क्रांति-मशाल सावित्रीबाई फुले

सामान्य

हम भारतीय अपनी सभ्यता पर गर्व करते हैं. ऐसे लोग जो प्राचीनतम को ही महानतम की कसौटी मानते है, वे और भी ज्यादा गर्व करते हैं. इतिहास की बात करें तो सभ्यताकरण के पिछले तीन हजार वर्षों में भारतीय समाज ने उथलपुथल के अनेक दौर देखे हैं. ढाई हजार वर्ष पहले जब बुद्ध के नेतृत्व में भारत दुनिया पर ‘धम्मविजय’ का सपना देख रहा था, उस समय कुछ विदेशी भारत पर राजनीतिक विजय का झंडा गाढ़ना चाहते थे. उन्हें लगता था कि महावीर और गौतम बुद्ध के प्रभाव में अहिंसा को अपना चुके भारतीय शासकों को युद्ध में हराना आसान होगा. लेकिन वह उनका भ्रम ही सिद्ध हुआ. खुद को सिकंदर महान करने वाले यूनानी शासक ने भारत पर जब हमला किया तो उसे जैन धर्म को अपना चुके चंद्रगुप्त की ओर से जोरदार टक्कर मिली. अहिंसावादी भारत ने सिकंदर के विश्वविजेता बनने के ख्बाव को चकनाचूर कर दिया. उसकी पराजय के पश्चात भारतीय पराक्रम की छाप विदेशियों के दिल पर ऐसी पड़ी कि अगले बारहतेरह सौ वर्षों में किसी विदेशी की भारत की ओर नजर उठाने की हिम्मत न पड़ी. बुद्ध के बाद भारत लगभग 1500 वर्षों तक विदेशी आक्रमणों से सुरक्षित रहा. लेकिन आंतरिक स्तर पर निरंतर कमजोर पड़ता गया. कारण था ब्राह्मणों का जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में बढ़ता वर्चस्व. इसी दौर में पुराणों का लेखन हुआ. बुद्ध ने संगठन का आधार व्यक्तिगत और सामाजिक शुचिता को बनाया था. ब्राह्मण उसकी जगह वर्णव्यवस्था ले आए. आरंभ में वर्णव्यवस्था खुली थी. यानी कोई भी व्यक्ति अपने गुणकर्म के आधार पर अपना वर्णनिर्धारित कर सकता था. क्षत्रिय कुल में जन्मे विश्वामित्र और दासीपुत्र शूद्र महीदास ब्राह्मण कहलाए. ऊपर के वर्गों से निचले वर्गों में भी पलायन हुआ. चूंकि ब्राह्मण का समाज की कुल ज्ञानसंपदा पर एकाधिकार था. इसलिए उन्होंने धीरेधीरे वर्णव्यवस्था को जाति का रूप देना आरंभ कर दिया.

बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित होने के बावजूद भारतीय समाज के विकास की दिशा में वह कालखंड बहुत अधिक सहायक सिद्ध न हो सका. हालांकि उस अवधि में समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त द्वितीय जैसे पराक्रमी सम्राट हुए. परंतु समाज में, विशेषरूप से मानवीय स्वतंत्रता और समानता की दृष्टि से हालात निरंतर बिगड़ते गए. क्योंकि पूरा समाज छोटीछोटी जातियों और उपजातियों में बंटने लगा था. स्त्रियों के लिए परिवेश और भी निराशाजनक था. उनपर जाति के अलावा पितृसत्तात्मकता के बंधन भी थे. उसके बाद मुस्लिमों का शासन आया. वे बहुत जल्दी समझ गए कि इस देश में ब्राह्मणों को संतुष्ट किए बगैर लंबे समय तक टिके रहना संभव नहीं है. इसलिए उन्होंने हिंदू धर्म की मूल संरचना में अधिक छेड़छाड़ करने की कोशिश नहीं की. अपितु हिंदू भावनाओं का सम्मान करते हुए मंदिरों और धार्मिक कार्यों को खूब मदद दी. ब्राह्मणों को ऊंचे पद दिए. उसका लाभ ब्राह्मणों ने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए उठाया. भक्ति साहित्य के सहारे अवतारवाद की नींव पड़ी. उसकी मदद से ब्राह्मणवाद अपनी जड़ें मजबूत करने में लगा रहा. परिणामस्वरूप जातियों की संख्या जो मनुस्मृति के रचनाकाल तक मात्र कुछ दर्जन तक सीमित थी, मुगलकाल आतेआते हजारों में पहुंच गई. जातियां आर्थिकसामाजिक भेदभाव बनाए रखने में सहायक थीं. वे शूद्रों को जो मेहनतकश समुदाय था एकदूसरे का प्रतिद्विंद्वी बनाती थीं. समाज की कुल उत्पादकता के लिए जिम्मेदार होने के बावजूद उन्हें न तो अपने श्रम पर अधिकार था, न ही श्रमोत्पाद पर. राजसत्ता, धर्मसत्ता और अर्थसत्ता तीनों उसके शोषण पर तुली थीं. स्पर्धा ऊपर के तीनों वर्गों में भी थी. लेकिन चौथे वर्ग से टकराव की स्थिति में वे सभी एकजुट हो जाते थे. जातिप्रथा का सबसे विकृत और कलंकित रूप अस्पृश्यता के रूप में उपस्थित थी. उसने समाज के बड़े हिस्से से उसके मूलभूत अधिकार छीनकर, उसे नारकीय परिस्थितियों में रहने के लिए विवश कर दिया.

अंग्रेज इस देश में व्यापारी बनकर आए थे. आरंभ में उनका यहां शासन करने का कोई इरादा नहीं था. लेकिन जब उन्होंने इस देश को छह सौ से अधिक रियासतों में बंटे हुए पाया, यह देखा कि लोग आपस में ही लड़झगड़ रहे हैं तो उन्होंने अर्थसत्ता के साथसाथ राजसत्ता को भी साधना आरंभ कर दिया. इस कार्य में उन्हें स्थानीय शासक वर्ग की भरपूर मदद मिली. राजनीतिक औपनिवेशीकरण का मूल उद्देश्य आर्थिक उपनिवेश को सुरक्षित करना था. ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में प्रवेश के समय पश्चिम में बौद्धिक जागरण दस्तक दे चुका था. अगली दो शताब्दियों में एशिया और अफ्रीका के लगभग सभी देश औपनिवेशीकरण की जद में आ चुके थे. चारों ओर यूरोप की वैचारिक क्रांति की धूम मची थी. स्वाभाविक रूप से यूरोपीय लोगों को उनपर गर्व था. वे स्वयं को नई सभ्यता का संवाहक कहते थे. उनका दावा था कि उनका शासन उपनिवेशों को उनकी संस्कृतियों के बर्बर तत्वों से मुक्ति दिलाएगा. साम्राज्यवादी लिप्सा और आर्थिक दोहन को कुछ देर के लिए भुला दिया जाए तो औपनिवेशिक ताकतों के इस दावे में दम था. राजनीतिक सत्ता हथियाने के बाद अंग्रेजों ने भारत में जो कानून बनाए, उनपर वहां की वैचारिक क्रांति का असर था. फलस्वरूप शताब्दियों से शोषण एवं उत्पीड़न का शिकार रहे शूद्रों और अतिशूद्रों को शिक्षाप्राप्ति का अवसर मिला. समान नागरिकता का कानून लागू होने से उनमें अधिकार चेतना बढ़ी. सरकारी नौकरियों के दरवाजे उनके लिए खुलने लगे. लेकिन कानून बनाना अलग बात थी. उत्पीड़ितों को उनका लाभ उस समय तक मिलना संभव न था, जब तक उनके भीतर परिवर्तन की मौजूद न हो. इस काम के लिए आगे आए ज्योतिराव फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले. ज्योतिराव फुले ने जिन्हें सब प्यार से ज्योतिबा कहते थे, दो स्तरों पर काम किया. यह मानते हुए कि जातिवाद की नींव धर्मशास्त्रों तथा उस पुरोहित वर्ग पर टिकी है, जो धर्म और धर्मशास्त्रों की मनमानी व्याख्या करते हैं, उन्होंने धार्मिक मिथों की पड़ताल की. दर्जनों स्कूल खोले, उसके फलस्वरूप समाज में नई क्रांति ने दस्तक दी और देश आधुनिक राज्य बनने की ओर अग्रसर हुआ.

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सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के नायगांव में हुआ था. यह स्थान पुणेसतारा मार्ग पर पुणे से 50 किलोमीटर दूर है. उनके पिता का नाम खांडोजी नेवासे पाटिल तथा मां का नाम लक्ष्मी था. वे अपने पिता की सबसे बड़ी बेटी थीं. सावित्रीबाई का बचपन ठीक ऐसे ही बीता जैसे उस उम्र में दूसरी लड़कियों का बीतता था. अपनी सहेलियों के साथ खेलतेकूदते, हंसतेबतियाते हुए. बस एक बात उन्हें अपनी हमउम्र लड़कियों से अलग करती थी. सावित्रीबाई बचपन से ही निडर और साहसी थीं. हमेशा नया सीखने को उत्सुक रहती थीं. तैराकी उनका शौक था. गुलेल का निशाना इतना पक्का था कि एक निशाने से फल जमीन पर आ गिरता. दबंग इतनी कि लड़कों से जूझने में भी पीछे नहीं हटती थीं. खासतौर पर यदि कोई लड़का लड़की को सताए तो उनका कोप देखते ही बनता था. आगे बढ़कर वे उसकी पिटाई कर देती थीं. खेलकूद के अलावा घुमक्कड़ी भी उनके शौक में शामिल थी. इसलिए सहेलियों के साथ घूमते हुए दूर निकल जातीं. वहां नएनए पेड़पौधों को देखना, उनका नामगुण की जानकारी हासिल करना, उनका स्वभाव था. जिज्ञासा और कौतूहल से ही उनके पसंदीदा खेल बने थे.

उनके बचपन की एक घटना है. एक बार वे बच्चों के साथ ऐसे ही जंगल में घुमक्कड़ी कर रही थीं. तभी उनकी नजर एक सांप पर पड़ी जो अपने कुत्सित इरादों के साथ एक घौंसले की ओर बढ़ रहा था. प्रखर बुद्धि सावित्रीबाई समझ गईं कि सांप का निशाना घौंसले में रखे पक्षी के अंडे या बच्चे हैं. बस फिर क्या था! उन्होंने रास्ते से पत्थर उठाया और सांप में दे मारा. निशाना अचूक था. सांप जमीन पर आ गिरा. बाकी बच्चे घबराकर अपनेअपने घर की ओर भाग गए. परंतु सावित्रीबाई तत्क्षण आगे बढ़कर उसपर डंडे से प्रहार करने लगीं. सांप को अशक्त करने के बाद ही उन्होंने उसका पीछा छोड़ा.

