ज्ञान और ज्ञानार्जन की उलटबांसियां

ज्ञानार्जन की प्रक्रिया की समीक्षा के दौरान बड़े रोचक प्रसंग सामने आते हैं. उनसे पता चलता है कि ज्ञान के विकास की प्रक्रिया, मानवविकास की प्रक्रिया से भिन्न नहीं है. ज्ञानार्जन की प्रक्रिया के दौरान सर्वप्रथम ज्ञान का कोई अंकुर किसी मनस्वी के मस्तिष्क में उभरता है. वह उसे अपनी विचारदृष्टि, उपलब्ध ज्ञान और अनुभवों के आधार पर तौलता है. धीरेधीरे उसे रूपाकार के साथ सामने लाता है. नए विचार की मौलिकता कुछ लोगों को लुभाती है तो कुछ को चमत्कृत भी करती है. विद्वतजन ज्ञान की उपलब्ध कसौटियों के आधार पर उसका मूल्यांकन करते हैं. उसी के समानांतर क्रम में या थोड़ाबहुत आगेपीछे कोई दूसरा स्वतंत्र ज्ञानांकुर फूटता है. वह भी अपने जन्मदाता, समर्थकों, प्रशंसकों एवं आलोचकों के बीच धीरेधीरे विस्तार लेता है. ज्ञानयात्रा इसी क्रम में निरंतर प्रवाहमान रहती है.

इस बीच कोई सृजनशील मनस्वी धरती पर जन्म लेता है. वह ज्ञान की विभिन्न धाराओं, लोकानुभवों, संस्कारों का उनकी उपयोगिता एवं लोकमान्यता के आधार पर आकलन करता है. समन्वयात्मक रुख अपनाते हुए उनके अंतःसंबंधों को टटोलता है. तदनंतर उन्हें अपनी विचारदृष्टि के अनुसार समकालीन मानवीय संवेगों, आवेगों, कथारूपकों, सांस्कृतिक प्रतीकों तथा सामाजिक संदर्भों के साथ कलात्मक कलेवर में नियोजित करता है. जरूरत पड़ने पर उपलब्ध ज्ञानांकुरों के साथ उनकी तुलना भी करता है. दूसरे शब्दों में यह नन्हे ज्ञानांकुरों के विशाल बरगद में बदलने, महाकाव्यों में ढल जाने की प्रक्रिया है, जिसमें ज्ञानांकुरों की लोकप्रिय शाखाएं, खंडप्रखंड अपनी खूबियों और खामियों के साथ एकजुट होते जाते हैं. एक तरह से वे अपने समाज के अनुभवों का निचोड़ होते हैं. इस तरह जन्मा महाकाव्य अपनी संस्कृति और सभ्यता का विशिष्ट दस्तावेज होता है. उसमें ऐेतिहासिक चरित्र न हों तब भी उसे सभ्यता के विकास का प्रामाणिक दस्तावेज मान लिया जाता है. फलस्वरूप उसके पात्रों तथा कथारूपकों को, भले ही वे पूरी तरह काल्पनिक हों, जीवन में जगह मिलती है. कई बार तो वे जीतेजागते, चलतेफिरते पात्रों से भी अधिक प्रामाणिक, भरोसेमंद और प्रेरणादायी मान लिए जाते हैं. ज्ञान का यह रूप मिथक कहलाता है. सामाजिक जीवन में मिथक कदमकदम पर मनुष्य का मार्गदर्शन करते हैं. उन लोगों को जीवनदृष्टि देता है जो किन्हीं कारणों से ज्ञान की जीवंत शैलियों से संवाद करना छोड़ देते हैं. अथवा किसी अन्य कारण से ज्ञान के समकालीन उपकरणों के साथ उनका संपर्क कम हो जाता है. हम इसे ‘ज्ञान का समाजीकरण’ अथवा ‘समाज का प्रबोधीकरण’ कुछ भी कह सकते हैं. दुनियाभर के सभी महाकाव्य, वेदोपनिषद, पुराण, ग्रंथमहाग्रंथ इसी प्रक्रिया के अंतर्गत जन्मे हैं. समाज की आर्थिकराजनीतिक या भौगोलिक प्रस्थिति चाहे जैसी हो, ज्ञान के अर्जन की यही शैली है. यह सभी संस्कृतियों में कमोबेश एक समान होती है. समाज द्वारा अपनाए जा रहे उत्पादकता के साधनों से इसका सीधा संबंध होता है. इसका मतलब यह नहीं है कि त्वरित उत्पादकता वाले समाजों में ज्ञानार्जन की गति भी तीव्र होती है. हां, उससे ज्ञान की प्रवृत्ति पर अवश्य अंतर पड़ता है. तीव्र उत्पादकता वाले समाजों में ज्ञान की ऐसी शैलियां जन्म लेने लगती हैं, जो तेजी से परिवर्तनशील समाजों को संतुष्ट कर सकें.

