इंटरनेट लर्निंग : भारतीय परिदृश्य और नई शिक्षा नीति

सामान्य

ओमप्रकाश कश्यप

‘दूर-शिक्षण’ यानी ‘ऑनलाइन शिक्षा’ अथवा ‘ई’लर्निंग’ प्रौद्योगिकीय विकास की देन है। एक लोकोपयोगी प्रौद्योगिकी में जितने गुण होने चाहिए, वे लगभग सभी इसमें मौजूद हैं। यह स्कूली शिक्षा से सस्ती हो सकती है। प्रयोगात्मक अवस्था में है, इसलिए हम इसके निरंतर बेहतर होने की उम्मीद कर सकते हैं। तकनीकी सुधार द्वारा इसे अधिकाधिक रचनात्मक, आकर्षक, संप्रेषणीय एवं प्रभावशाली बनाया जा सकता है। आज देश के विभिन्न हिस्सों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम में भारी अंतर है। यहां तक कि एक ही शहर में प्राइवेट तथा सरकारी स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम का स्तर एक जैसा नहीं होता। शिक्षा  स्तर में यह अंतर प्रकारांतर में सामाजिक असमानता को बढ़ावा देता है। इसलिए शिक्षा-नीति-2020 में इस अंतर को पाटने का संकल्प लिया गया है. दूर-शिक्षण पद्धति पाठ्यक्रम के मानकीकरण में सरकार की मददगार सिद्ध हो सकती है। सरकार चाहे तो एनसीईआरटी तथा उसकी अनुषंगी संस्थाओं की मदद से दूर-शिक्षण सामग्री के वाक्-चित्रण(आडियो विजुलाइजेशन) का मानकीकरण भी कर सकती है। ऑनलाइन शिक्षा के सामुदायिकरण द्वारा हम वहां भी आसानी से पहुंच सकते हैं, जहां अभी तक स्कूली शिक्षा नहीं पहुंच पाई है। कुल मिलाकर, तात्कालिक मजबूरी में ही सही, ऑनलाइन शिक्षा को अपनाना घाटे का सौदा नहीं है। देखना यह है कि समाजार्थिक विषमता से भरपूर भारतीय परिदृश्य में वह कितनी और किस प्रकार उपयोगी हो सकती है!

भारत में ‘ऑनलाइन क्लासिस’ की दशा-दिशा पर बातचीत करने से पहले इसके इतिहास पर सरसरी नजर डाल लेना उचित होगा।

ऐतिहासिक विहंगावलोकन

‘ऑनलाइन क्लासिस’, दूर-शिक्षण(डिस्टेंस एजुकेशन) का आधुनिक संस्करण है। दूर-शिक्षण की संकल्पना उनीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में जन्मी थी। उद्देश्य था, जो लोग किसी कारणवश स्कूली शिक्षा से वंचित हैं—उनके लिए शिक्षा के वैकल्पिक माध्यम विकसित किए जाएं। 1833 में एक स्वीडिश अखबार में प्रकाशित एक विज्ञापन ने लोगों को चौंकाने का काम किया था। विज्ञापन में डाक के माध्यम से शिक्षा देने की सूचना थी। उस समय तक पत्राचार द्वारा शिक्षा की एकदम अवधारणा नई थी। इसलिए लोगों का ध्यान उसकी ओर कम ही गया। फिर भी विचार की नींव तो पड़ ही चुकी थी। सो उत्साही लोग ‘दूर-शिक्षण’ को कामयाब बनाने में जुट गए। इस बीच इंग्लेंड सरकार की ओर से पूरे देश के लिए एक समान डाक-नीति लागू करने की घोषणा की गई। उसका लाभ उठाते हुए 1840 में सर ईसाक पिटमेन(1813-1897) ने पोस्टकार्ड को पत्राचार की शिक्षा का माध्यम बनाया। प्रति पत्राचार एक पेनी की शुल्क पर वे दूरदराज के क्षेत्रों में रह रहे विद्यार्थियों को आशुलिपि सिखाने लगे। ये वही पिटमेन थे, जिन्हें ‘शार्टहेंड’ का जनक माना जाता है। उनके सम्मान में शार्टहेंड को ‘पिटमेन शार्टहेंड’ का नाम भी दिया गया है। पिटमेन साहब पोस्टकार्ड के माध्यम से अपने विद्यार्थियों को शार्टहेंड के बारे समझाते। लगे हाथ उन्हें ‘एक्सरसाइज’ के बारे में बता देते थे। विद्यार्थी भी पोस्टकार्ड के जरिए उनका हल भेजते और अपनी समस्याएं सामने रखते थे। प्रयोग इतना ज्यादा कामयाब हुआ कि मात्र 3 वर्ष के भीतर पिटमेन के नेतृत्व में ‘फोनोग्राफिक कोरसपोंडेंस सोसाइटी’ का गठन हुआ। उसके तत्वावधान में पत्राचार  कॉलेज की स्थापना हुई, जिसे दुनिया का पहला पत्राचार कॉलेज कह सकते हैं। 

