शब्द और सनसनी

विचारहीन राजनीति का दौर तो दशकों से था. हाल में उसका और भी अवमूल्यन हुआ है. इधर की राजनीति मानो कुछ शब्दों तक सीमित होकर रह गई है. शब्द नए नहीं हैं. सैकड़ोंहजारों वर्षों से वे हमारे सोच और विमर्श का हिस्सा रहे हैं. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि शब्द ही विचार के रूप में अभिव्यक्त होने लगें; और गिनेचुने शब्द हमारे विमर्श तथा संपूर्ण सामाजिकराजनीतिक चेतना को अल्पकाल के लिए ही सही, पूरी तरह से हड़प लें. मगर पिछले कुछ महीनों से देखने में आया है कि चंद शब्द जानीअनजानी किसी भी दिशा से शरारताना उछाल दिए जाते हैं. पूंजीवादी हितों को समर्पित मीडिया उन्हें तत्काल लपक लेता है. फिर प्रायोजित विमर्श के माध्यम से पूरी बौद्धिक चेतना उन शब्दों की व्याख्या, पुनर्व्याख्या में जुट जाती हैविचारहीनता के माहौल में उपद्रवी संगठनों की जुबान पर चढ़े शब्द तेजाब का काम करने लगते हैं. प्रतिक्रियावाद पहले भी था, लेकिन उसकी मंशा प्रतिपक्षी को शहमात के खेल में उलझा देने की होती थी. वह इतना पश्चगामी भी नहीं था, जितना कि आज. जैसे, ‘पाकिस्तान’ हमारे लिए केवल पड़ोसी देश कभी नहीं रहा. अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए सरकार और राजनीतिज्ञ उसका नाम प्रायः उछालते आए हैं. आज भी वही सिलसिला जारी है. इस पड़ोसी देश के प्रति हमारे पूर्वाग्रह एवं प्रतीतियां इतनी गहरी हैं कि आज भी, प्रायः आतंकवाद के पर्याय के रूप में तो कई बार बेमतलब की बातों में भीवह हमारे दिलोदिमाग पर सवार हो जाता है. फिर भी कुल मिलाकर एक स्वतंत्र देश के नाते पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीयता से जुड़ा मसला है. इसलिए वह समाज को तात्कालिक रूप से उत्तेजित भले ही करे, ध्रुवीकरण में सफल नहीं हो पाता.

इन दिनों ‘असहिष्णुता’, ‘बीफ’, राष्ट्रद्रोह’ आदि कुछ ऐसे शब्द हैं जो हमारी सामाजिक और राष्ट्रीय चेतनाओं को खंडखंड करने पर तुले हैं. जिन्हें लेकर अर्थहीन बहस चारों ओर जारी है. दोष इन शब्दों का नहीं है. प्रत्येक शब्द अनेकार्थी होता है. वाक्य में, अन्य शब्दों के साथ मिलकर वह विशिष्ट संदर्भों को अभिव्यक्त करने लगता है. इसलिए व्याकरण में शब्दार्थ के साथ शब्दशक्ति का महत्त्व भी बताया गया है. संदर्भ के अनुसार शब्द के विशिष्ट अर्थ को रचना में उभारकर, उसकी मदद से अपने मंतव्य को स्पष्ट कर देना ही लेखकीय सफलता है. आशय है कि विमर्श के दौरान शब्द अपनी अर्थवत्ता या अर्थवत्ताओं को आमतौर पर बड़े अर्थ यानी सर्जनात्मकता के निमित्त बलिदान कर देता है. रचना में ढलने के लिए शब्द की ओर से यह कुर्बानी जरूरी है. जैसे अनेक बूंदें एकसाथ मिलकर महासागर को जन्म देती हैं, शब्द भी दूसरे शब्दों से तालमेल कर, बड़े सृजन में ढलने का सामथ्र्य रखता है. लेकिन कुछ महीनों से शब्दों को, बड़ी अर्थवत्ता से जोड़ने के बजाए लोग उनके सीमित और स्थानिक अर्थों पर बहस करने में अपनी ऊर्जा खपाने लगे हैं