दूसरे शब्दों में समाज की अन्य गतिविधियों की भांति ज्ञान की यात्रा तथा उसका मूल्यांकन दोनों समयसापेक्ष होते है. ज्ञान का स्तर मनुष्य तथा उसके समाज के विवेकीकरण की अवस्था को दर्शाता है. अपनी मौलिकता के संदर्भ में ज्ञान सदैव उर्ध्वगामी होता है. मगर मूल्यांकन के बाद भी यह विशेषता बनी रहे, आवश्यक नहीं है. आलोचना, समीक्षा, पुनःप्रस्तुतीकरण अथवा तुलनात्मक आधार पर कोई ज्ञान उर्ध्वगामी है या अधोगामीयह परिस्थितियों तथा आकलनकर्ता की दृष्टि से तय होता है. ज्ञान की कसौटियां परिवर्तनशील हो सकती हैं. वे व्यक्तिसापेक्ष, समूह सापेक्ष और समय सापेक्ष कुछ भी हो सकती हैं. ज्ञान की यात्रा अधोगामी है या पुरोगामी, इसका पता दूसरी ज्ञानशैलियों के सापेक्ष विचार की स्वीकार्यता से भी देखा जाता है. इससे निरपेक्ष, ज्ञान की नई कसौटियों के बनने और उनके आधार पर उपलब्ध ज्ञानविज्ञान की शाखाओं को परखने का सिलसिला भी लगातार चलता रहता है. कई बार चेतना के उभरते स्वर एक क्रांतिकारी विचार को जन्म देते हैं. वह विचार अपने समय और समाज को झकझोरने का काम करता है. फलस्वरूप पुराने विचार अप्रासंगिक हो जाते हैं. लंबे समय से चली आ रही सांस्कृतिक अवधारणाएं खंडखंड बिखरने लगती हैं. एक मोड़ ऐसा भी आता है जब वह उन लोगों को भी आकर्षित करने लगता है, जिनसे जूझते हुए या मुक्तिकामना के साथ उस विचार अथवा ज्ञानांकुर का जन्म हुआ था.

उदाहरण के लिए मध्य युग में उभरे भक्ति आंदोलन को ले सकते हैं. सर्वज्ञात तथ्य है कि भक्ति आंदोलन का उदय मध्यकालीन भारत में व्यक्ति पूजा, बलि, कर्मकांड, पोंगापंथी और सामाजिक असमानता के विरोध में हुआ था. वर्णक्रम में सबसे निचली जातियों ने, जिन्हें धर्मग्रंथों को पढ़ने की मनाही थी, धर्मालयों में जिनका प्रवेश वर्जित था—पहली बार वर्णाश्रम व्यवस्था को चुनौती दी थी. मूर्ति पूजकों, धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव करने वालों को ललकारा था—‘वे तुम्हें धर्मालयों में जाने से रोकते हैं. तुम उन पत्थर के ठिकानों की ओर झांकों भी मत’….‘पत्थर पूजने से यदि ईश्वर मिलता है तो मैं पहाड़ पूजने को तैयार हूं. दिनरात पत्थर के आगे सिर झुकाने से अच्छा है चक्की को पूज लिया जाए, जो पूरे परिवार के भरणपोषण में सहायक है.’….‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’….जैसे चकमक पत्थर में आग छिपी होती है, ऐसे ही तेरा परमात्मा तेरे भीतर है.’—जैसे शब्दों से संत कवियों ने निरर्थक कर्मकांडों और मूर्तिपूजा का बहिष्कार किया. उसका भरपूर असर पड़ा. संतकवि जनजन के दिलों पर राज करने लगे. निराकार भक्तिआंदोलन ने जातिव्यवस्था पर गहरी चोट की. लेकिन विचार के प्रतिविचार को जन्म लेते देर नहीं लगती. जब कोई नया विचार जन्म लेता है, मानस में प्रतिविचार का तुरंत एक और अंकुर फूट पड़ता है. वह पहले का पूरक अथवा विरोधीय या कभीकभी पूरक और विरोधी दोनों होता है.

