दक्षिण भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के जन्मदाता : सिंगारवेलु चेट्टियार

सामान्य
जब भी कोई नया महापुरुष जन्मता है, मनुष्यता का भी पुनर्जन्म होता है। प्रत्येक महापुरुष अपने विचारों से, कर्मों से नई इबारत लिखता है। ऐसे कि लोग सम्मोहित होकर उसका उसका अनुसरण करने लगते हैं। फलस्वरूप जड़ और अप्रासंगिक हो चुकी विचारधाराएं पीछे छूटने लगती हैं। कुल मिलाकर बात इतनी-सी है कि जब भी किसी महापुरुष का जन्म होता है, इस दुनिया का भी पुनर्जन्म होता है।

आजकल लोग सवाल नहीं गूगल करते हैं। तो चलिए गूगल कर लेते हैं—‘भारत में मई दिवस मनाने की शुरुआत किसने की थी? वर्ग-क्रांति का प्रतीक लाल झंडा भारत में पहली बार किसने फहराया था? कौन था वह भारतीय जिसने खचाखच भरे सभागार में पहली बार ‘कामरेड’ शब्द का संबोधन किया था। जिसे सुनकर पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगा था? भारत में मजदूर आंदोलनों का पितामह कौन था? कौन था, दक्षिण भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन का जन्मदाता? गूगल बाबा इन प्रश्नों का थोड़ा घुमा-फिराकर एक ही जवाब देंगे—‘सिंगारवेलु चेट्टियार। लोग उन्हें सम्मान से सिंगारवेलार कहते थे।

अब आप सिंगारवेलु को गूगल करना चाहेंगे। पर थोड़ा धीरज रखिए। पहले कुछ बातें ‘मई दिवस’ पर कर ली जाएं। मशीनीकरण के आरंभ में आदमी को भी मशीन मान लिया गया था। ‘कार्य-दिवस’ का अर्थ था, सूरज निकलने से दिन ढलने तक काम करना। मौसम के अनुसार दिन घटता-बढ़ता तो काम के घंटे भी बदल जाते। कामगार को प्रतिदिन 14 से 16 घंटे काम करना पड़ता था। कभी-कभी तो एक कार्यदिवस 18 घंटे तक पहुंच जाता था। अगस्त 1866 में ‘नेशनल लेबर यूनियन’ 8 घंटे की मांग का समर्थन किया।1 आंदोलन होने लगे। परंतु न सरकारें चेतीं न कारखाना मालिकों ने ही कोई ध्यान दिया। आखिरकार अमेरिकी मजदूरों ने 1 मई 1886 से देशव्यापी हड़ताल की घोषणा कर दी। तीन और चार मई, को प्रदर्शन के दौरान पुलिस और मजदूर संगठनों की भिड़ंत हुई। 4 मई को शिकागो के हेमार्किट चौक पर हुई घटना तो नरसंहार जैसी थी। उसी की याद में मई दिवस मनाया जाता है। मई की पहली तारीख का संबंध 8 घंटों के कार्यदिवस की मांग तथा उसके लिए श्रमिकों द्वारा दी गई कुर्बानियों से है।

भारत में पहला मई उत्सव, 1 मई, 1923 को मद्रास में मनाया गया था। उसी दिन देश में पहले मजदूर संगठन का जन्म हुआ था, नाम था—‘हिंदुस्तान लेबर एंड किसान पार्टी’।2 उसी दिन लाल झंडा पहली बार फहराया गया था।3 आगे चलकर यह झंडा मजदूर आंदोलनों की पहचान बन गया। इन सबका श्रेय जाता है—सिंगारवेलु चेट्टियार को। भारत में ‘कामरेड’ शब्द का पहली बार इस्तेमाल उन्होंने ही, दिसंबर 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में किया था।4 यह जादुई शब्द आगे चलकर साम्यवादी चेतना की पहचान बन गया। गया सम्मेलन में सिंगारवेलु ने ही पहली बार भारत के लिए ‘संपूर्ण स्वराज’ की मांग रखी थी।5

