परिताप की मिठास : अतीत से भयभीत चार हस्तियां

अशोक, आइंस्टाइन और अब्दुल कलाम! चाहें तो एक और नाम इनमें जोड़ सकते हैंᅳअल्फ्रेड नोबेल. चारों अलग-अलग समय में जन्मे. अलग-अलग क्षेत्रों में उनका योगदान रहा. क्या इनमें कुछ समानता नजर आती है? उत्तर अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग तरह से देंगे. फलित ज्योतिष में विश्वास रखने वाला तत्क्षण कहेगाᅳ‘चारों नाम ‘अकार’ से आरंभ होते हैं; यानी सब एक ही नाम-राशि के हैं.’ जिसकी इतिहास में पैठ है वह जोर देकर कहेगाᅳ‘उन सबका प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध युद्ध से था.’ इतिहास और संस्कृति दोनों में पैठ रखने वाला बताएगाᅳ‘अशोक(304 ईस्वी पूर्वᅳ232 ईस्वी पूर्व) महान सम्राट था. हमेशा प्रजा कल्याण को समर्पित. लोककल्याण के निमित्त उसने बौद्ध धर्म अपनाया. उसके प्रचार-प्रसार के लिए जगह-जगह स्तंभ गढ़वाए. उसके फलस्वरूप बौद्ध धर्म देश की सीमाएं लांघ, देश-देशांतर तक फैला. भारत आर्थिक प्रगति की ओर बढ़ा.’ अपने तर्क को पक्का करने के लिए वह सुप्रसिद्ध उपन्यास लेखक एच. जी. वेल्स की पुस्तक ‘दि आउटलाइन ऑफ हिस्ट्री’ के हवाले से कहेगाᅳ

‘हजारों-लाखों सम्राटों के बीच, जिनसे इतिहास के लाखों-करोड़ों पन्ने भरे पड़े हैं. तेजस्विता, करुणा, शांति, औदार्य और कुलीनता के वैभव मंडल में अशोक एकमात्र ऐसा तारा है जो चमक रहा है, चमकता ही जा रहा है, अकेला….लगातार.’1

बाकी महापुरुषों के बारे में भी विद्वानों के अलग-अलग मत और जानकारियां हो सकती हैं. अल्फ्रेड नोबेल(1833ᅳ1896) ख्यातिनाम शख्सियत था. वह अपने काम से ज्यादा अपने नाम से दिए जाने वाले पुरस्कारों के लिए जाना जाता है. हर साल नोबेल पुरस्कारों की घोषणा होती है. जिसे पुरस्कार मिलता है, उसकी प्रतिभा को तत्क्षण वैश्विक मान्यता मिल जाती है. दुनिया-भर के लेखक, साहित्यकार, बुद्धिजीवी उसे सम्मान सहित याद करते हैं. कम लोग जानते होंगे कि वह अपने समय का प्रतिष्ठित रसायनशास्त्री, इंजीनियर, आविष्कारक, हथियार उत्पादक और सफल उद्यमी था. 355 के आसपास पेटेंट उसके नाम थे. ‘डायनामाइट’ के उसके आविष्कार ने साम्राज्यवादियों के हाथों में ऐसा हथियार थमा दिया था, जिससे वे युद्ध-स्थल पर लाशों के अंबार बिठा सकते थे.

