आदर्श राज्य की कसौटी और मृत्युदंड

  • हालात चाहे जो भी हों, मृत्युदंड की बढ़ती संख्या सरकार की सुस्ती और कमजोरी को दर्शाती है. दुनिया में ऐसा कोई मनुष्य नहीं है, जिसमें कुछ अच्छाई न हो. इसलिए जब तक किसी अपराधी को ऐसे स्थान पर रखना संभव है जहां वह समाज को कोई नुकसान न पहुंचा सके, तब तक मृत्युदंड सुनाने से बचना चाहिए.—रूसो.

  • अनेक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें मनुष्यता के हित में जीवित रहना चाहिए था. अनेक ऐसे व्यक्ति हैं जो जीवित होकर भी मृत्यु की कामना करते हैं. क्या तुम उन्हें उनका वांछित दे सकते हो? यदि नहीं तो न्याय के नाम पर मौत बांटने की जल्दबाजी मत दिखाओ.—जे. आर. आर. टोलीकन.

  • ईश्वर की निगाह में हत्या केवल हत्या है. न्यायिक हत्या जैसी कोई अवधारणा नहीं है. यह केवल कानून की निगाह में न्यायसंगत है.—डेविड जे. मार्टिंज.

  • राज्य परमात्मा नहीं है. उसे ऐसी चीज को लेने का कोई अधिकार नहीं है, जिसे आवश्यकता पड़ने पर लौटा न सके.—अंतोन चेखव.

  • मृत्युदंड खूब सोचीसमझी हत्या है.—अल्बर्ट केमस.

  • किसी के भी साथ, बुराई के बदले में बुरा मत करो.—बाइबिल

धम्मपद(10/1) की व्यवस्था है—सब्बे तसंति दंडस्स सब्बे भायंति मच्चुनो….सब्बे तसंति दंडस्स सब्बेसं जीवितं पियं. अत्तानं उपमं कृत्वा न हनेय्य, न घातये.’—‘सभी दंड से डरते हैं, सभी को मृत्यु से भय लगता है. जीवन सभी को प्रिय है—अत प्रत्येक को अपने समान समझकर किसी की हत्या न करें, न किसी को दूसरे की हत्या के लिए उकसाएं.’ यह सामान्य मनोविज्ञान पर केंद्रित सत्य है. जितना यह सत्य है, उतना ही व्यावहारिक भी है. प्रत्येक समाज अपेक्षा करता है कि उसकी सदस्य इकाइयां मिलजुल कर रहें. आवश्यकता पड़ने पर एकदूसरे की मदद करें. एकदूसरे के अधिकार का सम्मान करें. लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता. लोग अज्ञानतावश, अपने स्वार्थ की खातिर, दूसरों के उकसावे में अथवा उत्तेजनावश—राज्य अथवा समाज के कानूनों का उल्लंघन कर बैठते हैं. अपराध राज्य, समाज या व्यक्ति के विरुद्ध किया जाता है. रूप चाहे जो हो, प्रत्येक अपराध दूसरों के जीवन में अवांछित हस्तक्षेप होता है. दंड उसका सामान्य प्रतिदेय है. इसलिए वह राज्य को, जो नागरिक जीवन में शांतिसुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है—बलप्रयोग का अवसर देता है. जनता द्वारा सौंपे गए अधिकारों के आधार पर राज्य अपराध की समीक्षा कर, कानून के प्रावधानों के अनुसार उपयुक्त दंड का निर्धारण करता है. राज्य या समाज के विरुद्ध अपराध के मामले में समाज और राज्य दोनों को यह अधिकार होता है कि वे अपराध की कोटि के अनुसार दंड तय कर सकें. आधुनिक राज्यों में एक सीमा से ऊपर समाज के अधिकारों को प्रतिबंधित कर दिया जाता है. मगर ‘व्यक्ति के विरुद्ध अपराध’ के मामले में पीडि़त को स्वयं न्याय करने का अधिकार नहीं होता. यहां तक कि अपराधी भी प्रायश्चितस्वरूप अपने लिए दंड खुद निर्धारित करना चाहे, तो भी विधिसंहिता उसे अमान्य करार देती है. न्याय के लिए उसे न्यायालय की शरण में जाना ही पड़ता है. दंडनिर्धारण में राज्य की भूमिका सर्वोपरि और समाज के निष्पक्ष अभिकर्ता की होती है. केवल अपराधी को दंड देना उसका मकसद नहीं होता. दंड प्रणाली का अंतिम ध्येय होता है—समाज को अपराधमुक्त कर, सुखशांतिमय बनाना. अपराध समाज की नकारात्मक प्रवृति है. उनके पीछे व्यक्ति या व्यक्तिसमूहों का हाथ हो सकता है, मगर उनकी आपराधिक मनोवृत्ति के निर्माण में कुछ न कुछ भूमिका उसके परिवेश की भी होती है. अतएव श्रेष्ठ राज्य दंड निर्धारण की प्रक्रिया के दौरान शक्ति प्रदर्शन में ऊर्जा खपाने से बचता है, बचना चाहिए. इस ध्येय में कितना सफल हो जाता है, यह प्रत्येक प्रकरण में विचारणीय रह जाता है.

अपराधी को दंडित करने के पीछे राज्य की दुहरी मंशा होती है. पहली, अपराधी समझ ले कि वह अपने किए के परिणाम से मुक्त नहीं है. दूसरी यह कि बाकी लोगों को उससे सबक मिले. वे लोभलालच, उत्तेजना, अज्ञानता अथवा दूसरों के बहकावे में आकर कानून भंग करने की कोशिश कभी न करें. इनमें पहले को प्रतिकारात्मक न्याय और दूसरे को निवारणरात्मक न्याय कहा जाता है. प्रतिकारात्मक न्याय एक तरह से अपराधी को राज्य और समाज की ओर से प्रत्युत्तर होता है. ‘शठे शाठयं समाचरेत’ की शैली में क्रिया की प्रतिक्रिया. उसमें दंड निर्धारण की प्रक्रिया कार्यकारण सिद्धांत पर टिकी होती है. जनसाधारण की भाषा में इसे ‘जैसा बोओगे—वैसा काटोगे’, ‘जैसी करनी—वैसी भरनी’ आदि भी कहा जाता है. प्रतिकारात्मक न्याय की सैद्धांतिकी कहती है—जिसने अपराध किया है, वह दंड का अधिकारी है. आदमी जैसा बोता है, वैसा ही काटता है. अतः अपराधी को उसके अपराध का दंड मिलना ही चाहिए. किंतु केवल उतना दंड मिलना चाहिए, जितना उसने अपराध किया है. भिन्न अपराधियों को समान अपराध के लिए समान दंड मिलना चाहिए. साथ ही केवल और केवल अपराधी को दंड मिलना चाहिए. ऐसा न होने पर लोगों का न्यायव्यवस्था से विश्वास उठने लगता है. उससे अपराधी के समाज की मुख्यधारा में लौटने के अवसर कम हो जाते हैं.

