वज्रसूची

उपनिषद((सामवेद)

हिंदी अनुवादक : ओमप्रकाश कश्यप

[‘वज्रसूचि’ बौद्ध विद्वान अश्वघोष(50 ईस्वी पूर्व—50 ईस्वी) द्वारा विरचित लघु उपनिषद है. इसमें हिंदुओं की वर्ण-व्यवस्था पर प्रहार किया गया है. अश्वघोष की वर्ण-व्यवस्था के औचित्य के खंडन के लिए अश्वघोष ब्राह्मण ग्रंथों से ही उदाहरण देते हैं. उनके तर्क तीखे, कहीं-कहीं व्यंजना लिए हुए हैं. इस उपनिषद का पहला अंग्रेजी अनुवाद रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के लिए बी.एच. हॉडग्सन द्वारा 1829 में किया था, जो लंदन से 1835 में प्रकाशित किया गया था. उससे पहले रॉयल सोसाइटी के सचिव के नाम 11 जुलाई 1929 को लिखे गए पत्र में हॉडग्सन ने लिखा था कि ‘वज्रसूची’ के अनुवाद में मदद करने के लिए उन्होंने ‘बनारस के एक पंडित’ को रखा था, लेकिन वह बीच में ही काम को अधूरा छोड़कर चला गया था. जैसे-तैसे उन्होंने अनुवाद कार्य को पूरा किया.

उपनिषद् के हिंदी अनुवाद हेतु सुजीत कुमार मुखोपाध्याय के अंग्रेजी अनुवाद की मदद ली गई है, जो विश्वभारती, शांतिनिकेतन द्वारा प्रकाशित 1849 में प्रकाशित हुआ था. अपने तीखे और विद्वतापूर्ण तर्कों के माध्यम से अश्वघोष जिस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, वह कालातीत और चिर-प्रासंगिक है—

‘हे राजन्। मनुष्य की जाति नहीं देखी जाती। उसके गुण ही उसके श्रेष्ठत्व की पहचान हैं। सिर्फ वही महत्वपूर्ण हैं। ऐसा व्यक्ति जो परोपकारी जीवन जीता है, जो सदैव धैर्य-धृत्ति और क्षमा का अनुसरण करता है, ईश्वर की दृष्टि में वही श्रेष्ठ जन है।’]

पुस्तक की खूबी है कि तर्क पूर्ण विवेचना से अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने के बावजूद अश्वघोष अपनी ओर से कोई फैसला थोपते नहीं हैं, अपितु आगे का काम पाठकों के विवेक पर छोड़ देते हैं. यह गुण इसे दूसरे उपनिषदों से अलग करता है.

वज्रसूची का अर्थ है—हीरे की सुई. तो अब आप हीरे की सुई को पढ़िए, परखिए और काम लीजिए.

 

वज्रसूची

ओम नमो मञ्जुनाथाय।

मैं अश्वघोष सर्वप्रथम अपने गुरु मंजुनाथ को नमन करता हूं

जगद्गुरुं मञ्जुघोषं नत्वा वाक्कायचेतसा

अश्वघोषो वज्रसूचीं सूत्रयामी यथामतम्।1।

अपनी अंतरात्मा और पूरी शक्ति के साथ जगद्गुरु मंजुनाथ का नमन और स्मरण करने के पश्चात मैं शास्त्र के अनुसार वज्रसूची नामक इस ग्रंथ को लिखना आरंभ करता हूं।1।

वेदाः प्रमाणं स्मृतयः प्रमाणं धर्मार्थयुक्तं वचनं प्रमाणम्।

यस्य प्रमाणं न भवेत्प्रमाणं कस्तस्य कुर्याद्वचनं प्रमाणम्।2।

आपके वेद प्रमाण हैं, स्मृतियां प्रमाण हैं। धर्म-सम्मत आधार पर कहे गए वचन भी प्रमाण हैं। जो प्रमाण को प्रमाण के रूप में स्वीकारने से इन्कार करेगा, उसके कथन को प्रमाण के रूप  में भला कौन स्वीकार करेगा।

  1. इह भवता यदिष्टं सर्ववर्ण प्रधानं ब्राह्मणवर्णइति, वयमत्र ब्रूम: कोऽयं ब्राह्मणो नाम। किं जीवः किं जातिः किं शरीरं किं ज्ञानं, किमाचारः किं कर्म किं वेद इति।

आपके शास्त्रों के अनुसार सृष्टि में ब्राह्मण ही सर्वश्रेष्ठ हैं। यदि ऐसा है तो यह बताइए कि ब्राह्मण कौन हैं? किसे ब्राह्मण कहा जाए? क्या आत्मा को? अथवा शरीर को? मनुष्य ब्राह्मण कुल में जन्म लेने से ब्राह्मण होता है अथवा ज्ञान से? क्या व्यक्ति का आचार उसे ब्राह्मण बनाता है, अथवा उसका ज्ञान? किसी व्यक्ति के कर्म उसे ब्राह्मण बनाते हैं, अथवा वेद-शास्त्रों में प्रवीणता प्राप्त कर लेने के पश्चात वह ब्राह्मण बन पाता है?

  1. तत्र जीवस्तावद् ब्राह्मणो न भवति। कस्माद्। वेदस्य प्रामाण्याद्। उक्तं हि वेदेः।

यदि आप कहते हैं कि जीव ही ब्राह्मण है तो यह सच नहीं है। क्योंकि वेद जीव(आत्मा) को ब्राह्मण नहीं मानते।

  1. ओं सूर्यः पशुरासीत्, सोमः पशुरासीद्, इंद्र पशुरासीत्।

पश्वो देवाः। आद्यन्ते देवपशवः। श्वपाका अति देवा भवन्ति।।

  • ओं, वेदों के अनुसार पहले सूर्य पशु था, चंद्रमा पशु था और इंद्र भी पशु ही था। कुछ देवता पहले पशु थे, बाद में(जन्मांतर के पश्चात) वे देवता कहलाए। यहां तक कि कुत्ते का मांस खाने वाला भी बाद में देवता(ब्राह्मण) बन गया था।
  1. अतो वेदप्रामाण्यान्मन्यामहे जीवस्वाद् ब्राह्मणो न भवति।

भारत-प्रामाण्यादपि। उक्तं हि भारतेः।

  • वेदों के आधार पर प्रमाणित होता है कि जीव(आत्मा) ब्राह्मण नहीं है। इसे महाभारत भी पुनःप्रमाणित करता है।
  •  

सप्तव्याधा दशार्णेषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ।

चक्रवाकाः शरद्वीपे हंसाः सरसि मानसे।3।

तेऽपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा  वेदपारगाः।4।

उसके अनुसार एक बार कलिंजर पहाड़ी के सात शिकारी, दस हरिण, मानस-सरोवर झील की एक बत्तख और शरद् द्वीप का चावक पक्षी—इन सभी का जन्म कुरुक्षेत्र में ब्राह्मण के रूप में हुआ था, आगे चलकर ये सभी वेद-पारंगत हुए।3-4।

  • अतो भारतप्रामाण्याद् व्याधमृगहंसचक्रवाकदर्शन सम्भवान्मन्यामहे जीवस्तादु ब्राह्मणो न भवति। मानवधर्मप्रामाण्यादपि। उक्तं हि मानवे धर्मेः।

अधीत्य चतुरो वेदान्सांगोपांगेन तत्त्वतः

शूद्रात्प्रतिग्रहग्राही ब्राह्मणो जायते खरः।5।

खरो द्वादशजन्मानि षष्टिजन्मानि सूकरः

श्वानः सप्ततिजन्मानि—इत्यमेवं मनुरब्रवीत्।6।

5. अतएव महाभारत के अनुसार, हम मानते हैं कि एक भेड़िया, एक हरिण, एक हंस, एक चक्रवाक पक्षी को भी ब्राह्मण के रूप में देखना(पुनर्जन्म लेना) संभव है। इसलिए जन्म लेने मात्र से ही कोई ब्राह्मण नहीं बनता है। यह मनुस्मृति से भी प्रमाणित है। उसमें कहा गया है—