आइंस्टाइन(1879ᅳ1955) तो बस आइंस्टाइन थे. उनके बारे में भला कौन नहीं जानता. वैज्ञानिक बहुत हुए. अनेक ने मनुष्यता के हित में कल्याणकारी आविष्कार किए. उनकी मेधा से विश्व-सभ्यता समृद्ध हुई. परंतु सर्वाधिक विलक्षण, मेधावी और प्रखर प्रतिभावान होने का जो श्रेय, प्रसिद्धि और मान-सम्मान अल्बर्ट आइंस्टाइन को प्राप्त है, वैसा शायद ही किसी दूसरे वैज्ञानिक को प्राप्त हो. वे मानवीय मेधा के ‘मिथ’ के रूप में स्थापित हैं. आज भी यदि कोई बालक अपनी प्रतिभा से समाज को एकाएक चौंका दे तो लोग उसकी तुलना आइंस्टाइन से करने लगते हैं. उनके बारे में कुछ और बताने को कहा जाए तो लोग कहेंगे कि उन्हें संगीत से भी प्यार था. वे गांधी के प्रशंसक तथा विश्वशांति के अग्रदूतों में से एक थे. नए-नए देश बने इजरायल ने उन्हें अपना राष्ट्रपति बनने का न्योता दिया था, मगर उन्होंने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया था. लोग उन्हें संवेदनशील वैज्ञानिक मानते हैं. आइंस्टाइन का यह कथन, ‘मनुष्य के लिए मनुष्य से ज्यादा उपयोगी कुछ भी नहीं है’ᅳमहाभारत के कथन ‘न कि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचितः’ की याद दिलाता है. सापेक्षिकता का उनका सिद्धांत विशुद्ध वैज्ञानिकीय उपलब्धि था. आइंस्टाइन ने तो सहज भाव से बताया था कि पदार्थ और ऊर्जा अंतपर्रिवर्तनीय हैं. उस समय शायद ही किसी ने सोचा था कि उसके आधार पर बना परमाणु बम अच्छे-खासे देश की तबाही का कारण बनेगा. आगे चलकर उसी शोध के आधार पर परमाणु बम बना, जिसके कारण दूसरे विश्वयुद्ध में लाखों जापानियों की जानें गईं. कई लाख  हमेशा-हमेशा के लिए अपाहिज हो गए.

‘मिसाइल मैन’ अब्दुल कलाम की मृत्यु पिछले वर्ष हुई. भारत का बच्चा-बच्चा उनके नाम से परिचित है. बल्कि बड़ों से अधिक बच्चे कलाम साहब के बारे में जानते हैं. हिंदी में ‘बेस्टसेलर’ किताबें कम होती हैं. कलाम साहब की पुस्तक ‘अग्नि की उड़ान’ को उन्होंने भी पढ़ा जो सामान्यतः पढ़ने-लिखने से कतराते हैं. वे गांधी के देश के राष्ट्रपति थे. अजीब युति थी. राष्ट्रपिताᅳ‘अहिंसा का पुजारी’, ‘राष्ट्रपतिᅳ‘मिसाइल मैन!’ बुद्ध और महावीर के देश का एक ‘भारत रत्न’ जो ‘मिसाइल मैन’ भी है. देश में राष्ट्रपति का संबंध जनता से सीधे नहीं होता. बावजूद इसके दिवंगत कलाम साहब को जो ख्याति मिली, वह अनूठी थी. स्वयं उन्होंने भी खुद को जनता से दूर नहीं रखा. बल्कि लगातार लोगों से जुड़े रहे. खासकर शिक्षा के क्षेत्र में. अपने लिए कुछ जोड़ा नहीं. यहां तक की शादी तक नहीं की. उनके निधन के बाद पता चला कि वे कितने मितव्ययी थे. उनके निजी सामान में थे, कुछ कपड़े और ढेर सारी किताबें. घर वे दान में दे चुके थे. उनके भाई अब भी नुक्कड़ पर पान की दुकान चलाते हैं. उनके हजारों प्रशंसकों के प्रयास से ये बातें फेसबुक, इंटरनेट और पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी पड़ी हैं. विद्यार्थी कलाम जैसा बनने के सपने देखते हैं. उनका सूक्ति-वाक्य कि ‘सपना वह नहीं है जो आप नींद में देखते हैं, सपने वे हैं जो आपको नींद ही नहीं आने देते.’ आज भी हजारों युवजनों की आंखों में बसता है.

ये चारों अपने समय की महानतम हस्तियां हैं. न जाने कितने ग्रंथ इन पर रचे गए हैं. सैंकड़ों-हजारों बार इनका उल्लेख हुआ है. ऐसे में इनके बारे में जानने योग्य रह क्या जाता है? यदि हम इन चारों की उपलब्धियों और बाद के फैसलों की तुलना करें तो समानता-सूत्र साफ दिखने लगते हैं. कुछ है जो इन्हें मन के धरातल पर एक करता है. उसकी पड़ताल द्वारा हम जान सकते हैं कि अपने-अपने क्षेत्र में विरलतम उपलब्धियों को प्राप्त करने वाले ये चारों जीवन के उत्तरकाल में लगभग एक समान मनस्थिति को जी रहे थे. वह अंतर्सूत्र क्या है? कौन-सी बात है जो अलग-अलग कालखंड की इन विभूतियों को एक साथ, एक मानसिक धरातल पर ले आती है?

