आभासी लोकतंत्र यानी लोकप्रतिनिधित्व की प्रामाणिकता

यह सिद्धांततः मान लिया गया है कि लोकतंत्र में बहुमत की सरकार शासन की जिम्मेदारी संभालती है. जो बहुमत में नहीं है, वह या तो विपक्ष में बैठता है अथवा सरकार से पूरी तरह बाहर कर दिया जाता है. प्रश्न है कि जिसे सरकार बनाने या उसमें शामिल होने का अवसर दिया जाता है, क्या वह वास्तव में ही बहुसंख्यक का प्रतिनिधि होता है? दूसरे शब्दों में जीतकर सरकार बनाने वाले विधायक अथवा सांसद क्या सचमुच जनप्रतिनिधि होने का दावा कर सकते हैं? जहां तक मीडिया तथा उसके पोषित बुद्धिजीवियों की बात है, वे प्रत्येक चुनाव को लोकतंत्र के उत्सव की भांति देखते हैं. सरकार भी ऐसा ही मानती है. वे पूरी तरह गलत भी नहीं हैं. देश में बहुमत के आकलन की जो सामान्य कसौटी है, उसपर वे खरे उतरते हैं. जबकि लोकप्रिय अथवा संसदीय राजनीति की विवशताओं के चलते जो सच सामने आता है, वह वास्तविक बहुमत से बहुत दूर होता है. इसे हम धर्म, संस्कृति, जाति और क्षेत्रीयता के खानों में बंटे समाज की विडंबना भी कह सकते हैं, जिसमें व्यक्ति अपने राजनीतिक निर्णय देश अथवा समाज नहीं, चंद समूहों के स्वार्थ को केंद्र में रखकर लेता है. लोकप्रतिनिधित्व की प्रामाणिकता को परखने के लिए चुनावी आंकड़ों के खेल को समझना आवश्यक है. उसे हम साधारण गणित के माध्यम से जानने की कोशिश करेंगे, जो अपने आप में खासा रोचक है.

मान लीजिए किसी निर्वाचन क्षेत्र की कुल जनसंख्या 10000 है. उसमें बच्चों और 18 वर्ष से कम के मताधिकार से वंचित लोगों की संख्या को लगभग एकतिहाई मान लिया जाए तो मताधिकार प्राप्त नागरिकों की संख्या लगभग 66 प्रतिशत यानी 6600 होगी. अब मान लीजिए कि मतदान होता है. मतदाता उसमें बढ़चढ़कर अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं. भारतीय लोकतंत्र के जैसे हालात हैं, उनमें 65 प्रतिशत मतदान को भी ‘आदर्श’ मान लिया जाता है. इस तरह 6600 का 65 प्रतिशत यानी कुल 4290 नागरिक अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं. यह कुल जनसंख्या का लगभग 43 प्रतिशत है. इस तरह चुनाव प्रक्रिया के संपन्न होतेहोते करीब 57 प्रतिशत मतदाता विभिन्न कारणों से या तो निर्वाचन प्रक्रिया में हिस्सेदारी के अयोग्य मान लिए जाते हैं, अथवा उससे वंचित रह जाते हैं. इसे एकदम स्वाभाविक मान लिया जाता है. सिवाय चुनावी दिनों के जनता को अपनी सरकार चुनने तथा जनप्रतिनिधियों की गतिविधियों को जाननेसमझने का कोई प्रयास नहीं किया जाता.

