पुरस्कार वापसी विवाद : एक और गुगली

आलेख

 

तुम्हारा अध्ययन व्यर्थ होगा और विज्ञान बांझ, अगर यूं ही पढ़ते रहे….बिना समर्पित किए अपना ज्ञान, समूची मानवता कोब्रेख्त.

कुछ लेखक चर्चा में रहते हैं, लेकिन विवादों में नहीं पड़ते. नपातुला बोलते हैं. नजर सीधे लक्ष्य पर टिकाए रखते हैं. जिस समय बाकी लोग चर्चा और विवादों में ऊर्जा खपा रहे होते हैं, वे शांत मन से अपनी गोटियां सेट करने में लगे होते हैं. डॉ. रामदरश मिश्र विवादों से परे रहने वाले लेखक हैं. ऐसा कुछ साहित्यकार बंधु मानते हैं. कदाचित डॉ. मिश्र को भी इसका इलम है. वे गोटियां सेकने वाले लेखक भी हैं—ऐसा मैं भी नहीं मानता. मगर काव्यकृति ‘आग के आंसू’ के लिए ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ मिलने के अवसर पर ‘जनसत्ता’(19 दिसंबर, 2015) को दिए गए साक्षात्कार में जो बातें उन्होंने कही हैं, वे अनावश्यक हैं. कम से कम मैं तो उन्हें समीचीन नहीं मानता. न ही वे किसी परिपक्व लेखक की अभिव्यक्ति प्रतीत होती हैं. अखबार में प्रकाशित साक्षात्कारआधारित रिपोर्ट में उन्होंने साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाने वाले साहित्यकारों को आड़े हाथ लिया है. हो सकता है पत्रकार ने जानबूझकर ये बातें उनसे उगलवाई हों. या रिपोर्ट लिखते समय बाकी बातों को एकदम छोड़ दिया गया हो. आम पाठक और साहित्य प्रेमी की रुचि तो पुरस्कृत कृति की कविताओं में झलकती, जिनके बारे में एक भी शब्द उस रिपोर्ट में नहीं है. पूरा साक्षात्कार पुरस्कार वापसी के मसले पर केंद्रित है. रिपोर्ट को मुख्य पृष्ठ के शीर्ष पर जिस प्रमुखता के साथ छापा गया है, उससे यह संभावना भी बलवती होती है कि अखबार ठंडे पड़ चुके विवाद में फिर जान फूंकने की कोशिश कर रहा है. यूं भी इन दिनों ‘जनसत्ता’ में सब उल्टापुल्टा हो रहा है. यह अखबार अपने जनवादी अतीत से जल्दी से जल्दी पीछा छुड़ाने पर उतारू है. अगर ऐसा न होता तो बात ‘आग की हंसी’ की कविताओं पर की जाती. कवि की उन अनुभूतियों पर की जाती जिनसे वे कविताएं उपजी हैं. तब वह अवसर के अनुकूल कही जाती. इससे पहले ‘जनसत्ता’ न तो सनसनी की चाहत रखने वाला अखबार रहा है, ना ही उसने इस तरह की इच्छा रखने वाले मीडिया का साथ दिया है. मुझे याद है अयोध्या में मस्जिद का ढांचा गिराए जाने के अवसर पर हिंदी समाचारपत्रों के सांप्रदायिक चरित्र पर तथा कुछ साल पहले ‘पेड न्यूज’ के मसले पर इस अखबार ने एक आंदोलनसा निर्मित किया था. वह आज भी अपने मूल्यों से प्रतिबद्ध पत्रकारिता का बेहतरीन उदाहरण है.

यह स्वाभाविक है कि जब दूसरे लेखक अकादेमी का पुरस्कार लौटा रहे हों, पुरस्कार ग्रहण करने का इच्छुक लेखक उनके समर्थन में टिप्पणी कर, उसका औचित्य सिद्ध करे. लेकिन इस अवसर पर दिए गए साक्षात्कार में जो भाषा डॉ. मिश्र ने इस्तेमाल की है, वह आपत्तिजनक है. विशेषकर तब जब विवाद पर धूल जमने लगी है. यह संभव है अकादेमी या ‘पुरस्कार वापसी’ का विरोध कर रहे लेखकों की ओर से ‘डेमेज कंट्रोल’ की कोशिश हो. या फिर पुरस्कार के बदले डॉ. मिश्र की ओर से अकादेमी के लिए आभारज्ञापन—जो भी हो, सामान्य नैतिकता इसका समर्थन नहीं करती. डॉ. मिश्र को यदि लग रहा था कि पुरस्कार वापसी अकादेमी के अध्यक्ष को बदनाम करने का षड्यंत्र है, तो यह उन्हें पहले कहना चाहिए था. दूसरे लोग जब यही बात दोहरा रहे थे, तब उनका समर्थन करना था. क्यों वे आग के ठंडी होने का इंतजार करते रहे. अब जब मामला करीबकरीब शांत पड़ चुका है तो वे एक झटके में न केवल पुरस्कार वापसी के लिए जुटे लेखकों से, बल्कि ‘मार्क्सवादियों’ से भी निपट लेना चाहते हैं.

