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ईश्वर : एक अवैज्ञानिक धारणा

सामान्य

क्या ईश्वर बुराई पर अंकुश लगाना चाहता है, लेकिन लगा नहीं सकता?

तब वह सर्वशक्तिमान नहीं है.

क्या वह अंकुश लगा सकता है, लेकिन उसकी इच्छा नहीं है?

तब वह विद्वेषी है.

वह कर सकता है और करने की इच्छा भी रखता है?

तब ये ढेर सारी बुराइयां कहां से आती हैं?

वह न तो कर सकता है, न ही करने की इच्छा रखता है?

तब उसे ईश्वर क्यों माना जाए?

              —एपीक्यूरस, लेक्टेंटियस द्वारा ”आ॓न दि एंगर आ॓फ गॉड”, 13.19.

स्पर्धा आधुनिक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का सबसे कारगर उपकरण है. एक तरह से मूलमंत्र. मान लिया गया है कि स्पर्धा रहेगी, तब तरक्की होगी. प्रतिभाशाली लोग आगे आएंगे. लोगों को अच्छे उत्पाद सस्ते मूल्य पर प्राप्त हो सकेंगे. इसलिए जो इस व्यवस्था को अपनाता है, जाने-अनजाने स्पर्धा में शामिल हो ही जाता है. लोग स्पर्धा को विकास का मूलमंत्र मानना चाहते हैं, मानें. उसमें सफलता व्यक्ति के प्रतिभा-कौशल से तय नहीं होती. वास्तविक परिणाम स्पर्धारत व्यक्ति/व्यक्ति-समूहों की आर्थिक-सामाजिक हैसियत पर निर्भर करते हैं. उन प्रक्रियाओं द्वारा तय होते हैं, जिन्हें साधारण भाषा में मौकापरस्ती कहा जाता है. दो उद्योगपति इसलिए स्पर्धा में रहते हैं, ताकि बाजार के अधिकतम हिस्से पर कब्जा कर, वहां अपने एकाधिकार का परचम लहरा सकें. भूखों की स्पर्धा उन्हें अपनी थाली में कटौती के साथ जैसे-तैसे जीते जाने की मजबूरी की ओर ढकेल देती है. मार्क्स के अलावा मिखाइल बकुनिन, विल्फ्रेद परेतो, जीतान मोसका आदि ने स्पर्धा की प्रवृत्ति का विद्वतापूर्ण विश्लेषण किया है. उनके अनुसार स्पर्धा असमान व्यक्तियों की बेमेल प्रतियोगिता है. उसका परिणाम असमानता की खाई के उत्तरोत्तर चौड़े होने के रूप में सामने आता है. चूंकि स्पर्धा लोकतांत्रिक मूल्यों एवं समानाधिकार के प्रसाद के रूप में व्यवहृत होती है, इसलिए उसका विरोध लोकतंत्र का प्रतिवाद मान लिया जाता है. शिखर तक पहुंचने तथा वहां टिके रहने की स्पर्धा में व्यक्ति को अनेक समझौते करने पड़ते हैं. कई बार सामान्य नैतिकता सहित उन मूल्यों को भी दांव पर लगाना पड़ता है, जिनके प्रति प्रतिबद्धता उस अभियान का औचित्य रही है. यह सब याद आया हिंदी के चर्चित ब्लॉग ‘साइंटिफिक वर्ल्ड’ चल रही एक बहस को पढ़कर. इस ब्लॉग पर एक चौंकाऊ, विज्ञान के नाम पर अवैज्ञानिक बहस पिछले दिनों ऐसे देखने को मिली, जैसे टीआरपी बढ़ाने के लिए टीवी चैनल सामान्य सूचनाओं को भी ‘न भूतो न भविष्यति’ कहकर परोस देते हैं. भले ही यह अनजाने में हुआ हो अथवा अतिउत्साह में, नजर साफ आ रहा था.

पिछले दिनों ‘साइंटिफिक वर्ल्ड’ पर दो आलेख प्रकाशित हुए हैं, उनमें पहला आलेख के पी सिंह का ‘क्या ईश्वर को वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित किया जा सकता है?’ दूसरे आलेख, ‘ईश्वर की अवधारणा: विज्ञान की कसौटी!’ के लेखक विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी हैं. दोनों आलेख ईश्वरवादियों की ओर से लिखे गए हैं, इसलिए उनमें ईश्वर की सत्ता पर संदेह कम, विश्वास और आस्था की अभिव्यक्ति अधिक है. दोनों विद्वान आस्था-मंडित हैं. ईश्वरत्व में संदेह उन्हें छू भी नहीं पाया है. इसलिए दोनों अपनी-अपनी तरह से ईश्वर को प्रमाणित करने की कोशिश करते हैं. मगर इकतरफा होने के कारण दोनों लेख ईश्वर-प्रचारक मंडली के प्रवचन बन जाते हैं. विज्ञान के नाम पर अवैज्ञानिकता का आशय यही है. लेखों में दिए गए तर्क भी नए नहीं हैं. कथावाचक किस्म के ‘गुरु महाराज’ ऐसे तर्क देते ही रहते हैं. के. पी. सिंह जिस आस्था को प्रश्नवाचक चिह्न के साथ आरंभ करते हैं, वैसी ही आस्था चतुर्वेदी जी के लेख में विस्मयादिबोधक चिह्न के साथ नजर आती है. गोया लेखों को विज्ञान की श्रेणी में लाने के लिए वे संदेह का हिस्सा पाठक के लिए छोड़ देना चाहते हैं. आपत्तिजनक यह नहीं है कि ब्ला॓ग पर दो ईश्वरवादियों ने अपने-अपने तर्क जुटाए हैं. निस्संदेह जैसा वे सोचते और महसूस करते हैं, उसको अभिव्यक्त करने का उन्हें पूरा-पूरा अधिकार है. आपत्तिजनक यह है कि इन लेखों को ऐसे ब्ला॓ग पर जगह मिली है जो स्वयं को विज्ञान के प्रति समर्पित बताकर बौद्धिक जड़ता एवं पाखंड के विरोध का अभियान चला रहा है. इसी प्रतिबद्धता के चलते उसको हजारों पाठक मिले हैं.

इन लेखों की कमजोरी है कि उनकी सामग्री उनके अपने ही शीर्षक से मेल नहीं खाती. शीर्षक से लगता है कि उनमें विषय का वस्तुनिष्ट विवेचन देखने को मिलेगा, मगर असलियत में सारे तर्क एकतरफा होने से लेख पूरी तरह आत्मपरक, निजी आस्था की प्रस्तुति तक सिमट गए है. दोनों में कहीं भी शंका अथवा संदेह को जगह नहीं है. इस विषय पर ऐसे लेखों की कमी नहीं है जिनमें लेखक पूर्वाग्रह अथवा पूर्व निष्पत्ति के साथ लिखना आरंभ करता है. अपने मत के समर्थन में जो भी तर्क जंचते हैं उन्हें सामने रखता जाता है. मगर पूर्वाग्रहों के दबाव में उस सामग्री की वस्तुनिष्ट समीक्षा करना भूल जाता है, जिसे उसने अपने मत के समर्थन में बतौर उद्धरण प्रयुक्त किया है. विचाराधीन आलेखों में से पहले में भारतीय संदर्भ अधिक हैं तो दूसरे में पाश्चात्य विद्वानों को अपने समर्थन में दिखाने की कोशिश की गई है.

 विज्ञान संदेह के साथ शुरू होता तथा उसी के साथ आगे बढ़ता है. उसमें ठहराव की स्थिति कभी नहीं आती. किसी वैज्ञानिक सत्य पर भरोसा करने से पहले प्रत्येक को उसे जांचने-परखने तथा प्रयोगों की कसौटी पर कसने की छूट प्राप्त होती है. ईश्वर एवं मानवीय आस्था के बीच विज्ञान को न लाएं तो भी उसके अस्तित्व पर संदेह एवं तदनुरूप उठनेवाली बहस नई नहीं है. भारत में भी ढाई-तीन हजार वर्षों से यह बहस लगातार चली आ रही है. वैदिक काल में ईश्वरवादी धारणा का खंडन करने वाले आजीवक और लोकायती संप्रदाय थे. वहीं आस्थावादियों के समर्थन में वैदिक धर्म की अनेक शाखाएं थीं. दर्शन की दृष्टि से वह भारतीय मेधा का सबसे प्रस्फुटनकारी दौर था. उसी दौर में वेदों को आप्त-ग्रंथ की संज्ञा दी गई. उन्हें दैवी उपहार माना गया. श्रद्धालु आचार्यों का एक वर्ग ‘आस्तिक’ बनाम ‘नास्तिक’ की बहस में वेदों को आप्तग्रंथ मनवाने जुटा रहा. बावजूद इसके नास्तिक दर्शनों की प्रतिष्ठा उतनी ही बनी रही, जितनी आस्तिक दर्शनों की थी. विचारों के उस लोकतंत्र ने सांख्य जैसे निरीश्वरवादी दर्शन को जगह थी तो कर्मकांड प्रधान मीमांसा दर्शन को भी. वैदिक धर्मों के विचलन के दौर में उभरे जैन और बौद्ध दर्शन ने ‘आत्मा’ और ‘ईश्वर’ पर केंद्रित बहसों में उलझने के बजाए मनुष्य के आचरण को महत्त्वपूर्ण माना. उन्होंने सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह आदि पर जोर देकर नैतिक एवं समाजोन्मुखी, जीवन जीने का आवाह्न किया. मानो सभ्यताओं के तार आपस में जुड़े हुए थे. लगभग उन्हीं दिनों भारत से हजारों मील दूर यूनान में भी कुछ वैसा ही हुआ. ईसा पूर्व छठी शताब्दी में वहां सुकरात, प्लेटो, जीनोफेन जैसे विचारकों ने अभिजन संस्कृति का पोषण करने वाले परंपरावादी सोफिस्टों को चुनौती दी. सुकरात ने ईश्वर को शुभ का पर्याय माना तथा उसकी प्राप्ति के लिए सद्गुण और सदाचरण पर जोर दिया. गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, सुकरात, कन्फ्यूशियस, प्लेटो जैसे दार्शनिकों का नैतिक प्रभामंडल इतना तेजोमय था कि उसका प्रभाव शताब्दियों तक बना रहा. आज भी ईसा से तीन से छह शताब्दी पूर्व का वह समय विश्व-इतिहास में बौद्धिक क्रांति का सफलतम दौर माना जाता है. आगे चलकर जितने भी राजनीतिक-सामाजिक दर्शन सामने आए, वे भी जो विश्व-परिदृश्य में परिवर्तन के वाहक बने, सभी की नींव इस दौर में पड़ चुकी थी.

विद्वान लेखकों द्वारा दिए गए तर्कों में प्रत्येक पर स्वतंत्र रूप से चर्चा संभव है. तथापि इस लेख की सीमा को ध्यान में रखते हुए मैं केवल स्टीफन डी. अनविन के उद्धरण की ओर दिलाना चाहूंगा. स्टीफन अनविन ने विशेषरूप से पुस्तक लिख, ‘ईश्वर के पक्ष-विपक्ष में आंकड़े जुटाकर ईश्वर के होने की प्रायिकता 67 प्रतिशत’ सिद्ध की है.’ मैंने वह पुस्तक नहीं पढ़ी है, किंतु उसपर पर्याप्त समालोचनात्मक सामग्री इंटरनेट पर उपलब्ध है. इस आलेख में आए गणितीय संदर्भ वहीं से लिए गए हैं. मेरी कोशिश उसी को आगे बढ़ाने की है, ताकि अनविन द्वारा प्राकलित ईश्वर की 67% प्रायिकता का सच पाठकों के सामने आ सके. अनविन भौतिक विज्ञानी हैं. डा॓क्ट्रेट उन्होंने सैद्धांतिकी भौतिकी की शाखा ‘क्वांटम गुरुत्च’ में की है. प्रसंगवश बता दें कि यह विज्ञान की वही शाखा है जिसके अंतर्गत आजकल विश्व-प्रसिद्ध ‘लार्ज हैड्रा॓न कोलीडर’ नाम का दीर्घकालिक और महत्त्वाकांक्षी प्रयोग चल रहा है. उससे जुड़े वैज्ञानिकों ने द्रव्यमान का कारण कहे जानेवाले मूलकण यानी ‘हिग्स बोसोन’ की खोज का दावा किया, जिसे वस्तुओं में भारता के लिए जिम्मेदार माना जाता है. विज्ञान की चुनौतियों के आगे लड़खड़ा रहे आस्थावादी यहां भी क्यों चूकने वाले थे. वैज्ञानिक अपने प्रयोग के आरंभिक निष्कर्षों के पुनरीक्षण में जुटे ही थे कि आस्थावादियों ने उसे तुरत-फुरत ‘गॉड पार्टिकिल’ का नाम दे दिया. जिसका हिग्स बोसोन की खोज में जुटी प्रयोगशाला सर्न के वैज्ञानिकों ने जोरदार विरोध किया. प्रयोगशाला से जुड़े वरिष्ठ अमेरिकी वैज्ञानिक पोलीन गा॓नन से 2011 में यूरोप के रेडियो पत्रकार ने जिनेवा में एक साक्षात्कार के दौरान जब कहा, ‘मैं मीडिया से हूं और मैं उसे यही(गॉड पार्टिकिल) कहता रहूंगा.’ तब गा॓नन का जवाब था, ‘यह सब आप ही का दिया गया नाम है….मैं इससे घृणा करता हूं.’ वैज्ञानिकों के न चाहने के बावजूद हिग्स बोसोन को ‘गॉड पार्टिकिल’ कहने का षड्यंत्र आज भी चल रहा है. षड्यंत्र इसलिए क्योंकि धर्मसत्ता, राजसत्ता, अर्थसत्ता और उनसे पालित-पोषित मीडिया में से कोई नहीं चाहता कि जनता विज्ञान को विज्ञान की तरह जाने. उसका विवेकीकरण हो. इसलिए वैज्ञानिक शोधों को तत्काल अपने पाले में खींच लेने, उनका तेज कम करने तथा उनसे लाभ उठाने की प्रवृत्ति प्रायः सभी समाजों में रही है. इससे धर्मग्रंथों का मूल संदेश गंडे-ताबीजों में कैद होकर रह जाता है. कंप्यूटर जन्मपत्री बनाने लगता है और टेलीविजन पर बाबा लोग भविष्य सुधारने का धंधा करने लगते हैं.

अनविन संयुक्त राष्ट्र के ऊर्जा विभाग के दूत रह चुके है. आजकल वे एक सलाहकार फर्म का संचालन करते हैं, जिसका काम विश्व की नामी-गिरामी पूंजीपति कंपनियों को आपदा प्रबंधन के मामले में सलाह देना है. अनविन की एक चर्चित पुस्तक The Probability of God: A Simple Calculation That Proves the Ultimate Truth. 2003 का उल्लेख चतुर्वेदी जी ने अपने आलेख में किया है. यह उनकी अध्ययनशीलता को दर्शाता है. अपनी पुस्तक में अनविन ने ईश्वर के अस्तित्व की संभाव्यता को गणित के माध्यम से सिद्ध किया है. इस निष्कर्ष में उनके व्यावसायिक स्वार्थ छिपे होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता. आपदा को ईश्वरीय कर्म सिद्ध कर देने से प्रबंधकीय कौशल पर लगनेवाले आरोप कम हो जाते हैं. शायद इसलिए वे ईश्वर के विचार को उसी प्रकार जीवित रखना चाहते हैं, जैसे अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए ज्योतिषी प्रारब्ध की संकल्पना को ऊल-जुलूल तर्क देकर पालता-पोषता है. हालांकि अनविन ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने जो समीकरण दिए हैं, वे आवश्यक नहीं कि पूरी तरह खरे, अंतिम सत्य हों. वे केवल एक पक्ष यानी उस पक्ष को जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखता है, अपनी बात को और अच्छी तरह स्पष्ट करने के लिए कुछ उपकरण उपलब्ध करा रहे हैं. वे यह भी लिखते हैं कि ईश्वर विषयक विज्ञान की सभी मान्यताएं अधूरी हैं. अर्थात जिन संकल्पनाओं पर चलते हुए अनविन ईश्वरत्व की संभावना को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 67 प्रतिशत तक आंकते हैं, दूसरा उन्हीं संकल्पनाओं को अपनी तरह से प्रस्तुत कर, उनसे नए निष्कर्ष निकाल सकता है. वे भी गणितीय मापदंड पर उतने ही खरे उतरेंगे, जितने स्वयं अनविन के. कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसा हुआ है. उसकी चर्चा हम यथास्थान करेंगे. कुल मिलाकर मामला वहां भी आस्था का और आस्थावादियों के लिए है, गणित का नहीं.

अब बात उस गणित की जिसके आधार पर अनविन ने ईश्वर की प्रायिकता को कथितरूप से 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 67 प्रतिशत कर दिया है. पहले तो यह जान लें कि अनविन ईश्वर की 50 प्रतिशत संभाव्यता तक किस प्रकार पहुंचे हैं. इसके लिए उन्होंने न तो कोई सर्वे किया है, जो सांख्यिकी का मूल कर्म है, न ही किसी और माध्यम से आंकड़े जमा किए हैं. केवल काम-चलाऊ प्रतीतियों के सहारे अपने मंतव्य को गढ़ा है. यह साधारण से साधारण व्यक्ति भी जानता है कि ईश्वर को लेकर दो प्रकार की संभावनाएं बनती हैं. पहली, ईश्वर हो सकता है. और दूसरी ईश्वर नहीं हो सकता. इस तरह ईश्वर के होने या न होने की मूल प्रायिकता बराबर-बराबर अर्थात पचास प्रतिशत है. सिवाय संभाव्यता के अलावा इसके पीछे कोई और तर्क नहीं है. एक तरह से यह अनविन की मजबूरी भी थी. क्योंकि प्रायिकता को बढ़ाने के अनविन जिस गणितीय सूत्र का सहारा लेता है, वह सांख्यिकी-विद् रेवरेंड थामस बा॓यस का है. वह सूत्र तभी काम कर सकता है जब उसके लिए आधार अथवा प्राथमिक संभाव्यता मौजूद हो. इसलिए उन लोगों के लिए जो ईश्वर की संभावना को शून्य अथवा नगण्य मानते हैं, यह सूत्र और प्रकारांतर में अनविन के निष्कर्ष, किसी काम के नहीं हैं. उल्लेखनीय है कि जब कोई गणितज्ञ सांख्यिकीय आकलन करता है तो उसके आंकड़े किसी न किसी रूप में समाज से, अथवा किसी वैज्ञानिक प्रयोग द्वारा ठोस परिगणनाओं के आधार पर जुटाए गए होते हैं. वे किसी व्यक्ति-विशेष के बारे में सत्य भले ही न हों, मगर वास्तविकता का एक सामान्य चित्र हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं, जो सामाजिक अध्ययन में बहुत कारगर सिद्ध होते हैं. उससे प्राप्त निष्कर्ष किसी न किसी सामाजिक यथार्थ का प्रतिनिधित्व करते हैं. आगे बढ़ने से पहले बा॓यस के सूत्र के बारे में जान लेना आवश्यक है. इसके लिए पहले कुछ उदाहरण—

मान लीजिए एक घर है. जिसका दरवाजा खुला हुआ है. एक आदमी उस घर में घुसता है. उसको किसी ने बाहर आते हुए नहीं देखा. तब उस व्यक्ति की, जब तक कोई और साक्ष्य न हो, घर में होने तथा न होने की संभावना बराबर-बराबर यानी पचास प्रतिशत होगी. सूत्र के गणितीय हिस्से पर आने से पहले एक और स्थिति. मान लीजिए एक व्यक्ति हर रोज घर में कुछ न कुछ फल लेकर अवश्य आता है. परिवार में दो बच्चे हैं. उनमें एक को केला पसंद हैं, दूसरे को अनार. व्यक्ति दोनों का मन रखने के लिए एक दिन केले लेकर आता है, दूसरे दिन अनार. इस तरह उसके किसी एक दिन केला या अनार लाने की संभावना 0.5 अर्थात 50 प्रतिशत होगी. पापा केला लाएंगे या अनार, यह बात बच्चे भी जानते हैं. एक दिन भाई-बहन छत पर थे कि पापा को हाथ में थैला लिए आते देखा. दोनों बच्चे बहस करने लगे—

‘आज पापा केला लाए हैं.’

‘नहीं अनार.’

‘पापा का फोन आया था, उस समय वे केले वाले के पास खड़े थे.’

‘तो क्या हुआ, जरूरी थोड़े ही पापा केले वाले के पास से केला लेकर ही आएं. वे केला बेचनेवाले से मना करके अनार वाले के पास भी जा सकते हैं.’

‘पापा जिस ठेली के पास खडे़ होते हैं, वहीं से फल खरीद लेते हैं.’

‘हमेशा ऐसा नहीं होता. एक बार मैंने स्वयं पापा को केले वाले को छोड़ अनारवाले के पास जाते हुए देखा था.’

अब मान लीजिए जहां से उन बच्चों के पिता फल खरीदते हैं, वहां केवल दो फलवाले खड़े होते हैं. उनमें से एक अनार बेचता है और दूसरा केला, तो जो बच्चा अपने पक्ष में अतिरिक्त तर्क दे पाएगा, उस दिन उस फल को लाने की संभावना उतनी ही बढ़ जाएगी. अनविन का 50 प्रतिशत वाला विचार यही कहता है. मान लीजिए लोगों से पूछा जाए कि ईश्वर है? कुछ लोग कहेंगे—‘हां’, कुछ कहेंगे—‘नहीं.’ जरूरत इस कवायद की भी नहीं है. आप एक सिक्का लीजिए, उछालिए. हेड और टेल आने की प्रायिकता बराबर होगी. अनविन ईश्वर न होने की संभावना को किनारे कर, शेष पचास प्रतिशत को उसके पक्ष में प्रमाण मान लेता है. यही उसके अनुसार ईश्वर की आधार प्रायिकता है. इस 50 प्रतिशत को 67 प्रतिशत तक पहुंचाने के लिए वह आगे भी ऐसी ही पूर्वापेक्षाओं का सहारा लेता है. जबकि बायस संभावनाओं की पड़ताल के लिए स्थितिजन्य साक्ष्य प्रस्तुत करता है. ठीक ऐसे ही जैसे कोई चतुर पुलिस अधिकारी किसी घटना की पड़ताल करता है.

कल्पना कीजिए प्लेटफार्म पर उतरता हुआ कोई आदमी चलती ट्रेन में खिड़की के बराबर बैठे एक पुरुष को अपने सहयात्री से बातचीत करते हुए देखता है. इससे पहले कि वह दूसरे व्यक्ति को पहचान पाए कि वह स्त्री है अथवा पुरुष, ट्रेन आगे बढ़ जाती है. दृष्टा इतना तो जान चुका है कि खिड़की के बराबर में बैठा यात्री पुरुष था. लेकिन जिससे वह बात कर रहा था, वह पुरुष भी हो सकता है, स्त्री भी. उसके स्त्री अथवा पुरुष होने की प्रायिकता बराबर, अर्थात पचास प्रतिशत होगी. अब यदि कोई तीसरा व्यक्ति दृष्टा से उन यात्रियों के बारे में पड़ताल करना चाहे तो उनकी बातचीत कुछ इस प्रकार होगी—

‘अच्छी तरह याद करके बताओ, दूसरा व्यक्ति पुरुष था अथवा स्त्री?’

