चलते-चलते : बचपन पर विमर्श

बालक के मनोविज्ञान को लेकर हमारी जानकारी सिर्फ अनुमान केंद्रित होती है. हम उसे जितना सहज-सरल मानते हैं, वह उतना ही जटिल होता है. हम बचपन की सोचते हैं, वह बचपन से दूर जाने की सोचता है. इसका मतलब यह नहीं है कि बालक के लिए बचपन जेल होता है. बचपन बालक के लिए खेल का मैदान है, जहां वह खुद कप्तानी करता है और चाहता है कि बड़े सिर्फ तमाशा देखें, हस्तक्षेप न करें.

 

किसी भी लेखक या साहित्यकार से पूछ लीजिए. खासकर उससे जो बच्चों के लिए लिखता और बालमनोविज्ञान का पारखी होने का दावा करता हो. हर कोई कहेगा कि बच्चों के लिए लिखना बहुत कठिन है. परकाया प्रवेश जैसा. एक तरह से दूसरे की मानसिकता को जीना, कथापात्र की मनोस्थिति में रमना, फिर लिखना. उनकी माने तो लेखक को इस काम के लिए बचपन की उस पृष्ठभूमि की ओर लौटना पड़ता है, जिसे वह उम्र के अंतराल में बहुत पीछे छोड़ आया है. यह प्रक्रिया जटिल बताई गई है, इसलिए बच्चों के लिए लिखना सामान्यतः मुश्किल मान लिया जाता है. यह सही है या गलत, पता नहीं. लेकिन बच्चों के लिए लिखने से पीछा छुड़ाने का यह अच्छा बहाना लगता है. बालसाहित्य लेखन को चुनौतीपूर्ण कहने वाले लेखकों में अधिकांश वे हैं, जो उसे ज्यादा तवज्जो नहीं देते. उन्हीं में से कुछ बालसाहित्य और बालसाहित्यकार दोनों को दोयम दर्जे का मानते हैं. एक ओर तो यह कहना कि बच्चों के लिए लिखना कठिन है. दूसरी ओर जो लिखने की हिम्मत जुटाएं उन्हें दोयम दर्जे के लेखक, साहित्यकार घोषित कर देना! इस विरोधाभास का शिकार केवल लेखक नहीं हैं. अध्यापन जगत से जुड़े विद्वान भी कुछ ऐसा ही मानते हैं. वहां भी बच्चों को पढ़ाने का काम कठिन माना जाता है. इसके बावजूद जो उस जिम्मेदारी को निभाते हैं, उन्हें ‘मास्टरजी’ कहकर हल्के में लिया जाता है. बच्चों को लेकर यह सोच जान-अनजाने समाज के सभी वर्गों में व्याप्त है. किसी न किसी रूप में हम सभी मान लेते हैं कि बालक वह है जो बड़ा नहीं है. और जो बड़ा नहीं है, उसे बड़ा बनाने के लिए अपने विचार, अपनी मान्यताएं, अपने सपने, आग्रह-दुराग्रह यहां तक कि अपनी कुंठाओं को भी उनपर लादने के अधिकार हमें प्राप्त हैं.

