स्वतंत्र देश में स्वाधीन मनस्

  • सच्ची स्वाधीनता का अभिप्राय है, दूसरों की समान स्वाधीनता का सम्मान करते हुए कार्य करने की संपूर्ण आजादी. मेरा मतलब कानून सम्मत अधिकारों से नहीं है. क्योंकि कभीकभी कानून भी तानाशाह की मनमर्जी का शिकार हो जाता है. उस समय वह दूसरों की स्वाधीनता का हनन करने लगता है.—थॉमस जेफरसन.

  • क्या स्वतंत्रता सिवाय इसके कि जैसा जीवन हम अपने लिए चाहते हैं, वैसा ही जीवन जीने की क्षमता के अलावा कुछ और है? कुछ भी नहीं.1एपिक्टीटस, दि डिस्कोर्स.

शुरुआत एक पहेली से करते हैं. देश स्वतंत्र है. लोग स्वतंत्र हैं. पर क्या वे स्वाधीन भी हैं? सामान्यतः हम ‘स्वतंत्रता’ और ‘स्वाधीनता’ दोनों को एक माने रहते हैं. मान लेते हैं कि इनके बीच महज शब्दों का ऐरफेर है. दोनों में से किसी भी शब्द का प्रयोग करो, मंतव्य वही रहता है. अर्थात यदि हम स्वतंत्र हैं, तो स्वाधीन भी हैं. या स्वाधीन हैं, इसलिए स्वतंत्र भी है. ‘स्वतंत्रता’ एवं ‘स्वाधीनता’ के अर्थों में घालमेल का एक कारण यह भी है कि स्वतंत्र भारत में हमने लोकतंत्र को तो अपनाया, मगर शताब्दियों तक सामंती संस्कारों में पलेढले समाज के लोकतांत्रिकरण हेतु अपेक्षित प्रयासों की ओर से मुंह मोड़े रहे. स्वतंत्रता आंदोलन के हमारे कई महानायक तो, जो कदाचित सबसे भरोसेमंद दिखाई पड़ते थे—समानता और स्वाधीनता के अधिकार तथा लोकतंत्र की आलोचना ही करते रहे. गांधी के सर्वाधिक प्रिय शिष्य विनोबा को समान मताधिकार का विचार ही विचित्र लगता था. उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि नेहरू और उनके खानसामा दोनों का वोट एक हो. ‘गणतंत्र’ को एक स्थान पर उन्होंने ‘अवगुणतंत्र’ कहा है(गणतंत्र नहीं गुणतंत्र, लोकनीति). कथित इसलिए कि उनमें से कई गांधी के कहने पर ‘हरिजनोद्धार’ के कार्यक्रमों में हिस्सा ले चुके थे, परंतु जिस मनुस्मृति को दलित अपने गले की फांस मानते आए थे—ऋषि के राज के बहाने वे उसी का महिमामंडन करते थे(ऋषि अनुशासन, विनोबा, लोकनीति). लोकतंत्र के प्रति चलताऊ निष्ठा का नुकसान यह हुआ कि हम राज्य और नागरिक के अंतःसंबंधों को पहचानने तथा उनकी मजबूती के लिए उपयुक्त तंत्र खड़ा करने में असफल रहे. हमने लोकतंत्र को आधेअधूरे बोध के साथ, केवल इतने बोध के साथ अपनाया कि उसके माध्यम से हमारा संविधान हमें सरकार चुनने का अधिकार देता है. संविधान हमें अपनी स्वाधीनता को परिपक्व बनाने, उसके दायरे को विस्तृत करते जॉने तथा स्वतंत्रता का सहीसार्थक उपयोग करने के जो अवसर हमें देता है, उस ओर से हम प्रायः अनभिज्ञ बने रहे. भूल गए कि अच्छी नागरिक सरकार अपनी स्वतंत्रता की व्याप्ति नागरिकों में देखती है. चूंकि हम स्वयं अपनी स्वाधीनता की ओर से उदासीन रहे, इसलिए सरकार और अन्य संस्थाएं कब अपनी स्वतंत्रता का दायरा लांघकर हमारी स्वाधीनता और अधिकारों को अवरुद्ध करने लगीं, हम समझ ही नहीं पाए. इस बीच शासनप्रशासन की निरंकुशता ने जबजब हमें आहत किया, उसे लोकतंत्र की स्वाभाविक दुर्बलता मानकर हम प्रायः मौन साधे रहे.

