सामाजिक न्याय की कसौटी पर ‘स्वामीभक्ति’ और ‘राष्ट्रवाद’ का आकलन

सामान्य

लेख

हिंदी में एक बड़ा ही निर्लज्ज शब्द है—स्वामीभक्ति। निर्लज्ज मैं आज कह रहा हूं। एक जमाने में यह बड़ा ही पुण्यवान शब्द माना जाता था। स्वामीभक्त व्यक्ति का समाज में बड़ा मान-सम्मान और प्रतिष्ठा थी। उसकी गिनती मालिक के सर्वाधिक विश्वसनीय लोगों में होती थी। स्वामीभक्ति सिखाने के लिए न तो कोई स्कूल था, न इसके लिए कोई अलग से धर्मशास्त्र रचा गया था। फिर भी स्वामीभक्त होना, कुछ लोगों के लिए अत्यंत गौरवशाली होता था। ‘स्वामीभक्ति’ कदाचित जन्मजात गुण था। समाज में कहीं से, कोई भी, ऐसा ‘स्वामीभक्त’ निकल आता, जो अपना सर्वस्व किसी सत्ता अथवा सत्ता-शिखर पर विराजमान व्यक्ति या दरबारियों में से किसी एक को सौंप देता था। उसके बाद स्वामी का मित्र उसका मित्र; तथा स्वामी का दुश्मन उसका दुश्मन बन जाता था। उसका समर्पण इतना प्रबल होता था कि ‘स्वामी’ के हित में यदि निर्दोष व्यक्ति की जान लेनी पड़े; अथवा किसी अपने की बलि देनी पड़े तो भी वह खुशी-खुशी कर्तव्य-पूर्ति का आनंद लेता था। मालिक का विश्वासपात्र होना ही उसकी उपलब्धि थी। यही उसका श्रेय था और यही उसका प्रेय—जिसके लिए वह बड़े से बड़ा बलिदान करने को तत्पर होता था। इस कारण अपने आश्रयदाता की कीर्ति-गाथा रचने वाले कवि, इतिहासकार भी उसके विश्वासपात्रों को नजरंदाज नहीं कर पाते थे। कभी-कभी स्वामीभक्ति का सिलसिला पीढ़ियों तक चलता रहता था। हर ‘स्वामीभक्त’ गर्व से दोहराता था कि उसकी इतनी पीढ़ियां अमुक व्यक्ति तथा उसके परिवार की विश्वासपात्र रही हैं।  

स्वामीभक्त के लिए उसकी ‘स्वामीभक्ति’ ही सब कुछ थी। ईश्वरभक्ति और स्वामीभक्ति में उसके लिए कोई अंतर न था। यद्यपि राजा के आदेशानुसार काम करने वाले सैंकड़ों-हजारों लोग हो सकते थे। ऐसे लोग जो दावा करते हों कि वे ठीक वही करते हैं, जो उनका मालिक कहता है। लेकिन इतने भर से वे स्वामीभक्त नहीं हो जाते थे। इसलिए कि स्वामीभक्ति, स्वामीभक्त व्यक्ति द्वारा संपन्न कार्य के बजाय, उस समर्पण एवं विश्वास में होती है, जिसमें एकमात्र स्वामी की इच्छा सर्वोपरि हो। बदले में स्वामीभक्त को क्या मिलता था—यह वर्णनातीत है। गूंगे के गुण के समान—सच्चा स्वामीभक्त ही उसे महसूस कर सकता था। ‘अमुक व्यक्ति मेरा भरोसेमंद है’—ये चंद शब्द स्वामीभक्त द्वारा आत्ममुग्ध जीवन जीने के लिए पर्याप्त होते थे। अपने ‘मैं’ को मारकर, पूरी तरह स्वामी का हो जाना, अपना अच्छा-बुरा कुछ भी न सोचना, स्वामी के हित को अपना हित मान लेना, उसके प्रत्येक आदेश को सिर-माथे लेना, अच्छाई-बुराई, नीति-अनीति पर कतई विचार न करना, विवेक और तर्कबुद्धि को मालिक के नाम पर गिरवी रख देना, स्वामी दिन कहे तो दिन, रात कहे तो रात बताना—ये स्वामीभक्ति के विशिष्ट लक्षण माने जाते थे। समाज में इन गुणों की इज्जत चाहे हो या न हो, स्वामीभक्त के लिए यही सबकुछ होते थे। वह केवल अपने ‘स्वामी’ के लिए जीता था। जीवन देकर भी स्वामी के हित की रक्षा करने को अपना सौभाग्य मानता था। बदले में जो भी मिलता, उसी को पुण्यफल मानकर ग्रहण कर लेता था। अपने मालिक या राज्य के प्रति सब कुछ बलिदान कर देने की भावना अवश्य ही उदात्त एवं सराहनीय मानी जा सकती है। इसीलिए इतिहास उसे महिमामंडित करता आया है। कमी यह थी कि मालिक के प्रति समर्पण और बलिदान के समय स्वामिभक्त मनुष्य अपने विवेक तथा कार्य के औचित्य को एकदम भुला देता था। स्वामीभक्त व्यक्ति की तत्कालीन समाज में क्या इज्जत थी? जनसाधारण उसे किस प्रकार देखता था? इसका कोई लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। तथापि लगता तो यही है कि स्वामीभक्त की सारी मान-मर्यादा और सम्मान स्वामी के पद-गौरव में विलीन होकर रह जाते थे। इस बात को स्वामीभक्त भी समझता था, मगर इससे उसकी स्वामीभक्ति पर कोई अंतर नहीं पड़ता था। 

