परीकथाएं : नींव की तलाश

पुराकथाओं के ईश्वर और देवता प्राचीन काव्य तक आतेआते अर्धदेवता (यक्ष) का रूप ले चुके थे. यही यक्ष कालांतर में पुनः रूपांतरित होकर शिशु कथाओं में मुख्य प्रेरणादायी चरित्र के रूप में वर्णित किए गए. — मैक्स मुलर.

भारतीय संस्कृति और साहित्य में परीकथा की स्वतंत्र अवधारणा नहीं है. ‘परी’ शब्द बाहर से आयातित है. इसकी ऐतिहासिकता और मूल की खोज के बारे में हम कुछ देर बाद विचार करेंगे. यहां इतना जान लेना पर्याप्त होगा कि जिन्हें परीकथाएं कहा जाता है, उनमें ‘परी’ नामक पात्र की उपस्थिति अनिवार्य नहीं है. क्या आरंभ से ही ऐसा था? अथवा कालांतर में जब विद्वानों को लगा कि मनुष्य अपनी सहजस्वाभाविक वृत्ति से जड़वस्तुओं का मानवीयकरण करता रहता है; तथा ‘परी’ पशुपक्षियों के मानवीयकरण का ही रुपहला बिंब है? और पशुपक्षियों को पात्र बनाकर कहानी में वैसी ही संवेदना, वैसा ही न्यायबोध, वैसा ही उपकारी भाव, वैसा ही चामत्कारिक प्रभावजैसी परीकथा द्वारा अपेक्षा की जाती है, पाठक के मनस् में बहुत पहले से बनाया जाता रहा है. तब उन्होंने दोनों को एक माना. फलस्वरूप उन्हें ऐसे कथानकों को भी परीकथा में सम्मिलित करना पड़ा, जिनमें कल्पना के अतिरेक द्वारा मनुष्य तक एक नीतिपरक संदेश पहुंचाने की कोशिश की गई हो. अथवा क्या इसका उल्टा हुआ था? यानी भारत और यूनान में सहस्राब्दियों से लिखी जा रही नीति और व्यवहार पर आधारित पशुपक्षियों की कथाएं समुद्रों, पहाड़ों, नदियों और रेगिस्तानों की हजारों किलोमीटर लंबी दूरी तय करने के उपरांत जब अरब देशों में पहुंची तो वहां के निवासियों ने उनमें पशुपक्षी जैसे ‘तुच्छ प्राणियों’ की जगह कल्पनानिर्मित सौंदर्यमूर्ति परियों को, जिनका आधा शरीर पक्षी का था और शेष मनुष्य का थास्थानापन्न कर लिया. परियों के साथ सरोवर, हंस, समुद्र, नदी, झरने, गीतसंगीत आदि की कल्पना स्वाभाविक रूप से की जाती रही है. तो क्या यह अरब और सहारा के रेगिस्तान में रहनेवाले, कठिन जीवन जीने वाले जांबाज कबीलों की मानसकल्पना थी, जिसके माध्यम से वे अपने जीवन के सबसे बड़े अभाव की, हरियाली और खुशहाली की, फंतासी के माध्यम से ही सहीपूर्ति कर लेना चाहते थे. बहरहाल, यदि ‘परीकथा’ जैसे इस विषय के लिए रूढ़ हो चुके शब्द को छोड़ दिया जाए तो जिस तरह की कहानियां इस श्रेणी के अंतर्गत लिखीपढ़ी या सुनीसुनाई जाती हैंउन्हें ‘अजरज कथा’, ‘कौतुक कथा’ अथवा ‘विचित्र कथा’ कहना भी अनुपयुक्त न होगा. ये अचरज कथाएं इसलिए कहलाईं क्योंकि इनमें तुच्छ, नाकुछसे पात्र सबकुछ करते हुए पाए जाते हैं. कई बार तो उनके कारनामे इतने विचित्र होते हैं कि सुननेपढ़ने वाले लोग दांतों तले उंगली दबा लेते हैं. इनकी दूसरी विशेषता मानवीय संवेदना और मानवीय सरोकार हैं. वही इन्हें साहित्य का दर्जा प्रदान करते हैं. कुल मिलाकर कथासाहित्य का इतिहास बहुत पुराना और विविधताओं से भरा है.