एक कामयाब प्रयोग की देर थी। उसके बाद तो ‘दूर-शिक्षा’ का सिलसिला जोर पकड़ने लगा। 1891 तक अमेरिका में पत्राचार द्वारा डिग्री कोर्स कराने की सुविधा आरंभ हो चुकी थी। ग्रेट ब्रिटेन के बाद अमेरिका, जर्मनी आदि देशों में पत्राचार द्वारा शिक्षा के स्कूल खोले जाने लगे। सबसे बड़ी सफलता मिली, शिकागो विश्वविद्यालय को। वहां प्रतिवर्ष 125 अनुदेशक, 3000 विद्यार्थियों को पत्राचार द्वारा शिक्षा प्रदान करते थे। विश्वविद्यालय में पत्राचार शिक्षा के लिए 350 पाठ्यक्रम निर्धारित थे। कह सकते हैं कि वह शिक्षा-जगत की पहली क्रांति थी। रेडियो का प्रचलन हुआ तो विश्वविद्यालयों ने उसे भी दूर-शिक्षा का माध्यम बना लिया। 1920 के दशक में, अकेले अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने दूर-शिक्षण के लिए 176 रेडियो स्टेशन स्थापित किए थे। फिर आया दूरदर्शन। आने के साथ ही उसने मनोरंजन उद्योग के साथ-साथ शिक्षा क्षेत्र को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया। गौरतलब है कि 1891 में ‘चलचित्र कैमरा’ का आविष्कार करते समय थॉमस अल्वा एडीसन ने कहा था कि चलती-फिरती तस्वीरें शिक्षाजगत में क्रांति का आगाज करेंगी। वे शिक्षा को और अधिक मनोरंजक, आकर्षक एवं रचनात्मक बनाएंगी। एड़ीसन के बाद जन्मे मार्शल मेक्लुहान ने ‘मीडिया ही संदेशवाहक’ कहते हुए उसे ‘मनुष्य के विस्तार’ के रूप देखा। आगे सबकुछ  एडिसन की भविष्यवाणी के अनुरूप हुआ। 1950 के दशक तक दुनिया के कई देश, दूरदर्शन को दूर-शिक्षा के उपयोगी माध्यम के रूप में अपना चुके थे। खासतौर पर दूरस्थ गांवों में शिक्षा देने के लिए दूरदर्शन विशेष मददगार सिद्ध हुआ। अमेरिका के अलास्का में, दूर-शिक्षण प्रविधि द्वारा गांव-गांव शिक्षा पहुंचाने के लिए 1980 में ‘लर्न अलास्का’ परियोजना आरंभ की गई। उसकी ओर से प्रतिदिन छह घंटे का शैक्षिक कार्यक्रम प्रसारित किया जाता था, जिसकी पहुंच कई सौ गांवों तक थी।

भारत में दूर शिक्षा की नींव 1962 में रखी गई। उसी वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा ‘स्कूल ऑफ़ कॉरसपोडेंस कोर्सिस एंड कंटीन्युइंग एजुकेशन’ की शुरुआत की गई। उसका भरपूर स्वागत किया गया। मात्र एक दशक में कई और भी संस्थान दूर-शिक्षण प्रणाली को अपना चुके थे। 1982 में हैदराबाद में डॉ. भीमराव आंबेडकर मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना दूर शिक्षण की दिशा में क्रांतिकारी कदम थी। आज देश में 242 विश्वविद्यालय/संस्थान ऐसे हैं जो सामान्य कक्षाओं के साथ-साथ दूर शिक्षण के माध्यम से भी शिक्षा प्रदान करते हैं। 2009-10 में देश में उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में दूर शिक्षा संस्थानों का योगदान 23.38 प्रतिशत था। उसी वर्ष दूर-शिक्षा संस्थानों में पंजीकरण कराने वाले विद्यार्थियों की संख्या लगभग 40,00,000 थी।

