गठबंधन की मर्यादा, मर्यादाओं का गठबंधन

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इस बात की उम्मीद बहुत कम लोगों को रही होगी कि विपक्ष भाजपा के विरुद्ध सफल गठबंधन बनाने में कामयाब हो पाएगा। जो थोड़ी-बहुत उम्मीद बनी थी, उसके लिए भी विपक्ष जिम्मेदार था। प्रायः सभी विपक्षी नेता भाजपा को मिलकर हराने का दावा कर रहे थे। एकजुट विपक्ष के लिए यह लक्ष्य बहुत कठिन भी नहीं है। सब जानते हैं कि पिछले चुनावों में भाजपा ने कुल मतदान का लगभग तीस प्रतिशत पाकर धमाकेदार जीत हासिल की थी। उन मतदाताओं का बड़ा प्रतिशत ऐसा है जो भाजपा का कटृटर समर्थक है। इस वर्ग को भाजपा के हिंदू-मुसलमान, मंदिर-मस्जिद, गाय-गोबर, पाकिस्तान-हिंदुस्तान जैसे खेलों से रोमांच हो आता है। चुनाव के दौरान यही वर्ग आंख मूंद कर भाजपा के खेमे की ओर खिंचा चला आता है। इस वर्ग का समर्थन पाने के लिए भाजपा सांप्रदायिकता की फसल उगाती है, प्राचीन भारतीय संस्कृति का गौरव-गान सुनाती है, समय-असमय पाकिस्तान को गालियां देती है। इसमें जो एकदम नई चीज जोड़ी है, वह है सवर्ण गरीबों के नाम पर दस प्रतिशत आरक्षण। आरक्षण की  पुरानी रोस्टर प्रणाली में घालमेल कर, नया रोस्टर लागू करने को भी इसी से जोड़ा जा सकता है। भाजपा को उम्मीद है कि नोटबंदी, बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में असफलता, भीषण व्यापारिक मंदी से जो मतदाता छिटक गए हैं—नए रोस्टर और सवर्ण आरक्षण से उसकी भरपाई आसानी से हो जाएगी। वैसे भी जब हार-जीत एक-दो प्रतिशत मतों के ऐर-फेर पर आ टिके तो छोटे-छोटे प्रलोभन, यहां तक कि जुमले भी कारगर दिखने लगते हैं। भाजपा इस मामले में उस्ताद पार्टी है। 2014 में गुजरात-मॉडल का मिथ खड़ा करना तथा उसके नाम पर उत्तर से दक्षिण तक मतदाताओं के ध्रुवीकरण में सफलता प्राप्त कर लेना, उसके प्रचारतंत्र और चुनावी कौशल का नतीजा था—जो आज भी किसी विपक्षी दल में नजर नहीं आ रहा है। सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण के नाम पर भाजपा ने जो पासा फेंका है, उसकी काट विपक्षी दल अभी तक नहीं सोच पाए हैं। इसे लेकर दलितों और पिछड़ों में जो आक्रोश है, वह उन्हें नजर नहीं आ रहा है। यहां तक कि दलितों और पिछड़ों की राजनीति करने वाले विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और बसपा भी उसका तोड़ नहीं ढूंढ पाए हैं। विरोध करने पर उन्हें अपने सवर्ण मतदाताओं के खिसक जाने का खतरा है, जो पिछले चुनावों में ही उनसे दूर छिटक  चुका है, उसके वापस लौटने संभावना कम से कम 2019 तक तो नहीं है।

