प्रदूषण और पर्यावरण असंतुलन : कुछ नोट्स

 

अपने में सबकुछ भर, कैसे व्यक्ति विकास करेगा
                           यह एकांत स्वार्थ भीषण है, अपना नाश करेगा.कामायनी, कर्म सर्ग

 

प्रदूषण ऐसी समस्या है जिससे सभी त्रस्त हैं. उसे लेकर चिंता भी कम नहीं है. पहलीदूसरी कक्षा से ही हम बच्चों को उसके प्रति जागरूक करने लगते हैं. हालात यह हैं कि जिस गति से समाज विकास की ओर अग्रसर है, पर्यावरणसंतुलन को लेकर चिंता करने वाले बढ़ रहे हैंप्रदूषण और तज्जनित समस्याएं उससे कहीं तेजी से बढ़ रही हैं. उन्हें लेकर हमारे सभी आकलन और पूर्वापेक्षाएं गलत सिद्ध हुई हैं. कुछ समय पहले तक प्रदूषण को अनियोजित औद्योगिकीकरण से जोड़ा जाता था. माना जाता था अंधाधुंध मशीनीकरण ने प्रदूषण को न्योता दिया है. मशीनीकरण बढ़ेगा तो शहरीकरण बढ़ेगा और शहरीकरण के कारण भूमि के कुछ हिस्सों को जनसंख्या का अनपेक्षित दबाव झेलना पड़ेगा. यानी जैसेजैसे ‘विकास’ को गति मिलेगी, उसके उच्छिच्ट के रूप में प्रदूषण में भी वृद्धि होती जाएगी. प्रथम दृष्टया ऐसा हुआ भी. परंतु अब हालात बदल रहे हैं. आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों से अर्थव्यवस्था अवमंदन की शिकार है. सकल उत्पादन में गिरावट दर्ज हुई है. प्रौद्योगिकीय सुधारों के फलस्वरूप भारीभरकम मशीनों के स्थान पर स्वचालित तकनीक आ रही है, जो उत्पादनक्षम होने के साथसाथ पर्यावरण के प्रति अपेक्षाकृत संवेदनशील है. वाहनों को यूरो-5 और यूरो-6 के अंतरराष्ट्रीय मापदंडों के अनुसार बनाने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि उनके द्वारा होने वाले वायू प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सके. बावजूद इसके, प्रदूषण बजाय घटने के बढ़ता ही जा रहा है. ओजोनपरत का छलनी होना, वैश्विक गर्मी, नदियों में सूखा, कहीं भीषण वर्षा कहीं अकाल, हवापानी का निरंतर विषाक्त होना आदि पर्यावरण में आए असंतुलन के कारण हैं. इनसे मधुमेह, कैंसर, उच्च रक्तचाप, टीबी जैसी बीमारियां छोटेछोटे बच्चों को भी अपनी चपेट में ले रही हैं.

मन बहलाव के लिए सरकार और संगठन कह सकते हैं कि उनके प्रयासों के फलस्वरूप समाज में पर्यावरण चेतना बढ़ी है. यदि वे आगे नहीं आते तो समस्या और भी विकराल होती. वे सही हो सकते हैं. लेकिन आर्थिक विकास की घटती दर तथा प्रदूषणनियंत्रण के तमाम प्रयासों के बावजूद उसमें जराभी गिरावट न आने का अभिप्राय है कि उसके कारणों के प्रति हमारी जानकारी अधूरी और अपर्याप्त है. यदि ध्यानपूर्वक विश्लेषण किया जाए तो पर्यावरण असंतुलन एवं प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कारणों में से प्रायः उन्हीं की चर्चा की जाती है, जिनके आधार पर सारा दोष आम नागरिक के सिर मढ़ा जा सके. इस क्षेत्र के बड़े मगरमच्छों या आम नागरिक के निर्णयअधिकार पर डाका डालने वालों को लगभग बरी कर दिया जाता है. ऐसी स्थिति में क्या यह आवश्यक नहीं है कि पर्यावरण संकट के कारण तथा प्रदूषण नियंत्रण हेतु जो उपाय हमने किए हैं, उनकी समीक्षा की जाए. उन परिवर्तनों को चिन्हित किया जाए, जो हाल के दशकों में हुए हैं, या ऊपर से थोपे गए हैं. जिनके कारण प्रदूषण की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है.