कल्याण राज्य में राज्य और नागरिक परस्पर संविदा के आधार पर बंधे होते हैं. उसके अनुसार राज्य लोगों के जानमाल की रक्षा का दायित्व उठाता है. तो नागरिकों से भी यह अपेक्षा करता है कि वे इस कर्तव्य में उसके साथ पूरी तरह सहयोग करें. जैसे राज्य अपने नागरिकों से अलग नहीं होता, वैसे ही बिना राज्य के नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा भी संकट में पड़ जाती है. इसलिए राज्य के कर्तव्यों के साथ सहयोग करते हुए उसके साथ एकजुटता दिखाना, प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है. यह भी कि नागरिक कर्तव्यों से इतर नागरिकअधिकार शून्य होते हैं. अतः जब कोई व्यक्ति नागरिक कर्तव्यों का उल्लंघन करता है, तो उसके नागरिक अधिकार भी उसी अनुपात में सीमित होने लगते हैं. रूसो के अनुसार जब कोई व्यक्ति चोरी या राहजनी जैसा अपराध करता है तो वह अपने संपत्ति अधिकार स्वतः गंवा देता है. इसी तरह दूसरे की हत्या करने वाला अपराधी अपनी प्राणरक्षा का अधिकार खो देता है. निजता मनुष्य का संवैधानिक अधिकार है. कानून के उल्लंघन के साथ अपराधी से यह अधिकार भी छिन जाता है. इससे राज्य को उसके जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार स्वतः प्राप्त हो जाता है. आपराधिक मानसिकता वाले व्यक्ति से दूसरों को बचाने तथा समाज में शुचिता की स्थापना के लिए दंड आवश्यक हो जाता है. प्रकारांतर में निवारणात्मक न्याय भी ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ होता है. उसमें भी ‘आंख के बदले आंख’, ‘जैसे को तैसा’ वाली शैली में न्याय किया जाता है. मगर महत्त्व अपराधी को ताड़ने से ज्यादा दंड के लाक्षणिक परिणाम का होता है. उन स्थितियों के निवारण का होता है, जो अपराध की संभावनाओं को जन्म देती हैं. अपराध के कारण का निवारण ही न्याय है. उसमें राज्य यह मानकर चलता है कि सुधार के लिए दंड आवश्यक है. कानून के भय से अपराधी मनोवृत्ति वाले लोग अपकर्मों से दूर रहेंगे. फलस्वरूप समाज में शांतिव्यवस्था कायम होगी. उसके अनुसार हत्यारे को दिया गया मृत्युदंड निर्दोष लोगों की प्राणरक्षा करता है.

केविन कूपर कैलीफोर्निया का रहने वाला था. एक अपराध में उसे मृत्युदंड की सजा दी गई. दिन निर्धारित किया गया—10 फरवरी 2004. जेल में मृत्युदंड संबंधी सारी तैयारियां हो चुकी थीं. कूपर मान चुका था कि यह उसके जीवन का अंतिम दिन है और कुछ ही घंटों में उसका प्राणांत कर दिया जाएगा. लेकिन वधस्थल पर मृत्युदंड की कार्यवाही के दौरान, तय समय से बामुश्किल चार घंटे पहले कूपर को अचानक सूचना मिली कि उसकी सजा माफ कर दी गई है. एक साक्षात्कार के दौरान कूपर ने अपनी आपबीती इस प्रकार बयान की है—

‘‘उन्होंने सबसे पहला काम यह किया कि मेरी शरीर को दूसरे पिंजड़े में ढकेल दिया. इस प्रकार कि वे मुझपर निरंतर नजर रख सकें. पिंजड़ा बेहद गंदा और घिनौना था. जब से बना था, शायद ही किसी ने उसकी सफाई की थी. वर्षों पुरानी धूल और गंदगी उसमें जमा थी. मैंने उसमें कई दिन उसको रगड़तेखुरचते हुए बिताए. जेल के कर्मचारी मुझे हर घंटे देखने के लिए आते. कदाचित उन्हें भय था कि मैं फांसी से पहले ही मरकर उन्हें धोखा न दे दूं. यह क्रम पूरे दो सप्ताह चला. इस बीच मेरा हालचाल लेने डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक, नर्स तथा जेल के अधिकारीगण लगातार आते रहे. वे मेरे कपड़ों की माप जानना चाहते थे….एक बार अचानक आधी रात को वे आए और फोटो खींचने के लिए ले गए….उसके बाद मुझे अस्पताल ले जाया गया, ताकि मृत्युदंड स्क्वाड मेरा साइज माप सके….मेरे सामने ही डॉक्टर मेरे मृत्युदंड पर चर्चा करते रहे…..उन्होंने पूछा कि मेरी नसें कहां हैं? उनका चित्र भी खींचा गया, मुझे बताए बिना ही. ऐसी ही कार्रवाही में कई सप्ताह गुजर गए.

