ऋग्वेदकालीन भौतिकवादी चिंतन

अनीश्वरवादी चिंतन की भारतीय परंपरा―दो

हम भारतीय कालिदास को आदिकवि मानते हैं तथा ‘रामायण’ को आदिकाव्य. जबकि आदिग्रंथ होने का गौरव ‘ऋग्वेद’ को देते आए हैं. तो क्या ऋग्वेद की ऋचाएं काव्यरचनाएं नहीं हैं? ऋग्वेद को आदिकाव्य कहने में हमें संकोच क्यों होना चाहिए? उसकी ऋचाओं में कविता के लक्षण है, इस तथ्य को कोई नहीं नकारता. फिर भी लोग ऋग्वेद को आदिकाव्य कहने में संकोच करते हैं. यह कहकर कि वेदों के रचियता ‘मंत्रसृष्टा’ न होकर ‘मंत्रदृष्टा’ कवि थेउन्हें आलोचनाविमर्श के दायरे से बाहर निकालकर ‘आप्तग्रंथ’ घोषित कर दिया जाता है. कुछ ऐसा ही मुसलमान ‘कुरआन’ के बारे में दावा करते हैं. धर्मग्रंथों को दैवी ग्रंथ सिद्ध कर श्रद्धा का पात्र बना देने की परंपरा लगभग हर धर्म में रही है. अनुयायियों को लगता है कि धर्मग्रंथ को मानवीकृत कहने से उसका महत्त्व घट जाएगा. जबकि दैवीय कह देने से लोग उसके प्रति ऋद्धा के साथ पेश आएंगे. उनमें लिखी बातों का तन्मयता के साथ पालन करेंगे. धर्मग्रंथों के साथ ऐसा हमेशा होता आया है. ऐसा मान लेने से न केवल वह कृति आलोचनाविमर्श के दायरे से बाहर निकल जाती है, बल्कि उसके मौलिक विस्तार की संभावनाएं भी क्षीण हो जाती हैं. ऋग्वेद यदि आदि ग्रंथ है. उसकी ऋचाओं में कविता के लक्षण हैं तो स्वाभाविक रूप से उसके रचनाकार इस देश और अपनी भाषा के प्राचीनतम कवि भी हैं. साहित्यिक कृति के रूप में ऋग्वेद की सामग्री का मूल्यांकन न करने का नुकसान यह भी होता है कि वैदिक परंपरा के नाम पर रचे गए कथानकों में आए पात्रों, घटनाओं, चरित्रों आदि का मिथकीकरण करने का अवसर परंपरावादियों को मिल जाता है. ऋग्वेद इसी का शिकार होता आया है. बाद में लिखे गए तीनों वेद किसी न किसी रूप में ऋग्वेद के कर्मकांडीकरण की कोशिश है. कालांतर में यही प्रवृत्ति भारतीय मनीषा का संस्कार बनकर उभरती है, जिसमें बिना प्रतीकों और मिथकों का सहारा लिए विमर्श करना मुश्किल हो जाता है. वेदों को आप्तग्रंथ का गौरव भले ही मिला. परंतु ब्राह्मण मनीषियों के लिए वैदिक परंपरा वेदों से अधिक महत्त्वपूर्ण थी. इसलिए वेदों तथा वेदादि ग्रंथों के पाठ में उनके भाष्यकार के हिसाब से परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं. परंतु मूलभूत परंपरा में कोई अंतर नजर नहीं आता.

ब्राह्मणवादी दर्शनपरंपराएं वेदों से उपजी थीं. आरंभ में वे श्रुति की अवस्था में थीं. तथापि ब्राह्मणमनीषियों को उनपर इतना गुमान था कि उनके कारण खुद को विश्वसभ्यता में श्रेष्ठतम होने की दावेदारी करते थे. वेदों में सूत्र रूप में उपस्थित दार्शनिक विचारों को विस्तार देने से अधिक चिंता उन्हें उनके संरक्षण की थी. उसके लिए तरहतरह के आयोजन किए जा रहे थे. गैरब्राह्मणवादी विचारधाराएं आजीवक, लोकायत आदि जिन्हें भौतिकवादी चिंतनधारा भी कहा जा सकता हैके बारे में माना जाता है कि वे ब्राह्मणवादी दर्शनों के विरोध में जन्मीं, तथा उसके बहुत बाद की हैं. वैदिक परंपरा के समर्थक वेदों को भारतीय दर्शनचिंतन का आदिस्रोत तथा वैदिक युग को भारतीय दर्शन परंपरा का आदिचरण मानते हैं. इसे हम उनका पूर्वाग्रह कह सकते हैं. समकालीन दर्शनों को नकारने की प्रवृत्ति भी इसका कारण हो सकती है. सच तो यह है कि वेदों में जो प्रच्छन्न दार्शनिक सूत्र हैं, उनपर प्रकृतिवादी दर्शनों की गहरी छाया है. प्राचीन यायावर मनस्वियों के अनुभवों से उपजीं वे विचारधाराएं वेदों की रचना से बहुत पहले से समाज में निश्चय ही विद्यमान रही होंगी. वैदिक युग से भारतीय चिंतन परंपरा में क्रांतिक बदलाव की शुरुआत होती है. वह ऐसा मोड़ है जहां से अध्यात्मचिंतन में मिथक महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं. मौलिक चिंतन में गुरुडम की घुसपैठ होने लगती है. जीवन संबंधी सहजसामान्य दर्शन पर मिथक सवार हो जाते हैं. सत्तासमर्थन के सहारे ब्राह्मण ऋषियों का समूह बिना व्यक्तिगत यशलाभ की कामना के, उस परंपरा को इस तरह आगे बढ़ाता है कि उसमें परंपरामोह निर्णायक रूप ले लेता है. मौलिक चिंतन की महत्ता घटने लगती है. परिणामस्वरूप समकालीन चिंतनधाराएं, विशेषकर वे जो उस परंपरा के लिए चुनौती थींगौण मान ली जाती हैं. ज्ञान के कर्मकांडीकरण की वह परंपरा धीरेधीरे अपने समय के समूचे ज्ञानानुराग एवं सामाजिक विवेक को अपनी गिरफ्त में ले लेती है.