“ब्राह्मण, वेद-वेदांगों के सांगोपांग अध्ययन द्वारा जो ग्रहण करता है, शूद्र से भिक्षा अथवा दान लेने पर वह नष्ट हो जाता है । मरणोपरांत वह गधे के रूप में जन्म लेता है।5 ।

बारह जन्मों तक गधे की योनि में जन्म लेने के बाद वह साठ जन्मों तक सूअर के रूप में जन्मता है. तदनंतर उसे लगातार सत्तर बार कुत्ते की योनि में जन्म लेना पड़ता है।6।   

  • अतो मानवधर्म प्रामाण्याज्जीवस्तावद् ब्राह्मणो न भवति।

6. अतएव मानवशास्त्र, श्रुति एवं स्मृति के आधार पर यह आत्मा ब्राह्मण नहीं हैं।

  • जातिरपि ब्राह्मणें न भवति। कस्मात्। स्मृति प्रामाण्याद्। उक्तहिं स्मृतौः

7. सिर्फ जन्म मात्र ही कोई मनुष्य ब्राह्मण नहीं हो जाता। क्यों? स्मृति में यही कहा गया है। स्मृति-ग्रंथों में लिखा है—

हस्तिन्यामचलो जात उलूक्यां केशपिंगलः

अगस्त्योऽगस्तिपुष्पाच्च कौशिकः कुशसम्भवः।7।

कपिलः कपिलाजातः शर गुल्माच्च गौतमः

द्रोणाचार्यस्तु कलशात्तित्तिरिस्तित्तिरीसुतः।8।

रेणुकाऽजनयद्राममृष्यशृंगमुनिं मृगी

कैवर्तिन्यजनयद् व्यासं कुशिकं चैव शूद्रिका।9।

विश्वामित्रं च चण्डाली वशिष्ठं चैव उर्वशी

न तेषां ब्राह्मणी माता लोकाचाराच्च ब्राह्मणाः।10।

अचल मुनि का जन्म हथिनी के गर्भ से, केशपिंगल ऋषि का उल्लू से, आगस्त्य मुनि का अगस्ति पुष्प से, कौशिक का जन्म कुश(घास) से हुआ था। पुनश्चः कपिल मुनि का जन्म कपिता(अग्नि, बंदर) से, और गौतम का चीटिंयों से, द्रोणाचार्य का कलश से, तैत्तिरीय मुनि का तीतरी के गर्भ से, परशुराम का रेणु(धूल) से, श्रृंगी ऋषि का हरिणी के गर्भ से, व्यासमुनि का जन्म एक मल्लाह स्त्री से, कौशिक मुनि का जन्म एक शूद्र स्त्री से, विश्वामित्र का जन्म चांडाल स्त्री के गर्भ से तथा वशिष्ट मुनि का जन्म उर्वशी नामक अप्सरा के गर्भ से हुआ था। इनमें से किसी की भी मां ब्राह्मणी नहीं थी। बावजूद इसके ये सभी शुद्ध ब्राह्मण के रूप में विख्यात हुए। इन्हें सिर्फ लोकाचार में ब्राह्मण का दर्जा दिया गया है, ग्रंथों के आधार इनके ब्राह्मणत्व की पुष्टि संभव नहीं है।7-10।

  • अतः स्मृतिप्रामाण्या न्मन्यामहे जातिस्तावद् ब्राह्मणो न भवति।

8. इस तरह स्मृति ग्रंथों द्वारा प्रमाणित होता है कि जन्म के आधार पर कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण नहीं होता।

IX.  अथ मन्यसे माता वाऽब्राह्मणी भवेत्। तेषां पिता ब्राह्मण स्ततो ब्राह्मणो भवतीति। यद्येवं दासीपुत्रा अपि ब्राह्मणजनिता ब्राह्मणा भवेयुः। न चैतद्भवतामिष्ठम्।

9. अब यदि आप यह कहते हैं कि माता भले अब्राह्मणी हो, पिता यदि ब्राह्मण है तो संतान ब्राह्मण ही मानी जाएगी। यदि इसे मान लिया जाए तो ब्राह्मण द्वारा दासियों द्वारा उत्पन्न संतान को भी ब्राह्मण का ही दर्जा मिलना चाहिए। लेकिन आप इसे स्वीकार नहीं करेंगे।

  • किं च। यदि ब्राह्मणपुत्रो ब्राह्मणस्तर्हि ब्राह्मणाभावः प्राप्नोति। इदानीन्तानेषु ब्राह्मणेषु पितरि सन्देहाद्। गोत्रब्राह्मणमारभ्य ब्राह्मणीनां शूद्राभिगमनदर्शनाद्। अतो जातिर्ब्राह्मणो न भवति। मानवधर्मप्रामाण्यादपि। उक्तं हि मानवे धर्मेः।

10. क्या आप यह कहें कि ब्राह्मण की औरस संतान ही ब्राह्मण होती है। यदि आप उसी को शुद्ध और सच्चा ब्राह्मण मानते हैं तो मुझे उससे भी आपत्ति है। क्योंकि आज के युग के ब्राह्मण, ब्राह्मणों से ही उत्पन्न हैं, यह बात ही संदेहास्पद है। माना जाता है कि आरंभ से ही, यहां तक कि जब से ब्राह्मणत्व की संकल्पना जन्मी, ब्राह्मण गोत्र की स्त्रियों का संबंध शूद्रों से था; और आज भी है। यदि वास्तविक पिता ही शूद्र है तो उनकी संतान ब्राह्मण हो ही नहीं सकती। इसका मां के ब्राह्मण होने से कोई संबंध नहीं है। इसके आधार पर मैं कहना चाहता हूं कि ब्राह्मणत्व को सिर्फ जन्म के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा सकता। मनुस्मृति से भी यही प्रमाणित होता है। उसमें कहा गया है—

सद्यः पतति मांसेन लाक्षया लवणेन च

त्याहाच्छूद्रश्च भवति ब्राह्मणः क्षीरविक्रयी।11।

आकाशगामिनो विप्राः पतन्ति मांसभक्षणात्

विप्राणां पतनं दृष्टा ततो मांसानि वर्जयेत्।12।

मनुस्मृति इस बात का प्रमाण है कि जो ब्राह्मण मांस भक्षण करता है, वह अपना ब्राह्मणत्व गंवा देता है। यही नहीं सोम, नमक या दूध का व्यापार करने वाला ब्राह्मण भी तीन दिनों के भीतर शूद्र हो जाता है। जो ब्राह्मण चमत्कारी शक्ति से आकाश-गमन करते हैं, यदि वे मांस भक्षण करें तो जमीन पर आ गिर पड़ते हैं। ऐसे पराभव की संभावना को टालने के लिए ब्राह्मणों के लिए मांस सेवन को वर्जित किया गया है।11-12।

XI. अतो मानवधर्मप्रामाण्याज्जातिस्तावद् ब्राह्मणो न भवति। यदि हि जातिर्ब्राह्मणः स्यात् तदा पतने शूद्रभावो नोपद्यते। किं खलु द्रुष्टोऽप्यश्वः सूकरो भवेत्। तस्माज्जातिरपि ब्राह्मणो न भवति।

11. स्पष्ट है कि मनु धर्म के प्रमाणनुसार ब्राह्मणत्व वह नहीं है जो  जन्म से प्राप्त होता है। यदि किसी को जन्म से ब्राह्मण दर्जा प्राप्त है तो कर्म के आधार पर उसे शूद्र माना ही नहीं जा सकता। क्या कभी किसी घोड़े को किसी दोष के कारण सूअर बनते देखा है! इससे स्पष्ट है कि जन्म से कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण नहीं होता।