मेरे विचार में परामनोविज्ञान या पराकल्पना जिसके माध्यम से पीछे छूट चुके बचपन का वर्षों बाद पुनः अनुभव कर सकेंᅳकोई चीज नहीं होती. ऐसा भी नहीं है कि लेखक जो लिखता है, वह सत्य से सर्वथा परे, निरी मनोरचना होता है. श्रेष्ठ लेखक व्यक्तिगत सत्य या कार्य-कलापों से सार्वजनिक सत्य निकालने की कला में दक्ष होता है. यही उसका लेखकीय कौशल है. इसके लिए उसके पास कल्पना, संवेदनशीलता. अभिव्यक्ति कला जैसे कुछ विशेष उपकरण होते हैं. कल्पना उसे अपने कथापात्रों के मानस में झांकने, उससे अंतरंग होने में मदद करती है. उसके माध्यम से लेखक अपने कथापात्रों तथा कथावस्तु का सामान्यीकरण करता है. यह व्यैक्तिक सत्यों से सार्वभौम सत्य तक पहुंचने की यात्रा है, उसमें निपुण व्यक्ति ही साहित्यकार या विचारक होने का दावा कर सकता है. संवेदनशीलता लेखक को अपने कथापात्रों के मन में झांकने, उनसे अंतरंग होने तथा उसके अंतर्द्वन्द्वों को समझने का अवसर प्रदान करती है. अभिव्यक्ति कला पाठक को रचना के प्रवाह में बहा ले जाने का कौशल है. ये सब लेखक के अपने अनुभव एवं बौद्धिक सामर्थ्य पर भी निर्भर करते हैं. इसलिए खास विषयवस्तु को लेकर अलग-अलग लेखक की प्रस्तुतियों में अंतर होता है. दूसरे शब्दों में पराकल्पना या परामनोविज्ञान यानी दूसरे की मनस्थिति के अनुसार खुद का अंतरण कर लेना सिवाय परिकल्पना के कुछ नहीं है.

जिसे दूसरे की अवस्था में अंतरण यानी परकाया प्रवेश कहते हैं वह लेखक द्वारा अपने कथापात्र तथा उसकी परिवेश के साथ अंतरंग होना है. यह बड़ों की रचना के लिए भी उतना ही आवश्यक है, जितना बालसाहित्य की रचना के लिए. उसके अभाव में रचना प्रामाणिक हो ही नहीं सकती. यहां बालसाहित्यकार और मनोवैज्ञानिक की कार्यशैली के अंतर को समझा जा सकता है. बच्चों के लिए लिखने या बच्चों पर लिखने के लिए उनकी मनोभूमि को समझना जरूरी है. यह खुद को बालक के समानांतर रखकर संभव है. यह जानना भी जरूरी है कि दुनिया को समझने का बालक का अपना तरीका होता है. जिस वस्तु को उसे समझना हो, पहले वह उसे अपने व्यक्तित्व के समानांतर धरातल पर ले आता है. इसके अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं. अधिकांश बालक मिठाई खाना पसंद करते हैं. परंतु आवश्यक नहीं कि जिस मिठाई को बड़े चाव से खाते हों, बालक को उतनी ही पसंद हो. बालक का मन. महंगी मिठाइयों को नकार कर वह मामूली मीठी गोलियों से भी बहल सकता है. वे बालक को अपने व्यक्तित्व के अनुकूल लगती हैं. छोटेपन का एहसास तक नहीं होने देतीं. कह सकते हैं कि बालक का सबसे बड़ा बचपना यही है कि वह खुद को बालक नहीं समझता. बच्चों के लिए यह सोचकर लिखने वाले कि उसके लिए बालक की मनोभूमि को उसी के स्तर पर आकर समझना आवश्यक है, प्रकारांतर में अपने ही बचपन को याद करने लगते हैं. उस दौर में पहुंचने की कोशिश करते हैं, जब वे स्वयं बालक हुआ करते थे. उस समय वे अपनी उम्र के अंतर को भूल जाते हैं. उन सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों को भी भूल जाते हैं, जिनसे समाज उस अंतराल में गुजर चुका है. नतीजा यह होता है कि उनकी रचनाएं अतीतमोह की शिकार नजर आती हैं. बालसाहित्य की रचना को अनुभूति-सिद्ध बनाने का सही रास्ता यह है कि किसी बालक को देखते, उसके कार्यव्यवहार का सूक्ष्म निरीक्षण करते हुए यथार्थवादी लेखन किया जाए. यह काम कवि की संवेदना, वैज्ञानिक जैसी विवेचना, धीरज तथा पैनी नजर की मांग करता है. आम तौर पर लेखक इससे परहेज करते हैं. कई बार वैसा अवसर भी उनके पास नहीं होता. इसलिए बालसाहित्य के नाम पर लिखी जाने वाली अधिकांश रचनाएं बालमनोविज्ञान पर कसौटी पर खरी नहीं उतर पातीं.