भाजपा के प्रतिबद्ध मतदाताओं का बड़ा हिस्सा अगड़ी जातियों, बनिया, ब्राह्मण और क्षत्रिय का है। बाकी उन पिछड़ों का जो भाजपा के हिंदुस्तान-पाकिस्तान और हिंदू-मुस्लिम खेल में फंसकर दुनिया-बाहर की सोच ही नहीं पाते। यदि प्रतिबद्ध या अंधसमर्थक मतदाताओं की संख्या के अनुपात से देखा जाए तो भाजपा इन दिनों देश का सफलतम दल है। उसके पास, विशेष रूप से उत्तर और मध्य भारत में जिसे हिंदी पट्टी भी कहा जाता है—कुल मतदाताओं का करीब 24-26 प्रतिशत ऐसा है, जो ठोकर खाकर, नुकसान सहकर भी उसके खेमे में बना रहता है। उसमें दो-चार प्रतिशत मतदाता कहीं से छिटककर, नाराज होकर अथवा किसी और कारण से आकर मिल जाएं तो उसके लिए जीत आसान हो जाती है। 2014 में ऐसा ही हुआ था। उन दिनों गुजरात-मॉडल के नाम पर विकास का ऐसा मिथ खड़ा किया गया था, जिसकी काट न तो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी कांग्रेस के पास थी, न ही समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के पास—जिनकी राजनीति जातीय समीकरणों और परंपरागत टोने-टोटकों पर निर्भर थी। विपक्षी दलों की असावधानी या आत्मव्यामोह के कारण ही उनसे नाराज दलित-पिछड़े मतदाताओं का एक हिस्सा भाजपा की झोली में जा गिरा था। बाकी मतदाता कांग्रेस तथा क्षेत्रीय पार्टियों के बीच बंट गए। परिणाम यह हुआ कि कुल पड़े मतों के एक-तिहाई से भी कम वोट पाकर भाजपा बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता पर सवार हो गई। यही नहीं, अप्रत्याशित सफलता से उत्साहित होकर वह कांग्रेस-मुक्त भारत का सपना भी देखने लगी थी। इस भ्रम को बनाने में सहचर पूंजीवाद(क्रोनी कैपीटलिज्म) के बल पर पल रहे मीडिया का बड़ा योगदान था। पांच राज्यों में हुए मतदान के बाद से भाजपा आसमान से जमीन पर आ गिरी है। उसके कांग्रेस-मुक्त भारत के अभियान को झटका लगा है। फिलहाल उसकी चिंता 2019 के लोकसभा चुनाव हैं।

पिछले चुनावों में भाजपा की जीत में बड़ी भूमिका उत्तर प्रदेश और बिहार की थी। इन दोनों राज्यों से उसे 102 लोकसभा सीटें प्राप्त हुई थीं। उत्तर प्रदेश में मत-प्रतिशत के हिसाब से देखा जाए तो मुस्लिम, यादव और कुछ पिछड़ी जातियों को मिलाकर समाजवादी पार्टी दूसरे स्थान पर थी। उन चुनावों में सपा को करीब 22 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। 2009 के चुनावों के मुकाबले उन चुनावों में समाजवादी पार्टी को मात्र 1 प्रतिशत वोटों का नुकसान हुआ था, मगर इस एक प्रतिशत वोटों का खामियाजा उसे 18 लोकसभा सीटों से चुकाना पड़ा था। बसपा को 2009 के मुकाबले 7.8 प्रतिशत मतों का घाटा हुआ था। यह नुकसान इतना बड़ा था कि 19.6 प्रतिशत वोट हासिल करने के बावजूद, उससे पहले 20 सांसदों वाली पार्टी शून्य पर आ गिरी थी। चौथे स्थान पर रही कांग्रेस को उन चुनावों में मात्र 7.5 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे, नुकसान करीब 11 प्रतिशत मतों का हुआ था। परिणामस्वरूप 2009 के चुनावों में 21 लोकसभा सीटों वाली पार्टी को केवल दो सीटों से संतोष करना पड़ा था।

