विचारहीन राजनीति और परिवर्तन का स्वप्न

हम ऐसे दौर में हैं जब राजनीति को परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम मान लिया गया है. सदियों से दमितशोषित रहे वर्ग अपनी पहचान पाने को आकुल हैं, लोकतांत्रिक निजाम में सब अपने लिए सुरक्षित स्थान चाहते हैं. इसके लिए वे राजनीति को परिवर्तनकारी ‘टूल’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन उसका उपयोग कैसे किया जाए? जिन सपनों को राजनीति के माध्यम से साकार करना है, उन्हें लोकस्वीकृति कैसे दिलाई जाए? इस बारे में किसी के पास कोई स्पष्ट दिशा नहीं है. जहां दृष्टि है, वहां प्रतिबद्धता का अभाव है. नतीजा, नए वर्गों के प्रवेश तथा आशाओं, अपेक्षाओं के बावजूद राजनीति का चेहरा ज्यों का त्यों है. आरक्षण, भ्रष्टाचार, जातिवाद, क्षेत्रीयता जैसे वही पुराने घिसेपिटे मुद्दे हैं. पिछले कुछ दशकों से देश की राजनीति इन्हीं के इर्दगिर्द चकराती रहती है. ये इतने लोकलुभावन और सदाबहार हैं कि कोई दल इन्हें छोड़ना नहीं चाहता. यह मान लिया गया है कि वैचारिक राजनीति के दिन लद चुके हैं. ‘समाजवाद’, ‘साम्यवाद’, ‘गांधीवाद’ आदि को लेकर जो बहसें बीसवीं शताब्दी में सुर्खियां बना करती थींउनसे किनारा कर लिया गया है. तात्कालिकता में विश्वास ऐसा बढ़ा है कि दीर्घकालिक हित के अलोकप्रिय मुद्दों को कोई छूना तक नहीं चाहता. लोकप्रियता की राजनीति, अपनी पूरी चमकदमक, टोनोंटोटकों के साथ लगातार हमें भरमाए रखती है. संविधान पर दिए गए अपने भाषण में डॉ. अंबेडकर ने जिस सामाजिक लोकतंत्र की कामना की थी, उसे पूरी तरह भुला दिया गया है. प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में, देश की राजनीति पर आरएसएस जैसे उन जड़संस्कृतिवादी संगठनों का दबदबा है, जो तर्क के बजाय आस्था से काम लेने का प्रचार करते हैं, संस्कृति की आड़ में संप्रदाय और वर्गविरोध की राजनीति करना जिनकी फितरत है. हालांकि बहुसंख्यक वर्ग ऐसे संगठनों को पसंद नहीं करता, लेकिन वे मीडिया और दूसरे माध्यम से विभेदकारी राजनीति को गरमाए रहते हैं. धर्मसत्ता, अर्थसत्ता और राजसत्ता की तिकड़ी के समर्थन से वे प्रायः कामयाब भी होते हैं.

धर्म केंद्रित संस्कृति के अलावा जातिवाद भारतीय समाज एवं राजनीति की बड़ी विकृति है. हिंदू धर्म जातिवाद को पोषता है. जाति समाज के छोटे से हिस्से के लिए विशेषाधिकारों का गुलदस्ता है, वहीं बहुसंख्यक वर्ग के लिए अपने विवेक, पसंदों, इच्छाओं, सपनों और तर्कशक्ति को दूसरों के हाथों में सौंपकर खुद धर्म और संस्कृति की कारा को घर समझ लेने वाली स्थिति है. उसमें हालात से अनुकूलित लोग चमत्कारों की आस में जीते हैं, जबकि उन्हीं की खूनपसीने की कमाई के सहारे शिखर पर विद्यमान अभिजन शेष जनसमाज को अपने चंगुल में फंसाए रखने के लिए निरंतर बरगलाते रहते हैं. परिवर्तन की वांछाओं के दमन के लिए वे धर्म और संस्कृति को आगे कर देते हैं. जो जाति सहित अन्यान्य विभेदकारी व्यवस्थाओं का सुरक्षाकवच है. राजनीति की अपेक्षा धर्म और संस्कृति की परिवर्तनदर बहुत धीमी, आनुपातिक रूप से नगण्य होती है. अतएव राजनीति के सहारे परिवर्तन का सपना देखने वाले लोग, धर्म को अपना हथियार बनाते हैं. धर्म और सामंतवाद में कोई खास अंतर नहीं है. दोनों के अधिकांश लक्षण एकदूसरे से मिलतेजुलते हैं. दोनों ही वर्चस्ववाद को प्रश्रय देते तथा मौलिकता से घबराते हैं. अंतर केवल इतना है कि धर्म पहले दिमाग पर कब्जा करता है, फिर शरीर पर कब्जे को आसान बनाता है, जबकि सामंतवाद का प्रथम प्रहार मनुष्य के शरीर पर होता है और वहां से दिलोदिमाग को जकड़ता चला जाता है. इसलिए जो लोग धर्म को बीच में लाकर अथवा उसके सहारे से राजनीति करना चाहते हैं, वे प्रकारांतर में दैवी सत्ता के नाम पर सामंती प्रतीकों को ही थोप रहे होते हैं. ऐसे लोग या तो मूर्खता की हद तक भोले और नेतृत्व के गुणों से शून्य हो सकते हैं; अथवा अत्यंत स्वार्थी. इसलिए उनकी राजनीति भी स्वार्थपरक होती है. इसी कारण परिवर्तनकामी लोग धर्म और धार्मिक विश्वासों को राजनीति से दूर रखते हैं. उन्हें निजी विश्वासों की सीमारेखा से भीतर नहीं आने देते.

