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असफलताओं का आर्थिक मोर्चा

सामान्य

उत्पादन क्षेत्र में अभूतपूर्व मंदी है. विदेशी मुद्रा-भंडार में कमी आई है. अर्थशास्त्रियों के अनुसार आर्थिक विकास-दर मात्र एक प्रतिशत रह जाने की उम्मीद है. देश की शाख को भी बट्टा लगा है. बड़ी संख्या में लघु और कुटीर उद्यम या तो बंद चुके हैं, अथवा मंदी के शिकार हैं. छोटे उद्यमियों, दस्तकारों तथा उनमें लगे मजदूरों, कामगारों और शिल्पकर्मियों की हालत पतली है. निर्माण-क्षेत्र में नई परियोजनाओं पर काम रुक-सा गया है. जिन उद्यमियों ने बैंक-ऋण तथा ग्राहकों की मदद से परियोजनाएं चालू रखी थीं, उनकी आगे की बिक्री कम है. घटी आमदनी के कारण किश्त समय पर न चुका पाने से ग्राहकों की चिंताएं बढ़ती जा रही हैं. निरंतर कमजोर पड़ती मांग से बड़े-बड़े उद्योग छंटनी पर मजबूर हैं. छत्तीसगढ़ में ‘अल्ट्राटेक’ सीमेंट बनाने वाली कंपनी के मजदूर प्रदर्शन कर रहे हैं. कंपनी ने कुछ मजदूरों को बाहर का रास्ता दिखाया है तो कुछ की दैनिक मजदूरी में कटौती की है. सबसे चिंताजनक है छोटे और लघु व्यापारियों में फैली हताशा. रोजगार की दृष्टि से इस क्षेत्र की उपयोगिता कारपोरेट सेक्टर से कहीं अधिक है. यहां पसरी हताशा भविष्य में बड़े समाजार्थिक संकट का कारण बन सकती है. सरकार चुनावों की वजह से हालात के प्रबंधन में लगी है, लेकिन उसका पूरा ध्यान असल समस्या से भटकाने का है. जातिवाद, सांप्रदायिकता, राममंदिर जैसे मुद्दे उछाले जा रहें हैं. ताकि किसी भी प्रकार सत्ता में बने रहकर जातिवादी मंसूबों को साधा जा सके.

2014 में सत्ता संभालते समय केंद्र सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’, ‘न्यू इंडिया’ जैसे सपने लोगों को दिखाए थे. आज वे सब हवा में हैं. क्यों? सरकार उससे जुड़े प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पा रही है. यदि कुछ नहीं बदला है तो मीडिया का सरकार के प्रति भक्ति-भाव. वह जैसे पहले सरकार की हवा बनाने में लगा था, आज भी वही हाल है. बात बढ़ती है तो ध्यान हटाने के लिए या तो आतंकवाद को बीच में ले आता है, अथवा पाकिस्तान को. कुछ नया दिखाना हो चीन के साथ डांडा-मेंडी की खबरें छा जाती हैं. एक ओर विकास के नाम पर छल है, दूसरी ओर धर्म, सांप्रदायिकता और निरंतर बढ़ती जातीय हिंसा. एक साथ कई पाटों के बीच पिसती जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है. उधर कारपोरेट सेक्टर की पो-बारह है. देश के सबसे बड़े 100 उद्योगपतियों की संपत्ति में औसतन 26 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. जबकि मुकेश अंबानी तथा सरकार के करीबी माने जा रहे अडानी की कुल संपत्ति में 67 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है. इस वर्ष एक नया नाम उद्योगपतियों की कतार में बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण का शामिल हुआ है. कारोबार में 176 प्रतिशत वृद्धि-दर के साथ उन्होंने दिखा दिया है कि भारतीय उपभोक्ताओं के मानस पर भगवा रंग अन्य किसी भी रंग से अधिक प्रभावशाली है.