दर्शन की सर्वमान्य कसौटी है कि उसमें स्थायी विश्वास या निष्कर्ष जैसी कोई चीज नहीं होती. दार्शनिक सत्य शाश्वत न होकर चिर नूतन होता है. इसलिए उसकी खोज भी चिर नवीन बनी रहती है. जैसे ही कोई नया विचार सामने आता है, उसका प्रतिविचार तथा मिलेजुले विचारों की शृंखला साथ ही जन्म ले लेती है. विचारों के संलयन एवं विश्लेषण द्वारा पुनः नए विचारों की उत्पत्ति होती है. कल्पना का महत्त्व दर्शन के क्षेत्र में भी होता है. परंतु दार्शनिक कल्पना साहित्यकार की कल्पना से हटकर वैज्ञानिक परिकल्पना के निकट होती है. साहित्यिक कल्पना का वितान अंतहीन होता है. उसके लिए मानवीय मूल्य महत्त्वपूर्ण होते हैं, जबकि दर्शन में महत्त्व केवल और केवल सत्य का होता है. इसका आशय यह नहीं है कि दर्शन जीवनमूल्यों से निरपेक्ष होता है. साहित्य की भांति दर्शन का ध्येय भी जीवन को श्रेष्ठतम की ओर गतिमान रखना है. दर्शन स्वयं शुभत्व की शाश्वत खोज का सिलसिला है. साहित्यकार अपनी कल्पना को लोकपरलोक में कहीं भी लाले जा सकता है. दार्शनिक के लिए उसकी कल्पना सत्य की खोज को समर्पित होती है. इसलिए ज्ञात सत्य अथवा स्थापित तर्कपद्धति ही उसका आधार बनती है. कुल मिलाकर दार्शनिक परिकल्पना वैज्ञानिक परिकल्पना जैसी ही होती है. अंतर केवल इतना है कि दार्शनिक परिकल्पना का विषय मूर्त्तअमूर्त्त कुछ भी हो सकता है. जबकि वैज्ञानिक परिकल्पना किसी न किसी मूर्त्त विषय यानी ऐसे विषयों जिनका भौतिक आधार पर परीक्षणअवलोकन, सत्यापन आदि किया जा सकेसे संबद्ध रहती है. जब तक किसी परिकल्पना का पर्याप्त आधार न हो, दर्शन के क्षेत्र में उसका महत्त्व सहज प्रतीति जितना ही होता है. तर्क की कसौटी पर कमजोर परिकल्पना साहित्य का आधारस्रोत हो सकती है, दर्शन का नहीं.

वेदों में आर्यों का प्रच्छन्न इतिहास है. छिटपुट दर्शन भी है. परंतु उनमें प्रमुख हैयज्ञ संस्कृति. पुरोहितवाद. जिसके प्रभाव में प्रच्छन्न इतिहास मिथकीय रूप में सामने आता है. दार्शनिक अवधारणाओं पर भी मिथकों का प्रभाव है. अग्नि, सूर्य, उषा, इंद्र, सोम, मित्रवरुण, मरुत, द्यावा, पृथ्वी, अश्विन आदि देवता हैं. उनका सीधा संबंध प्रकृति से है. ‘विश्वदेव’ की भी परिकल्पना है जो विभिन्न देवताओं का सूत्रीकरण कर एकेश्वरवाद की ओर इशारा करता है. कुछ स्थानों पर भावनाओं और संवेगों को भी देवताओं में शामिल किया गया है, जैसे वाक्, ज्ञानम्, मनस्, काम इत्यादि. प्रत्येक देवता किसी न किसी प्राकृतिक शक्ति का स्वामी है. सवाल है कि अग्नि, आकाश, पृथ्वी, वायु आदि जीवनदायिनी प्राकृतिक शक्तियों को सीधेसीधे उनके भौतिक रूप में देवता मानने के बजाए, उनके नामानुरूप मिथकीकरण क्यों किया गया? क्यों उनके लिए सातवें आसमान के पार कथित स्वर्ग में मौजूद शक्तियों की कल्पना की गई? हमारा मानना है कि केवल सहूलियत के लिए. ऐसा करना मनुष्य को आसान लगा. हो सकता है आरंभ में केवल मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण ही प्रभावी रहा हो. क्योंकि अनुभवों के सामान्यीकरण के लिए उन्हें किस्सेकहानियों में ढालना जरूरी था. उसके फलस्वरूप पृथ्वी, सूरज, चंद्रमा, जल, आकाश आदि का पहले मानवीकरण किया गया. फिर वे विभिन्न प्रतीकों के रूप में संस्कृति का हिस्सा बनने लगे. वही प्रतीक कालांतर में पुरोहितवाद के हत्थे चढ़, देवता के रूप में पहचाने जाने लगे. जिन्हें वेद कहा जाता है, उनकी अधिकांश सामग्री काल्पनिक प्रतीकों के महिमामंडन तथा उनके नाम पर हुए कर्मकांडीकरण का परिणाम है. आप्त ग्रंथ बताकर कल्पना को प्रामाणिक बनाने की कोशिश ब्राह्मण ग्रंथों में लगातार दिखाई पड़ती है. वेदों को ‘आप्त ग्रंथ’ मानना धर्म की निगाह में महत्त्वपूर्ण हो सकता है. दर्शन की निगाह में यह तर्कबुद्धि को एक खूंटे से बांध देने जैसा विचारहीन कृत्य है. विडंबना यह कि कालांतर में निहित स्वार्थवश इसी को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाने लगा. वेदों को धर्मग्रंथ मान लेने का परिणाम यह हुआ कि दर्शन की बाकी शाखाएं यानी न्याय और वैशेषिक जैसे दर्शन जो केवल तत्व चिंतन को प्राथमिकता देते हैं, लगातार उपेक्षित होते गए. जबकि इन्हीं दर्शनों से कुछ तत्व उधार लेकर कालांतर में जैन और बौद्ध दर्शन ने समाज के बड़े वर्ग को प्रभावित करने का काम किया.

