Category Archives: इकीसवीं सदी के पहले दशक में हिंदी बालसाहित्य की स्थिति और चुनौतियां

विज्ञान लेखन और नैतिकता के सवाल

सामान्य

इस लेख का उद्देश्य बच्चों के लिए विज्ञान साहित्य की उपयोगिता पर सवाल खड़े करना नहीं है. यह मानते हुए कि विज्ञान साहित्य की जितनी उपयोगिता बड़ों के लिए है, उतनी बच्चों के लिए भी है—हमारा ध्येय लिखे जा रहे विज्ञान साहित्य पर समीक्षादृष्टि डालना है. यह देखना है कि जो विज्ञान साहित्य इन दिनों लिखा जा रहा है, उसमें साहित्य जैसा क्या है? और यदि उसमें ‘साहित्यत्व’ का अभाव है, अथवा कहीं विचलन है, तो उसके कारण क्या हैं? साहित्यिक आचारसंहिता के नाते आलोचकों और समीक्षकों का यह दायित्व है कि रचना का अन्वीक्षण, उसकी नीरक्षीर विवेचना करते समय भाषा, शैली, व्याकरण, विषयवस्तु आदि के अलावा, रचना की अंतनिर्हित शुभता; यानी साहित्यत्व को भी कसौटी बनाएं. देखें कि रचना में ‘साहित्य’ अथवा ‘सर्वहितकारी’ जैसा क्या है? ऐसा कौनसा गुण है जो उस रचना को साहित्य की कोटि में ले आता है? दूसरे शब्दों में रचना का नैतिक पक्ष, जिसे उसका मूल्य भी कह सकते हैं, उसकी आलोचनाविवेचना की प्रथम कसौटी होना चाहिए. जबकि सामान्य आलोचना प्रायः बड़े नामों, भाषाशैली, प्रस्तुतीकरण और मनोरंजकता तक सीमित रह जाती हैं. मूल तथ्य जिससे रचना को साहित्य का दर्जा मिलता है, जिसके लिए कोई संवेदनशील रचनाकार कलम उठाता है, अथवा जो मुद्दा उसको कलम उठाने के लिए उद्वेलित करता है—उपेक्षित रह जाता है.

यहां हमारा आशय आलोचना के नैतिकतावादी पक्ष से है, जो किसी रचना को साहित्य की श्रेणी में लाने के लिए उसका अपरिहार्य गुण है. पर्याप्त नैतिक प्रेरणा के अभाव में लेखक केवल लिखने के लिए लिखते हैं. आलोचक नैमत्तिक कर्म की तरह आलोचना करते हैं. ऐसी कलावादी आलोचना समाज पर वैसा असर नहीं डाल पाती, जैसा अपेक्षित होता है. इससे कभीकभी रचनाकार के स्तर पर हताशा भी व्याप जाती है—‘कुछ नहीं बदलना’, ‘सब इसी तरह चलता रहेगा’—का नैराश्यभाव उसे स्थायी पलायन की मुद्रा में ले आता है. जबकि लेखन की सार्थकता जीवन और समाज में जो भी अच्छा है, सकारात्मक है, उसे बाहर लाने; तथा मनुष्य का उसकी मूलभूत अच्छाइयों में विश्वास जगाने में है. अच्छी रचना नैतिक मूल्यों की उत्प्रेरक होती है. वह पाठक और समाज के बीच जीवनमूल्यों की अबाध आवाजाही हेतु संबंधसेतुओं का निर्माण करती है. आधुनिक जीवन चूंकि विज्ञान और प्रौद्योगिकी से अत्यधिक प्रभावित है, अतएव आलोचना की नैतिकताकेंद्रित कसौटी को लेकर, विज्ञान लेखकोंसमीक्षकों से हमारी अपेक्षाएं और भी बढ़ जाती हैं. ‘साहित्यत्व’ की खोज विज्ञानलेखन के अलावा साहित्य की दूसरी धाराओं और विधाओं में भी की जा सकती है, की जानी चाहिए. मगर लेख की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए फिलहाल हम अपनी बात विज्ञान साहित्य तक सीमित रखेंगे.

उपर्युक्त कसौटी पर हिंदी विज्ञान साहित्य की समीक्षा करें तो कुछ चीजें स्पष्ट रूप से सामने आने लगती हैं. प्रायः सभी रचनाओं में वैज्ञानिकों तथा उनके आविष्कारों को मनुष्यता के प्रति समर्पित और कल्याणकारी दिखाया जाता है. जहां ऐसा नहीं है, जिन रचनाओं में वैज्ञानिक अथवा उससे जुडे़ व्यक्तियों की निजी महत्त्वाकांक्षाएं लोकहित पर भारी पड़ें, वहां वैज्ञानिक के हृदयपरिवर्तन द्वारा उसे सही रास्ते पर लाने की कोशिश की जाती है; अन्यथा मनुष्यता की समर्थक शक्तियों के आगे उसे पराजित होना पड़ता है. पशुता पर मनुष्यता की विजय साहित्यत्व की पहली कसौटी है. उसके अभाव में रचना साहित्य बन ही नहीं सकती. विज्ञान सबके लिए है, उसके लाभ सभी तक पहुंचने चाहिए, मनुष्य समाज का ऋणी होता है, अतः उसके ज्ञानविज्ञान पर समाज का भी पूरापूरा अधिकार है—यह संदेश प्रत्येक विज्ञानरचना का मूलमंत्र होता है. इसके आधार पर विज्ञान लेखक साहित्यकर्म की कसौटी पर खरा उतरने का दावा कर सकते हैं.

आधुनिक विज्ञान का जन्म 15वीं शताब्दी की महत्त्वपूर्ण घटना है. पश्चिमी विज्ञान का पितामह कहा जाने वाला फ्रांसिस बेकन उसे लेकर बेहद आशान्वित था. ‘ज्ञान ही शक्ति है’—कहकर उसने ज्ञानविज्ञान आधारित समाज के गठन पर जोर दिया था. बेकन का मानना था कि विज्ञान मनुष्य को जानलेवा श्रम और व्याधियों से बचाकर उसका मुक्तिदाता सिद्ध होगा. बेकन राजसत्ता से जुड़ा था. सत्ता और शक्ति दोनों उसके पास थे. जानता था कि सत्ता के फैलाव के लिए बड़ी शक्ति चाहिए. बड़ी शक्ति यानी बड़ी सत्ता. और सत्ताएं आमतौर पर महत्त्वाकांक्षी होती हैं. अपने विस्तारवादी मनसूबों को साधने के लिए वे अपनी ताकत लगातार बढ़ाती रहती हैं. इसका दूसरा पहलू यह है कि किसी भी राष्ट्र की शक्तियां उसकी जनता और संसाधनों पर निर्भर करती हैं, जिनका कालखंड विशेष में एक सीमा तक ही दोहन संभव होता है. वैज्ञानिक होने के बावजूद बेकन को संभवतः याद नहीं था कि ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत व्यापक संदर्भों में, देश और समाज पर भी लागू होता है. उसका व्यावहारिक संदेश यह भी है कि यदि एक स्थान पर संसाधनों का अनावश्यक और अतिरिक्त दोहन हो तो उनका अन्यत्र अभाव अवश्यंभावी होता है.

औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप सतरहवींअठारहवीं शताब्दी में यूरोप ने इतनी तेजी से तरक्की की थी कि विज्ञान नई पीढ़ी का जीवनमंत्र जैसा बन गया. जो देश उससे वंचित थे, वे उसको पाने के लिए ललचाने लगे. पूरी दुनिया में उसके लिए होड़सी मच गई. बेकन का यह सोच गलत नहीं था कि विज्ञान मनुष्यता की अनेक समस्याओं का निदान करने में सक्षम है. विज्ञान खुद को ऐसा दर्शा भी चुका था. लेकिन ताकत की विशेषता है कि वह उसी का हित साधती है, जिसका उसपर अधिकार होता है. दूसरे शारीरिक शक्ति को छोड़कर बाकी किसी भी शक्ति का प्रबंधन जटिल कार्य होता है. जो व्यक्ति शक्तिप्रबंधन की कला से अनभिज्ञ है, अथवा उससे वंचित है, यह वंचना चाहे जिस कारण से भी हो—वह न केवल पिछड़ जाता है, बल्कि दूसरों के बराबर में आने के उसके अवसर भी तेजी से घटते चले जाते हैं. अपनी स्थिति का लाभ उठाकर शक्तिधारक(अथवा शक्ति प्रबंधक) व्यक्ति, शक्तिविपन्न व्यक्तियों के साथ मनमानीभरा वर्ताब करता है. परिणामस्वरूप शोषण बढ़ता है और असमानता में वृद्धि होती है. ऐसे समाजों में जहां जनता शिखरस्थ शक्तियों की गतिविधियों की ओर से उदासीन; अथवा उनकी ओर से आंखें मूंदे रहती है, वहां शीर्षस्थ लोग बड़ी चतुराई से अपनी शक्तियों को राज्य की अथवा राज्य समर्थित शक्तियों के रूप में प्रचारित करते हैं. धीरेधीरे वे राज्य के संसाधनों को अपने अथवा अपनी समर्थक शक्तियों के अधीन करते जाते हैं.

चूंकि किसी कालविशेष में, जब तक नए संसाधनों का दोहन न हो या उन्हें पहचाना न जाए—राज्य की कुल शक्तियां सीमित होती हैं, इसलिए शीर्ष वर्ग की शक्ति और समृद्धि शेष समाज की दुर्बलता और विपन्नता की कीमत पर आती है. अपनी उपलब्धियों को राज्य की उपलब्धि की भांति पेश करते हुए शिखरस्थ लोग, कभीकभी जनता की सहानुभूति भी बटोर लेते हैं. इस प्रकार वे स्वयं को उत्तरोत्तर शक्तिशाली बनाते जाते हैं, हालांकि वे दावा राष्ट्र के शक्तिशाली होने का ही करते हैं. उनके अनुसार राष्ट्रसशक्तीकरण का अभिप्राय है, जनता के हाथों से ताकत खिसककर शीर्ष पर मौजूद चंद लोगों के हाथों में सिमट जाना. विज्ञान की चलायमान प्रवृत्ति और उसकी शक्ति के दुरुपयोग की संभावना को सबसे पहले रूसो ने समझा था. उसका मानना था कि विज्ञान ने मनुष्य और प्रकृति के बीच दूरी पैदा की है. परिणामस्वरूप व्यक्ति प्रकृति को भोग्य वस्तु की भांति देखता है. इससे समाज में भौतिक सुखों के प्रति होड़ पैदा होती है. प्लेटो की भांति रूसो भी सामाजिक समस्याओं का निदान नैतिकता के अनुपालन में ढूंढता था. ‘एमाइल’ में उसने लिखा था—‘बालक को विज्ञान पढ़ाने की अपेक्षा अपने परिवेश से प्यार करने की शिक्षा देना, उसके बारे में जागरूक बनाना ज्यादा जरूरी है.’ इसी को कुछ भिन्न शब्दों में आइंस्टाइन ने भी स्वीकार किया है—‘अधिकांश लोग मानते हैं कि प्रतिभा महान वैज्ञानिक बनाती है. वे गलत हैं: असली चीज तो व्यक्तित्व है.’ रूसो और आइंस्टाइन दोनों ने ही विज्ञान का अंधानुकरण करने, उसको धर्म मान लेने की प्रवृत्ति का विरोध किया था. इसके लिए उसकी खूब आलोचना हुई. लेकिन वह अपने विचारों पर अडिग रहा. कालांतर में उसके समर्थक बढ़ते गए. उसके साथसाथ पूरी दुनिया में यथार्थवादी लेखकों की संख्या भी बढ़ती गई. साहित्य की अवधारणा भी संघर्ष के इसी दौर में पनपी.

यह निर्विवाद है कि विज्ञान ने आर्थिक समृद्धि की दर को गति प्रदान की है. मगर उससे समाजार्थिक विषमता भी तेजी से बढ़ी है. गरीबी पहले भी थी. सामाजिक असमानता पहले भी थी, लेकिन विज्ञान और प्रौद्योगिकी के वर्चस्व से पहले मानवीय कलाकौशल का महत्त्व था. न केवल मनुष्य बल्कि पूरा समाज अपने शिल्पकौशल पर गर्व करता था. विज्ञान और प्रौद्योगिकी का सबसे पहला हमला मानवीय अस्मिता के संरक्षक और प्रतीक मानेवाले इन्हीं मूल्यों पर हुआ. श्रम से मुक्ति तथा सघन उत्पादन के नाम पर मशीनें, मानवशिल्प और उससे आगे बढ़कर मानवीय अस्मिता पर कब्जा करती गईं. उससे उपभोक्ताकरण की राह आसान होनी ही थी. वही हुआ. नतीजा हमारे सामने है. आज मनुष्य के प्रत्येक निर्णय यहां तक कि संबंधों पर भी बाजार की छाया देखी जा सकती है.

चूंकि संसाधनों के दोहन तथा उन्हें लोकोपयोगी बनाने में विज्ञान का बड़ा योगदान होता है, अतएव वैज्ञानिकों एवं विज्ञान लेखकों से हमारी अपेक्षाएं बहुत बढ़ जाती हैं. उनसे उम्मीद की जाती है कि वे विज्ञान के ऐसे उपयोग की ओर सबका ध्यान आकृष्ट कराएं जिससे आर्थिक, सामाजिक सहित सभी प्रकार के लाभों की सिद्धि हो सके. वैज्ञानिक शोध अपने आप में खर्चीला उद्यम है. उसके लिए भारी निवेश की आवश्यकता पड़ती है. ऐसे में विज्ञान लेखक को दुहरी भूमिका निभानी पड़ती है. स्वचेता रचनाकार के रूप में पाठकों के प्रबोधन की, ताकि वे अपने आसपास की घटनाओं के बारे में बैज्ञानिक सूझबूझ के साथ निर्णय ले सकें. दूसरी भूमिका ज्ञानविज्ञान के सामाजिक लाभों के पक्ष में माहौल बनाने की होती है, ताकि नवीनतम आविष्कार और प्रौद्योगिकी केवल पूंजीपतियों के लाभ कमाने का जरिया बनकर न रह जाएं. वे अधिकतम लोगों के कल्याण का माध्यम बन सकें. प्रतिबद्धता की कमी के चलते अधिकांश विज्ञान लेखक दूसरी भूमिका में कमजोर, बल्कि कई बार तो पूंजीपतियों के हितरक्षक सिद्ध होते रहे हैं.