ऐसा क्यों हो रहा है. क्यों प्रधानमंत्री की वायदों और असलियत के बीच की दूरी कम नहीं हो पा रही है. इसे समझने के लिए वर्तमान सरकार की प्राथमिकताओं को समझना आवश्यक है. यह जानना आवश्यक है कि जिस विकास के नारे के साथ सरकार सत्ता में आई थी, क्या उसकी नीतियां उसके अनुरूप हैं? अपने चुनावी भाषणों में मोदी जी ने गुजरात को विकास के मॉडल के रूप में पेश किया था. तथाकथित गुजराती मॉडल की वास्तविकता पर बुद्धिजीवियों ने उन दिनों भी प्रश्न उठाए थे. तब कांग्रेस सहित दूसरे राजनीतिक दल उस मुद्दे पर चुप्पी साधे रहे. गत साढ़े तीन वर्ष के केंद्र सरकार के कार्यकलापों द्वारा समझा जा सकता है कि विकास का तथाकथित गुजराती मॉडल कुछ नहीं, असलियत में पूंजीवाद एवं सांप्रदायिकता का गहरा गठजोड़ था. केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद वह और भी उग्र हुआ है. आमजन को जाति, धर्म और क्षेत्रवाद में उलझाकर देश की संपदा पूंजीपतियों के हवाले की जा रही है. धर्म और पूंजीवाद का यह गठजोड़ इतना शक्तिशाली है कि जो इसके साथ नहीं, वह बेबस और लाचार नजर आता है. धर्म और राजनीति का गठजोड़ वर्तमान सामाजिक उथल-पुथल का वास्तविक कारण है. अस्थिरता के ऐसे माहौल में विदेशी  निवेशक भला क्यों पूंजी लगाना चाहेंगे! इसलिए प्रधानमंत्री की 150 से अधिक देषों की यात्रा और वहां की हंगामाखेज बैठकों, व्यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद विदेशी निवेशक भारत में पूंजी निवेश से कतरा रहे हैं. बड़ी स्पर्धा न होने के कारण देशी पूंजीपतियों की पौ-बारह है. वे जानते हैं कि बाहरी पूंजी को तरसती सरकार के आगे मनमानी शर्तें थोपी जा सकती हैं. इससे वे बेलगाम होकर आगे बढ़ रहे हैं. वैश्विक मंदी के दौर में भी रिलायंस-अडानी जैसे बड़े कारपोरेट घरानों की चामत्कारिक वृद्धि-दर सरकार और लोगों के मानस पर उनकी पकड़ को दर्शाती है.

अनायास नहीं है कि भयावह मंदी के इस दौर में अकेला मीडिया ऐसा क्षेत्र है, जिसपर कोई अंतर नहीं पड़ा है. बल्कि वह तेजी से समृद्धि की ओर अग्रसर है. कारपोरेट मुनाफे का बड़ा हिस्सा उसकी ओर जा रहा है. वह अपनी सामाजिक प्रतिबद्धताओं को बिसराकर, लोकहित के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर मिट्टी डालने का काम बहुत बेशर्मी से कर रहा है. कभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो कभी खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ दर्शाते हुए वह अपने लिए विशिष्ट सुविधाओं तथा अधिकारों की मांग करता है. जबकि हाल के दिनों में उसका वास्तविक कार्य नागरिकों के मानस का उपभोक्ताकरण कर, पूंजीवाद के रास्ते को निष्कंटक करना है. समाज में भय, असुरक्षा, लालच और हताशा का वातावरण तैयार करना, धर्म के नाम पर तंत्र-मंत्र, जादू-टोना परोसना और रूढ़ियों का महिमा-मंडन करना—मीडिया की इसी सोची-समझी नीति का हिस्सा है. उसकी कोशिश है कि अपने एकाकीपन को बांटने की जद्दोजहद में लोग आभासी दुनिया में शरण लेने को विवश हो जाएं. राजनीतिक दल मीडिया की ताकत को समझते हैं. इसलिए चुनावों में लोगों तक पहुंचने के लिए वे उसका इस्तेमाल उसी की शर्तों पर करने को विवश होते हैं.