भक्ति आंदोलन जैसेजैसे लोकप्रियता के शिखर को छू रहा था, उसकी ओर वे लोग भी आकर्षित हो रहे थे, जो वर्णव्यवस्था की शीर्षस्थ श्रेणियों से आए थे. वे वर्णव्यवस्था के पूरी तरह समर्थक न भी हों, मगर उसके संस्कारों से पूरी तरह अनुप्रेत थे. अपने साथ वे अपने वर्गीय संस्कार भी लाए थे. इससे भक्ति आंदोलन में वे सभी कुरीतियां शामिल होने लगीं, जिनकी राख पर उसकी आरंभिक इमारत का निर्माण हुआ था. उनके बीच का अंतर साफ पढ़ा जा सकता है. कबीर मूर्ति पूजा का खंडन करते हैं. जन्म के आधार पर जाति के भेदभाव पर प्रहार करते हैं. सांप्रदायिकता को ललकारते हैं. जबकि भक्ति परंपरा के अगले कवि वर्णाश्रम व्यवस्था को आदर्श बताते हैं. उसमें व्यक्ति की जाति और संस्कार कितने महत्त्वपूर्ण हैं, इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है. कबीर, रैदास और तुलसी तीनों का संबंध धर्म और संस्कृति के शहर बनारस से था. धर्म पर केंद्रीभूत संस्कृति आदमीआदमी में फर्क करती है. वह ‘जपमायाछापातिलक’ को ही सब कुछ माने रहती है. वर्णाश्रम व्यवस्था के सताए संत कवि कबीर, रैदास, दादू बारबार नकली संस्कृति का लबादा उतार फैंकने को कहते हैं. मगर वर्णाश्रम व्यवस्था के शीर्ष से आए भक्त तुलसी के लिए वह आदर्श व्यवस्था है. इसलिए वे शूद्र को ढोल, गंवार और पशु की श्रेणी में रखकर ताड़ते रहने पर जोर देते हैं. रामचरितमानस में ऐसी अनेक चौपाइयां हैं, जो श्रम पर जीवन जीने वाली जातियों का उपहास करती हैं. उस व्यक्ति द्वारा जो दूसरों के श्रम पर जीवन जीता हो, उसके द्वारा अपने परिश्रम पर जीने वाली जातियों का मखौल उड़ान न केवल तुलसी की संवेदनहीनता को दर्शाता है, बल्कि वह इस संस्कृति के संकट की ओर भी संकेत करता है. तुलसी के लिए ‘रामराज्य’ इसलिए आदर्श है, क्योंकि वहां सभी वर्णाश्रम के अनुसार अनुशासित हैं—‘बरनाश्रम निजनिज धरम निरत वेद पथ लोग.’ जबकि रैदास आचरण की शुद्धता को महत्त्व देते हैं. उनकी आदर्श राज्य की परिकल्पना ‘बेगमपुरा’ के सच होने में है. जहां सभी बराबर हैं. किसी को किसी भी प्रकार का क्लेश नहीं है.