स्वतंत्रता’ के अंग्रेजी पर्याय Freedom से किसी भी प्रकार के दासत्व से संपूर्ण मुक्ति का भाव जुड़ा है. तदनुसार स्वतंत्र वह है जो बाहरी बंधनों से सर्वथा मुक्त हो. जिसके सोच पर, कर्म पर किसी भी प्रकार का बाहरी प्रतिबंध न हो. स्वतंत्रता मनुष्य को उसके मनुष्यत्व का एहसास कराती है, इसलिए लोग उससे प्यार करते हैं. आरनेल्डो पेटरसन के अनुसार—स्वतंत्रता ऐसा मूल्य है, जिसके लिए लोग खुशीखुशी जान देने को तैयार रहते हैं….यह नेताओं का चहेता नारा, मुक्त अर्थतंत्र का धर्मनिरपेक्ष अवतार तथा हमारी समस्त सांस्कृतिक गतिविधियों का आधार है.” किसी देश के संदर्भ में स्वतंत्रता बाहरी प्रतिबंधों से पूरी तरह मुक्ति तथा संपूर्ण निर्णयाधिकार की क्षमता एवं उसकी स्वयंप्रभुता को दर्शाती है. स्वतंत्रता का इतिहास राज्य की उत्पत्ति से जुड़ा है. उसकी मांग लगभग 2600 वर्ष पहले तब शुरू हुई जब यह महसूस किया गया कि विवेकशील प्राणी होने के नाते मनुष्य अपने बारे में निर्णय करने में स्वयं सक्षम है. इस योग्यता का सम्मान करना राज्य के हित में है. इस सोच में कल्याण राज्य की अवधारणा के बीज छिपे थे, हालांकि उसे भलीभांति विकसित होने में अनेक शताब्दियां गुजर गईं. इस बीच सर्वसत्तावादी निरंतर दावा करते रहे कि सभ्यता के लंबे दौर से गुजरने के बावजूद मानव स्वभाव में जंगली जीवन की प्रवृत्तियां शेष हैं. उसके समुचित मार्गदर्शन तथा समाज में शांति एवं अनुशासन बनाए रखने के लिए शक्तिशाली राज्य की उपस्थिति अपरिहार्य है. दूसरी ओर उदारचेता विद्वान लगातार मानवमात्र की स्वाधीनता पर जोर देते रहे. इससे कल्याणकारी राज्य के विचार ने जोर पकड़ा. यह विचार भी आगे बढ़ा कि स्वाधीन व्यक्ति न केवल अपना विकास बेहतर कर सकता है, बल्कि समाज को भी अपना श्रेष्ठतम प्रदान करने में सक्षम होता है. कुछ विद्वानों के अनुसार Freedom शब्द की उत्पत्ति दासों के मुक्ति संघर्ष से जुड़ी है. लगभग ढाई हजार वर्ष पहले एथेंस में सम्राट सोलोन ने नागरिकों को अधिकार दिए जाने के लिए अपेक्षाकृत उदार नियम बनाए थे. बाद की शताब्दियों में एथेंस की प्रगति में सोलोन द्वारा लागू संविधान की बड़ी भूमिका थी. तदनंतर स्वतंत्रता की अवधारणा में अनेक बदलाव हुए हैं. नई मान्यताओं के अनुसार बिना नागरिकों की स्वाधीनता के राज्य की स्वतंत्रता अपर्याप्त मानी जाती है. इसलिए मानवाधिकार, समानता, सामाजिक न्याय आदि के माध्यम से स्वतंत्रता का लाभ जनजन तक पहुंचाने के लिए जनसमर्थन और सहभागिता पर जोर दिया जाने लगा है.

स्वतंत्रता और स्वाधीनता परस्पर पूरक हैं. स्वतंत्रता तभी पूर्ण मानी जाती है, जब शिखर पर बैठे लोग उसके अच्छेखासे हिस्से को, बगैर किसी पक्षपात के नागरिकों तक अंतरित करने लगते हैं. लोकतंत्र में निर्णयाधिकार जनता के पास होते हैं. तथापि नागरिक उसका वास्तविक लाभ तभी उठा सकते हैं, जब वे अपनी स्वाधीनता का सदुपयोग करने में सक्षम हों. दूसरों के हितों पर आंच आए बिना अपने हितों के अनुरूप उपयुक्त निर्णय लेने का नागरिक अधिकार स्वाधीनता की कोटि में आता है. इसके अंग्रेजी पर्याय के रूप में Liberty का प्रयोग किया जाता है. स्वतंत्रता राज्य से संबंधित, उसपर किसी भी प्रकार के बाहरी नियंत्रण से मुक्ति का नाम है. जबकि स्वाधीनता समाज और शासन की ओर से प्रदान की जाती है, जिसमें सत्ता की आलोचना का अधिकार भी सम्मिलित है. इतिहासकार, राजनीति विज्ञानी जॉन अक्टन के लिए वह सत्ता के वाजिब विरोध का माध्यम है. स्वाधीनता की कदाचित सबसे अच्छी परिभाषा जे. आर. ल्यूकस ने अपने ग्रंथ ‘दि प्रिंसिपल आफ दि पॉलिटिक्स’ में दी है, उसके अनुसार—‘‘स्वाधीनता का तात्विक अर्थ यह है कि विवेकशील कर्ता को जो भी सर्वोत्तम प्रतीत हो, वह वही कुछ करने में समर्थ हो तथा उसके कार्यकलाप बाहर से प्रतिबंधित न हों.’’ राष्ट्र विशेष के संबंध में स्वतंत्रता से भी यही उद्दिष्ट है. कुल मिलाकर ‘स्वतंत्रता’ विशेषत: राष्ट्र का मसला है. वही स्वतंत्रता जब आंतरिक स्तर पर विस्तरित होकर नागरिकों के सोच और व्यवहार का हिस्सा बन जाती है, तो स्वाधीनता कहलाने लगती है. इस तरह स्वाधीनता नागरिकों का अधिकार, विवेक सम्मत आचरण की संपूर्ण आजादी है. वह राज्य की उदारता एवं न्याय भावना की संकेतक है. स्वतंत्रता एवं स्वाधीनता परस्पर पूरक, सहायक और अन्योन्याश्रित पद हैं. दोनों में इतना सूक्ष्म अंतर है कि समझने में प्रायः गड़बड़ हो ही जाती है.

यह मान लेना कि स्वतंत्रता केवल राष्ट्र का विषय है, सामान्य नागरिक का उससे कोई सरोकार नहीं है, अनुचित होगा. कोई भी राष्ट्र अपने नागरिकों के सपनों तथा उनकी कर्तव्यनिष्ठा से बनता है. अरस्तु के शब्दों में कहें तो अच्छी जनता ही अच्छे शासन की जनक होती है. ऐसी जनता को बाहरी नियंत्रण में लंबे समय तक नहीं रखा जा सकता. अपने अधिकारों के प्रति चैतन्य, सतत जागरूक जनता अपने लिए स्वतंत्रता का रास्ता खोज ही लेती है. स्वाधीनता, स्वतंत्रता की अगली सीढ़ी है. उसे तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब राज्य स्वतंत्र तथा अपने नागरिकों के प्रति उदार हो. शिखर पर आसीन लोग मानते हों कि शासन चलाने का अधिकार उन्हें जनता की ओर से प्राप्त है. वास्तविक स्वाधीनता मनुष्य को, दूसरे के स्वाधीनता क्षेत्र में अतिक्रमण को छोड़ वह सब करने की आजादी देती है, जिसे वह अपने लिए आवश्यक मानता है. भले ही उससे समाज, सत्ता, विचारधारा या स्थापित रीतिरिवाजों को चुनौती मिलती हो. स्वाधीनता की सीमा शासन की प्रवृत्ति से भी तय होती है. यह कतई आवश्यक नहीं है कि दो स्वतंत्र राज्यों की जनता को समान स्वाधीनता भी उपलब्ध हो. यह भी हो सकता है कि राज्य स्वतंत्र हो, परंतु लोग पूरी तरह स्वाधीन न हों. उदाहरण के लिए हिटलर के समय जर्मनी एक स्वतंत्र और शक्तिशाली देश था. मगर वहां की जनता नागरिक अधिकारों से वंचित थी. यहां तक कि मनुष्य के मौलिक अधिकारों पर भी डाका पड़ चुका था. चीन का उदाहरण भी हम ले सकते हैं. वह स्वतंत्र देश है. लेकिन वहां के नागरिकों को उतने निर्णयाधिकार उपलब्ध नहीं हैं, जितने भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में प्राप्त होते हैं. इस उदहारण को आगे और भी बढ़ाया जा सकता है.