जिसे आज हम ई’लर्निंग(इलेक्ट्रानिक्स लर्निंग) कहते हैं, उसकी शुरुआत 1980 के दशक से ही हो चुकी थी। आज लाखों की संख्या में बेवसाइटें किसी न किसी रूप में शिक्षा प्रदान करने या उसके प्रचार-प्रसार में जुटी हैं। इंटरनेट द्वारा शिक्षण के क्षेत्र में नई क्रांति का आगाज हुआ, ‘वेब-2’(वर्ल्ड वाईड वेब-2) के आविष्कार के बाद। वेब-1 का दौर 1980 से 2004 तक चला था। उसमें प्रयोक्ता की हैसियत महज उपभोक्ता जैसी थी। उस एकल-मार्गी माध्यम का उद्देश्य उपभोक्ता तक सूचनाएं पहुंचाना मात्र था। उपभोक्ता वेबसाइट पर मौजूद सामग्री को केवल देख सकता था। इंटरनेट की पहुंच सीमित थी। गति कम। इंटरनेट सामग्री निर्माता भी कम थे। उपभोक्ता की प्रतिक्रिया जानने के लिए ‘गेस्टबुक’ हुआ करती थी। जिसपर दी गई प्रतिक्रियाएं मुख्य सामग्री से अन्यत्र जमा होती थी। वेब-2 के आविष्कार इस क्षेत्र में क्रांति ने उपभोक्ता को भी ‘सामग्री उत्पादक’ की श्रेणी में ला दिया। उपभोक्ता को यह छूट दी जाने लगी कि वह उपलब्ध सामग्री में विषयगत संशोधन कर सके। फिर ऐसी बेवसाइटें भी बनने लगीं जिनमें सामग्री उत्पादक और उपभोक्ता के बीच कोई अंतर न था। प्रयोक्ता अपनी ओर से नई सामग्री जोड़ने तथा उसके मनचाहे प्रस्तुतीकरण के लिए स्वतंत्र था। आज लाखों बेवसाइट केवल उपभोक्ताओं द्वारा सृजित सामग्री के भरोसे चलती हैं। सामग्री उसकी अपनी या किसी और व्यक्ति/संस्था की हो सकती है। वेबसाइट निर्माताओं का काम केवल ‘सामग्री सर्जकों’ और ‘सामग्री प्रयोक्ताओं’ के बीच पुल बनाना है। उन्हें ‘सूचनाप्रदेश के वासी’ अथवा ‘डिजिटल नेटिव्स’ का नाम दिया। आज जिसे सोशल मीडिया कहते हैं, वह असल में इंटरनेट पर फैला ‘वैश्विक सूचनाप्रदेश’ है, जिसमें आमोखास सभी को दखलंदाजी करने का अधिकार प्राप्त है। ई’लर्निंग सूचना-प्रदेश की विस्मयकारी सफलताओं तथा उसके महाविस्तार का ही हिस्सा है।   

सवाल है कि इन सब खूबियों के बावजूद क्या ऑनलाइन शिक्षा, स्कूली शिक्षा का समानोपयोगी अथवा बेहतर विकल्प बन सकती है? प्रश्न यह भी हो सकता है कि क्या शिक्षा का माध्यम, उसकी गुणवत्ता को प्रभावित करता है। इस संबंध में दो अमेरिकी प्रोफेसरों, रिचर्ड एडवर्ड क्लार्क तथा राबर्ट बी। कोझमा के बीच लंबी बहस चली थी। 1983 में बहस की शुरुआत करते हुए क्लार्क ने कहा था—‘संज्ञानात्मक प्रक्रियाएं एवं रणनीतियां जो सीखने के लिए आवश्यक हैं, उनका उपयोग विद्यार्थी अपने लिए नहीं कर सकते। वे करेंगे भी नहीं।’1 क्लार्क के अनुसार मीडिया सूचनाओं एवं अनुदेशों को विद्यार्थी तक पहुंचाने का महज एक माध्यम है। इससे इतर उसकी और कोई भूमिका नहीं है। जैसे खाने-पीने की चीजों की पौष्टिकता, उन्हें ढोने वाले ट्रक के प्रभाव से बेअसर रहती है, इसी तरह शिक्षा भी मीडिया के प्रभाव से अछूती रहती है। एक तरह से क्लार्क ने मीडिया को महज सूचना-प्रदाता तथा विद्यार्थियों को सूचना-संग्राहक मात्र मान लिया था।