उन दिनों लड़कियों को पढ़ाने का चलन नहीं था. शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए तो यह और भी कठिन था. मगर यदि कोई सावित्रीबाई जैसा जिज्ञासु हो तो अज्ञानता की पकड़ स्वतः ढीली पड़ने लगती है. सावित्रीबाई बचपन से ही अक्षरों के प्रति सम्मोहित थीं. प्रखर बुद्धि तो वे थीं ही. एक और घटना है. एक बार वे पड़ोस के शिखल गांव में मेला देखने गई हुई थीं. उस समय उनकी उम्र मात्र छहसात वर्ष थी. बच्चों के साथ उन्होंने भी मेले से खाने के लिए खरीदा. उसे खातेखाते वे मेला घूम ही रही थीं कि कानों में संगीत ध्वनि पड़ी. एक पेड़ के नीचे कुछ अंग्रेज गाबजा रहे थे. घूमतीघामती सावित्री उनके पास चली गईं. वहां एक अंग्रेज ने उन्हें खाते हुए देखा तो टोक दिया—‘चलतेफिरते खाना अच्छी बात नहीं होती.’ अच्छी सीख को मानने में सावित्रीबाई ने विलंब नहीं किया. उन्होंने खाने की सामग्री तुरंत फेंक दी. अंग्रेज पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ा. उसने प्रसन्न होकर सावित्री को एक पुस्तक उपहार में दी. पुस्तक अंग्रेजी में थीं. वे अंग्रेज का मुंह देखने लगीं. अंग्रेज ने हंसकर कहा—‘पढ़ना नहीं आता, कोई बात नहीं. पुस्तक को अपने पास रखो. फिलहाल चित्र देखकर जितना समझ सको, उनका काफी होगा.’ पुस्तक लेकर सावित्रीबाई घर चली आईं.

उन दिनों लड़कियों को पढ़ानेलिखाने का चलन न था. कई जगह तो वह पाप समझा जाता था. उपहार में मिली पुस्तक को निहारते हुए सावित्रीबाई अक्षरों की उष्मा को महसूस कर ही रही थीं कि उनके मातापिता ने उन्हें देख लिया. बेटी के हाथों में अंग्रेजी की पुस्तक देख वे आगबबूला हो गए. सावित्रीबाई ने घबराकर वह पुस्तक खिड़की से फैंक दी. पिता का गुस्सा शांत होने के बाद सावित्री उस पुस्तक को उठाकर लाईं, फिर पिता से बोलीं—‘देख लेना, एक दिन मैं इस पुस्तक को अवश्य पढ़ लूंगी.’ उसके बाद उन्होंने वह पुस्तक संदूक के हवाले कर दी. बात आईगई हो गई. उस समय कौन जानता था कि सावित्री बाई फुले न केवल उस पुस्तक को पढ़ने में सक्षम होंगी, अपितु ऐसा करिश्मा कर दिखाएंगी कि अशिक्षा के अंधकार में रह रहीं देश की बाकी स्त्रियां भी पुस्तकें पढ़लिख सकेंगीं. वह संभव हुआ. बहुत जल्दी, कुछ ही अंतराल के बाद सावित्रीबाई फुले ने बड़े आंदोलन के साथ परिवर्तन की शुरुआत की.

उन दिनों लड़कियों का विवाह अल्पायु में ही हो जाता था. 1840 में सावित्रीबाई के परपंराजीवी परिवार ने भी उनका विवाह मात्र दस वर्ष की अवस्था में ज्योतिबा फुले के साथ कर दिया गया. फुले की उम्र उस समय 13 वर्ष थी. वह उम्र खेलनेकूदने और दुनिया को समझने की शुरुआत करने की थी. हजारों वर्षों से भारत में राजनीतिक सत्ता चाहे जिनके भी हाथ में रही हो, सामाजिक सत्ता पर ब्राह्मणों का ही अधिकार था. जाति के माध्यम से उन्होंने पूरे समाज को दो हिस्सों में बांटा हुआ था. एक ओर ब्राह्मण और वे ऊंची जातियां थीं, जिन्हें मनुवादी विधान अतिरिक्त अधिकार देता था. उनमें ब्राह्मण सर्वोपरि थे. बाकी दो वर्ग क्षत्रिय और वैश्य क्रमशः राजसत्ता और अर्थसत्ता की मदद से ब्राह्मणवाद का पोषण करते थे. चौथे वर्ग में शूद्र और अतिशूद्र आते थे. शूद्र यानी क्षुद्र. शिक्षा और संसाधनों से विपन्न. ब्राह्मण ग्रंथों में उन्हें पंचम वर्ण, दास, दस्यु जैसे नाम दिए गए थे. मनुवादी विधान में उनका काम था बाकी तीनों वर्गों की सेवा करना. असल में चौथा वर्ग ही समाज का प्रमुख उत्पादक वर्ग था. बाकी तीनों वर्ग पूरी तरह अनुत्पादक और परजीवी थे. बावजूद इसके उनके पास अधिकारों की अफरात थी, जबकि चौथे वर्ग को पूरी तरह अधिकारविपन्न अवस्था में रखा गया था. अपनी धार्मिक सत्ता को बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों ने दलितों पर तरहतरह के सामाजिक और आर्थिक प्रतिबंध लागू किए थे. जहां ब्राह्मण को पृथ्वी की समस्त संपदा का अधिकारी बताया गया था, वहीं शूद्रों एवं अतिशूद्रों को संपत्ति रखने के अधिकार से भी वंचित किया गया था. हिंदू धर्म का रवैया उनके प्रति पक्षपातपूर्ण था. हिंदुओं के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से अर्थ और मोक्ष शूद्रों और अतिशूद्रों पर लागू नहीं थे. यदि अपने श्रमकौशल से कोई शूद्र कुछ धनराशि जुटा भी ले तो ‘मनुस्मृति’ उस धर्म को बलात् छीन लेने की अनुशंसा करती थी.

मनुस्मृति के प्रावधानों का लाभ उठाते हुए ब्राह्मण न केवल सामाजिक सत्ता में सर्वोपरि स्थान पर थे, अपितु सरकारी पदों पर भी वही छाए हुए थे. इस अन्याय का सामना करने के लिए नवंबर 1916 में मद्रास में ‘जस्टिस पार्टी’ की स्थापना की गई थी. दिसंबर 1916 में पार्टी ने ‘दि नाॅन ब्राह्मण मेनीफेस्टो’ जारी किया था. उस मेनीफेस्टो में पार्टी ने 1912 में सत्ता प्रतिष्ठानों पर ब्राह्मणों के अधिपत्य का ब्यौरा दिया था—

जाति वर्ग

कुल

जनसंख्यानुपात

डिप्टी

कलेक्टर

उपन्यायाधीश

जिला मुंसिफ

ब्राह्मण

3.2

77

15

93

गैरब्राह्मण हिंदू

0

30

3

25

मुस्लिम

6.6

15

0

2

भारतीय ईसाई

2.7

7

0

5

यूरोपीय तथा अन्य यूरेशियाई नागरिक

नगण्य

11

0

3

गैरब्राह्मण हिंदुओं भी अधिकांश उच्च सवर्ण जातियों के लोग ही सरकारी सेवा में थे. शूद्रों और अतिशूद्रों की भागीदारी पूर्णतः नदारद थी. शिक्षा की दृष्टि से वे अत्यंत पिछड़े हुए थे. सरकारी नौकरियों में प्रवेश न होने का यह भी बड़ा कारण था. महाराष्ट्र में इस स्थिति को ज्योतिबा फुले ने समझा था. उनकी जाति माली की गिनती पिछड़ी जातियों में की जाती थी. वह न केवल शिक्षा, अपितु संसाधनों के आधार पर भी अत्यंत पिछड़ी हुई थी. अपनी जाति में फुले के पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी थी. लेकिन शिक्षा के प्रति उनमें भी किसी प्रकार की जागरूकता न थी. लेकिन रिश्ते की बहन सगुणाबाई के जोर डालने पर फुले के पिता ने उन्हें प्राथमिक पाठशाला में भर्ती करा दिया गया. ज्योतिबा प्रखर बुद्धि थे, मगर वहां पढ़ाई लंबी न खिंच सकी. ब्राह्मणों के बहकावे में आकर फुले के पिता ने उन्हें विद्यालय से निकाल लिया. और जैसा कि उन दिनों चलन था, 13 वर्ष की उम्र में फुले का विवाह कर परंपरानुसार गृहस्थ आश्रम में ढकेल दिया गया था. उस समय फुले के मार्गदर्शक बनकर आए मुंशी खान गफ्फार बेग और सर लिजिट. गफ्फार बेग अध्यापक थे और शिक्षा के महत्त्व को भलीभांति समझते थे. जबकि लिजिट अंग्रेज अधिकारी थे. उन्होंने न केवल फुले को शिक्षा का महत्त्व समझाया, अपितु उनके मातापिता को भी उनकी आगे की पढ़ाई के लिए राजी कर लिया. विवाह के एक वर्ष बाद फुले को पूना के स्काटिश मिशन स्कूल में भर्ती करा दिया गया.

स्कूल के पुस्तकालय में फुले का परिचय यूरोप की वैचारिक क्रांति के प्रवत्र्तकों तथा उसे आंदोलन का रूप देने वाले विचारकों से हुआ. थाॅमस पेन की ‘मनुष्य के अधिकार’ उन्होंने पढ़ी. वहीं अश्वेतों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले मार्टिन लूथर किंग के बारे में पढ़ने को मिला. उनके अलावा जार्ज वाशिंग्टन, शिवाजी, थाॅमस जेफरसन, मिल, रूसो के विचारों का असर भी उनपर पड़ा. इसी से उनके मन में समाज सुधार की प्रेरणा जगी. फुले के एक मित्र थे, सदाशिव गोवड़े. अच्छे और संवेदनशील इंसान थे. जज के कार्यालय में काम करते थे. एक बार फुले उनसे मिलने गए. भविष्य की योजनाओं पर बात की. भारत में मिशनरियों को आने की अनुमति 1831 में मिल चुकी थी. अहमदनगर में जहां सदाशिव कार्यरत थे, मिशनरियों के अनेक स्कूल थे. एक दिन फुले और सदाशिव उन स्कूलों को देखने गए. सदाशिव के साथ वे एक स्कूल की संचालिका, श्रीमती फरार से भी मिले. बातचीत हुई. श्रीमती फर्रार ने फुले को भारतीय स्त्रियों की दुर्दशा के बारे में बताया. फुले से भी भारतीय स्त्रियों की दुर्दशा छिपी न थी. श्रीमती फर्रार ने जब उन्हें स्त्रीशिक्षा के क्षेत्र में काम करने के लिए कहा तो फुले को मानो अपना आरंभिक लक्ष्य मिल गया. वहां से लौटते समय वे बहुत प्रसन्न थे.