संसदीय लोकतंत्र में दलगत उम्मीदवारों के अलावा निर्दलीय उम्मीदवार भी हिस्सा लेते हैं. कुछ डमी उम्मीदवार भी खड़े कर दिए जाते हैं. जिनका उद्देश्य विरोधी उम्मीदवार के वोट काटना होता है. धरतीपकड़ जैसे उम्मीदवार भी लोकतंत्र का प्रहसन रचते नजर आते है. हार सुनिश्चित होने के बावजूद ऐसे प्रतिनिधि चुनावों में हिस्सा लेते हैं. तमाम सावधानियों के बावजूद कुछ मत खारिज होते हैं. कुछ ऐसे मतदाता होते हैं, जिन्हें एक भी प्रत्याशी योग्य नहीं लगता. निर्वाचन केंद्र पर वे ‘इनमें से कोई नहीं’ का विकल्प चुनते हैं. इन परिस्थितियों में 30—35 प्रतिशत मतदान प्राप्त कर लेने वाले राजनीतिक दल चुनावों में अप्रत्याशित जीत दर्ज कर लेते हैं. विगत चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को मिले बंपर बहुमत के पीछे मात्र 31 प्रतिशत वोट थे. यह प्रतिशत कुल दर्ज मतों में से वैध मतों का है. यदि मान लिया जाए कि अवैध मतों का प्रतिशत शून्य या नगण्य है तो उपर्युक्त उदाहरण में विजेता दल को 4290 का 31 प्रतिशत; यानी मात्र 1716 मत प्राप्त होंगे. यदि इसे कुल जनसंख्या के अनुपात में देखा जाए तो यह लगभग 17 प्रतिशत यानी उसका छठा हिस्सा है. ये 17 प्रतिशत लोगों के प्रतिनिधि ही आगे चलकर देश का शासनभार संभालते हैं. शेष 83 प्रतिशत नागरिकों में मताधिकार से वंचित लोगों के अलावा वे लोग सम्मिलित होते हैं, जो विपक्ष होने के कारण सीधे सरकार चलाने की जिम्मेदारी से मुक्त होते हैं. यही स्थिति चुनाव जीतने वाले प्रत्याशियों की भी है. वे भी कुल मतदान का पचीसतीस और जनसंख्या का पंद्रहबीस प्रतिशत मत पाकर जीत दर्ज करा ले जाते हैं; यानी जिसे सरकार कहते हैं, वह मात्र 1718 प्रतिशत लोगों की इच्छाओं को अभिव्यक्त करती है. बाकी के मत विभिन्न दलों/प्रत्याशियों में बंटकर निष्प्रभावी हो जाते हैं.

ऊपर दिया गया उदाहरण केवल मानसकल्पना नहीं है. चुनावों में इस प्रकार के खेल खूब खेले जाते हैं. इस सचाई को वे देश में फलतेफूलते लोकतंत्र का नाम देकर महिमामंडित करते रहते हैं. आगे बढ़ने से पहले हम वास्तविक आंकड़ों पर आते हैं. मई 2014 में देश की कुल जनसंख्या लगभग 124 करोड़ थी. उसी महीने हुए आम चुनाव में कुल 83.42 करोड़ (कुल जनसंख्या का 67.3 प्रतिशत) निर्वाचकों में से 53.38 करोड़; यानी 66.38 प्रतिशत (कुल जनसंख्या के हिसाब से मात्र 44.66 प्रतिशत) मतदाताओं ने मतदान में हिस्सा लिया था. इनमें से विजेता भारतीय जनता पार्टी को मात्र 17.16 करोड़ वोट, कुल मतदान का 31 प्रतिशत तथा एनडीए को कुल मिलाकर 35 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे. इस तरह संसद में सर्वाधिक सीट लाने वाली भाजपा को कुल मतदाता संख्या के मात्र 20.57 प्रतिशत तथा देश की कुल जनसंख्या का मात्र 13.84 प्रतिशत (लगभग सातवां हिस्सा) मत प्राप्त हुए हैं. कुल जनसंख्या के 86.16 प्रतिशत लोग या तो किसी कारणवश चुनाव प्रक्रिया से बाहर थे, अथवा भाजपा के स्थान पर दूसरे विकल्प उनकी पसंद थे. दूसरे शब्दों में जिसे ‘मोदी मैजिक’ कहा गया है, वह औसतन पांच मतदाताओं में से केवल एक पर चला है. जबकि देश के कुल मतदाताओं में से लगभग अस्सी प्रतिशत ऐसे थे, जिन्हें मोदीजी, भाजपा तथा उसका संगठन अस्वीकार्य था. चूंकि वे बिखरे