राजनीतिक के साथ सांस्कृतिक समर भी है उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव

[यह पत्र एक खास संदर्भ में लिखा गया है. जिन्हें संबोधित है, वे भाजपा से जुड़े हैं. संघ जिसकी आत्मा है. इसके अलावा वे वर्षों से कश्यप, कहार, महार, बिंद, मल्लाह आदि जातियों को अनुसूचित जातियों की परिभाषा में लाने के लिए आंदोलन करते हैं. उनका आंदोलन लंबा है, और इस कारण वे सम्मानीय हैं. लोकसभा के चुनावों में और हाल के चुनावों में भी, उपुर्यक्त जातियों का बड़ा हिस्सा भाजपा के पक्ष में गया था. विधानसभा चुनावों में भी यही दिशादशा दिखती है. मगर इन जातियों का भाजपा समर्थन के मायने केवल राजनीति तक सीमित नहीं हैं. उनका बड़ा संदर्भ सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से भी है. इधर संघ नेता मनमोहन वैद्य ने चुनाव से ऐन पहले आरक्षण खत्म करने की मांग दोहराई है. उनका मानना है कि आरक्षण अलगाव बढ़ाता है.(गोया मनु की संहिता समाज को जोड़ती थी) उनके अनुसार आरक्षण अनुसूचित जातियों और जनजातियों के कारण लाया गया है. जिन्हें लंबे समय से सुविधाओं से वंचित रखा गया है. संघ के नेताओं की यह मांग नई नहीं है. न ही इसमें कुछ अलग से जोड़ा गया है. संघ की चलती तो आरक्षण को एक दशक से भी आगे चलाना कठिन हो जाता. इसके बावजूद कुछ जातियां हैं जो भाजपा से आरक्षण बढ़ाने या उसमें फेरबदल करने का सपना पाले हुए हैं. जबकि सामाजिक न्याय को केंद्रीय मुद्दा बनाकर आई बिहार सरकार ने न्यायपालिकाओं को आरक्षण के दायरे में लाकर क्रांतिकारी कदम उठाया है…..

पत्र की भाषा निजी है. संदर्भ समसामयिक. अतः जिन सज्जन को संबोधित है उन्हें सीधे न लिखकर सार्वजनिक कर रहा हूं, ताकि सनद रहे. लेख में कुछ जातियों का नामोल्लेख जरूर है, प्रकारांतर में वे समाज के उस समूह का हिस्सा हैं, जिसे आज बहुजन कहा जाता है. यह सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के मकड़जाल को समझने की कोशिश भर है. इसलिए कि उत्तरप्रदेश के चुनावों के परिणाम केवल राजनीतिक परिवर्तन तक सीमित नहीं रहने वाले. उनका महत्त्व सांस्कृतिक क्षेत्र में कहीं ज्यादा होगा. पत्र है इसलिए इसकी भाषा में काफी कुछ व्यक्तिगत भी है. लेख को उसी भाव के साथ पढ़ा जाना चाहिए.]

आदरणीय…..!

आपका पत्र प्राप्त हुआ. साथ में चैक भी. आभार व्यक्त नहीं कर सकता. क्योंकि जिस उद्देश्य के लिए यह तुच्छ सहभागिता थी, वहीं इसका उपयोग सार्थक था. कारण जो बताया गया है, वह उचित ही है. सूबे में भाजपा या कांग्रेस की सरकार होती तथा सपा, बसपा जैसे दल ऐसा आयोजन करना चाहते, जिसमें किसी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष की सहभागिता होतब भी यही हालात होते. असल में जिस जातिसमूह की ओर से यह आयोजन प्रस्तावित था, वह राजनीतिक दलों के लिए महज वोट बैंक रहा है. 2014 के चुनावों में इनका बड़ा हिस्सा भाजपा के समर्थन में उतरा था, जिससे उसे सूबे में 73 सीटें मिलीं. उससे पहले ये जातियां कभी सपा तो कभी बसपा की झोली में जाती रही हैं.