पूंजीवाद के समर्थन में ‘ट्रिकल डाउन थ्योरी’ यानी ‘रिसाव का सिद्धांत’ का तर्क अकसर दिया जाता है. अर्थशास्त्रियों के अनुसार समृद्धि का रिसाव ऊपर से नीचे की ओर होता है. तदनुसार पूंजीपति जितना कमाते हैं, उतना टेक्स देते हैं. बेखुदी जैसी हालत में सरकार माने रहती है कि जितना उनका मुनाफा बढेगा, उतना ज्यादा टेक्स आएगा. अनुभव बताते हैं, ऐसा होता नहीं है. पूंजीपति जितना टेक्स के रूप में सरकार को देते हैं, सारा जनता की जेब से जाता है. ऊपर से विभिन्न प्रकार की छूट के रूप में वे सरकार से इतना बटोर लेते हैं कि कराधान के रूप में दी गई राशि छोटी पड़ जाती है. पश्चिम में इस सिद्धांत की हकीकत को बहुत पहले समझ लिया गया था. अर्थशास्त्री जान केनिथ गिल्वर्थ ने ‘घोड़े और गौरैया’ की सैद्धांतिकी कहकर उसका मजाक उड़ाया था—घोड़ों को जितना अधिक दाना मिलेगा वे उतनी ज्यादा लीद देंगे. उसमें से बिना पचे दाने चुगकर ज्यादा गौरैया पेट भर सकेंगी.

यह जानते हुए भी कि कथित ‘ट्रिकल डाउन थ्योरी’ प्राय: उलटी चाल चलती है—भारत सरकार आज भी उसपर भरोसा करती है. इसके दुष्परिणाम सामने हैं. पूंजीवाद जितनी तेजी से भारतीय जनसमाज पर अपनी पकड़ बना रहा है, उतनी तेजी से समृद्धि निचले स्तर से ऊपर की ओर गतिमान है. आजादी के बाद के दशकों में कठिन परिश्रम द्वारा जनता ने जो थोड़ी-बहुत समृद्धि अर्जित की थी, धीरे-धीरे उसका साथ छोड़ रही है. बड़ी पूंजी तरह-तरह के प्रलोभन देकर उसे अपनी ओर खींच रही है. सरकार बेबस है. चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा जनता के साथ किए गए वायदे एक-एक कर झूठे साबित हो रहे हैं. उनके मन की बात, जनता के मन की बात बन ही नहीं पा रही है. सांप्रदायिकता के बुरी तरह शिकार समाज में ‘धर्मनिरपेक्षता’ तथा ‘साम्यवाद’ जैसे शब्द गाली बन चुके हैं. जिन्हें समाजार्थिक समानता का सिद्धांत नापसंद है, वे वामपंथ का सीधे सामना करने के बजाए, धर्म की आड़ लेकर हमला करते हैं. घोर सांप्रदायिक, जातिवादी लोगों ने एक वर्ग का मानस इस तरह तैयार किया है कि वह मार्क्स, सेकुलर, साम्यवाद, धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों को सुनते ही बलबलाने लगता है. धर्म और पूंजीवाद का जैसा गठजोड़ इन दिनों भारत में है, वैसा दुनिया के अन्य देश में नहीं है. चैनल पूंजीवाद से खाद-पानी लेकर धर्मांधता परोस रहे हैं. जनसरोकार भुला चुका टेलीविजन गाय और गोबर पर बहसें कराता है. विकास के नाम पर ये सब पतनोन्मुखी समाज की भूमिका रच रहे हैं.