निरंकुश शासक ताकत के बल पर शासन करता है. अपनी सर्वोच्चता के प्रदर्शन के लिए वह नागरिकों के सामान्य अधिकारों का भी हरण कर लेता है. ऐसे में स्वाधीनता का आकार सिकुड़ जाता है. नागरिक अधिकार की दृष्टि से ऐसी स्वतंत्रता जिसमें नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हो, नकारात्मक स्वतंत्रता कही जाएगी. उसमें अधिकांश अधिकार केंद्रीय शक्तियों में सिमट जाते हैं. परिणामस्वरूप नागरिकों के मूलभूत अधिकारों पर भी कटौती के बादल मंडराने लगते है. सकारात्मक या वास्तविक स्वतंत्रता वहां संभव है, जहां जनता के विवेकाधिकार बाधित न हों. लोग अपने हितों के अनुसार निर्णय लेने को स्वतंत्र हों. वहां शासन की बागडोर जनता के हाथों में होती है. अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से वह ऐसी सरकार का गठन करती है, जो न्यूनतम शासन करे. इस तरह स्वस्थ नागरिक समाजों में सरकार और नागरिक अपनीअपनी मर्यादा से आबद्ध रहकर स्वाधीनता का आनंद लेते हैं. सरकार की स्वतंत्रता वहां तक मर्यादित होती है जहां तक वह नागरिकजीवन में अनावश्यक दखलंदाजी प्रतीत न हो. वहीं नागरिक के लिए स्वाधीनता की मर्यादा, दूसरों की स्वाधीनता को अक्षुण्ण रखने तक सीमित रहती है. नागरिकगण केवल दूसरे नागरिकों की स्वाधीनता का सम्मान करके अपनी स्वाधीनता की रक्षा कर सकते हैं. दूसरे की स्वाधीनता में हस्तक्षेप करने वाला व्यक्ति अपनी स्वाधीनता के अधिकार को खो बैठता है. उस अवस्था में शांतिव्यवस्था बनाए रखने के लिए शासन को उसकी स्वाधीनता की परिसीमा में हस्तक्षेप का अधिकार मिल जाता है. कह सकते हैं कि स्वतंत्रता और स्वाधीनता परस्पर पूरक और सहायक हैं. नागरिकों की स्वाधीनता का स्तर बढ़ाने के लिए चुनी हुई सरकारें जहां न्यूनतम शासन करती हैं. वहीं एकदूसरे की स्वाधीनता का सम्मान करते हुए नागरिक सरकार और शासन को यह भरोसा दिलाते रहते हैं कि वे अपने कर्तव्य के प्रति सचेत हैं. फलस्वरूप राज्य की स्वतंत्रता नागरिकों की स्वाधीनता से अनुप्रेत होने लगती है; या यूं कहें कि स्वतंत्रता और स्वाधीनता का अंतर लुप्त होने लगता है.

स्वाधीनता और मानवाधिकार परस्पर पूरक हैं. उन्हें बिना किसी भेदभाव के नागरिकों को उपलब्ध कराने का संकल्प राज्य की उदारता को दर्शाता है. कल्याण राज्य में हर अवधारणा के केंद्र में नागरिक होता है. इसलिए वहां स्वाधीनता भी नागरिक दृष्टि से परखी जानी चाहिए, जैसे—लोग यदि स्वाधीन हैं तो कितने? परिपक्व लोकतंत्र के लिए जितनी स्वाधीनता चाहिए, क्या उतनी स्वाधीनता नागरिकों को प्राप्त है? स्वाधीनता को समझना, उसे पाने जितना ही महत्त्वपूर्ण होता है. स्वाधीनता को समझा कैसे जाए? इसपर बड़ी अच्छी बात एपिक्टीटस(55 ईस्वी—135ईस्वी) ने कही है. वह एक दास था. उसका धनवान मालिक एप्फ्रिोडिटो भी किसी जमाने में दास हुआ करता था. बाद में उसने अपने दासत्व से मुक्ति प्राप्त की और बादशाह नीरो का मंत्री बन गया. एपिक्टीटस की पढ़ने की बड़ी ललक थी. वह सुकरात और प्लेटो का प्रशंसक था; और खुद भी दार्शनिक बनना चाहता था. एपिक्टीटस की ललक देखकर उसके स्वामी ने उसे मुक्त कर दिया. बाद में उसने दास बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल की स्थापना की. एपिक्टीटस का मानना था कि दासत्व का कारण संसाधन छीन लेना नहीं है, बल्कि लोगों को ज्ञान के अवसरों से वंचित कर देना है. उसका विश्वास था कि केवल शिक्षा ही व्यक्ति को भय, भ्रांति और उद्धिग्नता से मुक्ति दिला सकती है. अपने शिष्यों को संबोधित करते हुए उसने कहा था—

हमें उन अनेक लोगों की बात पर भरोसा नहीं करना चाहिए जो कहते हैं कि केवल मुक्त लोगों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है. बजाय इसके हमें यह मानना चाहिए कि केवल शिक्षा ही हमें मुक्ति दिला सकती है.’2

