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साम्यवाद : द्वैत से अद्वैत की यात्रा

सामान्य

मनुष्यता के इतिहास में उनीसवीं शताब्दी का बड़ा महत्त्व है. यह वह कालखंड है जब मार्क्स ने वर्गसंघर्ष के नारे के साथ सर्वहारा क्रांति का आवाह्न किया था. ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ के माध्यम से दिए गए इस नारे की सीमाएं अथवा कमजोरियां 23वें वर्ष में ‘पेरिस कम्यून’ के प्रयोग की असफलता के साथ सामने आ गईं. मार्क्स के विचारों पर आधारित वह पहली समाजवादी क्रांति थी. अपने विचारों की प्रारंभिक असफलता से निराश होने के बजाय मार्क्स ने वर्गसंघर्ष की सैद्धांतिकी में सुधार हेतु स्वयं को नए सिरे से इतिहास, दर्शन, समाजविज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीतिक दर्शन आदि के अध्ययन को समर्पित कर दिया. वह फ्रांस छोड़कर इंग्लेंड चला आया जहां अपेक्षाकृत शांति थी. साथ में बौद्धिकरूप से खुला माहौल भी. करीब 15 वर्ष के गहन अध्ययनमनन के फलस्वरूप ‘पूंजी’ का पहला खंड सामने आया. इस युग प्रवर्त्तक ग्रंथ में पूंजी के शोषणकारी चरित्र तथा उसकी बहुआयामी पैठ को पहली बार समग्रता के साथ इतिहास, दर्शन एवं अर्थनीति के संदर्भ में उजागर किया गया था. सर्वहारा क्रांति का समर्थक मार्क्स इस नतीजे पर पहुंचा था कि पूंजीवादी अधिनायकवाद का उत्तर श्रमअधिनायकवाद से नहीं दिया जा सकता. श्रमअधिनायकत्व की संभावनाओं को कम करने के लिए उसने वर्गहीन समाज की संकल्पना की थी. लिखा था कि समाजवादी क्रांति का लक्ष्य बुर्जुआ वर्ग को अपदस्थ कर उत्पादन के साधनों पर कब्जा कर लेने से पूरा नहीं हो जाता. वास्तविक चुनौती उस एकाधिकारवादी भावना को समाप्त करने की है, जो वर्गविभाजन की संभावना को जन्म देती तथा प्रकारांतर में उसे मजबूत एवं स्वीकार्य बनाती है. ‘थीसिस आन फायरबाख’ में उसने लिखा था—

विद्वानों ने इस सृष्टि की अनेक प्रकार से व्याख्या की है. वास्तविक चुनौती तो इसको बदलने की है.’ 1

दुनिया को बदलने की कामना के साथ मार्क्स ने वर्गसंघर्ष का सिद्धांत प्रस्तुत किया. इसकी प्रेरणा उसको हीगेल के दार्शनिक सिद्धांत ‘द्वंद्ववाद’ से मिली थी. हीगेल के ‘शुभ’ एवं ‘अशुभ’ के द्वंद्व को उसने सर्वहारा और पूंजीपति के द्वंद्व के रूप में देखा था. उल्लेखनीय है कि हीगेल से बहुत पहले शंकराचार्य ने जीवन की व्याख्या के लिए आत्मा और परमात्मा के द्वैत का विचार प्रस्तुत किया था. कार्यकारण संबंधों की व्याख्या करते हुए उन्होंने सृष्टि की रचना में माया की अतार्किकअवैज्ञानिक परिकल्पना की थी. उनसे पहले सांख्य दर्शन में भी सृष्टिरचना को प्रकृति एवं पुरुष के संपर्क द्वारा समझाने की कोशिश की गई. सांख्याचार्य के अनुसार प्रकृति प्रमुख कार्यकारी शक्ति है. वही पुरुष को कार्य के उकसाती है.2

तुलनात्मकरूप से देखा जाए तो माया की अपेक्षा प्रकृति की परिकल्पना अधिक यथार्थवादी है. वेदांताचार्य के अनुसार माया कार्यकारण की प्रेरक शक्ति है. वहीं द्वैत की जन्मदाता है. इसके मूल में अज्ञान है. जैसे ही आत्मा अपने मूलस्वरूप अर्थात परमात्मा को पहचानने लगती है, उसका मायारूपी संसार से मोहभंग हो जाता है. आत्मा और परमात्मा के द्वैत के समापन की अवस्था को वेदांत में ‘मोक्ष’ कहा गया. उसके अनुसार मोक्ष चिरंतन ठहराव और परमशांति की ऐसी कल्पनातीत अवस्था है, जिसमें मानवात्मा के समस्त विक्षोभ शांत हो जाते हैं. मन से माया का आवरण हट जाता है और मनुष्य परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने लगता है. वेदांत दर्शन में आत्मतत्व स्वयं क्रियात्मक नहीं हैं. माया के संपर्क में आने के उपरांत उत्पन्न विक्षोभ उसे क्रियाधर्मी बनने को उकसाता है. इसके विपरीत हीगेल का ‘द्वंद्ववाद’ विपरीत गुणसंपन्न शक्तियों की नैसर्गिक क्रियाशीलता तथा उनके बीच सतत द्वंद्व की परिणति है. द्वंद्वात्मकता की प्रतीति सृष्टि में अनेक स्तर पर भिन्न रूपों में, विभिन्न प्रकार से द्रष्टिगत होती है. द्वंद्व के कारणों को हीगेल ने आभासी माना है. हीगेल के अनुसार यह सृष्टि परमसत्ता का विस्तार है. उसमें आभासी विपरीतात्मकता मानवेंद्रियों की सीमा की देन है.

सृष्टि व्यापार को द्वंद्वात्मकता के सिद्धांत से समझाने वाले हीगेल ने द्वैत को ‘शुभ’ और ‘अशुभ’ के रूप में देखा था. उसका मानना था कि सृष्टि में प्रत्येक विचार का प्रतिविचार मौजूद है. सफेद के साथ स्याह, अच्छे के साथ बुरा, पुण्य के साथ पाप, उत्तर के विरुद्ध दक्षिण आदि परस्पर विपरीतार्थी एवं समानधर्मा सत्ताओं से दुनिया भरी पड़ी है. साधारण द्रष्टिबोध उन्हें अलग, एकदूसरे से स्वतंत्र तथा परस्पर विरोधी मानता है. हीगेल के लिए इस विपरीतार्थ के अलग मायने थे. वह द्वैत की सत्ता को स्वीकारता है, लेकिन उसका कारण वस्तुगत न होकर मानवेंद्रियों की सीमा है. दूसरों से अलग वह ‘शुभ’ को ‘अशुभ’ का पूरक, उनके द्वैत को अस्थायी मानता था, जिसको मनुष्य अपने ज्ञान के माध्यम से चुनौती दे सकता था. परमसत्ता के बारे में स्पिनोजा से सहमत हीगेल का मानना था कि वह परमशुभ है. उसका विस्तार अनंत है. मानवेंद्रियों का सामथ्र्य नहीं कि उसकी विलक्षणता और विराटपन का साक्षात कर सकें. शंकर इसे माया के आवरण के रूप में देखते हैं. उसको देखते हुए हीगेल का विचार अधिक तार्किक प्रतीत होता है. हीगेल के अनुसार मनुष्य की विवशता है कि वह सत्य को केवल टुकड़ों में देख पाता है. मसलन आंखें त्रिविमीय संसार की केवल दो विमाओं को देख पाती हैं. जबकि दृश्यमान जगत की समस्त वस्तुएं त्रिविमीय संसार का हिस्सा हैं. प्रसंगवश बता दें कि चैथी विमा के रूप में ‘समय’ को मान्यता बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशक में उस समय मिली, जब आइंस्टाइन ने अपने आपेक्षिकता के सिद्धांत की व्याख्या करते हुए समय को चौथा आयाम माना. दर्शन के क्षेत्र में चैथी विमा की परिकल्पना बहुत पहले लगभग ढाई हजार वर्ष पहले की जा चुकी थी. उसकी ओर स्पष्ट संकेत अठारहवीं शताब्दी के दार्शनिक डेविड ह्यूम ने किया. समय को पहली बार महत्त्व देते हुए ह्यूम ने कहा था कि कोई भी व्यक्ति एक ही नदी में दो बार पांव नहीं रख सकता. जब तक हम नदी के प्रवाह में दूसरी बार पैर रखते हैं, उसका जल कहीं आगे बढ़ चुका होता है. उस समय दार्शनिकों ने डेविड ह्यूम को संदेहवादी कहकर उसकी खिल्ली उड़ाई गई थी. बाद में जब यही बात आइंस्टाइन ने वैज्ञानिक प्रमाण देते हुए कही, तब जाकर समय को चैथी विमा के रूप में मान्यता मिल सकी. आज अनिश्चितता अथवा संदेह के सिद्धांत को वैज्ञानिक मान्यता मिल चुकी है. ‘थ्योरी आ॓फ अनसर्टेनिटी’ आधुनिक परमाणु विज्ञान का अत्यंत महत्त्वपूर्ण अनुसंधान है, जिससे सृष्टि के रहस्यों को समझने में मदद मिल सकती है. विज्ञान की इस संशयवादी धारा ने दर्शन और विज्ञान के बीच की दूरी को पाटने का काम किया है.

ऐंद्रियक अनुभवों की सीमा की ओर संकेत करते हुए हीगेल का कहना था कि ‘सांत’ इंद्रियों द्वारा ‘अनंत’ को पूरी तरह समझा ही नहीं जा सकता. अपने बोध के लिए मनुष्य को जिन इंद्रियों पर भरोसा करना पड़ता है, वे पूरा सच कभी देख ही नहीं पातीं. मसलन आंखें दीवार पर लगी तस्वीर का एक समय में केवल एक ही पृष्ठ देख पाती हैं. तस्वीर के अगलेपिछले हिस्सों को, एक ही समय में देख पाना उनके लिए कदापि संभव नहीं है. यह कार्य मस्तिष्क को करना पड़ता है. इसलिए दीवार पर टंगी तस्वीर का हमारा आकलन सिर्फ वह नहीं होता जो हमारी आंखें तात्कालिक रूप से देख रही होती हैं. तस्वीर को पूरा देखने के लिए हमें अपनी स्थिति में बदलाव करना होता है. मगर स्थिति में परिवर्तन के साथ हम दूसरे समय में चले जाते हैं. पहला पक्ष तत्क्षण हमसे ओझल हो जाता है. पूरी छवि की परिकल्पना के लिए हमें अपने मस्तिष्क और अनुभव की मदद लेनी ही पड़ती है. आशय है कि किसी वस्तु अथवा विचार की अवधारणा के पीछे हमारे अनुभवों, स्मृतिबोध तथा मस्तिष्क का योगदान होता है.

यदि मनुष्य की इंद्रिया सांत हैं, उनकी सीमा है, तब तो वह अनंत को कदापि नहीं जान पाएगा. उस अवस्था में तो उसको अनंत सत्ता को जाननेसमझने की कोशिश छोड़ ही देनी चाहिए. हीगेल के विचारों को पढ़ते हुए ऐसा निष्कर्ष सहसा दिमाग से टकराने लगता है. लेकिन अगर यहीं तक सीमित होता तो हीगेल का दर्शन द्वंद्ववाद से आगे बढ़ ही नहीं पाता. वह संशयवादी ही बना रहता. जबकि द्वंद्व उसके दर्शन का प्रस्थान बिंदू है, लक्ष्य नहीं. प्रारंभिक स्थापना से आगे बढ़कर वह कहता है कि ठीक है, मानवेंद्रियों की सीमाएं हैं. उसकी इंद्रियां उसको किसी वस्तु को समग्रता से एक ही पल में देखने का अवसर ही नहीं देतीं. इसके बावजूद उसके पास एक चीज है, जो उसके ऐंद्रियक अनुभवों की सीमा को पाटने में सहायक है. वह है उसका मस्तिष्क. मानव मस्तिष्क ही है जो एक ही क्षण में किसी तस्वीर को पूरा न देख पाने के बावजूद उसका यथार्थबोध कराने में सक्षम होता है. इसलिए जो मनुष्य अपने सांत ऐंद्रियक साधनों से अनंत को समझना चाहता है, उसे निरंतर अपना बौद्धिक परिष्कार करते रहना चाहिए. इसके लिए वह अनुभव के साथ निरंतर अध्ययनमनन पर जोर देता है. कोई हताश न हो, इसलिए वह द्वंद्ववाद की आगे व्याख्या भी करता है. वह समझाता है कि ‘अच्छे’ और ‘बुरे’, ‘काले’ और ‘सफेद’, ‘गुणअवगुण’ का भेद आभासी है.

असल में वह हमारी अज्ञानता और अधूरे ज्ञान की देन है. सही मायने में हमारी सीमाओं का प्रतीक. परोक्षरूप में वह भी द्वैत की महत्ता को स्वीकारता है. परंतु मानता है कि बोध के विकासक्रम में द्वैतभाव तिरोहित होने लगता है. मनुष्य समझने लगता है कि ‘काला’ और ‘सफेद’ रंग एकदूसरे के विपरीतधर्मा न होकर परस्पर भिन्न स्थितियां हैं. जो वस्तु काली दिखती है, वह अपने ऊपर पड़ी प्रकाश किरणों को पूरी तरह सोख लेती है. दूसरे शब्दों में उसका गुण है अपने ऊपर पड़ने वाली समस्त प्रकाश किरणों को अवशोषित कर लेना. जबकि सफेद रंग वाली वस्तु का गुण है, प्रकाश किरणों को ज्यों का त्यों परावर्तित कर देना. दोनों के अपनेअपने गुण हैं. उनमें विरोधाभास हो सकता है, परंतु विपरीत गुणसंपन्न होने के बावजूद दोनों में कहीं टकराव नहीं है. बल्कि वे एकदूसरे के पूरक का कार्य करती हैं. साधारण मनुष्य इस अंतर को समझ नहीं पाता, इसलिए वह सफेद और काले को एकदूसरे का विपरीतधर्मा मान लेता है. हीगेल के तर्कों के आगे हमारी आंखों के आगे पड़ी द्वैत की चदरिया लगातार झीनी पड़ती हुई अंत में गायबसी हो जाती है. यही ‘सांत’ के ‘अनंत’ तक पहुंचने की यात्रा है.

अच्छे’ और ‘बुरे’, गुणअवगुण’ के विपरीतार्थ को नकारता हुआ वह कहता है कि ‘अच्छा’, ‘बुरे’ का विलोम न होकर भिन्न स्थिति है. यह वह प्रत्यय है जो समाज के एक वर्ग द्वारा थोप दिया जाता है. समाज बदलने पर वह बदल भी सकता है. हीगेल की दृष्टि में ‘बुरा’ वह है जिसमें उन गुणों का, जिन्हें हम अच्छाई का प्रतीक मानते हैं, अभाव है. ये गुण या स्थापनाएं व्यक्ति की न होकर उस समाज की होती हैं, जिसमें वह जन्मा है. इसी प्रकार तस्वीर या कमरे में पड़ी मेज की वह व्याख्या करता है कि जो दिख रहा है, वह तस्वीर वास्तविक नहीं है. वह मात्र द्विविमीय छवि है. आंखें अपनी खूबी तथा मस्तिष्क की मदद से उसको त्रिविमीय छवि में बदल रही हैं. छवि की सीमा है कि वह केवल स्थिति एवं क्षणविशेष में ही सत्य हो सकती है. मेज को पूरा समझने के लिए हमें उसके दूसरे पहलुओं को भी जोड़ना पड़ता है. इसलिए अलगअलग समय में मस्तिष्क पर पड़ने वाले मेज के बिंबों को एकदूसरे का विरोधी नहीं माना जा सकता, बल्कि वे एकदूसरे के पूरक हैं. जैन दर्शन इसे स्याद्वाद के सिद्धांत द्वारा अभिव्यक्त करता है. चार अंधों और हाथी के रूपक द्वारा वह समझाता है कि हाथी को पहचानने में जुटे चार अंधों के अनुभव परस्पर भिन्न होंगे. उनमें जो व्यक्ति हाथी की सूंड की ओर होगा वह उसकी उपमा बेल से देगा, कानांे को छूकर हाथी को पहचानने में जुटे अंधे की निगाह में हाथी का आकार सूप के समान होगा. इसी प्रकार पेट और पैर का स्पर्श करने वाले अंधों के निष्कर्ष भी एकदूसरे से अलग होंगे. व्यक्तिगत निष्कर्ष में वे चारों सही हैं, परंतु उनमें से एक भी सत्य का पूर्णानुमान लगाने में असमर्थ है. सामान्य व्यक्ति के प्रकरण में भी उसकी ऐंद्रियिक सीमा सत्य की पूर्णानुभूति कराने में अक्षम होती है. तर्कों के माध्यम से हीगेल स्पष्ट करता है संसार में दिखने वाली सभी विरोधी स्थितियां एकदूसरे की पूरक हैं. यहां हम हीगेल को स्पिनोजा के करीब पाते हैं. अंतर सिर्फ इतना है कि स्पिनोजा ‘सर्वेश्वरवाद’ को सीधेसीधे एक झटके में छू लेता है. हीगेल वहां तक पहुंचने के लिए अनेक तर्कों, स्थितियों का सहारा लेता है. स्पिनोजा पर अतिरेकी आस्था का दबाव है. हीगेल बौद्धिकता के मुक्ताकाश में सत्य को समझने की चेष्ठा करता है. कह सकते हैं कि स्पिनोजा जो लक्ष्य निर्धारित करता है, हीगेल उसको स्वीकार करता है, लेकिन पूरी तर्कबुद्धि के साथ. एकएक के लिए समर्थन जुटाते हुए. वह एक ओर तो मनुष्य को उसकी सीमाओं का एहसास कराता है, दूसरी ओर उसे यह विश्वास भी दिलाता है कि निरंतर अभ्यास, अध्ययनचिंतन से वह अपनी दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त कर सकता है.

मार्क्स हीगेल से द्वंद्ववाद की विचारधारा उधार लेता है. लेकिन उसका उपयोग केवल साधन तक सीमित रखता है. वह द्वंद्ववाद से प्रभावित है. पूंजीवादी समाज में जन्मे मार्क्स को सर्वहारा और बुर्जुआ ही अपने चारों ओर दिखाई पड़ते हैं. अपने परिवेश के प्रति वह इतना सम्मोहित है कि उससे इतर अतींद्रिय दुनिया की परिकल्पनाएं उसको जम ही नहीं पातीं. आरंभ में समाज में वांछित परिवर्तन के लिए वह दोनों वर्गों के संघर्ष की अनिवार्यता पर जोर देता है. शुभ और अशुभ के शाश्वत संघर्ष की भांति, ताकि परमशुभ की सर्वकल्याणक, सर्वत्र शुभदायक स्थिति को प्राप्त किया जा सके. वह साम्यवाद का सपना रचता है, जिसमें सुख पर किसी का भी एकाधिकार न हो. बल्कि अधिकतम व्यक्ति अधिकतम सुख का भोग कर सकें. यह सपना उसकी आंखों में 1845 में ही जन्म ले चुका था. साम्यवाद की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उसने ‘दि जर्मन आइडियोला॓जी’ में लिखा है—

हमारे लिए साम्यवाद किसी प्रस्तावित राज्य के गठन का ऐसा मसला नहीं है जिससे अपने आदर्श लक्ष्य की प्राति हेतु वह नागरिकों से सहयोग एवं समन्वय बनाए रखने की अपेक्षा करे. इसके बजाय साम्यवाद को ऐसा जमीनी आंदोलन कहना उचित होगा जो वर्तमान राज्य को विखंडित कर देगा. नए राज्य की शर्त उसके होने में न होकर उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता में निहित होगी.’3

वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि समाज में असमानता का कारण केवल आर्थिक विषमता नहीं है. अकेले पूंजी के रहने या न रहने से वर्गीय विषमताओं को मिटा पाना असंभव होगा. उसके पीछे धर्म, राजनीति, समाज आदि कारक भी सम्मिलित हैं, जो वर्गभेदकारी स्थितियों को जन्म देने के साथसाथ नागरिकों को विभेदकारी तंत्र से अनुकूलन की प्रेरणा देते हैं. इन्हीं की मदद से शिखरस्थ शक्तियां उत्पादन केंद्रों पर अधिकार जमाए रहती हैं. स्थायी परिवर्तन वर्गभेद को जन्म देने वाली स्थितियों के उन्मूलन बगैर संभव नहीं. आमूल परिवर्तन के लिए उस मानसिकता में भी संशोधन करना पड़ेगा जो विभेदकारी वातावरण से अनकूलन करना सिखाती है. स्थितियों को उनकी समग्रता में देखने का यह गुण मार्क्स ने अपने गुरु हीगेल से लिया था. अन्य शब्दों में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद वह दरवाजा है जिसको वह अपने जीवनकाल में ही पार कर चुका था. भौतिकवादी मार्क्स आत्मा, परमात्मा और माया जैसी अमूत्र्त धारणाओं के फेर में नहीं पड़ता. हीगेल की पुस्तक ‘फिलास्फी आ॓फ राइट’ की आलोचना करते हुए वह धर्म को जनसाधारण के लिए अफीम बताता है. ‘थीसिस आ॓न फायरबाख’, ‘क्रिटीक आन फिलास्फी आ॓फ राइट’ ऐसी ही पुस्तकें हैं, जिनमें उसके धर्मसंबंधी विचारों की आलोचना की झलक है. एक अन्य पुस्तक में उसने हीगेल के शिष्य और अपने मित्र बूनो बायर की आलोचना की थी. लेकिन पेरिस क्रांति की असफलता के बाद उसको अपने चिंतन के अधूरेपन की अनुभूति होती है. उसको लगता है कि ‘सर्वहारा’ और ‘पूंजीपति’ की विपरीतधर्मिता ‘काले’ और ‘सफेद’, ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ की द्वैत जितनी ही आभासी है. आमूल परिवर्तन के अभाव में ही सर्वहारा राज्य के सर्वहारा अधिनायकवादी राष्ट्र में बदलते देर नहीं लगती.

मार्क्स द्वंद्वात्मक भौतिकवाद से अपने चिंतन की शुरुआत करता है, लेकिन वह उससे उतना ही काम लेता है, जितना कोई भौतिक विज्ञानी गणित के पूर्वस्थापित सूत्र से, मिस्त्री अपने औजार से. सर्वहारा वर्ग द्वारा सत्ता पर अधिकार कर लेने के बाद आंदोलन का दूसरा लेकिन अतिमहत्त्वपूर्ण चरण आरंभ हो जाता है, साम्यवाद के सिद्धांतों के अनुरूप राज्य को ढालने का. उसमें वह वर्गहीन समाज की स्थापना के लक्ष्य को सामने रखता है. वह एक ऐसे समाज की परिकल्पना करता है, जिसमें लोग पारस्परिक कल्याण भावना के आधार पर एकदूसरे से जुड़े हों. उसकी व्याख्या में साम्यवाद केवल राजनीतिक व्यवस्था तक ही सीमित नहीं रह जाता. साम्यवादी दर्शन को उठान देता हुआ मार्क्स , उसे अपने गुरु हीगेल के ‘परमशुभ’ का पर्याय बना देता है. उसके अनुसार साम्यवाद ऐसी अवस्था है, जहां समाज के सभी प्रकार के द्वैतों का शमन हो जाता है. समस्त द्वंद्वों का समाधान हो जाता है. सामाजिकआर्थिकराजनीतिकमनोभौतिक समरसता का वातावरण बनने लगता है. असंतुलन एवं असमानता की भावना कमजोर पड़ जाती है. कह सकते हैं कि साम्यवाद के रूप में वह ऐसे दर्शन की परिकल्पना करता है जहां नियंत्रणकारी समूहों की आवश्यकता ही न हो. मनुष्य जीवन और समाज के उच्चादर्शों से स्वतः अनुशासित हों. धर्म, संस्कृति जैसे परंपरागत मूल्यों के बजाय लोग उत्पादन, समान उपभोग और सहजीवन के वैज्ञानिक नियमों से एकदूसरे से आबद्ध हों. समाज अपनी आंतरिक नैतिकता, समानता के सिद्धांत एवं लोकतंत्र द्वारा मर्यादित रहे . ऐसे राज्य में सरकार की उपस्थिति महज इसलिए जरूरी हो, ताकि वह शेष विश्व को उसकी भावनाओं और संकल्पों से परचा सके. हीगेल के दर्शन में परमशुभ एक लक्ष्य है. चूंकि वर्गहीन समाज की स्थापना का लक्ष्य भी अपने आप में काफी जटिल और लंबी प्रक्रिया है, इसलिए साम्यवाद को समर्पित संस्थाओं को इसके लिए सतत प्रयासरत रहना होता है.

यहां एक स्वाभाविक प्रश्न उभरता है कि यदि साम्यवाद इतनी ही उत्कृष्ट व्यवस्था है तो यह विश्व में इतनी सिमटी हुई क्यों है? बीसवीं शताब्दी के मध्याह्न में विश्व के लगभग आधे देशों में प्रभाव रखने वाला साम्यवाद शताब्दी के अंत तक मात्र पांच देशों का खेवनहार बनकर रह गया, आखिर क्यों? सोवियत संघ जैसी व्यवस्था का पतन हुआ. अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए चीन पूंजीवाद के साथ समझौतावादी रुख अपनाए हुए है. आखिर क्या कारण है कि साम्यवाद जैसी आदर्शोन्मुखी प्रणाली अपनी प्रतिबद्ध सैद्धांतिकी के बावजूद बिखराव का शिकार होने से स्वयं को बचाने में असमर्थ रही? इसके बरक्स पूंजीवाद जिसकी अपनी कोई सैद्धांतिकी नहीं है, आज दुनिया के बड़ेबड़े देशों का भाग्यविधाता बना हुआ है. आखिर क्यों? मुझे लगता है कि साम्यवाद की अतिआदर्शोन्मुखी दार्शनिक प्रतिबद्धता ही उसकी असफलता का कारण है, बड़ा कारण. इसकी तह में जाने के लिए हमें एक बार फिर मार्क्स की शरण में लेनी होगी. कार्ल मार्क्स का कुल जीवनदर्शन दो हिस्सों में बंटा है. द्वंद्वात्मक भौतिकवाद. जिसमें वह सर्वहारा और पूंजीपति के बीच संघर्ष को अनिवार्य मानता है. दूसरा वर्गहीन समाज की स्थापना का साम्यवादी लक्ष्य. जो उसका दूसरा और महत्त्वपूर्ण चरण है. इतना कि उसके अभाव में पहले चरण की सफलता के असफलता में बदलते देर नहीं लगती. यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो पहली अवधारणा में जबरदस्त राजनीतिक अपील है, जो व्यवस्था से उत्पीड़ित बहुसंख्यक वर्ग को सामूहिक कल्याण की भावना के अनुसार संगठित करने का सामर्थ्य रखती है. यह अपील बहुत कुछ परंपरागत सामंतवादी राजनीति से मिलतीजुलती है. जिसमें युद्ध एवं हिंसा के रास्ते सत्ता हथिया ली जाती थी. अंतर केवल इतना है कि सामंतवाद में प्रायः उग्र राष्ट्रवाद और बाद में तलवार की ताकत के दम पर ही उसको कायम रखा जाता था. अंतर सिर्फ इतना है कि राजशाही में युद्ध किसी एक व्यक्ति की साम्राज्यवादी लिप्साओं द्वारा आम प्रजा पर थोप दिए जाते थे, साम्यवाद में वे सर्वहारा वर्ग द्वारा, जो मार्क्स के अनुसार वास्तविक उत्पादक शक्ति है, परिवर्तन की कामना के साथ तय होते हैं. दोनों अवस्थाओं में हिंसा अपरिहार्य है. इसलिए हम देखते हैं कि जिन देशों में साम्यवादी क्रांति हुई वहां जनाक्रोश का लाभ उठाने के लिए ऐसे नेता उभरकर सामने आए जो सैन्य संचालन में निपुण थे. रूस, चीन, क्यूबा, वियतनाम, आदि इसके उदाहरण हैं. जर्मनी में हिटलर ने जब निरंकुश तानाशाही कायम की तो उसका नारा भी समाजवादी होने का था. भारत आदि देशों में जहां नेतृत्व की बागडोर गैर सैनिक नेताओं के हाथों में थी, वहां साम्यवाद केंद्रीय व्यवस्था का हिस्सा कभी न बन सका. जिन देशों में सैन्य कार्रवाही अथवा सैन्य नेताओं के प्रभाव से साम्यवाद आया, वहां जनता और सामरिक शक्तियां साथसाथ थीं. लेकिन सैन्य नेतृत्व की अपनी कमजोरी होती है. साम्यवादी अनुशासन में स्वयं को ढालने के लिए बाहरी के साथ आंतरिक अनुशासन भी अपेक्षित था. सामरिक बल पर सत्तारूढ़ हुए सर्वहारा संगठन जनता पर बाहरी अनुशासन तो थोप सकते थे, आंतरिक अनुशासन के लिए उनमें न तो आवश्यक नैतिक बल था, न ही वैसा अभ्यास. इसलिए कि यह राजनीति से अधिक सामाजिक कृत्य था, जिसका उनको अभ्यास न था. तलवार की धार और बाहरी अनुशासन के बल पर साम्यवादी शक्तियां जब तक बनी रह सकती थीं, रहीं. बाद में उनको बढ़ते जनाक्रोश की मदद से अपदस्थ कर दिया गया.

पूंजीवाद साम्यवाद के मुकाबले बहुत लचीली व्यवस्था है. वह उपभोक्ताअधिकार, मानवाधिकार, लैंगिक समानता, जातीय भेदभाव के उन्मूलन, मुक्त व्यापार, लोकतंत्र आदि लोकलुभावन नारों के बूते जनता का अपने प्रति अनुकूलन कर लेती है. साम्यवाद आधुनिकता का दावा करते हुए धर्म का विरोध करता था. लेकिन पूंजीवाद धर्म का उपयोग भी अपने पक्ष में माहौल बनाए रखने के लिए करता है. साम्यवाद के प्रचार में लगी शक्तियों की कमजोरी है कि जनता पर अपना प्रभाव बनाए रखने वे उन्हीं रास्तों का अनुसरण करती हैं, जिनपर चलकर धर्म मानवीय विवेक की उपेक्षा का वातावरण बनाता है. शायद इसी कारण अल्पचेतनशील समाजों वे आरोपित धर्म को अपनाने के बजाय परंपरागत धर्म की शरण में जाना उचित समझते हैं. ऐसा नहीं है कि साम्यवादी विचारक इस कमजोरी से अनभिज्ञ हों. अंतोनियो ग्राम्शी ने इसलिए सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से मुक्ति का नारा भी साथसाथ दिया था. उसने सर्वहारा वर्ग से अपील की थी कि वे अपने बीच से बुद्धिजीवी पैदा करें. ताकि उसके अनुरूप राजनीतिक नेतृत्व तैयार हो सके. भारत जैसे देशों में साम्यवाद की असफलता का कारण यह रहा है कि यहां राजनीति में वे लोग आए जो संसद में घुसपैठ के लिए गलियारों की तलाश में थे. साम्यवाद के दार्शनिक पक्ष को समझेसमझाए बिना केवल व्यावहारिक पक्ष की राजनीति को बढ़ावा दिया गया. उन समस्याओं को केंद्र में रखकर आंदोलन चलाए गए, जिनका जनता के वास्तविक विकास से कोई सीधा संबंध न था. उन्होंने सामाज के न तो मूल ढांचे में छेड़छाड़ की जरूरत महसूस की, न आमूल परिवर्तन के लिए वांछित प्रयास किए. वैचारिक निष्ठा के अभाव तथा लोकप्रिय राजनीति से लगाव के कारण वे हताशा की लड़ाई लड़ते रहे हैं.

अंत में एक प्रश्न कि क्या साम्यवाद का कोई भविष्य है. तो मैं बेहिचक बिना कोई पल गंवाए कहूंगा कि है. राजनीतिक सामंतवाद की तरह पूंजीवादी सामंतवादी निरंकुशता नहीं चल सकती. इसलिए एक न एक दिन साम्यवाद को अपनाना ही होगा. शोषणकारी शक्तियों में साम्यवाद का आज भी कितना भय है, वह एक उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है. मार्क्स ने ‘बुर्जुआ’ शब्द का उपयोग अनेक स्थान पर किया है. इस शब्द से उसका आशय उन लोगों से था जिन्होंने तीव्र मशीनीकरण का लाभ उठाकर, पूंजीगत निवेशविनिवेश के माध्यम से अकूत पूंजी जमा की है. उसका उपयोग अब वे श्रमिक शोषण को बनाए रखने के लिए नएनए रूप में कर रहे हैं. लेकिन आधुनिक शब्दकोशों में इस शब्द का अर्थ देख लीजिए, वह ‘मध्यवर्ग’ अथवा ‘शिक्षित मध्यवर्ग’ ही मिलेगा, जिसका मार्क्स की अवधारणा से कोई संबंध नहीं है.

