसलिए दिया जाता है कि वे बुद्धिसामर्थ्य में दूसरों से आगे होते हैं और दूसरों के विकास की जिम्मेदारी उठाकर एक प्रकार से वे समाज का ही भला करते हैं. इसमें कोई संदेह नहीं कि अभिजन बुद्धिसामर्थ्य में जनसाधारण से आगे तथा व्यवहारकुशल होते हैं. कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने की उनकी क्षमता भी अधिक होती है. अतएव प्राप्त अवसरों का उपयोग करते हुए वे दूसरों से आगे निकल जाते हैं. प्रकृति में भी उत्तरजीविता का सिद्धांत चलता है. वहां जो दूसरों से बलशाली है, जो अपनी सूझबूझ से प्राकृतिक चुनौतियों का सामना अधिक कुशलतापूर्वक कर सकता है, वही दीर्घजीविता को प्राप्त होता है. इस तर्क पर विश्वास किया जाए तो अभिजन वही प्राप्त करते हैं, जिसके वह योग्य हैं. योग्यता के आधार पर वे जो अर्जित करते हैं, वह उनका अधिकार है. ऐसे तर्कों का एकाएक खंडन संभव भी नहीं है.

खास बात यह नहीं है कि अभिजन बुद्धिसामर्थ्य, व्यवहारकौशल एवं शिक्षादीक्षा के मामले में जनसाधारण से काफी आगे होते हैं और इस कारण उनका आत्मविश्वास बहुत बढ़ा हुआ होता है. खास बात यह है कि श्रेष्ठत्व का दावा करते समय वे अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता और व्यवहारकुशलता का जिक्र तक नहीं करते. अपने बौद्धिक श्रेष्ठत्व पर वे न तो स्वयं चर्चा करते हैं, न ही जनसाधारण में उसे चर्चा का विषय बनने देते हैं. बजाए इसके वे ऐसे तर्क चुनते हैं, जिससे जनसाधारण ज्ञान की शक्ति से अपरिचित बना रहे. इस काम में धर्म, राजनीति और बाजार तीनों उसके मददगार होते हैं. धर्म अभिजन की शोषणकारी नीतियों पर पर्दा डालते हुए उसकी उपलब्धियों को ‘दैवी कृपा’ की श्रेणी में ले आता है. वह जनसाधारण को समझाता है कि उसकी समस्याओं की वजह उसकी अपनी गलतियां तथा आसपास के लोगों की ईष्र्या है. राजनीति उन्हें धर्म, जाति और क्षेत्रीयता के ऐसे मुद्दों में उलझा देती है, जिसका उनके विकास से कोई संबंध नहीं होता. वह जीवन की जटिल वास्तविकता को लोकप्रियता के उपादानों तक सीमित कर देती है, परिणामस्वरूप विकास के रास्ते की वास्तविक अड़चनों की ओर उनका ध्यान ही नहीं जा पाता. बाजार की निगाह में हर व्यक्ति पहले एक उपभोक्ता होता है. उसकी दृष्टि कभी भी अपने लाभ से आगे नहीं जाती. इसके चलते अभिजन विशेषज्ञ, जिन्हें उपर्युक्त तीनों का समर्थन प्राप्त होता है, अपनी उस छलपूर्ण स्थापना को समाज में बनाए रखने में सफल हो जाते हैं, जिसके अनुसार अपने जीवन की विसंगतियों, दुखों और अभावों के लिए आम आदमी को स्वयं जिम्मेदार माना जाता है. इससे जनसमूह के भीतर अविश्वास को बल मिलता है. दूसरे उनके भीतर चल रही अस्तित्व की स्पर्धा स्वाभाविक मान ली जाती है.

अपनी वर्गीय श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए अभिजन वर्ग द्वारा गढ़े गए तर्क प्रायः सुनने में बहुत सुंदर और तर्कसंगत प्रतीत होते हैं. ऐसे ही तर्कों के आधार पर शीर्षस्थ शक्तियां समाजीकरण का मूल रही, सहयोग की सहस्राब्दियों पुरानी भावना को स्पर्धा में बदलने में सफल हो जाती हैं. जैसे मजदूरी के संबंध में पूंजीवादी अभिजन का सामान्य तर्क, कानूनी रूप से मान्य, ‘अतिरिक्त कार्य के लिए अतिरिक्त मजदूरी’ के सिद्धांत पर टिका होता है—‘‘मान लीजिए दो मजदूरों को एक ट्रक पर कुछ बंडल चढ़ाने के लिए काम पर लगाया जाता है. मजदूरी तय कर दी जाती है—दस रुपये प्रति बंडल. अब एक मजदूर यदि बारह बंडल चढ़ा पाता है, जबकि दूसरा उतनी ही देर में पंद्रह बंडल चढ़ाने में सफल हो जाता है. ‘अतिरिक्त कार्य के लिए अतिरिक्त मजदूरी’ के सिद्धांत के अनुसार तो पंद्रह बंडल चढ़ाने श्रमिक को अधिक मजदूरी मिलनी ही चाहिए. श्रमकानूनी में भी यही वैध माना जाएगा. प्रथमद्रष्टया इसमें अनीति कहीं है ही नहीं. किए गए काम के अनुसार पहले को 120 रुपये मजदूरी मिलेगी, दूसरे को 150 रुपये. मजदूरों को भी इससे शिकायत न होगी. अनीति तो अधिक कार्य करने वाले को अतिरिक्त कार्य के लाभ से वंचित कर देना है.’ इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए वे कहेंगे—‘ईख के खेत में घुसे दो हाथियों में से एक सौ गन्ने खाता है, दूसरा एक सौ दस. तो यह उनकी क्षमता या आवश्यकता है. एक हाथी ज्यादा गन्ने खाने में सक्षम है तो इसका कारण है कि प्रकृति ने ही उसे ऐसा बनाया है.’’