बिहार की बात करें तो भाजपा ने पिछले चुनावों में उससे पहले के चुनावों के मुकाबले 15.47 प्रतिशत अधिक मत प्राप्त कर, 22 लोकसभा सीटें प्राप्त की थीं। इससे उसे 2009 के मुकाबले 10 सीटों का फायदा हुआ था। इस जीत में उसका साथ रामविलास पासवान की ‘लोक जनशक्ति पार्टी’ तथा उपेंद्र कुशवाहा की ‘राष्ट्रीय लोक समता पार्टी’ का साथ और सहयोग मिला था। भाजपा के साथ आने का लाभ इन दलों को भी मिला था। भाजपा के सहयोग से चुनावों में मात्र 6.4 प्रतिशत वोट पाने वाले ‘लोक जनशक्ति पार्टी’ को छह सीटें; तथा उपेंद्र कुशवाहा के दल को मात्र 3 प्रतिशत वोट और 3 लोकसभा सीटें प्राप्त हुई थीं। चुनावों में 8.4 प्रतिशत मत प्राप्त करने वाली कांग्रेस को मात्र 2 प्रतिशत मतों का नुकसान हुआ था। इसके ऐवज में उसे अपनी दोनों लोकसभा सीटें गंवानी पड़ी थीं। सबसे बड़ी त्रासदी लालू यादव के दल के साथ थी। उन चुनावों में राजद को कुल 20.1 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे, जो उससे पिछले चुनावों के मुकाबले 0.8 प्रतिशत अधिक थे। बावजूद इसके उसे चार लोकसभा सीटों का नुकसान हुआ था। बहुजन समाज पार्टी की तरह उनका दल भी लोकसभा में शून्य सांसदों वाला दल बन चुका था।

पिछले कुछ वर्षों से मतों का ध्रुवीकरण हुआ है। प्रत्येक राजनीतिक दल के पास उसके समर्थक मतदाताओं का एक हिस्सा है, जिसे उसका आधार वोट भी कह सकते हैं। वह आसानी से इधर-उधर नहीं होता। अपने इसी प्रतिबद्ध मतदाता समूह के भरोसे राजनीतिक दल चुनावों में मोलभाव करने में सफल होते हैं। बचा हुआ यानी चलायमान वोटर ही वह हिस्सा है, जिसको लुभाने के लिए सरकार और राजनीतिक दल घोषणापत्रों के जरिये तरह-तरह के प्रलोभन देते हैं। सरकारें चुनावों से ठीक पहले नई योजनाओं का ऐलान करती हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार की बात करें तो पिछले चुनावों में चलायमान वोटर के रूप में, असंतुष्ट पिछड़े और अतिपिछड़े मतदाताओं का एक हिस्सा भाजपा के था। इसके अलावा लगभग पूरा सवर्ण मतदाता उसके साथ था। लेकिन नोटबंदी और जीएसटी के बाद व्यापारिक मंदी, सामाजिक अस्थिरता और बढ़ती बेरोजगारी से उसका पार्टी से मोह-भंग हुआ है। 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण द्वारा पार्टी ने इस वर्ग को दुबारा लुभाने की कोशिश की है। वही भाजपा की उम्मीद है। इस बीच राजनीति में राहुल गांधी का बढ़ता प्रभाव, प्रियंका गांधी का कांग्रेस में औपचारिक रूप से शामिल होना सवर्ण मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करेगा, इससे उनके एक हिस्से की कांग्रेस की ओर वापसी तय है। भाजपा द्वारा उठाए गए कदमों से पिछड़ों और दलितों में भी उसके प्रति असंतोष पनपा है। इससे लगता है कि सपा-बसपा अपने पारंपरिक वोट बैंक को अपने साथ रखने में कामयाब होंगे। कुल मिलाकर आगामी चुनावों में भाजपा का मत-प्रतिशत गिरना तय है। सवाल है कि क्या इतने से विपक्ष आगामी चुनावों में अपनी वापसी तय कर सकता है?