अब यह सर्वहारा वर्ग के ऊपर है कि कब पूंजीवादी प्रलोभनों से बाहर निकलकर आमूल परिवर्तन का आवाह्न करता है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. the philosophers have only interpreted the world, the point is to change it” – Karl Marx in Theses on Feuerbach, 1845.

2. कार्याणि प्रकृतिजेगुणे कर्माणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।

3. Communism is for us not a state of affairs which is to be established, an ideal to which reality will have to adjust itself. We call communism the real movement which abolishes the present state of things. The conditions of this movement result from the premises now in existence.” —Karl Marx in The German Ideology, 1845.

कार्ल मार्क्स के सहयोगी : जेनी कोरलाइन, फ्रैड्रिक ऐंगल्स और देमुट

सामान्य

मार्क्स के व्यक्तित्व को देखें तो उसके निर्माण में अनके विद्वानों, दार्शनिकों और विचारकों का योगदान है. इनमें सबसे पहला नाम महान दार्शनिक फ्रैड्रिक हीगेल का है. मार्क्स की संपूर्ण दार्शनिक चेतना, भौतिकवादी चिंतन हीगेल से ही प्रभावितप्रेरित है. इसके अतिरिक्त उसपर प्लेटो, वाल्तेयर, रूसो, रिकार्डो आदि अनेक विद्वानों का प्रभाव था. धर्म की आलोचना संबंधी तत्व उसने फायरबाख एवं ब्रूनो बायर से उधार लिए थे. जबकि जनप्रतिबद्धता, स्पष्टवादिता, वैचारिक निष्ठा तथा उसके लिए किसी भी प्रकार का जोखिम मोल लेने की कला उसने वाल्तेयर और रूसो से सीखी थी. मार्क्स इन सबसे प्रेरित भी था और प्रभावित भी. इसके साथसाथ वह विमर्शचिंतन को लेकर सर्वथा मौलिक भी था.उसके दिल में श्रमिकों के प्रति बेहद प्यार था. खुद वह सदैव संघर्षशील अवस्था में रहा.शायद ही ऐसा कोई अवसर आया हो जब उसको अपनी आर्थिक चिंताओं से पूर्ण मुक्ति मिली हो. हालांकि अपनी प्रतिभा के दम पर वह अच्छी जीवनशैली को अपना सकता था. मगर उसने अपनी वैचारिक निष्ठा से कभी समझौता नहीं किया. उसके इस संघर्ष को सफल बनाने में जिन दो व्यक्तित्वों का बड़ा योगदान था, जिनके बिना उसका अस्तित्व अधूरा रह जाता है, उनमें एक है, जेनी कोरलीनमार्क्स की पत्नी. दूसरा उसका अभिन्न मित्र एवं मददगारफ्रैड्रिक ऐंगल्स. कई पुस्तकों में उसका सहलेखक, ऐसा मित्र जो आजीवन मार्क्स को आर्थिक मदद पहुंचाता रहा. जिसने अपने परिवार का जमाजमाया व्यापार अपनी मैत्री और वैचारिक निष्ठा पर न्योछावर कर दिया.

 

जीवनसंगिनी : जेनी

 

उसका पूरा नाम था जेनी वान कोरलाइन. वह एक सुंदर, संवेदनशील, दयालु, कोमल हृदय वाली, ममतामयी और अपने परिवार के प्रति समर्पित स्त्री थी. उदारमना और संघर्षशील. पूंजीवाद के मुखर आलोचक और प्रखर लेखक की छवि बना चुका मार्क्स अपने जीवन में आरामदेय नौकरी की संभावना तो पहले ही खारिज कर चुका था, सिर्फ लेखन ही उसका सहारा था. वैचारिक उग्रता के कारण गिनेचुने समाचारपत्रों में ही उसके लेखों को जगह मिलती थी. ऐसे समाचारपत्र निजी परिश्रम और संसाधनों के दम पर निकाले जाते थे. उनका आर्थिक पक्ष भी अपेक्षाकृत कमजोर होता था. अतएव वहां से मिलने वाला मानदेय अपेक्षाकृत बहुत कम होता. ऊपर से उसका बड़ा परिवार. मार्क्स स्वयं फेफड़ों की कमजोरी का शिकार था. अपने उपचार और बड़े परिवार का खर्च चलाने के लिए जितनी धनराशि की उसे आवश्यकता पड़ती, आय के स्रोत अत्यंत सीमित थे. परिणामस्वरूप जेनी को काफी कष्ट उठाना पड़ता था. लेकिन यह सब वह प्रसन्नतापूर्वक करती थी. यहां तक कि मार्क्स कभीकभी खुद भी घर की दरिद्रता देखकर दुखी हो जाता. उदासमन से अपने आप को दोष देने लगता. उस समय जेनी ही उसको गरीब मजदूरों के जीवन से तुलना करके बताती कि उनकी अपेक्षा वह कितनी बेहतर अवस्था में हैकि लेखक का काम मजदूर के काम से कितना आरामदेय और सुखकर है. जेनी सुंदर होने के साथसाथ भावुक कवियित्री भी थी. संघर्ष के दिनों में जेनी की प्रेमकविताएं मार्क्स के लिए बहुत बड़ा सहारा थीं. वह आजीवन श्रमिकों के हित में सोचतालिखता रहा तो उसके पीछे जेनी का बहुत बड़ा योगदान था. बल्कि लेखक मार्क्स की कामयाबी के पीछे जेनी का ही हाथ था. वह एक अच्छी पत्नी, आदर्श मां, कुशल ग्रहणी और संवेदनशील महिला थी. वह चाहती तो स्वयं भी अच्छी लेखक बन सकती थी. किंतु वह आजीवन मार्क्स की मदद करने, उसको लेखन के लिए उत्साहित करने का काम करती रही.

 

अभिन्न मित्र : फ्रैड्रिक ऐंगल्स


जेनी के अलावा मार्क्स की जीवनगाथा जिस व्यक्ति के बगैर अधूरी है, वह था फ्रैड्रिक ऐंगल्स. ऐंगल्स के लिए तो मार्क्स की मित्रता उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुकी थी. दोनों परम मित्र और सहयोगी थे. दोनों की हीगेल के विचारों में आस्था थी. दोनों श्रमिक जीवन की त्रासदियों से परिचित थे और उत्पादनतंत्र में सुधार की कामना करते थे. दोनों की रुचि दर्शनशास्त्र में थी. उम्र में मार्क्स से मात्र दो वर्ष छोटा ऐंगल्स धनी उद्योगपति की संतान था. उसके पिता सूती मिल के हिस्सेदार थे. इसलिए ऐंगल्स का बचपन आरामदेय परिस्थितियों में बीता. तो भी अपने स्वतंत्र सोच और पारिवारिक स्थितियों के कारण वह हाईस्कूल से आगे शिक्षा प्राप्त न कर सका. वस्तुतः अध्ययन के दौरान ही उसका झुकाव प्रगतिशील विचारों की ओर हो चुका था, जिसको उसके पिता और संबंधी अपने वर्गीय हितों के विपरीत मानते थे. उन्हांेने अपने बेटे को अपने व्यवसाय से जोड़े रखने, अपने वर्गीय हितों से जोड़ने का भरपूर प्रयास किया. लेकिन ऐंगल्स की वैचारिक निष्ठा उसके मन में पूंजीवाद के विरोध की प्रेरणाएं भरती रही. इससे परिवार में तनाव की स्थिति आना स्वाभाविक था.

पारिवारिक कलह से तंग आकर वह ब्रीमेन चला गया, जहां उसने एक कार्यालय में बिना वेतन के लिपिक का काम किया. ब्रीमेन में काम करते हुए ऐंगल्स ने दर्शन का अध्ययन जारी रखा. कविताओं में उसकी रुचि थी. मात्र अठारह वर्ष की अवस्था में उसका पहला कविता संग्रह प्रकाशित हुए. उस समय तक उसके समाचारपत्रों में लेख भी छपने लगे थे. बीस वर्ष की अवस्था में वह प्रूशिया की सेना में भर्ती हो गया. उसी दौरान उसको बर्लिन जाना पड़ा, जहां उन दिनों नवहीगेलवादियों की बड़ी चर्चा थी. युवा और स्वप्नदृष्टा ऐंगल्स स्वयं को उनके प्रभाव से न बचा सका. वहीं रहते हुए उसने हीगेल सहित समकालीन दार्शनिकों का गहन अध्ययन किया. अनेक समकालीन विचारकों की भांति वह भी हीगेल के विचारों से प्रभावित हुए बिना न रह सका.

1841 तक ऐंगल्स एक युवा लेखक के रूप में अपनी पहचान बना चुका था. उसी समय उसको अपने परिवार की ओर से मेनचेस्टर स्थित सूती मिल का काम देखने का निमंत्रण मिला. ऐंगल्स के पिता उस मिल के हिस्सेदारों में से थे. उन्होंने सोचा था कि कारखाने की जिम्मेदारी सौंपने से ऐंगल्स के मन में अपने वर्गीय हितों के प्रति झुकाव पैदा होगा. उन दिनों मार्क्स ‘रींसचे जीटुंग’ नामक प्रगतिशील समाचारपत्र का संपादक था. कम उम्र में ही वह प्रगतिशील विचारक, लेखक के रूप में पर्याप्त ख्याति बटोर चुका था. मेनचेस्टर जाते समय ऐंगल्स ने मार्क्स से मुलाकात की. दोनों की पहली भेंट औपचारिक ही रही. कोई भी एकदूसरे को प्रभावित करने में असमर्थ रहा. मेनचेस्टर में ऐंगल्स की भेंट मेरी बन्र्स नामक महिला से हुई. दोनों ही प्रगतिशील विचारों को मानने वाले थे. मेरी बन्र्स और ऐंगल्स का संबंध आजीवन बना रहा. ऐंगल्स की विवाह नामक संस्था में कोई आस्था न थी. दोनों आजीवन अविवाहित रहकर भी परस्पर गहरे मित्र और शुभचिंतक बने रहे.

मेनचेस्टर में रहते हुए ऐंगल्स को मजदूरों के जीवन को करीब से देखने का अवसर मिला. उसने देखा कि दिनभर कारखाने में जीतोड़ परिश्रम करने वाले श्रमिक शाम को भरपेट खाना भी नहीं खा पाते हैं. उनकी स्त्रियों और बच्चों को अधनंगे तन रहना पड़ता है. रातें भूख से काटनी पड़ती हैं. छोटेछोटे मकानों में जानवरों की भांति रहकर वे अपना समय बिता देते हैं. ऐंगल्स के लिए ये नए अनुभव थे, जिन्हें केवल लेखक के रूप में श्रमिकजीवन को करीब से देखे बिना वह समझ नहीं सकता था. ऐंगल्स ने अनुभव किया कि इंग्लेंड में लगभग सभी जगह मजदूरों की एक जैसी हालत है. उसी से प्रेरित होकर उसने अपनी पुस्तक ‘दि कंडीशन आ॓फ दि वर्किंग क्ला॓स इन इंग्लेंड इन 1844’ पूरी की. इंग्लेंड में उन दिनों चार्टिस्ट आंदोलन का उफान पर था. चार्टिस्ट आंदोलनकारी मजूदरों के सम्मान और उनके संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे. यूरोप के करोड़ों मजदूर उसके समर्थन में थे. उनके संपर्क में आने के बाद ऐंगल्स में मजदूर आंदोलनों के प्रति निष्ठा का विकास हुआ. उन्हीं दिनों राबर्ट ओवेन, विलियम किंग, रिकार्डो तथा अन्य साहचर्यवादी अर्थशास्त्रियों को भी उसने पढ़ा. मगर उसको संतोष न हुआ. श्रमिकों के जीवन की दुर्दशा देखकर उसको अपने जीवन से घिन होने लगी. आखिर उसने मेनचेस्टर छोड़ने का निश्चय कर लिया. वहां से वह जर्मनी के लिए प्रस्थान कर गया. पेरिस में उसने एक बार फिर मार्क्स से मिलने का निश्चय किया. दोनों की भेंट एक स्थानीय कहवाघर में हुई. इस मुलाकात में दोनों एकदूसरे के मित्र बन गए. उनकी मित्रता आजीवन बनी रही. मार्क्स उन दिनों ‘दि होली फैमिली’ नामक पुस्तक पर काम कर रहा था. इस पुस्तक में उसने ब्रूनो बायर और अन्य नवहीगेलवादियों की आलोचना की थी. मार्क्स का जीवन संघर्षमय था. ऐंगल्स उसके काम से बेहद प्रभावित था. इसलिए उसने पेरिस में ही रुकने का निर्णय लिया, ताकि वहां रहकर अपने मित्र की आर्थिक मदद कर सके.

1848 में पेरिस में क्रांति भड़क उठी. मार्क्स को प्रूशिया में शरण लेनी पड़ी. वहां उसने एक समाचारपत्र का संपादन शुरू किया. मगर कलम का धनी और विचारों से निर्भीक मार्क्स वहां भी शांत रहने वाला न था. उसकी कुछ विवादित टिप्पणियों के कारण प्रूशिया की सरकार मार्क्स से नाराज हो गई. परिणामस्वरूप उसको समाचारपत्र और पू्रशिया की नागरिकता, दोनों से हाथ धोना पड़ा. मार्क्स वहां से इंग्लेंड चला गया. जहां उसने स्वयं को ‘पूंजी’ के लेखन के प्रति समर्पित कर दिया. ऐंगल्स को कारखानेदारों के जीवन से चिढ़ थी. उन्हें वह दूसरों के श्रम पर जीवनवाला, परजीवी वर्ग मानता था. उनकी विलासिता एवं स्पर्धा में एकदूसरे को पछाड़ देने की आदत से उसको कोफ्त होती थी. एक मालिक के रूप में उसे अपना जीवन बोझ लगता था. इसलिए वह मेनचेस्टर छोड़कर बर्लिन पहुंचा था. बर्लिन जैसे अपेक्षाकृत शांत नगर को अपना डेरा बनाने का उसका उद्देश्य यह भी था कि वह अपनी लेखनसंबंधी योजना को आगे बढ़ाना चाहता था. उसकी कोशिश आंशिक रूप से सफल भी रही. बर्लिन में उसके लेख वहां के प्रसिद्ध समाचारपत्रों में स्थान पाने लगे. बर्लिन पहुंचकर थोड़े ही दिन हुए थे कि उसको मार्क्स के परिवार पर आए आर्थिक संकट पर पड़ी. अंततः अपने परममित्र के जीवनसंघर्ष को देखते हुए उसको पुनः उसी जीवन में लौटना पड़ा. परिस्थितिवश जिस मिल में उसके पिता की साझेदारी दी, उसी में उसको लिपिक के रूप में काम करना पड़ा.

स्मरणीय है कि ऐंगल्स ने अपने कैरियर की शुरुआत भी एक लिपिक के रूप में की थी. तब उसने वैचारिक मतभेदों के कारण परिवार छोड़ा था. इस बार वह इसलिए काम पर लगा था, क्योंकि उसके परममित्र को उसकी मदद की आवश्यकता थी. एक बार फिर ऐंगल्स ने स्वयं को कुशल प्रबंधक सिद्ध किया और 1864 में उसने पुनः उस कारखाने की हिस्सेदारी खरीद ली. इस बीच मार्क्स लंदन के लिए रवाना हो गया. कारखाने का सफलतापूर्वक संचालन करता हुआ ऐंगल्स बर्लिन से ही मार्क्स की मदद बराबर करता रहा. उन दिनों मार्क्स एवं ऐंगल्स के बीच संवादवहन का एकमात्र माध्यम पत्राचार था. ऐंगल्स को अपने मित्र मार्क्स से मिलने की ललक थी. इसलिए उसने कारखाना छोड़ दिया. इस बार भी उसके परिजनों ने खूब समझाया. जमाने की ऊंचनीच का वास्ता दिया. लेकिन ऐंगल्स को उनसे अधिक अपने मित्र मार्क्स की चिंता थी. इसलिए वह लंदन के लिए रवाना हो गया, जहां वह मार्क्स के साथ रहने लगा. अपने जीवन के अंतिम दिनों में मार्क्स की बीमारी ने जोर पकड़ लिया था, उस समय ऐंगल्स ने एक आदर्श मित्र का दायित्व निभाते हुए उसकी भरपूर मदद की थी. ऐंगल्स जिद्दी, धुन का पक्का और खुशमिजाज इंसान था. साहित्य, संगीत, कविता लिखने के अतिरिक्त उसको लोमड़ी का शिकार करने का भी शौक था, जो उन दिनों इंग्लेंड के रईसों का पसंदीदा खेल था. जीवन के आरंभिक दिनों में वह क्रांति के लिए हिंसा का समर्थक था, मगर आगे चलकर वह शांतिपूर्ण तरीके से समाजवाद का पक्षधर बना.

मार्क्स के जीवन की एक विडंबना यह भी है कि वह आजीवन पूंजीवाद की आलोचना करता रहा. किंतु उसका सर्वाधिक घनिष्ट मित्र स्वयं एक पूंजीपति वर्ग से आता था. जिससे वह आजीवन मदद लेता रहा. मार्क्स ने जब ‘पूंजी’ की रचना की तो उसके लिए श्रमिकों के बारे में तथ्यात्मक जानकारी उसको ऐंगल्स से ही प्राप्त हुई थी. यही नहीं पूंजी की रचना के दौरान वह समयसमय पर मार्क्स को सुझाव भी देता रहा. इस पुस्तक के दूसरे और तीसरे खंड तो उसके संपादन में ही प्रकाशित हुए थे. दोनों ने हालांकि एक साथ कई पुस्तकों पर काम किया, लेकिन दोनों में कुछ उल्लेखनीय मतभेद भी थे. मार्क्स राजनीतिक अर्थशास्त्र में रुचि रखता था, जबकि ऐंगल्स की विशेषज्ञता इतिहास और प्राकृतिक विज्ञान में थी. दोनों के स्वभाव में भी काफी अंतर था. मार्क्स जहां तुनकमिजाज और बहुत जल्दी आपा खो देने वाला इंसान था, वहीं ऐंगल्स अपेक्षाकृत धैर्यवान और सोचसमझकर निर्णय लेता था. इन चारित्रिक भिन्नताओं के बावजूद दोनों के बीच गहरी और अटूट दोस्ती थी.

 

देमुट

जेनी और ऐंगल्स के अतिरिक्त एक तीसरा व्यक्ति और भी है, जिसका मार्क्स से अंतरंग संबंध था. वह थी, हेलेन लेंकन देमुट. देमुट मार्क्स की समवयस्का थी, और उसके घर नौकरानी का काम करती थी. मार्क्स की नौकरानी बनने से पहले सतरह वर्ष की जेनी टायर निवासी हेमुट जाॅन लुडविग वाॅन वेस्टफ्लान के घर नौकरी करती थी. जेनी काॅरलीन का जब मार्क्स से विवाह हुआ तो, देमुट भी जेनी के साथ उसके परिवार में चली आई. उन दिनों के सामंती परिवेश का अनुमान लगाया जा सकता है. भारत समेत पूरे यूरोप में स्त्री की यही अवस्था थी. खासकर नौकरानियां. संपन्नवर्ग के परिवार अपने घरों में काम करने वाली स्त्रियों का भी दहेज के रूप में लेनदेन करते रहते थे. यद्यपि मार्क्स दंपति के घर देमुट की हैसियत केवल नौकरानी तक सीमित नहीं थी. वह उनकी शुभचिंतक, सलाहकार, मित्र और नौकर सबकुछ थी. युवा मार्क्स भी उसके आकर्षण से बच न सका. 23 जून, 1851 को हेलेन देमुट ने मार्क्स के संपर्क से एक बच्चे को जन्म दिया, मगर वह कभी पिता का नाम न पा सका. सर्वहारा वर्ग को क्रांति के लिए प्रेरित करने वाला, ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत का जन्मदाता, श्रमिकों का हितचिंतक, महान दार्शनिक, क्रांतिकारी चिंतक और संवेदनशील कवि मार्क्स, अपने घर में देमुट के गर्भ से जन्मी अपनी औरस संतान को कभी अपना नाम न दे सका. तो भी धीरेधीरे देमुट के बच्चे को लेकर अफवाहें बढ़ती गईं. मार्क्स के आलोचकों के लिए उसको बदनाम करने का यह एक बेहतरीन अवसर था.

एक बार फिर ऐंगल्स मार्क्स का सखा और उद्धारक बनकर आगे आया. उसने खुद को देमुट के गर्भ से जन्मे बच्चे का पिता होने की घोषणा कर दी, ताकि मार्क्स और जेनी के संबंधों में किसी भी प्रकार की खटास न आए. मार्क्स के घर में रहने के कारण उसपर आरोप तो लगने ही थे, लगे, मगर ऐंगल्स ने अपनी जिंदादिली से उन सबको चुप रहने को विवश कर दिया. 1883 में मार्क्स की मृत्यु के पश्चात देमुट ऐंगल्स के घर में नौकरानी का काम करने लगी. 1890 में उस दयालु और परिश्रमी स्त्री को केंसर ने घेर लिया. ऐंगल्स ने उसका उपचार करने का भरसक प्रयास किया. लेकिन पहले अपनी मित्र जेनी कोरलीन और बाद में मार्क्स की मृत्यु से हताश देमुट की सेहत में कोई सुधार न हुआ. आखिर उसी वर्ष 4 नवंबर को बीमारी के कारण उसका निधन हो गया. उसको मार्क्स के परिवार के साथ दफनाया गया है.

ओमप्रकाश कश्यप

मार्क्स का राजनीतिक, धार्मिक एवं आर्थिक चिंतन

सामान्य

मार्क्सवादएक

कार्ल मार्क्स उन लेखकों में से था, जिनकी प्रतिष्ठा समय के साथसाथ निरंतर परवान चढ़ती जाती है. जिन दिनों वह युवा था, फ्रांस में प्रूधों के विचारों का बोलबाला था. उस समय के अधिकांश बुद्धिजीवी और सामाजिकराजनीतिक आंदोलन प्रूधों के ‘अराजकतावाद’ से प्रभावित थे. सामंतवाद और साम्राज्यवाद का उत्पीड़न झेल चुके लोगों द्वारा शासकविहीन राज्य की परिकल्पना की जा रही थी. हालांकि यह कोई अभिनव अभिकल्पना नहीं थी. ढाई हजार वर्ष पहले प्लेटो ऐसा ही सपना देख चुका था. प्राचीन भारत की वैराज्य की अवधारणा भी अराजकता से मिलतीजुलती थी. तो भी नया न होने के बावजूद, अराजकतावाद एक लुभावनी परिकल्पना थी, जिसको लेकर वुद्धिजीवियों के एक वर्ग में खासा उत्साह था. अराजकतावाद का प्रवर्त्तक प्रूधों खुद भी विलक्षण मेधा का स्वामी था. ‘संपत्ति चोरी है, व्यक्तिगत संपत्तिधारक चोर है…’ जैसे नारों से उसने पूंजीपतियों की खुलकर आलोचना की थी, जिसको बुद्धिजीवियों और आम जनता का खूब समर्थन मिला. प्रूधों के जीवनकाल में ही उसके समर्थकों और प्रशंसकों का बड़ा वर्ग था, वह स्वयं प्रखर विचारक था, इसलिए उसके जीवनकाल में मार्क्स को उतना महत्त्व नहीं मिल सका.

सच तो यह है कि वे मार्क्स की तैयारी, ज्ञान और जीवनानुभव बटोरने के दिन थे. वह आरंभ से ही गजब का पढ़ाकू था. युवावस्था में ही उसने प्राचीन यूनानी दार्शनिकों के साथसाथ आधुनिकतम दर्शनशास्त्रियों जिनमें कांट, देकार्त, जा॓न लाक, स्पिनोजा, लाइबिनित्ज, डेविड ह्यूम, हीगेल, फायरबाख, बायर आदि प्रमुख थे, का गहरा अध्ययन किया था. मगर उसको सर्वाधिक प्रभावित किया था, हीगेल के द्वंद्ववाद ने. अपने प्रसिद्ध दार्शनिक सिद्धांत में हीगेल ने सृष्टि के विकास को शुभ और अशुभ के शाश्वत द्वंद्व के माध्यम से समझाने का प्रयास किया था. उसने इन्हें परस्पर विरोधी शक्तियां मानते हुए दोनों के अनिवार्य संघर्ष की ओर संकेत किया था. हीगेल परम आस्थावादी था. उसका विश्वास था कि हर वस्तु स्वाभाविक रूप से परम की ओर अग्रसर है. इस कारण उसका अवरोधक शक्तियों से, जो अपनी अज्ञानता के आधार पर उसका विरोध करती हैं, संघर्ष अपरिहार्य है. हीगेल के अनुसार अज्ञानता का मूल ऐंद्रियक ज्ञान की अपूर्णता में निहित है. हीगेल का विचार था कि मानवेंद्रियों द्वारा उपलब्ध ज्ञान अपूर्ण होता है. पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना मानवेंद्रियों के सामथ्र्य से बाहर है. विरोधी शक्तियों के संघर्ष की कल्पना पश्चिमी दर्शन के लिए यद्यपि नई नहीं थी. बाइबिल पहले से ही पाप और पुण्य के शाश्वत संघर्ष की ओर संकेत कर चुकी थी. स्वर्ग से आदम का निष्कासन भी इसी संघर्ष की परिणति था.

बाइबिल की इस स्थापना पर सभी परंपरावादी विश्वास करते थे. इसमें निहित नकारात्मक भाव सृष्टि के मूल को आकस्मिक घटना बताते हुए, उसको पापबोध से जोड़ता था. उसी का डर दिखाकर पादरीवर्ग जनसाधारण को भरमाए रखता था. इस संबंध में हीगेल, जेकोब बोह्म (Jakob Boehme, 1575 – 1624) से प्रभावित था. पेशे से मोची का काम करने वाले बोह्म सृष्टि के मूल में शाश्वत पाप की उपस्थिति से इनकार करता था. स्थानीय जर्मन भाषा में लिखी गई अपनी पुस्तक ‘वेग जू क्रिस्टो’ जिसका अंग्रेजी अनुवाद है ‘दि वे टू क्राइस्ट’, में बोह्म ने सृष्टि की उत्पत्ति को परमसत्ता की सोचीसमझी और रचनात्मक योजना बताया था, जिसके अनुसार मानवमात्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिए वह उसको सृजनात्मकता से परिपूर्ण करना चाहती थी. अपने विचारों के लिए बोह्म को स्थानीय प्रशासन और परंपरावादियों के तीव्र विरोध का सामना करने के साथ, तदनुसार निष्कासन का दंड भी भोगना पड़ना था. बोह्म से प्रभावित हीगेल ने द्वंद्ववाद का उपयोग सृष्टि की उत्पत्ति संबंधी व्याख्या और तत्संबंधी तात्विक विवेचन के लिए किया था. उसका चिंतन विषय की दार्शनिक गवेषणा तक सीमित था. मार्क्स ने हीगेल के द्वंद्ववाद को जमीन पर लाते हुए उसको समाज में व्याप्त धार्मिकसामाजिक ऊंचनीच और शोषणकारी प्रवृत्तियों की व्याख्या का माध्यम बनाया. धार्मिकराजनीतिक दबावों की उपेक्षा करते हुए उसने सामाजिक असमानता के कारणों की ऐतिहासिकवैज्ञानिक आधार पर व्याख्या की, और जीवन के प्रति भौतिकवादी दृष्टिकोण को महत्त्व दिया.

यूरोप में पूंजीवाद मार्क्स के जन्म पहले ही अपने पांव जमा चुका था. जिन दिनों उसका जन्म हुआ, पूंजीवाद के दुष्परिणाम सामने आने लगे थे. लोगों में उनके विरुद्ध सांगठनिक चेतना उभरने लगी थी. पूंजीवाद से मुक्ति के लिए जगहजगह प्रयास हो रहे थे. संघर्ष के एक छोर पर मजदूर और कामगार थे, अपनी गरीबी और शोषण से त्रस्त. दूसरे छोर पर पूंजीपति थे. किसी जमाने के जमींदार और सामंतगण जो उससे पहले भी आम जनता का शोषण करते हुए आए थे, अब वे मशीनीकरण का लाभ उठाकर पूरी दुनिया की पूंजी पर कब्जा जमाने में लगे हुए थे. उनका निजी जीवन विलासितापूर्ण था. उत्पादनकर्म उनके लिए केवल पूंजी बटोरने का आयोजन था. इसलिए अपने कारखानों में वे मजदूर विरोधी तकनीक का उपयोग करते थे. पूंजीवादी उत्पादन परंपरागत तकनीक पर आधारित उत्पादनव्यवस्था से एकदम अलग था, जब उत्पादन को जीवन की जरूरत के रूप में लिया था और उत्पादक समाज का स्वाभाविक हिस्सा होता था.

अपनी तीक्ष्ण दृष्टि से मार्क्स ने भांप लिया कि समाज में उत्पादक और उपभोक्ता, शोषक और शोषित, अमीर और गरीब, पूंजीपति और सर्वहारा के बीच स्पष्ट विभाजन है. दूसरे शब्दों में हीगेल जिस सत्य का दर्शन सृष्टि की व्याख्या के निमित्त कर रहा था, मार्क्स को वही सत्य समाज के बीच दिखाई पड़ता था. लेकिन मार्क्स यदि केवल हीगेल तक ही सीमित रहता तो उसका चिंतन अकादमिक बहसों तक सिमटकर रह जाता. हीगेल एक प्रतिभाशाली दार्शनिक था. समकालीन विद्वान भी उसको सर्वाधिक जटिल मानते थे. मार्क्स के पास दार्शनिक का दिमाग और आंदोलनकारी का दिल था. उसके विचारों पर हीगेल के अतिरिक्त अनेक समकालीन और पूर्ववर्ती विद्वानों का प्रभाव था. असल में वह कुछ ऐसा ही था जैसे अलगअलग खानों कुछ रसायन निकालकर नियति उन्हें एक बारूद का रूप दे दे. जबकि मार्क्स के कुछ विचार तो बारूद से भी अधिक प्रभावकारी माने गए हैं.

मार्क्स के विचारों को समग्रता से आत्मसात करने के लिए उसके प्रेरणास्रोतों के बारे में जानना आवश्यक है. मार्क्स के प्रमुख प्रेरणास्रोतों में प्लेटो, हीगेल के अलावा वाल्तेयर, रूसो, एडम स्मिथ, रिकार्डो, प्रूधों, फायरबाख, ब्रूनो बायर आदि सम्मिलित हैं. इनमें फायरबाख और बायर हीगेल के ही शिष्य थे. बायर धर्म के राजनीतिककरण का प्रबल विरोधी था. जबकि फायरबाख धर्म और राजनीतिक के मानवीय संबंधों को महत्त्व देते हुए उन्हें परस्पर करीब लाने का पक्षधर था. इनके अलावा मार्क्स ने अपने मित्र और सहयोगी ऐंगल्स से भी काफी कुछ ग्रहण किया था.