‘मुझे याद नहीं आ रहा.’

‘ठीक है, दिमाग पर जोर डालो, याद करने की कोशिश करो. तुमने उसके बाल तो देखे ही होंगे. वे लंबे था या छोटे?’ पड़ताल कर रहा व्यक्ति अपनी तकनीक आजमाता है. जांचकर्ता का तर्क उसके ठोस अनुभवों पर आधारित है.

‘लंबे.’ दृष्टा को याद आता है. जांच करने वाला जानता है कि सामान्यतः स्त्रियां लंबे बाल रखती हैं. लेकिन सभी स्त्रियां बाल नहीं रखतीं. औसतन कितनी स्त्रियां लंबे बाल रखती हैं, इसके आंकड़े उसके पास हैं. यदि नहीं तो जुटाए जा सकते हैं. वह प्राप्त आंकड़ों से मिलान करके देखता है. लंबे बाल रखनेवाले हर चार व्यक्तियों में से आमतौर पर एक पुरुष होता है, तीन स्त्रियां. वह हिसाब लगाता है. उसके अनुसार जिस व्यक्ति से वह बातचीत कर रहा था उसके स्त्री होने की संभावना चार में से तीन, यानी 75 प्रतिशत है. प्रायिकता को बढ़ाने के लिए जांचकर्ता कुछ और सवाल कर सकता है. जैसे क्या उसने हाथ रचाए हुए थे? ऐसे साक्ष्यों के साथ प्रायिकता में आनुपातिक रूप से वृद्धि अथवा कमी आती जाएगी. बा॓यस के सूत्र का यही आधार है. इसी को विस्तार देते हुए वह स्थिति-विशेष के समर्थन में साक्ष्य जुटाता है और विशुद्ध गणितीय पद्धति का अनुपालन करते हुए सामान्य निष्कर्ष तक पहुंचता है.

बा॓यस के अनुसार यदि हम मान लें कि बातचीत स्त्री ‘स’ के साथ हो रही थी, तब यह मानते हुए कि समाज में स्त्री-पुरुष की संख्या लगभग बराबर है, बगैर किसी गहराई में जाए मान सकते हैं कि सहयात्री के स्त्री होने की प्राथमिक संभाव्यता सप्रथम= 0.5 होगी. जिसका आशय है कि पुरुष की बगल में बैठे सहयात्री के स्त्री अथवा पुरुष होने की संभावना बराबर-बराबर है. यदि यह मान लिया जाए कि उस सहयात्री के बाल लंबे थे और आंकड़ों से यह सिद्ध हो कि प्रत्येक चार स्त्रियों में से तीन(75 प्रतिशत) लंबे बाल रखती हैं तो बा॓यस के अनुसार लंबे बालों के आधार पर पुरुष के सहयात्री के, स्त्री होने की संभावना सलंब/म = 0.75 होगी. इसे बायस ने सशर्त प्रायिकता कहा है. अर्थात वह प्रायिकता जो घटना के लक्षणों तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार से तय होती है. ऐसे ही जैसे मान लीजिए कि 25 प्रतिशत पुरुष लंबे बाल रखते हैं तो उपर्युक्त घटना में सहयात्री के लंबे बालों के आधार पर पुरुष होने की संभावना स/पु= 0.25 होगी. यहां यह मान लिया गया है कि बातचीत केवल स्त्री अथवा पुरुष के साथ हो रही थी, अन्य किसी प्राणी के साथ नहीं. बायस इससे अंतिम संभाव्यता अथवा कुल लाक्षणिक संभाव्यता को जानना चाहता है. इसके लिए वह निम्नलिखित सूत्र देता है—

                                                   सप्रथम x   सलंब/म

                     सअंतिम       =         ……………………….

                                                            स

                                                                     (स = कुल संभाव्यता)

                                                     सप्रथम x   सलंब/म

                                =       …………………………………………

                                             सप्रथम x   सलंब/म +   सप्रथम x स/पु

                                                0.75 x 0.50                        0.375

                                =   …………………………………… =     …………….

                                           0.50 x 0.75 + 0.50 x 0.25         0.500

                                                                                     = 75 % लगभग

इस तरह लंबे बाल के साक्ष्य के आधार पर उपर्युक्त उदाहरण में सहयात्री के स्त्री होने की संभावना 50% से बढ़कर 75% हो जाती है. साक्ष्यों की संख्या तथा उनकी कोटि का प्रभाव संभाव्यता के स्तर पर पड़ता है. डा॓क्टर रोगी से तथा पुलिस मुजरिम से जांच-पड़ताल के दौरान इसी तरह संभाव्यता को आगे बढ़ाती जाती है. अनविन उसी सूत्र को ईश्वर की संभाव्यता पुष्ट करने के लिए अपनाता है. बा॓यस के सूत्र को ईश्वर की परिगणना के लिए आधार बनाते समय अनविन यह दावा कतई नहीं करता कि उसने जो सूत्र दिया है, उससे सभी सहमत होंगे. वह स्वयं मानता है कि विज्ञान और गणित के माध्यम से ईश्वर की संभाव्यता को सिद्ध करना बहुत मुश्किल भरा काम है. उसका बस इतना दावा है कि वे लोग जो ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखते हैं, उसके तथाकथित गणितीय सूत्र का सहारा लेकर अपने मत को बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर सकते हैं. वह जानता है कि उसके निष्कर्षों से लोग अपनी मान्यताएं बदलने को राजी नहीं होंगे. इसलिए अपने बचाव हेतु वह पर्याप्त संभावनाएं पहले ही सोच कर चलता है. कहने की आवश्यकता नहीं कि ईश्वरवादियों को अनविन के तर्क अपनी आस्था के प्रति चमत्कारी समर्थन प्रतीत होते हैं. ईश्वर की आधार-संभावना(सपूर्व = 50 प्रतिशत) तय कर लेने के पश्चात, बा॓यस के सूत्र में किंचित संशोधन के साथ वह अपना सूत्र प्रस्तुत करता है. निष्कर्ष संभाव्यता(सपश्चात) तक पहुंचने के लिए अनविन द्वारा प्रयुक्त सूत्र निम्नवत है—

                                                               सपूर्व x द

                सपश्चात            =                  ………………………….

                                                                सपूर्व x द + 1—सपूर्व

अनविन के अनुसार ‘द’ दिव्यता सूचकांक है. वह अपने दिव्यता सूचकांक को अलग-अलग अंक देकर गणना करता है. वे अंक भी अनविन द्वारा प्राकल्पित हैं. अलग-अलग स्थितियों के अनुरूप अनविन द्वारा प्रकल्पित दिव्यता सूचकांक निम्नलिखित हैं—

  1. पहली स्थिति में यह मानते हुए कि ईश्वर है और अकाट्य रूप से है, उसके विरोध के समस्त तर्कों को नकारते तथा पक्ष की प्रत्येक संभावना को स्वीकारते हुए वह दिव्यता सूचकांक ‘द’ को उच्चतम 10 अंक देता है. इससे वह दर्शाना चाहता है कि ईश्वर है और दस बार है.

2 दूसरी गणना के लिए वह यह मानते हुए कि ईश्वर है, एक नहीं दो बार है, वह दिव्यता सूचकांक ‘द’ को 2 अंक देता है.

  1. तीसरी गणना में वह दिव्यता सूचकांक को केवल 1 अंक देता है. इसका आशय है कि ईश्वर हो भी सकता है, नहीं भी.
  2. चौथी परिकल्पना में इस संभावना को मानते हुए कि ईश्वर नहीं है, वह दिव्यता सूचकांक को मात्र 0.5 अंक देता है.
  3. पांचवी स्थिति में वह दिव्यता सूचकांक ‘द’ को 0.01 अंक देता है. उस संभावना को और बढ़ा लेता है, जो मानती है कि ईश्वर नहीं है.

दिव्यता सूचकांक को तय करने का अनविन का अलग मापदंड हैं. सांख्यिकी आंकड़ों के साथ साक्ष्य पर भी विश्वास करती है, जबकि अनविन के यहां ऐसा कुछ भी नहीं है. दिव्यता सूचकांक के अलग-अलग निर्धारण हेतु वह पुनः प्रतिज्ञप्तियों की कल्पना करता है. जाहिर है ये प्रतिज्ञप्तियां आस्था के आधार गढ़े गए उसके छह भिन्न स्तर हैं—

  1. शुभत्व(द=10): अंकों के आधार पर यदि ध्यान से देखा जाए तो शेष संभावनाओं के मुकाबले यह शक्तिशाली संभावना है. कम से काम तुलनात्मक अंकों के आधार पर. यह कुछ ऐसा ही है कि तराजू के एक पलड़े में एक भारी-भरकम पत्थर तथा दूसरे में बिल्ली, खरगोश, चूहा, बकरी, बंदर को एक साथ चढ़ाकर यह निष्कर्ष निकाल लिया जाए कि वह पत्थर जंगल के सभी जानवरों से अधिक वजनदार है.
  2. सामान्य बुराइयां: यानी ऐसी बुराइयां जिनका होना समाज की विकास प्रक्रिया को गति देने के लिए आवश्यक है(द=0.5).
  3. प्राकृतिक बुराइयां : जैसे जंगलराज की स्थिति, महामारी आदि. जंगल में शक्तिशाली प्राणी अपने से छोटे प्राणी को खा जाता है. महामारी से मासूम बच्चे तक चल बसते हैं. यह नैतिकता की दृष्टि में अपराध है. यद्यपि जंगल में उत्तरजीविता के नियम के चलते यह स्वाभाविक अवस्था है. अनविन इसके लिए दिव्यता सूचकांक को 0.1 अंक देता है.
  4. आध्यात्मिक अनुभूतियां/अंतःप्राकृतिक चमत्कार : जैसे पूजा-पाठ, प्रार्थना, अंतरानुभूति आदि. जिससे मनुष्य को अपने अंतर्मन में झांकने से शांति की अनुभूति होती है(द=2).
  5. धार्मिक अनुभूतियां : स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित कर देने के बाद इस प्रकार की अनुभूतियां कथित रूप से साधक को होती रहती हैं. अनविन इसे भी 2 अंक देता है.
  6. पुनर्जीवन /पराभौतिक चमत्कार : धर्म की नींव मृत्यु पश्चात सुख की लालसा पर टिकी हुई है. अधिकांश धर्मों में माना गया है कि मनुष्य मरने के बाद पुनः जन्म लेता है. इस चमत्कारपूर्ण धारण को अनविन अपने दिव्यता सूचक पैमाने पर मात्र 1 अंक देता है.

उपर्युक्त दिव्यता सूचकांकों को वह अपने सूत्र अलग-अलग रखकर गणना करता है. तदनुसार—‘ईश्वर के होने की प्रायिकता 67 प्रतिशत सिद्ध होती है.’ आगे वह जोर देकर कहता है, ‘यह संख्या व्यक्तिपरक है. इसलिए कि यह मेरे निजी साक्ष्यों के आकलन पर आधारित है.’ उदारता का प्रदर्शन करते हुए वह कहता है कि सूचकांकों को प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने हिसाब से आकलित कर सकते हैं. मगर उस अवस्था में अनविन का सूत्र लड़खड़ा जाता है. ‘साइंटिफिक अमेरिकन’ पत्रिका के जुलाई 2004 अंक में प्रकाशित एक आलेख में Skeptic के प्रकाशक मिशेल शर्मर अनविन के दिव्यता सूचकांकों को 1 से 10 अंक अपनी ओर से देते हैं. फिर उसी सूत्र के आधार पर ईश्वर की संभाव्यता का आकलन करते हैं, तो वह घटकर मात्र 2 प्रतिशत रह जाती है. एक अन्य गणना का उल्लेख पुस्तक की आलोचना के दौरान बा॓ब सीडेंस्टकर ने अपने लेख ‘कंप्यूटिंग दि प्रोबेबिलिटी आ॓फ गा॓ड’ में किया है. बा॓ब अनविन के दिव्यता सूचकांक में जैसे ही ऐच्छिक मान रखता है, ईश्वर की संभाव्यता और भी घटकर नगण्य(10—16) तक रह जाती है.

स्पष्ट है कि अनविन का आकलन उसकी व्यक्तिगत धारणा की अभिव्यक्ति है. हालांकि उसने कभी दावा नहीं किया कि वह ईश्वर को वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित कर रहा है. और कोई भी उसको जांचकर वैसे ही निष्कर्ष पर पहुंच सकता है, जैसा कि दूसरे वैज्ञानिक प्रयोगों में होता है. इस पुस्तक को एक-दो को छोड़कर अधिकांश आलोचकों ने मजाक के रूप में लिया है. उनके अनुसार यह पुस्तक गणित के लिए पढ़ी जा सकती है, मनोरंजन के लिए पढ़ी जा सकती है, यदि आप ईश्वर के अस्तित्व पर भरोसा करते हैं, तब थोड़ी-बहुत तसल्ली के लिए पढ़ी जा सकती है. लेकिन यदि आप किसी दार्शनिक समस्या का समाधान इससे चाहते हैं, तब वह व्यर्थ की कवायद सिद्ध होगी. पुस्तक के समीक्षकों में से एक हेमंत मेहता लिखते हैं—‘पढ़ने में मजेदार. वैचारिकी का आश्चर्यजनक प्रयोग….अनविन को ऐसे लोगों की ओर खड़ा कर देता है, जिनका गणित से कोई वास्ता नहीं है.’ अनविन अपनी धारणाओं को लादने के लिए गणित का सहारा लेता है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर बच निकलने का रास्ता भी तैयार रखता है. यह कोशिश कृति को मनोरंजक प्रयोग से आगे नहीं बढ़ने देती. बा॓यस के सूत्र का उपयोग चिकित्सा से लेकर अपराध-जांच तक कहीं भी किया जा सकता है, जहां प्रायिकता को बढ़ाने के लिए ठोस साक्ष्य उपलब्ध हों. जबकि अनविन के दिव्यता सूचकांक का कोई तार्किक आधार नहीं है. वह केवल उसकी मनोरचना है, जिसे उसने बेहिचक स्वीकारा भी है. उल्लेखनीय है कि विज्ञान को धर्म से जोड़ने अथवा धर्म और विज्ञान का साम्य दिखाने की कोशिश करनेवाले अनविन अकेले नहीं हैं. इस विषय पर पिछली दशाब्दियों में और भी पुस्तकें आई हैं. उनमें स्टीवन ब्रम्स की ‘सुपीरियर बीईंग्स : इफ दे एक्जिस्ट’, रिचर्ड दाकिन की ‘दि गार्ड डिल्यूजन’ आदि प्रमुख हैं. इनमें किसी न किसी प्रकार ईश्वर के विचार को विज्ञान से जोड़ने की असफल कोशिश की गई है.

अनविन के इस आत्मपरक लेखन के कई सामाजिक पहलु भी हैं. दिव्यता सूचकांक में शुभता को ईश्वर में स्थापित करना मनुष्यता के रास्ते अवरुद्ध करने जैसा है. आज हम पूंजीवादी अर्थतंत्र पर आरोप लगाते हैं कि उसने मनुष्य को भौतिकवादी बना दिया है. इतना स्वार्थी बना दिया है कि मनुष्य को सिवाय अपने सुख के, भोग और स्वार्थ-लिप्सा के कुछ भी नजर नहीं आता. इसी आधार पर अपसंस्कृतिकरण का रोना भी रोया जाता है. उस समय हम भूल जाते हैं कि जिसे हम बाजारवाद की देन बताते हैं, वैसी स्वार्थपरता, अकेले-अकेले सुख पाने की कामना का उपदेश तो धर्म सहस्राब्दियों से देता आया है. धर्म की ओर प्रवृत्त करने के लिए गुरु आमतौर पर अपने शिष्यों को समझाता है—‘यह संसार माया है. इसमें कोई भी तुम्हारा अपना नहीं है. भाई, बहन, पत्नी, माता-पिता, सभी से तुम्हारा स्वार्थ का नाता है. वे भी तुमसे स्वार्थ से बंधे हैं. कोई तुम्हारा साथ नहीं देने वाला. इसलिए यदि स्वर्ग का सुख पाना है, तो इस मोह-ममता को त्याग कर परमात्मा की शरण में आ.’ थोड़े-बहुत फेरबदल के साथ गीता में कृष्ण ने यही कहा है. गीता निष्काम कर्म का संदेश देकर उसे संतुलित करने का प्रयास करती है. केवल अपने लिए सुख-समृद्धि और स्वर्ग की कामना, अनेक बार मनुष्य को सामाजिक दायित्वों की ओर से उदासीन बनाकर, घोर स्वार्थी आचरण की ओर प्रवृत्त कर देती है. दूसरे केवल अपने सुख की कामना तथा स्वार्थसिद्धि के लिए काम करना, सामाजिक नैतिकता को बिसार देना है. यह भुला देना है कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है. भले ही वह समाज में अपने सुख और सुरक्षा के लिए शामिल हुआ हो, समाज के प्रति उसकी भी पर्याप्त जिम्मेदारियां हैं. प्रकट में प्रत्येक धर्म अपने माता-पिता, पड़ोसी, मित्र-सखा के प्रति उदारतापूर्वक पेश आने की सलाह देता है. लेकिन मोक्ष एवं कल्याण के नाम पर वही धर्म संसार को माया और विभ्रम बताकर मनुष्य को ऐसी अंध-स्पर्धा से जोड़ देता है, जिसकी अति उसे सामाजिक कर्तव्यों की ओर से उदासीन बनाती है. इसलिए हम देखते हैं कि भारत जैसे समाजों जहां सामान्य नैतिकता को भी धर्म के भरोसे छोड़ दिया जाता है, नागरिकबोध बहुत कम होता है. पूरा समाज एक भीड़ के आचरण को अपने स्वभाव का हिस्सा बना लेता है.

फिर एक अवैज्ञानिक कार्य को विज्ञान जितना महत्त्व दिए जाने का कारण? दरअसल, आस्तिक को उतना डर धर्म, ईश्वर या पापकर्म से नहीं लगता, जितना नास्तिक से लगता है. उस विचार से लगता है, जो ईश्वर को नकारता है. इसलिए जब भी वह किसी नास्तिक को देखता है, नकलीपन का एहसास उसे कचोटने लगता है. वह उसे बार-बार उकसाता है—‘अरे! यह ईश्वर को नहीं मानता! अगर नहीं मानता तो जीवित कैसे है?’ सामंती समाजों के देवता और भी बड़े सामंत होते हैं. देवत्व की अवमानना करने, यहां तक कि प्रसाद तक न खाने अथवा प्रसाद लेकर उसको खाना भूल जाने से भी उनकी त्योरियां चढ़ जाती हैं. आस्तिक यही सोचकर हैरान होता है कि ऐसे कोपवंत देवताओं के चलते उनके अस्तित्व को नकारनेवाला धरती पर सुरक्षित कैसे है? जरूर वह दिखावा करता है. अगर यह सचमुच ईश्वर को नकारता है तब तो ईश्वर का कोप उसे सताएगा ही. उस समय मैं भी इसका साथी न मान लिया जाऊं? ऐसे न जाने कितने अनजाने भय उस व्यक्ति को घेर लेते हैं. पक्ष में दिखने के लिए वह ईश्वर पर सवाल उठाने की संभावना को ही धिक्कारने लगता है. फिर चाहे कोई कितना ही कहे कि वह नास्तिक है—वह विश्वास ही नहीं करता. लोग यह मानने को तैयार ही नहीं होते कि नास्तिक होना भी भारतीय दर्शन-परंपरा का हिस्सा है. उस समय सौ में से अस्सी का एक ही जवाब होता है—‘हं…हं! नास्तिक में भी तो अस्तिः(नः+अस्तिः) छिपा हुआ है. उस समय कोई लाख तर्क दे कि ‘‘भइया, ‘अस्तिः’ को नकारने के लिए ही ‘नः’ उपसर्ग लगाया गया है.’’—बात उनके गले नहीं उतरती. जिद पर कायम रहने के लिए ईश्वरवादियों के रटे-रटाए तर्क होते हैं. उनके दिमाग की सुई हजार-दो-हजार साल पहले के समय पर अटकी होती है, जब साम्राज्यवादी लालसा में दर्शन का धार्मिकीकरण कर मनुष्य के सहजबोध को उससे बांध दिया गया था.

ईश्वरवादियों का दूसरा तर्क होता है, इस दुनिया को किसी ने तो बनाया है! वही शक्ति ईश्वर है. फिर ईश्वर को किसने बनाया है? ईश्वर को भला कौन बनाएगा? वह तो अनादि-अनंत और सर्वशक्तिमान है. यही बात हम इस सृष्टि के लिए कहें तो? कार्य-कारण का उनका नियम ईश्वर तक जाकर ठहर जाता है. उससे पीछे ले जाने में उनके पसीने छूटने लगते हैं. यदि उनपर जोर डाला जाए, कहा जाए कि यदि ईश्वर अनादि-अनंत हो सकता है तो सृष्टि क्यों नहीं? यदि ब्रह्मांड का विस्तार ही कल्पनातीत है तब उसके कथित निर्माता की कल्पना कैसे संभव है? उस समय बहस से कन्नी काटते हुए वे सृष्टि को ही ईश्वर मान लेंगे. यानी चिपके अपनी बात से रहेंगे. डरे हुए लोग ठहरे. उनका डर उनके किस पापबोध की परिणति है, वे जानें. विज्ञान और धर्म के रास्ते एकदम अलग हैं. विज्ञान संदेह का रास्ता है. ईश्वर आस्था का मसला. दिमाग की सुई एक जगह ठहर जाए, तब आदमी धार्मिक कहलाता है. उदाहरण के लिए इन दिनों भारत की ओर से भेजा गया मंगलयान रास्ते में है. सब कुछ ठीक ठाक रहा तो अगले कुछ दिनों में मंगल की कक्षा में होगा. मान लीजिए उस यान को किसी सुदूर ग्रह पर बैठा ऐसा व्यक्ति देखे जिसके दिमाग की सुई रामायण काल पर अटकी हुई है तो वह यही कहेगा—देखों धरती से फेंगी गई पवनपुत्र हनुमान की गदा आसमान में उड़ रही है.’ ऐसे ही दूसरा व्यक्ति जो किसी कारणवश महाभारत युग पर अटका हुआ है, उसे भीम की गदा बताएगा. इसे आप मजाक की तरह भी ले सकते हैं. लेकिन अशोक की लाट को भीम की गदा बतानेवाले लोग भी इसी देश-समाज में होते आए हैं.