 

कमोबेश सब मानते हैं कि बालक बौद्धिक स्तर पर अपरिपक्व होता है. या कम से कम वे बातें नहीं जानता जिन्हें ‘बड़े’ जानते हैं क्या वह व्यक्तित्व के स्तर पर भी छोटा होता है? लेख के अगले हिस्से में हम इसी पर विचार करेंगे. इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि बालक किसे कहा जाए? बाकी प्राणियों की भांति बालक भी धीरे-धीरे बढ़ता हुआ भरपूर कद-काठी प्राप्त करता है. सुरक्षा और जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए माता-पिता पर निर्भर होता है. उनसे सीखते, उनकी नकल करते हुए जीवन का पहला पाठ पढ़ता है. समय के साथ उसके मस्तिष्क का भी विकास होता है. अनुभव में वृद्धि होती है. फिर बड़ा होकर एक दिन स्वयं माता या पिता बनता है. बच्चे के अनेक गुण, आदतें उसे अपने माता-पिता की ओर से विरासत में प्राप्त होती हैं. इस आधार पर कुछ लोग बालक को बड़ों का लघु संस्करण मानते हैं. कुछ समय पहले तक पश्चिम में भी बालक को युवा-वयस्क(यंग एडल्ट) कहने का चलन रहा है. मध्यकाल तक दुनिया के प्रायः सभी देशों में ऐसा रहा है. लोग अपनी संतान से प्यार करते थे. उसे अगली पीढ़ी के रूप में तैयार करते थे. मगर उनके निर्णय अथवा विचार का कोई मोल नहीं था. आधुनिक विद्वान, खासकर मनोवैज्ञानिक इसे मानने को तैयार नहीं हैं. उनके अनुसार मनुष्य की विकास प्रक्रिया शेष जीव-जगत या वनस्पतियों के विकास से भिन्न है. मनुष्य को छोड़कर बाकी सब का विकास पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर होता है. उनमें न तो स्वतंत्र निर्णय लेने का सामर्थ्य होता है, न परिस्थितियों को बदल देने की इच्छाशक्ति. जबकि बालक ऊर्वर मस्तिष्क का स्वामी होता है. वह अपने फैसले स्वयं लेना पसंद करता है. उसमें नएपन के प्रति तीव्र आकर्षण होता है. रूसो के अनुसार बालक जिन तीन स्रोतों का ज्ञानार्जन की आधार-साम्रगी के रूप में इस्तेमाल करता है, उनमें समाज, प्रकृति और वस्तु जगत सम्मिलित हैं.

 

सृष्टि में मनुष्य अकेला विवेकशील प्राणी है. परंतु विवेक जन्मजात नहीं होता. जन्मजात जिज्ञासा होती है. कौतूहल होता है. शोध बताते हैं कि गर्भस्थ भ्रूण भी बाहर की हलचलों के प्रति संवेदनशील होता है. चार महीने का शिशु आहट पर चैंकने लगता है. छह महीने के बाद वह अपने स्वतंत्र एवं एकीकृत अस्तित्व को महसूस करने लगता है. धीरे-धीरे वही एहसास देहासक्ति में ढल जाता है. मां और अपने छोटे-भाई बहनों को देखकर बालक यह सोचने लगता है कि वह दूसरों से अलग है. यहां तक कि मां के साथ एकमेव न होकर अन्य है. इसी के साथ अपने-पराये की भावना भी जन्म ले लेती है. मां जब उसे शीशा दिखाती है तो उसका विश्वास और भी मजबूत हो जाता है. फ्रांसिसी मनोविज्ञानी जेकुइस लकां इसे आत्ममोह की शुरुआत का क्षण मानते हैं. वह मान लेता है कि जो दर्पण में है, वही वह है. लेकिन वह नहीं जान पाता कि छवि उसकी इयत्ता न हो कर केवल उसका प्रतिबिंब है. उस समय दर्पण में बालक की प्रतिछाया के साथ आसपास की वस्तुओं के प्रतिबिंब भी होते हैं. उनमें अपने प्रतिबिंब को देख बालक परिवेश के बीच अपनी उपस्थिति को महसूसता है. इससे उसकी मानसिक सक्रियता का अनुमान लगाया जा सकता है. इसी प्रकार की घटनाएं बालक के अहं के विकास का कारण बनती हैं. हालांकि उसकी नींव ऐसी समझ पर टिकी होती है, जो प्रतिबिंब होने के कारण यथार्थ से परे है.