वेदों को श्रुति कहा गया है. वे किसी एक कालखंड की रचना नहीं हैं. इसलिए उनमें विचार के अनेक रूप विद्यमान हैं. जिन मनीषियों के नाम से ऋचाओं का उल्लेख मिलता है, उनके जीवन के बारे हमारे पास नगण्य सूचनाएं हैं. कदाचित इसीलिए उनके रचियताओं के बारे में भिन्न स्रोतों से अलगअलग जानकारी प्राप्त होती है. ‘दीघनिकाय’ के ‘तेविज्जसुत्त’ में बुद्ध ने ब्राह्मण लेखकों तथा मूल वैदिक कवियों का वर्गीकरण किया है. उनके अनुसार वेदों के आदि रचियता ऋषियों की संख्या मात्र दस है―अट्टक, वामक, वामदेव, यमदग्नि, विश्वामित्र, कश्यप, भरद्वाज, भृगु, अंगिरस तथा वशिष्ट. आगे चलकर इस सूची में बदलाव होता है. मनुस्मृति(1/35) में जो नाम गिनाए गए हैं, वे हैं―भृगु, नारद, वशिष्ट, क्रतु, अत्री, अंगीरस, पुलत्स्य, पुलह, प्रचेतस और मैत्रेयी. कुछ जगह केवल ‘सप्त ऋषियों’ को ही वेदों का आदि रचियता होने का गौरव प्राप्त हैं. मनुस्मृति द्वारा गिनाए गए नाम वास्तविक हैं अथवा कुलपरंपरा? इस बारे में कुछ भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. क्योंकि ‘नारदपुराण’ को विद्वान मात्र 1000 वर्ष पुरानी कृति मानते हैं. ब्राह्मण लेखकों की विशेषता यह रही कि उन्होंने व्यक्तिगत श्रेय के बजाय परंपरा को अधिक महत्त्व दिया है. महत्त्वपूर्ण ग्रंथलेखकों ने बिना यशनाम की चिंता किए, अपने मौलिक ग्रंथ केवल परंपरा को समर्पित कर दिए हैं. वेदों में जिन ऋषियों का नामोल्लेख है, वे महाकाव्यों और पुराणों में उपस्थिति बनाए हुए हैं. जबकि उनके रचनाकाल में शताब्दियों का अंतराल है. ‘दीघनिकाय’ और ‘मनुस्मृति’ में दी गई सूची की तुलना करने पर एक सच यह भी सामने आता है कि ‘मनुस्मृति’ में दर्शाए गए ऋषिगण बौद्धिक विमर्श से अधिक जोर कर्मकांड पर देते आए हैं. इससे यह निष्कर्ष भी सामने आता है कि मनु के लिए वेदों का कर्मकांडपक्ष उनके तात्विक चिंतन से अधिक महत्त्वपूर्ण था. उनके नेतृत्व में दार्शनिक विवेचन का कर्मकांडीकरण होना स्वाभाविक ही था. जनसाधारण वैदिक ऋषियों की कमजोरी को भलीभांति समझता था. इसलिए आजीविका के मामले में स्वतंत्र व्यक्ति ब्राह्मणवादी दर्शनों से दूर रहने में ही भलाई समझते थे.