स्वामीभक्ति का एक चलताऊ नाम है—नमकहलाली। लेकिन उसमें स्वयंस्फूर्त्त स्वामीभक्ति की भावना नहीं है। ‘तुमने उनका नमक खाया है, इसलिए उनके साथ दगा करने की सोचना भी मत’ या ‘मैंने उसका नमक खाया है, मैं भला उसको धोखा कैसे दे सकता हूं’ कहकर नमकहलाल, व्यक्ति-विशेष के साथ कभी छल न करने को प्रतिबद्ध हो जाता था। लेकिन नमकहलाली का प्रत्यय सामान्यतः आमजन के लिए ही था। शिखरस्थ वर्गों में ‘हम पियाला—हम निवाला’ बनने के बावजूद वर्चस्व का संघर्ष चलता रहता था। तब वह कूटनीति माना जाता था। सीधे तौर पर कहें तो जनसाधारण पर नमकहलाली के नाम पर स्वामीभक्ति सायास थोप दी जाती है। सवाल है कि नमक ही क्यों? बड़े से बड़ा व्यक्ति हमेशा खैरात तो बांटता नहीं था। बल्कि भिखारियों और फकीरों से तो, जिनका जीवन पूरी तरह खैरात पर पलता था, नमकहलाली की अपेक्षा की ही नहीं जाती थी। नमकहलाली की अपेक्षा आमतौर पर ऐसे लोगों से की जाती थी, जो सेवा में रहते थे। जिन्हें उनका मालिक नौकरी के बदले मात्र नमक जितना देता था। उस ‘नमक’ जितनी पगार के लिए नमकहलाल ने अपनी देह का कितना नमक बहाया है, इस बात को वह न तो खुद समझ पाता था, न उसके आसपास रहने वालों को समझ आती थी। नमक की कीमत चुकाने में अकसर पीढ़ियां गुजर जाती थीं। बावजूद इसके, मजबूरी में ही सही स्वामीभक्ति दर्शाने वाले लोग कम न थे। इनमें अधिकांश समाज की पिछड़ी और अतिपिछड़ी जातियों के लोग होते थे, जो अपनी आजीविका के लिए ‘स्वामी’ पर निर्भर थे। स्वामीभक्ति दर्शाना एक तरह से आजीविका को सुरक्षित रखने का माध्यम भी था। एक बात और, जिन दिनों यह शब्द बना या यूं कहो कि जब से स्वामीभक्ति को आदर्श माना गया—उन दिनों सत्ता और संसाधनों में जनसाधारण की हिस्सेदारी नमक जितनी भी नहीं थी। जनसाधारण के पास कुल पूंजी के नाम पर, केवल उसकी देह होती थी। अपने स्वामी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के लिए सिवाय देह के वह कुछ और दांव पर लगा ही नहीं सकता था। इसलिए स्वामीभक्त बने रहना कुछ लोगों के लिए उनकी मजबूरी भी थी।

उन दिनों पृथ्वी की समस्त निधियों और संपदाओं का स्वामी ब्राह्मण को माना जाता था। उसका कोई स्वामी न था। वह अपना स्वामी स्वयं होता था। दूसरे पायदान पर राजा यानी क्षत्रिय था। उसका दायित्व था, ब्राह्मण के नाम पर, उसके मार्गदर्शन में उसकी संपदाओं की सुरक्षा और संवर्धन करना। तीसरे में व्यापारी-वर्ग आता था। उसके कराधान से राज्य का खर्च चलता था। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनों के पास ‘नमक’ की अफरात थी। बावजूद इसके स्वामीभक्त शब्द उन तीनों के लिए नहीं बना था। ये तीनों खुद ‘स्वामीवर्ग’ से थे। उनमें वर्चस्व के लिए स्पर्धा चलती रहती थी। एक-दूसरे को नीचा दिखाकर आगे निकलने के लिए षड्यंत्र भी होते रहते थे। स्पर्धा ऊपर के तीन वर्गों में हो तो प्रत्येक वर्ग स्वयं को श्रेष्ठतम मानकर एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश में लगा रहता था। लेकिन किसी कारणवश, हालांकि इसकी संभावना बहुत कम थी, यदि चौथा वर्ग मुकाबले में आ जाए तो  ऊपर के तीनों वर्ग अपने सारे वैर-भाव बिसराकर एक हो जाते थे। इस चौथे वर्ग के साथ मुकाबले जैसी स्थिति न बने, लोग सहज भाव के साथ अपने शूद्रत्व को धारण करें—‘स्वामीभक्ति’ शब्द ऐसे अवसर के लिए ही बना था। 

‘शूद्र’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द ‘क्षुद्र’ से हुई थी। ‘क्षुद्र’ यानी ओछा, यानी नाकुछ। समाज के एक हिस्से को, जो संख्या में कुल जनसंख्या के तीन-चौथाई से भी अधिक था, ‘शूद्र’ कहकर पायदान में सबसे नीचे ढकेल दिया गया था। उसके कुछ लोग वर्ण-व्यवस्था के भीतर थे, कुछ बाहर। उन्हें पक्के घर बनाने का अधिकार नहीं था। शरीर वे केवल आधा ढक सकते थे। रहने के लिए उन्हें बस्ती से बाहर स्थान दिया जाता था। नए वस्त्र पहनना निषिद्ध था। स्वामी जो उतार दे, वही पहनना उनके लिए गौरव की बात थी। नाम वे ऐसे रखते थे जिनसे दरिद्रता झलकती हो। सार्वजनिक मार्गों पर चलते हुए जिन्हें सिर झुकाकर निकलना पड़ता था। अपनी ही बस्ती में यदि चारपाई या चौपाल पर बैठे हों और रास्ते से सवर्ण गुजरे तो उसके सम्मान में खड़ा न होना धृष्टता मानी जाती थी। धन जुटाने के अवसर नहीं थे। फिर भी अपने पुरुषार्थ और परिश्रम से यदि शूद्र कुछ धन जुटा ले तो ब्राह्मण को अधिकार था कि उसे हड़प लें। शिक्षा प्राप्त करने की हसरत के साथ शूद्र यदि गुरुकुल पहुंच जाए तो उसे एकलव्य की भांति अपमानित करके बाहर निकाल दिया जाता था। या फिर कर्ण की तरह आजीवन शाप ढोना पड़ता था। धर्मशास्त्रों को पढ़ने की चाहत करें तो शंबूक की भांति गर्दन उड़ा दी जाती थी। सुनने की कोशिश करें तो कान में सीसा उंडेल दिया जाता। सामाजिक ऊंच-नीच को दैवीय माना जाता था। धर्म मनुष्य की पूरी जीवनचर्या, उसके समस्त कार्यकलापों को नियंत्रित करता था। सांस्कृतिक अधिपत्य के औजार के रूप में ‘सीसा’ का इस्तेमाल भारत की अकेली और मौलिक खोज थी। उसका इस्तेमाल उन कानों को बंद करने के लिए किया जाता था, जिनमें वेदादि धर्मग्रंथों के शब्द जा घुसे हैं। यह इसलिए आवश्यक था ताकि ब्राह्मण धर्मशास्त्रों की मनमानी व्याख्या कर जनसाधारण को छलते रहें। उनका गुरुत्व बना रहे और बौद्धिक वर्चस्व को किसी भी प्रकार की चुनौती पेश न हो। अमानवीय और असमानताकारी होने के बावजूद यह व्यवस्था लंबे समय तक टिकी रही तो इसलिए कि सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों से अनुकूलन के चलते पीड़ित वर्ग ने स्वयं इसे स्वेच्छापूर्वक अपना लिया था। 

