सहकार : आत्मनिर्भरता का दर्शन

उत्तरोत्तर कठिन होते जा रहे श्रमिक-जीवन की परेशानियों से मुक्ति का एक रास्ता समस्याओं के साथ-साथ जीवन से पलायन का हो सकता है. जैसा कि हमारे पूर्वज भी करते आए हैं. कभी संतोष के नाम तो कभी भाग्य के नाम पर. कभी धर्म तो कभी परलोक-सिद्धि के प्रलोभन से. कभी आत्मविश्वास गंवा जिंदगी से हार मानते हुए तो कभी शक्तिशाली के आतंक के चलते. यदि हमेशा यही होता तो जीवन में संभावनाओं की उपस्थिति और मानवीय जिजीविषा की चामत्कारिक देन से लोगों का भरोसा ही उठ जाता. परस्पर सहयोग और समर्पण की जादुई शक्ति को मनुष्य पहचान ही नहीं पाता. अमेरिका के शेकर साहचर्यवादियों के एक प्रसिद्ध गीत का गीत का भावार्थ  है—

जो भी सर्वोच्च शिखर तक पहुंचना चाहता है, उसको सर्वप्रथम समाज के सबसे निचले स्तर की ओर देखना चाहिए. तत्पश्चात सबसे नीचे मौजूद व्यक्ति को साथ लेकर सर्वोच्च शिखर तक पहंुचने के लिए चढ़ाई आरंभ कर देनी चाहिए.’

मनुष्य एवं सहकार का संबंध सहस्राब्दियों पुराना है. हड़प्पा और मोअ-जो-दड़ो की सभ्यता के अवशेष बताते हैं कि उन दिनों भारतीय व्यापारिक संगठन सुदूर रोम तक की यात्रा करते थे. प्राचीन चीन और जापान में ऐसे सहयोगी संगठन थे, जिनके सदस्य प्रतिमाह एक निश्चित रकम एक स्थान पर जमा करते रहते थे. धीरे-धीरे रकम बड़ी हो जाती, तो परस्पर बांट लिया जाता था. ऐसे सहयोगी संगठनों को चीन और जापान में क्रमशः यू हुई तथा तोनोमुशी कहा जाता था. भारतीय श्रेणि और यूरोपीय देशों में गिल्ड के बीच अच्छे व्यापारिक संबंध थे. आधुनिक सहकारिता आंदोलन की विधिवत शुरुआत रोशडेल पायनियर्स द्वारा 21 दिसंबर, 1844 को सहकारी उपभोक्ता भंडार की शुरुआत के साथ हुई थी.

सहकारिता को प्रेरित करने में सुप्रसिद्ध इतिहासकार चार्ल्स डिकेन्स की अद्वितीय प्रेरणा का योगदान भी कम नहीं है. 1843 की गर्मियों में चार्ल्स डिकेन्स, जो उन दिनों 31 वर्ष के सुदर्शन युवक थे, लंकाशायर की यात्रा पर निकले. उद्देश्य था अपनी नई पुस्तक के लिए जमीनी अनुभव बटोरना. देखना चाहते थे कि उत्तरी इंग्लेंड, जो उद्योग के क्षेत्र में विश्व-भर में नाम कमा रहा है, वहां पर आम जनजीवन कैसा है. उन्होंने मेनचेस्टर की मजदूर बस्तियों की यात्रा की, यह जानने के लिए कि अपने मालिकों के लिए साल में करोड़ों पाउंड का मुनाफा कमाने वाली कपड़ा मिलों के मजदूर किन परिस्थितियों में रहते हैं. डिकेन्स ने वहां जो देखा वह देह तो देह आत्मा तक को सुन्न कर देने वाला था. मजदूर बस्तियों में भूख, गरीबी और बीमारियों के नंगे नांच ने डिकेन्स को विचलित कर दिया. औद्योगिक क्रांति का हृदय-प्रदेश माने जाने वाले उस क्षेत्र में जीवन कितना मुश्किल और अमानवीय है. मानो पूरे इंग्लेंड को दो हिस्सों में बांट दिया गया हो. उसके एक ओर तो बड़े-बड़े धन्नासेठों, पूंजीपतियों, उद्योगपतियों और कमाऊ नौकरशाहों का इंग्लंेड है, तो दूसरे इंग्लेंड में भूखे, नंगे, विपन्न, शोषित-उत्पीड़ित और बीमार स्त्री-पुरुषों का बसेरा है. पूंजीवाद प्रेरित औद्योगिक क्रांति का कड़वा सच उसके सामने था. उसने जो देखा वह घोर अमानवीय, मनुष्यता को लांछित करने वाला था. अनियमितत मशीनीकरण के कारण प्रदूषण लगातार बढ़ता ही जा रहा था. नागरिक सुविधाएं पूरी तरह उजाड़ पड़ी थीं. वस्तुतः 1848 के आसपास रोशडेल में जीवन-संभाव्यता मात्र 21 वर्ष थी, जो उस समय इंग्लेंड की औसत जीवन-संभाव्यता से कहीं कम थी. औरतों के पास बदलने के लिए कपड़े तक नहीं होते थे. उनके गंदे और चिथड़े कपड़े बेहद बदबूदार होते थे. पलंग पर न तकिये होते थे, न चादर. बच्चे को जन्म देने के लिए औरतें प्रसूता के अगल-बगल, अपनी बाहों का सहारा देने के लिए खड़ी हो जाती थीं. भीषण दरिद्रता की यह अवस्था उन बुनकर परिवारों की साथ थी, जिनके बारे में यह दावा किया जाता था, कि वे पूरे विश्व के लिए कपड़ा तैयार करते हैं.