यदि वे कहते हैं कि ‘पुरस्कार वापसी विरोध जताने का सही तरीका नहीं’, तो यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है. उन्हें समाज में बढ़ती असहिष्णुता नहीं दिखती तो यह भी उनकी अपनी नजर है. आखिर हम सभी चीजों को अपनेअपने नजरिये से ही तो देखते हैं. लेकिन यह बात उस दौर में कही गई होती जब मुद्दा गरमाया हुआ था, तब ज्यादा प्रासंगिक होती. अब उनका यह कथन, ‘पुरस्कार वापसी कर यह मान लेना कि लड़ाई लड़ ली, महज एक भ्रम है’—अपने आप में ही अंतर्विरोधी है. जब देश में असहिष्णुता जैसी कोई समस्या ही नहीं है तो लड़ाई लड़ना पागलपन ही कहा जाएगा. वे कहते हैं—‘वे लोग भ्रमित हैं, जो पुरस्कार वापस कर मान रहे हैं कि उन्होंने असहिष्णुता के खिलाफ (लड़ाई)लड़ ली. विरोध और लड़ाई लड़ने के इससे कहीं बेहतर मार्ग हैं. जिनकी उपेक्षा की गई.’ इस टिप्पणी से कहीं नहीं लगता कि उन्हें विरोध प्रदर्शन से शिकायत है. वे केवल विरोध के माध्यम से असहमत हैं. यानी लेखकों को पुरस्कार वापसी से अलग कोई और मार्ग चुनना चाहिए था. यह आवेश में कही गई बात नहीं है. कोई संदेह न रहे, इसलिए वे दुबारा स्पष्ट कर देते हैं—‘मैं इनको बताना चाहता हूं कि पुरस्कार वापस करके अपनी पीठ खुद थपथपाकर खुद को हीरो समझने वाले असल लड़ाई से पीछे हट रहे हैं. उन्हें चाहिए था कि लड़ाई के और कारगर माध्यम चुनते.’ ये बातें न तो नई हैं, न अनसुनी. जिन दिनों विवाद शिखर पर था, पुरस्कार वापसी का विरोधी हर प्रतिक्रियावादी लेखक यही तर्क देता था. ‘फेसबुक’ पर ये शब्द हजारों बार दोहराए जा चुके हैं. लेकिन उन वाक्बहादुरों में से कोई भी वैकल्पिक माध्यम या बेहतर मार्ग का उल्लेख तक नहीं करता. यदि उन्हें पुरस्कार वापसी के अलावा दूसरे विकल्प दिए जाते तो वे बुरी तरह विभाजित मिलते. डॉ. मिश्र उस समय चुप्पी साधे रहे. यदि विरोध आवश्यक, मगर माध्यम अनुचित था, तो उन्हें अपनी ‘कलम’ के साथ, उचित माध्यम से स्वयं आगे आना चाहिए था. या दूसरों को वैसी सलाह देनी थी. फिर क्यों पहल करने से बचे रहे? दूसरों को विरोध के उचित माध्यमों के बारे में बताया क्यों नहीं? साहित्यकार केवल लगातार लिखने से नहीं बड़ा नहीं होता. जनसरोकारों से जुड़ाव उन्हें बड़ा बनाता है. सरोकार ही हैं जो ‘प्रेमचंद’ और ‘गुलशन नंदा’ में अंतर करने की प्रेरणा जगाते हैं. क्या वे अकादेमी पुरस्कार घोषित होने से पहले मुंह खोलने से बचना चाहते थे? सोचते थे कि यदि इस समय पुरस्कार वापसी का विरोध किया और पुरस्कार बाद में घोषित हुआ तो वह अकादेमी की ओर से ‘आभार ज्ञापन’ जैसा ही कुछ समझा जाएगा? अब यदि वे यह कहते हैं कि पुरस्कार के बारे में पहले कहां पता था? सारी प्रक्रिया गोपनीय रहती है तो उन्हें बहुत भोला माना जाएगा. मनोहर श्याम जोशी को अकादमी सम्मान देना था, देना ही था सो तब दिया गया था, जब वे चलाचली की कगार पर थे. जल्दबाजी में ऐसी पुस्तक पर थमा दिया गया, जो उनके दूसरे उपन्यासों के मुकाबले दूसरे या तीसरे स्तर की है. अकादमी पुरस्कार के लिए ‘आधा गांव’ के बरक्स ‘रागदरबारी’ को वरीयता दिए जाने की घटना पर तो पहले ही काफी लिखा जा चुका है. लेकिन इन घटनाओं के बावजूद किसी लेखक की क्षमताओं पर संदेह करना, उसे कमजोर लेखक बताना अनुचित ही माना जाएगा. इसलिए कि वे सब एक पूर्वनिर्धारित प्रक्रिया के तहत दिए गए हैं. पुरस्कारों की घोषणा के तत्काल बाद डॉ. मिश्र द्वारा अकादेमी के समर्थन में तर्क देना, अकादेमी तथा उसके अध्यक्ष के प्रति ‘आभार प्रदर्शन’ जैसा ही कुछ माना जाएगा. यह अकादेमी के अध्यक्ष के दामन पर लगे दागों को साफ करने जैसा भी है, जिनके बारे में विज्ञप्ति निकालकर वह अपनी चूक को स्वयं सार्वजनिक कर चुकी है.