भारत जैसे देशों में जहां धर्म जीवनसंस्कृति में गहरे तक रचाबसा हो तथा मानवीय विवेक जातिपाश से बाहर आने के बजाय उसी को अपनी नियति मान बैठा हो, वहां वास्तविक परिवर्तन लंबे समय तक महज सपना बना रहता है. भारत में जाति ऐसी सचाई है जो समाज के हर पढ़ेलिखे और अनपढ़ की समझ में तुरंत और एकसमान आती है. जाति का इतिहास जितना पुराना है, लगभग उतना ही लंबा इतिहास इससे मुक्ति की छटपटाहट का भी है. बावजूद इसके यह हर समय, हर समाज में किसी न किसी न किसी रूप में विद्यमान रही है. हाल में तो यह मान लिया गया है कि जाति से एकाएक मुक्ति असंभव है. बुद्धिजीवियों का एक वर्ग तो जाति को भारतीय समाज की कड़वी हकीकत के रूप में स्वीकार कर चुका है. इसलिए वह जाति से मुक्ति के बजाय उसकी मदद से मुक्ति का सपना देखता है. जिसे समाज की विकृति माना जाता है, उसी के सहारे शताब्दियों से वंचना और उत्पीड़न का शिकार रहे वर्गों को एकजुट करने की कवायद की जा रही है. जाति के नाम पर सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने वाला दूसरा वर्ग राजनीतिज्ञों का है. उनके लिए जनसाधारण की कीमत एक अदद वोट तक सीमित होती है. उस ‘वोट’ को अपने पक्ष में करने के लिए वे तरहतरह के उपक्रम करते रहते हैं, जिनमें जाति भी एक है. धर्म और जाति के नाम पर मतदाताओं ध्रुवीकरण करना भारतीय राजनीतिज्ञों का सबसे पसंदीदा चलन है. आजादी से पहले और कुछ दशक बाद तक जातिविहीन समाज की स्थापना के लिए जो आंदोलन चले थे, समरस और वर्गहीन समाज की स्थापना का जो लक्ष्य रखा गया थाउनका अब कोई जिक्र तक नहीं करता. इसका परिणाम यह हुआ है कि आजादी के संघर्ष के दौरान प्रभाव खोने वाली जातिव्यवस्था इन दिनों पुनः अपनी केंद्रीय भूमिका है. सवाल है कि जाति को औजार बनाने का समाज को क्या लाभ पहुंचा है? क्या इससे समाज में दलित और शोषित वर्ग के मानसम्मान और सुखसमृद्धि में बढ़ोत्तरी हुई है. और यदि सुखसमृद्धि में सचमुच कुछ वृद्धि हुई तो क्या वह जाति को अस्मिता संघर्ष का औजार बनाए बिना असंभव थी?

यह ठीक है कि पिछली कुछ शताब्दियों में समाज के दलितशोषित वर्गों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार आया है. यह सुधार इतना बड़ा है जिसकी आज से सौ वर्ष पहले इसकी कल्पना तक असंभव थी. इसके साथसाथ जाति को टूल बनाकर पोषने के दुष्परिणाम भी कम सामने नहीं आए हैं. इससे जातियों के बीच ही असमानताओं के छोटेबड़े ऐसे अनेकानेक टापू बनने लगे हैं, जो समाज में दूसरे कारण से व्याप्त असमानताओं से किसी भी भांति कम नहीं हैं. हालांकि उपजातियों की संख्या घटी है. लेकिन ऐसा किसी सामाजिक सुधारभावना के चलते संभव नहीं हुआ है. बल्कि लोकतंत्र की मजबूरियों के चलते छोटेछोटे जातिसमूह परस्पर एकजुट होने लगे हैं. जो जातियां ऐसा करने में सफल हुईं, उन्हें विकास के अपेक्षाकृत अधिक अवसर भी मिले हैं. मगर जिस समाजार्थिक समानता के ध्येय से परिवर्तनकामी बुद्धिजीवियों ने जाति को एक औजार की भांति स्वीकार करना आरंभ किया था, वह भीतर ही भीतर दूसरे घाव करने लगा है. उससे अविश्वास और वर्गभेद की अलंघ्य दीवारें खड़ी होने लगी हैं.

जाति स्वयं में नकारात्मक व्यवस्था है. मनुष्य की योग्यता और रुचियों का ध्यान रखे बिना यह उसके चयन के अधिकार को बाधित करती है. यह श्रम के विभिन्न रूपों में न केवल भेद करती है, बल्कि उन्हीं के आधार पर समाज में अलंघ्य दूरियां पैदा कर देती है. इसके चलते शिखरस्थ वर्ग के प्रतिनिधियों के उत्तराधिकारी बिना किसी योग्यता के शिखर पर बने रहते हैं. जबकि निम्नस्थ वर्ग के प्रतिभाशाली प्रतिनिधियों को भी को अपनी योग्यता के सदुपयोग से वंचित कर दिया जाता है. इससे न केवल उस व्यक्ति बल्कि समाज की भी हानि होती है. वह मुट्ठीभर लोगों को जन्म के साथ ही शासकीय गुणों से संपन्न मानकर शेष जनता को शासित घोषित कर देती है. कुल मिलाकर देखा यही गया है कि लोकतंत्र में जाति लोगों को संगठित करने का औजार तो बन सकती है. बनती भी है, किंतु न्याय, समानता और समरस विकास जैसे जीवनमूल्य उसके सहारे संभव नहीं हैं. जाति सामाजिक अंतर्द्वंद्वों का बड़ा कारण है. जातीय अस्मिताओं का कड़ा संघर्ष विभिन्न जातिसमूहों को अनावश्यक स्पर्धा की ओर ले जाता है. इससे कथित जातीय पायदान के निचले स्तर पर मौजूद जातियों को, संख्या में अधिक होने के बावजूद परिवर्तनकारी शक्ति में ढालना कठिन हो जाता है.