स्वतंत्रता की भांति स्वाधीनता भी निःशर्त नहीं होती. प्रकटतः वह बंधनमुक्ति का पक्ष लेती है, परंतु व्यक्ति को कुछ भी करने की आजादी नहीं देती. स्वाधीनता का संपूर्ण आनंद बिना नैतिक बने असंभव है. जो नैतिक है, आत्मानुशासित है, समाज और राज्य के विधान के प्रति जिसकी निष्ठा विवेकसम्मत है, जो दूसरे के मूलभूत अधिकारों का सम्मान करता है, वही व्यक्ति स्वाधीनता का सच्चा लाभ उठा सकता है. सरकार नागरिकों की संरक्षक होती है. अतः जब तक वह अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार है, उसकी स्वतंत्रता और अधिकारिता का सम्मान करना नागरिकों का कर्तव्य है. कहा यूं भी जा सकता है कि अच्छी सरकार और नागरिक स्वाधीनता को एकदूसरे से अलग नहीं किया जा सकता. क्योंकि जो लक्ष्य अच्छी सरकार का होता है, वही लक्ष्य स्वाधीनता का भी होता है. जैसे अच्छी सरकार स्वयं एक उपलब्धि है, वैसे ही स्वाधीनता अपने आप में परम लक्ष्य है. वह समाजीकरण की उच्चतम अवस्था है, जिसमें व्यक्ति के निजत्व को भी उतना ही सम्मान प्राप्त होता है, जितना समाज को. वह नागरिकों को उनकी पसंदों के साथ बने रहने का अधिकार ही नहीं देती. बल्कि वे सभी अवसर प्रदान करती है, जिनसे वे उस सभी कार्यों को कर सकें जिन्हें अपने लिए आवश्यक मानते हैं. वह मनुष्य को अपने, समाज और देश; फिर दुनिया के हित में अपना अधिकतम योगदान देने के लिए आवश्यक अवसर उपलब्ध कराती है. स्वाधीनता को दैविक कहकर किसी भी हालत में टाला नहीं जा सकता. ना ही उसमें कटौती की जा सकती है. वह मनुष्य का जीवनसिद्ध अधिकार है. इसलिए वह नैतिक लक्ष्य न होकर समाजीकरण की उच्चतम अवस्था है.

रूसो ने कहा था कि सभी मनुष्य आजाद जन्मते हैं. बेड़ियां समाज उन्हें पहनाता है. स्वाधीनता इस विकृति का निस्तार है. वह मनुष्य को निर्बंधता का एहसास कराती है. पराधीनता मानव समाज के लिए कलंक है. वह महज राजनीतिकसामाजिक अवस्था है, जो व्यक्ति और समाज के बीच किसी न किसी प्रकार की सत्ता को ले आती है. स्वाधीनता प्राकृतिक जीवन के निकट होती है. इसलिए वह मनुष्य को अधिकतम आज़ादी का एहसास करने में सक्षम होती है. वह मनुष्यों को परस्पर निकट लाकर, मनुष्यता में विश्वास करना सिखाती है. बताती है कि सभी मनुष्य श्रेष्ठ हैं. अपने सर्वोत्तम की अभिव्यक्ति, उसको अपने तथा शेष समाज के लाभ के लिए प्रयुक्त करने का अधिकार प्रत्येक को है. अधिकांश लोग अपनी ऊर्जा दूसरों को अनुशासित करने में खपाते रहते हैं. जबकि वह दुष्कर कार्य है. स्वाधीन समाज में सच्चा नागरिक धर्म स्वयं को अनुशासित रखना है. खुद पर अनुशासन दूसरों को अनुशासित करने से आसान होता है. शासन का कार्य नागरिकों को अनुशासित करना नहीं, ऐसे वातावरण का निर्माण करना है, जिसमें नागरिकगण आत्मानुशासन हेतु स्वत: अनुप्रेत हों. उसके लिए सार्वजनिक जीवन में राज्य की न्यूनतम भूमिका अपरिहार्य है. किसी ने कहा है कि कोई भी प्रजाति, समूह या मनुष्य अनुशासन की दृष्टि से अयोग्य नहीं होता. जबकि शासन करने के लिए सभी अनफिट होते हैं. अक्टन के शब्दों में—

‘‘बीजगणित की कोई भी प्रमेय इससे ज्यादा स्वयंसिद्ध नहीं है कि जिन लोगों के हाथों में जितनी ताकत होती है, वे उतने ही अधिक अपराध करते हैं.’’ उसके अनुसार—‘‘शक्ति का अतिरेक आदमी को पत्थर दिल बनाता है, विवेक का हरण करता है और विचारधारा को कलुषित करता है.’’3

स्वाधीनता का इतिहास स्वंतंत्रता के इतिहास से बहुत पुराना है. स्वतंत्रता का इतिहास सामान्यतः राज्यों की स्थापना के बाद आरंभ होता है. जब राज्य नहीं था, तब भी मनुष्य स्वाधीन था. लेकिन तब उसके चर्या में स्थायित्व नहीं था. यायावर जीवन में हर दिन नई चुनौती से जूझना पड़ता था. जिसके लिए वह हर रोज नई योजना बनाता था. दूसरी ओर स्वाधीनता का इतिहास मनुष्य की विकास की चाहत से जुड़ा है. अपनी पुस्तक ‘ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ लिबर्टी’ में डेविड शेमिड्ज और जेसन ब्रेनन स्वाधीनता के इतिहास को 40000 वर्ष पहले तक ले जाते हैं. उस समय मनुष्य को हिम युग से बाहर आए कुछ ही समय हुआ था. जीवन संघर्षभरा था. उसे न केवल विषम प्राकृतिक हालातों से चुनौती थी, बल्कि अपने भीतर पैठे भय और दूसरे मानवसमूहों से भी जूझना पड़ता था. उसके पीछे कहीं न कहीं स्वयं को स्वाधीन बनाने की चाहत थी. लेखकद्वय के अनुसार स्वाधीनता प्रत्येक युग में द्वंद्वात्मकता का शिकार रही है. जनतांत्रिक समझ के अभाव में लोगों के लिए उसके मायने भी अलगअलग रहे हैं. ताकतवर ज्यादा आजादी इसलिए चाहता है, ताकि वह और ताकत जुटा सके. इसके लिए वह अपनी शक्ति और संसाधनों का दुरुपयोग करता है. गरीब सोचता है कि आजाद होने पर वह अपने श्रम का उपयोग अपने लिए कर, दरिद्रता से मुक्ति पा सकेगा. मगर उसकी सीमाएं हैं. न्यूनतम स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए उसके पास सिवाय देह के कुछ नहीं होता. उसका उपयोग वह जीविकोपार्जन से इतर कर ही नहीं पाता. अपनी स्वाधीनता के लिए उसे शक्तिशाली वर्गों तथा सरकार पर आश्रित रहना पड़ता है. सरकार का दायित्व है कि न्याय भावना का पालन करे हुए नागरिक स्वाधीनता के उच्चतम स्तर को बनाए रखे. सामाजिक शांति और समरसता के लिए यह आवश्यक है. मनुष्य सामाजिक प्राणी है. मगर समाज के साथ वह आत्मनिर्भर होकर रहना चाहता है. दूसरों पर बोझ बनकर नहीं. प्रत्येक युग में कभी समूह की मदद से तो कभी अकेले ही, आत्मनिर्भर बनने की चाहत मनुष्य के लिए देरसवेर मुक्तिप्रदाता बनी है. आत्मनिर्भरता का आशय यह नहीं है कि मनुष्य अपनी जरूरत की हर वस्तु का उत्पादन स्वयं करे. जरूरतों का आदानप्रदान भी आत्मनिर्भरता के स्तर को दर्शाता है. प्रस्तरकालीन मानव प्रजातियां अपनी पूर्वज प्रजातियों के मुकाबले इसलिए जीवित रह सकीं, क्योंकि उन्होंने दूसरे मानवसमूहों से तालमेल तथा वस्तुओं के आदानप्रदान की योग्यता प्राप्त कर ली थी. एकदूसरे की जरूरतों का सम्मान करते हुए उन्होंने प्रकृति के अनेक झंझावात पार किए थे. इससे जीवन में स्वाधीनता की उपयोगिता को समझा जा सकता है.