ऐसा नहीं है कि शब्दसंस्कार को पहचानने तथा उसका अनुकूल संदर्भों में प्रयोग करने की हमारी क्षमता कम हुई है. बल्कि इसलिए कि जनसंवाद कायम करने के लिए जो व्यक्ति और संस्थाएं जिम्मेदार हैं, वे उन लोगों के इशारों पर काम करने लगी हैं, जिनके निजी स्वार्थ मानवीय हितों पर भारी पड़ते हैं. यह न केवल हमारे समाजीकरण के लिए घातक है, बल्कि मानवीकरण की कोशिशों को भी झटका देने वाला है. चंद शब्दों को उछालकर सरगर्मी पैदा करने वाली कुछ शक्तियों को तो हम भलीभांति जानते हैं. उनके अपकर्म के लिए जबतब उन्हें धिक्कारते भी रहते हैं. तथापि कुछ शक्तियां ऐसी भी हैं जिन्हें हम जानते तो हैं, पर्दे के पीछे सारे अपकर्म वही करती हैं, फिर भी हमारी संवेदना, सारा समर्थन उनके पक्ष में बना रहता है. विकल्प के अभाव में ‘सोशल मीडिया’ को जो कहीं से भी ‘सोशल’ न होकर विशुद्ध पूंजीवादी तंत्र है, मुक्तिकामी लेखकों, संगठनों ने अभिव्यक्ति का अपरिहार्य माध्यम मान लिया है. वे उसे जनतांत्रिक मीडिया के रूप में पेश करते हुए सत्ता प्रतिष्ठानों से टकरा रहे हंै. टेलीविजन, अखबार आदि पर सरकार और अन्य वर्चस्वकारी शक्तियों का नियंत्रण होने के कारण वे उस मीडिया को अपनाने के लिए विवश हैं, जिसकी बागडोर बाजारवादी शक्तियों के हाथ में है. निहित स्वार्थ के लिए जो कभी भी, किसी भी दिशा में जा सकता है.

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में ‘इन्विजीविल हेंड’(अदृश्य हाथ) की प्रसिद्ध अवधारणा है. उसकी परिकल्पना एडम स्मिथ ने बाजार के संतुलनकारी रूप की व्याख्या के लिए की है. स्मिथ के अनुसार बाजार स्वयंसिद्ध होता है. प्रत्येक चुनौती से निपटने में सक्षम. प्रतिकूल हालात में तत्काल समायोजन कर वह अपने अस्तित्व को बनाए रखता है. थोड़े भिन्न रूप में ऐसा ही अदृश्य वरद्हस्त ‘फेसबुक’ और ‘ट्विटर’ जैसे कथित ‘सोशल मीडिया’ को भी प्राप्त है. वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को वहीं तक सह सकते हैं, जहां तक वह उनके आकाओं के लिए लाभकारी हों. ये सब उनके लिए सरकार पर दबाव बनाए रखने के माध्यम हैं. ताकि हांफती हुई सरकारों से हड़बड़ी में मनमाने फैसले कराए जा सकें. आकालोग नहीं चाहते कि राजनीति के पीछे कोई विचार हो. सरकारों को एक सीमा से अधिक मजबूत न होने देना भी उनकी चाल होती है. जानते हैं कि वामपंथी हो या दक्षिणपंथी, राजनीति विचारकेंद्रित होगी तब वह न्यूनतम मूल्यों से भी समृद्ध होगी. मूल्यकेंद्रित होगी तो उसे वास्तविक लोकसमर्थन हासिल होगा. वास्तविक लोकसमर्थन हासिल होने पर सरकारें आत्मविश्वास से लबरेज रहेंगी. फिर उनसे मनमाने फैसले कराना मुश्किल होगा. ‘सोशल मीडिया’ उनके लिए लोगों के दिलोदिमाग पर नियंत्रण बनाए रखने का हथियार है. जैसे ही लोग इन माध्यमों का ऐसा उपयोग करने लगेंगे, जिनसे पूंजीपतियों का वास्तविक अहित होने की संभावना हो, अदृश्य हाथ फौरन काम करना शुरू कर देता है. आकालोग खुद सामने नहीं आते. वे सरकार, विपक्ष, धर्म और संस्कृति सभी के सक्षम कंधों का इस्तेमाल करते हैं. इसलिए जो लोग इन माध्यमों से वास्तविक बदलाव की उम्मीद पाले हैं, सोचते हैं कि ये माध्यम बदलाव के अंतिम क्षण तक मददगार सिद्ध होंगे, वे या तो अंधविश्वासी हैं या हद से अधिक भोले. वास्तविक बदलाव के लिए इन माध्यमों के पीछे जो ‘अदृश्य हाथ’ है, उसे पहचानने की जरूरत है.