अतिप्राचीन समाजों में धर्म की चाहे जो प्रासंगिकता रही हो, आज वह सामाजिक भेदभाव और ऊंच-नीच का कदाचित सबसे बड़ा मददगार है. शीर्षस्थ वर्गों के साम्राज्यवादी मंसूबों ने धर्म को राजनीति और समाज में प्रासंगिक बनाए रखा. करीब ढाई-तीन हजार वर्ष पहले यह महसूस किया जाने लगा था कि छोटे-छोटे राज्यों से काम नहीं चलनेवाला. हमलावर दुश्मनों से सुरक्षा के लिए बड़ी ताकत बनना होगा. ऐसे में धर्म ने आसंजक और संसजक दोनों का काम किया. इस अवधि में कुछ अच्छे परिणाम भी धर्म के कारण देखने को मिले. भौतिकता की आड़ के रूप में वह अनेक व्यक्तिगत और सामाजिक तनावों को कम करने का माध्यम बना है. धर्म का औचित्य बनाए रखने के लिए उसको नैतिक मूल्यों से जोड़ा गया था, लेकिन बाद में उन्हें धर्म का पर्याय बताना आरंभ कर दिया. उसकी सबसे बड़ी भूमिका सामजिक-आर्थिक और राजनीतिक विभाजन को शास्त्रीय रूप देने में रही, जिससे कालांतर में बड़े आर्थिक-सामाजिक विभाजनों को जगह मिली. धर्म का अतिवादी रूप महाभारतकाल में भी दिखाई पड़ता है, जब आर्यवर्त पर एकक्षत्र राज्य कायम करने के लिए कृष्ण चतुराई पूर्वक समस्त आर्यवर्त के राजाओं को परस्पर लड़वा देते हैं. सभी छोटे-बड़े राजा खेत रहते हैं. कौरवों को पराजित कर, देर-सवेर पांडव भी महाप्रयाण पर चले जाते हैं. आगे चलकर कुछ ऐसी ही कोशिश चाणक्य के नेतृत्व में नजर आती है.

सवाल है कि यदि कि विज्ञान ही सबकुछ है तो जीवन, मृत्यु जैसे प्रश्न अनुत्तरित क्यों हैं. इसके अलावा भी ऐसे अनेकानेक प्रश्न हैं जिनका उत्तर विज्ञान नहीं दे पाया है. लेकिन विज्ञान ने कभी दावा भी नहीं किया कि उसने सबकुछ जान लिया है. धार्मिक प्रवृत्ति के लोग दुनिया के सारे ज्ञान को परमात्मा में अवस्थित मान लेते हैं. धीरे-धीरे अधिकांश के लिए यह परमात्मा को प्रसन्न रखने का कर्मकांड बन जाता है. धीरे-धीरे वह सुबह-शाम की आरती में सिमट जाता है. ऐसे आस्थावादी समाज में लोग 24—25 पृष्ठ रटकर सत्यनारायण की कथा सुनाने वाले पुरोहित को ‘पंडित’ मान लें, तो आश्चर्य कैसा! वैज्ञानिक को अपने ज्ञान का कभी गुमान नहीं होता. सच्चा वैज्ञानिक भली-भांति जानता है कि उसका अज्ञान उसके ज्ञान कहीं अधिक बड़ा है. इसलिए वह निरंतर और जानने के लिए प्रयासरत रहता है. अपने ही ज्ञान पर निरंतर संदेह करता है. इसी में उसकी सिद्धि है. इसके लिए विज्ञान की आलोचना करना उचित नहीं. अनसुलझे सवालों के उत्तर की खोज के लिए वैज्ञानिकों को पर्याप्त समय देना होगा. यूं भी सृष्टि की उम्र छोडि़ए, पृथ्वी की आयु के समक्ष भी विज्ञान की उम्र शिशु जितनी नहीं है. इस बारे में अमेरिकी लेखक हावर्ड बूस फ्रेंकलिन ने एक मजेदार उदाहरण दिया है—

‘‘पृथ्वी की उम्र लगभग साढ़े चार अरब है. हिम युग को पूरी तरह समाप्त हुए लगभग 10000 साल हुए हैं. तदनुसार पृथ्वी की उम्र हिम युग बीतने की अवधि के लगभग 4,50,000 गुना अधिक है. इसे समझने के लिए हम एक तस्वीर की कल्पना करते हैं. हम मान लेते हैं कि पृथ्वी की उम्र 45,000 फुट के समतुल्य है ठीक उतनी ही जिसपर कोई जेट वायुयान उड़ान भर सकता है. उस पैमाने पर यदि हिम युग की अवधि को दर्शाया जाए तो वह मात्र 1.2 इंच को दर्शाएगा. अब यदि आधुनिक विज्ञान के अवधि, जब उसने तकनीक और प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में कदम रखा, मात्र 200 वर्ष पुरानी घटना है. वह हमारे पैमाने पर मात्र 0.024 की ऊंचाई को दर्शाएगी. यह इतनी बारीक रेखा होगी, जैसे मामूली बाल पाइंट पेन द्वारा खींची गई रेखा की मोटाई.’’

सत्य से परे होने के बावजूद मैं अनविन के प्रयासों की सराहना करूंगा. उन्होंने ईश्वरत्व को गणित के आधार पर आकलित करने का विचार तो दिया. आगे और लोग भी आएंगे. जिसके फलस्वरूप पारंपरिक धर्म ने अपने चारों ओर जो बाड़ें लगाई हैं, वे कमजोर होंगी; तथा धर्म की वैज्ञानिकता पर बहस का सिलसिला आगे बढ़ेगा. तब शायद लोग महाभारत के इस सत्य को स्वीकारने को राजी हो जाएं—

गुह्यं ब्रह्म तदिदं वो ब्रीवीमि। न हिं मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचितः। (महाभारत, शांतिपर्व, 299/20)—एक बात बताता हूं, संसार में मनुष्य से श्रेष्ठ, मनुष्य के लिए मनुष्य से उपयोगी कुछ भी नहीं है. सच मानिए, ईश्वर भी नहीं.

[पुनश्चः: मुझे एक बात जानकर हैरानी होती है कि धर्म के नाम पर, अपने समय के शीर्षस्थ महारथियों, अठारह अक्षौहिणी सेना, देवता-राक्षस तथा यादव कुल का विनाश लिख देने के पश्चात महाभारतकार ने कानाफूसी के अंदाज में ही क्यों कहा कि ‘इस संसार में मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है.’ युद्ध में अपनों से लड़ाई छेड़ने के लिए अर्जुन को उकसानेवाले कृष्ण भी इस ‘परमसत्य’ को लोगों से छिपा ले जाते हैं और गीता इससे वंचित रह जाती है. अगर यह उपदेश पहले ही दे दिया होता तो क्या युद्ध होता? प्रजा यदि जानती कि मनुष्य के लिए एकमात्र श्रेष्ठतम मनुष्य है तो क्या वह दूसरों के कहने पर अपनों का गला काटने को तैयार होती? हरगिज नहीं! दरअसल शिखर पर विराजमान लोगों के लिए केवल वही मनुष्य होते हैं, जो उनके सगे या सत्ता के आसपास होते हैं. बाकी या तो सेवक होते हैं अथवा प्रजा. वे सुन न लें, इसलिए अच्छी बात हमेशा चुपके-चुपके कानाफूसी के अंदाज में, केवल अपनों के बीच कही जाती है, और उकसाने की जरूरत आ पड़े तो ‘धर्म-धर्म चिल्लाया जाता है.]

© ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com

अराजकतावादी दर्शन और केजरीवाल का ‘स्वराज’

सामान्य

ऐसा चाहूं राज मैं यहां मिले सभन को अन्न
छोटे-बड्डे सभ सम्म बसें, रविदास रहे प्रसन्न
रविदास

अरविंद केजरीवाल स्वयं को अराजकतावादी मानते हैं. उनकी नीयत पर संदेह करने की मेरी कोई मंशा नहीं है. कुछ दिनों पहले उनके द्वारा केंद्र सरकार के विरोध में दिए गए धरने और जनलोकपाल बिल को लेकर केंद्र को चुनौती देने, गैस दोहन जैसे मामलों में मुकेश अंबानी सहित तीन केंद्रीय मंत्रियों के विरुद्ध एफआईआर की सिफारिश करने जैसे मामलों से उन्होंने सिद्ध भी किया है कि वे लोकतंत्र के परंपरागत ढांचे में विश्वास नहीं करते. अपनी मांगों के समर्थन अति की सीमा तक जा सकते हैं. मैं यह भी कहना चाहता हूं कि जनतंत्र में जिदें नहीं जनसहमति चलती है. इसके बावजूद यदि केजरीवाल स्वयं को अराजकतावादी मनवाने पर तुले हैं, तब मेरे सामने यह मान लेने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है कि खुद को अराजकतावादी घोषित करने अथवा वैसा आचरण करने से पहले उन्होंने इस दर्शन को भली-भांति पढ़ लिया होगा. मेरी अपेक्षा अन्यथा भी नहीं है. वे विनम्र हैं, सुशिक्षित हैं. जनलोकपाल आंदोलन तथा चुनावी सभाओं में भाषण के जरिये उन्होंने लोगों के मन पर जो छाप छोड़ी है, उससे इसमें कोई संदेह नहीं कि वे पूर्ण अराजकतावादी भले न हों, किंतु लोकतांत्रिक आस्था से गहरे जुड़े हैं. यदि यह निष्ठा आगे भी बनी रही तो जनता का प्यार और विश्वास निस्संदेह आगे भी उनमें बना रहेगा. जिद और संकल्प के बीच न्यूनतम दूरी रखने की उनकी राजनीतिक शैली को देखकर अराजकतावाद नए सिरे से विमर्श में आया है. यह बात अलग है कि कतिपय पूर्वाग्रहों के कारण हमारे यहां अ-राजकता को अच्छे अर्थों में नहीं लिया जाता. प्रायः उसे अव्यवस्था, अशांति, उपद्रव-ग्रस्त राज्य तथा शासन की नाकामी का पर्याय मान लिया जाता है. ऐसे में यदि कोई मुख्यमंत्री स्वयं को खुलेआम अराजकतावादी कहता है, तो वह अलोकप्रिय होने का खतरा उठाता है. साथ ही विपक्षी दलों को अवसर देता है कि अराजकता और अराजकतावाद के बारे में प्रचलित जन-पूर्वाग्रहों का लाभ उठाकर उसकी छवि को मलिन करने की कोशिश कर सकें. इस आधार पर केजरीवाल की खूब आलोचना भी हुई है. लेकिन यहां बात व्यक्तिगत प्रशंसा या आलोचना की नहीं, अराजकतावाद को लेकर है. अराजकतावाद अंग्रेजी राजनीतिक दर्शन ‘अनार्की’ का पर्याय है. जिसका सामान्य अर्थ है—‘बिना राजा का राज्य.’ यह विचार लगभग उतना ही पुराना है, जितना समाज. यह आश्चर्यजनक सत्य जैसी स्थिति है कि अ-राजकता राज्य से पहले ही अवस्था है. अराजकतावाद के आलोचक यह भी भूल जाते हैं कि लाला हरदयाल, सरदार भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के अलावा गांधी और जयप्रकाश नारायण जैसे बड़े नेता जिनकी लोकतांत्रिक निष्ठा असंद्धिग्ध थी, ने भी स्वयं को समय-समय पर अराजकतावादी घोषित किया था. क्रांतिकारी ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए अराजकतावाद का नारा देते थे तो गांधी समेत आधुनिक नेता सर्वसाधारण से अपनी निकटता तथा उसके कल्याण से जुड़े मुद्दों के प्रति अपनी निष्ठा दर्शाने के लिए स्वयं को अराजकतावादी कहने का खतरा उठाते थे. प्रश्न उठता है कि क्या सचमुच अराजकता या अराजकतावाद अशांति, अव्यवस्था और सामाजिक उच्छ्रंखलता का प्रतीक है? क्या शासन के अधीन, चिर-शासित रहना ही मानव-नियति है?

राजनीतिक दर्शन के रूप में अराजकतावाद लोकतंत्र जितना ही पुराना, किंतु जनोन्मुखता को लेकर उससे आगे का परमलोकतंत्रवादी दर्शन है. यह मनुष्य की अच्छाई पर भरोसा करता है. मानता है कि मनुष्य मूलतः निष्कपट, न्यायप्रिय, शांतिप्रिय और विवेकवान प्राणी है. यदि उसके व्यवहार में गिरावट आती है, तो उसके पीछे समाज में व्याप्त असमानता, अविश्वास और अन्यायकारी स्थितियां हैं. परिस्थितियां अनुकूल हों, समाज में न्यायकारी और समानतापूर्ण वातावरण हो तो प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन को शांतिपूर्वक ढंग से बिताना पसंद करेगा. ऐसे में बाहरी शासन की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी. अराजकतावादी मानते हैं कि शासन अथवा कानून के नाम पर राज्य की उपस्थिति जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप है. ताकत का प्रतीक होने के कारण उसका झुकाव शक्तिशाली वर्गों की ओर होता है. इससे जनसाधारण के लिए मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं. उल्लेखनीय है कि शासन को लेकर यह समझ आज नहीं बनी. ईसापूर्व छठी शताब्दी में जन्मा चीनी विद्वान लाओत्से अराजकतावादी था. उसके शिष्य झुआंग्जी ने राजशाही और दूसरे सर्वसत्तावादी तंत्रों की आलोचना करते हुए लिखा था कि न्याय और कानून के नाम पर गठित अतिवादी राज्य, ‘मामूली चोर को जेल में डाल देता है, जबकि बड़े-बड़े डाकू, बटमार खुलेआम घूमते रहते हैं.’ पश्चिम के देश भी अराजकतावाद(अनार्की) की प्रशंसा के मामले में पीछे नहीं हैं. अराजकतावाद के उद्गम की खोज करते ‘क्रिश्चन अनार्किस्ट’ ईसा मसीह तक चले जाते हैं. जार्ज बुडकाक ने अपनी पुस्तक ‘अनार्किस्म: ए हिस्ट्री आ॓फ लिबरटेरियन आइडियाज एंड मूवमेंट’ में फ्रांसिसी इतिहासकार जार्ज लेकार्शियर को उद्धृत करते हुए लिखा है, ‘अराजकतावाद के वास्तविक संस्थापक ईसा मसीह थे. प्रथम अराजकतावादी समाज की स्थापना उनके अनुयायियों द्वारा की गई थी.’1 अराजकतावाद के माध्यम से राज्य नामक संस्था के निषेध के पीछे विद्वानों की यह धारणा रही है कि राज्यसत्ता का स्वरूप चाहे जैसा हो, उसकी निगाह अपने स्वार्थ से आगे नहीं जा पाती. सत्ता की अंतिम परिणति शोषण के रूप में सामने आती है. जितनी बड़ी सत्ता, उतना ही भयावह शोषण. उसके शोर में जनसाधारण की न्याय के लिए उठी आवाज नक्कारखाने में तूती बनकर रह जाती है. बीसवीं शताब्दी के महान मानवाधिकारवादी चिंतक थामस पेन ने राज्य का वैसा निषेध नहीं किया, जैसा अराजकतावादी करते थे, मगर उसने राज्य को एक आवश्यक बुराई स्वीकार किया—‘कुछ विद्वान समाज और सरकार दोनों को एक होने की भ्रांति पाल लेते हैं, अथवा दोनों के बीच बहुत कम अंतर कर पाते हैं. जबकि दोनों न केवल अलग हैं, बल्कि उनका उद्गम स्रोत भी अलग-अलग है. प्रत्येक राज्य में समाज मनुष्यता का आशीर्वाद है, लेकिन सरकार, भले ही सर्वश्रेष्ठ राज्य में क्यों न हो, एक आवश्यक बुराई है और निकृष्ट राज्य में तो वह असहनीय हो सकती है.’2

भारत में अराजकतावाद के समर्थक विद्वान उसकी खोज के लिए वेदों तक चले जाते हैं. वे दावा करते हैं कि लोकप्रशासन अथवा पूर्ण विकेंद्रीकृत राज्य के संकेतों की वैदिक साहित्य में भरमार है, ‘वेदों से पता चलता है कि बिलकुल आरंभिक काल में भी….राष्ट्रीय जीवन के सब कार्य सार्वजनिक समूहों और संस्थाओं आदि के द्वारा हुआ करते थे. इस प्रकार की सबसे बड़ी संस्था हमारे पूर्वजों की समिति थी.’ (हिंदू राजतंत्र: काशीप्रसाद जायसवाल). महाभारत के शांतिपर्व में युधिष्ठिर ने कहा है कि पहले न राजा था न राज्य. लोग मिल-जुलकर काम चला लेते थे. स्थानीय तंत्र इतना सुगठित था कि बाहरी प्रशासन की आवश्यकता ही नहीं थी. आशय है कि अराजकतावादी यानी ‘बिना राजा का राज्य’ एक प्राचीनतम अवधारणा है. इसका इतिहास सभ्यता के इतिहास जितना ही पुराना है. अराजकतावाद को सबसे सुंदर ढंग से थोरो ने अभिव्यक्त किया है—‘‘मेरा दृढ़ विश्वास है कि—सरकार वही सर्वोत्तम है जो न्यूनतम शासन करे. प्रत्येक सरकार को मैं इस रास्ते पर निरंतर प्रयत्नरत देखना चाहता हूं. उसका लक्ष्य उस ऊंचाई को प्राप्त करना होना चाहिए, जिसके बारे में मुझे विश्वास है कि—सरकार वही सर्वश्रेष्ठ है जो कतई शासन नहीं करती.’ नागरिकों को उसके लिए तैयार रहना चाहिए. सही मायने में वही ऐसी सरकार होगी, जिसको उन्हें प्राप्त ही चाहिए.’3

अराजकतावाद परिपक्व नागरिक तंत्र का पर्याय है. उसमें नागरिक आपसी समझौते, सहयोग और स्वेच्छा के आधार पर परस्पर जुड़े होते हैं. सभी का ध्येय होता है समेकित विकास. आपसी जरूरतों, भावनाओं का सम्मान करते हुए विकासरत रहना. फिर क्या कारण है कि लोग राज्य-सत्ता को अपरिहार्य मान लेते हैं? क्यों उन्हें लगता है कि बगैर राजा के राज्य चल ही नहीं सकता है? क्यों वे स्वयं को भेड़ मान लेते हैं, जिन्हें घेरने के लिए गड़हरिया का होना उन्हें जरूरी लगता है? क्या यह आत्मविश्वास की कमी है? क्या यह सत्ता के आगे समर्पण की भावना है, अथवा ऐसा ही कुछ और? सवाल यह भी है कि अराजकतावाद यदि लोकतंत्र से आगे की व्यवस्था है तो पिछली शताब्दियों में उसके समाजवाद, साम्यवाद यहां तक कि लोकतंत्र जैसी समानधर्मा विचारधाराओं के मुकाबले पिछड़ जाने की वजह क्या है? इसके अनेक कारण हो सकते हैं. उनमें से एक यह है कि समाज सहस्राब्दियों से शासक और शासित में बंटा रहा है. लंबे समय तक शासित-शोषित रहा मनुष्य, इस विभेदकारी व्यवस्था से अनुकूलन कर चुका है. निरंतर शासित होने से उसका आत्मविश्वास क्षीण हुआ है. ऊपर से शासकवर्ग, जिनमें धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक तीनों शक्तियां सम्मिलित हैं, द्वारा उसे बार-बार समझाया जाता है कि शांतिपूर्ण जीवन के लिए बाहरी नियंत्रण आवश्यक है! कि अकेला व्यक्ति सुरक्षित नहीं रह सकता! इस तरह वे अनजाने ही मानव-समाज की गरिमा पदावनत कर उसकी गणना पशु समाज के तुल्य रखकर करने लगते हैं. अपने समर्थन में वे उन मनोवैज्ञानिकों तर्कों का सहारा लेते हैं जिनका मानना है कि मनुष्य में नकारात्मक प्रवृत्तियां जन्मजात होती हैं. कि शासक होना जन्मजात गुण है. और जिनमें शासक होने की योग्यता नहीं है, शासित होना उनकी नियति है. उनपर नियंत्रण के लिए पुलिस और कानून बल आवश्यक है. ‘सद् रक्षणाय—खल निग्रहाय’ तथा ‘परित्राणाय् साधुनाम् विनाशाय् च दुष्कृताम्’ जैसे कथन, मनुष्य और उसकी स्वाभाविक अच्छाइयों पर इसी अविश्वास के चलते अस्तित्व में आए हैं. उसमें सुधार के बजाय दंड पर जोर दिया जाता है. वेदों में अनार्यों से समझौता या उनके सुधार की संभावना तलाशने के बजाय सीधे-सीधे उन्हें मिटा देने की प्रार्थनाएं इंद्र से की गई हैं. विभेदकारी व्यवस्था से अनुकूलन हेतु कभी धर्म का सहारा लिया जाता है, कभी राष्ट्र-भक्ति का तो, कभी विकास और सुख-शांति का. इस तरह सत्ता की मौजूदगी को सुख, शांति और सामाजिक विकास की आवश्यकता के रूप में देखने की सहस्राब्दियों लंबी परंपरा रही है. उसका जनमानस पर इतना गहरा प्रभाव है कि उनके बिना भी सफल नागरिक जीवन जिया जा सकता है, ऐसी कल्पना तक संभव नहीं लगती. यहां हम रूसो को याद करना चाहेंगे. उसका कहना था कि मनुष्य आजाद जन्मा है, लेकिन हर जगह वह बेड़ियों में है. इस कथन का निहितार्थ यह भी है कि मानवीय स्वतंत्रता की अवरोधक ये बेड़ियां राज्य और समाज द्वारा विनिर्मित होती हैं. ये ऐसे समाज के लिए बड़ी चुनौती हैं जो मानवाधिकारों के सम्मान का दावा करते हुए मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता को अधिकतम लौटा देना चाहता है. उनकी धारणा जान लाक, रूसो, बैंथम जैसे विचारकों की मान्यता के भी विपरीत है, जो बालक के मस्तिष्क को कोरी स्लेट, उसे निश्छल, निर्मैल्य, निष्पाप, निष्पक्ष, पवित्र आदि मानते थे. यूं भी नकारात्मक वृत्तियों को नैसर्गिक कहकर, उन्हें मानव-व्यवहार की स्थायी विशेषता मान लेना, मानव-व्यक्तित्व पर परिवेश के प्रभाव के साथ-साथ उसके आत्मोत्थान की संभावना तथा उसके लिए की जाने वाली नैतिकतावादी कोशिशों को भी नजरंदाज कर देना है. इसे अधिसत्तावादियों की चाल भी कह सकते हैं, जो मनुष्य से सामान्य जीवन और चयन के नैसर्गिक अधिकारों को पहले ही छीन लेती है. उस अन्याय से मनुष्य जब छटपटाता है, प्रतिकार की सोचता है तो उसके सोच और आजादी के लिए किए जाने वाले प्रतिकार को नकारात्मक कहकर उसका मनोबल गिराने की कोशिश की जाती है.