मृत्युदंड का दिन जैसेजैसे करीब आ रहा था, इस तरह की गतिविधियां बढ़ती ही जा रही थीं. फिर मुझे वधस्थल के ऊपर स्थित कक्ष में ले जाया या. एक व्यक्ति घड़ीघड़ी मेरा मुआयना कर मेरी एकएक गतिविधि को नोट कर रहा था. उन्होंने मेरे हाथों में हथकड़ी डालकर साइड में कसकर बांध दिया. इस बीच पहरेदार लगातार मुझपर नजर रख रहे थे….मृत्युदंड के एक दिन पहले मेरा अंतिम रूप से चैकअप किया गया. 14 हथियारबंद सैनिक मुझे बधस्थल के बराबर वाले पिंजड़े में ले गए. वहां उन्होंने मेरी हथकडि़यां खोल दीं. नंगा करके मेरी तलाशी ली गई—‘हमने जो किया, क्या उससे तुम्हें कोई परेशानी हुई?’ तलाशी के दौरान उन्होंने बेहूदा सवाल किया था.

मैं नीलामी पटल पर बैठे दास की भांति अनुभव कर रहा था. उन्होंने मुझे जगहजगह से कोंचा, जानवर की तरह उंगलियां गाढ़गाढ़कर देह को जांचापरखा. मुझे गर्दन तानकर खड़ा होने को कहा गया, फिर झुकाकर देखा गया, मेरे अंडकोश को उठाया, परखा….मेरे पीछे मृत्युदंड के लिए आवश्यक सारा सामान खुला पड़ा था….सब कुछ बेहद अमानवीय और भद्दा था. मृत्युदंड में चार घंटे से कम ही बचे थे कि फोन की घंटी बजी. उच्चतम न्यायालय ने मेरी फांसी का तख्ता हटाने का निर्णय लिया था. मेरी देह में सांस वापस लौटने लगी. उस घटना के बाद मैं भयानक मानसिक यंत्रणा से गुजर रहा था. मुझे अकेला छोड़ दिया गया. कोई मदद नहीं, डॉक्टर नहीं, नर्स नहीं. जितने समय में मृत्युदंड की कार्रवाही के दौरान यंत्रणा से गुजरा, मेरी नजर हमेशा घड़ी पर टिकी रहती थी. कैसे उस यंत्रणा से बाहर आऊंकुछ घंटे नहीं, दिन नहीं….बल्कि महीनों तक.’— इस यातना पर कूपर की टिप्पणी थी, ‘मृत्युदंड देने से पहले ही वे हमारी मानसिक हत्या कर देते हैं.’

अपराध की सजा भुगतने के साथ ही व्यक्ति के नागरिक अधिकार उसे वापस मिल जाते हैं. मान लिया जाता है कि व्यक्ति अपराधकर्म के भार से मुक्त हो चुका है. उसे समाज में बाकी नागरिकों की तरह सम्मानपूर्ण जीने का अधिकार है. अतः उसे यह अवसर मिलना भी चाहिए. लेकिन समाज आमतौर पर भावनाओं के आधार पर फैसले लेता है और अपनी स्मृतियों को ताजा रखता है. इसलिए कानून से बरी हुए लोगों को वह आसानी से बरी नहीं करता. समाज के व्यवहार से आहत नागरिक अपराध की दुनिया में वापस लौट सकते हैं. इस समस्या के निदान हेतु न्याय की तीसरी सैद्धांतिकी सामने आती है. उसमें अपराधी को दंड देने के अलावा उसके पुनर्वास का भी ध्यान रखा जाता है. इसके लिए काराग्रहों में अपराधियों के विशेष शिक्षणप्रशिक्षण की व्यवस्था की जाती है. कल्याण राज्य में इसे न्याय प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. किंतु हत्या, बलात्कार और राजद्रोह जैसे गंभीर मामलों में राज्य यह मान लेता है कि अपराधी जघन्यता की समस्त सीमाओं को पार कर चुका है. उसके व्यक्तित्व में सुधार की सभी संभावनाएं समाप्त हो चुकी हैं. उस अवस्था में राज्य अपराधी को मृत्युदंड जैसा क्रूरतम दंड देता है. इस तरह मृत्युदंड राज्य के क्षोभ, गुस्से और हताशा की स्थिति को दर्शाता है.

सवाल है कि जीवंत राज्य को जो पारदर्शी होने का दावा करता है, कल्याणराज्य होने का दम भरता है, उसे गुस्सा, हताशा और क्षोभ जैसे नकारात्मक लक्षण क्या शोभा देते हैं? क्या मृत्यु का भय, फांसी का भय, मनुष्य को अपराध से सचमुच दूर रख पाता है? समाज में ‘शुभता’ की स्थापना के लिए राज्य की ‘कांटे से कांटा निकालने की युक्ति’ क्या सचमुच कारगर सिद्ध होती है? आंकड़ों पर गौर किया जाए तो इसके परिणाम न केवल नकारात्मक हैं, बल्कि एकदम विपरीत दिशा की ओर ले जाते हैं. उनसे पता चलता है कि क्रूरता, चाहे व्यक्ति की हो अथवा राज्य की, वह राज्य और समाज दोनों को क्रूरतम स्थितियों की ओर ले जाती है. प्रतिहिंसा हिंसा को वैध ठहराती है. राज्य की क्रूरता उसकी असंवेदनशीलता को दर्शाती है. प्रकारांतर में वह समाज में भी असंवेदनशीलता पैदा करने लगती है. जबकि राज्य की उदारता समाज को निर्मैल्य कर शुभता का संचार करती है. उदाहरण के लिए भारत में बलात्कार के अपराधी धनंजय चटर्जी को 14 अगस्त 2004 को फांसी दी गई थी. उसके बाद 2011 तक किसी भी अपराधी को फांसी नहीं दी गई. ‘राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो’ की रिपोर्ट के हवाले से ‘एशियन सेंटर फाॅर ह्यूमेन राइट्स’ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि 2001 में देश में कुल 36,202 हत्याओं के मामले दर्ज किए गए थे. जबकि 2011 में यह आंकड़ा गिरकर 34,305 तक सिमट गया. जबकि इस अवधि में देश की कुल जनसंख्या 1.028 अरब से बढ़कर 1.21 अरब तक पहुंच गई. दूसरे शब्दों में फांसीमुक्त अवधि के दौरान हत्या के मामलों में, 18 प्रतिशत जनसंख्या वृद्धि के बावजूद, पांच प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गई.