जीवन परिचय

सिंगारवेलु  का जन्म 18 फरवरी, 1860 को एक मछुआरा परिवार में हुआ था। समुद्र किनारे जिस बस्ती में वे रहते थे, उसे वे ‘कप्पम’ कहते थे। बस्ती के प्रायः सभी पुरुष मछली पकड़ने का काम करते। बांस और तख्तों से बनी डोंगी से समुद्र की लहरों को चीरते हुए वे आगे बढ़ जाते। कभी समुद्र की बन आती। उसकी उन्मत्त लहरें, किनारे बसीं झुग्गियों को अपने साथ बहा ले जातीं। मगर कुछ दिनों बाद वे फिर उसी जगह उभर आती थीं। प्रकृति और पुरुष की डांडा-मेंडी….झुग्गियों का बनना-मिटना भी मानो लहरों जैसा हो। सिंगारवेलु के पिता का नाम था—वेंकटचलम चेट्टियार। मां थीं—वाल्लमई। बताया जाता है कि उनके दादा मामूली डोंगी के सहारे बर्मा के तटवर्ती क्षेत्रों तक चले जाते। वहां से चावल और इमारती लकड़ी मद्रास तक ले आते थे।6 कह सकते हैं कि धैर्य और दुस्साहस सिंगारवेलु को विरासत में प्राप्त हुए थे।

जिस जाति में सिंगारवेलु का जन्म हुआ था, उसमें पढ़ने-पढ़ाने की कोई परंपरा न थी। परंतु वेंकटचलम थोड़ा आधुनिक मिजाज थे। उन्होंने सिंगारवेलु को पढ़ाने का फैसला किया। खुद को प्रखर बुद्धि सिद्ध करते हुए सिंगारवेलु ने 1881 में मेट्रिक की परीक्षा पास की। 1884 में क्रिश्चन कॉलेज से एफए पास करने के पष्चात उन्होंने बीए के लिए प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास में दाखिला ले लिया। आगे की पढ़ाई के लिए मद्रास लॉ कॉलेज से जुड़े। 1902 में कानून की डिग्री मिली। उसके बाद वे मद्रास उच्च न्यायालय में प्रक्टिश करने लगे। प्रतिभाषाली थे ही। सो वकालत के जमने में देर न लगी।7

1889 में उनका विवाह आंगम्मल से हुआ। वह अंतररजातीय विवाह था। दोनों के एकमात्र संतान, बेटी का जन्म हुआ। जिसका नाम उन्होंने कमला रखा था। 1932 में उन्होंने अपने धेवते, कमला के पुत्र सत्यकुमार को उन्होंने कानूनी तरीके से गोद ले लिया।

आरंभ में सिंगारवेलु व्यापार में हाथ आजमाना चाहते थे। इसलिए 1902 में वे चावल के व्यापार की संभावना तलाशने के लिए ब्रिटेन चले गए। सिंगारवेलु के लिए वह यात्रा बहुत परिवर्तनकारी सिद्ध हुई। वहां उन्हें नई-नई पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिला। लंदन में उन्होंने बौद्ध अधिवेशन में हिस्सा लिया। उससे बौद्ध धर्म-दर्शन के प्रति ऐसा अनुराग बना कि मद्रास लौटने पर अपने घर पर ही ‘महाबोधि सोसाइटी’ की बैठकें आयोजित करने लगे।8 इससे प्रसन्न होकर उन्हें मद्रास महाबोधि सोसाइटी का अध्यक्ष भी मनोनीत कर दिया गया। उन्हीं दिनों समाज सेवा से लगाव हुआ। वे चाहते थे कि बस्ती के बच्चे पढ़-लिखकर आगे बढ़ें। इसके लिए वे बच्चों तथा उनके माता-पिता को प्रोत्साहित करने लगे। आवश्यकता पड़ने पर गरीब बच्चों को पुस्तक, स्टेशनरी, भोजन वगैरह देकर मदद भी करते। पढ़ने का शौक था। सो धर्म, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र आदि विषयों की नई से नई पुस्तकें अपने लिए जुटाते, पढ़ते। अपने पढ़े हुए पर दूसरों से बातचीत करते। सुब्रह्मयम भारती, वी. चक्करई चेट्टियार जैसे नेताओं के संपर्क में आने के बाद वे राजनीति की ओर मुड़ गए।

