महाज्ञानी पूर्ण कस्सप

भारत के अनीश्वरवादी चिंतकएक

(पहला भाग)

बौद्ध ग्रंथ ‘दीघ निकाय’ में भी पूर्ण कस्सप को अहेतुवादी बताया गया है. यानी ऐसा व्यक्ति जो किसी कार्यकारण संबंध को नहीं मानता. तदनुसार ‘सृष्टि’ केवल स्वयं की सृष्टि है. उसके पीछे न तो कोई नियंता है, न किसी की सुनियोजित योजना. यानी वह न तो किसी का कार्य है, न ही कारण. यदि उसमें कुछ तारतम्य है, उसकी कुछ अर्थवत्ता है, तो वह स्वयं सृष्टि की कलाकारी है. जब कोई इतर कारण नहीं, कोई इतर उद्देश्य और योजना भी नहीं, तब अच्छा या बुरा, जो है वह स्वयं सृष्टि का कार्य है. उसके लिए स्वयं सृष्टि जिम्मेदार है. मनुष्य भी सृष्टि का उपहार है. अतएव सृष्टि की भांति वह भी अपने कर्म में स्वतंत्र है. वह न तो किसी दैवी सत्ता के अधीन है, न ही उससे अनुप्रेत. वह सीधीसादी अनीश्वरवादी विचारधारा थी, जो उस समय के प्रचलित ब्राह्मणवादी दर्शनों तथा तद्विषयक कर्मकांडों का पूरी तरह निषेध करती थी. चूंकि वह सृष्टिनिर्माण के पीछे किसी भी दैवी सत्ता का हाथ होने से इन्कार करती तथा पदार्थ को ही सबकुछ मानती थी, इसलिए उसे भौतिकवादी विचारधारा भी कहा जाता है. एकमात्र पूर्ण कस्सप उसके प्रवर्त्तक नहीं थे. भौतिकवादी विचारधारा इस देश की समृद्ध और विकासमान चितंन शैली रही है. एक समय था जब उसे पर्याप्त लोकसमर्थन प्राप्त था. बुद्ध पूर्व भारत में तो वह समानांतर चिंतन शैली थी, जिसने अपने समय की सभी प्रमुख विचारधाराओं को चुनौती दी. फलस्वरूप उसका प्रभाव आने वाले 1500 वर्षों तक बना रहा.

बावजूद इसके पूर्ण कस्सप को अहेतुवादी तक सीमित कर देना, मेरी राय में संकुचित दृष्टिकोण है. किसी चीज को समग्रता में जानने की कोशिश करने के बजाए टुकड़ेटुकड़े में जानना; या ज्ञानार्जन की अपनी सीमाओं को वस्तु की सीमा घोषित कर देने जैसा. ‘अहेतुवाद’ कार्यकारण संबंध को नकारता है. मानता है कि जीवन या वस्तु अपने आप में स्वतः प्रमाण है. हर कार्य का कोई कारण होता है, इस संबंध को वह स्वीकार नहीं करता. दूसरी ओर हेतुवादी मानता है कि हर चीज का कोई न कोई ‘हेतु’ होता है. आग है तो धुंआ होगा ही. या धुंआ है तो आग होगी ही. क्योंकि आग और धुंआ दोनों एकदूसरे के हेतु हैं. लेकिन ध्यान से देखा जाए तो यह जीवन या किसी और वस्तु के प्रति दृष्टि और सोच की सीमा को दर्शाते हैं. दृष्टि की सीमा होती है कि वह एक समय में किसी वस्तु के एक ही पक्ष को देख पाती है. हमारे सामने सिक्के का या तो ‘हेड’ होता है अथवा ‘टेल’. इसी तरह मेज, कुर्सी, पंखा, कूलर, गिलास, केतली यानी कोई भी वस्तु कभी भी पूरी की पूरी हमारे सामने नहीं होती. दूसरे पक्ष को देखते समय पहला पक्ष पीछे चला जाता है. वस्तु को पहचानने का बाकी काम मस्तिष्क को करना पड़ता है. दृष्टि की सीमा को वस्तु की सीमा नहीं माना जा सकता. बीज वृक्ष का कारण नहीं, विकास प्रक्रिया का आरंभिक पड़ाव है. इस आधार पर पूर्ण कस्सप को मैं आदि विकासवादी कहना पसंद करूंगा.

पूर्ण कस्सप ही क्यों, जो भी अनीश्वरवाद में विश्वास रखता है, मेरी राय में वह मूलतः विकासवादी है. इसका समर्थन वही कर सकता है, जिसे इस वस्तुजगत की वास्तविकता में भरोसा हो. जिसे सपने और संकल्प की दूरी को कम करने का हुनर आता हो. अधिकांश अनीश्वरवादी दार्शनिक समाज के उस वर्ग से आए थे, जिसे अपने श्रम पर भरोसा था. जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाते हुए जीने का अभ्यासी था. खुद को कर्मकांडों में उलझाने की जिसे फुर्सत न थी. ब्राह्मण उसे धर्मशिक्षा के लिए अयोग्य मानता था. तो अपने श्रमकौशल पर गर्वाया, स्वाभिमान से भरपूर वह वर्ग भी यज्ञादि कर्मकांडों को आडंबर कहकर नकार देता था. उस समय के प्रमुख अनिश्वरवादी विचारकों में पूर्ण कस्सप के अलावा मक्खलि गोसाल, अजित केशकंबलि, पुकुद कात्यायन, संजय वेल्ठिपुत्त आदि सम्मिलित थे. सृष्टि के पीछे किसी भी प्रकार की परामानवीय सत्ता के अस्तित्व से इन्कार करने के कारण वे ब्राह्मणवादी पुरोहितों के अलावा जैन और बौद्ध परंपरा के विचारकों के भी निशाने पर थे. इसे भारतीय भौतिकवादी चिंतन की विडंबना ही कहा जा सकता है कि अपने समय की महत्त्वपूर्ण विचारधारा होने के बावजूद उस परंपरा का कोई स्वतंत्र ग्रंथ उपलब्ध नहीं है. उनके बारे में जानने के लिए हमें जैन और बौद्ध ग्रंथों पर ही निर्भर रहना पड़ता है.