ऋग्वेद के लिपिबद्ध होने से पहले ही पुरोहितवर्ग समाज में प्रभावशाली भूमिका प्राप्त कर चुका था. तत्कालीन बौद्धिक वर्ग का समर्थन उसे बिना किसी शर्त प्राप्त था. वेदों में या तो पुरोहित वर्ग का वर्णन है अथवा इंद्रादि देवताओं का जो वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार क्षत्रिय के प्रतिनिधि कहे जा सकते हैं. श्रमिक वर्ग और शिल्पकार वर्ग वेदों से नदारद है. स्त्रीचरित्र भी गिनेचुने हैं. इससे उन्हें तत्कालीन अभिजन समाज का प्रतिनिधि ग्रंथ भी कहा जा सकता है. इस कारण ब्राह्मणों ने न केवल उनकी सुरक्षा और विस्तार के लिए खुद को समर्पित किया, बल्कि स्वार्थ के हिसाब से लगातार उनकी स्वार्थानुरूप व्याख्याएं और फेरबदल करते रहे. ऐसा नहीं है कि उस समय वेदों और ब्राह्मणवादी परंपरा के आलोचक न थे. ब्राह्मणों तथा उनके कर्मकांडों की आलोचना करने वाले तब भी अधिसंख्यक समाज का हिस्सा थे. लेकिन ब्राह्मणों के ही हाथ लगी. वर्णव्यवस्था के सहारे वे समाज में अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफल रहे. उनके द्वारा गढ़े गए मिथ किस्सेकहानियों और संस्कृति का हिस्सा बनकर लोकमेधा का अटूट हिस्सा मान लिए गए. आज भी भारतीय धर्मदर्शन का ककहरा न जानने वाला साधारण से साधारण व्यक्ति अग्नि, वरुण, आकाश, उषा, तमस, अनल पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा आदि की जीवनप्रदायिनी शक्ति के बारे में जानता है. रोजमर्रा के जीवन में प्रत्येक मनुष्य उन्हें उसी रूप में देखतासमझता; और इस तरह अपने बुद्धिविवेक के अनुसार दार्शनिक मान्यताएं गढ़ता है. अनुभवआधारित निष्कर्षों में पर्याप्त गतिशीलता होती है. परंतु जैसे ही व्यक्ति के धार्मिक आग्रह प्रबल होते हैं, उसकी वैचारिक गत्यात्मकता थमने लगती है. धारणा खूंटे से बंध जाती है. अपने ही विवेक पर उसका नियंत्रण नहीं रहता. स्थितियों का आकलन बंधेबंधाए ढर्रे के अनुसार करने लगता है. ब्राह्मण ग्रंथों की रचना कथित रूप से वेदों को सर्वग्राही बनाने के लिए की गई है. लेकिन ये ग्रंथ वेदों में अंतर्निहित दार्शनिक सूत्रों की न तो मौलिक गवेष्णा करते हैं, न ही कोई नया दर्शन प्रस्तावित करते हैं. वे केवल वेदों के कर्मकांड पक्ष पर सविस्तार टिप्पणी करते हैं, जिससे आगे चलकर पुरोहितवाद को बढ़ावा मिला.

वेदों और उत्तरवर्ती ग्रंथों में सृष्टि की प्रत्येक जीवनदायिनी शक्ति के लिए अधिष्ठाता शक्ति की कल्पना की गई है. निहित स्वार्थ हेतु पुरोहित कल्पना के मूर्त्तिकरण को वैध ठहराता है. उसपर संदेह करना उचित नहीं माना जाता. प्रकारांतर में वह संस्कृति पर सवार होकर पूरे समाज के आचारव्यवहार का अनिवार्य हिस्सा मान लिया है. इससे मौलिक सोच का हृस होने लगता है. यहीं से सत्य के मिथकीकरण की प्रक्रिया आरंभ होती है. स्वयं वेदादि ग्रंथ समकालीन बोध के मिथकीकरण का परिणाम हैं. वेदों को आप्त ग्रंथ मानना भी उन्हें मिथ मान लेने जैसा है. हालांकि वेदों में यत्रतत्र दार्शनिक प्रश्न भी आए हैं. समय के हिसाब से उनमें पर्याप्त मौलिकता भी है. लेकिन ऐसी ऋचाएं संख्या में नगण्य हैं. प्राकृतिक शक्तियों को सीधे जाननेसमझने के बजाय अधिकांश ऋचाएं उनके नाम पर गढ़े गए देवताओं का महिमामंडन करती हैं. इसे ‘अनुभवों का मिथकीकरण’ कहें अथवा ‘ज्ञान एवं कौतूहल का कर्मकांडीकरण’ जैसा नाम देंवैदिक मनीषियों के लिए वही ‘धर्म’ रहा है. ऋग्वेद भी इससे अछूता नहीं है

प्रज्वलित तपस्या से यज्ञ और सत्य उत्पन्न हुए. अनंतर दिन और रात उत्पन्न हुए. इसके अनंतर जल से पूर्ण समुद्र की उत्पत्ति हुई. जलपूर्ण समुद्र से संवत्सर उत्पन्न हुआ. ईश्वर दिनरात्रि को बनाते हैं. निमिष आदि वाले सारे संसार के वे स्वामी हैं. पूर्वकाल के अनुसार ही ईश्वर ने सूर्य, चंद्र, आनंददायी स्वर्ग, पृथ्वी एवं अंतरिक्ष का निर्माण किया.’ऋग्वेद, 10/190/1-3.