2014 के चुनावों में बड़ी दिखने वाली हार-जीत के पीछे मात्र दो-तीन प्रतिशत मतों के अंतरण से समाजवादी पार्टी और बसपा को जो धक्का लगा था, वह इन दोनों दलों के लिए अस्तित्व का सवाल बन चुका है। इस कारण अपने वर्षों पुराने मतभेद भुलाकर सपा-बसपा को एक मंच पर आना पड़ा है। उम्मीद थी कि कांग्रेस भी इस गठबंधन का हिस्सा बनेगी, परंतु कांग्रेसी जनों के अतिउत्साह और सपा-बसपा के नेताओं की अतिमहत्त्वाकांक्षा के कारण, गठबंधन या महागठबंधन की बात अब खटाई में पड़ती दिख रही है। कांग्रेस की ओर से गठबंधन को लेकर तरह-तरह के बयान आ रहे हैं। जनवरी में कांग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश के प्रभारी गुलाम नबी आजाद ने एक बयान देकर संभावना व्यक्त की थी कि कांग्रेस प्रदेश की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। हालांकि उन्होंने यह भी कहा था कि वे गठबंधन में शामिल होना चाहते हैं। अपने कार्यकर्ताओं पर बात डालते हुए उन्होंने कहा था कि कांग्रेस के समर्थक प्रदेश में 25 सीटें चाहते हैं। 21 सीटें भी मिल जाएं तो पार्टी उन्हें मनाकर गठबंधन के साथ चलने को तैयार है। बात समझौते की दिशा में आगे बढ़ सकती थी, मगर जनवरी में की गई  साझा प्रेस कान्फ्रेंस में सपा और बसपा के संयुक्त ऐलान, जिसमें उन्होंने 38-38 सीटें अपने लिए रखने और तीन आरएलडी को देने की घोषणा की थी, ने कांग्रेस से समझौते की दिशा पर संशय खड़ा कर दिया है। सपा-बसपा के इस ऐलान के पीछे चाहे जो कारण हों, उनका बयान बिना जमीनी हकीकत को समझे, हड़बड़ी में दिया गया बयान ही माना जाएगा। अच्छी बात यह है कि अपने हालिया साक्षात्कार में राहुल गांधी ने गठबंधन की संभावनाएं बनाए रखी हैं। इधर 2014 में एनडीए के घटक रहे, उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर और बिहार में उपेंद्र कुशवाहा भी नाराज दिख रहे हैं। बिहार में उपेंद्र कुशवाहा का राजद के साथ जाना लगभग तय है। उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर भी गठबंधन में शामिल हो सकते हैं। यह हुआ तो प्रदेश में भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। क्या इसके लिए सपा-बसपा अपने पुरानी घोषणा में संशोधन करने को तैयार होंगे?

अब बात कांग्रेस की करते हैं, जिसकी स्थिति उत्तर प्रदेश और बिहार में लगभग एक जैसी है। 2014 में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में 7.5 प्रतिशत और बिहार में 8.4 प्रतिशत वोट मिले थे। बावजूद इसके कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय कदाचित इसलिए लिया है कि उसे लगता है कि राहुल गांधी के नए अवतार तथा प्रियंका गांधी के महासचिव बन जाने से वह न केवल अपने खोये हुए मत-प्रतिशत को वापस प्राप्त करने में कामयाब हो जाएगी, बल्कि कुछ अतिरिक्त वोट भी उसे प्राप्त हो जाएंगे। फलस्वरूप वह उससे अधिक सीट पाने में कामयाब होगी, जितनी गठबंधन में मिलने की संभावना थी। हालांकि उत्तर प्रदेश की जो वर्तमान स्थिति है, उससे यह संभव नहीं दिख रहा है। बिहार में यदि अचानक कोई अनहोनी न हुई तो कांग्रेस और राजद का गठबंधन में शामिल होना तय है। जीतनराम मांझी गठबंधन में बने रहने का ऐलान कर चुके हैं। लालू यादव लंबे समय ये जेल में हैं। बीमार हैं। इस कारण आम मतदाता की सहानुभूति उनके साथ है। ऊपर से नितीश के शासनकाल में प्रदेश में जो अराजकता बढ़ी है, उससे भी जनता नाराज है। पिछले चुनावों में नितीश कुमार के साथ रहे शरद यादव अब उनसे अलग हो चुके हैं। उपेंद्र कुशवाहा पर जिस तरह पिछले दिनों लाठियां पड़ी हैं, उससे लगता है कि वे भी एनडीए का साथ छोड़कर राजद के साथ जाने वाले हैं। वहां तेजस्वी यादव एक मंजे हुए नेता की तरह राजनीति कर रहे हैं। उन्हें लालू यादव का सही उत्तराधिकारी कहा जाने लगा है। इसका लाभ गठबंधन को मिलना तय है। सवाल है कि जिस गठबंधन की संभावना बिहार में लगभग पक्की है, वह उत्तर प्रदेश में क्यों नाकाम होता दिख रहा है। क्या इसके लिए केवल सपा और बसपा को दोष दिया जाना चाहिए?