प्लेग के दौरान

1905 में रूसी क्रांति की खबरें मिलीं, जिससे पहली बार उनका कम्युनिस्म की ओर वे रुझान बढ़ा। इस बीच उनके कांग्रेस से अच्छे संबंध बन चुके थे। पार्टी में वे तिलक जैसे उग्रपंथी नेता माने जाते थे। वे मानते थे कि देश को आजाद कराने के लिए बल प्रयोग अपरिहार्य है। बिना उसके साम्राज्यवादी अंग्रेजों से मुक्ति असंभव होगी। 1914 में पहला विश्वयुद्ध छिड़ा तो सिंगारवेलु का ध्यान युद्ध की खबरों से ज्यादा जनसाधारण की बढ़ती समस्याओं की ओर गया। खासकर उन समस्याओं की ओर जो युद्ध की, पूंजीवादी लिप्साओं की देन थीं। उन्हीं दिनों एक बड़ी चुनौती सामने आ गई। मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में तबाही मचाने वाली प्लेग 1898 में मद्रास तक आ पहुंची। वहां उसने ‘कुप्पम’ को भी अपनी चपेट में लिया। सब कुछ छोड़कर सिंगारवेलु जनसेवा में जुट गए। लोगों को भुखमरी से बचाने के लिए उन्होंने ‘सामुदायिक रसोई’ का संचालन किया। 1910 के बाद प्लेग से छुटकारा मिला तो मलेरिया ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। सिंगारवेलु जूझते रहे। इससे उन्हें गरीबी तथा उसके कारणों को समझने की दृष्टि मिली। वही उन्हें साम्यवाद की ओर ले गई।

राजनीति में दस्तक

13 अप्रैल 1919 भारतीय इतिहास का रक्त-रंजित दिन था। उस दिन जलियांवाला हत्याकांड 379 लोग मारे गए थे। लगभग 1500 हताहत हुए थे। क्षुब्ध जनता अंग्रेजों के विरुद्ध प्रदर्शन करने लगी। उत्तर से दक्षिण तक सब अंग्रेजों के खिलाफ थे। फिर सिंगारवेलु कैसे पीछे रह सकते थे! उन्होंने युवाओं को संगठित कर, कई शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए। गांधी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया। उससे प्रेरित होकर सिंगारवेलु ने भी एक जनसभा में अपने गाउन को अग्नि-समर्पित कर अदालत से नाता तोड़ने की घोषणा कर दी। मई 1921 में उन्होंने गांधी को लिखा—‘मैंने आज अपने वकालत के पेशे से मुक्ति पा ली है। देश-सेवा के लिए मैं भी आपका अनुसरण करूंगा।’9 इसी दौरान वे कांग्रेस के संपर्क में आए। जनमानस में अपनी पैठ, प्रतिभा और सरोकारों के चलते बहुत जल्दी प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में उनकी गिनती होने लगी।

हैलो कामरेड्स

दिसंबर 1922 में उन्हें कांग्रेस के गया अधिवेशन में शामिल होने का अवसर मिला। उस समय वे अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य भी थे। अधिवेशन में दिए गए भाषण में सिंगारवेलु का रंग एकदम निराला था। गए वे प्रदेश कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में थे, मगर भाषण में वे खुद को कुछ और ही बता रहे थे—‘अध्यक्ष, हाल में मौजूद कामरेड्स, साथी मजदूरो, प्रजाजनो, हिंदुस्तान के किसानो और हलवाहो….मैं आपके बीच आपके मजदूर साथी के रूप में बोलने आया हूं। मैं यहां पूरी दुनिया के लिए महा-कल्याणकारी, कम्युनिस्टों की दुनिया के प्रतिनिधि के रूप में पहुंचा हूं। मैं यहां उस महान संदेश को दोहराऊंगा, जिसे साम्यवाद दुनिया-भर के मजदूरों को देता आया है।’10 उन दिनों अंग्रेज ‘कम्युनिज्म’ शब्द से ही खार खाते थे। ऐसे में किसी प्रतिनिधि के मुंह से ‘कामरेड्स’ संबोधन सुनना, खुद को साम्यवादी जगत का प्रतिनिधि बताना, कामगारों, मजदूरों और किसानों की बात करना, वहां मौजूद सदस्यों के लिए यह एकदम अप्रत्याशित था। सो सिंगारवेलु की पहली पंक्ति के साथ ही सभागार तालियों से गूंजने लगा।