जब सब कुछ ऊपर से तय होता हो, समस्त लाभ-कामनाएं शीर्षस्थ वर्ग के लिए की जाती हों—ऐसे में जनसाधारण द्वारा जीवन को ‘आभार’ की तरह लेना स्वाभाविक ही था। इसलिए लोग स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को भुला बैठे थे। अधिकांश ने मान लिया था कि उनका जन्म ही सेवाकर्म के लिए हुआ है। उसी में वे अपने जीवन की छोटी-मोटी खुशियां तलाशते रहते थे। और वह खुशी थी, खाना-पीना, समाज के प्रभुवर्ग के लिए कामकाजी हाथ पैदा करना और मर जाना। कई बार समाज की जातीय संरचना उनकी मामूली खुशियों पर भी भारी पड़ जाती थी। अछूत कही जाने वाली जाति का व्यक्ति यदि गलती से भी किसी सछूत को छू ले तो उसके लिए कड़े दंड की व्यवस्था थी। उसे चुनौती देने के लिए कोई अदालत न थी। जाहिर है, स्वामीभक्ति केवल व्यक्ति विशेष का मसला नहीं था—अपितु जातीय शोषण को महिमा-मंडित करने की सोची-समझी चाल थी। जाति-केंद्रित व्यवस्था में उसे सर्वसम्मति से स्वीकार लिया गया था। निचली जाति के सदस्यों से उम्मीद की जाती थी कि वे अपने अधिकार एवं खुशियों को भुलाकर, उच्च जाति के सदस्यों के प्रति सम्मान, सदाशयता, सत्यनिष्ठा एवं स्वामीभक्ति का प्रदर्शन करें। इस व्यवस्था के अनुसार यदि बेगार भी करनी पड़े तो खुशी-खुशी करता था।  

असल में वह परिवेश ही ऐसा था जो लोगों के दिलो-दिमाग को निष्क्रिय कर देता था। उनके सोचने-समझने की शक्ति को छीन लेता था। स्वामीभक्ति को समर्पित व्यक्ति जहर को अमृत समझने लगता था। इसे समझने के लिए पन्ना धाय के जीवन को देखा जाता है। पन्ना राणा सांगा के पुत्र उदय सिंह की दाई थी। उसका अपना बेटा भी था—चंदन। पन्ना ने दोनों का दूध पिलाकर बड़ा किया था। राणा सांगा के बाद बनवीर ने राज-परंपरा से विद्रोह कर दिया। बनवीर राणा सांगा के भाई का पुत्र था। उसकी मां एक दासी थी। उस समय की परंपरा के अनुसार राजा अपनी वासना पूर्ति के लिए राजमहल में मौजूद दासियों के साथ सो तो सकते थे, परंतु उनका उत्तराधिकारी विवाहिता पत्नी द्वारा उत्पन्न संतान में से ही होता था। राजा के महल में ऐसी स्त्रियां भी होती थीं, जिन्हें राजा हरण करके ले आते थे, या पसंद आने पर रंगमहल की शोभा मान ली जाती थीं। उन्हें विवाहिता स्त्री के अधिकार प्राप्त नहीं थे। महत्त्वाकांक्षी बनवीर ने राणा के वंशजों को एक-एक कर मौत के घाट उतार दिया। रह गया बस उदय सिंह जो पन्ना धाय के संरक्षण में था। एक दिन नंगी तलवार लिए वह पन्ना के महल में भी आ धमका। पन्ना को उसकी पूर्वसूचना मिल चुकी थी। उसने उदय सिंह को बांस की टोकरी में सुलाकर, झूठी पत्तलों से ढककर बाहर भेज दिया और अपने बेटे चंदन को उसके पलंग पर सुला दिया। बनवीर ने एक ही झटके में चंदन की हत्या कर दी। पन्ना खड़ी, चुपचाप देखती रही। 