बौद्ध ग्रंथों में पूर्ण कस्सप को संघ आचार्य, तीर्थंकर, अनुभवी विचारक, नए मत का संस्थापक आदि कहा गया है. ‘सामञ्ञफल सुत्त’ में अजातशत्रु और बुद्ध के बीच संवाद का उल्लेख है. संवाद जिस रूप में है, वह वास्तव में उसी रूप में हुआ होगा, यह दावा नहीं किया जा सकता. क्योंकि बौद्ध ग्रंथों में लगभग एक जैसे वार्तालाप को अलगअलग समय में भिन्नभिन्न व्यक्तियों के साथ हुआ बताया गया है. संवाद का ध्येय प्रचलित भौतिकवादी विचारधाराओं तथा बौद्ध दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन नहीं है. न ही उसे किसी चर्चा को तर्कसम्मत ढंग से आगे बढ़ाने की नीयत से शुरू किया गया है. हर प्रसंग में एकतरफा निर्णय लेते हुए भौतिकवादी विचारधारा के सापेक्ष बौद्ध दर्शन को श्रेष्ठतर ठहरा दिया जाता है. इस तरह की चर्चा अलगअलग कालखंड में लिखे गए धर्मग्रंथों में प्राप्त होती है. उनमें जैन और बौद्ध दोनों ही धर्मों के ग्रंथ सम्मिलित हैं. उनमें चर्चा का स्वरूप तो बदलता है, परंतु अनीश्वरवादी दार्शनिक वही रहते हैं. इससे दो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं. पहला उनकी ऐतिहासिकता को लेकर. यह कि भारत में भौतिकवादी चिंतन की समृद्ध परंपरा थी. और दूसरा निष्कर्ष यह कि लोगों पर उसका गहरा प्रभाव था. अच्छीखासी संख्या उनके समर्थकों की थी. इससे यह भी सिद्ध होता है कि बौद्ध एवं जैन दर्शन को अनिश्वरवादी विचारधारा की चुनौती लंबे समय तक झेलनी पड़ी थी. जिन अनीश्वरवादी दार्शनिकों का नामोल्लेख ऊपर किया है, सभी बुद्ध के समकालीन थे. मक्खलि गोसाल और पूर्ण कस्सप तो बुद्ध के बुद्धत्व प्राप्त करने से पहले ही पर्याप्त प्रतिष्ठा अर्जित कर चुके थे. जैन परंपरा में उसे ‘जिन्’ ऐसा महापुरुष जो अपनी इंद्रियों पर अनुशासन करता हो—बताया गया है. पूर्ण कस्सप के साथ जुड़ा ‘पूर्ण’ ज्ञान की संपूर्णता का संकेतक है. ‘दीघनिकाय’ के ‘सामञ्ञफल सुत्त’ के अनुसार मगध सम्राट अजातशत्रु पूर्ण कस्सप के विचारों तथा उनसे अपनी असंतुष्टि का जिक्र गौतम बुद्ध के समक्ष करता है. बदले स्थान तथा पात्रों के साथ अनिश्वरवादी धारा के विचारकों को लेकर इसी तरह की चर्चा ‘संयुत्तनिकाय’ में भी हैं. अंतर केवल इतना है कि ‘दीघ निकाय’ में संवाद अजातशत्रु और गौतम बुद्ध के बीच दिखाया गया है तो ‘संयुत्तनिकाय’ में गौतम बुद्ध और कोसलाधिपति पसेनदि के बीच चर्चा है. स्थान भी बदला हुआ है. तथापि मंतव्य वही है, जो ‘सामञ्ञफल सुत्त’ का है. इसी प्रकार का संवाद बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के करीब पांच सौ वर्ष बाद रचे गए बौद्ध ग्रंथ ‘मिलिंद प्रश्न’ में उद्धृत हुआ है. वहां चर्चा बौद्ध आचार्य नागसेन तथा सम्राट मिलिंद के बीच है. पांच शताब्दी बाद भी पूर्ण कस्सप आदि भौतिकवादी दार्शनिकों का नामोल्लेख दर्शाता है अनिश्वरवादी विचारधारा उस समय भी चुनौती की अवस्था में थी.