संकेत हम ऊपर भी कर चुके हैं. चारों में अशोक सबसे पहले का है. इतिहास में सवार्धिक स्पेस भी वही घेरता है. राजा-महाराजाओं के लिए खून-खराबा बड़ी बात नहीं. साम्राज्यवादी लिप्साओं को साधने के लिए उन्होंने मनुष्यता का खूब लहू बहाया है. उनमें से शायद ही किसी को अपने किए पर मलाल हुआ हो. आरंभ में अशोक भी बाकी राजाओं जैसा था. साम्राज्यवादी लालसाओं से भरा महत्त्वाकांक्षी, क्रूर और अहंकारी सम्राट. उसकी युद्ध-लिप्सा ने कलिंग युद्ध में लाखों निर्दोष सैनिकों ने प्राणों की आहूति दी. कई लाख घायल हुए. समृद्ध राज्य तबाह हो गया. अपनी तलवार से जीवन-भर दूसरों को डराने वाला अशोक अंत में खुद इतना डरा कि अहिंसा का प्रचारक बन गया. जीव-जंतुओं की मौत पर पाबंदी लगा दी. जब तक जिया धर्म और नैतिकता का प्रचार करता रहा. देर से ही सही, पर समझा कि अपने भीतर के दानव को जीतने से बड़ा कोई विजेता नहीं होता.

अल्फ्रेड नोबेल ने डायनामाइट का आविष्कार खनन उद्योग को मदद पहुंचाने के लिए किया था. लेकिन विज्ञान की विवशता कि हर नई खोज अच्छे और बुरे परिणाम साथ-साथ लाती है. तीव्र विस्फोटक क्षमता के कारण डायनामाइट का उपयोग भी युद्ध सामग्री के रूप में किया जाने लगा. नोबेल के कारखाने युद्ध सामग्री निर्माण में आगे थे. डायनामाइट उनमें लगातार मांग वाला उत्पाद बन गया. दूसरी ओर डायनामाइट की मारक क्षमता के कारण लोग नोबेल को ‘हत्याओं का सौदागर’ कहने लगे. आरंभ में नोबेल अपने आलोचकों की ओर से निश्चिंत था. उसे केवल अपने मुनाफे की चिंता थी. उसके कारखाने सोना उगलते थे. उनमें बना बारूद न दोस्त देखता था, न दुश्मन, सिर्फ तबाही लाता था. युद्ध इंसानियत के लिए भले बरबादी का सबब हों, नोबेल के लिए वे समृद्धि का आधार थे. छोटी-मोटी घटनाओं के अलावा सब-कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कि अचानक कुछ ऐसा घटा जिसने उसके सोच को बदलकर रख दिया.