प्राचीन कथासाहित्य को वर्गीकृत करते समय विद्वान उसे मुख्यतः चार श्रेणियों में रखते आए हैं

1. लोक कथा (Marchen)

2. पशुपक्षी कथा (Fables)

3. कल्पित कथा (Myths)

4. अद्भुत या अचरज कथा (Fairy Tales)

हमने ऊपर के विश्लेषण से देखा लोककथाओं की उपस्थिति तब से है, जब से मनुष्य ने बोलना सीखा. संवादन की कला उसे आई और भाषा नामक अभिव्यक्ति का प्रमुख हथियार उसके हाथ लगा. दूसरे शब्दों में लोककथा कहानियों का वह विशाल महासागर है, जिसमें पशुपक्षी कथा, कल्पित कथा, अद्भुत कथा या अचरज कथा सभी सम्मिलित हो सकती हैं. यह वहां तक लहराता है, जहां तक मानवसंस्कृति की सीमा है. यह वहांवहां जा सकता है जहां मानवकल्पना आजा सकती है. लोककथाओं की एक विशेषता यह भी है कि इनका कोई रूप स्थिर नहीं होता. प्रत्येक समाज, अपनी आवश्यकता, रुचि, परिवेश यहां तक कि दक्ष किस्सागो भी अपनी मर्जी से इनमें इच्छानुसार फेरबदल कर लेता है. शर्त यह है कि ये समाज के साथ घुलीमिली होनी चाहिए. कोई भी विश्वास जो समाज की मान्यताओं से हटकर हो, उन्हें चुनौती देता हो, यदि किसी कहानी में आता है तो वह लोककथा के रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकती. दूसरे शब्दों में समाज के सामूहिक विश्वास से टकराकर लोककथा बन ही नहीं सकती. इनकी सर्वस्वीकार्यता के आधार पर कभीकभी इन्हें लोककथाओं के साथसाथ ‘लोकप्रिय कथाएं’ भी कह दिया जाता है. यह विशेषण भी सर्वथा उचित है. लोककथाओं अथवा लोकप्रिय कथाओं की दूसरी शर्त मनोरंजन है. चूंकि लोककथाएं अकसर सुनीसुनाई होती हैं. हम उन्हें कईकई बार सुन चुके होते हैं. इसके बावजूद वे भरपूर मनोरंजन करने में कामयाब रहती हैं तो इसलिए कि उन्हें सुनानेवाला अवसर के अनुकूल कथानक में सुधार करने तथा उन्हें अपनी तरह से प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र होता है. इसी से उसकी प्रतिभा की पहचान होती है. अपने मनोरंजनसामर्थ्य के आधार पर ही ये एक कान से दूसरे कान तक निर्बाध यात्रा करती रहती हैं. इनकी तीसरी शर्त है भौगोलिक परिस्थितियों से अनुकूलन की क्षमता. एक दूरी के बाद समाज के रीतिरिवाज बदल जाते हैं. बोलीबानी, खानपान, जीवनशैली और आचारविचार में परिवर्तन आ जाता है. अच्छी लोककथा वह होती है जो बदली परिस्थिति के अनुरूप तत्काल खुद को ढाल ले. चतुर किस्सागो इसे कुशलतापूर्वक अंजाम देते हैं. उदाहरण के लिए एक लोककथा का नायक यदि पश्चिमी उत्तरप्रदेश में खीरपूरी की दावत पसंद करता है, तो वही लोककथा जब बंगाल में पहुंचेगी तो उसके नायक का खानपान भी बदल जाएगा. उसके प्राण खीरपूरी के बजाय मछलीभात में बसने लगेंगे. प्रत्येक चरअचर प्राणी, वस्तु या विचार जो लोक की कल्पना की विषयवस्तु है, वह लोककथा का पात्र भी बन सकती है.