हुए थे, इतने बिखरे थे कि अलगअलग समूह तथा नेता की इच्छाओं की अभिव्यक्ति करते थे. इसीलिए उन्हें मिले खंडित जनादेश को निष्प्रभावी मानते हुए किनारे कर दिया गया. इसे हम अप्रत्यक्ष लोकतंत्र की सीमा भी कह सकते हैं. भारत में जनता केवल अपने प्रतिनिधि चुनती है. उसके बाद सरकार बनाने, और चलाने का अधिकार जनता के हाथों से निकलकर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के अधीन चला जाता है. जनता प्रायः मूक दृष्टा बन जाती है. इसलिए 16वीं लोकसभा में कुल मतदाताओं में से दोतिहाई से ज्यादा मत विपक्ष के संयुक्त खाते में आने के बावजूद, तकनीकी कारणों से नेता विपक्ष का पद खाली रह जाता है. इसे प्रथम दृष्ट्या सत्तारूढ़ दल की लोकतांत्रिक मूल्यों में अनास्था मान सकते हैं, लेकिन भारतीय संसद के इतिहास में यह पहली घटना नहीं है. ऐसा पहले भी हो चुका है, जब अपनी जीत पर इतराया हुआ सत्तापक्ष विपक्ष की मांग अनसुनी कर देता है. भूल जाता है कि इस विशाल लोकतांत्रिक देश में उसे मतदाताओं के केवल चौथेपांचवे हिस्से का समर्थन प्राप्त है. बाकी का समर्थन विपक्ष में बंटा होने के कारण वह निष्प्रभावी भले हो, लेकिन उपेक्षायोग्य हरगिज नहीं है. सच तो यह है कि सत्ता में आने के बाद इस देश के राजनीतिक दल, केवल सरकार बनाने और चलाने की सोचते हैं, लोकतांत्रिक मूल्यों में उसकी उसकी अपेक्षित आस्था रह ही नहीं जाती. दूसरे शब्दों में जिसे हम बहुमत की राजनीति कहते हैं, वह असल में अल्पमत की राजनीति होती है. सरकारें कुल मिलाकर आभासी बहुमत के सहारे शासन करती हैं. आभासी बहुमत के सहारे चलने वाली सरकारों से देश में वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना असंभव है. यह प्रकारांतर में अन्यान्य विकृतियों की वजह भी है.

व्यावहारिक राजनीति की मजबूरियों को कुछ देर के लिए नजरंदाज कर दिया जाए तो हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि जिसे बहुमत की सरकार कहा जाता है, असल में वह देश की कुल जनसंख्या तथा निर्वाचकों की संख्या के अनुपात में अल्पमत की सरकार होती है. इस पर विचार करने, स्थिति में सुधार लाने हेतु गंभीर प्रयास करने के बजाय, समस्या को बहुदलीय लोकतंत्र की स्वाभाविक परिणति मान लिया जाता है. वर्तमान व्यवस्था की कमी है कि इसमें उस बंटे हुए ‘बहुमत’ का कोई सदुपयोग नहीं होता, जो सत्ताधारी दल को प्राप्त मतों की संख्या से कहीं अधिक है, लेकिन छोटेछोटे हिस्सों में बंटकर अपना प्रभाव खो चुका है. सोलहवीं संसद में ही कुल मतदाता संख्या के हिसाब से प्रत्येक पांच में से चार और दर्ज मतदान के हिसाब से प्रत्येक तीन से से दो मतदाता वर्तमान सत्तारूढ़ दल और उसके सहयोगियों के विरोध में थे. ऐसे में केवल एक अपेक्षा रह जाती है कि सरकारें सभी प्रकार के भेदभाव, राजनीतिकसामाजिक वैमनस्य को भुलाकर संपूर्ण समाज के कल्याण के लिए काम करें. यह तब संभव है जब जीतकर सरकार बनाने वाले नेतागण ध्यान रखें कि वे केवल आभासी बहुमत के सहारे उस पद तक पहंुचे हैं. यदि उन्हें पसंद कर संसद या विधानसभा में पहुंचाने वाले लोग बड़ी संख्या में हैं तो उसको नापसंद करने वाले अथवा विकल्प की तलाश करनेवाले मतदाताओं की संख्या उनसे कहीं बड़ी है. उसके नेतृत्व की कसौटी उन सब का