करीब एक दशक बाद, 1994 में कोझ़मा ने क्लार्क की आलोचना करते हुए कहा कि शिक्षा पर मीडिया के असर को समझने के लिए उन दोनों के संबंधों को समझना जरूरी है। कोझ़मा के अनुसार, क्लार्क की धारणा इन दोनों के अंतःसंबंध को सही-सही न समझ पाने के कारण बनी थी। उसका कहना था कि यदि माध्यम को तकनीक; तथा शिक्षा-अनुदेशों को अध्यापन प्रविधि मान लिया जाए तो मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए बाध्य हूं कि शिक्षण माध्यम से अधिक प्रविधि से प्रभावित होता है।2 कोझ़मा का तर्क एक तरह से क्लार्क के निष्कर्ष की ही पुष्टि करता था। बावजूद इसके कोझ़मा को नकार पाना संभव नहीं है। निरंतर शक्तिशाली होते इंटरनेट-मीडिया, खासकर तब जब उपभोक्ता को वेबसाइटों पर उपलब्ध सामग्री को संपादित करने की छूट प्राप्त हो, उससे निरपेक्ष सूचना-प्रदाता बने रहने की उम्मीद करना ही व्यर्थ है।

तकनीकी का मूल स्वभाव गतिशीलता है। प्रत्येक प्रौद्योगिकी अपने से बेहतर प्रौद्योगिकी की संभावनाएं लिए रहती है। वह न केवल स्वयं गतिशील रहती है, अपितु अपने प्रयोक्ता को भी गतिमान बनने के लिए उकसाती है। इसलिए वह शिक्षण की समग्र प्रक्रिया के साथ-साथ विद्यार्थी क्या सीखता है, कब सीखता है, कैसे सीखता है—को प्रभावित करती है। ई’लर्निंग की प्रक्रिया में विद्यार्थी केवल अपने अनुदेशक या शिक्षण संस्थान से जुड़ा नहीं होता। बल्कि इंटरनेट के जरिए लाखों जालपट्टों, इलेक्ट्रॉनिक सामग्री के प्रयोक्ताओं, सर्जकों, उत्पादकों तथा उनका व्यापार करने वालों से भी जुड़ा होता है। यदि यह मान लिया जाए कि प्रयोक्ता(विद्यार्थी) इंटरनेट पर उपलब्ध पाठेत्तर सामग्री के आकर्षण से खुद को बचाए रखता है, तब भी वहां मौजूद दर्जनों शब्दकोश, अनुवाद सुविधाएं, तरह-तरह के संदर्भ ग्रंथ, विश्वकोश, पूरक पाठ्य-सामग्री, अखबार, शोध पत्रिकाएं आदि से उसका निरपेक्ष रह पाना संभव नहीं है। इसलिए क्लार्क का कथन कि माध्यम का संबंध केवल सूचना के आवागमन तक सीमित रहता है, उचित नहीं है। गौरतलब है कि क्लार्क और कोझ़मा के बीच बहस उन दिनों हुई थी, जब तक वेब-2 का आविष्कार नहीं हो पाया था। अधिकतर वेब-सामग्री एकतरफा सूचना-प्रदाता माध्यमों पर सुरक्षित थी। यदि क्लार्क आधुनिक वेबसाइटों को देखते, ऐसी वेबसाइटों को देख पाते जिनपर वेबसाइट मालिकों की हैसियत महज सूचना प्रबंधक जैसी है—तब उनका निष्कर्ष अवश्य ही कुछ और होता।

     

इंटरनेट लर्निंग : भारतीय परिदृश्य और नई शिक्षा नीति

भारतीय संविधान में 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार माना गया है। भारत में इस आयु-वर्ग में करीब 30 करोड़ विद्यार्थी हैं। 300 विश्वविद्यालय स्तरीय शिक्षण संस्थान हैं, जिनसे जुड़े कॉलेजों की संख्या 12,600 से अधिक है। उनमें 80 लाख विद्यार्थी हैं। देश में स्कूल अध्यापकों की संख्या लगभग 95 लाख है। इनमें से 4,00,000 कॉलेज स्तर की संस्थाओं में अध्यापन करते हैं। बावजूद इसके देश में साक्षरता अनुपात मात्र 56 प्रतिशत है। अनेक ऐसे ठिकाने हैं जहां औपचारिक शिक्षण संस्थाओं का बेहद अभाव है। कुछ, खासकर उच्चशिक्षण संस्थान, अत्यंत महंगे होने के कारण गरीब आदमी की पहुंच से बाहर हैं। इसे देखते हुए ऑनलाइन शिक्षा देश के लिए वरदान सिद्ध हो सकती है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में शिक्षा को प्रतिस्पर्धी एवं सर्वसुलभ बनाने पर जोर दिया गया है। इसके लिए उसमें ‘ऑनलाइन शिक्षा’ को बढ़ावा देने तथा उसके लिए नवीनतम प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल का भी संकल्प है। कहा गया है कि ऐसे क्षेत्रों में जहां बालक को सीधे शिक्षा देना संभव नहीं है—वहां ऑनलाइन शिक्षा बेहतर विकल्प बन सकती है। इसके लिए मानव संसाधन मंत्रालय के तहत, एक सशक्त ढांचा खड़ा करने की योजना बनाई गई है। ऐसा ढांचा जो स्कूली स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक, ऑनलाइन अध्ययन-अध्यापन हेतु प्रभावशाली डिजीटल सामग्री और कारगर सिस्टम का निर्माण करेगा; तथा सरकार और शिक्षण संस्थानों के लिए मार्गदर्शक का काम करेगा।