इस सम्मेलन के रद्द होने की मुझे न तो खुशी है न ही दुख. जिस सम्मेलन के विशिष्ट अतिथि ‘शाह’ और ‘मौर्य’ जैसे व्यक्ति होंवह कश्यप, महार, धींवर, तुरैहा, कहार, मल्लाह, निषाद आदि का सम्मेलन हो ही नहीं सकता था. यह सीधासीधा राजनीतिक सम्मेलन था. जिसे सूबे की सरकार ने अपना राजनीतिक स्वार्थ देते हुए मंजूरी देने से इंकार कर दिया. हम लोग जैसे अभी तक विभिन्न दलों की राजनीति में पिसते आए थे, इस बार भी ऐसा ही हुआ. इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है. वैसे भी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा प्रदेश अध्यक्ष के सान्निध्य में हुआ यह सम्मेलन भाजपा का सम्मेलन ही कहलाता. जातिबंधु जैसे अब तक दूसरे दलों को कंधों पर साधते आए हैं, इस बार वे भाजपा को उठा रहे होते. मुझे तो यह भी लगता है कि अमित शाह और उनके प्रदेश अध्यक्ष स्वयं इस सम्मेलन को लेकर गंभीर नहीं थे. अगर चाहते तो वे प्रदेश सरकार पर दबाव डाल सकते हैं. अनुमति के लिए कलेक्ट्रेट के आगे प्रदर्शन कर सकते थे. धरने के माध्यम से भी आवाज उठाई जा सकती थी. परंतु उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया. कदाचित उन्हें विश्वास रहा कि सम्मेलन हो या नहीं, बंटे हुए जातिसमूह के जितने वोट उन्हें अपेक्षित हैं, वे कहीं नहीं जाने वाले. यह भाजपा की नीति है, जो गत चुनावों में पूरी तरह कारगर रही थी. कारण जो भी हों, सम्मेलन के टलने पर व्यक्तिगत रूप से मुझे खुशी है. सच तो यह है कि मैं इस देश के उन 69 प्रतिशत सक्रिय मतदाताओं में से हूं जिन्होंने 2014 में भाजपा के विरोध में मतदान किया था. जो अलगअलग दलों में बंटने के कारण निष्फल सिद्ध हुआ था.

मैं अपनी सपाटबयानी के लिए क्षमा चाहता हूं. आप जैसे वयोवृद्ध, सक्रिय, सतत चेतनशील व्यक्ति के समक्ष ऐसी साफगोई धृष्टता भी मानी जा सकती है. परंतु आप जैसे व्यक्तित्व के आगे जो समाज में निरंतर सक्रिय और लंबे समय तक बहुतसे जातिबंधुओं का पथप्रदर्शक रहा हो, अपने विचारों को झूठ के आवरण में पेश करना अवमानना जैसा ही होगा. आपके प्रति मेरे मन में भरपूर सम्मानभाव है, जिसपर झूठ का लांछन लगाना मैं नहीं चाहता. रामस्वरूप वर्मा तथा अन्य लोगों से कश्यपबंधुओं को एकसूत्र में बांधने के लिए आपके अनथक योगदान का परिचय मुझे बहुत पहले मिल चुका था. ……..को दिल्ली विधानसभा में पहुंचाने तथा उनकी राजनीतिक पहचान बनाने का श्रेय भी आप को जाता है. सीमित संसाधनों से साधारण नौकरीपेशा आदमी जितना कर सकता है, उससे कई गुना संघर्ष आपने किया है. इसलिए मैं आपके समक्ष न केवल विनीत हूं, बल्कि सम्मानभाव से भरा हुआ हूं.

