धर्मनिरपेक्षता और जाति

  • कोई भी व्यक्ति इतना न्यायप्रिय नहीं होता, जितना पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति.—गिल्बर्ट कीथ चेटरसन

  • ‘‘मेरे विचार में भारत न हिंदू देश बन सकता है ना हिंदू धर्म भारत सरकार का धर्म बन सकता है. हमें याद रखना चाहिए कि हमारे देश में अल्पसंख्यक भी रहते हैं और हमारा यह कर्तव्य है कि उनकी सुरक्षा का प्रबंध करें. यह देश सबका देश है. चाहे कोई धर्म, कोई जाति हो. हम उस रास्ते पर नहीं चल सकते़ जिसपर पाकिस्तान चल रहा है. हमें यह ध्यान रखना होगा कि हमारे धर्मनिरपेक्ष उद्देश्य सुरक्षित रहें. यहां हर मुसलमान, हर ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक वर्गों को यह विश्वास होना चाहिए कि वह सुरक्षित है और उसे भारतीय नागरिक की हैसियत से बराबर के अधिकार प्राप्त हैं. अगर हम उसे यह विश्वासदिलाने में नाकाम रहे तो यह हमारी विरासत और इस देश का घोर अपमान होगा.’’—सरदार वल्लभभाई पट

धर्मनिरपेक्षता का मामला आधुनिक राष्ट्रराज्य की न्यायचेतना से जुड़ा है. जबकि जाति इस देश के लिए कम से कम तीन हजार वर्ष पुरानी संस्था है. जाति का भारतीय, विशेषकर हिंदू समाज पर इतना गहरा प्रभाव है कि बिना इसके हिंदुओं को अपनी पहचान अधूरी लगती है. जबकि इसी की वजह से समाज के बड़े वर्ग को कदमकदम पर अपमानितलांछित होना पड़ता है. विभिन्न सभ्यताओं में कार्यविभाजन के लिए समाज को अलगअलग बांटने की संस्कृति रही है. वर्तमान में दुनियाभर में केवल भारत ऐसा देश है जहां आज भी जाति का बोलबाला है. जिसके चलते बच्चे के जन्म के साथ ही तय कर दिया जाता है कि वह समाज में कौनसा काम करने के लिए जन्मा है. इन दिनों परिस्थितियां बदली हैं. विशेषरूप से शहरों में. वहां जाति के विरुद्ध आवाजें उठने लगी हैं. मगर यह सुगबुगाहट मुख्य रूप से जातिवादी अन्याय एवं शोषण का शिकार रहे वर्गों में देखने को मिलती है. जिन वर्गों को जातीय स्तरीकरण का लाभ मिलता आया है, वे मौका मिलते ही आज भी उसके समर्थन में खड़े हो जाते हैं. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के सत्ता संभालने के बाद ऐसा स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. हाल ही में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का बयान देखा. उनके अनुसार जाति ठीक, जातिवाद बुरा है. उनके कहने का आशय है कि जाति भले बनी रहे, परंतु जातिवाद जाना चाहिए. यह ठीक ऐसा ही कामना है कि धर्म और धार्मिक दुराग्रह बने रहें और सांप्रदायिकता समाप्त हो जाए. लोकप्रिय राजनीति के दबाव भी जातिवाद को संरक्षित करने का काम करते हैं. हिंदुओं में जाति, सभ्यता और संस्कृति परस्पर अंतर्गुंफित हैं. इसलिए वे एकदूसरे के गुणदोष से भी प्रभावित होते हैं.

जातिवाद की तुलना में धर्मनिरपेक्षता आधुनिक अवधारणा है. कुछ विद्वान इसे मध्यकाल तक ले जाते हैं. अकबर आदि आरंभिक मुगल सम्राटों की यह कहकर प्रशंसा की जाती है कि वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे. उनके राज्य में धर्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था. वे किसी सीमा तक सही भी हैं. लेकिन अकबर आदि की राजनीति धार्मिक उदारता अर्थात सर्वधर्म समभाव तक सीमित थी. वह स्वयं धार्मिक था और राज्य में अनेक पद धार्मिक आधार पर सुनिश्चित थे. उसे धार्मिक रूप से उदार सम्राट तो कहा जा सकता है, धर्मनिरपेक्ष नहीं. धर्मनिरपेक्षता के लिए राज्य का लोकतांत्रिक होना आवश्यक है. एक सिद्धांत के रूप में धर्मनिरपेक्षता यूरोपीय चिंतन की देन है. इस बारे में विचित्र बात यह है कि बहुधर्मिता जो कई बार सांप्रदायिकता के रंग में रंगकर भारत के लिए विकट स्थितियां पैदा कर देती है, जैसी कोई समस्या यूरोप में न थी. वहां धर्म का एकमात्र केंद्र चर्च था. उसके दो धड़े थे—कैथोलिक और प्रोस्टेंट. दोनों के बीच संघर्ष होता रहता था. वही दौर था जब वाल्तेयर, रूसो, हीगेल, फायरबाख, बूनो बायर, मार्क्स, मिखाइल बकुनिन आदि ने धार्मिक पाखंड और उसके सहारे फलतेफूलते सामंतवाद का विश्लेषण करते हुए, तज्जनित बौद्धिक जड़ता, शोषण आदि की ओर इशारा किया था. वहीं जॉन लाक, हॉब्स, बैंथम, जॉन स्टुअर्ट मिल, जेफरसन, थॉमस पेन जैसे विचारकों ने व्यक्ति स्वाधीनता और समानता की मांग को आगे बढ़ाते हुए विधिसम्मत राज्य की स्थापना पर जोर दिया था. उस समय तक औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी. उसे सफल बनाने का एकमात्र उपाय था, मानवमात्र की सामंतवाद से शारीरिकमानसिक मुक्ति.

धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्मदाता जार्ज जैकोब हॉलीयोक(1817—1906) को माना जाता है. विचारों से नास्तिक हॉलीयोक सहकारिता के पितामह कहे जाने वाले राबर्ट ओवेन से प्रभावित था. ओवेन ने इंग्लेंड एवं अमेरिका में सहजीवन पर आधारित बस्तियों की स्थापना की थी. धर्मनिरपेक्षकता उसके उद्देश्य में व्यावहारिक जरूरत थी. सहकारिता और सहजीवन पर आधारित बस्तियों की सफलता के लिए आवश्यक था कि लोगों में धर्म आदि को लेकर मतभेद न्यूनतम हों. हॉलीयोक धर्मकेंद्रित समाज के स्थान पर ऐसे समाज का सपना देखता था, जिसमें लोग आपसी सहयोग और मैत्री द्वारा बंधे हों. ज्ञानविज्ञान और तर्क के आधार पर निर्णय लेते हों. मानते हों कि मानवतावादी लक्ष्यों की प्राप्ति में मनुष्य का अपना विवेक किसी भी देवता या पैगंबर से अधिक मददगार होता है. 1851 में धर्मनिरपेक्षता का विचार प्रस्तुत करते हुए हॉलीयोक ने ऐसे आदर्शोन्मुखी समाज की परिकल्पना पेश की थी, जिसमें लोग शारीरिक, मानसिक, नैतिक और बौद्धिक उठान के उच्चतम स्तर पर हों. जीवन अदृश्य शक्तियों की कृपा के बजाय ठोस, यथार्थ, सकारात्मक जीवनबोध और मानवविकास के उद्देश्य को समर्पित हो. जिनमें नैसर्गिक शुभता, सदगुण, चारित्रिक उदात्तता तथा वैचारिक गहनता हो; तथा लोग आस्था और वायवी विश्वासों के बजाय ठोस, दृश्यमान, चराचर जगत से प्रेरणाएं ग्रहण करते हों; और विशुद्ध मानवतावादी लक्ष्यों के लिए निःस्वार्थ भाव से समर्पित हों. उसका मानना था कि मानवव्यवहार तथा उसके नैतिक प्रतिमानों का एकमात्र आधार लोककल्याण होना चाहिए. उसके लिए धर्म, आस्था, लोकपरलोक जैसी प्रगतिविरोधी मान्यताओं का बहिष्कार अत्यावश्यक है.

भारत में शासन के स्तर पर धर्मनिरपेक्षता के अनुसरण की पहली विधिवत घोषणा 1857 में प्रथम स्वाधीनता संग्राम की विफलता के बाद हुई थी. उस समय दिल्ली सहित अनेक बड़े राज्यों पर मुस्लिमों का शासक था. दूसरी ओर देश की बहुसंख्यक जनता हिंदू थी. दोनों ही समुदाय धार्मिक भावनाओं से गहराई से जुड़े थे. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के मूल में भी धार्मिक भावनाओं के आहत होने से जन्मा आक्रोश था. इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी से शासन की बागडोर अपने हाथों में लेते हुए महारानी विक्टोरिया ने घोषणा की थी कि भारत धर्मनिरपेक्ष राज्य होगा. उसके तुरंत बाद देश में कानूनी सुधार के दौर की शुरुआत हुई. उसके फलस्वरूप धर्मनिरपेक्ष राज्य का स्वरूप सामने आने लगा. भारतीय संविधान भी धर्मनिरपेक्षता की भावना से ओतप्रोत है. 1951 में हिंदू कोड बिल पर भाषण देते हुए डॉ. आंबेडकर ने जो कहा, उससे धर्मनिरपेक्षता को भलीभांति समझा जा सकता है. आंबेडकर के अनुसार—

धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ यह नहीं है कि वह लोगों की धार्मिक भावनाओं का ध्यान नहीं रखेगा. धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ केवल यह है कि यह संसद सारी जनता पर कोई एक विशेष धर्म नहीं थोप पाएगी.’

भारतीय संविधान में धमनिरपेक्षता को सिद्धांततः 42वें संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया. तो क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ राज्य का धर्म की ओर से महज तटस्थ हो जाना है? क्या यह केवल जनता के धार्मिक विश्वास एवं राज्य से जुड़ा विषय है? डॉ. आंबेडकर के उपर्युक्त कथन और संविधान संशोधन के समय सदस्यों की बहस पर विचार करें तो यही प्रतीत होता है. गांधी, नेहरू, पटेल, के. एम. मुंशी, लक्ष्मीकांत मेघ, के. एम. पणिक्कर, के. संथाराम, एच. आर. खन्ना, पी. वी. गजेंद्रड़कर आदि विद्वानों ने धर्मनिरपेक्षता को धर्म के संदर्भ में ही परिभाषित करने की कोशिश की है. कुछ ऐसे नेता भी थे जिन्हें धर्मनिरपेक्षता का विचार ही अस्वीकार था. उनमें प्रमुख नाम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का है. डॉ. राधाकृष्णन की ख्याति दार्शनिकविचारक के रूप में है. परंतु व्यक्ति के रूप में उन्हें उदार आस्थावादी ही कहा जा सकता है. वे धर्म को नैतिकता के आलंबन के रूप में देखते थे. उन्हें क्षोभ था कि ‘आधुनिक मनुष्य की मानस रचना रूसो के ‘सोशल कांट्रेक्ट, मार्क्स की ‘दि कैपीटल’, डार्विन की ‘ऑन दि ओरीजिन्स ऑफ सोसाइटीज’ तथा स्पिंग्लर की ‘डिक्लाइन ऑफ वेस्ट’ के प्रभाव से हुई है.’ उनके अनुसार भारतीय राज्य की निष्पक्षता को धर्मनिरपेक्षता अथवा नास्तिकता के भ्रामक अर्थ में नहीं समझा जाना चाहिए. वे बिना धर्म के नैतिकता को असंभव मानते थे. इसलिए धर्मनिरेक्षता को उन्होंने अपने समय की सबसे बड़ी कमजोरी माना था(रिलीजन एंड सोसाइटी, पृष्ठ 20). इस तरह स्वयं डॉ. राधाकृष्ण भी धर्मनिरपेक्षता को धर्म के संबंध में ही देखसमझ रहे थे. वे इस तथ्य को जानबूझकर नजरंदाज करते रहे कि समाज में अपनी प्रतिष्ठा, अपना स्थान सुरक्षित के लिए धर्म स्वयं नैतिकता का सहारा लेता है. हमारे युग की त्रासदी ही यही है कि यहां धर्म ने नैतिकता को हड़प लिया है.