इसी ‘त्याग’ के लिए इतिहास पन्ना को महिमा-मंडित करता आया है। उसके बलिदान को लेकर न जाने कितने ग्रंथ और लोककाव्य रचे गए हैं। वर्षों तक पन्ना धाय को स्वामीभक्ति और त्याग की प्रतिमूर्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा। राजस्थान में आज भी यही स्थिति है। पन्ना दासी थी। परिस्थितिवश उसे उदय सिंह को अपना दूध पिलाना पड़ा था। बनवीर भी दासी-पुत्र था। पन्ना यह भी सोच सकती थी कि बनवीर की मां और उसकी त्रासदी एक समान है। कि राज-पुरुष की संतान होने के बावजूद बनवीर जिन अधिकारों से वंचित है, स्वयं उसके पुत्र को भी उन अधिकारों से वंचित रहना पड़ेगा। कि बनवीर का आक्रोश स्वाभाविक है, अतएव उसका साथ देकर वह व्यवस्था को चुनौती दे सकती है। वह सोच सकती थी कि राज्य यदि समाजीकरण की प्रक्रिया में लोगों द्वारा गढ़ी गई संस्था है तो उसका अधिकार किसी परिवार या वंश परपंरा के अनुसार क्यों तय होना चाहिए! अनपढ़ और सामंती संस्कारों के बीच पली-बढ़ी पन्ना यह नहीं सोच पाती। वह वही करती है जो वर्चस्वकारी संस्कृति ने उसे सिखाया था। कि राज करना केवल राजा और उसके उत्तराधिकारियों का अधिकार है। कि राज करने वाले लोग दैवी कृपा से संपन्न होते हैं। बाकी लोगों का कर्तव्य है कि इस अधिकार का सम्मान करें। खुद को केवल सेवा-भाव द्वारा संतुष्ट रखें। वर्चस्वकारी संस्कृति की रक्षा के लिए अपने मन-प्राण समर्पित कर दें।

पन्ना ने जो किया वह उस समय का युग-संस्कार था, जिसे वर्चस्वकारी संस्कृति के निर्माता और संरक्षकों ने बनाया हुआ था और जिसे वे युगों से बचाते आए थे। पन्ना ने किया वह अनोखा भले लगे, स्वामीभक्ति का  अकेला कृत्य नहीं था। समाज के निचले वर्ग उच्च वर्गों की समृद्धि एवं सुरक्षा हेतु शताब्दियों से समर्पित होते आए हैं। वैसी मानसिकता से अनुकूलित लोग ही पन्ना धाय के कृत्य को ‘बलिदान’ कहकर महिमामंडित करते आए हैं। आधुनिक चेतना से संपन्न व्यक्ति पन्ना के निर्णय को लेकर सवाल कर सकता है। क्या मां होने के नाते पन्ना का चंदन के प्राणों पर भी अधिकार था? क्या एक राजकुमार के प्राण तथा सामान्य व्यक्ति के प्राण के मूल्य में कोई अंतर हो सकता है? क्या बनवीर का आक्रोश एकदम वृथा था? लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी जन्मदात्री मां को वाल्सल्य और त्याग की प्रतिमूर्ति माना जाता है। लेकिन इससे किसी मां को उसकी संतान के प्राणों पर अधिकार नहीं मिल जाता। बावजूद इसके शताब्दियों से पन्ना धाय को गौरवान्वित किया जाता रहा है। पन्ना का आचरण तत्कालीन गैरबराबरी वाले समाज और संस्कृति में स्वामीभक्ति की पराकाष्ठा है, जो कुछ वर्गों के सत्ता एवं संसाधनों पर एकाधिकार के दावे को पुष्ट करता है।

जब तक राजशाही रही, स्वामीभक्ति को खूब फलने-फूलने का अवसर मिला। मगर लोकतंत्र के उदय के साथ उसपर संकट मंडराने लगा। बदले समय में राजा-रानी और उनकी गाथाओं की चमक फीकी पड़ी तो ‘स्वामीभक्ति’ की अवधारणा भी अप्रासंगिक होने लगी। बड़े अर्थों में उसे नए चलन में ‘स्वामीभक्त’ के स्थान पर ‘चापलूस’ और ‘चमचा’ जैसे  शब्दों का प्रचलन बढ़ता गया। ये शब्द पहले भी थे, मगर सार्वजनिक जीवन में इनका उपयोग परिहासजनक स्थिति में—प्रायः कमजोर के लिए किया जाता था। शक्तिशाली के संदर्भ में ‘स्वामीभक्त’ का ही प्रचलन था। शायद इसलिए कि ‘स्वामीभक्ति की अपेक्षा ‘चमचागिरी’ बहुत हल्का शब्द था। उसमें स्वामीभक्ति का विकल्प बनने की योग्यता नहीं थी। 

उस दौर में सत्ता राजा तथा उसके गिने-चुने दरबारियों के अधीन होती थी। जनता राजनीतिक शक्ति से विहीन होती थी। इसलिए उस समय ऐसे स्वामीभक्तों की आवश्यकता पड़ती थी, जिनके माध्यम से राजसत्ता अपने वैभव और मेहरबानियों का प्रदर्शन कर सके। जो राजसत्ता का गुणगान करते हुए उसके पक्ष में माहौल बनाने का काम करें। लोकतंत्र में सरकार बनाने की ताकत जनता को हस्तांतरित हो चुकी थी। उसके फलस्वरूप नागरिकों में अधिकार चेतना में भी विस्तार हुआ था। अतएव सर्वसत्तावादियों को, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी अपने अधिपत्य को सुरक्षित रखना चाहते थे—स्वामीभक्ति की परंपरा को अक्षुण्ण रखने के लिए, नए युगबोध के अनुकूल ऐसे शब्द की आवश्यकता थी, जो देखने-सुनने में थोड़ा आधुनिक प्रतीत हो, जिसमें स्वामीभक्ति जैसा ही आभासी आदर्श और गौरव की प्रतीति हो, इसके साथ-साथ जिसमें ठीक वैसा ही नशा हो जैसा स्वामीभक्ति में है; या जिसे ‘सम्मानित’ नशे के रूप में पेश किया जा सके। मुखर अभिव्यक्तियों के दौर में हालांकि ऐसा कोई सर्वमान्य शब्द मिलना आसान भले न हो, मगर मुश्किल भी नहीं था। बदले समय के अनुरूप स्वामीभक्ति के मुकाबले जिस शब्द को प्राथमिकता दी वह था—‘राष्ट्रवाद’। राष्ट्रवाद चूंकि राजनीतिक संकल्पना है, और जाति-भेद से ग्रस्त भारतीय समाज में विशुद्ध राजनीतिक संकल्पनाएं सर्वसत्तावादियों के मंसूबों को पूरा करने की दिशा में अपर्याप्त मान ली जाती हैं, इसलिए ‘राष्ट्रवाद’ को हमारे यहां ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में थोपा जा रहा है।