हममें से अधिकांश प्रदूषण को भौतिक व्याधि के रूप में देखने के अभ्यस्त हैं. मान लेते हैं कि प्रदूषण तथा उसके कारण दोनों बाहरी चीज हैं. ‘दृष्टि ही सृष्टि है’, यदि परिवेश को सुधार लिया जाए तो सबकुछ सही हो जाएगाऐसा हम मानते आए हैं. हम भूल जाते हैं कि मनुष्य तथा उसका परिवेश परस्पर संबद्ध होते हैं. हमारा बोध परिवेश से प्रेरणा लेता है. अवसर आने पर अपनी कल्पना से उसे संवारता भी है. दूसरे शब्दों में हम वही गढ़ते हैं जिसके कारण हम अपने जीवन में अधूरापन महसूस करते हैं. हम किस वस्तु को अपने अस्तित्व का हिस्सा मानें तथा किसे अपनी पहचान के साथ जोड़ें, यह केवल हमारे अपने विवेक और इच्छाओं द्वारा तय होना चाहिए. प्रायः ऐसा होता नहीं है. चालाक और मुनाफाखोर लोग तरहतरह के हस्तक्षेप द्वारा हमारी पसंदों को अपने स्वार्थ के अनुसार ढालते रहते हैं. वे हमें निरंतर इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि हम उनकी इच्छाओं को अपना मानकर उनका अनुसरण करते रहें. किसी प्रकार का सवालजवाब न करें. वे हमारी प्रश्नाकुलता पर सवाल उठाते हैं. चाहते हैं कि अपने विवेक को उनके यहां गिरवी रखकर हम केवल वह करें, जिससे उनकी स्वार्थसिद्धि हो सके.

चलो मान लेते हैंस्पर्धा से उत्पादकता बढ़ती है. मगर यह भी तो सच है कि तीव्र स्पर्धा के बीच मनुष्य और शेष समाज का वह रिश्ता दरकने लगता है, जो सामाजिकता का आधार है. मनुष्य तथा उसके बहिर्जगत का संबंध उत्पादकता के साधनों पर भी निर्भर करता है. भूमि को लेकर एक किसान के दिमाग में बनी छवियां बिल्डर के दिमाग में निर्मित छवियों से पूरी तरह भिन्न होंगी. किसान की आंखों में भूमि का सर्वोत्कृष्ट स्वप्न उसपर लहलहाती फसल के रूप में होगा. जबकि बाजारवादी नजरिये से सोचते हुए बिल्डर उसपर कंक्रीट का जंगल उगाना चाहेगा. इमारत बनाने और बेच देने के बाद उसका कोई संबंध उस भूमि से नहीं रह जाएगा. परिणामस्वरूप भूखंड को लेकर किसी प्रकार की आत्मीयता या भविष्य दृष्टि भी उसके पास नहीं होगी. किसान केवल अर्थोत्पादन के लिए खेती नहीं करता. उसके मूल में सामाजिक हित भी जुड़ा होता है. वह चाहेगा कि उसके खेत सदैव उसके या उसके अपनों के अधिकार में रहें. उनकी उर्वरा शक्ति सदा बनी रहे. पर्यावरण की दृष्टि से यह बड़ा अंतर है. विडंबना है कि प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को लेकर हममें से अधिकांश की विचारधारा बिल्डर के दृष्टिकोण से मेल खाती है.

