पेरियार ललई सिंह : प्रखर मानवतावादी एवं विद्रोही चेतना

सामान्य

राजनीतिक स्वतंत्रता की आवश्यकता इसलिए होती है कि मनुष्य को सामाजिक स्वतंत्रता हो। मनुष्य, दूसरों की स्वतंत्रता में बाधक न होकर स्वेच्छानुसार खा-पी सके, पहन-ओढ़ सके, चल-फिर सके, मिल-जुल और ब्याह-शादी कर सके। यदि सामाजिक स्वतंत्रता न तो राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता…इसलिए सामाजिक समता और सामाजिक स्वतंत्रता ही हमारा मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। राजनीतिक स्वतंत्रता तो उसमें सहायक होने के कारण ही वांछनीय है।

संतराम बीए, ‘हमारा समाज’ से

कुछ नेता स्वाभाविक नेता होते हैं। समाज की कच्ची-खुरदरी जमीन पर हालात से संघर्ष करते हुए स्वयं उभरते हैं। विपरीत परिस्थितियों से जूझने की प्रवृत्ति उन्हें नेता बना देती है। दूसरे वे नेता होते हैं, जिन्हें थोप दिया जाता है। ऐसे नेता प्रायः मान लेते हैं कि राजनीति उनके खून में है, इसलिए सत्ता-केंद्र पर छाए रहना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। वे प्रायः परिवर्तन-विरोधी होते हैं। गांधी ऐसे ही नेता थे। 1917 में रूसी क्रांति से डरे हुए भारतीय उद्योगपतियों, जमींदारों यहां तक कि यूरोप को भी ऐसे नेता की आवश्यकता थी, जो इस देश के मानस को समझता हो। साथ में ठेठ परंपरावादी भी हो। जो परिवर्तन की इच्छा और संभावनाओं को धर्म की आड़ में दबा सके। इसलिए दक्षिण अफ्रीका से लौटकर आए गांधी को उन्होंने हाथों-हाथ लिया। गांधी ने भी उनकी उम्मीद से बढ़कर काम किया। गरीब जनता के दिल में जगह बनाने के लिए लंगोटी धारण कर ली। उसके बाद जो हुआ, सबके सामने है।

दूसरी श्रेणी के नेताओं की संख्या भी कम नहीं है। ऐसे महामनाओं में ज्योतिराव फुले, डाॅ. आंबेडकर, ई. वी. रामासामी पेरियार, स्वामी अछूतानंद जैसे क्रांतिकारी विचारकों का नाम आता है। पेरियार को छोड़ दें तो बाकी तीनों बहुत साधारण परिवारों से आए थे। परंतु अपने असाधारण सोच, सरोकार और संघर्ष के बल पर वे बड़े परिवर्तन के संवाहक बने। ये सब नए भारत के वास्तुकार हैं। संघर्ष में तपकर निकले नेताओं में ललई सिंह का नाम भी शामिल है। वे कानपुर देहात के छोटे-से गांव में जन्मे और विद्रोही चेतना के बल पर लोगों के दिलो-दिमाग पर छाये रहे। वर्षों लंबे संघर्ष के दौरान उन्होंने विरोधी भी बनाए और समर्थक भी। विरोधी मृत्यु के साथ ही उन्हें भुला चुके थे, जबकि समर्थकों की संख्या आज भी लगातार बढ़ती जा रही है। बड़े नेता और महत्त्वपूर्ण विचार की प्रासंगिकता समय के साथ-साथ निरंतर बढ़ती जाती है। ललई सिंह इस कसौटी पर एकदम खरे उतरते हैं।

ललई सिंह यादव का जन्म 1 सितंबर, 1911 को कानपुर देहात के गांव कठारा के किसान परिवार में हुआ था। पिता का नाम था गज्जू सिंह और मां थीं, मूला देवी। पिता गज्जू सिंह पक्के आर्यसमाजी थे। जाति-भेद उन्हें छू भी नहीं गया था। उनकी गिनती गांव के दबंग व्यक्तियों में होती थी। मां मूला देवी के पिता साधौ सिंह भी खुले विचारों के थे। समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी। ललई सिंह के जुझारूपन के पीछे उनके माता-पिता के व्यक्तित्व का गहरा प्रभाव था।

ललई सिंह की प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई थी। उन दिनों दलितों और पिछड़ों में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ने लगी थी। हालांकि सवर्ण समाज का नजरिया अब भी नकारात्मक था। उन्हें यह डर नहीं था कि दलित और शूद्र पढ़-लिख गए तो उनके पेशों को कौन करेगा। असली डर यह था कि पढ़े-लिखे दलित-शूद्र उनके जातीय वर्चस्व को भी चुनौती देंगे। उन विशेषाधिकारों को चुनौती देंगे जिनके बल पर वे शताब्दियों से सत्ता-सुख भोगते आए हैं। इसलिए दलितों और पिछड़ों की शिक्षा से दूर रखने के लिए वह हरसंभव प्रयास करते थे। ऐसे चुनौतीपूर्ण परिवेश में ललई सिंह ने 1928 में आठवीं की परीक्षा पास की। उसी दौरान उन्होंने फारेस्ट गार्ड की भर्ती में हिस्सा लिया और चुन लिए गए। वह 1929 का समय था। 1931 में मात्र 20 वर्ष की अवस्था उनका विवाह सरदार सिंह की बेटी दुलारी देवी से हो गया। दुलारी देवी पढ़ी-लिखी महिला थीं। उन्होंने टाइप और शार्टहेंड का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। ललई सिंह को फारेस्ट गार्ड की नौकरी से संतोष न था। सो 1933 में वे सशस्त्र पुलिस कंपनी में कनिष्ठ लिपिक बनकर चले गए। वहां उनकी पहली नियुक्ति भिंड मुरैना में हुई।