बहुलतावादी भारतीय समाज में अनेक संस्कृतियां और उपसंस्कृतियां हैं. एक ही राष्ट्र की सीमा में यहां हिंदू, जैन, पारसी, मुस्लिम, ईसाई, सिख आदि विभिन्न धर्मावलंबी रहते हैं. ऐसी स्थिति में धर्मनिरपेक्षता स्वयं एक मूल्य बन जाती है. ऐसा मूल्य जिसे समाज ने स्वयं हासिल किया है. सम्राट अकबर द्वारा सभी धर्मों के प्रति उदारता पूर्ण व्यवहार, महारानी विक्टोरिया द्वारा धर्मनिरपेक्षता की नीति लागू करना तथा संविधान में उसे एक मूल्य के रूप में शामिल करना इसलिए संभव हुआ क्योंकि भारतीय जनता ऐसा चाहती थी. धर्म उसके लिए निजी आस्था और व्यवहार का विषय रहा है, राजनीति का नहीं. इसलिए यहां धर्म को लेकर कभी सीमारेखाएं नहीं बनीं. स्वाधीनता संग्राम की स्थितियों का सूक्ष्म अवलोकन किया जाए तो तत्कालीन भारतीय समाज को सामान्यतः दो हिस्सों में बंटा पाते हैं. एक ओर संभ्रात तबका, जिसमें जमींदार, नबाव, राजेमहाराजे, पुरोहितकाजी, सेठसाहूकार आदि सम्मिलित थे. उन्हें सत्तासंरक्षण प्राप्त था. बदले में वे सरकारी अमले को भेटसौगात आदि देकर प्रसन्न रखते थे. उनकी निगाह में शासन का अभिप्राय जनता से कर वसूली तक सीमित था. लगभग छह सौ रियासतें उस समय देश में थीं. जिनके कर्ताधर्ता अंग्रेजियत में ढले हुए थे.

दूसरा वर्ग किसानों, मजदूरों, शिल्पकारों तथा उन छोटेछोटे व्यापारियों का था, जो अंग्रेजों तथा उनके मुंह लगे सामंतों के अत्याचारअनाचार का शिकार थे. अपने श्रमकौशल के भरोसे आजीविका कमाने वाला वह वर्ग अंग्रेजी सत्ता से मुक्ति चाहता था. संभ्रांत तथा गैर संभ्रांत दोनों ही वर्गों में धर्म के आधार पर कोई विभाजन न था. दोनों में सभी प्रकार के धर्मावलंबी शामिल थे. आपसी लेनदेन था. हो सकता है शुद्धतावादियों का एक छोटासा तबका इधरउधर दोनों तरफ रहा हो. लेकिन उसकी जनसमाज में कोई पैठ न थी. आजादी के संघर्ष में यह वर्ग और भी करीब आया था. स्वाधीनता संग्राम के दौरान ही यह तय हो चुका था कि स्वतंत्र भारत में सामंतों और पंडापुरोहितों के अधिकारों में भारी कटौती की दरकार होगी. नई व्यवस्था में धर्म का हस्तक्षेप न्यूनतम होगा. जनता मुख्य निर्णायक की भूमिका में रहेगी. स्वाधीनता संग्राम के दौरान गर्मदल, नरम दल, क्रांतिकारी, अहिंसावादी आदि जितने भी समूह बने, उनमें धर्मनिरपेक्षता को लेकर लगभग आमसहमति थी. कह सकते हैं कि जातिविहीन समाज और धर्मनिरपेक्षता, स्वतंत्रता से जुड़े महत्त्वपूर्ण सर्वसम्मत संकल्प थे. जनमत के दबाव के चलते गांधी जैसे वर्णव्यवस्था समर्थक नेता को भी धर्मनिरपेक्षता के समर्थन में आना पड़ा था. 1946 में ईसाई मिशनरी से संवाद करते हुए उन्होंने लिखा था—

यदि तानाशाह होता तो राज्य और धर्म को एकदूसरे से अलग कर देता. मैं अपने धर्म से बंधा हूं. उसके लिए अपनी जान भी दे सकता हूं. परंतु वह मेरा निजी मामला है. राज्य के साथ उसका कोई लेनादेना नहीं है. राज्य को स्वास्थ्य, लोककल्याण, संचार, विदेशनीति, मुद्रा जैसे धर्मनिरपेक्ष मामलों में फैसले लेने का पूरा अधिकार है; धर्मिक मामलों नहीं. धर्म प्रत्येक व्यक्ति का निजी मसला है.’2

क्या धर्मनिरपेक्षता और शासन की प्रकृति में कोई अंतःसंबंध है? राजतंत्र हो या गणतंत्र धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर क्या दोनों ही खरे हैं? असल में ऐसा नहीं है. राजतंत्रात्मक शासन प्रणालियां किसी न किसी रूप में धर्म से अनुशासित और प्रेरित रही हैं. धर्म की भांति उनका ढांचा भी सर्वसत्तावादी होता है. इसलिए उनके लिए पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष होना, न केवल कठिन बल्कि असंभव होता है. उदार सम्राट अपने राज्य में विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच समानता का नियम लागू कर सकता है. वह धार्मिक भेदभाव से भी मुक्त हो सकता है. लेकिन धर्मनिरपेक्ष राज्य के लिए केवल इतना अपेक्षित नहीं होता. न ही उसका आशय सर्वधर्म समभाव तक सीमित होता है. राजतंत्र में सम्राट की हैसियत एकल संस्था की होती है. वह उदार हो या कठोर, सारे निर्णय उसकी के विवेककुविवेक से चलते हैं. राजा के कुछ सलाहकार भी होते हैं, परंतु दरबारियों की सलाह पर अमल करना सम्राट के लिए बाध्यकारी नहीं होता. सत्ताअंतरण में अनुवांशिक उत्तराधिकार का नियम राजा को और भी शक्तिशाली बनाता है. इस प्रकार उसकी हर इच्छा वैध मान ली जाती है. ऐसे राज्यों में धर्मनिरपेक्षता व्यक्तिगत निर्णय तक सिमटकर, प्रकारांतर में राजा या सम्राट की अनुकंपा के रूप में सामने आती है. राजा अपने निर्णय को इच्छानुसार कभी भी बदल सकता है. राजा के बाद, अथवा उसके विचारों में आए परिवर्तन के साथ ही धर्मनिरपेक्षता के आगे भी प्रश्नचिह्न लगने लगता है. उधर जो लोग राजा का गुणगान सभी धर्मों के प्रति उसकी उदारता और न्यायभावना के लिए करते आए थे, तत्काल उसे धर्मरक्षक, देवानामप्रिय, धर्मोद्धारक जैसी उपाधियों और अलंकारों से महिमामंडित करने लगते हैं. चूंकि राजतंत्र में राजा स्वयं एक संस्था होता है. इसलिए उसकी मर्जी राज्य की मर्जी भी मान ली जाती है. ऐसे में राजा की आस्था, राज्य की आस्था के रूप में प्रदर्शित होती रहती है. ऐसे राज्य में धर्मनिरपेक्षता न तो पूरी तरह फलित होती है, न ही लंबे समय तक टिकाऊ रह पाती है. आधुनिक राष्ट्रराज्य के लिए जो न्याय, समानता एवं स्वतंत्रता जैसे मानवमूल्यों के आधार पर गठित होते हैं, वहां धर्मनिरपेक्षता राज्य की ‘कृपा’ के बजाय उसके संवैधानिक कर्तव्य के रूप में निरूपायित होती है. वह राज्य की विभिन्न धर्मावलंबी नागरिकों के प्रति निष्पक्षता एवं न्यायभावना को दर्शाती है.