1888 की बात. अल्फ्रेड नोबेल का बड़ा भाई लुडबिग नोबेल केन्स की यात्रा पर था. एक शाम वह पार्क में अकेला घूमने निकला था. अकस्मात वहीं उसकी मृत्यु हो गई. सुबह उसका शव पार्क से मिला. अखबारों में उसकी मृत्यु पर शोक संदेश प्रकाशित हुए. लेकिन एक अखबार ने गलती से लुडबिग की मृत्यु को अल्फ्रेड की मृत्यु समझकर हेडलाइन के रूप में छापाᅳ‘हत्यारों के सौदागर नोबेल की मौत.’ आगे शोक संदेश के रूप में उसने लिखाᅳ‘डा. अल्फ्रेड नोबेल जिसने ऐसे आविष्कारों से अकूत दौलत समेटी थी जिनसे लोगों को पहले की अपेक्षा अधिकाधिक तत्परता से मौत के घाट उतारा जा सकेᅳका कल निधन हो गया.’2 अखबार अल्फ्रेड नोबेल के हाथों में पहुंचा तो उसका माथा घूम गया. वह आजीवन अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए जिया था. विज्ञान और इंजीनियरी उसका जुनून थे. उसके लिए उसने विवाह तक नहीं किया था. एकाएक उसे अपनी समस्त उपलब्धियां गौण दिखने लगीं. वह नहीं चाहता था कि लोग उसे ‘हत्याओं के सौदागर’ के रूप में याद रखें. प्रायश्चित की डगर पर कदम बढ़ाते हुए उसने अपनी कुल संपत्ति का 94 प्रतिशत हिस्सा ट्रस्ट के नाम कर दिया. वह बड़ा काम था. प्रायश्चितबोध अथवा अपकीर्ति से बचने के लिए नोबेल ने जो किया, उसका सुफल उसके नाम से दिए जाने वाले पुरस्कारों के रूप में हमारे सामने है. आज वह संस्था विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, विश्व-शांति, साहित्य आदि क्षेत्रों में विशेष योगदान देने वाली प्रतिभाओं को पुरस्कृत करती है; और दुनिया को उन स्थितियों से उबारने हेतु कृत-संकल्प है, जिनके माध्यम से नोबेल ने अकूत संपदा अर्जित की थी. अपने नाम से पुरस्कारों की स्थापना नोबेल को कुशल व्यापारी सिद्ध करती है, जो मानता था कि दौलत से सब कुछ खरीदा जा सकता है. अपकीर्ति को ढकने लायक यश-प्रतिष्ठा भी.

आइंस्टाइन ने परमाणु बम का आविष्कार नहीं किया था. 1905 में ‘सापेक्षिकता का विशिष्ट सिद्धांत’ प्रस्तुत करते समय उन्होंने स्वयं को शांतिवादी घोषित किया था. 1929 तक वे स्वयं को अमन-पसंद कहते रहे. उस समय देश पर पूरे विश्व पर युद्ध के बादल मंडरा रहे थे. उनका दावा था कि यदि युद्ध घोषित होता है तो उसके कारण चाहे जो भी, वे हमेशा उसके विरोध में रहेंगे. हालात तब बदले जब 1933 में हिटलर ने जर्मनी में सत्ता संभाली और उसके नेतृत्व में जर्मनी युद्ध की राह पर चल पड़ा. देखते ही देखते पूरे विश्व का ध्रुवीकरण होने लगा. प्रकट रूप में आइंस्टाइन तब भी स्वयं को युद्ध-विरोधी घोषित करते रहे. उन्हीं दिनों एक सूचना अफवाह की तेजी से फैलने लगी कि जर्मनी परमाणु बम पर काम कर रहा है. इस डर को हवा देने में पूंजीपतियों की हथियार उत्पादक लाबी का भी योगदान था.

आइंस्टाइन के निष्कर्ष-सूत्र E=MC2 को आधार मानकर अमेरिकी वैज्ञानिक लियो सिज्लार्ड और यूजीन बिग्नर यूरेनियम के परमाणु के विखंडन पर काम कर रहे थे. वे चाहते थे कि अमेरिकी सरकार परियोजना को आगे बढ़ाने में उनका सहयोग करे. लेकिन उनकी हैसियत ऐसी नहीं थी कि सरकार को प्रभावित कर सकें. आइंस्टाइन इस काम को कर सकते थे, मगर वे शांति-समर्थकों में से थे. वे परमाणु बम के समर्थन में सरकार के आगे सिफारिश करने को तैयार होंगे, इसकी संभावना कम ही थी. अंततः किसी तीसरे आदमी की मदद से आइंस्टाइन को विश्वास दिलाया गया कि जर्मनी बम बनाने की कगार पर है. उसके वैज्ञानिक परमाणु विखंडन की तकनीक खोज चुके हैं. एक तानाशाह के हाथों में परमाणु शक्ति जाए, यह आइंस्टाइन भी नहीं चाहते थे. अनमने भाव से उन्होंने राष्ट्रपति रूजवेल्ट को पत्र लिखने की सहमति दे दी. पत्र का मसौदा सिज्लार्ड ने तैयार किया था.