उपर्युक्त ऋचाओं के उद्गाता कवि अघमर्षण हैं. तीन ऋचाओं में पहली दो ऋचाएं सृष्टि के जन्म को लेकर दार्शनिक समस्याओं से दो चार होती हैं. इसमें समय की उत्पत्ति को लेकर भारतीय दृष्टिकोण को समझा जा सकता है. हालांकि उसमें काफी लोच है. इस उल्लेख में समय स्वतंत्र नहीं है. वह ईश्वर से जुड़ा है. यह बात अलग है कि ईश्वर अपने कृत्यों के लिए खुद समय से बंधा है. प्रत्येक वर्णन के बीच में ईश्वर को घसीट लाने की प्रवृत्ति, न केवल वेदों, बल्कि बाद के भारतीय विद्वानों यहां तक कि आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त जैसे गणितज्ञों में भी दिखाई पड़ती है. समय को लेकर चर्चा ऋग्वेद में अन्यत्र भी है. तैतीरीय ब्राह्मण में प्रजापति को संवत्सर कहा गया है. माना गया है कि वही संपूर्ण जीवजगत का निर्माता है(संवत्सरो वे प्रजापतिः. संवत्सरेणैवास्मे प्रजाः प्राजनयत.―तैतीरीय ब्राह्मण, 1.6.2.2). उससे आगे बढ़कर शतपथ ब्राह्मण(10/4/2/2) में प्रजापति और संवत्सर को एक माना गया है. उसके अनुसार प्रजापति चरअचर सहित समस्त वस्तुजगत का निर्माता है. यहां तक कि ईश्वर को भी प्रजापति/संवत्सर की रचना कहा गया है. इस आधार पर विचार किया जाए तो समय ही समस्त वस्तुजगत, देवताओं और चरअचर का निर्माता है. ‘अथर्ववेद’ में संवत्सर को लेकर परिपक्व चिंतन मिलता है. वहां समय या संवत्सर को काल के पर्याय के रूप में प्रस्तुत किया गया है. उसके अनुसार काल अंतहीन और चिरंतन है. अर्थववेद के अनुसार, ‘जगमगाता सूर्य ही समय के रूप में उपस्थित है. इसलिए सूर्य ही समय है. वह हजार आंखों का क्षरणविहीन है. वह सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर निकलता है.’ ऋग्वेद के दशम् मंडल में महाविस्फोट को ‘ब्रह्मणस्फति’ का नाम दिया गया है. देवताओं की उत्पत्ति के बारे में कहा गया है कि उनका जन्म सृष्टि के बाद हुआ. सर्वप्रथम अविद्यमान यानी ‘असत्’ से ‘सत्’ की उत्पत्ति हुई, ‘ब्रह्मणस्फित ने कर्मकार के देवताओं को उत्पन्न किया. देवोत्पत्ति से पूर्व समय में असत् से सत् उत्पन्न हुआ. इसके अनंतर दिशाएं बनीं. दिशाओं से अनंतर वृक्ष उत्पन्न हुए….अदिति से दक्ष उत्पन्न हुए और दक्ष से अदिति. अदिति ने देवताओं को जन्म दिया. फिर वह अपने सात पुत्रों को लेकर स्वर्ग को प्रस्थान कर गई तथा जन्म और मृत्यु के लिए सूर्य को आसमान में रख दिया.’(10/72). अगली ऋचा में इंद्र के जन्म का उल्लेख मिलता है.

चूंकि ईश्वर का विचार अपने आप में संदिग्ध है. उसे बीच में लाने के बाद विश्वास गड़बड़ाने लगता है. अनेक प्रश्न पैदा हो जाते हैं. यदि ईश्वर ही एकमात्र कर्त्ता और परम शक्ति है तो उसे तपस्या की आवश्यकता क्यों पड़ी? कहा गया है कि तपस्या से ही सृष्टि बनी.(ऋग्वेद, 10/129-3). सवाल है कि ‘तप’ से ही क्यों? ‘तप’ के माध्यम से ईश्वर किसे प्रसन्न करना चाहता था? सृष्टि की रचना के लिए उसने एक कर्मकांड को ही माध्यम क्यों बनाया? पृथ्वी, सूर्य, चंद्र आदि ग्रहनक्षत्रों का निर्माण भी क्या समयहीनता के दौर में संपन्न हुआ था? ईश्वरीय समय यानी शून्य से सृष्टि निर्माण की अवधि क्या समयहीनता का अंतराल था? क्या सृष्टिध्वंस के साथ ही समयध्वंस भी हो जाता है? उपर्युक्त ऋचा के अनुसार ईश्वर के अस्तित्व को मान लिया जाए तो क्या ईश्वर की भांति काल भी सृष्टि का साक्षी होता है? क्या समय सीमित और काल असीमित है? क्या ब्रह्मांड का निर्माण और ध्वंस अंतहीन काल में तथा उसकी समस्त गतियां चलायमान समय में होती हैं? इस तरह के अनेक प्रश्न उपर्युक्त ऋचा को लेकर हो सकते हैं. दर्शन का जन्म ऐसी ही आशंकाओं से होता है. लेकिन शंका के लिए ‘स्पेस’ की आवश्यकता पड़ती है. यदि उसपर अंध आस्था और जड़ विश्वास का पर्दा डाल दिया जाए तो दर्शन का विकास थम जाता है. वैदिक मनीषा इसका शिकार होती आई है. जिज्ञासा और कौतूहल का आकस्मिक ठहराव कई अनसुलझे सवाल छोड़ जाता है. उदाहरण के लिए यदि तपस्या और तप से ही यज्ञ की उत्पत्ति हुई तो तपस्या की क्रिया क्या समयहीनता के दौर में संपन्न हुई थी? तपस्या करने वाला क्या स्वयं ईश्वर था? यदि ईश्वर था तो वह किसकी तपस्या कर रहा था? यदि ‘तप’ यहां सूर्य का स्थानापन्न है तो आलंकारिकता को छोड़ क्यों न सीधा और स्पष्ट शब्द ‘सूर्य’ को उसका स्थानापन्न कर दिया जाए? प्रश्नों का सिलसिला अंतहीन है. लेकिन तप को यदि उष्मा का पर्याय मान लिया जाए जो कदाचित सही भी है, तो उपर्युक्त ऋचा में सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर आए विचार तत्संबंधी वैज्ञानिक परिकल्पना से मेल खाने लगते हैं. आधुनिक वैज्ञानिकों का बड़ा वर्ग सृष्टि का विकास ‘महाविस्फोट’ की घटना से मानता है. उसके अनुसार आंतरिक दबाव के कारण परम संपीडित ब्रह्मांड में महाविस्फोट हुआ और वह टुकड़ों में बदल गया. एक टुकड़ा सूरज बना. छोटेछोटे टुकड़े ग्रहादि बने. गुरुत्वबल के कारण छोटे पिंड बड़े ग्रहों का चक्कर लगाने लगे. धरती धीरेधीरे ठंडी हुई. गैंसे जमकर तरल में बदलने लगीं. उन्हीं से पानी बना. और जल से जीवन की उत्पत्ति हुई. अघमर्षण जहां तप यानी उष्म से सृष्टि की रचना मानते हैं, वहीं एक और दार्शनिक परमश्रेष्ठि ने जल को ‘तपस’ की संज्ञा देते हुए उसे सृष्टि का मूलाधार माना है,सृष्टि से पहले केवल अंधकार था. अंधकार ही अंधकार को ढांपे था. सभी अज्ञात और सभी जलमय था….तपस्या के प्रभाव से वहीं एक तत्व उत्पन्न हुआ’(ऋग्वेद 10/129/3). परमेष्ठि कदाचित पहला ऐसा भारतीय बुद्धिवादी चिंतक था, जिसने मानवीय मेधा को सूर्य की उपाधि दी. उसके अनुसार ‘काम’ विश्व की उत्प्रेरक शक्ति है. वही मानव मस्तिष्क को नियंत्रित करता है. वही सूर्य है, ‘जिसकी आंखें इस विश्व को नियंत्रित रखती हैं. वह इससे देखा जा सकता है कि सृष्टि निर्माण को लेकर भौतिक विचारधारा और वेदों के दर्शन में खास अंतर नहीं है. सिवाय इसके कि वेद बीच में ईश्वर या परमात्मा को ले आते हैं. भौतिकवादी विचारक ऐसी किसी भी शक्ति की उपस्थिति को नकारते आए हैं.