कांग्रेस को लगता है कि सपा, बसपा और राजद का जो मतदाता वर्ग है, किसी जमाने में वह उसका प्रतिबद्ध मतदाता हुआ करता था। उसे यह भी लगता है कि राहुल और प्रियंका अपने परंपरागत वोट बैंक को वापस लाने में कामयाब होंगे। लेकिन जहां तक आम मतदाता का सवाल है, वह आसानी से समझ चुका है कि कांग्रेस और भाजपा के माइंड सेट में कोई खास अंतर नहीं है। माइंडसेट को बदलना आसान नहीं था। कांग्रेस ने खुद को कभी बदलने की कोशिश भी नहीं की। जब लगा कि मीडिया कांग्रेस का हिंदू विरोधी चरित्र गढ़ रहा है, बजाय अपने परंपरागत वोटर को साधने के, राहुल गांधी मंदिर और मानसरोवरों की यात्रा पर निकल पड़े। आज भाजपा खुले आम अपने आपको सवर्णों की हित-रक्षक मानती है। अंतर केवल इतना है कि भाजपा जो काम डंके की चोट पर कहती-करती थी, कांग्रेस यही काम तुष्टीकरण की नीति के अंतर्गत, समाज-कल्याण के नारे के साथ किया करती थी। 1991 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद उत्तरी भारत में दलित और पिछड़ी जातियां मंडल-समर्थक दलों के पीछे एकजुट होने लगी थीं। कांग्रेस उस समय भी अपनी तुष्टिकरण की नीति से बाहर न आ सकी। संविधान 1950 में लागू हुआ था। उसमें सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों के लिए नौकरी में आरक्षण का प्रावधान था। कांग्रेस न केवल मंडल आयोग की अनुशंसाओं को लागू करने से बचती रही, अपितु 1991 के बाद भी उसने नौकरियों में पिछड़ी जातियों के अनुपात को संतुलित करने के लिए कुछ नहीं किया। नतीजा पिछड़ी जातियों के कांग्रेस से मोहभंग के रूप में सामने आया। फिर जैसे ही पिछड़ी जातियों को विकल्प दिखाई दिया, वे कांग्रेस से छिटककर क्षेत्रीय दलों के खाते में चली गईं। उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक जैसे राज्यों में जहां इन जाति-वर्गों का बहुमत है, वहां कांग्रेस का मत-प्रतिशत 10  प्रतिशत से भी कम तक सिमट गया।