ऐतिहासिक भौतिकवाद

जार्ज विल्हेम फ्रैड्रिक हीगेल(17701831) ने राजनीति, दर्शन, विज्ञान, धर्म, इतिहास, समाज तथा कलाओं के विकास की व्याख्या के लिए द्वंद्वात्मकता के सिद्धांत को अपनाया था. मार्क्स हीगेल की निष्कर्ष तक पहुंचने की इस प्रविधि से प्रभावित था. प्राचीन ग्रीक दार्शनिकों ने भी इस युक्ति का उपयोग किया था. इस प्रविधि के आधार पर ऐतिहासिक विकासक्रम की व्याख्या करते हुए मार्क्स ने कहा था कि साम्यवाद कोई आधुनिक व्यवस्था नहीं.यह सृष्टि के आरंभ में भी था तथा पूंजीवादी उत्पीड़न का दौर समाप्त होने पर उसकी पुनःवापिसी सुनिश्चित है. मार्क्स के अनुसार सभ्यता के आरंभ में साम्यवाद की प्राथमिक अवस्था थी— सीधी और सरल. प्रकृति के सान्निध्य में जीने वाले, छोटेबड़े कबीलों में बंटे हुए लोग एकदूसरे की जरूरतों को समझते हुए संसाधनों का साझा करते थे. अर्थव्यवस्था सरल और पूरी तरह विकेंद्रीकृत थी. लोग मिलजुलकर आमसहमति के आधार पर निर्णय लेते थे. उस अवस्था में न कोई शोषक था न शोषित. जीवन पूरी तरह प्रकृतिआश्रित था. इसलिए उसमें अनिश्चितता भी थी. लोग सामूहिक रूप से शिकार करते थे. कभी शिकार मिलता था कभी नहीं. कालांतर में अपने अनुभवों का लाभ उठाते हुए आदमी ने भविष्य के लिए बचाना आरंभ कर दिया. यह बचत जबतक भोजनसामग्री की सुरक्षा तक सीमित थी, तब तक तो सबकुछ ठीकठाक रहा. बहुत जल्दी उस व्यवस्था की कमजोरियां सामने आने लगीं.

कालांतर में व्यापार में मुद्राओं और धातुओं का प्रचलन बढ़ने लगा. वस्तु विनिमय का मुद्राआधारित तरीका काफी आसान था. धातु की बनी मुद्राओं को लंबे समय तक सहेजे रखना, दूर तक लानाले जाना संभव था. कबिलाई जीवन में जिसकी बाजुओं में ताकत होती, जो दौड़कर शिकार को मार गिरा सकता था, जिसका निशाना अचूक होता, वह बहादुर और सम्मान का पात्र समझा जाता था. मगर मारे हुए शिकार को बहुत दिनों तक सुरक्षित रख पाना असंभव था. बाकी जरूरतें सीमित थीं. इसलिए उस दौर में मुद्रा आवश्यकता नहीं थी; या कहें कि बिना किसी किसी मुद्रा के उनका काम चल जाता था. पशु उत्पादों की अपेक्षा कृषि उत्पादों को अधिक दिनों तक सहेजा जा सकता था. मनुष्य की आवश्यकताएं भी बढ़ी थीं. बदली परिस्थितियों में यह संभव नहीं था कि व्यक्ति अपनी आवश्यकता की सभी वस्तुओं का उत्पादन कर सके, इसलिए समाज में एक शिल्पकार वर्ग का उदय होने लगा, जो अपने हस्तकौशल से लोगों की जरूरतों को पूरा करने में समर्थ थे. साथ ही विपणन की पुरातन पद्धति जो वस्तुओं के सहज आदानप्रदान पर आधारित थी, से असुविधा होने लगी, जिससे मुद्रा के उपयोग को बढ़ावा मिला.

नई मुद्रा के प्रचलन से बहादुरी और कौशल के मायने ही बदलने लगे. अब जिसके पास संपत्ति थी, वह बिना कुछ किए दूसरों से अपनी जरूरत की वस्तुओं का विनिमय कर सकता था. अर्जित मुद्राओं के दम पर वह अपने लिए भोजनवस्त्रादि खरीद सकता था. अपने लिए बहादुरों को खरीद सकता था. सेवादार जुटा सकता था. मुद्रा को सहेजना, लानाले जाना सुविधाजनक था. इसलिए समाज में पूंजीआधारित विषमताएं पनपने लगी थीं. कबिलाई जीवन में अपंग और बीमार व्यक्तियों को छोड़कर हर व्यक्ति श्रम करता था. मगर पूंजी के उदय के साथ समाज में ऐसे वर्ग तेजी से विकास होने लगा था, जो केवल अपनी संपत्ति के बूते दूसरों से सेवा और सुविधाएं खरीद सकता था. संपत्ति के आधार पर उसको विशेषाधिकार प्राप्त थे. वह निष्क्रय और परजीवी वर्ग था, जो दूसरों के श्रम पर विलासिता आधारित जीवन जीता था. अभिप्राय है कि संपत्ति और संसाधनों के संचय की जिस प्रवृत्ति का जन्म भविष्य को आकस्मिक बाधाओं से बचाने के लिए हुआ था, कालांतर में उसका उपयोग दूसरों पर अधिपत्य बनाए रखने के लिए किया जाने लगा.

समाज में संपत्तिसंचय के प्रति लोगों की ललक बढ़ी तो आर्थिकरूप से संपन्न लोगों ने निर्धनविपन्न वर्ग को गुलाम बनाना आरंभ कर दिया. उस समय राज्य छोटे, मात्र नगरों तक सीमित थे. मार्क्स ने इसे ‘दास समाज’ कहा है, यानी विकास की वह अवस्था जिसमें कबिलाई समाज नगरराज्य में परिवर्तित होने लगता है. शक्तिशाली होने का एहसास, संपत्ति का अतिरेक तथा सत्ता का घमंड, इन सबका मिलाजुला रूप शीर्षस्थ वर्ग के विलासी जीवन का कारण बना. भविष्य के प्रति सुरक्षा के एहसास से विलासिता के नएनए रूप सामने आने लगे, जो प्रकारांतर में अभिजात वर्ग के उद्भव और उसकी स्वतंत्र पहचान का कारण बने. उस समय तक अर्थव्यवस्था मुख्यतः देशदेशांतर के व्यापार पर निर्भर थी. व्यापारियों के काफिले दूर देश तक आतेजाते थे. उन्हीं के साथ सभ्यता और संस्कृति की यात्रा भी चलती रहती थी. जब तक व्यापार अर्थव्यवस्था का मूल था, तब तक नगरराज्य की व्यवस्था विकासमान रही.

कालांतर में कृषि का विकास हुआ. आरंभ में कृषिकर्म निजी श्रम पर निर्भर था.धीरेधीरे उसमें पशुश्रम का उपयोग बढ़ने लगा. इससे कृषिकर्म अपेक्षाकृत आसान हो गया. बढ़ती जनसंख्या के पोषण के लिए अधिक अनाज की जरूरत थी. इसके लिए कृषि के नए क्षेत्रों की तलाश की जाने लगी. बड़ेबड़े कृषि फार्म और आश्रम बनाए जाने लगे, जो पशुबल के सहारे कृषि को अंजाम देते थे. उससे पहले तक धनार्जन का अभिप्राय मात्र धातुई मुद्रा जमा कर लेने तक सीमित था. मगर बदली परिस्थितियों में सिर्फ धातुओं को सहेजना बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं था. भोजन के लिए अनाज की जरूरत थी. अतिरिक्त अनाज को बेचकर अपने लिए पूंजी का इंतजाम किया जा सकता था. इसलिए समाज के एक वर्ग ने अनुकूल कृषिभूमि पर कब्जा जमाना आरंभ कर दिया, जो प्रकारांतर में सामंतवाद का उद्भव का कारण बना. अभिजातवर्ग के रूप में स्थापित लोग शासकवर्ग में तथा व्यापारी वर्ग शनैशनै पूंजीपति वर्ग में बदलने लगा. विकास की इस तीसरी अवस्था को मार्क्स ने जागीरदारी की संज्ञा दी है, जिसमें समाज के मुट्ठीभर लोग संसाधनों पर कब्जा जमाए रखकर बाकी लोगों पर हुक्म चलाने लगे थे. इसका परिणाम समाज के वर्गीय विभाजन के रूप में सामने आया, जो कालांतर में सामंतवाद के रूप में पहचाना गया.

विकास की चौथी और अनिवार्य अवस्था के रूप में मार्क्स ने पूंजीवाद का उल्लेख किया है. इसमें जागीरदारी प्रथा अपना औचित्य खो देती है. उन्नत प्रौद्योगिकी द्वारा सघन उत्पादन आरंभ से होने से उत्पादनव्यवस्था में पूंजी का दखल बढ़ने लगता है, जो उत्पादनप्रक्रिया पर एकाधिकार को बढ़ावा देता है. यह प्रवृत्ति बढ़तेबढ़ते नैतिकता की सीमाएं पार करती जाती है. समाज के संसाधनों पर वर्गविशेष का अधिकार होने लगता है. पूंजी का केंद्रीयकरण अथवा पूंजीवाद समाज में प्रशासक वर्ग की नींद हराम करने लगता हैं. उसके आगे शासनतंत्र कमजोर पड़ता जाता है. दूसरी ओर पूंजीवादी कारखानों में नौकरी करने वाला मध्यवर्ग कालांतर में बड़ी ताकत कर रूप धारण कर लेता है. अपनी शिक्षा और तकनीकी कौशल के बल पर यह वर्ग शासक और पूंजीपति को प्रभावित करने की ताकत रखता है. लेकिन इस वर्ग की कमजोरी है कि यह आपस में बंटा होता है. इसका बड़ा और शक्तिशाली हिस्सा पूंजीपति वर्ग की सुरक्षा में जुटा होता है. यह अपने बुद्धिसामथ्र्य का बड़ा हिस्सा, श्रमकौशल के सहारे आजीविका कमाने वाले वर्ग, जिससे वह स्वयं ऊपर उठकर आया है, को दबाने के लिए करता है. यही पूंजीवाद को शोषण के नएनए तरीके सुझाता है.

कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ में मार्क्स ने इस वर्ग को बुर्जुआ की संज्ञा दी है. मजदूरोंकिसानों का वह वर्ग जिसके पास आजीविका का मुख्य माध्यम अपना श्रम है, को मार्क्स ‘सर्वहारा’(प्रोलेतरियत) कहता था. मार्क्स के अनुसार बुर्जुआ और सर्वहारा के बीच संघर्ष पूर्णतः स्वाभाविक और अवश्यंभावी है. यह ऐतिहासिक क्रम का सहज हिस्सा है. कम्युनिस्ट मेनीफेस्टों में उसने लिखा है—

सामंतवाद की राख से जन्मा आधुनिक बुर्जुआ समाज वर्गसंघर्ष की अनिवार्यता से बच नहीं सकता. उस समय तक उसके बीच से शोषण की नई स्थितियां, नए वर्ग और नएनए संघर्ष जन्मते ही रहते हैं. हमारा युग, जो असल में बुर्जुआ समाज का युग है, इसका प्रमुख गुण वर्गप्रतिद्विंद्वता है. वर्गीय प्रतिद्विंद्वता के निरंतर बढ़ते क्रम में संपूर्ण समाज दो परस्पर विरोधी, दुश्मनों की भांति एकदूसरे के आमनेसामने डटे हुए वर्गों में बंटता ही जाता है. उन वर्गों का नाम है—बुर्जुआ और प्रोलेतरियत.’1

मार्क्स के दर्शन में बुर्जुआ (Bourgeoisie) और प्रोलेतरियत(Proletariat) शब्द अनेक बार प्रयुक्त हुए हैं. इन शब्दों को परिभाषित करते हुए ‘दि कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो’ में उसने लिखा है कि—

बुर्जुआ का आशय नवोदित पूंजीपतियों, उत्पादक कारखाना मालिकों तथा अपने उद्यमों में मजदूरों को नौकरी पर रखने वाले नियोक्ताओं से है. जबकि प्रोलेतरियत का अभिप्राय उन आधुनिक श्रमजीवी मजदूरों से है जिनके पास सिवाय अपने श्रम के, आमदनी/उत्पादन का कोई और जरिया नहीं है, अतएव अपनी आजीविका के लिए श्रम बेचना उनकी विवशता है.’2

बुर्जुआ और सर्वहारा के बीच एक अंतर यह भी होता है कि बुर्जुआ वर्ग की आंखों में सपने होते हैं, जिन्हें वह किसी न किसी तरह बनाए रखना चाहता है. जबकि सर्वहारा भविष्य से बचकर लगभग डरते हुए, सिर्फ वर्तमान को किसी तरह जी लेने को ही जीवन माने रहता है. इस वर्ग की आंखों में सपने का अवतरण अंततः क्रांति का बीजारोपण करता है. उस समय अपनी हैसियत बनाए रखने के लिए बुर्जुआ वर्ग मनमानी पर उतर आता है. इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप कामगारों के एक वर्ग में संघर्षचेतना का जन्म होता है. श्रमिक अपने अधिकारों के लिए संगठित होने लगते हैं. इससे बुर्जुआ वर्ग में पड़ने लगती है. सर्वहारा के मन में पल रहे आक्रोश का लाभ उठाने के लिए उसका एक वर्ग उनमें वर्गसंघर्ष की चेतना भरता है. विकास की यह पांचवी अवस्था श्रमिककामगारों के तानाशाहीपूर्ण रवैये से समझी जा सकती है. अगली अवस्था क्रांति की है. श्रमिकों के आक्रोश तथा अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की प्रेरणास्वरूप मध्यवर्ग क्रांति का आवाह्न करता है, जिसको व्यापक लोकसमर्थन प्राप्त होता है. क्रांति की सफलता श्रमिकों को सत्ता में भागीदारी का अवसर प्रदान करती है. मगर अर्से तक सामंतवादी वातावरण में जीते आए श्रमिक वर्ग के जीवन और कार्यशैली पर किसी न किसी रूप में सामंतवाद का प्रभाव होता है, जिसके परिणामस्वरूप सर्वहारा वर्ग अथवा उसके समर्थन पर टिकी सरकारें प्रारंभ में तो उसी का अनुसरण करती हैं. मगर धीरेधीरे उनमें स्वतंत्र आत्मचेतना विकसित होने लगती है, जिससे पूरा समाज साम्यवाद की ओर बढ़ने लगता है. मार्क्स के सपनों का साम्यवाद पूरी तरह वर्गहीन और राज्यविहीन समाज था, जिसमें सभी को समान अधिकार प्राप्त होते हैं. वहां राजाप्रजामालिकमजदूर सभी का भेद समाप्त हो जाता है.

स्पष्ट है कि मार्क्स का राजनीतिक दर्शन मात्र वर्गसंघर्ष तक सीमित नहीं था. बल्कि राजनीतिक दर्शन के केंद्रीय विचार के रूप उसने जिस साम्यवाद की परिकल्पना की थी, अपने आदर्शरूप में समाजवाद से कहीं अधिक स्पष्ट एवं कल्याणकारी अवस्था है. हीगेल का मानना था कि मनुष्यता के इतिहास की विशेषता छोटेछोटे आंदोलनों का एक बड़े और भरोसेमंद आंदोलन के रूप में उभरना है. इसको मनुष्यता के विवेकीकरण की घटना भी कहा जा सकता है. अमेरिका में प्रचलित दासप्रथा का जोरदार शब्दों में विरोध करते हुए उसने कल्पना की थी कि सभ्यता के विकास के चरण में एक ऐसा दिन अवश्य आएगा जब ईसाई राष्ट्र दासप्रथा का जुआ अपने कंधोें से उतार फेंकेंगे. मार्क्स द्वारा जर्मन आदर्शवाद, ब्रिटेन के राजनीतिक अर्थदर्शन तथा फ्रांसिसी समाजवाद की आलोचना मुख्यतः फायरबाख और हीगेल से ही प्रेरित थी.

वस्तुतः मार्क्स का दर्शन हीगेल सूक्ष्म और अमूर्त्त आदर्शवाद को यथार्थ और भौतिकजगत के स्तर पर परिभाषित करने का प्रयास किया, जिसमें उसको पर्याप्त सफलता भी मिली थी. उसने लिखा था कि वह हीगेल के वुद्धिकेंद्रित प्रत्ययवादी आंदोलन को जमीनी स्तर पर ले आना चाहता है. मार्क्स फायरबाख की इस उक्ति से प्रभावित था कि ईश्वर वास्तव में मनुष्य की रचना है. शुभता के वे सभी लक्षण जिन्हें सामान्यतः ईश्वर में निहित माना जाता है, यह माना जाता है कि ईश्वर के बिना उनकी मौजूदगी असंभव है, वास्तव मनुष्यता की पहचान हैं. अपने गुरु हीगेल के तत्वचिंतन को भौतिक आधार देते हुए मार्क्स का कहना था कि भौतिक जगत एक सचाई है. हमारे विचार मात्र इसकी परिणति हैं, न कि विश्व की उत्पत्ति का कारण. इस प्रकार हीगेल तथा अन्य दार्शनिकों की देखादेखी मार्क्स ने आभासी जगत तथा वास्तविकता के अंतर को महत्त्व दिया है. उसने इस मान्यता का खंडन किया था कि भौतिक जगत हमसे छिपा रहता है. इसके विपरीत उसका मानना था कि ऐतिहासिकसामाजिक आदर्शवाद लोगों को अपने जीवन की वस्तुनिष्ट समीक्षा करने से रोकता है.

मार्क्स और दोनों का मानना था कि इतिहास और समाजविज्ञान के वैज्ञानिक अध्ययन द्वारा सामाजिक अंतद्र्वंद्वों तथा उनकी प्रवृत्तियों के कारणों की पहचान की जा सकती है. यद्यपि मार्क्स के कुछ अनुयायी उसके विचारों के आधार पर यह दावा करने लगे थे कि साम्यवादी क्रांति एक अपरिहार्य और सुनिश्चित घटना है. जबकि मार्क्स इसे समस्त बुद्धिजीवियों के लिए चुनौती मानता था. फायरबाख पर लिखे गए अपने छोटेछोटे निबंधों ‘थीसिस आॅन फायरबाख’ में उसने साफतौर पर लिखा था कि—

दार्शनिकों ने इस संसार की भिन्नभिन्न प्रकार से मात्र व्याख्या ही की है, लेकिन असल चुनौती तो इसको बदलने की है.’3

एक ईमानदार और प्रतिबद्ध आंदोलनकारी की भांति वह आजीवन दुनिया को बदलने का प्रयास करता रहा. उसका लेखन भाग्यवाद पर नहीं टिका है. बल्कि उसमें सच्चे आंदोलनकारी का आत्मविश्वास और संकल्प नजर आता है. मार्क्स का मानना था कि क्रांतिकारी को अपना जीवन समाज को बदलने के लिए समर्पित कर देना चाहिए. अपने विचार को उसने पूरी ईमानदारी एवं निष्ठा के साथ जिया. उसके लेखन में जहां एक दार्शनिक जैसी मौलिकता है, वहीं आंदोलनकारी का तेज भी है. दुनिया में ऐसे बहुत कम जीनियस हुए हैं, जिनके विचार और कर्म में इतनी एकरूपता हो.

हीगेल के अतिरिक्त मार्क्स पर बैंथम, जेम्स मिल, एडम स्मिथ, प्रूधों, देकार्ते, डेविड रिकार्डो आदि विचारकों का भी पूरा प्रभाव था. हालांकि अपने समय के इन दोनों महान अर्थशास्त्रियों से मार्क्स का रिश्ता असहमति का था. स्मिथ की पहचान पूंजीवाद के समर्थक अर्थशास्त्री के रूप में थी. जबकि मार्क्स घोषित रूप में पूंजीवाद का प्रखर आलोचक था. स्मिथ ने न्यायशास्त्र की समीक्षा पर लिखे गए आलेख ‘लेक्चर आ॓न ज्युरिशप्रूडेंश’ में सभ्यता के ऐतिहासिक विकास के चार प्रमुख पड़ावों का उल्लेख किया था. उसने लिखा था कि अपनी विकासयात्रा के क्रम में मनुष्यता जिन चार प्रमुख स्तरों से गुजरती है, वे हैं—

1. आखेटक युग: यह सभ्यता की अर्वाचीन अवस्था है, जब मनुष्य कबीलों के रूप में धरती पर यहां से वहां विचरण करता रहता था. गुफाओं में जीवन बसर करता था. भोजन के लिए वन्यजीवों के शिकार पर निर्भर था. कालविभाजन की भारतीय परंपरा में इतिहासकारों द्वारा इस युग को पूर्वपाषाण युग (3500 ईस्वी पूर्व) और पाषाणयुग कहा गया है.

2. पशुपालन युग: उत्तरपाषाण युग(3500 ईस्वी पूर्व से लेकर 1700 ईस्वी पूर्व तक) में आदिमानव को आग जलाना सीख चुका था. इस बीच उसको हिंò पशु और पालतु पशुओं के बीच भेद मालूम हो चुका था. उसने उपयोगी पशुओं को अपने काफिले के साथ रखना आरंभ कर दिया था. इस पशुओं से उसको भोजन और वस्त्र की प्राप्ति होती थी. इस युग में विपणन के लिए आदानप्रदान प्रणाली मुख्य थी. पशुपालन व्यवस्था में भी जीवन प्रकृति के निकट था. भोजन की तलाश में पशुओं के साथसाथ उसकी अविरत यात्राएं चलती ही रहती थी. यही सभ्यता के स्थानांतरण और उसके विकास का कारण था.

3. कृषि युग: एडम स्मिथ अनुसार आखेटक युग सामयिक बदलावों से गुजरता हुआ कालांतर में पशुपालन युग में बदल गया. अपने काफिले के साथ विचरते मनुष्य को अपने साथसाथ पशुओं के भोजन की व्यवस्था भी करनी पड़ती थी. इसलिए वह प्रायः उन्हीं स्थानों पर पड़ाव डालता था, जहां पशुओं के लिए पर्याप्त चारापानी हो. धीरेधीरे उसने प्रकृति की उर्वरा शक्ति को पहचानना आरंभ कर दिया. खेती की शुरुआत पशुओं के लिए चारा उगाने के काम से हुई थी. किंतु अतिशीघ्र मनुष्य ने समझ लिया कि उर्वरा धरती न केवल पशुओं के लिए बल्कि उसके अपने भोजन की व्यवस्था करने में भी सक्षम है. इसलिए उसने अपनी जरूरत की वस्तुओं को उपजाना आरंभ कर दिया.इससे भारत जैसे देशों में एक और जहां गांवों और पुरों का विकास हुआ, वहीं स्वतंत्र आश्रमव्यवस्था भी पनपी, जिसके संस्थापक ऋषिगण जंगल में प्रकृति के सान्न्ध्यि में रहकर तत्वचिंतन करते थे. उन आश्रमों की व्यवस्था पशुपालन और कृषि पर संयुक्तरूप से निर्भर थी. आर्थिक स्वायत्तता के चलते वे आश्रम ज्ञान के मौलिक अनुसंधान के केंद्र बन सके. उन्हीं की प्रेरणा कालांतर में कृषि युग की आधारशिला बनी. एडम स्मिथ लिखता है—

इस तरह हम पाते हैं कि लगभग सभी देशों में समाज पशुपालन युग से कृषि की ओर मुड़ा है….लेकिन जैसेजैसे जनसंख्या में विकास हुआ, मनुष्य ने खुद को स्वाभाविक रूप से कृषिकर्म के प्रति समर्पित कर दिया. कालांतर में समाज का फिर विकास हुआ. इस चरण में मनुष्य उपलब्ध वस्तुओं के बदले उन वस्तुओं का विपणन करने लगा, जो उसके लिए अपेक्षाकृत अधिक जरूरी थीं.’4

मार्क्स ने एडम स्मिथ के विचारों की खिल्ली उड़ाते हुए उन्हें कल्पना की उड़ान कहा था. उल्लेखनीय है कि स्मिथ की भांति हीगेल ने भी मानव समाज के ऐतिहासिक विकास को पूर्वी, ग्रीक, रोमन एवं जर्मन में विभाजित किया था, किंतु उसने विकासक्रम को द्वंद्वात्मकता के सिद्धांत के द्वारा दर्शाया था. कालांतर में यह विचार भौतिक द्वंद्ववाद के नाम से जाना गया. विश्व के महानतम दार्शनिकों में से एक हीगेल ने अपने समकालीन और बाद के कमोबेश सभी विद्वानों को प्रभावित किया था. हीगेल की मृत्यु के बाद उसके समर्थक दो वर्गांे में बंट गए. एक वे जो प्रचलित धर्म एवं राजनीति से संतुष्ट थे तथा उन्हीं में संशोधन की कामना करते थे. दूसरे वर्ग के लोग सामंतवाद को पूंजीवादी व्यवस्था में ढलते देख नाखुश थे. समाज में बहुसंख्यक वर्ग के कल्याण के लिए वे उसमें आमूल परिवर्तन चाहते थे. इस वर्ग के विचार उग्र और क्रांतिकारी थे.

दूसरे समूह में मार्क्स के अतिरिक्त लुडबिग फायरबाख, ब्रूनो बायर, मैक्स स्टिमर, मोसेस होस तथा ऐंगल्स प्रमुख थे. इन सब विद्वानों के बीच भी पारस्परिक सहमतियां और असहमतियां थीं. मगर एक बात पर ये सभी एकमत थे कि समाज में व्याप्त विसंगितयों और असमानताओं के निदान के लिए उसमें व्यापक बदलाव की जरूरत है. मार्क्स हीगेल के ऐतिहासिक तत्ववाद से प्रभावित था. हीगेल का मानना था कि मनुष्यता का इतिहास उसके छोटेछोटे खंडों की संपूर्णता की ओर यात्रा है. इसलिए यथार्थ और इतिहास को एकदूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखना चाहिए. हर वस्तु अपने परमलक्ष्य को पाने के लिए लालायित रहती है. यह एक क्रांतिकारी स्थापना थी. क्योंकि उसके पहले पूर्व और पश्चिम के प्रायः सभी समाज अपनी अस्मिता की खोज के लिए इतिहास और अतीत की शरण लेते थे तथा अपनी ऐतिहासिक मान्यताओं, भले ही उनमें मिथकीय तत्वों की कितनी ही बहुलता हो, को प्रामाणिक मानते हुए उनपर पूरा विश्वास भी करते हो. भारत समेत लगभग सभी ऐशियाई समाजों में यह प्रवृत्ति और भी उग्र, लगभग घातक रूप में मौजूद थी. हीगेल आदर्शवाद में विश्वास रखता था, किंतु मार्क्स ने उसके विचारों को भौतिकवादी आधार पर परखा था. अपनी पुस्तक ‘ए कंट्रीब्यूशन टू दि क्रिटीक आ॓फ पा॓लिटीकल इकाना॓मी’ की भूमिका में उसने लिखा था—

अपने अस्तित्व और सामाजिक विकास की सुदीर्घ परंपरा में मनुष्य ने अपनी इच्छा से एकदम स्वतंत्र कुछ सुनिश्चित रिश्ते, जिन्हें उत्पादनसंबंध कहा जा सकता है, स्थापित किए हैं. ये संबंध भौतिकवादी उत्पादन शक्तियों का आधार मजबूत करने के लिए पर्याप्त हैं. समाज की आर्थिक संरचना इन्हीं उत्पादकसंबंधों द्वारा निर्धारित होती है, तथा उसकी शेष संरचनाओं के लिए नींव का काम करती है. उसके ऊपर वैधानिक और राजनीतिक महासंरचनाएं आकार लेती रहती हैं. उन्हीं के अनुसार सामाजिक चेतना का विकास होता है. भौतिक उत्पादन को दिशा देने वाला तंत्र ही सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक परिवेश को निर्धारित करता है. मनुष्य की चेतना उसके अस्तित्व को नहीं गढ़ती, बल्कि उसका सामाजिक अस्तित्व ही उसकी चेतना को आकार देता है.’5

हीगेल के तत्ववादी चिंतन को भौतिक जीवन की समस्याओं और विसंगतियों के आधार पर परखने की प्रेरणा उसको फायरबाख से मिली थी, जिसका मानना था कि लोगों के सामाजिकराजनीतिक विचार ही उनकी संपूर्ण चेतना और वास्तविक जरूरतों की नींव बनते हैं. वह मानता था कि प्राणीमात्र अपने परिवेश की उपज है तथा उसकी संपूर्ण चेतना मानवेंद्रियों की, बाह्यः दुनिया के साथ सतत संवाद की देन है. अपनी पुस्तक ‘दि ऐसेंन्स आॅफ क्रिश्चिनिटी’ में फायरबाख ने ईश्वर को मनुष्य की निर्मिति बताते हुए उसके गुणों को मनुष्यता का सहज लक्षण सिद्ध किया था. देखा जाए तो यह ईश्वर की सत्ता को चुनौती थी, क्योंकि उससे पहले धर्म की नैतिक मान्यताएं उसकी स्वीकृति का पर्याप्त आधार रही थीं.

फायरबाख द्वारा समाज की भौतिकवादी व्याख्या ने मार्क्स और एंेगल्स दोनों को ही प्रभावित किया था. उसे विस्तार देते हुए मार्क्स ने कहा था कि दृश्यमान संसार ही वास्तविक है और तत्संबंधी हमारे विचार ही वैश्विक चेतना हैं, न कि उसका कारण. हीगेल और अन्य आदर्शवादी दार्शनिकों की भांति मार्क्स ने भी वास्तविक जगत और दृश्यमान विश्व में अंतर स्वीकार किया था. हालांकि वह इस बात पर विश्वास करने को तैयार नहीं था कि भौतिक वस्तुएं मनुष्य को दुनिया के वास्तविक ज्ञान से परे ले जाती हैं. मार्क्स की यह विचारधारा तत्कालीन धार्मिक मान्यताओं के विपरीत थी. अतएव धर्माचार्यों द्वारा उसका विरोध स्वाभाविक था.

मार्क्स का मानना था कि मनुष्य के प्रचलित सामाजिकऐतिहासिक बोध ने उसके भौतिक जगत से संबंधित सोच को प्रदूषित किया है. मगर वह फायरबाख की भांति मनुष्यता को पूर्णतः निराकार और अमूत्र्त मानने के लिए तैयार नहीं था. न ही वह उसमें बदलाव की आवश्यकता से इनकार करता था. उसने कहा था कि सांस्थानिक क्रिश्चिनिटी अर्थात चर्च में ईश्वर की अभिकल्पना करना, प्रकारांतर में धार्मिक तानाशाही को बढ़ावा देना है. 1846 में प्रकाशित पुस्तक ‘दि जर्मन आइडियोला॓जी’ में मार्क्स और ऐंगल्स ने संयुक्तरूप से लिखा था कि—

जर्मन(पश्चिम) की दार्शनिक परंपरा के विपरीत जो मनुष्य के स्वर्ग से धरती पर आने की बात कहती है, हम उसके धरती से स्वर्ग तक आरोहण पर जोर देते हैं. हमारे निष्कर्ष जैविक वास्तविकताओं, आंदोलनरत महापुरुषों तथा उनके असल जीवन की प्रेरणाओं की देन हैं. इनके माध्यम से हम जीवन के प्रति अपने संकल्पों तथा उसकी प्रतिध्वनियोंप्रतिरूपों का निरूपण करते हैं….धर्म, नैतिकता, तत्वविज्ञान, आदर्शवाद तथा मानवीय अंतश्चेतना के तत्संबंधी सभी संकल्प, स्वतंत्रता के विभिन्न सादृश्योंप्रतिरूपों को सहेजने में असमर्थ होते हैं. उनका अपना कोई इतिहास, विकास की कोई स्वस्थ परंपरा नहीं होती. लेकिन मनुष्य अपनी सभ्यता और संप्रेषणीयता के साथसाथ अपने विचार तथा उसके परिणामों के अनुरूप सतत विकासशील रहता है. हम कह सकते हैं कि जीवन चेतना से निर्धारित नहीं होता, बल्कि चेतना मनुष्य के सोच तथा उसके उत्पादों द्वारा आकार ग्रहण करती है.’6

मार्क्स का सक्रिय जीवन में विश्वास था. कोरे विचारों में उसका विश्वास न था. वह चाहता था कि बुद्धिजीवियोंविचारकों को अपने लेखन के अलावा वास्तविक धरातल पर भी काम करना चाहिए. उसने स्वयं भी सक्रिय और आंदोलनकारी जीवन जिया था. उसका हर कदम चाहे वह लेखन हो या आंदोलन में हिस्सेदारी, समाज में आमूल परिवर्तन की वांछा से प्रेरित था. सामाजिक व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता पर जोर देते हुए उसने कहा था कि—

दार्शनिकों ने इस संसार की व्याख्या तरहतरह से की है. असल बात तो इसको बदलने की है.’7

इन शब्दों से मार्क्स उसकी अपने विचारों के प्रति आस्था की झलक मिलती है. मार्क्स ने दर्शन को आकादमिक बहसों से बाहर लाकर उसको जमीनी स्तर पर खड़ा करने का युगांतरकारी कार्य किया था, जहां वह अपनी कल्याणकारी भूमिका में था. कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो में, फ्रांसिसी क्रांति से कुछ ही महीने पहले उसने दुनियाभर के मजदूरों को पूंजीवादी शोषण के विरुद्ध एकजुट होने का आवाह्न किया था—

सर्वहारा के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवाय कुछ नहीं है, लेकिन जीतने के लिए दुनिया पड़ी हैदुनिया के सर्वहाराओ, एक हो जाओ!’8

मार्क्स के ये शब्द संसारभर के शोषितों और उत्पीड़ितों के लिए मुक्तिमंत्र बन गए. उसके आवाह्न की तत्काल प्रतिक्रिया हुई थी. मजदूर संगठनों ने पूंजीवाद का सामना करने के लिए अभूतपूर्व एकता का प्रदर्शन किया. ‘प्रथम इंटरनेशनल’ तो श्रमिक नेताओं की निजी महत्त्वाकांक्षाओं, हठधर्मी और स्वार्थपरताओं का शिकार होकर बिखरने लगा था, मगर लोगों के बीच मार्क्स के विचार उत्तरोत्तर स्वीकृति प्राप्त करते चले गए. उसके बाद जो क्रांतिधर्मी एकता की लहर उठी, उसने फ्रांस, रूस आदि देशों में सामंती व्यवस्थाओं को उखाड़ फेंकने का कार्य किया. यही क्यों उसके विचार किसी न किसी रूप में आज भी दुनिया की आधी आबादी के बीच सम्मानित जगह बनाए हुए हैं. बल्कि पिछले कुछ दशकों में पूंजीवाद के बढ़ते प्रकोप के बीच लोगों को मार्क्स के विचार, एक बार फिर प्रासंगिक आने लगे हैं.