रिपोर्ट में उन्हें ‘हमेशा किसी वाद या खेमे से दूर रहने वाले’ कहा गया है. मगर साक्षात्कार में जो बातें आती हैं, वे उन्हें विवादों से बचने वाला सावधान लेखक भले ही ठहराती हों, ‘वाद’ से दूर रहने वाला लेखक सिद्ध नहीं करतीं. वे कहते हैं—‘दरअसल अर्से से अकादेमी पर एक गिरोह का कब्जा था. लेकिन सत्ता परिवर्तन के साथ ही वह गिरोह छटपटाने लगा. अकादेमी जो महज कुछ लोगों का अड्डा थी वहां सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व मिलने लगा.’ ऐसी टिप्पणी कोई ‘फेसबुकिया’ करे तो बात समझ में आती है. क्योंकि बहुत गंभीर और तथ्यात्मक होने के लिए वहां कम गुंजाइश होती है. यह टिप्पणी पढ़कर यदि आप डॉ. मिश्र को ‘वाद’ और ‘विवाद’ से दूर रहने वाला लेखक मान लें तो आपकी समझ पर बलिहारी. उस विचारधारा से जिससे किसी कारणवश आप असहमत हैं, उसके समर्थक रचनाधर्मियों को ‘गिरोह’ कहना क्या विनम्र टिप्पणी माना जाएगा! यदि मिश्र जी यह मान रहे हैं कि अकादेमी कुछ खास विचारधारा के ‘गिरोह’ का अड्डा बन चुकी है, तो एक जागरूक लेखक की भांति आंदोलन, नहीं तो कलम से ही प्रतिकार करते. तब आगे आते जब उसकी जरूरत थी. केंद्र में अधिकांश समय कांग्रेस की सरकार रही है. स्वाभाविक रूप से अकादेमी द्वारा अधिकांश पुरस्कार उन्हीं लेखक मंडलों की मदद से घोषित किए गए, जो कांग्रेस के कार्यकाल में गठित किए गए थे. अकादेमी और पूर्व लेखकमंडलों पर डॉ. मिश्र ने इससे पहले कोई टिप्पणी की हो—मुझे याद नहीं आता. यानी डॉ. मिश्र ने तब विरोध नहीं किया, जब वह ‘गिरोह’ अकादेमी पर काबिज था. यदि तब नहीं किया तो अब ऐसा क्यों? ‘का वर्षा जब कृषि सुखानी….क्या वे केंद्र में सत्तापरिवर्तन का इंतजार कर रहे थे. जहां तक मुझे याद है उन्हें हिंदी अकादमी, दिल्ली का सबसे बड़ा ‘शलाका सम्मान’ तब मिला था, जब शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं और कांग्रेस केंद्र में. यदि उनकी कांग्रेस या उसके द्वारा गठित लेखक मंडलों से ऐसी ही वैचारिक असहमति थी, तो ‘शलाका सम्मान’ स्वीकार ही क्यों किया था?