सरकार में बैठे लोग भी मान चुके हैं कि उद्योग जगत के हालात षीघ्र सुधरने वाले नहीं हैं. सरकार आय-वृद्धि हेतु नए-नए प्रकल्प आजमा रही है. सारा जोर सेवा क्षेत्र पर है. किसी भी राज्य की प्रगति-दर के आकलन का मापदंड यह भी है कि उसकी आय के स्रोत स्थायी हों. उनमें प्रमुख योगदान कृषि, उत्पादन और विनिर्माण क्षेत्र का हो. सेवा-क्षेत्र की भूमिका अर्थव्यवस्था के सहायक अथवा पूरक क्षेत्र के रूप में होनी चाहिए. भारत में हालात एकदम उलट हैं. यह पूंजीवाद के समक्ष राज्य के समर्पण को दर्शाता है. कहा जा सकता है कि मतलब तो राजस्व वृद्धि से है. वह चाहे सेवा क्षेत्र से हो या उत्पादन से, क्या अंतर पड़ता है? यहां मार्क्स के ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ की याद आती है. मनुष्यता के इतिहास की गहन समीक्षा करने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि उत्पादकता के साधन सभ्यता और संस्कृति के स्वरूप को निर्धारित करते हैं. कृषि-केंद्रित अर्थव्यवस्था तक भारतीय समाज उत्पादक समाज था. उत्पादन अन्योन्याश्रित था. लोग बजाय लाभ कामना के, एक-दूसरे की जरूरत के अनुरूप उत्पादन करते थे. मशीनीकरण के साथ-साथ उत्पादन का स्वरूप भी बदलता गया. सेवा क्षेत्र में तीव्र वृद्धि दर्शाती है कि हम तेजी से उपभोक्ता-समाज की ओर बढ़ रहे हैं. ऐसा समाज जिसमें परंपरागत संबंध कमजोर पड़ जाते हैं. यह स्थिति पूंजीपतियों के लाभदायक है. वे इसका लाभ भी उठा रहे हैं. उत्पादन के अलावा राजनीति, समाज और संस्कृति के सभी क्षेत्रों पर बाजार का कब्जा है. आज बाजार तय करता है कि लोग अपने त्योहारों को किस प्रकार मनाएं. मानवीय संबंधों का रूप कैसा हो. यहां तक कि हमारे दोस्त और दुश्मन तय करने की जिम्मेदारी भी मीडिया उठा रहा है.

आखिर ऐसा क्यों हुआ? आर्थिक मोर्चे पर सरकार के बुरी तरह विफल होने के कारण क्या हैं? सरकार जिस स्फूर्त्ति के साथ अरविंद पनगढ़िया को नीति आयोग का सर्वेसर्वा बनाकर लाई थी, वे सरकार को अधबीच छोड़कर जाने के लिए क्यों विवश हुए? कथित रूप से गुजरात में कामयाब होने वाला यह मॉडल बाकी देश  में असफल क्यों हो रहा है? सरकार के पास इस संकट से उबरने की क्या कोई योजना है? यदि हां, तो उसका स्वरूप और सफल होने की संभावना क्या है? ये प्रश्न किसी भी संवेदनशील मन को विचलित कर सकते हैं. उनपर अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों द्वारा विचार किया जाना आवश्यक है. लेकिन या तो वे जान-बूझकर उपेक्षा कर रहे हैं, अथवा उनके मुंह बंद कर दिए गए हैं. या फिर आलोचक अर्थशास्त्रियों के विचारों को सेंसर किया जा रहा है.