कुछ महीने पहले ‘असहिष्णुता’ नामक शब्द उत्तेजक मीडियाविमर्श का हिस्सा था. देश में बढ़ती सांप्रदायिकता को लेकर जागरूक साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों, कलाकारों आदि ने जागरूक पहल की थी. सरकार को सांप्रदायीकरण के लिए जिम्मेदार मानते हुए उन्होंने अपने सरकारी पुरस्कार/सम्मान लौटा दिए थे. यह न तो अलोकतांत्रिक था, न ही सरकार की अवज्ञा. बल्कि जो किया गया वह समय की मांग थी. उस समय उचित होता कि सरकार उनकी चिंताओं पर ध्यान देती. उनके बहाने समाज में बढ़ती असहिष्णुता, जातिभेद, उत्पीड़न तथा सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाली स्थितियों पर खुलकर चर्चा होती. किंतु मीडिया की मनमानियों और पर्दे के पीछे चलने वाले षड्यंत्रों के चलते ‘असहिष्णुता’ पर चर्चा के नाम पर पूरी बहस, देश के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशों में जुटी रही. कुछ लोगों ने यह कहकर कि जिन्हें इस देश में असहिष्णुता नजर आती है वे पाकिस्तान चले जाएंपाकिस्तान संबंधी हमारी रूढ़ अवधारणाओं का बेजा इस्तेमाल किया. ‘बीफ’ का मुद्दा भी ऐसा ही था. मांसखाना कुछ लोगों की दृष्टि में भले अनैतिक हो, लेकिन वह न केवल बड़े हिस्से की इच्छाओं और जरूरतों को पूरा करता है, बल्कि भारत की पुरातन संस्कृति में भी जगह बनाए है. इसके बावजूद यह नाकुछसा शब्द कई दिनों तक सनसनी फैलाने का काम करता रहा. धर्म और संप्रदाय की राजनीति करने वालों ने उसका स्वार्थ हित भरसक उपयोग किया.

इधर एक नया शब्द हवा में है. वह हैᅳ‘राष्ट्रद्रोह’. सब समझते हैं कि यह शब्द ‘सामाजिक न्याय’ जैसे बड़े मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए सोचीसमझी रणनीति के तहत उछाला गया है. हैदराबाद विश्वविद्यालय में प्रबंधन की मनमानियों से त्रस्त दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या ने विश्वविद्यालय की दमितशोषित वर्गों के प्रति भेदभावपूर्ण नीतियों को अचानक विमर्श में ला दिया था. उसको केंद्र में रखकर ‘सामाजिक न्याय’ की मांग कर रहे विद्यार्थी संगठनों, बुद्धिजीवियों, लेखकों और पत्रकारों ने आगे बढ़कर विश्वविद्यालय प्रबंधन की कारगुजारियों की ओर ध्यान आकर्षित कराना चाहा था. सरकार चाहे किसी भी दल अथवा विचारधारा की क्यों न हो, उसका संवैधानिक कर्तव्य है कि वह रंग, जाति, वर्ण, क्षेत्रीयता आदि के नाम पर होने वाले पक्षपात, अन्याय, उत्पीड़न को रोके. ऐसी स्थिति हरगिज उत्पन्न न होने दे जिससे कुछ नागरिकों को लगे कि किसी खास धर्म, जाति अथवा वर्ण में जन्म लेने के कारण उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है. लेकिन सरकार ने लापरवाही बरती. वह उस समय उत्पीड़नकर्ताओं के समर्थन में खड़ी नजर आई, जब हैदराबाद विश्वविद्यालय की घटना से लोगों का ध्यान हटाने के लिए जेएनयू को केंद्र बनाकर कुछ विद्यार्थियों को निशाना बनाया गया. ‘राष्ट्रद्रोह’ शब्द का प्रयोग पुलिस और कानून ने तो गिनीचुनी बार किया, परंतु सनसनीप्रेमी मीडिया ने उसे इतनी बार उच्चारा कि दक्षिणपंथी ताकतों का दबाव झेल रही सरकार प्रतिगामी शक्तियों के समर्थन में दिखने लगी. नतीजा पुलिस ने विश्वविद्यालय की स्वायत्तता के क्षेत्र में दखल दिया तो सरकार उसे कानून का मसला बताकर चुप्पी साधे रही. इस अलोकतांत्रिक कार्रवाही के मौन समर्थन के लिए उसे देशविदेश में आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. यहां तक कि नाम चॉम्सकी जैसे विद्वान जेएनयू के विद्यार्थियों के समर्थन में खड़े नजर आए