श्रेष्ठ राज्य की नैतिकता उसके नागरिकों के आचरण में झलकनी चाहिए. धर्मनिरपेक्ष राज्य की अपेक्षा होती है कि नागरिकगण अपने धार्मिक विश्वासों के साथसाथ दूसरों के विश्वासों का भी समादर करें. धर्मनिरपेक्ष आचरण के लिए नागरिकों का धर्मविशेष के प्रति आस्थावान रहना आवश्यक नहीं है. मनुष्य धार्मिक आस्था के बिना भी धर्मनिरपेक्ष रह सकता है. राज्य की ओर से धर्मनिरपेक्ष आचरण दर्शाता है कि वह नागरिकभावनाओं के प्रति कितना उदार और संवेदनशील है. ऐसा राज्य सभी धर्मों का सम्मान करता है. यदि कहीं विवाद हों तो उनका समाधान विधिमान्य कसौटियों के अनुरूप खोजा जाता है. जाहिर है, धर्मनिरपेक्ष राज्य धर्म की उपेक्षा नहीं करता. न ही वह विभिन्न धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन कर उनकी कोटियां बनाता है. न ही यह निर्धारित करता है कि प्रचलित धर्मों में से कौनसा धर्म संवैधानिक मान्यताओं के अधिक करीब है. वह केवल धर्म को व्यक्तिगत आस्था का विषय मानकर खुद को उसकी ओर से तटस्थ बना लेता है. चूंकि विभिन्न धर्मों के नैतिक सिद्धांतों में एक किस्म की एकता का भाव रहता है. इसलिए सुधी नागरिकगण धर्मनिरपेक्षता को गणतंत्र की अनिवार्यता के रूप में स्वीकारने लगते हैं. उन्हें यह विश्वास रहता है कि उनमें से कोई भी, धर्म को बीच में लाकर न तो किसी विशेष छूट का अधिकारी है न ही धर्म के आधार पर उसे उन अधिकारों और अवसरों से वंचित किया जा सकता है, जो नागरिक होने के नाते उसे सहज प्राप्त हैं.

जाति मुख्यतः हिंदू धर्म से जुड़ा मसला है. चूंकि जाति को हिंदुओं में धर्मसम्मत बताया जाता रहा है, इसलिए इसे हिंदू धर्म की मान्य संस्था भी कहा जा सकता है. कुछ विद्वान इसपर आपत्ति कर सकते हैं. कह सकते हैं कि धर्मग्रंथों में केवल वर्ण का उल्लेख है, जाति का नहीं. वे यह भी कह सकते हैं कि वर्णविभाजन की मिलीजुली परंपरा भारत के अलावा यूनान, अफ्रीका, यूरोप, मिस्र, पूर्वी एशिया, चीन, जापान आदि देशों में भी प्रचलित थी. इससे इन्कार नहीं किया जा सकता. लेकिन कहीं भी वह उतनी रूढ़ नहीं रही, जैसी कि भारत में. प्लेटो ने ‘रिपब्लिक’ में व्यक्तियों को उनके गुणों के आधार पर काम सांपने की अनुशंसा की है. उसने लोगों को उनकी प्रकृति के अनुसार बांटकर, स्वर्ण, रजत, कांस्य और लौह नामक श्रेणियां बनाई थीं. उसके पीछे प्लेटो की आदर्शवादी राज्य की संकल्पना थी. कार्यविभाजन को वंशानुगत न मान लिया जाए, इसके लिए सावधानी बरतते हुए उसने बच्चों का लालनपालन राज्य के संरक्षण में, उनकी पैत्रिक पहचान को छिपाकर करने का सुझाव दिया था. भारत में हालात भिन्न थे. यहां मान लिया गया कि ज्ञान और अज्ञान दोनों उत्तराधिकार में अंतरित किए जा सकते हैं. इसलिए पंडित के बेटे को पंडित और शूद्र की संतान को शूद्र का दर्जा दिया जाता रहा. समय के साथ जैसेजैसे नए पेशे बढ़े, जातियों की संख्या में भी वृद्धि होती गई. पेशागत जरूरत को रक्तसंकरण का नाम दिया गया.

