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पूंजी (दि कैपीटल): संक्षिप्त विमर्श : चार

सामान्य

1. इतिहास का संकट, पूंजीवाद एवं पूंजीवादी समाज की व्युत्पत्ति

मार्क्स ने पूंजीवाद की समीक्षा ऐतिहासिक संदर्भों के साथ की है. हालांकि कुछ विद्वान इसे इतिहास की अर्थशास्त्रीय व्याख्या भी कहते हैं. मगर इनमें से कुछ भी कहा जाए, बात लगभग एक ही है. इतिहास के अर्थशास्त्रीय अध्ययन द्वारा मार्क्स अपने इस बहुख्यात सिद्धात पर पहुंचा था कि सामाजिक परिवर्तनों का मुख्य आधार उत्पादन के साधनों में परिवर्तन है. उत्पादनपद्धति में आए परिवर्तन से ही उससे जुड़े संबंधों में बदलाव आता है. अर्थ सामाजिक संबंधों का निर्माता और निर्धारक बन जाता है. वही अन्य परिवर्तनों को दिशा देता है. पुस्तक के छबीसवें अध्याय में वह प्राचीन समाजों में पूंजी संचयन के सिद्धांतों के गूढ़ रहस्यों की पड़ताल करता है. मार्क्स के अनुसार प्राचीन समाज यानी पूंजीवादी समाज के उद्भव से पहले पूंजीसंचयन केवल धनसंचयन तक सीमित था. दूसरे शब्दों में उस समय तक धन पूंजी का रूप नहीं ले पाया था. पूरा समाज एक असंगठितसहयोगाधारित समाज था. उत्पादन की बजाय उसका जीवन प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करता था. शिकार आधारित भोजनव्यवस्था में देखा यह गया था कि कुछ व्यक्ति शिकार करने में निपुण हैं. उनका निशाना अचूक है. एक ही पत्थर में वे खूंखार जानवर को धराशायी कर सकते हैं. जरूरत पड़ने पर उससे स्वयं भिड़ सकते हैं. भारीभरकम शिकार को पीठ पर लादकर ठिकाने तक लेकर आ सकते हैं. कुछ ऐसे भी रहे होंगे, जिन्हें शिकार के नाम से ही डर लगता होगा. जिनका निशाना अचूक नहीं था. स्वाभाविक रूप से कबीले के लोग पहले व्यक्ति को ही नायक के रूप में स्वीकार कर सकते थे. दूसरों से उसको अपने लिए अधिक उपयोगी मान, उसकी बात भी मानते होंगे. कालांतर में ऐसे लोगों को समूह का नेतृत्व सौंपा जाने लगा. परिणाम यह हुआ कि मानवसमाज धीरेधीरे ताकतवर और कमजोर के रूप में बंटता चला गया. अपनी स्थिति का लाभ उठाते हुए ताकतवर लोगों ने संसाधनों को कब्जाना आरंभ कर दिया, परिणामस्वरूप दूसरे वर्ग के हाथों से संसाधन छिनते चले गए और वह पराश्रित होता गया.

मार्क्स के अनुसार आर्थिकसामाजिक परिवर्तन की आरंभिक प्रक्रिया महज धन की जमाखोरी तक सीमित नहीं थी, जिसने आगे चलकर पूंजीवादी संचयन और फिर पूंजीवादी समाज की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया. प्रकारांतर में पूरा समाज सर्वहारा और पूंजीपतिवर्ग में बंटता चला गया. वास्तव में वह समाज के कुल संसाधनों के चंद लोगों के हाथों में सिमटने जाने का परिणाम था, जिसके कारण समाज का बड़ा हिस्सा, जो मेहनती एवं कुशल था और अपने श्रमकौशल के बल पर सम्मानजनक जीवन जीने की योग्यता रखता था, वह संसाधनविहीन और दूसरों पर निर्भर होता चला गया. कालांतर में उस वर्ग की संख्या बढ़ती ही चली गई. एक दिन पूरा समाज दो हिस्सों में बंट गया. पहला वह जिसका समाज के संसाधनों पर कब्जा था, लेकिन उन संसाधनों का वह स्वयं कोई उपयोग नहीं करता था. दूसरा वह जो उन संसाधनों के दम पर जीविकोपार्जन करता था और बदले में पहले वर्ग को संसाधनों का कब्जाधारकस्वामी मानते हुए एक निश्चित राशि, अधिलाभ, लगान, कर आदि के रूप में प्रदान करता था. धनसंग्रह की प्राचीन पद्धति का रहस्य इस तथ्य में निहित था कि वह एक थोड़ेसे पूंजीवादियों से भरे सर्वहारा समाज के बजाय एक हिंसक एवं निर्दयी समाज से जन्मा था. गुलामों और दासों को उनके सामंत जमींदारों से मुक्त कराना, वास्तव में उनके घरों, जमीनों, उनके उत्पादन के संसाधनों और आजीविका के साधनों से भी दूर करना था. इतिहास का अर्थशास्त्रीय दृष्टि से अध्ययन करता हुआ मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि—

तथाकथित प्राचीन पूंजीसंचय और कुछ नहीं, बल्कि समाज के उत्पादक वर्ग को उत्पादन के संसाधनों से अलग कर देने की प्रक्रिया है.’

मार्क्स के निष्कर्ष पश्चिमी समाज की सामाजिकआर्थिक गतिविधियों के अध्ययन का निकष थे. उसने सोलहवीं शताब्दी से पहले के समाज को पूंजीवादी अवशेषों से रहित समाज स्वीकार किया था. उल्लेखनीय है कि यूरोप के इतिहास में वैज्ञानिक प्रबोधन की शुरुआत ही पंद्रहवीसोलहवीं शताब्दी से होती है. वैज्ञानिक चेतना के विकास का पहला उपयोग उत्पादन में मशीनीकरण की शुरुआत के साथ हुआ था. जिससे संचित धन को पूंजी में बदलने, उसका उपयोग और अधिक धन कमाने का प्रचलन हुआ. भारत और अन्य एशियाई देशों में यह प्रक्रिया काफी देर से करीब सतरहवीं शताब्दी से ही आरंभ हो पाई थी. सतरहवींअठारहवीं शताब्दी के बौद्धिक आंदोलनों के फलस्वरूप समाज में लोकतंत्र का आगमन हुआ. व्यक्तिस्वातंत्रय का नारा पूंजीवाद के विकास में सहायक सिद्ध हुआ, क्योंकि उसके बहाने वह समाज पर उपभोक्तावादी संस्कार थोपने में सफल सिद्ध हुआ.

22. कृषिआश्रित समूहों को भूसंपदा से बेदखल करना

पूंजी’ के सताइसवें अध्याय में मार्क्स पश्चिमी समाज में औद्योगिकीकरण के बाद आए बदलावों तथा उन स्थितियों पर विचार भी विचार करता है, जिनके कारण एक सामंती समाज पूंजीवादी समाज में परिवर्तित होता चला जाता है. मार्क्स के अनुसार पंद्रहवीं शताब्दी के अंतिम दो दशक यूरोप में पूंजीवाद के उद्भव का समय था. उससे पहले इंग्लेंड में जमींदारी प्रथा थी. सामंतों और जागीरदारों के माध्यम से राजशाही राजनीतिक कार्यव्यवहार देखती थी. उस समय लागू विधान के अनुसार राज्य की समस्त भूसंपदा उसके राजा के अधीन होती थी. उसके प्रबंधन तथा लगान वसूली के लिए वह जागीरदारों और सामंतों की नियुक्ति करता था, जो जनता के साथ निरंकुश व्यवहार करते थे. विज्ञान ने परंपरागत ज्ञान के साथसाथ प्राचीनकाल से चली आ रही अर्थव्यवस्था को भी चुनौती दी थी. परिणामस्वरूप नई प्रौद्योगिकी का जन्म हुआ और उत्पादन के स्रोत अपढ़कुपढ़ सामंतों के हाथों से फिसलकर पढ़ेलिखे पेशेवरों और तकनीशियनों के हाथों में आ गए.

उल्लेखनीय है कि सामंती समाज के पतन के चिह्न चैदहवीं शताब्दी के अंतिम दशक में ही दिखाई पड़ने लगे थे, जब किसानों से भूसंबंधी अधिकार छीने जा रहे थे. उस समाज में अधिकांश वे कृषक थे, जो जमींदारों और सामंतों के कब्जेवाली भूमि पर खेती करते थे. कठोर परिश्रम के बावजूद उन्हें नाममात्र की ही आमदनी थी. अपनी आजीविका के लिए उन्हें सामंतोंजागीरदारों की दया पर निर्भर रहना पड़ता था. उनमें कृषकों के अलावा बड़ी संख्या में वे मजदूर भी शामिल थे, जो खेती तथा दूसरे क्षेत्रों में मेहनतमजदूरी करके अपना जीवनयापन करते थे. जिन सामंतोंजमींदारों के लिए वे परिश्रम करते थे, वही उन्हें रहने के लिए छोटे झोपड़ीनुमा घर और जमीन का एक टुकड़ा दे देते थे. उस जमीन से अपने परिवार के भरणपोषण के लिए अन्न उपजा सकते थे. इसके अलावा कुछ सार्वजनिक जमीन भी होती थी, जिसपर वे अपने पशु चराते तथा लकड़ी, चारे और्र इंधनसंबंधी जरूरतें पूरी करते थे. कुल मिलाकर उन मजदूरों की हालत बंधुआ मजदूरों जैसी थी.

पंद्रहवीं शताब्दी के पश्चात हालात बदले. जमींदारों और सामंतों ने किसानों को भूमि से बेदखल करना प्रारंभ कर दिया. मजदूरोंकिसानों ने जो भूमि वर्षों की मेहनत के बाद, पसीना बहाकर कृषि के योग्य बनाई थी, वह भूसामंतों के कब्जे में जाने लगी. जमीन को संपदा मान लिया गया. भाड़े के लठैतों का डर दिखाकर किसानों को ऊबड़खाबड़ और बंजर जमीन की ओर खदेड़ा जाने लगा. वह भूमि जिसपर वे पीढ़ियों से खेती करते आए थे, जिसको उन्होंने वर्षों के कठिन परिश्रम के बाद तैयार किया था, समाज के ताकतवर वर्ग की निजी संपत्ति में ढलने लगी. उल्लेखनीय है कि कपड़ा उद्योग के विकास के बाद इस वर्ग के पास ऊन और कपास की बिक्री से बेशुमार दौलत जमा हुई थी, जिससे उस वर्ग की महत्त्वाकांक्षाएं सातवें आसमान पर थीं. मार्क्स के अनुसार किसानों को बेदखल करने का दूसरा मुख्य कारण वे मशीनें थीं, जिन्होंने सबसे पहले कपड़ा उद्योग में दस्तक दी थी. पूंजीपतियों के पक्ष में अपनी उपयोगिता सिद्ध करने के उपरांत वे अन्य उद्योगों के साथसाथ, कृषिक्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति दर्शाने लगी थीं. मशीनों का आविष्कार हालांकि मनुष्य को कठोर परिश्रम से मुक्ति दिलाने के नाम पर किया गया था, मगर अनुभव में वे मनुष्य को ही काम से बेदखल करने में लगी थीं. कपड़ा उद्योग में वे यह काम कर चुकी थीं. लाखों बुनकर, रंगरेज, कपास ओटने वाली औरतें, मशीनों के आगमन के बाद बेरोजगार हो चुकी थीं.

अन्य क्षेत्रों की भांति कृषिकर्म भी उनके हमले से अछूता न था. जुताईबुबाईगहाई की भारीभरकम मशीनों ने कम मजदूरों द्वारा बड़े कृषि फार्मों पर खेती करना आसान कर दिया था. चूंकि यूरोप का कपड़ा उन दिनों शीर्ष पर था, इसलिए कपास आदि कृषि उपजों की मांग बढ़ी हुई थी. इसलिए भूसामंतों ने अपने खेतों को बड़े कृषिफार्मों में बदलना आरंभ कर दिया था. परिणामस्वरूप छोटे किसान अपने खेतों से बेदखल किए जाने लगे. सोलहवीं शताब्दी के अंत तक कपड़ा उद्योग के विकास के साथ ऊन की मांग में भी लगातार वृद्धि हो रही थी. ऊन की खेती के लिए भेड़ों के बड़ेबड़े बाड़े बनाए जा रहे थे. उनके चरागाह के लिए किसानों से जमीन छीनी जा रही थी. उनके झोपड़ों को उजाड़कर मिट्टी में मिला दिया गया. जमीन की आवश्यकता तेजी से बन रहे कारखानों के लिए भी थी. इसलिए कस्बों और गांवों में कृषियोग्य भूमि को कारखानों के नाम पर हड़पा जा रहा था. कारखानों, ऊनउत्पादक केंद्रों यहां तक कि भेड़ चराने के लिए भी मानवश्रम की आवश्यकता थी. मगर पहले वे संसाधनों के स्वामी की तरह काम करते थे, उनके शिल्प का सम्मान किया जाता था, मगर अब उन्हें समाज में तेजी से उभरते नवसामंतवर्ग के कारखानों में, उसके अधीन कार्य करना पड़ता था.

सतरहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक भूसामंत अपनी स्थिति को काफी सुदृढ़ कर चुके थे. उन्हें धार्मिक और राजनीतिक शक्तियों का भी पूरा समर्थन प्राप्त था. हाथों से जमीन और रोजगार छिन जाने के कारण समाज में बेरोजगारों की संख्या बढ़ी थी. इसलिए भूसामंत जो आगे चलकर पूंजीपतिवर्ग में ढलने वाले थे, के पास पूरा अवसर था कि अपनी ताकत और स्थिति का लाभ उठाकर श्रमिकों से मनमानी दरों पर काम ले सकें. यही नहीं, श्रमिकोंकामगारों के शोषण का दौर भी आरंभ हो चुका था. मानवश्रम की जरूरत को पूरा करने के लिए बड़ेबड़े जमींदार और भूसामंत कृषिफार्मों और ऊन के कारखानों के नाम पर बड़ेबड़े बाड़े बनाने लगे थे. उन बाड़ों में सिर्फ पशुओं को ही नहीं, मजदूरों और कामगारों को भी कैद करके रखा जाता था. बाड़े में कैद लोगों में से अधिकांश भूसामंतों और जमींदारों के दास होते थे. जिनकी पशुओं की भांति ही खरीदफरोख्त की जाती थी.

मजदूरों का पूरा का पूरा परिवार उन बाड़ों में काम करता था. यहां तक कि छोटे बच्चों को भी बचपन से ही काम पर जोत दिया जाता था. मजदूरी के रूप में उन्हें सिर्फ पेट भरने लायक रोटी और तन ढकने को कपड़ा दिया जाता था. रहने के लिए ठिकाना, वह भी इसलिए ताकि पतिपत्नी मिलकर मजदूरों और गुलामों की नई पीढ़ी पैदा कर सकें. भूसामंतों, जमींदारों की आमदनी बढ़ने के साथ ही उनमें विलासिता के लक्षण भी पैदा होने लगे थे. किसानों से छीनी गई जमीनों, मगर खाली पड़े कुछ मैदानों को अरण्य क्षेत्र घोषित करने की प्रथा जोर पकड़ चुकी थी. उन अरण्यों का उपयोग हिरन के आखेट के लिए किया जाता. उल्लेखनीय है कि कृषियोग्य जमीन को आखेटस्थलों में बदल जाने का दुष्परिणाम जर्मनी में भीषण अकाल के रूप में देखने को मिला था. बावजूद इसके सरकार भूसामंतों के पक्ष में थी.

अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटिश संदद में एक बिल पेश किया गया, जिसके द्वारा भूकब्जाधारकों को उसके कानूनी मालिक का रूप दे दिया गया. अब वे अपने कब्जे वाली जमीन का उपयोग निजी संपत्ति के रूप में करने को स्वतंत्र थे. इससे भूस्वामियों को बेरोजगार श्रमिकों के साथ मनमानी करने, उनसे अपनी शर्तों पर काम लेने का अधिकार मिल गया. कृषियोग्य भूमि के छिन जाने से लोग मजदूरी की तलाश में भटकने लगे. दूसरी ओर भूसामंतों, जमींदारों ने अपने कब्जेवाले विशाल कृषि मैदानों में मशीनों के सहारे खेती करना प्रारंभ कर दिया. खेती एक उद्योग में बदलने लगी. भूवंचित किसानों के पास अपनी आजीविका के लिए, सिवाय मजदूरी पर काम करने के और कोई चारा न था. यह एक सर्वहारा वर्ग था, जो रोजीरोटी की तलाश में कहीं तक जाने को विवश था. इन्हीं भूसामंतों ने अतिरिक्त पूंजी के दम पर कारखानों और उद्योगों की स्थापना की. आम जरूरत का वस्तुएं जिन्हें पहले हस्तकौशल से बनाया जाता था और जिनके द्वारा हजारोंलाखों लोगों को रोजगार मिलता था, वे मशीनों द्वारा बनने लगीं. जिससे उन उद्योगधंधों में लगे कारीगर बेरोजगारी का शिकार बनने लगे. विवश होकर वे भी नौकरी के लिए कारखानों और फैक्ट्रियों में भटकने लगे. उनपर नियंत्रण रखने के लिए कानून बनाए गए. पूंजीपतियों के समर्थन पर बनी सरकारें, अनुशासन और व्यवस्था के नाम पर मजदूरों और कामगारों के मौलिक अधिकार, जीविका के अधिकार के हनन में—पूंजीपतियों का साथ दे रही थीं.