दोष अकेले बिल्डर का भी नहीं है. स्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था पारस्परिक सहयोग और सहअस्तित्व के आधार पर गठित अर्थव्यवस्था की अपेक्षा अधिक गतिशील हो सकती है. वह मनुष्य तथा उपलब्ध संसाधनों के बीच निजता स्थापित होने के लिए पर्याप्त समय नहीं देती. अधिक से अधिक लाभ की वांछा सारी आत्मीयता को किनारे कर देती है. मनुष्य बिना समाज के रह नहीं सकता, लेकिन प्रगाढ़ सामाजिकता के लिए जो अवसर उसे चाहिए, स्पर्धायुक्त समाजों उनका अभाव होता है. आपाधापी के बीच वह बाजार द्वारा विनिर्मित कृत्रिम समाज को ही असली मान लेता है. उधर बाजार की कोशिश होती है कि मनुष्य के चारों और सुखसाधनों का इतना जमघट कर दे कि शेष समाज की उसे आवश्यकता ही महसूस न हो. इसे तकनीक का जादू कहें या प्रलोभन, वह इतना सम्मोहनकारी होता है कि कमरे में बैठा मनुष्य उसके सहारे स्वयं को दिग्व्यापी समझने लगता है. उसे लगातार यह लगता है कि उसके मित्रहितैषी, जनपरिजन सब उसके सुखसाधनों पर ‘गिद्धदृष्टि’ जमाए हैं. परिणामस्वरूप वह उन लोगों पर भी संदेह करने लगता है, जो उसके मनुष्यत्व को बचाए रखने में सहायक हैं. किंतु संकट या चुनौतियों के बीच बंद कमरे की, सुखसंसाधनों तथा चमकदमक से भरपूर आभासी दुनिया मनुष्य के किसी काम नहीं आती. चूंकि सुखसंसाधनों का जमघट विकास और आधुनिकता के नाम जुटाया जाता है. अतः उनके अभाव या मुक्ति की चाहत को, मनुष्य पिछड़ापन मान लेता है. तो क्या सुखसंसाधन जुटाना गलत है? उत्तर होगा, हरगिज नहीं. ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में हुए हर नए आविष्कार के पीछे सैकड़ोंहजारों लोगों के अनथक श्रम और संपदा का योगदान होता है. उसके साथ मानवीय कल्याण का लक्ष्य भी जुड़ा होता है. इसलिए संपूर्ण समाज के लाभ के लिए प्रौद्योगिकीय शोध का लाभ उठाना कहीं भी अनुचित नहीं है. अनुचित तो भौतिक सुखसाधनों को विकास एवं आधुनिकता का एकमात्र पर्याय मानना तथा उनका समाज के कुछ वर्गों तक सिमटकर रह जाना है.

स्पर्धा के माहौल में ‘विकास’ का अभिप्राय ऐसी आत्मनिर्भरता से लिया जाने लगता है, जिसमें मनुष्य तकनीक के सहारे जीता है. अधिकतम विकास यानी तकनीक पर अधिकतम निर्भरता. इसे आधुनिक होना भी कहा जाता है. उस समय हम भूल जाते हैं कि आधुनिकता का आशय उपभोक्ता उपकरणों की भीड़ में व्यक्तित्व को विलीन कर देना हरगिज नहीं है. वह मानवीकरण की नवीनतम स्थिति को दर्शाती है. दिनकर के शब्दों में आधुनिकता नैतिकता में उदारता बरतने, खुद को सतत विवेकवान सिद्ध करते रहने की प्रक्रिया है.’ वह फैशन और दिखावे की भावना से सर्वथा परे मनुष्य के आत्मानुशासन तथा उसके निजी एवं सामूहिक विवेक के फलस्वरूप परंपरा, रीतिरिवाज एवं परिवेश में आए बदलाव की संकेतक होती है. विवेकवान मनुष्य नए ज्ञानविज्ञान की रोशनी में अपने सोच एवं निर्णयों में बिना किसी पूर्वाग्रह के परिवर्तन को उत्सुक रहता है. जबकि साधारण मनुष्य आधुनिकता के केवल बाहरी रूप से प्रभावित होता है. इसके परिणामस्वरूप आधुनिकता को महज प्रदर्शन की वस्तु मान लिया जाता है. आधुनिकता प्रायः समयसापेक्ष होती है. यद्यपि जरूरी नहीं कि आधुनिकता और समय दोनों की यात्राएं एक जैसी और एक ही दिशा में हों. उदाहरण के लिए 2400 वर्ष पहले जन्मा अरस्तु चर्च के अनुशासन में जीने वाले मध्ययुगीन यूनानी दार्शनिकों की अपेक्षा कहीं ज्यादा आधुनिक है. इसी तरह कबीर आधुनिकता की दौड़ में न केवल सूर और तुलसी से कोसों आगे हैं, बल्कि अनेक आधुनिक कवियों को भी पीछे छोड़ सकते हैं.