भाषण में सिंगारवेलु ने कहा था—‘हम स्वराज के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह लड़ाई हम अहिंसा और असहयोग जैसे हथियारों की मदद से लड़ रहे हैं। मेरा उनमें विश्वास है। मगर इन हथियारों से वर्गहीन समाज की रचना संभव नहीं है।’ उन्होंने कहा था—‘धनाढ्य संभल जाएं। ताकतवर ध्यान दें….दुनिया में जितनी भी अच्छी चीजें हैं, सब मेहनतकश लोगों ने ही तुम्हें दी हैं। तुमने उन्हीं को हाशिये पर ढकेल दिया। वे हमेशा तुम्हारी इच्छाओं के खटते रहते हैं। फिर भी तुम उनकी उपेक्षा करते हो….याद रखो, भारतीय मजदूर अब जाग चुके हैं। वे अपने अधिकारों को धीरे-धीरे समझने लगे हैं।’11 कांग्रेस के इतिहास में वह पहला अवसर था, जब उसके सम्मेलन में किसान और मजदूर वर्ग पर चर्चा हो रही थी। लोग कांग्रेस के कायाकल्प का श्रेय गांधी को देते हैं। लेकिन उस समय की परिस्थितियां ऐसी थीं कि उनसे समझौता किए बगैर कांग्रेस की राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता संभव ही नहीं थी। डॉ. आंबेडकर, रामासामी पेरियार और सिंगारवेलु जैसे नेताओं का दबाव कांग्रेस और गांधी दोनों को बदलने को विवश कर रहा था।

कांग्रेस का गया सम्मेलन सिंगारवेलु की राजनीति की दिशा तय कर चुका था। उनके भाषण ने देश-विदेश के लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। देश-भर से पहुंचे प्रतिनिधियों ने मांग की कि सिंगारवेलु को कांग्रेस की श्रमिक मामलों की प्रस्तावित उपसमिति में स्थान दिया जाए। मानवेंद्रनाथ राय ने मजदूरों तथा आम जनता की समस्या की ओर कांग्रेस तथा सरकार का ध्यान आकर्षित कराने के लिए सिंगारवेलु की प्रशंसा की थी। अपनी उग्र कार्यशैली और साम्यवादी रुझान के कारण वे पहले ही अंग्रेजों की नजर में आ चुके थे। 1921 में पुलिस ने उनके घर पर दबिश दी थी। वह कथित रूप से ‘चुनौती’ शीर्षक से प्रकाशित पंपलेट्स की तलाशी लेने गई थी। लेकिन पुलिस को वहां से खाली हाथ लौटना पड़ा था।12

सिंगारवेलु और गांधी

अपने आरंभिक राजनीतिक जीवन में सिंगारवेलु गांधी से प्रभावित थे। परंतु उनकी कार्यशैली गांधी से अलग थी। प्रिंस ऑफ़ वाल्स भारत दौरे पर आए। शेष भारत की तरह दक्षिण में भी उनकी यात्रा का बहिष्कार किया गया। मद्रास में सिंगारवेलु के नेतृत्व में हड़ताल का आह्वान किया गया था। हड़ताल पूरी तरह कामयाब थी। बाद में पता चला कि हड़ताल में शामिल होने के लिए कुछ दुकानदारों पर दबाव बनाया गया था। कुछ कार्यकर्ताओं की शिकायत पर गांधी ने 9 फरवरी, 1922 के ‘यंग इंडिया’ में ‘सत्याग्रह की मूल भावना का पालन न करने पर’ सिंगारवेलु की आलोचना की थी।13