23. भू-अधिग्रहण के विरुद्ध खूनी विद्रोह: बुर्जुआ वर्ग का उदय

भूमि छिन जाने के कारण समाज का बड़ा वर्ग बेरोजगारी का शिकार बना था. हजारों एकड़ जमीन जिसपर छोटे किसानमजदूर अपने पसीने से अन्न उपजाते थे, भूसामंतों और जमींदारों की संपत्ति बन चुकी थी. उन दिनों के सभी कानून भूसामंतों और जमींदारों के पक्ष में थे. यूरोप के जिन देशों में सरकार का चयन निर्वाचन द्वारा होता था. वहां एक प्रकार का कुलीनतंत्र था. सरकार के चुनाव में वही लोग चुनाव ले सकते थे, जिनके पास न्यूनतम वांछित क्षेत्रफल की कृषियोग्य जमीन हो. उससे पहले लोग या तो खेती पर निर्भर थे, अथवा आम उपयोग की उन वस्तुओं का निर्माण करते थे, जिनकी स्थानीय लोगों मेें खपत हो. उत्पादन लाभकेंद्रित न होकर, आवश्यकताकेंद्रित था. समाज में कारीगरोंशिल्पकारों को पूरा सम्मान मिलता था. बावजूद इसके, पारस्परिक आवश्यकताओं पर आधारित वह प्रणाली मशीनीकरण की मार झेलने में असमर्थ सिद्ध हो रही थी. मशीनों ने किसान और कामगार दोनों को बेरोजगार किया था. प्रौद्योगिकीय विकास के साथ ही समाज में विशिष्ट तकनीक क्षमता संपन्न दक्ष कामगारों की मांग भी बढ़ती जा रही थी. इसके लिए नए शिक्षासदन और प्रशिक्षण केंद्र खोले जा रहे थे. प्रशिक्षणप्राप्त कामगारों को अपेक्षाकृत अच्छे वेतन पर रखा जाता था. वे पूंजीपतिप्रबंधन के अपेक्षाकृत निकटवर्ती माने जाते थे. इससे श्रमिकों के बीच विषमता की खाई लगातार फैलती जा रही थी.

इसी समय को मार्क्स ने बुर्जुआ वर्ग के उद्भव का काल माना है. वह सामंतवाद और पूंजीवाद का संक्रमणकाल था. आरंभ में पूंजीवाद इतना विकृत भी नहीं हुआ था कि दूसरे के परिश्रम को अपनी प्रगति का आधार बनाया जा सके. न उद्योगों का उतना विकास हो पाया था कि उसमें सर्वहारा वर्ग के सभी बेरोजगारों को खपाया जा सके. न ही किसी एक की जमीन पर कब्जा जमाकर उसको भिखारी बना देने की रीतिनीति चलती थी. सोलहवीं शताब्दी तक यूरोपीय समाज तेजी से पूंजीवादी समाज में ढलने लगा था. बावजूद इसके उसपर परंपरा का पूरा दबाव था. यही वह कारण है जिससे सतरहवीं शताब्दी के आरंभ में ऐसे बहुत से नियम बनाए गए, जिनसे नागरिकों के अधिकारों को कानूनी संरक्षण दिया जा सके. लेकिन वे सभी कानून समाज के संपन्न और शक्तिशाली वर्ग के हित में थे. वही श्रमशोषण का मुख्य आधार थे. तो भी दासप्रथा के विरुद्ध सोलहवीं शताब्दी से ही आवाजें उठने लगी थीं. स्वयं दासों में भी अपने हालात को लेकर बेचैनी थी. वे आजाद होना चाहते थे. उस समय तक लोकप्रिय हो चुका मानवतावादी चिंतन और उससे जुड़े दार्शनिकविचारक और लेखक उनकी मांगों का समर्थन कर रहे थे. यूरोप के कई देशों में दासप्रथा पर कानूनी प्रतिबंध लगा दिया गया था. किसी भी व्यक्ति को बेगार और गुलामी के लिए बाध्य करना कानूनी अपराध था. कुछ देशों में तो दासता के लिए बाध्य करने पर मृत्युदंड का भी प्रावधान था.

समाज में अनुशासनसंबंधी नियम कड़े थे. कहींकहीं तो उनसे निरंकुशता की झलक भी मिलती थी. थाॅमस मूर के हवाले से मार्क्स ने बताया है कि सोलहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में ही केवल चोरी के आरोप में लगभग 72, 000 नागरिकों को मृत्युदंड दिया गया था. नागरिक अधिकारांे के संरक्षण की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण उनमें कुछ निर्दोष भी दंडित हुए होंगे. इसलिए कानूनों का विरोध होना स्वाभाविक था. परिणाम यह हुआ कि लोग रोजगार के वैकल्पिक रास्तों की तलाश करने लगे. निश्चित ही उन दिनों तेजी से बढ़ते उद्योग लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने का सर्वश्रेष्ठ क्षेत्र थे. लोग उनके माध्यम से सामंतवादी अत्याचारों से मुक्ति का सपना देख रहे थे. कारखानों का प्रबंधन पूंजीवादी नियमों के अनुसार किया जाता था. उनके लिए मजदूर का श्रम महज एक कामोडिटी, उपभोक्ता वस्तु जितना था, जिसको बाजार में बोली लगाकर कम से कम कीमत पर खरीदा जा सकता था—बिना यह सोचे कि मजदूर भी एक जैविक इकाई है. उसकी भी अपनी जरूरतें और सपने हो सकते हैं. कालांतर में जैसेजैसे मशीनीकरण का विस्तार हुआ, पूंजीवाद अपने पंजे फैलाता गया, फिर तो जहांजहां वह पहुंचा, मानवीय श्रम को उपभोक्ता वस्तु समझने की प्रथा भी वहांवहां फैलती गई. पूंजीवादी विस्तार के साथ सर्वहारा वर्ग और उसकी समस्याएं भी विस्तार लेती र्गइं. इसके साथ ही पूंजीवाद के प्रति आक्रोश भी परवान चढ़ता गया. इस जनाक्रोश को हवा देने में दार्शनिकों और बुद्धिजीवियों का भी पूरापूरा हाथ था.

24. पूंजीपति किसान की व्युत्पत्ति

पूंजीवादी व्यवस्था के सच को बेनकाब करने के लिए ‘पूंजी’ में मार्क्स एक ही प्रश्न को अनेक रूपों में जगहजगह उठाता है. उनतीसवें अध्याय में यह प्रश्न एक बार पुनः दोहराया गया है. वह पूछता है कि आखिर पूंजीवाद आया कहां से? इसका मूल उद्गम कहां है? किस प्रकार यह पूरी दुनिया में फैलने में कामयाब हुआ? वे कौनसी शक्तियां थीं, जो पूंजीवाद को अपने हितानुकूल मानकर उसको बचाए रखने का षड्यंत्र रचती थीं? अपने ही प्रश्नों पर विचार करते हुए मार्क्स इस परिणाम पर पहुंचा था कि ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो पूंजीपति का विकास वही घटना है, जब समाज में सर्वहारा वर्ग का जन्म हुआ था. दूसरे शब्दों में पूंजीपति और सर्वहारा दोनों का उद्गमकाल एक ही है. उसके अनुसार मनुष्यता के इतिहास में पूंजीवाद और सर्वहारा वर्ग का उद्गम वास्तव में इतिहास का वह हिस्सा है, जब मनुष्य में पहलेपहले धनसंग्रह की प्रवृत्ति का विकास हुआ. कालांतर में इसी से धन को पूंजी की भांति उपयोग करने और उसका पूर्ण आर्थिक लाभ उठाने की परंपरा को जन्म दिया.

न्यूटन का तीसरा नियम है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया साथसाथ और समान बलयुक्त होती है. पूंजीपति वर्ग के उदय के साथ सर्वहारा वर्ग का उद्भव भी ऐसी ही ऐतिहासिक और स्वाभाविक घटना थी. सर्वहारा वर्ग का विकास स्पष्टतः पूंजीवाद के विकास की परिणति था. उन दोनों के बीच स्वाभाविक द्वंद्वात्मकता थी, तो भी वे एकदूसरे के विकास को गति देने का उत्तरदायित्व निभा रहे थे. उनमें से पूंजीपतिवर्ग अपनी ताकत और पहुंच के बल पर पूरी दुनिया पर छा जाने का सपना देख रहा था. दूसरा करीबकरीब विपन्न और साधनविहीन सर्वहारा था. उसकी ताकत उसके संख्याबल में निहित थी, किंतु अन्यान्य कारणों से कई खेमों में बंटे होने के कारण वह किसी निर्णायक स्थिति में नहीं था. हालांकि उसकी भी वैश्विक व्याप्ति थी. मजदूर संगठन थे, मगर आपस में बंटे हुए. मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद का उदय किसानों और मजदूरों को उनकी जमीनों से बेदखल करने की घटना से जुड़ा था. पंूजीपतियों का एक वर्ग ऐसा भी था जो मजदूरों और किसानों के बल पर खेती करने का सपना देख रहा था. अवसर का लाभ उठाते हुए उन्होंने उत्पादन प्रणाली का आमूल मशीनीकरण किया. पूंजी जमा की और उसके दम पर छोटे किसानों को उजाड़ना आरंभ कर दिया. उजड़े हुए जमीन से बेदखल लोग भूसामंतों, पूंजीपति किसानों के अधीन कार्य करने और उत्पीड़न सहने को विवश थे.

पूंजीपति किसानों और सर्वहारा वर्ग के साथ एक और वर्ग भी बड़ी तेजी से पनप रहा था, जो था तो सर्वहारा वर्ग का हिस्सा, मगर अपने बुद्धिबल के हिसाब से वह पूंजीपति वर्ग के हितों को प्रभावित करने में सक्षम था. यह स्थिति उसने आधुनिक शिक्षा और तकनीकी कौशल के बल पर अर्जित की थी. मशीनीकरण के दौरान विशिष्ट प्रशीक्षणयुक्त कार्मिकों की मांग बढ़ने पर इस वर्ग को आर्थिक लाभ भी पहुंचा था. पूंजीवाद के आगमन के पश्चात नवधनाढ्यों की श्रेणी में आए इस वर्ग को मार्क्स ने ‘बुर्जुआ’ वर्ग कहा है. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के बीच, देखा जाए तो उसकी भूमिका कैटलिस्ट के समान थी. ‘पूंजीपतियों’ के साथ इस वर्ग के रिश्ते सहयोग और विरोध के थे. निहित स्वार्थों के लिए यह वर्ग कभी श्रमिकों के खेमे में जाकर उनसे अंतरंगता दर्शाता, उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने को उकसाता, तो कभी पूंजीपतियों का हितैषी बनकर श्रमिकों के हितों की बलि लेने से भी नहीं हिचकिचाता था.

चूंकि पूंजीपति और सर्वहारा एक ही सामाजिक प्रक्रिया से उद्भूत थे, अतएव जिस सामाजिक प्रक्रिया द्वारा सर्वहारावर्ग का जन्म हुआ था, उसी ने नए किसानों के लिए भी नियम बनाए थे. उनमें से एक नियम यह भी था कि भूसामंत अथवा पूंजीपति किसान अपने कृषिक्षेत्र के प्रबंधन का काम देख सकता था. वहां न्यूनतम मजदूरी के आधार पर नौकर रख सकता था. कालांतर में मजदूरी की दरों में गिरावट लगातार बनी रही, जिसका एक परिणाम मुद्रास्फीति के रूप में सामने आया, जो मजदूरी की दरों में अतिरिक्त गिरावट का कारण बना. उल्लेखनीय है कि अपनी स्थिति का अनुचित लाभ उठाते हुए पूंजीपति किसान मजदूरी की गणना मुद्रा की पुरानी दरों के आधार पर करता था. जिससे मजदूरों की वास्तविक आय काफी कम हो जाती थी. मजदूरी की दरों में आई भारी गिरावट और जमींदारों, भूसामंतों को दिए जाने वाले लगान में उत्तरोत्तर कमी का सीधा लाभ पूंजीपतिकिसानों को पहुंचा था. मार्क्स ने उदाहरण देकर इस स्थिति को स्पष्ट करने का पूरापूरा प्रयास किया है, जिसके परिणामस्वरूप परंपरागत जमींदारों और भूसामंतों के स्थान पर उन किसानों का वर्चस्व लगातार बढ़ता जा रहा था, जो पूंजीवादी सिद्धांतों के अनुसार कृषिकर्म को वरीयता देते थे. यह वर्ग एक ओर जहां मजदूरों का शोषण करता था, वहीं सघन खेती को प्रोत्साहन के सरकार से मिलने वाली सुविधाओं का भी लाभ उठाता था.

25. कृषि-क्रांति का उद्योग-जगत पर प्रभाव

पूंजी’ के तीसवें अध्याय में मार्क्स कृषिउत्पादन में मशीनों के आगमन के बाद आई क्रांति और उसके प्रभावों की विवेचना करता है. वह दर्शाता है कि मशीनीकरण के बाद पूंजीपति वर्ग न केवल उत्पादन क्षेत्र पर, बल्कि अर्थव्यवस्था के प्रत्येक प्रत्येक क्षेत्र पर काबिज हो चुका था. यहां तक कि परंपरागत कृषिकर्म भी उसके आक्रमण से अछूता नहीं था. वह लिखता है कि—सतत एवं सुव्यवस्थित क्रम में कृषकसमूहों को उनकी कृषिभूमि से बेदखल किए जाने से पूरे यूरोप में बेरोजगारी बढ़ी थी. रिक्त कराई गई भूमि का उपयोग पूंजीवादी ढंग से खेती किए जाने अथवा कारखाने स्थापित करने के लिए होता था. यद्यपि नए कारखानों के लिए मजदूरोंकामगारों की आवश्यकता पड़ती थी. तो भी मजदूरों के हिस्से का अधिकांश कार्य मशीनों द्वारा निपटा दिए जाने के बाद कुल रोजगार अवसरों में कमी आई थी. बेरोजगारों की संख्या उन कारखानों में रोजगार प्राप्त श्रमिकों की संख्या से कहीं अधिक थी. सर्वहारावर्ग की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही थी. मार्क्स आगे लिखता है कि खेती करने वाले किसानों और मजदूरों को जमीन से बेदखल किए जाने के कारण बाजार में उपलब्ध श्रमशक्ति में कई गुना वृद्धि की थी. बेरोजगार हुए वे सभी श्रमिक आजीविका के लिए काम की तलाश में थे.

चूंकि बड़े फार्महाउसों में कृषिकार्य का मशीनीकरण हो चुका था, इसलिए बेदखल किए गए किसानों को वहां रोजगार मिलने की संभावना अत्यंत क्षीण थी. उनके पास सिवाय कारखानों और फैक्ट्रियों में मेहनतमजदूरी करने के लिए खुद को जीवित रखने का और कोई रास्ता न था. जो किसान अपना पसीना बहाकर खेतों में अपनी जरूरत का अन्न उपजा लेते थे, जो उससे पहले तक पूरे समाज का पेट भरते आए थे, अब उन्हें अपना पेट भरने के लिए दूसरों के आगे गिड़गिड़ाना पड़ रहा था. उनका नया अन्नदाता वह पूंजीपतिवर्ग था, जिसने उनसे उनके खेतों को हड़पकर उनमें बड़ीबड़ी मशीनें खड़ी कर दी थीं. उन्हीं के संसाधनों का दोहन करता हुआ वह तेजी से पूंजी बना रहा था. यही नहीं, अपनी आर्थिक हैसियत और श्रमिकों की मजबूरी का लाभ उठाते हुए वह उनका जमकर शोषण भी करता था.