विश्वास प्राप्त करने से आंकी जाएगी जिन्होंने उसके विरोध में मतदान किया था. यहां कहा जा सकता है कि जिन लोगों ने मतदान प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया, अथवा आयु अथवा अन्य किसी कारण से मताधिकार से वंचित रहे हैं, वे सत्तारूढ़ दल के विरोध में ही मतदान करें, यह आवश्यक नहीं है. दूसरे ऐसा कोई कानून नहीं है, जिसके आधार पर नागरिकों को मतदान के लिए बाध्य किया जा सके. इसलिए जो मतदाता स्वेच्छासहित निर्वाचन प्रक्रिया में हिस्सेदारी करते हैं, उनकी राय के आधार पर निर्णय लेना ही उचित है. यह व्यावहारिक हो सकता है और तर्कसंगत भी, लेकिन ऐसा करते हुए हम अनायास ही उस विभाजित बहुमत की महत्ता को नकार रहे होते हैं, जिसने चुनावों में सक्रियता दिखाते हुए सत्तारूढ़ दल के विकल्पों में अपना विश्वास जाहिर किया था. दूसरी प्रतिक्रिया यह हो सकती है एक बार सरकार बन जाने के बाद उसे चुनावी राजनीति से ऊपर मान लिया जाता है. माना जाता है कि सरकार संविधान के प्रति आस्थावान है. इसलिए वह देश के सभी नागरिकों के लिए, चाहे उसने समर्थन में मतदान किया हो या विरोध में, बिना किसी पक्षपात के काम करती है. इस बारे में हमारा केवल यह कहना है कि लोकतंत्र में विपक्ष भी जनता की राय की नुमाइंदगी करता है, इसलिए उसके नेता पद को सत्तारूढ़ दल की इच्छा अथवा संसद में प्राप्त सीटों के पर निर्भर नहीं होना चाहिए.

इस दावे में सचाई है कि विजेता दल को इतने मत तो प्राप्त हो ही जाते हैं जितने किसी दूसरे दल को प्राप्त नहीं होते. चुनावों में 31 प्रतिशत वोट पाकर भी भाजपा प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस (लगभग 19 प्रतिशत) से काफी आगे है. लोकतंत्र में चूंकि मतदाता सर्वोपरि होता है, अतएव उसके किसी निर्णय पर प्रश्नचिह्न लगाना अनुचित है. फिर जो लोकतंत्र मतदाताओं को सरकार चुनने का अधिकारी बनाता है, वह राजनीतिक दलों और नेताओं को भी अधिकृत करता है कि वे सरकार में सम्मिलित होने के लिए अपनी तरह से दावेदारी पेश करें. इस परिस्थितियों में मतदाता अपने विवेक के आधार पर जो निर्णय लेता है, और उसमें जो बहुमत सामने आता है— लोकतांत्रिक प्रक्रिया उसी के सहारे आगे बढ़ती है. उसमें बहुमत छोटाबड़ा, कम या ज्यादा मतों का नहीं देखा जाता, वह केवल बहुमत होता है, भले ही जीत का अंतर एक वोट का क्यों न हो. इसलिए संसद में जिस दल का बहुमत हो वही स्वयं या अपने सहयोगियों के साथ सरकार बनाने का अधिकार रखता है. लेकिन यह व्यवस्था प्रकारांतर में उस विशाल जनमत की उपेक्षा करती है, जो विजेता प्रत्याशी के विरोध अथवा विकल्प की तलाश में पड़ा था. यहां सरकार या सत्तापक्ष के अधिकार को लेकर कोई चुनौती देने या उसकी वैधता पर सवाल उठाने का हमारा कोई लक्ष्य नहीं है. हमारा लक्ष्य लोकतंत्र और लोकप्रिय राजनीति की उन विडंबनाओं की ओर संकेत करना मात्र है, जिनके चलते मतदान के साथ ही कुल मतदाताओं का 69 प्रतिशत तथा जनसंख्या का 87 प्रतिशत हिस्सा सरकार और उसकी निर्णय प्रक्रिया से बाहर हो जाता है. यह स्थिति उन लोगों के लिए विशेष रूप से असंतोषजनक होती है जो मानते हैं कि भारत एक कल्याण राज्य है. जो लोकतंत्र के आदर्श ‘जनता द्वारा जनता के लिए जनता का शासन’ में विश्वास रखते हैं.