स्वतंत्रता आमतौर पर राजनीतिक और विधिमान्य होती है. वह जब नागरिकों के व्यवहार में रचबस जाती है और राष्ट्र मान लेता है कि उसके नागरिक स्वतंत्रता को आत्मसात् कर चुके हैं, तो वह अपने विशेषाधिकारों में धीरेधीरे कटौती करने लगता है. नागरिक उसका उपयोग दूसरों की स्वाधीनता का सम्मान करते हुए करते हैं. इस तरह स्वाधीनता केवल स्वतंत्र राष्ट्र में संभव होती है. उस समय संभव होती है जब राज्य नागरिकों के जीवन में अपनी भूमिका को सीमित कर लेता है. जब यही भाव नागरिकों के मन में समा जाता है तो वे दूसरों के निणर्याधिकार का सम्मान करते हुए खुद को सामाजिक की मर्यादा में बांध लेते हैं. इससे समाज को अनुशासित करने में लगने वाली ऊर्जा बचने लगती है. यानी स्वाधीनता का अभिप्राय दूसरों की इच्छा और अधिकारों का मान रखते हुए अपने विकास का मार्ग सुनिश्चित करने में है. जबकि स्वतंत्रता का अभिप्राय राज्य द्वारा बिना किसी प्रतिबंध के निर्णय लेने के अधिकार से है.

स्वाधीनता और स्वतंत्रता के अलावा एक प्यारासा शब्द और भी है—स्वच्छंदता! मुक्त नीलांचल में पक्षियों को उड़ान भरते या जंगल में हिरनों को कुलांचे मारते देख कई बार हम उनसे इर्ष्या करने लगते हैं. काश! हम भी वैसी ही स्वछंद उड़ान भर पाते. न आज की चिंता न आने वाले कल का भय—जंगल के मुक्त प्राणियों जैसा निर्बंध जीवन, काश! हमारा भी होता. यथार्थ में यह संभव नहीं है. पूर्ण स्वच्छंदता केवल कल्पना की वस्तु है. समाज का गठन ही कुछ मर्यादाओं के साथ होता है. जबकि स्वच्छंदता मर्यादाविहीन होती है. इसलिए जहां सभ्यता है, वहां स्वच्छंदता ज्यादा देर नहीं टिक सकती. दूसरे स्वच्छंदता प्रायः अल्पजीवी होती है. उसका जीवन लंबा नहीं होता. क्योंकि प्रत्येक की स्वच्छंदता, प्रकारांतर में प्रत्येक की निरंकुशता को न्योंता देती है. हरिण को लगता है कि उसे जंगल में मुक्त कुलांच भरने की स्वच्छंदता है, तो भेड़िया कहेगा कि मेरी स्वच्छंदता किसी का भी भक्षण कर, अपनी भूख मिटाने की है. यदि चिड़िया आसमान में मुक्त उड़ान को अपनी स्वच्छंदता मानती है, तो बाज अपनी स्वच्छंदता के नाम पर कहीं भी, किसी भी निरीह पक्षी पर झपट्टा मारने को अपनी स्वच्छंदता मानेगा. दोनों अपनेअपने सामर्थ्य और इच्छाशक्ति से अनुशासित हैं. इसके अलावा कोई नियम उनके बीच काम नहीं करता. जैसे ही सामर्थ्य की टकराहट होती है, भेड़िया के सामने मेमना और बाज के आगे चिड़िया को पस्त होना ही पड़ता है. इस अत्याचार के लिए न तो भेड़िया को दोषी माना जा सकता है, न ही बाज को. स्वच्छंद वातावरण में नियम जरूरतों और महत्त्वाकांक्षाओं से बनते हैं. सामर्थ्य के दुरुपयोग को रोकने का वहां कोई नियम नहीं होता. ऐसी स्वच्छंदता सभ्य समाज के लिए वरेण्य नहीं है. स्वाधीनता जहां बहुमान्य नियमों से अनुशासित होती है, वहीं स्वच्छंदता में सभी अपनेअपने नियम के अनुसार जीते हैं. स्वच्छंद समाज में यदि कोई नियम होता है तो यही कि वहां कोई नियम नहीं होता. सभ्य समाज नागरिकों की सहमति से स्वच्छंदता के अतिरिक्त हिस्से पर कैंची चलाकर उसे स्वाधीनता तक सीमित कर देता है. तय कर देता है कि उनमें से हरेक की स्वाधीनता, दूसरे की स्वाधीनता की हद पर समाप्त होगी.