सामञ्ञफल सुत्त’(दीघनिकाय) में पूरा प्रसंग सिलसिलेवार दिया है. एक बार अजातशत्रु अपने दरबार में विराजमान थे. रात्रि का समय, पूर्णिमा की चांदनी दिगदिगंत तक फैली हुई थी. अचानक अजातशत्रु के मन में आया कि खाली समय का सदुपयोग तत्वचर्चा हेतु किया जाए. कुछ अंतरग दरबारी उस समय भी उनके साथ थे. वह वैचारिक क्रांति का युग था. जीवन और सृष्टि के रहस्यों को जानने के लिए पूरी दुनिया में उत्साह था. लोग अपनीअपनी तरह से सत्य तक पहुंचना चाहते थे. समाज में श्रमणों और यायावर मुनियों की प्रतिष्ठा थी. बड़े से बड़ा सम्राट उनकी अवज्ञा करने से घबराता था. तो अंतिम सत्य तक पहुंचने के नाम पर वैदिक परंपरा में मोक्ष की अवधारणा थी. मगर मोक्ष तभी संभव था, जब जीवन से मुक्ति हो. कुछ अपवाद छोड़ दिए जाएं तो जीवन चाहे जैसा भी हो, सभी को प्रिय होता है. बुद्ध द्वारा निर्वाण की संकल्पना जीवन की इच्छा और मुक्ति के बीच संतुलन की भावना को दर्शाती थी. वह मध्यम मार्ग था. जीवन(देह) को ही सबकुछ मानने वालों(अनीश्वरवादी) तथा जीवन को कुछ भी नहीं मानते हुए मोक्ष को महत्त्व देने वाले परंपरावादी पुरोहितों के बीच का रास्ता. बुद्ध पुनर्जन्म में विश्वास रखते थे. उनका मानना था कि जिस प्रकार भुना हुआ बीज अंकुरित नहीं होता, ऐसे ही सम्यक आचरण द्वारा मनुष्य इसी जन्म में दुख से हमेशा के लिए निवृत्ति प्राप्त कर सकता है. निर्वाण यानी विरक्ति का आनंद. संसार में रहते हुए उसके दुखक्लेश से सदासर्वदा के लिए निवृत्ति. ’सामञ्ञफल सुत्त’ में अजातशत्रु की जिज्ञासा निर्वाण को समझने की शुरुआती कड़ी है. अजातशत्रु की जिज्ञासा बहुत सरल है. वह जानना चाहता है कि जैसे शिल्पकार को कर्म का अवदान इसी जीवन में प्राप्त हो जाता है, क्या उसी प्रकार श्रामण्य जीवन का फल भी इसी जीवन में प्राप्त किया जा सकता है? जिज्ञासा के समाधान के लिए वह कई प्रतिष्ठित विचारकों से चर्चा कर चुका था, मगर उसे संतुष्टि न थी.

दरबारियों के बीच अजातशत्रु के यह पूछने पर कि तत्व चर्चा के लिए किसके पास चला जाए एक अमात्य ने छूटते ही कहा—‘‘महाराज पूर्ण कस्सप के पास चलिए. वह गणस्वामी, गणाध्यक्ष, यशस्वी, तीर्थंकर(मतसंस्थापक), प्रज्ञाशील, अनेकानेक शिष्यों वाला, वयोवृद्ध, चिरसाधक, सुगत और परम ज्ञानी है. उसके साथ अध्यात्मचर्चा से आपको अवश्य ही संतुष्टि मिलेगी.’’ अजातशत्रु उस सलाह को नजरंदाज कर देता है. उसके बाद बाकी अमात्य एकएक कर मक्खलि गोसाल, अजित केशकंबलि, पुकुद कात्यायन, संजय वेल्ठिपुत्त और निगंठ नाथपुत्त का नाम लेते हैं. निगंठ नाथपुत्त महावीर के लिए आया है. जो आगे चलकर जैन दर्शन के प्रवर्त्तक बने और 24वें तीर्थंकर कहलाए. जैसा हमने शुरू में ही कहा, यहां ‘दीघनिकाय’ के लेखक का ध्येय पूर्ण कस्सप के तत्वदर्शन के बारे में बताना नहीं है. उसका वास्तविक ध्येय तत्कालीन लोकप्रिय धर्मदर्शनों के बीच बुद्ध के दर्शन को प्रतिष्ठित करना है.

राजमंत्रियों की सलाह की उपेक्षा के पश्चात जीवक का नंबर आता है. उस समय गौतम बुद्ध राजवैद्य जीवक के जेतवन में अपने 1250 शिष्यों के साथ ठहरे हुए थे. जीवक अजातशत्रु को बुद्ध से मिलने की सलाह देता है. बुद्ध की प्रशस्ति करते हुए वह कहता है—‘‘वे सम्यक संबुद्ध, सुगत, लोकसिद्ध, सभी विद्याओं और सदाचरण से समृद्ध, अनुपम शास्ता, परमपज्ञ महात्मा हैं और इस समय मेरे ही आम्रकुंज में अपने शिष्यों के साथ विहार कर रहे हैं. उनकी कीर्ति और यशगाथा दिगदिगंत व्याप्त है. ऐसे परमप्रज्ञ महात्मा बुद्ध से तत्व चर्चा के उपरांत आपको अवश्य ही शंाति मिलेगी. आप उसी ओर प्रस्थान कीजिए.’’ जीवक की बात मानकर अजातशत्रु अपने हाथी पर सवार होकर दलबल के साथ बुद्ध से मिलने के लिए चल देता है. उसके साथ पांच सौ हथनियों पर सवार उसकी इतनी ही रानियां तथा पांच सौ सैनिकों का काफिला है.