स्पष्ट है कि दर्शन का विकास भौतिकवाद से प्रत्ययवाद की ओर रहा है. आरंभ में ईश्वर या केंद्रीय शक्ति की कल्पना अलगअलग दिखने वाली विचारधाराओं में समन्वय की कोशिश का परिणाम थी. जिसे पुरोहितों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए कर्मकांडों तक सीमित कर दिया. देवताकरण के जरिये ब्राह्मणवादी परंपरा के चिंतकों ने उन शक्तियों को अधिभौतिक मान लिया. इससे ज्ञान के वायवीकृत रूप को मान्यता मिलने लगी. निहित स्वार्थ के आधार पर प्राकृतिक शक्तियों के ईश्वरीकरण की प्रवृत्ति ब्राह्मणों के लिए इतनी फूलीफली कि कालांतर में उसी को दर्शन की मुख्य धारा का श्रेय दिया जाने लगा. आज भी यही स्थिति है. बौद्ध धर्म के उदय से पहले दर्शन की ये धाराएं समानांतर रूप में विद्यमान थीं. बुद्ध ने दोनों के बीच का रास्ता अपनाया. चूंकि प्रकृतिवादी विचारधाराएं सृष्टि के विकास को लेकर भौतिकवादी दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती थीं, इसलिए पूर्ण कस्सप, मक्खलि गोशाल को भौतिकवादी धाराओं के प्रवर्त्तक मानना अधिक उचित होगा. भौतिकवादी धारा सृष्टि निर्माण के पीछे किसी भी अदृश्य शक्ति के योगदान को नकारती हैं. अधिभौतिक अथवा ईश्वर को महत्त्व देने वाली विचारधाराएं ईश्वर या परमात्मा को सर्वेसर्वा मानने के कारण ईश्वरवादी कहलाती हैं. ध्यातव्य है कि विगत ढाई हजार वर्षों में ब्राह्मण कभी खुशीखुशी सत्ता के हस्तांतरण को तैयार नहीं हुआ. सतयुग ब्राह्मण के लिए इसलिए आदर्श है, क्योंकि उसमें उसे चुनौती देने वाला कोई न था. जनसमाज कबीलों में बंटा था. उसके अपने रीतिरिवाज, परंपराएं और दर्शन थे. ब्राह्मणों के कर्मकांड से उसे उसे कोई लेनादेना न था. अर्थव्यवस्था पशुआधारित थी. इसलिए भूमिअधिकार का विचार पनपा ही नहीं था. राज्य छोटेछोटे थे, एकदम कबीलाई रूप था उनका. इसलिए सतयुग में केवल ब्राह्मण ही ब्राह्मण थे. वही शासक थे, वही नियम बनाने वाले. चारों ओर केवल उन्हीं की दुंदभि बजती थी. त्रेता में उन्हें क्षत्रियों साथ सत्ता का समझौता करना पड़ा. मनुस्मृति ने क्षत्रियों और ब्राह्मणों के बीच जो समझौता कराया था, त्रेता के रूप में उसी की अभिकल्पना की गई थी. द्वापर में थोड़ा और पतन हुआ. सतयुग में आर्यों के आक्रमण से पराजित शूद्रों ने खुद को संगठित कर लिया था. मजबूर होकर उन्हें शूद्र कृष्ण को अवतार स्वीकारना पड़ा. कलयुग में उनका नैतिक, राजनीतिक पराभव हो चुका है. केवल दंभ बाकी है.