आप कहेंगे, कश्यप, तुरैहा, बाथम, मल्लाह, कहार, धींवर आदि जातियां तो हमेशा से ही राजनीतिक दलों के हाथों में झूलती आई हैं. सपा, बसपा आदि सभी दलों के लिए भी तो हम महज वोट बैंक हैं. भाजपा भी उन्हें वोट बैंक की भांति इस्तेमाल करती है, तो इसमें बुरा क्या है? कभी कांग्रेस भी यही करती थी. उस समय तक इस समाज में राजनीतिक चेतना का वैसा उभार नहीं था, जैसा आज दिखाई पड़ता है. हालांकि मतों का बिखराब और दिशाहीनता जैसी तब थी, वैसी आज भी है. दिशाहीनता का शिकार हमारे नेतागण भी हैं. एक सामान्य सोच सभी के भीतर पनपा हुआ हैᅳ‘जब सभी के लिए हम वोट बैंक हैं प्रत्येक दल हमारी ओर बाहें फैलाए खड़ा है तो जहां अवसर मिले, वहां ‘शरण लेने’ में बुराई क्या है. इस ‘समझदारी’ के चलते हम अपने ही प्रतिद्विंद्वी बने हैं. लोकतंत्र में जितना बुरा किसी नागरिक समूह को वोटबैंक मानना है, उतना ही बुरा उसका मूक/अमूक प्रतिनिधि बनकर, बिना किसी भविष्य योजना के किसी दल की शरण में जाना और फिर दलीय विचारधारा का प्रतिनिधि बनकर समाज में वोट मांगने आना है. संभव है इससे कुछ व्यक्ति नेता के रूप में प्रसिद्ध हो जाएं. यह भी संभव है कि वे निर्वाचित होकर संसद और विधान मंडलों की शोभा बढ़ाने लगें. वे जानते हैं की उनके पीछे समाज की वास्तविक ताकत नहीं है. राजनीतिक दल की बैशाखी थामकर वे सत्ता में पहुंचे हैं, इस कारण वे हमेशा अविश्वास से भरे रहते हैं. उन्हें अपने ऊपर भरोसा ही नहीं होता. इसलिए समाज को उनका कोई लाभ नहीं मिल पाता. इससे लोगों का आत्मविश्वास भी घटता है और समाज अपने लक्ष्य के प्रति एकमत नहीं रह पाता. बंटा हुआ जनमत बड़ा नेतृत्व उभरने की राह में भी बाधक होता है.

यहां प्रतिवाद का अवसर उपलब्ध है. कहा जा सकता है कि विभिन्न दलों को हमारे नेताओं की आवश्यकता है तो उसका लाभ उठाने में क्या बुराई है. इसी के बूते संसद और विधायिकाओं में ‘कश्यप’, ‘मांझी’ और ‘निषाद’ जैसे टाइटिल दिखने लगे हैं. बात बिलकुल सही है. मगर मैं जानना चाहूंगा कि संसद और विधानमंडलों में समाज के जो नेता विभिन्न दलों में उनकी जरूरत बनकर जाते हैं. क्या वे वहां वास्तव में अपनी उपस्थिति दर्शा पाते हैं? अभी तक तो यही देखा गया है कि हमारे प्रतिनिधि समाज से ज्यादा दलीय जरूरतों को पूरा करने का काम करते हैं. ‘पार्टीलाइन’ पर बने रहना उनकी बाध्यता होती है. जिस प्रकार चुनावों में हमारा समाज वोट बैंक बना रहता है, उसी तरह हमारे ‘प्रतिनिधि’ संसद और विधायिकाओं में ‘संख्या’ बनकर रह जाते हैं. समाज की आवाज बनते हुए उन्हें कम ही देखा गया है.

ठीक है, अपने लोग जिस विपन्नता, सामाजिक अवरोधों को पार करके आते हैं, उनका उभरकर आना तथा चुनौतीपूर्ण चुनावी प्रक्रिया से गुजरकर संसद और विधायिकाओं में जाना ही बड़ी बात है. मैं इससे इन्कार नहीं करूंगा. लेकिन फिर भी कहूंगा कि हमारे प्रतिनिधि उतना नहीं कर पाते, जितना वे कर सकते हैं. या उन्हें करना चाहिए. एक उदाहरण मैं देना चाहूंगा, गाजियाबाद के ही एक पूर्व सांसद हैं. कभी वे बसपा प्रमुख के करीबियों में जाने जाते थे. ताजा खबर के अनुसार वे भाजपा के हो चुके हैं. यह उनका चयन है. इस लिहाज से इसमें कोई बुराई नहीं है. मेरा बस इतना कहना है कि वे जब तक बसपा में थे, अपनी जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल कराने के लिए कुछ नहीं किया. परिस्थितिवश बसपा से बाहर आना पड़ा. जिस आरक्षण के लिए बसपा में रहकर कुछ न कर सके, उसके लिए बाहर आकर आंदोलन किया और अब आरक्षण की सिद्धांतत: विरोधी, केवल राजनीतिक मज़बूरी के तहत उसका समर्थन करने वाली, भाजपा में शामिल होकर उसके लिए वोट मांग रहे हैं. उनकी हालत देख मुझे उदितराज(रामराज) की याद आती है, जिन्होंने कभी रामसे पीछा छुड़ाने के लिए नया नाम(उदितराज) अपनाया था और अब भाजपा के टिकट पर सांसद बनकर अपनी संपूर्ण क्रांतिधर्मिता को स्वयं अंगूठा दिखा चुके हैं. समाज ऐसे नेताओं पर भरोसा करे भी तो कैसे!