हिंदी में विज्ञान लेखन की परंपरा करीब सवा सौ वर्ष पुरानी है. बच्चों के लिए स्वतंत्र साहित्य सृजन की शुरुआत उससे लगभग एक दशक पहले हो चुकी थी. अंतर केवल इतना था कि आरंभिक बालसाहित्य जहां लोकसाहित्य, पुराण, उपनिषद्, जातक, कथासरित्सागर, पंचतंत्र आदि से प्रभावित था, वहीं परंपरा के अभाव में आरंभिक हिंदी विज्ञान कथाएं तथा उपन्यास पश्चिमी रचनाओं का अनुवाद अथवा उनकी पुनः प्रस्तुति मात्र थे. हिंदी में विज्ञान लेखन की शुरुआत, 1884 से 1888 के बीच ‘पीयूष प्रवाह’ में धारावाहिक रूप से प्रकाशित, अंबिकादत्त व्यास की रचना ‘आश्चर्यजनक वृतांत’ से मानी जाती है. यह कृति जूल बर्न के उपन्यास ‘जर्नी टू सेंटर आफ दि अर्थ’ का देसी संस्करण थी. केशव प्रसाद सिंह की चर्चित विज्ञान कथा ‘चंद्र लोक की यात्रा’(जून 1900) भी जूल बर्न की प्रसिद्ध रचना ‘फ्राम दि अर्थ टू दि मून’ पर आधारित थी। इन रचनाओं को मिली लोकप्रियता ने भारतीय लेखकों को भी उद्वेलित किया. इसके बावजूद हिंदी की प्रथम मौलिक विज्ञान कथा की रचना के लिए पाठकों को दो दशक लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ी. 1908 में प्रकाशित सत्यदेव परिव्राजक की कहानी ‘आश्चर्यजनक घंटी’ को हिंदी की प्रथम विज्ञान कथा होने का श्रेय प्राप्त है. उसके बाद तो प्रेमवल्लभ जोशी(छाया पुरुष 1915), अनादिधन बंधोपाध्याय(मंगल यात्रा, 1915-16), आचार्य चतुरसेन(खग्रास), नवल बिहारी मिश्र(अधूरा आविष्कार), ब्रजमोेहन गुप्त(दीवार कब गिरेगी) आदि लेखकों ने विज्ञान साहित्य को समृद्ध करने में योगदान दिया. अनादिधन वंधोपाध्याय ने अपनी विज्ञानकथा में पटरियों के ऊपर हवा में चलनेवाली रेलगाड़ी का वर्णन किया था. आज विकसित देशों में उच्च गति रेलगाड़ियों के संचालन हेतु विद्युतचुंबकीय ऊर्जा का भी उपयोग किया जाता है. जिसमें गाड़ी यात्रा के दौरान चुंबकीय प्रतिकर्षण बल के कारण पटरियों से मामूलीसी ऊपर उठकर यात्रा करती है.

हिंदी में विज्ञान लेखन की शुरुआत पुनर्जागरण के दौर में हुई थी. उस समय तक गल्प लेखन में तिलिस्म, जासूसी और ऐय्यारी से जुड़ी कहानियों का दबदबा था. देवकीनंदन खत्री, गोपाल राम गहमरी, किशोरी लाल गोस्वामी, विश्वेश्वर प्रसाद शर्मा आदि लेखकों ने तिलिस्म और जासूसी पर आधारित अनेक उपन्यास लिखे थे. उन उपन्यासों को खूब लोकप्रियता मिली. मगर जैसेजैसे साहित्य से अपेक्षाएं बढ़ीं, खासकर प्रेमचंद द्वारा यथार्थवादी साहित्य लेखन के बाद, वैसेवैसे तिलिस्म और जासूसी पर आधारित रचनाओं को दोयम दर्जे का समझा जाने लगा. उसकी जगह यथार्थवादी लेखन को बल मिला. चूंकि रहस्य, रोमांच, जासूसी और ऐयारी पर आधारित कथानकों की लोकप्रियता अक्षुण्ण थी, इसलिए वे विज्ञान गल्प का विषय बनने लगे. अथवा यूं कहो कि विज्ञान मंे रुचि रखने वाले लेखक उनमें नए प्रयोगों के साथ हाथ आजमाने लगे. यह स्वाभाविक भी था. अपनी मौलिकता के कारण अनेक वैज्ञानिक आविष्कार लोगों को चैंकाते थे. विशुद्ध वैज्ञानिक घटनाओं को जादू और चमत्कार बताकर जादूगर, तांत्रिक और तमाशेबाज शताब्दियों से जनता का मनोरंजन करते आए थे. लेकिन कोरा गल्प, चाहे उसमें वैज्ञानिक युक्तियों का प्रयोग हो अथवा तिलिस्म का, केवल गल्प माना जाएगा. इस कसौटी के मद्देनजर आरंभिक आलोचकों ने तथाकथित विज्ञानसाहित्य को भी नकारना आरंभ कर दिया. वे उसे दोयम दर्जे का लेखन कहने लगे. जूल बर्न जिसे उसके विज्ञानगल्प पर आधारित उपन्यासों और कहानियों के कारण पाठकों की भरपूर सराहना मिली थी—आलोचकों ने उसे साहित्यकार मानने से ही इन्कार कर दिया था. धीरेधीरे लोगों में विज्ञान के प्रति समझ पनपी. वैज्ञानिक प्रबोधन को आधुनिकता की अनिवार्यता माना जाने लगा. तब जाकर विज्ञान लेखन को साहित्य की मुख्यधारा के रूप में मान्यता मिलनी आरंभ हुई. यह कदाचित परंपरा का ही प्रभाव था कि हिंदी के आरंभिक विज्ञान गल्पकार यमुनादत्त वैष्णव ने अपनी औपन्यासिक कृतियों के जो शीर्षक(हिम सुंदरी, नियोगिता नारी, अपराधी वैज्ञानिक आदि) रखे, वे प्राचीन तिलिस्मी कृतियों के शीर्षकों से काफी मिलतेजुलते थे. यही कारण है कि भारतीय विज्ञान कथा लेखक, आलोचक भारतीय विज्ञान लेखन की नींव की खोज में तिलिस्मी और ऐय्यारी लेखन तक चले जाते हैं. इसके पीछे उनकी विवशता को समझा जा सकता है. जिस समाज में वैज्ञानिक प्रबोधन का अभाव हो, जो अज्ञान, अशिक्षा और रूढ़ियों के शताब्दियों लंबे दौर गुजरा हो, वहां नींव की तलाश के लिए ऐसे कच्चेभुरभुरे मैदानों से गुजरने की कोशिश स्वाभाविक कही जाएगी. हालात आज भी बहुत आश्वस्तकारी नहीं हैं. इसलिए आधुनिक विज्ञान लेखकों, आलोचकों द्वारा भारतीय विज्ञानकथा के मूल की खोज करते हुए तिलिस्मी साहित्य तक चले जाना स्वाभाविक माना जाएगा.

विज्ञानसाहित्य का एक उद्देश्य बच्चों का मानसिक प्रबोधन, उनमें तर्कसम्मत निर्णय लेने की क्षमता का विकास करना है. यह तभी संभव है जब विज्ञान लेखक का तार्किकता में भरोसा हो. वह उपलब्ध ज्ञानविज्ञान का वस्तुनिष्ठ विवेचन करने की योग्यता रखता हो. इन सबसे अधिक आवश्यक है कि वह जाति, वर्ग, धर्म और क्षेत्रीयता के प्रभावों और पूर्वाग्रहों से सर्वथा मुक्त हो. भारतीय परिवेश में पूर्वाग्रह मुक्त होना आसान नहीं है. सामान्य भारतीय विज्ञान लेखक बात तेइसवींचौबीसवीं शताब्दी की करेगा, किंतु उसकी मनोरचना अठारहवीं शताब्दी में ही चक्कर काटती नजर आएगी. शायद यही कारण है कि हिंदी विज्ञान साहित्य के लगभग सवा सौ साल पुराने इतिहास में पचास विज्ञानकथाएं भी ऐसी नहीं हैं, जिन्हें विश्व विज्ञानकथाओं की श्रेणी में रखा जा सके. कुछ और भी कारण हो सकते हैं. जैसे कि आरंभिक विज्ञान लेखकों में से अधिकांश समाज के अभिजात वर्ग से आए थे. उनके विचारों पर सांस्कृतिक जड़ता, वर्णभेद, जातिवाद आदि का प्रभाव था. यह वर्ग भारत के अतीत के गौरव की, जब देश में पुरोहितवाद का बोलवाला था, वापसी चाहता था. पूर्वाग्रहग्रसित होने के कारण इस वर्ग का लेखन विज्ञान की मूल भावना से काफी परे था. इस तरह का सोच रखने वाले विज्ञान लेखक आज भी बड़ी संख्या में हैं. दूसरे विज्ञानशिक्षा का माध्यम अंग्रेजी रहा है. अंग्रेजी माध्यम में पढ़ालिखा वर्ग हिंदी में अभिव्यक्त करने में अपनी हेठी मानता है. दूसरी ओर हिंदी का सामान्य लेखक पर्याप्त विज्ञानबोध के अभाव में कोरी फंतासी गढ़ता है. परिणामस्वरूप उसकी रचना वैज्ञानिक उपकरणों, सूचनाओं अथवा बेजान कल्पना तक सिमट जाती है.

साहित्यकार के रूप में विज्ञान लेखक सामान्यतः दो लक्ष्यों को साधता है. पहला विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों को सरल और पठनीय सामग्री के रूप में पाठक तक पहुंचाना. दूसरे उन कुरीतियों, रूढ़ियों, अंधविश्वासों और पाखंडों का पर्दाफाश करना जो अशिक्षा, अज्ञानता, धार्मिक आडंबरवाद और पोंगापंथी के कारण शताब्दियों से समाज में जगह बनाए हुए हैं. साथ ही पाठकों को तर्कसम्मत ढंग से सोचने की दृष्टि और विवेक देना, ताकि उनका आत्मविश्वास विकसित हो और वे जीवन की चुनौतियों का सामना विवेकपूर्ण ढंग से कर सकें. लेकिन किसी घटना के पीछे निहित वैज्ञानिक तथ्य को अकादमिक स्तर पर समझना एक बात है, व्यवहार में उसके अनुरूप ढलना, अपने आचरण को तर्कसंगत बनाना दूसरी बात. वैज्ञानिक प्रबोधन का काम तो विज्ञान की अकादमिक शिक्षा भी करती है. किंतु जब तक उसी अनुपात में सामाजिकसांस्कृतिक प्रबोधन न हो, तब तक समाज रूढ़ियों और जड़ परंपराओं को ढोते हुए अज्ञानता के अंधियार में जीने को विवश होता है. पुस्तकों में अर्से से पढ़ाया जा रहा है कि राहूकेतु किंवदंति हैं. ग्रहण सामान्य सौरमंडलीय घटना है. चेचक दैवी प्रकोप होने के बजाए महामारी है. भूतप्रेत केवल मन का बहम और कुछ ठग तांत्रिकों, ज्योतिषियों एवं पोंगापंथियों की चाल है….वगैरहवगैरह. इसके बावजूद यदि वे बड़े होकर मूर्तिपूजा में अपना श्रम और समय खपाते हैं, तांत्रिकों, ओझाओं और कलंदरों की शरण में जाते हैं, अंतरिक्ष अभियानों की सफलता के लिए कर्मकांड करते हैं, अथवा सांस्कृतिक दुराग्रहों के चलते उस तरह का नाटक करते हैं तो उसका कारण यह भी है कि जिस गंभीरता के साथ रूढ़िवादी लोग जनमानस में डर पैदा करने का काम करते हैं, उतनी ही गंभीरता के साथ विज्ञान लेखक और दूसरे समाजचेता लोग उस डर के निदान पर काम नहीं करते. इसे अतीतमोह कहिए या पूर्वाग्रह, विज्ञान लेखकों का एक वर्ग आज भी विज्ञान कथाओं के मूल की खोज को वैदिक युग तक खींच ले जाने को उद्यत है. इसके लिए दिए जानेवाले तर्क एकदम बचकाने हैं. किसी भी जाति या देश का अतीत प्रेरणादायी हो सकता है, वर्तमान पीढ़ियां उससे सीख भी ले सकती हैं, लेकिन व्यवहार में उसका महत्त्व एक गुजरे हुए सपने से बढ़कर नहीं होता. जीवन और समाज में सुधार के लिए अतीत के दबावों से मुक्त होना आवश्यक है.