कानपुर देहात जहां ललई सिंह का जन्म हुआ था, से लेकर भिंड मुरैना तक का क्षेत्र विद्रोही चेतना के लिए विख्यात रहा है। उसका असर ललई सिंह के व्यक्तित्व पर भी पड़ा। उन दिनों गांव-देहात में पुलिस का रौव था, लेकिन स्वयं पुलिस-कर्मियों को अनेक विपरीत परिस्थितियों में काम करना पड़ता था। उनका वेतन भी मामूली था। जिसे लेकर उनके मन में आक्रोश था। ललई सिंह के रूप में उन्हें ऐसा साथी मिल चुका था, जो जुझारू होने के साथ-साथ ईमानदार भी था। पुलिसकर्मियों की समस्याओं के समाधान के लिए ललई सिंह ने एक संगठन बनाया। उसके माध्यम से वे सहकर्मियों की समस्याओं को लेकर आवाज उठाने लगे। परिणामस्वरूप अधिकारी वर्ग उनसे नाराज रहने लगा। फिर ऐसा अवसर आया जिससे ललई सिंह और उनके साथियों की अधिकारियों से ठन गई।

जहां उनकी कंपनी का ठिकाना था, वहां एक बावड़ी थी। सभी पुलिसकर्मी नहाने-धोने और पीने के पानी के लिए सीढ़ीदार बावड़ी पर निर्भर थे। नहाने-धोने के लिए सीढ़ियों का इस्तेमाल किया जाता। सो बचा हुआ पानी वापस बावड़ी में चला जाता था। वही पानी पीने के काम भी आता था। प्रदूषित पानी शरीर में जाकर अनेक बीमारियां पैदा करता। उसपर कंपनी कमांडर कुटिल प्रवृत्ति का था। पुलिसकर्मियों की बीमारी उसे बहाना लगती। उपचार के लिए अस्पताल भेजने में वह आनाकानी करता था। अपने साथियों को लेकर ललई सिंह उस अमानवीय व्यवस्था के विरोध में डट गए। अधिकारी पहले ही उनसे नाराज थे। सो जायज विरोध को भी अनुशासनहीनता का नाम देकर उन्होंने ललई सिंह को नौकरी से बर्खास्त कर दिया। ललई सिंह गांव-देहात से आए थे। बहुत अधिक पढ़े-लिखे भी न थे। लेकिन अधिकार चेतना उनमें खूब थी। सो यह दिखाते हुए कि आसानी से हार मान लेने वालों में से वे नहीं हैं, बर्खास्तगी के विरोध में उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने वस्तुस्थिति की समीक्षा की। ललई सिंह निर्दोष सिद्ध होकर, नौकरी में वापस आ गए।

ललई सिंह ससम्मान नौकरी पर वापस लौटे थे। मगर उनका मन सशस्त्र पुलिस बल की नौकरी से ऊब चुका था। वे समय निकालकर पढ़ाई करने लगे। इसका उन्हें फायदा भी हुआ। उन्हीं दिनों उन्होंने फौज की परीक्षा दी और उसमें भर्ती हो गए। फौज की नौकरी सशस्त्र पुलिस बल से अच्छी मानी जाती है। माना जाता है कि सरकार भी फौजियों पर पूरा ध्यान देती है। लेकिन अंदरूनी हालत इससे अलग थी। खासकर ललई सिंह जैसे जुझारू व्यक्ति के लिए। फौज में रहते हुए ललई सिंह ने सैनिक जीवन की विसंगतियों को समझा और उनके विरोध में आवाज उठाने लगे। 1946 में उन्होंने ‘नान-गजेटेड पुलिस मुलाजिमान एंड आर्मी संघ’ की स्थापना की तथा उसके अध्यक्ष चुन लिए गए।

एक और नौकरी की चुनौतियां और संघर्ष थे, दूसरी ओर व्यक्तिगत जीवन की त्रासदियां। ललई सिंह का पारिवारिक जीवन बहुत कष्टमय था। उनकी पत्नी जो उन्हें कदम-कदम पर प्रोत्साहित करती थीं, वे 1939 में ही चल बसी थीं। परिजनों ने उनपर दूसरे विवाह के लिए दबाव डाला, जिसके लिए वे कतई तैयार न थे। सात वर्ष पश्चात 1946 में उनकी एकमात्र संतान, उनकी बेटी शकुंतला का मात्र 11 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया। कोई दूसरा होता तो कभी का टूट जाता। परंतु समय मानो बड़े संघर्ष के लिए उन्हें तैयार कर रहा था। निजी जीवन दुख-दर्द उन्हें समाज में व्याप्त दुख-दर्द से जोड़ रहे थे। उसी वर्ष उन्होंने ‘सिपाही की तबाही’ पुस्तक की रचना की। इस पुस्तक की प्रेरणा उन्हें लाला हरदयाल की पुस्तक ‘सोल्जर आफ दि वार’ से मिली थी। ‘सिपाही की तबाही’ छपी न सकी। भला कौन प्रकाशक ऐसी पुस्तक छापने को तैयार होता! सो ललई सिंह ने टाइप कराकर उसकी प्रतियां अपने साथियों में बंटवा दीं। पुस्तक लोक-सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाले सिपाहियों के जीवन की त्रासदी पर आधारित थी। परोक्षरूप में वह व्यवस्था के नंगे सच पर कटाक्ष करती थी। पुस्तक में सिपाही और उसकी पत्नी के बीच बातचीत के माध्यम से घर की तंगहाली को दर्शाया गया था। पुस्तक का समापन करते हुए उन्होंने लिखा था—

‘वास्तव में पादरियों, मुल्ला-मौलवियों-पुरोहितों की अनदेखी कल्पना, स्वर्ग तथा नर्क नाम की बात बिल्कुल झूठ है। यह है आंखों देखी हुई, सब पर बीती हुई सच्ची नरक की व्यवस्था सिपाही के घर की। इस नर्क की व्यवस्था का कारण है—सिंधिया गवर्नमेंट की बदइंतजामी। अतः इसे प्रत्येक दशा में पलटना है, समाप्त करना है। ‘जनता पर जनता का शासन हो’, तब अपनी सब मांगें मन्जूर होंगी।’