स्पष्ट है कि ज्ञान की विभिन्न धाराओं का मूल्यांकन मनुष्य अपनी जरूरत के आधार पर करता है. कबीर के साहित्य और तुलसी के साहित्य में वही अंतर है जो एक ‘संत’ और ‘भक्त’ के बीच होता है. ‘संत’ सभी को समदृष्टि से देखता है. उनकी निगाह में न कोई छोटा होता है न बड़ा. संतई वह लोककल्याण के लिए धारण करता है, न कि स्वार्थ साधना के लिए—जिसे प्रायः ‘मुक्ति’ अथवा ‘आत्मकल्याण’ जैसे सम्मोहनकारी संबोधन दे दिए जाते हैं. भक्त कवि लोक को माया समझता है इसलिए दुनियावी सरोकारों से खुद को अलग रखता है. उसकी निगाह में ईश्वरीय न्याय ही सबकुछ होता है. संत कवियों की कविता सवाल उठाती है, भक्त कवियों की कविता परंपरा और आराध्य के महिमामंडन से परे नहीं झांक पाती. उसमें समता का भाव गायब रहता है. जीवन की सामान्य समस्याओं को भक्त कवि भवबाधा के रूप में देखता है, संत कवि के लिए वह मनुष्यता की चुनौती होती है. मनुष्यता के समर्थन में संत कवि बड़े से बड़े बादशाह को भी खरीखोटी सुना सकते है. दास तुलसी के लिए दैन्य से मुक्ति असंभव है. लोकतांत्रिक युग में भक्ति काव्य का कोई सामाजिक मूल्य नहीं है. इसलिए वर्णाश्रम समर्थक विद्वान संतकाव्य और भक्तिकाव्य का अंतर समझाने से बचते हैं. लोग सवाल न उठाएं इसलिए वे दोनों को परस्पर गड्डमड्ड कर देते हैं.

ज्ञान की खूबी है कि उसका अस्तित्व होता है, आकार नहीं होता. ज्ञान को रूपाकार देने का काम ज्ञानीजन करते आए हैं. चूंकि बड़े से बड़े ज्ञानीजन की सीमा होती है. व्यक्ति विराट ज्ञानसंपदा के किसी एक अंश को ही सहेज पाता है. उसी के आधार पर वह सामाजिक घटनाओं और व्यक्तित्वों का मूल्यांकन करता है. यह एक कौड़ी द्वारा धरती को मापने जैसा सत्साहस है. अपने विवेकीकरण की कसौटी को पुख्ता करने के लिए व्यक्ति अपने विषयक्षेत्र की सीमा में इस काम को खुशीखुशी करता है. सदेच्छाओं के बावजूद उसके काम में कहीं न कहीं त्रुटि रह ही जाती है. आम तौर पर युद्ध लोगों के जीवन को प्रभावित करने का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता है. लेकिन जो लोग ऐसा मानते हैं, वे गलत हैं. असली प्रभावक ज्ञान होता है. अतः ज्ञान को नियंत्रित करने, उसे अपने अनुकूल ढालने, उससे मनचाहा काम लेने की कोशिश आदिकाल से होती रही है. इतिहास पूर्वाग्रह रहित नहीं होता, इसलिए समाजचेता विद्वान ऐतिहासिक तथ्यों को अधूरा, एकांगी और मनगढ़ंत मानते हैं.

ऋग्वेद को प्रथम वेद माना गया है. मनुष्यता का पहला ज्ञानांकुर. यह मानते हुए कि शूद्र उसके अर्थ का अनर्थ कर सकता है, वेदपाठी ब्राह्मणों ने शूद्र और स्त्री के वेदाध्ययन पर पाबंदी लगाई थी. यदि कोई शूद्र वेद पढ़ ले तो उसके कान में पिघला सीसा डालने जैसे दंड का प्रावधान था. सामवेद की रचना इसलिए की गई कि वैदिक ऋचाओं के सटीक गायन का प्रशिक्षण देकर उनके पाठ की शुद्धता को कायम रख सकें. मूल्य की दृष्टि से वेदानुयायियों के लिए वेद उसी सीमा तक पवित्र और वरेण्य थे, जब तक उनके वर्गीय हितों को कोई आंच न पहुंचती हो. वर्गीय हितों को ठेस की संभावनामात्र पर वे शास्त्रों की व्याख्याएं बदलते रहे हैं. उदाहरण ऋग्वेद से ही खोजे जा सकते हैं. वेदपाठी ब्राह्मण ऋग्वेद के पुरुषसूक्त को तो ज्यों का त्यों बनाए रखते हैं. वर्णाश्रम के समर्थन में अपने तर्कों को वहां तक खींच ले जाते हैं. लेकिन ऋग्वेद की दूसरी शिक्षाएं जिनकी सामाजिक उपयोगिता है, की वे मनमानी व्याख्या करते हैं. ऋग्वेद में जुआ को कुरीति माना गया है. दसवें मंडल में जुआरी का एक प्रसंग आया है जो महाभारत में युधिष्ठिर द्वारा द्रोपदी को दांव में हार जाने से एकदम मिलताजुलता है. अंतर बस इतना है कि ऋग्वेद का जुआरी गरीब है. जबकि युधिष्ठिर सम्राट. ऋग्वेद का जुआरी दिनरात जुआखाने में पड़ा रहता है. पासे को देख उसकी बांछें खिल जाती हैं. उसको गिरते देख वह मद्मत्त हो उठता है. जुआरी की पत्नी अपने पति से बेहद प्यार करती है. यहां तक कि जुए में सबकुछ हार जाने पर भी उसका बहिष्कार नहीं करती. जुआरी की सास भी उसपर दया करती है. जुए की लत से बरबाद हो चुका जुआरी कर्ज लेकर भी जुआ खेलता है. फिर एक दिन सब कुछ गंवा देता है. यहां तक कि अपनी पत्नी को भी. तब उद्गाता ऋषि जुआरी को समझाता है—