फुले के व्यक्तित्व निर्माण में उनकी बुआ सगुणाबाई का बहुत बड़ा योगदान था. इसलिए स्त्रियों के प्रति विशेष सम्मान बचपन से ही उनके मन था. लेकिन जिस जाति में वे जन्मे थे, उसमें शिक्षा के प्रति कोई जागरूकता न थी. फुले इसे भलीभांति समझते थे, परंतु उन्हें विश्वास था कि एक बार शुरुआत हो जाए तो लोग झिझक छोड़कर स्वयं आने लगेंगे. सो शुरुआत के लिए उन्होंने अपने परिवार को ही चुना. सबसे पहले सावित्रीबाई से बात की. पढ़नालिखना तो सावित्रीबाई का सपना था. उन्होंने तत्क्षण अपनी स्वीकृति दे दी. उसी ‘हां’ के साथ समाज में एक शीत क्रांति का सूत्रपात हुआ. फुले ने न केवल सावित्रीबाई को घर में पढ़ाना आरंभ कर दिया, अपितु सुगणाबाई को भी उनके साथ शामिल कर लिया. दिन में वे अपना काम देखते. शाम को भोजन के उपरांत दोनों को पढ़ाने बैठ जाते. इस तरह सगुणाबाई आधुनिक भारत की प्रथम प्रौढ़ विद्यार्थी भी अनायास ही बन गईं.

1831 के बाद ईसाई मिशनरियों को भारत में आकर काम करने की अनुमति मिल चुकी थी. उन्होंने भारत में जगहजगह स्कूल खोले हुए हुए थे. मिशनरी स्कूलों में सैद्धांतिक रूप से सभी वर्गों के विद्यार्थी पढ़ सकते थे. परंतु ऊंची जातियों के लोग ऐसे विद्यालयों में जहां शूद्र भी पढ़ते हों, अपने बच्चों को भेजने के लिए तैयार नहीं होते थे. जो शूद्र और अतिशूद्र उन विद्यालयों में पढ़ना चाहें उन्हें तरहतरह के अपमान का सामना करना पड़ता था. इसलिए उन स्कूलों में शूद्र और अतिशूद्र विद्यार्थियों की संख्या बहुत कम, करीबकरीब नगण्य होती थी. मिशनरियों के अलावा भारतीय द्वारा खोले गए स्कूल भी थे, जिनमें सिर्फ ऊंची जातियों के बच्चों को शिक्षा की अनुमति थी. शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए शिक्षा के अवसर बहुत विरल थे. फुले की चिंता उन्हीं को लेकर थी. वे पुणे के महारबाड़े में स्कूल खोलना चाहते थे. मगर स्कूल के लिए अध्यापकों की आवश्यकता थी. सवर्ण उन्हें पढ़ाना तो दूर पास भी न फटकने देते थे. फुले की उम्मीद फिर अपनी पत्नी पर आकर टिक गई. घरेलू पढ़ाई से सावित्रीबाई खुद पढ़नालिखना सीख चुकी थीं. मगर अध्यापन के लिए तो विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता थी. यह जिम्मेदारी फुले के दो मित्रों, सुखराम यशवंत परांजपे और केशव शिवराम भावलकर ने उठाई. उनकी मदद से सावित्रीबाई और सुगणाबाई ने पुणे की छबीलदास हवेली में चलाए जा रहे नार्मल स्कूल में प्रवेश ले लिया.

वह एक मिशनरी स्कूल था, जिसका संचालन मिशेल नामक ब्रिटिश महिला के जिम्मे था. उसके बाद सावित्रीबाई ने पुणे से अध्यापक प्रशिक्षण प्राप्त किया. इसके अलावा उन्होंने श्रीमती फरार द्वारा अहमदनगर में चलाए जा रहे अध्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम में हिस्सा लिया. इस तरह सावित्रीभाई भारत की पहली प्रशिक्षित अध्यापिका बनीं. पति की तरह सावित्रीबाई को भी पुस्तकों से प्रेम था. अध्ययन के दौरान उन्होंने अनेक आधुनिक विचारकों को पढ़ा था. उनपर सबसे ज्यादा प्रभाव थाॅमस क्लार्कसन(1760-1846) का पड़ा था. क्लार्कसन मूलतः ब्रिटिश नागरिक थे. उन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा उपनिवेशों में चलाए जा रहे गुलामों के कारोबार के विरोध में बड़ा आंदोलन किया था. जिसके फलस्वरूप उस घृणित कारोबार पर रोक लगी थी. सावित्रीबाई को लगा कि भारत में शूद्रों और अतिशूद्रों, विशेषकर उन वर्गों में महिलाओं की स्थिति अफ्रीकी गुलामों जैसी ही है. इस गुलामी से उन्हें केवल एक ही चीज मुक्ति दिला सकती है, वह है शिक्षा.

जिस समय सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले ने शूद्रों और अतिशूद्रों के लिए पाठशाला खोलने का संकल्प लिया, दोनों की उम्र क्रमशः 18 और 22 वर्ष थी. शुरुआत उन्होंने महारबाड़ा से की. उस जमाने में वह बड़ा साहसी कदम था. उन दिनों समाज में न केवल शिक्षा के प्रति उपेक्षा का भाव था, अपितु उसे बुरा भी माना जाता था. खासतौर पर लड़कियों की शिक्षा को लेकर. इसलिए जैसी आशंका थी, वही हुआ. ब्राह्मणों के बहकावे में लोग स्कूल के विरोध में उतर आए. विरोध इतना बढ़ा कि फुले दंपति को स्कूल बंद करना पड़ा. फुले के लिए यह बहुत बड़ा आघात था. परंतु वे इतनी जल्दी हार मानने वाले न थे. उन्होंने शूद्रों और अतिशूद्रों की सभा का आयोजन किया. उस सभा में उन्होंने जोरदार भाषण दिया. उसी सभा में तात्यासाहब भिड़े भी उपस्थित थे. वे फुले दंपति द्वारा किए जा रहे प्रयासों से विशेष प्रभावित थे. उन्होंने भिडे़वाड़ा स्थित अपने घर को स्कूल के लिए देने का प्रस्ताव रखा रखा. साथ ही स्कूल के लिए 101 रुपये एकमुश्त तथा प्रतिमास 5 रुपये चंदा देने की भी घोषणा की. यह बड़ा प्रोत्साहन था. इस तरह 1 जनवरी 1848 को लड़कियों के लिए पहले स्कूल की

स्थापना भिड़ेबाड़ा में हुई. मगर स्कूल खुलना ही समस्या का समाधान न था. बड़ी चुनौती थी लोगों को लड़कियों की शिक्षा के लिए तैयार करना. अधिकांश मातापिता लड़कियों को पढ़ाने के विरुद्ध थे. ऊपर से ब्राह्मण उन्हें भड़काते, शास्त्रों का डर दिखाते थे. कहते कि लड़कियों को पढ़ाने से सात पुश्तों तक नर्क भोगना पड़ता है. लोकनिंदा के भय से फुले के परिजन भी उनके द्वारा खोले गए स्कूल से अप्रसन्न थे. विशेषकर ब्राह्मण. उन्होंने फुले के पिता को समझाया कि वे धर्मविरुद्ध काम कर रहे हैं. स्वजातियों ने उन्हें जातिबहिष्कार करने की धमकी दी. लोगों के निरंतर विरोध पर फुले के पिता उनके दवाब में आ गए. अंततः वह समय भी आया जब 1849 में फुले को अपना पैत्रिक आवास छोड़ना पड़ा. घर के साथसाथ पैत्रिक व्यवसाय भी उनके हाथों से निकल गया. आजीविका चलाने के लिए फुले सरकारी निर्माण कार्य के ठेके लेने लगे. तीन वर्ष बाद, उस घटना को याद करते हुए फुले ने कहा था—

मेरे स्वजातीय भी नहीं चाहते थे कि लड़कियों को शिक्षा दी जाए. मेरे अपने ही पिता ने हमें घर से बाहर निकाल दिया था. स्कूल के लिए न तो कोई घर देने को तैयार था, न ही हमारे पास उसे बनाने के लिए आवश्यक था. लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजने को भी तैयार न थे.’3

पहले स्कूल के लिए घरघर जाकर बड़ी मुश्किल से फुले दंपति 6-7 मातापिताओं को अपने बच्चों को स्कूल भेजने को तैयार कर सके थे. उन लड़कियों के नाम थे, अन्नपूर्णा जोगी, सुमिति मोकशी, दुर्गा देशमुख, माधवी धन्ना, सोनू पवार तथा जरनाकार्दले. सावित्रीबाई और सगुणाबाई ने मिलकर उन्हें पढ़ाना आरंभ कर किया. विद्यालय को फुले के मित्रों की ओर से भी मदद प्राप्त होने लगी. अहमदनगर से सदाशिव गोवड़े ने विद्यार्थियों के लिए पुस्तकें भिजवाने का काम किया था. उसके बाद तो सहयोगी मिलते गए और संघर्ष के बीच सफलता भी साथ निभाने लगी. 1851 तक पुणे में फुले दंपति लड़कियों के लिए तीन पाठशालाएं खोल चुके थे. जबकि इसी अवधि में उनके द्वारा स्थापित स्कूलों की कुल संख्या 18 तक पहुंच चुकी थी. जहां स्कूलों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही थी, वहीं फुले विद्यार्थियों को पढ़ाने वाली विषयवस्तु को लेकर भी सतर्क थे. उनके विद्यालयों में बच्चों को गणित, विज्ञान, भाषा के अलावा अंग्रेजी के अध्यापन को भी शामिल किया गया.

आंदोलन की शुरुआत के लिए शिक्षा के क्षेत्र को ही क्यों चुना? इस बारे में अपने एक साक्षात्कार में फुले ने कहा था—‘अज्ञानता, भाषा एवं जातिआधारित भेदभाव इस देश के पतन का कारण हैं. यदि सब इससे दुखी हैं तो सवाल खड़ा होता है कि इनसे मुक्ति की पहल कौन करेगा? इस तरह के प्रश्नों को नजरंदाज करने से अच्छा है, उन लोगों की मदद के लिए काम किया जाए, जो इससे त्रस्त हैं. इनमें महार और मांग लोग जातिभेद से बुरी तरह प्रभावित हैं. केवल शिक्षा के माध्यम से ही वे उस दलदल से बाहर निकल सकते हैं. इसीलिए मैंने उनके लिए काम करने का फैसला किया था.’ ‘दार्शनिकों ने इस संसार की तरहतरह से व्याख्या की है, असली चुनौती इसे बदलने की है’ ये शब्द मार्क्स ने ‘थीसिस ऑन फायरबाख’ में 1845 में लिखे थे. 1888 में वह रचना प्रकाशित होकर दुनिया के सामने आई. फुले उससे करीब 40 वर्ष पहले की उसे अपने कर्तव्य के माध्यम से दुनिया के सामने ला चुके थे. लड़कियों के लिए शिक्षा क्यों आवश्यक है? इस बारे में भी फुले के विचार एकदम स्पष्ट थे. 15 सितंबर 1853 को मराठी अखबार ‘ज्ञानोदय’ को दिए गए एक और साक्षात्कार में उन्होंने कहा था—

मैं समझ चुका था कि बालक में मां के माध्यम से होने वाला विकास ही महत्त्वपूर्ण होता है. इसलिए जो इस देश का भला चाहते हैं, जो चाहते हैं कि हमारा समाज विकास की ओर अग्रसर रहे, उन्हें स्त्रियों की हालत में सुधार करने, उन्हें पढ़ानेलिखाने के सभी आवश्यक प्रयास करने चाहिए.’4