बच्चों के लिए कैसा विज्ञान साहित्य रचा जाए इस बारे में हमारा मानना है कि ऐसा साहित्य जो बच्चों को न केवल वैज्ञानिक यंत्रों, सिद्धांतों से परचाए बल्कि उनमें पर्याप्त विज्ञानबोध भी विकसित करे. इस तरह पाठक का प्रबोधीकरण विज्ञानसाहित्य की पहली शर्त है. अच्छी विज्ञानकथा बिना वैज्ञानिक उपकरण, यंत्र, वैज्ञानिक सिद्धांत की उपस्थिति के भी लिखी जा सकती है, लेकिन बिना विज्ञान बोध के श्रेष्ठ विज्ञानसाहित्य रचना असंभव है. इसलिए अच्छी विज्ञानकथा वह है जो पाठक को ज्ञानविज्ञान की बारीकियों से परचाने के साथ साथसाथ उनमें पर्याप्त विज्ञानबोध का संचार; और यदि उसमें ये सब पहले से हैं तो उसमें इजाफा करती हो. आधुनिक जीवन शैली को बदलने या मनुष्य को आधुनिक बनाने में इस प्रौद्योगिकी का बड़ा योगदान रहा है. खासकर पिछले कुछ दशकों में बावजूद इसके इस क्षेत्र में नवीनतम शोध को लेकर जो खबरें आ रही हैं, उनसे लगता है कि भविष्य हमारे लिए विपुल संभावनाएं बचाए है. यह बात अलग है कि प्रौद्योगिकीय उपलब्धियों का जितना उपयोग सकारात्मक है, उतना नकारात्मक भी है. अपने मुनाफे के लिए पूंजीवादी उत्पादक प्रौद्योगिकी को प्रलोभनकारी उत्पादों के साथ पेश करते हैं. उसमें से अधिकांश का व्यक्ति के वास्तविक विकास से कोई लेनादेना नहीं होता. इसे देखते हुए बच्चों के लिए ऐसा विज्ञान साहित्य अपेक्षित है जो उनमें बाजार में मौजूद उत्पादों के प्रति आलोचकीय दृष्टि विकसित करे.

विडंबना है कि विज्ञान साहित्य के लेखन, अनुशीलन के समय लेखक और आलोचक प्रायः विज्ञान को श्रद्धाभाव से लेते हैं. वे मान लेते हैं कि साहित्य में विज्ञान के नाम पर जो हो रहा है, वह सही है. दूसरे शब्दों में वे मानते हैं कि विज्ञान साहित्य के नाम पर कुछ भी चल सकता है, जबकि विज्ञान के प्रति यह श्रद्धाभाव धार्मिक रूढ़िवाद से कम खतरनाक नहीं है. इसके चलते लेखक मिथक और यथार्थ में भेद नहीं कर पाते. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के दबाव में इस दिशा में तो आज मानो होड़सी मची है. अपनी पुस्तक ‘विज्ञान पत्रकारिता’ में डॉ. मनोज पटैरिया ने जयंत विष्णु नार्लीकर के एक व्याख्यान का हवाला दिया है. नार्लीकर द्वारा पत्रकारिता पर दिए गए व्याख्यान के बहाने से वे लिखते हैं—‘मैं देवर्षि नारद को पहला पत्रकार मानता हूं.’ नारद को आदि पत्रकार मानने वाले जयंत नार्लीकर अकेले नहीं हैं. पिछले कुछ वर्षों से नारद जयंती को इसी संदर्भ में मनाने का चलन बढ़ा है. यह मिथकों को सत्य मान लेने की गंभीर भूल है. इस तरह के मिथ्याख्यान, सांस्कृतिक श्रेष्ठता के दंभ के चलते, समाज को भ्रमित करने के लिए जानबूझकर गढ़े जाते हैं. उल्लेखनीय है कि ऐसे मिथक प्रत्येक समाज और संस्कृति में पाए जाते हैं. रोमन संस्कृति में ‘ओसा’(Ossa) अथवा ‘फेम’(Pheme) को पत्रकारिता तथा झूठ और अफवाह फैलाने वाली शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है. होमर ने ‘ओडिसी’ एवं ‘इलियाड’ में कई स्थानों पर उसका उल्लेख किया है. भारतीय शास्त्रों में नारद की भूमिका भी उनसे मिलतीजुलती है.

भारतीय परंपरा में दूसरा उदाहरण महाभारत में संजय का है. धृतराष्ट्र की युद्ध का आंखों देखा हाल सुनने की इच्छा को देखते हुए व्यास ने संजय को दिव्यदृष्टि प्रदान की थी. उसके बारे में धृतराष्ट्र को बताते हुए वे कहते हैं—‘चक्षुषा संजयो राजन्दिव्यैनेष समन्वित कथष्यति ते युद्धं सर्वज्ञश्च भविष्यति. प्रकाशं वा रहस्यं वा रात्रौ वा यदि वा दिवा मनसा चिंततमपि सर्वं वेत्स्यति संजय. (भीष्मपर्व-6.2.10-11) ‘प्रकट हो अथवा गुप्त, दिन हो या रात, यहां तक कि मन में उठनेवाले विचारों को जानने की क्षमता भी संजय को प्राप्त है.’ संजय की कल्पना महाभारतकार की लेखकीय दक्षता को दर्शाती है. उल्लेखनीय है कि युद्ध में लंबेलंबे वर्णन वाल्मीकि रामायण में भी हैं. लेकिन वे वर्णनात्मक शैली में हैं. ऐसे वर्णन एक सीमा के पश्चात नीरस बन जाते हैं. उनमें दोहरावसा लगने लगता है. व्यास द्वारा दिव्यदृष्टा संजय की कल्पना युद्ध के दृश्यों को किस्सागोई के माध्यम से जीवंत बनाने के साथसाथ, धृतराष्ट्र के मानसिक उद्वेलन से पाठकों को परचाते रहने के लिए की गई थी. इस मौलिक कल्पना के लिए वे सराहना के पात्र हैं. ऐसे प्रसंग वैज्ञानिक परिकल्पना की पृष्ठभूमि तो बन सकते हैं, स्वयं विज्ञान या विज्ञानलेखन की कोटि में नहीं आते. संजय की दिव्यदृष्टि का प्रयोग सिवाय युद्ध के कहीं और देखने को नहीं मिलता. बावजूद इसके संस्कृतिवादी लोग मिथकीय पात्रों को वास्तविक मानने पर जोर देते रहते हैं. पटैरिया जी की पुस्तक से भी यही प्रकट होता है. वे इसे विश्वास में बदल देते हैं—‘यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि खाड़ी युद्ध में सीएनएन टेलीविजन ने जो करामातें दिखाईं, वे संजय ने महाभारत युद्ध में महाभारत युद्ध में प्रस्तुत की थीं.’ (विज्ञान पत्रकारिता, पृष्ठ-121). यह सच है कि खाड़ी युद्ध में कुछ टेलीविजन चैनलों ने युद्ध के जीवंत दृश्य पेश किए थे. मगर यह कोई नई बात नहीं. उससे पहले भी टेलीविजन ऐसा करता रहा है. क्रिकेट और दूसरे खेलों की कमेंटरी भी जीवंत होती है. ऐसे में सीएनएन के खाड़ी युद्ध वर्णन से महाभारत के संजय को जोड़ने के पीछे कहीं न कहीं यह दुराग्रह भी काम करता है कि आज दुनिया में विज्ञान के नाम पर जो भी हो रहा है, वह तो भारत में बहुत पहले से ही था. यह भ्रम हमारे प्रबोधीकरण की बहुत बड़ी बाधा है. चूंकि यह काम हिंदी के वरिष्ठ विज्ञान लेखकों द्वारा किया जा रहा है, इसलिए हालात और विचारणीय हो जाते हैं.

विज्ञान लेखन की एक कमजोरी यह भी है कि लेखकगण तकनीक के साथ जुड़ी कल्पना या फंतासी को ही विज्ञान लेखन समझ लेते हैं. वैज्ञानिक तथ्यों पर वे जराभी ध्यान नहीं देते. हिंदी के एक वरिष्ठ लेखक की कहानी है, जिसमें पेड़ आकाश में यात्रा करने लगता है. वह पेड़ बस दिखने में ही पेड़ है, क्योंकि उसमें पत्तियां और शाखाएं सब हैं. असल में वह एक यान है, जिसमें यात्रियों के बैठने के लिए सीट हैं, सीढ़ियां हैं, कार्बन डाईआक्साइड से कार्बन और आक्सीजन को अलग करने के लिए सयंत्र भी हैं. यह देखनेसुनने में अच्छी कल्पना लगती है. मगर वैज्ञानिक दृष्टि से इसमें कई लोच हैं. जब भी कोई चीज उड़ती है तो उसको वायुमंडल में मौजूद गैसों से टकराकर आगे बढ़ना होता है. इससे उसका सामना हवा की प्रतिकर्षण शक्ति से होता है. उड़नेवाली चीज की गति जितनी तेज तथा अग्रपृष्ठ का क्षेत्रफल जितना अधिक होगा, उसे उतने ही ज्यादा प्रतिरोधक बल का सामना करना पड़ेगा. लेकिन उक्त कहानी में पेड़ रूपी यान मात्र बैटरी की ऊर्जा से उड़ जाता है. बैटरी भी पूरे सप्ताह चलती है. विज्ञान को लेकर ऐसी कल्पना विचित्र भले दिखाईं, दें मगर असल में वे वैज्ञानिक विषयों के बारे में बालक को केवल भरमाती है. विज्ञान लेखकों से अपेक्षा की जाती है कि वे परीकथाओं और विज्ञानकथाओं की फंतासी के अंतर को समझें. समझें कि जो फंतासी परीकथाओं में चल सकती है, वह जरूरी नहीं कि विज्ञानकथाओं के लिए भी उपयुक्त हो. परीकथा का राजकुमार जादुई कंबल, जूतियां, पेड़, पहाड़, झोला या खटोला किसी के भी सहारे आसमान से उड़ सकता है. वहां कल्पना की मौलिकता देखी जाती है, उसकी प्रामाणिकता नहीं. लेकिन विज्ञान कथा के लेखक को ध्यान रखना होगा कि नायक को यदि आसमान की सैर करानी है तो वह उड़ान के सामान्य नियमों का पालन करे. पृथ्वी पर चलने की अपेक्षा हवा में उड़ने के लिए कम से कम दस गुना ज्यादा ऊर्जा की जरूरत पड़ती है. ऐसे में यदि कोई विज्ञान लेखक सिर्फ बैटरी के सहारे पेड़ के हवा में उड़ने की कल्पना करता है, बैटरी भी जिसे सप्ताह में केवल एक दिन चार्ज करना पड़े, और दावा करता है कि वह एक विज्ञान कथा है, तो वह विज्ञानकथा की मूलभूत अपेक्षाओं के विरुद्ध माना जाएगा.

विज्ञान’ का नैतिकतावादी पक्ष यह है कि वह पूरी मनुष्यता के लिए होता है. लुइस पाश्चर के शब्दों में—‘विज्ञान का कोई देश नहीं होता. क्योंकि ज्ञान का संबंध पूरी मनुष्यता से है. वही अपनी रोशनी से दुनिया को जगमगाता है. विज्ञान किसी राष्ट्र के सपनों को मूर्तिमान बनाने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है, ज्ञानविज्ञान में आगे रहनेवाला राष्ट्र ही दूसरों को राह दिखा सकता है.’ विज्ञान का कोई देश भले न हो मगर पिछले कुछ दशकों से, जबसे पूंजीवाद ने पांव पसारे हैं, उसके घराने अवश्य होने लगे हैं. बौद्धिक संपदा का हवाला देकर पूंजीपति शोध के लाभ पर अपना एकाधिकार बनाए रखना चाहते हैं. इसके अच्छे और बुरे दोनों तरह के परिणाम हमारे सामने हैं. यह मानते हुए कि नए शोध का लाभ सीधे उन्हीं को मिलेगा, कारपोरेट घराने वैज्ञानिक शोध को निवेश का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र मानते हैं. फलस्वरूप अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं स्थापित करने के लिए धन की कमी नहीं होती. नुकसान यह कि अपनी प्रयोगशालाओं में पूंजीपति उन्हीं क्षेत्रों में शोध को प्रमुखता देते हैं, जिनमें उन्हें लाभ की भरपूर संभावना हो. पिछले कुछ दशकों में संचारक्षेत्र में जितने शोध हुए हैं, उनका एक हिस्सा भी कृषि क्षेत्र में नहीं हो पाया है. बावजूद इसके ‘विज्ञान’ की मूल सैद्धांतिकी कि वह पूरी दुनिया के लिए है तथा उसके माध्यम से पूरी दुनिया या अधिकतम लोगों के अधिकतम कल्याण के कार्य किए जाने चाहिए—पर कोई फर्क नहीं पड़ा है. पंूजीपति संस्थान भी जो नए आविष्कारों के लिए पूंजी लगाते हैं, यह दावा नहीं कर सकते कि वे उस आविष्कार का केवल स्वार्थ हित उपयोग करेंगे. दूसरे शब्दों में वैज्ञानिक आविष्कारों के संपूर्ण लाभों को किसी व्यक्ति अथवा समूह तक सीमित रखना आज भी अनैतिक माना जाता है. बौद्धिक संपदा के रूप में आष्विकारक वैज्ञानिक या पूंजीपति घराना केवल लाभ पर दावेदारी कर सकता है. शोध का वास्तविक लाभ पूरे समाज को मिले, इस तरह की प्रतिबद्धता प्रत्येक वैज्ञानिक आविष्कार से जुड़ी होती है. उदाहरण के लिए मान लें कि कारपोरेट संस्थान द्वारा चलाई जा रही प्रयोगशाला में ऐसी तकनीक का आविष्कार होता है, जिससे मनुष्य के जीन में रोगों से लड़ने के लिए कुदरती प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई जा सके. तो वह कारपोरेट संस्थान बौद्धिक संपदा कानून के तहत उस प्रौद्योगिकी द्वारा दूसरे औद्योगिक संस्थानों की कमाई के एक हिस्से पर दावा कर सकता है. लेकिन किसी भी कारण से—शेष समाज को उसके लाभों से वंचित नहीं कर सकता.