पत्र मिलते ही रूजवेल्ट ने ‘ब्रिग्स समिति’ का गठन कर दिया. 1940 तक समिति सुस्त चाल से काम करती रही. बम निर्माण के लिए यूरेनियम के परमाणु के विखंडन में सफल होना पर्याप्त नहीं था. विपुल ऊर्जा के निमित्त उस प्रक्रिया को ‘चेन रिएक्शन’ में बदलने की चुनौती वैज्ञानिकों के सामने थी. आइंस्टाइन उस रहस्य को समझते थे. मगर वे तटस्थ थे. अचानक ‘ब्रिग्स समिति’ को आइंस्टाइन के हस्ताक्षर युक्त पत्र प्राप्त हुआ. उसमें जर्मनी का डर दिखाते हुए बम निर्माण के काम में तेजी लाने का आग्रह था. पत्र सिज्लार्ड द्वारा आइंस्टाइन के फर्जी हस्ताक्षर से लिखा गया था. उस समय तक ‘चेन  रिएक्शन’ का सिद्धांत वैज्ञानिकों की समझ में आ चुका था. राह आसान होते ही वैज्ञानिकों के दल का नेतृत्व कर रहे वेनेवर बुश ने आइंस्टाइन से सूचनाओं को छिपाना शुरू कर दिया. उसका मानना था कि आइंस्टाइन बम परियोजना को ‘उस तरह से गोपनीय नहीं रख पाएंगे, जिस तरह से उसे रखना चाहिए.’ अंततः परमाणु बम बना. उसकी विभीषिका हिरोशिमा और नागासाकी पर देखने को मिली, उसने पूरे विश्व को हिला दिया. आइंस्टाइन युद्ध की विभीषिका का अनुमान लगा चुके थे. इसलिए 1944 में ही सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक नील बोह्र को पत्र लिखकर उन्होंने कहा था कि युद्ध समाप्ति के उपरांत दुनिया के सभी देशों को विश्वशांति के लिए मिलकर काम करना चाहिए. नबंवर 1954 में अपनी मृत्यु से कुछ ही महीने पहले परमाणु बम के निर्माण को लेकर अपनी गलती स्वीकारते हुए उन्होंने कहा थाᅳ‘मैंने जीवन में एक बड़ी गलती की है….परमाणु बम के निर्माण को लेकर राष्ट्रपति रूजवेल्ट को पत्र लिखना. अपनी सफाई में मैं कह सकता हूं कि अमेरिका देर करता तो जर्मनी उसे पहले ही बना लेता.’ बम निर्माण में सीधा योगदान न होने के बावजूद आइंस्टाइन आजीवन ग्लानिबोध में डूबे रहे. कदाचित वही बतौर प्रायश्चित शांति-प्रयासों के रूप में सामने आया. विश्वशांति की स्थापना हेतु उन्होंने रवींद्रनाथ ठाकुर, बट्रेंड रसेल, महात्मा गांधी आदि के साथ मिलकर अथक प्रयत्न किए.

अब्दुल कलाम सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक, सफल इंजीनियर और भारतीय गणराज्य के 11वें राष्ट्रपति थे. उनके नेतृत्व में भारत में परमाणु शक्ति का दूसरा परीक्षण किया. वे श्रेष्ठ अभियंता और समर्पित वैज्ञानिक थे. वैज्ञानिक और विज्ञान व्यवस्थापक के रूप में  उन्होंने ‘रक्षा अनुसंधान एवं विकास परिषद’ तथा ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ के साथ चार दशकों तक सफलतापूर्वक काम किया. आइंस्टाइन विज्ञान का उपयोग शांति और समृद्धि के लिए करने के समर्थक थे. कलाम साहब का मानना था कि विकास के लिए शांति और शांति के लिए शक्ति का होना आवश्यक है. आधुनिक विज्ञान के पितामह कहे जाने वाले फ्रांसिस बेकन के कथन ‘ज्ञान ही शक्ति है’ पर उन्हें विश्वास था. हालांकि शक्ति-कामना से उनका मंतव्य संसाधनों की उपलब्धता और सुरक्षा से था. उनके कार्यकाल में भारत प्रक्षेपास्त्र प्रणाली तथा आग्नेयास्त्रों के उत्पादन में स्वावलंबी बना. ‘अग्नि’ और ‘पृथ्वी’ जैसे आग्नेयास्त्रों का निर्माण हुआ, जो परमाणु बम जैसे विध्वंसक अस्त्रों को ढोकर ले जा सकते हैं. जाहिर है तबाही में सहायक हैं.