स्पष्ट है कि राज्य की क्रूरता, सामाजिक क्रूरता और असहिष्णुता को कम करने के बजाय और बढ़ाती है. लोग यदि यह महसूस करें कि राज्य कठोर संस्था है; तो वे यह भी मानने लगते हैं कि विशेष परिस्थितियों में कठोरता एवं अनुदारता भी अच्छे गुण हैं. यदि गुस्से या आक्रोश की स्थिति बन जाए तो में वे ‘जैसे को तैसा’, ‘खून का बदला खून’ की तर्ज पर खुद न्याय करने लग जाते हैं. भूल जाते कि राज्य की कठोरता विशिष्ट परिस्थितियों के लिए है. मामला चाहे जितना गंभीर हो किसी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं कि वह स्वयं न्याय करने लग जाए. इसलिए यदि कोई कहता है कि ‘बुरे’ को हटाने का एकमात्र उपाय उसकी मृत्यु है और सजा के रूप में मृत्युदंड बना रहना चाहिए तो यही बात हत्यारे के लिए भी लागू होती है, क्योंकि हत्या के समय वह सिर्फ अपने प्रतिपक्षी की बुराई के बारे में सोच रहा होता है. उस अवस्था में हत्या उसे एकमात्र विकल्प दिखाई पड़ती है.

कुछ विद्वान मृत्युदंड को बर्बर न्याय का प्रतीक मानते हैं. वह है भी. न केवल बर्बर बल्कि निरर्थक भी. ‘बी’ की हत्या के दंडस्वरूप राज्य द्वारा ‘ए’ को मृत्युदंड देने से ‘बी’ को जीवन वापस नहीं मिल जाता. बल्कि समाज को दुहरीतिहरी हत्या को झेलना पड़ता है. पहली वह जिसे ‘ए’ व्यक्तिगत स्तर पर, जानबूझकर या किसी के उकसावे अनायास करता है. दूसरी ‘बी’ की हत्या जिसे राज्य बहुत ठंडे दिमाग से, सोचीसमझी गई नीति के तहत सांस्थानिक रूप से करता है. राज्य की हत्या न्यायसम्मत होती है, इस कारण वह हत्या के अपराध से बरी होता है—‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति.’ की तर्ज पर उसे समाज की ओर से इसकी अनुमति होती है. लेकिन मृत्युदंड यदि राज्य के कोप की चरमपरिणति है तो वह हत्यारे के कोप की चरमपरिणति भी हो सकता है. इस आधार पर राज्य उसे रोकने का नैतिक आधार खो देता है. नीति का तकाजा है कि राज्य को व्यक्ति की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान, उदार, सहिष्णु और संवदेनशील होना चाहिए. गुस्से पर नियंत्रण रखना अपने आप में सद्गुण है—अतः राज्य के कोप का परिणाम, विशेषकर अपने नागरिकों के संदर्भ में, उसकी चरम परिणति यानी मृत्युदंड से सदैव नीचे रहना चाहिए. तभी वह नैतिक रूप से अपने नागरिकों को उदारता का संदेश दे सकता है.

पुराने जमाने में राजामहाराजा राज्य की सुरक्षा के लिए सीमा पर जाकर खुद दुश्मन से लोहा लेते थे. इसलिए राज्य को उनकी अर्जित संपदा मान लिया जाता था. इस अधिकारिता के दबाव में प्रजा राजा के तानाशाही पूर्ण आचरण को भी सह लेती थी. अब वह बात नहीं है. आधुनिक राज्य जनता की अपनी अधिरचना है. नागरिक अपने खूनपसीने की कमाई से राज्य का खर्च वहन करते हैं. उसकी सुरक्षा के लिए दुश्मनदेशों से लोहा लेते हैं. इसलिए राज्य से अपनी अपेक्षाओं को वे न्यायसंगत मानते हैं. अपेक्षाओं की उपेक्षा का एहसास उनके मन में राज्य के प्रति आक्रोश को जन्म देता है. आक्रोश के एक सीमा से पार जाते ही असंतुष्ट समूह विद्रोह पर उतर आते हैं. ऐसे अवसरों पर राज्य की असंवेदनशीलता नागरिकों को असहिष्णु बनाती है. इसके प्रमाण दुनियाभर के सभी देशों में हैं. अमेरिका में फांसी की सजा को नरहत्या और आतंकवाद के मामलों तक सीमित कर दिया गया है. एफबीआई की क्राइम रिपोर्ट के अनुसार 2010 में अमेरिकन संघ के जिन राज्यों में मृत्युदंड को निषिद्ध कर दिया गया था, वहां एक लाख नागरिकों के पीछे 4.1 हत्याएं दर्ज की गई थीं. जबकि उन राज्यों में जहां मृत्युदंड प्रभाव में था, प्रति एक लाख नागरिकों के पीछे 5 हत्याएं होती थीं. रिपोर्ट बताती है कि 1990 से 2010 के दौरान अमेरिका के मृत्युदंड समर्थक और मृत्युदंड को निषिद्ध घोषित कर चुके राज्यों के बीच हत्या के मामलों में अंतर 4 प्रतिशत से बढ़कर 25 प्रतिशत तक हो गया था. स्पष्ट है कि मृत्युदंड के मामलों में निवारणात्मक न्याय की सैद्धांतिकी भी नाकाम सिद्ध हुई है. इस तथ्य को स्वीकार चुके देश मृत्युदंड से धीरेधीरे पलायन कर रहे हैं. एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार 2014 में 98 देश ऐसे थे जिनमें मृत्युदंड की सजा को पूरी तरह समाप्त कर दिया है. जबकि कुल 140 देश ऐसे हैं जहां मृत्युदंड या तो पूरी तरह बाहर है, अथवा उसपर व्यावहारिक रूप से अमल नहीं किया जा रहा है. हालांकि इस बीच मृत्युदंड के मामलों में तेजी आई है. इसी रिपोर्ट के अनुसार 2014 में दुनियाभर में लगभग 607 अपराधियों को मृत्युदंड दिया गया, जो 2013 के मुकाबले 22 प्रतिशत कम है. दूसरी ओर 2014 में 2466 अपराधियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई, जो 2013 के सापेक्ष 28 प्रतिशत अधिक है.