पीछे मैंने ‘सांस्कृतिक अधिपत्यवाद’ का नाम लिया है. इसके लिए मुझे कोई आसान शब्द याद नहीं आ रहा. इसका आशय है, ‘समाज में बिना सोचेविचारे, किसी को अपने से बड़ा मानकर उसका अंधानुकरण करना. विवेक को ताक पर रख थोपी गई परंपरा को आदर्श मान लेना. यह मान लेकिन कि वह शासक है, और हमारी नियति शासित बने रहना है. फिर थोपे गए दासत्व को गर्व का विषय मान उसे जीवन की सिद्धि के रूप में अपनाए रहना. सांस्कृतिक अधिपत्य राजनीतिक अधिपत्य से ज्यादा खतरनाक होता है. राजनीतिक अधिपत्य में दासता केवल राजनीतिक हारजीत तक सीमित होती है. वह कुछ वर्ष या दशक में समाप्त हो जाती है. यदि न भी हो तो परिस्थितियां एकसी नहीं रहतीं. सांस्कृतिक अधिपत्य में थोपी गई संस्कृति; यानी सामाजिक दासता को गौरव का विषय मान लिया जाता है. संस्कृति की विशेषता है कि वह परिवर्तन को आसानी से आत्मसात नहीं करती. बल्कि उन चीजों को अधिक महत्त्व देती है जो समय की पकड़ से बाहर होती हैं. चाहे वे अमरत्व का तमगा प्राप्त देवता हों या महामानव. चूंकि शाश्वतता और अमरत्व की मांग मनुष्य की सार्वकालिक चाहत रही है, इसलिए परिवर्तन की मांगों को आसानी से परंपराविरुद्ध, समाजविरुद्ध यहां तक कि संस्कृतिद्रोह तक मान लिया जाता है. रूढ़िग्रस्त मानव परिवर्तन से घबराता है. इच्छा के विरुद्ध परिवर्तन हों भी तो वह उन्हें वह आधेअधूरे मन से आत्मसात् करता है. जैसे वैष्णो देवी की यात्रा में हेलीकॉप्टर का उपयोग एक यात्री को विज्ञान और प्रौद्योगिकी की शक्ति का एहसास तो कराता है, लेकिन वह उसकी आस्था का परिमार्जन नहीं करता. मिथों के प्रति ठीकठाक पढ़ेलिखे व्यक्ति का भी वही श्रद्धाभाव रहता है, जो साधारण यात्री का. पूर्वाग्रहग्रस्त मन नएपन को अनमन्यस्क भाव से अपनाता है. उसके अनमनेपन का लाभ उठाकर पुरोहित और तंत्राचार्य धर्म को विज्ञानसम्मत बताने लगते हैं. लोगों की अनमन्यस्कता का लाभ उठाकर वे विज्ञान को भी धर्मसम्मत सिद्ध करने में सफल हो जाते हैं. नतीजा यह होता है कि उनके शिखरत्व को कभी कोई चुनौती नहीं मिलती और युवावर्ग जो आधुनिक तकनीक को फैशन और अस्मिता से जोड़ता है, वह वैचारिक आधुनिकता से दूर बना रहता है.