धर्मसंबंधी विचार

कार्ल मार्क्स की वैचारिक दृढ़ता देखते ही बनती थी. अपने विचारों पर उसे पूरा भरोसा था. उन्हें तात्कालिक अभिव्यक्ति देने से भी वह नहीं सकुचाता था. एक ओर जहां वह समान विचारधाराओं को अपने चिंतनविमर्श का हिस्सा बनाता था, वहीं विरोधी मान्यताओं से अपनी असहमति को तत्काल व्यक्त करने में भी उसको झिझक नहीं थी. चाहे उससे वरिष्ठ अराजकतावादी विचारक प्रूधों हो या नवहीगेलीयनवादी ब्रूनो बायर, मैक्स स्टीमर अथवा फायरबाख. इन सबसे उसका बौद्धिक संवाद निरंतर चलता रहता था. ये सभी विद्वान उस समय के यूरोप में अपनी बौद्धिक प्रखरता के कारण धाक जमाए हुए थे. इनमें मैक्स स्टीमर, बायर और फायरबाख दोनों का आलोचक था. मार्क्स इन सभी से कई मामलों में प्रभावित था, कई स्थान पर उनसे गंभीर असहमतियां भी थीं. उसके पांडित्य का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि फायरबाख, ब्रूनो बायर और प्रूधों, और मैक्स स्टीमर चारों से ही अपनी असहमति दर्शाते हुए उसने अलगअलग पुस्तकों की रचना की थी. उसकी पुस्तक ‘हिस्टोरिकल मैट्रीयलिज्म’ मैक्स स्टीमर की पुस्तक ‘दि जर्मन आइडियोला॓जी’ का आलोचनात्मक विस्तार थी.

बायर धर्म को राजनीतिक स्वतंत्रता के रास्ते में बाधक मानता था. वह धर्म के उन्मूलन के बिना वास्तविक राजनीतिक स्वतंत्रता को असंभव मानता था. यह बात उसने यहुदियों को धर्म के आधार पर राजनीतिक स्वतंत्रता दिए जाने के प्रश्न पर कही थी. बायर की मान्यता थी कि राजनीतिक स्वतंत्रता केवल धार्मिक रूप से निरपेक्ष राष्ट्रराज्य में ही संभव है; अर्थात ऐसा राज्य जहां स्वतंत्र सामाजिक पहचान, जैसे धर्म, जाति, वर्ण आदि के लिए कोई स्थान न हो. यहुदियों की स्वतंत्र राज्य की मांग पर उसने कहा था कि इस प्रकार की मांगे ‘मानवाधिकारों’ के असंगत हैं. उसका मानना था कि राजनीतिक स्त्रतंत्रता के लिए धर्म का उन्मूलन अपरिहार्य है और यदि यहूदी अपने लिए राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग करते हैं, तो उन्हें अपनी विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं का उन्मूलन करना होगा, ताकि वे समाज के बाकी लोगों के साथ घुलमिल सकें. उसने जोर देकर कहा था कि वास्तविक धार्मिक स्वतंत्रता केवल धर्म के उन्मूलन पर ही टिकी है.

मार्क्स का धर्म में यद्यपि कोई विश्वास नहीं था. फिर भी जनसाधारण की धर्म के प्रति आस्था को देखते हुए वह इस मामले में उदार कानून बनाए जाने के पक्ष में था, विशेषकर उस अवस्था तक, जब तक कि मनुष्यमात्र में इस बारे में पर्याप्त जागरूकता नहीं आ जाती. बायर की आलोचना करते हुए उसने कहा था कि यह कहना अनुचित है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य में धर्म सामाजिक जीवन में अपनी प्रासंगिकता खो देगा. उसने संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा था कि प्रूशिया की भांति वह धार्मिक राज्य नहीं है. लेकिन धर्मनिरपेक्ष अमेरिकी नागरिकों के सामाजिक जीवन में धर्म की महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता.

धर्मनिरपेक्षता की सीमाओं को दर्शाते हुए उसने जोर देकर कहा था कि—

धर्मनिरपेक्षता के आधार पर गठित राज्य धर्म का विरोध नहीं करते, वस्तुतः वे तो उसकी सत्ता को स्वीकार चुके होते हैं. नागरिकों की धार्मिक अथवा संपत्ति संबंधी मान्यताओं के उन्मूलन का अर्थ, धर्म अथवा संपत्ति का वास्तविक उन्मूलन नहीं है. यह केवल मनुष्यमात्र को उन सब वस्तुओं की ओर से अनमन्यस्क कर देने की नाकाम कोशिश करने जैसा है.’9

अपने निबंध में मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि धर्मनिरपेक्ष राज्य में नागरिक आध्यात्मिक और राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होने के बावजूद आर्थिक असमानता के कारण शोषण और उत्पीड़न के शिकार बन सकते हैं. मार्क्स के ये विचार आगे चलकर पूंजीवाद विरोधी दर्शन के रूप में और भी खुलकर सामने आए थे. अपने निबंध ‘आॅन दि ज्युश क्वश्चन, 1844’ में बायर की आलोचना करते हुए उसने कहा था कि वह राजनीतिक स्वतंत्रता एवं सामाजिक स्वतंत्रता में अंतर करने में नाकाम रहा है. उसका तर्क था कि आधुनिक राष्ट्रराज्य में राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अपनी धार्मिक मान्यताओं का परित्याग अनिवार्य नहीं है. जैसा कि अमेरिका में हो रहा है. धार्मिक उन्मूलन केवल धर्म के स्थान पर मनुष्यता की स्थापना से संभव है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में, पूंजी की मनमानी के चलते वह एकाएक संभव नहीं है. न ही यह अभी तक विश्वइतिहास में संभव हो पाया है. इस निबंध का दूसरा खंड यहूदी और ईसाई धर्मों की मान्यताओं को लेकर था. पहले खंड की अपेक्षा इस छोटे खंड में मार्क्स ने यहूदियों और ईसाइयों की धार्मिक मान्यताओं का का तुलनात्मक अध्ययन किया था.

बायर ने लिखा था कि यहूदियों के लिए अपनी धार्मिक मान्यताओं को छोड़ना अपेक्षाकृत ज्यादा कठिन है. इस बारे में उसका तर्क था कि यहूदी धर्म, ईसाई धर्म से प्राचीन, उसका पूर्वज है. बल्कि ईसाई धर्म की उत्पत्ति ही यहूदी धर्म से हुई है. इसलिए धर्म से पूर्ण छुटकारा पाने के लिए जहां ईसाइयों को जहां मात्र एक पड़ाव करना होगा, वहीं यहूदियों को उसके लिए दो मंजिलें तय करनी होंगी. इसलिए कि अतीत के दबाव उनके ऊपर ज्यादा है.

बायर के तर्क का उत्तर देते हुए मार्क्स ने कहा था कि यहूदी धर्म उन विशेषताओं को नजरंदाज दिया जाना चाहिए, जिनकी ओर बायर ने इशारा किया है, इसलिए कि वे यहूदियों के आर्थिक जीवन को आध्यात्मिक नजरिये से पेश करती हैं. यह व्याख्या मार्क्स की भौतिकवादी दृष्टि के अनुरूप थी. उसी दृष्टि में सामाजिक परिवर्तन के लिए आर्थिक कारण अन्यान्य कारणों की अपेक्षा अधिक कारगर होते हैं. वह मानता था कि धर्म ने वास्तविक विकास की राह में अवरोधक का कार्य किया है. इस विवेचना को आधार बनाकर मार्क्स के आलोचकों ने उसे यहूदी धर्म का विरोधी सिद्ध करने का प्रयास किया है. बायर और मार्क्स के बीच लेखकीय वादविवाद चलता ही रहा. मार्क्स का मानना था कि पूंजीवाद के बढ़ते प्रभाव ने विशिष्ट धार्मिक पहचानों को गौण कर दिया है. लोग आर्थिक लाभ के लिए धार्मिक सीमाएं तोड़ रहे हैं. आम यहूदी की धनार्जन के प्रति तीव्र ललक और यूरोपीय देशों में पूंजी के प्रति आपाधापी को देखते हुए अंत में वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ईसाई लोग यहूदी बन चुके हैं. अब यह मनुष्यता(यहूदी और ईसाई दोनों) पर है कि वह खुद की व्यावहारिक यहूदीवाद से रक्षा करे—

यहूदी ने स्वयं को यहूदीपन से ही मुक्त किया है, न केवल इसलिए कि वह आर्थिक ताकत हासिल कर चुका है, बल्कि इसलिए भी कि उसके द्वारा और उसके बिना भी अर्थसत्ता वैश्विक सत्ता हासिल कर चुकी है तथा यहूदी का स्वभाव ईसाई राष्ट्रों का व्यावहारिक स्वभाव बन चुका है. यहूदीगण आज भी मुक्त हैं, इसलिए कि ईसाई राष्ट्र स्वयं यहूदी बन चुके हैं.’10

आ॓न दि ज्युश क्वश्चन’ में यहूदियों के धार्मिकआर्थिक जीवन के बारे में की गई टिप्पणियों के कारण मार्क्स को ‘यहूदी विरोधी’ माना गया. मार्क्स के निबंध से प्रेरणा ग्रहण करते हुए हयाम मेकोबी ने कहा था कि आधुनिक व्यावसायिक दुनिया यहूदीवाद की विजय है. उसका संकेत दुनिया में पूंजी के लगातार बढ़ते वर्चस्व तथा उसके कारण जनसाधारण में धनार्जन के प्रति बढ़ती जा रही स्पर्धा की ओर था. उसने यहूदी धर्म को नकली धर्म की संज्ञा दी, जिसके लिए ‘धन ही ईश्वर’ है. मेकोबी का मानना था कि मार्क्स यहूदियों की पृष्ठभूमि से प्रभावित था, इसलिए उसने यहूदियों को ‘बुराई का प्रतीक’ माना है. उस समय तक समाज में यहूदियों की छवि एक धनलोलुप व्यक्ति की बनी हुई थी. शेक्सपियर से लेकर चाल्र्स डिकेन्स तक सभी ने यहूदियों का चित्रण समाज के खलनायक के रूप में किया था, जनमानस के बीच आम यहूदी की छवि कंजूसशोषक साहूकार जैसी थी, जिसके लिए धनसंपत्ति और मुनाफा बटोरना ही सबकुछ है. उस समय के अधिकांश बुद्धिजीवियों की तरह मार्क्स भी मानता था कि—

यहूदीगण पूंजीवाद के समर्थक और समस्त बुराइयों का प्रतिनिधित्व करने वाले हैं.’11

मार्क्स ने धर्म को शोषण का माध्यम माना है. साधारणजन धर्म के भुलावे में रहकर अपने शोषण एवं आर्थिक दुर्दशा के वास्तविक कारणों से अनजान रहते हैं. वह मानता था कि पूंजीपतिवर्ग जनसामान्य की धार्मिक आस्थाओं का लाभ उठाकर उनका आर्थिक शोषण करता है. इसलिए धर्म को अफीम की संज्ञा देते हुए उसने श्रमिकों को उससे मुक्त होने की सलाह दी थी.

आर्थिक चिंतन

मार्क्स का आर्थिक चिंतन उसके द्वारा लिखित ‘पूंजी’ नामक ग्रंथ में विस्तार सहित सामने आया है. तीन खंडों में लिखे गए इस वृहद गं्रथ का केवल पहला भाग ही मार्क्स के जीवनकाल में प्रकाशित हो पाया था. शेष दो खंड उसके मित्र और सहयोगी ऐंग्लस के प्रयासों से क्रमशः 1885 और 1894 में प्रकाशित हो पाए थे. इस ग्रंथ में उसने पूंजीवादी व्यवस्था की उत्पादन पद्धतियों, कारकों तथा उनके माध्यम से श्रमशोषण की स्थितियों का विवरण पेश किया है. वह इस तथ्य से सहमत था कि मनुष्य का स्वभाव सतत परिवर्तनशील होता है. सामाजिक परिवर्तन की शाश्वत प्रक्रिया को उसने ‘श्रम’ तथा उसके उत्पाद में बदलने की योग्यता को ‘श्रमशक्ति’ की संज्ञा दी है.

मार्क्स का मानना था कि श्रम का उत्पाद में बदलना मूलतः शारीरिक एवं मानसिक अभिक्रिया है. उसने श्रमसंगठनों से जुड़े इतिहास का गहन अध्ययन किया था. मानवेतिहास के सूक्ष्म विश्लेषण के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि यूरोपीय पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का विकास सामंती अर्थव्यवस्था की देन है. पूंजी और संसाधनों के दम पर उन्होंने उत्पादनव्यवस्था को कब्जा लिया है. उसका मानना था कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में उत्पादन प्रविधियां और तत्संबंधी तकनीक, उत्पादनसंबंधों की अपेक्षा क्षिप्र गति से परिवर्तित होती हैं.

उदाहरण के लिए मोबाइल या डीटीएच टेलीविजन सेवाओं को ले सकते हैं. पूंजीवादी संस्थानों के लाभ के सिद्धांत पर टिकी तकनीक एवं शोध संस्थान इस काम में लगातार लगे रहते हैं. शोध की निरंतर चलने वाली गतिविधियों के बीच लाभोन्मुखी आविष्कार और तकनीकी सुधार इतनी तेजी से होते हैं कि उनका व्यावसायिक उपयोग करने हेतु समाज में जगह बनानी पड़ती है. पूंजीप्रधान संस्थानों के लिए यह उनकी व्यावसायिक नीति का हिस्सा होता है, मगर त्वरित तकनीकी विकास का लाभ समाज का एक ही वर्ग उठा पाता है. जनसंख्या अनुपात की दृष्टि से यह बहुत कम होता है. सामाजिक विकास और आर्थिक विकास के बीच असंतुलन की स्थिति सामाजिक अंतद्र्वंद्वों को जन्म देती है. एक तत्वविज्ञानी के रूप में मार्क्स सामाजिक वर्गों को पूर्णतः वस्तुनिष्ठ मानने को तैयार न था. दरअसल वर्ग से उसका आशय एक जैसी परिस्थितियों में रह रहे जनसमुदाय से नहीं था. वर्ग की विषयनिष्ठ तरीके से व्याख्या करते हुए मार्क्स ने उसे सामाजिक विकासक्रम की देन माना है. कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो का पहला ही वाक्य है—

शुरुआत से लेकर अब तक के सभी समाजों का इतिहास, वस्तुतः वर्गसंघर्ष का इतिहास रहा है.’12

साधारण जन अपनी योग्यता, अपनी कार्यक्षमता और उपलब्ध संसाधनों का कैसे उपयोग करें? क्या वे अपने श्रमकौशल यानी अपने निकटतम संसाधन के उपयोग एवं उनकी विशेषताओं को पूरी तरह समझते हैं? मार्क्स इस समस्या के प्रति बेहद गंभीर था. उसका मानना था कि श्रमशोषण का एक कारण श्रमिकवर्ग की अज्ञानता और श्रम के लाभों के प्रति उसकी उदासीनता भी है. सर्वहारा वर्ग जिसके पास संसाधन के रूप में केवल अपने श्रम की पूंजी होती है, वह श्रम की उपयोगिता तथा उसका पूर्ण लाभ उठाने के तरीकों से प्रायः अनजान होता है. पूंजीपतिवर्ग भी एक साजिश के रूप में श्रमिक को श्रम की उपयोगिता एवं लाभों से विमुख किए रहता है. पूंजीवाद जैसेजैसे सशक्त होता है, श्रमिकवर्ग की अपने श्रम और उसके लाभों के प्रति असंप्रक्तता लगातार बढ़ती ही जाती है. इसके विपरीत वह पूंजीपतिवर्ग की उपलब्धियों के प्रति निरंतर मोहाविष्ठ होता जाता है. उत्पादन प्रक्रिया के दौरान वह उत्पाद से इतना अंतरंग हो जाता कि उसके विकास और समाज में उसकी मांग को अपना मान लेता है. इस भ्रम का उपयोग पूंजीपति निहित स्वार्थों के निमित्त करता है.

मार्क्स के अनुसार यह संभव है कि किसी श्रमिक को उसके श्रम के पूर्णाधिकार दे दिए जाएं. विचारणीय यह है कि क्या श्रमिक अपने श्रम का पूरा लाभ उठाने की स्थिति में है? मार्क्स का मानना था कि श्रमिक को श्रम के लाभों और उसकी उपयोगिता से विमुख कर देना इस छूट पर पानी फेर सकता है. यह एक प्रकार की आत्मिक हानि है, जिसके अंतर्गत किसी उत्पाद अथवा उपभोक्ता सामग्री के उत्पादन में लगा श्रमिकवर्ग उसके प्रति अंधभक्ति दर्शाने लगता है. वह यह मानने लगता है कि वस्तुविशेष के उत्पादन से जुड़ना उसके लिए प्रतिष्ठा का विषय है, भले ही उससे उसका आर्थिकसामाजिक जीवन उससे पूरी तरह अप्रभावित रहता हो. उत्पादविशेष के प्रति श्रमिक वर्ग की अंधश्रद्धा का उपयोग पूंजीपति वर्ग निहित स्वार्थों के लिए करता है.

मार्क्स के अनुसार यह वह अवस्था है जब किसी किसी वस्तु अथवा वस्तुओं, उपभोक्ता सामग्री आदि के उत्पादन में लगे लोग उस वस्तु अथवा उत्पादक सामग्री को अपने आचारव्यवहार और व्यक्तित्व का हिस्सा मान लेते हैं. दूसरे शब्दों में श्रमिक अपना श्रम और संसाधन ऐसी वस्तुओं के उत्पादनविपणन में खपाने लगता है, जिसका न तो उसकी उपयोगिता से कोई लेनादेना होता है, न वह अपने श्रमकौशल का कोई आर्थिकसामाजिक लाभ उठा पाता है. दूसरी ओर वह सदैव इस भ्रम में रहता है कि उस वस्तु का उत्पादन उसके लिए सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय है. और यह भी कि वस्तुविशेष का आदानप्रदान और समाज में उसका प्रचलन, उसके सामाजिक संबंधों को प्रतिबिंबित करता है. इससे उसका विकास रुक जाता है. मार्क्स ने इस प्रवृत्ति को प्रतिगामी अंधश्रद्धा का नाम दिया है.

उपभोक्ता सामग्री के प्रति जड़भक्ति को मार्क्स और ऐंगल्स ने ‘भ्रामक चेतना’ भी माना है, जिसके माध्यम से ‘आदर्शवाद’ को समझा जाता है. ‘आदर्शवाद’ शब्द का उपयोग भी यहां उसके परंपरागत अर्थों से हटकर किया गया है. इस शब्द से मार्क्स और ऐंगल्स का आशय समाज के किसी कालखंड विशेष में विशिष्ट वर्ग के वर्गीय हितों/स्वार्थों से था, जिसको अपनी अल्पज्ञता और भ्रम के कारण बाकी लोग सार्वभौमिक और चिरंतन मान लेते हैं. इससे वे उन कारणों की ओर से उदासीन हो जाते हैं, जो उनके आर्थिक पिछड़ेपन तथा सामाजिक अवनति का कारण रहा है. उनकी उदासीनता पूंजीपतिवर्ग को शोषण की नई नीतियां बनाने के लिए विवश कर देती है.

धर्मदर्शन

मनुष्यता के लंबे इतिहास में धर्म सदा ही मानवीय चेतना का हिस्सा रहा है. दुनिया के सैकड़ों युद्ध इसी के नाम पर लड़े गए हैं. उनमें करोड़ों लोगों की जानें गई हैं. करोड़ों घर से बेघर हुए हैं. उन युद्धों में से हालांकि अधिकांश राजनीति, अर्थ अथवा वर्चस्वभावना जैसे अधिकांश मामलों के लिए लड़े गए हैं. येनकेनप्रकारेण इनमें सामाजिक संसाधनों, हस्तशिल्प और श्रमशक्ति का दुरुपयोग ही हुआ है. तथापि समाज का वह वर्ग जो धर्म और परंपरा के माध्यम से समाज, राजनीति, अर्थसत्ता आदि के शिखर पर बने रहना चाहता है, वह गाहेबगाहे धर्म को ही इन सारी उपलब्धियों का मूल बताता रहता है. उसकी सारी कोशिशें लोगों को धर्मभीरू और भाग्यवादी बना देने की रहती हैं, ताकि उनका ध्यान ऐसे लोगों से हटा रहे, जो उनकी मेहनत और संसाधनों के बल पर मजे लूटते हैं और इस प्रकार जो उनकी दुर्दशा के वास्तविक जिम्मेदार हैं.

ईश्वर की प्रारंभिक संकल्पना भले ही आदि दार्शनिक जिज्ञासाओं की उपज रही हो, मगर जनसामान्य में उसकी व्याप्ति और उसको समाज और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बनाने के पीछे शीर्षस्थ वर्गों की शोषणवादी प्रवृत्ति का ही हाथ रहा है. यही कारण है कि वाल्तेयर, रूसो, नीत्शे, फायरबाख जैसे विचारक धर्म और ईश्वर की सत्ता को निरंतर चुनौती देते रहे हैं. भारत में भी निरीश्वरवादी लोकायतों की समृद्ध परंपरा रही है, जो सृष्टि को दृश्यमान जगत से परे कुछ भी मानने को तैयार न थे. यह बात अलग है कि धर्म और धर्माचार्यों को मिले राजनीतिक संरक्षण के कारण वे समाज में बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा करने में असमर्थ रहे हैं. बावजूद इसके समाज में लोकायतों की एक प्रच्छन्न परंपरा रही है. मार्क्स तो धर्म को एक प्रतिगामी शक्ति मानता था. अपने लेखों में उसने धर्म को अफीम की संज्ञा देते हुए सर्वहाराओं को उससे दूर रहने को कहा था.

मार्क्स की धर्मसंबंधी अवधारणा फायरबाख से प्रेरित थी. नवहीगेलीयनवादी फायरबाख की धर्म और ईश्वर संबंधी अवधारणा हीगेल के अध्यात्मबोध पर आधारित थी, जिसके अनुसार प्रत्येक कृति में उसके कृतिकार की चेतना समाहित होती है, तथा कृतिकार की सत्ता कृति से सदैव महत्तर होती है. प्रत्येक कृति मूलतः अपने रचनाकार में समाहित, उसकी चेतना का विस्तार होती है. फायरबाख की पुस्तक ‘दि ऐसेंस आ॓फ क्रिश्चिनिटी’ हीगेल के इसी अध्यात्मदर्शन को आगे बढ़ाती थी. मगर हीगेल की आध्यात्मिक चेतना का भौतिकवादी नजरिये से विश्लेषण करता हुआ फायरबाख इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि—

अपरिमेय की चेतना में लीन, सचेतन कर्ता अपनी मूल प्रकृति के अनुसार अपरिमित कर्म की सृष्टि करता है.’13

यह हीगेल के आदर्शवाद की प्रकृतिस्थ व्याख्या थी. यह उसके तत्ववादी चिंतन को भौतिकवादी आधार देता था. हालांकि हीगेल अपने इस प्रतिभाशाली अनुयायी के निष्कर्ष से असहमत था. इसलिए जब फायरबाख ने अपनी पुस्तक की प्रति हीगेल को भेजी तो उसने उसको लगभग उपेक्षित कर दिया था. संभवतः फायरबाख का अतिशय भौतिकवादी दृष्टिकोण, दर्शन में आदर्शवाद के समर्थक हीगेल को नापसंद था. पुस्तक के पहले खंड में धर्म के मूलतत्व की खोज करता हुआ फायरबाख जिस परिणाम पर पहुंचा उसको उसने ‘धर्म का वास्तविक अथवा मानवशास्त्रीय सारतत्व’ की संज्ञा दी थी. पुस्तक में उसने ईश्वर नामक प्रत्यय को ‘शाश्वत बोध का प्रतीक,’ ‘नैतिक उपस्थिति,’ ‘प्यार,’ आदि अनेक संज्ञाओं से विभूषित किया था. मगर अन्य अध्यात्मवादियों की भांति फायरबाख ईश्वर को सर्वेसर्वा मानने को तैयार न था, बल्कि वह उसको मानवीय चेतना का लघु संस्करण मानता था. उसके अनुसार पूर्ण चेतनासंपन्न मनुष्य के लिए ईश्वर एक मिथकीय परिकल्पना से अधिक कुछ नहीं है.

फायरबाख का मानना था कि मनुष्य ईश्वर से अधिक चेतनासंपन्न प्राणी है. दूसरों को जानने की योग्यता उसे ईश्वर से अधिक चेतना संपन्न सिद्ध करती है. अपने रोजमर्रा के व्यवहार में मनुष्य बहुतसी वस्तुओं के संपर्क में आकर अपनी विचारप्रक्रिया द्वारा उनके बारे में अपनी स्वतंत्र राय बना सकता है. ईश्वर के बारे में इसका कोई प्रमाण नहीं है. इसलिए फायरबाख ने तर्क द्वारा सिद्ध किया था कि मनुष्य से परे ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है. स्वर्गनर्क और पापपुण्य जैसी रूढ़िवादी धारणाओं पर पर प्रहार करते हुए उसने दावा किया था कि मनुष्य के सदगुण अपने आप में स्वर्ग हैं. वह स्वयं इतना योग्य है कि वह दिव्यता के लक्षणों को समझबूझ सके. धर्म के बारे में उसका मानना था कि मनुष्य के सत्कर्म और व्यवहार ही धर्म को दिव्य बनाते हैं. उनसे इतर धर्म की कोई महत्ता नहीं है—

‘‘इसलिए उस(फायरबाख)का दावा था कि, ‘यदि किसी मनुष्य को ईश्वर में संतोष मिलता है, तब वह उसमें अपनी ही तस्वीर देखेगा.’’14

फायरबाख के इन विचारों में प्राचीन यूनानी दार्शनिक जीनो के विचारों की छाया देख सकते हैं, जिसके अनुसार ईश्वर मात्र मानवीय संकल्पना है. यदि कुत्ते, बिल्लियों और दूसरे पशुपक्षियों को भी सोचनेसमझने की ताकत दे दी जाए और उनसे ईश्वर का चित्र बनाने को कहा जाए तो तत्संबंधी उनकी परिकल्पना उनके अपने कदकाठी और मनोभावों के अनुकूल होगी. फायरबाख के अनुसार धर्म में दिव्यता अथवा अतींद्रियता की खोज मनुष्य को ईश्वर की कल्पना तक ले जाती है, जिसके बारे में उसका मानना था कि वह प्रायः उन्हीं कार्यों दोहराता रहता है, जिन्हें मनुष्य पहले की पूरा कर चुका होता है. इससे भी यही सिद्ध होता है कि वह मानवनिर्मिति है. ईश्वर की अवधारणा की आलोचना करते समय फायरबाख यहीं शांत नहीं होता. उसने आगे कहा था कि—

ईश्वर अपने आप में सिवाय एक नकारात्मक सत्ता के और कुछ भी नहीं हैइसलिए कि मनुष्य के पास कल्पनाशक्ति है. ईश्वर मनुष्य द्वारा आविष्कृत होने के कारण मनुष्य की ही अनुकृति है.’15

इसी पुस्तक में फायरबाख ने ईसाई धर्म की आलोचना करते हुए लिखा था कि इतिहास के लंबे दौर में—

ईसाई धर्म न केवल तर्क और ज्ञान से दूर जा चुका है, बल्कि उसने मनुष्यता से भी किनारा कर लिया है.’16

फायरबाख द्वारा धर्म और ईश्वर की भौतिकवादी व्याख्याओं से मार्क्स बेहद प्रभावित था. उसने एक पुस्तक ‘थीसिस आ॓न फायरबाख’ भी लिखी थी, जिसमें उसकी विचारधारा को लेकर ग्यारह निबंध सम्मिलित थे. 1845 में लिखी वह पुस्तक 43 वर्ष बाद, 1888 में ही प्रकाशित हो सकी. उस समय तक मार्क्स की मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन यही वह समय था जब विश्वभर में मार्क्स के दर्शन को लेकर नएनए प्रयोग किए जा रहे थे. मार्क्स का दर्शन परिवर्तनकामियों के विमर्श का प्रमुख केंद्र बिंदू बना हुआ था, तथा उसके आधार पर लगातार सशक्त होते पूंजीवादसामंतवाद का सामना करने की तैयारी की जा रही थी. ब्रिटिश सत्ता निरंतर पराभव की ओर अग्रसर थी. उसके उपनिवेश अपनी आजादी और अस्मिता के लिए संघर्ष करते लोग मार्क्सवाद के सहारे नए जीवन का सपना देख रहे थे.

मार्क्स और ऐंगल्स दोनों ही फायरबाख की इस स्थापना से भी सहमत थे कि मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं की नींव उसके सामाजिक एवं राजनीतिक विचारों पर टिकी होती है. वह मानता था कि व्यक्तिमात्र अपने वातावरण की उपज है तथा उसकी संपूर्ण चेतना, बाह्यः दुनिया के साथ उसकी ज्ञानेंद्रियों के निरंतर चलने वाले संवाद का परिणाम है. इसलिए उसने जीवन में बदलाव के लिए समाज की यथार्थवादी व्याख्या को अत्यावश्यक माना है. फायरबाख की स्थापना कि ईश्वर वास्तव में मनुष्य की निर्मिति है तथा वे सभी सद्गुण जिन्हें ईश्वर का लक्षण बताया जाता है, वस्तुतः मनुष्य की ही चारित्रिक विशेषताएं हैं, मार्क्स के चिंतन का आधार थे. उसी के आधार पर ऐसे राज्यों की स्थापना तेजी से बढ़ रही थी, जिनमें धार्मिक हस्तक्षेप कम से कम हो.

फायरबाख के चिंतन को आगे बढ़ाते हुए मार्क्स ने कहा था कि ‘वस्तुजगत वास्तविक है, तथा हमारी संपूर्ण चेतना उसी की उपज है. हीगेल तथा अन्य दार्शनिकों की भांति मार्क्स भी दृश्यमान अर्थात आभासी और वास्तविक जगत को एकदूसरे से अलग मानता था, हालांकि वह फायरबाख की इस मान्यता को अस्वीकार करता था कि आभासी जगत मात्र आवरण है, जो वास्तविक सत्य को हमसे छिपाए रहता है. इसके सापेक्ष उसका मानना था कि मनुष्य के ऐतिहासिकसामाजिक संस्कार उसे इस वस्तुजगत को गहराई से देखने से रोकते हैं. फायरबाख की आलोचना करते हुए मार्क्स ने कहा था कि उसने मानवतावाद को तत्परता से समेटने का प्रयास किया है, इसलिए वह पाठक को उसकी प्रचलित धारणा से आगे नहीं ले जाता. उचित होता कि वह धर्म के बरक्स मानवता को ठोस विकल्प के रूप में स्थापित करता. ताकि धार्मिक शोषण के शिकार लोग मुक्ति की नई डगर पा सकें.