मार्क्स के अनुसार कृषिक्षेत्र से भारी मात्रा में मजदूरों के बेदखल किए जाने से घरेलू बाजार में वृद्धि हुई थी. इसलिए कि जो किसानमजदूर अपनी जरूरत की वस्तुएं अपने खेतों में उगा लिया करते थे, अब उन्हें वे बाजार से खरीदनी पड़ती थीं. इस तरह जो किसान और खेतिहर मजदूर पहले दूसरों का पेट भरते थे, वे अब अपना पेट भरने के लिए कारखानों में बनाए जा रहे, उत्पादों पर निर्भर हो चले थे. इससे बाजार का विस्तार हुआ था. इसका आशय ही था, पूंजीपतियों के लिए अतिरिक्त मुनाफा, बाजार का उत्तरोत्तर फैलाव और पूंजीवाद का निरंतर विस्तार.

26. औद्योगिक पूंजीवाद की उत्पत्ति

मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद का विस्तार एक ऐतिहासिक परिघटना थी. ‘पूंजी’ के अध्यायों में वह एक के बाद एक उन स्थितियों और परिवर्तनों का क्रमानुसार विश्लेषण करता है, जिनसे गुजरते हुए एक सरल समाज प्रकारांतर में औद्योगिक पूंजीवाद का शिकार हुआ और जिसके कारण समानताआधारित अर्थव्यवस्था चंद लोगों के वर्चस्व वाली अर्थव्यवस्था में बदलती जा रही थी. मार्क्स स्पष्ट करता है कि औद्योगिक पूंजीवाद का गुलाब, जमींदारी प्रथा की राख पर खिला था. बेलगाम मुनाफाखोरी के लिए जमीन उन मेहनतकश किसानों से हड़पी गई थी, जो पीढ़ियों से उसपर खेती करते आए थे. जमीन के साथ उनके भावनात्मक और बेहद करीबी संबंध थे. सामंतवादी शोषण और उत्पीड़न की विषम परिस्थितियों के बीच जो अपने जीवन को जैसेतैसे बचाए हुए थे. अपने परंपरागत उद्यमों से बेदखल हुए वे किसानमजदूरशिल्पकार जीवित रहने के लिए भारी संघर्ष से गुजर रहे थे. उनके पास बहुत कम विकल्प थे. अधिकांश लोगों ने पूंजीवादी उद्यमों की शरण ली थी. उनमें मजदूरी कर वे अपना जीवनयापन करने लगे. उनमें से कुछ ने जो व्यवहारकुशल और व्यावसायिक दृष्टि रखते थे, मशीनीकरण की शरण ली. उनमें से कुछ को सफलता भी मिली. लगातार मुनाफा कमाते हुए वे स्वयं को छोटे उद्यमियों की श्रेणी में स्थापित करने में सफल सिद्ध हुए. लेकिन ये सब संसाधनों की कमी का शिकार थे और अपनीअपनी सरकार से संरक्षण की आस लगाए हुए थे.

जमेजमाए उद्योगपति बाजार पर एकाधिकार चाहते थे. उनके पास संसाधनों की कमी न थी. अपने उद्योगों में वे बेहतर तकनीक का उपयोग कर सकते थे. उत्पादों के लिए नए बाजारों की खोज का उन्हें लंबा अनुभव था. किंतु अपने ही जैसे पूंजीपतियों से कड़ी स्पर्धा तथा बाजार पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए उन्हें भारी मात्रा में श्रमशक्ति की आवश्यकता थी. समस्या के समाधान के लिए पूंजीपतियों ने श्रमिकों को काबू में रखने के लिए दीघसूत्री योजना पर काम करना आरंभ कर दिया. यह योजना राजनीतिक सत्ता के साथ गठजोड़ पर टिकी थी. सरकार पर अपने दबदबे के कारण वे मनमाने कानून बनवाने में भी सक्षम थे. अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटिश सरकार द्वारा आरंभ की गई राष्ट्रीय ऋणकोश, कराधान जैसी अनेक नई व्यवस्थाएं, पूंजीपतियों की योजना के अनुसार थीं, इन सबने येनकेनप्रकारेण पूंजीवाद को मजबूत करने का ही काम किया था. इससे छोटे उद्यमी, किसान स्पर्धा में पिछड़ने लगे थे.

इन सभी व्यवस्थाओं को यद्यपि सर्वतोन्मुखी विकास के नारे के साथ लागू किया गया था. तथापि इनका प्रभाव सीमित एवं श्रमविरोधी था. यह औपनिवेशिक सरंचना आर्थिक मोर्चे पर फतह और नए संसाधन जुटाने के लिए भले अत्यावश्यक हो, मगर मूल रूप में यह श्रमशोषण एवं बेगार के सिद्धांत पर टिकी थी. इसका पलड़ा हमेशा पूंजीपतियों के पक्ष में झुका होता था. परिणाम यह हुआ कि औद्योगिकीकरण के विस्तार और उद्योगों के बीच कड़ी स्पर्धा के बीच अधिकतम लाभ की संभावना के साथ कारखानों में बालमजदूरों की भर्ती और उनका खुलेआम शोषण किया जाने लगा. पूरा का पूरा बाजार पूंजीपति के लाभ के लिए काम में जुट गया. विडंबना देखिए कि यूरोपीय देशों में 1769 से 1770 के बीच पड़ा भीषण अकाल भी पूंजीपतियों के लिए मुनाफे का संदेश लेकर आया था. उसमें एक ओर जहां लाखों गरीबों, बेबसों, स्त्रियों और मासूम बच्चों को जान से हाथ धोना पड़ा, वहीं पूंजीपति जमाखोरों ने सरकारी उदासीनता और अकाल की स्थितियों का लाभ उठाते हुए खूब चांदी काटी थी. लाभ के सिद्धांत पर टिकी उस पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में अधिकतम मुनाफा ही नैतिकता थी, इसलिए पुराने जीवनमूल्य धराशायी होने लगे थे.

मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी समाज में श्रमिक उसका सबसे शक्तिशाली केंद्रबिंदू हैं. अतएव श्रमिकवर्ग को काबू में रखने के लिए उन्हें संगठित होने, उधार लेने तथा ज्वाइंट स्टाॅक कंपनी की स्थापना के लिए प्रेरित किया गया. यह कार्य आधुनिक समाज में विकास और कल्याणकारी व्यवस्थाओं की स्थापना के नाम पर संपन्न हुए. मानवाधिकार और लोकतंत्र जैसी संस्थाओं ने भी अंततः पूंजीवाद को मजबूत करने का कार्य किया. इससे उत्साहित होकर अधिकांश कामगार ज्वाइंट स्टाॅक कंपनी, स्टाॅक एक्सचेंज तथा आधुनिक बैंक कर्जदारी के लिए प्रवृत्त हुए. उद्योगों को कर्ज प्रदान करने की अंतरराष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं ने, जो इस तथ्य को गोपनीय रखती थीं कि कर्ज के लिए वित्त की व्यवस्था किन òोतों से की जा रही है, कारखानों में श्रमिकों के शोषण को बढ़ाने का ही काम किया. आयकरदाताओं को टैक्स चुकाने और कर्ज लेने के लिए उकसाया जाता रहा. पूंजीपतियों ने जरूरी सेवाओं को भी बाजार में उतार दिया, ताकि उनके माध्यम से अपने लिए आय के नए स्रोत पैदा कर सकें. इसका उन्हें लाभ भी हुआ. बाजार के बहुमुखी विकास ने नई प्रौद्योगिकी की मांग पैदा की. नए क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी के आगमन से उनमें कार्यरत श्रमिककामगार, नाई, धोबी, दर्जी, बढ़ई, लुहार, स्वर्णकार आदि बेरोजगार होकर सड़क पर आ गए. कुल मिलाकर हालात ऐसे बनाए गए कि श्रमिक, कारीगर, हस्तशिल्पी सब के सब उसमें निरंतर उलझते ही गए. वास्तव में इस व्यवस्था से जुड़ा कोई भी व्यक्ति पूंजी के खूनी पंजों से बाहर जाने में असमर्थ था. वह सिर्फ छटपटा सकता था. अपसंस्कृतीकरण और महंगाई की बढ़ती दर से आहत हो सकता था. अपने हालात पर रो और छटपटा सकता था, लेकिन व्यवस्था में रहने, शोषण का शिकार होने और खुली आंखों से सबकुछ देखते जाने से अधिक कुछ और उसके बस में भी नहीं था. इन सभी परिवर्तनों के फलस्वरूप पूंजीवाद बेलगाम दौड़ता चला गया.

27. पूंजीवादी संचय की ऐतिहासिक प्रवृत्ति

प्रूधों का कहना था—व्यक्तिगत संपत्ति चोरी है….संपत्तिधारी व्यक्ति चोर है. मार्क्स हालांकि प्रूधों से कई मामलों में असहमत था. मगर व्यक्तिगत संपत्ति को लेकर उसकी कुछ मान्यताएं पू्रधों से मेल खाती हैं. इतिहास का भौतिकवादी अध्ययन करते हुए वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि उत्पादन के संसाधन सामाजिक परिवर्तन की मुख्य प्रेरणा रहे हैं, और इसके पीछे मनुष्य की संपत्ति संचय की प्रवृत्ति का भारी योगदान है. ‘पूंजी’ के बतीसवें अध्याय में मार्क्स पूंजीवादी संचय की प्रमुख वृत्तियों और उन अवस्थाओं का वर्णन करता है, जिनकी ओर वह उन्मुख है. लंबे चिंतनविश्लेषण के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि एक दिन श्रमिकवर्ग पूंजीवाद की, जो उसकी दुर्दशा का मूल कारण है, की वास्तविकता को पहचानेगा तथा संगठित होकर क्रांति का शंखनाद करेगा. वह पूंजीवाद का अंतिम दिन होगा. अध्याय के आरंभ में ही वह एक प्रश्न उठाता है—

‘‘प्राचीन पूंजीसंचयन ने अपने भीतर कौनसा परिवर्तन किया है?’ इस प्रश्न का उत्तर वह आगे स्वयं ही दे देता है—‘निजी संपत्ति का विलयन, जो उनके मालिकों ने कठोर परिश्रम द्वारा अर्जित की थी, अर्थात तात्कालिक उत्पादकों को बेदखल कर देना.’

पू्रधों से भिन्न मार्क्स ने निजी संपत्ति की अवधारणा का पक्ष लिया था. उसका मानना था कि श्रमिकों को निजी संपत्ति का अधिकार होना चाहिए, ताकि उसके द्वारा वे छोटेछोटे उद्यम स्थापित कर सकें. वह लघु उद्यमों की सामाजिक उत्पादकता को बनाए रखने एवं श्रमिक की अस्मिता और सम्मान की रक्षा के लिए आवश्यक मानता था. श्रमिक अपना बाॅस स्वयं है. चाहे वह हल जोतने वाला किसान हो अथवा हाथ में औजार लेकर काम करने वाला शिल्पकार. चाहे वह कारखानों में पसीना बहाकर रोजीरोटी कमाने वाला मेहनतकश श्रमिक हो अथवा दस्तकार. निजी संपत्ति ही उन सबके कल्याण की वाहक हो सकती है. वह लिखता है कि यद्यपि पूंजीवाद की नींव मजदूरों की भारी मात्रा में हुई बेदखली ने रखी है. निजी संपत्ति पूंजीपति के हाथों में पहुंचकर बहुआयामी शोषण का सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है. उसके कारण जो श्रमिककामगार कभी मुक्त जीवन जीने के अभ्यस्त थे, अब विस्थापित मजदूर बनकर कष्टमय जीवन जी रहे हैं. पूंजीवाद के चंगुल में फंसकर वे अपना सबकुछ गंवा चुके, सर्वहारा हैं. पूंजीपतियों ने उनके श्रम को पूंजी में बदल दिया है. उसके माध्यम से वह लाचार श्रमिकों का मनमाना शोषण कर रहा है. मार्क्स स्पष्ट करता है कि पूंजीपति की निजी संपत्ति पूंजीवादी विनियोजन के रूप में अविरत विस्तार लेती जाती है. इस कोशिश में वह अपने संपर्क में आने वाली हर छोटी संपत्ति जिसमें श्रमिक की अपनी पूंजी यानी श्रम भी सम्मिलित है, को आभाहीन कर देती, उसको ग्रस लेती है. ऐसी स्थितियां पैदा कर दी जाती हैं, जिनमें श्रमिकवर्ग का शोषण अपरिहार्य हो जाता है.

पूंजी के अध्ययन से स्पष्ट है कि मार्क्स अपने चारों ओर पूंजीवाद का नंगा नाच देख रहा था. उसके चंगुल में फंसे मजदूरों को उसने छटपटाते हुए देखा था. बावजूद इसके वह पूरी तरह आशावान था. पूंजीवाद की विशद् समीक्षा करने के पश्चात वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि अपनी मौत को स्वयं न्योता देना पूंजीवाद की मूल प्रवृत्ति है. यह एक ऐसा भस्मासुर है, जो दूसरे के श्रमकौशल के आधार पर ताकत ग्रहण करता है. किंतु अपनी मौत का उद्यम भी साथ लिए चलता है. श्रमिकअसंतोष की अनियंत्रित स्थितियां कभी भी उसको धराशायी कर सकतीं हैं. इसलिए पूंजीवादी व्यवस्था जहां अपने लाभ के लिए सार्थक उद्यम करती है, वहीं वह श्रमिकों को भुलावे में रखने के लिए निरंतर प्रयासरत रहती है. ये भुलावे सांस्कृतिक पहचान, धर्म और विशिष्ट क्षेत्रीयताओं को अस्मितावादी पहचान देने के नाम पर लगातार जारी रहते हैं.

पूंजीवाद की आलोचना करते हुए उसने उसको ऐसा उपक्रम बताया है, जिसमें सामाजिक नियंत्रण, सहयोग और सहकारिता, प्रकृति की नियामक शक्तियों तथा समाज के उत्पादक बलों के मुक्त विकास के लिए कोई स्थान नहीं है. अपने विकास के दौर वह इन्हें हड़पता चला जाता है. पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजीपतियों के बीच आंखमिचैनी जैसा स्पर्धा का खेल चलता ही रहता है. तमाम व्यावसायिक मनमुटाव और लागडांट के एक भी पूंजीपति नहीं चाहता कि उनके उत्पादनतंत्र में कोई बाहरी शक्ति हस्तक्षेप करे. मगर श्रमिकों के पास संगठन की ताकत, श्रम की ताकत और उत्पादन की योग्यता होती है. उसका विश्वास था कि पूंजीपतियों के व्यापक और शोषणकारी तंत्र को संगठित उत्पादक न केवल उखाड़ फेंक सकते हैं, बल्कि अपने श्रमकौशल के दम पर सर्वकल्याणकारी और विकेंद्रीकृत उत्पादनतंत्र की नींव भी रख सकते हैं. खदेड़ने वालों को भी खदेड़ा जा सकता है, मुट्ठीभर हाथों में सिमटे गैरसामाजिक उत्पादनतंत्र का सामाजीकरण कर उसके लौकिक और मानवीय चरित्र को वापस लौटाना असंभव नहीं है—मजदूरों की कार्यक्षमता में अटूट विश्वास रखने वाले मार्क्स का यही मानना था.

मार्क्स निजी संपत्ति को उतना बुरा नहीं मानता, जितना कि प्रूधों मानता था. बल्कि वह बड़े उद्योगों के स्थान पर छोटे उद्यम लगाने के पक्ष में था, जिनपर श्रमिकों का नियंत्रण हो. जहां वे अपनी जरूरत का सामान बना सकें. जहां हुए उत्पादन का पूरा लाभ वहां कार्यरत श्रमिकों को मिलें. उत्पादनतंत्र के समाजीकरण की प्रक्रिया में उसने निजी संपत्ति को व्यक्तिमात्र की संपत्ति कहा था. वह मानता था कि पूंजीवाद के पतन के बाद, उत्पादन व्यवस्था श्रमिकों के हाथों में चले आने का अभिप्राय निजी संपत्ति की अवधारणा की पुनः स्थापना नहीं है. वह लिखता है कि उत्पादन के समाजीकरण की क्रिया है, जो—

यह निजी संपत्ति की पुनः स्थापना नहीं करती. बजाय उसके यह पूंजीवादी युग की उपलब्धियों एवं शिक्षाओं के आधार पर, व्यक्तिमात्र की संपत्ति की अवधारणा जैसे कि सहयोगसहकारिता, कृषिभूमि पर समाज के संयुक्त अधिकार तथा श्रमिकों द्वारा संचालित विकेंद्रीकृत उत्पादनतंत्र की स्थापना करती करती है.’