पशुपक्षियों की कहानियों का निकास लोककथाओं से ही हुआ है. लेकिन लोककथाओं में जहां सामाजिक आचारविचार और व्यवहार की कहानियां भी सम्मिलित होती हैं, वहीं कथापात्र के रूप में पशुपक्षियों का उपयोग पाठकश्रोता तक विशेष नैतिकव्यावहारिक संदेश पहुंचाने के लिए किया जाता है. मनुष्य समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ है. उससे अपेक्षा की जाती है कि अपने श्रेष्ठत्व को आदर्शों के अनुपालन तथा आचरण की पवित्रता से सिद्ध करे. इस काम में वह प्रायः चूक जाता है. मनुष्य को उसकी चूक की ओर ध्यान दिलाने, उसे उसका मनुष्यत्व लौटाने के लिए कहानियों की जरूरत पड़ती है. खूब सोचसमझकर विद्वानों ने पशुपक्षी की कहानियों को चुना है. संदेश यही था कि जब पशुपक्षी आदर्श और नैतिकता से भरा जीवन जी सकते हैं, मर्यादापूर्ण आचरण कर सकते हैं, स्वार्थ त्यागकर परहित में बलिदान कर सकते हैं, तो मनुष्य क्यों नहीं? फिर मानवीय पात्रों के माध्यम से उच्चादर्श की बात की जाए तो कदाचित वह अविश्वसनीय जान पड़ेगी. प्रतिक्रियास्वरूप लोग उसकी चारित्रिक कमजोरियां खोजने लगेंगे. पशुपक्षियों के मामले में इस तरह की बहसबाजी की गुंजाइश नहीं रहती. वे वैसे ही मनुष्य से कमतर माने जाते हैं. कहानी पूरी होतेहोते उसके पात्र नेपथ्य में चले जाते हैं. रह जाता है वह संदेश जिसके लिए लेखक ने उसे रचा है. पाठकोंश्रोताओं को आमंत्रित करता हुआ. पशुपक्षियों को कथापात्रों में ढालकर नीति संदेश का वाहक बनाने के पीछे यही दर्शन काम करता है. ऋग्वेद में सरमा नामक कुतिया पणियों को पशुधन का व्यापार न करने को कहती है. पणि उसे डराते हैं, प्रलोभन देते हैं, मगर वह अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटती. उपनिषदों में पशुपक्षी अध्यात्मचर्चा करते हुए पाए जाते हैं. कालांतर में पशुपक्षियों का उपयोग व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा देने हेतु भी किया जाने लगा. महाभारत में पशुओं की नीति और व्यवहार बोध दोनों ही प्रकार की कहानियों की बहुतायत है. जातक ग्रंथों में बोधिसत्व के पूर्वजन्मों की गाथा सुनाते समय जीवजंतु अनायास ही आ गए हैं. वे सभी किसी न किसी रूप में उच्च सामाजिक आदर्श हेतु काम करते हुए नजर आते हैं. इस मामले में ‘पंचतंत्र’ बेमिसाल है. उदंड राजकुमारों को व्यावहारिक ज्ञान देने के लिए लिखी गई इन कहानियों ने शताब्दियों तक न केवल बच्चों, बल्कि बड़ों का भी मानसनिर्माण किया है.

जो सच नहीं है लेकिन मन उसको सच माने, उसके साथ सच होने जैसा व्यवहार करे और उसके सच होने की भ्रांति लगातार पाले रहेवह मिथक है. दूसरे शब्दों में मिथक समाज की ऐसी कल्पनाएं हैं, जिन्हें वह साथ लिए चलता है और जो उसकी चेतना को अभिव्यक्त करती हैं. विशुद्ध कल्पना यानी मिथ पर आधारित कहानियां किसी भी समाज की धार्मिकसामाजिक चेतना का आधार होती हैं. इनकी खूबी होती है कि विशुद्ध कल्पनामय होकर भी उन्हें परमयथार्थ या यथार्थ से ऊपर होने का सम्मान इन्हें मिलता है. समाज सामूहिक विवेक के साथसाथ सामूहिक विश्वास से भी चलता है. और सामूहिक विश्वास को बनाए रखने में मिथकों की बड़ी भूमिका होती है. इसलिए रामायण, महाभारत, पुराण, उपनिषद्, स्मृति आदि ग्रंथों में मिथक पर आधारित आख्यान खूब आए हैं. मिथक का अस्तित्व भले न हो परंतु समाज उन्हें सही मानता है. उनके संदेश को आप्तआदेश की भांति लेता है. इसलिए जीवंत समाजों में, विशेषकर वहां जहां भारी समाजार्थिक असमानता हो, लोग उससे पूरी तरह अनुकूलन कर चुके हों, मिथकों का बड़ा महत्त्व होता है. पुष्पक विमान, वानरों द्वारा रावण सेना से युद्ध करना, कृष्ण का उंगली पर गिरिराज पर्वत को उठा लेना या दो मुट्ठी चावल के बदले मित्र सुदामा को दो लोकों का राज्य थमा देनासब मिथकीय आख्यान हैं. पशुपक्षियों की कहानियों और मिथकीय आख्यान के संदेश संप्रेषण में अंतर है. पशुपक्षियों की कहानियों में रचना समाप्त होते ही पात्र नेपथ्यगामी हो जाते हैं. पाठक के मनमस्तिष्क पर केवल उसका संदेश छाया रहता है. वही रचना का सारत्व है या जिसके लिए कोई कलमकार कलम उठाता है. वहां साधारण पात्रों के माध्यम से असाधारण संदेश सामने आता है. इसी में पशुपक्षी की कहानियों की महत्ता है. मिथकीय आख्यान में पात्र अवास्तविक होते हुए भी लोकविश्वास में जीवित होते हैं. लोकश्रद्धा ही उन्हें शक्तिशाली बनाती है, और लोकआस्था पर सवार होकर वे विराट रूप धारण कर लेते हैं. ऐसे में उनके माध्यम से जो संदेश दिया जाता है, लोक उसका आकलन विवेक के बजाय आस्था के आधार पर करता है. फलस्वरूप साधारण संदेश भी असाधारण प्रतीत होने लगता है. लोकश्रद्धा की संजीवनी मिथकों को मरने नहीं देती. किंतु मिथकों के प्रति श्रद्धा एवं विश्वास के अतिरेक में कई बार वह वास्तविकता से परे चला जाता है. तो कई बार इसका लाभ उठाने के लिए ऐसी शक्तियां भी आगे आ जाती हैं, जिनका ध्येय मिथकों के माध्यम से अपने वर्गीय मनसूबे साधना होता है. वह मिथकों की लोकप्रियता का लाभ उठाकर उनके माध्यम से ऐसे विचार और कर्मकांड समाज पर थोपने में कामयाब हो जाती हैं, जिनसे समाज में वर्गविभाजन को मान्यता मिलती है. शीर्षस्थ धार्मिक शक्तियां लोकप्रिय धर्मग्रंथों में लोकप्रिय मिथकों को नएनए अवतार के रूप में पेश करती हैं. ऐसे मिथकों के माध्यम से रची गई कहानियां समाज में विवेक और नीति के बजाय लोकविश्वास को सींचने का ही काम करती हैं.