साहित्य तो वैसे भी कल्याणकारी उद्यम है. साहित्यकार उसे बिना किसी स्वार्थ भावना के अंजाम देता है. अतएव विज्ञान साहित्यकार से अपेक्षा की जाती है वह अपनी रचना को पूंजीवादी दबावों और प्रलोभनों से मुक्त रखे और विज्ञान के कल्याणकारी उपयोगों पर विचार करे. विज्ञान साहित्य का अभीष्ट लोगों के विज्ञानबोध को बढ़ाना है. केवल वैज्ञानिक उपकरणों, सिद्धांतों और संभावनाओं का विवरण दे देने अथवा उस सामग्री को सुंदर रचना में ढाल देने से रचना का उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता. बल्कि यह भी देखना होता है कि उसका पाठकों पर अनुकूल प्रभाव पड़े. इसके बावजूद विज्ञान को अपना धर्म मान चुके, उसके प्रति श्रद्धावनत लेखक विज्ञान के नाम पर कुछ भी परोसने की जिद किए रहते हैं. इवान येफ्रेमोव रूस के ख्यातिनाम विज्ञान कथा लेखक रहे हैं. अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने अनेक वैज्ञानिक आविष्कारों की पूर्वकल्पना की थी. अपनी ‘अतीत की परछाइयां’ शीर्षक कहानी में उन्होंने कल्पना की थी कि भविष्य के डॉक्टरी उपकरण गोली जितने सूक्ष्म आकर के बनेंगे. रोगी के शरीर में जाकर वह गोली अपने चारों को दिखने वाले अंगों का चित्र भेजेगी. जिससे डॉक्टर रोग के वास्तविक कारण का आसानी से पता लगा सकेंगे. आज यह तकनीक होलोग्राफी के नाम से प्रचलन में है. होलोग्राफी के आविष्कारक रूसी भौतिकविज्ञानी यूरी देनिस्युक ने अपने आविष्कार के पीछे येफ्रेमोव की उपर्युक्त कहानी के प्रभाव को स्वीकारा है. येफ्रेमोव का मानना था कि जीवन दृष्टि से रहित विज्ञान वैचारिक शून्यता को बढ़ावा देगा. विज्ञान के नाम पर कुछ भी चला देने पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा था—‘सारे संसार में वादविवाद की महामारी फैल गई है….बातेंबातेबातें. वर्तमान के डर की बातें….भविष्य की चिंता की बातें. डर और चिंता के बीच फंसा मनुष्य आगामी पीढ़ियों की खुशहाली के बहाने रेडिएशन बढ़ा रहा है, पानी गंदा कर रहा है, जंगल और उपजाऊ मिट्टी को नष्ट कर रहा है….आज की सभ्यता के तीन आधारस्तंभ हैं—ईर्ष्या, निरर्थक बातें और अनावश्यक वस्तुएं खरीदने की होड़….’ येफ्रेमोव की चिंता आज के प्रत्येक विज्ञानलेखक की चिंता होनी चाहिए.

स्पष्ट है कि विज्ञान ने जहां मानवजीवन को सुखसुविधामय बनाया है, वहीं अनेक चुनौतियां भी पैदा की हैं. उनसे निपटने का दायित्व वैज्ञानिकों, समाजविज्ञानियों के साथसाथ विज्ञान लेखकों का भी है. विज्ञान लेखक को कल्पनाशील होना चाहिए. तभी वह जान सकता है कि भविष्य में विज्ञान क्या रूप लेगा और उसका सामाजिक प्रभाव कैसा रहेगा. इसी तथ्य को वह वैज्ञानिक कथानक के माध्यम से समाज के सामने लाता है. यही दायित्व उसको विज्ञान के साधारण अध्येता और उसके विशेषज्ञों से अलग करता है. इसके लिए आवश्यक नहीं है कि लेखक विज्ञान के क्षेत्र में पारंगत हो; और वह उसकी जटिल गुत्थियों के बारे में सबकुछ जानता हो. अच्छी विश्लेषण क्षमता और तार्किकता से संपन्न कोई भी लेखक जिसे दसवीं तक के विज्ञान की जानकारी है, विज्ञान लेखन कर सकता है. बशर्ते उसको मनुष्यता पर भरोसा हो. विज्ञान के क्षेत्र में निरंतर हो रहे आविष्कारों के बारे में जानने की उत्कंठा हो. साथ में बेहतर भविष्य का सपना भी उसकी आंखों में हो, तभी वह विज्ञान को भविष्य के वरदान के रूप में देख सकता है.

विज्ञान लेखकों की सर्जनात्मक योग्यता और सदेच्छा पर संदेह करने का हमारा कोई इरादा नहीं है. फिर भी कुछ बातें हैं, जिनकी चर्चा हम यहां अत्यावश्यक मानते हैं. ये दिखाती हैं कि विज्ञान साहित्य की जो दिशादशा होनी चाहिए थी, विशेषकर भारतीय समाज और यहां की परिस्थितियों में, उस ओर पर्याप्त कार्य नहीं हो पाया है. इसके लिए दोषी केवल सरकार, वैज्ञानिक अथवा शोध का प्रबंधन करने वाली संस्थाएं नहीं हैं. साहित्यकार, बुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी आदि वे सभी लोग हैं जो स्वयं को किसी न किसी रूप में समाज के नेतृत्व के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं. बचाव के लिए कह सकते हैं कि पश्चिम में भी यही हो रहा है. वहां भी विज्ञान कथा और विज्ञान फिल्मों के नाम पर बेसिरपैर की फंतासी परोसी जा रही है. लेकिन वहां परिस्थितियां भिन्न हैं. वे विकास की उस शिखर को छू चुके हैं, जहां से और ऊपर जाना शायद संभव न हो. वहां फूलाफैला वाणिज्यतंत्र है. ऐसे तंत्रों के लिए पुस्तक महज एक उत्पाद है. इसलिए उसे पाठक तक पहुंचाने हेतु बाजार के सभी छलछंद अपनाए जाते हैं. लेकिन विकासशील भारत की अपनी समस्याएं हैं. उनमें से अधिकांश बेलगाम पूंजीवाद में ढल चुके सामंती अवशेषों की देन हैं. इसलिए जब तक ये असंगतियां हैं, तब तक लिखे हुए शब्द और उसके रचनाकारों से अपेक्षाएं रहेंगी ही. अतएव हमें ध्यान रखना होगा कि पुस्तक उत्पाद तक सीमित न रह जाए. वह सामाजिक परिवर्तन की वाहक, उसकी वास्तविक उत्प्रेरक बने. ज्ञानविज्ञान का लाभ देश के सभी नागरिकों तक पहुंचे. इस कार्य में विज्ञान लेखकों की भूमिका जितनी चुनौतीपूर्ण पहले थी, उससे कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण आज है. जैसी स्थिति आज है, उससे तो लगता है कि भविष्य में चुनौती लगातार बढ़ती ही जाएगी.

© ओमप्रकाश कश्यप

बचपन बहती गंगा

सामान्य

हर बालक अपने आप में एक्टीविस्ट होता है. पुराने को भंग कर नए की स्थापना को उत्सुक. आप उसे खिलौना दीजिए. कुछ देर खेलेगा, उसके बाहरभीतर झांकनेसमझने की कोशिश करेगा. तोड़ने का मन हुआ तो पल गंवाए बिना वैसा प्रयास भी करेगा. खिलौना महंगा है, पैसा खर्च करके लाया गया हैखूनपसीने की कमाई का है. ऐसा कोई मुहावरा वह नहीं समझता. मातापिता समझते हैं. वे बालक को बरजते हैं. रोकते हैं खिलौना तोड़ने से. बालक अक्सर मान भी जाता है. मान लेता है कि खिलौने के अंतनिर्हित सत्य को जानने के ज्यादा जरूरी है उसके साथ जीना.

जन्म के तुरंत बाद नवशिशु जब स्वयं को विराट प्रकृति के संपर्क में आता है तो अपने परिवेश को जानना चाहता है. शारीरिक रूप से वह भले माता पर निर्भर हो, लेकिन चाहता यही है कि दुनिया को अपनी तरह से जानेसमझे. हर छोटेबड़े कार्य में बड़ों की मदद लेना बालक की नैसर्गिक प्रवृत्ति नहीं. समाज की संरचना उसे विवश करती है. बालक चाहता है कि मातापिता उसकी जिज्ञासापूर्ति में सहायक बनें. अपनी ओर से कुछ थोपें नहीं. लेकिन मातापिता तथा अभिभावकगण जो बालक के आसपास का परिवेश रचते हैं, समाज से अनुकूलित कर चुके लोग होते हैं. उनकी जिज्ञासा की आंच ठंडी पड़ चुकी होती है. अनुभव तपे व्यक्ति के संपर्क में जब प्रखर जिज्ञासायुक्त बालक आता है तो ‘बड़े’ को अपना बड़प्पन खतरे में जान पड़ता है. उस समय जो विवेकवान और ज्ञानार्जन की ललक को बचाए हुए है, जान जाता है कि समाज से अनुकूलन की प्रक्रिया में वह कितना कुछ पीछे छोड़ आया है. इसलिए वह बालक के बहुमुखी विकास के लिए मुक्त परिवेश रचता है. सामान्यजन बालक की बौद्धिक प्रखरता और अतीव जिज्ञासा को समझ नहीं पाते. इसलिए वे बालक पर अपना निर्णय थोपने का प्रयास करते हैं. शारीरिक रूप से बड़ों पर निर्भरता बालक को उनकी बात मानने के लिए विवश करती है. प्रारंभ में उसके मन में विद्रोहभाव पनपता है. लेकिन जब वह देखता है कि उसके मातापिता समेत आसपास के सभी लोग परिस्थितियों के आगे नतमस्तक हैं, तब वह भी समर्पण की मुद्रा में आ जाता है.

कुछ लोग कहेंगे कि समाज में रहना है तो बालक को उसके तौरतरीके भी सिखाने होंगे. इसलिए मातापिता, सगेसंबंधी गलत नहीं करते. वे वही शिक्षा देते हैं जो उसको समाजोपयोगी बनाने में मदद करे. पर क्या वे सचमुच ऐसा कर पाते हैं? क्या वे ऐसी शिक्षा दे पाते हैं जो बालक की रचनात्मकता का सदुपयोग करती हो? जो उसके मस्तिष्क को सीमाबद्ध करने के बजाय मुक्त करे! दिमाग की खिड़कियों को खोलती चली जाए! कल्पना को पंख, सोच को नववितान दे! सवाल यह भी है कि क्या बालक को उसकी स्वतंत्रता के नाम पर मनमानी करने का अधिकार दिया जा सकता है? आखिर मातापिता जिस समाज से अनुकूलन करने की शिक्षा बालक को देते हैं, वह कोई एक दिन या एक व्यक्ति की रचना नहीं. मानवीय सभ्यता, संस्कृति तथा जीवनमूल्य की गरिमा प्राप्त कर चुकी सामाजिक आचारसंहिताएं—मानवीय मेधा एक उसकी जिजीविषा के शताब्दियों लंबे का परिणाम हैं. मनुष्य और पशु में अंतर भी यही है कि मनुष्य अपने ज्ञान को सहेजता हुआ, भावी संततियों को सौंपता चला जाता है. पशु अपने ज्ञान, अनुभवादि को सहेज नहीं पाते, इसलिए शताब्दियों से वे वहीं के वहीं टिके हुए हैं, जबकि मनुष्य ने प्रगति के एक के बाद एक सोपान पार किए हैं. अनुभव संपदा को बचाए रखने के लोभ में प्रत्येक समाज विगत की बांह में बांह डालकर चलता है. भविष्य की ओर एकाएक कुलांच नहीं मारता.

बालक की समझ में यह सत्य देर से आता है. धीरेधीरे वह परिवेश को आत्मसात करने लगता है. अनुकूलन की प्रवृत्ति बढ़ती ही जाती है. लेकिन इस कोशिश में बालक की मौलिकता, उसकी सृजनात्मकता और जिज्ञासावृत्ति निरंतर कमजोर पड़ती जाती हैं. बालक की मौलिकता बनी रहे, वह अपने सृजनसामथ्र्य का अधिकतम लोककल्याण में निवेश करे, लोकहित को पहचाने—इसके लिए उपयुक्त शिक्षा जरूरी है. वह मनुष्य को समाजोपयोगी बनने में मदद करती है. लेकिन हमारे शिक्षातंत्र का ढांचा ऐसा है कि बालक के मौलिक विकास के लिए उसमें बहुत कम ‘स्पेस’ बच पाता है. बालक अपने अनुभव से सीखना, अपने विवेकानुसार उसका संवर्धन करना चाहता है. अरस्तु की माने तो जन्म के समय बालक का मस्तिष्क पूरी तरह खाली होता है. शायद इसलिए उसमें उतावलापन होता है. अनुभवों के जरिये मस्तिष्क को बोध से भर लेने की जल्दी. अनुभव और शिक्षा इसमें मददगार सिद्ध होते हैं. इसलिए अरस्तु का सुझाव था कि बच्चों को अकादमिक और व्यावहारिक शिक्षा साथसाथ दी जानी चाहिए. उसके पूर्ववर्ती विद्वान सुकरात का कहना था कि—

ज्ञान का जन्म अज्ञान की कोख से होता है, सत्य की खोज निरंतर प्रश्नाकुलता द्वारा ही संभव है.’