उनका कहना है—‘मार्क्सवादी विचारधारा के लेखकों की रचनाओं में मार्क्सवादी चेतना की झलक मिलती है. जबकि दक्षिणपंथियों का रचनाकर्म रूढि़वादिता की ओर इंगित करता दिखाई देता है.’ काश! उनकी बात सच होती. यहां उनकी सारी बौद्धिक तटस्थता धरी की धरी रह जाती है. उनसे पूछा जाना चाहिए कि देश में मार्क्सवाद को आए तो सौसवा सौ वर्ष हुए हैं. उससे पहले तो यहां केवल दक्षिणपंथ राज करता था. जिसके चलते एक जाति या वर्ग के लोग ही पढ़ पाते थे. पिछले चारपांच हजार वर्ष का साथ वाङ्मय उनका और उनके समर्थकों का कियाधरा है. फिर इस देश में रूढि़वाद शताब्दियों तक कुंडली मारे क्यों बैठा रहा! यह जानते हुए भी कि वैचारिक रूढि़वाद, सामाजिक रूढि़वाद से कहीं अधिक खतरनाक होता है. तत्कालीन बुद्धिजीवियों ने उससे उबरने और दूसरों को उबारने का काम क्यों नहीं किया? हाल ही में आई फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ के बहाने एक पेशवा किलेदार की कथित वीरता पर खूब चर्चा हो रही है. लेकिन उन पेशवाओं के राज में जनसाधारण, विशेषकर दलितों की जो दुर्दशा थी, उसपर किस ‘पंडित’ ने अपनी कलम चलाई थी. यदि पेशवा किलेदार अपनी प्रजा से प्यार करते, सबके साथ बराबरी का वर्ताब करते, दलितों को सामाजिक उत्पीड़न से बाहर लाने का प्रयास करते, क्या तब भी यह देश गुलाम होता? ये बातें बहसतलब हैं और बड़े शोध की मांग करती हैं. डॉ. मिश्र से अपेक्षा थी कि इन विषयों के बारे हम सबकी अज्ञानता की धूल को हटाते. भारतीय समाज और संस्कृति की विसंगतियों और विरोधाभासों पर यदि कोई विदेशी लेखक कुछ लिख दे जो उसे ये ‘पंडितजन’ खलनायक मान लेते हैं. जेम्स मिल जैसे विचारक के लेखन को भी ‘रिपोर्ट आधारित लेखन’ कहकर खारिज करने की कोशिश की जाती है. क्यों? आखिर मिल की पुस्तक ‘ब्रिटिश कालीन भारत का इतिहास’ और कैथरीन मेयो की ‘मदर इंडिया’ में कुछ तो सचाई है.

जेम्स मिल और कैथरीन मेयो तो विदेशी लेखक थे. मान लेते हैं कि उन्हें भारत और भारतीयता की पुख्ता जानकारी नहीं थी. या उन्होंने जो लिखा वह पूर्वाग्रहों से भरा पड़ा है. डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी तो अपनी हिंदी के ही थे. उनकी विद्वता पर तो किसी को संदेह नहीं है. क्या उनका लिखा भी डॉ. मिश्र की नजर से नहीं गुजरा? अपने एक लेख में वे लिखते हैं—‘दसवीं शताब्दी के बाद, बल्कि आठवीं शताब्दी के बाद ही, हमारे देश में टीका युग चलने लगा. यानी कोई मौलिक चिंतन, नए सिरे से सोचना संभव नहीं, बल्कि पुराने ग्रंथों में जो कुछ कहा गया है, उसका हम भाष्य कर सकते हैं, टीका कर सकते हैं, टीका की टीका, उसकी भी टीका, सातसात पुश्तों तक टीकाएं चलती रहीं. टीकाओं का युग आ गया. ज्ञान की धारा अवरुद्ध हो गई. यह टीका वाली प्रवृत्ति, गुरु नानक का जिस समय आविर्भाव हुआ था, उस समय अपनी चरम अवस्था में पर आई हुई थी. नतीजा यह हुआ कि हिंदू शास्त्रों के विपुल भंडार में से केवल तीन ग्रंथ चुन लिए गए. इनको प्रस्थानत्रयी कहते हैं. तीन ग्रंथ या ग्रंथ समूह. इनमें से एक है उपनिषद अथवा दस या ग्यारह उपनिषद, जिनपर आदि शंकराचार्य ने अपना भाष्य लिखा थाय अद्वैत मत के प्रतिपादन के लिए. दूसरी श्रीमद् भगवद्गीता, और तीसरा वेदांत सूत्र, बादरायाण का लिखा हुआ वेदांत सूत्र.’ (डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, गुरुनानक: व्यक्तित्व और संदेश, ‘भारतीय जनजीवन: चिंतन के दर्पण में’, प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, पृष्ठ 11-12, अक्टूबर 1993). इस लेख में डॉ. द्विवेदी आदि शंकराचार्य पर भी टिप्पणी कर रहे हैं, जिन्हें भारतीयता की खोज और पुनस्र्थापना का पर्याय माना जाता है. यदि विचार करके देखें तो उन्होंने केवल भाष्यों की रचना की है. इसलिए उनका लेखन भी मौलिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता. बावजूद इसके पिछले हजारबारह सौ वर्षों में पंडितजन उन्हीं को सबकुछ माने रहे हैं. शायद इसलिए कि ऐसा करना उन्हें विश्वगुरु होने की अनुभूति देता है. हालांकि बाहर भारत की प्रतिष्ठा गौतम बुद्ध की जन्मस्थली होने के कारण है. डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी जब तक रहे, तब तक गनीमत थी. भारतीयता की खोज के लिए कम से कम उपनिषद और वेदांत की चर्चा तो हो जाती थी. सत्ता परिवर्तन के बाद तो सारा बौद्धिक ज्ञान गाय, गोबर और रामचरितमानस तक सिमट चुका है. जो लोग कभी समुद्र पार जाने को पाप बताया करते थे, वे वेदों में वायुयान की तलाश कर रहे हैं. बौद्धिक विमर्श अशोक स्तंभ को ‘भीम की गदा’ मानने जैसी त्रासदी से गुजरता आया है.