तीव्र राष्ट्रीयताबोध छोटे-मोटे मनोभावों को आसानी से ढक लेता है. कलाम साहब के व्यवहार से ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता जिससे लगे कि मारक आग्नेयास्त्रों के निर्माण को लेकर उन्हें किसी तरह की आत्मग्लानि थी. सार्वजनिक जीवन की भारी-भरकम जिम्मेदारियों के रहते व्यक्तिगत मनोभावों का प्रकटीकरण संभव भी नहीं था. मगर कहीं न कहीं उन्हें विश्वास था कि युद्ध शासकों की विवेकहीनता की उपज होता है. सत्ता से जुड़े लोग निजी महत्त्वाकांक्षाओं को राष्ट्रभक्ति का दर्जा देकर जनसाधारण का भावनात्मक दोहन करते रहते हैं. विवेकवान समाज युद्धों को यथासंभव टालता है. उसके लिए आवश्यक है कि लोग दिलो-दिमाग से स्वतंत्र हों. महत्त्वपूर्ण निर्णय अपने विवेक से लेना पसंद करते हों. वे बेहतर सरकार के लिए बेहतर समाज की रचना में यकीन रखते थे. इसलिए राजनीतिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने के साथ ही उन्होंने खुद को युवाओं और किशोरों में ज्ञार्नाजन की ललक जगाने के लिए समर्पित कर दिया था. 1999 में सलाहकार वैज्ञानिक के पद से मुक्ति के बाद उन्होंने दो वर्ष के भीतर एक लाख विद्यार्थियों से मिलकर उनमें ज्ञान-चेतना जगाने का संकल्प लिया था. उनका कहना था कि उन्हें बड़ी कक्षा के विद्यार्थियों की अपेक्षा हाईस्कूल स्तर के विद्यार्थियों को संबोधित करने में अधिक खुशी मिलती है. मृत्यु के दिन भी वे ‘इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ मेनेजमेंट’ में ‘पृथ्वी को रहने लायक ग्रह’ बनाने जैसे विषय पर वक्तव्य देने के लिए के लिए शिलांग पहुंचे हुए थे. यह सब उनके वर्तमान के प्रति असंतोष को दर्शाता है, जिनमें उनकी अपनी उपलब्धियां भी शामिल थीं.

जाहिर है चारों महान हस्तियां जिनका हमने ऊपर उल्लेख किया, अपनी उपलब्धियों से घबराई हुई थीं. ध्वंस या उसकी तैयारी में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष भागीदारी का एहसास तथा उससे उत्पन्न ग्लानिबोध आजन्म उनके दिलो-दिमाग पर छाया रहा. उनके जीवन को समझना मानव-व्यक्तित्व की जटिल गुत्थियों से दो-चार होना है. वस्तुतः कोई भी मनुष्य नितांत अच्छा या बुरा नहीं होता. व्यक्ति का परिवेश उसके निर्णय को प्रभावित कर, उसे अच्छा या बुरा बनाता है. कार्य चाहे जैसा हो कर्ता के पास उसके समर्थन में कोई न कोई तर्क होता है. यानी मनुष्य की कोशिश मूलतः खुद को ‘अच्छा’ सिद्ध करने की होती है. उस समय कर्ता यदि ऊंचे पद पर हो तो उसके अच्छे या बुरे निर्णय से इतिहास करवट लेने लगता है.