ईसाई धर्म की इस मान्यता कि परमात्मा चर्च में निवास करता है, का विरोध करते हुए उसने कहा था कि इस गलत धारणा ने राजनीति को व्यक्तिकेंद्रित बनाने का काम किया है. इसके विपरीत वह दर्शन को यथार्थवादी नजरिये से देखने का पक्षधर था. ‘दि जर्मन आइडियोलाॅजी’ में मार्क्स और एंेगल्स ने लिखा था—

जर्मनी की दर्शनपरंपरा के सीधे विरोध में, जो मनुष्य का स्वर्ग से धरा पर अवरोहण दर्शाती है, हम धरा से स्वर्ग तक आरोहण की बात करते हैं. किसी सर्वमान्य निष्कर्ष तक ले जाने के लिए हमारा मंतव्य वह नहीं है जैसा कि लोग कहते, कल्पना करते अथवा ग्रहण करते हैं—न ही हमारा मंतव्य उससे है जो लोगों ने अभी तक बताया, कल्पना की, ग्रहण किया, सोचाविचारा अथवा माना है. न वह है जैसा कि वे आपसी बातचीत में व्यक्त करते आए हैं. हमारे निष्कर्ष सच्चे, कर्मठ मनुष्य तथा उसके वास्तविक जीवनसंघर्ष का निकष् हैं. हमने विकासचक्र के आदर्शात्मक परिवर्तनों तथा उनकी प्रतिध्वनियों का निरूपण किया है. हमारा मानना है कि मानवमस्तिष्क में जन्म लेने वाले भ्रम भी अनिवार्यरूप से भौतिक जीवनचक्र, जो स्वतः प्रामाण्य और प्रयोगसिद्ध है, को प्रामाणिक रूप में ऊर्जस्वित और प्रेरित करते हैं. लेकिन नैतिकता, धर्म, तत्वविज्ञान, लोकादर्श तथा मानवीय संचेतनाओं के अन्य सभी रूप, स्वाधीनता के प्रतिरूपों को अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रख सकते. इसलिए कि उनका न तो कोई इतिहास है, न ही विकास की परंपरा, जबकि मनुष्य अपने भौतिक जीवन और तत्संबंधी आंतरिक संबंधों में लगातार सुधार करता जा रहा है. यही नहीं अपनी विचार प्रक्रिया तथा उसके परिणामों के साथ वह लगातार विकसित भी हो रहा है. इसलिए कि जीवन संचेतना से बंधा हुआ नहीं है, बल्कि चेतना जीवन से अनुबंधित है.’17

मार्क्स का भौतिकवादी चिंतन केवल दार्शनिक विवेचनाओं तक ही सीमित नहीं था. उसको लगता था कि इस तरह का आकादमिक चिंतन बहुत हो चुका है. अब उसकी सीमाआंे से बाहर आना होगा. इसलिए वह लेखन को व्यवस्था परिवर्तन का औजार बनाना चाहता था. उसका विचार था कि धर्म और अध्यात्म संबंधी मान्यताएं मजदूरों को वास्तविक मुद्दों से भरमाए रखती हैं. मार्क्स की धर्मसंबंधी अवधारणा उसके गहन अध्ययन और जीवनानुभव का परिणाम थी. यह मार्क्स ही था जिसने अपने काॅलेज के दिनों में लिखा था कि धर्म का प्राथमिक उद्देश्य सामाजिक एकता को बढ़ावा देना है. यही नहीं उन दिनों उसने धर्म के आदर्शात्मक कार्यों का विश्लेषण भी किया था, ताकि सामाजिक चेतना को अपेक्षित रूप दिया जा सके. उसने कहा था कि दर्शनशास्त्र का तात्कालिक कर्तव्य, जो इतिहास की सेवा ही होगी, यह है कि वह अपवित्र चेहरों से नकाब को अपने आप उतार फेंके. लंबे अनुभव के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि धर्म का वास्तविक कार्य समाज में आर्थिक असमानता को संरक्षण देना, बढ़ाना है. इसलिए वह व्यवस्था में आमूल बदलाव का पक्षधर था.

थीसिस आ॓न फायरबाख’ में उसने लिखा था कि—

दर्शनशास्त्रियों ने इस विश्व का उल्लेखभर किया है, असली चुनौती तो उसको बदलने की है.’18

केवल दार्शनिक समाज को बदल सकेंगे, वह इस भ्रम में नहीं था. उन्हें वह समाज की प्रेरक शक्ति मानता था. उसकी मान्यता थी कि समाज में वास्तविक बदलाव सर्वहारा वर्ग की अटूट एकता और उसके क्रांतिकारी प्रयासों से ही संभव है. मनुष्य की मुक्ति केवल निजी संपत्ति की अवधारणा के समाप्त होने पर ही हो सकती है. उसका धर्मसंबधी चिंतन उसकी एक अन्य पुस्तक ‘आॅन दि ज्यूश क्वश्चन, 1844’ में भी सामने आया है. यह पुस्तक उसने नवहीगेलीयनवादी ब्रूनो बायर की पुस्तक ‘ज्यूश क्वश्चन’ की आलोचना करते हुए लिखी थी. बायर का विचार था कि धर्मनिरपेक्ष राज्य में धर्म की कोई भूमिका नहीं होगी. इसकी प्रतिक्रिया देते हुए मार्क्स ने लिखा था कि धर्मनिरपेक्षता की भी सीमा होती है. धर्मनिरपेक्ष राज्य धर्म का विरोध नहीं करता, बल्कि परोक्षरूप में वह धर्म की सत्ता को स्थापित करता है. धर्मनिरपेक्षता की मान्यता में ही धर्म का समर्थन छिपा है. उसने आगे कहा कि धार्मिकता के लोप का अभिप्राय धर्म का विलोप हो जाना नहीं है. बल्कि यह व्यक्तिमात्र को उससे बच निकलने का रास्ता सुझाता है. लंबे चिंतन के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि धर्मनिरपेक्ष राज्य में लोग आध्यात्मिक तथा राजनीतिक रूप से मुक्त हो सकते हैं, मगर उनकी वास्तविक स्वाधीनता, उनकी आर्थिक असमानता के आधार पर बाधित हो सकती है. मार्क्स का मानना था कि बायर राजनीतिक मुक्ति और मानवमुक्ति में अंतर करने में नाकाम रहा है.

यहूदियों के बारे में ब्रूनो बायर के तर्क का खंडन करते हुए मार्क्स ने लिखा था कि आधुनिक समाज में धार्मिक बंधनों से मुक्ति के लिए मात्र राजनीतिक स्वतंत्रता ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके लिए संपूर्ण मानवमुक्ति की आवश्यकता है. हालांकि भारी आर्थिकसामाजिक ऊंचनीच से युक्त विश्व में यह अभी असंभव है. उपचार यही है कि सर्वहारा वर्ग संगठित होकर क्रांति का अवगाहन करे. ‘आ॓न दि ज्यूश क्वश्चन’ के दूसरे हिस्से में उसने बायर की इस मान्यता का विरोध किया था कि यहूदियों के लिए धर्म से मुक्ति ईसाइयों की अपेक्षा कठिन है. बायर का मानना था, चूंकि यहूदी धर्म ईसाई धर्म से पुराना है और ईसाई धर्म उसका निक्ष है, अतएव जहां ईसाइयों को धर्म से मुक्ति के लिए केवल एक चरण पार करना होगा, वहीं यहूदियों को दो चरणों के पार जाना होगा. इस साधारणीकरण का विरोध करते हुए मार्क्स का कहना था कि यह सामान्यीकरण यहूदियों के आध्यात्मिक सोच को एकदम नजंरदाज कर जाता है. यह यहूदियों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण विचार था, लेकिन बायर की आलोचना के समय धर्म के भौतिकवादी नजरिये से व्याख्या करते हुए मार्क्स ने यहूदियों के आर्थिक जीवन को लेकर कुछ ऐसी टिप्पणियां की थीं, जिनके कारण उसको यहूदियों का आलोचक माना गया. अपने पक्ष को स्पष्ट करने के लिए उसने सोलहवीं शताब्दी के विद्वान था॓मस मुंतजर से मदद दी थी. मार्टिन लूथर के समकालीन और उसके मुखर आलोचक मुंतजर संपत्ति के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि प्रकृति पर निजी संपत्ति का अधिकार हो जाने के बाद, वह केवल कल्पना में सिमट जाएगी. अपने विचारों को एक रूपक में बांधते हुए मुंतजर ने लिखा था कि—

देखो, हमारा सम्राट और सभी शासकगण आज सूदखोर साहुकारों, चोरों और डाकुओं के नीचे दबे हुए हैं, उन्होंने सभी चराचर को अपने कब्जे में कर लिया है, समुद्र में रहने वाली मछलियों, हवा में तैरने वाले पक्षियों तथा इस वसुंधरा के सभी उत्पादों को, सभी को वहां पहुंचना चाहिए.’19

मार्क्स को लगता था कि अपनी तमाम नैतिकतावादी घोषणाओं के बावजूद धर्म लोगों का आर्थिकसामाजिक और राजनीतिक शोषण करता है. इसलिए उसने मुंतजर की इस कल्पना को आगे बढ़ाते हुए कहा था कि—

सभी जीवजंतु संपत्ति में ढल चुके थे, समुद्र में मछलियां, आकाश में पक्षी और धरती पर पेड़पौधे सब, मगर हर प्राणी, यहां तक कि जीवजंतुओं को भी, मुक्त होना चाहिए.’20

यह मुक्ति धर्म से मुक्ति में ही संभव है. यहूदियों की मुक्ति के प्रश्न पर उसने कहा था कि—

यहूदी खुद को यहूदीवादी तरीके से मुक्त कर चुका है. उसने न केवल वित्तीय सामथ्र्य प्राप्त कर लिया है, इसके साथ ही क्योंकि उसके द्वारा और उसके अलावा भी धन आज वैश्विक तातक बन चुका है तथा एक यहूदी की व्यावहारिक आत्मा ईसाई राष्ट्रों की पहचान बन चुकी है. यहुदियों ने स्वयं को मुक्त कर दिया है, और अब ईसाई लोग यहूदी बन चुके हैं.’21

मार्क्स की धर्म के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि वाल्तेयर, रूसो, फायरबाख, ब्रूनो बायर जैसे उद्भट विद्वानों की देन थी. मगर उसकी विशेषता है कि उसने अपने विचारों को छिपाया नहीं, बल्कि कदमकदम पर श्रमिकों को शोषण के प्रति आगाह करते हुए धर्म से मुक्त होने, उससे दूर चले जाने का आवाहन करता रहा. उसकी निगाहों में एक महान साम्राज्य का सपना छिपा हुआ था. एक ऐसा साम्राज्य जिसमें धर्म या संपत्ति के आधार पर किसी प्रकार की ऊंचनीच या पक्षपात न हो. लोग एकदूसरे को चाहें और आपस में एक परिवार की भांति संवाद कर सकें. जिसमें सभी बराबर हों, धर्म, जाति, क्षेत्रीयता आदि के नाम पर किसी भी प्रकार की बंदिश या बंटवारा न हो.

ओमप्रकाश कश्यप

शब्दानुक्रमणिका

1. The modern bourgeois society that has sprouted from the ruins of feudal society has not done away with class antagonisms. It has but established new classes, new conditions of oppression, new forms of struggle in place of the old ones Our epoch, the epoch of the bourgeoisie, possesses, however, this distinct feature: it has simplified class antagonisms. Society as a whole is more and more splitting up into two great hostile camps, into two great classes directly facing each other — Bourgeoisie and Proletariat. Manifesto of the Communist Party By Karl Marx and Fredrick Engels.

2. By bourgeoisie is meant the class of modern capitalists, owners of the means of social production and employers of wage labour. By proletariat, the class of modern wage labourers who, having no means of production of their own, are reduced to selling their labour power in order to live. [Engels, 1888 English edition]

3. “philosophers have only interpreted the world, in various ways; the point however is to change it”, Marx Theses on Feuerbach.

4. we find accordingly that in almost all countries the age of shepherds preceded that of agriculture . . . But when a society becomes numerous . . . they would naturally turn themselves to the cultivation of land . . . As society was farther improved . . . they would exchange with one another what they produced more than was necessary for their support. –Adam Smith 1978: Lecture on Jurisprudence)

5. In the social production of their existence, men inevitably enter into definite relations, which are independent of their will, namely relations of production appropriate to a given stage in the development of their material forces of production. The totality of these relations of production constitutes the economic structure of society, the real foundation, on which arises a legal and political superstructure and to which correspond definite forms of social consciousness. The mode of production of material life conditions the general process of social, political and intellectual life. It is not the consciousness of men that determines their existence, but their social existence that determines their consciousness. – Marx in A Contribution to the Critique of Political Economy, 1859.

6. In direct contrast to German philosophy, which descends from heaven to earth, here we ascend from earth to heaven…. We set out from real, active men, and on the basis of their real life process we demonstrate the development of the ideological reflexes and echoes of this life process…. Morality, religion, metaphysics, all the rest of ideology and their corresponding forms of consciousness, thus no longer retain the semblance of independence. They have no history, no development; but men, developing their material production and their material intercourse, alter, along with this, their real existence, their thinking, and the products of their thinking. Life is not determined by consciousness, but consciousness by life. – Marx & Engels in The German Ideology, 1846.

7. the philosophers have only described the world, in various ways, the point is to change it” Marx in Theses on Feuerbach (1844).

8. The proletarians have nothing to lose but their chains. They have a world to win…WORKING MEN OF ALL COUNTRIES, UNITE! Marx and Engels, The Communist Manifesto, 1848.

9. the “secular state” is not opposed to religion, but rather actually presupposes it. The removal of religious or property qualifications for citizens does not mean the abolition of religion or property, but only introduces a way of regarding individuals in abstraction from them -Marx On the Jewish Question, 1844.

10. The Jew has emancipated himself in a Jewish manner, not only because he has acquired financial power, but also because, through him and also apart from him, money has become a world power and the practical Jewish spirit has become the practical spirit of the Christian nations. The Jews have emancipated themselves insofar as the Christians have become Jews.- Marx On the Jewish Question, 1844.

11. Jews were the embodiment of capitalism and the representation of all its evils. Edward H. Flannery. The Anguish of the Jews: Twenty-Three Centuries of Antisemitism. Paulist Press. (2004). p. 168

12. The history of all hitherto existing society is the history of class struggles.-Marx, The Communist Manifesto, Chapter 1.

13. In the consciousness of the infinite, the conscious subject has for his object the infinity of his own nature”- Ludwig Feuerbach, The Essence of Christianity (German: Das Wesen des Christentums), 1841.

14. If man is to find contentment in God,” he claims, “he must find himself in God.- Ludwig Feuerbach, The Essence of Christianity.

15. God is no longer anything more to him than a negative being….because man is imaginative….God is a part of man through the invention of a God.’

16. Christianity has in fact long vanished not only from the reason but from the life of mankind.” Feuerbach.

17. In direct contrast to German philosophy, which descends from heaven to earth, here we ascend from earth to heaven. That is to say, we do not set out from what men say, imagine, conceive, nor from men as narrated, thought of, imagined, conceived, in order to arrive at men in the flesh. We set out from real, active men, and on the basis of their real life process we demonstrate the development of the ideological reflexes and echoes of this life process. The phantoms formed in the human brain are also, necessarily, sublimates of their material life process, which is empirically verifiable and bound to material premises. Morality, religion, metaphysics, all the rest of ideology and their corresponding forms of consciousness, thus no longer retain the semblance of independence. They have no history, no development; but men, developing their material production and their material intercourse, alter, along with this, their real existence, their thinking, and the products of their thinking. Life is not determined by consciousness, but consciousness by life. – Marx & Engels, The German Ideology (1846).

18. the philosophers have only described the world, in various ways, the point is to change it”.- Marx,Theses on Feuerbach (1844).

19. Look ye! Our sovereign and rulers are at the bottom of all usury, thievery, and robbery; they take all created things into possession. The fish in the water, birds in the air, the products of the soil – all must be theirs (Isaiah v.)^ Thomas Müntzer: Hoch verursachte Schutzrede, or Apology, 1524, Alstedter, English translation cited from Karl Kautsky: Communism in Central Europe in the Time of the Reformation, 1897, Chapter 4, VIII. Münzer’s Preparations for the Insurrection.

20. that all creatures have been turned into property, the fishes in the water, the birds in the air, the plants on the earth; the creatures, too, must become free. Marx 1844, On the Jewish Question.

21. The Jew has emancipated himself in a Jewish manner, not only because he has acquired financial power, but also because, through him and also apart from him, money has become a world power and the practical Jewish spirit has become the practical spirit of the Christian nations. The Jews have emancipated themselves insofar as the Christians have become Jews. Marx 1844:

कार्ल मार्क्स : वैज्ञानिक समाजवादी

सामान्य

‘हालांकि उनका दावा एक सभ्य समाज का था, परंतु उनके फीते बनाने के कारखानों में काम करने वाले अधिकांश बाल मजदूर गंदी, अभावग्रस्त और अमानवीय स्थितियों में कार्य करते थे. एक ही स्थान पर रहते हुए उन्हें वर्षों बीत जाते थे. इस बात का पता भी नहीं चल पाता था कि उनसे परे की दुनिया कैसी है. नौ-दस वर्ष के मासूम बच्चों को सुबह मुंह-अंधेरे चार बजे, और कभी-कभी तो प्रातः दो बजे से ही उनके गंदे बिस्तरों से खींचकर काम पर झोंक दिया जाता, जहां उन्हें बिना किसी विश्राम के, मात्र इतने-से भोजन पर कि वे किसी तरह जीवित रह सकें, रात के दस, ग्यारह और कभी-कभी तो बारह बजे तक काम करना पड़ता था. उनका बदन नंगा रहता. चेहरे भूख और कुपोषण से सफेद पड़े होते, आंखें हताशा से पथरा-सी जाती थीं. इस तरह विकट अमानवीय स्थितियों में उनसे काम लिया जाता था.’1

पूंजीवादी कारखानों में कार्यरत बाल मजदूरों के शोषण तथा उनकी अमानवीय परिस्थितियों की ओर इशारा करते हुए ये शब्द मार्क्स ने अपने ग्रंथ ‘पूंजी’ में व्यक्त किए थे. उस समय उसका इशारा यूरोपीय पूंजीवाद प्रेरित औद्योगिकीकरण के परिणामस्वरूप उत्पादन-व्यवस्था और तदनुसार समाज पर पड़ रहे दुष्प्रभावों की ओर था. उसने लिखा था कि पूंजीवाद ने मजदूर को भी एक ‘उपभोक्ता वस्तु’ में बदल दिया है, जिसका वह मनमाने तरीके से उपयोग करता है. चार खंडों में लिखे गए महाग्रंथ ‘पूंजी’ का पहला खंड 1867 में प्रकाशित हुआ था. उस समय मार्क्स की अवस्था करीब पचास वर्ष थी.इस तरह वह एक अनुभवी और तपे-तपाए वुद्धिजीवी का मनुष्यता के प्रति महान रचनात्मक अवदान था. बाजार में आते ही यह पुस्तक श्रम-आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं, विचारकों, वुद्धिजीवियों और आंदोलनकारियों का धर्मग्रंथ बन गई. मार्क्स का सपना पूरे मानव-समाज का सपना और उसके शब्द करोड़ों लोगों के लिए मुक्ति का मंत्र बन गए.

पूरी दुनिया को संघर्ष के लिए प्रेरित करने वाला मार्क्स अक्सर बीमार रहता था. उसके अपने बच्चे समय पर इलाज न मिलने के कारण मौत की भेंट चढ़ चुके थे. एक बार जब वह सेना में भर्ती के लिए भर्ती-स्थल पर पहुंचा तो सीने में कफ जमा होने के कारण डा॓क्टर ने उसको अयोग्य ठहरा दिया. एक तरह से यह अच्छा ही हुआ. भर्ती हो जाता तो किसी सम्राट-सामंत के लिए अपना खून जाया करता. राजभक्ति के नाम पर निर्दोष सैनिकों का खून बहाता. मगर नियति ने तो उसको मजदूर और किसानों के लिए पसीना बहाने के लिए जन्मा था. स्वभाव से स्वप्नदृष्टा और मन से कवि मार्क्स ने भर्ती से नकारे जाने के बाद, खुद को कानून और दर्शनशास्त्र के अध्ययन के लिए समर्पित कर दिया था. उसने इतिहास और राजनीति का भी गहन अध्ययन किया. गरीब मजदूरों के संघर्ष को जानने के लिए वह उनके बीच एक साधारण मजदूर की भांति रहा. कलम का मजदूर, जिसके शब्द अपने वर्ग की पीड़ा, हताशा और सपनों भरे-भरे रहते थे. उसके व्यक्तिगत जीवन के बारे में और अधिक जानने से पहले उचित होगा कि एक सरसरी नजर तत्कालीन यूरोप की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों पर भी डाल ली जाए.

***

पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी से प्रारंभ हुआ अनियोजित औद्योगिकीकरण यूरोप के प्रायः सभी देशों में अराजक रूप ग्रहण कर चुका था. उससे औद्योगिक उत्पादन में तो निश्चय ही वृद्धि हुई थी. लोगों की जीवन-स्तर में सुधार भी देखने को मिला था. किंतु उसके नकारात्मक प्रभाव, विशेषकर उत्तरोत्तर बढ़ती आर्थिक असमानता और बेरोजगारी, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की समस्त उपलब्धियों पर पानी फेरने को उतारू थे. एक ओर तो औद्योगिक सभ्यता विकास की डगर पर तेजी से गतिमान थी. नवीन कारखानों की गिनती दिनोंदिन बढ़ रही थी, साथ में उनकी उत्पादन क्षमता भी. प्रौद्योगिकी में सुधार के लिए शोध और विनिर्माण के क्षेत्र में तेजी से काम हो रहा था. दूसरी ओर श्रमिकों और कामगारों के शोषण का भी वह अभूतपूर्व युग था. फैक्ट्रियों में काम के घंटे तय नहीं थे. मजदूरों को दिन में सोलह-सोलह घंटे लगातार काम करना पड़ता था. स्त्री और पुरुष के वेतन में भेद किया जाता. समान कार्य के लिए स्त्री कामगार को पुरुष कामगार की अपेक्षा कम वेतन मिलता. बाल-श्रमिकों की हालत तो और भी बुरी थी. यदि किसी से कोई चूक हो जाए तो भरपाई उसकी मजदूरी से कर ली जाती थी. बुनकर, रंगरेज, दर्जी, मोची, जुलाहे आदि शिल्पकारी के जाने-माने क्षेत्र जो कुछ वर्ष पहले तक सम्मानजनक आजीविका देने वाले रोजगार माने जाते थे, मशीनों के आगमन के पश्चात उनकी स्थिति बहुत दयनीय हो चुकी थी. वे हुनरमंद लोग अब कारखानों में मामूली नौकरी करने को विवश थे.

उत्पादन प्रक्रिया में हस्तकौशल का महत्त्व घटने से अर्धकुशल अथवा अकुशल मजदूरों से भी काम चलाया जा सकता था. इसीलिए अधिकांश उद्यमियों ने नैतिकता को ताक पर रख, अपने कारखानों में बालश्रमिकों की भर्ती करना आरंभ कर दिया था. उन्हेें बहुत कम वेतन पर काम पर रखा जाता. ऐसी परिस्थितियों में काम लिया जाता था, जो कहीं से भी मानवोचित नहीं थीं. वैज्ञानिक आविष्कार और प्रौद्योगिकीकरण बच्चों, विशेषकर गरीब बच्चों के लिए बहुत हानिकर सिद्ध हो रहे थे. अठारहवीं शताब्दी फैक्ट्रियों के रूप में उनके लिए मानो कालकोठरियां तैयार कर रही थी. शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास अर्थात हर दृष्टि से बालश्रमिकों की हालत बेहद दयनीय थी। एक ओर जहां पूंजी की मनमानी जारी थी, वहीं दूसरी और उसका सामना करने के लिए बड़े-बड़े समाजविज्ञानी, दार्शनिक, विचारक और साहित्यकर्मी बेचैन थे. पूंजीवाद के दुष्प्रभावों से मुक्ति के लिए तरह-तरह के सुझाव दिए जा रहे थे. अधिकांश लोगों की कल्पना में था॓मस मूर का ‘यूटोपिया’ बसा था, जिसमें उसने व्यंग्य से ही सही, एक समानता-आधारित समाज का सपना देखा था.

इसी सपने को सच करने के लिए संत साइमन, लुईस ब्लेंक ने क्रांतिकारियों का साथ दिया था. फ्रांसिस बेकन, वाल्तेयर, रूसो, जेम्स मिल, बैंथम, फायरबाख, फ्यूरियर, हीगेल, प्रूधों, कांट, देकार्ते, ला॓क, जा॓न स्टुअर्ट मिल जैसे विद्वान अपनी कलम के दम पर सामाजिक-राजनीतिक असमानता से जूझ रहे थे. अपने उपन्यास ‘दि क्रिसमस कैरोल’ में चाल्र्स डिकेन्स ने मजदूर बस्तियों का जो हृदय विदारक चित्र खींचा था, उससे पूरे समाज में परिवर्तन की मांग होने लगी थी. इस उपन्यास का एक पात्र ‘स्क्रूज’ कंजूस महाजन के रूप में तत्कालीन शोषक समाज का प्रतिनिधि बनकर उभरा था. एक ओर पूंजीवादी शोषण अपनी चरमावस्था पर था, तो दूसरी ओर उनसे निपटने के लिए भी प्रयास जारी थे. असल में वह सामाजिक हलचल और परिवर्तनों का दौर था. दार्शनिक, विचारक, लेखक, समाजकर्मी, चित्रकार, नाटककार, कवि, कलाकार सभी अपनी-अपनी कला का उपयोग लोकजागरण के लिए कर रहे थे.

यह लोकचेतना अपने समन्वित, प्रखर और परिवर्तनकारी रूप में 10 मार्च, 1848 को उस समय सामने आई जब फीरगस ओ’क्रोनर के नेतृत्व में लगभग तीन लाख चार्टिस्ट आंदोलनकारियों ने समान मताधिकार जैसी लोकतांत्रिक मांगों को लेकर एक विशाल सभा का आयोजन किया था. उस बैठक को लेकर सरकार की गंभीरता और उसके डर का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है, कि उसको नियंत्रित करने के लिए उसकी ओर से लगभग 8000 सैनिक और 1,50,000 विशेष कांस्टेबिलों को नियुक्त किया गया था. वह सभा शांतिपूर्वक संपन्न हुई. आंदोलन के अगले चरण में अपनी मांगों को लेकर ओ’का॓नर के ब्रिटिश संसद के समक्ष करोड़ों नागरिकों द्वारा हस्ताक्षरित एक मांगपत्र प्रस्तुत किया था. ओ’काॅनर का दावा था कि उस मांगपत्र पर 5,70,6000 लोगों ने हस्ताक्षर किए थे. बाद में ब्रिटिश संसद ने स्वीकार किया कि मांगपत्र पर केवल 1,95,7496 नागरिकों के हस्ताक्षर थे. ब्रिटिश संसद ने बाकी हस्ताक्षरों को फर्जी माना था, जबकि ओ’का॓नर का कहना था कि मजदूरों में से अधिकांश अशिक्षित थे, जो अपने स्पष्ट हस्ताक्षर करना जानते ही नहीं थे.
जो हो उन दिनों यूरोपीय पुनर्जागरण की अनुगूंज पूरे विश्व में सुनाई पड़ रही थी. करोड़ों लोगों के अपनी मांगों के पक्ष में संगठित होकर आंदोलनरत होने के पीछे मार्क्स की प्रेरणा थी, उसका ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ उसी वर्ष लंदन में प्रकाशित हुआ था, जिसमें उसने मजदूरों को पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने का आवाह्न किया गया था. उस समय वह क्रांतिकारी विचारक और महान आंदोलनकारी की भूमिका में था. चार्टिस्ट आंदोलन सरकार के दमन का शिकार हुआ, मगर वह मार्क्स के विचारों या आंदोलनकर्मियों की पराजय नहीं थी. वस्तुतः आमूल परिवर्तन की चाहत में चलाए जाने वाले अभियान के जीवनकाल में जय-पराजय के ऐसे दौर अवश्यंभावी होते हैं. वैसे भी मार्क्स उन विचारकों में से था, जिनके विचारों का प्रभाव उनके जीवनकाल से बाद में देखने को मिलता है. उसका चिंतन प्रतिबद्ध होने के साथ-साथ इतना गंभीर और बहुआयामी है कि एक विचारक और आंदोलनकर्मी दोनों प्रेरणा ले सकते हैं.

जीवनयात्रा

उसका पूरा नाम था, कार्ल हेनरिक मार्क्स और जन्मस्थान था, जर्मनी में प्रूशिया की राजधानी ट्रायर. तिथि—5 मई, 1818. पिता हेनरिक मार्क्स शहर के प्रतिष्ठित वकील थे, जबकि उसकी मां का संबंध हालेंड के हेनरिक प्रेसबर्ग नामक स्थान से था. पति-पत्नी दोनों ही यहुदियों के धर्मगुरुओं के परिवार से संबद्ध थे. मार्क्स सहित उसके कुल आठ भाई-बहन थे, जिनमें से चार की बचमन में ही मृत्यु हो चुकी थी. हेनरिक मार्क्स वाल्तेयर और लिंसिंग के प्रशंसक थे. मार्क्स के जन्म से करीब एक वर्ष पहले ही उन्होंने अपेक्षाकृत प्रगतिशील मानी जाने वाली प्रोस्टेंट चर्च, इवांलिकल एस्टाब्लिस्ड से धर्म-दीक्षा ली थी. वकालत के पेशे को अपनाने के लिए यह आवश्यक भी था. प्रगतिशील और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के प्रति सचेत हेनरिक मार्क्स, प्रूशिया में संविधान सुधारों की मांग को लेकर हुए एक आंदोलन में हिस्सा भी ले चुके थे. समाज में उनकी छवि एक संघर्षशील और जुझारू नेता की थी. कार्ल मार्क्स के सक्रिय जीवन पर अपने पिता का गहरा असर पड़ा था.

मार्क्स की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई. उसके बाद उसको ट्रायर जिमनाजियम(जर्मन हाई स्कूल) का॓लेज में भेज दिया गया. उस समय वह तेरह वर्ष का किशोर था. परिवार में पठन-पाठन का अच्छा माहौल था. मार्क्स की रुचि दर्शनशास्त्र और साहित्य की पढ़ाई में थी, कविताओं में उसका मन रमता था. मगर पिता चाहते थे कि पुत्र उन्हीं की भांति वकील बनकर विरासत को संभाले. उस समय पिता की ही चली. उनकी इच्छा पर मार्क्स को बाॅन विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई के लिए भेज दिया गया. उस समय उसकी आयु मात्र सतरह वर्ष की थी. बाॅन में रहते हुए ही वह जेनी वान वेस्टफ्लेन के संपर्क में आया. जेनी के पिता बेरोन बान वेस्टफ्लोन वे बान के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे. जेनी सुंदर और संवेदनशील लड़की थी.उनके संपर्क में आने के बाद मार्क्स की रोमानी साहित्य तथा राजनीति में रुचि बढ़ी थी. खासकर संत-साइमन के विचारों के प्रति. मार्क्स उन दिनों युवा था. जेनी के साथ उसका प्रेम-प्रसंग आगे बढ़ा तो दोनों दांपत्य में बंध गए. जेनी से मार्क्स की कुल सात संतान हुईं. मगर भीषण गरीबी और जीवन-संघर्ष के बीच उनमें से चार असमय ही काल के गाल समा गए.