अगले ही दिन अथेनयिम क्लब में नौकरशाहों तथा कारखाना मालिकों की उपस्थिति में, वहां उपस्थित मजदूरों का आवाह्न करते हुए डिकेन्स ने कहा कि उन्हें अपनी इस अज्ञानता और अपराध-ग्रंथि से बाहर आ जाना चाहिए कि वे गरीबी और अपराध के बेबस जन्मदाता हैं. कि वे स्वयं कुछ भी करने में असमर्थ हैं, या उनका विकास दूसरे की दया-दृष्टि के बगैर संभव ही नहीं है. उन्हें इस भ्रम से भी बाहर आ जाना चाहिए कि एक दिन धनवान लोग अपनी आत्मा की आवाज से प्रेरित होकर आए आएंगे; और मिलकर उनकी समस्याओं का खोजेंगे. उन्होंने नौकरशाहों और कारखाना मालिकों से भी अपील की थी कि श्रमिकों की हालत में सुधार लाने के लिए वे आपसी कर्तव्यों तथा जिम्मेदारियों का परस्पर आदान-प्रदान करें. कि उनकी समृद्धि समाज की समृद्धि के बिना अधूरी और बेमानी है.

मजदूर बस्तियों में छायी गरीबी और बदहाली ने डिकेन्स को इतना व्यथित कर दिया था कि ट्रेन द्वारा लंदन वापस लौटते हुए उन्होंने अपनी नई पुस्तक ‘दि क्रिसमस कैरोल’ की अभिकल्पना की. एक सप्ताह बाद ही उन्होंने वह पुस्तक लिखनी प्रारंभ कर दी. उसके लगभग छह महीने के बाद 19 दिसंबर, 1843 को वह पुस्तक प्रकाशित होकर आई, जिसने पूरे इंग्लेंड के बुद्धिजीवियों को झकझोर कर रख दिया. लोग मजदूरों की स्थिति के बारे में सोचने को विवश हो उठे. क्रिसमस का उस जैसा उल्लास पहले कभी नहीं हुआ था— डेविड जे. थांपसन उस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि लंदन लौटने के बाद चार्ल्स डिकेन्स ने अपने आंख, नाक तथा कान यह जानने पर लगा दिए थे कि मेनचेस्टर और लंकाशायर की मजदूर बस्तियों के उत्थान के लिए पूंजीपति और सरकार कितने चिंतित हैं; तथा मजदूर अपने शोषण एवं उत्पीड़न का कितना और किस तरह सकारात्मक विरोध कर पाते हैं.