लोकतंत्र में संख्याबल बहुत मायने रखता है. अतः उसके आधार पर खुद को निर्णायक शक्ति के रूप में ढालने में असमर्थ जातियां, ऐसे जातिसमूहों से गठजोड़ कर लेती हैं, जिनकी आर्थिकराजनीतिक ताकत अपेक्षाकृत अधिक है. हड़बड़ाहट में वे ऐसे दलों के समर्थन में उतर आती हैं, जिनपर सवर्णों का वर्चस्व है तथा जिनका न्याय, समानता, वर्गहीन समाज, विकास में साझेदारी जैसे मूल्यों पर कोई विश्वास नहीं है. जो जाति जैसी क्रूरतम और विभेदकारी संस्था को बनाने तथा उसे निरंतर पालनेपोसने के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार हैं. इससे उनकी समस्त जातीय चेतना निर्णायक शक्ति बनने के बजाय वर्चस्ववादी शक्तियों की पिछलग्गू बनकर रह जाती है. संवैधानिक व्यवस्था, सामाजिक आंदोलन के प्रभाव अथवा अन्यान्य परिस्थितियों के चलते भी, गैर सवर्ण नेता प्रायः संसद और विधायिकाओं में प्रवेश करते रहते हैं. किंतु अपने संस्कार, आत्मविश्वास की कमी, विशिष्ट मतदाता वर्ग की संसाधनों के लिए वर्चस्वकारी वर्गों पर निर्भरता तथा दलीय राजनीति के चलते वे विधायिकाओं में सार्थक भूमिका निभाने में असमर्थ रहते हैं. लोकतंत्र में संख्याबल का महत्त्व होता है, किंतु सदैव वही निर्णायक हो, यह आवश्यक नहीं है. बहुमत की आवश्यकता संसद में भी पड़ती है, जहां लोग दलीय आधार पर बंटे हो सकते हैं. कुल मिलाकर राजनीति में गैर सवर्णों के लिए सम्मानजनक अवसरों की कमी पहले भी थी. इन दिनों भी वे हाशिये पर हैं. वे राष्ट्रवाद को स्वतंत्रता, समानता और सामंजस्य जैसे आधुनिक जीवनमूल्यों पर खतरे के रूप में देखते हैं. जबकि यथास्थितिवादी परिवर्तन की वांछाओं को कुचलने के लिए सामदामदंडभेद यानी हर तरह के उपाय आजमा रहे हैं. सांस्कृतिकरण के बहाने वे भारत की पुरानी वर्णाश्रमी व्यवस्था को नए रूप में लौटाना चाहते हैं. इसके लिए हिंसा भी उनके लिए वज्र्य नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में जातीय झगड़ों में जिस तेजी से इजाफा हुआ है और गैर सवर्णों पर हमले बढ़े हैं, उससे मामले की गंभीरता को समझा जा सकता है.

जाति विचारहीन राजनीति को बढ़ावा देने वाले कारकों में प्रमुख है. वह विकास पर प्रतिकूल असर डालती है. थोपी गई जाति के प्रति मनुष्य का समर्पण दूसरी थोपी गई चीजों के प्रति अनुकूलन पैदा करता है. जैसे पिछले कुछ दशकों में तमाम कड़वे अनुभवों के बावजूद यह धारणा बन चुकी है कि विदेशी पूंजी होगी, तब विकास होगा. इसके चलते अंदरूनी संसाधनों के सदुपयोग से किनारा कर लिया गया है. जबकि सभी जानते हैं कि विदेशी पूंजी अतिरिक्त लाभ की सुनिश्चितता के बगैर न तो आती है, न ही उसके अभाव में ठहरती है. इस संबंध में पूंजीपति और चूहों में अधिक अंतर नहीं होता. बाढ़ के समय जैसे चूहे घर छोड़ने वालों में अग्रणी होते हैं, वैसे ही लाभ के अवसर कम होते देख विदेशी पूंजी भी पलायन करने लगती है. इसके बावजूद 2014 का चुनाव ऐसे व्यक्ति के नेतृत्व में लड़ा गया, जो विकास को विदेशी पूंजी की अनिवार्यता से जोड़ता है. सरकार बनने के पहले बीस महीनों में करीब तीस देशों की यात्राएं, उनके इसी विश्वास की पुष्टि करती हैं. चुनावों में मतदाताओं के बीच भाजपा समर्थक मीडिया और पूंजीपतियों ने विकास का ऐसा रुपहला सपना पेश किया था कि लोग गच्चा खा गए. विकास के अलावा उन चुनावों में जो दूसरा महत्त्वपूर्ण कारक थी, वह थी जाति. भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने खुद को बारबार पिछड़े वर्ग का बताकर अतिपिछड़ी जातियों के बीच ऐसी जगह बनाई कि वे वर्ग जो कांग्रेस से उम्मीदें खोकर बसपा और सपा के बीच गैंद की तरह ठोकर खाते रहते थे, एकमुश्त भाजपा के खाते में चले गए. भूल गए कि भाजपा की नीतियां संघ के कार्यालय में बनती हैं, जिसका ‘सामाजिक न्याय’ की वैचारिकी में कतई विश्वास नहीं है. वर्णाश्रम व्यवस्था आज भी उसके लिए आदर्श है.

भारतीय जनसमाज में परिवर्तन की चाहत को शिखरस्थ वर्ग अपने अस्तित्व पर संकट के रूप में देखते हैं. 2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद उनके हौसले बुलंद हुए हैं. केंद्र में अपनी सरकार है, ऐसा मानकर वे आक्रामक मुद्रा अपनाए हुए हैं. सामाजिक यथास्थिति बनाए रखने तथा परिवर्तन की इच्छाओं के दमन के लिए संस्कृति और राजनीति दोनों स्तर पर प्रयत्न किए जा रहे हैं. उनकी आक्रामकता देख परिवर्तन की चाहत रखने वाले वर्गों में यह विश्वास आम हो चला है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा समानता, स्वतंत्रता तथा समरसता जैसे आधुनिक जीवनमूल्यों के परिवर्तनकारी उष्मा के क्षरण हेतु उछाला गया है. उसके पीछे वे लोग हैं जो वर्णव्यवस्था का लाभ उठाकर शताब्दियों से सत्तासुख भोगते आए हैं; और निहित स्वार्थ के लिए उसे बनाए रखना चाहते हैं. इसलिए भाजपा और उसके सहयोगी दल जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का राग अलापना आरंभ करते हैं, तो उन वर्गों के जो राजनीति को परिवर्तनकारी औजार के रूप में इस्तेमाल करने के पक्ष में हैंकान खड़े हो जाते हैं.