बा॓न में रहते हुए वह ट्रायर क्लब ड्रिंकिंग सोसाइटी के संपर्क में आया. कुछ दिनों के लिए वह उसका अध्यक्ष भी बना. इस बीच पिता को लगा कि मार्क्स वहां रहकर कानून के अध्ययन के प्रति पर्याप्त सचेत नहीं है. इसलिए उन्होंने एक जिद्दी अभिभावक की भूमिका निभाते हुए मार्क्स को बर्लिन विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए विवश कर दिया, जो उन दिनों कानून के अध्ययन के लिए सर्वाधिक जाना-पहचान संस्थान था. 1836 के ग्रीष्म में मार्क्स वहां पहुंचा. उसी वर्ष के अक्टूबर में उसको बर्लिन विश्वविद्यालय में प्रवेश मिल गया. वहां रहकर उसके ‘क्रिमिनल ला॓’ के साथ मानवशास्त्र का अध्ययन करने लगा. मगर बदले परिवेश में भी मार्क्स कानून के प्रति वांछित रुचि जाग्रत न कर सका. दर्शन और साहित्य के क्षेत्र में उसका दखल लगातार बढ़ता ही गया. वहीं रहकर वह हीगेल के दर्शन के प्रभाव में आया, जिसने उसके सोचने-समझने का ढंग ही बदल दिया. अपने अध्ययनक्षेत्र का अतिक्रमण करते हुए उसने प्रख्यात दर्शनशास्त्रियों की पुस्तकों का अध्ययन किया. वह नियमित रूप से दार्शनिक सभाओं और सेमीनारों में जाता. वहां की गतिविधियों में सहभागी बनता. साहित्य के प्रति उसकी अभिरुचि निबंध और कविताओं के रूप में प्रकट होती. उसके लेख जहां आधुनिक विचारों से ओतप्रोत होते थे, वहीं कविताओं में आध्यात्मिकता का तत्व प्रधान रहता था, जिनपर उसके पिता के उदार विचारों की स्पष्ट छाया नजर आती थी. का॓लेज की पढ़ाई के अतिरिक्त दिन के कई घंटे वह अध्ययन-मनन में व्यतीत करता. लगातार और बहुविषयक अध्ययन से उसका दिमाग घूमने लगता. हालत पागलों जैसी हो जाती. फिर भी ज्यादा और ज्यादा पढ़ने, सब कुछ आत्मसात् कर लेने की जैसे सनक सवार हो उसपर. वह रात-दिन पुस्तकों में ही डूबा रहता. अपने पिता को लिखे पत्र में उसने स्वयं लिखा है: दर्शन, साहित्य और इतिहास की पुस्तकों को पढ़ते हुए—

‘मैं लगातार बीमार, वेदनामय, अनिद्रायुक्त और एकाकी जीवन की ओर बढ़ता जा रहा था.’2

मार्क्स की प्रतिभा की धमक पहली बार 1835 में सुनाई दी. ‘व्यवसाय चुनते समय एक युवा की प्राथमिकताएं’ शीर्षक के अंतर्गत लिखे गए निबंध में उसके विचारों की प्रखरता और मौलिकता दोनों ही विद्यमान थे. उसने लिखा था—

‘व्यवसाय का चयन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वह मनुष्यता के लिए सर्वथा वरेण्य और कल्याणकारी हो. ताकि उसके माध्यम से हम अपने सर्वश्रेष्ठ को अभिव्यक्त कर सकें….यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह अपने लोगों के भले के लिए कार्य करते समय ही अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकता है.’3
अत्यधिक पठन-पाठन का मार्क्स की सेहत पर बुरा असर पड़ा था. 1838 में काॅलेज के दौरान ही उसने सैन्य सेवा के लिए आवेदन किया. किंतु अपनी कमजोर छाती तथा खून-मिश्रित कफ के कारण उसको अयोग्य ठहरा दिया गया. आजीविका के लिए किसी बंधी-बंधाई नौकरी से जुड़ने का उसका सपना धरा का धरा रह गया. पर एक तरह से उसने इसे अपने लिए हितकर ही माना. पिता के आग्रह पर उसने कानून का अध्ययन जरूर किया था, मगर वकालत के पेशे के प्रति उसकी कोई रुचि न थी. वह मानता था कि वकालत का धंधा उसको वह नहीं दे सकता, जोे वह अपने जीवन में बनना चाहता है. इसलिए का॓लेज की पढ़ाई पूरी होते-होते उसने स्वयं को पत्रकारिता के प्रति समर्पित करने का निश्चय कर लिया. तब तक उसकी प्रतिभा लोगों की समझ में आने लगी थी. अपने लेखों के माध्यम से उसने साफ कर दिया था कि वह दूसरों से हटकर और विशिष्ट है. संयोग से उन्हीं दिनों उसको राइनलेंड से निकलने जा रहे एक प्रगतिशील समाचारपत्र ‘रीनिश जेटुंग’ का संपादक बनने का न्योंता मिला. मार्क्स ने बिना कोई देर किए वह आमंत्रण स्वीकार कर दिया. अक्टूबर 1942 में जब उसने कोलोन स्थित उस समाचारपत्र के संपादक का दायित्व संभाला, उस समय उसकी आयु मात्र 24 वर्ष थी. उस समय कौन जानता था कि वह युवा संपादक लिए वह समाचारपत्र उसके क्रांतिकारी लेखन की पहली प्रयोगशाला सिद्ध होगा. उस समाचारपत्र के संचालन के पीछे एक पूंजीपति का योगदान था, मगर मार्क्स के संपादक बनने के बाद वह समाचारपत्र लोकचेतना और जनसाधारण की आवाज बनता चला गया.

बर्लिन उन दिनों हीगेल के समर्थकों का गढ़ बना हुआ था. मार्क्स हीगेल के युवा समर्थकों के संपर्क में आया. उनके समूह के नेता लुडविग फायरबाख और बूनो बायर थे. दोनों ही वामपंथी विचारधारा में विश्वास रखते थे, जो उन दिनों जनपक्षधरता और पूंजीवाद विरोध का प्रतीक बनती जा रही थी. नवहीगेलवादियों का यह समूह खुद को हीगेल का प्रशंसक बताता था, लेकिन उसके कई विचारों से इस समूह की असहमति थी. बावजूद इसके वे अपने तर्कों, बहसों और लेखन के दौरान हीगेल की द्वंद्वात्मक पद्धति का खुला उपयोग करते थे. खासकर स्थापित धार्मिक-राजनीतिक विचारधारों की आलोचना के लिए. वामपंथी विचारधारा के प्रति अपनी आग्रहशीलता के कारण सरकार और पूंजीपति नवहीगेलवादियों को किंचित नफरत की दृष्टि से देखते थे. इसलिए मार्क्स को उसके मित्रों ने सलाह भी दी थी कि जीवन में यदि आगे बढ़ना है तो नवहीगेलवादियों के संपर्क में आने से बचे. मगर मार्क्स तो जैसे अपना रास्ता तय कर चुका था. अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए वह किसी भी प्रकार का खतरा मोल लेने को भी तैयार था. शनै-शनै ही सही, मार्क्स के समर्थकों की संख्या बढ़ती जा रही थी.

बौद्धिकता के प्रति नवहीगेलवादियों का समर्पण मुक्त विमर्श का उदाहरण था.उनके अपने भी बौद्धिक मतभेद थे. यह मतभेद मेक्स स्टीर्नर की पुस्तक ‘दि इगो एंड इट्स ओन’ के रूप में उस समय और खुलकर सामने आए. इस पुस्तक में उसने फायरबाख और बायर की आलोचना की थी. उन्हें खोखला और धर्मभीरू इंसान कहकर उनका मजाक उड़ाया था. इसका मार्क्स, जो उस समय तक फायरबाख से प्रभावित था, ने गहरा प्रतिवाद किया. फायरबाख की आस्था समाज के शोषित एवं उत्पीड़ित वर्गों के विकास को लेकर थी. वह दर्शन को अमूत्र्तन धारणाओं से बाहर निकालकर मानव-कल्याण के उपकरण के रूप में स्थापित करना चाहता था. मार्क्स भी खुद को उसी धरातल पर पाता था. अतएव फायरबाख के भौतिकवादी विचारों के पक्ष में उसने एक के बाद एक कई लेख लिखे, जिसमें उसने हीगेल के द्वंद्वात्मक सिद्धांत की सहायता से भौतिकवादी विचारधारा की प्राचीनता को चिह्नित करने का प्रयास किया था. दूसरे मोर्चे पर मार्क्स मोसेस हेस से जूझ रहा था. हेस भी मार्क्स की भांति हीगेल का प्रशंसक था, मगर दोनों के बीच अनेक मतभेद भी थे. मार्क्स हेस के धर्म, राजनीति, सामाजिक संबंध आदि से जुड़े विचारों से सहमत था. मगर उसका तत्ववादी चिंतन मार्क्स को खलता था. फायरबाख की भांति वह भी दर्शन को जीवन की विभिन्न समस्याओं के निदान का माध्यम बनाना चाहता था. घंटों-घंटों लंबी लगातार बौद्धिक बहसों, लेखन और अध्ययन के दबाव ने मार्क्स को बीमार बना दिया था. इसका एक कारण वह हीगेल के दर्शन से चिपके रहने को भी मानता था, उसने लिखा भी था किः
‘किसी एक खास विचारधारा से चिपक जाने के कारण मैं एक गुड्डा-जैसा बनता जा रहा था, जिससे मैं नफरत करता था.’

1841 में मार्क्स को बर्लिन विश्वविद्यालय ने डाॅक्ट्रेट की डिग्री द्वारा सम्मानित किया. उसके शोध का विषय था—‘दि डिफरेंस बिटवीन डेमोक्रेट्रीयन एंड एपीक्यूरीयन फिलाॅस्फी आॅफ नेचर.’ अपने शोधप्रबंध में उसने प्राचीन ग्रीक दर्शन को अपने विवेचनात्मक अध्ययन का आधार बनाया था. यहां उसने मित्रों के इस परामर्श कि वह बर्लिन में रहते हुए नवहीगेलवादी के रूप में अपनी पहचान बनाने से बाज आए, का पूरा-पूरा पालन किया था. यही नहीं बजाय बर्लिन विश्वविद्यालय के, जहां से उसको शोध की अनुमति मिली थी, उसने अपना शोधप्रबंध ‘जेन विश्वविद्यालय’ में प्रस्तुत किया था. इस बीच वह समाचारपत्र से भी जुड़ा हुआ था. कारखानों में श्रमिकों और कारीगरों का शोषण देखकर वह आहत होता था. उसकी तात्कालिक प्रतिक्रिया अगले दिन के समाचारपत्र में नजर आती. लेखन के समय उसका एक ही ध्येय होता था, मनुष्यता का भला. किसी न किसी प्रकार मनुष्य का कल्याण—

‘जनसाधारण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हुए मार्क्स ने उस समाचारपत्र में राज्य द्वारा मजदूरों के शोषण और दमन को लेकर संपादकीय लिखने आरंभ कर दिए. आक्रामक शैली में लिखे गए उन आलेखों द्वारा यूरोपियन देशों की सरकार को निर्देश दिया जा रहा था कि वे अपने यहां स्थित कारखानों में कामगारों के हालात में सुधार हेतु उपयुक्त परिवर्तन लाएं. उन आलेखों से प्रूशिया की सरकार का बुरी तरह चिढ़ जाना स्वाभाविक था. परिणाम यह हुआ कि मार्क्स के अखबार पर सेंसर लगा दिया गया. अंततः उसे समाचारपत्र को बंद करने को विवश होना पड़ा.’5
इस घटना के उपरांत मार्क्स फ्रांस रवाना हो गया. वहां एक सक्रिय क्रांतिकारी जीवन उसकी प्रतीक्षा कर रहा था.

पेरिस के दिन
पेरिस उन दिनों इटली के क्रांतिकारियों का प्रमुख अड्डा था. उनको नियंत्रण में रखने के लिए वहां जमर्नी, फ्रांस, प्रूशिया आदि देशों के सैनिक डेरा डाले रहते थे. बावजूद इसके वहां बौद्धिक वातावरण खुला और परिवर्तनवादियों के अनुकूल था. बौद्धिक बहसों और नए विचारों के लिए भी वहां पर्याप्त अवसर थे. मार्क्स ने पेरिस पहुंचते ही खुद को एक बार फिर अध्ययन के हवाले कर दिया दिया. स्कूल के दिनों में ही वह वाल्तेयर, इमानुएल कांट और रूसो का प्रशंसक था. ये सभी उसके पसंदीदा लेखकों में से थे. पेरिस में रहते हुए मार्क्स ने वहां के श्रम-संगठनों से मेलजोल बनाना आरंभ कर दिया. पेरिस प्रवास के दौरान अपने रचनात्मक लेखन को विस्तार देते हुए उसने आरनोल्ड रूग के साथ मिलकर ‘दि जर्मन-फ्रांसिसी ईयर बुक’ का संपादन किया, यह पुस्तक उस समय नवहीगेलवाद तथा फ्रांस में उठ रही समाजवादी लहरों के समन्वयवादी विश्लेषण पर केंद्रित थी. उन दिनों मार्क्स की लेखन-ऊर्जा अपने उफान पर थी. पेरिस में अपने प्रारंभिक वर्षों में उसने अर्थशास्त्र, राजनीति तथा अपनी दार्शनिक मान्यताओं को लेकर कई लेख लिखे. फायरबाख के विचारों से प्रभावित उन लेखों में उसने साम्यवाद के मानवीय स्वरूप को संहिताबद्ध करने की कोशिश की थी, जो आगे चलकर वैज्ञानिक समाजवाद के विकास की पृष्ठभूमि बना.

उन दिनों मार्क्स की साम्यवादी परिकल्पना में एक ऐसा राज्य था, जहां मानवमात्र को एक-दूसरे के साथ मिलकर अपना विकास करने की पूर्ण आजादी हो. जहां संपत्ति और संसाधनों विकेंद्रीकरण हो और जहां रहते हुए नागरिक स्वयं को ‘मुक्त’ एवं आत्मनिर्भर अनुभव कर सकें. घटनाक्रम तेजी से बदल रहा था. पेरिस के एक कहवाघर कैफे दे ला रीजेंस में उसकी मुलाकात फ्रैडरिक ऐंगल्स से दूसरी मुलाकात हुई. वह 28 अगस्त, 1844 का दिन था. उससे पहले दोनों करीब दो वर्ष पहले राइनलेंड में रीन्शचे जीटुंग के कार्यालय में मिल चुके थे. मगर वह मुलाकात बहुत छोटी और अल्पकालिक थी. उससे कुछ पहले ही मार्क्स की पुस्तक ‘दि कंडीशन आॅफ वर्किंग क्लास इन-1844’ प्रकाशित हुई थी. पुस्तक में मार्क्स ने पूंजीवादी उद्योगों में श्रमिकों की दयनीय अवस्था का वास्तविक चित्रण किया था. इस बीच संगठित श्रम-शक्ति की कार्यक्षमता पर उसका भरोसा बढ़ा था. उसने तर्क द्वारा यह समझाने का प्रयास किया था कि सामाजिक-राजनीतिक क्रांति के इतिहास में संगठित श्रम-शक्ति की भूमिका ही सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी.

अपने प्रकाशन के साथ ही पुस्तक वुद्धिजीवियों का ध्यान खींचने में कामयाब हुई. उसी की चर्चा से प्रभावित होकर ऐंगल्स उससे मिलने पेरिस पहुंचा था. ऐंग्लस पर मार्क्स के विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा. पेरिस स्थित कहवाघर की वह छोटी-सी भेंट दोनों के बीच अटूट दोस्ती की शुरुआत की गवाह बनी, जो जीवनपर्यंत बनी रही. आदर्श दोस्तों की भांति दोनों एक-दूसरे के साथी और संपूरक बने रहे. बल्कि मार्क्स तो अपने रोजमर्रा के खर्च तक के लिए फ्रैडरिक से मदद लेता रहता था. मार्क्स का लगभग पूरा समय लिखने-पढ़ने में व्यतीत होता था. आमदनी का माध्यम अखबारों में लिखे गए आलेख होते थे, जिसके बूते पारिवारिक दायित्वों का पालन कर पाना असंभव ही था. वह स्वयं बीमार रहता. पत्नी जेनी से उसके सात बच्चे जन्मे थे. लेकिन समय पर उपचार न करा पाने के कारण उनमें से मात्र तीन बच्चे ही जीवित बचे थे. पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के लिए भी मार्क्स को कर्ज लेना पड़ता था. ऐंगल्स का छोटा व्यवसाय था, जिससे उसको मार्क्स के मुकाबले अच्छी आमदनी थी. किंतु यह अंतर उनकी मित्रता में बाधक न था, बल्कि सहायक ही बना. इसकी वजह दोनों की वैचारिक एकता थी. हालांकि ऐगल्स के लिखे में मौलिकता का अभाव है, एक तरह से उसने मार्क्स विचारों का विस्तार किया है.

मार्क्स उन दिनों पेरिस से प्रकाशित होने वाले प्रायः सभी प्रगतिशील समाचारपत्रों के लिए नियमित लेखन कर रहा था. वह एक समर्पित और प्रतिबद्ध लेखक-विचारक था. उसकी वैचारिक संबद्धता केवल आक्रामक शैली में लिखे गए लेखों और पुस्तकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि मजदूर आंदोलनों की भूमिका बनाने, अपने आलेखों द्वारा उनके पक्ष में माहौल बनाने में वह सदैव आगे रहता था. यद्यपि पेरिस आंदोलन से पहले भी वह मजदूरों के साथ क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सेदारी कर चुका था. पेरिस प्रवास के दौरान वह एक और महत्त्वपूर्ण काम में जुटा, फ्रांसिसी क्रांति से जुड़े दुर्लभ दस्तावेज और प्रूधों की पुस्तकों के गंभीर अध्ययन का. मार्क्स द्वारा पू्रधों का अध्ययन दो क्रांतिकारियों का युगांतरकारी संवाद था. असहमति के बावजूद प्रूधों के लेखन ने मार्क्स के चिंतन को एक नई धारा से समृद्ध करने का काम किया. आने वाले वर्षों में जिस परिवर्तनकारी सोच के लिए मार्क्स को पहचाना गया, और आज भी जिसके कारण वह ख्यात-कुख्यात है, उसका वास्तविक विकास पेरिस प्रवास के दौरान ही संभव हो सका. उन्हीं दिनों मार्क्स की एक और महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘आॅन दि ज्यूश क्वश्चन’ का प्रकाशन हुआ. उसने उस पुस्तक की रचना नवहीगेलीयनवादी बाॅयर की पुस्तक ‘एथीज्म’ पर अपनी प्रतिक्रिया दर्शाते हुए रची गई थी.

‘आ॓न दि ज्यूश क्वश्चन’ नामक वह पुस्तक वास्तव में एक लंबा निबंध थी, जिसका विषय बाॅयर के समाज राजनीति, मानवाधिकार और अर्थनीतिक विषयक विचारों की समालोचना थी, जिसमें सामाजिक पुनर्रचना के लिए ईसाई और यहूदी धर्मग्रंथों से उद्धरण देकर समझाया गया था. ऎंगल्स ने जो उन दिनों एक साम्यवादी के रूप में बड़ी तेजी से अपनी पहचान बना रहा था, श्रमिक कल्याण से जुड़े मामलों में रुचि के लिए मार्क्स की मुक्त कंठ से सराहना की है. उल्लेखनीय है कि फायरबाख के प्रेरणा से मार्क्स का चिंतन पहले ही जनसाधारण की समस्याओं और उनके निदान के प्रति मुड़ चुका था. ऐंगल्स ने इस विश्वास को और प्रगाढ़ करने का काम किया. इसके फलस्वरूप मार्क्स का रुझान क्षेत्रीय मजदूरों की समस्याओं की और गया, जिसका निदान अर्थशास्त्र के माध्यम से खोजा जा सकता था. उसने कारखानों में मजदूरों की अवस्था का गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया. परिणाम यह हुआ कि वह पूंजीवाद के दुष्परिणामों के प्रति निरंतर जागरूक होता चला गया.

श्रम-कल्याण से जुड़े मुद्दों की महत्ता को देखते हुए उसने समकालीन पत्र-पत्रिकाओं में लिखना आरंभ कर दिया. उसके लेखों की व्यापक प्रतिक्रिया हुई. वह एक मजदूर हितैषी के रूप में पहचाना जाने लगा. उन दिनों विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखे गए उसके लेख आगे चलकर ‘इकोनाॅमिक एंड फिलाॅसाफिकल मेन्युस्क्रिप्ट आॅफ 1844’ में संकलित किए गए हैं. साम्यवादी दर्शन का मानवतावादी दृष्टिकोण से विश्लेषण करते हुए उसने साम्यवादी समाज और पूंजीवादी समाज में मजदूरों की स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन किया था. उसकी विश्लेषणात्मक क्षमता गजब थी, जिसके फलस्वरूप लोगों पर उसके विचारों का असर लगातार बढ़ता जा रहा था. पेरिस में उसका समय ठीक-ठाक बीत रहा. पुस्तकों और समाचारपत्रों में लिखे लेखों द्वारा उसको पर्याप्त आमदनी थी. सहसा 1845 में राजनीतिक घटनाक्रम के चलते प्रूशिया सरकार ने मार्क्स को अपने सभी साथियों के साथ देश छोड़ने का आदेश सुना दिया. मार्क्स चुनौतियां झेलने के लिए तैयार था. परिवार के साथ वह ब्रुसेल्स के लिए प्रस्थान कर गया. उस दिनों वह इतिहास के अध्ययन में डूबा हुआ था. ऐंगल्स के साथ मिलकर उसने ऐतिहासिक भौतिकवाद पर गवेषणात्मक आलेख तैयार किया था, जो उसकी मृत्यु के उपरांत ‘दि जर्मन आइडियोलाॅजी’ शीर्षक से पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ. इस पुस्तक में उसने प्राचीनकाल में लोकप्रिय उत्पादन प्रणालियों का अध्ययन करते हुए स्थापित किया था कि—

‘सामाजिक परिवर्तनों और राजनीतिक क्रांतियों के वास्तविक कारण मानवमात्र की जीवनमूल्यों और न्याय को पाने की उत्तरोत्तर बढ़ती चाहत में ही निहित नहीं होते. वस्तुतः वे उस कालखंड के दौरान उत्पादन और विपणन के स्वरूप में हुए परिवर्तनों द्वारा निर्धारित होते हैं, इस तरह वे दर्शनशास्त्र का विषय न होकर, कालविशेष की अर्थनीति का परिणाम होते हैं.’6
मार्क्स की यह स्थापना उसके मित्र और सहलेखक ऐंगल्स के विचार का ही विस्तार थी. ऐंगल्स ने एक स्थान पर लिखा था कि—

‘यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि किसी भी समाज का विभिन्न जाति-वर्गों एवं क्षेत्रों का विभाजन इस बात पर निर्भर करता है कि उसके उत्पाद कौन-से हैं तथा उनके उत्पादन हेतु वह किन उत्पादन-प्रणालियों को अपनाता है, इसके अलावा यह समाज-विशेष की विपणन प्रणालियों पर भी निर्भर करता है.’7

अपने निबंध में मार्क्स ने ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला देते हुए प्राचीन समाजों में प्रचलित उत्पादन प्रविधियों तथा उनके पतन के कारणों का विस्तृत विवेचन किया था. भौतिकवाद को ऐतिहासिक सत्य के रूप में स्थापित करते हुए उसने दावा किया था कि विकास के अगले चरण में पूंजीवाद का पतन अवश्यंभावी है. उसने भरोसा जताया था कि मजदूर वर्ग, वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत के अनुरूप अपनी ताकत को पहचानकर आगे बढ़ेगा और संघर्ष में बुर्जुआ वर्ग को परास्त कर सत्ता पर काबिज होता जाएगा. उत्पादन तंत्र पर नियंत्रण कर वह पूंजीवाद के खात्मे का ऐलान करेगा. अंततः पूरा समाज एक समानतावादी-समरसतावादी व्यवस्था द्वारा अनुशासित होगा. मार्क्स ने पहली बार भौतिकता को विकास के अनिवार्य उपकरण के रूप में स्वीकारा था. उससे पहले धर्म और संस्कृति के नाम पर समाज पर शासन करते आए लोग भौतिकता को सांसारिक बंधनों का पर्याय मानकर लांछित करते आए थे. भारतीय दर्शन की वेदांत परंपरा में भी संसार को माया और प्रपंच कहकर उसके प्रति लगाव को धिक्कारा गया है, मार्क्स ने धर्म को ही कठघरे में खड़ा करदिया था. इस कारण उसका चैतरफा विरोध होना स्वाभाविक था.

दूसरी ओर पूंजीवाद की मनमानियों से त्रस्त श्रमिकवर्ग मार्क्स के शब्दों को मंत्रों भी भांति बांच रहा था. लगभग उन्हीं दिनों पूधों ने ‘दि फिलाॅस्फी आॅफ पाॅवर्टी’ नामक पुस्तक की रचना की थी. प्रूधों उन दिनों एक ख्यातिनाम अराजकतावादी था. उसकी प्रतिष्ठा आसमान चढ़कर बोलती थी. मार्क्स उसके मुखर पूंजीवाद-विरोध से प्रभावित था, तथापि उसकी कई स्थापनाओं से उसकी असहमति थी. अपनी असहमतियों को स्वर देते हुए मार्क्स ने एक पुस्तक ‘दि पाॅवर्टी आॅफ फिलाॅस्फी’ की रचना की थी. 1847 में लिखी गई मार्क्स की यह पुस्तक मूल रूप से प्रूधों के विचारों की सटीक आलोचना थी. इसका परिणाम यह हुआ मार्क्स और उसके सहलेखक ऐंगल्स का नाम रातोंरात लोगों की जुबान पर छा गया. मार्क्स उस समय तक कम्युनिस्ट लीग की सदस्यता ग्रहण कर चुका था. इस संस्था का गठन लंदन में रह रहे जर्मन मजदूरों द्वारा किया गया था. मार्क्स और ऐंगल्स उसके प्रमुख सिद्धांतकारों में से थे.

कम्युनिस्ट लीग का गठन पूंजीवादी कारखानों में श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए किया गया था. श्रम-कल्याण के आंदोलन को गति देने और श्रमिकों को जोड़ने के लिए संस्था की ओर से एक सम्मेलन की परिकल्पना की गई. 1847 में प्रस्तावित सम्मेलन के लिए संस्था की नीतियों पर आधारित एक सारगर्भित वक्तव्य तैयार करने का दायित्व मार्क्स और एंेगल्स को सौंपा गया. उस समय तक श्रमिकों में व्यवस्था के प्रति आक्रोश बढ़ता ही जा रहा था. उस आक्रोश को स्वर देते हुए श्रमिक आंदोलन की रचनात्मकता को बनाए रखना एक चुनौती-भरा काम था. उस सम्मेलन के लिए ऐंगल्स के साथ मिलकर मार्क्स ने जो पर्चा तैयार किया, वही आगे चलकर दुनिया-भर के श्रमिकों की प्रेरणा का òोत बना. उसकी आवाज विश्व-भर में फैले करोड़ों मजदूरों, कामगारों, सर्वहाराओं की आवाज बन गई. पहली बार वह वक्तव्य 21 फरवरी 1848 को, कम्युनिस्ट मेनीफेस्टों के नाम से प्रकाशित हुआ और एक झटके में वैश्विक व्यवस्था-परिवर्तन का औजार बन गया. श्रमिक एकता का पक्ष लेते हुए उसने लिखा था कि—

‘तब और आज भी श्रमिक हमेशा विजयी रहे हैं, मगर मगर सीमित समय के लिए. उनके संघर्ष का सुफल तात्कालिक निष्कर्षों में नहीं, बल्कि मजदूरों के उत्तरोत्तर बढ़ते संगठनों से सन्निहित है. सांगठनिक एकता को बनाए रखने के लिए आधुनिक उद्योगों में प्रयुक्त संचार साधनों की मदद ली जाएगी, अलग-अलग मजदूर बस्तियों में उसकी उपलब्धता होगी, ताकि वे एक-दूसरे के साथ संपर्क कर सकें.’8

मार्क्स के आवाह्न का जादुई असर हुआ था. 1848 के प्रारंभिक वर्षों में ही पूरा यूरोप मजदूर आंदोलनों से धधक उठा. बेल्जियम की सरकार ने मार्क्स पर मजदूरों को भड़काने का आरोप लगाकर उसको गिरफ्तार कर लिया, मगर इस डर से कि गिरफ्तारी की सूचना पाकर श्रमिक और न भड़क जाएं, उसने मार्क्स को तत्काल बेल्जियम छोड़ने का आदेश सुना दिया. उन दिनों फ्रांस में मजदूर आंदोलन अपने उफान पर था. 24 फरवरी, 1848 को आंदोलनकारियों ने तत्कालीन फ्रांसिसी सम्राट लुईस फिलिप को पदच्युत कर सत्ता पर कब्जा कर लिया. क्रांति का सपना देखने वाले मार्क्स के लिए श्रमिकों की यह विजय आह्लादकारी थी. विजय से उल्लसित मजदूरों ने मार्क्स को फ्रांस आने का न्योता दिया. इस पर तुरंत पेरिस के लिए रवाना हो गया.

फ्रांस में नवगठित सरकार ने दो दिन बाद बेरोजगारी की समस्या के निदान के लिए नवगठित सरकार ने श्रमिक नेता लुईस ब्लेंक के नेतृत्व में 26 फरवरी, 1948 को ‘राष्ट्रीय उद्योगशालाओं’ के गठन की शुरुआत की थी, ताकि मंदी के कारण बेरोजगार हुए कामगारों के लिए रोजगार की व्यवस्था की जा सके. मगर राष्ट्रीय उद्योगशालाओं का प्रयोग सरकार ने मात्र चार महीने से भी कम समय में 21 जून, 1948 को धनाभाव का बहाना कहकर वापस ले लिया. इसपर मजदूर भड़क उठे. वस्तुतः मजदूर चेतना के बढ़ते प्रभाव में उन दिनों फ्रांसिसी नेताओं का खुद को प्रगतिशील और लोकतांत्रिक कहना फैशनेबल हो चुका था. मगर लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता-परिवर्तन के तुरंत बाद उनका असली चेहरा सामने आने लगा. उन्होंने ब्लेंक के राष्ट्रीय उद्योगशालाओं के प्रस्ताव का विरोध करना शुरू कर दिया. उन्हें प्रोत्साहित करने के कार्यक्रम में वे अड़ंगा लगाने लगे. अततः राष्ट्रीय कार्यशालाओं बंद करने का निर्णय हुआ. मजदूर संगठनों की ओर से उसका विरोध स्वाभाविक ही था. सरकार के निर्णय को अपने प्रति विश्वासघात मानते हुए मजदूर संगठन विरोध में सड़क पर उतर आए.

सरकार ने जनरल लुईस यूजेन केवनाॅक को युद्ध मंत्रालय का दायित्व सौंपा हुआ था. उसी के संकेत पर सेना आंदोलनकारी श्रमिकों के विरोध में उतर आई. 22 जून 1848 को सेना द्वारा निहत्थे मजदूरों पर बंदूकें तान दी गईं. 26 जून को मजदूर आंदोलन की कमर टूटने तक पुलिस उनपर गोलियां बरसाती रहीं. इस अवधि में 1500 से अधिक मजदूरों को गोली का निशाना बनाया गया. 15000 से अधिक राजनीतिक कैदी अलजीरिया निर्वासित कर दिए गए. ब्लेंक जान बचाकर भागते हुए बेल्जियम के रास्ते लंदन पहुंचा. उस हत्याकांड के लिए जिम्मेदार जनरल केवनाॅक को ‘जून का कसाई’ कहकर आज भी धिक्कारा जाता है.

मार्क्स ने जून-क्रांति को अपनी आंखों से देखा था. क्रांति की उस विफलता उसको गहरा आघात पहुंचा था. फ्रांस की परिस्थितियां अब उसके प्रतिकूल थीं. उसका अगला पड़ाव जर्मनी था, जहां उसने ‘न्यू रीनिश जेटुंग’ नामक समाचारपत्र को दुबारा निकालना आरंभ किया. उसकी ढेर सारी ऊर्जा इस पत्र के माध्यम से नए पूंजीपतिवर्ग जिसे वह ‘बुर्जुआ’ वर्ग कहता था तथा प्रूशियन कुलीनतावाद के विरोध पर खर्च होने लगी. जर्मन सरकार स्वयं मजदूर आंदोलनों से जूझ रही थी. यही कारण है कि मार्क्स और उसका समाचारपत्र जर्मन सरकार की आंखों की किरकिरी बनने लगे. अंततः सरकार ने दमन का रास्ता अपनाया. 7 फरवरी 1849 को उसको गिरफ्तार कर लिया. आरोप मामूली था, इसलिए तत्काल रिहा करना पड़ा. मार्क्स के लिए यह मुक्ति अल्पकालिक सिद्ध हुई. अगले ही दिन मजदूरों को बगावत के लिए उकसाने जैसा गंभीर आरोप लगाकर उसे पुनः गिरफ्तार कर लिया गया. प्रशासन इस बार भी मार्क्स को दोषी सिद्ध करने में नाकाम रहा. अंततः उसको रिहा करना पड़ा. सरकार भली-भांति समझती थी कि मजदूरों को क्रांति के लिए प्रेरित करने में मार्क्स के समाचारपत्र का बहुत बड़ा योगदान है. इसलिए उसके समाचारपत्र पर अघोषित प्रतिबंध लागू रहा. पेरिस में मार्क्स के लिए स्थितियां लगातार दुरूह होती जा रही थीं. विकट परिस्थितियों के बीच समाचारपत्र निकाल पाना संभव न था. अंततः फ्रांस को अलविदा कह, वह वहां से रवाना हो गया. नई क्रांति की चाहत के साथ, जिसके बारे में उसका मानना था कि वह नए संकट से ही जन्म ले सकती है.