चार्ल्स डिकेन्स की पुस्तक ‘दि क्रिसमल कैरोल’ लगभग जीवनी थी. एक मजदूर के संघर्षों और दुःखों की महागाथा. उसमें डिकेंस ने यह कल्पना कि थी एक पिता अपनी गरीबी से बेहद तंग आ चुका है. कर्ज न चुका पाने के कारण सजा काटते हुए भी वह अपने परिवार के प्रति चिंचित और परेशान है. उपन्यास का मुख्य पात्र बॉब क्रेस्टी नाम के अत्यंत गरीब मजदूर को बनाया गया था, जो अपने मालिक के लिए कमरतोड़ परिश्रम करने के बावजूद परिवार का भरण-पोषण कठिनाई-पूर्वक ही कर पाता है. उसका एक बेटा नन्हा टिम बीमार और चलने-फिरने में असमर्थ है. बॉब का मालिक स्क्रूज खूब धनवान मगर हद से ज्यादा कंजूस है. उसके जीवन का प्रमुख लक्ष्य अधिक से अधिक धन इकट्ठा करना है. स्क्रूज को उन भूखे-बीमार मजदूरों और उनके परिवारों की कतई फिक्र नहीं है, जिनके परिश्रम के दम पर उसके कारखाने सोना उगलते हैं.

पुस्तक के बहाने डिकेन्स द्वारा गढ़ा गया रूपक तेजी से बदलते ब्रिटिश समाज पर तीखा कटाक्ष था, जिसका एक सिरा बेहद चमकदार और चकाचौंध से युक्त था, उसपर मुट्ठी-भर लोगों का अधिपत्य था. जबकि दूसरे सिरे पर हजारों-लाखों उत्पीड़ित-शोषित जन थे, जीवन की मामूली सुविधाओं के लिए तरसते हुए. आगे चलकर इसी वर्ग को कार्ल माक्र्स ने सर्वहारा कहकर पुकारा था. कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें न भरपेट रोटी मिलती थी, न तन ढकने को जरूरत-भर कपड़ा. पुस्तक के बहाने लेखक ने मजदूर जीवन की विसंगतियों को पूरी दुनिया के सामने लाने का प्रयास किया था, जिसमें उन्हें भरपूर कामयाबी प्राप्त हुई. डिकेन्स की यह पुस्तक आगे चलकर यूरोप देशों के सामाजिक अध्ययन का प्रमुख दस्तावेज बनी. उससे लोग विकास को आलोचनात्मक दृष्टि से परखने के लिए विवश हो उठे. डिकेन्स द्वारा गढ़ा गया पात्र बॉब क्रेस्टी समाज के गरीब, ऋणग्रस्त, उत्पीड़ित और शोषित मजदूर का प्रतीक बन गया. कुटिल स्क्रूज को कंजूसी और शोषक पूंजीपति का पर्याय मान लिया गया. एक और मुख्य बात मजदूरों को यह समझ में आने लगी कि अपनी बेहाली और दुर्दशा के वे या उनका भाग्य जिम्मेदार नहीं हैं, असली जिम्मेदार वह व्यवस्था है, जो पूंजी को सीमित हाथों में कैद करने का अवसर देती है. वे समझने लगे कि इस अवस्था से उभरने के लिए उन्हें स्वयं ही प्रयास करने होंगे.

इंग्लेंड के चार्टिस्ट आंदोलनकारियों को आम मताधिकार के लिए छेड़े गए लंबे संघर्ष के लिए जाना जाता है. मगर सहकारिता के क्षेत्र में भी उनका योगदान कम नहीं है. मजदूरों की आवास समस्या के समाधान के लिए चार्टिस्ट नेता ओ’काॅनर ने 1843 ईस्वी में ‘चार्टिस्ट को-आपरेटिव लेंड कंपनी’ नाम से एक सहकारी संस्था का गठन किया था. उसे आगे चलकर ‘नेशनल लेंड कंपनी’ का नाम दिया गया. उस संस्था का एक सम्मिलित कोष था. केवल मजूदर उसके सदस्य बन सकते थे. 1844 से 1848 के दौरान संस्था द्वारा पांच स्थानों पर विशाल भूखंडों पर आवासीय इकाइयों का निर्माण कर, उन्हें चुने हुए श्रमिकों में बांटा भी गया. तत्कालिक कानून के अनुसार भूमिहीनों को मताधिकार से वंचित रखा गया था. अतः श्रमिकों को भू-स्वामी बनाना, उस समय के नियमों के अनुसार श्रमिकों को मान-सम्मान दिलाना था. उससे भी पहले 1830 में आर्थिक आत्मनिर्भरता द्वारा जनसाधारण का सम्मान वापस लाने का प्रयास सहयोगी उद्यमों के माध्यम से हो चुका था. 1830 में चार्ल्स हावर्थ के प्रयासों से ‘रोशडेल फ्रेंडली कोआपरेटिव सोसाइटी’ का गठन किया गया था. उस समिति ने सहकारी उद्यम की शुरुआत उपभोक्ता भंडार के माध्यम से की थी. परंतु अनुभव की कमी, सहकारिता संबंधी जागरूकता के अभाव, व्यवस्थागत कमजोरियों तथा कानूनी शिथिलताओं के वह समिति असफलता का शिकार हुई थी. असफलता के अन्य कारणों में प्रमुख कारण थे, उधार बिक्री का प्रावधान तथा नियमों की अस्पष्टता. मजदूरों की दयनीय आर्थिक स्थिति को देखते हुए, समिति के विधान में की गई व्यवस्था के अनुसार सदस्यों को उसके उपभोक्ता भंडार से एक सप्ताह का उधार दिया जाता था. उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि सप्ताह के अंत में उधार की रकम का भुगतान कर देंगे. व्यावहारिक रूप में वह व्यवस्था बहुत दिनों तक नहीं चल सकी. सीमित वेतन तथा अन्य आकस्मिक खर्चों के कारण बहुत से मजदूर सप्ताहांत में रकम लौटाने में असमर्थ रहते थे. परिणाम यह हुआ कि समिति को व्यापार मेें घाटा होने लगा. चार्ल्स हावर्थ को व्यक्तिगत रूप में भी बहुत नुकसान उठाना पड़ा. कुछ ही दिनों पश्चात वह समिति भंग हो गई.