कम्युनिज्म की ओर

गया सम्मेलन में ही उनकी भेंट श्रीपाद अमृत डांगे से हुई। मानवेंद्रनाथ राय से उनका संपर्क पहले से ही था। अबनीनाथ मुखर्जी, जो अपने साथियों में अबनि मुखर्जी के नाम से पहचाने जाते थे, सिंगारवेलु से मिलने दो बार मद्रास पहुंचे थे। इस तरह सिंगारवेलु कांग्रेस में रहकर भी अपनी स्वतंत्र राजनीति कर रहे थे। पेरियार की तरह वे भी कांग्रेसी नेताओं की कथनी और करनी के अंतर को समझते थे। जानते थे कि कांग्रेस कभी भी मजदूरों और किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार से सीधे टकराव का खतरा मोल नहीं लेगी। इसलिए मद्रास लौटते ही उन्होंने अपने विचारों को कार्यरूप देने के लिए काम शुरू कर दिया था। उसके फलस्वरूप ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’ का गठन हुआ। वह कम्युनिस्ट विचारधारा पर आधारित पहला संगठन था। ध्यातव्य है कि मानवेंद्रनाथ राय, अबानी मुखर्जी, इवेलिना राय आदि नेता मिलकर 17 अक्टूबर, 1920 को ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’(ताशकंद पार्टी) के गठन की घोषणा कर चुके थे, परंतु 25 दिसंबर 1925 को विधिवत गठन से पहले उसका अस्तित्व केवल अनौपचारिक था।

सिंगारवेलु  के नेतृत्व में पहली बार, 1 मई 1923 को भारत में मई दिवस का आयोजन किया गया। उसी दिन ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’ तथा उसके गठन के उद्देश्यों के बारे में लोगों को बताया गया था। मई दिवस का आयोजन सिंगारवेलु ने मद्रास में दो स्थानों पर किया था। पहला उच्च न्यायालय के आगे समुद्र तट पर। दूसरा ट्रिप्लीकेंस तट पर। पहली बैठक की अध्यक्षता स्वयं सिंगारवेलु ने की थी। दूसरे कार्यक्रम की अध्यक्षता एस. कृष्णास्वामी सरमा ने। उस अवसर पर सिंगारवेलु ने कहा था कि मई दिवस का आयोजन स्वयं मजदूरों द्वारा किया गया है। उन्होंने उम्मीद जाहिर की थी कि देश में शीघ्र ही मजदूरों की सत्ता स्थापित होगी, जो लोगों के विकास को गति देगी। ‘मद्रास मेल’ नामक अखबार ने ‘लेबर किसान पार्टी’ द्वारा मई दिवस की आलोचना का जवाब देते हुए कहा था कि केवल वास्तविक मजदूर ही इस उत्सव को मना रहे थे, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है। उस अवसर पर लाल-क्रांति का प्रतीक ‘लाल-झंडा’ भी फहराया गया था। सार्वजनिक कार्यक्रम में लाल झंडा फहराने की वह घटना, न केवल भारत, अपितु एशिया में भी पहली घटना थी। उस अवसर पर 2 मई 1923 के ‘दि हिंदू’ में छपा था—

‘लेबर किसान पार्टी ने मद्रास में मई दिवस उत्सव आरंभ किया है। कामरेड सिंगारवेलु ने उस बैठक की अध्यक्षता की थी। प्रदर्शन कामयाब था। मीटिंग में मई दिवस को सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग भी की गई। पार्टी अध्यक्ष ने पार्टी के अहिंसक सिद्धांतों के बारे में लोगों को बताया था। उसमें लोगों से आर्थिक मदद की अपील भी की गई। इस बात पर जोर दिया गया था कि भारतीय मजदूरों को दुनिया-भर के मजदूरों के साथ एकजुट हो जाना चाहिए।’14

दिसंबर 1923 में उन्होंने ‘दि लेबर किसान गजट’ शीर्षक से पाक्षिक की शुरुआत की। इसके साथ-साथ तमिल भाषा में ‘तोझीलालान’(कामगार) शीर्षक से साप्ताहिक भी निकाला था। ‘कामगार’ के एक अंक का मूल्य ‘आधा आना’ था। अंग्रेजों की सिंगारवेलु पर नजर थी। उनकी दृष्टि में ‘हिंदुस्तान लेबर किसान पार्टी’, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से कहीं अधिक खतरनाक थी। 1924 में ‘कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र’ मामले में सिंगारवेलु को उनके घर पर नजरबंद कर लिया गया। उन दिनों उनकी उम्र 64 वर्ष थी। बाद में उन्हें जमानत मिल गई।