इसके बावजूद हम हैं कि अपने अनुभव उसपर थोप देना चाहते हैं. ग्यारहवीं शताब्दी में अरबी विद्वान इब्न सीन अरस्तु का पक्ष दोहराते हुए कहा कि जन्म के समय मानवीय बोध खाली स्लेट जैसा होता है. शिक्षा उसको परिष्कृतपरिमार्जित करती है.’ विकासक्रम के बीच मानवीय प्रज्ञा वस्तुगत चेतना से ऊपर उठती हुई सक्रिय चेतना के स्तर को प्राप्त करती है और निरंतर विकासोन्मुखी रहने के बाद ही वह बोध के उच्चतम शिखर को छू पाती है.’ सीन के विचारों को इब्न तुफैल ने अपने दार्शनिक उपन्यास ‘हाये इब्न याक्जां’ में उपयोग किया. तुफैल ने बालक को ऐसे व्यक्ति की संज्ञा दी जिसका मस्तिष्क समाज के ‘लंदफंद’ से पूर्णतः मुक्त है. उपन्यास में दर्शाया गया था कि व्यक्ति केवल अनुभव से सीखता है. इब्न तुफैल के दार्शनिक उपन्यास का लातिनी अनुवाद ‘फिलोसोफस आॅटोडेक्टस’ शीर्षक से किया गया. उस उपन्यास को प्रकाशित किया था एडबर्ड पा॓कोक ने. इस उपन्यास से प्रेरणा लेकर सतरहवीं शताब्दी में जान ला॓क ने मानवीय विवेकीकरण की प्रक्रिया पर लंबा लेख लिखा, जिसमें उसने सिद्ध किया था कि मनुष्य के ज्ञान का मूल उद्गम उसका अनुभव है. इस लेख को भरपूर ख्याति मिली और जान ला॓क का नाम अपने समय के प्रमुख दर्शनशास्त्रियों में लिया जाने लगा. लेकिन ला॓क से लगभग एक शताब्दी पहले ही मस्तिष्क को कोरी स्लेट कहे जाने के विचार की समीक्षा करते हुए शताब्दी के महान चेक शिक्षाशास्त्री जा॓न अमोस काॅमिनियस(1592-1670) ने कहा था—

यह ठीक है कि बच्चे का मस्तिष्क कोरी सलेट होता है, जिसपर हम मनचाही इबारत लिख सकते हैं. लेकिन एक अर्थ में यह उससे भी बढ़कर है. सलेट की सीमा होती है. हम उसपर उसके आकार से अधिक कोई इबारत लिख ही नहीं सकते. जबकि मानवमस्तिष्क अनंत क्षमतावान होता है. उसपर जितना चाहे लिखा जा सकता है, क्योंकि वह निस्सीम है.’

काॅमिनयस का कहना था कि बच्चे स्वभावतः अच्छे होते हैं. इतने कि उन्हें सद्गुणों की खान कहा जा सकता है. तथापि उनके व्यक्तित्व को निखारने के लिए शिक्षा अनिवार्य है. का॓मिनियस ने ये विचार उस समय और समाज में व्यक्त किए थे, जहां एक सर्वमान्य मान्यता थी कि पाप मनुष्य के साथ उसके जन्म से जुड़ा है. पापपंक से उबारने के लिए शिक्षा (धार्मिक) अनिवार्य है. इस मान्यता के चलते तत्कालीन समाज में शिक्षा के नाम पर बलप्रयोग सामान्य बात थी. अपनी पुस्तक ‘डाइडेक्टिा मेग्ना’, जिसका अभिप्राय संपूर्ण शिक्षणकला से है, में का॓मिनियस ने शिक्षापद्धति को लेकर मौलिक विचार प्रस्तुत किए गए थे. उसका कहना था कि न केवल अमीर और ताकतवर वर्ग के बच्चों, बल्कि गांवों, कस्बों, शहरों में रहने वाले अभिजात और सामान्य, गरीब और अमीर, झोपड़ियों और अट्टालिकाओं के सभी लड़केलड़कियों को शिक्षा के लिए अनिवार्यतः स्कूल जाना चाहिए. ये विचार तत्कालीन यूरोपीय समाज में क्रांतिकारी थे. काॅमिनियस की पुस्तक वर्षों तक कई यूरोपीय भाषाओं में बेस्टसेलर बनी रही.

बीसवीं शताब्दी में बालकों के मन को समझा मारिया मानटेसरी ने. पेशे से डा॓क्टर मारिया को जिम्मेदारी सौंपी गई, मानसिक रूप से कमजोर बच्चों की देखभाल की. वह बच्चों के कुदरती हुनर को निखारकर उनकी प्रतिभा को तराशने में विश्वास रखती थी. वह अक्सर कहती—‘शिक्षा वह नहीं जो अध्यापकगण देते हैं; या जो तय पाठ्यक्रम द्वारा उपलब्ध कराई जाती है. शिक्षा तो व्यक्तिमात्र द्वारा किया जाने वाला नैसर्गिक उपक्रम है, जो कक्षा में पढ़ानेभर से पूरा नहीं हो जाता, बल्कि जीवनभर चलता रहता है. शिक्षाचक्र को पूरा करने के लिए परिवेश के संपूर्ण साक्षात्कार अनिवार्य है.’ मारिया का मानना था कि शिक्षण के पुनीत कर्तव्य को समर्पित शिक्षक को अपने विद्यार्थी की वैसे मदद करनी चाहिए, जैसे नौकर अपने स्वामी की करता है. लोग मारिया के प्रयोगों का मखौल उड़ाते. आरोप लगाते कि अर्धविक्षिप्त और मानसिक विकलांगता के शिकार बच्चों की शिक्षा पर वह अपना श्रम और सरकार का धन वृथा लुटा रही है. आलोचनाओं से निस्पृह, धुन की पक्की मारिया अपने प्रयासों में जुटी रही. उसको पहली सफलता उस समय मिली जब मानसिक रूप से विकलांग उसके कई विद्यार्थियों ने राज्य स्तरीय परीक्षा न केवल पास की, बल्कि औसत विद्यार्थियों से अधिक नंबर लाकर उस समय के शिक्षाविज्ञानियों को चकित कर दिया था. कुछ वर्ष पहले आई आमिर खान की चर्चित फिल्म ‘तारे जमीन पर’ के दर्शील सफारी का चरित्र का कांसेप्ट मारिया के छात्रों से लिया गया है.

मारिया ने जो काम इटली में किया भारत में उसको अंजाम देने वाले थे, गिजुभाई. उनके प्रशंसक उन्हें ‘मूंछों वाली मां’ कहते थे. गिजु भाई बापू के भक्त ठहरे. उनके साथ दक्षिण अफ्रीका में वकालत करते. उन्हीं की प्रेरणा से रचनात्मक कार्यों से नेह लगा. बापू भारत लौटने लगे तो जमीजमाई वकालत छोड़ गिजु भाई ने भी स्वदेश की राह ली. भारत आकर बापू तो राजनीति में लग गए. उनका काम बड़ा था. पर गिजुभाई क्या करें? उन्होंने बापू से बात की. बापू ने गिजु भाई को बच्चों को शिक्षित बनाने का काम दिया. एक न एक दिन अंग्रेजों को यह देश छोड़कर जाना ही होगा. उस समय राष्ट्र निर्माण की जरूरत होगी. नई पीढ़ी को नए सोच और चुनौतियों से निपटने योग्य बनाना है. बापू का निर्देश पाकर गिजु भाई अपने काम में जुट गए. बच्चों को पढ़ाना साधारणजन की निगाह में भले मामूली काम हो. लेकिन नई सृष्टि के जरूरी है नई दृष्टि की. सोच रचनात्मक सोच हो तो मामूली चीजों को भी विशिष्ट बनाया जा सकता है. फिर गांधी का कोई शिष्य अरचनात्मक हो ही नही सकता था. गिजुभाई भी परंपरा से होते आए को दोहराते तो भला कौन उनको याद रखता!

बापू की सलाह पर गिजु भाई ने टूटेफूटे सरकारी स्कूल को अपनी प्रयोगशाला बनाया. वे गाकर, नाचकर, झूमझूम कर, किस्साकहानी सुनाकर बच्चों को शिक्षा देने लगे. परिणाम उम्मीद से सवाया निकला. पहले बच्चे स्कूल के नाम से कन्नी काटते, सीखने से भागते थे. अब भागभागकर विद्यालय आने लगे. गिजु भाई ने अपने गीतों और किस्सोंकहानियों के माध्यम से बच्चों को एक साल में उतना सिखा दिया, जितना दूसरे अध्यापक पांचसात वर्षों भी नहीं सिखा पाते थे. उन दिनों मारिया मांटेसरी की यूरोप में धूम मची थी. गिजु भाई ने भारत का पहला बाल मन्दिर मांटेसरी पद्धति से दक्षिणामूर्ति भावनगर में खोला. कामयाबी मिलने लगी. गिजु भाई की उपलब्धियों से आह्लादित बापू ने एक बार कहा था—‘गिजु भाई का बच्चों के लिए काम मेरे काम से भी बड़ा है.’

गिजु भाई कहानियों को बालशिक्षण का महत्त्वपूर्ण औजार मानते थे. कहानी सुनाना आसान काम नहीं. यह भी एक कला है. आनंद बांटते हुए आनंदमग्न होने और आनंद लूटने की कला. गिजुभाई कहते थे कि कहानियों को असरदार बनाना उन्हें सुनाने वाले पर निर्भर करता है….कहानी को—‘आप रसीले ढंग से कहिए. कहानी सुनाने के लहजे से कहिए. कहानी भी ऐसी चुनें, जो बच्चे की उम्र से मेल खाती हो. कहानियां आप बच्चों को रटाना नहीं. बल्कि, पहले आप खुद अनुभव करें कि ये कहानियां जादू की छड़ीसी हैं….यदि आपको बच्चों के साथ प्यार का रिश्ता जोड़ना है तो उसकी नींव कहानी से डालें. यदि आपको बच्चों का प्यार पाना है तो कहानी भी एक जरिया है. लेकिन पंडित बनकर भी कहानी नहीं सुनाना. कील की तरह बोध ठोकने की कोशिश कभी न करना. कभी थोपना भी नहीं. यह तो बहती गंगा है. इसमें पहले आप डुबकी लगाएं, फिर बच्चों को भी नहलाएं.’

ज्ञान की मौलिकता को बचाने की. उसको संवर्धितसंरक्षित करने की कोशिश समयसमय पर अनेक विद्वानों ने की है. इसके बावजूद बच्चे पर अपना बोध थोपने की, उसके साथ मनमानी करने की कोशिश होती रही है. समाज में व्याप्त बौद्धिक जड़ता, हताशा, नाउम्मीदी और विवेकहीनता का एक कारण यह भी है कि हम नएपन से घबराते हैं. उसको मुश्किल मानकर लीक पर घिसटते जाते हैं. और बालक जो नए सपने, नई ऊर्जा, नया जोश और नए संकल्प लेकर इस दुनिया में आता है उसको भी उसी लीक पर ला पटकने की कोशिशों में लगे रहते हैं. जन्म के साथ ही स्थितियों से समझौते की, चुनौतियों से पलायन की आदत उसमें डाल देते हैं. हम स्वयं को आसानी से नहीं बदल सकते. बदलना चाहें तो एकाएक वह संभव भी नहीं है. लेकिन यदि हम समाज को बदलना चाहते हैं, यदि हम अपनी आंखों में कुछ बेहतरीन ख्बाव सजाना चाहते हैं तो हमें केवल इतना करना होगा कि बच्चों के बोध को मुक्त कर दें. उन्हें उनके सोच का विस्तृत वितान दें. इस समाज को बदलते तब देर नहीं लगेगी. समय हमारी मुट्ठी में भले न हो, लेकिन बालक समय को अपनी मुट्ठी में लेकर आता है. यह हम ही जो समय पर उसकी पकड़ को ढीला करने का अवरत प्रयास करते रहते हैं. इस बात से अनजान की हमारी यह आदत आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान की नई रोशनी से वंचित कर देती है.