पुस्तक में आजादी और लोकतंत्र दोनों की मांग ध्वनित थी। पुस्तक के सामने आते ही पुलिस विभाग में खलबली मच गई। सैन्य अधिकरियों को पता चला तो पुस्तक की प्रतियां तत्काल जब्त करने का आदेश जारी कर दिया। उस घटना के बाद ललई सिंह अपने साथियों के ‘हीरो’ बन गए। मार्च 1947 में जब आजादी कुछ ही महीने दूर थी, उन्होंने अपने साथियों को संगठित करके ‘‘नान-गजेटेड पुलिस मुलाजिमान एंड आर्मी संघ’ के बैनर तले हड़ताल करा दी। सरकार ने ‘सैनिक विद्रोह’ का मामला दर्ज कर, भारतीय दंड संहिता की धारा 131 के अंतर्गत मुकदमा दायर कर दिया। ललई सिंह को पांच वर्ष के सश्रम कारावास तथा 5 रुपये का अर्थदंड सुना दिया। वे जेल में चले गए। इस बीच देश आजाद हुआ। अन्य रजबाड़ों की तरह ग्वालियर स्टेट भी भारत गणराज्य का हिस्सा बन गया। 12 जनवरी को 1948 को लगभग 9 महीने की सजा काटने के बाद, ललई सिंह को कारावास से मुक्ति मिली। वे वापस सेना में चले गए। 1950 में सेना से सेवानिवृत्त होने के पश्चात उन्होंने अपने पैत्रिक गांव झींझक को स्थायी ठिकाना बना लिया। वैचारिक संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए वहीं उन्होंने ‘अशोक पुस्तकालय’ नामक संस्था गठित की। साथ ही ‘सस्ता प्रेस’ के नाम से प्रिंटिंग पे्रस भी आरंभ किया।

कारावास में बिताए नौ महीने ललई सिंह के नए व्यक्तित्व के निर्माण के थे। जेल में रहते हुए उन्होंने प्राचीन भारतीय ग्रंथों का अध्ययन किया। धीरे-धीरे हिंदू धर्म की कमजोरियां और ब्राह्मणवाद के षड्यंत्र सामने आने लगे। जिन दिनों उनका जन्म हुआ था, भारतीय जनता आजादी की कीमत समझने लगी थी। होश संभाला तो आजादी के आंदोलन को दो हिस्सों में बंटे पाया। पहली श्रेणी में अंग्रेजों को जल्दी से जल्दी बाहर का रास्ता दिखा देने वाले नेता थे। उन्हें लगता था वे राज करने में समर्थ हैं। उनमें से अधिकांश नेता उन वर्गों से थे जिनके पूर्वज इस देश में शताब्दियों से राज करते आए थे। लेकिन आपसी फूट, विलासिता और व्यक्तिगत ऐंठ के कारण वे पहले मुगलों और बाद में अंग्रेजों के हाथों सत्ता गंवा चुके थे। देश की आजादी से ज्यादा उनकी चाहत सत्ता में हिस्सेदारी की थी। वह चाहे अंग्रेजों के रहते मिले या उनके चले जाने के बाद। 1930 तक उनकी मांग ‘स्वराज’ की थी। ‘राज’ अपना होना चाहिए, ‘राज्य’ इंग्लेंड की महारानी का भले ही रहे। स्वयं गांधी जी ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ का शीर्षक पहले ‘हिंद स्वराज्य’ रखा था। बाद में उसे संशोधित कर, अंग्रेजी संस्करण में ‘हिंद स्वराज’ कर दिया था। ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’—नारे के माध्यम से तिलक की मांग भी यही थी। 1930, विशेषकर भगत सिंह की शहादत के बाद जब उन्हें पता चला कि जनता ‘स्वराज’ नहीं, ‘स्वराज्य’ चाहती है, तब उन्होंने अपनी मांग में संशोधन किया था। आगे चलकर जब उन्हें लगा कि औपनिवेशिक सत्ता के बस गिने-चुने दिन बाकी हैं, तो उन्होंने खुद को सत्ता दावेदार बताकर, संघर्ष को आजादी की लड़ाई का नाम दे दिया। अब वे चाहते थे कि अंग्रेज उनके हाथों में सत्ता सौंपकर जल्दी से जल्दी इस देश से चले जाएं।

दूसरी श्रेणी में वे नेता थे, जो सामाजिक आजादी को राजनीतिक आजादी से अधिक महत्त्व देते थे। मानते थे कि बिना सामाजिक स्वाधीनता के राजनीतिक स्वतंत्रता अर्थहीन है। कि राजनीतिक स्वतंत्रता से उन्हें कुछ हासिल होने वाला नहीं है। उनकी दासता और उसके कारण हजारों साल पुराने हैं। नई शिक्षा ने उनके भीतर स्वाभिमान की भावना जाग्रत की थी। उनकी लड़ाई अंग्रेजों से कम, अपने देश के नेताओं से अधिक थी। वे सामाजिक और राजनीतिक मोर्चे पर साथ-साथ जूझ रहे थे। महामना फुले, संतराम बी.ए., अय्यंकालि, डाॅ. आंबेडकर, पेरियार जैसे नेता इसी श्रेणी में आते हैं। स्वयं ललई सिंह इस श्रेणी से थे और जिस परिवेश से जूझते हुए वे निकले थे, उसमें अपना मोर्चा चुन लेना कोई मुश्किल बात न थी। भविष्य के संघर्ष की रूपरेखा क्या हो, इस बारे में वे सोच ही रहे थे कि 1953 में उनके पिता का भी निधन हो गया। ललई सिंह के लिए यह बड़ा आघात था। पिता उनके लिए प्रेरणाशक्ति थे। अपने अधिकारों के संघर्ष के संस्कार पिता की ही देन थे। एक-एक कर उनके सभी परिजन जा चुके थे। परिवार के नाम पर अब वे स्वयं थे, दूसरी ओर था पूरा देश। खासकर धार्मिक और जातीय बंधनों से आहत समाज। उनके अलावा चारों ओर पसरी चुनौतियां थीं। एक बड़ा कार्यक्षेत्र उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।