भारतीय समाज में अशिक्षा और अंधविश्वास बड़ी समस्या है. लोग आज भी धर्म एवं मिथकीय आख्यानों के आधार पर अपनी राय बनाते हैं. लोकतंत्र तथा आधुनिक राजनीतिक दर्शनों को लेकर उनकी समझ आजादी के 68वें वर्ष बाद भी अधूरी है. इसका प्रभाव चुनाव प्रचार पर भी पड़ता है. निर्वाचन प्रक्रिया प्रायः उन मुद्दों पर केंद्रित हो जाती है, जिनका लोगों के विकास से कोई संबंध नहीं होता. बल्कि कई बार तो वह विकास की प्रतिगामी धारा पकड़ लेती है. लोकप्रिय राजनीति में नेता यह मान लेते हैं कि नेतृत्व करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. इसलिए वे सत्ता तक पहुंचने के लिए मनमाने हथकंडे अपनाते हैं. यह भूलकर कि लोकतंत्र में सरकारें जनमत के आधार पर बनती और चलाई जाती हैं, वे स्वयं को शिखर पर स्थापित करने का हरसंभव षड्यंत्र रचते रहते हैं. भारत जैसे देशों में जहां लोकतंत्र कुछ ही दशक पुराना है तथा धर्म और जाति के चंगुल में फंसे समाज पर सामंतवाद का प्रभाव आज भी है, ऐसे लोगों की संख्या काफी होती है. वे लोग अपनीअपनी तरह से स्वयं को शिखर तक पहुंचाने की योजनाएं बनाते रहते हैं, जिनकी रूपरेखा मतदाता के हितों के बजाए नेता के स्वार्थ के आधार पर गढ़ी जाती है. परिणामस्वरूप चुनाव नागरिकों की सामान्य सहमति के आधार पर संचालित होने के बजाय प्रबंधनकला में ढलने लगता है. जिसके प्रभाव में लोगों को क्षुद्र मुद्दों के आधार पर छोटेछोटे समूहों में बांटकर काम चलाऊ बहुमत जुटाने का प्रयत्न यथासंभव किया जाता है. जिससे पूरी चुनाव प्रक्रिया एक तमाशे का रूप ले लेती है. मतदाता प्रत्याशियों की कथनी और करनी के अंतर को समझता है, किंतु सही विकल्पों का अभाव उसकी निर्णय शैली को अगंभीर और चलायमान बना देता है. अन्यमनस्कता के बीच वह लोकप्रिय राजनीति के वोटजुटाऊ हथकंडों का शिकार होता रहता है. यदि हम ध्यानपूर्वक विश्लेषण करें तो पाएंगे कि भारतीय राजनीति की अनेकानेक समस्याएं सांप्रदायिकता, चुनावों के दौरान उत्तेजक मुद्दे उछालना, जनमत को विभाजित करने की कोशिश करना, इसी की देन हैं.