यदि सब एक विराट पुरुष की संतान हैं तो रक्तशुद्धता का विचार क्यों? ऐसा तो हो नहीं सकता कि मस्तिष्क में एक प्रकार का खून बहता हो, और पैरों में दूसरा? सवाल जायज है. सवाल उठा भी होगा. परंतु नियम साधारण लोगों के लिए होते हैं. शिखर पर विराजमान लोग स्वार्थसिद्धि हेतु कोई न कोई चोर दरवाजा निकाल ही लेते हैं. ब्राह्मणों ने चोरदरवाजा निकाला था, द्विजीकरण का. एक संस्कार, जिसे ‘दूसरा जन्म’ कहा गया. जातियों और वर्णों के कथित रक्तसंकरण से जो बच्चे जन्मे उन्हें नई जातियों के रूप में समायोजित किया गया. प्राचीन धर्मग्रंथों में जातियां बनने का विस्तारसहित विवरण है. उसका विरोध या आलोचना कहीं भी नहीं है. न ही शूद्रत्व के आधार पर समाज के बड़े वर्ग के शोषण और उत्पीड़न की कहीं आलोचना है. अभिजात हिंदुओं की निगाह में वह आदर्श व्यवस्था रही है. इसलिए दैविक बताकर उसका जगहजगह महिमामंडन किया गया है. रक्तसंकरण के बहाने से मनु, याज्ञवल्क्य, गौतम आदि ने जातियों के बनने का जो विधान रचा है उसका विस्तृत वर्णन पांडुरंग वामन काणे की पुस्तक ‘धर्मसूत्रों का इतिहास’ में दर्ज है. इसलिए यह कहना पूरी तरह गलत है कि हिंदू धर्म केवल वर्णव्यवस्था को समर्थन देता है, जाति को नहीं. पौरोहित्य जातिवाद का संरक्षक रहा है. समाज में जैसेजैसे पुरोहितवाद का असर बढ़ा—न केवल जातियों की संख्या में वृद्धि हुई, बल्कि उनके बीच ऊेचनीच की भावना भी गहराती चली गई.

जातिव्यवस्था के कारण हिंदुओं को देशविदेश में इतनी बदनामी झेलनी पड़ी है कि सीधेसीधे उसके समर्थन में आने का कोई साहस कोई नहीं करता. प्रत्येक जाति के अपनेअपने मंच और संस्थाएं हैं. जिनके जरिये जातीय पहचान को बनाए रखने तथा संगठित शक्ति में बदलकर लोकतंत्र में दबावसमूह की तरह काम करने के प्रयास चलते ही रहते हैं. उच्चतम न्यायालय ‘हिंदुत्व को जीवनपद्धति’ बताना, प्रकारांतर में जातिआधारित समाज का समर्थन करना है. जातिव्यवस्था के समर्थक तर्क देते आए हैं कि मातापिता को काम करते देख संतान भी पैत्रिक व्यवसाय में दक्षता प्राप्त कर लेती है. इससे उनके आगे बेरोजगारी का संकट नहीं रहता. परंतु आजीविका की पहली शर्त उसका सम्मानजनक होना है. दूसरी मनुष्य को उससे इतनी आय होनी चाहिए कि वह अपने परिजनों की जरूरतों को पूरा करने के साथसाथ उन्हें बेहतर भविष्य दे सके. यदि व्यक्ति को लगता है कि उसकी वर्तमान आजीविका इन लक्ष्यों को पूरा करने में अक्षम है तो उसे अपने लिए उपयुक्त रोजगार चुनने का अधिकार होना चाहिए. जाति की अवधारणा इस मूलभूत सिद्धांत की उपेक्षा करती है. वह मनुष्य को अपने श्रम या सेवा के मूल्यांकन का अधिकार नहीं देती. धर्मसूत्रों और स्मृतियों में तो हर वह व्यवस्था की गई है जिससे शूद्र अपने दैन्य से कभी न उभर पाएं. ‘मनुस्मृति’ में शूद्र के पास संपत्ति जमा नहीं होने देने के स्पष्ट निर्देश हैं. यदि किसी कारण वह धन जमा करने में सफल हो जाए तो ब्राह्मण को यह अधिकार दिया गया है कि वह उसे बलात् छीन ले. गौतम धर्मसूत्र के अनुसार, ‘कन्या के विवाह का खर्च वहन करने के लिए और शास्त्रविहित किसी धार्मिक अनुष्ठान के लिए कोई व्यक्ति शूद्र से छल या बल का उपयोग करके धन ले सकता है.’(द्रव्यदान विवाहसिध्यर्थम धर्मतत्रसयोगे—गौतम धर्मसूत्र, 27/24, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, रामशरण शर्मा से उद्धृत). कह सकते हैं अपने आरंभ से ही यह व्यवस्था सामाजिक न्याय की भावना के विरुद्ध काम करती आई है.

समाज में लोग अपनेअपने धार्मिक विश्वास के आधार पर और उसके बिना भी रह सकते हैं. इसपर न तो समाज को आपत्ति होती है, न ही राज्य को. बल्कि राज्य का तो ध्येय ही व्यक्ति की स्वतंत्रता और निजी विश्वासों की सुरक्षा के लिए किया जाता है. ऐसा वह तभी कर सकता है, जब वह स्वयं किसी आस्था, विश्वास आदि से बंधा न हो. उसकी प्रतिबद्धता केवल और केवल अपने संविधान के प्रति हो. यदि वह स्वयं धर्म, जाति या वर्ग के प्रति आग्रहशील होगा तो उसके लिए तटस्थ भाव से काम करना कठिन हो जाएगा. समाज पूरी तरह समावेशी न हो तो भी उसके सदस्यों के बीच इतना समझौता अवश्य होता है जिससे वह न्यूनतम शांतिव्यवस्था को बनाए रख सके. जाहिर है संवैधानिक प्रतिबद्धताओं पर खरा उतरने हेतु राज्य का धर्मनिरपेक्ष आचरण समय की मांग बन जाता है. बहुधार्मिकता वाले समाजों में राज्य का धर्मनिरपेक्ष आचरण मात्र इसलिए अपेक्षित नहीं होता कि क्योंकि वहां अनेक धर्मावलंबी रहते हैं. वह इसलिए भी अपेक्षित होता है कि समानता, न्याय, स्वतंत्राता और निष्पक्षता के लिए राज्य को उन सभी विचारों और प्रतीकों से दूर रहना चाहिए, जिनके चयन में मानवीय विवेक की कोई भागीदारी न हो. जो व्यवस्था की मनमानी को दर्शाते हों. राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने नागरिकों के पक्ष में अधिकतम स्वतंत्रता सुनिश्चित करेगा. ऐसा वातावरण विनिर्मित करेगा, जिसमें लोग अपने विवेक और स्वतंत्रता का अधिकतम लाभ उठा सकें. उसके लिए थोपी गई किसी भी पहचान के आधार पर पक्षपात नहीं करेगा. धर्म के चयन में, जाति के चयन में मनुष्य की इच्छा या विवेक का कोई योगदान नहीं होता. ये जन्म के साथ ही उसपर थोप दी जाती हैं. धर्म के मामले में आध्यात्मिक विश्वास के अनुसार धर्मांतरण की छूट तो होती है, परंतु वह काम भी सर्वथा आसान नहीं होता. वहां धर्मकेंद्रित सामाजिकता आड़े आ जाती है.