कोई और होता तो दो बड़ी असफलताओं के चलते टूट जाता. भारी नुकसान सहकर शायद ही अगला प्रयास करता. लेकिन मजदूरों के समक्ष ‘करो या मरो’ की स्थिति थी. बाजार में महंगाई बढ़ती जा रही थी, ऊपर से दुकानदार खाने-पीने के सामान में भारी मिलावट करते थे. उससे भी अधिक था उधार का बोझ, जो मजदूरों के जीवन की पहली सांस से आरंभ होकर अंतिम क्षणों तक बना रहता था. मजदूरों को यह बोध हो चला था कि अपनी समस्याओं का निदान स्वयं उनके हाथों में है. इसलिए बिना और विलंब किए उन्हें स्वयं आगे आना होगा. इनमें वे लोग लोग थे, जिनकी भविष्य पर निगाह थी. जिनका आशावाद अभी मरा नहीं था, जिनकी जनसंगठन और लोकशक्ति में प्रबल आस्था थी, जो जानते थे कि मनुष्यमात्र उतना बुरा नहीं, जितनी कि लोग उसके बारे में सामान्य धारणा बना लेते हैं. मनुष्य की सकारात्मक प्रवृत्तियों को उभारकर उसकी समस्याओं का निदान संभव है. मनुष्यता के ऐसे ही महान स्वप्नदृष्टाओं में से एक था, डॉ. विलियम किंग(1786-1865), जिसकी सहकार और सहयोगाधारित उपक्रमों में प्रबल आस्था थी. सहकारिता के विचार को जन-जन तक पहुंचाने के लिए डॉ. किंग ने एक समाचारपत्र भी निकाला था, नाम था—दि को-आॅपरेटर. अपने समाचारपत्र में उसने लिखा था—

‘बगैर संगठन के संख्या-बल निःशक्त है. जबकि विवेक बिना संगठन-शक्ति निरर्थक.’

डिकेन्स के मेनचेस्टर दौरे से पहले ही मजदूरों एक समूह वहां से मात्र सतरह किलोमीटर दूर रोशडेल में अपनी समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए निरंतर बैठकें करता आ रहा था. उन बैठकों में मजदूरों की समस्याओं तथा उनसे मुक्ति के बारे में विचार होता. ऐसी ही एक बैठक में जॉन कार्सव नामक एक मजदूर कार्यकर्ता ने सहकारी समिति के गठन का सुझाव दिया था. सहकारिता के पुराने प्रयोग असफल सिद्ध हो चुके थे. इसलिए उसके प्रस्ताव पर कुछ लोग चौंके. परंतु यदि सहकारिता नहीं तो क्या? दूसरे विकल्पों का सरासर अभाव था. अंततः उस सभा में सहकारी समिति बनाने के निर्णय को अनुमति मिल गई. उसका मुख्य उद्देश्य बनाया गया ग्राहकों को शुद्ध, पवित्र पूरे माल की आपूर्ति.