सबसे पहले ‘गुजरात मॉडल’ पर चर्चा करते हैं. विकास के नाम पर जिस ‘गुजरात मॉडल’ को चुनाव के दौरान आर्थिक विकास के मानक के तौर पर पेश किया गया था, वह मनमोहन सिंह की उदार आर्थिक नीतियों के अतिरेकी, अनियोजित विस्तार के अतिरिक्त कुछ नहीं था. केवल एक चीज उसे शेष भारत से अलग करती थी. वह थी, उग्र हिंदुत्व अथवा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ पूंजी का तालमेल. केंद्र में उन दिनों कांग्रेस की सरकार थी. मनमोहन सिंह थे, जिन्होंने देष को आर्थिक उदारवाद की राह दिखाई थी. उग्र हिंदुत्व के पैरोकार बने मोदी जी केवल गुजरात तक सीमित थे. जो मीडिया आज हिंदू धर्म-दर्शन के नाम पर कचरा परोस रहा है, वह दबे स्वर में उग्र हिंदुत्व की आलोचना में सरकार और बुद्धिजीवियों के साथ था. सांप्रदायिकता विद्वेष इतना नहीं गहराया था, जितना  आज. सरकार समझती थी कि विदेशी निवेशकों को केवल राजनीतिक कूटनीति के तहत आमंत्रित नहीं किया जा सकता. उनका पहला और अंतिम उद्देश्य निवेश के माध्यम से अधिकाधिक लाभार्जन रहता है. यदि उन्हें युद्ध से लाभ दिखता है तो हजारों-लाखों जान की परवाह किए बिना वे युद्ध का समर्थन करेंगे.  अधिकतम मुनाफे की संभावना बनाए रखने के लिए वे जोखिम से तब तक बचना चाहते हैं, जब तक बदले में अतिरिक्त मुनाफे की संभावना न हो.

इन दिनों हालात अलग हैं. केंद्र में हालांकि बहुमत की सरकार है. लेकिन वह लोगों की सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काकर सत्ता में आई है. अपनी सत्ता अक्षुण्ण रखने के लिए वह सामाजिक-सांप्रदायिक विभाजन की खाई को चौड़ा करने में लगी है. संविधान की सौगंध उठाकर संसद और विधायिकाओं में पहुंचे उसके नेता कभी बीफ, कभी गाय, कभी सांप्रदायिकता और कभी जाति के नाम पर लोगों को भड़काने में लगे रहते हैं. उन्होंने जो उथल-पुथल पैदा की है, उससे देश और समाज के बीच अविश्वास बढ़ा है. कुल मिलाकर देश के हालात ऐसे नहीं हैं जो विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर सकें. ऊपर से सरकार द्वारा नोटबंदी के नाम पर मुद्रा-बदली का आत्मघाती फैसला. सरकार का दावा कि नोटबंदी से आतंकवाद की कमर टूट जाएगी, भ्रष्टाचार कम होगा और दबा हुआ कालाधन एक झटके में बाहर आ जाएगा—पूर्णतः निष्फल सिद्ध हुआ है. आर्थिक मुद्दों को लेकर दिशाहीनता ऐसी है कि साढ़े तीन वर्ष के कार्यकाल में सरकार अभी तक पिछली सरकार की योजनाओं को ही नाम बदल-बदलकर कार्यान्वित कर रही है. कुछ मुद्दे जैसे वीआई कल्चर पर नियंत्रण हेतु वाहनों से लाल-नीली बत्तियां हटवाना, चुनावों के दौरान घर-जाकर वोट मांगना—उसने ‘आम आदमी पार्टी’ से लिए हैं. जिन दो योजनाओं के साथ सरकार अपना नाम जोड़ सकती है, उनमें पहली नोटबंदी थी, जिसकी विफलता का उल्लेख ऊपर किया गया है. दूसरी योजना जीएसटी है. विपक्ष में रहते हुए भाजपा उसका विरोध किया करती थी. सरकार में आने के बाद उसे इतनी लापरवाही से लागू किया कि अर्थव्यवस्था पर उसका नकारात्मक असर पड़ा है. ऐसे में शरद यादव का हालिया बयान कि आने वाला चुनावों में बिगड़ती अर्थव्यवस्था बड़ा मुद्दा होगी, अनुचित नहीं लगता.