विद्रोही चेतना का विस्तार

धर्मग्रंथों के निरंतर अध्ययन द्वारा उन्हें पता चला कि हिंदू धर्म असल में राजनीतिक षड्ंयत्र है। ब्राह्मण-पुरोहित उसके नीतिकार हैं। क्षत्रिय अपनी ताकत से लोगों को डराने-दबाने का काम करते हैं; और निहित स्वार्थ के लिए वैश्य इस व्यवस्था का आर्थिक पोषण करते हैं। भाग्य-कर्मफल, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य, छूत-अछूत में उलझे बहुजन इसे समझ ही नहीं पाते हैं। धर्मग्रंथों में ब्राह्मणों के अनर्गल बखान से ललई सिंह को इस षड्यंत्र की तह तक जाने में मदद मिली थी। वे समझ चुके थे कि हिंदू धर्म तथा उसके ग्रंथ सवर्णों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के औजार हैं। जेल में रहते हुए उन्होंने डाॅ. आंबेडकर के भाषणों को सुना था, जिन्होंने हिंदू धर्म को धर्म मानने से ही इन्कार कर दिया था। आंबेडकर स्वयं हिंदू धर्म तथा उसके ग्रंथों को राजनीति मानते थे। कांग्रेसी नेताओं के व्यवहार से यह सिद्ध भी हो रहा था। 1930 के आसपास दलितों और पिछड़ी जातियांें में राजनीतिक चेतना का संचार हुआ था। ‘त्रिवेणी संघ’ जैसे संगठन उसी का सुफल थे। उसकी काट के लिए कांग्रेस ने पार्टी में पिछड़ों के लिए अलग प्रकोष्ठ बना दिया था। उसका मुख्य उद्देश्य था, किसी न किसी बहाने पिछड़ों को उलझाए रखकर उनके वोट बैंक को कब्जाए रखना।

दूसरा कारण पिछड़ी जातियों में शिक्षा का बढ़ता स्तर तथा उसके फलस्वरूप उभरती बौद्धिक चेतना थी। उससे पहले पंडित अपने प्रत्येक स्वार्थ को ‘शास्त्रोक्त’ बताकर थोप दिया करते थे। बदले समय में बहुजन उन ग्रंथों को सीधे पढ़कर निष्कर्ष निकाल सकते थे। इसलिए महाकाव्य और पौराणिक कृतियां जिनका प्रयोग ब्राह्मणादि अल्पजन बहुजनों को फुसलाने के लिए करते थे, जिनमें बहुजनों के प्रति अन्याय और अपमान के किस्से भरे पड़े थे—वे अनायास ही आलोचना के केंद्र में आ गईं। हमें याद रखना चाहिए कि उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा आदि राज्यों में निर्णायक राजनीतिक शक्ति बन चुके यादवों को क्षत्रिय मानने पर ब्राह्मणादि अल्पजन आज भले ही मौन हों, मगर उससे पहले वे उनकी निगाह ‘क्षुद्र’ यानी शूद्र ही थे। महाभारत जिसमें कृष्ण को अवतार के रूप में प्रस्तुत किया गया है, उसमें भी ऐसे अनेक प्रसंग हैं जब कृष्ण का उसकी जाति के आधार पर मखौल उड़ाया जाता है। डी. आर. भंडारकर यादवों को भारतीय वर्ण-व्यवस्था से बाहर का गण-समूह यानी पंचम वर्ण का मानते हैं।

महाभारत और ऋग्वेद यदुओं को सरस्वती तट का रहने वाला बताते हैं। लेकिन रामायण जो हिंदुओं का सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, में यदुओं का महासागर से पानी पीना भी अपराध मान लिया गया है। याद कीजिए लंका पर चढ़ाई करते समय राम समुद्र से रास्ता मांगता है। समुद्र के प्रसन्न न होने पर वह धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा लेता है। घबराया हुआ समुद्र उपस्थित होकर रास्ता देने को तैयार हो जाता है। वह राम से वाण को तूणीर में वापस रखने की प्रार्थना करता है। अब राम तो राम है, एक बार प्रत्यंचा चढ़ा वाण नीचे कैसे उतारे। सो समुद्री जीव-जंतुओं को बचाने के लिए वह समुद्र से ही रास्ता पूछता है। समुद्र जो उत्तर देता है, उससे लगता है कि यह पूरा प्रसंग बस इसी के निमित्त गढ़ा गया है—

उत्तरेणावकाशोऽस्ति कश्चित पुण्यतरो मम,

द्रुमकुल्य इति ख्यातो लोके ख्यातो यथा भवान

उग्रदर्शन कर्मणो बहवस्तत्र दस्यवः

आभीर प्रमुखाः पापाः पिबन्ति सलिलं मम

तैन तत्स्पर्शनं पापं सहेयं पापकर्मभिः

अमोधः क्रियतां राम अयं तत्र शरोत्तमः(रामायण, युद्धकांड, 22वां सर्ग)

”प्रभो! जैसे आप सर्वत्र विख्यात एवं पुण्यात्मा हैं, उसी प्रकार मेरे उत्तर की ओर ‘द्रुमकुल्य’ नाम से विख्यात एक बड़ा ही पवित्र देश है। वहाँ आभीर (अहीर, यादव) आदि जातियों के अनेकानेक मनुष्य निवास करते हैं। उनके रूप और रंग बड़े ही भयानक हैं। वे सब के सब पापी और लुटेरे हैं। वे लोग मेरा जल पीते हैं। उन पापचारियों का स्पर्श मुझे प्राप्त होता रहता है, इस पाप को मै नहीं सह सकता। हे, राम! आप अपने इस उत्तम बाण को वहीं सफल कीजिए।’