वह 15 अगस्त, 1844 का दिन था. बाकी दिनों से कहीं अधिक पवित्र और उम्मीदों से भरा हुआ, जब ‘रोशडेल पायनियर्स इक्वीट्वेल कोआॅपरेटिव सोसाइटी’ के गठन को सैद्धांतिक सहमति मिली, जिसने दुनिया-भर के सहकारिता आंदोलन को नई दिशा दी. रोशडेल पायनियर्स की संस्थापकों में कुल अठाइस सदस्य थे. सहकारी समिति की बात करना, उसके विचार को आगे चलाना अलग बात थी. उसके लिए पूंजी का प्रबंध करना अलग बात. मगर जहां चाह-वहां राह, और जहां राह-वहां हिम्मत और मंजिल भी. बैठक के दौरान मजदूरों ने निर्णय लिया कि प्रत्येक मजदूर को जो समिति का सदस्य बनना चाहता है, समिति के कोष में न्यूनतम एक पाउंड का निवेश करना होगा. एक-एक पेनी के लिए कमरतोड़ परिश्रम करने वाले मजदूरों के लिए एक पाउंड की रकम बहुत बड़ी थी. समस्या किसी एक की नहीं, अधिकांश मजदूरों की थी. तब सर्वसम्मिति से यह सुझाव आया कि इसके लिए कारखाना मालिकों से उधार लिया जाए. जो उधार देने में आनाकानी करें, उन्हें हड़ताल या धरना-प्रदर्शन के माध्यम से अग्रिम धनराशि देने के लिए विवश किया जाए. उस समय जो सदस्यगण काम करें, वे यह प्रयास भी करें कि हड़ताल पर गए सदस्यों के हिस्से के पेंस भी बचा सकें.

हड़ताल की धमकी मिलते ही कुछ कारखाना मालिक एडवांस देने को सहमत हो गए. यह संगठित शक्ति की पहली जीत थी. कुछ कारखाना मालिकों ने एकदम इंकार कर दिया. इसपर श्रमिकों का आक्रोश फूट पड़ा. उसके बाद मालिकों एवं मजदूरों के बीच संघर्ष भी हुआ. इसपर कुछ मजदूर निराश होकर समिति के प्रस्ताव से पीछे हटने लगे. कुछ अभी भी उम्मीद बांधे रहे. प्रत्येक सप्ताह दो पेंस की रकम उनके लक्ष्य को देखते हुए अपर्याप्त थी. हालांकि कुछ कारखाना मालिक उतनी रकम एडवांस के रूप में देने को तैयार थे, जबकि कुछ इस मांग को पूरी तरह नकार चुके थे. अततः मजदूरों तथा कारखाना मालिकों के बीच यह समझौता हुआ कि उतनी रकम मालिकों की ओर से मजदूर संगठन को एडवांस के रूप दी जाएगी. वहां से सदस्य उस राशि को उधार के रूप में ग्रहण कर सकते हैं.

 दो पेंस की रकम उस समय अधिकतर कामगारों की लगभग दो सप्ताह की मजदूरी के बराबर थी. कह सकते हैं कि उन बुनकरों के लिए यह रकम भी मामूली न थी. इसे उगाहने के लिए तीन व्यक्ति नियुक्त किए गए, जो प्रत्येक सोमवार सदस्यों से रकम लाकर खजांची के पास जमा कर देते थे. विषम स्थितियों में एक पाउंड की शेयर-निधि जुटाना भी कठिन प्रतीत हो रहा था. सदस्य प्रति सप्ताह दो पेंस जमा करने में भी नाकाम हो रहे थे. कई बार ऐसे भी अवसर आए जब सदस्यों पर निराशा हावी होने लगी थी. उस समय यह सुझाव दिया गया कि समिति के गठन का कार्य फिलहाल स्थगित कर दिया जाए तथा विकास के वैकल्पिक उपायों के बारे में सोचा जाए. साथ ही अभी तक जमा की गई रकम, संबंधित सदस्यों को लौटा दी जाए. भविष्य में जब भी हालात अनुकूल हों, तब संगठन के बारे में नए सिरे से विचार किया जाए. कुछ सदस्य तो हताश होकर उस समय तक जमा कराई गई शेयर-निधि वापस भी मांगने लगे थे.