स्वाधीनता चूंकि नागरिक का विषय है, अतएव उसका आनंद उठाने के लिए नागरिकों को स्वयं पहल करनी पड़ती है. राज्य खुद को अधिकतम उदार उनकी मदद कर सकता है. ऐसे वातावरण का निर्माण कर सकता है, जिसमें लोग अपनी स्वाधीनता का अधिकतम लाभ उठा सकें. स्वाधीनता की एक कसौटी विकास में सभी की समान सहभागिता है. लेकिन विकास को पूरी तरह समझना आसान नहीं. वह जटिल प्रक्रिया है, जिसकी व्याप्ति अनेकायामी होती है. नागरिक विशेष के संबंध में वह भ्रामक अवधारणा है. शरीर में कूबड़ भी निकल आए और वह लगातार बढ़ता जाए तब उसका भी विकास होता है, ऐसा हमारे डाक्टर और समाजविज्ञानी दोनों मानते हैं. लेकिन जब हम किसी देश के संदर्भ में इस शब्द को लेते हैं तो उसका अर्थ सामान्यतः प्रगति के पर्याय के रूप में होता है. प्रगति सामान्यत: एकदैशिक होती है. विकास की चर्चा करते समय उसके साथ जुड़े नकारात्मक एवं अनैच्छिक पहलुओं को कुछ देर के लिए नजरंदाज कर दिया जाता है. किसी स्वतंत्र देश के लिए विकास उसकी स्वतंत्रता का विस्तार होता है. इसलिए उसे आंकने का पैमाना यह होना चाहिए कि विकास ने लोगों की स्वाधीनता की अनुभूति का गाढ़ा करने में कितनी तरक्की है. या उस देश के नागरिकों के बीच न्याय के समविभाजन में वह कितना सफल सिद्ध हुआ है. समाज में नागरिकों की रुचियों, जरूरतों और कार्यक्षमताओं में अंतर होता है. इसलिए सभी नागरिक विकास योजनाओं का समान लाभ नहीं उठा सकते. हालांकि उचित यही है कि वह सभी के लिए सामान रूप से लाभदायक हो. व्यवहार में यह संभव नहीं है. अच्छी से अच्छी योजना कुछ लोंगों के लिए हानिप्रद हो सकती है. उन हालात में सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसे लोगों के नुकसान की भरपाई के लिए वैकल्पिक कार्यक्रम बनाए, ताकि कल्याण के विभाजन में समानता बनी रहे. नागरिकों द्वारा अपनी और दूसरों की स्वाधीनता का सम्मान करने के लिए ऐसे विश्वास का होना आवश्यक है.

स्वाधीनता का रास्ता हमेशा सरल नहीं होता. बावजूद इसके कि कल्याण राज्य की अवधारणा मानवमात्र के लिए अधिकतम स्वाधीनता के विचार पर टिकी है, सभ्यताकरण की कोशिश में मानवीय स्वाधीनता पर निरंतर हमले होते रहे हैं. मनुष्य ने खेती करना सीखा. एक जगह टिककर खेती करतेकरते एक समय ऐसा आया जब समाज के संसाधन मुट्ठीभर आदमियों के हाथों में सिमट गए और बाकी लोक उनकी इच्छा के अनुसार कार्य करने को विवश हो गए. धीरेधीरे भूमि और अन्य संसाधनों पर कब्जा जमाकर एक वर्ग दूसरे वर्ग का मालिक बन बैठा. खुद को सर्वेसर्वा बताकर वह लोगों से मन चाहा काम लेने लगा. जनसाधारण का जीवन संघर्ष और त्रासदियों से भरा था. सो सबसे पहले धर्माचार्य मदद के लिए आगे आया. संघर्ष से थकेहारे लोगों का आवाह्न करते हुए उसने कहा—‘तुम मुझे दान दो. मैं तुम्हें संघर्ष से सदा के लिए मुक्ति दिलाऊंगा.’ लोग दान देने लगे. हालात ज्यों की त्यों रहे. परेशान लोग धर्माचार्य से मुक्ति के बारे में पूछते तो उसका एक ही जवाब होता—‘मसीहा का इंतजार करो. अपनी संतान को संकट में देखकर वह मदद के जरूर आगे आएगा.’ लोगों ने इंतजार किया. कुछ दिनों बाद लोगों की निराशा बढ़ने लगी. तब तलवार लिए एक व्यक्ति आगे आया, बोला—‘मैं तुम्हारा राजा हूं. तुम मुझे कर दो. मैं तुम्हें दुश्मनों से बचाऊंगा.’ लोगों ने उसे कर देना शुरू कर दिया. थोड़े दिन बाद सैनिक ने पुरोहित से दोस्ती कर ली. प्रजा वैसी की वैसी ही रही. फिर एक दिन एक और व्यक्ति आया, ‘मैं व्यापारी हूं. तुम मेरे लिए काम करो. मैं तुम्हें सारे कष्टों से मुक्ति दिलाऊंगा.’ हताश लोगों ने दिल और दिमाग दोनों व्यापारी के यहां गिरवी रख दिए. बाद में पुरोहित, राजा और व्यापारी एक साथ मिल गए. पुरोहित राजा और व्यापारी के भले के लिए पूजा करने लगा. राजा व्यापारी के धन की देखभाली में जुट गया. और व्यापारी उसका व्यापार दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था. राजा उसके धन की रखवाली करता, पुरोहित उसके लिए हवा बनाने का काम करता. जनता उन तीनों की गुलाम बनकर रह गई.