यहां बौद्ध विद्वानों के लेखकीय कौशल की प्रशंसा करनी होगी. प्रसंग और प्रतीकों में अद्भुत तालमेल को बनाए रखते हैं. इतना कि दृश्यअदृश्य हर घटना से उनके लक्ष्य की पुष्टि होती है. श्रामण्य जीवन की सर्वोच्चता दर्शाने के लिए न केवल बुद्ध से आमनेसामने के संवाद की मदद ली जाती है, बल्कि परिस्थितियां भी ऐसी रची जाती हैं, जिनसे श्रामण्य जीवन के आगे राजसी वैभव महत्त्वहीन सिद्ध हो. ‘सामञ्ञफल सुत्त’ के अनुसार बुद्ध के पास जाते समय अजातशत्रु के साथ पांच सौ हथनियों पर सवार उसकी 500 पत्नियां के अलावा इतने ही सैंनिक साथ होते हैं. तत्वज्ञान के जिज्ञासु को इतने दलबल के साथ जाने का औचित्य? इससे दो चीजों की ओर संकेत किया गया है. पहला अजातशत्रु के मन में पैठा भय. उसने मगध की सत्ता अपने पिता से छीनी थी. मन में कहीं न कहीं यह आशंका भी छिपी होगी कि उसकी भांति कहीं उसका बेटा भी उसे पदच्युत करके सत्ता पर कब्जा न कर ले! कदाचित वह अपने बेटे की आंखों में मगध सत्ता के प्रति आकर्षण को पढ़ चुका था. इसलिए बेटे को सांसारिक रागविराग से मुक्त देखना चाहता था. जेतवन में अजातशत्रु जब, ‘निर्मल जलाशय के समान शांत, उदार, 1250 भिक्षुओं के बीच देदीप्यमान परम शास्ता को देखता है तो उसे तत्क्षण अपना बेटा याद आता है. यह भूलकर कि वह बुद्ध के पास अपनी जिज्ञासा के साथ आया है, वह अपने बजाए बेटे के लिए शांति की कामना करने लगता है—‘वाह! क्या बात है. क्या इसी प्रकार की शांति मेरे पुत्र उदयभद्र को भी प्राप्त हो सकती है?’ आगे उसे कामना करता हुए दिखाया गया है, ‘मेरा पुत्र उदयभद्र भी इसी शांति को प्राप्त करे.’ यह राजपरिवारों में पलने वाले भय और षड्यंत्रों से जन्मी कल्पना थी, जिनसे उसका सामना जन्म से ही होने लगा था. कहते हैं कि जब वह गर्भ में था, तब उसकी मां के मन में मानवमांस खाने की विचित्रसी इच्छा ने जन्म लिया था. इस बारे में जब ज्योतिषियों से विचार किया गया तो उन्होंने बताया कि जातक अपने पिता के लिए अशुभ होगा. ऐसे प्रसंग सच न भी हों तो भी रूढ़िवादी मान्यताओं के चलते जोड़ दिए जाते हैं. क्योंकि आगे चलकर अजातशत्रु ने पिता से मगध का राज्य हड़प लिया था. अब उसे भय था कि उसका बेटा भी उसके साथ वैसा ही व्यवहार कर सकता है, जैसा उसने अपने पिता के बिंबसार के साथ किया था. पुत्र उदयभद्र को बुद्ध की शरण में भेजने की अप्रत्यक्ष कामना उसी भय की ओर इशारा करती है.

इतिहास में अजातशत्रु की चर्चा वैभवशाली सम्राट के रूप में होती है. अपने पराक्रम द्वारा उसने काशी, कोशल, वैशाली तथा उसके आसपास बसे 36 गणराज्यों पर विजय प्राप्त की थी. इतने वैभवशाली सम्राट का 500 पत्नियों और सैनिकों के साथ बुद्ध से मिलने के इतर उद्देश्य भी हैं. अध्याय का शीर्षक ‘सामञ्ञफल सुत्त’(श्रमण जीवन का फल) है. जब वह बुद्ध से मिलने पहुंचता है तो उनके साथ 1250 शिष्यों की मंडली है. अजातशत्रु अशांत और संशयशील है. अनेक आशंकाएं और भय उसे घेरे हुए हैं. दूसरी ओर बुद्ध तथा उनके शिष्य ‘निर्मल जलाशय के समान शांत’ हैं. अपनी प्रतीकात्मकता में यह घटना धर्मसत्ता के आगे राजसी धनवैभव को गौण ठहराती है. इस अनुपात को ‘मिलिंद प्रश्न’ में भी कायम रखा गया है. समय के साथ बौद्ध जीवन की बढ़ी लोकप्रियता को अनुरूप ‘मिलिंद प्रश्न’ में भिक्षुओं की संख्या में उसी अनुपात में वृद्धि दर्शायी गई है. ‘दीघनिकाय’ और ‘मिलिंद प्रश्न’ में पांच शताब्दियों का अंतराल है. यह अंतराल मिलिंद और नागसेन के स्तर पर भी दिखता है. मिलिंद के साथ पांच सौ यवन सैनिकों के अतिरिक्त आवश्यक सैन्य बल है. जबकि नागसेन के साथ उसके 80000 शिष्य. परोक्ष रूप में यह भी राजसी जीवन के बरक्स श्रामण्य जीवन को श्रेष्ठता को दर्शाने का लेखकीय कौशल है. ऐसी प्रतीकात्मकता का ध्यान दूसरे प्रसंगों में भी रखा गया है.

पूर्ण कस्सप के तत्व दर्शन की झलक अजातशत्रु और बुद्ध की चर्चा के दौरान प्राप्त होती है. बुद्ध को अभिवादन करने के उपरांत अजातशत्रु परमशास्ता के समक्ष अपनी जिज्ञासा प्रकट करता है—वह जानना चाहता है कि जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के शिल्पकर्मों, उद्यमों यथा लौहकर्म, काष्ठकला, अश्वारोहण, रंजक, बावर्ची, हज्जाम, मालाकार, योद्धा आदि को उनके कर्म का फल इसी जन्म में प्राप्त हो जाता है, क्या श्रमण जीवन के फल को भी इसी जीवन में प्राप्त किया जा सकता है? उत्तर देने से पूर्व बुद्ध इस बारे में बाकी आचार्यों के मत को जान लेना चाहते हैं—‘‘यदि आपको आपत्ति न हो तो बाकी श्रमणों ने जो उत्तर दिया, वह बताइए?’’