नई शिक्षा नीति में शिक्षा-क्षेत्र में सुधार तथा उसके बहुआयामी विस्तार हेतु, नवीनतम प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। एक ‘राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी फोरम’ बनाने का संकल्प लिया है। यह फोरम गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के विस्तार हेतु डिजीटल सामग्री के निर्माण, मूल्यांकन, योजना, प्रशासन, प्रबंधन आदि क्षेत्रों में नवीनतम प्रौद्योगिकी के प्रयोग के बारे में सलाह देगा। फोरम की सभी सेवाएं, स्कूल स्तर से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों तक, निःशुल्क उपलब्ध होंगी। फोरम क्लासरूम शिक्षा के क्षेत्र में नई तकनीकी के उपयोग के साथ-साथ, ऑनलाइन शिक्षा हेतु ई-सामग्री के निर्माण तथा अध्यापकों के प्रशिक्षण के क्षेत्र में नवीनतम तकनीक के उपयोग की संभावनाओं पर विचार कर, उनके कार्यान्वन हेतु भरोसेमंद मार्गदर्शक तंत्र का काम करेगा।

ऑनलाइन शिक्षा की समस्याएं

एक ओर जहां ऑनलाइन शिक्षा की उपयोगिता स्वयं-सिद्ध है, वहीं दूसरी ओर यह भी सच है कि भारत जैसे बड़े देश के भारी-भरकम और विविधतापूर्ण शिक्षातंत्र का संपूर्ण डिजिटलाइजेशन एकाएक संभव नहीं है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में प्राइमरी तथा प्री-प्राइमरी स्तर पर कुछ ऐसे स्कूल, शृंखलाबद्ध तरीके से खोले गए हैं, जिनमें अध्यापक की भूमिका कक्षा में अनुशासन बनाए रखने; अथवा विद्यार्थी की तात्कालिक जिज्ञासाओं के समाधान तक सीमित होती है। ऐसे स्कूलों में जोर केवल शिक्षण-सामग्री का डिजिटलाइजेशन पर होता है। बच्चे सामान्य तौर पर स्कूल आते हैं। कक्षा लगती हैं, किंतु दीवार पर ब्लैक बोर्ड के स्थान पर सिल्वर स्क्रीन या टेलीविजन सेट होता है। उसके द्वारा पूर्वनिर्धारित पाठ-सामग्री, स्रोत केंद्र से सीधे विद्यार्थियों तक पहुंचाई जाती है। अभी तक ऐसे स्कूल, नर्सरी और प्राईमरी स्तर तक हैं। अलग-अलग स्थान पर कक्षाएं चलाने के लिए बड़े कोचिंग संस्थान भी इस प्रौद्योगिकी का सहारा लेने लगे हैं।

कुछ महीनों से कोविड-19 की महामारी के दौरान शिक्षण को लेकर आ रही मुश्किलों के लिए परंपरागत स्कूलों ने भी ऑनलाइन कक्षाएं चलाना आरंभ किया है। यह मजबूरी में अपनाया गया रास्ता है। क्योंकि ऐसे स्कूलों द्वारा चलाई जा रही ऑनलाइन कक्षाओं में उपलब्ध प्रौद्योगिकी के दसवें हिस्से का भी उपयोग नहीं हो पा रहा है। लगभग सभी अध्यापक परंपरागत शिक्षा के माहौल से आए हैं। उनका समूचा अनुभव और ज्ञान, क्लासरूम शिक्षा तक सीमित है। सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी उनकी जानकारी बहुत सामान्य स्तर की है। ऑनलाइन शिक्षा के लिए जो आवश्यक उपकरण, लैब, डिजिटलीकृत पाठ-सामग्री आदि चाहिए, स्कूलों में उसका भी अभाव है। ऑनलाइन शिक्षा के नाम पर वे केवल भरपाई कर रहे हैं, ताकि स्कूलों के नाम पर चल रही उनकी दुकानें बंद न हों। विद्यार्थियों, खासकर प्राथमिक स्तर के बच्चों की हालत और भी बुरी है। उनमें से अधिकांश बच्चों की जानकारी कंप्यूटर खोलने और बंद करने तक सीमित है। इस हकीकत को उनके अभिभावक भी जानते हैं। लेकिन फिलहाल इसके अलावा उनके सामने कोई विकल्प भी नहीं है। विडंबना यह है कि यह आधी-अधूरी ऑनलाइन शिक्षा भी केवल एक-चौथाई बच्चों के लिए उपलब्ध है। देश में करीब 76 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो अन्यान्य कारणों से ऑनलाइन शिक्षा का लाभ उठाने से वंचित हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत के लगभग 22 फीसदी ग्रामीण घरों में आज भी बिजली की सप्लाई नहीं है। कुछ राज्यों में तो हालत और भी खराब है। ऑनलाइन शिक्षा का सारा दारोमदार इंटरनेट पर टिका है। देश में अभी कुल 31 प्रतिशत, लगभग 40 लोगों के पास इंटरनेट की आधी-अधूरी सुविधा उपलब्ध है। आंकड़े बताते हैं कि अगले कुछ वर्षों में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या दो गुनी हो जाएगी। इसी आधार पर सरकार का इरादा 2025 तक, शिक्षा को ऑनलाइन मोड में लाने का है। संकल्प बुरा नहीं है, मगर चुनौतियां भी कम नहीं हैं।