चौथी श्रेणी में आनेवाली अद्भुत कथा या अचरज कथाएं इस पुस्तक का प्रतिपाद्य विषय हैं. इनमें कल्पना पर कोई बंदिश नहीं होती. कल्पना के लिए दशों दिशाएं मिथक में भी खुली होती हैं. मगर वहां पाठक स्वयं उन्हें कल्पना मानने को तैयार नहीं होता. उनके प्रति गहरे विश्वास और आस्था के चलते वह मान लेता है कि वे सत्य हैं. भले ही उसने या किसी और ने उस सच को कभी देखापरखा न हो. इस तरह मिथक कथा में पाठक एक पूर्वाग्रह के साथ कहानी को ग्रहण करता है. परिणामस्वरूप वह साहित्य के प्रमुख कर्म; यानी पाठक के विवेकीकरण के लक्ष्य से दूर रह जाती है. अद्भुत कथा में वैसी कोई बाध्यता पाठक के समक्ष नहीं होती. वहां पाठकश्रोता भी लेखककिस्सागो के साथ कल्पना की उड़ान भरने को स्वतंत्र होते हैं. अचरज कथा में पशुपक्षियों, जड़ वस्तुओं को अविश्वसनीय आचरण करते हुए दिखाया जाता है, जिससे पाठक हैरान हो जाते हैं. उदाहरण के लिए पेड़पौधों और पत्थरों का बोलना, पहाड़ों का फिरना, पशुपक्षियों का मनुष्यवत आचरण करना आदि. वह कल्पना की दुनिया है, वास्तविकता से परे. इस कल्पना को साहित्य की गरिमा दिलाता है, साहित्यत्व अथवा वह संदेश जिसे कोई लेखक लोककल्याण की वांछा के साथ अपने पाठक तक पहुंचाना चाहता है. प्रत्येक साहित्यिक रचना के दो हिस्से होते हैं. पहला रचनात्मक पक्ष जो लेखक द्वारा संपन्न किया जाता है. दूसरा उस प्रभाव के रूप में, जो साहित्यिक रचना पाठक के मनमस्तिष्क पर मनोरंजन के सहउत्पाद के रूप में अंकित होकर उसका नवसंस्करण करने का प्रयास करता है. पाठकश्रोता सामान्यतः मनोरंजन की चाहत में कहानी के पास आते हैं. वे भलीभांति जानते हैं कि रचना के सभी पात्र और घटनाक्रम काल्पनिक हैं, उनका वास्तविकता से कोई निकट संबंध नहीं है. अब यह लेखक या किस्सागो पर निर्भर करता है कि पाठकीय मनोरंजन की इच्छा को पूरा करते हुए अपने श्रोतापाठकों को मनोरंजन से अतिरिक्त कुछ अन्य भी दे, जिसके आधार पर उसका साहित्यकर्म सध सके. पाठक और श्रोता को भी उससे मनोरंजन के अतिरिक्त भी कुछ प्राप्त होने की उम्मीद होती है. परियों, पशुपक्षियों, जादूटोने की कहानियां इसी श्रेणी में आती हैं.