अजातशत्रु सबसे पहले पूर्ण कस्सप के बारे में बताता है—‘‘भंते! एक बार मैं पूर्ण कस्सप के पास गया. उनके पास जाकर मैंने अपना यही प्रश्न दोहराया कि जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के शिल्पकर्मों, उद्यमों आदि का फल इसी जन्म में प्राप्त हो जाता है. उसी प्रकार क्या श्रामण्यजीवन का सुफल भी इसी जन्म में संभव है?’’ अजातशत्रु आगे बताता है—‘‘मेरे प्रश्न के उत्तर में पूर्ण कस्सप ने कहा—‘महाराज कार्य करतेकराते. छेदन करतेकराते, पकातेपकवाते, सैंध करतेकराते, गांव लूटते, चोरी करते, बटमारी करते, झूठ बोलते, परस्त्रीगमन करते, किसी की देह को तेज छुरे के प्रहार से टुकड़ाटुकड़ा करते, करवाते जैसे कर्मों से कभी भी पाप का आगमन नहीं होता. दूसरों पर घात करतेकराते, चोरी से दूसरों की फसल काटतेकटवाते गंगा के दक्षिण जाने पर भी पाप का आगमन नहीं होता. न ही दान देतेदिलाते, यज्ञ करतेकराते, गंगा के उत्तरवत्ती तट पर जाने से पुण्य की प्राप्ति होती है. दान, धर्म, सत्कर्म, परोपकार आदि में भी न तो पुण्य है, न ही पुण्य का आगम.’’ अंत में अजातशत्रु पूर्ण कस्सप के बारे में अपना निर्णय सुनाता है—‘‘इस तरह पूर्ण कस्सप ने मेरे प्रश्न का उत्तर घुमाफिराकर दिया. जैसे पूछा कटहल के बारे में जाए और कोई आम की विशेषताएं बताने लगे. कोई जामुन के बारे में सवाल करे और बताने वाला केले के गुणों का बखान करने लगे, ऐसा ही व्यवहार पूर्ण कस्सप ने किया. इसलिए बिना सहमति या असहमति दर्शाए, उन्हें प्रणाम कर मैं वहां से चुपचाप लौट आया.’’

आगे अजातशत्रु बारीबारी से अजित केशकंबलि, मक्खलि गोशाल, संजय वेल्ठिपुत्त, निगंठ नाथपुत्त तथा पुकुद कात्यायन से अपनी धम्म चर्चा के बारे में बताता है. प्रत्येक प्रसंग के बाद मिलेजुले शब्दों में वह अपनी निराशा को व्यक्त करता है. उस समय तक पाठक लेखक की मंशा को समझने लगता है. वह जान लेता है कि लेखक का उद्देश्य बौद्ध मत और भौतिकवादी विचारधाराओं के बीच संवाद करना नहीं है. वास्तविक उद्देश्य अजातशत्रु को बौद्ध धर्म से प्रभावित होते दर्शाना है. यथा राजा, तथा प्रजा—अजातशत्रु जैसा सम्राट बौद्ध धर्म को अपनाएगा, तो बाकी प्रजा भी उसकी ओर आकर्षित होगी. अपने धर्म और विचारधारा को जनजन तक पहुंचाने की कामना न जो अनुचित है, न ही असंभव. बल्कि आवश्यक भी है. इसी से विचारधाराओं के बीच संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ती है और नए रास्ते निकलते हैं. जो बातचीत हम कर रहे हैं, उसका रास्ता भी इसी तरह निकला है. इसके लिए हम बौद्ध और जैन विद्वानों के ऋणी हैं, क्योंकि इस बहाने हम उन अनीश्वरवादी दार्शनिकों के बारे में जान पाते हैं जिन्होंने उस दौर में ब्राह्मणवादी विचारधाराओं को चुनौती दी थी, जब वह कदाचित सबसे संगठित अवस्था में था. हालांकि उसके साथसाथ कुछ स्वाभाविक प्रश्न भी खड़े हो जाते हैं. बुद्ध ने वैदिक धर्म की परंपरा का भी विरोध किया था. वे कर्मकांड और आडंबरवाद को नकारते हैं. बलि प्रथा की उन्होंने कठोर शब्दों में निंदा की थी. ध्यातव्य है कि यज्ञों के दौरान बलिप्रथा का जोर इतना था कि एक साथ सैकड़ों पशुओं की बलि चढ़ा दी जाती थी. उस समय की अर्थव्यवस्था का आधार या तो खेती थी, या पशुधन. यज्ञबलि द्वारा पशुधन की हानि किसान तथा व्यापारी सभी को उठानी पड़ती थी. बुद्ध द्वारा बलि प्रथा के बहिष्कार द्वारा उनका प्रचार उन वर्गों में भी तेजी से हुआ, जिनकी अर्थव्यवस्था खेती या पशुधन से जुड़ी थी. यज्ञ आदि कर्मकांडों का बहिष्कार करने वालों में भी वही जातियां आगे थीं. अजित केशकंबलि का तो जन्म ही गोपालक परिवार में हुआ था. मक्खलि गोशाल का जन्म गोशाला में हुआ था. भौतिकवादी चिंतन के इतिहास में इन सबका प्रतीकात्मक महत्त्व है. ध्यान रखने वाली बात यह भी है कि कर्मकांड, आडंबरवाद और बलिप्रथा की आलोचना करते समय बुद्ध(बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, जो उनके निर्वाण प्राप्ति के शताब्दियों बाद उनके अनुयायियों द्वारा रचे गए. जिनमें बुद्ध के ब्राह्मणीकरण का प्रयास साफ नजर आता है) एक भी ब्राह्मणवादी विचारकलेखक का नाम नहीं लेते. जबकि भौतिकवादी चिंतकों की आलोचना उनके नाम के साथ अनेक बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में है. उस समय वे पूरी तरह व्यैक्तिक हो जाते हैं. आखिर क्यों? कारण कुछ भी हो सकता है. बल्कि एक नहीं कईकई कारण हो सकते हैं. यहां कुछ संभावनाओं पर हम विचार करेंगे—