अपने कथन में डॉ. मिश्र पूरे वामपंथ को ‘मार्क्सवाद में सिमेट देते हैं. जबकि ‘मार्क्सवाद’ जैसे संबोधन पर स्वयं मार्क्स को ही आपत्ति थी. क्या इतने अनुभवसिद्ध लेखक को यह बताने की आवश्यकता है कि वामपंथ कोरा ‘मार्क्सवाद’ नहीं है? वह मार्क्स से पहले भी था, मार्क्स के समय में भी और उसके बाद भी. उपनिषद काल में वह ‘बौद्ध’ और ‘आजीवक’ दर्शन के रूप में मौजूद था. ‘चार्वाक’ और ‘लोकायत’ मतावलंबी भी भौतिकवाद के बहाने ‘वामपंथ’ पर विचार कर रहे थे. मध्यकाल में संत कवियों का कहा भी वामपंथ की श्रेणी में ही आता है. गांधी ने अंत्योदय का नारा दिया और हमेशा हाशिये पर मौजूद लोगों की राजनीति की. इस दृष्टि से वे हमारे समय सबसे मुखर वामपंथी हैं. ‘मार्क्सवाद’, यदि वैसा कुछ है तो वह वामपंथ रूपी बूढ़े बरगद की वह मजबूत शाखा है, जो स्वयं अपनी जमीन पाकर विशाल बरगद का रूप ले चुकी है. क्या यह माना जाए कि डॉ. मिश्र जैसा सुविज्ञ, वयोवृद्ध साहित्यकार वामपंथ के इन अपररूपों से अनजान हैं? क्या उन्हें बताने की आवश्यकता है कि ‘साहित्य’ परंपरा का पिष्ठपे्रष्ण न होकर, उसका नवसंस्कार होता है? भर्तृहरि बहुत पहले साहित्य को परिभाषित कर गए हैं—‘रसेन सहितं साहित्य.’ यानी ‘जिसमें रागात्मकता के साथसाथ है, जिसमें सभी(या अधिकतम) की हितसिद्धि की कामना हो, वह साहित्य है. परंपरागत लेखन अपनी कृतियों में रागात्मकता पर तो पूरा ध्यान देता था. उसके लिए ‘वेद’ भी गढ़े जा चुके हैं. किंतु साहित्य की दूसरी कसौटी ‘सर्वहित’ की ओर उसका ध्यान नहीं जाता. ‘कला कला के लिए है’ कहकर वह बादशाहों और उनके मनसबदारों की जीहुजूरी में लगा रहा. जबकि भारत के पंडितजन दुनिया में विस्मृति के सबसे बड़े शिकार लोगों में से हैं. उन्हें बस ‘शास्त्र’ शब्द तो याद रहा. शास्त्र क्या हैं, उनका मूल स्वरूप क्या है? वर्तमान में उनकी प्रासंगिकता क्या है या कैसे उनका युगारूप नवोन्मेषण किया जाए, यह उन्हें नहीं रहा. उसके बारे में दुनिया को बताने के लिए यूरोपीय लोगों को यहां आना पड़ा. एक बात और—भारत में सभी लेखक मार्क्सवादी नहीं हैं. लेकिन अधिकांश लेखक वामपंथी हैं, क्योंकि साहित्यत्व का जो संस्कार या उसकी अपेक्षाएं होती हैं वह संवेदनशील रचनाकार को स्वतः वामपंथ की ओर ले जाती हैं. जिसके सरोकार मानवीय हैं, जो अपने साहित्य में सभी के हित की कामना करता है, जिसके चिंताएं समाज के विपन्न और कमजोर वर्गों से जुड़ी हैं, जो मानवमात्र के लिए अधिकतम स्वतंत्रता की कामना करता है; और समानता आधारित समाज का सपना जिसकी आंखों में है, वह वामपंथी ही है. इसके अलावा सब चारणपंथी हैं.