अब हम इस नई अवधारणा की पृष्ठभूमि पर विचार करेंगे। दरअसल, नए विचारों के उदय के साथ इस स्थापना को स्वीकृति मिली थी कि राज्य नागरिकों की रचना है। मनुष्य ने उसे अपने सुख और सुरक्षा के लिए गढ़ा है, इसलिए उसको नागरिकों के प्रति कल्याणकारी होना चाहिए। लेकिन जहां राज्य के नागरिकों के प्रति कुछ दायित्व हैं, वहीं नागरिकों के भी राज्य के प्रति कर्तव्य हैं। राज्य और नागरिकों के सहसंबंधों को समझने की पहल अरस्तु बहुत पहले कर चुका था, तथापि उसपर सही मायने में विचार सोलहवीं शताब्दी के बाद ही संभव हो पाया। थॉमस हॉब्स, ग्रीन, जॉन लॉक, रेने देकार्त्त, रूसो, मिल, बैंथम, इमानुअल कांट, टॉमस पेन, थॉमस जेफरसन आदि चिंतकों ने राज्य और मनुष्य के संबंधों को परिभाषित किया था। कालांतर में उसी के आधार पर आधुनिक राज्य की नींव पड़ी। उसके मूल में जहां राज्य की गरिमा को प्राथमिकता दी गई थी, वहीं नागरिकों के कर्तव्यों एवं अधिकारों को भी सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। 

यह ठीक है कि परंपरागत राजनीतिक दर्शनों में भी प्रजा-कल्याण पर जोर दिया जाता था। उन दिनों उसी राजा को श्रेष्ठ माना जाता था जो राज्य की सुरक्षा के साथ-साथ प्रजा के कल्याण पर भी ध्यान दे। प्रजा के सुख में अपना सुख देखे। श्रेष्ठ राजा में क्या गुण होने चाहिए, इस बारे में ‘अर्थशास्त्र’ कहता है—‘राजा का सुख प्रजा के सुख में निहित है। राजा के सुख में प्रजा का सुख निहित नहीं होता। जो स्वयं को प्रिय हो, उसमें राजा का हित नहीं है, बल्कि जो प्रजा को प्रिय लगे उसी में रजा का हित है’(अर्थशास्त्र 1/19)। अर्थशास्त्र के अलावा ‘महाभारत’ और ‘शुक्रनीति’ में भी राजनीतिक दर्शन पर विचार हुआ है। उस व्यवस्था की कमजोरी थी कि उसमें प्रजा और राजा के बीच संवाद का कोई मजबूत तंत्र न था। कुछ कहानियों में राजा या उसके मंत्रियों को भेष-बदलकर राज्य की स्थिति का जायजा लेते हुए पाते हैं। प्रजा चाहती क्या है? राजा द्वारा चलाए गए कार्यक्रमों से वह संतुष्ट है अथवा असंतुष्ट? इसे जानने-समझने के लिए कोई मजबूत तंत्र न था। चाणक्य हालांकि प्रजा की मनोस्थिति को समझने के लिए राजा को गुप्तचर रखने की सलाह देते हैं। लेकिन उसके पीछे प्रजाकल्याण की भावना कम, राजा को षड्यंत्रों से बचाए रखने की वांछा ही प्रबल थी। दूसरे राजपद के साथ अनेक महत्त्वाकांक्षाएं जुड़ी होती थीं। उनमें से एक राज्य की सीमाओं का विस्तार भी था। राजाओं का बड़ा समय सीमाओं के विस्तार हेतु पराक्रम दिखाने अथवा विद्रोहों को दबाने में गुजर जाता था। आमतौर पर राजा के बदलने के साथ राज्य की प्राथमिकताएं भी बदल जाया करती थीं। चापलूस दरबारियों से घिरे राजा लोककल्याण के कार्यक्रमों को प्रजा पर अपनी कृपा मानने लगते थे। 

बदले परिवेश में लोक-कल्याण को वरीयता देना, राज्य के गठन का प्राथमिक उद्देश्य था। पहले राज्य को राजा की निर्मिति माना जाता था। बदली मान्यता में उसे नागरिकों का सृजन मान लिया गया। आज राज्याध्यक्ष निर्वाचित प्रतिनिधि होता है। यदि वह नागरिक अपेक्षाओं पर खरा न उतरे तो उसे बदल देने का अधिकार भी जनता को प्राप्त है। ऐसे में ‘स्वामीभक्ति’ का अप्रासंगिक हो जाना स्वाभाविक है। यद्यपि किस्से-कहानियों में वह आज भी जिंदा है, तथा उसके महत्त्व को पुनर्स्थापित करने के प्रयत्न भी जारी हैं। प्राचीन कथानकों को लेकर ऐसे ग्रंथ रचे जा रहे हैं, जिनसे स्वामीभक्ति का महिमा-मंडन होता हो। सच तो यह है कि समाज के एक हिस्से का अतीतमोह उसे बार-बार प्राचीन इतिहास और संस्कृति की ओर खींच ले जाता है। हर स्थिति में अपने स्वार्थ को आगे रखने वाले उस वर्ग की धारणा है कि आजादी के बाद भारतीय समाज और राजनीति में आए परिवर्तन अस्थायी हैं। धर्म और संस्कृति की मदद से आमजन को फुसलाकर, परिवर्तन-चक्र को वापस किया जा सकता है। लोकतंत्र की आड़ में ऐसी कोशिशें लगातार होती रही हैं। संविधान की सौगंध उठाने वाले राजनीतिक दल भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में इसमें सहयोगी बन जाते हैं।