जुआ मत खेल. मत खेल जुआ. अपने खेतों को जोत. प्राप्त धन से संतोष कर. उसे अपना मानते हुए परिश्रम कर. ये तेरी गौए हैं. वह तेरी जाया है. सबके साथ रहते हुए अपने सुख और कमाई को बढ़ा.’ (ऋग्वेद—10/34/13).

वेद का जुआरी गरीब है. अपनी मेहनत का खाता है. उसके लिए जुआ खेलना बरबादी का सबब है. मगर राजाओं और सामंतों के लिए जिनके पास अकूत धन संपदा है, और ज्यादा बटोरने के लिए पर्याप्त सैन्यबल है. राजकोष है जिसे भरने के लिए प्रजा रातदिन पसीना बहाती है, उनके लिए जुआ बरबादी नहीं, शान का प्रतीक है. युधिष्ठिर अपनी राजसी आन को बचाने की खातिर जुआ खेलता है. वेदविरुद्ध कार्य करने के बावजूद उससे युधिष्ठिर का धर्मराजपन खंडित नहीं होता. मरणोपरांत यदि उसे कुछ पल के लिए नर्क में जाना पड़ता है तो इसलिए कि उसने अश्वत्थामा के मरने की झूठी सूचना द्रोणाचार्य को देने की कोशिश की थी, जुए में अपनी पत्नी को दांव पर लगा देने के लिए नहीं, जो न केवल उसकी, बल्कि पांचों पांडवों की संयुक्त भार्या थी. साफ है कि जो शक्तिशाली है, सामर्थ्यवान है वह ज्ञान की स्वार्थानुकूल व्याख्या के लिए बुद्धिजीवियों को खरीद लेता है. प्रायः बुद्धिजीवी ही उसकी ओर स्वयं खिंचे चले आते हैं. वे उसके लिए उपलब्ध ज्ञानधाराओं की मनमानी व्याख्या करते हैं. दूसरे शब्दों में अभौतिक होने के बावजूद ज्ञान जिसके पास जाता है, उसकी भावनाओं, विवेक और स्वार्थ के अनुसार आचरण करने लगता है.

ज्ञान के ऐसे दुरुपयोग ‘महाभारत’ को न्योता देते हैं. आधुनिक भाषा में मार्क्स ने इसे द्वंद्ववाद कहा है. ज्ञान पर किसी का एकाधिकार नहीं होता. लेकिन जब मान लिया जाए कि फलां व्यक्ति या समूह का ज्ञान पर एकाधिकार है, तब उसके मनमाने उपयोग की संभावना बढ़ जाती है. इसलिए व्यक्ति और समाज दोनों का दायित्व है कि वह ज्ञान के एकाधिकार की भ्रांति से बाहर आए. ध्यान रखें कि विचार की स्थिति दोमुंहे सांप जैसी होती है. वह दोनों और गति कर सकता है. सपोंलों की तरह हर विचार, दूसरे विचार को खाने की कोशिश करता है. जन्म लेते ही नवज्ञानांकुर पर दूसरे ज्ञानांकुर हमला कर देते हैं. प्रकट में यह लड़ाई बहुत मारक दिखती है. असल में होती पूरी तरह अहिंसक है. विचारों के बीच दिखावटी प्रतिद्विंद्वता भले हो, उस लड़ाई में न तो कोई विचार मिटता है, न ही घायल होकर हमेशा के लिए प्रतियोगिता से बाहर चला जाता है. अस्तित्व की इस स्पर्धा में कुछ विचार दब अवश्य जाते हैं. लेकिन अनुकूल परिस्थितियों में वे पुनः केंद्रीय भूमिका के लिए सक्रियता के धरातल पर लौट आते हैं. विचार के समर्थक इतने उदार नहीं होते. उत्तेजना में वे अकसर बेकाबू हो जाते हैं.