XII.  शरीरमपि ब्राह्मणो न भवति। कस्माद्। यदि शरीरं ब्राह्मणः स्यात् तर्हि पावकोऽपि ब्रह्महा स्याद्। ब्रह्महत्या च बंधूनां शरीरं दहनाद्भवेद्। ब्राह्मणशरीरनिस्यन्दजातश्च क्षत्रियवैश्यशूद्रा अपि ब्राह्मणा स्युः। न चैतदद्ष्टं। ब्राह्मणशरीविनाशाच्च यजनयाजनाध्ययनाध्यापनदान -प्रतिग्रहादीनां ब्राह्मण-शरीरजनितानां फलस्य विनाशः स्यात्। न चैतदिष्टम्। अतो मन्यामहे शरीरमपि ब्राह्मणो न भवति।

12. क्या आप कहते हैं कि यह शरीर ब्राह्मण है? तब भी आप गलत हैं। इसलिए कि यदि यह शरीर ही ब्राह्मण है तो मृत्योपरांत ब्राह्मण के शरीर को अग्नि के सुपुर्द करने वालों को ब्रह्म-हत्या का पापी समझा जाना चाहिए। यह दोष मृतक ब्राह्मण के सभी मित्रों-संबंधियों को जो अंतिम संस्कार के समय उपस्थित थे, लगना चाहिए।

फिर यदि शरीर ही ब्राह्मण है तो क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जो ब्राह्मण के शरीर से अथवा जो ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रादि स्त्रियों के साथ संसर्ग द्वारा उत्पन्न हैं, उन्हें भी ब्राह्मण का दर्जा प्राप्त होना चाहिए। किंतु ऐसा नहीं होता।

पुनश्चः यदि शरीर ही ब्राह्मण है तो यज्ञादि कर्मकांडों में भाग लेना या दूसरों को उसके लिए प्रेरित करना, अध्ययन-अध्यापन, दान देना, दान लेना आदि ये सभी कृत्य शरीर द्वारा ही निष्पादित किए जाते हैं. जो उनको जो लोग मानते हैं, उनसे पूछना चाहिए कि क्या ब्राह्मण के शरीर के नष्ट हो जाने से इन सब कृत्यों के गुण-धर्म भी नष्ट हो जाते हैं? निश्चित रूप से ऐसा नहीं होता। सो स्पष्ट है कि यह शरीर ब्राह्मण नहीं है।

XIII.    ज्ञानमपि ब्राह्मणो न भवति। कुतः। ज्ञानबाहुल्याद्। ये ये ज्ञानवन्तः शूद्रास्ते सर्व एव ब्राह्मणाः स्युः। दृश्यन्ते च क्वचित शूद्रा अपि वेदव्याकरणमीमांसासांख्य-वैशेषिकलग्ना जीवकादिसर्वशास्त्रार्थ विदः। न चे ते ब्राह्मणाः स्युः। अतो मन्यामहे ज्ञानमपि ब्राह्मणो न भवति।

13. तो क्या आप मानते हैं कि ज्ञान व्यक्ति को ब्राह्मण बनाता है? यह भी गलत है। क्यों? इसलिए कि यदि यह सच होता तो अनेक शूद्र जिन्होंने अपने ज्ञान के बल पर बहुत-सा ज्ञान अर्जित किया है, जिन्हें प्रकांड पांडित्य हासिल है, उन्हें भी ब्राह्मण बन जाना चाहिए था। ऐसे अनेक शूद्रों को देखा गया है जो सभी वेद-वेदांगों, विद्याओं, धर्मशास्त्रों तथा उनकी शाखा-प्रशाखाओं, व्याकरण-मीमांसा-सांख्य-वैशेषिक-जैन धर्म, आजीवक दर्शन सहित ज्योतिष, तत्वज्ञान आदि समस्त विद्याओं में निष्णात हैं। लेकिन उनमें से कितनों को ब्राह्मणत्व हासिल हो पाया है?

इससे स्पष्ट है कि ज्ञान, अध्ययन-अध्यापन आदि भी ब्राह्मणत्व का लक्षण नहीं है। सिर्फ ज्ञानी होने से किसी को ब्राह्मणत्व से युक्त नहीं माना जा सकता।

XIV. आचारोऽपि ब्राह्मणो न भवति। कुतः यद्याचारो  ब्राह्मणः स्यात् तदा ये य आचारवन्तः शूद्रास्ते सर्वे ब्राह्मणाः स्युः। दृश्यन्ते च नटभटकैवर्तभण्डप्रभृतयः प्रचण्डतरविविधारवन्तो, न चे ते ब्राह्मणा भवन्ति। तस्मादाचारोऽपि ब्राह्मणो न भवति।

14.  आचार से भी मनुष्य को ब्राह्मण का दर्जा हासिल नहीं होता। यदि ऐसा होता तो जितने भी आचारवान शूद्र हैं, वे सब के सब कभी के ब्राह्मण बन गए होते। यह देखा भी जाता है कि अनेक नट, भाट, भांड, कैवर्त और अन्य लोग तरह-तरह के सदाचरण का बहुत गंभीरता से पालन करते हैं। उनका आचरण निर्मैल्य होता है। फिर भी वे ब्राह्मण नहीं बन जाते।

तदनुसार यह सिद्ध है कि आचार के आधार पर भी किसी मनुष्य को ब्राह्मण घोषित नहीं किया जा सकता।

XV. कर्मापि ब्राह्मणो न भवति। कुतः। दृश्यन्ते हि क्षत्रियवैश्य शूद्रा यजन-याजनाध्ययनाध्यापनदानप्रतिग्रह प्रसंग विविधानि कर्माणि कुर्वन्तो न च ते ब्राह्मणा भवतां सम्मताः। तस्मात्कर्मापि कर्माणि ब्राह्मणो न भवति।

15. व्यक्ति अपने कर्मों से भी ब्राह्मण नहीं बनता। न ही व्यक्ति की जीवनवृति उसे ब्राह्मण बनाती है। कैसे? अकसर देखा गया है कि क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रादि भी अध्ययन-अध्यापन, यज्ञादि कर्मकांड, दान-प्रतिग्रह, जिन्हें ब्राह्मणत्व का लक्षण माना गया है—करते पाए जाते हैं। उन सब कर्मों को करने के बाद भी कोई व्यक्ति ब्राह्मण न नहीं बन पाता है।

इससे सिद्ध है कि व्यक्ति की वृति उसे ब्राह्मण नहीं बनाती।

XVI.  वेदेनापि ब्राह्मणो न भवति। कस्माद्। रावणो नाम राक्षसोऽभूत्। तेनाधीताश्चत्वारो वेदाः। ऋग्वेदो, यजुर्वेद, सामवेदोऽथर्ववेदश्चेति। राक्षसानामपि गृहे-गृहे वेद-व्यवहारः प्रवर्तत एव। न चे ते ब्राह्मणः स्युः। अतो मान्यामहे वेदेनापि ब्राह्मणो न भवतीति।

16. तो क्या वेदाध्ययन के माध्य्यम  व्यक्ति ब्राह्मण बन पाता है? नहीं। वेदाध्ययन से भी व्यक्ति ब्राह्मण नहीं बन पाता। ऐसा क्यों होता है? रावण नामक राक्षस चारों वेदों यथा ऋक्, यजु, साम और अथर्ववेद का ज्ञाता था। राक्षसों के यहां हर घर में वेदानुरूप आचरण किया जाता था। तथापि वे ब्राह्मण नहीं होते थे।

स्पष्ट है कि वेदों में प्रवीणता ही किसी व्यक्ति के ब्राह्मण होने का प्रमाण नहीं है।

XVII.   कथं तर्हि ब्राह्मणत्वं भवति। उच्यते:

ब्राह्मणत्व न शास्त्रेण न संस्काररैर्न जातिभि:

न कुलेन, न वेदेन न कर्मणा भवेत्तत:।13।

17. तब ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर पाना कैसे संभव है? खासकर तब जब यह कहा गया कि न तो शास्त्रों के अध्ययन-अध्यापन से, न आचारों के पालन से, न ही ब्राह्मणों के लिए निर्धारित आजीविका को अपनाकर ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया जा सकता है।

फिर ब्राह्मणत्व का आधार क्या है। कोई व्यक्ति कैसे ब्राह्मण बन सकता है?