मार्क्स की समस्या थी कि पूंजीपति के हाथों में जाकर सर्वभक्षणकारी बन चुकी पूंजी को किस प्रकार लोकोपकारी सामाजिक संपदा में बदला जाए. वह कौनसी प्रक्रिया है जिसमें समाज की संपत्ति उसके सर्वांगीण विकास से प्रेरित हो, न कि मुट्ठीभर लोगों के वर्चस्व वाली पूंजीवादी व्यवस्था से. अपनी पुस्तक में वह लगातार इसपर विचार करता है. वह जानता था कि पूंजी, धर्म और राजनीति के दम पर बेहद शक्तिशाली बन चुके पूंजीपतियों का न तो हृदय परिवर्तन संभव है, न ही उस व्यवस्था से जो मनुष्यमात्र को उपभोक्ता और उसके आसपास की प्रत्येक वस्तु को उपभोक्तावस्तु में बदल देने को प्रयासरत हो, किसी भी प्रकार के परिवर्तन की उम्मीद करना उचित है. वह मानता था सरकार अथवा समाज की अन्य नैतिक शक्तियों द्वारा बेलगाम बन चुके पूंजीवाद को काबू में करना असंभव है. उत्पीड़न से मुक्ति के लिए सिर्फ उत्पीड़क वर्ग को ही आगे आना होगा. श्रमिक अभी तक जो उत्पादन पूंजीपति के लिए करता है, वह अपने लिए करे, पूरे समाज के लिए करे, तभी पूंजीवाद के विषैले दांत उखाड़े जा सकते /हैं.

निरीह मजदूर जो अपनी आजीविका के लिए भी दूसरों पर आश्रित हों, वे शक्तिशाली पूंजीपतियों को भला कैसे उखाड़ सकते हैं? विशेषकर तब जब समस्त कानून, सरकारी विधान उनके पक्ष में होकर, उनकी सुरक्षा के लिए सन्नद्ध हों. इस बारे में मार्क्स का मानना था कि श्रमिकवर्ग को यह अवसर पूंजीवाद की ओर से स्वयं ही प्राप्त होगा. इसलिए कि पूंजीवाद की सबकुछ हड़प लेने का स्वभाव ही उसपर भारी पड़ने वाला है. एक दिन वह स्वयं अपने आप को समाप्त कर लेगा. उस दिन श्रमिकोंकामगारों के पास अवसर होगा कि अपने श्रमकौशल और संगठित शक्ति के दम पर समाज को निर्दिष्ट परिवर्तन की ओर ले जा सकें. जहां समाज मुख्य हो. उत्पादन के साधनों पर व्यक्ति का कब्जा न होकर समस्त समाज का अधिकार हो. जहां उत्पादन उपभोगआधारित न होकर आवश्यकताआधारित हो. और जहां आवश्यकताएं व्यक्ति की निजी महत्त्वाकांक्षाओं का प्रतीक न होकर, सामाजिक चेतना द्वारा मर्यादित होती हों.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप

कार्ल मार्क्स की पूंजी : संक्षिप्त विमर्श—दो

सामान्य

10. श्रमविभाजन के सिद्धांत और उत्पादन

अर्थशास्त्र के दृष्टि से यह ‘पूंजी’ के अतिमहत्त्वपूर्ण अध्यायों में से एक है. इसमें मार्क्स उन उत्पादन प्रविधियों का विश्लेषण करता है, जिन्हें पूंजीवादी अर्थव्यवस्था अपने लाभ को ध्यान में रखकर गढ़ती है. विश्लेषण के दौरान वह उत्पादन के दो प्रविधियों का उल्लेख करता है. पहली विधि के अंतर्गत उत्पादन प्रक्रिया में निपुण कामगारों को श्रेणीक्रम में इस प्रकार संयोजित किया जाता है कि उत्पादन कार्य उनमें से एक के बाद एक हाथों में जाकर पूर्णता को प्राप्त होता है. इस विधि में कार्य को छोटे-छोटे चरणों में बांटकर उन्हें क्रमानुरूप संयोजित कर दिया जाता है. उद्यमी प्रायः एक ही प्रकार के उत्पाद की रचना करता है. उदाहरण के लिए ट्रकों के लिए पिस्टन बनाने वाला कारीगर, कारखाने में एक समय में केवल पिस्टन बनाने का ही कार्य करेगा. और वह भी एक बार में एक ही किस्म के. भले ही वह अलग-अलग प्रकार के पिस्टन बनाने में निपुण हो. इस पद्धति में कर्मचारी का मस्तिष्क एकाग्र रहता है. एक कार्य को करते समय उसके हाथ उस काम में पारंगत हो जाते हैं, जिससे उसकी उत्पादकता बढ़ जाती है तथा उसको अपने काम में निपुणता का एहसास होने लगता है. उनके आत्मविश्वास में वृद्धि होने लगती है. उनकी कार्यक्षमता वैविध्ययुक्त होती है. साथ ही उन्हें यह आश्वति होती है कि कारखाना बंद होने अथवा छंटनी के अवसर पर उनके पास रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध होंगे.

कार्यविभाजन की दूरी पद्धति के अंतर्गत पूंजीपति कामगारों की भारी-भरकम संख्या को नौकरी पर रखता है तथा कार्य का इस प्रकार समायोजन करता है कि प्रत्येक कारीगर पूरा का पूरा माल स्वयं बनाता है. इस पद्धति में प्रत्येक कारीगर माल बनाने में निपुण होता है. मगर जटिल उत्पादन प्रक्रिया के दौरान, जिसके निर्माण में तरह-तरह की मशीनों, औजारों और सामग्रियों का उपयोग होता हो, अथवा अनेक पुर्जों को जोड़कर किसी बड़े उत्पाद का निर्माण करना हो, तो यह पद्धति कारगर नहीं हो पाती. उस अवस्था में यह अव्यावहारिक सिद्ध होती है. यह पद्धति कामगारों के निजी कौशल पर निर्भर करती है और बहुआयामी तकनीकी निपुणता वाले श्रमिक मिलना आसान नहीं होता. उत्पादन में अचानक वृद्धि करनी पड़े तो उसके लिए अतिरिक्त कुशल कारीगरों का इंतजाम करना कठिन हो जाता है. इस प्रविधि में उत्पादन श्रमिकों के कौशल पर निर्भर करता है. परिणामस्वरूप उत्पादक श्रमिकों पर आश्रित हो जाता है. यह स्थिति उसके पूंजीवादी हितों के प्रतिकूल होती है. अतः मानवीय कौशल पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए पूंजीपति उत्पादन प्रक्रिया के अधिकतम मशीनीकरण पर जोर देता है. उच्चतम उत्पादन क्षमता बनाए रखने के लिए वह उत्पादन क्रियाओं का छोटे-छोटे प्रखंडों में वर्गीकरण करता है, ताकि प्रत्येक श्रमिक से उसका सर्वश्रेष्ठ कार्य लिया जा सके. इस पद्धति में श्रमिक को भी कम परिश्रम करना पड़ता है, अतः बगैर यह जाने कि यह पूंजीपति के लिए अपेक्षाकृत अधिक लाभकारी है, वह इसका समर्थन करता है.

बड़े उद्यमों में पूंजीपति की कोशिश होती है कि कार्य को छोटे-छोटे प्रखंडों में विभाजित कर दिया जाए तथा एक कारीगर को उसकी क्षमता के अनुसार छोटे-से-छोटे प्रखंड की जिम्मेदारी सौंपी जाए, ताकि वह किसी एक क्रिया पर अपने आप को एकाग्र रखे. उस अवस्था में उसकी कार्यक्षमता अलग-अलग प्रवृत्ति का काम करने की अपेक्षा अधिक उत्पादक होगी. मार्क्स का कहना था कि जो कारीगर पूरे जीवनकाल में एक ही प्रकार का कार्य करता रहता है, उसके काम में दूसरों की अपेक्षा अधिक कौशल होता है.उसकी उत्पादक दूसरे कामगारों से अधिक पाई जाती है. इसलिए पूंजीपति की कोशिश होती है कि वह बहुमुखी कारीगरों के स्थान पर प्रत्येक उत्पादन-स्तर के लिए अलग-अलग कामगारों की नियुक्ति करे. संभव है इसके लिए आनुपातिक रूप में अधिक संख्या में श्रमिकों को नियुक्त करना पड़े. लेकिन अपेक्षाकृत कम कुशल श्रमिकों से भी काम चल जाने के कारण इसमें मजदूरी की बचत होती है और मालिक को श्रमिकों पर निर्भर भी नहीं होना पड़ता. कुल मिलाकर यह पद्धति पूंजीपति स्वामी के हितों के अनुकूल होती है. मार्क्स का यह भी कहना था कि एक ही प्रकार के उत्पादन से लंबे समय तक जुड़े रहने वाले विशेषज्ञता प्राप्त कारीगर प्रायः परिष्कृत औजारों से काम लेने में सक्षम होते हैं. हालांकि वे अलग-अलग काम करने में उतने कार्यक्षम नहीं होते, जितना कि कोई दक्ष कारीगर हो सकता है. इस व्यवस्था में श्रमिक मशीन का पुर्जा बनकर रह जाता है.

उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन श्रमिकों को कुशल और अकुशल श्रेणी में बांट देता है. कुशल श्रमिक के लिए लंबे प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए उत्पादन-प्रक्रिया के अंतर्गत उसके द्वारा किया गया योगदान अधिक श्रम-मूल्य की अपेक्षा रखता है. इसके विपरीत अकुशल कर्मचारी के काम में किसी भी प्रकार की विशेषज्ञता नहीं होती. उसको आमतौर पर वह कार्य सौंपा जाता है, जिसे कोई भी व्यक्ति बड़ी आसानी से पूरा कर सकता है. इसलिए उसके योगदान को अपेक्षाकृत कम श्रम-मूल्य द्वारा आंका जाता है. अपनी विशेषज्ञता और कुशलता का लाभ उठाने के लिए प्रशिक्षित कारीगर ऐसे कार्यों की तलाश में रहता है, जहां उसके कौशल की अपेक्षाकृत ऊंची कीमत प्राप्त हो सके. वह यह भी उम्मीद करता है कि उसको बाकी श्रमिकों, विशेषकर अकुशल कामगारों की श्रेणी से अलग और ऊपर माना जाए. मार्क्स के अनुसार बाजार में अपने ऊंचे श्रम-मूल्य के लिए प्रयासरत कुशल कामगार अंततः स्वयं महंगी उपभोक्ता सामग्री का रूप धारण कर लेता है. अन्य उपभोक्ता-सामग्री की भांति बाजार में आकर वह भी स्पर्धा की वस्तु बन जाता है. श्रमिकों के बीच स्पर्धा की अघोषित स्थिति पूंजीवादी व्यवस्था को मजबूत करने का काम करती है. कार्य का छोटे-छोटे समूहों में विभाजन श्रमिकों के बीच श्रम-मूल्य तथा श्रम-शक्ति के आधार पर स्तरीकरण को बढ़ावा देता है. यह स्थिति भी उत्पादक वर्ग के पक्ष में जाती है. क्योंकि श्रम-मूल्य और श्रम-शक्ति के कृत्रिम विभाजन को आधार बनाकर वह श्रमिकों के बीच स्पर्धा बनाए रखने में कामयाब हो जाता है.

श्रम-विभाजन को सिर्फ पूंजीवाद की उत्पत्ति मानना अनुचित होगा. वह उससे पहले भी समाज में अपनी उपस्थिति बनाए हुए था. मनुष्य की प्रकृति पर निर्भर होने के कारण यह संभव भी नहीं है कि हर व्यक्ति सभी कार्यों में समानरूप से दक्ष हो. उसका परिवेश और मानसिक-शारीरिक सामथ्र्य उसको कार्यविशेष की और उन्मुख करता है. उस कार्य में लगातार कार्य करते हुए वह पर्याप्त कौशल प्राप्त कर लेता है. मार्क्स का मानना था कि पूंजीवाद-नियंत्रित कार्यशालाओं तथा फैक्ट्रियों में श्रमिकों के बीच कार्य-विभाजन एकरूपता लिए होता है, दूसरी ओर सामाजिक-मनोवैज्ञानिक कारक उसको समाज के बीच अलग-अलग वर्गों में बांट देते हैं. इससे उसके विभिन्न समूहों के बीच द्वंद्व की संभावना बढ़ जाती है. सामाजिक स्तर पर श्रमिकों का विभाजन भी पूंजीपतियों के लिए हितकारी होता है. मार्क्स का मानना था कि श्रमिकों की संख्या के अनुपात में उत्पादन-वृद्धि के साथ-साथ अधिशेष मूल्य में बढ़ोत्तरी का प्रयास, कालांतर में अकुशल श्रमिकों की संख्या में कमी लाता है. लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादक का ध्यान श्रमिकों की संख्या में वृद्धि से अधिक मशीनों की संख्या में वृद्धि पर होता है. उत्पादन क्षेत्रा में आत्मनिर्भरता बढ़ाने बाजार में एकाधिकार कायम रखने के लिए वह नवीनतम तकनीक के उपयोग पर जोर देता है. अपने दूरगामी हितों को साधने के लिए लाभ का एक हिस्सा नवीनतम तकनीक की खोज पर लगाता है. इससे लाभांश सीमित हाथों में सिमटकर रह जाता है.

11. मशीनों का विकास

मशीनें आधुनिक उत्पादन-तंत्रा की जान हैं. उत्पादन प्रक्रिया के दौरान मशीनरी के उपयोग का वास्तविक उद्देश्य उत्पादकता में अपेक्षित बढ़ोत्तरी करना है. आदर्श स्थिति तो यह होगी कि मशीनें श्रमिक से रोजगार के अवसर छीने बगैर उत्पादन में हिस्सा लें, साथ ही कठिन श्रम और अप्रिय स्थितियों से भी उसकी रक्षा करें. सामान्यतः ऐसा नहीं होता. चूंकि मशीनों का आविष्कार पूंजीपति की महत्त्वाकांक्षा एवं पूंजी के सहयोग से होता है, इसलिए शोध संस्थानों में कार्यरत वैज्ञानिक-इंजीनियर अपने आका पूंजीपति को खुश करने के लिए तकनीक का अधिकाधिक स्वचालीकरण करने पर जोर देते हैं. मशीनों की अभिकल्पना केवल उत्पादकता में वृद्धि को आधार बनाकर की जाती है. श्रमिक की कठिनाई को सामान्यतः नजरंदाज कर दिया है. मार्क्स के अनुसार उत्पादकता में वृद्धि होते ही उपभोक्ता वस्तुएं सस्ते दाम पर उपलब्ध होने लगती हैं. इसी के साथ उत्पादक के लाभांश में वृद्धि होती जाती है. मशीनें उत्पादन-प्रक्रिया के अंतर्गत लगने वाले श्रम को कम कर देती हैं, वे इतना कार्य एक साथ निपटा देती हैं जिसके लिए श्रमिकों की भारी संख्या की जरूरत पड़ती. इस तरह वे एक साथ कई श्रमिकों के कई कार्यदिवसों को छीन लेती हैं, जो उनके जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक हैं. परिणामस्वरूप श्रमिकों के हाथों से काम खिसकने लगता है. मशीनों के आ जाने से पूंजीपति की उत्पादकता पर कोई असर नहीं पड़ता, बल्कि वह लगातार वृद्धि की ओर अग्रसर होती है.पूंजीपति सुनियोजित तरीके से तकनीकी शोध एवं विकास पर जोर देता है, ताकि उसकी श्रमिकों पर कम से कम निर्भरता हो. इस प्रकार वह पूंजी के दम पर विद्रोह की तमाम स्थितियों से निपटने में सक्षम होता जाता है. मशीनों की कार्यक्षमता में होने वाला निरंतर सुधार पूंजीपति के हितों की रक्षा करता है, लेकिन श्रम-शोषण और बेरोजगारी को बढ़ावा देने का माध्यम भी बनता है. उत्पादन-प्रक्रिया में श्रम-मूल्य घटने से श्रमिक को होने वाली आय में भी गिरावट आती है. परिणाम यह होता है कि जीवन के न्यूनतम स्तर से समझौता कर लेने के बावजूद अपने जीवन की न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने के लिए भी उसको अधिक देर तक कार्य करना पड़ता है.