शब्दों के रूढ़ अर्थ को लेकर वादविवाद वैचारिकी के संकट की ओर इशारा करता है. देश में इन दिनों देश में यही हो रहा है. ‘असहिष्णुता’, ‘राष्ट्रद्रोह’, ‘भारतमाता’ जैसे शब्दों को उछालकर उनके जरिये समाज में उत्तेजना पैदा करना, वस्तुतः एक ही राजनीतिक संस्कृति की उपज है. इसके कर्ताधर्ता वे समूह हैं जो इस देश को कल्याण राज्य की अवधारणा से हटाकर ‘शक्तिशाली समूहों द्वारा शासित’ राज्य में बदल देना चाहते हैं. जैसा कभी जर्मनी में हिटलर ने किया था. उनके नियंत्रण में संचार माध्यमों का उपयोग एकतरफा संवाद के लिए किया जाता है. उनके जरिये ‘मन की बात’ कही जाती है, सुनी नहीं जाती. क्योंकि जिन लोगों पर शब्दों को बड़े विमर्श में ढालने की जिम्मेदारी रहती है, वे पूर्वाग्रहों से काम लेते हैं. ऐसा नहीं है कि वे दूसरों की व्याख्या को मन से अस्वीकार करते हैं. बल्कि इसलिए कि उनके स्वार्थ शब्दों की रूढ़ व्याख्याओं से जुड़ जाते हैं. हर बहस में वे उन्हीं बुद्धिजीवियों को उतारते हैं, जो उनकी विचारधारा के अनुकूल हो. बहस को सोचीसमझी दिशा में आगे बढ़ाया जाता है. फिर उसका ऐसी जगह समापन कर दिया जाता था कि दर्शकश्रोता किसी ठोस निर्णय पर न पहुंच सके. वही नौ दिन चले अढाई कोस वाली स्थिति. यह तब है जब इतिहास के किसी भी कालखंड से अधिक प्रखर और विविध विषयों के जानकार विशेषज्ञ और बुद्धिजीवी हमारे पास हैं. देश युवाशक्ति का गढ़ कहा जाता है. लेकिन राजनीति और पूंजीपतियों के हितों को अपना हित मान बैठे बुद्धिजीवी वही कहते हैं, जिसमें उनके स्वार्थ सधते हों. ऐसे में जिसे बहुमत का निर्णय कहा जाता है, अंततः वह अभिजन शक्तियों द्वारा संसाधनों को ओनेपौने हड़प लेने की नीति का हिस्सा बन जाता है.

इधर ‘राष्ट्रद्रोह’ और ‘भारत माता’ जैसे शब्द बौद्धिक गरमाहट का हिस्सा बने हैं. यह बात किसी से छिपी नहीं है कि इन शब्दों को सामाजिक न्याय की कामना में तेजी से उभर रहे अस्मितावादी आंदोलनों को दबाने के लिए उछाला गया है. देश को राजनीतिक स्वतंत्रता 1947 में मिली थी, मगर जनसंख्या का दोतिहाई हिस्सा वास्तविक आजादी के लिए 68 वर्ष बाद भी संघर्षरत है. अधिकांश के लिए तो वह आज भी सपने की तरह है. शताब्दियों से जातीय शोषण का शिकार रहे वर्ग इधर कुछ वर्षों से शोषण के कारणों को समझने लगे हैं. इसलिए वे उन प्रतीकों की नए सिरे से व्याख्या कर रहे हैं, जिनके आधार पर उन्हें सहस्राब्दियों से दबाया गया है. संवैधानिक स्थितियां उनके अनुकूल हैं. फलस्वरूप तेजी से बढ़ती जनचेतना, वर्चस्वकारी समूहों से हजम नहीं होती. देश की सरकार ऐसे संगठन के इशारे पर चल रही है, जो संस्कृति और धर्म के नाम पर समाज के बहुसंख्यक वर्ग को न्याय एवं अधिकारों से वंचित रखता है. जानता है कि अल्पमत में होने के कारण वह लोकतांत्रिक मोर्चे पर फतह नहीं पा सकता, इसलिए लोगों को मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिए धर्म, संस्कृति और बाजार की तरहतरह से मदद लेता है. ‘राष्ट्रवाद’ और ‘भारत माता की जय’ जैसे नारे जनसमुदाय की भावनाओं को भड़काकर शोषणकारी नीतियों की ओर से ध्यान हटाने की उसकी सोचीसमझी नीति का हिस्सा हैं.