XVIII. कुन्देन्दुधवलं हि ब्राह्मणत्वं नाम सर्वपापस्यापा करणमिति।

18. सभी प्रकार के प्रापों, दुष्कर्मों से विरत हो जाना ही ब्राह्मणत्व का लक्षण है, यह श्वेतकुंद पुष्प और धवल चंद्रमा जैसा निर्मेल्य हो जाना है।

XIX. उक्तं हि। ब्रततपोनियमोपवास दानदमशमसंयमो पचाराच्च। तथा चोक्तं वेदेः।

19. यह भी कहा गया है कि आचरण और शील के परिपालन द्वारा, तप, व्रत, दानादि कर्मो तथा आंतरिक और ब्राह्यः पर नियंत्रण हो जाने से ब्राह्मणत्व की अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है।

निर्ममो निरहंकारो निःसंगो निष्परिग्रहः

रागद्वेष विनिर्मुक्तस्तं देवा ब्राह्मण विदुः।14।

वह जो मोह-ममत्व से परे है, जिसने अहंकार को जीत लिया और जो निरासक्त तथा असंग्रही है। साथ ही जो व्यक्ति राग-द्वेष से रहित है, तथा विलासिता और घृणा से मुक्ति पा चुका है—देवताओं ने ऐसे व्यक्ति को ही ब्राह्मण का दर्जा दिया है।

सर्वशास्त्रेऽप्युक्तम् :

सत्य ब्रह्म तपो ब्रह्म ब्रह्म चेन्द्रियःनिग्रहः

सर्वभूते दया ब्रह्म एतद् ब्राह्मणलक्षणम्।15।

सत्यं नास्ति तपो नास्ति नास्ति चेन्द्रियनिग्रहः

सर्वभूते दया नास्ति एतच्चाण्डाललक्षणम्।16।

देवमानुष नारीणां तिर्यग्योनिगतेष्वपि

मैथुन नाधिगच्छन्ति ते विप्रास्ते च ब्राह्मणाः।इति।।17।

शुक्रेणाप्युक्तं

न जातिदृश्यते तावद् गुणाः कल्याणकारकाः

चाण्डालोऽपि हि तत्रस्थतं देवा ब्राह्मणं विदुः।18।

वेद-वेदांगों और शास्त्रों का कथन है कि

सत्य ही ब्राह्मणत्व है, तप ब्राह्मणत्व है, इंद्रियों पर नियंत्रण कर लेना भी ब्राह्मणत्व का लक्षण है। प्राणिमात्र के प्रति करुणा का भाव ब्राह्मणत्व है। ये सब ब्राह्मणत्व के लक्षण हैं।15।

दूसरी ओर,

मिथ्याभाषी और तपरहित हो जाना, इंद्रियों पर अधिकार न होना, प्राणिमात्र के प्रतिकरुणा का अभाव होना—ये सब चांडाल के लक्षण हैं।16।

देव, मनुष्य, स्त्रियों, पशु आदि में जो भी मनुष्य मैथुन कर्म से विरक्त  और शीलवान हैं, उन्हीं को ब्राह्मण बताया गया है।17।

शुक्राचार्य ने कहा था—

ईश्वर जाति नहीं देखता, किस कुल में जन्म लिया है यह भी नहीं देखता। बजाय इसके सुंदर, कल्याणोन्मुखी आचरण ही मनुष्यों के गुणों का आधार है। ये गुण यदि किसी चांडाल में भी मौजूद हैं तो देवता उसे भी ब्राह्मण ही मानते हैं।18।

XX. तस्मान्न जातिर्न जीवो न शरीरं न ज्ञानं नाचारो न कर्म न वेदो ब्राह्मण इति।

20. इससे निष्कर्ष निकलता है कि जन्म, आत्मा, शरीर,  ज्ञान, आचरण, कर्म और वेद-वेदांग मनुष्य को ब्राह्मण नहीं बनाते। इनमें से एक भी मनुष्य को ब्राह्मणत्व का दर्जा देने में सक्षम नहीं है।

XXI. अन्यच्च भवतोक्तम्। इह शूद्राणां प्रवज्या न विधीयते। ब्राह्मणशुश्रूषैव तेषां धर्मों विधीयते। चतुर्षु वर्णेष्वन्ते वचनात्तेनीचा इति।

21. अन्यत्र ऐसा भी कहा गया कि शूद्र मुक्ति के अधिकारी नहीं हैं। उन्हें प्रवज्या नहीं दी जा सकती। ब्राह्मणों की सेवा करना ही शूद्रों का एकल कर्तव्य बताया गया है। चारों वर्णों में जिस प्रकार शूद्र का नाम सबसे नीचे आया है, समाज में भी वे सबसे निचले स्तर पर आते हैं।

XXII. यद्येवमिन्द्रोऽपि नीचः स्यात्। ‘श्वयुवमघोनामतद्धिते’ इति सूत्रवचनात्। श्वा इति कुक्कुरः। युवा इति पुरुषः। मघवा इति सुरेंन्द्रः। तयोःश्वपुरुषयोरिन्द्र एव नीचः स्यात्। न चैतद् दृष्टं। किं हि वचनमात्रेण दोषो भवति। तथा च। उमामहेश्वरौ दन्तौष्ठमित्यपि लोके प्रयुज्जते। न च दन्ताः प्रागुत्पन्नाः उमा वा। केवलं वर्षसमासमात्रं क्रियते। ब्रह्मक्षत्र विट्शूद्रा इति। तस्माद्या भवदीय प्रतिज्ञा ब्राह्मणशूद्रश्रुषैव तेषां धर्मो, (सा) न भवति।

22. उक्त आधार पर यदि शूद्र सबसे नीचे हैं तो देवराज इंद्र भी नीच हैं। पाणिनी नें ‘श्वयुवमघोनामतद्धिते’ सूत्र का उल्लेख किया है, जिसमें श्वान का अर्थ है कुत्ता, युवा यानी पुरुष और मघवा या मेघ का अभिप्रायः इंद्र से है। यदि उक्त कसौटी को मान लिया जाए तो श्वान यानी कुत्ता जो इस सूत्र में सबसे पहले स्थान पर आया है, उसे इंद्र और पुरुष दोनों से श्रेष्ठतर होना चाहिए। अंत में स्थित होने के कारण इंद्र को सबसे नीच। लेकिन ऐसा तो नजर नहीं आता। क्या किसी को इसलिए नीच या कमतर  मान लेना उचित होगा कि उसका उल्लेख श्रेणीक्रम में सबसे बाद में आया है। प्रत्येक भाषा में संयुक्त और मिश्रित शब्द आते हैं। दंतोष्ट समास में दांत होठों से श्रेष्ठतर हैं। ‘उमा-महेश’ जैसे सामासिक शब्द का यह अभिप्रायः होगा कि पार्वती शिव से श्रेष्ठ है? ‘ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र’ तो शब्दक्रम मात्र है। इसके आधार पर किसी शूद्र को चाहे वह कितना ही सज्जन क्यों न हो, ब्राह्मण की तुलना में नीच और दुर्जन मान लेना क्या मूर्खता की हद नहीं है।

इसलिए यह दावा कि ‘ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र’ में शूद्र सबसे अंत में आया है, इसलिए उसका कर्तव्य ब्राह्मणों की सेवा करना हैं—उचित नहीं है।

XXIII. किं चानिश्तिऽयं ब्राह्मणप्रसंग। उक्तं हि मानवे धर्मः।

वृषलीफेनपीतस्य निःश्वासोपहतस्य च

तत्रैव च प्रसूतस्य निष्कृतिर्नोपलभ्यते।19।

शूद्रीहस्तेन यो भुंक्ते मासमेकं निरन्तरम्

जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वानश्च जायते।20।

शूद्रीपरिवृतो विप्रः शूद्री च गृहमेधिनी

वर्जितः पितृदेवेन रीरवं सोऽधिगच्छति।21।

23. गंभीरतापूर्वक विचार किया जाए तो मनु के धर्मशास्त्र की कसौटी पर ब्राह्मणत्व टिकता ही नहीं है।