डिजिटल माध्यम द्वारा पाठ को विद्यार्थी तक पहुंचाने के लिए चाहिए एक कंप्यूटिंग मशीन, निर्बाध इंटरनेट कनेक्शन, जरूरी साफ्टवेयर। इसके अलावा उसे चाहिए एकांत। ऐसी जगह जहां विद्यार्थी बगैर किसी व्यवधान के दूर-शिक्षण का लाभ उठा सके। मुश्किल यह है कि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में जहां आमदनी के हिसाब से लोगों के बीच जमीन-आसमान का अंतर है। गांवों और शहरों में बड़ी संख्या उन लोगों की है जिनके पास एक कमरे के घर हैं। जहां एक ही छत के नीचे छह-सात लोग रहते हैं। उनमें से काफी लोगों के लिए ये संसाधन जुटाना मुश्किल काम है। करीब चार महीने के घोषित-अघोषित लॉकडाउन और उस दौरान कीर्तिमान रच चुकी बेरोजगारी के कारण, विद्यार्थियों के माता-पिता की हालत ऐसी नहीं है कि वे बच्चों के लिए कंप्यूटिंग मशीन, इंटरनेट आदि का इंतजाम कर सकें। एक समाचार के अनुसार बच्चे की ऑनलाइन शिक्षा के लिए असम के एक परिवार को गाय बेचना पड़ी.  इस तरह के समाचार पूरे देश से प्राप्त हो रहे हैं।

‘इंडियन एक्सप्रेस’ में 27 जुलाई 2020 को प्रकाशित, हरियाणा की बडेशर तहसील के मोरनी गांव से जुड़े समाचार से ऑनलाइन शिक्षा की जमीनी हकीकत को समझा जा सकता है।3 उसके अनुसार गांव में गिने-चुने लोगों के पास स्मार्ट फोन हैं। जिनके पास हैं, वे ठीक-ठाक इंटरनेट सिग्नल न मिलने से परेशान रहते हैं। ऐसे में जिन विद्यार्थियों के पास स्मार्ट फोन नहीं है, उन्हें उन बच्चों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिनके पास फोन की सुविधा है। यह सुविधा उन्हें स्कूल समय में उपलब्ध नहीं हो पाती। उस समय जिसका फोन है, वह खुद ऑनलाइन क्लास से जुड़ा होता है। इसलिए बच्चे स्कूल समय के बाद उनके पास जाते हैं। ऐसे परिवार भी हैं, जिनके माता-पिता बच्चों को तत्काल मोबाइल फोन खरीदकर देने में असमर्थ हैं। गांव के एक किसान के ये शब्द पूरे भारत के मजदूर-किसानों की त्रासदी बयान करते हैं—‘मैंने कुछ रुपये बचाए थे। मगर लॉकडाउन के कारण सब घर-गृहस्थी की जरूरतों पर खर्च हो गए। अब सोच रहा हूं कि एक महीने में टमाटरों की फसल बिक जाएगी। उसके बाद मैं अपने बच्चों के लिए स्मार्ट फोन खरीद दूंगा।’ उस किसान की दो बेटियां हैं। छोटी पांचवी कक्षा में पढ़ती है, बड़ी सातवीं में। स्मार्टफोन न होने के कारण वे गांव के एक लड़के के घर जाती हैं। किसान के अनुसार—