पूना काॅलेज के प्रधानाध्यापक केंडी को लिखे गए पत्र दिनांक, 5 फरवरी 1852 के अनुसार तीनों विद्यालयों में पढ़ने वाली लड़कियों की संख्या 48, 51 और 33 थी. उन्हें पढ़ाने के लिए क्रमशः 4, 3 और 1 अध्यापक उन विद्यालयों में कार्यरत थे. सावित्रीबाई फुले उनमें से एक स्कूल की प्रधानाध्यापिका थीं. उन्होंने अपने साथ फातिमा शेख और सगुणाबाई को भी शामिल कर लिया था. फातिमा शेख ज्योतिबा शेख के मित्र उस्मान शेख की बहन थीं. फुले के आग्रह पर उस्मान शेख अपनी बहन को पढ़ाने के लिए तैयार हुए थे. बाद में फातिमा शेख सावित्रीबाई फुले के साथ उनके स्कूल में अध्यापन करने लगीं. उन्हें मुस्लिम बालिकाओं को स्कूल में दाखिला लेने के लिए भी प्रोत्साहित किया था. स्वयं ज्योतिबा फुले भी शिक्षा के प्रचारप्रसार को समर्पित थे. वे जानते थे कि मिशनरी और दूसरों स्कूलों के सामने तभी टिका जा सकता है, जब उनके स्कूलों में दी जा रही शिक्षा गुणवत्ता पूर्ण हो. इसलिए पाठ्यक्रम निर्धारण से लेकर अध्ययन की प्रविधियों तक, सभी का पूरापूरा ध्यान रखा जाता था. स्कूलों में प्रबंधन के स्तर पर कोई कमी न हो, इसे ध्यान में रखते हुए सावित्रीबाई बाई फुले ने 1852 में ‘महिला मंडल’ नामक संस्था का गठन किया, जो उन स्कूलों के संचालन पर नजर रखती थी.

एक ओर जहां फुले दंपत्ति का अभियान मजबूती से आगे बढ़ रहे थे, वहीं दूसरी ओर रूढ़िवादी थे, जो सामाजिक क्रांति के उस अभियान को असमय ही रोक देने पर उतारू थे. उनके लिए लड़कियों को पढ़ानालिखाना उन्हें गलत संस्कार देना, समाज को बिगाड़ने जैसा उद्यम था. कुछ उनपर बच्चों के ईसाईकरण की कोशिश का इल्जाम लगाते. ऐसे लोग फुले दंपति की मार्ग में तरहतरह से अड़चन पैदा कर रहे थे. सावित्रीबाई स्कूल जातीं तो स्त्रियां उनपर तरहतरह के ताने कसतीं. उन पर पत्थरों, गोबर, अंडे और कीचड़ फेंककर बाधा पहुंचाई जाती. उस समय सावित्रीबाई बस एक ही बात कहती—‘ईश्वर उन्हें क्षमा करे. मैं केवल अपना काम कर रही हूं. भगवान उन्हें सुखी रखे.’ लोगों की ओर से विरोध को देखते हुए फुले ने सावित्रीबाई को अतिरिक्त साड़ियां खरीदकर दी थीं. स्कूल जाते समय वे एक धुली हुई साड़ी अपने थैले में रखतीं. आवश्यकता पड़ने पर स्कूल में कपड़े बदल लेती थीं. एक बार एक व्यक्ति ने सावित्रीबाई फुले के साथ अभद्रता की तो उन्होंने उसे एक चांटा जड़ दिया था. उसके सावित्रीबाई को लानेलाने के लिए एक व्यक्ति रख दिया गया.

धीरेधीरे परिस्थितियां अनुकूल होने लगीं. फुले के शुभचिंतक स्कूल के लिए आवश्यक वस्तुएं, पुस्तकें तथा उनकी आवश्यकता की दूसरी वस्तुएं भेंट करने लगे. मोरो विट्ठल वाल्वेकर, देवराव थोसर, मेजर केंडी ने स्कूलों के लिए पुस्तकें भेट कीं. लेकिन फुले के लिए जरूरी था, उनके विद्यालयों का शिक्षा विभाग के आकलन पर खरा उतरना. उसके लिए दादोबा पांडुरंग नामक स्कूल निरीक्षक ने फुले की पाठशाला का निरीक्षण किया था. 16 अक्टूबर 1851 को उनके सामने विशेष परीक्षा का आयोजन किया गया. उस समय तक स्कूल को आरंभ हुए यद्यपि कुछ ही अर्सा हुआ था, बावजूद इसके परीक्षा में बैठी लड़कियों ने आश्वस्तकारी प्रदर्शन किया. दादोबा पांडुरंग उससे बेहद प्रसन्न थे. 17 फरवरी 1852 को स्कूलों में पहली वार्षिक परीक्षा का आयोजन किया गया. दूसरी वार्षिक परीक्षा 12 फरवरी 1852 को आयोजित की गई. पूना शहर के लिए ये दोनों घटनाएं खासी कौतूहलपरक थीं. उन्हें देखने के लिए जनसमुदाय उमड़ पड़ता था. दोनों बार लगभग 3000 लोग लड़कियों की स्कूल परीक्षा को देखने के स्कूल परिसर में जमा हुए थे. परिसर के बाहर भी काफी भीड़ जमा होती थी. दूसरी वार्षिक परीक्षा में 237 लड़कियों ने हिस्सा लिया था. पांडुरंग ने स्कूल के बहीखातों की भी जांच की थी. दानदाताओं तथा स्कूल प्रबंधकों की ओर से कुल 1947 रुपये 50 पैसे विद्यालय में जमा हुए थे. जमाखातों की जिस तरह देखभाल की जाती थी, उसने स्कूल निरीक्षक को आश्वस्त किया था. उसके परिणामस्वरूप स्कूलों को सरकारी दक्षिणा फंड से 900 रुपये की सहायता राशि स्वीकृत की गई थी. यह फुले दंपति द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों को सरकारी मान्यता जैसा ही था. फुले दंपति स्कूलों की संख्या बढ़ाना चाहते थे. लेकिन उनके पास उपयुक्त धनराशि का अभाव था. 1857 के बाद दक्षिणा राशि से सरकारी सहायता भी घटकर मात्र 300 रुपये सालाना रह गई. लेकिन 1858 में सरकार ने 5000 रुपये की धनराशि स्कूल के भवन निर्माण के नाम पर स्वीकृत की थी. उस समय तीनों स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या 258 तक पहुंच चुकी थी. फुले दंपति द्वारा संचालित स्कूलों में शिक्षा की जांच के लिए शिक्षा परिषद के अध्यक्ष जाॅन वार्डन ने भी निरीक्षण किया था. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा था—

जब मैंने 1851 में पुणे के कमिश्नर का कार्यभाल संभाला, तब मैंने लड़कियों के विद्यालय का निरीक्षण किया था. मुझे याद था कि यहूदियों के डर से ईसाई स्कूलों में कक्षाएं मुख्य द्वार से हटकर, ऊपर की मंजिल पर चलाई जाती थीं. उस स्कूल की अध्यापिका ‘माली’ की पत्नी थी. उनके पति ने उन्हें पढ़नालिखना सिखाया था, ताकि वे विपन्न हालात में जी रहे अपने बंधुबांधवों को उनकी त्रासद स्थिति से उबार सकें. वहां विवाहिता महिलाओं को शिक्षा का प्रशिक्षण देने के लिए भी कक्षाएं चलाई जा रही थीं. मैंने उनसे अपनी उपस्थिति में लड़कियों से कुछ प्रश्न पूछने का आग्रह किया था.’5

लड़कियों की प्रगति देख जाॅन वार्डन भी खुश हुए थे. उन्होंने फुले के स्कूलों में पढ़ रही छात्राओं को सरकारी स्कूल के विद्यार्थियों से अधिक योग्य माना था. यह तब था, जब फुले दंपति द्वारा चलाए जा रहे स्कूल संसाधनों के अभाव से जूझ रहे थे. इस संबंध में ‘पुणे ओवरसियर’ में 29 मई 1852 के अंक में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. उसमें लिखा था कि फुले दंपति—‘द्वारा संचालित विद्यालयों में लड़कियों की स्थिति सरकारी स्कूलों में अध्ययनरत लड़कों की स्थिति से दस गुना बेहतर थी. यह इसलिए था क्योंकि फुले दंपति के स्कूलों में अध्यापन की प्रविधि सरकारी स्कूलों के अध्यापकों की अध्ययन प्रविधि से काफी अच्छी थी.’ रिपोर्ट में सरकारी स्कूल के संचालकों को सावधान किया गया था—

यदि यही हालात रहे तो फुले दंपति के स्कूलों में अध्ययनरत छात्राएं, बहुत जल्द सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों को पीछे छोड़ देंगी. इस उपलब्धि को वे आने वाली परीक्षाओं में ही प्राप्त कर सकती हैं. यह उनकी सबसे बड़ी जीत होगी. यदि सरकारी स्कूल के शिक्षातंत्र ने जल्दी ही कुछ नहीं किया तो बेहद साधारण परिवारों से आई ये लड़कियां हमें शर्म से सिर झुकाने को विवश कर देंगीं.’

निश्चय ही इसके पीछे सावित्रीबाई फुले का बड़ा योगदान था. फुले दंपति द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे सराहनीय प्रयासों से प्रसन्न होकर कंपनी सरकार की ओर से उन्हें 16 नवंबर 1852 को पुणे के विश्रामवाडा में सम्मानित किया गया था. उसपर पुरातनपंथियों ने यह कहकर आपत्ति दर्ज की थी कि ज्योतिराव जैसे शूद्र को, उनके रहते कैसे ‘महावस्त्र’ प्रदान किया जा सकता है. उन्होंने सम्मान समारोह में विघ्न डालने की कोशिश भी की थी, जिसे फुले के स्वयं सेवकों ने उनके षड्यंत्र को समय रहते असफल कर दिया था.

शिक्षा को लेकर फुले दंपति की दृष्टि कितनी व्यापक थी, यह इससे भी पता चलता है कि उनीसवीं शताब्दी में जब भारत में आधुनिक शिक्षा की नींव डालने की कोशिशें की जा रहीं थीं, तभी उन्होंने शिक्षा को रोजगार से जोड़ने की पहल की थी. यह उनकी दूरदर्शिता को दर्शाता था. दरअसल फुले दंपति जिस वर्ग का शिक्षा के माध्यम से उद्धार करना चाहते थे, वह समाज का सबसे विपन्न तबका था. केवल श्रम ही उसकी पूंजी थी. उनके पास न तो जमीन थी, न ही दूसरे संसाधन जिससे वे सुुनिश्चित रोजगार प्राप्त कर सकें. दूसरी ओर देश मेें औद्योगिकीकरण की नींव पड़ रही थी. कोलकाता, मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, मद्रास जैसे बड़े शहरों में कपड़े और लोहे के कारखाने लगाए जा रहे थे. फुले जानते थे कि भविष्य में कुशल कामगारों की मांग बढ़ने वाली है. विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए 1852 की रिपोर्ट में अनुशंसा की गई थी कि स्कूलों को किसी उद्योग विभाग से जोड़ा जाना चाहिए, ताकि वहां अध्ययन करने वाले बच्चे दस्तकारी तथा दूसरे उद्यमों का परिचय प्राप्त हो; और स्कूल से निकलने के बाद वे अपना उद्यम स्थापित कर, आत्मनिर्भर जीवन की शुरुआत कर सकें. विद्यालयों में अवकाश के दौरान विद्यार्थियों को व्यवसायसंबंधी प्रशिक्षण दिया जाता था.