डॉ. मिश्र मानते हैं कि लेखक को जो भी कहना है कलम से कहना चाहिए. राजनीति उस विचारधारा का ‘एक्शन’ है. काश! लिखा हुआ शब्द उतना ही कारगर सिद्ध हो, जितना कोई लेखक अपनी रचना से उम्मीद रखता है. लेकिन हालात थोड़े अलग हैं. हम सब लोग जो शब्दों से किसी न किसी प्रकार का नाता रखते हैं, जिन्हें शब्दशक्ति पर भरोसा है—प्रायः शब्दों की निरर्थकता का रोना रोते रहते हैं. ऐसे कई लेखक हैं जो आजीवन शब्दों से बदलाव की अलख जगाते रहे. जब उन्हें लगा कि उनके शब्द वृथा जा रहे हैं तो अवसाद का शिकार हो गए. बहुतों ने तो लेखन से किनारा ही कर लिया, क्यों? शायद इसलिए कि हम कथनी और करनी के अंतर का शिकार होते हैं. हमारे लेखन की बड़ीबड़ी बातें सिर्फ दूसरों के लिए होती हैं. हमें जानना चाहिए कि ‘सामाजिक परिवर्तन की एक राह राजनीति से भी जाती है.’ कोई व्यक्ति अपने विचारों के समर्थन में लेखन करे, और राजनीति से एकदम कटा रहे, क्या यह स्वाभाविक माना जाएगा! ‘कथनी और करनी’ के अंतर के लिए क्या हम उसे दोषी नहीं मानेंगे! उस समय ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ की उक्ति क्या हमपर चरितार्थ नहीं होगी?

ठीक है, लेखक की अपनी सीमाएं होती हैं. अपने कृतियों में जिस तरह के समाज की वह कामना करता है, और उसके लिए जिस प्रकार की जनशक्ति उसे चाहिए, उसकी भरपाई वह अकेले नहीं करता. लेकिन इसका यह आशय नहीं कि जो उसकी सीमाओं में है, उससे भी मुंह मोड़कर बैठा रहे; या उसके सदाशयतापूर्ण प्रतिरोध को भी ‘राजनीति’ कहकर खारिज करने की कोशिश की जाए. अपने विचारों के साथ यदि लेखक ही प्रतिबद्ध न होगा तो उसकी अपेक्षा पाठकों से कैसे अपेक्षा कर सकता है! जबकि विचार और कर्म की युति सदैव कारगर सिद्ध हुई है. महाभारत में कृष्ण केवल गीतोपदेश नहीं देते. जब, जहां, जितनी जरूरत पड़ती है, उतनी राजनीति भी करते हैं. ज्यादा दूर न जाना चाहें तो गांधी का उदाहरण हमारे सामने है. वे खुद को साहित्यकार नहीं मानते थे. हम भी नहीं मानते. लेकिन उनका विपुल लेखन साहित्यिक सरोकारों से परे न था. अपने शब्दों के भरोसे जो कामयाबी गांधी को मिली, उतनी कामयाबी उनके समकालीन नेताओं में से शायद ही कोई पा सका. क्यों? इसलिए कि वे जो कहते थे, वे करते थे. उनके विचार ‘एक्शन’ से परे न थे. विनोबा का पूरा जीवन गांधी की छाया और गांधीवाद की व्याख्या में गुजरा. मगर देश के सामने उनका विराट उनका व्यक्तित्व तब उभरकर सामने आया जब वे भूदान के बहाने ‘एक्शन’ में आए. और पूरी दुनिया में जाने गए. फिर यदि अपने विचारों पर ‘एक्शन’ करना राजनीति है तो उसमें बुरा क्या है? क्या राजनीति बुरी चीज है? ठीक है, आज राजनीति बहुत बदनाम है. पर कोई सहृदय लेखक राजनीति के अच्छेपन की आस में कोई कदम उठाना चाहे तो उसके कदम को ‘राजनीति’ कहकर खारिज करने का हमें भला क्या अधिकार है.