यहां समझना होगा कि परीकथा या फेयरी टेल्स दोनों ही आयातित संज्ञाएं हैं; और जिन पंचतंत्र, हितोपदेश आदि की कहानियों के आधार पर पश्चिम के विद्वान भारत को परीकथाओं का आदिदेश होने का गौरव प्रदान करते हैं, स्वयं भारत में उन रचनाओं को ‘परीकथा’ अथवा ‘फेयरी टेल्स’ कहने की हिचक रही है. इसके बजाय भारतीय ‘पंचतंत्र’ और ‘हितोपदेश’ की रचनाओं को ‘नीतिकथा’ अथवा ‘बोधकथा’ कहने में गौरवान्वित होते हैं. ‘पंचतंत्र’ की कहानियों को तो भारतीय विद्वानों का बड़ा वर्ग नीतिकथा ही मानता आया है. पंचतंत्र की तो रचना ही उद्दंड राजकुमारों को सही राह दिखाने के लिए की गई थी. ‘हितोपदेश’ के रूप में ‘पंचतंत्र’ की कहानियों का पुनःलेखन नारायण पंडित ने बंगाल के राजा धवलचंद्र के कहने पर किया था. उनका भी मानना था कि हितोपदेश में संकलित कहानियां बच्चों के लिए विशेष उपयोगी सिद्ध होंगी. हितोपदेश की प्रस्तावना में लिखा है कि इन बालोपयोगी रचनाओं में कथारूप में नीतिरहस्यों को समझाया गया है. जिन दिनों विश्वसमाज स्वतंत्र बालसाहित्य की अवधारणा से दूर था, बालक को बड़ों का लघुसंस्करण मानने की भ्रांति प्रायः हर देश और समाज में थी, उस समय केवल बच्चों को ध्यान में रखकर कथालेखन करना, बड़ा जीवट और दूरदर्शिताभरा कार्य था. भारतीय होने के नाते हम इसपर गर्व कर सकते हैं कि ‘पंचतंत्र’ और ‘हितोपदेश’ दोनों ही के रचनाकारों की दृष्टि बालक पर थी. शायद तभी वे अपने समय की इन क्लासिक कृतियों का प्रणयन कर सके.

अब तक के वर्णन से स्पष्ट है कि अद्भुत कथापात्रों एवं कथानकों को लेकर कहानियां लिखने का समय तो पुरावैदिक काल से ही आरंभ हो चुका था, किंतु उससे पहले वे या तो किसी धर्मग्रंथ का हिस्सा थीं, अथवा किसी महाकाव्य का. उनका उपयोग एक दृष्टांत की भांति होता था. पंचतंत्रकार ने संभवतः पहली बार कहानी की महत्ता को उसी के स्तर पर स्वीकारा था. पहली बार ऐसी कहानियां लिखी गई थीं, जिनमें भरपूर कहानीपन था और संदेश उसके पीछे चुपकेचुपके, प्रच्छन्न रूप में आता था. इसलिए यदि भारत को परीकथाओं का मूलदेश माना जाए तो परीकथाओं के इतिहास को पंचतंत्र से आरंभ करना पड़ेगा. लेकिन भारतीय विद्वान इसके लिए शायद ही राजी होंगे. इसका कारण भी है. महाभारत, पंचतंत्र, कथासरित्सागर, जातक कथाएं आदि जिन ग्रंथों के आधार पर पश्चिमी देश भारत को परीकथाओं का आदिदेश होने का श्रेय देते आए हैं, वे इस देश के संस्कृतिकरण के अनुप्रेरक एवं साक्षी रहे हैं. बहरहाल, इस बारे में कोई राय बनाने से पूर्व उचित होगा कि ‘परी’ और ‘फेयरी’ जैसे शब्दों पर भी विचार कर लिया जाए, जिनपर हमारा विमर्श टिका है.