ऐसे ही अनर्गल और आधारहीन तर्कों के आधार पर अभिजन बुद्धिजीवी मनुष्य की आभासी स्वतंत्रता को वास्तविक सिद्ध करने में सफल हो जाते हैं. वे इस तथ्य को जानबूझकर नजरंदाज कर देते हैं कि व्यक्ति की नैसर्गिक भिन्नताएं जो छोटे स्तर पर अस्तित्व की स्पर्धा को जन्म देती हैं, शीर्ष पर उन्हीं से विशेषज्ञ संस्कृति को पनपने का अवसर मिलता है. न्याय संगत यही है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसकी योग्यता और परिश्रम का पूरापूरा लाभ मिले. यदि कोई व्यक्ति सामाजिक संपदा की वृद्धि में स्वेच्छापूर्वक अधिक योगदान देता है तो समाज का भी कर्तव्य है कि उसे प्रोत्साहित करने के लिए जो भी उचित समझे कदम उठाए. प्रोत्साहन नकद पारिश्रमिक अथवा पुरस्कार के रूप में हो सकता है; अथवा किसी अन्य सम्मानित ढंग से भी. किंतु समाज की जिम्मेदारी मात्र इसी से पूरी नहीं हो जाती. बल्कि यह तो समाज की जिम्मेदारी और उसके औचित्य की कसौटी की शुरुआतभर है. समाजीकरण की पहली शर्त थी कि समाज अपनी सदस्य इकाइयों के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा. जो समाज का है, वह सबका होगा और जो सबका है, उसका लाभ समाज की प्रत्येक इकाई तक पहुंचाने की व्यवस्था समाज की ओर से की जाएगी. इसके पीछे सोचासमझा, व्यावहारिक दृष्टिकोण था. यह माना गया था कि हर व्यक्ति अपने गुण एवं स्वभाव में दूसरों से भिन्न होता है. उसकी रुचि के साथसाथ कार्यक्षमता भी दूसरों से अलग होती है. यह अंतर नैसर्गिक भले हो, मगर पर्याप्त अनुभव, प्रशिक्षण के माध्यम ये इसे आसानी से पाटा जा सकता है. यही समाजीकरण का मूल उद्देश्य भी रहा है. इसी के लिए व्यक्ति स्वेच्छापूर्वक समाज से जुड़ने को उत्सुक होता है तथा अपनी नैसर्गिक स्वाधीनता के बड़े हिस्से का बलिदान कर, सामाजिक मर्यादाओं में रहने को तैयार हो जाता है. अतएव समाज का कर्तव्य है कि वह अपनी इकाइयों के प्रति समानता स्थापित करने के लिए जो भी आवश्यक हो करे, न कि मनुष्य की नैसर्गिक भिन्नताओं को आधार बनाकर समाज में समाजार्थिक वैषम्य को बढ़ावा दे. पिछले उदाहरण की बात करें, जिसमें एक व्यक्ति अपनी शारीरिक सीमाओं के कारण मात्र 120 रुपये प्रतिदिन कमा पाता है, जबकि उतनी ही अवधि में दूसरा व्यक्ति 150 रुपये अर्जित करने में सक्षम है. ऐसे में समाज का दायित्व है कि उन कारणों का पता लगाए जो व्यक्ति की उत्पादकता को प्रभावित करते हैं, तथा समयानुसार उन्हें दूर करने की योग्यता भी बनाए. यही न्याय का वह रूप है जो किसी भी कल्याणकारी समाज में अपेक्षित होता है. इसके अभाव में समाज में असमानता पनपती है और अभिजन संस्कृति को बढ़ावा मिलता है. समानता के लक्ष्य की स्थापना केवल अभिजन की दया अथवा परोपकारभाव के द्वारा संभव नहीं है. सामान्यतः इसके दो लक्ष्य हो सकते हैं

. जनसंस्कृति अर्थात समावेशी आधुनिक संस्कृति की स्थापना.

. सामाजिक दायित्व के रूप में न्याय का संवितरण.

क्रमशः….

©ओमप्रकाश कश्यय

opkaashyap@gmail.com