ब्राह्मणवादी परंपरा के विचारकों का नाम न लेने के पीछे पहला कारण हो सकता कि बुद्ध के समय तक वह कोरे कर्मकांडों और आडंबरों में सिमट चुकी थी. कोई मौलिक दार्शनिक था ही नहीं. जो थे, वे सामाजिक हलचल से दूर, एकांत ज्ञानसाधना में लीन रहते थे. बाकी मुख्यतः पुरोहित वर्ग से आते थे, जिसका काम परंपरा की लकीर पीटना था. ध्यान से देखा जाए तो वैदिक मेधा का ढलान ऋग्वेद के बाद से ही आरंभ चुका था. ब्राह्मण आचार्यों को अपनी उस कृति पर गर्व था. इतना गर्व कि उसे सहेजने की चिंता उन्हें सताए रहती थी. चूंकि लेखन कला का पूरी तरह विकास नहीं हुआ था, इसलिए ज्ञान को सहेजने तथा उसे अगली पीढ़ियों तक अंतरित तरने का कार्य पूर्णतः स्मृतिकेंद्रित था. सामवेद की रचना ऋग्वेद की ऋचाओं को कंठस्थ करने तथा सस्वर गायन के उद्देश्य से की गई. ऋषिगण शिष्यों को ऋचाएं कंठस्थ कराते समय अग्नि के आसपास बैठते थे. मौसम की मार, भोजन की जरूरत तथा वन्य पशुओं से रक्षा करने में अग्नि उनकी मददगार थी. अलाव जलाकर बैठने के चलन से ही यज्ञ का विकास हुआ. प्रकारांतर में उसी से यजुर्वेद का. बुद्ध के समय कर्मकांडी धारा प्रबल थी. कदाचित उसे तत्कालीन वैदिक धर्मदर्शन की मुख्यधारा भी मान सकते हैं. दूसरे शब्दों में उन दिनों ब्राह्मणवादी परंपरा में सिवाय कर्मकांडों के ऐसा कुछ था ही नहीं, जिसकी सीधी आलोचना आवश्यक मानी जाती.

दूसरा कारण हो सकता है कि ब्राह्मणवादी परंपरा केवल पुरोहित वर्ग और उनके आश्रयदाता राजघरानों तक सीमित थी. समाज का बहुसंख्यक हिस्सा कमेरी जातियों से संबंधित था, जिन्हें ब्राह्मणवादी वैदिक ज्ञान के लिए अपात्र मानते थे. बुद्धकालीन भारत में जैसे ही व्यापार के अवसर बढ़े, कमेरी जातियां संगठित होने लगीं. उनमें बहुत अच्छे शिल्पकार और मेहनतकश लोग सम्मिलित थे. अपने श्रमकौशल के बल पर उन्होंने समाजार्थिक रूप से खुद को इतना सशक्त कर लिया था कि बाहरी मदद की उन्हें आवश्यकता ही न रही. ज्ञान पर एकाधिकार की कोशिश का कदाचित सबसे सार्थक और सटीक प्रतिकार यही हो सकता था. और यही उन्होंने किया भी था—‘यदि आपके ज्ञान, आपके कर्मकांडों में हमारी ससम्मान हिस्सेदारी संभव नहीं, तो हमें भी उनकी आवश्यकता नहीं है. प्रकृति ने हमें जीवन दिया है, इसलिए वही हमारे लिए सबकुछ है. स्वतंत्र मस्तिष्क दिया है, सो हम उस लकीर को भी नहीं पीटना चाहते, जिसे आप धर्म और परंपरा मानते हैं.’ सातआठ सौ वर्ष पहले कुछ ऐसा ही जवाब संतकवियों ने पुरोहितों और पंडितों को संतकाव्य के रूप में दिया था—‘यदि आपका देवता हमारे स्पर्शमात्र से अपवित्र हो जाता है. तो वह रहे मंदिर में, मूर्त्तियों का कैदी बनकर. सम्मान गंवाकर हम उससे मिलने नहीं आएंगे. हमारा साईं हमारे भीतर है. हम उससे कभी भी संवाद कर सकते हैं. दरअसल एकदूसरे के साथ सहकार और समर्थन ने आजीवकों को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाया था. भौतिकवादी दर्शनों का उभार इसी आत्मनिर्भरता की देन था. एक समय ऐसा भी था जब आजीवक मक्खलि गोशाल के समर्थकों की संख्या बुद्ध के अनुयायियों से अधिक थी. आजीवक संप्रदायी अपने संख्याबल आधार पर आगे भी बौद्ध एवं ब्राह्मणवादी चिंतकों के लिए चुनौती बने रहे. प्रमाण के लिए हम ह्वेनसांग का बनारस संबंधी विवरण देख सकते हैं. अपनी भारतयात्रा को याद को करते हुए वह लिखता है कि सातवीं शताब्दी के आसपास बनारस में 30 संघाराम थे. उनमें 3000 भिक्षु रहते थे. 100 महादेव मंदिर, उनमें 10000 पुजारियों का वास था. इतने सारे भिक्षुओं और साधुओं की नगरी होने के बावजूद बनारसवासी, मुख्यतः धनी व्यापारी वर्ग धर्म की गिरफ्त से बाहर था. ह्वेनसांग के अनुसार उनमें से कुछ बौद्ध मतावलंबी थे, जबकि अधिकांश अनीश्वरवादी. इससे यह संकेत भी मिलता है कि ब्राह्मणवर्ग का प्रभाव केवल समाज के संपन्न वर्गों तक, जो उनके कर्मकांड का बोझ उठा सकते थे—सीमित था. बाकी हिस्सा आजीवकों तथा नास्तिकों का था. उन्हीं का एक हिस्सा जैन और बौद्ध दर्शनों की ओर आकर्पित हो रहा था. बुद्ध के लिए संख्याबल महत्त्वपूर्ण था. अतएव भिक्षु संघों में अधिक से अधिक व्यक्तियों को सम्मिलित करने के लिए उन्होंने उन वर्गों पर विशेषरूप से जोर दिया, जिन्हें ब्राह्मणवादी चिंतन परंपरा में कोई स्थान प्राप्त न था.