परीकथाओं का उद्गम

पार्शियन शब्द ‘परी’ और अंग्रेजी शब्द ‘फेयरी’ परस्पर समानार्थी हैं. हम यहां दोनों पर क्रमानुसार चर्चा करेंगे. लेकिन शुरुआत ‘परी’ से करनी होगी. इसलिए कि ‘परी’ से ‘परीकथा’ तक की जो यात्रा है, लगभग वैसी ही यात्रा ‘परी’ से ‘फेयरी’ के बीच भी है. ‘परी’ शब्द ऐतिहासिकसांस्कृतिक संदर्भ लिए हुए है. समय के साथ ‘परी’ के निहितार्थ तथा उसके चरित्रांकन में बदलाव आया है. आरंभिक ग्रंथों में इस शब्द का जो रूप मिलता है, बाद के ग्रंथों में संदर्भ एकदम बदल जाते हैं. दरअसल ‘परी’ शब्द की जड़ें पर्शिया की संस्कृति में इतनी गहरी हैं कि केवल इसी विषय को लेकर स्वतंत्र ग्रंथ की रचना की जा सकती है. किसी साहित्यिक कृति में ‘परी’ शब्द की सबसे पहली दस्तक फिरदौसी के ‘शाहनामा’ में दिखाई पड़ती है. फिरदौसी इस शब्द का न केवल उपयोग करते हैं, बल्कि ‘परी’ को उसके ऐतिहासिक संदर्भों से काटकर नए चरित्र में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं. अपनी मौलिक कल्पना से वह इस कथापात्र के संदर्भ तक बदल देते हैं. फलस्वरूप परी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनता हुआ दिखाई पड़ता है. ‘शाहनामा’ राजाओं के राजा खेमुर(Keyumars) की कहानी है. ग्रंथ के आरंभ में ही पार्शियन ज्ञान की देवी शोरुश(Soursh, जो सरस्वती की समकक्ष है) दुनिया के पहले मनुष्य तथा अहुरमज्द के अनुयायी सम्राट ‘खेमुर’ तथा उसके बेटे के पास परी के रूप में उपस्थित होकर उन्हें असुरसम्राट ‘अहिरमान’ की ओर से सावधान करती है.

संदर्भ को जानने के लिए फारस के सांस्कृतिक इतिहास में झांकना पड़ेगा. प्राचीन पर्शियावासी छोटेछोटे गांवों में रहनेवाले सीधे और मेहनतकश लोग थे. जीवनयापन के लिए वे पशु पालते. आवश्यकता पड़ने पर संगठित होकर शिकार करते थे. उनका दिन अजरबेजान की ऊंचीनीची, घुमावदार पहाडि़यों पर बीतता था. सीधेसाधे लोग दिनभर की थकान के बाद जब एक स्थान पर होते तो आपस में तरहतरह की चर्चाएं करते. धूसर पहाडि़यों से धूप टकराती तो प्राकृतिक वैभव और भी निखर उठता था. पूरा इलाका सूरज की तेज गरमाहट से भरा रहता था. तेज धूप, प्रकाश और वातावरण प्राकृतिक संपदा से समृद्ध हो तो उस पर गर्व स्वाभाविक है. तो पार्शियावासियों को भी अपने देशधरती पर गर्व था. उन्हें विश्वास था कि उनपर परमात्मा की विशेष अनुकंपा है. वे मानते थे कि महान ईश्वर ने उन्हें अच्छे कार्यों के निमित्त पैदा किया है. जबकि पहाड़ के दूसरी ओर उत्तर दिशा में बसे लोगों के बारे में उनकी राय एकदम अलग थी. वे उन्हें मानवीय सभ्यता, सुख और शांति का दुश्मन मानते थे. उनका मानना था कि पहाड़ के दूसरी ओर बसनेवाली जातियां न केवल सभ्यता; बल्कि मानवीय सरोकारों के बारे में भी उनसे भिन्न विचार रखती हैं. उनका पक्ष अन्याय और अनाचार का पक्ष है. पहाड़ की उत्तर दिशा में बसने वाली जातियों का भी पार्शियावासियों के प्रति कुछ ऐसा ही विचार था. परिणामस्वरूप दोनों के बीच सांस्कृतिक श्रेष्ठता को लेकर स्पर्धा की भावना थी, जिससे संघर्ष की स्थितियां बनती ही रहती थीं. पहाड़ पर चरते हुए पशु यदि भूल से भी दूसरी ओर निकल जाते तो इसका दोष उस ओर के कबीले पर थोप दिया जाता था. कालांतर में सांस्कृतिक स्पर्धा और छोटेमोटे संघर्ष स्थायी दुश्मनी का रूप लेने लगे. वैदिक समाज जैसे सुर और असुर में बंटा हुआ था, वैसे पार्शियावासियों को भी लगता था कि उनका देश रोशनी का देश है और यह रोशनी उन्हें देवता अहुरमज्द(संस्कृत में असुरमेधा) से प्राप्त होती है. जहां प्रकाश है वहीं स्वर्ग है. वे स्वयं को महान देवता अहुरमज्द की संतान मानते थे, जिनकी सेवा में अनेक सहायक देवीदेवता और गणप्रतिनिधि हैं.