‘मेरे पास साधारण फोन है, लेकिन यह बच्चों के किसी काम नहीं आ सकता। इसलिए जब तक टमाटरों की फसल उठ नहीं जाती, मैं अपनी बेटियों को उस लड़के के पास भेजने को विवश हूं, जिसके पास स्मार्ट फोन है। हमने कभी नहीं सोचा था कि पढ़ाई केवल टच फोन के सहारे ही संभव हो पाएगी।’

अखबार में स्थानीय पॉलिटेक्निक की छात्रा, देवी नामक लड़की का बयान भी छपा है। देवी के अनुसार, मोबाइल पर अपना काम निपटाने के बाद वह बच्चों को कापी-कलम के साथ अपने घर बुला लेती है—

‘शाम के समय उन सभी को अपने खेतों में काम करना पड़ता है। इसलिए वे दोपहर के बाद आते हैं और अध्यापक द्वारा भेजे गए नोट्स और वीडियो के पाठ को अपनी कापी में उतार लेते हैं।’

गौरतलब है कि पंचकुला जिले में शिवालिक की पहाड़ियों पर बसा मोरनी एक ऐतिहासिक गांव है। वह हरियाणा का टूरिस्ट स्थल भी है। यदि वहां के बच्चों की यह हालत है तो आप पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार और उड़ीसा के गांवों के बच्चों के हालात का सहज अनुमान लगा सकते हैं।

ऑनलाइन शिक्षा की सफलता में भाषा की समस्या भी है। अभी तक जितने सॉफ्टवेयर बने हैं, वे सभी अंग्रेजी में है। यह ठीक है कि यूनीकोड ने कंप्यूटर पर भाषायी लेखन को आसान बनाया है। मगर उन बच्चों से जिन्होंने आपात-सुविधा के रूप में दूर-शिक्षण को अपनाया है, जो अंग्रेजी के की’बोर्ड को देखकर भी टाइप करना नहीं जानते, यह उम्मीद करना कि वे हिंदी अथवा अपनी मातृभाषा को यूनीकोड में टाइप करना सीखकर, कक्षा में सक्रिय भागीदार बन पाएंगे—एक दुष्कर कल्पना है। न केवल विद्यार्थी, अपितु अधिकांश अध्यापकों के आगे भी यह समस्या है। इस कमी को पेशेवर प्रोग्रामरों द्वारा तैयार ‘पाठ’ के माध्यम से काफी हद तक दूर किया जा सकता है। लेकिन वह खर्चीला उद्यम है, जिसे खानापूर्ति के नाम पर ऑनलाइन कक्षाएं चला रहे स्कूल शायद ही स्वीकार करें।

ऑनलाइन कक्षाओं के लिए जो साफ्टवेयर और पोर्टल, खासतौर पर भारत में इस्तेमाल किए जा रहे हैं, वे स्वयं विकास की प्रारंभिक अवस्था में हैं। ऐसे में लिखित उत्तर की अपेक्षा वाले प्रश्नों का उत्तर दे पाना विद्यार्थी के लिए, खासतौर पर छठी-सातवीं तक के बच्चों के लिए असंभव होगा। इस कमी को नजरंदाज करने के लिए स्कूल वस्तुनिष्ठ प्रश्नमालाओं के विकल्प को आजमा रहे हैं। उनके उत्तर कंप्यूटर या मोबाइल पर महज क्लिक के जरिए दिए जाते हैं। इससे विद्यार्थी की तात्कालिक समस्या का समाधान हो सकता है, परंतु लिखने का अभ्यास, खुद को अभिव्यक्त करने की कला, जो शिक्षा का अनिवार्यता है, वह ढंग से विकसित नहीं हो पाएगी।    