तीसरा कारण भी महत्त्वपूर्ण है. ब्राह्मणवादी साहित्य सामूहिक प्रयासों की देन है. वहां व्यक्तिगत श्रेय के बजाए सामाजिक उद्देश्य के लिए काम करने पर जोर दिया जाता रहा है. उसकी पहचान उसकी समग्रता में है. अनगिनत ब्राह्मण आचार्य, मुनिगण बिना व्यक्तिगत नाम या यश की कामना के, सहस्राब्दियों तक केवल परंपरापोषण का काम करते रहे. ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ आरंभ में, क्रमशः ‘पुलत्स्य वध’ तथा ‘जय’ शीर्षक के अंतर्गत छोटीछोटी कृतियां थीं. उन्हें वर्तमान रूप में लाने में शताब्दियों का समय लगा है. अनेक मनीषियों का योगदान उन्हें मिला है. आज सिवाय ‘वाल्मीकि’ और ‘व्यास’ के किसी और का नाम उनके रचनाकार के रूप में नहीं जानते. नतीजा यह हुआ कि जो वाल्मीकि दो हजार वर्ष पहले ‘रामायण’ के लेखक के रूप में जाने जाते हैं, वही डेढ़ हजार वर्ष पहले लिखे गए महाग्रंथ ‘योगवशिष्ट’ के भी घोषित रचनाकार हैं. यही हाल उपनिषदों, पुराणों तथा अन्य ब्राह्मण ग्रंथों का है. व्यास को महाभारत, अठारह पुराण, श्रीमद्भागवत आदि का लेखक बताया जाता है. जबकि इन ग्रंथों की रचना शताब्दियों के अंतराल में हुई है. समय के साथसाथ उनमें संशोधनपरिवर्धन होते रहे हैं. यानी मौलिकता की कमी के चलते भी ब्राह्मणवादी विद्वानों का व्यक्तिगत संदर्भ अनावश्यक माना गया.

अनीश्वरवादी दार्शनिकों की भांति वैदिक परंपरा के लेखकोंआचार्यों की आलोचना उनके नामोल्लेख के साथ न करने के पीछे चौथा कारण यह हो सकता है कि ब्राह्मणवादी परंपरा के आचार्यों और पुरोहितों का तत्कालीन राजनीति और श्रेष्ठिवर्ग पर गहरा प्रभाव था. बुद्ध राजसत्ता और अर्थसत्ता के महत्त्व को भलीभांति समझते थे. जानते थे कि नए धर्म की सफलता समाज के शीर्षस्थ वर्गों के समर्थन के बिना असंभव है. इसलिए सीधे प्रहार से बचते हुए बुद्ध ने दूरंदेशी और कूटनीति से काम लिया. इसमें उन्हें सफलता भी मिली. यह ठीक है कि बौद्ध मठ समाज के सभी वर्गों के लिए खुले थे. किसी भी वर्ग का व्यक्ति उनमें प्रवेश पा सकता था. परंतु इसके आधार पर यह दावा करना कि बुद्ध वर्णव्यवस्था के भी विरोधी थे, अनुचित होगा. लेकिन यह बात विश्वास के साथ कही जा सकती है कि जाति और वर्ण को लेकर वे उतने कट्टर न थे, जितने ब्राह्मणवादी विचारक. अपने मत के प्रचारप्रसार के लिए बुद्ध ने समाज के सभी वर्गों का आवाह्न किया था. ब्राह्मणवादी परंपरा के आचार्यों और पुरोहितों का तत्कालीन राजनीति और श्रेष्ठिवर्ग पर गहरा प्रभाव था. वे राजदरबारियों में ऊंची हैसियत रखते थे. यह सोचते हुए कि ब्राह्मण परंपरा के आचार्यों पर सीधा प्रहार उनके आश्रयदाता सम्राटों को नाराज कर सकता है—उन्होंने परोक्ष आलोचना का मार्ग चुना और केवल कर्मकांड तथा यज्ञबलियों की आलोचना की. चूंकि ब्राह्मण पुरोहितों के यज्ञ खर्चीले होते थे और उनका भार राजाओं और सेठों को उठाना पड़ता था, इसलिए समाज के संपन्न वर्गों ने भी बुद्ध के विचारों का जी खोल कर समर्थन किया. यज्ञ बलियों से पशुहत्या में कमी आने लगी. उसका सीधा लाभ श्रेष्ठिवर्ग को पहुंचा. उसी की मदद से आगे चलकर देश की आर्थिक समृद्धि की नई कथा लिखी गई. राजाओं और श्रेष्ठिवर्ग से तालमेल के साथसाथ बुद्ध ने अद्विज वर्गों में भी अपने मत के प्रचारप्रसार पर जोर दिया, जिन्हें शूद्र कहकर किसी प्रकार के धार्मिक कार्यव्यवहार से अलग रखा गया था.

बुद्ध के आरंभिक शिष्यों में लगभग अस्सी प्रतिशत या तो ब्राह्मण थे, अथवा क्षत्रिय. चूंकि बौद्ध ग्रंथों की रचना बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के बाद संपन्न हुई थी. तो पांचवा और महत्त्वपूर्ण कारक यह भी संभव है कि बौद्ध लेखक वर्षों तक बुद्ध के सान्निध्य में रहने के बावजूद, अपने ब्राह्मणवादी संस्कारों को भुला नहीं पाए थे. इसलिए बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के पश्चात जैसे ही उन्हें अवसर मिला, उन्होंने बौद्ध परंपरा का ब्राह्मणीकरण करना आरंभ कर दिया. शुरुआत बुद्ध से ही की. अपने कुल को लेकर बुद्ध को अवश्य ही गर्व रहा होगा. लेकिन उनके जन्म को लेकर बाद में उनके शिष्यों ने जो लिखा, इस बारे में शायद ही उन्होंने कभी कुछ कहा होगा. ‘जातक निदान कथा’ में वर्णन आया है—

‘‘महापुरुष ने जन्म लेने के समय को विचारा….’’ फिर किस द्वीप में जन्म लिया जाए, यह सोचकर मध्य प्रदेश में जन्म लेने का निर्णय किया, ‘‘इसी प्रदेश में बुद्ध, प्रत्येक बुद्ध, श्रावक, अग्रश्रावक, महाश्रावक, चक्रवर्ती सम्राट तथा दूसरे महाप्रतापी ऐश्वर्यशाली क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य पैदा होते हैं….इसी में कपिलवस्तु नामक नगर है, जहां मुझे जन्म लेना है. फिर कुल का विचार करते हुए सोचा, ‘बुद्ध वैश्य या शूद्र कुल में उत्पन्न नहीं होते. लोकमान्य क्षत्रिय या ब्राह्मण इन्हीं दो कुलों में उत्पन्न होते हैं. आजकल क्षत्रिय ही लोकमान्य है. इसीलिए इसमें जन्म लूंगा….राजा शुद्धोधन मेरा पिता होगा.’’(बुद्धचरिय, राहुल सांकृत्यायन, पृष्ठ-1).