संवैधानिक व्यवस्थाओं में जहां अधिकारों एवं कर्तव्यों की लिखित व्यवस्था हो, परंपरागत ‘स्वामीभक्ति’ को हेय मान लिया जाता है। लोकतंत्र व्यक्ति-स्वातंत्र्य का समर्थन करता है। परिणामस्वरूप ‘स्वामीभक्ति’ जिसने कुछ खास वर्गों को शिखर पर बनाए रखा है—का दौर औपचारिक तौर पर लगभग खत्म हो चुका है। मगर शासक वर्ग का काम बिना उसके नहीं चलता। वह अपने वर्चस्व को लगातार कायम रखना चाहता है। इसके लिए उसे भरोसेमंद लोगों की जरूरत पड़ती है। ऐसे नागरिकों की आवश्यकता पड़ती है जो अपनी निजी महत्त्वाकांक्षाओं को सत्तावर्ग की महत्त्वाकांक्षाओं में विलीन कर दें। कुछ सीमा तक यह काम नौकरशाही भी करती आई है। उसे सत्ताधारी वर्ग, वह चाहे जिस रास्ते से सत्तासीन हुआ हो—के प्रति ईमानदार रहने की शिक्षा दी जाती है। किंतु लोकतंत्र में जहां निश्चित अवधि के बाद जनता के समर्थन की आवश्यकता पड़ती है—सत्ता में बने रहने के लिए केवल नौकरशाही का समर्पण पर्याप्त नहीं होता, अपितु ‘राष्ट्रवाद’ जैसी लोकलुभावन संकल्पनाओं की भी जरूरत पड़ती है। उसमें राष्ट्रीय अस्मिता को व्यक्तिगत अस्मिताओं पर वरीयता दी जाती है। नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी पहचान को राष्ट्र की पहचान में विलीन कर दें। राष्ट्रीय गौरव और मान-सम्मान के लिए यथासंभव बलिदान देने को तत्पर हों। उन्हें लगातार यह विश्वास दिलाया जाता है कि वर्तमान व्यवस्था तथा उसको चला रहे लोग ही सर्वाधिक श्रेष्ठ, ईमानदार और विश्वसनीय हैं। प्रकारांतर में राष्ट्रवाद समाज को दो वर्गों में बांट देता है। पहले वर्ग में सत्ता-लाभान्वित, विशेषाधिकार प्राप्त लोग होते हैं, जो येन-केन-प्रकारेण सत्ता से चिपटे रहना चाहते हैं। दूसरी ओर जनसाधारण, जिनसे उनकी राष्ट्रीय पहचान के बदले, यथासामर्थ्य त्याग और समर्पण की अपेक्षा की जाती है।

‘राष्ट्रवाद’ की अवधारणा पुरानी है। इस पद का सर्वप्रथम प्रयोग, 18वीं शताब्दी में जर्मन दार्शनिक जॉन गाटफ्रेड हर्डर ने किया था। हर्डर ने राष्ट्रवाद को समूची मानवता के संदर्भ में देखा था। उसका कहना था कि राष्ट्र केवल साझे इतिहास, भाषा, संस्कृति, नस्ल, धर्म और भौगोलिक क्षेत्र से बनता है। वह नागरिकों के गर्व करने की चीज है। विश्व अनेक राष्ट्रीयताओं का समुच्चय है। क्षेत्रीय विशेषता होने के बावजूद राष्ट्रवाद में ऐसा कुछ नहीं है जो दूसरी राष्ट्रीयताओं से श्रेष्ठतर दर्शाता हो—‘किसी देश द्वारा अपनी ही बढ़ाई करना, घमंड का मूर्खतापूर्ण प्रदर्शन है।’ ‘राष्ट्र क्या है?’ इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उसने कहा था कि राष्ट्र, ‘एक घना जंगल है जिसमें अच्छे और बुरे दोनों तरह के पौधे होते हैं।’ हर्डर की परिभाषा के अनुसार भारतीय राष्ट्रवाद की क्या स्थिति है? इसे समझना आसान नहीं है। क्योंकि भारत में इतिहास, भाषा एवं संस्कृति के क्षेत्र में अनेक विविधताएं हैं। विद्वान भारत में राष्ट्रवादी भावनाओं का उभार उनीसवीं शताब्दी के आरंभ से मानते आए हैं। यदि गहराई से सोचें तो वह कालखंड दो समानांतर घटनाओं का साक्षी था। पहला, भारत के निचले वर्गों में शिक्षा के प्रति चेतना का उभार। दूसरा, औपनिवेशिक शासन से मुक्ति की छटपटाहट। 

यदि आप सोचें कि ये दोनों घटनाएं भारतीय राष्ट्रवाद के विस्तार में समानरूप से सहायक थीं, तो आप पूरी तरह गलत होंगे। दरअसल भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा ऐसा था जिसे हजारों वर्षों से दबाकर रखा गया था। जो पीढ़ियों से शिक्षा, स्वतंत्रता, मान-सम्मान सहित सामान्य प्राकृतिक अधिकारों से भी वंचित था। चूंकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनके मनुष्य होने के अहसास को पुनर्जीवित किया था, उनके लिए समानता और शिक्षा की राह प्रशस्त की थी। अतएव भारतीय समाज का वह बहुसंख्यक हिस्सा, औपनिवेशिक शासन को अपने लिए अवसर के रूप में देखता था। ऐसे में राष्ट्रवाद बहुजन चेतना का हिस्सा बन ही नहीं सकता था। उनके लिए सामाजिक न्याय, राष्ट्रवाद से कहीं बड़ा मुद्दा था। दूसरे स्वाधीनता आंदोलन में भी सामाजिक यथास्थितिवादी, बुर्जुआ ताकतों का वर्चस्व था। नए भारत को वे अपने वर्गीय सोच, जो प्रकृति से सांप्रदायिक और जातिवादी था—के अनुसार ढालना चाहती थीं। यही कारण है कि बहुजन समुदाय राष्ट्रवादी भावनाओं के उभार को अपने हितों के लिए घातक मानता रहा। कुछ सीमा तक आज भी मानता है, क्योंकि आजादी से उसकी जो अपेक्षाएं थीं, वे आज भी स्वप्न तक सीमित हैं। 