1925 में कानपुर में पहले कम्युनिस्ट सम्मेलन का आयोजन किया गया था। उसकी अध्यक्षता सिंगारवेलु ने की। उस बैठक में ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’ के गठन को स्वीकृति मिली थी। अपने अध्यक्षीय भाषण में सिंगारवेलु ने छूआछूत की समस्या की चर्चा भी की थी। उनका दृष्टिकोण साम्यवादी दृष्टिकोण से मेल खाता था,

‘हमें साफ तौर पर समझ लेना चाहिए कि साम्यवाद की नजर में छूआछूत पूरी तरह आर्थिक समस्या है। अछूतों को मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक तालाबों और मार्गों पर चलने का अधिकार प्राप्त है अथवा नहीं, इन प्रश्नों का ‘स्वराज’ के संघर्ष से कोई संबंध नहीं है….कम्युनिस्टों की न तो कोई जाति होती है, न धर्म। व्यक्ति का हिंदू, मुसलमान या ईसाई होना उसका निजी मामला है….जैसे ही उन(अस्पृश्यों) की आर्थिक पराश्रितता खत्म होगी, छूआछूत की समस्या भी अपने आप समाप्त हो जाएगी।’15

उन दिनों पेरियार राजनीति में, गैर-ब्राह्मण जातियों को समुचित प्रतिनिधित्व न दिए जाने के कारण कांग्रेस से नाराज चल रहे थे। उन्होंने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की स्थापना की थी। सिंगारवेलु की ख्याति उन दिनों शिखर पर थी। उसी दौरान दोनों नेता एक-दूसरे के करीब आए। सिंगारवेलु ने ही पेरियार को कांग्रेस छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया था। पेरियार के मनस् में साम्यवाद का बीजारोपण करने वाले भी वही थे। सिंगारवेलु की सलाह पर ही पेरियार ने सोवियत संघ की यात्रा पर गए थे। लौटने के बाद पेरियार ने सोवियत संघ के अनुभवों के आधार पर ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की कार्यनीति में बदलाव करने का निर्णय लिया। पेरियार के आग्रह पर सिंगारवेलु ने ‘इरोद कार्यक्रम’ का ड्राफ्ट तैयार किया। ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का एक सम्मेलन 4 मार्च 1934 को मन्नारगुडी, तमिलनाडु में हुआ था। सिंगारवेलु ने उसकी अध्यक्षता की थी। अपने भाषण में सिंगारवेलु ने भारतीय समाज के आर्थिक वैषम्य पर चिंता व्यक्त की थी—

‘देश की 40 प्रतिशत जनता को भरपेट भोजन भी नहीं मिलता। मृत्यदर दूसरे देशों से कहीं ज्यादा है। यह 1000 में 30 है। 100 में से 30 बच्चे एक साल का होते-होते मर जाते हैं। भारत में औसत आयु मात्र 20 है, जबकि इंग्लेंड में 53 साल है….लोग घोर दारिद्रय में जीते हैं, बावजूद इसके मंदिरों की घंटियां टनटनाती रहती हैं। मस्जिदों में नमाज और चर्च में प्रार्थनाएं चलती रहती रहती हैं। लोग जिसे ईश्वर समझकर पूजते हैं, उसके बारे में वे कुछ नहीं जानते। ईश्वर महज मनुष्य की रचना है।’16

उस भाषण में सिंगारवेलु ने अपने पूर्वजों को भी नहीं छोड़ा था—

‘मेरे अपने पूर्वजों ने ब्राह्मणों को भोजन कराने के लिए 1 लाख रुपये अलग रख दिए थे। लेकिन जब उनकी बस्ती के मछुआरे बीमार पड़े, वे केवल देवता को पूजा-अर्चना, प्रार्थना और बलि तक सीमित रहे। मेरी जाति की तरह और भी जातियां हैं। वे भी धर्मादे के लिए रकम एक ओर रख देती हैं और मुष्किल समय में प्रार्थनाओं और बलि देकर मन को तसल्ली देती रहती हैं।’17