वस्तुतः धर्म, जाति, वर्ण जैसी प्रतिगामी संस्थाएं परस्पर इतनी अंतर्गुंफित हैं कि इनमें से कौनसी, किसे और कब संबल प्रदान करती हैं, इस पर निर्णय लेना प्रायः कठिन होता है. धर्मसम्मत विधान विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच व्याप्त असमानता, ऊंचनीच आदि को दैविक सिद्ध करने की कोशिश में जुटे रहते है. इससे उनकी दुर्दशा के वास्तविक कारणों की पड़ताल कठिन हो जाती है. प्रकारांतर में सामाजिक न्याय की प्रक्रिया अवरुद्ध होती है; और राज्य अपने उद्देश्य में विफल सिद्ध होता है. अतः उचित यही है कि राज्य का संचालन सर्वसम्मत या बहुसम्मत विधान के माध्यम से हो, ताकि असमानता, अन्याय और अनाचार की हालत में जिम्मेदारी तय की जा सके. इस तरह धर्मनिरपेक्षता जहां लोकतंत्र का उदात्त लक्षण है, वहीं जाति सामंतवाद का ऐसा रूप है जिसमें अल्पसंख्यक वर्ग को बहुसंख्यक वर्गों पर शासन का अधिकार केवल इसलिए मिल जाता है कि उनका जन्म किसी जातिविशेष में हुआ है. परिस्थितिवश यदि सुधार की मांग उठे तो उसे वर्णव्यवस्था के ढांचे के भीतर रखने की पुरजोर कोशिश की जाती है. ऐसे में शासन का यह कर्तव्य है कि नागरिकों को अधिकतम स्वतंत्रता और समानता के अवसर उपलब्ध कराने के लिए प्रतिक्रियावादी शक्तियों को आगे न आने दे.

वर्णाश्रम व्यवस्था विकास विरोधी भी है. शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण के अनुक्रम में जो पहले स्थान पर है, उसे सर्वाधिक शारीरिक श्रम करना पड़ता है. जैसेजैसे आगे बढ़ते हैं, श्रम की मात्रा घटती चली जाती है. अंत में वह लगभग शून्य हो जाती है. ब्राह्मण का श्रम पूरी तरह अनुत्पादक है. जब वह भौतिक जगत एवं सुखसंसाधनों को मोहमाया, क्षणभंगुर आदि कहकर परंपरानुसार नकारता है, तो उत्पादकता का विरोधी बन जाता है. यह विधान ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए तो विशेष सहायक सिद्ध होता है, परंतु शूद्रों के हितों के, जो मुख्य उत्पादक हैं—प्रतिकूल असरकारी होता है. अतः जब भी धर्मनिरपेक्षता की बात चलती है, समाज के वे वर्ग जिन्हें वर्णक्रम में ऊपर रखा गया है, कम या ज्यादा उसके विरोध में उठ खड़े होते हैं.

हम लेख के केंद्रीय विषय तक आ चुके हैं. भारत हिंदू बहुल देश है. जाति उसकी शास्त्रसम्मत संस्था. सवाल है कि धर्मनिरपेक्षता और जाति के संबंधों को कैसे परिभाषित किया जाए? सामाजिक न्याय के लिए धर्मनिरपेक्षता के साथ क्या जातिनिरपेक्षता भी आवश्यक है? चूंकि जाति के आधार पर समाज का बड़ा वर्ग शोषण का शिकार रहा है, इसलिए उत्तर तो ‘हां’ में ही आएगा. प्रथम दृष्टया यह अनुचित भी नहीं लगता. यह सच है कि धर्मनिरपेक्षता के साथ जातिनिरपेक्ष होना भी कामयाब लोकतंत्र की जरूरत है. परंतु मामला इतना आसान नहीं है, क्योंकि इस तरह हम ‘धर्म’ और ‘जाति’ को एक समान मान रहे होते हैं. जबकि जाति धर्म की अपेक्षा कहीं अधिक रूढ़ है. धर्म में जाति से ज्यादा खुलापन रहता है. हिंदुओं में व्यक्ति कथित तैंतीस करोड़ देवताओं में से किसी को भी अपना आराध्य मान सकता है. या फिर उसकी मर्जी है कि समस्त देवताओं तथा उनसे जुड़े कर्मकांडों को पूरी तरह नकारकर नास्तिक होने की घोषणा कर दे. उस समय लोग थोड़ीबहुत आलोचना करेंगे. लेकिन पूजापाठ एवं देवताओं को अंगूठा दिखाने से हिंदू धर्म से उसके संबंधों पर असर नहीं पड़ेगा. धर्म के नाम पर हिंदुओं में जितना खुलापन है, उतना शायद ही किसी दूसरे धर्म में हो. इसे उसकी विशेषता कहा जा सकता है. परंतु यह उसकी कमजोरी भी है. हिंदू धर्म अनेकास्थावादी धर्म है. इसमें साधक को इतनी छूट है कि वह अपने स्वतंत्र विश्वास के साथ हिंदू रह सकता है. जाति के साथ ऐसा नहीं है. वह जीवन के साथ जन्मती और जान के साथ जाती है. गांधी सहित इस देश के ऐसे असंख्य लोग हैं, जो धर्म के खुलेपन का समर्थन करते हैं, किंतु जाति और वर्ण के नाम पर कट्टर या परंपरापोषी देखे गए हैं. हिंदू समाज में जाति के आधार पर शोषण की शताब्दियों पुरानी रवायत है, जिसने समाज के बड़े वर्ग के जीवन को नर्क में बदल दिया था.