अथर्ववेद की एक ऋचा में सृष्टि की उत्पत्ति का कारण ‘तपस’(उष्म) को बताया गया है. वह सूर्य का पर्याय भी है. सूर्य को सृष्टिकर्ता मानने का विचार अन्य धर्मों में भी है. जापान खुद को ‘उगते सूर्य का देश’ बताता है. चीनी भी सूर्य को आदि देवता मानने की परंपरा रही है. चीनी लोककथा1 वहां के सूर्य पूजक समाज के बारे में बताती है. भगवतशरण उपाध्याय ने मिस्र के सूर्यपूजक राजा अखनातून को आदि धर्मप्रवर्त्तक माना है.(सांस्कृतिक निबंध, प्राचीन मिस्र का शंकर अखनातून). ऋग्वेद(7/6-1) में भी सूर्य को समस्त चराचर का स्वामी बताया गया है. सूर्य को सृष्टि का स्रोत मानने का विचार भिन्नभिन्न संस्कृतियों में रहा है. वेदों में उसे समय का जनक माना गया है. हालांकि इससे इतर निष्पत्तियां भी हैं. एक ऋचा के अनुसार सूर्य से ब्रह्मांड की उत्पत्ति तथा जल से सृष्टि का विकास हुआ. तदनुसार ईश्वर को सृष्टि के निर्माण की इच्छा के साथ ईश्वर ने जल का सृजन किया. उससे तेजस बना. फिर उससे ग्रहनक्षत्र, सूर्य, चंद्रादि अस्तित्व में आए. ऋग्वेद को भारतीय दर्शन का आधारग्रंथ माना जाता है. कुछ संकेतों को छोड़ दिया जाए तो ऋग्वेद का भारतीय दर्शनपरंपरा से उतना गहरा संबंध नहीं है, जितना माना जाता है. सच तो यह है कि उसमें जो दार्शनिक तत्व हैं, जिन्हें प्रायः बहुदेववाद के नाम से जाना जाता है, असल में प्राकृतिक उसमें जो विचार सूत्र रूप में मौजूद हैं, उनके आधार पर वह भौतिकवादी दर्शन के अधिक निकट है. कल्पना के अतिरिक को देखते हुए उसे हम भारतीय मनीषा की कविता कह सकते हैं. वेद का नाम उन्हें बाद में दिया गया. आगे चलकर उसी के आधार पर औपनिषिदक दर्शन का विकास हुआ. भौतिकवादी विचारक मानवीय कौतूहल, संदेह और आशंकाओं को बचाए रखकर दार्शनिक गवेष्णाओं के लिए बड़ा मैदान तैयार कर रहे थे. उनका दर्शन मानवमात्र के रोजमर्रा के अनुभवों और जिज्ञासाओं पर टिका था. वे जानते थे कि प्रकृति की विशालता, विचित्रता और अनिश्चितता ने मनुष्य को उसके सामने श्रद्धावनत होने को विवश किया है. प्रकृति की चुनौतियों का सामना करने के लिए उसको समझना आवश्यक है. इसलिए उन्होंने अपने संदेह और उसके बहाने अनेकानेक संभावनाओं को बनाए रखा.

अपने समय में भी इस तरह का विचार रखने वाले वे अकेले न थे. जीवन में सहायक, उसे संभव बनाने वाली, प्राणदायिनी शक्तियों के प्रति सम्मान, समर्पण और श्रद्धावनत होने की संस्कृति प्रायः सभी प्राचीन सभ्यताओं में रही हैं. यही जीवन के प्रति भौतिकवादी दृष्टिकोण है. वेद भी इससे अछूते नहीं हैं. ऋग्वेद में अनेक स्थान पर ‘काम’ का महिमामंडन है. एक ऋचा(10/191/1) में अग्नि को ‘कामवर्षक’ कहते हुए उसे प्राणिमात्र का गुण बताया गया है. कामोद्दीपन के लिए सोमपान का आवाह्न है. उसके लिए रात्रि और उषा(सूर्य) का मानवीकरण करते हुए उन्हें यज्ञस्थल पर आमंत्रित किया गया है(ऋग्वेद 10/13/7). एक स्थान पर उषा को रात्रि की बहन बताया गया है. उषा को साधारण लड़कियों की भांति सजनेसंवरने का शौक है‘एक ही रंग के वस्त्र पहन, नर्तकी की भांति उपस्थित होती है. जैसे गाय दूध देती है. वह अपने स्थान तक पहुंचती है. और अपना उजला वक्ष खोल देती है. इसी के साथ अंधेरा छंट जाता है. रात्रि जो उसकी बहन है, भाग खड़ी होती है. एक अन्य ऋचा में लिखा है कि जैसे कोई खिलाड़ी पासा फेंकता है, उषा दिन का पासा फेंकती है. वह स्वर्ग की पुत्री है. उसके आगमन के साथ ही निशा भाग खड़ी होती है.’ वेदांत में शंकर ने संसार को माया कहा है. संसार को नकारा है. उनके अनुसार भोग आत्मा की मुक्ति की राह का रोड़ा है. वेदों से ऐसा प्रतीत नहीं होता. आर्यगण जीवन को संपूर्णता के साथ जीने के समर्थक थे. खुशी के क्षणों में वे सोम का पान करते थे. एक लड़ाकू जाति का इस तरह सुखामोद में लिप्त होना अनपेक्षित भी नहीं माना जा सकता. यह भी हो सकता है कि सुखामोद में जीने का स्वभाव उन्होंने प्राचीन जातियों से सीखा हो. कुल मिलाकर आर्य ऐसे हरगिज नहीं थे, जैसा शंकर ने कहा है. तैतीरीय उपनिषद में लिखा है कि प्राचीन आर्यजन वर्ष में तीन बार विशेष आयोजन के लिए एकत्र होते थे. उस अवसर पर युवतियां शृंगार कर आती थीं. पुरुष सोमपान करते थे. तत्कालीन समाज में प्रजनन दर को बनाए रखने के लिए ऐसे उत्सवों की महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता. दरअसल ये उस दौर की ओर इशारा करती हैं, जब काम सामूहिकता का उत्सव हुआ करता था. प्राकृतिक जीवन कठिन था. चुनौतियों के बीच प्रजनन दर को बनाए रखना बहुत कठिन था. कामोद्दीपन के लिए विशेष अवसरों का सृजन प्रायः हर सभ्यता में किया गया. तैतरीय ब्राह्मण में बताया गया है कि देवता और मनुष्य वर्ष में तीन बार विशेष अवसर पर मिलते हैं. वसंतोत्सव जैसे त्योहारों की हर सभ्यता में उपस्थिति भी इसी ओर संकेत करती है.