पेरियार के मन में सिंगारवेलु के प्रति गहरा सम्मान था। खासकर उनकी वैज्ञानिक सोच पर। पेरियार के आग्रह पर ही सिंगारवेलु ने ‘कुदी अरासु’ में लिखना शुरू किया था। मगर उन दोनों के साथ आने से न तो कांग्रेस खुश थी, न ही अंग्रेज सरकार। अंग्रेजों का मानना था कि यह सिंगारवेलु ने ही पेरियार को ‘बिगाड़ा’ है। ब्रिटिश सरकार नहीं चाहती थी कि देश में कम्युनिस्ट आंदोलन को बढ़ावा मिले। उसे देखते हुए सिंगारवेलु ने ‘मजदूर एवं किसान’ जैसे शब्दों को अपनाया। मगर अपनी उग्र कार्यषैली के कारण वे सरकार और विरोधियों की आंखों में हमेशा ही खटकते रहे।

मजदूर नेता के रूप में  

बकिंघम एंड कार्नेटिक मिल, मद्रास की सबसे बड़ी कपड़ा मिल थी। उसका महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि भारत की पहली लेबर यूनियन18, ‘मद्रास लेबर यूनियन’ का गठन अप्रैल 1918 में वहीं के मजदूरों ने मिलकर किया था। ब्रिटिश अधिकारी यूनियन के गठन का विरोध कर रहे थे। घटना की नींव 1920 में पड़ी थी। ब्रिटिश अधिकारी रिवाल्वर लिए मजदूरों को धमकाता फिर रहा था। एक मजदूर ने उसकी रिवाल्वर छीनकर पुलिस को सौंप दी। इसपर पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। बाबूराव और मुरुगन नामक दो युवा मजदूर उस गोलीबारी में मारे गए। मद्रास में श्रम आंदोलन में मरने वाले ये दोनों पहले थे। घटना से नाराज 13000 मजदूर हड़ताल पर उतर आए। बाद में पुलिस और कामगारों के बीच कई भिड़ंत हुईं, जिनमें दर्जनों मजदूरों को प्राण गंवाने पड़े। सिंगारवेलु ने न केवल हड़ताल के नेतृत्व में हिस्सा लिया, बल्कि लगातार लेख लिखकर मजदूरों के उत्पीड़़न के विरुद्ध आवाज उठाते रहे।

उन्हीं दिनों उत्तरी मद्रास में मैसी कंपनी के कामगार भी हड़ताल पर चले गए। वी. चक्करई और ओदीकेसवेलु नायकर जैसे मजदूर नेताओं के साथ सिंगारवेलु एक बार फिर मजदूरों के समर्थन में उतर गए। अपने आग उगलते भाषणों से इन तीनों नेताओं ने सरकार को हिला दिया था। 1927-28 उत्तरी-पश्चिमी रेलवे, बंगाल-नागपुर रेलवे तथा ईस्ट इंडियन रेलवे के कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर चले गए। रेलवे कर्मचारियों को समर्थन देने, उनका हौसला बढ़ाने के लिए सिंगारवेलु ने भोपाल, हावड़ा और बंगाल की यात्राएं कीं। हावड़ा और बंगाल में 30,000 मजदूर-कामगार हड़ताल पर थे। सिंगारवेलु ने अपने साथियों के साथ हड़ताल में हिस्सा लिया था। उत्तरी भारत की यात्रा से लौटे ही थे कि दूसरी हड़ताल की सूचना मिली। 1928 में दक्षिण भारतीय रेलवे के मजदूरों ने भी हड़ताल का ऐलान कर दिया। मजदूर उनकी योग्यता के नए सिरे से छंटनी का विरोध कर रहे थे। छंटनी के लिए प्रबंधकों ने कर्मचारियों की योग्यता के नए मानदंड तैयार किए थे, जो मजदूरों को स्वीकार्य नहीं थे। दूसरे रेलवे ने मजदूरों को अलग-अलग ठिकानों पर भेजने का निर्णय लिया था। मजदूर इनका विरोध कर रहे थे। मांगे न मानने पर मजदूर 19 जुलाई 1928 से हड़ताल पर चले गए। उनके समर्थन में बाकी मजदूरों और कामगारों ने भी हड़ताल की घोषणा कर दी। परिणामस्वरूप 21 जुलाई से रेलवे का चक्का जाम हो गया। वह हड़ताल आखिरकार नाकाम सिद्ध हुई। सिंगारवेलु को दस वर्षों की सजा हुई। लेकिन बाद में अपील पर, उनकी बीमारी और उम्र को देखते हुए सजा की अवधि 18 महीने कर दी गई।