मार्क्स मशीन, औजार तथा उनकी कार्यविधियों में अंतर करके देखता था. उसने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया था कि बहुत से विशेषज्ञ, जिनमें वैज्ञानिक, इंजीनियर, अर्थशास्त्री आदि सभी सम्मिलित हैं, औजार और मशीन के मूलभूत अंतर को समझने में अक्षम होते हैं. वे औजार को प्रायः मशीन का पूरक या उसका लघु संस्करण मानते हैं—

‘वे औजार को साधारण मशीन एवं मशीनों को संश्लिष्ट औजार कहकर पुकारते हैं.’

औजारों के संचालन के पीछे मनुष्य का प्रयोजन और उसका श्रम कार्यकारी शक्ति के रूप में उपस्थित होता है. जबकि मशीन का संचालन ऊर्जा के मानवेत्तर स्रोतों यथा पशु,विद्युत, जल, वायु आदि द्वारा किया जाता है. इस आधार पर पशुओं द्वारा खींचा जाने वाला हल या बैलगाड़ी को मशीन कहना चाहिए तथा करघा जो मनुष्य द्वारा संचालित होता है,औजार है. पुस्तक में मार्क्स ने क्लाजेन द्वारा निर्मित वृताकार करघे का उदाहरण दिया था,जिसको एक मजदूर चला सकता था. वह अत्यंत तीव्र गति से बुनाई करता था तथा एक बार में कई बुनकरों जितना काम करने में सक्षम था. उसका मानना था कि मशीन और औजार के अंतर का साधारणीकरण अनेकानेक समस्याओं को जन्म देता है. वह चाहता था कि इस बारे में सरकार, उद्योगपति समेत सभी संबंधित पक्षों की स्पष्ट नीति होनी चाहिए.मशीन को परिभाषित करते हुए मार्क्स ने लिखा है—

‘मशीन वस्तुतः एक ऐसी यांत्रिक युक्ति है, जब उसको गतिशील किया जाता है तो वह अपने यंत्रों/पुर्जों के माध्यम से सामान्यतः उन्हीं क्रियाओं का निष्पादन करती है, जिन्हें मनुष्य उससे पहले औजारों के माध्यम से करता आया था. यह बात महत्त्वहीन है कि उस मशीन को संचालन-ऊर्जा चाहे किसी मनुष्य द्वारा प्राप्त हो अथवा किसी अन्य स्रोत से आयातित.’

मार्क्स का मानना था कि पूंजीवादी व्यवस्था की जान आधुनिक विशाल संयंत्रा अठारहवीं शताब्दी में आविष्कृत सरल मशीनों द्वारा विकसित हैं. मशीनों का विकास मूलरूप से उन शिल्पकारों द्वारा किया गया है, जो अपने श्रम-कौशल से उत्पादकता की जिम्मेदारी संभालते थे. उन्होंने शिल्पकला को उद्योगों में बदलकर औद्योगिक क्रांति की शुरुआत की थी. हालांकि उनका प्रारंभिक ध्येय उत्पादन प्रक्रिया को सरल एवं कम परिश्रम-युक्त बनाना था. इस कारण ये मशीनें शिल्पकारों को स्थानापन्न करने में सक्षम थीं. वे उन सभी कार्यों को सफलतापूर्वक, बहुत कम समय में, परिष्कृत ढंग से अंजाम दे सकती थीं, जिन्हें उनसे पहले सिर्फ कुशल शिल्पकार ही कर पाता था. साथ ही एक मशीन एक साथ कई शिल्पकारों की भरपाई, लंबे समय तक और बिना किसी मानवीय थकान के कर सकती थी. मशीनों का डिजाइन और निर्माण इस प्रकार किया जाता है कि कारखाने में एक के बाद एक लगी हुई मशीनें, एक-दूसरे की सहयोगी और पूरक की भांति कार्य करती हैं तथा दूसरी मशीनों के साथ मिलकर एक उत्पादन-चक्र को पूरा करती हैं. मशीनों का निरंतर परिष्करण शिल्पकारों पर उनकी निर्भरता को कम से कम करता जाता है. औजार के सामने शिल्पकार के मूल्य होता है. इसलिए पूर्व-मशीनीकृत उत्पादन व्यवस्था में उसका सम्मान होता था. मशीन के आगमन के बाद उसकी हैसियत एक पुर्जे तक सिमटती गई.और अब स्वचालीकरण के बाद तो वह मशीनों पर निर्भर होकर रह गया है. स्वचालित मशीनें उसको स्वयं निर्देश देती हैं. एक स्थिति ऐसी भी आती है, जब मशीनें सारी उत्पादन-प्रक्रिया को स्वयं संभाल लेती हैं. स्वचालन की इस अवस्था में कारखाना मालिक की श्रमिकों-कामगारों पर निर्भरता न्यून हो जाती है. मशीनें कारीगरों से उनका हुनर और रोजगार छीन लेती हैं. मुनाफे का बड़ा हिस्सा स्वयं हड़पने के लिए पूंजीवादी व्यवस्था उत्पादन-तंत्रा के अधिक से अधिक स्वचालन पर जोर देती है. स्वचालीकरण के क्रम में मनुष्य के शिल्प-कौशल की महत्ता निरंतर घटती जाती है. परिणामस्वरूप उसकी उपेक्षा होने लगती है. यह स्थिति पूंजीपति को उत्पादन की असीमित शक्तियां सौंप देती है.

मशीनीकरण के आरंभिक दौर का विश्लेषण करता हुआ मार्क्स उनके रोचक विकासक्रम की ओर संकेत करता है. उसके अनुसार आविष्कारकों द्वारा मशीनों का विकास उत्पादन प्रक्रिया के कुछ खास चरणों को सफलतापूर्वक पूरा कर लेने की दृष्टि से किया था. उस समय यह सोचा गया था कि मशीनें आदमी को जानलेवा श्रम से मुक्ति दिलाकर उसके जीवन को आनंदमय बनाने का काम करेंगी. वे मनुष्यता के लिए, खासकर उस वर्ग के लिए जो अपने श्रम और कौशल पर जीवित हैं, अपेक्षाकृत आरामदेय और सुखमय जीवन प्रदान करेंगी. इसीलिए बेकन जैसे दार्शनिक ने मशीनों का स्वागत खुले दिल से किया था.लेकिन हुआ यह कि मशीनें लगातार बड़ी होती गईं और जो श्रम आवश्यक वस्तुओं के निर्माण में लगना चाहिए, वह मशीनों के निर्माण पर खर्च होने लगा. आदमी मशीनों के उत्पादन में जुट गया. अब तक न जाने कितनी मशीनों का आविष्कार हो चुका है और न जाने कितनी मशीनों के आविष्कार पर काम चल रहा है. मगर देखने में आया है कि जैसे-जैसे मशीनों का विकास होता है, नई और अधिक उत्पादन क्षमतायुक्त मशीन की जरूरत महसूस की जाने लगती है, जो उपलब्ध मशीन को कुछ ही अर्से में पुराना माॅडल घोषित कर देती है. एक मशीन तत्काल दूसरी मशीन की जरूरत को विस्तार देती है.पूंजीवादी उत्पादन प्रक्रिया में उत्पादन कई चरणों में बंटा होता है. उत्पादनतंत्रा में निरंतरता बनाए रखने के लिए उसके विभिन्न चरणों के बीच तारतम्यता बनाए रखना आवश्यक होता है. इसलिए एक मशीन तत्काल दूसरी मशीन की आवश्यकता को बढ़ावा देने लगती है. उदाहरण के लिए बुनाई मशीन की खोज ने छपाई और रंगाई मशीन के आविष्कार को भी बढ़ावा देने का काम किया है. एक मशीन का निर्माण दूसरी उसी प्रकार की मशीनों को संतुष्टि प्रदान करता है. मार्क्स कहता है कि मशीनें अपने उत्पादन के आधार पर एक-दूसरे से संबद्ध होती हैं, जैसे कि—

‘भाप के इंजन के अभाव में हाइड्रोलिक प्रेस का आविष्कार असंभव था. हाइड्रोलिक प्रेस ने आगे चलकर खराद मशीन और कटिंग मशीन के आविष्कार पर जोर दिया. श्रम का भौतिकवादी आचरण प्राकृतिक श्रम के हाथों मानवीय श्रम की अदला-बदली को आवश्यक बना देता है.’

यह स्थिति पूंजीपति व्यवस्था के लिए लाभकारी होती है, क्योंकि उस अवस्था में वह श्रम को एक उपभोक्ता सामग्री की भांति प्रयोग करता है. बाजार में आने से श्रम के बीच स्पर्धा की स्थिति पैदा हो जाती है, जो प्रकारांतर में पूंजीपति के लिए मददगार सिद्ध होती है.यही कारण है कि भारी-भरकम निवेश की जरूरत के बावजूद पूंजीपति अनुधनातन प्रौद्योगिकी का ही विकल्प चुनता है.

12. मशीन द्वारा उत्पाद को अंतरित मूल्य

गहन विश्लेषण के उपरांत मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि मशीनें मानव-ऊर्जा द्वारा चलने वाले औजारों का स्थानापन्न नहीं हो सकतीं. वे मानवीय श्रम एवं कौशल का हनन कर सकती हैं. उसकी अस्मिता के लिए चुनौती बन सकती हैं. मगर औजार हमेशा ही मानवीय श्रम-कौशल के हितैषी हों, ऐसा भी नहीं है. जब कई औजार एक साथ मिल जाते हैं, जो उन्हें मानवीय श्रम से चला पाना संभव नहीं रह जाता. तब वे एक मशीन का रूप ले लेते हैं. उस अवस्था में कारीगर औजारों से काम नहीं लेता, बल्कि उसको मशीन जो औजारों का ही जटिल समुच्चय है, से जूझना पड़ता है. कई बार वे उन सारी क्रियाओं को अपने अधीन कर लेते हैं, जिनसे कभी श्रमिक का कौशल झलकता था. औजार समुच्चय अथवा मशीन के समकक्ष श्रमिक की योग्यता मात्रा सहायक की रह जाती है. बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान अधिकतम उत्पादन के लिए उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ तकनीक का चयन करते हैं. इसके लिए वे ध्यान रखते हैं कि उनकी श्रमिक पर कम से कम निर्भरता हो.

तदनुसार पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन वृद्धि का अभिप्राय यह नहीं है कि श्रममूल्य तथा रोजगार के अवसरों में भी उसी अनुपात में वृद्धि होगी. इसलिए कि मशीन अपने आप में किसी भी मूल्य का सृजन नहीं करती. बल्कि अंततः वह श्रमिक की मूल्यवत्ता का ही हनन करती है, जिसको उत्पादकता में बदला जा सकता था और जिसका उपयोग मशीनों के आने से पहले, उत्पादन के स्तर को बनाए रखने के लिए अतीत में भी होता रहा है.मार्क्स का मानना था कि केवल पूंजीपतियों द्वारा क्रय की गई श्रम-शक्ति ही मूल्य का सृजन कर सकती है. मशीन केवल मूल्य का अंतरण कर सकती है, जो उसके अपने मूल्य के समानुपाती होता है. यह अंतरण उत्पाद के मूल्य में वृद्धि के लिए जिम्मेदार होता है.मार्क्स के अनुसार—

‘मशीन की जितनी अधिक उत्पादकता होगी, उत्पाद को अंतरित मशीन-मूल्य उतना ही कम होगा.’

मार्क्स का यह निष्कर्ष बड़े काम का है. उसके अनुसार उत्पाद के मूल्य और मशीन के मूल्य में कोई सीधा संबंध नहीं होता. संबंध होता है मशीन की उत्पादकता का. मान लीजिए कोई पूंजीपति पुरानी मशीन के स्थान पर नई प्रौद्योगिकी ये युक्त मशीन बदलना चाहता है, जिसका मूल्य पुरानी मशीन की अपेक्षा दो गुना है. नई मशीन पुरानी की अपेक्षा चार गुना उत्पादन करने में सक्षम है. ऐसे में उत्पादक दो गुनी कीमत देकर भी नई तकनीक युक्त मशीन खरीदने को उत्सुक होगा. इसलिए कि उसके उत्पाद की मशीनी लागत घटकर आधी रह जाएगी. इसके विपरीत श्रमिक की सीमा होती है. यदि किसी मालिक को अपने उत्पादन को दो गुना करना है तो उसको दुगुनी श्रमशक्ति की आवश्यकता होगी. इससे उत्पाद की निर्माण लागत अपरिवर्तित बनी रहेगी. यही कारण है कि पूंजीपति भारी-भरकम निवेश के बावजूद नई प्रौद्योगिकी खरीदने को उत्सुक रहता है.उसके लिए शोध पर भारी-भरकम निवेश करता है.

मशीनरी के उपयोग का सामान्य सिद्धांत यह है कि किसी मशीन अथवा मशीन-समुच्चय द्वारा उत्पाद विशेष के निर्माण में लगा श्रम उस उत्पाद के निर्माण में लगे मानवीय श्रम से कम होना चाहिए. यदि ऐसा नहीं है तो मशीन का उपयोग अर्थहीन हो जाएगा. उस अवस्था में पूंजीपति मशीन में निवेश के बजाय सीधे मजदूर से काम लेना पसंद करेगा.मशीन का उपयोग लाभ के बजाय घाटे का सौदा बन जाएगा.

13. फैक्ट्री और कामगार

मार्क्स के आर्थिक चिंतन की विशेषता यह है कि वह उत्पादन और उससे संबद्ध प्रत्येक पहलु की गंभीर विवेचना करता है. चाहे वह मशीन हो अथवा पूंजी. अपने चिंतन को आगे बढ़ाते हुए वह लिखता है कि पूंजी को उत्पादन प्रक्रिया में संवृत्त होने के लिए, पूंजीधारक को एक ऐसे स्थल की आवश्यकता होती है, जहां पर श्रम और मशीन के कार्यकलापों को उत्पाद में बदला जा सके. यह स्थल फैक्ट्री कहलाता है. लेकिन फैक्ट्री अथवा कारखाना केवल भौगोलिक स्थल अथवा मशीनरी का ठिकाना मात्रा नहीं होता, बल्कि वह एक मशीन,उत्पाद, श्रम एवं श्रमिक के अंतःसंबंधों, सहयोगात्मक प्रकार्यों, निर्देशक शक्तियों,नियमों-विनियमों की संपूर्ण व्यवस्था होती है. फैक्ट्री को परिभाषित करते हुए मार्क्स ने लिखा है. इस विवरण से मशीन एवं श्रम-शक्ति के अंतःसंबंधों को समझा जा सकता है—

‘‘सामान्यतः एक ही प्रकार के कार्य में प्रवृत्त विभिन्न स्तर के,वयस्क एवं युवा कामगारों, उत्पादक मशीनों की संयुक्त कार्यवाही,जो लगातार किसी केंद्रीय शक्ति अथवा सर्वप्रमुख संचालक द्वारा प्रेरित और निर्देशित होते हैं…’ दूसरे शब्दों में, ‘अनेकानेक मशीनों और सुविज्ञ कर्मिकों से बना एक व्यापक स्वचालन तंत्र जो किसी सामान्य उत्पाद के निर्माण हेतु निरंतर-निर्बाध कार्यरत हों; तथा वे सभी किसी स्वतः अनुशासित, प्रेरक शक्ति के प्रति उत्तरदायी हों.’’

उपर्युक्त विवेचन के दोनों खंड प्रथम दृष्टया एक ही जैसे जान पड़ते हैं, किंतु यदि गहराई से पड़ताल की जाए तो दोनों में पर्याप्त अंतर है. विवरण के पूर्वार्ध में श्रमिक अथवा संगठित श्रम-शक्ति मशीनों से स्वतंत्रा दिखाई पड़ती है. इस तरह उसकी मशीन के समानांतर सत्ता है. इसलिए उत्पादन व्यवस्था में उसका महत्त्व भी है. विश्लेषण के दूसरे हिस्से में मशीनें स्वचालित होकर प्रधान भूमिका में हैं, वहां श्रमिक अथवा कारीगर की भूमिका एक मशीन के सहायक या उपांग की है, जिसका अपना कौशल मशीन की योग्यता के आगे महत्त्वहीन हो जाता है. इस अवस्था का लाभ उठाकर पूंजीपति श्रमिक की मजदूरी में कटौती करता जाता है.