गोया रामायणकार को ‘राक्षस’ रावण से पहले यदुओं को ठिकाने लगा देने की जल्दी थी। राम का जैसा चरित्र गढ़ा है, उसके हिसाब से वह ऐसी सलाह को टाल ही नहीं सकता था। ‘महात्मा’ समुद्र की सलाह मानकर वह उसी दिशा में शर-संधान कर यदुओं सहित बाकी गणों का सफाया कर देता है। यदुओं के प्रति तत्कालीन समाज की नफरत को तुलसीदास ज्यों का त्यों आगे बढ़ा देते हैं। उनके अनुसार—‘आभीर, यवन, किरात, खस, स्वपचादि अति अधरूपजे’। अहीर, यवन(मुस्लिम), किरात, खस, स्वपच आदि जातियां अत्यंत अधम हैं। यदुओं के विनाश की कहानी को महाभारत में भी बढ़ाया गया है। परंतु थोड़े भिन्न तरीके से। ‘सभा-पर्व’ में यदुओं को सरस्वती नदी के तट बसने वाला बताया गया है।1 कृष्ण को भगवान का दर्जा प्राप्त है। मगर क्षत्रीय जैसे राम की वंश-परंपरा से जोड़ने को आजाद हैं, उस तरह की दावेदारी स्वयं को कृष्ण का वंशज बताकर यादव न करे—इसके लिए गांधारी के शाप को बहाना बनाया जाता है। उसके अनुसार सारे यदुवंशी अंतर्कलह से आपस में लड़-झगड़कर मर जाते हैं। आशय है कि यादवों की बढ़ी राजनीतिक शक्ति से भय खाकर ब्राह्मणों ने ‘कृष्ण’ को अवतार का दर्जा तो दिया, लेकिन उनके वंशजों को एक-दूसरे से लड़वाकर मरवा दिया। पहले ये प्रसंग या तो धर्म ग्रंथों में दबे-छिपे रह जाते थे, या ब्राह्मणों की व्याख्या में कुछ का कुछ बना दिए जाते थे, नई शिक्षा और ज्ञान की रोशनी में उनके वास्तविक पाठ सबके सामने थे। उन्हें पढ़कर यदु-वंशजों में आक्रोश उभरना तय था।

‘त्रिवेणी संघ’ की सिद्धांत पुस्तिका ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ का प्रकाशन 1940 में हो चुका था, उसके लेखक थे—यदुनंदन प्रसाद मेहता संघ में यादव जाति का प्रतिनिधित्व करते थे।। धर्म के नाम पर हो रहे आडंबरों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने उसमें लिखा था—

‘‘धार्मिक मंदिरों और मठों के बाहर साइन-बोर्ड टँगा हुआ है कि ‘जाति पाँति पूछै नहीं कोई, हरि के भजे से हरि का होई।’ लेकिन भीतर जाकर देखिए कि कैसी-कैसी करामातें हो रही हैं। पुजारी कौन हो सकता है? जो उसमें जाति का ब्राह्मण हो। चाहे वह नया हो, साधु या कम ही पढ़ा-लिखा क्यों न हो।भंडारी कौन हो सकता है? जो उसमें जाति का ब्राह्मण हो। चाहे उसे पाचन-कर्म का ज्ञान भले ही न हो। अमुक साधु अमुक जाति का है, इसलिए उसे अमुक काम दिया जाए। ब्राह्मण साधु दूसरी जाति के साधु का बनाया हुआ नहीं खा सकता। क्या यहां धर्म की ओट में धर्म का शिकार नहीं किया जाता? तो, त्रिवेणी संघ ऐसी धार्मिक धांधलियों, लूटों, अन्यायों, अत्याचारों, अंधेरों और स्वार्थों का अंत सदा के लिए कर देना चाहता है और उनके स्थान पर, धर्म का सच्चा रूप बताकर जनता को उजाले में ले जाना चाहता है।’’

यही चीजें ललई सिंह का मानस निर्माण कर रही थीं। देश को आजादी मिल चुकी थी, मगर जिस स्वाधीनता की कामना आजादी के साथ की गई थी, वे सपना ही थीं। विशेषरूप से सामाजिक आजादी का सपना। ललई सिंह समझ चुके थे कि यहां से आगे का रास्ता संघर्ष का है, जो उन्हें स्वयं तय करना है। वे ‘रिपब्लिक पार्टी आफ इंडिया’ के सदस्य बन गए। उनकी आवाज कड़क थी। एक सैनिक का जोश उसमें भरा होता था। बिहार में बाबू जगदेव प्रसाद कुशवाहा त्रिवेणी संघ के आंदोलन को आगे बढ़ाने में जुटे थे तो उत्तर प्रदेश में रामस्वरूप शर्मा ने ‘समाज दल’ की स्थापना कर, यथास्थितिवादी राजनीतिक दलों के विरुद्ध एक और मोर्चा खोल दिया था। उधर रिपब्लिकन पार्टी डाॅ. आंबेडकर के बाद बिखरने लगी थी। ललई सिंह उसे छोड़ रामस्वरूप वर्मा के साथ जुड़ गए। बाद में जगदेव प्रसाद कुशवाहा के ‘शोषित दल’ और रामस्वरूप वर्मा के ‘समाज दल’ का एकीकरण हुआ तो उनके लिए लड़ाई और भी आसान हो गई। वे इन दलों के सम्मिलन से बने ‘शोषित समाज दल’; तथा वैकल्पिक राजनीति के प्रचार में जी-जान से जुट गए। उन दिनांे ई। वी। रामासामी पेरियार अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए देश-विदेश की यात्राएं कर रहे थे। इसी सिलसिले में जब वे उत्तर प्रदेश आए तो संभवतः 1967 में, ललई सिंह का उनसे संपर्क हुआ। पहली मुलाकात में ही ललई सिंह उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हो गए। रामस्वरूप वर्मा ने 1 जून 1968 को ‘अर्जक संघ’ की स्थापना की। ललई सिंह उसके साथ भी प्राण-प्रण से जुड़ गए।   