मनुस्मृति में लिखा है कि ब्राह्मण जो शूद्र स्त्री के साथ शयन करता है, उसे चूमता-आलिंगन करता है, उससे संतान उत्पन्न करता है—वह पतित हो जाता है। जिसका प्रायश्चित संभव ही नहीं है।19। और

वह जो शूद्र स्त्री के हाथों से बनाया गया भोजन  लगातार एक महीने तक खाता है, वह जीते-जी शूद्र हो जाता है। मृत्योपरांत उसे कुत्ते की योनि में जन्म मिलता है।20।

यही नहीं, कोई ब्राह्मण जो शूद्राओं से घिरा रहता है, जो शूद्र स्त्रियों का सान्निध्य ग्रहण करता है, शूद्रा के साथ विवाह करके उसे पत्नी या उपपत्नी(रखैल) के रूप में स्वीकार कर लेता है—वह पितरों और देवों की सेवा-भोग का अधिकार खो देता है। पितर और देवता उसके भोग को अस्वीकार कर देते हैं। ऐसा ब्राह्मण मृत्यु के बाद रौरव नर्क में जाकर कष्ट भोगता है।21।

XXIV.  अतोऽस्य वचनस्य प्रामाण्यादनियतोऽयं ब्राह्मण प्रसंगः।

24. मनुस्मृति से दिए गए इन सब प्रमाणों द्वारा स्पष्ट है कि किसी भी व्यक्ति या समूह को ब्राह्मणत्व से मंडित कर देना अथवा उन्हें ब्राह्मण का दर्जा दे देना उचित नहीं हैं।

XXV.   कि चान्यत्। शूद्रोऽपि ब्राह्मणों भवति। को हेतुः। इह हि मानवे धर्मेऽभिहितं:।

25. एक बात और भी। मनुस्मृति में कहा गया है कि धर्माचरण करते हुए कई शूद्र भी ब्राह्मणत्व को प्राप्त हो चुके हैं।

अरणी गर्भसम्भूतः कठो नाम महामुनिः

तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माज्जातिरकारणम्।22।

कैवर्तीगर्भसम्भूतो व्यासो नाम महामुनिः

तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माज्जातिरकारणम।23।

उर्वशीगर्भ सम्भूतो वसिष्ठोऽपि महामुनिः

तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माज्जातिरकारणम।24।

हरिणीगर्भ सम्भूत ऋष्यश्रृंगी महामुनिः

तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माज्जातिरकारणम।25।

चाण्डाली गर्भसम्भूतो विश्वामित्रो महामुनिः

तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माज्जातिरकारणम।26।

ताण्डूली गर्भसम्भूतो नारदो हि महामुनिः

तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माज्जातिरकारणम।27।

उदाहरण के लिए दो लकड़ियों की रगड़ से उत्पन्न काष्ठाग्नि से जन्मे कठ, अपने तप से ब्राह्मण बने और महान ऋषि कहलाए—इसलिए जन्म ब्राह्मणत्व का कारण नहीं है। मछुआरे की बेटी के गर्भ से पैदा हुए व्यास भी अपने तप और स्वाध्याय के बल पर मुनि कहलाए। इसलिए जन्म ब्राह्मणत्व का कारण नहीं है। उर्वशी नामक अप्सरा के गर्भ से जन्मे वशिष्ठ अपने तप के बल पर ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए। अतएव जन्म ब्राह्मणत्व का आधार नहीं है। हरिणी के गर्भ से जन्मे ऋंगी ऋषि अपने तप के बल पर ही महान ऋषि बने, वहां भी जाति बाधक नहीं हुई। इसलिए जन्म ब्राह्मणत्व का कारण नहीं। चांडाल स्त्री के गर्भ से उत्पन्न विश्वामित्र एक महान ऋषि की गरिमा को प्राप्त हुए। केवल अपने तप के बल पर। इसलिए जन्म ब्राह्मणत्व का आधार नहीं। चावल की मदिरा बेचने वाली स्त्री के गर्भ से उत्पन्न नारद अपने तप के बल पर ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए। महान ऋषि कहलाए। इससे भी सिद्ध है कि जन्म ब्राह्मणत्व का आधार नहीं होता।22-27।

जितात्मा निष्प्रतिद्वन्द्वः पञ्च जित्वा यतेन्द्रियः।

तपसा ब्राह्मणो  जातो ब्रह्मचर्येण ब्राह्मणः।28।

न च ते ब्राह्मणीपुत्रास्ते च लोकस्य ब्राह्मणाः

शीलशौचमयं ब्रह्म तस्मात्कुलम कारणम्।29।

शीलं प्रधानं न कुलं प्रधानं कुलेन किं शीलविवर्जितेन

बहवो नरा नीचकुल प्रसूताः स्वर्ग गताः शीलमुपेत्य धीराः।30।

क्या अब भी नहीं समझ पाए कि जन्म ब्राह्मणत्व का आधार नहीं है? लोकप्रसिद्ध है कि जिसने भी खुद को जीत लिया वह यति और जितेंद्रिय कहलाया। जिसने तपस्या की वह तापस की गरिमा को प्राप्त हुआ। ब्राह्मण की औरस संतान होने से कोई ब्राह्मण नहीं बनता। जिसने ब्रह्मचर्य का पालन किया, वह ब्राह्मण बना। इससे साफ है कि जिसका जीवन शुद्ध और पवित्र है, जो सहनशील और सदा खुश दिखने वाला है वही सच्चा  ब्राह्मण है। इसके लिए जाति-कुल का कोई भी संबंध नहीं है। सिर्फ मनुष्य का सदाचरण और नैतिकता ही देखी जाती है। जो मनुष्य नैतिक स्तर पर पतित है, जाति या वंश का गौरव उसे क्या दे सकता है! दूसरी ओर शील-सदाचार से युक्त नीतिवान मनुष्य नीच कुल से उत्पन्न होने के बावजूद ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर स्वर्ग पहुंचे हैं। साफ है कि व्यक्ति का जन्म उसके ब्राह्मण होने का प्रमाण नहीं है।

XXVI. के पुनस्ते कठव्यासवसिष्ठ ऋष्यश्रृंगविश्वामित्र प्रभृतयो ब्रह्मर्षयो नीचकुल प्रसूतास्ते च लोकस्य  ब्राह्मणाः। तस्मादस्य वचनस्य प्रामाण्याद् प्यनियतोऽयं  ब्राह्मणप्रसंग इति, शूद्रकुलोऽपि  ब्राह्मणो भवति।

26. कठ, व्यास, वशिष्ठ, विश्वामित्र और ऋंगी  जैसे ऋषि यद्यपि शूद्रकुल में जन्मे थे। तथापि विश्व में उनकी ख्याति ब्राह्मण के रूप में ही है।  इन प्रमाणों के आधार पर सिर्फ ब्राह्मणकुलोत्पन्न व्यक्ति को ब्राह्मण मान लेना प्रमाणित नहीं है। शूद्र कुल या शूद्र माता-पिता की संतान होकर भी मनुष्य ब्राह्मणत्व को प्राप्त करता आया है।

XXVII. किं चाप्यन्द् भवदीय मतंः

मुखतो ब्राह्मणो जातो ब्राहुभ्यां क्षत्रियस्तस्था

ऊरुभ्यां वैश्यः संजातः पदुभ्यां शूद्रक एव च।31।

  • अतएव आपका यह मत कि ब्राह्मण का जन्म परमपुरुष ब्रह्मा के मुंह से हुआ, क्षत्रिय का भुजाओं, वैश्य का उदर से और शूद्र का पैरों से हुआ है—कहीं प्रमाणित नहीं होता।31।

XXVIII. अत्रोच्यते। ब्राह्मणा बहवो, न ज्ञायन्ते कुतो मुखतो जाता ब्राह्मणा इति। इह हि कैवर्तरजकचण्डालकुलेष्वपि ब्राह्मणाः सन्ति। तेषामपि चूडाकरणमुंञ्जदण्डकाष्ठादिभि संस्काराः क्रियन्ते। तेषामपि ब्राह्मणासंज्ञा क्रियते। तस्माद् ब्राह्मणघत्क्षत्रिया दयोऽपि। इति पश्याम एकवर्णो, नास्ति चातुर्वर्ण्यमिति।