अधिकांश बच्चे गरीब परिवारों से संबंधित थे. ऐसे परिवारों के बच्चे थे जहां रोजमर्रा की आवश्यकता पूरी करने के लिए परिवार के सभी सदस्यों को जुटना पड़ता था. इसलिए अनेक विद्यार्थी बीच ही में स्कूल छोड़ने को विवश हो जाते थे. पारिवारिक जरूरतें उन्हें अध्ययन से दूर जाने को मजबूर कर देती थीं. फुले दंपति के स्कूलों में इस समस्या पर भी विचार किया गया था. स्कूलों की ओर से समाज के निर्धनतम वर्ग से आए विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देने की भी व्यवस्था की गई थी. कई बार विद्यार्थी बहुत छोटीछोटी वजहों से स्कूलों छोड़ देते थे. मेलों और त्योहारों में भागीदारी के नाम पर भी विद्यार्थी स्कूल बंक कर जाते थे. इसे समाज में शिक्षा के प्रति जागरूकता के बगैर रोक पाना असंभव था. इसलिए फुले दंपति ने शूद्रों और अतिशूद्रों को शिक्षा का महत्त्व बताने के लिए नियमित कार्यक्रम चलाए. आजाद भारत में साक्षरता मिशन आरंभ होने से एक शताब्दी पहले ही फुले दंपति उसका प्रयोग शूद्र एवं दलित बस्तियों में कर चुके थे. अपने भाषणों में फुले बारबार यह दोहराते थे कि शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान नहीं है. शिक्षा विद्यार्थी के भीतर सम्मानित जीवन जीने की चाहत पैदा करती है. साथ ही बताती है कि सम्मानित जीवन जीने के लिए समाज में दूसरों का सम्मान करना अपरिहार्य है. बिना दूसरों की इज्जत किए हम उनके दिल में अपने प्रति इज्जत पैदा नहीं कर सकते.

फुले दंपति द्वारा संचालित विद्यालयों में शिक्षा व्यक्तित्व निर्माण को समर्पित थी. वह उन्हें सही और गलत के बारे में निर्णय लेना सिखाती थी. कोशिश की जाती थी कि विद्यार्थी जब तक स्कूल में रहे, उसकी रचनात्मकता में निरंतर सुधार हो. इसका आकलन इससे भी किया जाता है कि उन स्कूलों में पढ़ने वाली कोई लड़की जब पुरस्कार के लिए मंच पर आती तो कार्यक्रम में मौजूद अतिथियों से वह प्रायः यही निवेदन करती थी—‘सर! मैं अपने लिए खिलौने या उपहार नहीं चाहती. हम आपसे इस स्कूल के लिए पुस्तकालय की उम्मीद करती हैं.’ यह शिक्षार्जन के प्रति समर्पण के बिना, उसे अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बनाए बगैर संभव न था. फुले दंपति के स्कूलों में अध्ययनरत लड़कियों के अभिभावक कभीकभी यह ‘शिकायत’ लेकर पहुंचते थे—‘सर! उनकी बेटी प्रतिदिन आधी रात तक पढ़ाई में तल्लीन रहती है.’ सावित्रीबाई की एक छात्रा मुक्ता के आत्मकथात्मक निबंध का उल्लेख पीछे भी किया जा चुका है. 1855 में जब मुक्ता ने वह पत्र लिखा था, उसकी आयु महज 14 वर्ष की थी. उस निबंध को मराठी साहित्य में मील का पत्थर माना जाता है. अपने निबंध में मुक्ता ने पुरोहितों को ‘लड्डुखाऊ’(लड्डू भकोसने वाला) कहकर संबोधित किया था. लिखा था—‘ये ‘लड्डुखाऊ’ ब्राह्मण सोचते हैं कि वेदों पर उनका विशेषाधिकार है. गैरब्राह्मणों को उन्हें पढ़ने का अधिकार नहीं है. चूंकि हमें धार्मिक साहित्य पढ़ने की अनुमति नहीं है, तो क्या इससे यह प्रमाणित नहीं होता है कि हमारा कोई धर्म नहीं है. हे ईश्वर! हमें बताओ की तुमने हमारे लिए कौनसा धर्म निर्धारित किया है, ताकि हम उसको अपना सकें.’ इस पत्र ने उस समय के बुद्धिजीवियों और समाजशास्त्रियों को झकझोरने का काम किया था. मुक्ता का वह निबंध बाद में मराठी दैनिक ज्ञानोदय में प्रकाशित हुआ. यही नहीं उसे मुंबई प्रेसीडेंसी की शिक्षा रिपोर्ट में भी जगह मिली थी.

फुले दंपति के स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश विद्यार्थी महार, मांग जैसी अतिशूद्र जातियों के थे. उन वर्गों से आते थे जिन्हें धर्म और जाति के आधार पर शिक्षा और संसाधनों से दूर रखा जाता था. उनके अलावा मुस्लिम बच्चों की भी बड़ी संख्या थी. सावित्रीबाई की मित्र फातिमा शेख भी उनकी मदद कर रही थीं. स्कूलों के प्रति जनसामान्य का आकर्षण बढ़े और शिक्षा को समाजीकरण की अनिवार्य सीढ़ी माना जाए—इसके लिए फुले ने एक ‘मंडली’(संस्था) का गठन किया था. समाज के प्रबुद्ध लोगों को उस ‘मंडली’ का सदस्य मनोनीत किया गया था. शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए आरंभ में जिन दो संस्थाओं का गठन किया गया था, उनके नाम थे—‘नेटिव फीमेल स्कूल, पुणे’ तथा ‘सोसाइटी फाॅर प्रोमोटिंग दि एजुकेशन ऑफ़ महार्स एवं मांग्स.’ फुलेदंपति द्वारा संचालित सभी स्कूल इन संस्थाओं के अधीन थे. उनमें सभी वर्गों के विद्यार्थी के पढ़ने की छूट थी. अपनी सहयोगियों फातिमा शेख और सगुणाबाई के साथ मिलकर सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा के क्षेत्र में जो क्रांति की, वह न केवल महाराष्ट्र अपितु पूरे भारत के लिए प्रेरणादायी बनी थी.

3

अशिक्षा अज्ञानता को बढ़ावा देती है. अज्ञानी मनुष्य अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं कर पाता. जरूरी मसलों पर वह दूसरों पर निर्भर हो जाता है. चालाक लोग उसकी अज्ञानता का लाभ उठाकर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं. परिणामस्वरूप एक क्षेत्र की अज्ञानता अनेक क्षेत्रों में प्रभावी हो जाती है. अज्ञानी धर्म और धार्मिक मूल्यों के बीच, जिनके लिए किसी धर्म को समाजहित में आवश्यक माना जाता है—अंतर नहीं कर पाता. ऐसे में धर्म उसके लिए टोटम बन जाता है. अध्यात्मिक जिज्ञासा मूर्तिपूजा और कर्मकांडों में फंसकर दम तोड़ लेती है. शिक्षा के अभाव में भारतीय समाज का बड़ा हिस्सा जिन कुरीतियों का शिकार था, उनमें विधवा विवाह, बाल विवाह, दहेज प्रथा, भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियां प्रमुख थीं. सोचीसमझी नीति के तहत शूद्रों, अतिशूद्रों तथा महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा जाता था. दूसरे शब्दों में उनकी अज्ञानता उनपर थोपी गई अज्ञानता थी. फुले दंपति ने उन सभी पर भी विचार किया और अपनी सीमाओं के अंतर्गत उनसे जूझने का प्रयास भी किया.

उन दिनों बड़ी समस्या विवाहेत्तर संबंधों से जन्मी संतान की भी थी. लोकलाज या समाज के भय से प्रायः ऐसे शिशुओं को असमय ही मार दिया जाता था. काशीबाई नाम की एक विधवा स्त्री ज्योतिबा फुले के मित्र और शुभचिंतक सदाशिव गोवड़े के यहां खाना बनाने का काम करती थी. वह गरीब और सुंदर भी थी. एक धूर्त्त ब्राह्मण ने काशीबाई की मजबूरी का फायदा उठाया. परिणामस्वरूप वह गर्भवती हो गई. स्त्री ने गर्भपात कराने के लिए यथासंभव प्रयत्न किए, मगर वे सभी नाकाम हुए. अंततः उसने एक सुंदर से शिशु को जन्म दिया. काशीबाई ने उस ब्राह्मण से जिम्मेदारी उठाने का आग्रह किया. उसके आगे रोईगिड़गिड़ाई, मगर ब्राह्मण ने उसकी एक न सुनी. किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी ओटने से साफ इन्कार कर दिया. लोकलाज और समाज के डर के कारण काशीबाई ने उस शिशु की हत्या कर, उसे गोवड़े के आंगन में बने कुंए में फेंक दिया. कुछ दिनों के बाद ही बच्चे की मृत देह कुंए से बरामद कर ली गई. पुलिस आई. काशीबाई को गिरफ्तार कर लिया गया. मुकदमा चला और उसे हत्या का अपराधी मानते हुए अंडमान जेल में उम्र कैद के लिए भेज दिया गया. यह 1963 की घटना है. पहला अवसर था जब किसी महिला को इतनी गंभीर सजा दी गई थी. वह भी ऐसे अपराध के लिए जिसके लिए वह पूरी तरह जिम्मेदार नहीं थी.

1968 की घटना है. सावित्रीबाई अस्वस्थ थीं और अपने मायके नायगांव, खंडाला आई हुई थीं. वहां रहते हुए उन्होंने ज्योतिबा फुले को 29 अगस्त 1968 को एक पत्र लिखा, जिसमें इसी तरह की एक और घटना का उल्लेख किया था. घटना इस प्रकार है—‘एक ब्राह्मण युवक गणेश था. वह पूजापाठ के माध्यम से अपनी आजीविका चलाता था. उसी दौरान गणेश का महार लड़की शारजा से मिलना हुआ. दोनों के प्रेमप्रसंग का नतीजा यह हुआ कि शारजा गर्भवती हो गई. गांव वालों को पता चला तो वे दोनों को मारने पर उतारू हो गए. दोनों का गांव जुलूस निकाला जाने लगा. सावित्री को पता चला तो बीमारी की अवस्था में भी वे तत्काल गांव के लोगों से मिलीं. उन्हें समझाया कि यदि वे प्रेमी युगल को मारने का अपराध करते हैं तो सरकारी कानून के अनुसार उन्हें मौत की सजा सुनाई जा सकती है. गांव वालों की समझ में आ गया. अंततः प्रेमी युगल के गांव छोड़ने की शर्त पर उन्हें छोड़ दिया गया. सावित्रीबाई की पहल के कारण दो लोगों की जान बच गई.’