ओमप्रकाश कश्यप

इकीसवीं सदी के पहले दशक में हिंदी बालसाहित्य की स्थिति और चुनौतियां

सामान्य


स्मृति अंतराल अधिक नहीं है. सब कुछ जैसे हमारी आंखों के सामने हो. इकीसवीं शताब्दी का स्वागत लोगों ने पूरे हर्षोल्लास के साथ किया था. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पिछली शताब्दी ने जो लक्ष्य सिद्ध किए थे, उनसे उत्साहित लोग यह मान चुके थे कि आने वाली शताब्दी वैज्ञानिक क्रांति की होगी. वर्तमान शती के पहले दशक में देखें तो लगता है कि इसने हमें निराश भी नहीं किया है. मात्र दस वर्ष की अवधि में हम विकास की इतनी लंबी यात्रा कर आए हैं, जितनी पहले पूरी शताब्दी में असंभवप्रायः थी. कंप्यूटर, इलेक्ट्रानिक्स, संचार, अंतरिक्ष, आवास, स्वास्थ्य, चिकित्सा, यातायात जैसे अनेक क्षेत्र हैं जिनमें विकास की गति इतनी तेज है, मनुष्यता के इतिहास में उतनी शायद ही कभी रही हो. हम यह भी नहीं भूले हैं कि साहित्य के लिए इकीसवीं शती की दस्तक आशंकाओंभरी थी. दूरदर्शन और कंप्यूटर को शब्द पर संकट के रूप में लिया जा रहा था. माना जा रहा था कि तेजगति जीवन और आपाधापी में लोगों के पास शब्द से संवाद करने का समय ही नहीं बचेगा. लगातार बढ़ते चैनल पाठकों को पुस्तकों से दूर कर देंगे. पर जो हो रहा है, वह उस समय की हमारी कल्पना से एकदम परे है. आज इंटरनेट के कारण टेलीविजन को खतरा बढ़ चुका है, जबकि शब्दसाधकों और पाठकों के लिए जो महंगी होने के कारण पुस्तकों से कटने लगे थे, इंटरनेट पर मौजूद साहित्य कागज पर छपे साहित्य का सार्थक विकल्प बनता जा रहा है. वहां मौजूद नेटपुस्तकों का खजाना पुस्तकप्रेमियों के लिए अनूठा वरदान है. दुर्लभ मानी जाने वाली पुस्तकें मात्र एक क्लिक पर, लगभग मुफ्त उपलब्ध हैं. साहित्य और बौद्धिक संपदा के लिए नए बाजार तलाशने की कोशिश भी जोरशोर से जारी है. संचारक्रांति ने साहित्य और पाठक की दूरी को समेट दिया है. अब उत्तर में रह रहे दक्षिण भारतीय पाठक को यह चिंता करने की आवश्यकता नहीं है कि उसकी भाषा की पुस्तक और पत्रिकाएं उसके आसपास उपलब्ध नहीं. प्रायः सभी अच्छी पत्रिकाओं के इंटरनेट संस्करण मौजूद हैं, जिन्हें सामान्यतः निःशुल्क उतारा जा सकता है. साहित्य विद्युतीय त्वरा से हम तक पहुंच रहा है. भाषाएं क्षेत्रीय सीमाएं लांघकर विश्वमंच पर संवाद कर रही हैं. शब्द के नएनए रूपाकार सामने आ रहे हैं. इंटरनेट की लोकप्रियता का आलम यह है कि चाहे वह लेखक हो, पाठक हो अथवा प्रकाशक, सभी वहां अपना नामपता खोजने को लालायित रहते हैं. नई तकनीक का लाभ उठाने में बालसाहित्य भी अछूता नहीं है. इंटरनेट पर नएनए जालपट्टों(बेवसाइटों) एवं जालपट्टिकाओं(ब्लागों) के आगमन से बालसाहित्य की उपलब्धता बढ़ी है. वहां बालसाहित्य की प्रत्येक विधा कहानी, कविता, कामिक्स, चुटुकले, संस्मरण, यात्रावृतांत, लेख आदि विपुल मात्रा में मौजूद हैं. यानी आधुनिक तकनीक बालसाहित्य के लिए उस रूप में तो हानिकर सिद्ध नहीं हुई है, जैसा आमतौर पर सोचा जा रहा था. तो भी सवाल उठता है कि तकनीकी बदलावों के साथसाथ बालसाहित्य के रूपाकार में जो बदलाव आ रहे हैं, क्या वे हमारी कल्पनाओं के अनुरूप हैं? विज्ञापनों की भूख से बिलबिलाता हमारा आधुनिक मीडिया, जिसमें प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों सम्मिलित हैं, बालसाहित्य के नाम पर जो परोस रहा है, क्या वही हमारी अपेक्षा थी? बालसाहित्यकारों का एक वर्ग वैज्ञानिक रचनाओं का हिमायती रहा है. पर विज्ञान और तकनीक के नाम पर जो सूचनावाद बालसाहित्य में फलफूल रहा है, क्या वही उनका लक्ष्य था? क्या बालसाहित्य की पुस्तकों का सुंदरसजीला होना ही उनकी उत्कृष्टता की कसौटी माना सकता है? और यदि बाजार के दबाव में कुछ ऐसा हो रहा है जो हमारी कल्पना के विरुद्ध है, जो हमने कभी सोचा तक नहीं था, तो क्या उसे रोका जा सकता है? क्या हमारे बालसाहित्यकार इस अनपेक्षित चुनौती से जूझने के लिए तैयार हैं?

बाजार कोई नई अवधारणा नहीं है. करीब पांच हजार वर्षों से जब साहित्य केवल श्रुति का हिस्सा था, सभ्यता ने पांव पसारने शुरू ही किए थे, बाजार रहा है. उस समय बाजार की भूमिका साहित्य के प्रवत्र्तक की थी. व्यापारियों के काफिले अपने साथ अपनी जमीन का साहित्य और कलाएं भी ले जाते थे. पंचतंत्र, कथासरित्सागर, वैतालपचीसी, सिंहासन बतीसी, आलिफलैला, मुल्ला नसरुद्दीन, किस्सा चार दरवेश, गुलीवर की यात्राएं, जातक कथाएं, सिंदबाज जहाजी जैसी कालजयी रचनाएं बाजार द्वारा प्रेरित सांस्कृतिकसाहित्यिक आदानप्रदान के कारण ही विश्वसाहित्य की धरोहर बनी हैं. उस समय संस्कृति के सम्मिलन के प्रायः दो ही रास्ते थे. वे यायावर जिज्ञासु जो ज्ञान एवं सत्य की खोज में धरती का कोनाकोना छानते रहते थे. दूसरे वे व्यापारी जो काफिलों के रूप में न केवल वस्तुओं बल्कि साहित्य और संस्कृति का भी आदानप्रदान करते थे. उस समय तक दोनों परस्पर पूरक थे. बाजार साहित्य और संस्कृतियों के सम्मिलन में अहं भूमिका निभाता था, तो साहित्य एवं कलाएं उसे व्यापार के नए अवसर तथा विश्वसनीयता प्रदान करते थे. फिर ऐसा नया क्या है, जो चिंता का विषय बना है, जिससे साहित्य और कलाओं पर संकट की बात समयसमय पर उठती रहती है. वस्तुतः बाजार और बाजारवाद में बहुत अंतर है. बाजार मानवसमाज के विकास को दर्शाता है. जबकि बाजारवाद पूंजीवादी व्यवस्था की देन है, उस व्यवस्था की देन है जो मनुष्य का अवमूल्यन कर उसको जड़ उपभोक्ता में बदल देना चाहती है. उसके साथ वही व्यवहार करती है, जो किसी जड़ वस्तु अथवा पशु के साथ किया जा सकता है. यह कार्य वह शासन और अपने भरोसे के अर्थशास्त्रियों की मदद से करती है. चूंकि सांस्थानिक धर्म अवसर मिलते ही निरंकुश सत्ता की भांति व्यवहार करने लगता है, अतः बाजारवाद एवं तज्जनित सांस्कृतिक अवमूल्यन का रोना रोतेरोते धार्मिक संस्थाएं भी प्रकारांतर में उसके पोषण का ही काम करती हैं. विषय गंभीर है तथा विशद् विवेचना की अपेक्षा रखता है. लेख की मर्यादा के निर्वहन में हम वर्तमान चर्चा को मात्र निम्नलिखित बिंदुओं तक सीमित रखेंगे—

  • क्या बालसाहित्य की रचना को प्रौढ़ पाठकों के लिखी गई रचना की अपेक्षा अनिवार्यरूप से छोटा होना चाहिए?
  • बालसाहित्य की पुस्तकों चित्र महत्त्वपूर्ण हैं अथवा कथ्य? प्रकाशनक्षेत्र में तकनीक की मदद से पुस्तक को सुंदर और सजीला बनाने के प्रयासों ने क्या प्रकाशकों को कथ्य के प्रति उदासीन बनाया है
  • क्या बालसाहित्य में बढ़ते सूचनाओं के दबाव पर नियंत्रण जरूरी है?
  • क्या बालसाहित्य लैंगिक भेदभाव का शिकार है? यदि हां तो उसमें बाजारवाद की क्या भूमिका है?
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साहित्यकारों द्वारा बाजार के समक्ष समझौतावादी रवैये की शुरुआत उस समय से मानी जानी चाहिए, जब उन्होंने बजाय विषयवस्तु के, पत्रपत्रिकाओं में उपलब्ध स्पेस अथवा प्रकाशक की अपेक्षाओं को देखते हुए लिखना आरंभ किया था. वरिष्ठतम लेखक भी रचना आमंत्रित करने वाले संपादक से उसकी अनुमानित शब्दसंख्या पूछना नहीं भूलते थे, ताकि निर्धारित सीमा के भीतर कथानक का ढांचा खड़ा किया जा सके. साहित्यिक पांडुलिपियों की पृष्ठसंख्या प्रकाशक की मांग पर, उसकी जरूरत को देखकर तय की जाने लगी थी. वह साहित्य के नाम पर रचनाओं का बोनसाई संस्करण बनाने की शुरुआत थी, जो आज भी बदस्तूर जारी है. आज भी साहित्यकार से अपेक्षा की जाती है कि वह पाठकों की रुचि के अनुकूल ऐसी रचना लिखकर दे जो अखबार में उपलब्ध स्पेस की मर्यादाओं का पालन करती हो, जिसे पूर्वनिर्धारित खाने में सेट किया जा सके. इसमें कोई संदेह नहीं है कि पत्रपत्रिकाओं की भी एक सीमा है, बाजार की मजबूरियों और जनरुचि का ख्याल रखते हुए प्रत्येक विधा को सीमित स्थान देना उनकी विवशता हो सकती है. परेशानी तब खड़ी होती है, जब लेखकसंपादक ही यह मानने लगें कि बच्चों की रचनाओं यथा कहानी, कविता, उपन्यास आदि को अनिवार्य रूप से छोटा ही होना चाहिए….कि बच्चों का मानसिक सामथ्र्य उतना नहीं कि वे बड़ी रचनाओं को पचा सकें. संपादकोंप्रकाशकों की यह विवशता हो सकती है कि वे अपने विभिन्न उम्र, वर्ग, क्षेत्र और संस्कृति के पाठकों की रुचि के अनुरूप साहित्य का प्रकाशन करें. किंतु यह मान लेना कि बच्चे छोटी रचनाएं पढ़ना पसंद करते हैं, या पाठ्य पुस्तकों के दबाव में उनके पास बड़ी रचनाएं पढ़ने का समय ही नहीं होगा, अपने पूर्वग्रहों तथा कमजोरियों को पाठक पर थोपना है. बाजारवाद पहले बड़ों को, जो अर्थोपार्जन में सक्षम हैं, अपने प्रभाव में लेता है. जब तक वे उसके आगे समर्पण न करें, तब तक वह बच्चों तक पहुंच ही नहीं सकता. उल्लेखनीय है कि लोकसाहित्य के रूप में पहचानी जाने वाली प्रायः सभी क्लासिक रचनाएं, जो हमारे संस्कारों का बड़ा हिस्सा गढ़ती हैं, बड़ों के साथ बच्चों में भी समानरूप से लोकप्रिय रही हैं. बच्चे नलदमयंती, रामायण, महाभारत, किस्सा चार दरवेश, हातिमताई आदि को भी उतने ही चाव से पढ़तेसुनते थे, जितने कि बड़े. कथासरित सागर, जातक कथाएं, वैताल पचीसी, सिंहासन बतीसी जैसी रचनाएं भी उतनी छोटी नहीं हैं, जितनी आजकल के समाचारपत्रों में प्रकाशित की जाती हैं. उनकी लोकप्रियता का कारण यह भी है कि उनमें एक तारतम्यता है. एक कहानी पूरी होते ही दूसरी के शुरू होने का संकेत दे जाती है. साथ ही उनमें पाठक को बांधे रखने वाली किस्सागोई है, जो उपन्यास जैसा आनंद देती थी. परिणामस्वरूप बालक का मन रचना में डूबा रहता था. अब बालक कथाकहानी में जब तक डूबने का प्रयास करता है, तब तक कहानी पूरी हो जाती है. कहानी में न तो परिवेश होता है, न चरित्रचित्रण के लिए समय. बिना शैली और परिवेश की चिंता के सबकुछ ऐसे परोसा जाता है, जैसे फास्ट फूड.

कुछ समय पहले तक पत्रपत्रिकाओं द्वारा औसत 1500 शब्द संख्या की बालकहानी आमंत्रित की जाती थी. अब यह स्पेस भी पांचसात सौ शब्दों में सिमटता जा रहा है. शब्दसंख्या का निर्धारण करते समय बालकों की रुचि या मनोविज्ञान का कोई ध्यान नहीं रखा जाता, जबकि बालक कहानी का आकार, उसकी शब्द संख्या क्या हो, यह कभी नहीं देखता. वह उसकी रोचकता और विषयवस्तु को देखता है. इसलिए दादादादी के लंबे, कईकई रातों तक चलनेवाले किस्से बच्चों में अपेक्षाकृत अधिक लोकप्रिय हुआ करते थे. हमारे लोकसाहित्य का अधिकांश हिस्सा आज भी वही घेरते हैं. परीकथाओं को आधुनिक परिवेश में रचने वाले महान डेनिश बालसाहित्यकार हेंस क्रिश्चिन एंडरसन की कई बालकहानियां 11000—13000 शब्दों की हैं, और वे बच्चों में पर्याप्त लोकप्रिय रही हैं. उनकी कहानी ‘भविष्य के जूते’ तथा ‘वर्फ की रानी’ क्रमशः 12644 तथा 11930 शब्दों की हैं. उनकी कहानियों की औसत शब्द संख्या ही 3100 है. हिंदी के पत्रपत्रिका तो प्रौढ़ साहित्य की इतनी बड़ी रचना नहीं छापते. अब जरा हिंदी के बालउपन्यासों अथवा बच्चों के उपन्यास के नाम पर छापी गई रचनाओं का भी तुलनात्मक अंतर देखिए. हिंदी के वरिष्ठतम बालसाहित्यकारों में से एक, जो शताधिक बालउपन्यासों के लेखक होने का दावा करते हैं, के औसत उपन्यास मोटे टाइप में छपे 30—35 पृष्ठों यानी अधिक से अधिक 12000—13000 शब्दों में सिमटे हैं. अपनी प्रतियोगिताओं में चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट जो पांडुलिपियां आमंत्रित करता है, उनमें बाल उपन्यास के लिए 25000—30000 शब्दों (मोटे टाइप में अस्सी से सौ पृष्ठ) की सीमा रखी जाती है. इनके सापेक्ष अंग्रेजी की क्लासिक रचनाओं की लंबाई देखते हैं. लेविस कैरोल की कालजयी उपन्यास ‘एलिस इन वंडरलेंड’, जिसका प्रायः दुनिया की हर भाषा में अनुवाद हो चुका है, जिसपर दर्जनों फिल्में भी बन चुकी हैं, का 2007 में प्रकाशित संस्करण की पृष्ठ संख्या 204 है. ऐसी ही महान रचना डेनियल डेफो की ‘राबिंसन क्रूसो’ का 2008 में नया संस्करण आया है, पृष्ठ संख्या है 244. ‘दि एडवेंचर आ॓फ टाम सायर’ नामक उपन्यास के लेखक मार्क ट्वेन के असली नाम सेम्युअल लेंगहार्न क्लेमेंस के बारे में बहुत कम लोग जानते होंगे. वह अपने उपनाम से ही पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. यह उपन्यास पहली बार 1876 में प्रकाशित हुआ था, पृष्ठ संख्या थी—275. पुस्तक इतनी लोकप्रिय हुई कि ट्वेन को इसका अगला हिस्सा लिखना पड़ा. आठ वर्ष बाद पुस्तक का अगला भाग ‘एडवेंचर आ॓फ हकलबेरी फिन(1884)’ प्रकाशित हुआ तो वह पहले से भी अधिक स्थूलकाय था. 366 पृष्ठ संख्या की इस मोटी पुस्तक के बारे में अमेरिका के महान साहित्यकार नोबल विजेता अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने अपनी पुस्तक ‘ग्रीन हिल्स आ॓फ अफ्रीका में लिखा है—‘‘आधुनिक अमेरिकी साहित्य का स्रोत एक ही पुस्तक है—मार्क ट्वेन की ‘हकलबेरी हिन.’’1