जाति के दो सामान्य पक्ष हैं. पहला व्यैक्तिक, दूसरा सामाजिक. समाज ने किसी जमाने में, सभ्यता के आदिचरण में तय किया कि व्यक्ति अपने पैत्रिक व्यवसाय को ही अपनाएगा. शुरूशुरू में लोगों ने भी मान लिया. उनके पास इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था. रक्षा और पाठपूजन के अलावा बाकी सारे काम शूद्रों के हिस्से आते थे. उन्हें पढ़नेलिखने या शस्त्र विद्या की जानकारी लेने की मनाही थी. प्राचीन भारत में ब्राह्मण के लिए पाठशालाएं और विद्यालय थे. क्षत्रियों के शिक्षणप्रशिक्षण के व्यापक प्रबंध थे. लेकिन शिल्पकारों के लिए पढ़नेलिखने या शिल्प के निखार के लिए कोई व्यवस्था न थी. श्रमिकों और कारीगरों का विधिवत विकास हो, इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी जाती थी. लेकिन श्रम और शिल्पकर्म की मांग हर जगह थी. समाज में उनकी अबाध आपूर्ति रहे, इसके लिए नियम बनाया कि बेटा बाप के व्यवसाय को आगे बढ़ाएगा.

जब तक राज्य संस्था शक्तिशाली नहीं हुई थी, समाज में आवश्यक खुलापन था, शिल्पकारों ने भी उस व्यवस्था को सहज भाव से लिया होगा. आगे चलकर ब्राह्मणवाद ने लोगों के मनमस्तिष्क को जकड़ना शुरू किया. राजसत्ता के साथ मिलकर उन्होंने शिल्पकर्म और श्रम के मूल्यनिर्धारण का काम अपने हाथों में ले लिया. इस बीच बौद्धिक स्वातंत्रय का परिचय देते हुए, मेहनतकश वर्गों ने नए दार्शनिक सिद्धांतों की नींव भी रखी. फलस्वरूप आजीवक, चार्वाक, लोकायत, श्रमण, अक्रियावादी, वैनायिक3 जैसे अनीश्वरवादी दर्शन अस्तित्व में आए. शिल्पकर्म की मांग बढ़ी तो वे संगठन बनाकर दूरदराज के देशों तक व्यापार करने लगे. एक समय ऐसा आया जब उन्होंने धर्मसत्ता और राजसत्ता के समानांतर आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली. बौद्ध धर्म के उदय तक लगभग ठीकठाक चलता रहा. कदाचित बुद्ध पहले ऐसे विचारक हुए जिन्होंने धार्मिक आधार पर सांगठनीकरण का रास्ता दिखाया. उसके पहले ब्राह्मण पुरोहित आश्रमों में रहकर वहीं से अपना प्रभुत्व जमाए रहते थे; उनकी पहुंच केवल सत्ताकेंद्रों तक थी. शूद्रों को वे कुछ समझते ही नहीं थे. उन्होंने शूद्रों की उपेक्षा, उन्हें अपने धर्मदर्शन से दूर रखने का हरसंभव प्रयत्न किया था. आर्थिक आत्मनिर्भरता का अवसर मिला तो शूद्र पूरे आत्मविश्वास के साथ नए दर्शनों की ओर मुखातिब होने लगे. ईसा से पांच सौ वर्ष पहले तक यही स्थिति बनी रही.

बौद्ध दर्शन का उभार ब्राह्मणों के लिए अप्रत्याशित था. उससे पहले भी विश्वामित्र जैसे क्षत्रिय तथा शूद्र विद्वानों ने ब्राह्मणों को बौद्धिक क्षेत्र में चुनौती दी थी. लेकिन वे सब वर्णव्यवस्था के समर्थक थे. अवसर मिलते ही ब्राह्मणों ने उन्हें उच्च वर्ण देकर वर्णव्यवस्था को बचाए रखा था. बौद्ध दर्शन को मिली व्यापक लोकप्रियता ने ब्राह्मणों के आगे अस्तित्व का संकट उत्पन्न कर दिया था. बुद्ध ने न केवल जाति और वर्णव्यवस्था को चुनौती दी थी, बल्कि क्षत्रियों को ब्राह्मणों से श्रेष्ठतर भी माना था. इसलिए बुद्ध के रहते उनका ब्राह्मणीकरण आसान न था. असुरक्षाबोध के बीच पुरोहितों का एक वर्ग पनपा जिसने स्वयं को प्राचीन धर्मदर्शन का अनुयायी बताते हुए आमजन में भी अपनी पैठ बनाना आरंभ कर दिया. परंतु आजीवक संप्रदाय की लोकप्रियता तथा बौद्ध एवं जैन जैसे श्रमण परंपरा पर आधारित धर्मों की लोकप्रियता के चलते आरंभिक शताब्दियों में सफलता उनके लिए दूभर बनी रही. बुद्ध के बाद राजसत्ता और धर्मसत्ता में फैलाव के लिए मानो होड़सी मच गई. चूंकि राज्य को संगठित करने के लिए काफी धन की आवश्यकता थी, इसलिए नए शासकों ने शिल्पकारों से उनके शिल्प के मूल्य निर्धारण का काम छीन लिया. चाणक्य आर्थिक रूप से स्वावलंबी शिल्पकार संगठनों को संदेह की दृष्टि से देखता था. इसलिए उसने सहयोगाधारित व्यापारिक संगठनों को नियंत्रित करना आरंभ कर दिया. इस बीच पुरोहितवर्ग तेजी से पनपा. उसने तेजी से कर्मकांड आधारित धर्मों को फैलाना शुरू कर दिया. जातिव्यवस्था को रूढ़ बनाने तथा तत्संबंधी भेदभाव और ऊंचनीच की नींव रखी जाने लगी. यह भेदभाव आर्थिक स्तर पर कितना गहरा था, इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में मुख्य पुरोहित को प्रतिमाह 48000 पण वेतन मिलता था, जबकि प्रमुख शिल्पकार के लिए मात्रा 120 पण वृत्तिका ही निर्धारित थी.