मशीनीकरण के आरंभ में कामगार के श्रम-कौशल का महत्त्व होता था. मशीनें तब औजारों का समुच्चय मात्रा थीं. अतएव कारखाना मालिक मशीनों के साथ दक्ष कामगारों पर भी समानरूप से निर्भर होता था. इसलिए औद्योगिकीकरण के आरंभिक दौर में उन्हीं को रोजगार मिला था, जो उस पेशे में दक्ष थे. पूंजी के विस्तार के साथ-साथ जैसे-जैसे मशीनांे का स्वचालन होता गया, कुशल कामगारों पर उनकी निर्भरता उत्तरोत्तर घटती गई.आधुनिक पूंजी-आधारित उद्यमों की विशेषता है कि उनमें मशीनों के आगे श्रमिक की भूमिका लगातार गौण होती जाती है. पूंजी-आधारित कारखानों में श्रमिकों के औजार,जिनके माध्यम से उसका हस्तकौशल उत्पादकता में बदलता है, लुप्तप्रायः हो जाते हैं.उसकी हुनरमंदी का स्थान मशीनें ले लेती हैं. यह सच है कि फैक्ट्रियां श्रम-विभाजन एवं शिल्प-विशेषज्ञता का भरपूर उपयोग करती हैं, बल्कि पूंजीवादी दबावों के अंतर्गत यह विभाजन और स्तरीकरण कई बार विस्फोटक रूप धारण कर लेता है. उल्लेखनीय है कि कारखानों में प्रायः दो प्रकार से काम लिया जाता है. पहली श्रेणी में वह कार्य आता है,जिसमें श्रमिक मशीन पर कार्यरत होते हैं. जबकि दूसरी श्रेणी में श्रमिक मशीनों का प्रेक्षक-मात्रा होता है. इनके अतिरिक्त फैक्ट्रियों में, वहां कार्यरत अथवा बाहर से बुलाए गए श्रमिकों का तीसरा वर्ग भी हो सकता है, जो मरम्मत और रखरखाव के काम में दक्ष हांे.कारखानों में ये सभी एक-दूसरे के सहयोगी और पूरक के रूप में कार्य करते हैं. उन सभी का एक ही ध्येय होता है. अपनी सम्मिलित कार्यक्षमता और परिश्रम से कारखाने को लाभ की स्थिति में बनाए रखना. मजदूर अपने स्वेद से मालिक के उद्यम को सोना उगलने वाले कारखानों में तब्दील करता है. मगर उनसे होने वाले लाभ पर मालिक का एकाधिकार होता है, जिससे उसका मौलिक सोच, शिल्पकर्म दम तोड़ने लगता है.

लोकतांत्रिक सरकारों में यह संभव है कि सरकार अथवा पूंजीपति हस्तकला एवं शिल्पकर्म के संरक्षण के नाम पर योजनाएं बनाएं. आधुनिक समाज में सरकारें अक्सर ऐसा ही करती हैं. लेकिन उनके संरक्षण के बावजूद मूल उत्पादन व्यवस्था में किसी भी प्रकार का योगदान न होने के कारण उनकी स्थिति दोयम दर्जे की हो जाती है. वे कलाएं जिनके आधार पर मशीनीकरण से पहले पूरी उत्पादन व्यवस्था निर्भर थी, केवल दिखावे और कभी-कभी तो दया की पात्रा मान ली जाती हैं. विडंबना यह है कि इस नियति को बदलने के लिए न तो सरकार कुछ कर पाती है, न शिल्पकारों के संगठन. बल्कि वहां भी पूंजीपति बिचैलिए के रूप में उपस्थित होकर बाजार पर कब्जा जमा लेता है. इससे शिल्पकारों को भी उनकी कृति का वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाता.

पूंजीवादी व्यवस्था में, जब तक बाहरी बाध्यता न हो, आमतौर पर कम वयस् के बच्चों को भी नौकरी पर रखा जाता है. ताकि वे वहां की परिस्थितियों, कानूनों और अनुशासन के अनुरूप स्वयं को ढाल सकें. साथ ही स्वचालित मशीनों के संग काम करते हुए उनके साथ अपनी कार्यशैली का अनुकूलन कर सकें. मार्क्स के अनुसार ये सभी स्थितियां मनुष्य के मानसिक विकास की अवरोधक होती हैं. फैक्ट्रियों का माहौल श्रमिकों से उनकी मूलभूत जरूरतों यथा स्वच्छ हवा, मुक्ताकाश, सुरक्षा, संवेदनशीलता, प्रकाश, स्वतंत्रा निर्णय लेने की आजादी को छीन लेता है. उल्लेखनीय है कि जिस समय मार्क्स ने पूंजी का लेखन किया,उन दिनों तक फैक्ट्रियों में काम करने वाले बालश्रमिकों पर रोक के लिए ठोस कानूनी प्रावधानों का अभाव था. जो कानून थे, वे सभी ढुलमुल, अस्पष्ट और मालिकों का पक्ष लेने वाले थे. मार्क्स की भांति फ्यूरियर ने भी बड़े कारखानों को श्रमिक हितों के विरुद्ध माना था. उसने फैक्ट्रियों को ‘उत्पीड़क कार्यशालाएं’ कहते हुए उनसे बचाव की सलाह दी थी. मार्क्स ने भी फैक्ट्रियों को पूंजीपतियों के लिए एकतरफा लाभ पहुंचाने वाला उद्यम माना, लेकिन वह वह फ्यूरियर की स्थापना से असहमत था.

पुस्तक के अगले चरण में मार्क्स उन स्थितियों और विचारों की विशद् समीक्षा करता है,जिनके आधार पर वह अभी तक मशीनों और कारखानों का विरोध करता आ रहा था.किसी समय मशीनों पर नियंत्राक की भूमिका निभाने वाला श्रमिक जब मशीन का पूरक या सहायक मात्रा बनकर रह जाता है, तब उसके मन में असंतोष पनपने लगता है.हालांकि एकाकी असंतोष की परिणति सामान्यतः व्यक्तिगत कुंठाओं और क्षोभ के रूप में ही सामने आती है. इनकी सतत और लंबे समय तक मौजूदगी प्रकारांतर में श्रमिकों के मन में आक्रोश को जन्म देती है, जिससे उनके मध्य से विरोधी स्वर उभरने लगते हैं.स्मरणीय है कि यहां मार्क्स नवीनतम प्रौद्योगिकी तथा उसके आधार पर विकसित मशीनों का विरोध नहीं करता. बजाय इसके वह सीधे-सीधे पूंजीवादी व्यवस्था की आलोचना करता है, जो श्रमिक से उसका मनुष्यत्व छीनकर उसको मशीन के मामूली पुर्जे की हैसियत तक अवमूल्यित कर देती है. वह लिखता है—

‘परंपरागत औजारों और पूंजी-आधारित उद्यमों में नवीनतम प्रौद्योगिकी पर आधारित रोजगार में अंतर करने में श्रमिकों का ढेर सारा समय और अनुभव लगा; और इस प्रकार वे अपना सारा ध्यान उत्पादन का मूलभूत औजार बनने के बजाय एक ऐसा समाज बनाने में लगा सके, जो उन औजारों का उपयोग कर सके.’

मार्क्स के अनुसार मशीन शिल्पकारों, कारीगरों के साथ स्पर्धा में रहती है, और इस प्रकार वह श्रम-शक्ति के उपयोग-मूल्य में गिरावट का कारण बनती हैं. गहन विश्लेषण के उपरांत मार्क्स ने स्पष्ट किया था कि मशीनें दक्ष कामगार को हटाकर उसके स्थान पर अकुशल अथवा अर्धकुशल कर्मचारी को ले आती हैं, जिसकी परिणति मजदूरी में नकारात्मक प्रभाव के रूप में देखने को मिलती है. इससे समाज में मानवीय कौशल की महत्ता तथा लोगों में खुद को परिष्कृत करने की ललक घटने लगती है. स्वचालित मशीनें अकुशल कामगारों द्वारा भी संचालित हो सकती हैं. परिणामस्वरूप समाज में दक्ष कामगारों की संख्या लगातार घटने लगती है. दूसरी ओर बालश्रमिकों की संख्या और पूंजीपतियों के लाभ में लगातार वृद्धि होती जाती है. इस लाभ के एक हिस्से का उपयोग पूंजीपति मशीनों के कार्यकुशलता को और अधिक बढ़ाने के लिए शोध आदि पर करता है, जिससे श्रम-शोषण की नई स्थितियों का जन्म होने लगता है.

पुस्तक में मार्क्स ने राजनीतिक अर्थशास्त्रियों के क्षतिपूरक सिद्धांत की आलोचना की है.पूंजीवाद के समर्थक इन अर्थशास्त्रियों का कहना था कि मशीनीकरण की प्रक्रिया जितने श्रमिकों को बेदखल करती है, वह अनिवार्यतः उतनी ही सचल पूंजी की बचत भी करती है,जो उससे पहले तक श्रमिकों को वेतन-मजदूरी आदि के रूप में अदा की जाती थी. यह राशि आगे भी इसी मद में उपयोग की जाती है, जिससे अन्य श्रमिक लाभांन्वित होते हैं और इस प्रकार उन्हें अब तक हुए नुकसान की भरपाई सामान्यतः हो ही जाती है. इस तर्क के विरोध में मार्क्स का कहना था कि मशीनीकरण की प्रक्रिया में अस्थायी अथवा चल पूंजी स्थायी पूंजी का रूप ले लेती है. मालिक अवशेष पूंजी का उपयोग नवीनतम प्रौद्योगिकी, जो प्रायः श्रम-विरोधी होती है, की खरीद के लिए करता है, जिसका सीधा प्रभाव कारखाने में श्रमिकों की संख्या पर पड़ता है. अतएव बची हुई चल पूंजी का उपयोग श्रमिकों की मजदूरी आदि के रूप में करना इसलिए भी संभव नहीं है, क्योंकि वह पहले ही उन्नत तकनीकी युक्त मशीनों में निवेश कर दी जाती है, जो उद्योग-स्वामी की परिसंपत्ति कहलाती है. यदि कुछ राशि बचती भी है तो भी क्षतिपूर्ति के लिए उपलब्ध कुल धनराशि उस राशि से बहुत कम होती है, जिसका उससे पहले श्रम-शक्ति की खरीद के लिए उपयोग किया जाता था. इसके अलावा अवशेष अस्थायी पूंजी का उपयोग नवीनतम मशीनरी के संचालन हेतु विशेषज्ञ-शिल्प पर व्यय होता है, जिसके फलस्वरूप अधिक से अधिक धन स्थायी पूंजीनिवेश के काम आता है. प्रौद्योगिकी में होने वाले निरंतर सुधार के फलस्वरूप जिन कामगारों से काम छूटता है, उनको तत्काल प्रभाव से क्षतिपूर्ति संभव नहीं होती. इस तरह कारखानों से बेदखल हुए श्रमिक बेरोजगार श्रमिकों की संख्या में चिंताजनक वृद्धि का कारण बनते हैं, जो अंततः श्रमिकों के शोषण और प्रकारांतर में उनकी दुर्दशा का कारण बनते हैं. मार्क्स यह तो स्वीकार करता था कि मशीनों के क्षेत्रा में हुए नए आविष्कार नए क्षेत्रों में रोजगार सृजन को बढ़ावा दे सकते हैं, लेकिन इससे पूंजी के बढ़ते वर्चस्व और श्रमिक की शोषणकारी प्रवृत्तियां कम होने के बजाय उत्तरोत्तर बढ़ती जाती हैं. स्पष्ट है कि प्रौद्योगिकी के क्षेत्रा में होने वाला लाभ एकतरफा होता है. मशीनें मजदूर के अतिरिक्त श्रम की बचत तो करती हैं, मगर वे उससे उसका शिल्प भी छीन लेती हैं, जिसके कारण उसको पूंजीपतियों पर आश्रित होकर रह जाना पड़ता है.

उत्पादकता में वृद्धि का सकारात्मक प्रभाव निश्चित रूप से उन क्षेत्रों पर भी पड़ता है, जो उसके लिए कच्चेमाल की आपूर्ति करते हैं. इसको ऐसे भी कहा जा सकता है कि कच्चेमाल की आपूर्ति के क्षेत्रा में नई मशीनरी का आगमन, उसके उपभोग से संबंधित उद्योगों के विकास को भी समानुपातिक गति देता है. कुल मिलाकर इससे पूंजीपति वर्ग के लाभ में भी वृद्धि होती है. यह अधिशेष वृद्धि प्रकारांतर में शासक वर्ग की कुल संपदा में बढ़ोत्तरी का कारण बनती है, जिसका उतना ही असर श्रमिक-बाजार पर भी पड़ता है, जो अंततः नए उद्योगों के विकास का रास्ता खोल देता है. नए उद्योग श्रमिकों के रोजगार के नए ठिकाने बनते हैं. क्योंकि तब तक श्रम-विरोधी प्रौद्योगिकी उनके शोषण एवं बेदखली के नए क्षेत्रा विकसित कर चुकी होती है. इस विश्लेषण के उपरांत मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि स्थानीय सेवा-आधारित उद्योगों में हुई वृद्धि उसी अनुपात में उत्पीड़ित वर्ग की संख्या और उत्पीड़क-स्थितियों में वृद्धि करती जाती है.

आगे इसी अध्याय में मार्क्स मशीनों के विकास के प्रति श्रमिकों के आकर्षण और विकर्षण पर चर्चा करता है. इसके लिए वह उनीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में कपास उद्योग पर आए संकट को माध्यम बनाता है. वह लिखता है कि राजनीतिक अर्थशास्त्री तर्क देते हैं कि मशीनीकरण से बेदखल हुए मजदूरों को अन्य क्षेत्रों में आसानी से रोजगार मिलता रहता है, जो मशीनीकरण के कारण उत्पन्न लेते हैं. अपने तर्क को स्पष्ट करने के लिए वह सिल्क उद्योग का उदाहरण देता है, जिसमें मशीनीकरण के कारण आई रोजगार अवसरों में गिरावट की भरपाई उसी क्षेत्रा में मशीनों की संख्या के फलस्वरूप होती जाती है. दूसरे शब्दों में—

‘कार्यरत फैक्ट्री-श्रमिकों की संख्या में हुई आनुपातिक वृद्धि उससे मिले-जुले क्षेत्रों में हुई औद्योगिक वृद्धि का परिणाम होती है, साथ ही यह नए कारखानों का निर्माण अथवा पुरानी फैक्ट्रियों का विस्तार है.’

मार्क्स का तर्क था कि फैक्ट्री कामगारों की संख्या में आनुपातिक वृद्धि इसलिए जरूरी है क्योंकि मशीनीकरण के कारण बेरोजगार हुए श्रमिकों की संख्या और नई मशीनों के परिचालन के लिए आवश्यक यानी उनके माध्यम से रोजगार-प्राप्त श्रमिकों की संख्या में भारी अंतर होता है. पूंजीवाद में निरंतर वृद्धि तथा उसके प्रयासस्वरूप हुए तकनीकी सुधार,उपभोक्ता वस्तुओं के बाजारों की संख्या में उस समय तक वृद्धि करते हैं, जब तक कि वे दुनिया के प्रत्येक कोने तक फैल नहीं जातीं, जो अंततः पूंजीपतिवर्ग के लिए वैभव और संपन्नता तथा श्रमिकवर्ग के लिए विपत्तिचक्र का कारण बनती हैं. लंबे विश्लेषण के बाद मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि तकनीकी सुधारों के लिए श्रमिकवर्ग का विकर्षण और आकर्षण वस्तुतः वह क्रमिक आवृत्ति है, जिसमें मशीनीकरण के कारण रोजगारविहीन हुए श्रमिकों की संख्या उत्पादकता-वृद्धि को जन्म देती है. इसकी प्रतिक्रिया नए क्षेत्रों में औद्योगिक विस्तार और तदनुसार श्रमिकों को मिले अतिरिक्त रोजगार के रूप में सामने आती है. यह शृंखला नए क्षेत्रों में औद्योगिक विस्तार तथा परिवर्तनशील श्रम-शक्ति को जन्म देती है, जो स्वचालीकरण की प्रक्रिया में लगातार सहायक की भूमिका में आती रहती है, परिणामस्वरूप मशीनरी आदि के रूप में पूंजी का एक ही स्थान पर संकेंद्रण होता जाता है, जो पूंजीपति को और ताकतवर एवं श्रमिकों से उनकी निर्णय लेने की स्वतंत्राता को छीनकर कमजोर और पर-आश्रित बनाता है.