जातिव्यवस्था के प्रति यथास्थितिवादी दृष्टिकोण तथा विकास को लेकर दिशाहीनता केवल भाजपाई राजनीति का लक्षण नहीं है. परिवर्तन का संकल्प लेकर उतरने वाले सभी दलों की कमोबेश यही हालत है. 130 वर्ष पुरानी कांग्रेस स्वयं को देश के स्वाधीनता संग्राम से जोड़ती है. उस समय वह भूल जाती है कि स्वतंत्रता मिलने के साथ ही गांधी ने कांग्रेस को भंग करने की सिफारिश की थी. तब जवाहरलाल नेहरू सहित बाकी कांग्रेसी नेता, जो स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए योगदान का मानदेय सत्ता की सीढि़यां चढ़कर प्राप्त करना चाहते थे, उसके लिए तैयार नहीं थे. आरंभ में कांग्रेस स्वयं देश के अभिजनों की पार्टी थी. उसमें बदलाव गांधीजी के नेतृत्व के दौरान आया. स्वयं गांधीजी वर्णाश्रम धर्म को श्रेष्ठ मानते थे. उनकी ओर से ‘प्रथम सत्याग्रही’ के गौरव से नवाजे गए विनोबा आम मताधिकार के सख्त विरोधी थे. नेहरू और उनके खानसामा दोनों का एक ही वोट हो, यह सुनकर उन्हें बड़ा अजीब लगता था. कांग्रेस के अधिकांश नेता भी तथाकथित ऊंची जातियों से आए थे, जो गैर सवर्णों के शोषणउत्पीड़न का शिकार थे. आगे भी कांग्रेस का चरित्र छदम् सेकुलरवादी और छद्म समानतावादी बना रहा.

राजनीति की सफलता लोकहित में किए गए प्रयासों से आंकी जाती है. इस बात से आंकी जाती है कि न्याय को सामाजिक लक्ष्य बनाने के लिए उसने कितने कारगर प्रयास किए हैं. इस आधार पर शासन के लक्ष्यों दो वर्गों में बांटा जा सकता है. लघु आयामी, तथा दीर्घ आयामी. लघु आयामी लक्ष्य आमजन की दैनंदिन की समस्याओं, शांतिव्यस्वस्था और अनुशासन से जुड़ा होता है. यह सुनिश्चित करने से होता है कि लोककल्याण के लिए बनाई गई योजनाओं का कार्यावन नियमानुसार हो रहा है अथवा नहीं. इसके लिए सरकार कुछ नागरिक संस्थाओं का गठन करती है; और स्वयं मुख्य कार्यकारी संस्था की भूमिका निभाती है. उसका दायित्व लोगों की रोजमर्रा की सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है. दीर्घायामी योजनाओं का निर्माण और कार्यान्वन इस बात पर निर्भर करता है, कि हम कैसा समाज चाहते हैं? उसके लिए संसाधनों की उपलब्धता, नागरिकों की अपेक्षा, बाहरी दबावों आदि को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाई जाती हैं. देश और समाज के दूरगामी हितों को देखते हुए विकास के लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं. लोकप्रिय राजनीति आज, अभी और स्थानीयता के बूते पनपती है. उनमें दीर्घायामी योजनाएं बनाने तथा उनका सफल संचालन हेतु आवश्यक धैर्य का अभाव होता है. जबकि लोकतंत्र में नागरिकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना सरकार की जिम्मेदारी होती है. इसे हम उनका कर्तव्य भी मान सकते हैं.

भारतीय राजनीति की विडंबना है कि यहां नेतागण लोकप्रिय राजनीति की सीढि़यां चढ़कर शिखर तक पहुंचते हैं. लोग उनसे उम्मीद करते हैं. शायद सबसे ज्यादा उम्मीद करते हैं. बावजूद इसके राजनेताओं के बारे में आम राय अच्छी नहीं है. साफ है कि लोग नेताओं को इसलिए चुनते हैं क्योंकि उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं होता. जनता की इस मजबूरी का लाभ नेतागण अपनी तरह से उठाते हैं. वे सपना देखते हैं कि जनता उनकी अंधसमर्थक बनी रहे. लोग उन्हें हमेशा अपने कंधों पर उठाए रखें. हालात उन दिनों की याद दिलाते हैं, जब राजशाही के दौर में कोई महत्त्वाकांक्षी सरदार या सामंत अपने नेतृत्व में सेना जुटाकर एकाध किला फतह कर लेता था. चूंकि उसके पास नया करने को कुछ नहीं होता था, इसलिए अपने आका की नएपन की चाहत को पूरा करने के लिए उसके चारणवृंद प्रशस्तिगायन के ऐसे आयोजन रचते रहते थे, जिनका जनता के विकास से कोई संबंध नहीं होता था. गणतंत्र में नीतियां लोगों के सपनों और जरूरतों के आधार पर बदलती हैं. लेकिन यहां बदलाव की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती. चारों ओर विचारहीनता का आलम है. बस किसी तरह सत्ता प्राप्त कर लेना चाहते हैं. चूंकि परिवर्तनकारी सत्ता का स्वरूप कैसा हो, इसका खाका किसी के भी पास नहीं है, इसलिए वंचित समूह के प्रतिनिधि सत्ता में आते ही इसकी चकाचौंध में खो जाते हैं. उस समय उन्हें वह लक्ष्य बिलकुल याद नहीं रहता, जिसका वायदा कर वे सत्ता में आए हैं.