2014 में इन जातियों ने पिछड़ों और अतिपिछड़ों ने भाजपा का साथ दिया था तो इसलिए कि मीडिया के बूते भाजपा ने ‘गुजरात मॉडल’ का जो मिथ खड़ा किया था, उसका प्रलोभन बड़ा था। इन जातियों को लगा था कि सरकारी नौकरियों के निरंतर सिकुड़ते आधार की भरपाई प्राइवेट सेक्टर से हो जाएगी। लेकिन ऐसा होना तो दूर भाजपा के आने से जमे-जमाए उद्योग जगत की भी कमर टूट गई। शहरों और कस्बों में जो लोग दूर देहात से आकर छोटा-मोटा धंधा करते थे, चीनी उत्पादों की बेलगाम आमद ने उन्हें धंधा बंद कर, अपने ठिकानों की ओर लौटने को मजबूर कर दिया। छोटे उद्यमियों और उनके साथ काम करने वाले मजदूरों की संख्या करोड़ों में है। निश्चय ही आने वाले चुनावों में वे अपने वोट का प्रयोग भाजपा को सबक सिखाने के लिए करेंगे। लेकिन किसके पक्ष में? यदि विपक्ष इसी तरह से बंटा रहा तो इसकी भी संभावना है कि भाजपा विरोधी उनका वोट विपक्षी दलों में बंटकर निष्प्रभावी हो जाए

कांग्रेस यदि स्वयं को बड़ा दल मानती है, और वह है भी, क्योंकि आजादी के आन्दोलन से उसका नाम जुड़ा है। आज़ादी के बाद लंबे समय तक उसी की सरकार रही है। यदि आजादी के बाद भी लोगों के लिए न्यूनतम मजदूरी और रोजी-रोटी जैसे सवाल की सबकुछ हैं तो इसकी जिम्मेदारी कांग्रेस के ऊपर भी जाती है। कदाचित बाकी दलों से अधिक जाती है। इसलिए उससे अधिक समझदारी और जिम्मेदार आचरण की उम्मीद की जा सकती है। यदि कांग्रेस उत्तर प्रदेश और बिहार में, थोड़ा पीछे हटकर समझौता करके गठबंधन को स्वीकारती है, तो इसका लाभ बाकी प्रदेशों में मिलना तय है। दलित मतदाताओं के बीच मायावती का प्रभाव केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है, अपितु राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र जैसे कई प्रदेश हैं, जहां का दलित मतदाता मायावती को अपना नेता मानता है। यही बात समाजवादी पार्टी के साथ है। बाकी प्रदेशों में यादव वोट बैंक भले ही बड़ा न हो, लेकिन मुस्लिम आज भी समाजवादी पार्टी को अपने लिए सबसे भरोसेमंद मानता है। इसलिए समाजवादी का साथ कांग्रेस की मुस्लिम मतदाताओं के बीच विश्वसनीयता को बढ़ाने में सहायक होगा। या कम से कम उसके बंटने की संभावना कम हो जाएगी।

कुल मिलाकर गठबंधन में राजद, सपा, बसपा और कांग्रेस का साथ आना न केवल 2019 की जीत को आसान बनाने के लिए आवश्यक है, अपितु देश में बढ़ रही सांप्रदायिकता को रोकने के लिए भी जरूरी है। गठबंधन की संभावना को ये पार्टियां गंभीरता से भले ही न लें, लेकिन भाजपा उसे पूरी गंभीरता से ले रही है। उसकी निगाह में गठबंधन बन चुका है। इसलिए प्रस्तावित गठबंधन के जितने भी बड़े नेता हैं, सब सीबीआई के रडार पर हैं. सपा, बसपा, कांग्रेस, त्रणमूल कांग्रेस के पुराने खाते खंगाले जा रहे हैं। देश में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा है। लेकिन यदि किसी दल को भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई केवल चुनाव के दिनों में याद आती हो तो समझ लेना चाहिए कि वह स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त है। भ्रष्टाचार केवल आर्थिक नहीं होता, सामाजिक,  सांस्कृतिक और राजनीतिक भी होता है। इस दृष्टि से भाजपा ने स्वयं को एक नहीं अनेक बार भ्रष्ट पार्टी सिद्ध किया है। आवश्यकता इसे समझने और मतदाता को समझाने की है। यह काम जितना संगठित तरीके से होगा, उतना ही फलदायक सिद्ध होगा।

ओमप्रकाश कश्यप


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