14. परम अधिशेष और आनुपातिक अधिशेष का सृजन

‘दि कैपीटल’ के सोलहवें अध्याय में मार्क्स कारखाना मजदूरों की व्यक्तिगत उत्पादक गतिविधियों के अनेक श्रमिकों के सामूहिक प्रयास में बदल जाने के प्रभावों का वर्णन करता है. विरोधाभास देखिए कि व्यक्तिवाद को अपने लिए हितकारी मानने तथा अपने व्यावसायिक हितों के लिए उसका लाभ उठाने वाला पूंजीपति वर्ग श्रमिकों के मामले में एकदम विपरीत आचरण करता है. बाजार के विस्तार के लिए वह चाहता है कि परिवार का प्रत्येक सदस्य, अन्य सदस्यों के साथ उपलब्ध सुविधाओं में साझा करने के बजाय अपने लिए निजी सुविधाएं खरीदे. हर सदस्य के पास अपनी निजी टेलीफोन, मोबाइल,कंप्यूटर, कार, मोटर साइकिल वगैरह हों. इनमें से एक भी सुविधा उसको परिवार के सदस्यों के साथ बांटनी न पड़े. इसके लिए वह जाॅन स्टुअर्ट मिल जैसे व्यक्ति-स्वातंत्रय के समर्थक दार्शनिकों का तर्क देता है. चूंकि लोकतंत्रा व्यक्तिवाद का ही सुसंस्कृत रूप है,इसलिए चाहे-अनचाहे वह लोकतंत्रा का भी समर्थन करता है. किंतु श्रमिक से काम लेते समय वह उसके निजी कौशल की सतत उपेक्षा करता है. वह चाहता है कि मशीनें इतनी सक्षम हों कि उसको कुशल श्रमिकों पर निर्भर रहना ही न पड़े. वह जानता है कि काम को करने वाले जितने अधिक होंगे, उतनी ही उनके बीच स्पर्धा होगी, जो अंततः उसके लिए लाभकारी होगी.

मार्क्स का मानना था कि यह प्रक्रिया श्रमिकों को उपभोक्ता वस्तुओं के वास्तविक उत्पादन से परे ले जाकर पूंजीपति को इस बात का पूरा अवसर देती है कि वह उसका उपयोग केवल अपने अधिलाभ की वृद्धि हेतु कर सके. जबकि अधिशेष में वृद्धि संपूर्ण प्रविधियों यथा कार्य-दिवस का विस्तार, कार्यघंटों में वृद्धि और उसके अनुसार उत्पादकता में वृद्धि के आधार पर ही संभव है. श्रमिकों का उपभोक्ता सामग्री के उत्पादक के बजाय उत्पादकों के भले के लिए काम करना, पूंजीवाद के विकास के लिए आवश्यक है. पूंजीवाद से पहले कामगार और शिल्पकर्मी प्रायः निजी उपयोग के लिए अनिवार्य समझी गई वस्तुओं का उत्पादन करते थे. कालांतर में औजारों के सहयोग से, उन्होंने अपनी आवश्यकता से इतर वस्तुओं का उत्पादन आरंभ किया तो श्रम और मजदूरी के बीच आदान-प्रदान की प्रक्रिया आरंभ हुई. श्रमिकगण प्राप्त मजदूरी से जीवन के लिए अनिवार्य वस्तुओं की खरीद-फरोख्त करने लगे. श्रम का मजदूरी के बदले अंतरण पूंजीपतियों को अपने हितों के अनुकूल लगा.उन्होंने मजदूरों को इसके लिए उत्साहित किया. प्रारंभ में पूंजीपतियों द्वारा उत्पादन-विशेष के लिए प्रदान की गई मजदूरी, इतनी होती थी कि उसके सहारे श्रमिक अपनी सामान्य आवश्यकताओं को पूरा कर सके, मगर वह उस राशि से बहुत कम थी, जिसे वे उत्पादक के रूप में स्वयं अर्जित करने में सक्षम थे. आगे चलकर जैसे-जैसे मशीनें उत्पादन की जिम्मेदारी निभाने में सक्षम होती गईं, पूंजीपति श्रमिकों की उपेक्षा करने लगा. यही नहीं वे सारे कार्य जो कुशल शिल्पकर्म की अपेक्षा रखते थे और जिन्हें श्रमिकों द्वारा आसानी से कराया जा सकता था, उन्नत तकनीकयुक्त मशीनों के माध्यम किए जाने लगे. दूसरे शब्दों में उन्हें अब दक्ष कामगारों की आवश्यकता ही नहीं थी. हालांकि कुछ मशीनें ऐसी भी विनिर्मित हुईं, जिनके परिचालन के लिए विशिष्ट प्रशिक्षण की आवश्यकता थी. इसके लिए पूंजीपतियों ने कुछ नए पद सृजित किए और अपेक्षाकृत अधिक वृत्तिका देकर काम चलाया. साथ ही उन्हें बाकी श्रमिकों से अलग बताते हुए दोनों के बीच कृत्रिम अंतर का दिखावा किया, जिससे कि उनके बीच की दूरी सदैव बनी रहे. ऐसे पदों की संख्या बहुत कम थी.

उच्चतकनीक पर निर्भर मशीनों को सामान्य कुशलता प्राप्त अथवा अर्धकुशल कामगार भी चला सकता था, जिनपर पूंजीपति को अपेक्षाकृत कम खर्च करना पड़ता था. ये सभी स्थितियां पूंजीपतियों के पक्ष में थीं. उच्च कार्यक्षमता संपन्न सघन उत्पादन तकनीक ने मशीनों का अधिक से अधिक स्वचालीकरण कर श्रमिकों को उत्पादनचक्र से बाहर ढकेल दिया था. उनकी भूमिका जटिल उत्पादन-प्रक्रिया के केवल एक हिस्से तक सिमटकर रह गई. इससे उत्पादक श्रम के मायने ही बदल गए. अब श्रमिक और शिल्पकर्मी वृहद उत्पादन तंत्रा के मामली पुर्जे के समान थे, जिसकी भूमिका पूंजीपति के लाभ में वृद्धि करने तक सीमित थी. मशीन-आधारित उत्पादन प्रणाली के दबाव के चलते उत्पादन मजदूरों और शिल्पकर्मियों के हाथों से फिसलकर पूंजीपतियों के अधीन चला गया.परिणामस्वरूप हस्तकौशल एवं व्यक्तिगत श्रम की महत्ता अतीत के अरण्यरोदन तक सिमटकर रह गई. इस व्यवस्था में पूंजीपति न केवल उत्पादन का अधिकतम हिस्सा हड़प लेता था, बल्कि उसका प्रयास होता था कि वह लाभ के अधिकतम हिस्से पर कब्जा कर सकें.

अपने लाभानुपात में वृद्धि के लिए पूंजीपति कार्यदिवस में बढ़ोत्तरी करने के प्रयास में रहता है, ताकि उसी मजदूरी के बदले में वह श्रमिकों से अधिक कार्य ले सके. लाभानुपात में वृद्धि का यह सबसे आसान तरीका है. जहां पूंजीपतियों पर प्रशासनिक अनुशासन कम हो अथवा शासन-प्रशासन को उसने अपने प्रभाव में ले रखा हो, वहां की सरकारें कार्यघंटे तय करने का अधिकार पूंजीपतियों को सौंप देती हैं, अथवा इस ओर से लगभग उदासीन हो जाती हैं. इस अवस्था में पूंजीपतियों को मनमानी करने, श्रमिकों पर अपनी शर्तें थोपने का अवसर मिल जाता है. लाभानुपात में वृद्धि का दूसरा उदाहरण उत्पादन प्रविधि में व्यापक बदलाव है, जिसको पूंजीपति प्रौद्योगिकी के अधिकाधिक आधुनिकीकरण द्वारा प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहता है. आधुनिक तकनीक पर आधारित मशीनें कम समय में अधिक उत्पादन करने में सक्षम होती हैं. प्रायः वे उत्पादन-प्रक्रिया की जटिल स्थितियों,अभिक्रियाओं को अपने हाथ में ले लेती हैं. ऐसी अवस्था में उनपर कार्यरत श्रमशक्ति का अवमूल्यन होता है, जो श्रम-स्पर्धा में वृद्धि का कारण बनता है. परिणामस्वरूप श्रम-मूल्य में गिरावट आने लगती है, जो पूंजीपति के लिए लाभदायक होती है.

यदि कोई श्रमिक निर्धारित समय-सीमा के अंतर्गत केवल उतना कार्य करता है, जितने के लिए उसे मजदूरी प्राप्त होती है, उस स्थिति में पूंजीपति-स्वामी को उससे कोई अतिरिक्त अधिलाभ नहीं होगा. अतएव पूंजीपति-स्वामी निरंतर यह प्रयास करता है कि उसका श्रमिक न्यूनतम समय लेकर अधितम कार्य पूरा करे, अथवा बिना किसी अतिरिक्त मजदूरी की अपेक्षा के निर्धारित कार्य-घंटों से अधिक समय तक कार्य करे. पूंजीपति-स्वामी का लालच श्रम-शोषण को जन्म देता है. श्रमिक की भलाई इसी में है कि वह शोषणकारी स्थितियों से स्वयं को बचाने का यथासंभव प्रयास करे. किंतु जिन समाजों में अतिरिक्त श्रम की उपलब्धता हो तथा अधिकांश श्रम-शक्ति प्राकृतिक उपादानों पर निर्भर हो, वहां एक व्यक्ति द्वारा अपने श्रम के बोझ को दूसरे के कंधे पर डाल देना बहुत आसान होता है.हालांकि श्रमिक भी एक व्यक्ति के रूप में पूंजीवादी उत्पीड़न से बाहर आने के लिए प्रयासरत रहता है.

पूंजीवादी शोषण से मुक्ति का एक सुनिश्चित तरीका तो यह है कि श्रमिक स्वयं पूंजीपति बनकर उत्पादन पर अधिकार जमा ले. एक अन्य रास्ता यह भी हो सकता है कि वह अपने श्रम-कौशल का इस प्रकार विशिष्टीकरण कर ले कि उत्पादन प्रक्रिया में न केवल उसका योगदान अनिवार्य हो, बल्कि उसकी उपस्थिति दूसरे श्रमिकों के लिए अपरिहार्य बन जाए. यह श्रम के समाजीकरण की अवस्था है, जिसमें अतिरिक्त श्रम आपसी तालमेल के आधार पर अपने अस्तित्व की रक्षा कर सकता है. मार्क्स ने संपदा की दो मूलभूत अवस्थाओं को विशिष्टीकृत श्रम की प्रगति में सहायक माना है. इनमें पहली अवस्था है जब प्राकृतिक संपदा जीवनयापन का प्रमुख माध्यम बन जाती है. दूसरी अवस्था वह होती है, जब वह श्रम की सहायक अथवा औजार बनकर उत्पादन में सहायक बनती है. मार्क्स के अनुसार सामाजिक विकास की मुख्य विशेषता यही होती है कि वह सदैव आगे की ओर जाता है. उसमें उतार-चढ़ाव के स्वाभाविक दौर तो आते रहते हैं, मगर एक सातत्य उनके बीच सदैव विद्यमान रहता है. थोड़े ही वर्ष पहले की बात है जब प्रत्येक समाज अपनी आवश्यकतानुरूप उत्पादन करने में सक्षम होता था और अतिरिक्त श्रम जैसी कोई समस्या भी नहीं थी. उत्पादन-प्रक्रिया के असंगठित रूप में यह भी असंभव था कि मनुष्य इसी आधार शोषण करता रहे. मार्क्स के अनुसार उत्पादन की वह प्रणाली परस्पर सहयोग और सहअस्तित्व की भावना के साथ कायम थी, जिसमें किसी एक पक्ष द्वारा उसके दुरुपयोग की संभावना न के बराबर थी.

मार्क्स ने मिश्रवासियों के उदाहरण द्वारा समाज की अंतर्निहित शक्ति का उल्लेख किया है,जब मनुष्य के पास समय तो था, लेकिन उसका उपयोग अतिरिक्त-श्रममूल्य की स्थापना के लिए नहीं होता था. उसने लिखा है कि मिश्र के निवासी बहुत ही उर्वरा भूमि कर वास करते थे, उनका जीवन प्रकृति और वन्य जंतुओं पर निर्भर था. चूंकि भोजन की व्यवस्था प्रकृति पर निर्भर थी और वह उन्हें कभी निराश भी नहीं करती थी, अतएव एक और बच्चे के आगमन से उनपर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता था. परिणाम यह हुआ कि उनकी जनसंख्या बढ़ती चली गई. मिश्र की वास्तुकला और वहां के महान ऐतिहासिक पिरामिडों के बारे में मार्क्स का विचार था कि उनकी रचना इसलिए संभव नहीं हुई थी कि वहां की जनसंख्या बहुत विशाल थी. बल्कि इसलिए संभव हो पाई थी कि उनके पास अतिरिक्त समय था. पूंजीवाद के बारे में आप सोच सकते हैं कि अधिक प्राकृतिक संपदा होने का अभिप्राय तीव्र प्रगति और सघन उत्पादन है, जैसाकि मिश्र में हुआ था. मगर ऐसा हर स्थिति में संभव नहीं है. रोजी-रोटी की चिंता किए बगैर वे अपने समय को मनोेनुकूल कार्यों में लगा सकते थे. यही कारण है कि पूंजीवाद उन देशों में अधिक मजबूत होकर उभरा, जो देश प्राकृतिक रूप से कम संपन्न हैं, जहां प्राकृतिक संसाधनों का अपेक्षाकृत अभाव है. इसलिए समाज के बहुसंख्यक वर्ग की भलाई के लिए प्राकृतिक संसाधनों को पूंजीवादी एकाधिकार से बाहर रखना अत्यावश्यक है.

मार्क्स ने अगले चरण में अफ्रीका के पुराने निवासियों के उदाहरण देकर बताया है कि वहां के मूल निवासी सप्ताह मे केवल बारह घंटे कार्य करके अपने जरूरत की वस्तुओं का उत्पादन बहुत आसानी से कर लेते थे. पूंजीवाद के आगमन से पहले यह उनकी संपन्न जीवनचर्या का हिस्सा था. पूंजीवाद ने उत्पादन को मशीनीकृत किया. मशीनों का आगमन श्रम को सुविधामय बनाने के नारे के साथ हुआ. इसलिए प्रारंभ में श्रमिकों की ओर से उनका स्वागत भी हुआ. लेकिन मशीनें सिर्फ उन्हीं के हितसाधन हो उन्मुख होती हैं, जो उनका स्वामी, यानी पूंजीपति है. परिणाम यह हुआ कि नई व्यवस्था में अफ्रीकावासियों सप्ताह में पूरे छह दिन तक काम करना पड़ता है. इस तथ्य पर कोई विचार करने के लिए तैयार नहीं है कि जो श्रमिक पहले मात्रा बारह घंटे प्रतिसप्ताह काम करने अपना भरणपोषण बहुत आसानी से कर लेते थे, अब उन्हें उससे पांच या छह गुना कार्य क्यों करना पड़ता है. इस बीच में उनकी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हो पाया है. इसलिए कि पहले जो उत्पादन पूरे समाज की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाता था, अब वह पूंजीपति की स्वार्थपूर्ति के निमित्त होता है. इससे पूंजीपति-मालिकों की संख्या और उनकी संपन्नता में कई गुना वृद्धि हुई है. जाहिर है कि प्रत्येक श्रमिक को अपनी जरूरतों के निष्पादन के लिए जो पांच या छह गुना अधिक कार्य करना पड़ता है, उसका लाभ पूंजीपति को मिलता है और श्रमिक के हिस्से सिर्फ उत्पीड़न रह जाता है.

मार्क्स ने डेविड रिकार्डो से बहुत सीखा था. लेकिन कई स्थानों पर उसकी आलोचना भी की है. उसका आरोप था कि रिकार्डो अतिरिक्त श्रम के मुद्दे पर कोई विचार नहीं करता,बल्कि उसकी उपेक्षा करता हुआ आगे बढ़ जाता है. आगे चलकर जान स्टुअर्ट मिल आदि ने भी स्वीकार किया था कि अतिरिक्त श्रम ही लाभ का प्रमुख स्रोत है, लेकिन उसका मानना था कि जीवन की वास्तविक जरूरतों लायक उत्पादन, समाज द्वारा अपेक्षित उत्पादन से बहुत कम समय में संभव है. अतिरिक्त श्रम का यही हिस्सा पूंजीपति के लाभ में ढलकर पूंजी के रूप में संग्रहित होता जाता है, जिसका उपयोग पुनः श्रमिक-शोषण तथा उसको उत्पादन-बाह्यः करने के लिए किया जाता है. यहां तक मार्क्स और मिल दोनों एकमत थे, किंतु मिल से भिन्न मार्क्स का मानना था कि अतिरिक्त श्रम का प्रतिशत पूंजीपति को होने वाले लाभ की अपेक्षा अधिक होता है. यही स्थिति श्रम-शोषण का कारण है. मिल श्रमिकों को पूंजीवादी व्यवस्था की देन, उसका स्वाभाविक हिस्सा मानता था.उसका मानना था कि श्रमिक पहले अपने श्रम का निवेश करता है, तत्पश्चात उत्पादन में से अपना हिस्सा प्राप्त करता है. मार्क्स ने मिल के विचारों को दृष्टिभ्रम की संज्ञा दी थी.उसने पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था में अधिलाभ की संकल्पना का बहुआयामी अध्ययन किया था. लंबे विमर्श के उपरांत वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था स्वामी के लिए अधिकतम लाभ की संभावना पर टिकी है. इसके लिए वह श्रमिक के शोषण के सभी यथासंभव प्रयासों पर अमल करती है. चूंकि वहां श्रमिक के विकल्प के रूप में मशीनों का आगमन लगातार बढ़ता जाता है, इसलिए उसके स्थानापन्न होते, उत्पादन-प्रक्रिया से बेदखली के भी बढ़ते जाते हैं.