क्या ऑनलाइन शिक्षा स्कूली शिक्षा का विकल्प बन सकती है

क्या ऑनलाइन शिक्षा स्कूली शिक्षा का विकल्प बन सकती है? ऑनलाइन शिक्षा से समय अपना समय घर पर, अपने परिजनों के बीच अपेक्षाकृत आत्मीय माहौल में बिताने का अवसर मिलेगा। आने-जाने की थकान, रास्ते के प्रदूषण से उसका बचाव होगा। बावजूद इसके घर-बैठे ऑनलाइन शिक्षा, विशेषकर वर्तमान परिस्थितियों में, स्कूली शिक्षा का सार्थक विकल्प बन सकेगी—इसमें संदेह है। बालक जब स्कूल जाता था तो घर से निकलने के बाद उसका वास्ता तरह-तरह के लोगों से पड़ता था। अपने साथियों से मिलता-मिलाता था। अध्यापकों और स्कूल के बाकी स्टाफ से संपर्क में आता था। इससे स्कूली शिक्षा के साथ-साथ बालक के समाजीकरण का सिलसिला, जो पुस्तकीय शिक्षा से भी अधिक महत्वपूर्ण है—चलता रहता था। बालक को प्रबुद्ध नागरिक में ढालने के लिए उन अनुभवों की महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता। ऑनलाइन क्लासिस के दौरान बालक का जीवन केवल परिवार के दायरे में सिमटकर रह गया है। एक बात और….सहपाठियों के साथ पढ़ते हुए बालक के मन में अनायास एक स्पर्धा जन्म ले लेती थी। उसमें थोड़ी-बहुत नकारात्मकता से इन्कार नहीं किया जा सकता। मगर उसका बड़ा हिस्सा सकारात्मक ही होता था। वह बालक को और अधिक परिश्रम करने, आगे बढ़ने की प्रेरणा देती थी। सहपाठियों के बीच रहकर बालक के बीच स्वतः मूल्यांकन की प्रक्रिया सतत चलती रहती थी। दूर-शिक्षण ने इन अवसरों को उनसे छीन लिया है।

बंद कमरे में दूर-शिक्षण के लिए कंप्यूटर स्क्रीन पर नजर गढ़ाए बैठा बालक पाठ सामग्री के रूप में केवल सूचनाएं समेट सकता है। सूचनाओं को ज्ञान में बदलने के लिए जो आपसी संवाद, परिचर्चाएं और अनुभव चाहिए, वे ऑनलाइन शिक्षा द्वारा संभव नहीं हैं। दूसरे शब्दों में ऑनलाइन शिक्षा ने सूचनाओं को ज्ञान में परिवर्तित करने, उसे अनुभवों के रूप में दोहराने का अवसर बच्चों से छीन लिया गया है। यदि महामारी के कारण, आधे-अधूरे संसाधनों पर टिकी वर्तमान दूर-शिक्षण प्रणाली लंबे समय तक अपनायी जाती है तो उससे बालक को शिक्षा के क्षेत्र में जो हानि होगी, उसकी अभी हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं।

इन कमियों के बावजूद मानना पड़ेगा कि भविष्य आनलाइन शिक्षा के साथ है। जैसे-जैसे इंटरनेट और संचार प्रौद्योगिकी का विस्तार होगा, ऑनलाइन शिक्षा के क्षेत्र में आ रही मुश्किलें भी कम होती जाएंगीं। पहले चरण में कक्षाओं का डिजिटलीकरण होगा। वह दिन दूर नहीं जब आने वाले दशकों में ब्लैक बोर्ड बिलकुल गायब हो जाएंगे। उनकी जगह टेलीविजन स्क्रीन सेट ले लेंगे। अध्यापकों का काम स्कूलों में पढ़ाने के बजाए, पाठ्यसामग्री तैयार करने तथा उसे प्रयोगशाला से, इंटरनेट के माध्यम से छात्रों तक पहुंचाना भर रह जाएगा। राष्टीय शिक्षा नीति—2020 में सरकार ने, पाठ-सामग्री के निर्माण हेतु ‘स्वयं’, ‘दीक्षा’, ‘स्वयंप्रभा’ नाम से डिजिटलीकृत प्रयोगशालाएं बनाने पर जोर दिया है। ऑनलाइन परीक्षा के लिए भी ‘परख’ नाम से पोर्टल बनाने का सुझाव है। यदि इस दिशा में प्रभावशाली ढंग से आगे बढ़ा गया तो संभव है आने वाले चंद दशकों में ही औपचारिक कक्षाओं की जगह, वर्चुअल कक्षाएं छा जाएं और बड़े-बड़े स्कूल उसी तरह बेमानी लगने लगें जैसे आज सिनेमाघर दिखते हैं। तब हम ‘अपना देश, अपनी भाषा, सबको समान शिक्षा’ के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ सकेंगे; और विद्यार्थियों को उनकी पसंद की शिक्षा उंनकी सुविधा अनुकूल समय पर उपलब्ध हो सकेगी।

ओमप्रकाश कश्यप

 संदर्भ : 

  1. Clark, R. E. (1994). Media will never influence learning. Educational, Technology Research and Development,  Page 5.
  2. Kozma, R. B. (1994). Will media influence learning? Reframing the debate. Educational Technology Research & Development,42(2), 7-19. Retrieved February 15, 2006, fromhttp://mmtserver.mmt.duq.edu/mm416-01/gedit704/articles/kozmaArticle.html
  3. इंडियन एक्सप्रेस, 27 जुलाई 2020,https://indianexpress.com/article/cities/chandigarh/haryana-struggling-to-study-at-remote-morni-village-students-travel-miles-to-access-a-smartphone-6524856/  

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