अराजकतावाद में शासन अथवा बाह्यः सत्तातंत्र का आकार सिकुड़ता जाता है. उसकी जिम्मेदारी सहयोगाधारित संस्थाएं एवं प्रबुद्ध नागरिक संगठन संभाल लेते हैं. आदर्श अराजकतावादी राज्य में शासनतंत्र की उपस्थिति शून्य अथवा नगण्य हो जाती है. वहां व्यक्तिमात्र की क्षमताओं, विशेषताओं को समष्ठि और व्यैक्तष्ठि में उपयोग करने तथा उनके बीच समन्वय स्थापित करने पर जोर दिया जाता. जिसमें सामूहिक नैतिकता और विवेक कानून के सार्थक विकल्प की तरह काम करते हैं. वह एक दुष्कर लक्ष्य है. जिसके लिए अभिजन मानसिकता तथा उसे बढ़ावा देने वाले तंत्र का सर्वत्र बहिष्कार अनिवार्य होता है. अराजकतावादी राज्य की शक्तियां उसके नागरिकों में केंद्रित होती हैं. उल्लेखनीय है कि सरकार को ताकत उसके नागरिकों की ओर से प्राप्त होती है. लोग अपनी शांति के लिए, सुरक्षा के लिए, अपनी स्वतंत्रता और निर्णयाधिकार का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा सरकार नामक सामूहिक तंत्र को सौंप देते हैं. वे सरकार अथवा निर्वाचित प्रतिनिधियों पर भरोसा करते हैं. यह मान लेते हैं कि उनका अपना होने का दावा कर संसद अथवा विधायिकाओं तक पहुंचे जनप्रतिनिधि ऐसे निर्णय लेंगे, जैसा अपने कल्याण के लिए वे स्वयं लेना चाहते हैं. उनका निर्णय इस सहज विश्वास की अभिव्यक्ति होता है कि निर्वाचित प्रतिनिधि अपने निर्वाचकों की सामान्य इच्छा का अधिवक्ता सिद्ध होगा. प्रायः वे मान लेते हैं कि उनके प्रतिनिधि स्वार्थ-भाव से कोसों दूर हैं. उस समय वे इस सामान्य-बोध से परे होते हैं कि घोड़े को सही दिशा देने, उसे अनुकूल गति तक साधने के लिए सवार को लगाम अपने हाथों में रखनी पड़ती है. जनता की बेध्यानी अथवा अपने प्रतिनिधियों पर अंध-विश्वास अथवा अतिविश्वास को निर्वाचित प्रतिनिधि दूसरे ही अर्थ में लेते हैं. यह भूलकर कि वे जनप्रतिनिधि हैं, उन्हें उनके अधिकार एवं शक्तियां जनता की ओर से प्राप्त हैं, यह मानने लगते हैं कि उन्हें जनता ने उनके गुणों और शक्तियों से सम्मोहित होकर अपना प्रतिनिधि स्वीकार किया है. यानी उनकी शक्तियां और अधिकार जनता का संदाय न होकर उनकी अपनी खूबियां हैं. वे यह भुला देते हैं कि जिस ज्ञान, कार्यकौशल अथवा व्यवहार-कुशलता के बूते वे उस स्थान तक पहुंचे हैं, वह समाज की सम्मिलित चेतना की धरोहर है और समाज में अनेक व्यक्ति खूबियों के मामले में उनसे कहीं आगे हो सकते हैं. बावजूद इसके वे स्वयं को जनता का भाग्य-विधाता मानने की भूल लगातार करते जाते हैं. यह स्थिति जनमानस में उनके और लोकतंत्र के प्रति अनास्था को बढ़ावा देती है.

लोकतंत्र में जनता अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ ले, सत्ता का नियामक होने के बजाय उसपर आश्रित होकर रह जाए, वहां यही होता है. सवार यदि लगाम को ढीला छोड़कर ऊंघने लगे तो घोड़ा मनमानी करेगा ही. स्वाभाविक रूप से उसे जिधर हरियाली दिखाई देगी, उस दिशा में मुड़ जाएगा. इस तरह आगे की यात्रा घोड़े की मर्जी पर निर्भर होकर रह जाएगी—इस तथ्य को जनता समझे न समझे, सरकार में बैठे हुए लोग भली-भांति जानते हैं. बेलगाम दौड़ते रहने के लिए वे जनता की आंखों पर पट्टी बांधने, उसे तरह-तरह से भरमाए रखने का प्रयास करते हैं. प्राचीन समाजों में जाति और धर्म जैसी संस्थाओं की खोज जनसाधारण को भरमाए रखने के लिए ही की गई थीं. समाजीकरण के लिए जरूरी नैतिकताओं को स्थायित्व देने के लिए धर्म का सहारा लिया गया था. आरंभ में एक समान आस्था, लोकविश्वास तथा सामाजिक आचारसंहिता के समर्थक एक ही धर्म के अनुयायी कहे गए. मगर कुछ ही अवधि में धर्म ने स्वयं को अभिजन हितों का संरक्षक और व्याख्याता सिद्ध कर दिया. प्रकट में वह सांसारिक सुखों को हेय बताकर उनकी उपेक्षा करता था, किंतु उसके मापदंड सामान्य जन और विशिष्ट जन के लिए अलग-अलग थे. जो धर्म जनसाधारण को त्याग और तपश्चर्य का उपदेश देकर संसार को निस्सार, मनुष्य के सहज रागानुराग को माया और भव-प्रपंच बताता था, वही राजा, पुरोहित आदि को दैवी-सत्ता का प्रतिनिधि मानकर उनके लिए असीमित अधिकार एवं भोगविलास के रास्ते खोल देता था. कहने को तो धर्म और समानता के नाम पर कुछ शास्त्रीय प्रावधान भी थे. अपेक्षा की जाती थी कि शिखर पर बैठे लोग उनका पालन करेंगे. मगर व्यवहार में सबकुछ शीर्षस्थ वर्गों द्वारा उनकी मर्जी पर निर्भर था. इसलिए विचलन की अवस्था में विक्षोभ की संभावना न्यूनतम थी. यही कारण था कि अर्जन, उपार्जन से लेकर भोग के स्तर तक समाज में आर्थिक-सामाजिक विषमता लगातार बनी रही. उसी के आधार पर बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में विद्वानों की धारणा बनी कि केवल धर्म अथवा उसकी नैतिकतावादी अवधारणाओं की मदद द्वारा जनसाधारण को खुशहाल, न्यायपूर्ण एवं समान जीवन दे पाना असंभव है. उसके लिए राजनीतिक आधार पर प्रयास करने होंगे. अराजकतावादी विचारधाराओं का नए सिरे से चर्चा में आना इसी सोच का परिणाम था. यह मानते हुए कि सत्ता का स्वरूप कोई भी हो, उसकी अंतिम परिणति शोषण में होती है, राज्य की शक्तियों को विक्रेंद्रीकृत कर पुनः जनता को लौटाने के सुझाव दिए जाने लगे. निहितार्थ था कि किसी को इतने अधिकार ही न दिए जाएं जिससे वह अपने दायित्वों को भुलाकर कालांतर में मनमानी करने लग जाए. अंतरराष्ट्रीय कानून, बाह्यः सुरक्षा, व्यापार आदि मामले में यदि किसी व्यक्ति या संस्था को अतिरिक्त अधिकार देना अत्यावाश्यक हो तो नागरिक संस्थाओं को इतना सजग और चेतना-संपन्न बनाया जाए कि जनहित के मुद्दों से विचलन अथवा मनमानी की अवस्था में उसपर तत्क्षण नियंत्रण संभव हो सके.

एक राजनीतिक दर्शन के रूप में अराजकतावाद पश्चिम से आयातित है. उसका जन्म उस दौर में हुआ था, जब औद्योगिक क्रांति के आगमन के पश्चात सामंतवाद सवालों के घेरे में था; तथा जिस अपेक्षा के साथ लोगों ने उसका स्वागत किया था, वह पूरी नहीं हो पाई थी. बल्कि उच्छ्रंखल पूंजीवाद के रूप में एक नए किस्म का सामंतवाद जन्म ले चुका था, जो पहले की अपेक्षा कहीं अधिक खतरनाक था. आर्थिक स्तरीकरण में तेजी आने से ऊपर से नीचे तक असंतोष व्याप्त था. उल्लेखनीय है कि पश्चिम में औद्योगिक क्रांति की सफलता सुखवादी विचारधारा से जुड़ी तथा उसपर निर्भर थी. वह मानवीय स्वतंत्रता का सम्मान करती थी. धर्म की विभेदकारी नीतियों, लोगों को लोक-परलोक संबंधी भ्रांतियों में उलझाकर खुद को सुख और विलासी जीवन जीने की प्रवृत्ति का विरोध वहां 16वीं से, वैज्ञानिक प्रबोधन के साथ ही होने लगा था. कालांतर में मशीनीकरण ने रफ्तार पकड़ी तो ऐसा धर्म जो लोगों को सांसारिक सुखों से बचने की सीख देता था, पूंजीपतियों और कारखानेदारों के आड़े आने लगा. धर्म सांसारिक सुखों के बजाय दिव्य आनंद को जीवन का लक्ष्य मानता था. जबकि साधारण कारखानों के उत्पाद केवल सुख की अनुभूति करा सकते थे. उनकी तेज खपत के लिए आवश्यक था कि अधिकाधिक लोग अधिकाधिक उपभोग करें. उसके लिए धर्म की सांसारिक सुखों को हेय समझनेवाली प्रवृत्ति पर हमले किए गए. इससे सुखवादी विचारों को नया आधार मिला. लेकिन समानता-आधारित समाज की स्थापना में धर्म की ओर से दी जाने वाली चुनौतियां केवल यहीं तक सीमित नहीं थीं. उसका विकास सामंतवाद और राजशाही के संरक्षण में हुआ था. धर्म पर उनका गहरा प्रभाव था. इस कारण वह समाजार्थिक, राजनीतिक असमानता का भी पोषण करता था. वह एक ओर तो ‘कण-कण में भगवान’, ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंजिंचज्जगत्यां जगत्’ के नारे लगाता था, वहीं दूसरी ओर वह राजा को दैवीय प्रतिनिधि बनाकर उसे असीमित अधिकार सौंप देता था. औद्योगिक विकास के दौर में निहित स्वार्थ के लिए पूंजीपतियों ने धर्म की सांसारिक सुखों को हेय बनाने वाली प्रवृत्ति को तो चुनौती दी, किंतु उसकी नियतिवादी स्थापनाओं को ज्यों का त्यों अपना लिया. यानी मनुष्य असीमित भोग को तो उत्सुक हो, किंतु समाजार्थिक विषमता के कारणों की ओर से आंखें मूंदे रहे, इससे श्रम के मूल्यांकन का अधिकार जो उसका एकमात्र स्वामी होने के कारण संबंधित व्यक्ति के पास होना चाहिए, उत्पादक के हाथों में चला गया. परिणामस्वरूप पूंजी-केंद्रित साम्राज्यों के उभार को बढ़ावा मिला. उन्होंने धर्म-संस्थानों को मोटे चंदे देकर अपने बस में कर लिया. परिणामस्वरूप सांसारिक सुखों को हेय बतानेवाली प्रवृत्ति को छोड़कर धर्म स्वयं उसकी व्यवस्था में जुट गया. पुरोहितों ने ऐसे अनेक कर्मकांड निर्धारित किए जिनके द्वारा सांसारिक सुखों में वृद्धि का दावा किया जा सकता था. धर्म ने प्रेय को लेकर व्यवस्थाओं में छूट अवश्य दी थी, किंतु नियतिवादी सोच से वह अब भी पूरी तरह बंधा हुआ था. इस आधार पर हो रहे शोषण से उसको कोई शिकायत न थी. चूंकि वह शोषण के कारणों पर विचार ही नहीं करता था, इसलिए धार्मिक व्यापार में लगी शक्तियां आसानी यह समझाने में सफल हो गईं कि जिन सुखों को समाज में चल रही स्पर्धा अथवा अन्य किसी कारण से पाने में असमर्थ है, उसको दैवी कृपा से आसानी से पाया जा सकता है. इससे उनकी धर्म की दुकानदारी पहले से ज्यादा भी जमने लगी. वर्चस्वकारी ताकतों का स्वार्थाधारित धार्मिक-आर्थिक गठजोड़ लगातार मजबूत होता गया. कई बार वह इतना शक्तिशाली हो जाता था कि राजनीतिक शक्तियों को भी अपने समर्थन में झुका सकता था.

वैज्ञानिक चेतना एवं नए विचारों की रोशनी में धर्म की वह चतुराई विचारकों की समझ में आने लगी थी. इसलिए ब्रूनो बायर, लुडबिग फायरबाख आदि हीगेल समर्थक विचारकों ने सीधे-सीधे धर्म को शोषण का हथियार माना. लेकिन बू्रनो और फायरबाख ने धर्म की आलोचना चाहे जितनी तल्ख भाषा और अकाट्य तर्कों के साथ की हो, उससे पूंजीपतियों तथा उनके समर्थक राजतंत्रों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था. क्योंकि उन दोनों की पैठ बौद्धिक हलकों में विशेषकर उन अभिजन बुद्धिजीवियों तक सीमित थी, जो एकाधिकारवादी शक्तियों की मौखिक आलोचना चाहे जितनी कर कर लें, प्रकट में वे उनसे बहुत दूर नहीं जा सकते थे. वे स्वयं एकाधिकारवादी सोच का शिकार होते हैं, तथा अपने बौद्धिक साम्राज्य को फैलते हुए देखना चाहते हैं. उनकी स्वाभाविक चेतना अभिजनोन्मुखी होती है. ऐसे विचारकों से एकाधिकारवादी शक्तियों को कोई नुकसान न था. इसलिए ब्रूनो और फायरबाख के क्रांतिकारी चिंतन का उतना असर नहीं हुआ, जितना कार्ल मार्क्स के विचारों का. मार्क्स संभवतः पहला विचारक था जिसने अर्थसत्ता और राजसत्ता को परस्पर पूरक मानते हुए वैकल्पिक समानतावादी समाज की परिकल्पना की थी. उसने सर्वहारा वर्ग से आवाह्न भी किया था कि वह संगठित प्रतिरोध द्वारा वर्चस्वकारी सत्ताओं को बेदखल कर शक्तिकेंद्रों को हथिया ले. मार्क्स प्रणीत ऐतिहासिक-भौतिकवाद का सिद्धांत बताता था कि किसी समाज में राजनीति की दशा-दिशा उस समाज की उत्पादन प्रणाली पर निर्भर करती है. इस विचार को सर्वत्र सराहना मिली. कालांतर में मार्क्स के चिंतन के आधार पर जो दल बने उनपर मुख्यतः ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ का असर था, जिसके पीछे हीगेल के द्वंद्ववादी दर्शन की प्रेरणा थी. मार्क्स की आंखों में वर्गहीन समाज की स्थापना का सपना था, किंतु वर्ग-संघर्ष की अवधारणा जो सर्वहाराक्रांति का मुख्य आधार थी, कम से कम इस मायने में परंपरागत राजनीति से प्रेरित थी कि बदलाव हेतु सत्ता में आने के लिए दूसरों को उससे बेदखल करना जरूरी है. मार्क्स सर्वहारा क्रांति को वास्तविक परिवर्तन यानी वर्गहीन समाज की स्थापना की दिशा में पहला कदम मानता था. पेरिस क्रांति की असफलता श्रमिक संगठनों की प्रशासन संबंधी मामलों में अनुभवहीनता का परिणाम थी. मार्क्स समझ चुका था कि सर्वहारा क्रांति द्वारा सत्ता तो प्राप्त की जा सकती है, किंतु उसको स्थायी बनाने और साम्यवादी लक्ष्य के अनुरूप वर्गहीन समाज की स्थापना के लिए लोगों को पूंजीवाद की कमजोरियों तथा उसके शोषण के तरीकों के बारे में समझाना पड़ेगा. यही कारण था जिससे ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ में वर्ग-संघर्ष का आवाह्न करने वाला मार्क्स परिवर्ती जीवन में, पूंजीवादी शोषण के तरीकों और उनके बहुआयामी प्रभाव की ही गवेषणा करता है.

सैद्धांतिक दृष्टि से देखा जाए तो मार्क्स के वर्गहीन समाज और अराजकतावादी समाज में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है. सिवाय इसके कि मार्क्स जहां सत्ता को श्रमिक संगठनों के हाथों में सौंपकर कदाचित उसे बचाए रखना चाहता है, या वर्गहीन समाज की स्थापना के लक्ष्य की प्राप्ति तक—सर्वहारा के अधीन सत्ता रहने का समर्थन करता है. मार्क्स वर्गहीन समाज की स्थापना के समर्थन में जोरदार साम्यवादी तर्क देता है, जबकि अराजकतावाद का आदर्श राज्य की आवश्यकता के तिरोहण में है. दूसरे द्वंद्ववाद समर्थक मार्क्स क्रांति के लिए वर्ग संघर्ष को आवश्यक मानता है. इसके लिए उसे हिंसा के उपयोग से भी गुरेज नहीं है. जबकि कुछ आरंभिक अराजकतावादी विचारकों को छोड़ दें तो अधिकांश इस लक्ष्य को समाज के विवेकीकरण, संगठन और व्यापक लोकचेतना के माध्यम से प्राप्त करना चाहते हैं. वे चाहते हैं कि समाज बौद्धिकरूप से परिपक्व हो, ताकि उसको बाहरी नियंत्रण की आवश्यकता ही न हो. इसके लिए उसका ज्ञान की बहुविध शाखाओं में पारंगत होना आवश्यक है. साथ में इस विश्वास को वापस लौटाना कि शासन आवश्यक बुराई है और समाज बिना शासकवर्ग भी सुगठित हो सकता है. इस तरह साम्यवाद और अराजकतावाद के व्यावहारिक भेद सामने आ जाते हैं. मार्क्स का समकालीन और श्रमिक आंदोलन में वर्षों तक साथ रहा अराजकतावादी मिखाइल बकुनिन उसका मुखर आलोचक था. बकुनिन को सत्तावाद की परिकल्पना ही दोषपूर्ण लगती थी. उसका मानना था कि सत्ता चाहे एक के अधिकार में हो या पचास के, शिखर पर मौजूद लोग अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते ही हैं. मार्क्सवादियों की आलोचना करते हुए उसने लिखा था, ‘वे केवल तानाशाही फैला सकते हैं. संभव है उनकी तानाशाही के साथ कुछ जनभावनाएं भी जुड़ी हुई हों. इसके बावजूद उसके विरोध में हमारी एकमात्र और जोरदार प्रतिक्रया होगी कि तानाशाही चाहे जिसकी और जैसी भी हो, तानाशाह का एकमात्र उद्देश्य होता है, येन-केन-प्रकारेण खुद को सत्ता-शिखर पर टिकाए रहना. यह व्यापक जनसहमति और तानाशाह द्वारा आरोपित दासता को स्वीकारे बगैर असंभव है. स्वतंत्रता प्राप्त करने का एकमात्र रास्ता स्वतंत्रता है. तदनुसार विद्रोह के लिए चिर-तत्पर एवं नीचे-से ऊपर तक कारगर और मुक्त श्रम-संगठनों का स्वतंत्र आचरण जरूरी है.’4 बकुनिन की कल्पना ऐसे राज्य की थी जिसमें निर्णायाधिकार पूरी तरह नागरिक-संगठनों के अधीन हों. उसके अनुसार अराजकतावाद स्वयं-अनुशासित, विवेकवान, सर्व-समन्वयी, साहचर्य आधारित समाज का मुक्ति-स्वप्न है, जिसमें राज्य की शक्तियां या तो पूरी तरह क्षीण हो जाती हैं, अथवा बड़ी मात्रा में क्षीण होकर निःशेष होने की तरफ बढ़ रही होती हैं.

अराजकतावाद की सफलता स्वयं अनुशासित, विवेकवान, अंत:प्रज्ञायुक्त तथा समन्वयकारी, सहयोगी संगठनों पर निर्भर है. यह चाहे जितना जरूरी हो, किंतु एक दुष्कर कार्य था. इसके अनेक कारण, उनमें धर्म भी एक है. सत्ता के विकेंद्रीकरण द्वारा विकासगति अवरुद्ध न हो, इसके लिए जनविवेकीकरण आवश्यक था. चूंकि धर्म मनुष्य की विभेदकारी सत्ताओं के अनुकूलन में भारी भूमिका निभाता है. इसलिए यह मानते हुए कि स्वतंत्र समतावादी और सहयोगकारी संगठनों के गठन के लिए लोगों को धर्म के चंगुल से बाहर लाना आवश्यक है, बकुनाइन ने ‘गाड आफ स्टेट’ जैसी क्रांतिकारी पुस्तक लिखी थी, जो मार्क्स की ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’ जितनी ही महत्त्वपूर्ण और प्रभावशाली रचना है. इसके बावजूद मार्क्स का प्रभाव गहरा बना रहा तो इसलिए कि मजदूर संगठनों पर उसका प्रभाव अधिक था. श्रमिक उसे अपना परमहितैषी मानते थे. इसलिए ‘प्रथम इंटरनेशनल’ के दौरान बकुनिन के साथ स्पर्धा में जीत मार्क्स की हुई थी. 1876 में बकुनिन की मृत्यु हुई. उसके सातवें वर्ष में मार्क्स भी चल बसा. 1895 में पूंजी के ऐंगल्स के संपादन में ‘पूंजी’ का दूसरा खंड सामने आया. उस समय तक 1871 में मात खाए श्रमिक संगठन पुनः सक्रिय होने लगे थे. इसलिए मार्क्स का पुनः सक्रिय हो उठना स्वाभाविक ही था. सर्वहारा क्रांति में एक राजनीतिक अपील थी. उसकी अपेक्षा अराजकतावाद अपेक्षाकृत भावुक और आदर्शोन्मुखी चिंतन था. चूंकि परिवर्तनकामी दलों, सर्वहारा संगठनों का नेतृत्व कर रहे नेताओं की निजी महत्त्वाकांक्षाएं उफान पर थीं, इसलिए वे मार्क्सवाद की ओर झुकते गए, जिसमें जोरदार राजनीतिक अपील थी और जो अपेक्षाकृत शीघ्र परिणाम, यहां तक कि बुर्जुआ शक्तियों के तख्तापलट तक का आश्वासन देता था. राजनीतिक अपील होने के कारण उग्र परिवर्तनकामी दलों ने मार्क्सवाद की शरण में जाना आसान समझा. उसी के आधार पर रूस, चीन, जर्मनी, अफ्रीका आदि देशों में श्रमिक नए सिरे से संगठित होने लगे थे. इस बार उनका नेतृत्व लेनिन, लियोन ट्राट्स्की जैसे महत्त्वाकांक्षी नेताओं के हाथों में था. बीसवीं शताब्दी का आरंभ मार्क्सवाद की जीत से हुआ था. और शताब्दी के मध्य तक आते-आते मार्क्सवाद दुनिया के आधे से अधिक देशों पर छा चुका था.