राजनीति के शिखर पर भले ही कुछ लोगों का अधिकार हो. पीढ़ीदरपीढ़ी सत्ता भोगने के बाद अब वे इसके अभ्यस्त हो चुके हों, फिर भी यह मान लिया गया है कि राजनीति अब इलीट कर्म नहीं रही. कम से कम वैसी तो नहीं जैसी पहले थी. यदि पिछले बीसतीस वर्षों के इतिहास की पड़ताल ही कर ली जाए तो इस दौरान उन क्षेत्रों के लोगों ने राजनीति में अपनी जगह पुख्ता की है, जो पहले इससे बहिष्कृत थे. हां, सक्रिय राजनीति में आने के बाद उनका तेज अवश्य घटा है. राजनीति का अतिरेक भी दिखाई पड़ता है. पहले जो काम सामाजिक संगठनों की मदद से हो जाते थे, अब उनके लिए भी राजनीति करनी पड़ती है. इसलिए गलीमुहल्लों में छुटभइये नेताओं की पूछ बनी रहती है. अवसर का लाभ उठाते हुए सामाजिक संगठन भी राजनीति से संपर्क बढ़ा रहे हैं. राजनीतिकरण का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है, उन दमितशोषितों पर जो सदियों से उत्पीड़न और उपेक्षा का शिकार थे. लोकतांत्रिक अवसरों का लाभ उठाकर अब वे सत्ता के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं. वे सत्ता में हिस्सेदारी चाहते हैं.

आधुनिक राजनीति मोटे तौर पर दो लोकप्रिय मुहावरों के आसपास घूमती है. विकास और भ्रष्टाचार. बाजार का जादू लोगों के सिर पर इतना चढ़कर बोल रहा है कि लोग दन से विकास की मंजिलें पार कर लेना चाहते हैं. विकास का स्वरूप कैसा हो, उसके लिए संसाधन कैसे जुटाए जाएंगे, यह कोई विचार नहीं करता. विकास हो, चाहे उधार से, या बाहर की पूंजी से. ‘जब तक जियो, सुख से जियो. कर्ज लेकर भी घी पियो.’जैसी भौतिकवादी विचारधारा के लिए चार्वाक पंथियों की खिल्ली उड़ाई जाती है. हालांकि संभावना इसी बात की है कि यह उक्ति चार्वाकपंथियों की आलोचना में, उनपर कटाक्ष करने की नीयत से गढ़ी गई हो. जो हो संस्कृति और सभ्यता के बीच चौड़ी खाई के चलते यह भुला दिया गया है कि विकास के मायने क्या हैं? इस बारे में कोई स्पष्ट सोच लोगों के पास नहीं है. यदि पिछले दोतीन दशकों के बारे में सोचा जाए तो लोगों के पास संसाधनों की रेलपेल हुई है. टेलीविजन, मोबाइल, इंटरनेट ने दुनिया को एक कर दिया है. इनकी पहुंच से देश का कोई कोना, कोई घर नहीं बचा है. ध्यान करें, इन्हें विकास के प्रतीक के तौर पर ही परोसा गया था. जिन दिनों संचार क्रांति का गुब्बारा फूलने लगा था, उन दिनों उसका गुणगान किया जा रहा था. लेकिन आज उसकी पैठ केवल फेसबुक, वाटअप, ईमेल और चैटिंग तक सिमट गई है. इन संसाधनों ने लोगों का प्रबोधीकरण किया हो, उनका मानसिक स्तर ऊपर उठा हो यह बात इनका बड़े से बड़ा समर्थक भी कह सकता. फिर भी विकास और भ्रष्टाचार इतने बड़े मुद्दे हैं कि इनके सहारे सत्ता की अदलाबदली आसानी से की जा सकती है.

भ्रष्टाचार की परिभाषा अपने आप में सुस्पष्ट नहीं है. कमाई के अवैधानिक तरीकों को भ्रष्टाचार कहा जाता है. लेकिन यह परिभाषा केवल सरकारी निकायों तक सीमित है. निजी संस्थानों में अवैधानिक कमाई पर या तो ध्यान नहीं दिया जाता अथवा वित्तीय अनियमितता कहकर उनका प्रभाव हल्का कर दिया जाता है. लेकिन लोकप्रिय राजनीति में भ्रष्टाचार भी बड़ा मुद्दा है. इतना बड़ा कि इसी को आधार बनाकर पिछले चुनावों में दिल्ली में आम ने 15 वर्षों से जमीजमाई कांग्रेस पार्टी को किनारे होने को मजबूर कर दिया. करीब सवा सौ वर्ष पुरानी पार्टी आज सत्ता में वापसी के लिए हांफ रही है. केंद्र में यह काम भाजपा के द्वारा हुआ. भ्रष्टाचार के साथसाथ विकास को मुद्दा बनाकर उसने दस वर्षों की जमी कांग्रेस सरकार को पटखनी दी. कांग्रेस को लगी चोट इतनी गहरी थी कि वह संसद में विपक्षी नेता का पद पाने में नाकाम रही. हाल में संपन्न हुआ बिहार का चुनाव भी विकास और जातिवाद के बीच फंसा था.

हमारी सरकारें भ्रष्टाचारभ्रष्टाचार इसलिए चिल्लाती हैं क्योंकि इससे वे प्रकारांतर में वे उन्हीं लोगों को कठघरे में खड़ा करने में कामयाब हो जाती हैं, जिनके सहयोग से वे सत्ता में पहुंचती हैं. क्या विकास और भ्रष्टाचार अलगअलग मुद्दे हैं? दिखने में दोनों परस्पर विपरीत नजर आते हैं. मगर असल में दोनों एक ही सिक्के के पहलू हैं. सरकारों की कमी है कि वे भ्रष्टाचार को आर्थिक अपराध मानकर विचार करती हैं. जबकि वह नैतिक मसला भी है. जब कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार करता है तो वह आर्थिक अपराध से पहले नैतिक पराभव का शिकार होता है. वह मान लेता है कि सुख और सुविधाएं बटोरने का एकमात्र माध्यम धन है. सेवाओं के आदानप्रदान में यदि धन का हस्तक्षेप कम कर दिया जाए तो भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सकती है. वह सिक्का विचारहीनता का है. राजनीति में विचार न होने के कारण दोनों मुद्दे अकस्मात प्रभावी हो जाते हैं. हैरानी यह है कि दोनों ही मुद्दे आधुनिक विकासवादी अवधारणा की देन हैं. समस्या विचार के हाशिये पर पहुंच जाने की है.