पेरियार से पहली मुलाकात के समय ही ललई सिंह ने उनकी पुस्तक ‘रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ को हिंदी में प्रकाशित करने का मन बना लिया था। इसके लिए उन्होंने पेरियार से चर्चा की। पेरियार उन उस पुस्तक के हिंदी अनुवाद की अनुमति चंद्रप्रकाश जिज्ञासु को दे चुके थे। कुछ ही महीने बाद जुलाई 1968 में ललई सिंह को ‘रामायण: ए ट्रू रीडिंग’ का हिंदी संस्करण प्रकाशित करने की लेखकीय सहमति प्राप्त हो गई।

सहमति मिलना अलग बात थी। पुस्तक प्रकाशित होकर बाजार में आना दूसरी बात। कोई भी प्रकाशक हिंदी अनुवाद छापने को तैयार न था। ललई सिंह हार मानने वालों में से न थे। उन्होंने पुस्तक को अपनी ‘अशोक पुस्तकालय’ नामक संस्था से प्रकाशित करने का फैसला कर लिया। आगे चलकर यही संस्था ‘सच्ची रामायण’ सहित उनकी दूसरी पुस्तकों की प्रथम प्रकाशक बनी। ‘सच्ची रामायण’ का हिंदी अनुवाद राम अधार ने किया था। पुस्तक का पहला संस्करण जुलाई 1969 में आया। उसके आने के साथ ही हिंदी जगत में तहलका मच गया। पुस्तक को हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत करने वाली बताकर, उसके विरोध में प्रदर्शन होने लगे। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी बिना देर किए, 8 दिसंबर 1969 को पुस्तक पर प्रतिबंध की घोषणा कर, प्रकाशित प्रतियों को अपने कब्जे में लेने का आदेश सुना दिया। सरकार का मानना था कि पुस्तक समुदाय विशेष की धार्मिक भावनाओं का अपमान करती है। इससे समाज में शांति-भंग खतरा है। यह भी कहा गया कि पुस्तक जानबूझकर समाज में अशांति फैलाने के ध्येय से लिखी गई है। प्रतिबंध केवल हिंदी संस्करण को लेकर था। अंग्रेजी संस्करण ‘रामायण : दि ट्रू रीडिंग’ के तमिल और अंग्रेजी संस्करण उन दिनों भी धड़ल्ले से बिक रहे थे।    

ललई सिंह सरकार के निर्णय से आहत थे। उन्हें लगा कि भारतीय समाज आज भी लोकतांत्रिक भावना से दूर है। उन्होंने प्रदेश सरकार के विरुद्ध अदालत में अपील कर दी। लेकिन मन हिंदू धर्म से खट्टा हो चुका था। वैसे भी ईश्वर, धर्म, आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नर्क आदि में विश्वास वे पेरियार के संपर्क में आने से पहले ही खो चुके थे। अब उनका इरादा हिंदू धर्म को हमेशा के लिए छोड़ देने का था। इसके लिए उन्होंने विभिन्न धर्मों का अध्ययन करना आरंभ कर दिया। यहां डाॅ. आंबेडकर उनके प्रेरणा-पुरुष बने। बौद्ध धर्म उन्हें अपनी कसौटी पर खरा लगा। जैसे-जैसे उनका अध्ययन बढ़ रहा था, वैसे-वैसे ब्राह्मण धर्म के षड्यंत्र भी खुलकर सामने आ रहे थे। उन्हें यह लगा कि जातियां हिंदू समाज को बांटने का काम करती हैं। अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए ही ब्राह्मणों ने हजारों जातियों की रचना की है। यहां तक कि शोषितों के भी दो वर्ग बना दिए हैं। पहली श्रेणी में वे हैं जिन्हें स्पर्श करने से कोई अपवाद नहीं होता। दूसरी श्रेणी में वे हैं जिनकी छाया भी सवर्णों को अपवित्र कर देती है। ये चीजें जहां ललई सिंह को आहत करती थीं, वहीं संघर्ष में लगातार बने रहने की प्रेरणा भी देती थीं।

पुस्तक जब्ती के सरकारी आदेश के विरुद्ध उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी। मामले की सुनवाई के लिए तीन सदस्यों की बैंच बनाई गई। ‘सच्ची रामायण’ का मामला अभी न्यायालय में विचारधीन ही था कि सरकार ने 1970 में ललई सिंह की पुस्तकों ‘सच्ची रामायण की चाबी’ और ‘सम्मान के लिए धर्म-परिवर्तन करें’ की जब्ती के आदेश जारी कर दिए। ‘सच्ची रामायण’ में पेरियार ने अपने तर्क तो प्रस्तुत किए थे, परंतु उनके संदर्भ वे नहीं दे पाए थे। ‘सच्ची रामायण की चाबी’ में ललई सिंह ने ‘सच्ची रामायण’ के तर्कों को पुख्ता बनाने वाले संदर्भ दिए थे। दूसरी पुस्तक डाॅ. आंबेडकर के भाषणों पर आधारित थी। इस जब्ती के मात्र छह महीनों के पश्चात 12 सितंबर 1970 को सरकार ने डाॅ. आंबेडकर की अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘जातिभेद का उच्छेद’ को भी प्रतिबंधित घोषित कर दिया गया। यह सरकार का तानाशाही-भरा आचरण था जो हर विरोधी विचारधारा को दबा देना चाहता था। रामस्वरूप वर्मा के प्रोत्साहन पर ललई सिंह ने डाॅ. आंबेडकर की पुस्तकों की जब्ती के आदेश के विरुद्ध अदालत में मुकदमा दायर कर दिया। परिणाम अनुकूल ही निकला। न्यायमूर्ति ए. कीर्ति ने 19 जनवरी 1971 को ‘सच्ची रामायण’ पर जब्ती के आदेश को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मानते हुए रद्द कर दिया। फैसले में उन्होंने सरकार को निर्देश दिया था कि वह जब्त की गई पुस्तक को लौटाकर प्रकाशक को 300 रुपए का हर्जाना दे। सरकार भी ललई सिंह के पीछे पड़ी थी। उसने ललई सिंह की पुस्तक ‘आर्यों का नैतिक पोल प्रकाश’ के विरुद्ध मुकदमा दायर कर दिया। यह मुकदमा उनकी मृत्युपर्यंत अदालत में बना रहा।