दूसरी घटना; यानी औपनिवेशिक शासन से मुक्ति की छटपटाहट की परिणति 1857 के स्वाधीनता संग्राम के रूप में हुई थी। उस समय उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा अंग्रेजों के विरुद्ध लामबंद था। बड़ी बात यह थी कि हिंदू और मुसलमान भारत के दो बड़े धार्मिक समूह, उस समय अंग्रेजों के विरुद्ध कंधे से कंधा मिलाकर, साथ-साथ खड़े थे। इसी आधार पर अधिकांश विद्वान 1857 के स्वाधीनता संग्राम को भारत में राष्ट्रवादी चेतना के उभार के रूप में देखते हैं। लेकिन हर्डर ने राष्ट्रवाद की जो कसौटी तय की है, उसपर 1857 की घटना खरी नहीं उतरती। 1857 के विद्रोह की शुरुआत सैनिक विद्रोह से हुई थी। उसके मूल में धर्मिक भावनाएं थीं। सैनिकों को कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी के प्रयोग के बहाने उकसाया गया था। विद्रोही सैनिकों का लक्ष्य, धर्मभ्रष्ट करने वाले अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़ देना तो था, परंतु उसके बाद क्या होगा, इसकी उनके मस्तिष्क में कोई योजना नहीं थी। यह विश्वास तक नहीं था कि केवल अपने दम पर, बिना किसी बड़े नेतृत्व के, वे अंग्रेजों से जंग जीत सकते हैं। नेतृत्व के लिए पहले वे झांसी की रानी सहित कई रजबाड़ों के पास गए थे। वहां से निराश होने के बाद उन्होंने बूढ़े बहादुरशाह जफर को अपना नेता चुना था। उस युद्ध में जिन राजे-रजबाड़ों ने विद्रोही सैनिकों का साथ दिया, सबकी अपनी-अपनी मांगें थीं। इसलिए युद्ध के दौरान, 1858 में जैसे ही ब्रिटेन ने उनकी मांगों के प्रति सहमति दर्शायी, अधिकांश ने खुद को विद्रोह से अलग कर लिया। कल्पना कीजिए, उस युद्ध के बाद यदि झांसी पर रानी लक्ष्मी बाई और दिल्ली पर बहादुरशाह का परचम लहराने लगता तो उनकी देखा-देखी बाकी राजे-महाराजे भी खुद को आजाद घोषित कर देते। उससे देश में सीधे राजशाही की वापसी होती। तब हम 1857 की घटना को राष्ट्रवादी चेतना के उभार से कभी नहीं जोड़ पाते। हमें ध्यान रखना चाहिए कि राष्ट्रवादी चेतना का मूल सामाजिक-सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय अखंडता की प्रतीति में निहित है। जबकि भारतीय समाज आज भी जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति, संप्रदाय एवं क्षेत्रीयता के आधार पर अनेक हिस्सों में बंटा हुआ है। यही कारण है कि भारतीय राष्ट्रवाद आज भी एक संद्धिग्ध अवधारणा है।

इसका आशय यह नहीं है कि भारतीय नागरिक अपने देश को प्यार नहीं करते? बिलकुल करते हैं। सामान्य स्थिति में  ‘राष्ट्रवाद’ और ‘देशभक्ति’ में खास अंतर नहीं होता। अपनी भाषा, अपनी मिट्टी और अपनी संस्कृति से लगाव नैसर्गिक चेतना है। हम जिस देश में रहते हैं, उससे प्यार करना, जरूरत पड़ने पर मदद के लिए आगे आना, न केवल स्वाभाविक है, अपितु आवश्यक भी है। यही देशभक्ति है। जिस तरह देशभक्ति अपने साझा इतिहास, संस्कृति, भौगोलिकता, धर्म आदि के प्रति जनसाधारण की स्वयंस्फूर्त्त  भावना और उद्गार है, उसी तरह राष्ट्रवाद भी है। देश पर संकट के समय जैसे समर्पण की अपेक्षा किसी ‘देशभक्त’ से की जाती है, ठीक ऐसे ही राष्ट्रवाद में भी जाती है। बावजूद इसके देशभक्ति और राष्ट्रवाद में अंतर है। देशभक्ति स्वयंस्फूर्त्त भावना है। अपनी मिट्टी के प्रति सहजानुराग है। कर्तव्यपरायण होना भी देशभक्ति का लक्षण है। एक मजदूर जो ईमानदारी से अपना काम निपटाता है, वह भी सीमा पर डटे सैनिक जितना ही देशभक्त है। देशभक्ति सत्ता निरपेक्ष होती है तथा नागरिकों में देश के प्रति स्वयंस्फूर्त्त समर्पण एवं बलिदान की प्रेरणा जगाती है। 

इसके उलट राष्ट्रवाद कृत्रिम और सत्ता-सापेक्ष संकल्पना है। देशभक्ति में सहज नागरिक-सामाजिक संबंध तथा स्थानीयता का भाव होता है। उनमें पर्याप्त लचीलापन होता है। नागरिक अपने देश, वहां के समाज, संस्कृति और देशवासियों से बराबर प्यार करते हैं। यह मानते हैं कि जिस तरह वे अपने देश से प्यार करते हैं, बाकी लोग भी अपने देश से उतना ही प्यार करते होंगे। इसमें किसी देश या उसके नागरिकों के देशप्रेम को छोटा या कमतर नहीं आंका जाता। अपने प्रचलित रूप में ‘राष्ट्रवाद’, राष्ट्र को गौरवशाली स्तंभ की भांति प्रस्तुत करता है। नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे राष्ट्र के हित में बलिदान हेतु तत्पर रहें। इसके लिए आवश्यकतानुसार कानून भी बनाया जा सकता है। प्रसंगवश बता दें कि पश्चिमी के कई देशों में अनिवार्य सैन्य सेवा का कानून है। भारत में ऐसा नहीं है। राष्ट्रवाद को प्रासंगिक ठहराने के लिए यहां प्रायः संस्कृति की मदद ली जाती है, जो अपने आप में जातीय भेदभाव से ग्रस्त रही है। 