कोई भी चयन आपके विवेक और एकाग्रता की परख करता है. सर्वोत्तम चयन के लिए आवश्यक है कि वह एकदम शांत और निरुद्धिग्न वातावरण में संपन्न हो. जबकि भारत में पूरी निर्वाचन प्रक्रिया उत्तेजना के माहौल में संपन्न होती है. मतदाता को यह जाननेसमझने का अवसर मिल ही नहीं पाता कि उसका अपना हित किसमें है? उसे अकसर उन्हीं मुद्दों के बीच अपनी राय बनानी पड़ती है, जो राजनीतिक पार्टियां और मीडिया उसके बीच पेश करते हैं. ऐसे में वह भीड़ की मानसिकता से नियंत्रित होता है. विराट बहुमत विपक्ष में बंटकर निष्प्रभावी हो जाता है; और कुल निर्वाचकों के 17—18 प्रतिशत मत बटोरने वाले नेता के आगे जीत परोस दी जाती है—इसलिए नेतागण तात्कालिक महत्त्व के उन मुद्दों को उठाते हैं, जिनका दूरगामी प्रभाव विकासविरोधी होता है. उससे सामाजिकसांस्कृतिक प्रदूषण बढ़ जाता है. वे समझते हैं कि कुल मतदाताओं के पांचवेंछठे हिस्से को भी प्रभावित कर लिया जाए तो भी सफलता की संभावना बढ़ जाती है. इसलिए मतदान प्रबंधन में बदल जाता है. इससे चुनाव प्रक्रिया के दौरान अमित शाह जैसे कुशल राजनीतिक प्रबंधकों और कार्यकत्र्ताओं का महत्त्व बढ़ जाता है. ऐसे लोगों के पास न तो विकास के लिए खास नीति होती है, न ही लोकहित के वैकल्पिक कार्यक्रम. वे लोग जाति, धर्म, क्षेत्रीयता के नाम पर मतदाताओं को आकर्षित करना जानते हैं. किस तरह समर्थक मतदाताओं को अपनी ओर खींचा जाए और विरोधी के मतों को बांट दिया जाए, इसपर जमकर चर्चा होती है. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता साफसाफ कहा करते थे कि चुनाव बूथप्रबंधन से अधिक कुछ नहीं है. इसलिए वे प्रत्येक बूथ पर किस तरह समर्थक मतों को अपने पक्ष में खींचा जाए और जो समर्थन में नहीं हैं, उन्हें बांट दिया जाए, इसपर खुलकर चर्चा करते थे. पिछले चुनावों को ही लें तो पिछला चुनाव विकास के नारे और सांप्रदायिकता के बीच लड़ा गया था. भाजपा के पास कोई वैकल्पिक विकास नीति नहीं थी. आज भी वह कांग्रेस सरकार द्वारा लागू नीतियों के विकल्प में कोई नया कार्यक्रम नहीं ला पाई है, न ही उसके पास कोई वैकल्पिक विचार है. लेकिन सांप्रदायिकता के नाम पर वह मतों का ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही और प्रत्येक तीन मतदाताओं में दो द्वारा नकारने के बावजूद वह संसद में सबसे अधिक जनप्रतिनिधि लाने में सफल हुई.

बहुदलीय व्यवस्था में चुनावों के दौरान मत अनेक हिस्सों में बंट जाते हैं, और जैसा कि हाल के चुनावों में देखा गया है, अनेक हिस्सों में बंटे मतदाता अपनी राजनीतिक अहमियत भी खो देते हैं. इसलिए चुनावों में जीत हासिल करने के लिए संघर्ष बहुत महीन स्तर पर किया जाता है. उसके लिए सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार की योजनाएं बनाई जाती हैं. उसके तहत वोट खींचने के साथसाथ दूसरे दलों के वोट काटने के षड्यंत्र भी रचे जाते हैं. चूंकि भारतीय समाज जातिआधार पर बुरी तरह विभाजित है, अतएव जातियों और जातिसमूहों को अपनी ओर खींचने के लिए तरहतरह की चालें चली जाती हैं. इसके प्रमुख हथियार आरक्षण, सांप्रदायिकता आदि हैं. उदाहरण के लिए दलित और पिछड़े दोनों ही जातिआधारित शोषण का शिकार रहे हैं. यह स्वाभाविक था और समय भी मांग भी कि आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय की लड़ाई इन दोनों वर्गों द्वारा मिलकर लड़ी जाती. राममनोहर लोहिया से लेकर विश्वनाथ प्रताप सिंह, कांशीराम आदि का यही सपना था. जनता पार्टी के शासनकाल में उत्तर प्रदेश में मायावती और मुलायम सिंह यादव क्रमशः दलित और पिछड़ी राजनीति के शिखर नेतृत्व के रूप में उभरे थे. अपेक्षित था कि वे आगे चलकर वर्णव्यवस्था समर्थक शक्तियों से एकजुट रहकर संघर्ष करते. लेकिन सवर्ण सोच वाले मीडिया, नौकरशाहों और कुछ राजनीतिक दलों ने ऐसी चालें चलीं कि दोनों के बीच की स्वाभाविक मैत्री की अपेक्षा, स्थायी दुश्मनी में बदल गई. नतीजा यह हुआ कि जीत के लिए दोनों दल कथित ऊंची जातियों के मतों के मोहताज बनकर रह गए और पिछले आम चुनावों सवर्ण वोट बैंक के अपने स्वाभाविक खाने में खिसक जाने से दोनों ही को मुंह की खानी पड़ी.