साफ है कि एक ओर जहां संख्यात्मक आधार पर मृत्युदंड बढ़ रहे हैं, वहीं सजा पर अमल के मामलों में तेजी से कमी आ रही है. यह न्यायालयों के असमंजस को दर्शाता है. समाज में बढ़ रहा आक्रोश, आंतरिक तनाव, जनाकांक्षाओं का दबाव आदि सरकार के सामने शांति और व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती पेश करते हैं. अपने ही अंतर्विरोधी में घिरी सरकारें जब टालमटोल करती हैं तो बात घूमफिरकर अदालतों पर आ जाती है. हर अपराध के बाद लोगों की उम्मीदें न्यायालय पर केंद्रित होकर रह जाती हैं. मृत्युदंड के विरोध में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ता दबाव भी फांसी की सजा पर अमल को टालने का कारण है. धनंजय चटर्जी के बाद, राज्य के विरुद्ध आतंकवाद के मामलों को छोड़कर बाकी अपराधों में फांसी की सजा को अघोषित रूप से टाला जाता रहा है. परिणामस्वरूप भारत समेत पूरी दुनिया में मृत्युदंड प्राप्त अपराधियों की संख्या बढ़ती जा रही है. ‘राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो’ की रिपोर्ट के अनुसार 2001-2011 के दशक में भारत में कुल 1455 व्यक्तियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई, जबकि इसी अवधि में 4321 अपराधियों के मृत्युदंड को आजीवन कारावास की सजा में बदल दिया गया. बहरहाल, उदार राज्य की दावेदारी के बावजूद भारतीय अदालतें प्रतिवर्ष 132.27 व्यक्ति यानी हर तीसरे दिन एक व्यक्ति को मृत्युदंड की सजा सुनाती रही हैं, जो कि एक विचारणीय प्रश्न है.

दुनियाभर में बढ़ती अशांति और हलचल के बावजूद मृत्युदंड के मामलों में गिरावट की सीधी वजह यही है कि सरकारें मान चुकी हैं कि अपराधियों को मृत्युदंड देने भर से समाज में शांति और स्थिरता की स्थापना असंभव है. कदाचित वे जान गए है कि समाज में हत्या और बलात्कार के मामलों का कारण समाज का चारित्रिक पतन नहीं है. अपराध इसलिए बढ़ रहे हैं कि क्योंकि सामाजिक स्तर पर समस्याएं भी बढ़ रही हैं तथा राज्य अपने कर्तव्य की पूर्ति में नाकाम सिद्ध हुए हैं. लोग यह जान जानने लगे हैं कि राज्य उनका अभिभावक नहीं है. बल्कि उनकी बनाई गई संस्था है, इसलिए वे अपने अधिकारों की मांग के लिए, न्याय के लिए—खुलकर सामने आते हैं. बाकी लोगों के समानांतर उनकी मांग गलत हो सकती है. रास्ता भी गलत हो सकता है. मगर परिस्थितियां चाहे वह राज्य की हताशा या असफलता से जन्मी हों अथवा धार्मिक, राजनीतिक स्वार्थी तत्वों की साजिश से, वे वास्तविक होती हैं. राज्य को उनके समाधान के तत्काल गंभीर प्रयास करने चाहिए. ऐसे मामलों में मृत्युदंड जैसी सजाएं कई बार आग में घी डालने का काम करती हैं. राज्य जिसे कानून कहता है, विरोधी उसे राज्य की ‘तानाशाही’ कहकर प्रचारित करते हैं. फांसी उनकी निगाह में धर्मयज्ञ की आहूति बन जाती है.

आंख के बदले आंख’ का दंडविधान बहुत पुराना है. मृत्युदंड की ऐतिहासिकता को दर्शाता हुआ सबसे पहला उल्लेख मिस्र में ईसा से 1600 वर्ष पहले का है. उस दौर में मनुष्य जंगलों में पशुओं के साथ रहता था; और जंगली न्याय की प्रवृत्ति को त्यागने की कशमकश में था. उस न्याय के अनुसार निर्बल को सबल के आगे झुकना ही पड़ता था. सहअस्तित्व और असहमतियों के साथ जीने की कला का तब तक विकास ही नहीं हुआ था. वहां विरोध से निपटने का एकमात्र रास्ता था—युद्ध. उसमें भी बात जान लेनेदेने तक चली जाती थी. दुनिया की जो आरंभिक दंड संहिताएं बनीं—उरुकजीन, उरनाम्मु, लिपितइस्तर, हम्मुरबी से लेकर सम्राट ड्रेसो के संविधान तक, सभी में मृत्यु दंड को सजा के रूप में सम्मिलित किया गया था. शुद्धतावादी ड्रेसो के संविधान में मानवीय चूकों के लिए कोई स्थान नहीं था. गलती चाहे जानबूझकर की जाए अथवा अनजाने, अपराध छोटा हो या बड़ा, मामूली चोरी हो या बदचलनी, उसमें सबके लिए मृत्युदंड का प्रावधान था. ड्रसो के अतिवाद का दुष्परिणाम यह हुआ कि निर्दोषों को भी सजा मिलने लगी. राज्य की ऐसी मनमानी लोगों को खलनी ही थी. धीरेधीरे जनता में विद्रोह पनपने लगा. आगे चलकर सोलोन ने ड्रेसो की भूल का समाधान किया. सोलोन के बाद यूनान में सुकरात, प्लेटो और अरस्तु जैसे महान विचारक जन्मे, मगर एक ने भी मृत्युदंड की सजा का विरोध नहीं किया. कांट, जा॓न स्टुअर्ट मिल, हा॓ब्स, बैंथम जैसे मानवतावादी विचारक भी ‘क्रूरतम अपराध के लिए क्रूरतम दंड’ के समर्थक रहे हैं. यह भी सच है कि इतिहास में मृत्युदंड के विरुद्ध पहली आवाज भी पश्चिम में एथेंस से उठी थी. वहां 427 ईस्वीपूर्व में थूसाइडिड ने मिटलेलियन विद्रोह के दौरान एक कानूनी दस्तावेज तैयार किया था. उस दस्तावेज में मृत्युदंड के औचित्य पर सवाल उठाए गए थे. उस प्रस्ताव को सभी ने सराहा. फलस्वरूप स्पार्टा के युद्धबंदियों के मृत्युदंड को टाल दिया गया था.