उपर्युक्त से स्पष्ट है कि जातीय विभाजन के नाम पर समाज के बड़े वर्ग को उसके मूलभूत अधिकारों से अलग कर देने में समाज के साथसाथ शासन का भी हाथ रहा है. यूं भी कह सकते हैं कि धर्मसत्ता और राजसत्ता के गठजोड़ ने समाज के बहुसंख्यक वर्गों के साथ अनाचार किया है. इसलिए राज्य की जिम्मेदारी केवल खुद को धर्म की ओर से तटस्थ बना लेने से पूरी नहीं होती. विशेषकर ऐसे राज्य के लिए जो लोकतांत्रिक और लोककल्याण को समर्पित होने का दावा करता है, उसका यह दायित्व है कि विकास की दौड़ में किसी भी कारण पिछड़ चुके अथवा पीछे ढकेल दिए गए लोगों के कल्याण के लिए विशिष्ट प्रबंध करे. भारतीय धर्मशास्त्रों में राज्य के लिए इस नैतिक दायित्व के बारे में अधिक नहीं मिलता. यहां धर्म को नैतिकता का पर्याय माना गया है. जबकि पश्चिम में नीतिशास्त्र सुकरात के जमाने से ही अध्ययन का विषय रहा है. ‘पॉलिटिक्स’ में अरस्तु ने न्यायस्थापना को राजनीति का प्रमुख उद्देश्य माना है—‘राजनीति का प्रमुख उद्देश्य है न्याय और न्याय का मूल ध्येय है—सर्वसाधारण का हित.’ इस काम के लिए निष्पक्षता अनिवार्य है. अरस्तु ने इसके लिए संवितरणात्मक न्याय का सिद्धांत प्रस्तुत किया है. उसके अनुसार राजनीति का प्रमुख लक्ष्य न्याय की स्थापना है. यह सभी को समान अवसर देने से पूरा नहीं हो जाता.

अरस्तु ने न्याय को वस्तु पक्ष और व्यक्ति पक्ष में बांटा है. राज्य की ओर से सभी को समान वस्तुएं और अवसर दिए जाने चाहिए. लेकिन इस बारे में कोई एक नियम हमेशा कारगर नहीं हो सकता. मान लीजिए दो व्यक्ति दौड़ में हैं. दोनों का लक्ष्य समान है. किंतु उनमें से एक व्यक्ति लक्ष्य से बेहद दूर, एकदम अंतिम छोर पर है, जबकि दूसरा उसके एकदम पास खड़ा है. ऐसे में उन्हें यदि एक साथ दौड़ने के लिए कहा जाए तो जीत जो लक्ष्य के एकदम पास खड़ा है, उसकी ही सुनिश्चित मानी जाएगी. वह दौड़ में आगे बना रहेगा. दूसरा व्यक्ति कभी उसके बराबर पहुंच ही नहीं पाएगा. यदि दोनों में से एक ताकतवर और दूसरा अत्यधिक कमजोर है, तब भी यही परिणाम होंगे. अतएव राज्य का कर्तव्य है कि जो लक्ष्य से बहुत दूर, विकास के अंतिम छोर पर है अथवा किसी कारणवश कमजोर है, उसे विशेष प्रोत्साहन देकर स्पर्धा हेतु सक्षम बनाए. आधुनिक विचारक इसे संवितरणात्मक न्याय कहकर राज्य के कर्तव्य के रूप में निरूपायित किया है. इसलिए धर्मनिरपेक्षता की तर्ज पर जातिनिरपेक्ष होना राज्य का आदर्श हो सकता है. परंतु जाति के आधार पर पिछड़ चुके वर्गों की दृष्टि में वह न्याय नहीं कहा जा सकता. धर्मनिरपेक्षता को फलनेफूलने के लिए आधुनिक संवैधानिक कसौटी पर खरे राज्य की आवश्यकता पड़ती है. साथ ही सैद्धांतिक स्तर पर जातिनिरपेक्ष रहते हुए, तज्जनित भेदभाव और अन्याय की भरपाई हेतु सामाजिक स्तर पर पिछड़ गए वर्गों को विशेष प्रोत्साहन द्वारा मुख्यधारा से जोड़ना—राज्य का विशिष्ट कर्तव्य माना गया है. दूसरे शब्दों में समानता और स्वतंत्रता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दमन का शिकार रही जातियों के लिए विशेष प्रोत्साहन देना उसका संवैधानिक कर्तव्य बन जाता है. इस दृष्टि से भारतीय संविधान को आदर्श कहा जा सकता है. यह बात अलग है कि भारतीय समाज स्वयं को संवैधानिक आदर्शों के अनुरूप ढालने में अभी तक नाकाम सिद्ध हुआ है. लोकप्रियता की राजनीति इस लक्ष्य की सबसे बड़ी बाधा है. उससे बचने के लिए समाज तथा उसकी अन्यान्य संस्थाओं का लोकतांत्रिकरण हमारे समय की सबसे बड़ी जरूरत है.

अंत में कबीर को याद करते/कराते हुए—

सबही भूमि बनारसी, सब निर गंगा होय

ज्ञानी आतम राम है, जो निर्मल घट होय

© ओमप्रकाश कश्यप

संदर्भानुक्रम

1. द्रव्यदान विवाहसिध्यर्थम धर्मतत्रसयोगे—गौतम धर्मसूत्र, 27/24, शूद्रों का प्राचीन इतिहास, रामशरण शर्मा से उद्धृत.

2. If I were a , religion and state would 1be separate. I swear by my religion. I will die for it. But it is my personal affair. The state has nothing to do with it. The state would look after your secular welfare, health, communications, foreign relations, currency and so on, but not your or my religion. That is everybody’s personal concern!” ―Gandhi MK, Harijan, 22 September 1946.

3. विनायक गणेश का उपनाम है. गणेश शिवपुत्र जिन्हें आदि यानी अनार्यो का देवता माना जाता है. वे उस दौर के देवता हैं हैं जब देश कबीलों में बंटा था और उनका मुखिया ही सबकुछ होता था. वही सारे निर्णय लेता था. गणेश का वैनायिक को अनीश्वरवादी आजीवकों का ही एक संप्रदाय माना जाता है. इस तरह गणेश और शिव दोनों ही अनार्य अनीश्वरवादी देवता सिद्ध होते हैं. बाद में उन्हें अपने भीतर मिलाने के लिए जहां आर्यों ने अपनी बेटी का विवाह शिव से किया, वहीं गणेश को शामिल करने के लिए उन्हें प्रथम देवता का नाम देना पड़ा. लेकिन गणेश को देवता मानते ही उनके पद गणवेश के साथ खूब खिलबाड़ किया गया. गणेश की सूंड सभापति के स्थान पर बैठकर सबकी बात ध्यानपूर्वक सुनते व्यक्ति का विकृतीकरण है.


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