इसमें कोई संदेह नहीं कि साम्यवाद मानवीय स्वतंत्रता और समानता का सपना देखने वालों के लिए आदर्श सपना था, लेकिन जिन महत्त्वाकांक्षाओं के साथ उसको लाया जा रहा था, उनके पीछे राजनीतिक चेतना अधिक थी. इससे शीर्ष के स्तर पर सुख, सम्मान, प्रतिष्ठा की चाहत और वर्चस्ववादी मानसिकता पनपने लगी. दूसरे शब्दों में परिवर्तनकामी राजनीति के नारे के साथ सत्तारूढ़ हुए दलों में वे सब विकृतियां आने लगी थीं, जिनके विरुद्ध उन्होंने संघर्ष आरंभ किया था. परिणामस्वरूप साम्यवादी लक्ष्य के बीच निरंतर दूरी बढ़ने लगी. नतीजा यह हुआ कि कुछ ही वर्षों में साम्यवादी सपने का रंग फीका पड़ने लगा. इससे पूंजीवादी शक्तियों को बढ़ावा मिला. जनसाधारण की धर्म के प्रति आस्था को देखते हुए उन्होंने मार्क्सवाद का फैलाव रोकने के लिए से लोगों की धार्मिक आस्था को हथियार बनाया. पूंजीवादी-साम्राज्यवादी ताकतें मार्क्स के कथन, ‘धर्म अफीम है’ को आधार बना, उसे धर्म-विरोधी घोषित कर, निरंतर उसकी आलोचना करने लगीं. इसमें उन्हें कामयाबी भी मिली. अराजकतावाद से लड़ने के लिए उन्होंने मानवीय कमजोरियों को हथियार बनाया. उनके द्वारा बार-बार यह प्रचारित किया गया कि केवल कानून के राज्य में शांति और खुशहाली संभव है. सघन प्रचार तंत्र का लाभ उठाकर पूंजीवादी ताकतें मार्क्स और मार्क्सवाद को धर्मविरोधी तथा अराजकतावाद को शांति और व्यवस्था विरोधी सिद्ध करने में कामयाब हुईं.

आज व्यक्ति उपभोक्तावाद और धर्म दोनों के चंगुल में है. उपभोक्तावाद इस जन्म के सुखों के लिए व्यक्ति को अकेला होने का बोध कराता है. धर्म कहता है कि मृत्यु बाद केवल आत्मा होगी, संगी, साथी, परिजन काम नहीं आएंगे, इसलिए तरह वह परलोक के नाम पर व्यक्ति को अकेला बना देता है. यह अकेलेपन का बोध, अपने आसपास रह रहे नागरिकों के प्रति अविश्वास अराजकतावाद का आदर्श है. अराजकतावादी समाज को गढ़ने में सबसे बड़ा दुश्मन है, यह लोगों को सार्वजनिक हितों के लिए एकजुट होने से रोकता है. इसलिए अरविंद केजरीवाल यदि स्वयं को अराजकतावादी मानते हैं तो उन्हें तय करना होगा कि क्या उन्हें सचमुच अपने नागरिक बोध में विश्वास है. यदि हां तो धर्म और पूंजीवाद ने अपने-अपने स्वार्थ के कारण नागरिकों के बीच जो अविश्वास और दूरियां कायम कर दी हैं, उन्हें पाटने के लिए कौन-सा वैकल्पिक कार्यक्रम उनके पास है? उनके ‘स्वराज’ में पंचायती राज्य का सपना है, जिसे भारत में अकसर नारे की तरह उछाला जाता है. व्यावहारिक धरातल पर यह हर बार असफल सिद्ध हुआ कार्यक्रम है. गांधी, नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक पंचायती राज्य की मांग करते आए थे. लेकिन जैसे ही ये मांगे उठती हैं, सहस्राब्दियों से जातीय शोषण और उत्पीड़न का शिकार रहे लोगों के मन में संदेह उभर आता है. पंचायती राज्य का सीधा आशय आर्थिक और राजनीतिक शक्तियों, अधिकारों के विकेंद्रीकरण से है. यदि वे सचमुच विकेंद्रीकरण और स्वराज में विश्वास रखते हैं, तब उन्हें समझाना होगा कि ‘स्वराज’ जिम्मेदारी का विधान है. उसमें आलसी घुड़सवार होने से काम नहीं चल सकता. उसके लिए जनता को बौद्धिक और शारीरिक दोनों किस्म की सक्रियता चाहिए. इसलिए केजरीवाल के ‘स्वराज’ में कोई कार्यक्रम नजर नहीं आता. वे सत्ता को विकेंद्रीकृत कर जनता को अधिकार संपन्न करना चाहते हैं, बहुत अच्छा विचार है. जिन देशों में विकेंद्रीकृत शासन है, वहां स्थानीय तंत्र मजबूत हैं. चीन में कम्यून, श्रीलंका, जर्मनी और इजरायल में ‘किबुत्ज’, रूस में ‘सोवियत’ आदि स्थानीय निकायों के ही नाम हैं. भारत में ऐसे प्रयोग नाकाम हैं तो इसलिए कि यहां की दो-तिहाई जनता जिसमें शूद्र और दलित दोनों सम्मिलित हैं, जातीय शोषण के शिकार रहे हैं.

जनता यदि केजरीवाल में अपना नायक देखती है तो उसे समझना चाहिए कि ऊपर से थोपा हुआ विकास नीचे तक आते-आते चुकने लगता है. अराजकतावादी समाज के गठन के लिए आवश्यक है कि जनता स्वयं अपना नेतृत्व संभाले. नेता की भांति आचरण करते हुए अपने प्रतिनिधियों को जरूरी निर्देश दे. लोकतंत्र में सफलता केवल श्रेष्ठतम प्रतिनिधियों को संसद भवन तक पहुंचा देने से पूरी नहीं हो जाती. निर्वाचित प्रतिनिधि श्रेष्ठतम कार्य करें, इसी में लोकतंत्र की सफलता है. संसार का कल्याण है. यह तभी संभव है जब जनता भी अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सचेत हो. जनप्रतिनिधियों से श्रेष्ठतम काम लेना भी जनता का दायित्व है. अभी तक जनता यह मानकर चलती रही है कि उसके प्रतिनिधि अपने दायित्वों के प्रति जागरूक रहकर निष्ठापूर्वक उनका पालन करेंगे. किंतु व्यवहार में उसका उल्टा हुआ है. देखा यह गया है कि जनता के प्रतिनिधि संसद में जाकर अपना कर्तव्य बिसरा देते हैं. चूंकि अधिकांश मामलों में ऐसा होता है, इसलिए माना जाना चाहिए कि जिन्हें जनता श्रेष्ठतम के नारे के साथ चुनती है, वे संसद में जाकर वैसे नहीं रह जाते. वहां जाते ही उनपर अभिजन संस्कार हावी होने लगते हैं. स्वयं को जनता का सेवक बताकर चुनकर आए लोग खुद को उसका मालिक समझने लगते हैं. चूंकि अधिकांश मामलों में ऐसा होता है, अधिकांश अपना कर्तव्य बिसार देते हैं, इसलिए माना जाना चाहिए कि जिन्हें जनता श्रेष्ठतम के नारे के साथ चुनती है, वे संसद जाकर श्रेष्ठतम नहीं रह जाते. वे स्वयं को आमजन से ऊपर समझने लगते हैं. चूंकि अधिकांश मामलों में हमारे ‘श्रेष्ठतम’ साधारण या उससे भी कम, अर्थात ‘निकृष्टतम’ सिद्ध होते हैं. जनता को यह भी समझना होगा कि श्रेष्ठतम प्रतिनिधि जैसी अवधारणा में ही खोट है. इसलिए यदि जनता को शासन का श्रेष्ठतम रूप चाहिए तो उसे स्वयं सक्रिय रहकर श्रेष्ठतम निगरानी व्यवस्था कायम करनी पड़ेगी. ताकि तयशुदा लीक से हटने की किसी जनप्रतिनिधि की हिम्मत ही न पड़े. इसे यूं भी कह सकते हैं कि ‘श्रेष्ठतम प्रतिनिधि’ एक भ्रांत अवधारणा है. केवल श्रेष्ठतम जनता ही शासन को श्रेष्ठतम स्तर तक ले जाती है.

यहां एक पेंच है. आम जनता अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम करे या शासन चलाए? किसान यदि अपना वक्त शासन-प्रशासन की देखभाल करेगा तो हल चलाने के लिए समय कहां से निकाल पाएगा? ऐसी शंकाएं वाजिब हैं, लेकिन यदि आपने इस सिद्धांत कि श्रेष्ठतम जनता ही श्रेष्ठतम शासन दे सकती है’—को भली-भांति समझ लिया है तो मुझे पूरा विश्वास है कि आपके लिए शासन संबंधी कोई समस्या ही नहीं होगी. इसलिए आपके दिमाग में यह विचार आना ही नहीं चाहिए. यदि जनता ही शासन है और प्रतिनिधित्व के शासन को उसकी कमजोरी के कारण नकार चुकी है, तो किसी बाहरी शासन की आवश्यकता ही नहीं रह जाती. फिलहाल ‘बिना राजा का राज’ या ‘बिना शासन के शासन’ जैसी अवधारणा दूर की कौड़ी या फिर दिमागी शगल लग सकती है. वह इसलिए कि गत चार-पांच हजार वषों के बीच जनता शासित होते-होते, अपने आपको, अपनी शक्ति और योग्यता को बिसरा चुकी है. इन चार-पांच हजार वर्षों में उसने हर प्रकार की राज्य प्रणाली को आजमाया है. पहले कबीलाई शासन देखा, राजा आए, फिर महाराजाधिराज और चक्रवर्तित्व का जमाना आया. उसके बाद औपनिवेशिक शासन और अब लोकतंत्र, उसे सभी में छला गया है. लेकिन लोकतंत्र में छला जाना जनता को ज्यादा मर्माहत करता है, क्योंकि वह अपनों द्वारा छले जाने की प्रतीति कराता है. उसमें सत्ता जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में रहती है. यह अपेक्षा की जाती है कि निर्वाचित प्रतिनिधि अपने मतदाताओं के प्रति जिन्होंने उनपर भरोसा करते हुए अपना प्रतिनिधित्व सौंपा है, ईमानदार होंगे तथा उनके विकास एवं समस्याओं के समाधान हेतु पूर्णतः प्रतिबद्ध होंगे. लेकिन सत्ता प्राप्त होते ही प्रतिनिधि अपनी स्वार्थ-सिद्धि के आयोजनों में जुट जाते हैं. उससे जनता को अपने ही प्रतिनिधियों द्वारा छले जाने की आत्महंता पीड़ा से गुजरना पड़ता है.

केजरीवाल के प्रस्तावित ‘स्वराज’ की कमजोरी है कि उसमें, जनविवेकीकरण और सत्ता के वास्तविक विकेंद्रीकरण की कोई योजना नहीं है. इसलिए वे भीड़ तो जुटा लेते हैं, उसे विवेकवान जनशक्ति में परिवर्तित करने का रास्ता उनके पास नहीं है. रही फेसबुकिया समर्थन और अभियान की बात, जिसे वे युवा चेतना से जोड़ते हैं, वह स्वयं दिग्भ्रमित है. कुछ समय पहले तक युवाओं को अपना मसीहा मोदी में नजर आता था, दिल्ली में ‘आआप’ की अप्रत्याशित जीत के बाद अब वह केजरीवाल को मसीहा के रूप में देखने लगे हैं. दूसरे जिस सोशल साइटस पर उनका प्रभाव है, असल में वह सामाजिकता से कोसों दूर है. वह असल से बहुत दूर ऐसा वर्चुअल समाज है जिसका वास्तविकता से कोई नाता नहीं है. फिर उसकी डोर पूरी तरह पूंजीपतियों के हाथों में है. अभी तक वे इसमें छूट दे रहे थे तो इसलिए वह उत्पाद को घर-घर पहुंचाने के लिए सबसे सस्ता और प्रभावी माध्यम है. सरकार के प्रति असंतोष एवं जनाक्रोश को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करना उनका पुराना शगल है. जैसे ही उन्हें उससे अपने अस्तित्व पर संकट महसूस होगा, वे युवा आक्रोश को एकदम विपरीत दिशा में मोड़ देंगे. अतएव केजरीवाल समेत दूसरे लोगों की परिवर्तनकामी आंदोलनों या राजनीति की सफलता इसपर निर्भर करेगी कि समाज की वर्चुअल एकता को वास्तविक समाज की एकता में कैसे ला पाते हैं. इसके लिए परंपरागत शक्तियों के साथ आधुनिक पूंजीवादी शक्तियों से भी लोहा लेना पड़ेगा. इसमें कामयाबी ही उनकी अराजक होने की वास्तविक पहचान होगी. लोकतंत्र में नागरिक की हैसियत केवल केवल टैक्स भरने और बूथ पर जाकर ठप्पा लगाने तक सीमित नहीं है? उसे सरकार के काम पर निगरानी करने और आवश्यकता पड़ने पर उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार मिलना चाहिए. उसको यह अधिकार भी होना चाहिए कि यदि कहीं अव्यवस्था और अनाचार देखे तो उसे उन अधिकारियों तक पहुंचा सके, जिन्हें उसके लिए नियुक्त किया गया है. यह नागरिक प्रशासन की वह उच्चतम अवस्था है जिसमें राज्य की आवश्यकता न्यूनतम हो जाती है. अ-राजकता ही क्यों, विवेकवान नागरिक तो लोकतंत्र के लिए भी जरूरी हैं. आआप के आंदोलन के माध्यम से जो विचार स्पष्ट रूप से सामने आया है, वह है जनसाधारण का प्रशासन में दखल बढ़ाने का विचार. यह अपने आपमें एक विचार है. हालांकि आआप के नेता इसे किसी विशेष विचारधारा से जोड़ने से इन्कार करते हैं. शायद वे स्थापित विचारधाराओं का हश्र देख खतरा उठाने से डरते हैं. हो सकता है इसमें भी कोई राजनीति हो. लेकिन सुदीर्घ और परिवर्तनकारी राजनीति के लिए ठोस विचारधारा आवश्यक है. आआप को यदि कभी खतरा होगा तो इसी वैचारिक ढुलमुलपन के कारण. यह संभव है कि विचारधारा की शरण लेने से आआप की विकासगति धीमी पड़ जाए. क्योंकि विचारधारा को लोकमानस में जगह बनाने और कारगर बनने में समय लगता है. उसमें व्यवधान भी आ सकता है. इसके बावजूद वह परिवर्तन स्थायी होगा. फिर भी यदि केजरीवाल के आने से राजनीति में थोड़ी-सी भी संवेदनशीलता आई है तो इसके लिए उनकी प्रशंसा करनी चाहिए. उन्हें यह भी श्रेय दिया जाना चाहिए कि आगामी लोकसभा चुनावों में चेहरों की लड़ाई को उन्होंने विकल्प देने की कोशिश की है. इसलिए जरूरी है कि आआप में जो अच्छा हो रहा है उसका समर्थन करते हुए उसपर नैतिक दबाव बनाना चाहिए ताकि विचलन की संभावना न्यूनतम रहे और यदि अपनी ही कमजोरी ये यह प्रयोग ढहता भी है तो भविष्य में नई वैचारिकता, नए आंदोलन को जमीन देने के लिए तैयार रहे. अंत में 14 अगस्त 2013 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित एक रिपोर्ट, अफ्रीका के जनजातीय समाज की एकता और एक-दूसरे के प्रति उदात्त समर्पण का अनूठा उदाहरण है—

दक्षिण अफ्रीका की झोसा प्रजाति के बच्चों के साथ एक मानव विज्ञानी ने एक गेम खेला. उन्होंने बच्चों से थोड़ी दूर एक फलों से भरी डलिया रख दी. बच्चों से कहा कि आपमें से जो भी इन फलों तक पहले पहुंचेगा मैं यह सारे फल उसे दे दूंगा. इस पर सभी बच्चे हाथ पकड़कर एक साथ उस डलिया तक गए. यह पूछने पर कि उन्होंने ऐसा क्यों किया जबकि उनमें से कोई एक जीत सकता था. इस पर बच्चों ने जवाब दिया उबन्टू. झोसा प्रजाति में इसका अर्थ होता है कि हम एक हैं. उनका कहना था कि अगर बाकि सब दुखी हैं तो हममें से कोई एक खुश कैसे हो सकता है. वे सारे घेरा बनाकर फल खाने के लिए बैठ गए.

क्या स्पर्धा को विकास का मूलमंत्र मानने वाले आधुनिक पूंजीवादी समाजों में यह संभव है?

 – ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रमणिका:

1. The true founder of anarchy was Jesus Christ and… the first anarchist society was that of the apostles.”-GEORGE WOODCOCK, Anarchism : A History Of Libertarian Ideas And Movements, P 37.
2. Some writers have so confounded society with government, as to leave little or no distinction between them; whereas they are not only different, but have different origins … Society is in every state a blessing, but Government, even in its best state, is but a necessary evil; in its worst state, an intolerable one. -Thomas Paine,Common Sense.
3. “I heartily accept the motto, – “That government is best which governs least;” and I should like to see it acted up to more rapidly and systematically. Carried out, it finally amounts to this, which I also believe, – “That government is best which governs not at all;” and when men are prepared for it, that will be the kind of government which they will have.” -Henry David Thoreau, On the Duty of Civil Disobedience.
4. They [the Marxists] maintain that only a dictatorship — their dictatorship, of course — can create the will of the people, while our answer to this is: No dictatorship can have any other aim but that of self-perpetuation, and it can beget only slavery in the people tolerating it; freedom can be created only by freedom, that is, by a universal rebellion on the part of the people and free organization of the toiling masses from the bottom up. -Mikhail Bakunin, Statism and Anarchism.

समाजवाद के आधुनिक विकल्प

सामान्य

अराजकतावाद(अनार्किज्म)

समाजवाद उदार मन की अपरिग्रही कामना है. यह समाजवाद का जादू ही है जिसने बीसवीं शताब्दी के प्रायः सभी प्रमुख बुद्धिजीवियों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों को अपनी ओर आकर्षित किया है. उसके समर्थकों में बर्ट्रेंड रसेल, जॉन रस्किन, अल्बर्ट आइंस्टाइन, ग्राम्शी, जॉन स्टुअर्ट मिल, ज्यां पाल दि सार्त्र आदि विश्व की महानतम प्रतिभाएं सम्मिलित हैं. ये सभी कहीं न कहीं मार्क्स से प्रेरित हैं. परवर्ती विचारकों ने मार्क्स के दर्शन को अपने उठान बिंदु के रूप में लिया है. मार्क्स के अलावा मिल भी उन्हें प्रभावित करता है. अतः मार्क्स को यदि ‘समाजवाद का चैंपियन’ कहा जाता है, तो मिल ‘स्वाधीनता का चैंपियन’ स्वतः बन जाता है. हालांकि दोनों के बीच कोई स्पष्ट विभाजन रेखा खींच पाना संभव नहीं है. इसलिए कि मिल का ‘स्वाधीनतावाद’ ही अपने भीतर ‘समाजवाद’ की अनेक विशेषताओं को सहेजे हुए है.

मिल ने सुखवाद का प्रणयन किया और कहा कि व्यक्तिमात्र का सुख बिना उसकी स्वतंत्रता की सुरक्षा के असंभव है. यदि व्यक्तिमात्र को सुख पाने का अधिकार है तो यह व्यवस्था किसी एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने का अधिकार नहीं दे सकती. दूसरे शब्दों में मिल का ‘स्वाधीनतावाद’ समाजवाद का पूरकसंरक्षक एवं संसाधक है. किंतु व्यक्तिस्वातंत्र्य का समर्थक मिल कुछ भी ऊपर से थोपना नहीं चाहता. वह इसको चेतना की उठान के निक्ष के रूप में प्राप्त करना चाहता है. जबकि मार्क्स का मानना था कि सत्ताशिखर पर विराजमान लोग आसानी से कुछ भी छोड़ने को तैयार न होंगे. उनसे मुक्ति के लिए सर्वहारा का संगठित संघर्ष अपरिहार्य है. मार्क्स और मिल के समाजवाद में अंतर भी यही है. मार्क्स समाजवाद को समाज के लिए अपरिहार्य मानता है, जबकि मिल उसको मनुष्य की इच्छा पर सौंप देता है. उसके अनुसार यह लोगों की इच्छा से ही तय होना चाहिए कि वे ‘निजी संपत्ति’ अथवा ‘सामूहिक संपत्ति’ में से किसको वरीयता देते हैं. पूर्वग्रह की पराकाष्ठा में सामंजस्य की संभावना घट जाती है. फलतः व्यक्ति भीड़ के आचरण पर उतर आता है, जहां विचारधाएं तथा निजी पूर्वग्रह इतने गड्डमड्ड हो जाते हैं कि उनमें वास्तविक की पहचान करना असंभवसा हो जाता है. उल्लेखनीय है कि समाजवादी चिंतक ‘स्पर्धा’ को पूंजीवाद का औजार मानते रहे हैं. मिल सहकारिता का समर्थन करता है, लेकिन सीमित अर्थों में. वहां भी वह व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता को बनाए रखना चाहता है. औद्योगिक स्पर्धा की आलोचना करते समय थांपसन ने कहा था कि—

स्पर्धा, सहृदयता, सहकार एवं सदाचार की विचारधारा के सर्वथा प्रतिकूल है. स्पर्धा के बीच में सप्लाई को मांग के अनुसार इच्छुक व्यक्तियों में समविभाजित कर पाना अत्यंत कठिन होता है. श्रमिकगण मशीनरी के साथ बेमेल स्पर्धा से सदैव त्रस्त रहते हैं. स्पर्धा का स्वभाव ही है मनुष्य और मनुष्य के बीच ऊंची दीवार खींचकर, उन्हें एकदूसरे का दुश्मन बना देना.’

थांपसन की आलोचना करते हुए मिल ने कहा था कि यदि अत्यंत प्राचीन उत्पादन पद्धतियों को छोड़ दें तो स्पर्धा प्रत्येक समाज में उपस्थित रही है. उससे बच पाना मनुष्य के लिए सदैव कठिन रहा है. उसने कहा था कि यदि कोई समुदाय किसी एक वस्तु का उत्पादन करता है, तो उसी वस्तु का उत्पादन करने वाले दूसरे समाज अथवा औद्योगिक वर्गों से उसकी स्पर्धा रहेगी. फिर चाहे व्यापार का मामला हो अथवा उत्पादन का. इस आधार पर उसने बाजारआश्रित अर्थव्यवस्था का पक्ष लिया है. दरअसल व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता एवं सुख का समर्थक मिल मनुष्य पर किसी भी प्रकार के बाहरी प्रतिबंध को अनुचित मानता था. वह समाजवाद को राजनीतिक दर्शन मानते हुए उसका प्रचलित राजनीतिक दर्शनों के साथ तुलनात्मक अध्ययन करता है. दूसरी ओर मार्क्स समाजवाद को विशुद्ध विज्ञान मानता था. उसका मानना था कि विज्ञान की उपयोगिता असंद्धिग्ध है. मिल समाज के हित में व्यक्तिहितों का बलिदान करने को सरासर अमानवीय मानता था. मिल का कहना था कि, ‘प्रायः सभी समाजों में पहले से ही व्यक्तिहित की सामूहिक हितों से तुलना करना लगातार बढ़ती बुराई है. साम्यवादी वातावरण में यह और भी अधिक हो सकती है, जबकि यह मनुष्य के हाथ में है कि वह प्रत्येक व्यक्ति को इतनी छूट दे कि वह अपनी रुचि एवं स्वभाव के अनुकूल अपने कार्यक्षेत्र का निर्धारण करे.’