ये सभी विश्व क्लासिक्स हैं. फिर भी कहा जा सकता है कि ये उदाहरण पुराने हैं. तो चलिए इन्हें छोड़ देते हैं. हम ‘हैरी पा॓टर’ को भी नहीं लेंगे जिसके एक के बाद एक सात खंड आ चुके हैं और जिसने लोकप्रियता की सभी सीमाओं को तोड़ा है. कुछ लोगों के लिए वह असाहित्यिक रचना है. मगर फिलिप पुलमेन का नाम तो आधुनिक लेखकों में सम्मान के साथ लेना पड़ेगा. अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों के विजेता पुलमेन ने ‘हिज डार्क मैटीरियल्स’ शृंखला की तीन पुस्तकें लिखी हैं. उनमें ‘नादर्न लाइट(1995)’ 399 पृष्ठ, ‘दि सबटेल नाइफ(1997) 341 पृष्ठ तथा ‘दि अंबर स्पाईग्लास(2000) 518 पृष्ठ की हैं. बालउपन्यास की इतनी बड़ी कृति हिंदी में शायद ही किसी ने लिखी है. कम से कम मुझे तो याद नहीं आती. यहां लेखक पर अंग्रेज प्रेमी होने का आरोप लगाया जा सकता है! लीजंेड फिल्मकार सत्यजीत राय ने बालसाहित्य लेखन को गंभीरता से लिया था. बच्चों के मनोविज्ञान तथा उनकी रुचि का ख्याल रखते हुए उन्होंने कई लोकप्रिय पुस्तकों की रचना की. ‘फेलुदा’, ‘प्रोफेसर शंकु’, ‘फाटिकचंद’ उनकी अत्यंत लोकप्रिय कृतियां हैं. इनमें ‘फेलुदा’ और ‘प्रोफेसर शंकु’ कहानी संग्रह हैं. ‘फेलुदा’ शीर्षक से उन्होंने जासूसी, रहस्य और रोमांच से भरपूर एक के बाद एक 35 कहानियों की रचना की थी. ‘प्रोफेसर शंकु’ उनकी विज्ञानआधारित कहानियों का संकलन है. हिंदी में ऐसा प्रयोग मुझे याद नहीं. इस क्षेत्र में कुछ लेखकों ने अवश्य ही सराहनीय काम किया, पर अधिकांश की वर्णनात्मकता के बोझ से दबी रचनाएं, पाठकों पर अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पातीं. ‘फाटिकचंद’ किशोरोपयोगी उपन्यास है, इसका हाल ही में पेपरबैक संस्करण आया है जो अपने आकार, कथ्य और रोचकता में अंग्रेजी की उपर्युक्त पुस्तकों से टककर लेता है. इसलिए यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब अंग्रेजी और बांग्ला में बच्चों के स्थूलकाय उपन्यास तथा लंबी कहानियां चल सकती हैं तो भारत में क्यों नहीं? अब यह तो कोई नहीं मानेगा कि हिंदी पढ़नेवाले बच्चे इतने मंदबुद्धि हैं कि वे लंबे कथानक वाली रचनाओं को पचा ही नहीं सकते.

दरअसल सारा खेल बाजारवादी मानसिकता का है. रचना के पर कतरने का काम यह कहकर किया जाता है कि आधुनिक भागमभाग के युग में बच्चों के पास बड़ी पुस्तकों को पढ़ने का समय ही नहीं है. यदि ऐसा है तो भी यह बाजारवादी मानसिकता का सामना करने के बजाय उसके समक्ष हथियार डाल देने जैसा है. इसमें साहित्यकार की आत्मविश्वास की कमी झलकती है. यदि रचना का लघु कलेवर ही उसकी पठनीयता की कसौटी होता तो लघुकथा को हिंदी साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा होती. सबसे ज्यादा पाठक कविताओं के होने चाहिए थे. जबकि आज भी ‘कहानी’ और ‘उपन्यास’ सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली विधाएं हैं. दरअसल शब्दसंख्या के आधार पर किसी भी विधा का निर्णय करना अनुचित है. हर विधा की एक तकनीक होती है. रचना का पैमाना उसकी कथावस्तु और प्रस्तुतीकरण होना चाहिए. कहानीउपन्यास यदि रोचक और उसका विषय बच्चों की पसंद के अनुकूल होगा तो वे उसकी ओर आकर्षित होंगे ही. बाजार की अपेक्षाओं के अनुसार जो बालसाहित्य प्रकाशित होता है, वह बच्चों में पढ़ने की तात्कालिक भूख भले शांत कर दे, किंतु उन्हें पढ़ने का संस्कार देने में असमर्थ सिद्ध होता है. परिणामस्वरूप उसका वैसा प्रभाव नहीं पड़ता जो एक साहित्यिक रचना से अपेक्षित होता है. संस्कार के अभाव में बालक साहित्यिक पुस्तक के साथ भी उपभोक्ता वस्तु जैसा ही व्यवहार करता है. जिससे उसकी प्रभावोत्पादकता घट जाती है. अतएव बालसाहित्यकारों से अपेक्षा की जा सकती है कि वे समाचारपत्रपत्रिकाओं की के काॅलम को ध्यान में रखकर तो लिखें ही, उससे इतर कुछ अपने और अपने पाठकों के लिए भी अवश्य लिखें. ताकि बच्चों के लिए सिर्फ पुस्तकें ही नहीं बेहतर रचनाएं भी सामने आ सकें.

सभी जानते है कि साहित्य शब्द से गढ़ा जाता है. उसमें महत्ता उस विचार की होती है, जिसे साहित्यकार सर्वकल्याणकारी भावना के साथ रचना में समाहित करता है, और जिसको पाठक रचना के सत्व के रूप में उसके आस्वादन के साथ प्राप्त करता है. विचार सहज, सरल एवं संप्रेषणीय हों, बालपाठक शब्दों की ओर आकर्षित होकर उससे जुड़े, ताकि उनके माध्यम से लेखक की विचारधारा से परिचित हों, उसके साहित्यत्व को आत्मसात कर सके, जो रचना की आत्मा है—इसके लिए चित्रों ही आवश्यकता पड़ती है, विशेषकर बच्चों और उन सरल बुद्धि बड़ों के लिए जिन्हें शब्दों से गुजरने का अभ्यास कम है. साहित्य में चित्रों और शब्द की अटूट मैत्री को पहली बार जा॓न अमोस का॓मिनियस(1592-1670) ने पहचाना था. बच्चों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर उस चेक लेखक ने ‘आ॓रबिस पिक्चस्’(वस्तु जगत) शीर्षक से सचित्र पुस्तक तैयार की थी. उसका पहला संस्करण 1658 में प्रकाशित हुआ था. उसमें पहली बार कथ्य को समझाने के लिए चित्रों की मदद ली गई थी. असल में बच्चों का पहला सचित्र शब्दकोश था, जिसमें चित्रों बच्चों को उनके आसपास के संसार के बारे में बताया गया था. वे चित्र सादा थे और उन्हें बहुत कलात्मकता से बनाया भी नहीं गया था. साधारण छापे से बस टाप दिया गया था. तो भी उसकी ऐतिहासिक महत्ता है. लगभग साढ़े तीन सौ वर्ष पहले जब छापाखाने का विकास हुआ तब तक देश शब्दक्रांति की ओर बढ़ चुका था. कालांतर में चित्रों का रूपरंग और संवरा. पेशेवर चित्रकारों ने मोर्चा संभाला. अब रचना केवल शब्दों से ही संवाद नहीं करती थी, बल्कि वह चित्रों के माध्यम से भी बोलने लगी थी. किंतु उन चित्रों की एक मर्यादा थी. वे शब्दों के साथ मौजूद तो रहते थे. मगर कभी उनपर भारी नहीं पड़ते थे. दोनों अपनी समानांतर भूमिका में रहकर सफल आयोजन रचते थे. जिन्हें चंदामामा के अंक याद हैं, नंदन और पराग को जिन्होंने पढ़ा है. वे शब्द और चित्र की अटूट जुगलबंदी को बेहतर समझ सकते हैं. वे जानते हैं कि चित्रकार की कूंची का एक कोना किस प्रकार रचना का पूरक और संप्रेषक बन जाता है.

साहित्यिक पुस्तकों के प्रकाशन में व्यावसायिकता के कारण इधर एक प्रश्न उठने लगा है कि बालसाहित्य की पुस्तकों में चित्र महत्त्वपूर्ण हैं अथवा कथ्य? इसमें कोई संदेह नहीं कि चित्र और शब्द यानी साहित्य, अभिव्यक्ति की अलगअलग शैलियां हैं. दोनों ही कला हैं और परस्पर पूरक भी. उनमें कभीकभी स्पर्धा भी देखी जा सकती है. चित्रकार की कूंची का एक झोंका एक झटके में जो बात कह सकता है, संभव है उसका बयान करने के लिए लाखों शब्दों का लश्कर भी अपर्याप्त सिद्ध हो. दूसरी ओर शब्दनाद के माध्यम से जो संदेश मस्तिष्क की शिराओं में प्रवेश करता है, चाक्षुस संदेश की अपेक्षा उसकी अनुगूंज लंबे समय तक रहती है. वह अधिक संप्रेषणीय एवं ग्राह्यः होता है तथा जनसाधारण की पहंुच में भी. जबकि चित्रकला को परखने के लिए पारखी नजरों की जरूरत पड़ सकती है. कई बार तो पाठक कथ्य में इतना रम जाता है कि चित्रमय प्रस्तुतियों की ओर उसका ध्यान ही नहीं जाता. मगर यदि कथ्य कमजोर है तो इस बात की भी संभावना बनी रहती है कि बालक चित्रों को देखकर ही पुस्तक को किनारे रख दे.

अच्छा चित्र पुस्तक में बालक की रुचि जाग्रत करता है. अतः बात जब साहित्य की हो तो उसमें शब्द और उनमें निहित कथ्य ही महत्त्वपूर्ण माना जाएगा. चित्र का काम तो विषय की संप्रेषणीयता को विस्तार देना, उसे सहज एवं चाक्षुस बनाना है. जहां तक बच्चों की पुस्तकों का सवाल है, आजकल अधिकांश चित्र कंप्यूटर द्वारा बनाए जाते हैं. यह कार्य आमतौर पर जिन कंप्यूटरशिल्पियों से कराया जाता है, उनकी दक्षता कंप्यूटर से काम लेने में होती है, न कि बालसाहित्य या बालमनोविज्ञान को लेकर. इसलिए उनके द्वारा बनाए गए चित्रों में सतहीपन झलक स्पष्ट दिखाई पड़ती है. वे चित्र चित्रों की निर्जीवता रेखाओं और रंगों के संयोजन से आगे नहीं बढ़ पाती. जबकि रचना के साथ दिए गए चित्र की भूमिका केवल उसकी अभिव्यक्ति को सहजसंप्रेषणीय बनाना नहीं है, बल्कि उस अनकहे को भी सामने लाना है, जिसका बयान करते समय शब्द अकसर चूक जाते हैं. एक स्तरीय चित्र पाठकदर्शक को सोचने के विविध आयाम देता है. आशय है कि बालसाहित्य की पुस्तकों में चित्र तो महत्त्वपूर्ण हैं, मगर वे कथ्य का स्थान नहीं ले सकते. किसी भी महान साहित्यिक रचना के लिए एक अच्छा चित्र कथ्य एवं संदेश का पूरक हो सकता है, उसकी अनिवार्यता नहीं.

इसके बावजूद बालसाहित्य की पुस्तकों के प्रकाशन के समय प्रकाशक जितना उसके चित्रों पर परिश्रम करते हैं, कथ्य पर उतना नहीं करते. कथ्य को प्रायः संबंधित बालसाहित्यकार के लिए छोड़ दिया जाता है. हाल के वर्षों में तो कई प्रकाशकों को भी लेखक की भूमिका निभाते देखा गया है. वे चतुराईपूर्वक इंटरनेट या इधरउधर से सामग्री जुटाकर उसको चित्रों के साथ सजा देते हैं. कंप्यूटर ने इस काम को और भी आसान करा दिया है. इससे संस्थान में दक्ष लेखकों, चित्रकारों का महत्त्व घटा है. परिणाम यह हुआ है कि चित्रों की आत्मा जाती रही. चित्रकार की कूंची पहले हर चित्रों में प्राणप्रतिष्ठा करती थी. अब वह माउस की बेजानसी क्लिक के भरोसे रह गया है. इसके कारण चित्र अब भावमय नहीं, रंगमय नजर आते हैं.