जाहिर है, अनुभव के अलावा फंतासियां और कल्पनाएं भी बालक के प्रबोधीकरण में महत्त्चपूर्ण भूमिका निभाती हैं. आशय है कि विकास को केवल दैहिक परिवर्तन की कसौटी द्वारा तय नहीं किया जा सकता. दर्शन की निगाह में मस्तिष्क को देह से शक्तिशाली माना गया है. प्लेटो का विचार था कि ज्ञान कुछ और नहीं, मस्तिष्क में पहले से ही मौजूद प्रत्ययों का पुनःसंग्रहण है. दर्शन, गणित और विज्ञान में समान दखल रखने वाले रेने देकार्त की मान्यता भी लगभग मिली-जुली थी. ‘मोम की गैंद’ के साथ किए गए अपने चर्चित प्रयोग द्वारा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि वस्तु-विशेष के बारे में हमारी निष्पत्तियां मस्तिष्क में पहले से ही मौजूद प्रत्ययों का उत्स होती हैं. देकार्त को आधुनिक पश्चिमी दर्शन का पितामह माना गया. तथापि बालक के बारे में सच्ची उत्सुकता पैदा करने वाला विचारक थाᅳजॉन लॉक. मस्तिष्क को ‘टेबुला रासा’(कोरी सलेट) बताकर लॉक ने प्लेटो और रेने देकार्त की अवधारणाओं को एकदम उलट दिया था. अपने लेख ‘एन ऐस्से कन्सर्निंग ह्यूमेन अंडरस्टेंडिंग’ में अपनी मूल अवधारणा कि जन्मजात बोध जैसा कुछ नहीं होता, का बचाव करते हुए उसने लिखा था कि बालक अपना बोध ‘अपने परिवेश, संवेदनशील वस्तुओं तथा परिजनों से ग्रहण करते हैं.’ उसका मानना था कि बालक उस समय तक किसी नए ज्ञान या व्यक्ति के प्रति आकर्षित नहीं होता, जब तक वह ऐसी किसी जानकारी या व्यक्ति संबद्ध न हो, जिससे वह पहले से ही परिचित है. लॉक का यह भी मानना था कि शिशु की ‘कोरी सलेट’ कोरी भले हो, निष्क्रिय नहीं होती.

‘मैं इससे इन्कार नहीं करता कि (जन्म के समय से ही) मानव-मस्तिष्क में कुछ नैसर्गिक प्रवृत्तियां मौजूद होती हैं. बेहद महत्त्वपूर्ण. उनमें से कुछ एक-दूसरे का समर्थन करती हैं. कुछ जोरदार विरोध. कुछ लंबे समय तक अड़ी रह सकती हैं. कुछ एकाएक उड़न-छू हो जाती हैं. परंतु वे अनुभूतियां मनुष्य के बोध अथवा बोधगम्यता की क्षमता को कतई प्रभावित नहीं करतीं.’1

शिशु के मस्तिष्क को ‘कोरी सलेट’ बताकर लॉक ने शिक्षाशास्त्रियों और धर्माचार्यों का ध्यान एकाएक उसकी ओर मोड़ दिया था. अध्यात्मवादियों को लगा कि बालक के मस्तिष्क में धर्म की नींव जमाने के लिए शिक्षा सर्वोत्तम माध्यम है. इसलिए उनके नेतृत्व में पुस्तकों में अधिकाधिक धार्मिक सूचनाएं जोड़ी जाने लगीं. शिक्षा-विज्ञानियों की ओर से शिक्षा पद्धति में आमूल बदलाव की मांग की जाने लगीं. लेखकों और साहित्यकारों का ध्यान भी बच्चों की ओर गया. यह मानते हुए कि बालक भविष्य का नागरिक है, वे साहित्य के माध्यम से उसके प्रबोधीकरण का संकल्प उठाने लगे. इससे बालसाहित्य की अवधारणा ने जन्म लिया. आधुनिक विचारक लॉक की मान्यता को ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं करते. लेकिन वे ज्ञानार्जन में अनुभव की महत्ता से इन्कार नहीं करते. मानते वे भी हैं कि बच्चों और बड़ों के बौद्धिक सामर्थ्य में अंतर होता है. इस दृष्टि से विचार किया जाए तो बालक से बड़े बनने की प्रक्रिया को विवेकीकरण के पैमाने पर शून्य या उससे थोड़ा ऊपर से लेकर अधिकतम तक दर्शाया जाना चाहिए.