विकास अपने आप में भ्रामक अवधारणा है. आवश्यक नहीं कि उसका असर मनुष्य और समाज के लिए सदैव सकारात्मक ही हो. परिवर्तन की दिशा जो भी हो, विकास की दिशा उसी ओर होती है. ‘कुविकास’ या ‘अविकास’ जैसी कोई अवधारणा नहीं है. शरीर में यदि कूबड़ निकल आए तो वह भी विकास माना जाएगा. इसलिए अर्थक्षेत्र के पुरोधा इस भ्रामक अवधारणा को अपने और व्यापार के बीच में नहीं आने देते. इसके बजाए वे ‘प्रगति’ पर ध्यान देते हैं, जो वांछित दिशा में सप्रयास प्रयत्नों की उन्नति को दर्शाती है. कहा जा सकता है कि समाज ‘जटिल’ संरचना है. सरकार जो विकास योजनाएं बनाती है, उनका एक छोर जनता में उनकी स्वीकार्यता और संसाधनों की उपलब्धता आदि पर भी पड़ता है. पूंजीपति जिस तरह अपने श्रमिकों और अन्य कर्मचारियों से काम लेता है, सरकार वैसा नहीं कर सकती. इसलिए सामाजिक प्रगति को मापने के लिए कोई मीटर नहीं बनाया जा सकता. क्योंकि नागरिकगण न तो जड़ पदार्थ हैं, न ही मशीन कि उनसे जब, जैसा चाहे काम लिया जा सके. वे परंपरा और संस्कृति से भी प्रभावित होते हैं. अपने अधिकांश निर्णय परंपरा और संस्कृति को केंद्र में रखकर ही लेते हैं. ऊपर से प्रकृति भी अपना खेल खेलती है. इसके अलावा जनसंख्या वृद्धि जैसे कारण, जिनसे विकास योजनाओं पर प्रतिकूल दबाव बना रहता है. इस कारण सरकार द्वारा आरंभ की गई योजनाओं के ठीक वही परिणाम नहीं निकलते जिन्हें ध्यान में रखकर उन्हें बनाया और लागू किया जाता है.

सरकारी तर्क अपनी जगह सही हो सकते हैं. लेकिन एक तरह से तो यह सरकार द्वारा अपनी ही जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश कही जाएगी. दरअसल सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है. प्रायः सभी योजनाओं के मूल में सामाजिक विकास की भावना निहित होती है. एक उदाहरण लेते हैंमान लेते हैं एक पूंजीवादी उद्यम को शीतल पेय बनाने के लिए सरकार लाइसेंस देती है. उस समय उस उद्यम के पास अगले पांच से दस वर्ष तक अनुमानित प्रगति की रिपोर्ट होती है. लागू करने के बाद प्रायः हर वर्ष या त्रैमासिक आधार पर उसकी समीक्षा की जाती है. अपने आंकड़ों को लेकर कंपनी आश्वस्त होती है. कोई गड़बड़ न हो इसके लिए उनका निरंतर अवलोकनपुनरावलोकन किया जाता है. अनुमानित आंकड़े परियोजना प्रस्ताव का हिस्सा होते हैं, जिनकी एक प्रति, समयसमय पर प्रकाशित होने वाली प्रगति रिपोर्ट के अलावा सरकार को भी सौंपी जाती है.

कोई भी कारखाना केवल मशीनों के बल पर नहीं चलता. उसके लिए तकनीशियनों और कामगारों की जरूरत भी पड़ती है. जो जनता के बीच से ही आते हैं. सामान्य नागरिकों की भांति वे भी परंपरा, संस्कृति और प्राकृतिक कारणों से प्रभावित होते हैं. उद्योग की परियोजना के समय इन सबका ध्यान भी रखा जाता है. कारखाना मालिक इस सबको ध्यान में रखकर ही अपनी अपनी प्रगति रिपोर्ट परिकल्पित करता है. सरकार ऐसा क्यों नहीं कर सकती? कहा जा सकता है कि सरकार, कल्याणकारी उपक्रम है. उसका ध्येय मुनाफा कमाना नहीं है. सरकार का यह सोच प्रकारांतर में पूंजीपति को निष्प्राण यंत्र की भांति उपयोग करने की अनुमति दे देता है. सरकार विकास को प्रगति के पर्याय के रूप में पेश करती है. लेकिन वह उस अनिश्चितता और दुष्परिणामों के बारे में नहीं बताती, जो विकास के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़े होते हैं. उदाहरण के लिए शीतल पेय का कारखाना लगाने से पारिस्थिकीय संबंधी संकट पैदा हो सकते हैं. उसके लिए भूजल का भारी मात्रा में दोहन करना पड़ता है. इससे जलस्तर में तीव्र गिरावट आती है. कारखाना मालिक अपनी प्रगति रिपोर्ट तो सार्वजनिक करता है, सरकार भी उसके आंकड़ों को उपयुक्त स्थान पर दर्शाती है, लेकिन कारखाने के कारण जो परिस्थितिकीय एवं पर्यावरण संबंधी संकट उस क्षेत्र में पैदा हो रहे हैं, उसपर न कारखाना मालिक ध्यान देता है, न ही सरकार. जबकि इसके लिए सरकार के पास पूरा अमला होता है. समयसमय पर वे अपनी रिपोर्ट भी देते हैं. लेकिन वह सार्वजनिक नहीं की जाती. सरकार विकास के साथ जुड़े उन नकारात्मक प्रभावों के अध्ययन से भी बच जाती है, जो बिना सोचेसमझे आरंभ की गई अनेकानेक योजनाओं से स्वाभाविक रूप से जुड़े होते हैं.