लंदन प्रवास
मई 1849 में मार्क्स लंदन पहुंचा. लंदन प्रवास के प्रारंभिक दिन उसको अपने परिवार के साथ भीषण गरीबी और दीनता के बीच बिताने पडे़. कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो द्वारा दुनिया के करोड़ों मजदूरों-किसानों के दिलों में क्रांति की मशाल जला देने वाला विलक्षण लेखक-आंदोलनकारी उन दिनों ‘न्यू यार्क ट्रिब्यून’ का मामूली संवाददाता था. अखबारों में छपने वाले आलेख ही अपनी आमदनी का प्रमुख òोत थे. उन दिनों वह लंदन में अपने बड़े परिवार के साथ तीन कक्षवाले छोटे से मकान में रहता था. उसके सात बच्चों (एम. लांजेट(1844—1883), जेनी लौरा (1845—1911), एडगर(1847—1855), हेनरी एडवर्ड जीडो(1849—1850), जेनी एवलाइन फ्रांसिसका(1851—52), जेनी जूली एलीनर(1855—1898), तथा एक अन्य बच्चा जो नामकरण से पहले ही जुलाई, 1857 में कालकवलित हो चुका था. इनके अतिरिक्त मार्क्स का एक उसकी नौकरानी से भी एक बेटा था, जो मात्र नौ वर्ष ही जी सका.) में से केवल तीन जीवित रह सके थे. समय पर उपचार न हो पाने के कारण बाकी असमय मृत्यु का शिकार हुए थे. क्रांति की विफलता के बाद पूंजीवादी समाचारपत्रों में मार्क्स के लेखन पर अघोषित प्रतिबंध था. लोगों के मन में श्रमिक आंदोलन से विश्वास भी घटने लगा था, जिससे उसकी पुस्तकों की बिक्री पर भी ग्रहण लगा था. फ्रैडरिक ऐंगल्स उसका आत्मीय मित्र और मददगार था. ऐंगल्स का कपड़ों का छोटा व्यवसाय था. आर्थिक दृष्टि से वह मार्क्स की अपेक्षा बेहतर अवस्था में था. घोर आर्थिक संकट और शारीरिक व्याधियों के बावजूद उसका मस्तिष्क अब भी पहले की भांति सजग और सक्रिय था. लक्ष्य की ओर उन्मुख उसके मनस् में अब भी नई-नई योजनाएं उमड़ती रहती थीं.

क्रांति की विफलता ने मार्क्स को नए सिरे से सोचने के लिए विवश किया था.जनसाधारण के बीच श्रमिक आंदोलन के प्रतिष्ठा लगातार घट रही थी. आसन्न चुनौतियों से जूझने के लिए उसने राजनीति एवं अर्थव्यवस्था के अंतःसंबंधों और पूंजीवाद का अध्ययन करना आरंभ कर दिया, ताकि कारणों की तह तक जा सके. इसके साथ-साथ वह क्रांतिकारी संगठनों को एकजुट करने का प्रयास भी करने लगा. क्रांति की संभावना और उसके अनुकूल परिणामों के प्रति उसका विश्वास अब भी दृढ़ था. उसने कम्युनिस्ट लीग की सदस्यता दुबारा प्राप्त कर, खुद को एक बार पुनः परिवर्तन के प्रति झोंक दिया. लीग के सदस्य के रूप उसने फ्रांसिसी क्रांति और उसके परिणामों को लेकर दो लंबे पंपलेट्स लिखे. इसके साथ-साथ वांछित परिवर्तन के लिए नए रास्तों की खोज की चाहत में उसने राजनीतिक अर्थशास्त्र का अध्ययन करना आरंभ कर दिया. उस समय वह अपनी उम्र के चालीसवें दशक में था, मगर शारीरिक व्याधियां और परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति उसको लगातार परेशान रखती थीं. बावजूद इसके श्रम-कल्याण के प्रति उसके समर्पण में कहीं कमी नहीं थी. चुनौतियां उसको और ऊर्जस्वित करती थीं.

मार्क्स द्वारा राजनीतिक अर्थशास्त्र के गंभीर अध्ययन का परिणाम 1857 में सामने आया. उसके हाथों में 800 पृष्ठों की विशाल पांडुलिपि थी. इसके अलावा पांडुलिपि से संबंधित विषयों को लेकर दर्जनों लेख थे, जिसमें उसने पूंजी, श्रम, मजदूरी, राज्य, विदेश व्यापार, वैश्विक बाजार, उधार चल-अचल संपत्ति, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के विकार, आदि की स्थिति तथा उनके अंतःसंबंधों को लेकर गंभीरतापूर्वक विचार किया था. वस्तुतः इन विषयों की विवेचना से संबंधित पुस्तक की रूपरेखा करीब बीस वर्ष से मार्क्स के दिमाग में थी. अंततः 1860 के प्रारंभिक महीनों में पुस्तक को तीन बड़े खंडों में टंकित कराया गया. इन खंडों में रिकार्डो और एडम स्मिथ के आर्थिक विचारों की समीक्षा के साथ पूंजीवाद के दुष्परिणामों का खुलासा करते हुए, विकल्प के रूप में वर्गहीन समाज के गठन का आग्रह किया गया था.

मार्क्स के असंतोष एवं अन्यान्य कारणों के चलते वे पांडुलिपियां तत्काल पुस्तकाकार न छप सकीं. 1867 में उस पुस्तक का पहला खंड प्रकाशित हुआ. मार्क्स ने उसको शीषर्क दिया था—पूंजी(दास कैपीटल). पहले खंड में उसने श्रम सिद्धांत, अधिशेष मूल्य एवं श्रम-शोषण से संबंधित विचारों को सम्मिलित किया था. विश्लेषण के दौरान वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि अधिशेष मूल्य, पूंजीवादी शोषण प्रकारांतर में औद्योगिक घाटे का कारण बनेंगे, जो अंततः पूंजीवाद को पतन की ओर ले जाएगा. ‘पूंजी’ का सर्वत्र स्वागत किया गया. मार्क्स की छवि एक सक्रिय आंदोलनकारी से एक प्रखर बुद्धिजीवी के रूप में उभरने लगी. मार्क्स अपने वृहद् गं्रथ ‘पूंजी’ के दूसरे और तीसरे खंड की तैयारी भी 1860 में ही कर चुका था. लेकिन पुस्तक और और समृद्ध करने की कोशिशों के फलस्वरूप उन खंडों का प्रकाशन उसके जीवनकाल में संभव न हो सका. पूंजी (दास कैपीटल) का दूसरा और तीसरा खंड, मार्क्स की मृत्यु के पश्चात ऐंगल्स के प्रयासों के फलस्वरूप, क्रमशः 1885 और 1894 में ही सामने आ सके. पूंजी के समय पर प्रकाशित न होने का एक कारण मार्क्स की विभिन्न मजदूर आंदोलन में सक्रियता भी थी.

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन
नई क्रांति की संभावना और मजदूर आंदोलन को पुनर्जीवित और सक्रिय करने के प्रयास में 1864 में ‘अंतरराष्ट्रीय कामगार संगठन—प्रथम अंतरराष्ट्रीय का गठन किया गया. इसके सदस्यों में पीयरे जोसेफ प्रूधों, मिखाइल बकुनिन, ए. ब्लेंकी आदि मजदूर नेता सम्मिलित थे. जर्मन मजदूरों के प्रतिनिधि के रूप में संगठन में सम्मिलित हुए मार्क्स को उसकी कार्यकारी परिषद का सदस्य बनाया गया. उन दिनों उसकी दर्शनशास्त्र के विशिष्ट अध्ययन की योजना थी. लेकिन संगठन के उद्देश्य को व्यापक लोकहित में मानते हुए उसने स्वयं को उसके पुनर्गठन और मजदूर आंदोलन को पुनः सक्रिय बनाने के प्रति समर्पित कर दिया. ‘फस्र्ट इंटरनेशनल’ के गठन में इंग्लेंड और फ्रांस के श्रमिक-संगठनों का वर्चस्व था. उसकी पहली सभा का आयोजन 1865 में जिनेवा में किया गया. मार्क्स तथा उसका एक साथी जाॅन जार्ज एक्युरियस जो लंदन में दर्जी का काम करता था, सभा की शुरुआत से लेकर अंत तक बैठे रहे. उस सभा में पहली बार समाजवादी अर्थव्यवस्था के स्वरूप पर खुलकर विचार किया गया. ‘फस्र्ट इंटरनेशनल’ का संदेश दूर तक गया. श्रमिक-वर्ग एक बार फिर समाजवादी राष्ट्र-राज्य का सपना देखने लगा, जो उसके पहले तक केवल पुस्तकों और व्याख्यानों तक सीमित था. सामंतवाद से त्रस्त वुद्धिजीवियों में से कुछ पूंजीवाद को विकल्पहीन मानने लगे थे, मार्क्स के विचारों से उनके मन में वैकल्पिक अर्थव्यास्था का खाका तैयार होने लगा.

पहली सभा के चार वर्ष पश्चात, समाजवादी आंदोलन को गतिशील बनाने के लिए मार्क्स और ऐंगल्स के प्रयासों के फलस्वरूप 1869 में जर्मनी में सामाजिक-गणतांत्रिक पार्टी का गठन किया गया था. मार्क्स का यह एक युग-प्रवत्र्तक कार्य था. उसी समय फर्डीलेंड लेसले द्वारा स्थापित जर्मन कामगार मजदूर संघ भी श्रमिकों को एकजुट करने के लिए प्रयासरत था. आंदोलन की एकजुटता और उसकी शक्ति को बचाए रखने के लिए मार्च में समाजवादी-गणतांत्रिक पार्टी का विलय, उसके गठन के छह वर्ष बाद ही, ‘जर्मन कामगार महासंगठन’ में कर दिया गया. कालांतर में इस संगठन ने ‘समकालीन जर्मन सामाजिक डेमोक्रेटिक पार्टी’ का रूप ले लिया.

मार्क्स को ‘अंतरराष्ट्रीय कामगार संगठन’ से काफी उम्मीदें थीं. वह उसकी सफलता के लिए अपने साथियों के साथ सक्रिय था. लेकिन संगठन की कार्यनीति को लेकर उसके भीतर से ही विरोध के स्वर उठने लगे थे. वस्तुतः मार्क्स और ऐंगल्स सहित उनके साथी मजदूर राज्य की कामना करते हुए समाजवादी ढांचे के अनुरूप, लोकतांत्रिक केंद्र द्वारा संचालित उत्पादनतंत्र की स्थापना का सपना देखते थे, जबकि अराजकतावादी नेता श्रमिकों द्वारा नियंत्रित, पूर्णतः विकेंद्रीकृत उत्पादन-तंत्र की स्थापना पर जोर दे रहे थे. उनका नेतृत्व मिखाइल बकुनाइन(1840—1913) के हाथों में था. प्रूधों तथा उसके समर्थक अराजकतावादी नेताओं का मानना था कि पूंजीवाद को राज्य से अलग कर पाना असंभव है. इनमें से किसी एक को नष्ट करने के लिए दूसरे का नष्ट करना आवश्यक है. अतएव पूंजीवाद के आमूल नाश के लिए वे राज्य की सत्ता का विखंडन अपरिहार्य मानते थे. उस विवाद में अंततः मार्क्स को ही जीत हासिल हुई. वह जनरल काउंसिल की सीट को लंदन से न्यू यार्क स्थानांतरित करने में कामयाब भी हो गया. मगर अंदरूनी विवादों और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के चलते फस्र्ट इंटरनेशनल को अपेक्षित सफलता न मिल सकी. एक समाजवादी समाज के रूप में 1871 में स्थापित पेरिस कम्यून उस संगठन के खाते में बड़ी उपलब्धि के रूप में दर्ज है.
पेरिस कम्यून

पेरिस कम्यून की स्थापना में मार्क्स का सीधे हाथ नहीं था. मगर प्रेरणा उसी की थी.अपने ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ की शुरुआत ही उसने इस वाक्य से की थी कि मानव-सभ्यता का अभी तक का इतिहास वर्ग-संघर्ष का रहा है. वह पूंजीवाद को सामंतवाद का ही परिष्कृत-परिवर्तित रूप मानता था. कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो में उसने तर्क द्वारा समझाने का प्रयास किया था कि अपनी पूर्ववर्ती सामाजिक-आर्थिक प्रणालियों की भांति पूंजीवाद भी सामाजिक असंतोष को बढ़ावा देने वाला सिद्ध होगा, जो अंततः सामाजिक संघर्ष और उसके विखंडन का कारण बनेगा. उसे विश्वास था कि एक न एक दिन समाजवादी व्यवस्था पूंजीवाद को अपदस्थ कर अपना स्थान बनाने में कामयाब सिद्ध होगी, जो एक वर्गहीन, राज्य-विहीन समाज की जननी होगी. तभी पूर्णसमाजवाद का सपना सत्य हो सकेगा. उस अवस्था को मार्क्स ने ‘विशुद्ध साम्यवाद’ की संज्ञा दी थी. सामान्य रूप से समाजवाद और साम्यवाद को एक ही समझा जाता है. मार्क्स की दृष्टि में साम्यवाद ‘श्रमिक-राज्य’ अथवा ‘श्रमिक गणतंत्र’ के बाद की अवस्था है. श्रमिक-राज्य को वह ‘श्रमिकों की तानाशाही’ पूर्ण व्यवस्था भी मानता था, उसमें समस्त निर्णय श्रमिकों द्वारा, श्रमिकों के हित में लिए जाते हैं. मार्क्स का मानना कि वर्ग संघर्ष के दौर में श्रमिक पूंजीपतियों के सत्ता छीनकर उसपर कब्जा कर लेंगे. वह वांछित परिवर्तन का पहला चरण होगा. दूसरे चरण में श्रमिक-शासित राज्य वर्गहीन-राज्यविहीन समाज की आधारशिला रखेगा. पेरिस कम्यून वास्तव में श्रमिकों द्वारा गणतांत्रिक पद्धति पर अनुशासित, वर्गविहीन अवस्था थी. हालांकि नेतष्त्व और अनुभव की कमी के कारण वह प्रयोग मात्र दो महीने तक ही चल सका था, मगर इतने कम समय में ही उसने पूंजीवाद के समानांतर जिस वैकल्पिक व्यवस्था का स्वरूप प्रस्तुत किया, वह कालांतर में दुनिया-भर के समाजवादी प्रयोगों का प्रेरक बना.
फ्रांस और प्रूशिया के युद्ध में फ्रांस की पराजय से वहां के आम नागरिकों के बीच जहां शासकवर्ग के प्रति आक्रोश की लहर थी. ऊपर से युद्ध के बाद बेरोजगारी और महंगाई की मार से जनजीवन अकुलाया हुआ था. घोर अराजकता का वातावरण था. अव्यवस्था के वातावरण में लोगों का तत्कालीन शासकों से भरोसा ही उठ चुका था. उल्लेखनीय है कि जुलाई 1870 में प्रूशिया से युद्ध की पहल तत्कालीन फ्रांसिसी सम्राट नेपोलियन तृतीय द्वारा की गई थी. बिना किसी तैयारी के युद्ध की घोषणा कर देना, सिर्फ एक राजसी सनक थी, जिसके कारण सम्राट को अंततः पराजय का मुंह देखना पड़ा. सितंबर आते-आते पेरिस का जनजीवन अस्तव्यस्त हो चला था. युद्ध के कारण अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और भी चैड़ी हो चुकी थी. सूदखोर व्यापारी युद्ध की स्थितियों का लाभ उठाकर मनमाने तरीके से लूट मचा रहे थे. भोजन की काफी किल्लत थी. प्रशासन के स्तर पर पूरी तरह अराजक स्थिति थी. जनसाधारण की कोई सुनने वाला न था. ऊपर से प्रूशिया की सेनाओं द्वारा बमबारी और फ्रांसिसी सैन्यबलों की नाकामी से श्रमिक-असंतोष विद्रोह ही स्थिति तक जा पहुंचा था.

सेना में उच्चस्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार, सैनिकों के कमजोर मनोबल तथा हताशा के कारण फ्रांस का पतन हुआ. पराजित फ्रांसिसी सम्राट को जर्मनी के सम्राट के आगे, उसकी शर्तों पर युद्धविराम के लिए विवश होना पड़ा. इससे तुरंत बाद जर्मन सैनिकों ने नगर में विजेता के दंभ के साथ प्रवेश किया. पेरिसवासियों के मन में प्रूशियावासियों और जर्मन साम्राज्य के प्रति बेहद नाराजगी थी. लोग भीतर ही भीतर सुलग रहे थे. स्थानीय नागरिकों ने मिलकर एक ‘राष्ट्रीय सुरक्षादल’ का गठन किया था. उसने सदस्यों में अधिकांश श्रमिक और कारखानों में काम करने वाले कारीगर थे. नागरिक सेना का नेतृत्व प्रगतिशील समाजवादी नेताओं के अधीन था. नागरिक सेना के प्रति जनसाधारण के समर्थन और विश्वास का अनुमान मात्र इसी से लगाया जा सकता है कि स्वयंसेवी सैनिकों की संख्या रातदिन बढ़ रही थी. स्त्री, बच्चे और बूढ़े जो लड़ाई में सीधे हिस्सा लेेने में असमर्थ थे, वे भी अपने अनुकूल काम खोज रहे थे, ताकि अवसर पड़ने पर दुश्मन से लोहा रहे राष्ट्रीय सुरक्षाकर्मियों को मदद पहुंचा सकें.

इस बात की अफवाह भी उड़ रही थी कि जर्मन सम्राट नगर में घुसने के बाद नागरिकों पर आक्रमण भी कर सकता है, उसके बाद नगर राजशाही के अधीन होगा. फरवरी 1871 का चुनाव भी राजशाही को बढ़ावा देने का संकेत देता था. ऐसी अफवाहें लोगों के गुस्से को परवान चढ़ाने के लिए पर्याप्त थीं. पेरिसवासी वैसे भी निडर थे. युद्ध उनके लिए कोई नई बात न थी. वर्षों से वे स्वशासन और आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ते आ रहे थे. इसलिए जर्मन सम्राट के सैन्यबल के साथ नगर-प्रवेश के पूर्व ही उसके विरोध की तैयारियां हो चुकी थीं. नागरिक सेना के विद्रोह को जनसाधारण के समर्थन का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि सेना का सशस्त्र विरोध करने के लिए आवश्यक तोपों और हथियारों की खरीद के लिए पेरिस के सामान्य नागरिकों ने भी चंदा दिया था. जर्मन सम्राट के प्रवेश से पहले ही तोपें उपयुक्त स्थान पर अच्छी तरह से तैनात कर दी गई थीं. उनके संचालन के लिए नागरिक सैनिक तैयार किए जा रहे थे. ऊंचाई पर स्थित मोंटमेंट्री नामक स्थान को विद्रोह के प्रमुख ठिकाने के रूप में चुना गया था. वह सामरिक दृष्टि से भी अनुकूल था. उसके चारों ओर मजदूर बस्तियां थीं, निवासियों में से अधिकांश नागरिक सेना के प्रति समर्पित थे.

सारी तैयारी इतनी गुपचुप और भरोसेमंद थी कि भारी-भरकम सैन्यबल के साथ नगर-प्रवेश की तैयारी कर रहे जर्मन-सम्राट को इसकी खबर तक न लगी थी. गणतंत्र के अभ्यस्त हो चले पेरिसवासियों को राजशाही के नाम से ही चिढ़ थी. इसलिए जर्मन सेना से निपटने के लिए भीतर ही भीतर तैयारी चल रही थी. जर्मन की जंगी सेना के मुकाबले साधनविहीन, लगभग हार के मुहाने पर खड़े पेरिस- वासियों के मन में अपनी अस्मिता, मान-सम्मान और आजादी के प्रति इतना गहरा अनुराग था कि लोग नागरिक सेना में भर्ती होने उमड़े आ रहे थे. उनमें स्त्री-पुरुष, बूढ़े और बच्चे हर वर्ग के लोग थे, जो स्वेच्छा से मर-मिटने को तैयार थे. हर कोई ‘अपना राज’ चाहता था तथा उसके लिए यथासंभव बलिदान देने को उत्सुक था.

अस्थायी सरकार के मुखिया एडोल्फ थीयर को मालूम था कि राजनीतिक अस्थिरता और उथल-पुथल का लाभ उठाकर नागरिक सुरक्षादल ने वैकल्पिक शक्तिकेंद्र बना लिए हैं. आमजनता का उन्हें संरक्षण प्राप्त है. उसकी मुख्य चिंता थी कि हथियारबंद नागरिक सुरक्षादल के साथ-साथ श्रमिक-कामगार भी हथियार उठा सकते हैं, जिससे क्रुद्ध होकर जर्मन सेना नगर में तबाही मचा सकती है. इस बीच जर्मन सेना अल्प समय के लिए पेरिस में आई और समस्त आशंकाओं पर पानी फेरते हुए वहां से शांतिपूर्वक प्रस्थान कर गई. बावजूद इसके पेरिस का वातावरण गरमाया रहा. नगर के अशांत वातावरण से बचने के लिए नवनिर्वाचित राष्ट्रीय असेंबली ने बार्डोक्स के बजाय, उससे मीलों दूर पेरिस के दक्षिण-पश्चिम में स्थित वर्सेलाइस को अपना सम्मेलन-स्थल बनाने का निर्णय किया. सम्मेलन के लिए अधिकांश नेताओं के पेरिस से प्रथान कर जाने से वहां राजनीतिक शून्य पैदा हो गया. नेशनल असेंबली के सदस्यों में से

अधिकांश राजशाही और साम्राज्यवाद के के समर्थक थे. दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन में लोकतंत्र समर्थकों का वर्चस्व था. असेंबली के सदस्यों के वर्सेलाइस प्रस्थान करते ही स्थानीय प्रशासन पर उनकी पकड़ ढीली पड़ गई. दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षादल की केंद्रीय समिति में सुधारवादियों का अनुपात और उनका प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था. हालात का अनुमान लगाते हुए सरकार ने निर्णय लिया कि सेना की चार सौ तोपों को नागरिक सुरक्षादलों के अधिकार में रखना सामरिक दृष्टि से उचित नहीं है. अतएव 18 मार्च को जनरल थीयर ने सेना को आदेश दिया कि वह मोंटमेंट्री की पहाड़ियों तथा उसके आसपास के क्षेत्रों पर तैनात तोपखाने को अपने अधिकार में कर ले. मगर कुछ ही दिन पहले जर्मन सेना से भारी पराजय झेल चुके सैनिकों का मनोबल बहुत गिरा हुआ था. अपने ही लोगों का सामना करने का उनमें साहस न था. विवश होकर नागरिक सुरक्षादल के स्वयंसेवकों तथा स्थानीय नागरिकों को भी उस टुकड़ी में शामिल करना पड़ा, जिनके मन में सरकार के प्रति पहले ही आक्रोश भरा था.

सरकारी तोपखाने को अपने कब्जे में लेने के लिए वह टुकड़ी जैसे ही मोंटमेंट्री पहुंची, स्थानीय नागरिक और सुरक्षाकर्मी भड़क गए. क्लाउड मार्टिन लेकाम्टे सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व कर रहा था, उसने अदूरदर्शिता और नासमझी का प्रदर्शन करते हुए सुरक्षाबलों और स्थानीय जनता पर गोलीबारी का आदेश सुना दिया. जिससे लोग भड़क गए. भीड़ ने लेकाम्टे तथा जनरल थाॅमस को उनके घोड़ों से खींच लिया. उत्तेजित नागरिक सैनिकों ने दोनों को वहीं गोली से उड़ा दिया. बुजुर्ग जनरल था॓मस कभी नागरिक सुरक्षादल का कमांडर होता था, मगर अवसरवादी रुख अपनाते हुए वह राजशाही के पक्ष में चला गया था. उत्तेजित भीड़ ने उसको भी वहीं दबोच लिया. विद्रोहियों का रुख पहचानकर सेना भी उनके साथ मिल गई. जनरल थीयर ने पेरिस को खाली कराने का आदेश दिया. तब तक विद्रोही पूरे शहर में फैल चुके थे. स्थानीय नागरिक बड़ी संख्या में उनका साथ दे रहे थे. सेना का कहीं अता-पता न था. उधर एक सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व करना हुआ जनरल थीयर वर्सेलाइस के लिए प्रस्थान कर चुका था. इससे लोगों में संकेत गया कि वह घबराकर भागा है. इसके फलस्वरूप नागरिक सेना का मनोबल और भी बढ़ गया. यद्यपि जनरल थीयर ने बाद में दावा किया था कि पेरिस से हटना उसकी एक रणनीतिक चाल थी, तथापि उस समय नागरिकों और सुरक्षाबलों ने माना कि आसन्न पराजय से क्षुब्ध होकर पेरिस से भागा है.

पेरिस के चप्पे-चप्पे पर नागरिक सुरक्षाकर्मी छाए हुए थे. शासक के रूप में मात्र नागरिक सुरक्षादल तथा उनकी केंद्रीय समिति थी. स्थिति की गंभीरता को समझते हुए उन्होंने गणतांत्रिक पद्धति के अनुरूप शासन चलाने का निर्णय लिया. आनन-फानन में लोकतांत्रिक विचारधारा के समर्थकों तथा श्रमिक नेताओं की बैठक बुलाई गई. आमचुनावों के लिए 26 मार्च, 1871 का दिन तय कर दिया गया. स्थानीय प्रशासन को व्यवस्थित रूप देते हुए 92 सदस्यीय कम्यून-परिषद का गठन किया गया. उसमें बड़ी संख्या दक्ष कामगारों और श्रमिक नेताओं की थी. उनके अलावा परिषद में डाॅक्टर, पत्रकार, नर्स, अधिवक्ता, अध्यापक जैसे पेशेवर, राजनीतिक कार्यकर्ता, सुधारवादी नेता, छोटे उद्यमी, उदार धर्मपंथी तथा समाजवादी नेता सम्मिलित थे. जर्मन सम्राट की सेना और उसके सभी सैनिक अवसर देखकर पेरिस छोड़ चुके थे. नगर पूरी तरह से विद्रोही नागरिक सेना के अधिकार में था.
इस अचानक सत्ता परिवर्तन का अनुमान न तो सरकार को था, न ही नागरिक सुरक्षाबलों को. इसलिए अप्रत्याशित परिवर्तन के बाद की स्थितियों के लिए कोई तैयार न था. प्रशासन को समाजवादी विचारधारा के अनुरूप, नए सिरे से गठित करने की आवश्यकता थी, जिसका सैनिकों और कार्यकर्ताओं को अनुभव ही नहीं था. उन्हें विश्वास था कि कि लुईस ब्लेंक और उसके समर्थक, अराजकतावादी-समाजवादी विचारक लुईस अगस्त ब्लेंकी प्रशासन और नागरिक सेना की बागडोर संभालेंगे तथा बदले हुए वातावरण में सबसे प्रभावी क्रांतिनेता सिद्ध होंगे. मगर नागरिक सेना का दुर्भाग्य रहा कि 17 मार्च के दिन ब्लेंकी को भी गिरफ्तार कर लिया गया. जीवन के बाकी दिन उसको जेल ही में बिताने पड़े. एक सौदे के रूप में कम्यून के नेताओं ने ब्लेंकी के प्रत्यार्पण के बदले पेरिस के पुजारी डारबी तथा 74 अन्य युद्धबंदियों को छोड़ देने का आश्वासन दिया, मगर थीयर ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया. तो भी नागरिक सुरक्षाबलों तथा आंदोलनकर्मियों के अनुशासन में 28 मार्च को पेरिस कम्यून में ढल गया. वर्गहीन-राज्यविहीन समाज गढ़ने की कोशिश में सभी स्थानीय निकायों को भंग कर दिया. अनुभव की कमी के बावजूद समाजवादी आंदोलन के इतिहास में पेरिस कम्यून को मिली कामयाबी अद्वितीय और चामत्कारिक थी.

क्रांति की सफलता और सुनिश्चितता के लिए जनजीवन को पटरी पर लाना अत्यावश्यक था. अतएव केंद्रीय परिषद ने जनसुविधाओं की बहाली और प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए कई कदम उठाए, जिसके कारण पेरिसवासियों को आजादी का एहसास हुआ. मगर युद्ध के बाद अस्त-व्यस्त हो चुके जनजीवन को सहेजने के लिए बड़े पैमाने पर नागरिक सुविधाओं की जरूरत थी. इसलिए उनकी बहाली हेतु सार्थक कदम उठाए गए. पेरिस के उन विद्रोही समाजवादियों, लोकसेवकों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर बहुत कम, मात्र दो महीने ही मिल पाया. किसी भी व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त कर पटरी पर वापस लाने के लिए इतना समय नगण्य होता है. तो भी इस अवधि में कम्यून के संचालकों ने आपसी सहमति और सर्वकल्याण की भावना के साथ कई महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए थे, जो आगे चलकर समाजवादी व्यवस्था के प्रेरणास्रोत बने—

क. राज्य और धर्मस्थलों को एक-दूसरे से असंबद्ध करना.
ख. जितने समय तक नगर का कामकाज ठप्प रहा था, उस अवधि का किराया पूरी तरह माफ माफ करना.
ग. पेरिस स्थित सैकड़ों बेकरियों में रात की ड्यूटी करने पर पाबंदी. उनमें बड़ी संख्या में स्त्री और बच्चे काम करते थे.
घ. अविवाहित जोड़ों तथा ड्यूटी के दौरान मारे गए नागरिक सैनिकों के लिए पेंशन की व्यवस्था करना.
ड़. युद्धकाल में श्रमिकों द्वारा गिरवी रखे गए औजारों और घर के साज-सामान की बिना किसी अदायगी के वापसी. कम्यून का विचार था कि अधिकांश दक्ष कारीगरों को युद्धकाल अपने औजार गिरवी रखने के लिए विवश किया गया था.
च. वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए गए ऋण पर भुगतान को स्थगित करना तथा सभी प्रकार के ऋणों पर देय ब्याज से मुक्ति.
छ. कारखाना मालिकों द्वारा छोड़े गए तथा निष्क्रय पड़े कारखानों को श्रमिकों को चलाने का अधिकार. यद्यपि पूर्व कारखाना मालिकों को क्षतिपूर्ति के रूप में समुचित भत्ता मांगने का अधिकार दिया गया था.

चर्च को राज्य से अलग करने का परिणाम यह हुआ कि उसकी समस्त परिसंपत्तियां जनता के स्वामित्व में आ गईं. पाठशालों में धार्मिक गतिविधियों का आयोजन तत्काल प्रभाव से बंद करा दिया गया. चर्च की धार्मिक गतिविधियों को सीमित करने का भी प्रयास किया गया. वे अपनी धार्मिक गतिविधियां उसी अवस्था में चला सकती थीं, जब उन्हें शाम के समय राजनीतिक बैठकों के लिए खुला रखा जाए. यह जीवन में धर्म के हस्तक्षेप को न्यूनतम करने तथा उसके नाम पर संरक्षित संसाधनों का व्यापक लोकहित में उपयोग करने की दूरदर्शी योजना थी. शिक्षा में सुधार और सभी के लिए निःशुल्क और अनिवार्य तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था भी की गई. स्पष्ट है कि आंदोलनकारियों द्वारा पेरिस कम्यून को पूर्णतः वर्गहीन समाज के अनुरूप गढ़ने का प्रयास किया गया था.