कहानी से पता चलता है कि दिमाग की गुलामी देह की गुलामी से चार कदम आगे चलकर आती है. मनुष्य पहले मानसिक रूप में दास बनता है, बाद में दैहिक रूप में. ऊपर के उदाहरण में मनुष्य के समक्ष एक के बाद एक स्थितियां जन्म लेती हैं. हर बार उसके विवेक पर कोई और कब्ज़ा करता चला जाता है. सभ्यता का इतिहास साक्षी है कि लोगों ने पहले अपनी निर्णयप्रक्रिया दूसरों को समर्पित की. दूसरों के फैसलों पर पूरी तरह आश्रित होने के बाद शरीर को उससे आजाद रख पाना असंभव था. परिणाम यह हुआ कि समाज स्वामी और दास में बदल गया. एक व्यक्ति अनेक व्यक्तियों के दिलोदिमाग पर कब्जा, लोगों को अपना दास बना, उनसे काम लेने लगा. फिर उसी को व्यवस्था मान लिया गया. मुट्ठी भर लोगों द्वारा बहुसंख्यक की चेतना पर सवार हो जाने की नीति थी. आगे चलकर दास वर्ग में चेतना का प्रवाह हुआ. वह समझने लगा कि कोई मसीहा उसकी मदद को नहीं आने वाला. न कोई व्यापारी उसका कल्याण करेगा. उसे अपनी सुरक्षा, अपना कल्याण, अपनी मदद स्वयं करनी होगी. तदनंतर वह वर्ग अपनी मुक्ति के लिए एकजुट होने लगा. सतत संघर्ष से उसे सफलता भी मिली. स्वतंत्रता की मूल अवधारणा यही है. स्वतंत्रता का मूलभूत अर्थ इसी चेतना के सुफल है. उसका आशय राज्य की स्वायत्तता से है. ऐसा राज्य जो अपनी इच्छाओं के आधार पर संचालित हो. लेकिन ऐसी स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है जो केवल राज्य के स्तर पर सीमित हो. जब तक नागरिक जीवन में स्वतंत्रता की संपूर्ण व्याप्ति नहीं है, तब तक उसकी कोई उपयोगिता नहीं है.

स्वतंत्रता लोकचेतना का विस्तार है. कह सकते हैं कि स्वतंत्रता एवं स्वाधीनता दोनों सापेक्षिक अवस्थाएं हैं. संदर्भ बदलते ही उनके अर्थ भी बदल जाते हैं. हिटलर का जर्मनी तथा मुसोलिनी का इटली दोनों स्वतंत्र देश थे. उनकी किसी बाहरी शक्ति का दबाव नहीं था. परंतु उन देशों की प्रजा स्वाधीन नहीं थी. आशय है कि नागरिकों की स्वाधीनता राज्य की मर्जी पर टिकी होती है. राज्य यदि अपने नागरिकों के प्रति संवेदनशील है. उनकी भावनाओं का सम्मान करता है, तो वह उनके सतत प्रबोधीकरण पर भी जोर देता है. लेकिन राज्य यदि कट्टर हो तो नागरिकों के सामान्य अधिकार भी संकट में पड़ जाते हैं. केवल राज्य व्यक्ति की स्वाधीनता को बाधित नहीं करता. अपनीअपनी तरह से बाज़ार और धर्म भी इस काम को करते हैं. चूँकि वैधानिक अधिकार राज्य के पास होते हैं. धर्म और बाज़ार को नागरिकों की स्वाधीनता में सीधे हस्तक्षेप का अधिकार नहीं होता, इसलिए वे चतुराई से काम लेते हैं. वे तरहतरह के प्रलोभनों द्वारा लोगों का ध्यान इस तरह से भटकाने में लगे रहते हैं. जिससे वे स्वाधीनता के भ्रम और वास्तविकता स्वाधीनता में अंतर नहीं कर पाते. जैसे कुछ लोग फैशन को ही आधुनिकता माने रहते हैं, वैसे ही वे नकली स्वाधीनता को वास्तविक मान कर भ्रम में जीते चले जाते हैं. जिन लोगों का विवेक दूसरों के पास गिरबी हो उनके लिए स्वाधीन होना, न होना बेमानी हो जाता है.

स्वधीनता नागरिक का विवेकाधिकार है. कानून जनता के भले के लिए बनाए जाते हैं. उसके लिए जरूरी है कि सबका भला हो. उनसे यदि एक भी व्यक्ति को नुकसान पहुंचता है, तो वह अधूरा माना जाएगा. अत: अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख को ध्यान में रखकर कानून बनाने के साथसाथ आवश्यक है कि जो नागरिक अधिकतम की सीमा में नहीं आ पाए हैं, उनकी भी उपेक्षा न हो. इसके अभाव में स्वतंत्रता और स्वाधीनता दोनों ही का दुरुपयोग माना जाएगा. स्वाधीनता के विस्तार के लिए ऐसे अनेक काम हैं जिन्हें सरकार कर सकती है. करना चाहिए. इसी के लिए जनता उसे जिम्मेदारी सौंपती है. मगर यह कार्य जनता और नागरिकों के मध्य संवाद द्वारा होना चाहिए. यदि सरकार यह दावा करती है कि वह जनता की शिक्षक है, इस कारण लोगों की राय को बदलने का उसे अधिकार है तो समझ लीजिए कि उसकी निष्ठा लोकतंत्र में न होकर, निरंकुश शासन में है. इसलिए लोकतंत्र का पहरुआ बनने के लिए सरकार को जनता का शिक्षक बनने का भ्रम छोड़ देना चाहिए.

लोकतंत्र पर यह आरोप लगाया जाता है कि वह अनेक लोगों की निरंकुशता है. यह आरोप प्राय: वही लोग लगाते हैं जो लोकतंत्र पर भरोसा नहीं करते या उसको ढंग से समझ ही नहीं पाते. ऐसे लोगों से आप कोई उदाहरण पेश करने को कहिए. फिर ध्यानपूर्वक उस उदाहरण का विश्लेषण करने की कोशिश कीजिए. कुछ ही देर में सच सामने आ जाएगा. जिसे वे लोग बहुसंख्यक की तानाशाही कहते हैं, असल में वहां बहुसंख्यक के नाम पर कुछ लोगों की मनमानी वाली सरकार होगी. निर्वाचन प्रक्रिया में उलटफेर कर धोखा देकर आए लोग. जो लोग लोकतंत्र को समझते हैं; और वह जनता जो लोकतंत्र का महत्त्व जानती है, वह न तो तानाशाह हो सकती है, न ही तानाशाही को पाल सकती है. इसलिए कि अल्पसंख्यक समूह द्वारा बहुसंख्यक समूह का दमन लज्जाजनक है. लेकिन बहुसंख्यक द्वारा अल्पसंख्यक का दमन घृणित कार्य है.