एक अन्य उदाहरण सिगरेट के कारखाने का लिया जा सकता है. सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, सरकार इसे लेकर निरंतर प्रचार करती है. हर वर्ष करोड़ों रुपये के विज्ञापन इसके प्रचारप्रसार पर खर्च किए जाते हैं. लेकिन सिगरेट के कारखाने को अनुमति देते समय सरकार की दृष्टि मुट्ठीभर रोजगार और रिवेन्यु पर केंद्रित रहती है. सिगरेट का कारखाना लोगों के स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और परिस्थितिकी पर क्या प्रभाव डालता है, सरकार उसकी ओर से मुंह मोड़े रहती है. हम इस बात पर गर्व करते हैं कि प्रवासी भारतीय विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत हैं. प्रवासी भारतीयों ने अपने आपको सिद्ध भी किया है. पिछले वर्ष उन्होंने 72 अरब डालर की पूंजी मनीआर्डर के माध्यम से भारत में भेजी, जो दुनिया में सबसे अधिक है. मगर इसका दूसरा पहलू भी है. वह यह कि हम अपने आला दर्जे के दिमाग निर्यात कर देते हैं और दोयम दर्जे की प्रतिभाओं से काम चलाते हैं. देश की सत्ता अव्वल दर्जे के धूर्त राजनीतिज्ञों के हाथों में तथा कामकाज दोयम दर्जे की प्रतिभा के हाथों में रह जाता है.

विकास को लेकर वर्तमान सरकार और उसके मुखिया अनेकानेक अंतर्विरोधों के शिकार हैं. उनके अंतर्विरोध उनकी विचारधारा की देन हैं जो सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को अपना अभीष्ट मानती है. युवावस्था में संघ की विचारधारा को समर्पित कर देने, फिर कई दशकों तक उसके साथ जीने के क्रम में वे उसे पूरी तरह आत्मसात् कर चुके हैं. इसलिए जो राजनीति वे इन दिनों कर रहे हैं, वह खुद भी अंतर्विरोधों से भरी है. वे भारत का नवोन्मेष चाहते हैं. इसके लिए ‘डिजिटल इंडिया’, ‘मेक इन इंडिया’, ‘अतुल्य भारत’ जैसे नारे उनके नेतृत्व में गढ़े गए हैं. वे चाहते हैं कि देश ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में आगे जाए. इसके लिए वे अमेरिका, रूस, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, यानी जहां से भी नवीनतम प्रौद्योगिकी खरीदने के प्रयास में हैं. दूसरी ओर ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे व्यक्तियों को महत्त्वपूर्ण पदों पर बिठाया गया है, जो भारत को लेकर किसी न किसी किस्म के ‘नास्टेल्जिया’ के शिकार हैं और अपनी शक्ति या संसाधनों का उपयोग उस नास्टेल्जिया को साकार करने में लगाना चाहते हैं. इस कारण वे आरएसएस जो विशुद्ध जातिवादी संगठन है, के भी करीब हैं. बारहवीं पास स्मृति ईरानी को भारत सरकार के मानव संसाधन जैसा महत्त्वपूर्ण मंत्रालय सौंप देना, दीनानाथ बत्रा को एनसीईआटी, पी. सुदर्शन राव को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का प्रमुख(राव साहब पद पर वेतन की व्यवस्था न होने के कारण इस्तीफा दे चुके हैं) बना देते हैं, जिसका संबंध भारतीय समाज के विवेकीकरण से कम है. ये अंतर्विरोध तभी तक अंतर्विरोध कहे जा सकते हैं जब तक हम उनके बारे में लोकतांत्रिकसमानतावादी समाज की, जैसा भारतीय संविधान में संकल्पित है, विचार करते हैं. इसलिए संघ के नेताओं को संविधान से ही शिकायत है. अवसर मिलते की वे संविधान को ही बदल देना चाहते हैं. हालांकि इसकी संभावना न्यूनतम है.

यह अच्छी बात है कि हमारे प्रधानमंत्री समयसमय पर लोगों से संवाद करते हैं. अपने ‘मन की बात’ उन तक पहुंचाते हैं. लेकिन विकास के संदर्भ में देखा जाए तो वे सर्वाधिक संशयमना प्रधानमंत्री लगते हैं. संशय लंबा है. इसके बने रहने का मुख्य कारण यह भी है कि वे स्वयं उसके बारे में अनजान हैं. यह शायद उनकी प्रवृत्ति है. उनका मिजाज प्रचारक का रहा है. प्रचारक की विशेषता होती है कि वह अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचाने को उत्सुक रहता है. कुशल सेल्समेन की भांति वह अपने उत्पाद की खूबियों को ग्राहक के सामने रखता है. उत्पाद की कमजोरियां क्या हैं, इसपर वह अधिक ध्यान नहीं देता. कई बार तो जानकर भी वह अनजान बना रहता है. यह उसके पेशे की मांग भी है. इसलिए उसकी सबसे अच्छी भूमिका तब होती है, जब वह अपने ‘प्राडक्ट’ के बारे में ग्राहकों से संवाद कर रहा होता है. सवाल है कि जिस विचारधारा के वे प्रचारक है, वैसे प्रचारक तो उनकी पार्टी के पास और भी बहुत हैं. फिर मोदी जी में ऐसा क्या है? इस सचाई के बारे में संभवतः मोदी जी भी अनजान हैं.

दरअसल भारत की जाति केंद्रित राजनीति में आरएसएस और भाजपा की विचारधारा का प्रचार करते, करते वे स्वयं कब ब्रांड मान लिए गए, इस बात से संभवतः वे स्वयं भी अनजान हैं. गुजरात के दंगों के दौरान उनकी छवि कटटर हिंदुत्ववादी नेता की बनी. लेकिन आम चुनावों में सफलता के लिए कट्टर हिंदुत्ववादी होना कारगर नहीं था. भारतीय राजनीति की यह विशेषता है कि यहां कट्टरता सीधेसीधे कामयाब नहीं हो सकती. भारतीय मतदाता को कट्टरता स्वीकार ही नहीं है. यहां अटलविहारी बाजपेयी को कामयाबी तब मिलती है जब वे उग्र हिंदूवाद चोला उतारकर समन्वयवादी का मुखौटा पहन लेते हैं. प्रधानमंत्री बनने के इच्छुक लालकृष्ण अडवाणी नाकाम होते हैं, क्योंकि रथयात्रा के दौरान उन्होंने अपनी छवि उग्र हिंदुवादी की गढ़ ली थी. अयोध्या में मस्जिद के अवशेषों को गिराने का दाग उनपर लगा था. आगे चलकर इस दाग को मिटाने के लिए उन्होंने पाकिस्तान जाकर जिन्ना की मजार पर चादर चढ़ाकर इस दाग को मिटाने की कोशिश की. बस यहीं आरएसएस की निगाह में वे खलनायक मान लिए गए. इसलिए ऐसे चेहरे की तलाश की जाने लगी, जो संघ की विचारधारा का आंख मूंदकर समर्थन करता हो. दाग मोदी पर भी था. गुजरात दंगों का. लेकिन उनके मातृसंगठन के लिए यह उनकी विशेषता थी.