दिल्ली सरकार और केंद्र के बीच चल रही नूराकुश्ती को भी देश में लगातार बढ़ रही नकारात्मक राजनीति के रूप में देख सकते हैं. अरविंद केजरीवाल और आआप की महत्त्वाकांक्षाएं किसी से छिपी नहीं हैं. नई होने के बावजूद राज्य सरकार की स्वायत्तता के नाम पर आआप ने केंद्र सरकार को समयसमय पर चुनौती दी है. इससे उसकी मंशा कांग्रेस को मृतप्रायः सिद्ध कर, स्वयं को भाजपा के एकमात्र विकल्प के रूप में पेश करने की है. इसके लिए राज्य सरकार ने दिल्ली को पूर्णराज्य का दर्जा दिए जाने की मांग पर उपराज्यपाल नामक संस्था से बेजा टकराव किया है. दूसरी ओर उपराज्यपाल ने भी अनेक अवसरों पर खुद को केंद्र का प्रतिनिधि होने से अधिक भाजपा सरकार के प्रतिनिधि दर्शाने की कोशिश की है. आआप नेताओं को लगता है कि जैसे दिल्ली में कांग्रेस के वोटबैंक पर कब्जा किया है, वैसा ही वे बाकी राज्यों में भी कर सकते हैं. आभासी प्रतिद्विंद्वता दर्शाने का दूसरा उदाहरण नकली प्रमाणपत्रों के आधार पर एकदूसरे पर हमला करना है. केंद्रीय मंत्री पर समान आरोप होने के बावजूद दिल्ली पुलिस ने केवल दिल्ली सरकार के मंत्री को फर्जी डिग्री के आरोप में गिरफ्तार करने में तत्परता दिखाई. दूसरे कुछ मामले भी चर्चा में हैं.

उल्लेखनीय है कि नामांकन के समय भरे जाने वाले शपथपत्रों में शैक्षिक योग्यता के अलावा संपत्ति संबंधी ब्यौरे भी होते हैं. लेकिन न तो भाजपा न ही आआप के किसी नेता ने प्रतिपक्षी को शपथपत्र में दर्ज संपत्ति संबंधी आंकड़ों की प्रामाणिकता को परखने तथा उनके आधार पर दोषी को घेरने की कोशिश की. क्योंकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि संपत्ति के आधार पर बात आगे बढ़ी तो दूर तक जाएगी. राबर्ट बढेरा को कथित रूप से भूमि लेनदेन में लाभ पहुंचाने को भी कांग्रेस के विरोध में मुद्दा बनाया गया था. मगर चुनाव के बाद मामला पूरी तरह ठंडे बस्ते में है. क्योंकि हरियाणा में जमीन खरीद के सौदों में लाभ प्राप्त करने वालों में सुषमा स्वराज के संबंधियों का नाम भी आ चुका है. जाहिर है उस हम्माम में सभी नंगे हैं, इसलिए उससे बचा गया है. यूं भी नूराकुश्ती में जैसे सबसे हल्के और दिखावटी दांव चले जाते हैं. संजय सिंह जैसे आआप के महत्त्वाकांक्षी नेता उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ने का मन बना चुके हैं. हालांकि आआप के लिए उत्तर प्रदेश के चुनाव दिल्ली जैसे आसान होने वाले नहीं हैं. फिर भी वे खुद को राजनीतिक विकल्प के रूप में खड़ा करने की भरसक कोशिश में हैं. इस नूराकुश्ती में भाजपा का भी लाभ है. वह चाहती है कि इस अवधि में आआप को इतना चर्चित कर दिया जाए कि वह राज्यों में भाजपा