 

शैशव को लेकर जो परिभाषाएं हैं उनमें उसे विकास की अवस्था माना गया है. जीवविज्ञान के अनुसार भी बालक, ‘जन्म से युवावस्था के बीच विकासमान मानुषिक प्राणी है.’ विधिशास्त्री भी मिली-जुली परिभाषा देते हैं. उनके अनुसार, ‘बालक जन्म से लेकर वयस्कता की अवधि तक का मानुषिक प्राणी है.’ इस तरह वयस्कता की शुरुआत को बचपन की अंतिम सीमा माना गया है. संतानोत्पत्ति में सक्षम होते ही मानुषिक प्राणी बालकपन की सीमा को पार कर जाता है. दोनों परिभाषाओं में विवेकशीलता को जो मानवीकरण का प्रमुख लक्षण है, कोई स्थान नहीं दिया जाता. इससे उसका अध्ययन बालक के दैहिक परिवर्तन तथा उसकी सामान्य रुचियों तक सिमट जाता है. उसकी मनोभूमि की हलचलों को प्रायः उपेक्षित कर दिया जाता है. रूसो ने बालक को स्वायत्त मानुषिक प्राणी माना है. उसके अनुसार बालक का विकास उसकी अपनी चेतना का परिणाम होता है. उसपर केवल वातावरण का प्रभाव पड़ता है. उसका मानना था कि बालक के विकास में समाज या अभिभावकों की भूमिका अनुकूल वातावरण के सृजन तक सीमित होनी चाहिए. उसे तत्कालीन समाज और उसकी संरचना से बेहद शिकायत थी. वह उन्हें मनुष्य की स्वतंत्रता में बाधक मानता था. उसका विचार था कि अधिकांश अवसरों पर मौलिकता की खोज में समाज की भूमिका नकारात्मक होती है. ऊपर से अनेक प्रकार की बंदिशें. बालक चूंकि ज्ञानार्जन की प्रेरणा समाज से ही लेता है, इसलिए मौलिक ज्ञान को सहेजने, उसकी खोज करने की उत्सुकता धीरे-धीरे कम होने लगती है.

रूसो के अनुसार लोग जिसे समाजीकरण कहते हैं, असल में वह विवेकीकरण की प्रक्रिया में अवमंदन की अवस्था भी है. समाज बालक के निर्णय-सामर्थ्य को अपने हिसाब से संतुलित करना चाहता है. व्यक्ति और समाज दोनों भला इसी में है कि बालक के विवेक-स्वातंत्र्य को पहचाना जाए. उसे बढ़ावा दिया जाए. अधिकांश पश्चिमी विद्वानों ने रूसो का समर्थन किया है. भारतीय परंपरा में भी बालक के निर्णय-स्वातंत्र्य को नकारा गया है. कुछ ऐसे उदाहरण अवश्य हैं जिनमें बालक अपने चयन-सामर्थ्य का उपयोग करता है. परंतु प्रसंगों के उल्लेख का उद्देश्य बालक के स्वतंत्र विवेक अथवा ज्ञानार्जन के प्रति उसकी ललक में भरोसा पैदा करना नहीं था. उनके माध्यम से धार्मिक-सांस्कृतिक रूढ़ियों में जकड़े समाज की असल मंशा आने वाली पीढ़ियों पर अपने विश्वासों और पूर्वाग्रहों को लादे रखने की थी. ध्रुव और नचिकेता इसके उदाहरण हैं. दोनों बालक चुने गए मार्ग पर चलने की दृढ़ता दिखाते हैं. सांस्कृतिक इतिहास में प्रशंसित होते हैं. परंतु उन चरित्रों के गढ़ने का उद्देश्य बालमनोविज्ञान या बालसाहित्य को समृद्ध करना नहीं है. असल मंशा प्रतिगामी ब्राह्मणवादी संस्कारों के लिए जमीन तैयार करना है.