ऐसे वर्णन बौद्ध साहित्य में भरे पड़े हैं. ब्राह्मणवाद की छाया कहींकहीं तो इतनी गाढी है कि आप बिना संदर्भ के जान ही नहीं पाएंगे कि आप बौद्ध साहित्य पढ़ रहे हैं कि ब्राह्मण साहित्य—

‘‘इस तरह बौद्धि सत्व ने उत्तरापाद नक्षत्र में गर्भ में प्रवेश किया. दूसरे दिन….राजा ने गोबर लिपी, धान की खीलों आदि से मंगलाचार की हुई भूमि में….घी, मधु, शक्कर से बनी खीर से भरीं, सोने और चांदी की थालियों से ढंकी थालियां परोसीं (तथा) नए वस्त्र, कपिला गौ आदि से उन्हें संतर्पित किया.’’(बुद्धचरिय, राहुल सांकृत्यायन, पृष्ठ-2)

बुद्ध के प्रमुख शिष्यों में उपालि को छोड़कर बाकी सब ब्राह्मण या क्षत्रिय वर्गों से आए थे. उनके सोच पर ब्राह्मणवाद की छाया विद्यमान थी, वे ब्राह्मणवाद के आलोचक रहे होंगे, विरोधी नहीं.

छठा और महत्त्वपूर्ण कारक अनीश्वरवादियों की जाति थी. उनमें से कई समाज के उन वर्गों से आए थे, जो अपने श्रम के आधार पर जीविकोपार्जन करते थे. ब्राह्मणी व्यवस्था उन्हें शूद्र मानती थी. और शूद्र का कार्य अपने से श्रेष्ठ वर्गों की सेवा करना है, ज्ञान बघारना नहीं. ऐसी उन दिनों मान्यता थी. ऐसा नहीं है कि शूद्र वर्गों में मेधावी लोगों की कमी रही है. ब्राह्मणी व्यवस्था के अनेक ग्रंथों की रचना में शूद्र वर्ग के आचार्यों का योगदान रहा है. वेदों के संकलन कर्ता व्यास, प्रख्यात दार्शनिकों रैक्व, महीदास, सत्यकाम जाबाल उस समय की व्यवस्था के अनुसार शूद्र ही थे. रघुकुल के गुरु कहे जाने वाले वशिष्ट का जन्म दासी के गर्भ से हुआ था. एक और कारण यह भी संभव है कि भौतिकवादी विचारकों की पैठ अपने शिष्यों में इतनी गहरी थी कि उन वर्गों में अपनी पैठ बनाने के लिए उनपर सीधा प्रहार आवश्यक था. चूंकि अनिश्वरवादी विचारकांे को किसी भी प्रकार की सत्ता का समर्थन प्राप्त ही नहीं था. इसलिए सत्ता की गोदी में पलने वाले बौद्ध और जैन आचार्यों के लिए उनकी खुली आलोचना करना आसान बात थी.

पूर्ण कस्सप के जीवन और दर्शन पर चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले यह जान लेना भी आवश्यक है कि बुद्ध के समय तक धम्मप्रचार आमनेसामने के संवाद द्वारा किया जाता था. बुद्ध या महावीर ने अपने विचारों को लेकर स्वयं कोई ग्रंथ नहीं लिखा. बुद्ध के निर्वाण प्राप्ति के बाद अजातशत्रु के नेतृत्व में राजगीर में एक धर्मसंसद हुई थी जिसमें बुद्ध के प्रमुख शिष्यों से पांच सौ महाश्रमणों ने हिस्सा लिया था. सभी की अध्यक्षता महाकाश्यप ने की थी. उस समय तक बौद्ध दर्शन काफी प्रतिष्ठा अर्जित कर चुका था. बौद्ध के शिष्यों पर बड़ी जिम्मेदारी बुद्ध के विचारों तथा उपदेशों को बचाए रखने की थी. उनकी अपनी पदप्रतिष्ठा और भविष्य भी उससे जुड़ चुका था. इसलिए उस धर्मसंसद में बुद्ध के कृतित्व को सहेजने पर सभी की सहमति थी. उस दायित्व को बुद्ध के शिष्यों ने अच्छी तरह संभाला. लेकिन उनके शिष्यों में बड़ी संख्या द्विज वगों से आए बौद्धों की थी. जो अपने साथ वर्गीय संस्कार भी जाए थे. इसलिए बौद्ध ग्रंथों की अन्वीक्षा करने पर वे सब बातें बौद्ध ग्रंथों में, आई हैं, जिनका बुद्ध ने अपने जीवन में विरोध किया था. उदाहरण के लिए बुद्ध ने भिक्षुओं को जादू और चमत्कार दिखाने से दूर रहने को कहा था. ‘दीघनिकाय’ में ही इसके बारे में पर्याप्त चर्चा है. परंतु पूर्ण कस्सप के जीवन के बारे में चर्चा करते समय ही हम देखेंगे कि बाद के ग्रंथों में बौद्ध भिक्षु न केवल जादू और चमत्कार दिखाने लगे थे, बल्कि बुद्ध को भी चमत्कारी दिखाने से उन्हें परहेज न था.

क्रमशः….

© ओमप्रकाश कश्यप

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