उनका विश्वास था कि अजरबेजान पर्वतमाला के दूसरी ओर जहां अंधियार की राजधानी है, वहां का सम्राट अहिरमान है. वह दुराचारी और मानवीय सभ्यता का दुश्मन तथा अपनी ही तरह की बुरी ताकतों से घिरा रहता है. पार्शियन संस्कृति में अहिरमान का उल्लेख ‘असुर सम्राट’ के रूप में हुआ है, जो वहां की दैवी संस्कृति के लिए बड़ा खतरा है. उसके अधीन दीव(दैत्य) और परियों की भारी सेना है. परियां दीव की अपेक्षा उदार हैं, किंतु अपनी जादुई ताकत से दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाने का सामथ्र्य रखती हैं. प्रकाश और अंधियार की प्रतीक सत्ताओं के बीच युद्ध होता रहता था. बहरहाल, सांस्कृतिक वर्चस्व के लिए लगातार चलने वाले लंबेलंबे युद्धों के बाद अंततः अंधकार सम्राट की पराजय हुई. अहुरमज्द के नेतृत्व में प्राप्त जीत को शांति और खुशहाली के प्रतीक प्रकाशसम्राट की विजय माना गया. अन्याय पर न्याय की, असत्य पर सत्य की, अंधकार पर प्रकाश की जीत का गुणगान कविगण सदियों से करते आए हैं. पार्शियन इसका आदि उदाहरण अहुरमज्द की अहिरमान पर विजय को मानते थे. अहुरमज्द और अहिरमान यानी अच्छाई और बुराई का युद्ध ही परीकथाओं की आत्मा है. अपने मूल में परीकथाएं अच्छाई और बुराई के संघर्ष के बीच अच्छाई की जीत का भरोसा दिलाती हैं, जिन्हें आगे चलकर कवियों, कहानीकारों और इतिहासकारों ने अपनीअपनी प्रतिभा से संवारा है. परीकथाओं में राक्षस की मौजूदगी इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना यह विश्वास कि उसे परास्त किया जा सकता है. कुछ विद्वान ‘पर्शिया’ से ‘परी’ का उद्गम मानते हैं; यानी वह जो अहुरमज्द की संतान हैं. जिनका रास्ता सचाई और नेकनीयती का है. परीकथाओं में उन्हें जिस प्रकार अच्छाई की समर्थक, नेकनीयत, उदार और जरूरतमंदों की मदद करते हुए दिखाया जाता है, उससे उनका दावा पुष्ट होता है. स्मरण दिला दें कि अंधकार पर प्रकाश की जीत की कामना केवल पार्शिया की संस्कृति की विशेषता नहीं थी. भारत में भी वेदों में ‘तमसो मा ज्योर्तिमय गमय’ की कामना की गई है.

कुछ विद्वान ‘परी’ शब्द की व्युत्पत्ति ईसापूर्व पांचवी शताब्दी में जन्मे पर्शिया सम्राट अर्ताक्सरस की पत्नी ‘परीस्तिस’ से मानते हैं. वे इस शब्द का अनुवाद ‘परीजाद’ यानी ‘परी की संतान’ के रूप में करते हैं. लेकिन ‘अवेस्ता’ तथा अन्य आरंभिक ईरानी धर्मग्रंथों में ‘परी’ को बुरी ताकतों की सहायक, अंधियार की संगिनी आदि दर्शाया गया है. यह माना जाता है कि वे अकाल लाती हैं. पहले महिलाओं और बच्चों पर प्यार लुटाती हैं, फिर जादूगरनी के रूप में उन्हें छल लेती हैं. इसलिए परियों के स्वर्ग में प्रवेश की भी मनाही थी. इस विचार के समर्थकों के अनुसार परियां पहले अहिरमान के ही अधीन थी, जहां ‘दीव(दैत्य) का बोलबाला था. हालांकि ‘दीव’ तथा उस जैसी दूसरी बुरी ताकतों की अपेक्षा ‘परियां’ किंचित उदार स्वभाव वाली हैं. शायद इसीलिए ‘अहिरमान’ की सहायक बुरी ताकतें ‘दीव’ परी को परेशान करती हैं. वे उसे लोहे के पिंजड़े में कैद कर देती हैं. युद्ध में अहिरमान की पराजय तथा दीव के निरंतर उत्पीड़न से तंग आकर परियों का हृदयपरिवर्तन होता है. फलस्वरूप वे वहां से पलायन को विवश हो जाती हैं. बाकी इतिहास में वे अच्छाई का साथ देती हुई नजर आती हैं. फिरदौसी ने लिखा है कि परी खेमुर की सेना में सम्मिलित होकर अहिरमान के विरुद्ध युद्ध में उसकी मदद करती है. बुराई के विरुद्ध संघर्ष में वह अच्छाई की सहायक बनती है. कालांतर में परी को लेकर जनसमाज में जो नएनए किस्से गढ़े गए, उन सभी में परियों के बदले हुए रूप का प्रदर्शन था. ‘शाहनामा’ उनकी शुरुआत है. ‘शाहनामा’ में परी का उल्लेख कम से कम दो अन्य स्थानों पर भी हुआ है. ग्रंथ के ‘रुस्तम और शोहराब’ वाले खंड में घंूघट में रहने वाली रुस्तम की प्रेमिका तहमीना को ‘परी जैसे चेहरेवाली’ वाली बताया गया है. कह सकते हैं कि परी के अद्वितीय सौंदर्यशाली होने का मिथ जो आगे बना, उसकी शुरुआत भी ‘शाहनामा’ से हो चुकी थी. हालांकि वही परीकथाएं अधिक लोकप्रिय हुईं, जिनमें दैहिक सौंदर्य के साथ आंतरिक सौंदर्य और संवेदना पर बराबर जोर दिया गया हो. परीकथाओं की लोकप्रियता में उनकी आंतरिक एवं बाह्यः सुंदरता का बहुत बड़ा योगदान है.