लगभग दो दशक पहले तक राष्ट्रीय पत्रपत्रिकाओं में बालसाहित्य की सामग्री की तुलना आजकल परोसी जा रही रचनाओं से करें. उन दिनों रचनाओं पर पुराकथाओं का गहरा प्रभाव था. उसके अलावा जो साहित्य इस श्रेणी में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता था, वह मुल्ला नसरुद्दीन, तेनालीराम, अकबरबीरबल, सिंहासन बतीसी, कथासरित्सागर, जातककथाएं और पंचतंत्र जैसे क्लासिकों से आता था. लिखित साम्रगी के साथसाथ बड़ी मात्रा में धारावाहिक रूप से चित्रकथाएं भी छापी जाती थीं. उनका एक ही उद्देश्य होता था, बालपाठकों को अपनी संस्कृति और परंपरा से परिचित कराना. यद्यपि साहित्यकारों का एक वर्ग चित्रकथाओं को बालकों के लिए हानिकर मानता था. यह माना जाता था कि का॓मिक्सों के अतिमानवीय चरित्र बालकों को फंतासी के बहाने यथार्थ से दूर ले जाएंगे, जिससे वे वास्तविक जीवन की समस्याओं का सामना करने में असमर्थ सिद्ध होंगे. असल में वह दौर यथार्थवाद से प्रेरित था, जिसकी पृष्ठभूमि में माक्र्सवादी प्रेरणाएं थीं. हालांकि उन्हीं दिनों परंपरावादी साहित्यकारों का भी एक वर्ग था, जो अपना त्राण महाकाव्यीय मिथकों, अंतर्कथाओं में देखता था, तो भी गत शताब्दी के समापन तक प्रगतिवादी बालसाहित्यकारों का एक बड़ा वर्ग पैदा हो चुका था, जिसका ध्येय बच्चों की प्रश्नाकुलता को तीव्र बनाना था. उनके प्रेरणास्रोत कथासम्राट प्रेमचंद तथा सुदर्शन जैसे साहित्यकार थे, जिनकी किस्सागोई से भरपूर कहानियां, बच्चों के साथसाथ बड़ों में भी समानरूप से लोकप्रिय थीं. एक और वर्ग था जो पुराकथाओं के सपाट प्रदर्शन की काट विज्ञान कथाओं में देखता था. ये दोनों ही धाराएं साथसाथ विकसित हुईं थीं, तथापि वैज्ञानिकबोध एवं कल्पनाशीलता की युति अभाव में हिंदी विज्ञानसाहित्य अपेक्षित सफलता अर्जित न कर सका, जबकि कल्पना और यथार्थ के समन्वय से बालसाहित्य की रचना करने वाले बालसाहित्यकारों जैसे जहूरबख्श, मस्तराम कपूर ‘उर्मिल’, डा. जाकिर हुसैन, सुदर्शन आदि ने हिंदी को कई अनूठी रचनाएं दी हैं, जिनमें किस्सागोई शैली का भरपूर उपयोग किया गया था.

गत शताब्दी के अंतिम दशक से बाजार ने हर चीज को अपनी अपेक्षाओं के अनुकूल ढालना आरंभ कर दिया था. आज हालात यह है कि समाचारपत्रों में प्रकाशित बच्चों की सामग्री का अधिकांश सूचनावाद से आक्रांत नजर आता है. उपनगरीय(सैटेलाइट टाउनशिप) की मानसिकता के विस्तार ने सुदूर गांवदेहात में भी मध्यवर्ग की संख्या में इजाफा किया है. दूसरी ओर छोटे परिवारों, विशेषकर उनमें जहां मातापिता दोनों ही कार्य करते हैं, बच्चों को बड़े उपभोक्ता वर्ग के रूप में चिह्नित किया जाने लगा है. अतएव समाचारपत्र, पत्रिकाएं बालसाहित्य के नाम पर उन रचनाओं को प्रकाशित करते हैं, जो बच्चों को नए उत्पादों के बारे में जानकारी देती हों. इसलिए पर्यटन, तीर्थस्थलों आदि को लक्ष्य बनाकर, बालसाहित्य के अंतर्गत जो सामग्री परोसी जाती है उसका उद्देश्य बालपाठकों को देश की सांस्कृतिक छटाओं और बहुरंगी सभ्यता की परचानाभर नहीं होता. उद्योग की तरह चलाए वाले समाचारउद्यमों की असल मंशा अपनी सहयोगी पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने की होती है. इसलिए उनमें लोकजीवन की से अधिक वहां के प्रमुख होटलों तथा बाजारों की जानकारी होती है. बालसाहित्य पर सूचनावाद का प्रभुत्व तब है जब इंटरनेट ने सूचनाओं को माउस की क्लिक पर सर्वसुलभ बना दिया है. इससे वे चीजें पिछड़ने लगती हैं, जिनका वाणिज्यिक महत्त्व कम होता है, इससे प्रकारांतर में आर्थिक विषमताएं जन्मती हैं. अतएव बालसाहित्यकार के सामने बड़ी चुनौती बालसाहित्य को सूचनावाद के चंगुल से बचाना है. यह कार्य मौलिक सोच एवं साहित्यिक भावना के साथ ही संभव है.

बालसाहित्यकार के समक्ष एक चुनौती लैंगिक भेदभाव की खाई को पाटना भी है. यह आरोप पर बहुतसे साहित्यकार बंधुओं को चौंका सकता है. पर यह सचाई है कि हमारा बालसाहित्य आज भी सामंतकालीन प्रवृत्तियों से बाहर नहीं आ पाया है. हिंदी में बच्चों के लिए लिखी जाने वाली कहानियों, उपन्यासों को यदि हम देखें तो आज भी लगभग तीनचौथाई रचनाओं के नायक पुरुषवर्ग से संबंधित होते हैं. शेष आधी आबादी को मात्र एकचौथाई से ही संतोष करना पड़ता है. आजादी के बाद बालसाहित्य के अन्य क्षेत्रों में जहां आमूल परिवर्तन आया है, वहीं लैंगिक विषमता को लेकर हमारा बालसाहित्य आज भी मध्ययुगीन प्रवृत्तियों से भरा है. यहां हम इस बात पर संतोष व्यक्त कर सकते हैं कि लैंगिक भेदभाव केवल हिंदी तक सीमित नहीं है. सर्वाधिक लोकतांत्रिक होने का दावा करने वाला पश्चिमी समाज भी इस जकड़न से बाहर नहीं आ पाया है. फरवरी 2007 में अमेरिका के सेंट्रल का॓लिज के दो प्रोफेसरों डा॓. डेविड एंडरसन तथा डा॓. माइकल हेमिल्टन ने बच्चों के लिए प्रकाशित पुस्तकों में लैंगिक भेदभाव की स्थिति का अध्ययन किया था. अपनी रिपोर्ट में उन्होंने 2001 के बाद बच्चों की लगभग 200 सर्वाधिक बिक्री वाली पुस्तकों तथा 1938 से स्थापित बहुप्रतिष्ठित काल्डकोट पुरस्कार से सम्मानित सचित्र पुस्तकों में से सात वर्ष की पुस्तकों के नमूने का चयन किया था. उनके अध्ययन के पश्चात वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि बच्चों के लिखा जाने वाला बालसाहित्य लैंगिक भेदभाव की भावनाओं से भरा पड़ा है. बालसाहित्य की रचनाओं में नर पात्रों की संख्या मादा पात्रों की अपेक्षा लगभग दो गुनी होती है. नर पात्रों को चित्रों में प्रमुखता से दर्शाया जाता है. ऐसा दर्शाया जाता है मानो लड़कियां लड़कों की अपेक्षा प्राकृतिक तौर पर कमजोर होती हैं, इसलिए उन्हें लड़कों से अधिक देखभाल की आवश्यकता होती है. अध्ययन में यह भी सामने आया कि बालसाहित्य की रचनाआंे में लड़कियों को प्रायः घर के काम में लिप्त दिखाया जाता है. अध्ययन के निष्कर्षों पर एंडरसन की टिप्पणी थी कि—

बालसाहित्य की आधुनिक चित्रकथाएं इस अंधविश्वास को आज भी बनाए हुए हैं कि लड़के यानी पुरुष पात्र लड़कियों अर्थात स्त्रीपात्रों की अपेक्षा अधिक मनोरंजन प्रधान होते हैं.’2

बच्चों में समानतावादी दृष्टिकोण भरने के लिए आवश्यक है कि माता पिता आरंभ से ही इसपर ध्यान दें. दूसरी शोधकर्ता डाॅ. हेमिल्टन ने चेताया है कि बालसाहित्य की कृतियों मे, ‘लैंगिक भेदभाव बच्चों के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है. यह उनकी कैरियर संबंधी उड़ान में अवरोध पैदा करता है, उनकी महत्त्वाकांक्षाओं को कुंद करता है. उनपर गहरा मनौवैज्ञानिक असर डालते हुए भविष्य के मातापिता के रूप में उनके विचारों और भावनाओं का अनुकूलन करता है.’3 परिणाम यह होता है कि लैंगिक भेदभाव पीढ़ीदरपीढ़ी बना रहता है. रचनाओं में अभिव्यक्त लैंगिक भेदभाव किशोर मानस पर कितना गहरा असर डालता है, उसका ताजा उदाहरण हैरी पा॓टर की लेखिका जे. के. रोलिंग के जीवन से भी दिया जा सकता है. लेखिका का असली नाम जोनी रोलिंग है. करीबी उन्हें प्यार से ‘जो’ कहकर बुलाते हैं. जब उन्होंने हैरी पाॅटर लिखा और उसकी पहली पा॓डुलिपि अपने प्रकाशक ‘ब्लूम्सबरी’ को भेजी तो प्रकाशक को लगा कि यह जानने के बाद कि पुस्तक किसी महिला लेखक की रचना है, किशोर पाठक उसकी ओर कम संख्या में आकर्षित होंगे. इसलिए उसने लेखिका से अनुरोध किया कि वह अपने सरनेम ‘रोलिंग’ के अलावा दो नामाक्षर प्रयोग करे. प्रकाशक की सलाह पर अमल करते हुए जोनी ने अपनी नानी कैथलीन, जो उन्हें बचपन में अच्छीअच्छी कहानियां सुनाया करती थी, के नाम से ‘के’ उधार लिया. इस प्रकार पुस्तकों पर ‘जे. के. रोलिंग’ नाम छापा गया. यह आज भी उनका असली नाम नहीं है.

इकीसवीं शती का पहला दशक समापन की ओर है, पर बालसाहित्यकार की चुनौतियां कम नहीं हुई हैं. बल्कि बाजार जिस तरह अपने सर्वग्राही पंजे फैलाता जा रहा है, उससे तो लगता है कि चुनौतियां उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रही हैं. ऐसे में हर उस व्यक्ति का, जो बच्चों को जड़ उपभोक्ता बनने से रोकना चाहता है, जो चाहता है कि सूचनाओं के चैतरफा दबाव और बाजारवादी प्रलोभनों के बीच भी बालक का विवेक और संवेदनशीलता बनी रहे, कर्तव्य है कि बच्चों को पढ़ने के लिए उनकी रुचि के अनुकूल मगर स्तरीय साहित्य उपलब्ध कराए. साहित्यकारों का कर्तव्य है कि महज पत्रपत्रिकाओं के लिए रचनाओं का बोनसाई तैयार करने के बजाए वे मौलिकता, कथानक की मांग, बच्चों के मनोरंजन एवं उनकी रुचि के अनुसार अपना लेखनकार्य करें. प्रकाशकों का लेखक बनने से अच्छा है अपने पाठकों का साहित्यकार बनना. रचना यदि मनोरम है तो वह अपना पाठकवर्ग हर हाल में खोज लेगी. साहित्य दिल का मामला, कच्ची उम्र का प्रेम है, बिना संवेदनशीलता के वह लोकप्रिय हो ही नहीं सकता. पठनीयता के संकट को दूर करने तथा संवेदनाओं के क्षरण को रोकने के लिए आवश्यक है कि बालक का बचपन से ही साहित्य से लगाव हो. इसका एक रास्ता ब्रितानी अध्यापक क्रेग जेंकिन भी दिखा रहे हैं. हालांकि रास्ता नया नहीं हैं. जगहजगह जाकर वहां की लोककथाएं संचित करने और उन्हें बच्चों तक पहुंचाने का काम उनसे बहुत पहले 1825 के आसपास जर्मनी के ग्रिम बंधु कर चुके हैं. क्रेग जेंकिन पिछले दिनों दक्षिण भारत की यात्रा पर थे. यहां उन्होंने लोककथाएं इकट्ठी कीं. अब वे उन्हें लंदन में अपने विद्यार्थियों को सुनाते हैं. उनका यह प्रयोग बहुत सफल हो रहा है. विद्यार्थी कहानियों को सुनकर झूम उठते हैं. सांस्कृतिक आदानप्रदान के जिस काम को करने में बड़ेबड़े सांस्कृतिक मंत्रालयों और राजकीय दूतावासों के पसीने छूटने लगते हैं, वह कहानियों के माध्यम से आसानी से पूरा हो रहा है. हिंदी को ऐसे ही समर्पित किस्सागो चाहिए, जो उसको बाजारवाद और सूचनावाद के चंगुल से निकालकर लोक के नजदीक ले जा सकें.

ओमप्रकाश कश्यप

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संदर्भानुक्रमणिका

  1. All modern American literature comes from one book by Mark Twain called Huckleberry Finn…” Ernest Hemingway in Green Hills of Africa.
  2. Modern children’s picture books continue to provide nightly reinforcement of the idea that boys and men are more interesting and important than are girls and women,” Dr. David Anderson, professor of economics.
  3. This bias that continues to exist contributes negatively to children’s development, limits their career aspirations, shapes their attitudes about their future roles as parents and even influences their personality characteristics.” Dr. Mykol Hamilton, professor of psychology.