प्रदूषण एवं पर्यावरण असंतुलन जैसी विकट समस्याएं ‘विकास’ और ‘आधुनिकता’ जैसी बहुआयामी अवधारणाओं को सीमित अर्थों में लेने तथा इसके कारण सामाजिकसांस्कृतिक बोध में आई गिरावट से जन्मती हैं. बाजार का चरित्र प्रदर्शनकारी होता है. वह उन्हीं उत्पादों को बढ़ावा देता है, जिनसे उसके व्यावसायिक हित सधते हों. उसे इससे कोई मतलब नहीं होता कि संपूर्ण मानवसमाज की दृष्टि से क्या हितकारी है, क्या नहींवह निरंतर उस दिशा में काम करता है, जिससे उसके पालक पूंजीपतियों का भला हो सके. इसलिए संतोष, अपरिग्रह, सम्मिलित भोग, सुखों का सामान्यीकरण जैसे सहजीवन को बढ़ावा देने वाले मूल्य उसके किसी काम के नहीं होते. अपने लाभ के लिए वह किसी भी दिशा में जा सकता है. सुखसुविधाओं के नाम पर एक ओर वह ऐसे उपकरण उतारता रहता है, जो प्रदूषण को बढ़ावा देकर मनुष्य के लिए पारिस्थतिकीय संकट पैदा करते हैं. उसके साथसाथ बगल में एक और कारखाना वह लगाता है, जिसके जरिये प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर उपकरणों की नईनई खेप बाजार में उतारी जाती है. जो पूंजीपतिे तरहतरह के कारखाने लगाकर जलप्रदूषण को बढ़ावा देता है, वही अपने दूसरे कारखाने के जरिये शुद्ध जल के नाम पर ‘मिनरल वाटर’ का धंधा करता है. यह बात शायद चैंकाने वाली लगे परंतु है एकदम सच कि वायुप्रदूषण के लिए जिम्मेदार पूंजीपति ही नए नामों से बड़ीबड़ी कंपनियां खोलकर हवा के व्यापार की संभावनाएं तलाश रहे हैं. कुछ ही वर्ष पहले बेजोड़ तरक्की द्वारा दुनियाभर को हतप्रभ कर देने वाला चीन उनका सबसे बड़ा खरीदार है.

आशय है कि प्रदूषण आम नागरिक के आगे भले ही उसके अस्तित्व का संकट पैदा करता हो, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में कमाई का बड़ा जरिया है. वह पूंजीपतियों को हर साल खरबों डालर का बाजार देता है. उसकी राह को आसान बनाती है, उपभोक्तासंस्कृति. जो ‘खाते जाओखाते जाओ’ कहकर मनुष्य को पेटू बनने के लिए ललचाती है. और जब समस्या बढ़ती है तो ‘हाजमोला से पचाते जाओ’ जैसे विज्ञापनों के साथ मुनाफादेय उत्पादों की एक और शृंखला बाजार में उतार देती है. मीडिया के घोड़े पर सवार होकर यह तंत्र मनुष्य के विवेक पर विज्ञापन के कोड़े बरसाता है और किसी न किसी बहाने जनसाधारण से उसके निर्णय के अधिकार को छीन लेता है. फिर बड़ी चतुराई के साथ उसका सारा दोष आम नागरिक के मत्थे मढ़ देता है, ताकि लोग एकदूसरे को लेकर हमेशा अविश्वास के शिकार रहें और कभी भी बड़ी संगठित शक्ति में न ढल सकें.

हमारा समय लोकतंत्र, अभिव्यक्ति का अधिकार, समानता, स्वतंत्रता जैसी कई अच्छी बातों के लिए जाना जाएगा. किंतु इनके कारण मनुष्य के विवेकीकरण को जैसी गति मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिल पाई है. क्योंकि पूरा का पूरा तंत्र मनुष्य को बाजार के हाथों की कठपुतली बना देने पर तुला है. तरहतरह से उसके निर्मानवीकरण की कोशिश की जा रही है. अकूत पूंजी के दम पर पूंजीवाद स्वयं को इतना शक्तिशाली बना चुका है कि राज्य, समाज और राजनीति जैसे तंत्र जो मनुष्यत्व को बचाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, असल में पूंजीवाद के लिए काम करते नजर आते हैं. इसलिए जो लोग सही मायने में प्रदूषण से लड़ना चाहते हैं, जिन्हें पर्यावरण असंतुलन की सही मायने में चिंता हैउन्हें सबसे पहले मनुष्य को बाजारवाद के चंगुल से निकालकर राज्य और समाज दोनों को मानवीकरण की कसौटी के अनुरूप ढालना होगा. जिस दिन इसकी सही मायने में शुरुआत होगी, प्रदूषण की समस्या अपने आप सुलझती चली जाएगी. इस पुनीत लक्ष्य के लिए नागरिकों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण होगी. वस्तुजगत् के प्रति ‘इदं न मम्जगत हिताय’(यह केवल मेरा नहीं, बल्कि जगत्कल्याण के लिए है) की दृष्टि ही उसे उपभोक्ताकरण के चंगुल से बाहर निकाल सकती है.

ओमप्रकाश कश्यप

 

1 टिप्पणी

Filed under साहित्य, प्रदूषण एवं पर्यावरण असंतुलन : एक अकथ कथा

One response to “प्रदूषण और पर्यावरण असंतुलन : कुछ नोट्स

  1. Nitin Patel

    thanks dear thanks to send a new letrachar FromNitin patel

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