पेरिस कम्यून के गठन की घटना को इसलिए भी याद किया जाना चाहिए कि उसके माध्यम से फ्रांस में पहली बार स्त्री-शक्ति का ओजस्वी रूप सामने आया. यद्यपि रूसो(1712—1778) अठारहवीं शताब्दी में ही स्त्री समानता का समर्थन कर चुका था. बाद में फ्यूरियर ने उस आंदोलन को आगे बढ़ाने काम किया. उसी ने ‘फेमिनिज्म’ जैसा सार्थक शब्द गढ़ा. फ्यूरियर की ही प्रेरणा पर महिला श्रमिकों ने आगे बढ़कर ‘अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन’ की सदस्यता ग्रहण की थी. पेरिस की आजादी के संघर्ष में भी महिला आंदोलनकारियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. उनमें से एक थी पेशे से जिल्दसाज, नेथाली लेमल. समाजवादी विचारों में आस्था रखने वाली नेथाली ने ऐलिजाबेथ डिमीट्रिफ के साथ मिलकर पेरिस की आजादी के लिए महिला संगठन बनाया था. उसका नाम था—‘पेरिस की सुरक्षा तथा घायलों की देखभाल के लिए महिला संगठन.’ डिमीट्रिफ अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रूसी शाखा की सदस्य रह चुकी थी और उन दिनों रूस से निर्वासन की सजा भोग रही थी. कुछ ही दिनों बाद इस संगठन को स्त्रीवादी लेखक आंद्रे लियो का भी समर्थन मिल गया. लियो पित्रसत्तात्मकता को पूंजीवाद को प्रश्रय देने वाली व्यवस्था मानते थे. उन्हें विश्वास था कि पित्रसत्तात्मकता के विरुद्ध उनका अभियान कालांतर में पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा बनेगा. नेथाली द्वारा गठित संगठन की मुख्य मांगें थीं—‘स्त्री समानता तथा समान मजदूरी’. इनके अलावा तलाक का अधिकार, धर्मनिरपेक्ष शिक्षा, संसाधनों में समान भागीदारी आदि भी स्त्रीवादियों की मांग में सम्मिलित थे. संगठन ने विवाहिता स्त्री और रखैल के बीच अंतर को मिटाने के साथ-साथ उनकी संतानों के बीच भेदभाव खत्म करने की मांग भी थी. आशय यह है कि पेरिस कम्यून का वातावरण पूरे समाज को नई चेतना सराबोर कर रहा था.

नागरिक संगठन एक ओर सामूहिक जीवन को समृद्ध बनाने के लिए निरंतर नए प्रयास कर रहे थे, उधर पू्रशिया सरकार थीयर की मदद के लिए हाथ बढ़ा चुकी थी. उसी की मदद से पूरे पेरिस की घेराबंदी कर दी गई. अंततः 21 मई को थीयर के नेतृत्व में संयुक्त सेना ने पश्चिमी दरवाजे से नगर पर हमला बोल दिया. नागरिक सुरक्षाकर्मियों ने आम जनता की मदद से उन्हें रोकने का प्रयास किया. क्रुद्ध होकर प्रूशिया के सैनिकों ने कत्लेआम मचा दिया. पेरिस के चप्पे-चप्पे पर नागरिकों और सैनिकों के बीच घमासान युद्ध छिड़ा था. लोग राजशाही के अधीन रहने के बजाय स्वाधीन रहते हुए जान देना ठीक समझते थे. नगर के पूर्वी सिरे पर मजदूर बस्तियां थी. कम्यून की जीवनशैली में उन्हें सम्मानजनक अवसर मिले थे. इसलिए पू्रशिया और जनरल थीयर के सैनिकों का सर्वाधिक विरोध भी उसी ओर था. गरीब मजदूर जी-जान से संघर्ष कर रहे थे. मगर हथियारों की कमी और युद्धनीति की जानकारी का अभाव उनकी सफलता के आड़े आया. धीरे-धीरे श्रमिक सेना कमजोर पड़ने लगी. 28 मई, 1871 को आखिरकार पेरिस फिर से राजशाही के अधीन चला गया. क्रुद्ध सैनिकों ने खूब कत्लेआम किया. लेक्समबर्ग के बागों और लोबाउ छावनी में विशेषरूप से बनाई गई कत्लगाहों में हजारों विद्रोहियों को मौत के घाट उतार दिया गया. करीब 40,000 से अधिक युद्धबंदियों को निष्कासन की सजा सुनाई गई. आमजनता यहां तक कि स्त्रियों और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया.

सैनिकों ने हजारों स्त्रियों-बच्चों को अमानवीय अवस्था में भूखे-प्यासे कैद में रखा.
पेरिस पर सेना का कब्जा हो जाने के बाद 12,500 नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों पर मुकदमा चलाया गया. उनमें से 10,000 को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई गई, 23 को फांसी पर चढ़ा दिया गया. लगभग 4,000 को न्यू सेल्डोनिया में निर्वासित कर दिया गया. बाकी को कैद की सजा हुई. सेना द्वारा सामूहिक नरसंहार के उस सप्ताह में कुल कितने लोगों को मौत के घाट उतारा गया, इसका सही-सही आकलन आज तक नहीं हो पाया है. बेंडिक्ट एंडरसन के अनुसार उस ‘खूनी सप्ताह’ के भीतर पकड़े गए लगभग 20,000 सैनिकों में से कुल 7,500 को सजा सुनाई गई. जबकि कुछ विद्वान इस संख्या को 50,000 से भी अधिक बताते हैं. यहां उल्लेख करना आवश्यक है कि हालांकि पेरिस कम्यून की अवधारणा मार्क्स के सिद्धांत के अनुकूल थी. इसके पीछे कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो की प्रेरणा भी थी. बावजूद इसके पेरिस कम्यून में हुए खून-खराबे से मार्क्स को गहरा धक्का पहुंचा था, जिससे उसने खुद को लेखन और अध्ययन के प्रति समर्पित कर दिया.

पेरिस कम्यून में भारी उद्योगों का संचालन मजदूर संघों के समन्वित प्रयासों द्वारा लोकतांत्रिक आधार पर संभव होता था. सभी उद्योग एक श्रमिक महासंघ के अधीन संचालित होते थे. वह पूरी तरह एक वर्गहीन समाज था, जिसमें न पुलिस बल था, न जेल, न किसी प्रकार की हिंसा को वहां स्थान था. उत्पादन के स्रोतों में सबका साझा था. ऐसे वातावरण में वहां कोर्ट-कचहरी, जज-मुन्सिफ वगैरह की भी आवश्यकता नहीं थी. सरकार के सभी पदों का चुनाव लोकतांत्रिक परिषद द्वारा किया जाता था. सामंतवाद और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में निचले और ऊपर के स्तर पर व्याप्त वेतनमान की असंगतियों को दूर करने की ईमानदार कोशिश की गई थी. चयनित अधिकारियों को भी कामगारों की औसत मजदूरी के बराबर वेतन प्राप्त होता था. कर्तव्य में कोताही बरतने, किसी भी प्रकार का आरोप सिद्ध होने पर उन्हें वापस बुलाया जा सकता था. यूजेन पोत्येर नामक एक कामगार ने कम्यून के जीवन पर एक कविता लिखी थी, जिसका आशय है—
‘सुबह जो नाला साफ करता है, वह दस बजे आकर आफिस में बैठता है, कोर्ट में जज बनता है, शाम को आकर कविता लिखता है.’

समाजवाद के पहले प्रयोग के रूप में ख्यात पेरिस कम्यून का जीवनकाल मात्र 70 दिन रहा, वह प्रयोग एक समानता-आधारित समाज का प्रतीक माना गया. मगर मार्क्स और उसके मित्र ऐंगल्स को उसी से संतुष्टि नहीं थी. उनकी आंखों में साम्यवाद और पूर्णतः वर्गहीन समाज का सपना बसा था. कम्यून-व्यवस्था को वे नौकरीपेशा मजदूरों (बुर्जुआ वर्ग) की तानाशाही मानते थे. उनका तर्क था कि, ‘राज्य और कुछ नहीं, बल्कि एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के शोषण का अवसर देने वाली मशीन है…’ दोनों का विश्वास था कि श्रमिक-क्रांति द्वारा विनिर्मित ‘नवीन एवं मुक्त सामाजिक परिवेश में एक दिन सभी साहूकारों, पूंजीपतियों को कूड़े के ढेर में बदला जा सकेगा.’9 पेरिस कम्यून साम्यवाद की स्थापना का पहला चरण था. सरकार के भारी बलप्रयोग द्वारा समाप्त कर दिया गया, मगर समाजवादी व्यवस्था का जो रास्ता उसने दिखाया, वही आगे चलकर मार्क्स और ऐंगल्स के वैज्ञानिक समाजवाद के रूप में विकसित हुआ था, जिसने कुछ दशकों में ही दुनिया के लगभग आधे देशों में अपनी अच्छी-खासी पैठ बना ली.

पेरिस कम्यून की असफलता के पीछे मजदूर नेताओें के आपसी मतभेद भी थे. उनमें से हर कोई क्रांति का श्रेय स्वयं लेना चाहता था. इनमें मार्क्स और बकुनाइन के मतभेद भी जगजाहिर हैं. पेरिस क्रांति के बड़े नेताओं में से एक बकुनाइन का मानना था कि मार्क्स जर्मन मूल का घमंडी यहूदी है. तानाशाही उसके स्वभाव का स्वाभाविक हिस्सा है. इसलिए वह फस्र्ट इंटरनेशनल के माध्यम से श्रमिकों को अपनी तरह से हांकना चाहता है. दूसरी ओर मार्क्स मानता था कि सर्वहारा वर्ग को अपना राजनीतिक दल स्वयं गठित कर, अन्य राजनीतिक दलों को राजनीति के मैदान में ही टक्कर देनी चाहिए. बकुनाइन और उसके समर्थकों के लिए पेरिस कम्यून वांछित परिवर्तन की दिशा में क्रांतिकारी कदम था, जिसके माध्यम से वे सोचते थे कि मार्क्स द्वारा कल्पित ‘आधिकारिक साम्यवाद’ को जवाब दिया जा सकता है. इस तरह वे मार्क्स की उस छवि को धूमिल करना चाहते थे, जो कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो के बाद बुद्धिजीवियों और श्रमिकों के बीच बनी थी.

बहरहाल मार्क्स और बकुनाइन के समर्थकों के बीच विवाद बढ़ता ही बढ़ता ही गया, जिसके परिणामस्वरूप बकुनाइन को ‘फस्र्ट इंटरनेशलन’ से निष्कासित होना पड़ा. मगर विवाद का यहीं अंत नहीं था. बकुनाइन के निष्कासन के बाद भी विवाद थमा नहीं था. परिणामस्वरूप श्रमिक नेताओं और विचारकों में फूट बढ़ती ही गई. जिस ऊर्जा और बौद्धिक क्षमता का उपयोग क्रांति को सफल बनाने के लिए किया जाना चाहिए था, वह लगातार कमजोर पड़ता चलता गया. इससे लोगों का विश्वास अपने नेताओं से उठता चला गया. मार्क्स भी इससे काफी निराश हुआ. परिणाम यह हुआ कि उसने स्वयं को अध्ययन और लेखन के प्रति समर्पित कर दिया. जो हो, मार्क्स का सपना आज भी मरा नहीं है. पूंजीवाद के इस इस घनघोर जंगल में, इस शोषणकारी व्यवस्था में आज भी उसकी प्रासंगिकता पूर्वतः बनी हुई है.

संघर्ष और विराम
पेरिस कम्यून की असफलता के बाद मार्क्स, ऐंगल्स और मिखाइल बकनाइन के समर्थकों के बीच असहमतियां बहुत बढ़ चुकी थीं. यहां तक कि दोनों के बीच समझौते की कोई गुंजाइश नहीं, यह मान लिया गया. मार्क्स के दबाव में हेग कांग्रेस के दौरान अराजकतावादियों को ‘फस्र्ट इंटरनेशनल’ से निष्कासित कर दिया गया. धीरे-धीरे संगठन अपनी प्रासंगिकता खोकर विवादों के घेरे में आने लगा. अंततः 1876 में उसको भंग कर दिया गया. मार्क्स अब क्रांति की असफलता के कारणों की खोज में जुटा हुआ था. उसकी पुस्तक ‘पूंजी’ का पहला खंड 1867 ही छपकर आ चुका था, जिससे उसकी प्रतिभा को वैश्विक स्वीकार्यता मिली थी. पुस्तक के शेष दो खंडों पर काम जारी था. उस ग्रंथ के द्वारा मार्क्स की योजना पूंजी के विभिन्न रूपों तथा उसके आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक संबंधों की गवेषणा करना था, लेकिन लेखकीय असंतुष्टि और शारीरिक व्याधियों के चलते पुस्तक के शेष दो अंश मार्क्स के जीवनकाल में प्रकाशित न हो सके. दोनों खंड क्रमशः 1884 और 1895 में ऐंगल्स के संपादन में प्रकाशित हुए, तब तक उसकी मृत्यु हो चुकी थी. 1871 में ही उसने फ्रांसिसी क्रांति को लेकर एक और पुस्तक की रचना की थी, उसका शीर्षक था—‘दि सिविल वार इन फ्रांस’.

मार्क्स के जीवन का अंतिम दशक शारीरिक रूप से बहुत कष्टदायक था. ‘दि कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ और ‘पूंजी’ में जिस श्रम-क्रांति का सपना उसने देखा था और जिसके लिए वह आजीवन संघर्ष करता आया था, कमजोर स्वास्थ्य के कारण अब उस दिशा में आगे बढ़ पाना कठिन हो चुका था. तो भी जर्मन और रूस के राजनीतिक परिदृश्य पर लिखी गई अपनी आलोचनात्मक टिप्पणियांे के कारण वह चर्चा में बना रहा. मगर लगातार भागमभाग, अध्ययन और लेखन, ऊपर से आर्थिक अभावों के कारण बौद्धिक सक्रियता भी लंबे समय तक संभव न हो सकी. उसका स्वास्थ्य लगातार गिरता ही जा रहा था. ऊपर से बड़ी बेटी और पत्नी की मृत्यु ने उसको मानसिक रूप से अपंग कर दिया था. पत्नी जेनी ने उसके हर संघर्ष में एक सहधर्मिणी की भूमिका का निर्वाह किया था. वह सौंदर्य, स्नेह और समर्पण की मूर्ति थी. उसका न होना, जीवन से उमंगों और धैर्य का मिट जाना था. तो भी मित्रों के तीव्र आग्रह पर उसने स्वास्थ्य-लाभ के लिए यूरोप के पहाड़ी स्थलों, यहां तक कि अल्जीरिया की यात्राएं भी कीं. इसके बावजूद उसकी सेहत लगातार बिगड़ती गई. फेफड़ों की पुरानी बीमारी ही उसकी मृत्यु का कारण बनी. अंततः 14 मार्च, 1883 का वह दिन आ ही पहुंचा.

उस दिन, 2.45 बजे अपराह्न उस विलक्षण मेधा के स्वामी और जीवन के हर मोर्चे पर बौद्धिक सक्रियता दिखाने, श्रम-आधिकारिता के प्रबल पक्षधर, क्रांतिधर्मी लेखक ने जीवन की अंतिम सांस ली. मार्क्स की मृत्यु के तीन दिन पश्चात अपने शोक संदेश में उसके अभिन्न मित्र ऐंगल्स ने कहा था—

‘14 मार्च(1883) को, अपराह्न 2.45 बजे उस महान विचारक ने सोचना बंद कर दिया. उसको केवल दो मिनट के लिए अकेला छोड़ा गया था, जब हम वापस लौटे तो हमने उसको आरामकुर्सी पर धंसे हुए पाया, शांतिपूर्वक सोते हुए, किंतु हमेशा-हमेशा के लिए….उसकी मृत्यु से यूरोप और अमेरिका के संघर्षशील मजदूरवर्ग तथा इतिहास-विज्ञान की अपूरणीय हानि हुई है….डार्विन ने जैसे जीव-जगत के विकासवाद के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था, वैसे ही मार्क्स ने मनुष्यता के इतिहास के विकास के सिद्धात को दुनिया के सामने रखा. उसने एक सहज आदर्श लोगों को समझाया कि मनुष्यमात्र के लिए भोजन, पानी, वस्त्र और आवास जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना—धर्म, राजनीति, विज्ञान, कला आदि से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण और मानवीय है…’10

ऐंगल्स के शब्दों में उस महान विचारक ने सोचना बंद कर दिया था, किंतु मार्क्स के साथ ही उसके युग का समापन नहीं हुआ. बल्कि आने वाले वर्षों में उसके विचार और संघर्ष लगातार प्रासंगिक होते गए. मार्क्स अपने जीवनकाल से अधिक प्रसिद्ध और अधिक प्रासंगिक होता गया. मार्क्स के जीवन के विश्लेषण से हम पाते हैं कि उसके व्यक्तित्व में मन-वचन-कर्म की गजब की एकता थी. उसने जैसा अनुभव किया, वही लिखा और जो लिखा, उसको अपने जीवन में उतारता भी रहा. अपने पूरे जीवन में वह, नियमित प्रतिष्ठापूर्ण लेखन के बावजूद, अपने लिए कोई स्थायी ठिकाना न बना सका. चाहता तो अपनी मेधा के बल पर वह आरामदायक जीवन का रास्ता चुन सकता था. कानून का विद्यार्थी रह चुका था. चाहता तो किसी अदालत में मजे की वकालत कर सकता था. मगर उसने अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीने का रास्ता चुना. वह उन लोगों के लिए जिया, जो सर्वहारा और उत्पीड़ित और शोषित थे, और जो लगभग उम्मीद खोते जा रहे, दिशाहीन थे. उसने शोषण के कारणों को समझा, इसलिए सर्वहारा वर्ग को हमेशा अपने हितों के लिए संगठित होने की प्रेरणा देता रहा.

मार्क्स की चर्चा करते समय उसकी पत्नी जेनी का कोई जिक्र न करना उस महान स्त्री और स्त्रीजाति के प्रति घोर कृतघ्नता होगी. यह कहना कठिन है कि अगर जेनी जैसी पत्नी का साथ न मिला होता तो भी क्या मार्क्स जीवनसंघर्ष में उतना ही सक्रिय रह पाता. क्या जेनी के साथ के बगैर पूंजी जैसा विशालकाय ग्रंथ रच पाना संभव था? बहरहाल, ये सब तो कयास की बातें हैं, जाने दीजिए. मगर वह जेनी ही थी जो धनी माता-पिता की पुत्री होने के बावजूद मार्क्स के साथ भीषण गरीबी और अभाव का जीवन जीती रही. कभी उफ् तक न की. खुद तंगहाली में रहते हुए वह बल्कि कदम-दर-कदम उसका हौसला बढ़ाती रही.
मार्क्स के लंदन के दिनों का उल्लेख जेनी ने इन शब्दों में किया है—

‘मैंने फ्रैंकफर्ट जाकर चांदी के बर्तन बेच दिए और कोलोन में फर्नीचर बेचना पड़ा. लंदन के महंगे जीवन में हमारी सारी जमा-पूंजी जल्द ही समाप्त हो गई. हमारा सबसे छोटा बच्चा जन्म से ही बीमार रहता था. एक दिन मैं स्वयं छाती के दर्द से पीड़ित थी कि अचानक मकान-मालकिन किराये के बकाया पाउंड मांगने के लिए आ धमकी. उस समय हमारे पास उसको देने के लिए कुछ भी नहीं था. वह अपने साथ दो सिपाहियों को लेकर आई थी. उसने हमारी चारपाई, कपड़े, बिछौने, दो छोटे बच्चों के पालने तथा दोनों लड़कियों के खिलौने तक कुर्क कर लिए. सर्दी से ठिठुर रहे बच्चों को लेकर मैं कठोर फर्श पर पड़ी हुई थी. अगले दिन हमें घर से निकाल दिया गया. उस समय पानी बरस रहा था और बेहद ठंड थी. पूरे वातावरण में मनहूसियत छायी हुई थी…’

और ऐसे विकट समय में दवावाले, राशनवाले और दूधवाला अपना-अपना बिल लेकर उसके सामने खड़े हो गए. उनका बिल चुकाने के लिए जेनी को बिस्तर आदि घर का बचा-कुचा सामान भी बेचना पड़ा. इसके बावजूद वह महान स्त्री मार्क्स को कदम-कदम ढांढस बंधाती रही. मार्क्स घर की गरीबी देखकर जब भी खिन्न होता, जेनी का जवाब होता था—

‘दुनिया में सिर्फ हम लोग ही कष्ट नहीं झेल रहे हैं.’

जेनी सही मायने में आदर्श स्त्री थी, जिसने अपने पति की खातिर कष्टों से समझौता किया, गरीबी में रही. मगर कभी भी अपने पति को उसका एहसास न होने दिया. बल्कि जब भी वह कमजोर पड़ता दिखाई दिया, वह उसकी हिम्मत बंधाने के लिए स्वयं आगे आ गई. दर्शनशास्त्र, इतिहास, राजनीति, कानून, नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र का व्याख्याता मार्क्स अपनी पत्नी के लिए एक भावुक कवि भी था. पत्नी जेनी के नाम 1836 में लिखी गई उसकी एक कविता का भावार्थ है—

जेनी दिक करने को तुम पूछ सकती हो
संबोधित करता हूं गीत क्यों जेनी को
सच तो यह है कि
तुम्हारी ही खातिर होती है मेरी धड़कन तेज
कलपते हैं बस तुम्हारे लिए मेरे गीत
तुम, बस तुम्हीं उन्हें उड़ान दे पाती हो
हर अक्षर से फूटता है तुम्हारा ही नाम
स्वर-स्वर को देती हो गंध-माधुर्य तुम्हीं
मेरी हर सांस हो निछावर अपनी देवि पर!
इसलिए कि अद्भुत मिठास से पगा है यह नाम
और कहती हैं कितना कुछ मुझसे उसकी लयकारियां
इतनी परिपूर्ण, इतनी सुरीली उसकी ध्वनियां
ठीक वैसे ही जैसे कहीं दूर आत्माओं की गूंजती स्वरवलियां
कि कोई अद्भुत-अलौकिक-विस्मयजनक सत्तानुभूति
कि कोई राग हो स्वर्णतारों के सितार पर.

यह कविता मार्क्स के दिल में उमड़ने वाले भरपूर प्यार की गवाही देती है. वह प्यार जो केवल जेनी और अपने परिवार तक सीमित नहीं था. अगर वहीं तक सीमित रहता तो उस जैसा प्रतिभाशाली विद्वान एक खुशहाल जिंदगी जी सकता था. उसका प्यार पूरी मनुष्यता के लिए था. गरीब-मजदूरों और कामगारों के लिए था, जो औद्योगिकीकरण की मार से बुरी तरह कराह रहे थे. इसलिए समस्त पूंजीवादी प्रलोभनों से परे रहते हुए वह साधारण से साधरणतम के बारे में ही सोचता रहा. वह आजीवन सक्रिय रहा. लेखन के अलावा आंदोलन के क्षेत्र में भी. शायद यही कारण है कि उसके लेखन में हर एक को कुछ न कुछ मसाला मिल जाता है. शायद इसलिए उसके विचारों का दुरुपयोग भी हुआ. उसके जीवन-संघर्ष से वैचारिक विकासक्रम को समझे बिना ही लोग उसके बारे में मनमाने निष्कर्ष निकालते रहते हैं. फिर भी दुनिया में उसके करोड़ों भक्त हैं, जिनका वह मागदर्शक, गुरु और आत्मचेता है. वे उसके लिखे पर श्रद्धा रखते हैं. उसका हर वाक्य उनके लिए अमृतवाक्य है. खासकर उसके द्वारा धर्म को लेकर की गई टिप्पणियां. उल्लेखनीय है कि मार्क्स धर्म का विरोधी नहीं था. वह उसको व्यक्ति का निजी मामला मानता था. इसलिए वह धर्म के साथ राजनीति और धर्मनीति का घालमेल करने का विरोधी था. दूसरी ओर करोड़ों लोग ऐसे भी हैं जिन्हें मार्क्स का लेखन चिढ़ाता है. थियोडोर ग्रो के शब्दों में—

‘कार्ल मार्क्स आधुनिक विश्व के इतिहास में सर्वाधिक विवादास्पद व्यक्तियों में से एक है. उसके विचारों को लेकर क्रांतियां रची गईं, करोड़ों लोग उनपर जान लुटा चुके हैं, यहां तक कि दुनिया पर परमाणविक युद्ध का खतरा मंडराने लगा है. उनीसवीं और बीसवीं दोनों शताब्दियों में उसके लेखन और दर्शन का सर्वाधिक दुरुपयोग किया गया, उनका गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया. यहां तक कि उन्हें गलत समझा भी गया.’11
मार्क्स ने अपने विचारों को जिया. इसलिए उसके विचारों में जहां उसके जीवन संघर्ष की झलक है, वहीं ईमानदारी भी है. उसके विचारों से गुजरते हुए हम देखेंगे कि वे चाहे जितने विवादित सही, मगर उनकी प्रासंगिकता उस समय तक खत्म होने वाली नहीं है, जब तक कि इस पृथ्वी पर शोषणकारी आर्थिक-सामाजिक विषमताएं हैं. धर्म-जाति और क्षेत्र के नाम पर होने वाला शोषण है. जब तक ये हैं, तब तक मार्क्स का आवाह्नकारी स्वर हमें सतत प्रेरणा देता रहेगा. नीचे उसकी एक कविता का अनुवाद प्रस्तुत है—

आओ
हम बीहड़ और कठिन सुदूर
यात्रा पर चलें
चलें, क्योंकि छिछला,
निरुद्देश्य और लक्ष्यहीन
जीवन हमें स्वीकार नहीं
हम ऊंघते, कलम घिसते हुए
उत्पीड़न और लाचारी में नहीं
जिएंगे!
हम आकांक्षा, आक्रोश
आवेग और
अभियान से जिएंगे
अभिमान से जिएंगे
हम, असली इंसान की तरह
जिएंगे!

लेखकीय अवदान
अपने विद्यार्थी जीवन से ही मार्क्स ने खुद को लेखन के प्रति समर्पित कर दिया था. उसने रचानात्मक रूप से सक्रिय जीवन जिया. शारीरिक व्याधियों और भीषण आर्थिक तनावों के बीच वह लगातार लिखता रहा. बल्कि यह कहना चाहिए कि मुश्किलों और अभावों के बीच उसका अपना लेखन ही उसको संघर्ष की प्रेरणा देता रहा. अपने जीवनकाल में उसने विपुल वांङमय की रचना की. उसकी प्रमुख कृतियां निम्नलिखित हैं—
1. दि फिलास्फीकल मेनीफेस्टो आफ हिस्टारिकल स्कूल आफ ला॓, 1842.
2. क्रिटीक् आफ हीगेलस्: फिलास्फी आफ राइट, 1843.
3. आन दि जुइस क्विचन, 1844.
4. नोट्स आन जेम्स मिल, 1844.
5. इकानामिक एंड फिलास्फीकल मेनुस्क्रिप्ट आफ 1844, 1844.
6. दि होली फेमिली, 1845
7. थीसिस आन फायरबाख, 1845.
8. दि जर्मन आइडियालाजी, 1845.
9. दि पावर्टी आफ फिलास्फी, 1847.
10. वेज-लेबर एंड केपीटल, 1847.
11. मेनीफेस्टो आफ दि कम्युनिस्ट पार्टी, 1848.
12. दि एटींथ बू्रमायर आफ लुईस नेपोलियन, 1852.
13. गूंड्राइज, 1857.
14. ए कंट्रीब्यूशन आफ दि क्रिटीक आफ पालिटीकल इकानामी, 1859.
15. राइटिंग आन दि यू. एस. सिविल वार, 1861
16. थ्योरीज आफ सरप्लस वेल्यू, तीन खंडों में, 1862
17. वेल्यू, प्राइस एंड प्राफिट, 1865
18. केपीटल, प्रथम खंड, 1867
19. सिविल वार इन फ्रांस, 1871
20. क्रिटीक आफ दि गोथा प्रोग्राम, 1875
21. नोटस् आन वेगनर, 1883
22. केपीटल, दूसरा खंड (मरणोपरांत ऐंगल्स के सौजन्स से प्रकाशित), 1885
23. केपीटल, तीसरा खंड (मरणोपरांत ऐंगल्स के सौजन्य से प्रकाशित), 1894.

उपर्युक्त के अतिरिक्त उसने हजारों की संख्या में निबंध लिखे, जिनमें इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीति, दर्शन, अंतरराष्ट्रीय संबंध, धर्म आदि की विस्तृत विवेचना की गई थी. वह अपने समय का विवादित मगर प्रतिभाशाली लेखक था. अपने समय में प्रचलित सभी प्रमुख विचारधाराओं का उसने अध्ययन करते हुए उनके प्रति अपनी प्रतिक्रिया मुखर स्वर में प्रस्तुत की थी, जिसके परिणामस्वरूप उसने अपने समर्थकों और आलोचकों की बड़ी जमात पैदा की. बीसवीं शताब्दी के महान क्रांतिकारी नेता चे ग्वेरा ने मार्क्स के बारे में कहा था—

“मार्क्स की प्राथमिकता थी कि वह सामाजिक विचारों के इतिहास में ठोस गुणात्मक एवं तात्कालिक परिवर्तन ला सके. इसके लिए उसने इतिहास की नई व्याख्या की, उसकी गतिशीलता को समझा-परखा, भविष्य का आकलन किया एवं गहन विश्लेषण के उपरांत उसने एक क्रांतिकारी संकल्पना भी सामने रखी कि—संसार की केवल व्याख्या से काम नहीं चलेगा, इसको बदलना ही चाहिए.’12

ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका

1. That there was an amount of privation and suffering among that portion of the population connected with the lace trade, unknown in other parts of the kingdom, indeed, in the civilized world…Children of nine or ten years are dragged from their squalid beds at two, three, or four o clock in the morning and compelled to work for a bare subsistence until ten, eleven, or twelve at night, their limbs wearing away, their frames dwindling, their faces whitening, and their humanity absolutely sinking into a stone-like torpor, utterly horrible to contemplate.’ Capital,’ CHAPTER- I, Vol. i, p. 227- MARX, as quoted by Bertrand Russell in Proposed Roads to Freedom.
2. I lead a tormented life of solitude, illness and sleep deprivation – MARX.
3. …the main idea which should guide us in choosing a profession is the good of humanity and our own perfection… Man’s nature is such that he can attain his own perfection by working for the welfare and perfection of his fellows.- MARX.
5. Marx began to write very critical editorials on the poverty and state of oppression of some of the German workers. This irritated the Prussian Government and eventually, after Marx continued to print biting articles directed at the government of Prussia and other European nations about their political policies and treatment of their working class, they censored his newspaper and eventually had it suppressed.-Theodore Groh in Karl Marx: Life and Theory of a Sick and Angry Man.
6. …The ultimate causes of all social change and political revolutions are to be sought not in the minds of men, in their increasing insight into eternal truth and justice, but in changes in the mode of production and exchange; they are to be sought not in the philosophy but in the economics of the epoch concerned.”- MARX, The German Ideology.
7. In every society that has appeared in history the distribution of products, and with it the division of society into classes or estates, is determined by what is produced and how it is produced, and how the product is exchanged – Friedrich Engels.
8. Now and then the workers are victorious, but only for a time. The real fruit of their battles lies, not in the immediate result, but in the ever expanding union of the workers. This union is helped on by the improved means of communication that are created by modern industry, and that place the workers of different localities in contact with one another. – Karl Marx and Fredrick Engels in the Manifesto of the Communist Party.
9. The state is “nothing but a machine for the oppression of one class by another” and a new generation of socialists, “reared in new and free social conditions, will be able to throw the entire lumber of the state on the scrap-heap”. – Engels’ 1891 Preface to Marx, Civil War in France, Selected Works in one volume, Lawrence and Wishart, (1968), p256, p259
10. On the 14th of March, at a quarter to three in the afternoon, the greatest living thinker ceased to think. He had been left alone for scarcely two minutes, and when we came back we found him in his armchair, peacefully gone to sleep — but for ever…An immeasurable loss has been sustained both by the militant proletariat of Europe and America, and by historical science, in the death of this man…. Just as Darwin discovered the law of development or organic nature, so Marx discovered the law of development of human history: the simple fact, hitherto concealed by an overgrowth of ideology, that mankind must first of all eat, drink, have shelter and clothing, before it can pursue politics, science, art, religion, etc.; Engels’.
11. Karl Marx is one of the most disputed men in the history of our modern world. Revolutions have been fought, millions have died, and nuclear war threatened over what people thought he said. The writings and philosophies of Karl Marx are the most misused, misquoted, and altogether misunderstood documents of the 19th and 20th centuries. – Theodore Groh.
12. The merit of Marx is that he suddenly produces a qualitative change in the history of social thought. He interprets history, understands its dynamic, predicts the future, but in addition to predicting it, he expresses a revolutionary concept: the world must not only be interpreted, it must be transformed. —Che Guevara, Notes for the Study of the Ideology of the Cuban Revolution by, October 8 1960