असल में मिल और मार्क्स दोनों ही समाजवाद के समर्थक हैं. केवल उसकी स्थापना के तौरतरीकों को लेकर दोनों में कुछ मतभेद हैं. बीसवीं शताब्दी में समाजवाद ने स्वयं को लोगों की आवश्यकता के अनुसार बदला है. हालांकि आज भी समाजवाद की परिभाषा को लेकर लोगों के बीच विचारवैभिन्न्य है. तो भी समाज की कुल पूंजी, भूसंपदा और संसाधनों पर समाज के गणतांत्रिक नियंत्रण को समाजवाद मान लिया गया है. जहां संपत्ति राज्याधिकार में हो परंतु गणतांत्रिक व्यवस्था का अभाव हो, उन्हें समाजवादी राज्य मानने में संकोच है. समाजवाद का समानधर्मा अराजकतावाद भी संपत्ति पर राज्याधिकार को मान्यता देता है. लेकिन अराजकतावाद में राज्य लोगों की चेतना में विस्तरित मानवतावादी अवधारणा है, जिसमें आधुनिक राज्य की अन्य सभी विशेषताओं यथा कानून, अदालत, पुलिस, वकील, न्यायाधीश आदि का अभाव होता है. अराजकतावाद राज्यसत्ता की संपूर्ण अनुपस्थिति की अवधारणा पर आधारित है. अराजकतावादी राज्य में संपत्ति स्वयंचेता और आत्मानुशासित नागरिक समूहों के अधिकार में होती है.

उनीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में समाजवाद शब्द के अतित्व में आने के पश्चात से आज तक इसकी अनेक व्याख्याएं हुई हैं. 1830 में अलेक्जेंडर विनेट द्वारा इस शब्द को पहली बार परिभाषित करने से लेकर आज तक इस शब्द को लेकर अनेक परिभाषाएं सामने आई हैं. विनेट ने सीधेसीधे कहा था कि ‘समाजवाद पूंजीवाद का विलोम है.’ जबकि इस शब्द को उछालने वाले राबर्ट ओवेन के अनुसार समाजवाद ‘नैतिकता की विषयवस्तु’ है. समाज का गठन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि वह अपने अधिकतम लोगों का अधिकतम हितसाधन का माध्यम बने. जबकि पियरे जोसेफ प्रूधों ने कहा था कि मनुष्य की प्रत्येक अभिलाषा जो सामाजिक उन्नति में योगदान दे—समाजवाद है.

समाजवाद की लगभग एक सर्वमान्य परिभाषा संत साइमन ने देने की कोशिश की थी. उसने कहा था—‘प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार तथा प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुरूप.’ संत साइमन को समाजवादी चिंतकों में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. उससे पहले हेनरी मूर अपनी पुस्तक ‘यूटोपिया’ में समानता पर आधारित समाज की झलक प्रस्तुत कर चुका था. मूर का ‘यूटोपिया’ हालांकि समानता के विचार का मजाक उड़ाते हुए लिखी गई पुस्तक थी. लेकिन अपने प्रकाशन के बाद ही यह पुस्तक परिवर्तनकामियों की आंखों पर ऐसी चढ़ी कि शताब्दियों तक इसका सम्मोहन बना रहा. साइमन के अनुसार समाजवादी तंत्र में उन सभी व्यवस्थाओं को मिटाने का भरसक प्रयत्न किया जाता है, जो आर्थिक असमानताओं को बनाए रखने में सहायक हों. संत साइमन के बाद रूसो ने व्यक्ति स्वातंत्रय का विचार सामने रखा, जो कालांतर में समाजवादी विचारधारा को संपुष्ट करने में मददगार बना. चाल्र्स फ्यूरियर, राबर्ट ओवेन, डेविड रिकार्डो ने अपनीअपनी तरह से आर्थिक असमानता की खाई को पाटने के लिए सुझाव दिए. पर समाजवाद को वास्तविक बल मिला, कार्ल मार्क्स से. उनीसवीं शताब्दी के इस विलक्षण प्रतिभाशाली और मेधावी विचारक ने इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या करते हुए विकास एवं उत्पादन के साधनों को एकदूसरे का पूरक माना. प्रतीकात्मकता से बाहर आर्थिकसामाजिक तथ्यों की ठोस व्यावहारिक स्तर पर समीक्षा करते उसने वैज्ञानिक समाजवाद का नारा दिया.

मार्क्सवादी विचारधारा में समाजवाद सामाजार्थिक विकास की विशिष्ट स्थति है. मार्क्स ने कामना की थी कि सुरसामुखी पूंजीवाद बढ़तेबढ़ते एक दिन अपने चरम पर पहुंचेगा और वर्गसंघर्ष का शिकार बनेगा. उसने सर्वहारा वर्ग का आवाह्न भी किया था कि वह संगठित विद्रोह द्वारा अपनी परतंत्रता की बेड़ियों को काट फेंके. ‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’(1848) के लेखन के बाद से हालांकि स्वयं मार्क्स की विचारधारा में परिवर्तन दृष्टिगत हुए, इसके बावजूद उनीसवीं और बीसवीं शताब्दी में, 1871 में पेरिस कम्यून की असफलता के बावजूद मार्क्सवाद एवं समाजवाद परस्पर पर्याय बने रहे. मार्क्स ने समाजवादी विचारधारा को धर्म की भांति अपने अनुयायियों के दिमाग में पैठाया, परिणाम यह हुआ कि मार्क्सवाद की शरण में आने वाले राजनीतिज्ञों, विचारकों की संख्या लगातार बढ़ती गई. मार्क्सवाद का प्रसार दुनियाभर में हुआ, लेकिन उसकी खूबी यह रही कि अलगअलग देशों के नेताओंविचारकों ने मार्क्सवाद का अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप स्थानीयकरण किया गया. जिसके फलस्वरूप आज समाजवाद के दर्जनों रूप समाज में प्रचलित हैं. मार्क्सवादलेनिनिज्म, मार्क्सवादट्राट्सकिज्म’ वैज्ञानिक समाजवाद, समष्ठिवाद, श्रमिकसंघवाद, अराजकतावाद, सहजीवितावाद उनमें से हालांकि कुछ का प्रभाव निश्चय ही दूसरों से अधिक है, लेकिन आर्थिकसामाजिकराजनीतिक असमानता को मिटाने के लिए उनकी प्रतिबद्धता लगभग एकसमान है. बीसवीं शताब्दी में समाजवाद के कुछ नए रूप सामने आए हैं, उनमें ‘समष्ठिवाद’, ‘श्रमिकसंघवाद’, ‘अराजकतावाद’, ‘सहजीवितावाद’, ‘संघवाद’, सामूहिकतावाद आदि विभिन्न विचारधाराएं हैं. समाजवाद के विभिन्न वैश्विक रूपों को देखते हुए उन्हें दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जा सकता है.

इनमें पहला है, क्रांतिकारी समाजवाद. इस वर्ग में मार्क्सवाद और अराजकतावाद जैसी विचारधाराएं आती हैं, जो संगठित सर्वहारा शक्ति के बल पर उत्पादनतंत्र पर अधिकार जमा लेने का पक्ष लेती हैं. जिनके समर्थकों का विश्वास है कि पूंजीपति वर्ग स्वेच्छा से कुछ भी छोड़ने को तत्पर न होगा. इसके प्रवर्तक क्रमशः कार्ल मार्क्स एवं मिखाइल बकुनिन हैं. दूसरे वर्ग में श्रमिक संघवाद, सहजीवितावाद, सामूहिकतावाद, सहकारिता आदि विचार आते हैं, जो संगठित जनशक्ति का रचनात्मक उपयोग करने के समर्थक हैं तथा किसी न किसी प्रकार सहकारिता से प्रेरितप्रभावित हैं. मार्क्सवाद और अराजकतावाद जहां पूंजीवाद से सीधे टकराने के समर्थक हैं. इसी की समानधर्मा अन्य विचारधाराओं में लेनिनवाद, ट्राट्स्कीवाद, माओवाद, क्रांतिकारी मार्क्सवाद, सामाजिक अराजकतावाद, जैसी विचारधाराएं भी क्रांति के आधार पर बदलाव की समर्थक हैं. वहीं दूसरे वर्ग की विचारधाराएं पूंजीवाद के समानांतर स्वयं को शक्तिशाली और सर्वव्यापी बनाते हुए स्वयं को उसके विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना चाहती हैं. इनमें सहकारिता का विचार सबसे पुराना है. इनके अतिरिक्त ‘अराजकश्रमसंघवाद’(अनार्कोसिंडीक्लिज्म) जैसे सम्मिलित विचार भी जन्मे, जिसमें कोई श्रमिकसंघ अथवा श्रमिक संगठन गणतांत्रिक पद्धति से सत्ता पर अधिकार जमा लेता है, तथा अर्थव्यवस्था का संचालन समाजवादी आदर्शों के अनुरूप करने लगता है. यहां हम इन विचारधाराओं का संक्षिप्त परिचय प्राप्त करेंगे.

अराजकतावाद

अराजकतावाद यानी ‘anarchism’ ग्रीक मूल के शब्द ‘anarchos’ से जन्मा है, जिसके उपसर्ग ‘an-‘ का अर्थ है ‘बिना’(without), जबकि ‘archê’ का अभिप्राय राज्यसत्ता, सरकार अथवा कानून से है. इस प्रकार ‘अनार्किज्म’ का अर्थ हुआ—‘बिना सरकार का राज’. ऐसा राज्य जो नागरिकसंचेतना द्वारा अनुशासित हो. कानून के बजाय जहां मनुष्यता का अनुशासन चलता हो. यह थोपे हुए शासन का विरोध करता है. ‘अनार्किज्म’ के पर्यायवाची के रूप में कुछ विद्वान ‘लिब्रटेरियनिज्म’ यानी ‘स्वाधीनतावाद’ शब्द का उपयोग करते हैं, इसका भी अभिप्राय मनुष्य की अबाधगतिशील स्वाधीनता से है. यह माना गया है कि बाह्यः सत्ता द्वारा आरोपित कानून, पुलिस, न्यायिक संस्थाएं, सैन्य बल आदि मनुष्य की स्वतंत्रता को बाधित करते हैं. इससे सत्ता शक्तिकेंद्र के रूप में ढलती जाती है और प्रकारांतर में वह मनुष्य के नैतिक उत्थान में अवरोधक बनती है. अपनी अधिसत्ता की सुरक्षा के लिए शिखरस्थ शक्तियां समाजिक स्तरीकरण की पोषक संस्थाओं का सहारा लेते हैं. कुछ विद्वान ‘अराजकतावाद’ के स्थान पर ‘लिबर्टेरियन सोशियलिज्म’ ‘स्वाधीनतावादी समाजवाद’ शब्दयुग्म का उपयोग भी करते हैं. विश्व में अराजकतावाद समर्थक दार्शनिकों की खासी संख्या रही है. ईसापूर्व पांचवीछठी शताब्दी में भारत, चीन और यूनान में अराजकतावाद के समर्थक दार्शनिक रहे हैं. चीन में ताओ के शिष्य लाओ जु, चुआंगजु, बाओ जिंग्यान राज्यसत्ता के आलोचक थे. चुआंग जु(369—286) ने किसी भी प्रकार की अधिकारिता को मनुष्यता पर अंकुश माना था. राज्यसत्ता में पलने वाले अन्याय का उल्लेख करते हुए उसने लिखा था कि वह प्रायः अन्यायी का पक्ष लेती है. साधारण व्यक्ति के लिए कानून अनगिनत निषेधाज्ञाओं और प्रतिबंधों का जखीरा खड़ा कर देता है, जबकि शक्तिशाली को मनमानी करने के लिए खुला छोड़ देता है. कानून का लाभ उठाकर सत्ताशीर्ष पर विराजमान लोग जनसाधारण का शोषण और उत्पीड़न करते रहते हैं. राज्य का झुकाव समृद्धिशाली वर्ग की ओर होता है, वह पहले से ही सुविधासंपन्न वर्ग को और अधिक सुखसुविधाएं बटोरने का अवसर प्रदान करता है, जबकि निर्धन उसकी दया पर जीने के लिए विवश होता है.

राज्य के असमानतापूर्ण आचरण के बारे में चुआंग जु ने लिखा था कि उसके बनाए कानून ने—‘मामूली चोर को जेल भेज दिया गया है, जबकि खूंखार डकैत राज्याधिपति बना हुआ है.’ जीवन में कृत्रिमता के विरुद्ध चुआंगजु का मानना था कि प्रत्येक प्राणी अपने आप में पूर्ण है. प्राकृतिक रूप से समृद्ध. सामान्य जीवन जीने के लिए प्राणी को किसी बाह्यः साधन की आवश्यकता ही नहीं है. वह उदाहरण देता है—

घोड़ों के खुर होते हैं, जिनसे वे बर्फीली, फिसलनयुक्त सतह पर चल सकें. बाल होते हैं जो उनकी तेज हवा और ठंड से रक्षा कर सकें. वे प्रकृति में सहज उपलब्ध घास खाते, पानी पीते तथा अपनी मजबूत ऐड़ियों के बल पर लंबी दौड़ भी लगाते हैं. यह घोड़ों का कुदरती लक्षण है. राजसी जीन उनके लिए व्यर्थ है.’

चुआंगजु के विचार सुनकर एक दिन पो लो नामक व्यक्ति उसके सामने पहुंचा और कहने लगा—‘घोड़ों की देखभाल कैसे की जाए, यह मैं भलीभांति जानता हूं.’

उसने घोड़ों पर निशान लगाया, उन्हें बांधा, उनके खुरों को अच्छी तरह से साफ किया, वे भागें नहीं इसलिए पैरों में रस्सा भी डाल दिया. उसके बाद उसने उनपर लगाम कसकर अश्वशाला में बांध दिया. लेकिन इस कोशिश में कुछ दिनों बाद दस में से दोतीन घोड़े मर गए. प्रशिक्षण देने के लिए उसने घोड़ों को भूखा और प्यासा रखा, उन्हें सरपट और दुलकी चाल से दौड़ाया. उनके बालों को तराशा. लगाम कसी. फिर एक दिन ऐसा भी आया जब उनमें से आधों ने दम तोड़ दिया.’

चुआंगजु का यह उदाहरण दर्शाता है कि कृत्रिमता जीवन को सुविधाजनक भले बनाए, किंतु वह अनेक व्यवधान भी खड़े करती है. मनुष्य को हालांकि सामाजिक प्राणी कहा जाता है, लेकिन सामाजिक होना केवल मनुष्य का लक्षण नहीं है. यह गुण अन्य जीवों में भी पाया जाता है. चींटियों, मधुमक्खियों तथा पक्षियों की सामाजिकता पर अनेक ग्रंथ रचे जा चुके हैं. मनुष्य ने लंबा जीवन प्रकृति के सान्न्ध्यि में बिताया है. अब भी प्रकृति पर उसकी निर्भरता कम नहीं हो पाई है. इसलिए उसकी सामाजिकता प्रकृति और नैसर्गिक नियमों से मुक्त नहीं हो सकती, जो जीवन में कृत्रिमता का निषेध करते हैं. जीवन की नैसर्गिकता को बचाए रखने की आवश्यकता के पक्ष में चुआंगजु एक के बाद एक कई तर्क देता है. वह लिखता है कि कुम्हार यह दावा करता है कि वह मामूली मिट्टी को मनमानी आकृति में ढाल सकता है, चाहे गोल हो या चौकोर, आयताकार हो अथवा वृताकार—उसके लिए कुछ भी कठिन या असंभव नहीं है. काष्ठकार यह गुमान करता है कि वह लकड़ी को जैसी चाहे वैसी आकृति देने में कुशल है. चाहे गोलाकार हो या घुमावदार. सीधी हो अथवा आड़ी—सब उसके लिए बाएं हाथ का खेल है. ऐसा ही दावा दूसरे शिल्पकर्मी भी कर सकते हैं. चुआंगजु के अनुसार उपर्युक्त उदाहरण में कुम्हार और काष्ठकार दोनों अपनीअपनी कला का बखान करते हैं. मिट्टी और लकड़ी स्वयं क्या चाहती हैं, उनकी अपनी खुशी किसमें है, यह उनमें से कोई नहीं जानना चाहता. जैसे पो लो ने घोड़ों से साथ वह किया जो वह चाहता था; या जो उसको सिखाया गया था. घोड़े स्वयं क्या पसंद करते हैं. किस कार्य में उन्हें सर्वाधिक खुशी हासिल होती है, यह उसने कभी जानने का प्रयास ही नहीं किया था.

यही प्रवृत्ति शासक की होती है. हर शासक सत्ता पर सवार होते ही मनमानी पर उतर आता है. वह दावा करता है कि उसका शासन जनता के हक में, उसकी बेहतरी के लिए है. जनता स्वयं क्या चाहती है, यह जानने का वह कभी प्रयास तक नहीं करता. जनता के लिए ऐसा शासक अनपेक्षित और अनावश्यक है. राज्यसत्ता को अनावश्यक और अप्रासंगिक बताने वाला चुआंगजु पहला विद्वान नहीं था. उससे लगभग दो शताब्दी पहले जन्मे लाओजु ने साफ लिखा था कि सर्वोत्तम तो यह है कि सरकार हो नहीं. यदि सरकार बनाना अनिवार्य है, तो बुद्धिमानी इसमें है कि उसका स्वरूप एकदम सादा और सरल हो. वह कोई काम न करे. बस शांत बनी रहे. व्यक्तिमात्र को बदलने के लिए, उसको नागरिक धर्म सिखाने के लिए वे अपनी ओर से कौनसा कदम उठाना चाहेंगे, इस प्रश्न के उत्तर में लाओजु का कहना था—

मैं कोई कदम नहीं उठाऊंगा. लोग खुद अपने आप को बदलेंगे. मैं खामोशी का पक्ष लूंगा, लोग स्वयं अपनी मंजिल तय कर लेंगे. मैं कोई कार्रवाही नहीं करूंगा, अपने उत्थान के लिए लोग स्वयं आगे आएंगे….’

लाओजु का मानना था—

संसार में लोगों पर जितने अधिक प्रतिबंध और निषेध थोपे गए हैं, उतनी ही यहां दरिद्रता है….दुनिया में जितने अधिक नियम, कानूनादि होंगे, उतने ही अधिक चोरडकैतदुराचारी यहां होंगे.’

मानवसमूह की कुछ सामान्य विशेषताएं होती हैं. जैसे हर व्यक्ति अपना भोजन स्वयं कमानाकरना पसंद करता है. अपने कपड़े वह स्वयं पहनता है. अनौपचारिक वातावरण में ऐसे अनेक कार्य हो सकते हैं, जिन्हें मनुष्य को स्वयं करने से प्रसन्नता प्राप्त होती हो. कहा जा सकता है कि ये उसके जन्मजात लक्षण हैं. इन कार्यों के लिए किसी बाहरी उपकरण अथवा सहायता की आवश्यकता भी नहीं पड़ती. इस स्तर तक मनुष्य को शासन की भी आवश्यकता नहीं है. यह आदिम अवस्था है. परंतु जब कोई समाज विकास की ओर अग्रसर होता है, तो वह पाता है कि विकास के लिए आवश्यक मानी जाने वाली सभी वस्तुओं का उत्पादन प्रत्येक के लिए संभव नहीं है. अपनी रुचि, स्वभाव, सामथ्र्य के आधार पर व्यक्ति किसी कार्यविशेष में ही निपुण हो सकता है. इन स्थितियों में कार्यविभाजन समाज की आवश्यकता बन जाता है. पूंजीवादी व्यवस्था में कार्यविभाजन का आधार लाभ की वांछा से किया जाता है. उससे समाज में स्पर्धा बढ़ती है, जो एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की दासता के लिए बाध्य करती है. इसलिए आवश्यक है कि कार्यविभाजन लार्भाजन के बजाय सामूहिक कल्याण की भावना से प्रेरित हो, ताकि मनुष्य की स्वतंत्रता किसी भी प्रकार से बाधित न हो.

यूनानी विचारकों में अराजकतावाद का प्रमुख व्याख्याकार हम क्रीटवासी जीनो को पाते हैं. ईसा पूर्व 342 ईस्वी में जन्मा यह प्रतिभाशाली यूनानी दार्शनिक स्टोइक दर्शन का जन्मदाता था. प्लेटो के आदर्श राज्य की परिकल्पना का विरोध करते हुए उसने मुक्त समाज की स्थापना पर जोर दिया था. उसने राज्य की संप्रभुता, शक्ति संपन्नता, नागरिकों के जीवन में हस्तक्षेप करने के उसके अधिकार, ताकत बटोरने हेतु सेनाएं खड़ी करने की प्रवृत्ति तथा साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं का विरोध करते हुए व्यक्तिमात्र की नैतिकता तथा उसको संरक्षण प्रदान करने वाले नियमों का पक्ष लिया था. व्यक्ति की जटिल मनोरचना का विश्लेषण करते हुए जीनो ने लिखा था कि आत्मसंरक्षण और आत्मपरिर्वधन की प्रवृत्ति जहां मनुष्य को अहंवादी बनाती है, वहीं इसको संतुलित करने के लिए एक अन्य प्रवृत्ति भी मानव मन में सतत सक्रिय रहती है, वह है व्यक्तिमात्र में अंतनिर्हित उसका सामाजिकताबोध, जो विश्वभर के जनसमूहों में दूसरे जनसमूहों यानी मानवमात्र के बीच एकता का भाव पैदा करता है. दूसरों से मिलजुलकर रहने का स्वभाव मनुष्य को प्रकृति की ओर से प्राप्त है. मैत्री नैसर्गिक गुण है. इसलिए उसको न तो किसी कानून की आवश्यकता है, न पुलिस, न कोर्टकचहरी की. यहां तक कि उसे धर्म, धर्मालय, धनसंपदा, उपहार आदि की भी कोई आवश्यकता नहीं है. इसके लिए मनुष्य को चाहिए कि वह आवश्यकताओं को सीमित रखे, विलासिता के दुर्गुण को अपने मन में न पनपने दे. अपने अधिकार में ऐसी कोई वस्तु न रखे, जो समाज के दूसरे सदस्यों को सहज उपलब्ध न हो.

यह दुर्भाग्य ही है कि जीनो के अराजकतावादी विचारों को उन दिनों बहुत महत्त्व नहीं दिया जा सका. इसका कारण उसके समकालीन प्लेटो और अरस्तु की उच्चस्तरीय ख्याति थी, जिनके विचार सुकरात के दर्शन की छत्रछाया में विकसित हुए थे. उन दिनों राज्य छोटे थे और और वे आपस में युद्ध करते रहते थे. ऐसे में बिना राज्य के राज्य यानी ‘वैराज्य’ की परिकल्पना के लिए उन दिनों समाज में बहुत कम स्थान था. एक अन्य कारण जीनो की लिखी पुस्तकों का अनुपलब्ध होना है. उसके अराजकतावादी विचारों की झलक छिटपुट रूप से प्राप्त उसके वक्तव्यों में दर्ज है. भारत में बौद्ध धर्म का उदय राजसत्ता का प्रतीकात्मक विरोध था. ‘अप्प दीपोभव’ की चेतना के साथ गौतम बुद्ध ने मनुष्य से अपना मार्गदर्शक स्वयं बनने का आवाह्न किया. उन्होंने बाहरी अनुशासन के बजाय आंतरिक अनुशासन पर जोर दिया. बौद्ध विहारों की स्थापना की जहां जीवन सामूहिकता के नियम से अनुशासित होता था. महावीर स्वामी ने भी स्वयांनुशासित जीवन पर जोर दिया. उन्होंने अहिंसा को अपने दर्शन के केंद्र में रखा जो समाज और सहसंबंधों के स्थायित्व से लिए अपरिहार्य है.