28. हम देखते हैं कि ब्राह्मणों में अनेक भेद हैं। उनमें जो ब्राह्मण ब्रह्मा से मुख से जन्मे हैं, वे कहां है—यह पता ही नहीं चलता। यहां तक कि केवट, रजक, चंडाल कुलोत्पन्न ब्राह्मण भी यहां हैं। ब्राह्मणोचित पुण्यानुष्ठान यथा मूंज से आहूति देना, यज्ञोपवीत धारण कराना, इनके लिए भी संपन्न किए जाते हैं। उन सभी को ब्राह्मण का दर्जा प्राप्त है। यह क्षत्रिय तथा वैश्य के बारे में भी उतना ही सत्य है।

इससे प्रमाणित होता है कि मनुष्यों के चार वर्ण(जातियां) न होकर सिर्फ एक ही जाति है।

XXIX. अपि च। एकपुरुषोत्पन्नानां कथं चातुर्वर्ण्यम्। इह कश्चिद्देवदत्त एकस्यां स्त्रियां चतुरः पुत्राञ्जनयति। न च र्तेषां वणभेदोऽस्ति। अयं ब्राह्मणोऽयं क्षत्रियोऽयं, वैश्योऽयं शूद्र इति। कस्मात एकपितृकत्वाद्। एवं ब्राह्मणदीनां कथं चातुर्वर्ण्यम्।

29. पुनश्च! एक ही व्यक्ति(यथा ब्राह्मण) द्वारा उत्पन्न संतान की चार जातियां भला कैसे संभव हैं। एक व्यक्ति, मान लीजिए उसका नाम देवदत्त है की एक पत्नी से जन्मे चार पुत्र हैं। उन पुत्रों की अलग-अलग जातियां नहीं हो सकतीं। ऐसा नहीं है कि उन चारों में से आप एक को ब्राह्मण, दूसरे को क्षत्रिय, तीसरे को वैश्य और चौथे को शूद्र मान लें। क्यों? एक ही पिता की संतान होने के कारण क्या ऐसा विभाजन तर्कसंगत है। फिर एक ही कथित परमपुरुष(ब्राह्मण) से जन्मी संतानों की शारीरिक बनावट हाथ, पैर, नाक, कान आदि में कोई भेद न होने के कारण हम उनमें एक जैसी समानता पाते हैं। फिर उनमें ब्राह्मण, शूद्रादि वर्णभेद कैसे  संभव है।

XXX. इह हि गोहस्त्यश्वमृगसिंहव्याघ्रादीनां पदविशेषो दृष्टः। गोपदमिदं हस्तिपदमिदम्श्वपदमिदं सिंहपदमिदं व्याघ्रपदमिदमिति। न च ब्राह्मणादीनां ब्राह्मणपदमिदं क्षत्रियपदमिदं वैश्यपदमिदं शूद्रपदमिदमिति। अतः पदविशेषाभावादिपि पश्याम एक वर्गो, नास्ति चातुर्वर्ण्यमिति।

30. संसार में गाय, हाथी, मृग, घोड़े, सिंह, व्याघ्र आदि पशुओं के हाथ-पैर भिन्न-भिन्न होते हैं। इससे उनकी अलग जाति की पहचान सुनिश्चित हो जाती है। यथा गाय की बनावट अलग है, हाथी की अलग है, अश्व की इस प्रकार की है, हरिण की अमुक प्रकार की है, यह सिंह की हैं और वह अमुक पशु की प्रजाति की। इस भेद के आधार पर ही उनकी भिन्न पहचान संभव है। लेकिन ब्राह्मणादि चार वर्णों के बारे में यह बात सच नहीं है। वहां व्यक्ति के शरीर की बनावट से उसकी जाति का अनुमान लगा पाना असंभव है। न ही शरीर शारीरिक अंगों की बनावट के आधार पर मनुष्य को ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्रादि में बांटा जा सकता है।

इस तरह शरीर की बनावट के आधार पर, मानव शरीर के अवयवों नाक, कान, आंख आदि में अंतर न होने के कारण, हम मनुष्य में केवल एक ही जाति को पाते हैं, चार नहीं।

XXXI. इह गोमहिषाश्वकुञ्जरखरवानरछागैडकादीनां भगलिंगवर्णसंस्थानमलमूत्रगंधध्वनि विशेषो दृष्टः। न तु ब्राह्मणक्षत्रिया दीनाम् अतोऽप्यविशेषादेक एव वर्ण इति।

31. हम दुनिया में मौजूद गाय, भैंस, घोड़े, हाथी, गधा, बंदर, बकरी, भेड़ आदि की शारीरिक संरचना में भेद पाते हैं। शारीरिक अंगों के आधार पर उनकी प्रजाति सहित, नर और मादा की पहचान भी की जा सकती है। मल-मूत्र, आवाज का वैभिन्न्य को भी परखा जा सकता है। क्षत्रिय, ब्राह्मण, शूद्रादि के मामले में ऐसा भेद कहीं नहीं दिखा।  पशु-पक्षियों से अलग मनुष्य को एक ही चीज अलग करती है, वह है उसकी शारीरिक रचना, जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि के आधार पर कोई अंतर नहीं दिखता। तदनुसार मनुष्य की केवल एक ही जाति है।

XXXII. अपि च। यथा हंसपारावतशुककोकिलशिखण्डि प्रभृतीनां रूपवर्णलोमतुण्डविशेषो दृष्ट, न तथा ब्राह्मणादीनाम्। अतोप्यविशेषादेक एव वर्ण इति।

32.  और जैसे कि हम हंस, मोर, तोता, कोकिल, कबूतर आदि की शारीरिक संरचना, उनकी चौंच, पंखों आदि में भेद पाते हैं, इस तरह का कोई भी भेद ब्राह्मणादि चारों वर्णों के मनुष्यों में खोज पाना असंभव है। इस तरह का कोई भेद न होने के कारण भी मनुष्य की सिर्फ एक ही जाति है, वह है मनुष्य।

XXXIII. यथा वटबकुलपलाशाशोकतमालनागकेशर शिरीषचम्पकप्रभृतीदनां वृक्षाणां विशेषो दृश्यते, यदुत दण्डततश्च, पत्रततश्च, पुष्पततश्च, फलततश्च त्वगस्थिबीजरसगन्धतश्च, न तथा ब्राह्मणक्षत्रियविट्शूद्राणामंग, प्रत्यंगविशेषो न च त्वङ्प्रत्यङ्गविशेषो च त्वङमांसशोणितास्थिशुक्रमलवर्णसंस्थानविशेषणं नापि प्रसवविशेषो दृश्यते। ततोऽप्यविशेषादेक एव वर्णो भवति।

33. विभिन्न वृक्षों यथा वट, बकुल, पलाश, अशोक, तमाल, नागकेशर, शिरिस, चंपकादि वृक्ष, लता आदि के पत्तों, फलों, छिलकों, बीज, रस, गंध आदि में भेद होता है, वे सभी अलग-अलग प्रकार के हाते हैं—इस आधार पर उन सबको अलग-अलग प्रजाति का कहा जाना स्वाभाविक है। पर शूद्र, क्षत्रिय, वैश्यादि वर्णों के मनुष्यों में इस प्रकार का कोई भेद नहीं होता। फिर उन्हें अलग-अलग कहा जाना कैसे संभव है? ये चारों वर्णों के लोग अपनी आंतरिक और बाहरी शरीर रचना में एक ही प्रजाति के हैं। हड्डी, मांस, रक्त, शारीरिक अंग-उपांग, इंद्रियों तथा उनके उपयोग आदि लक्षणों के आधार पर उनमें कोई अंतर नहीं है। इसलिए उन्हें चार वर्णों में कैसे बांटा जा सकता है?