भारतीय मनीषा ने मति को चंचल माना है. उसपर विवेक का अंकुश अनिवार्य है. आत्मा के बारे में कहा गया है कि वह मनुष्य की सच्ची मार्गदर्शक होती है. भटकाव के समय मनुष्य को सावधान करती है. इसलिए आस्थावादी उसे ईश्वर का अंश मानते आए हैं. फ्रायड ने मानव-वृत्तियों को ‘इद’(Id), ‘ईगो’(Igo) तथा ‘सुपर ईगो’ में बांटा है. इन्हें क्रमशः ‘इदम्’, ‘अहम्’ और ‘अतिअहं’ भी कहा जा सकता है. ‘इदम्’ मनुष्य की विशेष मनोवृत्ति है. इसके प्रभाव से सुखासक्ति और वासना जैसी मूलभूत ऐषणाओं की उत्पत्ति होती है. ये मनुष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं. ‘ईगो’ अथवा ‘अहम्’ मानव-व्यवहार को समाज द्वारा निर्धारित मर्यादाओं में रखने की कोशिश करता है. यह वैध इच्छाओं, जिन्हें समाज की स्वीकृति प्राप्त हैᅳकी उत्पत्ति के लिए भी जिम्मेदार होता है. ‘सुपर ईगो’, ‘इदम्’ (मनुष्य की तमाम सुखेच्छाओं) तथा ‘ईगो’ (समाज द्वारा मान्य सुखेच्छाओं) के बीच समन्वय और नियंत्रण की भूमिका निभाता है, इसलिए इसको ‘विवेक बुद्धि’ भी कहा गया है. इनके अलावा मानव-व्यक्तित्व के कुछ अन्य लक्षण भी होते हैं, जो जन्मजात, कदाचित प्रकृति की ओर से उपहार में प्राप्त होते हैं. यह कि प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र रहना चाहता है. इसके साथ-साथ हरेक मनुष्य न्याय और अच्छाई को सद्गुण मानता है. अपने प्रत्येक निर्णय को न्यायोचित ठहराने की वांछा इसी से अभिप्रेत होती है. लेकिन अपने आपको ‘अच्छा’ सिद्ध करना, यानी अपने पक्ष को तर्कसम्मत ढंग से पेश करना तथा प्रत्येक कृत्य को न्याय-संगत सिद्ध करना अलग-अलग बाते हैं. खुद को ‘अच्छा’ सिद्ध करते समय मनुष्य अपने दृष्टिकोण से बंधा होता है. उस समय वह हालात का अपने विवेकानुसार विवेचन और इस्तेमाल करता है. जबकि खुद को न्यायसंगत सिद्ध करते समय उसे समाज द्वारा निर्धारित कसौटियों पर खरा उतरना पड़ता है. सामान्य मनुष्यों के लिए इसमें बहुत अंतर नहीं पड़ता. वे प्रायः रोजी-रोटी के संघर्ष में उलझे होते हैं. उनके जीवन-संघर्ष और भटकावों में सामान्य एकरूपता होती है. जैसे झूठ बोलना, नशा करना, यह मानते हुए भी कि जीव-हत्या पाप हैᅳमांस का सेवन करना. इस सूची को मिलावट और छोटी-मोटी बेईमानी तक बढ़ाया जा सकता है. चूंकि सामान्य लोगों के लक्ष्य भी सामान्य होते हैं, अतएव दूसरे उनके बारे में क्या सोचते हैं, इसकी उन्हें परवाह नहीं होती. समाज ऐसे विचलनों को प्रायः नजरंदाज कर देता है. उनसे ऊपर के लोगों की सामान्य इच्छा होती है कि समाज उनकी विशिष्टताओं का सम्मान करे. जबकि अतिविशिष्ट किस्म के लोग जिन्हें लगता है कि वे आने वाले इतिहास का हिस्सा हैं, अपनी छवि-निर्माण के प्रति खासे सतर्क होते हैं. अपवादों से खुद को दूर रखना उनकी प्रवृत्ति होती है. अपवाद का भय एकाएक भी उत्पन्न हो सकता है. जैसा अल्फ्रेड नोबेल के साथ हुआ था. और किसी महान हस्ती या विचार के संपर्क में आने के बाद भी. जैसे अशोक के मामले में. व्यक्ति बहुत संवेदनशील हो तो अपवाद की संभावना ही उसे विचलित किए रहती है. सृजनशील मानस उसका तोड़ अपनी सर्जना से ही निकालता है.वह पुनः नवनिर्माण की राह पर निकल पड़ता है. जैसे आइंस्टाइन ने किया. युद्ध की विभीषिका को टालने के लिए वे निरंतर युद्ध विरोधी अभियान का हिस्सा बने रहे. कलाम साहब भी बेहतर समाज की संरचना के लिए हमेशा समर्पित रहे.