ठीक है, आधुनिक राजनीति में अनेक कमियां हैं. अधिकांश को यह दलदल नजर आती है. अच्छे लोग इसमें आने से बचते हैं. इसके बावजूद राजनीति धर्म से लाख दर्जा उत्तम और लोकोपकारी है. आज यदि समाज के वंचितदमित करोड़ों लोग बदलाव का सपना देख रहे हैं, उसके लिए एकजुट हो रहे हैं तो वह केवल राजनीति के कारण संभव हो पाया. आप कहेंगे कि राजनीति तो पहले भी थी. इसका उदाहरण देते हुए बड़ी आसानी से आप रामायण और महाभारत की याद दिलाने लगेंगे. लेकिन सब जानते हैं कि रामायण और महाभारत में राजनीति धर्म की चेरी थी. धर्म की कमजोरी है कि वह समाज को बड़ी आसानी से भीड़ में बदल देता है. उस समय मनुष्य को सिवाय अपने स्वार्थ, क्षुद्र स्वार्थों के कुछ याद नहीं रहता. जबकि कथनीकरनी का कोई भेद न होना ही राजनीति का आदर्श है. बहरहाल, डॉ. मिश्र की इस बात में दम है कि इस देश में असहिष्णुता की आंधी नहीं चल रही. खासकर सांप्रदायिक असहिष्णुता की. उनका कहना कि ‘पहले भी देश में धार्मिक त्योहारों के समय तनाव हो जाता था.’ बिलकुल सही बात है. इसके लिए हमें भारतीय मीडिया की आलोचना करनी चाहिए जो सामान्य घटनाओं को भी बढ़ाचढ़ाकर पेश करता है. मगर बात यहीं तक सीमित नहीं है. हम जानते हैं कि सांप्रदायिकता धर्म का विकार है. अपने अनुयायियों की संख्या के बल पर जब कोई संगठित धर्म खुद को शक्तिशाली समझने लगता है तो समाज में सांप्रदायिकता पनपने लगती है. चूंकि धर्म कहीं न कहीं शक्ति से जुड़ा है. किसी धर्मानुयायी में शक्ति भले न हो, मगर हर धर्मानुयायी अपने आराध्य को दूसरे धर्मानुयायियों के आराध्यों से अधिक शक्तिशाली मानता है. इसलिए जो लोग धार्मिक होते हैं, वे कम या ज्यादा सांप्रदायिक भी होते हैं. यह बात भी अपनी जगह ठीक है कि इससे पहले भी धार्मिक पर्वों और उत्सवों में सांप्रदायिक तनाव पैदा हो जाता था. मगर उस समय केंद्र या राज्य का कोई जनप्रतिनिधि यह कहने नहीं आता था कि यदि फलां धर्म वालों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए. न ही कोई ‘आर्यपुत्र’ धर्म के आधार पर नसबंदी को जायज ठहराता था. न ही लाखों लोग केवल इस कारण किसी अभिनेता के चेहरे पर कालिख पोतने पर उतारू हो जाते थे, क्योंकि उसने वह कहा जो हम सुनने को तैयार नहीं हैं.

डॉ. मिश्र को पुरस्कार वापसी की घटना पर क्षोभ है. अब जब मुंह खोला है तो कहीअनकही सब कह जाते हैं. परोक्ष रूप में वे उन अनेक फेसबुकियाओं का समर्थन कर रहे हैं, जो लिखते थे कि जिन्होंने पुरस्कार लौटाया, वे उसके अधिकारी ही नहीं थे. बस दौड़भाग करके किसी तरह से पुरस्कार हथिया लिया था. रिपोर्ट में उनके नाम से छपा है—‘दौड़भाग के सदके हो सकता है कि अतीत में काफी कमजोर लोगों को भी यह पुरस्कार मिल गया हो.’ आशय स्पष्ट है. अतीत में भले ही कुछ कमजोर लेखकों को अकादेमी सम्मान मिला हो, अब उनके रूप में एक ‘मजबूत’ लेखक सामने है. मिश्र जी वयोवृद्ध हैं. वरिष्ठतम भी हैं. उनका लेखकीय सामर्थ्य संदेह से परे है. इसलिए उनके प्रति स्वाभाविक सम्मान के साथ और यह मानते हुए कि लेखकों में कोई छोटाबड़ा नहीं होता, प्रत्येक लेखक अपने आप में विशिष्ट होता है—मैं यह कहना चाहूंगा कि अकादेमी पुरस्कार लौटाने वाले हिंदी लेखकों उदयप्रकाश, कृष्णा सोबती, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी में से कौन है जिसकी लेखन क्षमताओं पर संदेह किया जा सकता है! ये सब उतने पायेदार लेखक तो हैं ही जितने स्वयं मिश्र जी हैं. कुल 35 लेखकों ने अकादेमी पुरस्कार लौटाए हैं. उनमें दूसरी भाषाओं के लेखक भी हैं. जिनके बारे में टिप्पणी करने से मैं बचना चाहूंगा. लेकिन अपनी भाषा में कुछ तो ऐसा सार्थक किया होगा, जिसका नोटिस लेना अकादेमी ने आवश्यक समझा था.