पत्र के माध्यम से ज्योतिबा फुले को जब इस घटना का पता चला तो वे स्तंभित होकर रह गए. समाधान क्या हो, इसपर विचार किया जाने लगा. फुले दंपति के पास संसाधनों की कमी थी. उस समस्या से दूसरे बुद्धिजीवी और समाजकर्मी भी जूझ रहे थे. मगर उसके समाधान की पहल फुले ने की. उन्होंने तत्क्षण फैसला करते हुए अपने आवास—395 गंज पेठ, पुणे में मातृसदन बनाने की घोषणा कर दी. वह मातृसदन विशेषरूप से व्याभिचार की शिकार ब्राह्मण स्त्रियों के लिए था. काशीबाई को कालापानी की सजा पुणे में चर्चा का विषय थी. लोग उससे सहमे हुए थे. मातृसदन की स्थापना के बाद फुले ने महाराष्ट्र के प्रमुख शहरों और तीर्थस्थानों में एक इश्ताहार जारी किया. उसमें लिखा था कि कालापानी की सजा से बचने के लिए मातृसदन की सुविधा का उपयोग किया जाए. विज्ञापन का अनुकूल असर हुआ. 1884 तक उस मातृसदन में 35 ब्राह्मण विधवाएं प्रसव के लिए पहुंच चुकी थीं. सावित्रीबाई ने स्वयं उन महिलाओं की प्रसव में मदद की और शिशु को अपने संरक्षण में रख लिया.

1874 में ऐसी ही एक उत्पीड़ित ब्राह्मण विधवा मातृसदन पहुंची. फुले दंपति ने उसके बच्चे को गोद ले लिया. उसका नाम यशवंतराव रखा गया. दोनों ने उस बच्चे को प्यार से पालपोसकर बड़ा किया. पढ़ालिखाकर डाॅक्टर बनाया. कन्याओं की भ्रूण हत्या रोकने के लिए 10 जुलाई 1887 को फुले दंपति ने एक वसीयतनामा पंजीकृत कराया. उसमें घोषणा की गई थी कि सावित्रीबाई मातृसदन में पल रही बच्चियों की अपनी बेटियों की तरह देखभाल करेंगी. एक क्रांति दूसरी क्रांति को सहज ही जन्म दे देती है. विवाहेत्तर संबंधों से जन्मे बच्चों की भ्रूण हत्या रोकने के लिए सावित्रीबाई ने जो क्रांतिकारी कदम उठाए थे. उनका असर महाराष्ट्र के दूसरे समाजसेवियों पर भी पड़ा. नारायण मेघजी लोखंडे ‘दीनबंधु’ के संपादक थे. वे बड़े मजदूर नेता और समाज सुधारक थे. उन दिनों तक सती प्रथा पर कानूनन रोक लगाई जा चुकी थी. मगर पति की मृत्यु के बाद विधवा स्त्री का जीवन नारकीय बन जाता था. वह न तो अच्छा खापी सकती थी, न ही मनचाहा पहनओढ़ सकती थी. विधवा स्त्री के मेलेत्योहारों में हिस्सा लेने, घूमनेफिरने पर भी प्रतिबंध लागू थे. पति की मृत्यु के तुरंत बाद उसकी विधवा स्त्री के बाल काट दिए जाते थे. सावित्रीबाई की प्रेरणा से लोखंडे ने विधवाओं के मुंडन के विरोध में आंदोलन की शुरुआत की. उनके प्रभाव में शहरभर के नाइयों ने विधवाओं का मुंडन करने से इन्कार कर दिया. दबाव डाला गया तो उन्होंने हड़ताल कर दी. ‘नाइयों की हड़ताल’ की चर्चा दुनियाभर में हुई. अंग्रेजी की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘दि टाइम’ ने उस हड़ताल की खबर अपने 9 अप्रैल 1890 के अंक में प्रकाशित की. उसे पढ़ने के बाद इंग्लेंड की महिलाओं ने लोखंडे को प्रशंसाभरे पत्र लिखे.

1877 में महाराष्ट्र को अकाल ने घेर लिया. समाज सुधार के साथसाथ प्रत्येक कार्य में लोगों की मदद को तत्पर रहने वाले फुले दंपति के लिए ऐसे अवसर पर निष्क्रिय होकर बैठ जाना असंभव था. अकाल बड़ा था. हजारों लोग उससे प्रभावित थे. उनके लिए सहायतासामग्री जुटाने के लिए फुले दंपति ने लोगों से सहायता की फरियाद की. मदद जुटाने के लिए उन्होंने गांवगांव की यात्राएं कीं. फुले की देखादेखी उनके कुछ मित्र भी मदद के लिए आगे आए. डाॅ. शिवप्पा जैसे मित्रों की सहायता से उन्होंने धानकवाड़ी में ‘विकटोरिया बालाश्रम’ की स्थापना की. आश्रम के माध्यम से प्रतिदिन एक हजार गरीबों और जरूरतमंदों को भोजनादि की सुविधा मिलने लगी. बालाश्रम के संचालन में भी सावित्रीबाई का योगदान बढ़चढ़कर था. वे अपने सहयोगियों की मदद से स्वयं भोजनव्यवस्था देखतीं. यही नहीं सत्यशोधक समाज के कार्यकर्ताओं को लेकर वे अकालपीड़ित क्षेत्रों में भी र्गइं. अप्रैल 1877 में वे पश्चिमी महाराष्ट्र के जुनेर परिक्षेत्र में थीं. वहां से उन्होंने 20 अपै्रल 1877 को ज्योतिबा फुले के लिए एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने अकाल का दिलों को झकझोर देने वाला विवरण दिया है—

वर्ष 1876 बीत चुका है. लेकिन अकाल नहीं गया. इस क्षेत्र में वह भीषण विभीषिका के रूप में ठहरा हुआ है. लोग भूख से मर रहे हैं. जानवर जमीन पर गिरकर दम तोड़ रहे हैं. यहां भोजन का बेहद अभाव है. जानवरों के लिए चारा नहीं है. लोग अपना गांव छोड़ने के लिए मजबूर हैं. कुछ लोग अपने बच्चों को, अपनी जवान लड़कियों को बेचकर गांव छोड़कर जा रहे हैं. नदीनाले और तालाब पूरी तरह सूख चुके हैं. पीने के लिए पानी नहीं है. पेड़ सूखते जा रहे हैं, उनके पत्ते झर चुके हैं. सूखी, बंजर धरती में दरारें पड़ चुकी हैं. सूरज जला और झुलसा रहा है. लोग भोजन और पानी के लिए चिल्लातेचिल्लाते धरती पर गिरकर दम तोड़ रहे हैं. भूख से व्याकुल कुछ लोग जहरीले फल खाने को मजबूर हैं. प्यास बुझाने के लिए वे अपना ही मूत्र पीने को मजबूर हैं. वे भोजनपानी के लिए हाहाकार करते हुए दम तोड़ रहे हैं.’

अकाल की विभीषिका का ऐसा मर्माहत कर देने वाला विवरण वही लिख सकता था, जिसने उसे अपनी आंखों से देखा हो. जो उनकी पीड़ा को घनीभूत संवेदना के साथ आत्मसात कर रहा हो. उस पत्र में एक घटना का विवरण भी दिया है. सत्यशोधक मंडल के स्वयंसेवकों ने अकालपीड़ितों की मदद के लिए एक कमेटी का गठन किया था. एक बार सावित्रीबाई अपने सहयोगियों आर.बी. कृष्णजी पंत तथा लक्षमण शास्त्री के साथ अकालपीड़ित क्षेत्र का दौरा करने निकली हुई थीं. उन्होंने उस घटना का विवरण भी अपने पत्र में दिया है—

‘‘साहूकार लोग निर्दयतापूर्वक लोगों का शोषण कर रहे हैं. अकाल के कारण अनेक बुरी घटनाएं हो रही हैं. दंगे शुरू हो चुके हैं. कलेक्टर ने जब इस बारे में सुना तो वह हालात संभालने के लिए वहां पहुंचा. उसने अंग्रेज सिपाहियों को ड्यूटी पर लगाकर दंगों पर काबू पाने की कोशिश की. सिपाहियों ने 50 सत्यशोधक कार्यकर्ताओं को भी अपने घेरे में ले लिया. उसके बाद कलेक्टर ने मुझे बुलाया. मैंने उनसे पूछा कि भले स्वयंसेवकों को किसलिए गिरफ्तार किया गया है? क्यों उनपर झूठे आरोप लगाए गए हैं? मैंने उससे उन्हें तत्काल बरी कर देने को कहा. कलेक्टर भला और निष्पक्ष इंसान था. वह अपने सिपाहियों पर चिल्लाया—‘क्या उन्होंने पाटिल किसानों को लूटा है? उन्हें तत्काल बरी किया जाए.’ कलेक्टर लोगों को दयनीय अवस्था में देखकर विचलित था. उसने उसी क्षण चार गाड़ी ज्वार का इंतजाम किया.’’

दूरदराज के रहने वाले विद्यार्थियों के लिए फुले दंपति की ओर से छात्रावास भी बनाया हुआ था. अलग से जगह की व्यवस्था न होने के कारण वह उनके घर से ही संचालित था. उसकी देखभाल भी सावित्रीबाई फुले के अधीन थी. छात्रावास में रहने वाला एक विद्यार्थी लक्षमण कराडी मुंबई से पढ़ने पहुंचा था. उसने सावित्रीबाई की प्रशंसा करते हुए लिखा है—‘मैंने सावित्रीबाई जितना प्यार करने वाली दूसरी औरत नहीं देखी. उन्होंने मुझे मेरी मां से भी ज्यादा प्यार दिया था.’ एक और विद्यार्थी ने सावित्रीबाई के स्वभाव और जीवनशैली के बारे में संवेदनपरक टिप्पणी की थी. उसके अनुसार सावित्रीबाई का जीवन बहुत ही सादा था. सिवाय मंगलसूत्र के वे कोई आभूषण धारण नहीं करती थीं. फुले दंपति में एकदूसरे के प्रति बेहद प्रेम था. महादु सहादु वागले नाम का वह विद्यार्थी लिखता है—‘सावित्रीबाई बहुत ही विनम्र और ममतामयी स्त्री थीं. उनके दिल में दूसरों के प्रति अगाध प्रेम था. गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए वे सदैव आगे रहती थीं. वे उन्हें भोजन और जरूरत की दूसरी चीजें बांटती रहती थीं. यदि किसी स्त्री की देह पर फटेचिथड़े वस्त्र देखतीं तो तत्काल अपनी साड़ी निकालकर उसे भेंट कर देती थीं. इस कारण उनका खर्च बढ़ जाता था. तात्या(ज्योतिराव) उनसे कभीकभी कहते—‘किसी को इतना खर्च नहीं करना चाहिए.’ इसपर वे मुस्कराकर कहतीं—‘क्या हमें यह मरने के बाद अपने साथ ले जाना है.’ तात्या सोच में पड़ जाते. उनके पास उसका कोई जवाब नहीं होता था. पतिपत्नी दोनों के बीच अगाध प्रेम था.