भारत में भी मृत्युदंड को धार्मिक ग्रंथों की मान्यता मिलती रही. धर्मशास्त्रें में चोरी, राहजनी, हत्या आदि के लिए मृत्युदंड की व्यवस्था थी. चाणक्य ने भी मृत्युदंड का समर्थन किया है. ‘प्राण के बदले प्राण’ की दंडनीति तो पुरानी है ही. देखा जाए तो वह दौर ही ऐसा था. सहअस्तित्व की संभावनाएं ही नहीं थीं. सत्ताएं झूठ के सहारे पलतीं. सम्राट स्वयं को या तो देवानाम् प्रिय बताते थे, या देवताओं के उत्तराधिकारी. बुद्धिजीवी इस झूठ को सच बनाते थे. वे खुद भी इस झूठ में रहते थे कि एकमात्र उन्हीं का विचार सर्वोत्तम है. ऐसे में विरोध का एकमात्र प्रतिदेय था—मृत्युदंड. यह कैसे और किस रूप में दिया जाए यह जरूर चयन का मसला था. शंकराचार्य से पराजित मीमांसक मंडन मिश्र को ‘मरना’ ही पड़ता है. बाद में उनका अवतार ‘सुरेश्वराचार्य’ वेदांती बनकर जीवित रहता है. मंडन मिश्र के गुरु कुमारिल भट्ट को इसलिए आत्महत्या करनी पड़ती है क्योंकि उन्होंने दुस्साहसी बनकर अपनी जिज्ञासा को शांत करना चाहा था. नीयत वही थी, जैसा उस समय की परंपरा थी—दूसरे को पराजित कर अपने संप्रदाय में सम्मिलित करने की. उन्होंने बौद्धों को उन्हीं के हथियार से पराजित करने की मंशा से बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया था. गलती यह की कि इसके लिए गुरु की पूर्वाज्ञा लेना भूल गए थे. इसलिए परंपरानुसार प्राणत्याग को स्वीकारना पड़ा. राजा जिसे चाहे उसे मृत्युदंड दे सकता था. इस तरह राजा के हर अपराध पर अपराध पर पर्दा डालने, मृत्यु को ‘प्रसाद’ बनाने का खेल भी उस युग में आरंभ हुआ. इसके लिए ‘मुक्ति’ का मिथक रचा गया. इस घालमेल से सबकुछ बदल गया. ‘हत्या’ को ‘प्रसाद’ कहा जाने लगा. अपराध ‘धर्मकार्य’ के रूप में पूजित होने लगा….वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति!

बहरहाल, धर्मशास्त्रों में परस्त्रीगमन, राहजनी, राजद्रोह आदि के लिए भी मृत्युदंड की सजा का प्रावधान है. हालांकि दंड निर्धारण से पहले अपराधी का वर्ग अवश्य देखा जाता था. राजा दंडाधिकारी भी होता था, ब्राह्मण उसका प्रमुख मार्गदर्शक. राजा को पृथ्वी पर ईश्वरीय प्रतिनिधि माना जाता था. इसलिए उसका निर्णय अंतिम और सर्वस्वीकार्य होता था; और कई बार तो उसे देवताओं का फैसला बताकर पेश किया जाता था. महाभारत में एक ओर जहां ‘न हि मानुषात श्रेष्ठतरं हि किंचितः’(मनुष्य के लिए मनुष्य को श्रेष्ठतम है) कहकर मनुष्यत्व का सम्मान किया गया, दूसरी ओर मृत्युदंड को धर्मकार्य की संज्ञा दी गई. महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध जैसे अहिंसा समर्थक विचारक भी मृत्युदंड के मामले में मौन बने रहे. बुद्ध ने अंगुलिमाल जैसे डाकू को संघ में शामिल कर, यह संकेत अवश्य दिया कि क्षमा सबसे कारगर हथियार है और समाज से बुराई को मिटाने का उपाय ‘बुरे’ को मिटा देना नहीं है, बल्कि उस मानसिकता को बदलना है जो बुरे कर्म की ओर प्रवृत्त करती है. मानसिकता बदल जाए तो डाकू रत्नाकर के आदि कवि वाल्मीकि बनते देर नहीं लगती.

अभी तक हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मृत्युदंड अमानवीय है. क्रूरता से क्रूरता को नहीं मिटाया जा सकता. लेकिन आधुनिक राज्य तो लोगों की सहमति से चलता है. समाज से अलग राज्य की कोई सत्ता नहीं है. राज्य को उसकी शक्तियां समाज की ओर से प्राप्त होती हैं. इसलिए कोई राज्य यदि मृत्युदंड को सजा के रूप में अपनाए हुए है तो यह तय है कि उस सजा को अमल में लाने के लिए आवश्यक शक्तियां और समर्थन उसे समाज की ओर से प्राप्त हैं. कोई समाज यदि शांति और अनुशासन के लिए मृत्युदंड को आवश्यक मानता है तो इसमें राज्य का क्या दोष! शरीर का कोई अंग यदि गल जाए तो हम, अनमने भाव से ही सही, उस अंग को आवश्यकतानुसार काटने तक की अनुमति दे देते हैं. बाकी शरीर को गलने से बचाने के लिए वैसा जरूरी होता है. एक अपराधी को फांसी यदि अनेक निरपराधों की जीवनरक्षा करती है तो उसे जनहित में स्वीकारना ही चाहिए. मृत्युदंड के समर्थक यह भी कहते हैं कि आतंकवादियों और बलात्कारियों को जेल में रखकर उन्हें खिलानापिलाना, उनकी सुरक्षा पर बेशुमार जननिधियां खर्च करना अनुचित है. हत्या करने के साथ ही हत्यारा अपने प्राणों पर अधिकार खो देता है. इसलिए ऐसे दुर्दांत अपराधी को तुरंत फांसी दे देनी चाहिए. फांसी के समर्थन में इस प्रकार के तर्क अकसर सुने जाते हैं. यदि धर्म बीच में आ जाए तो लोगों की घृणा और उत्तेजना आसमान छूने लगती हैं.