रामायण में इसका सबसे बड़ा उदाहरण हनुमान है. वह बलशाली है. कहने को बुद्धिमान भी है. परंतु सिवाय अपने आराध्य की चाटुकारिता के उसकी बुद्धिमत्ता का दूसरा प्रमाण नहीं मिलता. अनार्य हनुमान वर्चस्वकारी आर्य संस्कृति के आगे इतना नतमस्तक है कि महाशक्तिशाली होने के बावजूद अपने दीनताबोध से बाहर नहीं आ पाता. राम के आगे हनुमान का दैन्य उस सर्वहारा का दैन्य है, जो सांस्कृतिक अधिपत्य से अनुकूलित हो, बात और लात में फर्क करना भूल चुका था. वह बड़ी चालाकी से, धूर्त्ततापूर्वक गढ़ा गया चरित्र है. पहले किसी को महाबलशाली, परम प्रज्ञावान घोषित करना, फिर उसे अपना अनुचर बना लेना. ताकि लोगों को यह संदेश जाए कि बड़े से बड़ा व्यक्ति भी उनका दास है. उसकी उपलब्धियां उसके द्वारा अर्जित न होकर उसके आश्रयदाता या आराध्य की देन हैं. ‘हनुमान राम के बिना कुछ नहीं हैं’यह धारणा भावविभोर करने वाली है. अपने लोग भी सरयू तट पर निषादराज द्वारा राम के पदप्रक्षालन के ‘मिथ’ को गौरव का विषय मानते आए हैं. पीढ़ियां बस इसी सोच के सहारे मरखप गईं कि हम भी उस ‘महान संस्कृति’ का हिस्सा थे. जबकि इस तथाकथित ‘महान संस्कृति’ ने हमारे पूर्वजों के अनथक श्रम, संपूर्ण निष्ठा एवं सेवाभाव के बावजूद शोषण, उत्पीड़न और बेगार से ज्यादा कुछ नहीं दिया. आजीविका के लिए दूसरों पर निर्भर समाज बौद्धिक रूप से भी पराश्रित होता चला गया.

जहां कानून का शासन न हो, वहां न्याय और संसाधनों पर अधिकार को दैवीय मान लिया जाता है. परिणामस्वरूप स्वतंत्रता और समानता जैसे मूल्य जिनपर आधुनिक समाजों की नींव टिकी है, वहां बेमानी हो जाते हैं. इस तरह आस्था और परंपरा का केवल सांस्कृतिक पक्ष नहीं होता, उसकी व्याप्ति लौकिक विषयों तक भी होती है. उनके प्रभाव में संसाधनों पर एकाधिकार को दैवीय मानकर विपन्नता को प्रभावित लोगों की नियति घोषित कर दिया जाता है. सांस्कृतिक वर्चस्व से दबासहमा हमारा मन यह सोच ही नहीं पाता कि ऐसे हालात बने क्यों? उसके लिए जिम्मेदार शक्तियां कौनसी हैं? खुद को राम का मित्र कहने वाले, उसके लिए सेना लेकर अयोध्या पर चढ़ाई करने को उद्यत गुहराज भला इतने दीन कैसे हो सकते हैं कि नाव में राम के पांव पड़ते ही उसके उड़नछू हो जाने का भय सताने लगे और संदेहनिवारण के कठौते में पानी लेकर बैठ जाएं. ‘जो व्यक्ति श्रम करता है, वह उसके प्रतिफल का भी अधिकारी है.’यह कहानी इस सामान्य नियम का उल्लंघन करने के साथसाथ बेगार का महिमामंडन करती है. अभी कुछ अर्सा पहले तक ऐसे प्रसंगों पर लोग भावविभोर होते आए हैं. उनमें अपने लोग भी होते होंगे. वे यह समझ ही नहीं पाते कि अपने श्रम पर जीवनयापन करने वाले व्यक्ति का, नदी पार उतारने वाले मांझी का पारिश्रमिक क्या पैरों की धोबन होना चाहिए? यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है, तो क्या उसे ईश्वर कहा जाना चाहिए? मेरी निगाह में यह सांस्कृतिक दुष्टता है.