© ओमप्रकाश कश्यप

1. बहुत दिन पहले की बात है. चीन में एक नामीगिरामी शिकारी ‘ई’ रहता था. उसका निशाना अचूक था. भाला हो अथवा तीर, उसके हाथों से छूटकर सीधा निशाने पर जाकर लगता था. वह घोड़े पर सवार होकर शिकार करता. भाला फेंकने के साथ, बगैर कोई पल गंवाए वह तेजी से शिकार की ओर दौड़ पड़ता. उसको पक्का विश्वास होता कि उसकी कमान से छूटा हुआ तीर सीधे निशाने पर जाकर लगेगा. जब ऐसा विलक्षण तीरंदाज अपने पास हो तो लोगों को उससे उम्मीद भी होगी. एक बार की बात. चीन को एक विपत्ति ने आ घेरा. एक सुबह जब लोग जागे तो देखा कि आसमान में दसदस सूरज जगमगा रहे हैं. उनकी गर्मी से जनजीवन कुम्हलाने लगा. पेड़पौधे झुलसने लगे. जीवजंतु भूखप्यास से व्याकुल होकर इधरउधर भटकने लगे. इस उम्मीद में कि केवल शिकारी ‘ई’ उन्हें प्रकृति के कोप से बचा सकता है, लोग उसके पास फरियाद लेकर पहुंचने लगे.

हमारी मदद करो….आसमान यदि ऐसे ही आग उगलता रहा तो आदमी की जाति ही धरा से मिट जाएगी.’ शिकारी ‘ई’ चिंता में पड़ा था. वह समझता था कि यदि दसदस सूर्य आसमान में चमकते रहे तो प्राणी झुलस जाएंगे. वनवनस्पतियां स्वाह हो जाएंगी. लेकिन धरती को उन सूरजों से बचाया कैसे जाए? ‘ई’ सोचने लगा. इस बीच दसों सूरज सिर पर चढ़े आ रहे थे. उसने सूरजों को ललकारा. आवाज देकर उन्हें बाज आने की चेतावनी दी, लेकिन वे मनमानी पर उतारू थे. यह देख ‘ई’ का पारा चढ़ गया. गुस्से में उसने धनुषवाण उठाए. प्रत्यंचा चढ़ाई. एक साथ दस तीर कमान पर चढ़ाकर डोर को कान तक खींचा. निशाना साधकर तीर छोड़ दिए. दसों तीर तेजी से आसमान की ओर बढ़े. उनमें से नौ तीर अलगअलग दिशाओं में निकलकर नौ सूरजों से टकराए. जैसे सूरज न होकर हवा से भरे गुब्बारे हों. तीर लगने के साथ ही नौ सूरज देखते ही देखते धरती पर बिखर गए.

दसवां तीर निशाने से चूक गया. उधर नौ सूरजों को धराशायी होते देख दसवां सूरज बुरी तरह डर गया था. वह आसमान छोड़ भाग खड़ा हुआ. खुद को बचाने की जुगत में वह बैंसबाड़ी के पीछे जा छिपा. अब आसमान सूरजों से खाली था. इसी के साथ वहां अंधेरा छा गया. थोड़ी देर पहले जो जीवजंतु भीषण गर्मी से व्याकुल थे, अब उन्हें अंधेरा डराने लगा. सूरज न रहने से सर्दी बढ़ गई. जीवजंतु परेशान हो उठे. ‘ई’ को भी लगा कि उससे चूक हुई है. जीवजगत के लिए धूप और गरमी दोनों चाहिए. सूरज के बिना प्राणियों को ये चीजें कौन देगा! इसपर विचार किए बगैर ही उसने दस के दस सूरजों को निशाना बना लिया. एक सूरज बचा रहता तो चिंता की बात न होती. लेकिन अब? अब क्या होगा? ‘ई’ की चिंताओं का पारावार न था.

तभी उसे ध्यान आया कि उसने नौ सूरजों को तो गुब्बारे की तरह आसमान से गिरते देखा था. लेकिन दसवां सूरज! वह कहां गया? ‘ई’ ने इधरउधर नजर दौड़ाई. अचानक बैंसबाड़ी के पीछे छिपा दसवां सूरज उसको दिखाई पड़ गया. सूरज स्वयं बाहर आने को उत्सुक था. लेकिन जैसे ही वह ‘ई’ को देखता, भय से बैंसबाड़ी के पीछे दुबक जाता था. ‘ई’ सूरज की मनस्थिति को देख मुस्करा दिया. उसको खुशी थी कि एक सूरज बचा हुआ है. अपना धनुषवाण संभालकर वह अपने घर की ओर चल दिया. उसके जाते ही दसवां सूरज बैंसबाड़ी के पीछे से निकला और दुबारा आसमान पर छा गया. दुनिया फिर जगमगा उठी. लोग ‘ई’ की जयजयकार करने लगे.

चीनी किवदंति है कि सूरज आज भी शिकारी ‘ई’ के भय से उबर नहीं पाया है. वह डरताडरता पूरब से उदय होता है. पहले केवल दिन ही दिन था. उस घटना के बाद से सूरज दिनभर पश्चिम की ओर भागते रहने के बाद शाम को पुनः बैंसबाड़ी के पीछे दुबक जाता है. इसी से दिनरात होते हैं. सूरज रात को छिप जाता है, इससे प्राणियों को सोने का अवसर मिल जाता है. इसके लिए चीनी लोग महान शिकारी ‘ई’ का आभार मानते हैं.

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