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अपने आंदोलन को संस्थागत रूप देने के लिए फुले ने 24 सितंबर 1873 को सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी. उसके कार्यक्रमों में भी सावित्रीबाई बढ़चढ़कर हिस्सा लेती थीं. सत्यशोधक समाज का उद्देश्य था, शूद्रों और अतिशूद्रों में शिक्षा का विकास करना, जातिवादी सहित किसी भी प्रकार के पुरोहितवाद को नकारना तथा सामाज में व्याप्त दहेज प्रथा, भ्रूणहत्या, बालविवाह जैसी कुरीतियों को समाप्त करना. सावित्रीबाई फुले सत्यशोधक समाज के प्रत्येक कार्यक्रम में आगे थीं. पुरोहितवाद को समाप्त करने के लिए सत्यशोधक समाज ने बगैर पुरोहित के विवाह संपन्न कराने का कार्यक्रम आरंभ किया था. उसके अंतर्गत पहला विवाह 25 दिसंबर 1873 को संपन्न हुआ. लड़की राधा सावित्रीबाई के मित्र बेजुबाई ज्ञानोबा की बेटी थी और लड़का सीताराम जाबाजी आलहत सत्यशोधक समाज का सक्रिय कार्यकर्ता था. वह बिना दहेज और न्यूनतम खर्च में संपन्न हुआ विवाह था. सत्यशोधक समाज की विवाह पद्धति के अनुसार दूल्हा अपनी पत्नी से प्रतिज्ञा करता था कि वह उसे प्रत्येक मामले में बराबरी का अधिकार देगा. विवाह के मंत्र दूल्हा और दुल्हन द्वारा स्वयं पढ़े जाते थे. उनका निहितार्थ वे प्रतिज्ञाएं थीं जो सुखी और सफल जीवन के लिए दांपत्य का आधार हो सकती थीं. उस अवसर के लिए ‘मंगलाष्ठक’(वैवाहिक गान) स्वयं फुले ने लिखा था, जिसका भावार्थ है—

दूल्हा : ईश्वरीय विधान के अनुसार अपने परिवार के रीतिरिवाजों का पालन करना. सत्य सर्वोपरि है—उसका आदर करना. सभी वंचितों के साथ पक्षपात रहित वर्ताब करो, उन्हें ज्ञानवान बनाओ. तुम्हारे आचरण का सम्मान करते हुए मैं तुम्हें अपने दांपत्य जीवन में स्वीकार करता हूं—शुभमंगल सावधान.

दुल्हन : भले ही तुम नित्यप्रति मेरा सम्मान करो, तुम्हारा आचरण संतोषजनक हो, हम सभी स्त्रियां शोषित होती आई हैं, तुम मेरे साथ कैसा आचरण करोगे? हमें स्वतंत्रता का अनुभव है और आत्मनिर्भर हो चुकी हैं. हमारी उस कामना के लिए क्या तुम स्त्रियों को अधिकार दोगे? प्रतीज्ञा करो—शुभमंगल सावधान.

दूल्हा : मैं प्रत्येक कीमत पर सभी स्त्रियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करूंगा. मैं सभी स्त्रियों को अपनी बहन मानूंगा और तुम्हें प्रेयसि. तुम्हारी देखभाल को मैं अपना कर्तव्य मानूंगा—शुभमंगल सावधान.

दुलहन : यहां बैठे सभी बंधुबांधवों के समक्ष मैं तुम्हें अपना पति स्वीकार करती हूं. मैं कभी अपनी प्रतीक्षा नहीं तोड़ूंगी और सदैव अपने कर्तव्य का पालन करूंगी. सभी चिंताओं और दुश्वारियों को भुलाकर हमें लोगों के भले के लिए संघर्ष करना चाहिए. तुम्हारे हाथ को थामकर मैं, यहां उपस्थित लोगों के सामने मैं यह प्रतीज्ञा करती हूं—शुभमंगल सावधान.

अभिभावकों की शुभेच्छा : अपने मातापिता के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करो, अपने मित्रों से प्यार करो. वृद्धजनों, अपंगों और बच्चों की मदद करो, उन्हें पढ़नालिखना सिखाओ. हर्षोल्लास के साथ खुशियां बांटों, और एकदूसरे से हाथ मिलाओ. शुभमंगल सावधान.

28 नवंबर 1890 को ज्योतिबा फुले का निधन हो गया. सावित्रीबाई विवाह के बाद से ही जीवन के प्रत्येक कदम में अपने पति के साथ थीं. मृत्यु के समय भी वे ज्योतिबा के करीब ही थीं. ज्योतिबा की इच्छा थी कि उनके शरीर को जलाने के बजाए नमक के साथ दफना दिया जाए. इसके लिए उन्होंने अपने घर के पीछे एक गड्ढ़ा भी खुदवा लिया था. लेकिन नगर निगम की ओर से आवासीय भूमि पर शव को दफनाने की अनुमति न मिल सकी. इसलिए उनकी देह को अग्निसमर्पित करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था. परंपरा थी कि जो भी शव के साथ ‘तित्व’(मिट्टी का बर्तन) लेकर चलता है, वह दिवंगत का उत्तराधिकारी माना जाता है. संपत्ति पर भी उसी का अधिकार होता है. यह देखकर ज्योतिराव के दत्तक पुत्र यशवंत को पीछे कर, उनका भतीजा आगे आ गया. उस समय सावित्रीबाई फुले साहस करते हुए आगे आईं और ‘तित्व’ को अपने हाथों में ले लिया. उसे थामे हुए वे ज्योतिबा फुले की अंतिम यात्रा में श्मशान घाट तक गईं, भारत के इतिहास में सावित्रीबाई फुले पहली महिला थीं, जिन्होंने अपने पति को मुखाग्नि दी थी. दो दिन बाद, 30 नवंबर को ज्योतिबा फुले ही अस्थियां लाई गईं और उन्हें उसी स्थान पर दफना दिया गया, जहां उनकी इच्छा थी. उसके बाद सावित्रीबाई ने अपने हाथों से उस स्थान पर ‘तुलसी वृंदावन’(तुलसी के पौधे) रोप दिए. एक बहुत ही साधारण पत्थर, जिसपर ज्योतिबा फुले के पदचिन्ह बने थे, उस स्थान पर लगा दिया. वही उस महान पुरुष की अंतिम यादगार बना.

ज्योतिबा फुले के निधन के पश्चात 1893 में सत्यशोधक समाज का सम्मेलन सासवद में हुआ. सावित्री बाई फुले ने उसकी अध्यक्षता की. 1896 में महाराष्ट्र को फिर अकाल ने घेर लिया. सावित्रीबाई अपने कार्यकर्ताओं के साथ गरीबों और जरूरतमंदों की मदद में जुट गईं. लेकिन इस बार अकाल अकेला नहीं था. वह प्लेग की विभीषिका भी साथ लाया था. 1897 में पुणे के आसपास के इलाकों को प्लेग ने घेर लिया. प्रतिदिन सैकड़ों लोग प्लेग के शिकार हो रहे थे. यशवंत पढ़लिख कर डाॅक्टर बन चुका था और सेना में नौकरी कर रहा था. सावित्रीबाई फुले ने उसका विवाह भी सत्यशोधक समाज की रीति के अनुसार किया था.

पुणे पर प्लेग का हमला देख सावित्रीबाई ने उसे भी रोगियों की देखभाल के लिए बुला लिया. यशवंत छुट्टी लेकर प्लेग के रोगियों के उपचार में जुट गया. सरकार अपनी ओर से प्लेग की महामारी पर काबू पाने का भरसक प्रयत्न कर रही थी. सावित्रीबाई ने मरीजों की देखभाल के लिए अस्पताल का निर्माण कराया. यह जानते हुए भी कि प्लेग महामारी है सावित्रीबाई जीजान से मरीजों की देखभाल में जुटी थीं. वे मरीजों को उनके घर से स्वयं अस्पताल तक लाती थीं. इसी बीच उन्हें पता चला कि मुंधावा गांव के बाहर महार बस्ती में पांडुरंग बाबाजी गायकबाड़ का बेटा भी महामारी से ग्रस्त है. सावित्रीबाई उनके घर पहुंच गईं. लेकिन छूत के भय से कोई भी बीमार बालक के करीब जाने को तैयार न था. तब वे उस बालक को अपनी पीठ पर लादकर अस्पताल तक ले गईं. प्लेग के मरीजों के निरंतर संपर्क में रहने का दुष्प्रभाव तो उनके शरीर पर भी पड़ना ही था. सो वह पड़ा और अंततः 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया.

उनकी मृत्यु पर मराठी समाचारपत्र ‘दीनबंधु’ ने शोक समाचार प्रकाशित किया. जिस समय बालक के अपने ही परिजन उससे हाथ लगाने को तैयार नहीं थे, सावित्रीबाई अपनी पीठ पर प्लेगग्रस्त महार बालक को ढोकर अस्पताल तक लेकर गई थीं. ‘दीनबंधु’ में इस साहसी कदम के कारण उनकी तुलना लक्ष्मीबाई से की गई थी. ज्योतिबा फुले से विवाह 1848 में विवाह से लेकर 1897 तक, पूरे पचास वर्ष वे समाज की सेवा को समर्पित रहीं. सावित्रीबाई के बारे में सत्यशोधक समाज के कार्यकर्ता नारायण महादेव उर्फ मामा परमानंद ने 31 जुलाई 1890 को लिखा था—

ज्योतिराव से ज्यादा उनकी पत्नी प्रशंसा की हकदार हैं. हम उनकी जितनी भी प्रशंसा करें, वह कम है. कोई कैसे उस महान व्यक्तित्व का वर्णन कर सकता है! उन्होंने पूरी तरह से अपने पति का साथ दिया, उनकी राह में आने वाली प्रत्येक मुश्किल और झंझावात का सामना किया. उच्च शिक्षित सवर्णों में भी ऐसी त्यागमयी स्त्री का मिलना असंभव है. उस दंपति ने अपना सारा समय परोपकार करते हुए बिताया था.’

क्रांतिज्योति सावित्रीबाई ने महाराष्ट्र में शिक्षा और स्त्रीसुधार की जो मशाल जलाई, उसकी रोशनी आज तक कायम है.