मैंने ऊपर लिखा है कि ‘सांस्कृतिक अधिपत्य’ ’राजनीतिक अधिपत्य’ से कहीं ज्यादा खतरनाक और दीर्घजीवी होता है. भारत के 3000 वर्षों के इतिहास का आकलन किया जाए तो ऐसा कभी नहीं हुआ जब केवल ब्राह्मण शिखर पर रहे हों या सिर्फ क्षत्रियों के हाथों में राजसत्ताएं रही हों. बल्कि जब भी देश इस तरह की प्रवृत्ति की ओर कट्टरता से बढ़ा, हमेशा कमजोर पड़ा है. उसके बाद पूरे समाज को भयानक पतनशीलता से गुजरना पड़ा है. इसके बावजूद भारतीय धर्मग्रंथों मे ब्राह्मणों और क्षत्रियों का गुणगान है, तो इसलिए कि उनके लेखक ब्राह्मण या ब्राह्मणवादी मानसिकता के पालकपोषक रहे हैं. बात सिर्फ इतनी नहीं है कि ब्राह्मणों ने स्वयं का महिमामंडन करते हुए धर्मग्रंथ रचे हैं. यह वह संस्कृति है जो वेदों को पढने से ज्यादा पूजने का समर्थन करती है. ब्रह्मा तक को वेद पढ़ते हुए नहीं उनका प्रदर्शन करते हुए दिखाती है. ब्रह्मा के स्वयंभू उत्तराधिकारी, जनसाधारण के आगे त्याग, तपश्चर्य, संन्यास और वैराग्य को महिमामंडित करने वाले, ये तथाकथित ब्रह्मामुखोवतार असल में बेहद अवसरवादी रहे हैं. शूद्र वेदों की पूजा करें यह उनके लिए गर्व की बात थी, वे वेदों को पढ़ें यह उन्हें बर्दाश्त न था. अजीब लोग ठहरे, पूर्वजों के पढ़ेलिखे को अपना समझकर शताब्दियों तक कूपमंडूक बने रहे. चालाक इतने कि देश पर मुस्लिमों का आक्रमण हुआ तो संस्कृत को देवभाषा मानने वाले ब्राह्मणों ने फारसीअरबी सीखने में देर नहीं की. धर्म के साथ छेड़खानी न करने की शर्त पर वे मुस्लिम बादशाहों के दरबार में नौकरी करने लगे. अंग्रेज आए तो अंग्रेजी सीख उनके महिमामंडन में जुट गए. उन्हें राजनीतिक सत्ता से उतना मोह नहीं रहा, जितना सांस्कृतिक सत्ता से. जबजब दोनों के बीच संघर्ष की स्थिति बनी, उन्होंने सांस्कृतिक वर्चस्व को चुना है. वह बना रहे इसलिए ज्ञान के जिन उपकरणों से वे स्वयं लाभान्वित रहे, उनका लाभ समाज के दूसरे वर्ग न उठा पाएं इसका उन्होंने सर्वविध प्रपंच रचा. क्षत्रिय की शिक्षा को केवल हथियार चलाने तक सीमित रखा तो वैश्य को गुणाभाग तक. शूद्र पर कोई जिम्मेदारी नहीं, उसका काम बाकी समाज की जिम्मेदारी उठाना है, सो उसे शिक्षा से ही वंचित रखा. शूद्र पढ़ लिख जाए तो कान में पिघला सीसा डालने का नियम बनाया गया.

उन्होंने खुद वेद पढ़े और हमसे कहा ‘रामराम’ रटो. बेशर्मी ऐसी कि कह दियाकबीर जैसे तत्वज्ञानी के ज्ञान का मूल रामानंद का गुरुमंत्र ‘मरामरा’ है. असलियत से अनजान हम मैकाले पर आरोप लगाते हैं कि उसने हमें ज्ञान को रटंत विद्या में बदलने का महामंत्र दिया. इस विषय में मैकाले का निबंध ‘मिनिट्स ऑन एजुकेशन’ कुछ और ही बात कहता है. ठीक है वह चाहता था कि भारतीय अंग्रेजी पढ़ें. इसलिए भी चाहता था कि दुनिया का बेहतरीन ज्ञान उस भाषा में सुरक्षित है. वह गलत नहीं था. अंग्रेजी सचमुच समृद्ध भाषा है. अपने निबंध में मैकाले ने शिक्षा को तर्कमूलक बनाने पर जोर दिया है, उसने जोर देकर कहा है भारतीय लॉक के तर्कशास्त्र को पढ़ें. यहां यह उल्लेख प्रासंगिक है कि आधुनिक विधिशास्त्र की नींव जॉन लॉक, रूसो, बैंथम के दर्शन पर रखी है. उसका निबंध ही प्रकारांतर में ‘इंग्लिश एजुकेशन एक्ट’ की नींव बना. मैकाले की शिक्षा से कहीं बड़ी देन कानून के क्षेत्र में है. उसने इस देश में विधि आयोग की नींव रखी. उसके फलस्वरूप देश में समान अपराध के लिए समान दंड का कानून बना. उससे पहले मनुस्मृति का कानून चलता था. जिसमें ब्राह्मण को सभी प्रकार के दंडों से बरी रखा गया था. फिर भी लोकतंत्र के नाम पर वोट मांगने वाले किसी प्रतिबद्ध भाजपाई से पूछ लीजिए, वह मैकाले को गाली देगा, उसे भारतीय इतिहास का खलनायक घोषित करेगा.