1927 में ही जब हड़ताली मजदूर चाको और विंसेंट पुलिस की गोली से मारे गए। मद्रास तक जब वह समाचार पहुंचा तो सिंगारवेलु ने बिना कोई पल गंवाए उनकी स्मृति में शोक सभा का आयोजन किया। जिसमें पुलिस के दमन की निंदा की गई। मजदूर और कामगारों की समस्याओं के समाधान को लेकर वे इतने समर्पित थे कि जब भी, जहां से भी बुलावा मिलता, तुरंत पहुंच जाते थे।

सिंगारवेलु का निधन 11 फरवरी 1946 को हुआ। जब तक जिये तब तक उन्हें मजदूरों के हितों की चिंता सताती रही। जीवन के आखिरी दिनों में जब बढ़ी उम्र के कारण सक्रियता घट गई तो उन्होंने पेरियार की पत्रिकाओं, ‘कुदी अरासु’, ‘रिवोल्ट’ तथा अंग्रेजी दैनिक हिंदू में लेख आदि लिखकर संघर्ष की लौ को जलाए रखा। उनकी आंखों में समानता पर आधारित, वर्गहीन समाज का सपना बसता था। इस कसौटी पर कांग्रेस की ‘स्वराज’ की अवधारणा भी उन्हें अधूरी दिखाई पड़ती थी। उनका गांधी के नाम लिखा गया एक पत्र 24 मई 1922 को ‘नवशक्ति’ में प्रकाशित हुआ था। पत्र में उन्होंने लिखा था कि कि प्रत्येक परिवार को उतनी जमीन मिलनी चाहिए, जिससे वह अपनी जरूरत के लायक अन्न उपजा सके। अपना घर होना चाहिए, ताकि किसी को भी किराया न चुकाना पड़े। इसके अलावा मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य की व्यवस्था भी सरकार की ओर से करनी चाहिए। जिस स्वराज में यह गारंटी न हो, उसका कोई मूल्य नहीं है। असली स्वराज केवल जनता द्वारा, और केवल जनता के लिए आएगा। वे बेहद पढ़ाकू थे। उनका पुस्तकालय मद्रास के सबसे बड़े निजी पुस्तकालयों में से था।

ओमप्रकाश कश्यप

 संदर्भ

  1.  अलेक्जेंडर ट्रेक्टनबर्ग,दि हिस्ट्री ऑफ़ मे डे, इंटरनेशनल पंपलेट, 14,799 ब्रोडवे न्यू यार्क, पृष्ठ 3
  2.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम- सिंगारवेलु : फर्स्ट कम्युनिस्ट इन साउथ इंडिया, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृष्ठ-1
  3.  पी.मनोहरन, जेनेसिस एंड ग्रोथ ऑफ़ कम्युनिस्ट पार्टी इन इंडिया, पृष्ठ 191।
  4.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-189
  5.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-190
  6.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-1
  7.  पी.वसंतकुमारन, गॉडफादर ऑफ़ इंडियन लेबर, एम. सिंगारवेलु, पूर्णिमा प्रकाशन, चैन्नई।
  8.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-2
  9.  वसंतकुमारन, पूर्णिमा प्रकाशन, चैन्नई।
  10.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ 164-165
  11.  उपर्युक्त 165
  12.  पी. मनोहरन, पृष्ठ 183
  13.  दि कलैक्टिड वर्क्स ऑफ़महात्मा गांधी, खंड-26, पृष्ठ 132-134।
  14.  के.मुरुगेशन एंड सी.एस. सुब्रमण्यम, पृष्ठ-169
  15. उपर्युक्त पृष्ठ 203
  16.  उपर्युक्त पृष्ठ 221-22
  17.   उपर्युक्त पृष्ठ 222
  18.  पी. मनोहरन, पृष्ठ-11

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