स्वतंत्रता और स्वाधीनता के सूक्ष्म अंतर को यदि स्वीकार लिया जाए तो 1857 के जनविद्रोह को क्या कहना उचित रहेगा—‘स्वाधीनता संग्राम’ या ‘स्वतंत्रता संग्राम’? फैसला एकदम साफ है. जिन आंदोलनों में जनता की प्रत्यक्ष या परोक्ष भागीदारी हो, वहां स्वतंत्रता और स्वाधीनता को एकदूसरे से अलग नहीं किया जा सकता. अधिकतम स्वाधीनता के लिए अपना शासनतंत्र जिसपर जनता का नियंत्रण हो, होना आवश्यक है. 1857 की क्रांति के मूल में मुख्यतः सैनिक विद्रोह की भूमिका को रेखांकित किया जाता है, जिसे क्रांति में ढालने की जमीन किसानों, मजदूरों और शिल्पकार वर्ग के असंतोष ने तैयार की थी. उसकी तात्कालिक परिणति के पीछे सैनिकों की धार्मिक भावनाओं का प्रस्फुटन था. कारतूसों में गाय और चर्बी प्रयुक्त किए जाने की अपवाह से भारतीय सैनिक नाराज थे. मेरठ की बैरक से निकलकर जैसे ही विद्रोह की सूचना देश के बाकी हिस्सों तक पहुंची, उसमें आम नागरिकों की सहभागिता भी बढ़ती गई. लोग अंग्रेजों को खदेड़ कर अपनों का शासन चाहते थे. बाद में अंग्रेजों के हाथों सत्ता गंवा चुके चंद राजा और नबाव भी उनके साथ मिल गए. उनका असली मकसद अपनी खोई सत्ता हासिल करना था. दूसरी ओर आम जनता अपना मानसम्मान वापस पाने तथा स्वाधीनता की चाहत के साथ, स्वतंत्रता सेनानियों की मदद के लिए उतरी थी.

लंबे संघर्ष के उपरांत देश को 15 अगस्त 1947 को बाहरी शासन से मुक्ति मिली. तय किया गया कि देश में जनता का अपना शासन होगा. एक तरह से जनता के संघर्ष का समापन सुखद एवं फलदायी था. तब से आज तक, लगभग सात दशक लंबी विकास यात्रा पर गर्व करने के लिए पर्याप्त कारण हमारे पास हैं. स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार से भारतीय मनुष्य की औसत आयु आजादी के समय के औसत 32 वर्ष से बढ़कर 66 वर्ष हो चुकी है. अनाज, दुग्ध, सीमेंट, लोहा आदि के उत्पादन में यह देश आत्मनिर्भर है. देश की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा युवा है. इन सब उपलब्धियों पर हम अपनी पीठ थपथपा सकते हैं. मगर केवल भौतिक उपलब्धियां स्वतंत्रता की जरूरत का मापदंड नहीं होतीं. मानवमन का स्वाभाविक उल्लास भी उसकी पहचान होता है. समानताधारित समाजों में वह नागरिकों के व्यक्तित्व का हिस्सा होता है. स्वतंत्रता की वीं वर्षगांठ पर विचारणीय यह है कि स्वाधीनता के जो लक्षण हमने ऊपर गिनाए हैं, क्या उनका लाभ सभी नागरिकों को समान रूप से पहुंचा है? क्या लोग स्वाधीनता और स्वतंत्रता के अंतर तथा उसके मूल्य को समझते हैं? समानता, समरसता, न्याय और समानाधिकार का जो सपना संविधान निर्माताओं ने देखा था, क्या वह पूरा हुआ है? यदि नहीं तो उसके कारण क्या है?

15 अगस्त का दिन यह याद रखने का भी है कि सत्ता का चरित्र मूलतः एक जैसा होता है. स्वयंभू बनने की चाहत प्रत्येक सत्तासीन के भीतर छिपी होती है. उसपर केवल जागरूक जनता नियंत्रण रख सकती है. जाति, धर्म, सांप्रदायिकता आदि के अनेकानेक खानों में बंटी जनता क्या इस स्थिति में है कि स्वाधीनता पर आसन्न खतरों को समझ सके? इन दिनों आतंकवाद को देश की शांति, एकता और अखंडता के बड़े खतरे के रूप में पेश किया जाता है. कदाचित वह है भी. लेकिन इस खतरे का शोर मचाकर आर्थिक वैषम्य और जातीय भेदभाव की उत्तरोत्तर चौड़ी होती खाई की ओर से हमारा ध्यान हटा दिया जाता है. चूंकि सरकार ने शासन के स्तर पर जातिआधारित भेदभाव को हटाने के लिए कुछ नहीं किया, इसलिए जातीय दंश का शिकार रही जातियां मजबूरी में जाति को अपना तारणहार समझने लगती हैं. गत दो दशकों से मतदाताओं का जितना जातिआधारित ध्रुवीकरण हुआ, उतना पहले कभी नहीं हुआ. क्या जनता इस प्रपंच को समझती है? कोई भी देश अपने नागरिकों से बनता है. यदि नागरिक अपनी स्वाधीनता पर मंडराते संकट की ओर से बेखबर हों तो समझ लेना चाहिए कि उतना ही बड़ा खतरा देश की स्वतंत्रता और अखंडता पर भी मंडरा रहा है. 2021 में भारत आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाएगा. तब तक इन समस्याओं का समाधान न सही, असली कारण भी हम पहचान पाए तो बड़ी उपलब्धि होगी.

© ओमप्रकाश कश्यप

शब्दानुक्रमणिका

1. in these matters we must not believe the many, who say that free persons only ought to be educated, but we should rather believe the philosophers, who say that the educated only are free. – Epictetus, The Discourses.

2. (Freedom) is the one value that many people seem prepared to die for….It is the catchword of every politician, the secular gospel of our economic, ‘free enterprise’ system, and the foundation of all our cultural activities.”-Orlando Patterson, Freedom : Freedom in the Making of Western Culture.

3. Those who have more power are liable to sin more; no theorem in geometry is more certain than this….the possession of unlimited power…corrodes the conscience, hardens the heart, and confounds the understanding…

 

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