संवैधानिक राज्य होने के बावजूद भारत में आज भी जाति मानवीय पहचान का महत्त्वपूर्ण पहलू है; और वह नीचे से ऊपर तक असरकारी है। यहां तक कि यह सरकार और उसके फैसलों को भी प्रभावित करता है। ऐसे में जो लोग जाति के आधार पर पिछड़े हुए हैं, सरकार की नजर में भी उनका अस्तित्व गौण हो जाता है; या वे ज्यादा से ज्यादा वोट-बैंक तक सीमित होकर रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि छोटी और अल्पसंख्यक अस्मिताएं, बहुसंख्यक अस्मिताओं के दबाव में खुद को उपेक्षित समझने लगती हैं। शासक वर्ग की निरंतर उपेक्षा कभी-कभी उन्हें हताशा की ओर ढकेल देती है। दूसरी ओर राष्ट्रवाद के चलते शासक वर्ग के हाथों में अतिरिक्त अधिकार आ जाते हैं, जिनसे उनके निरंकुश आचरण की संभावना बढ़ जाती है। मूर्तियों पर अनाप-शनाप पैसा खर्च करना, मंदिर निर्माण को राष्ट्रीय पहचान से जोड़ देना—सरकार की वैचारिक निरंकुशता को दर्शाता है। निरंकुशता का दूसरा रूप दलितों एवं अल्पसंख्यकों पर हमलों के रूप में नजर आता है।

राष्ट्रवाद जब तक नागरिक-मन की स्वयंस्फूर्त्त भावना है, तब तक उसमें और देशभक्ति में कोई अंतर नहीं होता। ऐसा राष्ट्रवाद(या देशभक्ति) देश तथा उसके नागरिक, सभी के लिए श्रेयस्कर होता है। लेकिन जब भी कोई शासकवर्ग राष्ट्रवाद को अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का औजार बनाकर, दूसरी राष्ट्रीयताओं के संदर्भ में उसका उपयोग करने लगता है, जब वह दावा करता है कि उसकी राष्ट्रीयता दूसरी राष्ट्रीयताओं से श्रेष्ठतर है, तथा उसे श्रेष्ठतम बनाने की आवश्यकता है, अर्थात जब राष्ट्रवाद शासकवर्ग की साम्राज्यवादी लिप्साओं का हथियार बन जाता है—तब वह सामाजिक-राजनीतिक स्तरीकरण का प्रस्तावक एवं पोषक भी बन जाता है। राष्ट्रीयताओं के स्तरीकरण की साम्राज्यवादी प्रवृत्ति पहले सत्ता का चरित्र बनती है, कालांतर में नागरिक भी, कभी दबाव तो कभी प्रलोभनों के चलते उससे अनुकूलित होने लगते हैं। 

कह सकते हैं कि राष्ट्रवाद खासकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, देशप्रेम से इतर थोपी गई अवधारणा है। भारत जैसे विविधताओं वाले देश में होता प्रायः यह है कि जो वर्ग शक्तिशाली और सत्ता के केंद्र में है उन्हें स्वयं को दूसरों से अच्छा और योग्य सिद्ध करने का अवसर मिलता रहता है। जो हाशिये पर हैं, उन्हें उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है। अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए यदि वे संघर्ष करना चाहें तो, सत्ताकेंद्र पर विराजमान लोग अपनी पहुंच और अधिकारों का उपयोग कर, उन्हें समाज का शांति-भंजक, यहां तक कि राष्ट्रद्रोही तक कह जाते हैं। दूसरे शब्दों में राष्ट्रवाद की अभिकल्पना के समय हर्डर की चाहे जितनी सदेच्छा रही हो, कालांतर में इसका उदय अंध-राष्ट्रवाद के रूप में देखने में आया, जिसमें बड़ी अस्मिताएं छोटी अस्मिताओं को कुचलने में लगी होती हैं। स्वयं जर्मनी इसका उदाहरण है। वहां जर्मन राष्ट्रवाद के नाम पर हिटलर ने पूरी दुनिया को दूसरे विश्वयुद्ध की भट्टी में ढकेल दिया था। सामूहिक फांसीघर बनवाकर हजारों अल्पसंख्यक यहूदियों को सामूहिक मृत्युदंड की सजा दी थी। 

आवश्यक नहीं कि कथित बड़ी संस्कृतियां अपने समर्थकों के संख्याबल के अनुसार भी बड़ी हों। बावजूद इसके सत्ताकेंद्र पर विराजमान लोग अपनी संस्कृति और धार्मिक विश्वासों को ही मुख्य संस्कृति की तरह पेश करते हैं। ग्राम्शी ने इसे ‘सांस्कृतिक अधिपत्यवाद’ कहा था, जिसमें अल्पसंख्यक वर्ग, सांस्कृतिक श्रेष्ठता के दावे के साथ, बहुसंख्यकों के दिलो-दिमाग पर कब्जा कर लेता है। जनसाधारण के विवेकीकरण तथा मनुष्य को उसके अधिकारों से परचाकर इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सकता है। इसके लिए सामाजिक न्याय को समर्पित राज्य तथा ऐसे नागरिक संगठनों की जरुरत पड़ती है जो नागरिक प्रबोधीकरण के लिए आवश्यक कार्यक्रमों का संचालन कर सकें। 

ओमप्रका कश्यप

1.  प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितम् ।

न आत्मप्रियम् हितम् राज्ञः प्रजानाम् तु प्रियम् हितम्॥ अर्थशास्त्र 1/19

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s