यह प्रतिकूल स्थिति थी. लेकिन उम्मीदों एवं घनी निराशाओं के बीच मजदूरों का अभियान आगे बढ़ता रहा. इस बीच चार्ल्स हावर्थ बिना समय खोए तेजी से समिति के लिए विधान की रचना में लगा था. विपरीत स्थितियों और आस-निराश के बीच डोलते उस छोटे-से समूह के लिए पहला पड़ाव आया 24 अक्टूबर 1844 को, जब हावर्थ द्वारा बनाए गए नियमों को ‘रजिस्ट्रार आॅफ फैमिली सोसाइटीज’ द्वारा पंजीकृत कराके, नियमों की उस व्यवस्था को संसद के अधिनियम के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था की पहचान दी गई. इस तरह ‘रोशडेल इक्वीटेवल पायनियर्स को-आपरेटिव संस्था’ की नींव रखी गई. एक सपना अंगड़ाई लेने को आंखों में उतर चुका था. पंछी उड़ान भरने को पर खोल चुके थे, और अब पूरा अंतरिक्ष उनके लिए खुला था.

सदस्यगण अपने बाकी खर्च में कटौती करके एक-एक पेनी जोड़ते रहे. अंततः दिसंबर तक रोशडेल पायनियर्स मिलकर प्रारंभिक 28 पाउंड की पूंजी जमा करने में कामयाब हो गए. अब समस्या ऐसे स्थान की थी जो व्यावसायिक दृष्टि से उपयुक्त हो, साथ में पर्याप्त सस्ता भी. थोड़ी तलाश के बाद वह स्थान भी मिल गया. रोशडेल के 21, टोड लेन पर एक पुरानी मिल वर्षों से बंद पड़ी थी. देखभाल न होने के कारण वह खंडहर में बदलती जा रही थी. उसके मालिक मिस्टर डनलप से बात की गई, लेकिन वे उसको किसी समिति के नाम किराये पर देने को तैयार न थे. अंततः एक उपाय निकाला गया. समिति के ही एक स्थायी सदस्य के नाम पर उस गोदाम के भू-तल स्थित 23 फुट चौड़े तथा 50 फुट लंबे स्थान को तीन वर्ष के लिए किराये पर लिखवा लिया गया. किराया तय हुआ—दस पाउंड प्रति वर्ष. उसी स्थान के अगले हिस्से के 23 फुट चौड़े तथा सतरह फुट लंबे स्थल को दुकान के रूप में प्रयोग में लाया गया. शेष स्थान को भंडार तथा मीटिंग आदि के उपयोग के छोड़ दिया गया.

तैयारियां पूरी हो चुकी थीं. आखिर वह दिन भी आ गया जिसकी उन्हें वर्षों से प्रतीक्षा थी. रात-दिन जिसका उन्होंने इंतजार किया था. हजारों-लाखों सपने संजोए थे. अठाइस पाउंड में से दस पाउंड किराये के नाम खर्च हो चुके थे. कुछ उस इमारत की मरम्मत और सफेदी के नाम चढ़ गए. बाकी पाउंड से उन्होंने रोजमर्रा में काम आने वाली चीजें खरीदीं. कुल इतना सामान जितना कि छोटी-सी ट्राली में समा सके. उपभोक्ता भंडार का सपना और जरा-सा सामान! यह कहकर रोशडेल पायनियर्स का उपहास भी किया गया. मगर उन्होंने धैर्य से काम लिया. बिना प्रतिक्रिया दिए वे अपने काम से लगे रहे. पूर्णतः अनुशसित और लक्ष्य-समर्पित. आखिर उसी स्थान से, वर्ष की सबसे लंबी रात अर्थात 21 दिसंबर, 1844 को, सायं आठ बजे किटकिटाती ठंड के बीच रोशडेल पायनियर्स द्वारा सहकारी उपभोक्ता भंडार की शुरुआत की गई. मानो घने अंधियारे के बीच एक टिमटिमाती-सी लौ जली हो, जो बढ़ते-बढ़ते विश्वव्यापी दीपमाल बन गई. कुछ ही समय बाद जब वह स्थान छोटा पड़ने लगा तो भंडार को नए स्थान पर ले जाया गया. उपभोक्ता भंडार से आरंभ हुआ सहकारिता का अभियान उत्पादन, विपणन, निर्माण, थोक आपूर्ति जैसे नए-नए क्षेत्रों में फैलता चला गया. रोशडेल नाम सहकारिता का पर्याय बन गया. जगह-जगह से लोग उस स्थान को देखने के लिए आने लगे. उस अभियान कामयाबी ने सहकारिता का मखौल उड़ाने वाले लोगों की आंखें चैंधियां दीं. इस भ्रम को भी दूर कर दिया कि सीमित पूंजी के दम पर कोई उद्यम आरंभ कर पाना असंभव है.