XXXIV. अपि भो ब्राह्मण सुखदुःखएवजीवितबुद्धि व्यापार-व्यवहारमरणोत्पत्ति भयमैथुनोषचार समत्तया नास्त्येव विशेषो ब्राह्मणादीनाम्।

34. पुनश्चः मुझे बताओ कि क्या ब्राह्मण की सुख-दुख, हर्ष-शोक आदि अनुभव करने की क्षमता क्षत्रिय-वैश्य शूद्रादि से भिन्न होती है। क्या ब्राह्मण भी बाकी लोगों के समान जीवन नहीं जीते। क्या दूसरों की तरह वे भी मृत्यु को प्राप्त नहीं होते? क्या वे बुद्धि कर्म, अथवा उनके परिणामों से मुक्त होते हैं, जन्म के समय, भय, मैथुन, आशा से क्या वे भी ऐसे ही प्रभावित नहीं होते जैसे बाकी वर्णों के लोग। यदि इन सब मामलों में ब्राह्मण तथा शेष वर्णों में कोई अंतर नहीं है, तो मानना पड़ेगा कि वे सभी एक हैं।

XXXV.  इदं चावगभ्यतां। यथैकवृक्षोत्पन्नानां फलानां नास्ति वर्णभेद उदुम्बरपणसफलवद्। उदुम्बरस्य हि पणसस्य च फलानि कानिचित् शाखातो भवन्ति, कानिचिद् दण्डतः, कानिचित्स्कन्धतः, कानिचिन्मूलतः। न च तेषां भेदोऽस्तीदं ब्राह्मणाफलमिदं क्षत्रियफलमिदं वैश्यफलमिदं शूद्रफलमिति। एकवृक्षोत्पन्नत्वाद्। एवं नराणामपि नास्ति भेदः। एकपुरुषोत्पन्नत्वाद्।

35. जिस प्रकार गूलर और कटहल के वृक्षों की टहनी, तना, जोड़, जड़ आदि में फल लगते हैं।  वे फल चाहे टहनी पर लगें, तने पर लगें, या फिर जड़ और जोड़ पर लगें—अपने रंग, आकृति, स्पर्श  आदि की दृष्टि से सब एक समान होते हैं। उन फलों को एक वृक्ष का उत्पाद माना जाता है। उन्हें अलग-अलग जातियों की पहचान नहीं दी जाती। गूलर के वृक्ष के सभी हिस्सों पर फल लगता है। तो क्या जो फल टहनी पर लगा है उसे ब्राह्मण, तने पर लगने वाले को क्षत्रिय या वैश्य और सबसे नीचे लगने वाले फल को शूद्र गूलर कहना चाहिए। जैसे एक वृक्ष पर लगे सभी फल समान होते हैं, वैसे ही सभी मनुष्य भी समान होते हैं। एक पिता के पुत्रों की भांति उनमें कोई अंतर नहीं होता। अतएव  ब्राह्मण-शूद्रादि का भेद करना वृथा है।

XXXVI. अन्यच्च दूषणं भवति। यदि मुखतो जातो भवति ब्राह्मणो ब्राह्मण्याः कुत उत्पत्तिः? मुखादेवेति चेद्, हन्त तर्हि भवतां भगिनीप्रसंगस्यात्। तथा गम्यागम्यं त सम्भाव्यते। तच्च लोकेऽत्यन्तविरुद्धम् तस्मादनियतं  ब्राह्मण्यम्।

36. आपके इस कथन में एक और दोष है। यदि  ब्राह्मण की उत्पत्ति परमपुरुष के मुख से हुई थी तो  ब्राह्मणी की कहां से हुई? निस्संदेह वह भी मुख से ही होगी। अरे! यदि यही सत्य है तो दोनों भाई-बहन हुए।। ऐसे में क्या आप उनके बीच देह संबंध की वैधता-अवैधता पर विचार नहीं करेंगे! उनका संबंध लोकाचार के सर्वथा विरुद्ध माना जाएगा। अतएव किसी भी व्यक्ति का ब्राह्मणत्व अनिश्चित और असंभावित है।

XXXVII. क्रिया-विशेषेण खलु चतुर्वर्णव्यवस्था क्रियते। तथा च युधिष्ठिराध्येषितेन वैशम्पायनेनाभिहितं क्रियाविशेषतश्चातुर्वर्ण्यमितिः।

37. वर्ण-व्यवस्था का विधान कर्म के अनुसार किया गया है। युधिष्ठिर ने जब वैशम्पायन से पूछा तो उन्होंने भी यही उत्तर दिया था—‘‘वर्ण-व्यवस्था की रचना समाज में श्रम के बंटवारे की खातिर की गई थी.’’

पाण्डोस्तु विश्रतुः पुत्र: स व नाम्ना युधिष्ठिरः

वैशम्पायनमागम्य प्राञ्जलिः परिपृच्छति।32।

के च ते ब्राह्मणाः प्रोक्ताः किं वा ब्राह्मणलक्षणम्

एतदिच्छामि भी ज्ञातुं तद्भवान व्याकरोतु मे।33।

लोकप्रसिद्ध पांडुपुत्र युधिष्ठिर वैशम्पायन के पास पहुंचे। हाथ जोड़कर उनकी प्रणति की। तदनंतर बोले।32।

ब्राह्मण किसे कहते हैं? किन लक्षणों से कोई व्यक्ति  ब्राह्मण बनता है। यह मैं जानना चाहता हूं। कृपया मेरी जिज्ञासा को शांत करें।।33।

वैशम्पायन उवाच :

क्षान्त्यादिभिर्गुणैर्युक्तस्त्यक्त दण्डो निरामिषः

न हन्ति सर्वभूतानि प्रथमं ब्रह्मलक्षणम्।34।

यदा  सर्वं परद्रव्यं पथि वा यदि वा गृहे

अदत्तं नैव गृह्णाति द्वितीयं ब्रह्मलक्षणम्।35।

त्यक्तवा क्रूरस्वभावं तु निर्ममो निष्परिग्रहः

मुक्तश्चरति यो नित्य तृतीयं ब्रह्मलक्षणम्।36।

देवमानुष नारीणां तिर्यग्योनिगतेष्वपि

मैंथुनं हि सदा त्यक्तं चतुर्थ ब्रह्मलक्षणम्।37।

सत्यं शौचं दया शौचं शौचमिन्द्रियनिग्रहः

सर्वभूत दया शौचं तपः शौचञ्च पञ्चमम्।38।

पञ्चचलक्षणमसम्पन्नः ईदृशो यो भवेद् द्विजः

तमहं ब्राह्मणं ब्रूयां शेषाः शूद्रा युधिष्ठिर।39।

न कुलेन न जात्या वा क्रियाभिर्ब्राह्मणो भवेत्

चाण्डालोऽपि हि वृत्तस्थो ब्राह्मणः स युधिष्ठिर।40।

युधिष्ठिर का प्रश्न सुनने के पश्चात वैशम्पायन बोले—

हे युधिष्ठिर! ऐसा मनुष्य जो क्षमा-शांति से युक्त शीलवान और गुणवान है, जिसने शस्त्र का परित्याग कर दिया है, जो मांस भक्षण छोड़ चुका है। जो किसी की भी हत्या नहीं करता—यह ब्राह्मणत्व का पहला लक्षण है।34।

चाहे वह घर में हो या मार्ग में पड़ी हो, जो दूसरे की वस्तु किसी भी अवस्था में बिना दिए ग्रहण नहीं करता, यह ब्राह्मण होने का दूसरा लक्षण है।35।

वह जो निस्स्वार्थ है, किसी भी प्रकार की क्रूरता से सर्वथा मुक्त और दयावान है, जो निष्परिग्रही होकर सभी प्रकार के प्रलोभनों से मुक्त होकर विचरण करता है, उसे ब्राह्मणत्व के तीसरे लक्षण से युक्त मानना चाहिए। 36।

वह जो देव-मनुष्य-नारी किसी भी योनि में होते हुए, मैथुन की इच्छा से सर्वथा मुक्त हो चुका है, यह  ब्राह्मण होने का चौथा लक्षण है।37।