आरएसएस की निगाह में ‘ब्रांड’ मोदी का पिछड़ा होना उनकी बड़ी खूबी थी. इसलिए चुनावों के दौरान कई मिथक उस ब्रांड के साथ जोड़े गए. पहला मिथक विकास का था. मंदी की शिकार अर्थव्यवस्था में भारत का युवा चमत्कार की उम्मीद पाले हुए था. विकास का नारा उसे एक उम्मीद में बदल देता था. लेकिन केवल विकास के नाम पर बहुमत का जुगाड़ असंभव था. इसलिए कि कांग्रेस विकास के नाम पर ही राजनीति कर रही थी. उसके पास मनमोहन सिंह जैसा नेता था, जिसे आर्थिक सुधारों का सबसे बड़ा नक्काश माना जाता है. इसलिए विकास के साथसाथ मोदी जी के पिछड़े वर्ग से संबंधित होने ने उन्हें भारतीय राजनीति में स्वीकार्य चेहरा बना दिया. अपनी कुशल सेल्समेनी के बल पर मोदीजी अपनी छबि बनाने में कामयाब भी रहे.

कारपोरेट घरानों से निकटता, मीडिया के समर्पण, धार्मिक कट्टरपंथ, जातिवाद सांप्रदायिकता और पूंजीवाद के साथ मिलकर उन्होंने ऐसा कोलाज रचा कि धर्म और कट्टर राष्ट्रवाद को आसानी से खपा लिया गया. पूंजीवाद के नेतृत्व में धर्म, संस्कृति और राजनीति का ऐसा कोलाज शायद ही किसी और देश में रचा गया हो. धार्मिक धु्रवीकरण और पूंजीवादी संस्थाओं से अपनी निजता के आधार पर मोदी जी ने इतनी लोकप्रियता बटोरी कि केंद्रीय चुनावों में सफलता के लिए अपने चुनावी राजनीति के तहत हर प्रयोग को दोहरा चुकी भाजपा के लिए वाजपेयी के बाद नरेंद्र मोदी सबसे उपयुक्त उम्मीदवार सिद्ध हुए. उन्हें सबसे उपयुक्त और प्रभावी नेता मान लिए गए. राजनीति में ‘मोदीत्व’ को अपरिहार्य मानते हुए संघ की ओर से पार्टी के जमेजमाए नेताओं, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज भी किनारे करते देर नहीं लगी. चालीस वर्षों तक संघ के प्रचारक रहे मोदी को अपना उम्मीदवार बनाते देर नहीं की. और मोदी जी ने भी अपनी इस तरह मार्किटिंग की कि पूरा का पूरा विपक्ष भौंचक्का रह गया. जाति और वर्ग के धु्रवीकरण के बीच में उलझी भारतीय राजनीति इस तरह के मुखौटे का होना, संघ की नजरों में समय की मांग थी.

मुखौटे की विशेषता होती है कि वह अवसर विशेष के लिए बनाया जाता है. काम निकलते ही वह बोझ लगने लगता है. तो जिन लोगों ने मोदी जी को अपना नेता माना है, और उन्हें लोकतंत्रात्मक शक्तियां प्रदान की हैं, उनकी संस्कृति ऐसी नहीं है कि एक शूद्र को सत्ता सौंपकर उसके अधीन काम कर सकें. वे मनु महाराज को अपना आराध्य मानने वाले और शंबूक की हत्या करनेवाले लोग हैं. मोदी जी को प्रधानमंत्री बनाने का एक ही उनका मकसद है, येनकेनप्रकारेण वर्चस्वकारी संस्कृति को आगे बढ़ाना. जिन लोगों की दूरदर्शन धारावाहिकों में रुचि है, वे आसानी परख सकते हैं. हर सीरियल में हनुमान चालीसा का पाठ हो तो सेंसर बोर्ड अपने आंख, नाक और कान सब बंद कर लेता है. पिछले दिनों एक अच्छी बात अवश्य हुई है. विदेशी पूंजी की तरफ से निराश होकर सरकार ने नव उद्यमियों के प्रोत्साहन हेतु ‘स्टार्टअप’ योजना लागू करना. यदि ढंग से, इस देश की जनशक्ति में विश्वास करते हुए इस योजना का कार्यान्वन किया जाए तो गिरती अर्थव्यवस्था के दौर में चमत्कारी सिद्ध हो सकती है. प्रधानमंत्री यदि कुछ दिनों के लिए विदेशयात्राओं का मोह छोड़कर इसी योजना को आगे बढ़ाने के लिए काम करें तो विकास को सही मायने में ‘प्रगति’ से जोड़ा जा सकता है. लेकिन इसके लिए उन्हें अपने उन नेताओं पर नकेल कसनी होगी जो सांप्रदायिकता की राजनीति करते हैं, जाति के नाम पर लोगों को भड़काते हैं और किसी न किसी बहाने देश को एक हजारबारह सौ वर्ष पीछे ढकेल देना चाहते हैं. वे ऐसा करेंगे या कर पाएंगे, इसकी संभावना बहुत कम है.

© ओमप्रकाश कश्यप

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Filed under विचारहीन राजनीति और परिवर्तन का स्वप्न

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