15. श्रम-शक्ति एवं अधिलाभ के ध्रुवांतों की परिवर्तनशीलता

एक विशेषज्ञ अर्थविज्ञानी के रूप में मार्क्स ‘दि कैपीटल’ में उन सभी स्थितियों पर गंभीरतापूर्वक चिंतन करता है, जो श्रम-शोषण को बढ़ावा देती हैं. साथ ही वह उन तकनीकों की भी गहन समीक्षा करता है, जो पूंजीवादी शोषण का आधार बनती हैं. पुस्तक के सतरहवें अध्याय में वह श्रम-शक्ति और लाभ के विभिन्न पहलुओं तथा उनकी पारस्परिक परिवर्तनशीलता पर विचार करता है. श्रम-शक्ति के मूल्य को प्रायः मजदूरी के नाम से जाना जाता है. सतरहवें अध्याय के आरंभ में मार्क्स मजदूरी की एक बार पुनः विवेचना करता है. उसके अनुसार मजदूरी पूंजी की वह मात्रा है जो औसत मजदूर को सामान्य जीवनस्तर बनाए रखने के लिए अत्यावश्यक होती है. जिसको सामान्य अवस्था में उससे कम कर पाना असंभव है. मजदूरी की सैद्धांतिक विवेचना के बाद मार्क्स अध्याय के प्रतिपाद्य विषय की ओर लौटता है. श्रम-शक्ति के सैद्धांतिक पक्ष को स्पष्ट करते हुए वह परिवर्तन के कारक दो प्रमुख पहलुओं की ओर संकेत करता है, ये हैं:

क. श्रमशक्ति की लागत, जो उत्पादन के विभिन्न चरणों, उत्पादन की प्रवृत्तियों और प्रारूपों के अनुसार परिवर्तनशील होती है.

ख. लैंगिक आधार पर श्रम-शक्ति का विभेदीकरण यथा स्त्राी और पुरुष, बच्चे और वयस्क की वृत्तिकाओं में अंतर आदि.

अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए वह दो मुख्य परिकल्पनाएं करता है. पहली यह कि उपभोक्ता सामग्री की बिक्री सामान्यतः उसके मूल्य के आधार पर की जाती है. दूसरी परिकल्पना के अनुसार श्रम-शक्ति कभी-कभी अपने मूल्य से भी ऊपर चली जाती है, मगर यह उससे नीचे कभी नहीं आती. इन परिकल्पनाओं पर विचार करता हुआ वह तीन सामान्य मूल-निष्कर्षों तक पहुंचता है, जो श्रम-शक्ति की मूल्यवत्ता का निर्धारण करते हैं.वे निम्नलिखित हैं—

क. पूर्वनिर्धारित घंटों का कार्यदिवस सदैव एकसमान मूल्य का उत्पादन करेगा. यह मूल्य श्रमिक की उत्पादकता अथवा उत्पादित वस्तु के मूल्य से निरपेक्ष तथा प्रत्येक परिस्थिति में स्थिर और अपरिवर्तनीय रहेगा.

ख. अधिलाभ की मात्रा एवं श्रम-शक्ति परस्पर व्युत्क्रमानुपाती होते हैं. उपभोक्ता वस्तु का मूल्य स्थिर रहने की शर्त पर जब अधिलाभ-मात्रा में एक इकाई की वृद्धि होती है तो उसके परिणामस्वरूप श्रम-शक्ति की मात्रा में भी एक इकाई की कमी आ जाती है. इस विवेचन से यह निष्कर्ष भी संभव है कि लाभानुपात और श्रम-शोषण एक-दूसरे के पूरक और सहगामी होते हैं.

ग. अधिलाभ की मात्रा में हुआ परिवर्तन श्रम-शक्ति में होने वाले बदलाव का पूर्वाभास होता है.

पुस्तक के सतरहवें अध्याय में मार्क्स श्रम-उत्पादकता, श्रम-मूल्य की महत्ता तथा उनकी परिवर्तनीयता का गहन विश्लेषण करता है. वह लिखता है कि—

‘अधिलाभ-मूल्य के उच्चतम स्तर में हुआ परिवर्तन, श्रम-शक्ति के मूल्य का पूर्भाभास होता है, यह स्थिति श्रम की उत्पादकता में हुए परिवर्तन का निकष होती है.’

श्रम की उत्पादकता में आया उतार-चढ़ाव वही है तो प्रकारांतर में श्रम-मूल्य की विकास-दर में आए परिवर्तन को दर्शाता है. श्रम का मूल्य यानी मजदूरी को प्रभावित करने वाले कारक अनेक होते हैं, जिन्हें दूर किया जा सकता है. उनमें तीन प्रमुख हैं, श्रम की उत्कृष्टता, उत्पादकता और कार्यदिवस की लंबाई यानी कार्यघंटों की संख्या. मार्क्स ने इन तीनों की अंतःसंबद्धता का गंभीर विश्लेषण किया है.

16. मजदूरी

मार्क्स पूंजीवादी व्यवस्था का आलोचक था. वह इसको श्रम-शोषण का उद्यम कहता था.चूंकि पूंजीपति श्रमिक के शोषण के लिए उसकी वृत्तिका को आधार बनाता है. इसलिए उसने पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूरी के स्तर एवं उसके विभिन्न रूपों की विस्तृत समीक्षा की है. मार्क्स के लिए इस विषय की गंभीरता और इस बारे में उसके चिंतन की गहराई का अनुमान मात्रा इसी से लगाया जा सकता है कि पुस्तक का पूरा एक खंड, जिसमें तीन अध्याय संकलित हैं, उसने मजदूरी को समर्पित किया है. उसके अनुसार श्रमिक के लिए श्रम ही उसकी एकमात्रा पूंजी होता है. उत्पादन-प्रक्रिया की संपूर्णता के निमित्त वह अपनी इस एकमात्रा पूंजी का निवेश करता है. इस अपेक्षा के साथ कि पूंजीपति की ओर से लाभांश का समुचित हिस्सा उसको प्राप्त होगा. लेकिन पूंजीपति श्रम के साथ निवेश-निधि के बजाय किराये पर अर्जित वस्तु की तरह व्यवहार करता है; और इस तरह उसका मूल्यांकन करता है कि प्राप्त वृत्तिका से श्रमिक अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति ही कर पाता है. मुश्किल यह भी है कि प्रौद्योगिकीय सुधार और मशीनों के स्वचालीकरण के कारण श्रमिक की भूमिका मशीन-सहायक के रूप में सिमट जाती है. मशीनें उसके श्रम-कौशल का हनन कर, उसकी आजादी को सीमित कर देती हैं.

इन अध्यायों में मार्क्स ने पूंजीवादी व्यवस्था की उन धूत्र्तताओं का पर्दाफाश करने का प्रयास किया है, जो एक ओर तो श्रम-शोषण का कारण बनती हैं, साथ ही उन चालबाजियों पर पर्दा डालने का काम भी करती हैं, जिनके फलस्वरूप बिना किसी भुगतान के आधार पर किए गए श्रम का अनुपात लगातार बढ़ता जाता है. जाहिर है कि श्रम वह मूल्य जो बचाया गया है, उत्पादक-पूंजीपति के पास उसके अधिलाभ के रूप में संग्रहित होता जाता है. अधिलाभ की लगातार बढ़ती मात्रा तथा जमाराशि उत्पादक-पूंजीपति को और अधिक सशक्त एवं सामथ्र्यवान बनाती है. अधिलाभ का बड़ा हिस्सा वह ऐसे प्रौद्योगिकीय शोधों पर करता है, जो श्रम एवं मानवीय कौशल के विरोधी होते हैं. इससे उत्पादन-व्यवस्था में श्रमिक लगातार उपेक्षित और कमजोर पड़ता जाता है. चूंकि नई तकनीक त्वरित उत्पादन में भी सक्षम होती है, इसलिए वह अतिरिक्त श्रम-शक्ति को अपने उत्पाद के लिए नए बाजारों की खोज पर लगा देता है, जिनकी वृत्तिका का निर्धारण वह अपनी शर्तों पर, अपने स्वार्थ को देखते हुए करता है.

मार्क्स उन स्थितियों को परिप्रेक्ष्य में लाकर उनकी गहन विवेचना करता है, जिनके आधार पर मजदूरी अपने लघुत्तम आकार के बावजूद पूंजीवाद के कैनवास पर एकदम ठीक फिट हो जाती है, और श्रमिक की ओर से जो उससे सर्वाधिक प्रभावित होता है, किसी प्रकार को विरोध भी नहीं किया जाता. अपने श्रम के बदले उत्पादन-मूल्य में से अपनी न्यायिक हिस्सेदारी के बजाय उसका सर्वाधिक आग्रह पहले अपनी प्रारंभिक जरूरतें पूरा करने पर होता है. न्यूनतम वृत्तिका के लिए भी वह पूंजीपति के आगे गिड़गिड़ाता है. घुटने टेकता है. एक दास की भांति विश्वसनीयता का दावा करता है. इस बीच एक-एक कर उसके सारे सपने दम तोड़ लेते हैं. न्यूनतम जरूरतों के लिए ही वह अपनी नियति से समझौता कर लेता है. प्रारंभिक आवश्यकताओं की पूर्ति होते ही वह शिथिल पड़ने लगता है, विशेषकर उस समय तक जब तक कि उसको कोई उत्पे्ररित करने वाला न हो. पूंजीपति श्रमिक की इसी दुर्बलता का लाभ उठाता है. वह उसके श्रम के बराबर मजदूरी का भुगतान करने के बजाय उसको किसी न किसी बहाने न्यूनतम मजदूरी देकर टाल देना चाहता है. चूंकि श्रमिक को उम्मीद होती है कि वह अपनी श्रम-शक्ति द्वारा केवल अपनी सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है. उसके परिवेश में यही सबसे अधिक जरूरी होता है.इसलिए कदाचित उसकी विवशता होती हैं कि अपनी श्रम-शक्ति को बेचकर सबसे पहले अपनी सामान्य जरूरतों की पूर्ति का प्रबंध करे.

मार्क्स ने दर्शाया है कि पूंजीपति किस प्रकार मजदूरी को ही शोषण का माध्यम बना लेता है. वह वास्तविक मजदूरी में कटौती के नित नए रास्ते सोचता रहता है. विवेचन के दौरान वह तीन भिन्न स्थितियों का विश्लेषण करता है, जो मजदूरी पर आधारित शोषण को दर्शाती हैं. उसके अनुसार जागीरदारी या सामंती प्रणाली में श्रमिक इस तथ्य से सुपरिचित होता था कि जो श्रम वह अपनी भूमि कर करता है, वह उसके अपने लिए है. लेकिन जो श्रम वह जमींदार की भूमि पर करता है, वह जमींदार के लिए है. अपनी भूमि पर किए गए श्रम का सारा लाभ उसके हिस्से आएगा. जबकि पूंजीपति के लिए किए गए श्रम के लिए उसको उनकी दया पर निर्भर होना पड़ेगा. यही बात दास के लिए भी सही थी. दास जो सुबह से शाम तक अपने मालिक के लिए कार्य करता था, भली-भांति जानता था कि उसका कोई भी लाभ उसको नहीं मिलने वाला. सिवाय भरपेट रोटी के लिए. भूख की भरपाई को ही वह अपने श्रम का प्रतिफल मान सकता था, और मानता भी था. लेकिन मजदूर को भरपेट रोटी मिलना जितना उसके लिए आवश्यक है, उससे कहीं भू-स्वामी अथवा जमींदार के लिए भी आवश्यक है. इस तथ्य से परिचित होने के बावजूद जमींदार और सामंत अपनी ताकत के दम पर श्रमिकों का शोषण भी करते थे. शोषण की स्थितियां एकदम स्पष्ट थीं. मजदूर-श्रमिक अपनी दुर्दशा के लिए श्रमिक वर्ग को जिम्मेदार मानते थे.इसलिए उनके मन में जमींदारों, सामंतों के प्रति आक्रोश जमा रहता था. परिणामस्वरूप यदा-कदा विद्रोह के स्वर भी उठते रहते थे. तो भी उस व्यवस्था में जो कुछ था साफ था.जागीरदार और सामंत शोषण करते हैं, यह मजदूरी या बेगार करने वाले को मालूम होता था, इसलिए वे उसके लिए तैयार होते थे, तथा अवसर मिलने पर उस व्यवस्था का प्रतिकार भी करते थे. पूंजीवादी व्यवस्था में मालिक और स्वामी के बीच संबंधों की असलियत सामने नहीं आ पाती. वे सदैव संदेहपूर्ण होते हैं. पूंजीपति यद्यपि पारदर्शिता का ही दावा करता है. विडंबना यह है कि अधिकांश श्रमिक इस दावे पर विश्वास भी कर लेते हैं. यही विश्वास पूंजीवाद को दीर्घजीवी और टिकाऊ बनाता है.

श्रमिक को जो उसकी मजदूरी के नाम पर प्राप्त होता है, वह दुर्भाग्यवश उस राशि के सापेक्ष बहुत कम होता है, जो उसके श्रम के बल पर पूंजीपति अर्जित करता है. वस्तुतः श्रमिक की श्रम-शक्ति के बदले जो मजदूरी उसको उसकी श्रम-लागत के रूप में दी जाती है, वह उसके उस श्रम के तुल्य नहीं होती, जिसका उसने उत्पादन-प्रक्रिया में निवेश किया है. जिसके बारे में मजदूर यह सोचता है कि वह उसके श्रम की मजदूरी के रूप में उसको प्राप्त हुई है. वह वास्तव में उसके स्वामी को पहुंचने वाले लाभांश का बहुत छोटा हिस्सा होता है. दूसरे शब्दों में श्रमिक की मेहनत उसके मालिक के लिए अधिलाभ की रचना करती है. मार्क्स कहता है—

‘कामगार और पूंजीपति की न्याय-संबंधी सभी धारणाएं, पूंजीवादी उत्पादन-व्यवस्था की सभी दुर्बोधताएं और मिथ्यावरण,स्वतंत्राता-संबंधी पूंजीवाद के सभी मतिभ्रम और दिखावे,अशिष्ट-अमानवीय अर्थव्यवस्था की माफीनामे जैसी समस्त पैंतरेबाजी वैसी ही है, जैसा कि ऊपर दर्शाया गया है. यह असलियत पर पर्दा डालने का काम करती है और सच में वह दिखाती हैं, जो कि वास्तविकता से एकदम परे, जानबूझकर दिखाया जाता है.’

मुश्किल यह है कि अपनी जीविका के संघर्ष में डूबा हुआ मजदूरवर्ग इस सचाई को समझ ही नहीं पाता. यदि समझ भी लेता है तो उसके पारिवारिक दायित्व और अन्य विवशताएं संघर्ष की ओर प्रवृत्त होने से रोकती हैं. हालात में सुधार के लिए वह सरकार अथवा अन्य नैतिकतावादी संस्थाओं से न्याय दिलाने की अपेक्षा रखता है. मगर विडंबना ही है कि ये सभी संस्थान और सरकार भी, कहीं न कहीं पूंजीवाद के दबाव में होते हैं. परिणामस्वरूप पूंजीपति के लिए शोषण का रास्ता एकदम साफ रहता है. मार्क्स समस्या का उल्लेख करके रुक नहीं जाता. बल्कि समस्या का हल कैसे हो? श्रमिक पूंजीवादी शोषण से कैसे त्राण पाएं, इस बारे में वह अगले अध्यायों में विस्तार से चर्चा करता है.

क्रमश:

ओमप्रकाश कश्यप