भाजपा जिन विचारों का प्रतिनिधित्व करती है, वह चाहे हिंदुत्व हो या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सब सांस्कृतिक अधिपत्य बनाए रखने के औजार हैं. ज्यादा दूर जाने की आवश्यकता नहीं है. पिछले दो वर्षों में आप देख लीजिए. भाजपा शासन के मोर्चे पर बुरी तरह फेल रही है. विकास के वायदे के साथ चुनाव जीतकर आए मोदी हताशा में ऐसे कदम उठा रहे हैं, जिनसे अर्थव्यवस्था को तात्कालिक रूप से कोई लाभ होने वाला नहीं है. और यदि इनका दूरगामी महत्त्व मान भी लिया जाए तो उसके लिए जितना समय चाहिए उसके लिए धैर्य और सामर्थ्य दोनों ही भारतीय जनता में नहीं हैं. राजनीतिक मोर्चे पर भी सरकार को असफलता का सामना करना पड़ा है. भाजपा के ही कई नेता उसके भविष्य को लेकर चिंता करने लगे हैं. लेकिन भाजपा के पितृ संगठन ‘आरएसएस’ को इसकी कतई चिंता नहीं है. राजनीतिक जीतहार को उसने कभी अर्थपूर्ण माना भी नहीं है. उसकी स्थिति यूरोप की चर्च जैसी रही है. जो लोगों के दिलोदिमाग को अपने अधिकार में लेकर उन्हें अपना अनुचर बनाए रखने में विश्वास रखती है. सरकार विकास के वायदे को पूरा करने के लिए कुछ करे या न करे, इन दोढाई वर्षों में संघ ने हर वैचारिक संस्थान में अपने आदमी बिठा दिए हैं. पाठ्यक्रमों में अपनी सांस्कृतिक नीति के अनुसार बदलाव किया गया है. दूरदर्शन पर तंत्रमंत्र, भूतप्रेत के पोंगापंथी सीरियलों की बाढ़सी आई हुई है. संघ जानता है, यदि पांचदस वर्ष के लिए भाजपा को सत्ता से बाहर रहना भी पड़ा तो महत्त्वपूर्ण स्थानों पर जमे उसके कार्यकर्ता भीतर ही भीतर अपना काम करते रहेंगे. मैं स्पष्ट कर दूं कि राजनीतिक दल के तौर पर भाजपा से मुझे कोई शिकायत नहीं है. उसे कांग्रेस, बसपा, सपा, जेडीयू, लोजपा जैसी परिवारवाद के अधीन होकर संविधान की मूल भावना से दूर जा चुकी पार्टियों से बेहतर मानता हूं. अपनी तमाम शिकायतों के बावजूद मैंने भाजपा के प्रतिनिधियों के पक्ष में एक या दो बार मतदान किया था. तब मुझे लगा था कि वे उम्मीदवार भाजपा के उग्र राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक अधिपत्यवाद में वैसा भरोसा नहीं करते, जैसा कि भाजपा के परंपरागत, संघी पृष्ठभूमि के नेता. लेकिन मोदी को मुखौटा बनाकर संघ इस बार जो उग्र राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक वर्चस्व की जमीन तैयार कर रहा है, वह अभूतपूर्व है. कहने की आवश्यकता नहीं कि यह अति पिछड़ी जातियों के मतों के भरोसे हो रहा है.

अंत में बस इतना कि सांप्रदायिकता धार्मिक प्रदूषण है; और धार्मिकता बौद्धिक प्रदूषण. पहली का अतिरेक मनुष्य को पशु बना देता है. जबकि दूसरी का अतिरेक उसे अंतहीन नशे की गिरफ्त में ले जाता है.

ओमप्रकाश कश्यप

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