 

बालक के बारे में अभी तक हम जितना समझते हैं, उसके अनुसार बच्चों और बड़ों के बीच बौद्धिक सामर्थ्य के आधार पर विभाजन असंभव है. बावजूद इसके बालक और बालसाहित्य दोनों की उपेक्षा की जाती है? उपेक्षा न भी हो तो भी बच्चों के निर्णय-सामर्थ्य को, बड़ों की तुलना में कमतर आंका जाता है. इसलिए कि समाज के अधिकांश कार्यकलापों में मानवीय मेधा, विशेषकर ज्ञान तथा उसे प्रत्यक्ष या परोक्ष बढ़ावा देने वाली सामग्री का बहुत सीमित उपयोग होता है. उसके अधिकांश कार्यकलाप परंपरा और संस्कृति से संचालित होते हैं. परंपरापोषी समाजों में जहां पीढ़ियों का अनुभव मौलिकता पर भारी पड़ता है, वहां निर्णय-प्रक्रिया में ज्ञान के मौलिक संसाधनों की अपेक्षा अनुभव का दखल बढ़ जाता है. रूढ़ियां ज्ञान का विकल्प मान ली जाती हैं. चूंकि मनुष्य की अपेक्षा कुल समाज का अनुभव हमेशा अधिक होता है. ऐसे समाजों में व्यक्ति का निरंतर अवमूल्यन होता है. अकेले या कुछ प्राणियों का ज्ञान निरंकुश शासन की नींव बनता है. समाज तर्क के स्थान पर बल से संचालित होने लगता है. जबकि ज्ञान में अधिकतम की साझेदारी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को पुष्ट कर, उन्हें स्थायी बनाती है.

समाज किसी व्यक्ति नहीं, सैकड़ों, हजारों पीढ़ियों से बनता है. जो जितना पुराना होता है, उसका डर भी उतना ही बड़ा होता है. इस आधार पर कहा जा सकता है कि समाज का डर तर्कसम्मत है. इसका अर्थ यह भी है कि जो केंद्र में हैं, वे अपने विशेषाधिकारों को एकाएक छोड़ना नहीं चाहते. कभी संबंधों के नाम पर, कभी किसी और बहाने, संपत्ति और संसाधनों पर एकाधिकार की प्रवृत्ति हर समाज में रही है. इसके लिए वे परंपरा और संस्कृति को सुरक्षा-कवच की भांति इस्तेमाल करते आए हैं. यही कारण है कि मध्यकाल तक, यानी जब तक सामंतवाद सबसे मजबूत स्थिति में रहा, बालक को लेकर समाज में उदार सोच बन ही नहीं पाया था. उदार सोच का आशय बालक के प्रति सहजानुराग तक सीमित नहीं है. प्यार तो पशु-पक्षी भी अपने बच्चों से करते हैं. परंतु वे अपनी संतान को उनके कंधों पर परंपरा और संस्कृति का बोझ डालकर बड़ा नहीं करते. उनके बच्चों के अपने पंख होते हैं, अपनी ही उड़ान. वे उनका भरपूर लाभ उठाते हैं.