ऐसा मनुष्य जो सत्य को पवित्र मानता है, करुणा को पवित्र मानता है, जिसके लिए इंद्रिय संयम पवित्रता है, जिसके लिए प्राणिमात्र के प्रति करुणाभाव होना ही पवित्रता है, वह  ब्राह्मणत्व के पांचवे लक्षण से युक्त है।38।

हे युधिष्ठिर जिस व्यक्ति में भी ये पांचों लक्षण हैं, मैं बस उसी को  ब्राह्मण मानता हूं। मेरी दृष्टि में अन्य सभी शूद्र हैं।39।

जन्म से, कुल से, यज्ञादि कर्मकांडों के निष्पादन से कोई व्यक्ति ब्राह्मण नहीं बनता। यदि किसी चांडाल में भी उपर्युक्त पांचों विशेषताएं/लक्षण हैं, हे युधिष्ठिर उसे ब्राह्मण ही समझना चाहिए।40।

किं च भूयो वैशम्पायनेनोक्तम

एकवर्णमिदं पूर्वं विश्वमासीद् युधिष्ठिर

कर्म-क्रियाविशेषेण चातुर्वर्ण्यं प्रतिष्ठितम्।41।

सर्वे वै योनिजा मर्त्याः सर्वे मूत्रपुरीषिणः

एकेन्द्रियेन्द्रियार्थाश्च तस्माच्छीलगुणैर्द्विजाः।42।

शूद्रोपि शीलसम्पन्नो गुणवान ब्राह्मणो भवेत्

ब्राह्मणोऽपि क्रियाहीनः शूद्रात्प्रत्यवरो भवेत।43।

फिर वैशम्पायन ने इसकी व्याख्या करते हुए बताया—

‘हे युधिष्ठिर। प्राचीनकाल में समस्त संसार में मात्र एक ही वर्ण था। चार वर्णों की उत्पत्ति कर्मों और व्यवसायों की भिन्नता के कारण हुई है।41।

प्राणिमात्र की उत्पत्ति एक ही स्रोत से हुई है। सभी गर्भाशय से जन्मे हैं। सभी में मल-मूत्र जैसी गंदगियां हैं, सभी में समान इंद्रियां हैं उनका इंद्रिय-बोध भी एक जैसा होता है। ऐसे में कोई मनुष्य केवल श्रेष्ठ आचरण करके ही ब्राह्मणत्व प्राप्त कर सकता है।42।

यहां तक कि कोई शूद्र भी शील एवं सदाचार का अनुसरण करके  ब्राह्मण बन सकता है। यदि कोई  ब्राह्मण गुण-शील से हीन, स्वार्थी और परिग्रही है, जो क्रोधी, कामी और लालची है, वह शूद्र से भी गिरा हुआ है।43।

इदं च वैशम्पायन वाक्यम्

पञ्चेन्द्रियावर्णवं घोरं यदि शूद्रोऽपि तीर्णवान्

तस्मैं दानं प्रदातव्यमप्रमेयं युधिष्ठिर।44।

न जातिर्दृश्यते राजन गुणाः कल्याणकारकाः

जीवतं यस्यधर्मार्थे परार्थे यस्यजीवितम्

अहोरात्रं चरेत्क्षान्ति तं देवा ब्राह्मणं विदुः।45।

परित्यज्य गृहावासं ये स्थिता मोक्षकाङ् क्षिण:

कामेष्वसक्ताः कौन्तेय ब्राह्मणास्ते युधिष्ठिर।46।

अहिंसा निर्ममत्वं चा मतकृतस्य वर्जनम्

रागद्वेषनिवृत्तिश्च एतद् ब्राह्मणलक्षणम्।47।

क्षमा दया दमो दानं सत्यं शौचं स्मृतिर्घृणा

विद्याविज्ञानमास्तिक्यमेतद् ब्राह्मणलक्षणम्।48।

गायत्रीमात्र सारोऽपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः

नायन्त्रितश्चतुर्वेदी सर्वाशी सर्वविक्रयी।49।

एकरात्रौषितस्यापि या गतिर्ब्रह्मचारिणः

न तत्क्रतुसहस्त्रेण प्राप्नुवन्ति युधिष्ठिरः।50।

पारगं सर्ववेदानां सर्वतीर्थाभिषेचनम्

मुक्तश्चरित यो धर्मं तमेव ब्राह्मणं विदुः।51।

यदा न कुरुते पापं सर्वभूतेषु दारुणम्

कायेन मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा।52।

अस्माभिरुक्तं यदिदं द्विजानां मोहं निहन्तुं हतबुद्धिकानाम्

गृह्रन्तु सन्तो यदिदं युक्तमेतन्मुञ्चन्त्वथायु क्तमिदं यदि स्यात्।53।

कृतिरियं सिद्धाचार्याश्वघोषणपादानामिति।शुभम्।

इससे आगे वैशम्पायन ने कहा है कि—

है युधिष्ठिर! यदि कोई शूद्र भी पांचों इंद्रियों के भीषण समुद्र को पार कर चुका है, अर्थात अपनी सभी इंद्रियों पर विजय हासिल कर चुका है तो उसे भी निस्सीम दानादि देकर सम्मानित करना चाहिए।44।

हे राजन्। मनुष्य की जाति नहीं देखी जाती। उसके गुण ही उसके श्रेष्ठत्व की पहचान हैं। सिर्फ वही महत्वपूर्ण हैं। ऐसा व्यक्ति जो परोपकारी जीवन जीता है, जो सदैव धैर्य-धृत्ति और क्षमा का अनुसरण करता है, ईश्वर की दृष्टि में वही श्रेष्ठ जन है।45।

हे कौन्तेय! जो सांसारिक आसक्ति से परे हो चुके हैं, जो सभी प्रकार के प्रलोभनों और तृष्णाओं से मुक्त होकर निर्वाण प्राप्ति की दिशा में अग्रसर हैं, वही ब्राह्मण कहलाने के अधिकारी हैं।46

पुनश्चः अहिंसा, स्वार्थरहित होना, शास्त्र-विरुद्ध कर्मों से सर्वथा विरत हो जाना, लालच, लोभ और घृणा से ऊपर उठ जाना ही ब्राह्मण की विशेषताएं हैं।47

सहिष्णुता, क्षमा, करुणा, इंद्रियनिग्रह, दान, सत्य, शुद्धता, पवित्रता को धारण करना, शास्त्र विरुद्ध आचरण न करना, ज्ञानवान होना—ये ब्राह्मण के लक्षण हैं।48।

यदि कोई व्यक्ति सिर्फ गायत्री मंत्र को ही आत्मसात् कर शील-संयम से युक्त जीवनयापन करता है, तो वह ब्राह्मण है। चारों वेदों का ज्ञाता होकर भी जो असंयमी, सर्वभक्षी, सर्वग्राही और प्रलोभनों में डूबा हुआ है—वह ब्राह्मण नहीं है।49।

कोई व्यक्ति ब्रह्मचारियों की गम्य अवस्था को इंद्रिय संयम द्वारा एक रात्रि के लिए भी प्राप्त कर लेता है तो उस अवस्था को यज्ञादि कर्म करते हुए, सहस्रों पशुओं की बलि देकर प्राप्त कर पाना भी संभव नहीं है।50।

ऐसा परमशील व्यक्ति जो सभी वेद-वेदांगों में प्रवीण है, जो अपने संभाषण द्वारा लोगों को पवित्र करने का सामर्थ्य रखता है, जो कर्मों से विरक्त न ही होता, लेकिन आसक्ति जिसे छू नहीं पाती, वही ब्राह्मण कहलाने योग्य है।51।

ऐसा परमशीलवान जो मन, वचन, कर्म से कभी भी हिंसा नहीं करता, वह ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर पाता है।52।

हतबुद्धि और भटके हुए ब्राह्मणों के भ्रम को दूर करने के लिए हमने यहां जो भी कहा है, यदि वह मान्य और तर्कसम्मत है—तो सच्चरित व्यक्ति को चाहिए कि उसे स्वीकार करे। अन्यथा जाने दे।

सिद्धाचार्य अश्वघोष द्वारा विरचित। इति शुभम्।

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