मध्यकाल में अराजकतावादी दर्शन की झलक मार्को जिरोलमो वाइड के विचारों में देखने को मिलती है. अराजकतावाद और स्वाधीनतावाद के बारे में विस्तृत विमर्श हमें सोलहवीं शताब्दी के फ्रांस के दूरद्रष्टा कविदार्शनिक ला बूइटी(1530—1563) के साहित्य में भी प्राप्त होता है. उसने स्वाधीनतावाद के पक्ष में जोरदार तर्क दुनिया के सामने रखे. क्रीटवासी जीनो से प्रभावित बूइटी का विचार था कि तानाशाही चाहे वह बलपूर्वक स्थापित की गई हो, अथवा किसी अन्य माध्यम से, बड़े से बड़ा तानाशाह केवल उस समय तक सत्ता शिखर पर बना रह सकता है, जब तक कि जनता उसको वहां बनाए रखना चाहती है. ऐसे तानाशाह को बलपूर्वक खदेड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती. जनता यदि अपने दासताबोध से बाहर आ जाए तो तानाशाही स्वतः दम तोड़ लेती है. इसलिए आजादी की चाह रखने वाली जनता को सबसे पहले स्वयं दासताचक्र से बाहर निकालना चाहिए. बूइटी को हम सत्याग्रह आंदोलन का आदि प्रवत्र्तक भी मान सकते हैं. यह बात चैंका सकती है कि 1575 में धार्मिक सुधारवादी नेता ह्युजनोट द्वारा प्रकाशित एक पंपलेट में बूइटी ने—

कस्बों और शहर में रहने वाले लोगों से सिविल नाफरमानी का सहारा लेते हुए राज्य को दिए जाने वाला किसी भी प्रकार का टैक्स न चुकाने की अपील की थी.’

बूइटी असल में मानवतावादी विचारक था. उस समय तक भी अराजकतावाद अथवा उसके किसी पर्यायवाची शब्द का चलन नहीं हो पाया था. अंग्रेजी शब्दावली में ‘अनार्किस्ट’ शब्द 1642 में इंग्लेंड के गृहयुद्ध के दौरान उपयोग किया गया. उन दिनों इस शब्द का आशय आज से एकदम भिन्न था. तब यह शब्द उपहास और हेयताबोध दर्शाने के लिए प्रयुक्त किया गया था. प्रयोग करने वाले अंग्रेजी राजशाही के समर्थक थे. उन्होंने इस शब्द का गालीनुमा प्रयोग राजशाही के स्थान पर संसदीय राज्यप्रणाली की मांग कर रहे परिवर्तनवादियों के लिए किया था. 1793 में फ्रांसिसी क्रांति के दौरान साम्राज्यवादी जेकोबिन के विरुद्ध परिवर्तनवादी आंदोलनकारियों द्वारा भी इस शब्द का उपयोग किया था. हालांकि उस समय भी अराजकतावादी होना, उपहास और हंसी का पात्र माना जाता था. आंदोलनकारी भीड़ को संबोधित करते हुए फ्रांसिसी क्रांति के सूत्रधार जेकुइस राॅक्स ने ‘आक्रोश का घोषणापत्र’ में समाज में व्याप्त असमानता पर प्रहार करते हुए कहा था कि ऐसे राज्य में जहां—

एक वर्ग शोषण द्वारा दूसरे वर्ग को भूखा मरने पर विवश कर दे, वहां आजादी सिवाय प्रेतछाया के कुछ नहीं है. जहां धनी अपने एकाधिकार और मनमानी द्वारा निर्धन व्यक्ति के जीवनमरण का फैसला करने लगे, वहां समानता सिवाय प्रेतछाया के कुछ नहीं है. जिस राज्य की तीनचैथाई जनता दिनोंदिन आसमान चढ़ती महंगाई से त्रस्त होकर रातदिन आंसू बहाती हो, वहां गणतंत्र सिवाय प्रेतछाया के कुछ नहीं है.’

अपने घोषणापत्र में रा॓क्स ने जनता से आततायी राजसत्ता को उखाड़ फेंकने का आवाह्न किया था. इस पर साम्राज्यवादियों द्वारा प्रतिक्रियावादी कहकर उसका मजाक उड़ाया गया था. अठारवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक व्यक्तिस्वातंत्रय की मांग विस्तार ले चुकी थी. उन्हीं दिनों इमानुएल जोसेफ सीयेस(1748—1836) ने क्रांतिकारी काम किया, जिसने इतिहास की धारा ही बदल दी. कुलीन मध्यवर्गी परिवार में जन्मे सीयेस ने अपनी शिक्षा धार्मिक माहौल में पूरी की थी. समय आने पर उसको एक चर्च में पादरी की नौकरी मिल गई. लेकिन वह पादरी के परंपरागत कार्य में रमे रहने के बजाय सुधारवादी कार्यक्रमों में प्रवृत्त हुआ. अपने क्रांतिधर्मी विचारों को लेकर सीयेस ने कई छोटेछोटे परिपत्र लिखे, जिन्होंने समाज में नई चेतना का प्रसार किया. उसके लिखे परिपत्रों में ‘तीसरी दुनिया क्या है?(व्हा॓ट इज थर्ड एस्टेट?)’ शीर्षक से लिखा गए परिपत्र में नए युग का संदेश निहित था. कालांतर में यही परिपत्र फ्रांसिसी क्रांति का प्रमुख उत्प्रेरक बना. राजशाही में जनता की हैसियत पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए सीयेस ने लिखा था—

तीसरी दुनिया क्या है?’

सबकुछ.’

अभी तक राजतंत्र में तीसरी दुनिया की हैसियत कैसी है?’

तुच्छ, कुछ भी नहीं.’

इसकी हसरत क्या है?’

थोड़ेसे मानसम्मान की.’

किसी राष्ट्र की जीवंतता और समृद्धि के लिए क्या अनिवार्य है?’

व्यक्तिगत प्रयास एवं सामूहिक कर्तव्यपरायणता.’

सीयेस ने अस्सी प्रतिशत नागरिकों को अधिकार वंचित करने वाली व्यवस्था को चुनौती दी थी. उसके परिपत्र ने जादू का असर किया, इसके बावजूद उनीसवीं शताब्दी के आरंभ तक ‘अनार्किज्म’ तथा उसके समर्थकों के प्रति लोगों का नकारात्मक रवैया बना रहा. अराजकतावाद को कोई भी गंभीरता से लेने को तैयार न था, किंतु उनीसवीं शताब्दी में यूरोपीय नवजागरण के दौर में, विशेषकर रूसो द्वारा व्यक्ति स्वातंत्रय के पक्ष में दिए गए जोरदार तर्कों के बाद अराजकतावाद के प्रति लोगों ने नए सिरे से सोचना आरंभ किया. उनीसवीं शताब्दी में पहली बार विलियम गुडविन(1756—1836) ने पहली बार अराजकतावाद का दर्शन सामने रखा, हालांकि अपने इस दर्शन को उसने कोई नया नाम नहीं दिया था. गुडविन के विचारों का प्रभाव एडमंड ब्रूक, बेंजामिन टुकर पर पड़ा. परंतु उसका श्रेय मिला अमेरिकी सुधारवादी विचारक जोसीह वारेन(1798—1874) को जिसने संभवतः पहली बार राज्य की उपयोगिता को नकारते हुए राज्यविहीन स्वावलंबी बस्तियों की स्थापना पर जोर दिया. राबर्ट ओवेन के सामूहिक आवास बस्तियों के विचार से प्रभावित वारेन के प्रस्तावित स्वावलंबी राज्य में सभी संपत्तियों तथा सेवाकार्यों को सामूहिक बस्तियों के अधिकार में रखा गया था. वारेन द्वारा स्थापित सामूहिक आवास बस्तियों में मानवजीवन पर बाहरी हस्तक्षेप कम से कम था. वे व्यक्तिमात्र की स्वतंत्रता का समर्थन करती थीं, लेकिन निवासियों में सामूहिक जीवन के प्रति निष्ठा का अभाव, अनुभव की कमी के कारण उनका वही अंत हुआ जो राबर्ट ओवेन द्वारा स्थापित ‘न्यू हार्मोनी’ का हुआ था. उन दिनों सहकारिता आंदोलन उठान पर था. वारेन के प्रयासों को भी सहकारिता के उपांग के रूप में देखा गया. असफलता का एक कारण यह भी था कि वारेन ने सहजीवन का पक्ष तो लिया, किंतु राजशाही और साम्राज्यवाद की उतनी तीखी आलोचना नहीं की, जैसी फ्रांसिसी क्रांति के सूत्रधार नेताओं ने की थी.

दर्शन के रूप में ‘अराजकतावाद’ भले ही ढाई हजार वर्ष अथवा उससे भी अधिक पुराना हो, परंतु एक परिपक्व राजनीतिक दर्शन के रूप में इस शब्द का सर्वप्रथम उपयोग 1890 में फ्रांस में पियरे जोसेफ प्रूधों द्वारा किया गया था. वह पहला विचारक था जिसने खुद को जोरदार शब्दों में अराजकतावादी कहते हुए व्यवस्था परिवर्तन की मांग की थी. निजी संपत्ति की अवधारणा को चुनौती देते हुए उसने लिखा था—‘निजी संपत्ति चोरी है तथा संपत्तिधारक व्यक्ति चोर है.’ प्रूधों सीयेस की तीसरे राज्य की अवधारणा से प्रभावित था, जिसने बाइबिल से संदर्भ लेकर राजशाही की तीखी आलोचना की थी. अपने समय में प्रूधों की ख्याति मार्क्स से कहीं बढ़कर थी. प्रूधों जब व्यक्तिगत संपत्ति को चोरी बता रहा था तो उसका आशय उसके कुछ हाथों तक सिमट जाने से था. राज्य चूंकि संपत्ति के केंद्रीयकरण को वैधता प्रदान करता है, इसलिए उसने राज्य की सत्ता को ही अवैध मानते हुए ऐसे राज्य की परिकल्पना की थी, जहां व्यक्ति कानून की अपेक्षा आत्मसंयम एवं आत्मानुशासन से बंधा हो.

अराजकतावाद की सैद्धांतिकी

अराजकतावाद ऐसा विचार अथवा सिद्धांत है जिसमें कोई समाज बिना सरकारी हस्तक्षेप अथवा मदद के आपसी भाईचारा, एकता और खुशहाली के लिए प्रयासरत रहता है. अराजकतावादी समाज में लोग स्वेच्छा और सहमति की भावना से एकदूसरे के साथ सहयोग करते हैं. वहां समर्पण की भावना किसी सत्ता के प्रति न होकर एकदूसरे के प्रति होती है. उत्पादन का कार्य तकनीक विशेषज्ञों, पेशेवरों, कामगारों के समूह द्वारा किया जाता है, जो लाभ के बजाय सामूहिक हितों के लिए स्वेच्छापूर्वक संगठित होते हैं. एम्मा गोल्डमेन ने अराजकतावाद को परिभाषित करते हुए लिखा है—

अराजकतावाद—नव्य सामाजिक व्यवस्था का दर्शन है, जिसमें मानवीय स्वाधीनता को मनुष्यनिर्मित कानूनों द्वारा सुरक्षितसंरक्षित किया जाता है. इस दर्शन की मूल अवधारणा यह है कि सरकार के सभी रूप हिंसा पर टिके होते हैं, इसलिए वे अनुचित, अनावश्यक एवं हानिकारक हैं.’

अराजकतावाद मनुष्य की स्वाधीनता और समृद्धि दोनों की सुरक्षा चाहता है. वह दर्शाता है कि ‘समाजवाद के अभाव में स्वाधीनता कुछ लोगों का विशेषाधिकार और अनाचार है, जबकि स्वाधीनता के अभाव में समाजवाद दासता और क्रूरता का प्रतीक है. अराजकतावाद के आधार पर अनुशासित समाज में स्वयंसेवी संस्थाएं, समितियां उत्पादन, विपणन, अंतरण, शिक्षा, व्यापार, चिकित्सा, यातायात सहित सभी आवश्यक क्षेत्रों तक विस्तृत होती हैं. आवश्यकता पड़ने पर वे सरकार के श्रेष्ठतर विकल्प के रूप में राजनीतिक निर्णय भी लेती हैं. वे उत्पादन, वितरण, संचार, सफाई, शिक्षा, उपचार, सुरक्षा, प्रबंधन, अंतरण, आवागमन आदि समाजोपयोगी कार्यों के लिए विभिन्न आकारप्रकार की स्थानीय, क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर की सभी संस्थाओं, संगठनों, संघीय स्वरूपों को परस्पर जोड़े रखती हैं. साहित्य, कला, संस्कृति आदि मानवरुचि के विभिन्न क्षेत्रों में भी वे समाज के सक्रिय कार्यकत्र्ताओं, संगठनों, जनसमूहों के सहयोग द्वारा परस्पर संबंध बनाए रखती हैं. वे मनुष्य को यह संदेश देती हैं कि पारस्परिक सहयोग और सद्भाव मानवमात्र की आवश्यकता हैं तथा ऐसा कोई भी सुख और संतुष्टि नहीं है, जिसको इनके द्वारा प्राप्त कर पाना असंभव हो. और समाज के पास जो कुछ है, उसपर उसके प्रत्येक सदस्य का अधिकार है.

अराजकतावाद में चूंकि बाहरी सत्ता की पूरी तरह अनुपस्थिति होती है, इसलिए वहां सामाजिक अंर्तद्वंद्वों में खप रही ऊर्जा को अन्य उत्पादक कार्यों में लगा पाना संभव होता है, जिससे अपेक्षाकृत अधिक स्थायी सामाजिक संरचना जन्म लेती है तथा सामाजिक विकास को गति प्राप्त होती है. इस व्यवस्था में उत्पादन कार्य में लगे समूह, लोगों की रुचि एवं आवश्यकता को पहचानकर उत्पादन कर्म में हिस्सा लेते हैं, न कि लाभार्जन की वांछा से. उत्पादन प्रक्रिया में हिस्सा ले रहा व्यक्ति पूरे समाज के प्रति उत्तरदायी होता है, न कि किसी एक व्यक्ति के. एकाधिकारवाद और मनमानी के लिए अराजकतावादी समाज में कोई स्थान नहीं होता, इससे समाज पूंजीवादी समाज की बुराइयों से दूर बना रहता है. वहां उत्पादन के लाभ पर पूरे समूह का अधिकार होता है. चूंकि व्यक्तिमात्र स्वेच्छा और सहयोग भावना से उत्पादनकार्य में हिस्सा लेता है, इसलिए उसकी उत्पादकता अधिकतम होती है. उत्पादन समाज के निर्देशन और आवश्यकता के अनुरूप होने के कारण वहां स्पर्धा का लोप हो जाता है, इससे सामाजिक अंतद्र्वंद्वों में कमी आती है. व्यक्ति को कला, संस्कृति, नैतिकता, आदर्श आदि के मामले में विकास की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त करने के अवसर प्राप्त होते हैं. प्रत्येक व्यक्ति चूंकि नैतिकता और आत्मानुशासन की भावना से शेष समाज के प्रति कर्तव्यरत होता है, इसलिए वहां कानून, अदालत, पुलिस जैसी पूंजीवादी समाजों में सभ्यता का प्रतीक मानी जाने वाली व्यवस्थाएं अपनी प्रासंगिकता खोने लगती हैं. उनमें खप रही समाज की ऊर्जा एवं संपदा का उपयोग अन्य रचनात्मक कार्यों के लिए किया जा सकता है. नागरिकों का आपसी विश्वास बढ़ने से तीव्र सामाजिक विकास संभव होता है.

अराजकतावाद समाजवाद की पूरक विचारधारा है. उसकी आर्थिक नीतियां समाजवाद की आर्थिकी से मेल खाती है. भूसंपदा, संसाधनों पर निजी अधिकारिता तथा पूंजीवादी उत्पादन पद्धतियां अपने एकाधिकारवादी सोच के कारण सामाजिक न्याय की भावना के प्रतिकूल कार्य करती हैं. इससे समाज में विशेषाधिकार संपन्न वर्ग पनपने लगता है. परिणामस्वरूप नवीनतम तकनीक, शिक्षा एवं वैज्ञानिक शोधों का लाभ समाज के सीमित वर्गों तक सिमटकर रह जाता है. इससे धन का ऊपरी वर्गों की ओर संचरण होने लगता है. खुली स्पर्धा के अंतर्गत वे लाभ को अपने पक्ष में मोड़े रखते हैं. परिणामस्वरूप समाज में आर्थिकसामाजिक स्तरीकरण बढ़ता है. अराजकतावादी विचारक मानते हैं कि श्रम एवं मजदूरी की आधुनिक पद्धतियां तथा राज्य के संरक्षण में बने उत्पादन के पूंजीवादी तरीके, समाज के सर्वांगीण विकास में बाधक हैं. इसलिए शक्ति के दम पर टिकी राजसत्ता येनकेनप्रकारेण शक्तिशाली का ही पक्ष लेती है. इससे समाज में अन्याय की मात्रा बढ़ती है. वे यह भी मानते हैं कि राज्य अपने आरंभ से, अब तक भूमि पर सीमित व्यक्तियों के अधिकार को समर्थन देता रहा है. राज्य की अनुमति पर पूंजीवादी शक्तियां लाभ के बड़े हिस्से को पूंजी में बदलकर उसका उपयोग अपने लाभानुपात को और तीव्रता से बढ़ाने के लिए करती हैं. इसलिए भूमि और उत्पादन पर सीमित लोगों के अधिकार को समर्थन देने वाली सामंतवादीपूंजीवादी व्यवस्थाओं के साथसाथ अराजकतावाद को राज्य से भी जूझना पड़ता है, जो सामाजिक असमानताओं को जन्म देने वाली व्यवस्थाओं का पोषणसंरक्षण करता है. अराजकतावाद के लिए इस बात से अधिक अंतर नहीं पड़ता कि सत्ता का स्वरूप कैसा है. तानाशाही अथवा गणतंत्र?

अराजकतावादी विचारक मानते हैं कि सत्ताशिखर पर विद्यमान लोगों के चरित्र में बहुत अधिक अंतर नहीं होता. राज्य का झुकाव केंद्र की ओर होता है. इसी विशेषता के चलते सुविधाभोगी अल्पसंख्यक लोगों के हाथों में असीमित अधिकार एवं शक्तियां सौंप देता है, जिसका उपयोग वे अपनी सत्ता को अक्षुण्ण रखने के लिए बहुसंख्यक वर्गों के अधिकार हनन के रूप में करते हैं. सत्ताशिखर पर विराजमान अल्पसंख्यक वर्ग कानून के समर्थन द्वारा उत्पादन, यातायात, खनन, भूमि, बीमा, विपणन, व्यापार समेत आय के समस्त स्रोतों पर अपना अधिकार जमा लेता है. राज्य के संरक्षण में पलने वाला पूंजीवाद नौकरशाही को बढ़ावा देता है, जिससे केंद्रीय सत्ता निरंतर ताकतवर होती जाती है. इससे मुक्ति का एक ही उपाय है, शक्ति और अधिकारों का विकेंद्रीकरण. अतः अराजकतावाद सत्ता, शक्ति एवं अधिकारों के संपूर्ण विकेंद्रीकरण का पक्ष लेता है, ताकि आमजन की शासन में सहभागिता सुनिश्चित की जा सके. यह कतिपय सर्वाधिक पुराना और अकेला राजनीतिक दर्शन है, जो मनुष्य को उसकी चेतना से जोड़ता है. उसके अनुसार ईश्वर, राज्य, समाज जैसे पारंपरिक विश्वास जो अभी तक सामाजिक चेतना को निर्धारित करने वाले प्रमुख कारक रहे हैं, असल में ये बाहर से थोपी गई यथास्थितिवाद की पोषकसमर्थक और अनावश्यक व्यवस्थाएं हैं. नई सामाजिक संरचना का जन्म मनुष्य के स्वेच्छिक और सहयोगात्मक संगठनों के द्वारा ही संभव है.

अराजकतावाद आज का दर्शन नहीं है. भले ही मानवेतिहास में लंबा दौर ऐसा रहा हो जब इसको हेय और निंदात्मक दृष्टि से देखने वालों की खासी संख्या रही हो. लेकिन लगभग प्रत्येक युग और कालखंड में राजसत्ता और धर्मसत्ता समेत किसी भी प्रकार की सत्ता पर प्रश्न उठाने वाले लोग समाज में हुए हैं. भारतीय धर्मग्रंथों में सतयुग भले ही मिथकीय कल्पना हो, लेकिन उसमें भी ‘राज्यविहीन समाज’ की परिकल्पना की गई है. ‘वैराज’ अर्थात ‘बिना राजा का राज्य’ यहां सम्मानित शास्त्रीय परिकल्पना का हिस्सा रहा है. ऋग्वेद में कहा गया था—‘मनुर्भव! ‘मनुष्य बनो!’ ‘रामराज्य’ की परिकल्पना में भले ही ब्राह्मणवादी दृष्टि रही हो, किंतु इसके मूल में समानताधारित समाज की स्थापना का सपना निहित है. महाभारत तक आतेआते साम्राज्यवाद राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा का रूप ले चुका था. लेकिन मनुष्य के प्रति आस्था उस समय में भी विद्यमान थी, तभी तो व्यास ने लिखा है—

इस सृष्टि में मनुष्य से श्रेष्ठतर कुछ भी नहीं है.’

अराजकतावाद यह शिक्षा देता है कि मनुष्य और समाज में इतना ही अंतर है जितना रक्त और धमनियों में. इमर्सन ने कहा था कि इस संसार में काम की एक ही चीज है. एक जीवंत आत्म, जो हर व्यक्ति में मौजूद होती है तथा हर वस्तु पर निगाह रखती है. आत्मरूप होने के कारण ही व्यक्तिमात्र महत्त्वपूर्ण है. अराजकतावाद संसार में एकता और अभिन्नता का संदेश देता है. चूंकि हर व्यक्ति आत्मरूप है, इसलिए सब एक हैं. सभी को समान अधिकार हैं. कोई छोटा है न बड़ा. इस कारण उनमें से किसी भी उपेक्षा संभव नहीं. अतएव आवश्यकता है कि प्रत्येक के कहे का सम्मान हो. प्रत्येक को अपने परिष्कार के बराबर अवसर प्राप्त हों. प्रत्येक के जीवन की महत्ता है. इसको तभी अक्षुण्ण रखा जा सकता है, जब कि उस पर समाज, राज्य, कानून आदि के न्यूनतम दबाव हों. रूसो ने कहा था—मनुष्य स्वतंत्र जन्मा है, पर हर जगह वह बेड़ियों में है. ये बेड़ियां मनुष्य ने कुछ अपने आप पैदा की हैं, कुछ उसी के स्वार्थी बंधुबांधवों द्वारा पैदा की गई हैं. कुछ प्रसिद्ध बेड़ियों के नाम धर्म, राज्य, संपत्ति आदि हैं, जो मनुष्य की गुलामी के कारक हैं—

इनमें धर्म मानवमस्तिष्क का उपनिवेश है. संपत्ति मानवीय आवश्यकताओं की उपनिवेश है. इसी प्रकार सरकार मानवीय व्यवहार की उपनिवेश है—ये सब मिलकर मानवीय दासता और उसके लिए अन्यान्य डरों का कारण बनते हैं. यहां एक प्रश्न सहज ही उपस्थित हो जाता है कि धर्म! आखिर किस प्रकार यह मानवमस्तिष्क को नियंत्रित करता है? किस तरह से यह आत्मा के उत्पीड़न तथा उसकी अवमानना का कारण बनता है? धर्म कहता है—जो भी है, ईश्वर है, मनुष्य कुछ भी नहीं.’ जबकि इसी ‘नाकुछसे इंसान’ के बल पर ईश्वर ने इस अनाचारी, निरंकुश, कठोर, निर्दयी, आतंककारी, अनमेल सृष्टि की रचना की है. सच तो यह है कि उदासी, आंसू और रक्त मिलकर इस संसार को तब से अनुशासित करते आए हैं, जब से ईश्वर का जन्म हुआ है.’