भारत जैसे देशों में जहां धर्म और जातिवाद व्यक्ति और समाज की मनोरचना पर छाए रहते हैं, मस्तिष्क आज भी सामंती प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाया है. लोग डरते हैं. बात-बात पर डरते हैं. इतना डरते हैं कि छोटा बालक भी उनके असुरक्षाबोध को बढ़ा देता है. बालक की जिज्ञासा, सीखने की उसकी ललक, उसकी प्रश्नाकुलता उन्हें परेशान किए रहती है. उनके अवचेतन में एक डर यह भी पैठा रहता है कि परंपरा और संस्कृति के स्थान पर  सामाजिक पद-प्रतिष्ठा की कसौटी, प्रतिदिन कुछ नया सीखने की दर को बना दिया जाए तो उनमें से अधिकांश ‘बड़े’ एक झटके में स्पर्धा से बाहर हो जाएंगे. कारण यह कि तीन-चार वर्ष के शिशु की सीखने की ललक प्रौढ़ व्यक्तियों से सौ गुना तक हो सकती है. चार-पांच वर्ष का बालक अपने परिवेश के प्रति सजग होता है. वह प्रतिदिन औसतन साढ़े-चार सौ प्रश्न अपने माता-पिता और अभिभावकों से करता है. जबकि आसपास के परिवेश को जानने के लिए बड़े बहुत जरूरी होने पर भी, दो-चार प्रश्नों से अधिक नहीं कर पाते हैं. जब तक कोई मजबूरी न हो, सहज जिज्ञासाओं का समाधान खोजने की रुचि तक उनमें नहीं होती. ऐसे लोग बालक के कौतूहल का समाधान करने के बजाए उसे डांटकर चुप कर दिया करते हैं. बालक की प्रश्नाकुलता दम तोड़ने लगती है. फिर भी किशोरावस्था तक बालक में प्रतिदिन कुछ न कुछ नया सीखने की ललक बनी रहती है, जबकि तथाकथित बड़े सीखे हुए को भूलने, परंपरा की पालकी ढोने को ही अपना धर्म माने रहते हैं.

इन दिनों हालांकि हालात सुधरे हैं. एकल परिवारों और अर्थव्यवस्था दोनों में बच्चे केंद्र में आ चुके हैं. घरों का बजट बच्चों को ध्यान में रखकर बनने लगा है. इसलिए बच्चों के लिए आकर्षक पुस्तकें छापने का चलन बढ़ा है. शिक्षा के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है. मगर उसी अनुपात में साहित्य के प्रति जागरूकता नहीं बढ़ पाई है. बल्कि पाठ्य पुस्तकों के दबाव के कारण बच्चों को पाठेत्तर पुस्तकों से जानबूझकर अलग किया जाने लगा है. बच्चों को स्पर्धा के लिए तैयार जो करना है. साहित्य सहयोग और समन्वय की नीति पर चलकर धीरे-धीरे अपना काम करता है. वह सार्वजनिकता में विश्वास रखता है. किसी कविता या कहानी का पात्र कोई एक लड़का या लड़की हो सकती है. लेखक का ध्येय उस ‘एक’ को केंद्र बनाकर ऐसे सत्य का उद्घाटन करना है, जो ‘अनेक’ पर भी खरा उतरता हो. इस कार्य के लिए लंबे अनुभव और बौद्धिक सामर्थ्य की दरकार होती है. इसलिए यह कहना कि बालक के बारे में लिखने के लिए बालक जैसा बनना पड़ता है, बचकानी बात है. बालमनोविज्ञान के निकट पहुंचने के नाम पर कुछ बालसाहित्यकार अपने कथापात्रों का नाम पप्पू, कप्पू, बोनी, टोनी, दुल्ला-गुल्ला जैसे अजीब-अजीब नाम चुनते हैं. बिना यह जाने कि नामों का ऐसा विरूपीकरण बालक को एकदम नापसंद होता है. यह उसे अपने व्यक्तित्व के साथ खिलबाड़ लगता है. उसकी शारीरिक सीमाएं भले बड़ों पर आश्रित रखती हों, मानसिक रूप से वह पूरी तरह स्वतंत्र होता है. आवश्यकता इस सच को समझने और बालक की स्वतंत्रता का सम्मान करने की है.

ओमप्रकाश कश्यप

 

  1. I deny not, that there are natural tendencies imprinted on the Minds of Men; and that, from the very first instances of Sense and Perception, there are some things, that are grateful, and others that welcome to them; some things that they incline to, and others that they fly: But this makes nothing for innate Characters on the Mind, which are to be the Principles of Knowledge, regulating our Practice. [John Locke, in An Essay Concerning Human Understanding, I.III]

 

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