यह ठीक है कि राज्य समाज की अधिरचना है. लेकिन श्रेष्ठ राज्य माध्यम भी है, जो समाज की शुभता को अपने नागरिकों तथा बाकी राज्यों और समाजों के सामने लाता है. समाज की रचना होने के बावजूद राज्य उसकी इच्छाओं को ज्यों का त्यों नहीं स्वीकारता. वह उन्हें परंपरा, संस्कृति, कानून, नैतिकता, न्याय आदि के मापदंडों पर तौलता है. तदनंतर सिर्फ उन्हीं इच्छाओं को व्यवहार में लाता है, जो समाज के अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम कल्याणकारी सिद्ध हो सकें. दूसरे शब्दों में समाज की रचना होकर भी राज्य उसके तात्कालिक मार्गदर्शक का काम करता है. कल्याण योजनाओं को इस रूप में लागू करता है कि वे सभी की सामान्य पहुंच में हों. उनसे सभी का लाभ हो. अपने नागरिकों के बीच न्याय और कल्याण का समवितरण करते रहना राज्य का कर्तव्य है, उपकार नहीं. यह समाज द्वारा व्यक्त किए गए विश्वास का राज्य की ओर से कृतज्ञता ज्ञापन होता है. इसलिए यदि समाज इन कर्तव्यों की पूर्ति में असफल रहता है, यदि उसमें ढेर सारी विसंगतियां हैं, ऊंचनीच के अनगित टापू, भेदभाव, अंतर्विरोध, अविश्वास तथा उनसे जन्मा असंतोष है….सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्तर पर भारी असमानताएं हैं, जिनके चलते संपन्न और दबंग लोग न्यायप्रणाली की कमजोरियों को पहचानकर बरी छूट जाते हैं. यदि फांसी के सजायाफ्ता मुजरिमों में 93.5 प्रतिशत पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक, एकचौथाई निरक्षर और तीनचौथाई आर्थिक रूप से विपन्न हैं. उनमें से एकचौथाई यदि कहते हैं कि उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया, यहां तक कि उनके वकील को भी उनसे दूर रखा गया, यदि राज्य ऐसे आरोपों को सुनकर भी अनसुना किए रहता है तो यह न केवल उसकी असंवेदनशीलता का परिचायक है, बल्कि मनुष्यता की नजर में गंभीर अपराध भी है.

भारत जैसे देशों में जहां भारी असमानता है, समाज का एकतिहाई हिस्सा अनपढ़ है, और दोतिहाई हिस्सा सामान्यरूप से पढ़ालिखा, वहां मृत्युदंड को बनाए रखने का कोई कोई औचित्य समझ से परे है. वैसे भी हमारे धर्मग्रंथ बताते हैं कि सभी में एक आत्मा है. सभी एक परमात्मा का अंश हैं. महाभारत कहता है—‘न ही मानुषात श्रेष्ठतरं हि किंचितः’ मनुष्य के लिए मनुष्य से उपयोगी कुछ भी नहीं है. तो मृत्युदंड की सजा एक नैतिकता का सवाल भी है. यदि हम कोई राज्य यह कहता कि नागरिक जीवन में शुभता हो, सत्यनिष्ठा हो, लोग नैतिकता के उच्चतम मानदंडों के अनुसार जीवन जिएं तो उसे स्वयं भी नैतिकता के शिखरमापदंड अपनाने होंगे. बचपन में एक कहानी हम सबने पढ़ी थी. आज भी वह नैतिकता की मिसाल के रूप में दोहराई जाती है.

एक किसान अपने बेटे के हरदम गुड़ खाते रहने की आदत से बहुत दुखी था. आदत छुड़ाने के लिए किसान अपने बेटे को साधु के पास ले गया. साधु ने उसको 15 दिन बाद आने की सलाह दी. निश्चित अवधि के बाद किसान फिर साधु के दरबार में हाजिर हो गया. साधु ने किसान के बेटे को अपने पास बिठाकर समझाया—‘बेटा, जरूरत से ज्यादा गुड़ खाना नुकसानदेह है. उससे अनेक बीमारियां फैलती हैं.’ साधु की बातों में जाने क्या था कि उस दिन के बाद से किसान के बेटे ने गुड़ खाना छोड़ दिया. किसान खुश था. फिर भी एक बात उसको रहरह कर कोंच रही थी. एक दिन वह फिर साधु के दरबार में पहुंचा. साधु के पूछने पर उसने बेटे के बारे सहीसही बता दिया—

महाराज, आपकी कृपा से बेटे ने गुड़ खाना छोड़ दिया है. मैं बहुत खुश हूं. लेकिन मेरे दो सवाल हैं?’

पूछो?’

आपने मेरे बेटे से जो कहा, वह कोई नई बात नहीं थी. मैं बेटे को हमेशा यही समझाता था? लेकिन वह मेरी बात कभी नहीं मानता था. लेकिन आपकी बात उसने तुरंत मान ली.’

और दूसरा प्रश्न?’

मेरा दूसरा सवाल है कि जो बात आपने कही, उसको जब में पहली बार बेटे को लेकर आपसे मिला था, तभी कह सकते थे. पंद्रह दिन बाद दुबारा बुलाने की क्या जरूरत थी?’ तब गुरु ने समझाया—‘हमें दूसरों के साथ वही व्यवहार करना चाहिए, जैसा हम दूसरों से अपने प्रति चाहते हैं. व्यवहार में ईमानदारी बड़ी बात है. ईमानदारी न हो तो अच्छी से अच्छी बात भी प्रभावहीन बनकर रह जाती है. जब तुम पहली बार आए थे, मैं खुद बहुत ज्यादा गुड़ खाता था. तुम्हारे बेटे को समझाने का नैतिक अधिकार मुझे नहीं था. पंद्रह दिन गुड़ से दूर रहकर मैंने अनुभव किया कि गुड़ को छोड़ा जा सकता है. तभी मैंने तुम्हारे बेटे से गुड़ छोड़ने का आग्रह कर पाया.’