तब से आज तक लगभग 170 वर्ष की अवधि में सहकारी आंदोलन ने पूरी दुनिया में तरक्की के नए-नए सोपान प्राप्त किए हैं. यह उस मिथ का खंडन करता है जो मानता है कि व्यावसायिक सफलता केवल स्पर्धा के माध्यम से संभव है. इसके उलट आधुनिक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का तो संपूर्ण दर्शन ही स्पर्धा पर टिका हुआ है. एक-दूसरे को नीचा दिखाकर बाजार पर छा जाने का प्रयास; और प्रयास भी ऐसा जो षड्यंत्र तक जाता हो, करना—आधुनिक उद्योग-नीति का ही हिस्सा है. इसमें कोई संदेह नहीं कि स्पर्धा से उत्पादकता पर प्रभाव पड़ता है. एक-दूसरे से बेहतर बनने की चाहत, स्वयं में परिष्कार का बोध भी जगाती है. लेकिन स्पर्धा सदैव निरापद नहीं होती. वह अपने साथ अनेक चुनौतियां लिए चलती है, जिनमे जरा-सी चूक पिछली सभी सफलताओं पर भारी पड़ सकती है. सुदीर्घ यात्रा के दौरान सहकारिता के क्षेत्र में भी अनेक बदलाव आए हैं. उच्च तकनीक ने सहकारी उद्यमों में भी जगह बनाई है. बावजूद इसके मूल सिद्धांत लगभग वही हैं, जो रोशडेल पाॅयनियर्स द्वारा अपनाए गए थे. उनमें देशकाल और परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर संशोधन अवश्य होते रहते हैं. इंग्लेंड से शुरू हुआ सहकारिता आंदोलन बड़ी तेजी से फ्रांस, स्वीडन, चीन, इटली, जर्मनी, जापान, स्पेन, अमेरिका, भारत आदि देशों में फैलता चला गया. आखिर क्यों, इसे समझने के लिए एक पुराना प्रसंग—

अरस्तु जब वह मात्र इकीस वर्ष युवा था, एक दिन वह मेकदोलन के सम्राट फिलिप के दरबार में पहुंचा. वहां उसने सिकंदर को पढ़ाने की इच्छा व्यक्त की. प्लेटो के शिष्य रह चुके अरस्तु को भला कौन मना करता! अनुमति मिलते ही अरस्तु ने अध्यापन आरंभ कर दिया. सिकंदर उस समय ग्यारह वर्ष का किशोर था. बड़ा ही सुंदर और उससे कहीं ज्यादा मेधावी. एक दिन की बात. अरस्तु गणित पढ़ा रहे थे कि अचानक सिकंदर ने टोक दिया—‘गुरुजी, एक कितने होते हैं?’

सवाल बहुत आसान दिखता है. अरस्तु इसको दार्शनिक रूप देना चाहते तो कह सकते थे कि एक यानी एकता यानी एकेश्वर अर्थात परमशक्ति! वे गणित का खेल दिखाते हुए यह भी कह सकते थे कि एक यानी दो का आधा या एक बटा दो का दुगुना; अथवा चार का एक-चौथाई. चाहते तो कोई और भी पहेली की तरह जवाब सुझा सकते थे. लेकिन जवाब देने के बजाय अरस्तु ने कहा—

‘मुझे सोचना होगा?’ उसके बाद वे घर लौट आए.

अगले दिन वे वापस लौटे. सिंकदर उत्तर की प्रतीक्षा में था. तब अरस्तु ने कहा—‘एक बहुत अधिक से भी अधिक हो सकता है.’

बात स्पष्ट थी. हम सब अलग-अलग मिलकर यदि केवल भीड़ बनाते हैं तो हमारी शक्ति, अकेले इंसान की शक्ति से कुछ ही ज्यादा होगी है. लेकिन यदि हम एकजुट हो जाएं, हमारे मनोरथ आपस में मिल जाएं, यदि हम अपनी संकल्पशक्ति का साझा कर लें, तब हम एक-एक होकर भी बहुत अधिक से अधिक हो सकते हैं.

यही सहकारिता है. यही संगठन की ताकत, यही इस लेख का उद्देश्य भी है.

© ओमप्रकाश कश्यप

 

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