इन स्थितियों से बचने के लिए ज्ञान और ज्ञानी दोनों का निष्प्रह होना आवश्यक है. मनुष्य की विशेषता है कि वह नए की ओर आकर्षित होता है, उसको आत्मसात करने की कोशिश करता है. यह स्वागतयोग्य है. लेकिन ज्ञानी और ज्ञानसाधक दोनों को समझना चाहिए कि समाज उनसे कहीं ज्यादा ज्ञानी है. उनकी बौद्धिकता की इमारत में कुल ज्ञानसंपदा समाज की खर्च हुई है. व्यक्ति तो केवल समाज में अर्जित ज्ञानसंपदा को रूपाकार देता है. उसे अपनी दृष्टि के अनुसार ढालता है. मनुष्यता की संपूर्ण ज्ञानसंपदा के आगे उसका ज्ञान विराट बरगद के एक पत्ते जितना है. वैसे भी समाज का ज्ञानी होना, व्यक्ति के ज्ञानी होने से अधिक महत्त्वपूर्ण है. विडंबना है कि हमारे पास ऐसा कोई कारगार रास्ता नहीं है, जिससे समाज को ज्ञानी बनाया जा सके. इसलिए हम व्यक्तियों के प्रबोधीकरण के जरिये समाज के प्रबोधीकरण का सपना देखते हैं. यह रास्ता आसान है. लेकिन इसमें व्यक्ति खुद को दूसरों से अलग और बड़ा समझने लगता है. शीर्षत्व का गुमान अहंकार पैदा करता है और अहंकार से अकेलेपन और असुरक्षाबोध की वृद्धि होती है. नतीजन सामूहिकता के बीच उसका आचरण भीड़ या भेड़चाल जैसा हो जाता है.

जो वास्तव में मनस्वी होते हैं, वे इस सच से वाकिफ होते हैं. वे जानते हैं कि अपरिमेय ज्ञान की अंतहीन यात्रा में कुछ भी सर्वथा अंतिम और प्रामाणिक नहीं है. इसलिए वे बारबार दोहराते हैं कि उनके कहे को अंतिम मानने से बचो. वे जो कह रहे हैं उसे अपने तर्कों और विवेक की कसौटी पर जांचोपरखो. यही बुद्ध ने भी कहा था, यही गांधी ने भी कहा. प्रकृति भी समझाती है कि किसी अकेले वृक्ष से धरती की शोभा नहीं बनती. पृथ्वी का सौंदर्य सर्वत्र हरियाली में है. यदि छोटेछोटे तिनकों से बनी घास का सौंदर्य भी इसलिए अनुपम होता है कि वहां सभी तृण बराबर होते हैं. सभी सहअस्तित्व की भावना का सम्मान करते हैं. ताड़ का वृक्ष तब तक शोभा नहीं बनता जब तक उसका साथ देने के लिए कुछ और ताड़ वृक्ष न हों. योग्य नागरिक योग्य समाज का उत्पाद होता है. तदनुसार आवश्यक है कि समाज प्रबुद्ध हो. लेकिन ज्ञान की उलटबांसी है कि जब हम व्यक्ति के प्रबोधीकरण पर जोर देते हैं, तो समाज में असमानता पनपने लगती है; और संपूर्ण समाज के प्रबोधीकरण का सीधासरलसर्वस्वीकार्य रास्ता हमारे पास है नहीं.

© ओमप्रकाश कश्यप

1 टिप्पणी

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One response to “ज्ञान और ज्ञानार्जन की उलटबांसियां

  1. सहज प्रवाहशील भाषा में गहन अनुभूति से निःसृत इस आलेख में ‘ज्ञान का तत्त्वविधान’ मौजूद है जो अपनी समाजीकरण एवं संस्कृतिकरण के उद्देश्य की पूर्ति कर रहा है। संतुलित ज्ञानधारा के इस मनीषी आलेखक को साधुवाद!

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