ललई सिंह इन दबावों के आगे झुकने वाले न थे। बल्कि इन दबावों से उन्हें और अधिक लिखने की प्रेरणा मिलती थी। इस बीच उन्होंने पांच नाटकों की रचना की थी, उनमें अंगुलीमाल, शंबूक वध, संत माया बलिदान, एकलव्य शामिल थे। संत माया बलिदान का प्रथम लेखन स्वामी अछूतानंद ने किया था। लेकिन वह नाटक अनुपलब्ध था। ललई सिंह ने उसका पुनर्लेखन किया था। वे रामस्वरूप वर्मा और जगदेव प्रसाद सिंह कुशवाहा के साथ वंचना एवं षोषण के षिकार हर व्यक्ति के साथ थे। नाटकों के अलावा उन्होंने ‘शोषितों पर धार्मिक डकैती’, ‘शोषितों पर राजनीतिक डकैती’, तथा ‘सामाजिक विषमता कैसे समाप्त हो?’ जैसी पुस्तकों की रचना भी की। उनकी सभी पुस्तकें ब्राह्मणवादी वर्चस्व के विरुद्ध शंखनाद करने वाली थीं। साधारण प्रकाशक उनकी पुस्तकें छापने को तैयार न थे। इसलिए उन्होंने एक के बाद एक तीन प्रेस खरीदे। पुस्तकें छापने और उन्हें बांटने में उनकी काफी जमा रकम निकल गई। यह सोचकर कि मोटी पुस्तकों को खरीदना आम आदमी के लिए आसान नहीं है, उन्होंने छोटी प्रचारनुमा पुस्तकें लिखने को प्राथमिकता दी। वैसे भी उनका उद्देष्य अपने विचारों को अधिकतम लोगों तक पहुंचाना था। यदि ब्राह्मण बीस से चौबीस पृष्ठों की पोथी को पढ़कर ‘पंडित’ कहला सकता है और लोगों को मूर्ख बना सकता है, तो उतने ही आकार की पुस्तकों से लोगों में चेतना का संचार भी संभव है। इसलिए अपने विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने छोटी पुस्तकों को प्राथमिकता दी।

‘सच्ची रामायण’ पर लगे प्रतिबंधों के विरुद्ध वे उच्च न्यायालय में मुकदमा जीत चुके थे। लेकिन उनके विरोधी षांत नहीं थे। उनके दबाव में सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपील कर दी। वहां मामला वरिष्ठ जजों की पीठ के सम्मुख पहुंचा। कोर्ट ने गंभीरतापूर्वक मामले की सुनवाई की। न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को केंद्र में रखकर निर्णय सुनाया, जो ललई सिंह के पक्ष में था। यही नहीं, ‘जातिवाद का उच्छेद’ तथा ‘सम्मान के लिए धर्म-परिवर्तन करें’ को भी न्यायालय ने प्रतिबंध से मुक्त कर दिया। अदालत के सामने पहुंचे इन मामलों में जीत ललई सिंह की हुई थी। लेकिन जिस तरह प्रतिक्रियावादी षक्तियां उनके पीछे पड़ी थीं, उससे हिंदू धर्म की ओर से उनका मोह-भंग होना स्वाभाविक था। डाॅ. आंबेडकर 1935 में ही हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा कर चुके थे। धर्मांतरण का कार्यक्रम बना 14 अक्टूबर, 1956 को। ललई सिंह अपने प्रेरणा पुरुष के साथ ही धर्मांतरण करना चाहते थे। लेकिन अचानक खून की उल्टी होने के कारण उन्हें अपना फैसला रोकना पड़ा। उन्होंने घोषणा की कि जिन महास्थिविर से डाॅ. आंबेडकर से दीक्षा ली थी, उन्हीं से वे भी दीक्षा ग्रहण करेंगे। इससे मामला थोड़े दिन टला। आखिरकार 21 जुलाई 1967 को उन्होंने महास्थविर चंद्रमणि के मार्गदर्शन में बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली।

उस समय वे बहुत आह्लादित थे। धर्मांतरण के बाद दिए गए अपने संक्षिप्त भाषण में उन्होंने न केवल स्वयं को बौद्ध माना था, अपितु अपने नाम के साथ जुड़ा जातिसूचक षब्द छोड़ने का ऐलान भी किया था। उनका कहना था, ‘आज से मैं मनुष्य हूं, मानवतावादी हूं, आज से मैं सिर्फ ललई हूं।’ किसी भी प्रकार के जातीय आग्रहों, मान्यताओं से संपूर्ण मुक्ति का ऐलान करते हुए उन्होंने भविष्य में कभी जातिसूचक शब्द या सामंती शब्दावली का प्रयोग न करने का ऐलान किया था। जुझारूपन उन्हें पिता से विरासत में प्राप्त हुआ था। रामस्वरूप वर्मा ने अपने संस्मरण में एक घटना का उल्लेख किया है—