संपत्ति जो मानवीय आवश्यकताओं का उपनिवेश है, वह मनुष्य के असंतोष को विस्तार देती है. वह कुछ मनुष्यों को यह हौसला भी देती है कि वे दूसरों के सुख की कीमत पर अपने असंतोष का दायरा बढ़ाते रहें. यह हमेशा नहीं था. प्रारंभ में जब सभ्यता का इतना विकास नहीं हुआ था, मानव जीवन पूरी तरह प्रकृतिआश्रित था, तब वह संपत्ति और संसाधनों का भोग करते समय यह ध्यान रखता था कि वे उसके अपने न होकर प्रकृतिप्रदत्त हैं. इसलिए वह प्रकृति के प्रति एक सम्मानभाव से भरा रहता था. अपने साथ वह दूसरों की आवश्यकताओं की चिंता भी करता था. उल्लेखनीय है कि मानवमात्र की कुछ न कुछ आध्यात्मिक जिज्ञासा होती है. धर्म इसी विश्वास को जमीन देता है. सभी व्यक्ति कैसे एक ही आध्यात्मिक विश्वास की ओर प्रेरित हों, कैसे उस जमीन पर संगठित होकर खड़े रहें. इसके लिए धर्म को नैतिकता से जोड़ा गया. चूंकि विराट वसुंधरा पर मनुष्य की चिंताएं एक समान हैं, उनका संघर्ष, सपने और समस्याएं एक हैं, इसलिए विभिन्न धर्मों के आध्यात्मिक विश्वास चाहे जो हों, उनकी नैतिक मान्यताएं आपस में इतनी मेल खाती हैं कि इस आधार पर उनकी पहचान कर पाना अंसभवसा है. कालांतर में सत्ता और संसाधनों पर कब्जे की होड़ में मनुष्यों के अतिमहत्त्वाकांक्षी वर्ग ने प्रकृतिजन्य वस्तुओं पर भी अपना अधिकार जमाना आरंभ कर दिया. इससे अव्यवस्था फैली, जिसको नियंत्रित करने के लिए कानून, पुलिस, न्यायालय आदि बनाए गए. अराजकतावाद मनुष्य को वही नैसर्गिक परिवेश प्रदान करने के लिए संकल्पबद्ध है. यह मनुष्य की अपनी खोज है जो शताब्दियों लंबी सभ्यता की यात्रा में कहीं गुम हो चुकी है. यह मनुष्य द्वारा अपने व्यक्तित्व को संपूर्णता प्रदान करने का प्रयास है.

अराजकतावाद का पक्ष लेते हुए एम्मा गोल्डमेन ने लिखा है कि संपूर्ण मानवीय व्यक्ति उसी समाज और राज्य में संभव है जो उसको अपने कार्य का चयन, उसकी परिस्थितियों का निर्धारण करने की खुली छूट देता हो. तभी व्यक्ति अपने काम का आनंद ले सकेगा. तभी उसकी अधिकतम उत्पादकता संभव है. यह मुमकिन है उस समय उसकी आर्थिक उपलब्धियां कम रह जाएं. पर उसके माध्यम से जो सामाजिक लाभ होंगे, उनके आगे मौद्रिक लाभ गौण पड़ जाएंगे. इसलिए कि सरकार और शासन मनुष्य को बांधते हैं. वहां व्यक्ति की आवश्यकताओं और भावनाओं को एक ही तराजू पर तौला जाता है; तथा मौद्रिक आमदनी के आधार पर मनुष्य के सुख के स्तर की परिकल्पना कर ली जाती है. ऐसी सुविधाओं और स्पर्धाओं से घिरा मनुष्य कितना एकाकी, निरीह और बेबस होता है, इसका आकलन करने अथवा इसपर अंकुश लगाने के लिए कोई कानून दुनिया के किसी भी देश में आज तक नहीं बन पाया है. निरंकुश व्यवहार हर शीर्षस्थ शक्ति का लक्षण है, शायद इसलिए इमर्सन ने कहा था—

सरकार चाहे किसी भी प्रकार की हो, मूलतः तानाशाही का प्रतीक होती है. यह सवाल पूरी तरह अर्थहीन है कि वह सरकार दैवीय अधिकार द्वारा संचालित है अथवा बहुमत के आधार पर. प्रत्येक परिस्थिति में उसका एक ही उद्देश्य होता है, व्यक्तिमात्र को पूरी तरह अपने अधीन बना लेना.’

आधुनिक युग में भी अराजकतावादी विचारकों की लंबी शृंखला रही है. हेनरी डेविड रूसो, बट्रेंड रसेल, पीटर क्रोप्टोकिन, थोरो, महात्मा गांधी जैसे विचारक राज्य की मनमानी से आहत होकर स्वतंत्र, विवेकवान, स्वअनुशासित समाज की स्थापना पर जोर देते रहे हैं. थोरो ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा था कि प्राचीनकाल से आज तक सरकार सिर्फ अपनी समृद्धि, शक्तिसंपन्नता और सफलता पर जोर देती रही है. हर बार उसकी निष्ठा को संदेहजनक पाया गया है. नियम कभी भी मनुष्य को श्रेष्ठ नागरिक नहीं बनाता. कानून के प्रति सम्मान दर्शाता हुआ व्यक्ति अनायास ही अन्याय की ओर मुड़ जाता है. किसी विद्वान की उक्ति याद आती है. कानून की निस्सारता और उसकी असफलता के बारे में उसका कहना था—

दुनिया के सभी कानून व्यर्थ हैं. इसलिए कि बुरा आदमी उनसे सुधर नहीं पाता और भले को उसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती.’

यह मानते हुए कि सत्तामद में शीर्षस्थ शक्तियां सदैव अकसर अधिकारों का उल्लंघन करने लगती हैं, राज्य की आलोचना करने वाले विद्वानों की संख्या खासी रही है. लियो टॉल्सटाय जैसे महान लेखक, विचारक और महात्मा गांधी जैसे नेता अराजकतावाद के समर्थक रहे हैं. टॉल्सटाय द्वारा महात्मा गांधी को लिखित पत्र ‘लेटर टू ए हिंदू’, जिसने उन्हें सत्याग्रह के लिए प्रेरित किया, पर फ्रांसिसी कवि ला बूइटी का प्रभाव था. उनीसवीं शताब्दी का महान अमेरिकी विचारकदार्शनिक हेनरी डेविड थोरो राज्यसत्ता के पर कतर देने के पक्ष में था. उसका मानना था—

सरकार वही सर्वोत्तम है जो बिलकुल भी शासन नहीं करती.

थोरो का ‘सिविल नाफरमानी’ का विचार ही आगे चलकर ‘सत्याग्रह’ के रूप में विकसित हुआ था. महात्मा गांधी की ग्रामस्वराज्य की परिकल्पना भी राज्य की भूमिका को कमतर करने की कोशिश थी. हालांकि भारत में उसको अपेक्षित महत्त्व कभी मिल ही नहीं पाया.

कहा जा सकता है कि अराजकतावाद का लक्ष्य मस्तिष्क को धर्म की अधीनता से, शरीर को संपत्ति की गुलामी से तथा उसकी मानवस्वातंत्रय को सरकार की हड़कड़ियों, बेड़ियों और अन्यान्य बंधनों से मुक्त कराना है. इस लक्ष्य को पाने के लिए वह नागरिक चेतना का पक्ष लेता है. यह मनुष्य के स्वेच्छिक समूहों के गठन के प्रति आग्रहशील होता है, जो समाजकल्याण की व्यापक लक्ष्य के लिए समूहबद्ध होते हैं. यह मानते हुए कि मनुष्य स्वतंत्र जन्मा है तथा उसको अपनी रुचि के अनुरूप सुखोभोग के सभी अधिकार प्राप्त हैं. इसलिए आवश्यक है कि उसपर न्यूनतम नियंत्रण हों. इसके लिए प्रूधों ने ‘सरकार रहित राज्य’ की अवधारणा प्रस्तुत की थी, जिसके लिए उसने ‘अराजकता’ शब्द का उपयोग किया. उसने साम्यवाद का यह कहकर विरोध किया था कि उसमें वैचारिक दुराग्रह के चलते पूरे समाज को मठों और छावनियों में बदल दिया जाता है. वह राज्याश्रित समाजवाद का भी विरोधी था, जिसका समर्थन उसके समकालीन लुइस ब्लेंक जैसे विचारक कर रहे थे. ‘संपत्ति चोरी है’ उक्ति से प्रूधों का आशय था कि संपत्ति अधिकारिता से जुड़े रोमन कानून संपत्ति पर अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकार को मान्यता देते आए हैं. यानी धर्म समाज में व्याप्त आर्थिक विभाजन को न केवल मान्यता देता है, बल्कि पापपुण्य, पुनर्जन्म की अपनी व्याख्याओं के आधार पर उसको तार्किक भी ठहराता है. लेकिन इससे मुक्ति कैसे संभव हो? कैसे धार्मिक पाखंड से समाज की रक्षा की जाए, अपने समकालीन विचारकों की भांति प्रूधों के समक्ष भी यह चुनौती थी. मार्क्स ने श्रमिक समूहों का आवाह्न किया कि वे संगठित विरोध द्वारा उत्पादनतंत्र को अपने अधिकार में ले लें. प्रूधों नहीं चाहता था कि जमींदारों, खान मालिकों, कारखानेदारों आदि को बेदखल करने के लिए हिंसा का उपयोग किया जाए. हिंसा किसी भी मुक्त समाज के लिए वरेण्य नहीं है, इसलिए उसने उस राज्यसत्ता की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किए जो ऊंचनीच और आर्थिक विषमता को अधिमान्य ठहराती है. उसने संपत्ति पर सामूहिक अधिकारिता के विचार का समर्थन किया जो उन दिनों समाजवादियों की प्रमुख मांग थी.

समाज के संसाधनों को सामूहिक अधिकारिता की परिधि में कैसे लाया जा सकता है? संपत्ति को लाभ की अवधारणा से मुक्त करके यह संभव है—प्रूधों का सुझाव था. बैंकों में जो धनराशि हो, वह पूरी तरह ब्याजमुक्त रहे. अपना प्रशासनिक खर्च निकालने के लिए बैंक अधिक से अधिक एक प्रतिशत वार्षिक ब्याज ले सकते हैं. इससे बैंकों से ऋण प्राप्त करना सुविधाजनक होगा. इसके लिए उसने बैंकों के राष्ट्रीयकरण का सुझाव देते हुए आपसी सहमति के सिद्धांत का पक्ष लिया था. यही व्यवस्था अन्य उद्योगों, कामधंधों के लिए भी संभव है. लाभ की कामना से मुक्ति के लिए आवश्यक है कि उत्पादन में जुडे़ समूह अपने उत्पाद का विपणन न कर, आपसी समझौते के आधार पर आदानप्रदान की नीति को अपनाएं. जिसके पास जो वस्तु अपनी आवश्यकता से अधिक है, वह अपनी जरूरत की अन्य वस्तुओं के आधार पर उनका दूसरे उत्पादक समूहों के साथ आदानप्रदान करे. आदानप्रदान का स्वरूप तय करने के लिए प्रत्येक वस्तु में लगे श्रम को कार्यघंटों में बांट दिया जाए. उन्हीं श्रमघंटों के आधार पर लोग अपनी आवश्यकता की वस्तुओं का लेनदेन करें. पारस्परिक सहमति की इस व्यवस्था में सभी सेवाओं को बराबर आंका जाएगा.

प्रूधों का विश्वास था कि समाज में धन को अत्यधिक महत्त्व मिलने से लोगों में उसको अतिरिक्तरूप से अर्जित करने की चाहत पैदा होती है. इससे समाज में स्पर्धा बढ़ती है तथा मुनाफाखोरी भी. धन को लाभ की वांछा से मुक्त कर दिए जाने से समाज में उसका महत्त्व घटेगा, जिससे आर्थिक समानता के लक्ष्य को प्राप्त कर पाना आसान होगा. इस आधार पर गठित समाज में राज्य की भूमिका गौण होगी. संबंध पारस्परिक सहयोग और सद्भावना पर आधारित होंगे. क्या ऐसा समाज विवादों और आपसी अंतद्र्वंद्वों से सर्वथा मुक्त होगा? प्रूधों का मानना था कि मानवीय कमजोरियां वहां भी होंगी. इसके समाधान हेतु उसका सुझाव था कि अराजकतावाद पर आधारित समाज में विवादों का निपटान आपसी समझौते के आधार पर किया जाएगा. परस्पर समर्पित, स्पर्धाविहीन समाज में पुलिस, कानून, न्यायालय आदि की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. अराजकतावाद के प्रति पू्रधों की निष्ठा उसकी पुस्तक ‘व्हा॓ट इज प्रापर्टी’ के इस संवाद से समझी जा सकती है—

क्यों, आप यह सवाल कैसे कर सकते हैं? आप तो गणतंत्रसमर्थक हैं.’

गणतंत्र समर्थक, ठीक है, लेकिन इस शब्द से कुछ साफ नहीं होता. ‘रिपब्लिक’ यानी ‘रेस पब्लिका’ के मायने हैं, जनता से संबंधित मुद्दा. ऐसा कोई मसला जिसका लोकहित से सचमुच संबंध हो, वह न तो इस शब्द की सीमा में आता है, न उस सरकार के जो स्वयं के ‘रिपब्लिकन’ होने का दावा करती है. इस शब्दार्थ के अनुसार तो एक तानाशाह सम्राट भी स्वयं को गणतंत्रवादी कह सकता है.’

समझ गया, तुम प्रजातंत्र समर्थक हो?’

नहीं.’

क्या! क्या तुम्हारा विश्वास राजशाही में है?’

यह भी नहीं.’

संविधानवादी हो?’

भगवान माफ करे!’

अच्छा! तब तुम जरूर कुलीनतंत्र में विश्वास करते होगे?

कतई नहीं.’

क्या तुम चाहते हो कि मिलीजुली बने?

इससे भी कम.’

तुम आखिर चाहते क्या हो?’

मैं अराजकतावादी हूं.’

अराजकतावादी! तुम अवश्य ही परिहास रहे हो. वरना यह तो सरकार पर प्रहार करने जैसा है.’

कदापि नहीं! मैंने बस वही कहा है जो मैं एक मनुष्य के रूप में सोचता रहा हूं. मैं अनुशासन का कट्टर समर्थक हूं, लेकिन कुल मिलाकर हूं एक अराजकतावादी ही.’

प्रूधों के बाद अराजकतावाद की सैद्धांतिकी को आगे बढ़ाने वाले विद्वानोंआंदोलनकारियों में महत्त्वपूर्ण नाम है—मिखाइल बकुनिन(30 मई, 1814—1 जुलाई, 1876) का. मार्क्स के समकालीन बकुनिन की उससे कई मुद्दों में गहरी असहमति थी. हालांकि दोनों ही पूंजीवाद और साम्राज्यवाद से मुक्ति चाहते थे. दोनों का ही रुझान समाजवाद की ओर था. दोनों ने ही फ्रांस की समाजवादी क्रांति में हिस्सा लिया था. प्रथम इंटरनेशनल की बैठक के दौरान उनके मतभेद खुलकर सामने आए थे, जो प्रकारांतर में उसकी असफलता का कारण भी बने. मार्क्स जहां श्रमिक वर्ग की अधिसत्ता में विश्वास रखता था, वहीं बकुनिन किसी भी प्रकार की सत्ता को मनुष्यता के लिए घातक मानता था, इसलिए उसने अराजकतावाद का समर्थन किया, किंतु मार्क्स की बौद्धिक प्रतिष्ठा के आगे बकुनिन के विचार अपना अपेक्षित प्रभाव न छोड़ सके. अपने अतिसक्रिय जीवन में उसने श्रमिकों और दासों की मुक्ति के लिए एक गोपनीय संगठन ‘इंटरनेशनल ब्रदरहुड’ का गठन किया था, जिसमें फ्रांस, इटली, स्केंडनेविया, स्वीडन, नार्वे, डेनमार्क, बेल्जियम, इंग्लेंड, स्पेन, पोलेंड, रूस आदि देशों के दास और श्रमिकसंगठन सम्मिलित थे. वह राजसत्ता की भांति धर्मसत्ता को भी मनुष्य की पराधीनता का कारण मानता था. अपने निबंध ‘केटकिज्म आफ ए रिवोल्युशनरी’ में उसने धर्मसत्ता और राजसत्ता दोनों का यह कहकर विरोध किया था कि—

किसी भी प्रकार की सत्ता के किसी भी रूप, जिसमें राज्य की सुविधा के नाम पर नागरिकों की स्वतंत्रता न्योछावर करा ली जाती है, का संपूर्ण निषेध.’

बकुनिन की आस्था समाजवाद में थी, किंतु समाजवाद की संरचना किसी गुलाम समाज में संभव नहीं, ऐसे समाज में भी वह असंभव है, जहां अभिव्यक्ति के अधिकार को बाधित किया जाता है. इसलिए बकुनिन स्वाधीनता के बगैर समाजवाद को दिवास्वप्न मानता था. उसका कहना था कि—

बगैर समाजवाद स्वाधीनता कुछ लोगों का विशेषाधिकार और अन्याय है, जबकि समाजवाद के बिना स्वाधीनता दासता और पाशविकता.’

मिखाइल बकुनिन ने श्रमिकों का आवाह्न किया था कि वे अपने उत्पादन संगठन बनाएं तथा उत्पादन कार्य को अपने हाथ में ले लें. उत्पादन, शिक्षा, अर्जन, भोजन, आवास आदि के साधन सामूहिक होने चाहिए. प्रत्येक बालक को चाहे वह लड़का हो अथवा लड़की, भोजन, वस्त्र, शिक्षा, आदि के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए. बड़ा होने पर उसको अपनी रुचि का व्यवसाय चुनने, सम्मानजनक ढंग से आजीविका कमाने का अवसर मिले, ताकि वह अपनी स्वाधीनता और श्रम का भरपूर आनंद ले सके. कुछ अराजकतावादी स्वाधीनता को समानता की अपेक्षा अधिक महत्त्व देते थे. यहां तक कि स्वाधीनता के पक्ष में वे समानता के लक्ष्य को टालने के भी समर्थक थे. बेंजामिन टुकर ने कहा था कि समानता हमें चाहिए—

यदि हम इसको प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन स्वाधीनता हमें किसी भी कीमत पर चाहिए.’

समानता सहकारिता का अभीष्ठ है. सहकारी समूह अपने सदस्यों के बीच हर तरह की समानता का पक्ष लेता है. स्वाधीनता के अभाव में स्वैच्छिक सहयोग असंभव है. इसलिए अजारकतावादी का सहकार एवं समाजवाद का समन्वित रूप था. मार्क्स के साम्यवाद से थोड़ा अलग. हालांकि दोनों का ही लक्ष्य राजनीति और अर्थव्यवस्था को समाजवादी भावना के अनुरूप ढालना था. उसके सिद्धांत को ‘सांगठनिक अराजकतावाद’ कहा जाता है.

अराजकतावाद के सिद्धांत के आधार पर किसी प्रथक राज्य का गठन तो नहीं हो सका, तो भी उनीसवीं शताब्दी के बाद से ही यह यह दर्शन परिवर्तनकामी विचारकों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों को आकर्षित करता रहा है. विलियम थांपसन, मिखाइल बकुनिन, लियो टाल्सटाय, जॉन ग्रे, जे. एफ. फ्रे. जोसीह वारेन, एडवर्ड कारपेंटर, फ्रैड्रिक नीत्शे, जॉन स्टुअर्ट मिल, लार्ड गैरीसन, हेनरी डेविड थोरो, एम्मा गोल्डमेन, स्पेंसर, पीटर क्रोप्टकिन, नोम चामस्की, महात्मा गांधी, भगत सिंह आदि उनीसवींबीसवीं शताब्दी के अनेक महत्त्वपूर्ण विचारक, नेता, साहित्यकार अराजकतावाद का समर्थन करते आए हैं. अराजकतावाद का पूरक सिद्धांत ‘स्वाधीनतावाद’ तो बीसवीं शताब्दी के प्रायः सभी महत्त्वपूर्ण लेखकों, साहित्यकारों का सर्वाधिक पसंदीदा विषय रहा है.

इकीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में अराजकतावाद ने अपने पंख फैलाए हैं. इन दिनों विश्व का सबसे बड़ा अराजकतावादी आंदोलन स्पेन में चल रहा है. वहां ‘नेशनल कन्फेडरेशन आ॓फ लेबर’(1910) तथा ‘जनरल कन्फेडरेशन आफ लेबर(1979) नामक अराजकतावाद समर्थकों के दो बड़े संगठन हैं. इनमें नेशनल कन्फेडरेशन आ॓फ लेबर के सदस्यों की संख्या लगभग 50000 है, जबकि दूसरे संगठन की सदस्य संख्या 2003 में 1 लाख से ऊपर थी. इसके अलावा अमेरिका, फ्रांस, इटली आदि देशों में भी अराजकतावाद के समर्थक विचारकों, लेखकों, संगठनों की अच्छीखासी संख्या है. आदर्श के सर्वाधिक निकट होने के बावजूद अराजकतावाद विश्वसमाज में अपना सम्मानजनक स्थान बना पाने में असमर्थ रहा है. इसका कारण यह हो सकता है कि सहस्राब्दियों से राजशाही, सामंतवाद तथा अन्यान्य व्यवस्थाओं के अनुशासन में स्वयं को ढालने में अभ्यस्त हो चुका जनसमाज, बिना सत्ता के राज्य की कल्पना ही नहीं कर सकता. ऐसे लोगों के लिए अराजकता आज भी नकारात्मक स्थिति है. दूसरे धर्म के सामंती ढांचे में बंधे समाजों की मानसिकता समर्पण की होती है, जो आत्मचेतित समाज के राजदर्शन ‘अराजकतावाद’ के विरुद्ध जाती है. इसलिए अराजकतावाद को यदि जनमानस में अपनी व्यापक पैठ बनानी है तो उसको बड़े स्तर पर लोकप्रबोधीकरण का आंदोलन खड़ा करना होगा, जो मनुष्य के उपभोक्ताकरण जिसमें पूंजीवाद के प्राण बसते हैंके सर्वथा विरुद्ध है.

© ओमप्रकाश कश्यप