यह बात पहले भी उठी थी कि पुरस्कार वापस कर रहे साहित्यकार, अकादेमी के वर्तमान अध्यक्ष की कुर्सी अस्थिर करना चाहते हैं. डॉ. मिश्र भी उसे आगे बढ़ाते हैं—‘जिन लोगों ने अकादेमी पर एकाधिकार बनाया था, वही एकजुट हो गए और तिवारी जी पर हमला बोल दिया….इस गिरोह को लग रहा होगा कि नए अध्यक्ष के आने से उनके हित आहत हुए हैं.’ तो क्या तिवारी जी इतने कमजोर हैं, कि अपना पक्ष भी नहीं रख सकते. क्यों उन्हें कुर्सी का मोह सताता रहता है. क्या तिवारी सचमुच इतने कमजोर है? ऐसा तो तभी हो सकता है जब अध्यक्ष पद उन्हें खैरात में मिला हो. या फिर जोड़जुगाड़ से प्राप्त किया हो. लेकिन यदि वह उनकी अपनी उपलब्धि है. यदि उन्हें ऐसा लगता है कि सरकार या किसी और संस्था ने अकादमी अध्यक्ष का पद उन्हें खैरात में नहीं दिया है, खुलकर सामने आना चाहिए. यह विडंबना ही है कि जब देखभर के लेखक किसी मुद्दे को लेकर उद्वेलित हो रहे थे तब अकादेमी अध्यक्ष को अपनी कुर्सी की चिंता सता रही थी. और एक लेखक को जब अपनी पुरस्कृत कृति के बारे में चर्चा करनी चाहिए, वह दबी राख को कुरेदने में लगा हुआ है. होचीमिन्ह की एक कविता याद आती है—

प्राचीन कवि सौंदर्य के गीत गाना पसंद करते थे

वर्फ और फूलों के, चंद्रमा और हवा के, कुहरे के

पहाड़ों के और नदियों के

आज की मांग है कि हम लोहे और इस्पात को

कविता के असबाब में शमिल करें

और कवि यह समझदारी भी हासिल करे कि एक

जवाबी कार्रवाही की अगुआई कैसे की जाए

(प्रसंगवश: वामपंथ हालांकि मार्क्सवाद, साम्यवाद या समाजवाद का पर्याय नहीं है. पहली बार इस शब्द को कौन चलन में लाया यह भी मैं नहीं जानता. बावजूद इसके मैं उस व्यक्ति के मौलिक सोच के आगे नतशिर हूं, जिसने सत्ताअभिमुखी और सत्तावंचित लोगों के लिए ‘दक्षिणपंथ’ और ‘वामपंथ’ की शब्दयुति की खोज की. मनुष्य का दाहिना हाथ अधिक सक्रिय होता है. माना जाता है कि सारी पहल वही करता है. वह वामहस्त की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होता है, ऐसा भी लोग मानते हैं. वास्तव में ऐसा भले न हो, फिर भी पूजाविधानों, कर्मकांडों और महत्त्वपूर्ण कार्यों में वरीयता दाहिने हाथ को ही मिलती है. बाएं हाथ से भोजन करना ठीक नहीं माना जाता. यदि कोई अबोध बालक ऐसा करने लगे तो हम फौरन टोक देते हैं. कह सकते हैं कि कहीं न कहीं हम सब शक्ति के पुजारी हैं. हमें ऐसा करने की ही शिक्षा दी जाती है. तदनुसार वामपक्षी वे लोग हुए जो शक्तिवंचित हैं; या बराबर योगदान होने के बावजूद उन्हें शक्तिवंचित मान लिया जाता है. स्त्री को पुरुष से कमजोर माना जाता है, इसलिए उसे पुरुष के वामांग बिठाया जाता है. अब स्त्री चाहे जितने दावे करे कि वह पुरुष से किसी मायने में कम नहीं है, धर्म और संस्कृति में उसकी नियति केवल वामांगी बनना है. इस आधार पर वामपंथी वे लोग हुए जो समाज के दबेकुचले लोगों का पक्ष लेते हैं और समानता की बात करते हैं. साहित्य दमित वर्गों से सहानुभूति रखता है. वंचित वर्गों का पक्ष लेता है, उनके लिए समानता का नारा बुलंद करता है. इसलिए वामपंथी होना उसकी नियति है. ऐसा होते हुए भी कुछ लोग ‘वामपंथ’ को एक गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं, क्या ऐसे लोगों को साहित्यकार माना जा सकता है. कम से कम मैं तो नहीं मानता.)

 ओमप्रकाश कश्यप

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