आत्मग्लानि से गांधी जैसा परंपरावादी भी बच नहीं पाया था. पिता की मरणासन्न अवस्था में पत्नी के साथ सहवासरत रहने का अपराधबोध उनके मन में ऐसा पैठा था उसके समाहार हेतु ब्रह्मचर्य प्रयोगों में लगे रहकर अपनी ही बनाई कसौटी पर खुद को कसते रहे. अपराधबोध और आत्मग्लानि बहुत अधिक बढ़ जाए और उसके समाहार का कोई रास्ता न दिखे तो बात जान पर भी बन आती है. छायाकार केविन कार्टर का उदाहरण सामने है. यथार्थवादी छायाकार बनने की कोशिश में वह कब यथार्थ से कट गया, उसे पता ही नहीं चला था. तीन दशक पहले दक्षिणी अफ्रीका में जघन्य अपराधियों को मृत्युदंड देने के लिए बेहद नृशंस तरीका अपनाया जाता था. उसमें अपराधी की छाती और बांहों को पैट्रोल भरे टायर से कसकर बांध दिया जाता, फिर उसमें आग लगा दी जाती. अपराधी तड़फते हुए जान देता. दिल दहला देने वाली उन घटनाओं को कैमरे में कैद करने वाला कार्टर पहला छायाकार बना. शुरू में उसे वे घटनाएं स्तंभित करती थीं. बाद में जब लगा कि लोग उनमें रुचि लेते हैं, तो उसे वह अपने कार्य सामान्य हिस्सा मानकर करने लगा. उसकी पराकाष्ठा सूडान के अकाल में सामने आई. भीषण अकाल की मार झेल रहे इलाकों का निरीक्षण करते हुए कार्टर ने एक चित्र खींचा, जिसमें भूख से बिलबिलाती अबोध बच्ची दाने की तलाश में जमीन पर झुकी है. उसके पीछे घात लगाए एक गिद्ध बैठा है. गिद्ध को उड़ाए बिना केविन ने उस बच्ची के कई चित्र लिए. उनमें से एक चित्र ‘न्यूयार्क टाइम्स’ के 26 मार्च 1993 के अंक में प्रकाशित हुआ. उसके लिए केविन को ‘पुल्तिजर पुरस्कार’ प्रदान किया गया. सूडान के अकाल की विभीषिका से पूरी दुनिया को परचाने के लिए उसे सर्वत्र सराहना मिली. लेकिन कुछ ही दिन बाद चित्र पर सवाल उठने लगे. लोग उस बच्ची के बारे में जानना चाहते थे. केविन ने सफाई देने की कोशिश की कि संक्रामक रोगों की आशंका के चलते पत्रकारों और फोटोग्राफरों को भुखमरी के शिकार लोगों को छूने की मनाही थी. मगर आलोचनाएं बदस्तूर जारी रहीं. केविन की तुलना उस बच्ची के पीछे घात लगाकर बैठे गिद्ध से की जाने लगी. इससे वह प्रतिभाशाली छायाकार अवसाद में रहने लगा. अवसाद इतना बढ़ा कि उसे जीवन से मौत आसान दिखने लगी. आत्महत्या के लिए भी उसने बड़े ही दर्दनाक तरीके को अपनाया.

इन कहानियों से पता चलता है कि मनुष्य के लिए केवल अच्छा होना पर्याप्त नहीं है. अपने अच्छेपन को दूसरों के अच्छेपन को उबारने के लिए प्रयुक्त करना, ताकि अधिक से अधिक लोगों का कल्याण हो, ही सच्ची मानवता है.

ओमप्रकाश कश्यप

 

1. Amidst the tens of thousands of names of monarchs that crowd the columns of history, their majesties and graciousnesses and serenities and royal highnesses and the like, the name of Ashoka shines, and shines, almost alone, a star.’ H. G. Wells, The Outline of History.
2. Le marchand de la mort est mort (“The merchant of death is dead”)….”Dr. Alfred Nobel, who became rich by finding ways to kill more people faster than ever before, died yesterday.”Golden, Frederic (16 October 2000). in The Worst and The Brightest , Time.

 

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