विरोधी मतों के विभाजन में सफल हो जाए. चूंकि महत्त्वाकांक्षी आआप के नेता दूसरे दलों से समझौता करके चुनाव लड़ने वाले नहीं हैं, इसलिए मतविभाजन का इसका सीधा लाभ भाजपा को ही मिलेगा. इसलिए जंग के बहाने भाजपा भी एक नकली जंग आआप से लड़ रही है. यह नूराकुश्ती आगे भी चलती रहेगी. इसका चुनाव बिहार चुनावों में भले ही न मिले, क्योंकि वहां केजरीवाल नितीश कुमार को समर्थन देने की घोषणा कर चुके हैं. मगर उत्तर प्रदेश में जहां पार्टी स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का मूड बना रही है, वहां भाजपा को इस नूराकुश्ती का लाभ मिलने की पूरी उम्मीद है.

आजादी और उसके बाद अनेक अवसरों पर भारतीय जनता ने दिखाया है कि वह परंपरागत राजनीति से ऊब चुकी है. स्वाधीनता संग्राम के दौरान गांधी और बाद में लोहिया, जयप्रकाश नारायण, विश्वनाथ प्रताप सिंह आदि के नेतृत्व में आगे आकर उसने अपनी जागरूकता का प्रदर्शन किया है. दिल्ली की जनता ने भी कांग्रेस के परंपरागत नेतृत्व को नकारकर आआप को अपनाया है. ये घटनाएं दिखाती हैं कि इस देश में वैकल्पिक राजनीति के लिए भरपूर संभावनाएं मौजूद हैं. अतः परिवर्तन की चाहत रखने वाले बुद्धिजीवियों का कर्तव्य है कि वे जनता में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति विश्वास पैदा करें. लोगों को अपने हितों की पहचान करने तथा उनके लिए संगठित होने की प्रेरणा जगाएं. ताकि छोटेछोटे मुद्दों के आधार पर होने वाले मतविभाजन को रोका जा सके. यदि आवश्यक हो तो कुछ संवैधानिक व्यवस्थाएं भी की जा सकती हैं. दुनिया में कुछ ऐसे देश भी हैं जहां कुल मतदाताओं का पचास प्रतिशत वोट न मिलने पर चुनाव प्रक्रिया को ही अपूर्ण मान लिया जाता है. जाति, धर्म और संस्कृति के आधार पर बंटे भारतीय समाज मंे यह फिलहाल असंभवसा है. लेकिन सरकारें वास्तविक बहुमत यानी अधिकतम के समर्थन के आधार पर बनें या चलें, ऐसी कोशिशें चलती रहनी चाहिए. आभासी लोकतंत्र को वास्तविक लोकतंत्र में बदलने का एक रास्ता यह भी हो सकता है कि बहुमत संपन्न दल की भांति ही वे दल जो सरकार के साथ नहीं हैं, पार्टीलाइन से ऊपर उठकर विपक्ष के नेता का चुनाव करें. विपक्ष के नेता का चुनाव दलविशेष के सदस्यों की न्यूनतम संख्या पर निर्भर न होकर उन सदस्यों की मर्जी से हो जो सरकार बना रहे दल अथवा समूह से किसी भी प्रकार से असंबद्ध हों. वह सदस्य संपूर्ण विपक्ष की नुमाइंदगी विवेक सम्मत ढंग से, लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुसार करे. तभी वास्तविक बहुमत जो विपक्ष के साथ है, की मानरक्षा संभव है.

© ओमप्रकाश कश्यप

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