भारतीय गांवों में संचय की प्रवृत्ति बहुत पुरानी है. कभी अपने भविष्य के लिए, कभी अचानक आ पहुंचे पाहुन के नाम पर; और कभी किसी परिजन के शादी-विवाह या किसी और कारज के लिए, लोग संचय को गृहस्थ का पुनीत कर्म मानते आए हैं. यह प्रवृत्ति ग्रामीण संस्कृति से निकलकर शहर में आ बसे लोगों के उपभोक्ताकरण की सबसे बड़ी बाधा है. इसलिए भय, असुरक्षा, अविश्वास, अशांति आदि के बहाने वाक्-बहादुर चैनल रात-दिन लोगों की सामाजिकता पर प्रहार करते रहते हैं. बहाना कभी आंतकवाद बनता है, कभी पाकिस्तान तो कभी सांप्रदायिकता. भारत-चीन तनाव को युद्ध की दुंदभि में बदल देना भी उनकी इसी रणनीति का हिस्सा था. उन दिनों एक भी चैनल ने इस तथ्य पर चर्चा करना जरूरी नहीं समझा कि पचास के दशक में भारत और चीन के हालात करीब-करीब एक समान थे. चीन भारत के बाद आजाद हुआ. बावजूद इसके उसने अपने उद्योग क्षेत्र को जिस कुशलता के साथ संभाला, मानव-संसाधनों का सुनियोजित उपयोग किया, छोटे-छोटे खेतों को मिलाकर ‘कम्यून’ आधारित कृषि को बढ़ावा दिया—भारत में वैसा नहीं हो सका. भारत चीन से विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था का सबक ले सकता था. लेना चाहिए था. किंतु सत्ताकेंद्र पर विराजमान नेताओं की मुश्किल यह थी कि विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था का रास्ता वर्गहीन समाज की स्थापना की ओर जाता है. उसे न पहले की सरकार चाहती थीं, न आज की भाजपा प्रणीत सरकार.

पूरा दोष वर्तमान सरकार का भी नहीं है. आजादी के बाद से ही देश में विदेशी पूंजी पर आधारित विकास की परिकल्पना की गई थी. यहां मौजूद विपुल प्राकृतिक संसाधनों तथा मानव-संपदा का लोक-हित में उपयोग करने को लेकर सरकारों की न तो नीति रही, न वैसा संकल्प. पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से यूँ तो कई विकास कार्यक्रमों का संचालन किया गया. किंतु भ्रष्ट नौकरशाही और प्रशासनिक दिशाहीनता के कारण वे अपेक्षित परिणाम न दे सकीं. वर्तमान सरकार की सारी राजनीति उग्र हिंदुत्व पर टिकी है. जातिवादी अजेंडे के तहत राजनीति करने वाली भाजपा को यह डर हमेशा लगा रहता है कि यदि वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुद्दे पर कमजोर पड़ी तो उसका सवर्ण मतदाता समूह, जो केवल उग्र हिंदुत्ववादी छवि के कारण उससे जुड़ा है, एक ही झटके में छिटक जाएगा. आर्थिक विकास को लेकर उचित दिशा-दृष्टि के अभाव में भी सरकार को वे सब कष्ट उठाने पड़ रहे हैं. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने उदारीकरण की शुरुआत की थी. वर्तमान सरकार उसे और भी खुले मन से आगे बढ़ा रही है. पूरा देश अंबानी, अडानी और टाटाओं के लिए चरागाह बना है. सभी ने अपने-अपने घोड़े छोड़ दिए हैं. जब तक सरकार है, जहां तक संभव हो कब्जा लेना चाहते हैं. जनसंघ और अटलबिहारी वाजपेयी के जमाने में भाजपा स्वदेशी की समर्थक थी. मोदी जी ने पासा पलट दिया है. ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’ के बहाने वह अंबानी-अडानी को ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ की जगह देना चाहती है. विडंबना यह है कि ‘भाजपा मुक्त’ भारत की राजनीति करने वाले नेताओं के पास भी अर्थव्यवस्था को लेकर कोई सार्थक विकल्प नहीं है.

ओमप्रकाश कश्यप