‘वह हमारे चुनाव प्रचार में भूखे-प्यासे एक स्थान से दूसरे स्थान भागते। बोलने में कोई कसर नहीं रखते थे। उनके जैसा निर्भीक भी मैंने दूसरा नहीं देखा। एक बार चुनाव प्रचार से लौटे पैरियर ललई सिंह जी को मेरे साथी ट्रैक्टर ट्राली से लिए जा रहे थे। जैसे ही खटकर गाँव के समीप से ट्रैक्टर निकला, उन पर गोली चला दी गई। संकट का आभास पाते ही वह कुछ झुक गए, गोली कान के पास से निकल गई। लोगों ने गाँव में चलकर रुकने का दबाव डाला। किन्तु वह नहीं माने। निर्भीकता से उन्होंने कहा, ‘चलो जी, यह तो कट्टेबाजी है, मैंने तो तोपों की गड़गड़ाहट में रोटियां सेकीं हैं।’

24 दिसंबर 1973 को पेरियार का निधन हुआ। उनकी स्मृति में बड़ी सभा का आयोजन 30 दिसंबर 1974 को किया गया। उसमें विश्व-भर के बुद्धिजीवी, चिंतक और राजनेता पधारे हुए थे। ललई सिंह भी उसमें पहुंचे। उन्हें बोलने के लिए आमंत्रित किया गया तो ब्राह्मणवाद सहित हिंदू मिथों पर वैसा ही हमला किया जैसा पेरियार किया करते थे। अंतर केवल इतना था कि पेरियार नास्तिक थे और मनुष्य के लिए किसी भी धर्म को अनावश्यक मानते थे। जबकि डाॅ. आंबेडकर के प्रभाव में आकर ललई सिंह बौद्ध धर्म में शामिल हो चुके थे। अपने भाषण में ललई सिंह ने बौद्ध धर्म का ही पक्ष लिया। बौद्ध धर्म को श्रेष्ठतम बताते हुए उन्होंने कहा कि वह तर्क और मनुष्यता का समर्थन करता है। किसी भी प्रकार के आडंबरवाद के लिए बौद्ध धर्म में कोई गुंजाइश नहीं है। हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म की तुलना करते हुए उन्होंने पहले को ‘उधार का धर्म’ और दूसरे को ‘नकद का धर्म’ बताया। अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहा कि बौद्ध धर्म मनुष्य को जन्म-मरण के चक्कर में नहीं उलझाता। उसमें मनुष्य जो भलाई करता है, उसका परिणाम इसी जन्म में स्वयं उसके आगे आता है, यानी—‘जा हाथ देब और वा हाथ लेव।’ जबकि हिंदू धर्म भलाई इस जन्म में करो, उसका फल अगले जन्म में प्राप्त होगा—कहकर लोगों को भरमाता रहता है।

वे स्पष्ट और निर्भीक वक्ता थे। घुमा-फिराकर बात करना उन्हें आता ही नहीं था। एक बार वे आगरा में एक सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे थे। मंच पर बौद्ध आचार्यों सहित अनेक विद्वान और कार्यकर्ता मौजूद थे। ललई सिंह के बोलने का नंबर आया तो उन्होंने मंचासीन लोगों पर कटाक्ष करते हुए कहा—‘मेरे पास जो लोग मंच पर बैठे हैं एवं जो लोग सामने बैठे हैं वह सब सहायताइष्ट, वजीफाइष्ट और रिजर्वेशनाइष्ट हैं, आप में से कोई भी बौद्धिष्ट व अम्बेडकराइष्ट नहीं है।’ इसपर कुछ मंचासीन हस्तियों ने आपत्ति की तो उन्होंने उत्तर दिया—‘जब तक आप बौद्धों में रोटी-बेटी का संबंध नहीं बनाएंगे, हिंदू रीति-रिवाजों और त्योहारों को मनाना नहीं छोड़ेंगे—तब तक तक आपका बौद्ध होना सिर्फ ढोंग ही रहेगा।’ उस बैठक के बाद ही उन्हें पेरियार की उपाधि मिली, जो स्वयं ललई सिंह के लिए गर्व की बात थी।

ललई सिंह सच्चे मानवतावादी थे। आस्था से अधिक महत्त्व वे तर्क को देते थे। सच्ची रामायण के प्रकाशन के पीछे उनका उद्देश्य हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को खारिज करना न होकर, मिथों की दुनिया से बाहर निकलकर जीवन-जगत के बारे तर्क संगत ढंग से सोचने और उसके बाद फैसला करने के लिए प्रेरित करना था। वे जाति-भेद और छूआछूत के विरुद्ध आजीवन संघर्षरत रहे। उनका एक ही ध्येय था, समाज को धार्मिक आंडबरों और जातिवाद जैसी रूढ़ियों से मुक्ति दिलाना। जीवन के अंतिम दिनों में वे आंखों की असाध्य बीमारी का शिकार था। अंततः सामाजिक क्रांति का वह अनन्य सेनानी, अनथक योद्धा 7 फरवरी 1993 को संघर्ष की लंबी विरासत छोड़कर हमारे बीच से उठ गया। गांव में लोग उन्हें ‘दीवानजी’ कहा करते थे। उनके संघर्ष के साक्षी रहे लोग आज भी उन्हें उसी मान-सम्मान और गर्व के साथ याद करते हैं।  

ओमप्रकाश कश्यप

1। गणानुत्सवसङ्केतान्वयजयत्पुरुषर्षभः

संदर्भ:

सिंधूकूलाश्रिता ये च ग्रामणेया महाबलाः

शूद्राभीरगणाश्चैव ये चाश्रित्य सरस्वतीम्

वर्तयंति चे ये मत्स्यैर्ये च पर्वतवासिन, सभापर्व, अध्याय 29, 8-9, महाभारत, भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट, संपादन: विष्णु एस। सकथांकर

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