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सावित्रीबाई फुले अच्छी कवि, लेखक, वक्ता और संपादक थीं. उनका कविता संग्रह ‘काव्यफुले’ 1854 में ही प्रकाशित हो चुका था. संकलन में 41 कविताएं थीं. ‘काव्यफुले’ मराठी में प्रकाशित किसी भारतीय महिला का संभवतः सबसे पहला कविता संग्रह था. सावित्रीबाई की कविताओं की विशेषता है, समाज के शोषित, वंचित और जमीन से जुड़े हुए लोगों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता. अपने पति के साथ वे भारत की सबसे बड़ी और पहली यथार्थवादी कवि और लेखक थीं. जिन दिनों भारतीयता की खोज के नाम पर अधिकांश भारतीय लेखक किसी न किसी रूप में संस्कृत ग्रंथों की टीकाएं, उनके अनुवाद अथवा किसी न किसी रूप में उनका पुनःप्रस्तुतीकरण कर रहे थे— सावित्रीबाई फुले भारत की जनता के दुःखदर्द को अभिव्यक्ति दे रहीं थीं. वे शब्द की ताकत, लेखन के उस मर्म को पहचान चुकी थीं, जिसे आत्मसात करने के बाद ही कोई रचना साहित्य का दर्जा प्राप्त कर पाती है. ज्योतिराव फुले ने ब्राह्मणों के सांस्कृतिक आधिपत्य के बरक्स जनसंस्कृति को खड़ा करने के लिए प्राचीन मिथों और धर्मग्रंथों की क्रांतिकारी व्याख्या की थी. उनकी परंपरा को मजबूती देते हुए सावित्रीबाई भी कविताओं का सहारा लिया. अपनी कविताओं के माध्यम से जहां शूद्रों में फैली रूढ़ियों पर प्रहार करती हैं, उनमें व्याप्त अशिक्षा के लिए उन्हें चेताती हैं, वहीं दूसरी ओर ‘अंग्रेजी माता’ की अभ्यर्थना भी करती हैं, जिसने भारतीयों को अज्ञानता के अंधकार से बाहर लाकर तर्क और ज्ञानविज्ञान की ओर प्रवृत्त किया है. उनकी एक कविता अज्ञानता को लेकर है, जिसमें वे उसे शूद्रों और अतिशूद्रों का सबसे बड़ा दुश्मन बताती हैं—

अपना एक ही दुश्मन/उससे अधिक खतरनाक नहीं कोई/आओ, उसे खदेड़ दें हम सब मिल कर/खोजोखोजो मन की भीतर झांको….क्या नाम है उसका?’

चलो चलो मैं बताती हूँ/उस दुष्ट खतरनाक दुश्मन की पहचान/ध्यान से सुनो उस दुश्मन का नाम/उस दुश्मन को कहते हैं अज्ञान’

अज्ञान शूद्रों और अतिशूद्रों का सबसे बड़ा दुश्मन है. बल्कि वह उनकी दुर्दशा का वास्तविक कारण है—

शूद्र और अतिशूद/अज्ञान की वजह से पिछड़े/देव, धर्म, रीतिरिवाज/अर्चना के कारण/अभावों से घिरकर कंगाल हुए.’

गुलामगिरी’ में फुले ने हिंदू धर्म का आधार कहे जाने वाले मिथों की व्याख्या की थी. इस कारण फुले से ब्राह्मण वर्ग चिढ़ा हुआ था. उनपर हमला भी हो चुका था. सामान्य स्त्री होती तो पति को ऐसा करने से बरजती. आगे उनकी जान पर कोई संकट न आए, ऐसे कदम उठाने से रोकती. लेकिन सावित्रीबाई साधारण स्त्री न थीं. वे असाधारण स्त्रियों में भी असाधारण थीं. एक कविता में वे प्रति की विचारधारा को ही आगे बढ़ाती हैं. कविता फुले दंपति के बीच वैचारिक साम्य को दर्शाती है—

शूद्र शब्द का/सही अर्थ है हिनेटिव/आक्रामक शासकों ने/शूद्र का ठप्पा लगाया/पराजित शूद्र हुए गुलाम….असल में शूद्र ही हैं/स्वामी इंडिया के/नाम उनका थाइंडियन/वे शूद्र पराक्रमी हमारे पूर्वज/उन्हीं प्रतापी योद्धाओं के/हम सब वंशज.’

कविताओं के अलावा उनके पत्र भी ऐतिहासिक महत्त्व रखते हैं. सावित्रीबाई फुले ने अपने पति ज्योतिबा फुले को तीन पत्र लिखे थे. एक पत्र में उन्होंने अपने परिजनों की ज्योतिबा के प्रति नाराजगी का वर्णन किया था. ज्योतिबा ब्राह्मण ग्रंथों पर उंगली उठाते थे. पूजापाठ, यज्ञकीर्तन आदि को आडंबर बताते थे. ऐसे में उनसे केवल ब्राह्मण और सवर्ण ही नहीं, उनके अपने लोग भी नाराज रहते थे. ऐसे ही लोगों में सावित्रीबाई के मायके वाले भी थे. पत्र में उन्होंने लिखा था कि कैसे उनका भाई ज्योति बा की आलोचना करता रहता है. कहता है कि फुले जो काम कर रहे हैं, वह अछूतों का है. इसीलिए समाज ने उनका बहिष्कार किया है.’ पत्र में सावित्रीबाई अपने भाई पर टिप्पणी करती हैं कि उसकी मति खराब हो चुकी है. पत्र में ज्योतिबा फुले को यह भी बताया था कि उन्होंने अपने भाई का समझाने का प्रयत्न किया है. और इसका असर साफ नजर आता है. भाई के नाम की चिट्ठी में वे लिखती हैं—‘आपकी मति ब्राह्मणों की चाल की शिकार है. उनकी घुट्टी पी पी कर, उनके पाखंडी उपदेश सुन कर आपकी बुद्धि दुर्बल हो गयी है और इसी कारण आपके स्वयं के विवेक ने काम करना बंद कर दिया है, एक तरफ आप इतने दयालु बनते हैं कि बकरी और गाय को खूब प्यार करते हैं, उन्हें दुलारते हैं, नागपंचमी के त्योहार में विषैले सांपों को दूध पिलाते हैं, ये कृत्य आपके लिए धर्म सम्मत है और महार, मांग अपने जैसे इंसानों को तुम इंसान नहीं समझते. उनसे तुम परहेज करते हो, उन्हें अछूत, अस्पृष्य समझ कर दुत्कारते हो. क्यों करते हो ऐसा? क्या तुम नहीं जानते के ब्राह्मण लोग तुम्हें भी अछूत ही समझते हैं. हमारे स्पर्श से भी उन्हें नफरत है.’ पत्र के अनुसार वे अपने भाई के सामने ज्योतिबा की प्रशंसा भी करती हैं—

मैंने अपने भाई से यह भी कहा कि मेरा पति तुम्हारे जैसे लोगो में से नहीं है. ऐसा तो बिलकुल नहीं है जो धर्म यात्रा के नाम पर पंढरपुर तक पैदल हरी नाम जपते हुए चलता जाए और अपने लिए पुण्य कमाने का ढोंग करे. वे असली और सच्चा काम करते हैं, मानवता को जीवित रखते हैं, अनपढ़ों को पढ़ालिखाकर, उन्हें ज्ञान देकर उनके जीवन में रोशनी भरते हैं, उनमें स्वाभिमान जगा कर जीने की राह दिखाते हैं. यही सच्चा रास्ता है. उनका ध्येय अब मेरा भी ध्येय बन गया है. लोगों को शिक्षित करने में मुझे बहुत शांति मिलती है, स्त्रियों को पढ़ाने से मुझे खुद को प्रेरणा, प्रोत्साहन और उर्जा मिलती है. यह काम मुझे खुशी देता है. इससे मुझे सुख शांति, आत्मतृप्ति मिलती है. ये ही वो काम है जिसमें इंसानियत और मानवता दीख पड़ती है.’

सात्रिवीबाई कुशल वक्ता थीं. ज्योतिबा फुले की तरह उन्होंने भी देशीविदेशी साहित्य का खूब अध्ययन किया था. लोग उनकी बात को ध्यान लगाकर सुनते थे. आरंभ में सावित्रीबाई की आलोचक, उनपर ताना कसने वाली, उनका मजाक उड़ाने वाली, राह चलते समय उनपर कीचड़ और गालियों मी बौछार करने वाली स्त्रियां बाद में उनकी प्रशंसा करने लगी थीं. समाज में उनकी इज्जत थी. यह सावित्रीबाई की बड़ी उपलब्धि थी. मगर वे इतनेभर से शांत होने वाली न थीं. सावित्रीबाई का मानना था कि बगैर सम्मानजनक रोजगार के शिक्षा की कोई उपयोगिता नहीं हैं. भूमि रोजगार सृजन का बड़ा साधन है. लेकिन उसपर ब्राह्मणों और सवर्ण सामंतों का कब्जा है. शूद्र और अतिशूद्र उनके यहां काम करते हैं. यह भी उनकी दासता की वजह है. वे चाहती थीं कि शूद्र और अतिशूद्र उद्यमों में रुचि लें. इसीलिए उनके स्कूलों में बच्चों को रोजगार की दृष्टि से आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा दी जाती थी. अपने भाषण में भी सावित्रीबाई लोगों को श्रम और सामूहिकता का अर्थ समझाती थीं—

कामधंधे और उद्यमशीलता ज्ञान एवं प्रगति का प्रतीक हैं. सामूहिक श्रम का महत्त्व हैउद्यमी व्यक्ति अपने सुखसुविधा में बढ़ोतरी करते हुए, अन्य लोगों को भी सुखी करने का प्रयास करता है. ठीक इसके विपरीत देवदेवतावादी, भाग्यवादी, किस्मत और भगवान के भरोसे जीने वाला व्यक्ति आलसी और मुफ्तखोर होने के कारण हमेशा दुखी ही रहता है तथा वह अन्य लोगों की सुखशांति को मिट्टी में मिलाने का काम करता है. आलस्य ही गरीबी का पर्याय है. ज्ञान, धन, सम्मान का आलस्य दुश्मन होता है. आलसी आदमी को कभी धन, ज्ञान और सम्मान नहीं मिलता. लगातार परिश्रम, इच्छा शक्ति, सकारात्मक सोच के बल पर ही सफलता प्राप्त होगी. निश्चित रूप से प्राप्त होगी. ऐसा मेरा विश्वास है.’

काव्य फुले’ के बाद सावित्रीबाई फुले का ‘बावन काशी सुबोध रत्नाकर’ शीर्षक से दूसरा कविता संग्रह प्रकाशित हुआ. इन पुस्तकों के अलावा उन्होंने ‘ज्योतिबा के भाषण’ नाम पुस्तक जिसमें ज्योतिबा फुले के भाषणों का संग्रह है, जैसी पुस्तक भी संपादित की. सावित्रीबाई फुले के अपने भाषणों और गीतों का संग्रह ‘सावित्रीबाई भुले के भाषण और गीत’ शीर्षक संग्रह से उपलब्ध है.

सावित्रीबाई फुले ने जो किया वह आज इतिहास में दर्ज है. वे भारत में स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं. लक्ष्मीबाई को अंग्रेजों के साथ संघर्ष के लिए भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की महानायिका कहा जाता है. यदि देखा जाए तो लक्ष्मीबाई की अपेक्षा सावित्रीबाई फुले का योगदान कहीं अधिक बड़ा है. लक्ष्मीबाई जो कर रही थीं, उनके पीछे हिंदुस्तान का हर वह व्यक्ति खड़ा था, जो अंग्रेजों से मुक्ति चाहता था. सावित्रीबाई फुले के पीछे अपने ही लोग और सबसे अधिक उनका अज्ञान पड़ा था, जिसे उन्होंने अपनी कविताओं और जीवनसंघर्ष द्वारा निरंतर और अनथक चुनौती दी. रानी लक्ष्मीबाई और सावित्रीबाई फुले के कर्मक्षेत्र एकदम अलग थे. बावजूद इसके सावित्रीबाई का इस देश को बनाने में जो योगदान रहा, उसके कारण वे लक्ष्मीबाई को पीछे छोड़ देती हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

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