व्यवहार की ईमानदारी’ किसान को उस दिन सबक मिला. आचरण की शुद्धता जितनी नागरिकों के आवश्यक है, उतनी सरकार के लिए भी जरूरी है. आदर्श समाज में मृत्युदंड के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए. राज्य को ध्यान रखना चाहिए कि मनुष्य उसकी अर्जित संपत्ति नहीं है. कि उसका जैसा चाहे वैसा उपयोग कर ले. बकौल थामस पेन ‘मनुष्य समाज में इसलिए शामिल नहीं हुआ है कि उसकी स्थिति पहले की अपेक्षा और बुरी हो जाए; और न इसलिए कि उसके अधिकारों में पहले की अपेक्षा कटौती कर दी जाए. मनुष्य समाज में इसलिए सम्मिलित होता है कि सबके साथ रहते हुए उसके मौलिक अधिकारों को अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षा और सम्मान प्राप्त हो सके.’ वैसे भी कट्टरपंथ से कट्टरपंथ को मिटाया नहीं जा सकता. दूसरे यह कि व्यक्ति की कट्टरता से समाज की कट्टरता बहुत खतरनाक होती है. कट्टरपंथी व्यक्ति को सुधारा जा सकता है. न सुधरने पर समाज से अलग भी किया जा सकता है. लेकिन समाज कट्टरपंथी हो जाए तो सुधार की सारी संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं. उसका नुकसान उन नागरिकों को उठाना पड़ता है जो उदार हैं. कट्टरता जिनकी मूल प्रवृत्ति नहीं है. उल्लेखनीय है कि समाज का कट्टरपंथी हो जाने का आशय यह नहीं है कि उसके प्रत्येक नागरिक कट्टर हो जाते हैं. बस वे अपने विवेक से काम लेना छोड़ देते हैं. तब वे भेड़ की तरह हांके जाते हैं, शासकीय महत्त्वाकांक्षाओं के लिए गिनीपिग की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं. इसलिए हम मृत्युदंड का विरोध करते हैं, क्योंकि व्यक्ति की क्रूरता की अपेक्षा राज्य की क्रूरता के दुष्परिणाम कहीं अधिक घातक और दूरगामी होते हैं.

समाज में न्याय की सर्वत्र उपलब्धता का स्तर ही राज्य के श्रेष्ठत्व की कसौटी है. जिस समाज में समानता और स्वतंत्रता न हों, वहां न्याय की संभावनाएं भी दम तोड़ लेती हैं. ऐसे राज्य में न्याय केवल एक दिखावा माना जाएगा. मृत्युदंड निर्धारित करने का अधिकार तो उसे हरगिज नहीं है. इसके बावजूद यदि वह ऐसा करता है तो वह शिखर पर बैठे लोगों की मनमानी, कानून के नाम पर सोचसमझकर की गई संस्थानिक हत्या कही जाएगी. यदि राज्य की कमजोरियों को समझने के बावजूद उसके नागरिक मृत्युदंड का समर्थन करते हैं, किसी व्यक्ति को अपराधी को मृत्युदंड मिलने पर उनके दिलों में दुख और शोक की लहर नहीं उठती तो मान लेना चाहिए कि उस समाज के सभ्य होने में अभी देर है. फिर भी जो कहते हैं कि न्याय न्याय है, और खून का बदला खून से लिया जाना चाहिए तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि प्रतिवर्ष जो सैकड़ों किसान आत्महत्या कर लेते हैं, लाखों बच्चे कुपोषण का शिकार होकर मर जाते हैं—उनके लिए किसे सूली पर चढ़ाया जाए?

© ओमप्रकाश कश्यप

 

 

यदि वह ऐसा करता है तो वह शिखर पर बैठे लोगों की मनमानी, कानून के नाम पर सोचसमझकर की गई संस्थानिक हत्या कही जाएगी. यदि राज्य की कमजोरियों को समझने के बावजूद उसके नागरिक मृत्युदंड का समर्थन करते हैं, किसी व्यक्ति को अपराधी को मृत्युदंड मिलने पर उनके दिलों में दुख और शोक की लहर नहीं उठती तो मान लेना चाहिए कि उस समाज के सभ्य होने में अभी देर है. फिर भी जो कहते हैं कि न्याय न्याय है, और खून का बदला खून से लिया जाना चाहिए तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि प्रतिवर्ष जो सैकड़ों किसान आत्महत्या कर लेते हैं, लाखों बच्चे कुपोषण का शिकार होकर मर जाते हैं—उनके लिए किसे सूली पर चढ़ाया जाए?

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1 टिप्पणी

Filed under आदर्श राज्य की कसौटी और मृत्युदंड

One response to “आदर्श राज्य की कसौटी और मृत्युदंड

  1. काफ़ी विचारोत्तेजक लेख है वह भी ऐसे विषय पर जिस पर विश्व के चिंतकों पर विशद मनन किया है ..आदर्श समाज की परिकल्पना समग्र रूप में सच नहीं हो पाती ऐसा मेरा मानना है। मृत्यु दंड अपने आप में अमानवीय और त्याज्य है और किसी भी न्याय व्यवस्था में एक सामान्य नियम तो है ही कि “सौ अपराधी छूट जाएं पर किसी एक निर्दोष को दंडित नहीं किया जाना चाहिए। पर व्यवहार में ऐसा कम ही देखा गया है। युद्ध की तरह मृत्यु दंड भी एक आवाश्यक बुराई है। एक नृशंस हत्याऒं का अपराधी कारावास भोगने के बाद भी हत्या नहीं करेगा इसकी क्या गारंटी है, क्या उसे मुक्त करने का मतलब उसे हत्या का एक और अवसर देनए के बराबर नहीं होगा? यह मेरा मत नहीं, पर एक संभावना तो है ही। एक विकल्प यह हो सकता है कि म्रुत्यु दंड की जगह उसे अंतिम सांस तक काराग्रह में ही रहने का न्यायिक आदेश दिया जाए तो जीवन भी बचा रहेगा और अपराधी समाज को नुकसान पहुंचाए बिना अपनी स्वाभिक मृत्यु को प्राप्त हो सकेगा।…अलग-अलग देशों की दंड सहिताएं इस पर क्या कहती हैं इस पर तो अधिकारी विद्वान ही विचार विमर्श कर सकते है..पर आपका लेख इस अति-संवेदनशील विषय पर फ़िर एक बहस खड़ी करता है..इसके लिए आपका साधुवाद।

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