चर्चा राष्ट्रद्रोह की चली है तो कुछ बातें ‘राष्ट्र’ और ‘राष्ट्रवाद’ को लेकर भी कर ली जाएं. पिछले कुछ दिनों से ‘भारत माता की जय’ का मुद्दा भी बौद्धिक गरमाहट का हिस्सा बना है. जो इस देश में रहता है, वह इस देश का नागरिक है. इसलिए यह मान लेना चाहिए कि उसे इस धरती से उतना ही प्यार है, जितना किसी और को है. अपनी मातृभूमि के प्रति स्नेह और सम्मान को कोई किन शब्दों में व्यक्त करता है, यह उसका निजी विश्वास या मसला है. उसका कोई एक स्वरूप संभव भी नहीं है. सरहद पर लड़ रहे सैनिक ‘भारत माता की जय’ बोलकर धावा बोलते हैं या ‘अल्लाह हो अकबर’ कहकर दुश्मन के छक्के छुड़ाते हैं, यह बात उतनी मायने नहीं रखती, जितना उन सैनिकों का जोशोजुनून और अपनी मातृभूमि के लिए मरमिटने की कामना. किसी भी राष्ट्र के लिए उसकी सीमाओं का महत्त्व होता है. लेकिन राष्ट्र की पहचान में उसकी भौगोलिकता अधिक मायने नहीं रखती. राष्ट्र की पहचान उसकी सांस्कृतिक जीवंतता, नए जीवनमूल्यों को अपनाने की क्षमता, नागरिकों के सामंजस्य भाव और श्रमसंस्कृति के स्तर से होती है. प्रत्येक राष्ट्र अपने नागरिकों की निर्मिति होता है. किसी देश की नागरिक संस्कृति ही दूसरे देशों में उसकी पहचान बनकर उभरती है. जब हम किसी जापानी के बारे में बात करते हैं तो इस बात पर कतई ध्यान नहीं देते कि उसका धर्म क्या है, वह बौद्ध है या शिंतो धर्म में विश्वास करने वाला. उसकी कल्पना के साथ ही अपने कर्म के प्रति सचेत, कर्मठ, अनुशासित तथा अपने देश को बेहद प्यार करनेवाले नागरिक का प्रत्यय मस्तिष्क में उभर आता है. यही स्थिति यूरोप के अधिकांश देशों के बारे में भी सच है. इसके विपरीत भारतीय नागरिक की विदेशों में छवि धर्म, जाति, विभिन्न प्रकार के कर्मकांडों में जकड़े रूढ़िग्रस्त व्यक्ति की बनी है. हमारे यहां नागरिकताबोध की कमी है, इसलिए भारत को लेकर हमारी राष्ट्रीय पहचान भी नागरिक होने के नाते कुछ खास नहीं है. जो कुछ कमाई बुद्ध, महावीर, नानकदेव जैसे महामानव हमारे लिए छोड़ गए हैं, उसी को हम आज तक भुनाए जा रहे हैं.

नागरिकताबोध का विकास सरकार और नागरिक दोनों का कर्तव्य है. लोकतांत्रिक सरकारों का यह भी कर्तव्य है कि वे समाज के लोकतांत्रिकरण हेतु सभी आवश्यक कदम उठाएं. नागरिकअस्मिता की रक्षा करें. मानवीकरण के अनुकूल स्थितियां पैदा करें. बिना नागरिक अस्मिता का सम्मान किए राष्ट्रवाद लाना, घोड़े को सिर से पांव तक बनी लोहे की जीन में कस लेने जैसा है. कोरा राष्ट्रवाद केवल उन्मादक मनःस्थिति है. वह सामाजिक असमानता और वर्चस्वकारी सोच का प्रदर्शन करता है. ‘भारतमाता की जय’ बोलने से शायद ही किसी को शिकायत हो. लेकिन इसे सभी के लिए अनिवार्य बनाने की मांग करने वाली शक्तियां वे हैं जिनकी लोकतंत्र के प्रति आस्था सदैव संद्धिग्ध रही है. इसलिए जब भी वे ऐसी कोई बात करती हैं, बाकी समूह जिन्हें उनकी नीयत पर संदेह है, उसे अपने अधिकारों पर संकट के रूप में देखने लगते हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

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