शाहनामा का रचनाकाल 9771010 ईस्वी है. उस समय तक राजशाही पूरी दुनिया पर छा चुकी थी. बड़े साम्राज्य बनने का सिलसिला अर्से से जारी था, लेकिन अस्थायित्व बहुत ज्यादा था. समाज के संसाधनों पर शक्तिशाली सम्राट का अधिकार होता था. हर निर्णय राजा की मर्जी से निकलता और वहीं समाप्त हो जाता था. जनसाधारण शीर्ष पर बैठे लोगों का दबदबा देख मन ही मन उससे खिन्न था. लेकिन दिशाअभाव और आत्मविश्वास की कमी के कारण वह मुक्ति हेतु किसी चमत्कार की आस लगाए रहता था. आस्था से अनुप्रेत उनकी कल्पना मुक्ति के स्वागत हेतु नित नए बंदनवार सजाती थी. अपने मूल में परीकथाएं ऐसे ही असमानताकारी दौर की उपज हैं, जिनमें जनसाधारण का अपने शासकों से विश्वास क्षीण होने लगा था. जनता सामंतवादी अत्याचारों के आगे खुद को बेबस महसूस करती थी. परियां जनभावनाओं में दर्ज असंतोष, अन्याय के प्रतिकार की भावना को प्रतीक के रूप में अभिव्यक्त करती हैं. सत्ता की तमाम ज्यादतियों का विरोध, बुराई और अच्छाई का संघर्ष उनमें है, जिसमें परियों को अच्छाई की मदद करते, फलस्वरूप उसे जीतते हुए दिखाया गया है. कह सकते हैं कि परीकथाएं सामंतवादी अत्याचारों के प्रति जनसाधारण का पहला प्रतीकात्मक विद्रोह था. एक भावुक दार्शनिक, कवि के रूप में परी को नए संदर्भ के साथ बरास्ते ‘शाहनामा’ साहित्य में लाने के लिए फिरदौसी की जितनी भी प्रशंसा की जाए, कम है. हालांकि धर्मग्रंथों और लोकश्रुति में ‘परी’ की आमद कम से कम दो सहस्राब्दी पहले हो चुकी थी.

परी’ शब्द के सजातीय अथवा समानार्थी के रूप में ‘पैरिका’( Pairika, Parikeh) नामक शब्द अवेस्ता के पुराने संस्करणों में शब्द आता है. उसका अर्थᅳ‘राक्षस, बुरी आत्मा, जादूगरनी, चुड़ैल, नाचगानेवाली’ आदि से लिया जाता है. इसके समानार्थी अथवा व्युत्पत्तित अन्य शब्द ‘परियां’(Paris) ‘पर’ (Parr) अथवा ‘पंख’, ‘परिंदा’(Parr) ‘परीरू’ (Pari-Ru) यानी ‘परी समान आंखें’ या ‘परीचेहरा’ (Pari-Chehreh) यानी ‘परी समान चेहरा’, पार्शियन भाषाओं और लोकसंस्कृति में आए हैं. ये सभी शब्द भारत में भी समानरूप से लोकप्रिय हैं. फ्रैड्रिक स्पीगेल ‘परी’ का उद्भव अवेस्ता से मानते हैं. वे अहिरमान की सेना का हिस्सा हैं. उनका काम अहिरमान को उकसाना, उसकी मिथ्या प्रशंसा करना है. ‘अवेस्ता’ में पैरिका अथवा परी को उनके दुराचरण के लिए कम से कम तीन बार दंडित करने का उल्लेख मिलता है. महमूद जाफरी देहाजी परियों की उत्पत्ति के लिए असुर सम्राट अहिरमान को जिम्मेदार ठहराते हैं. उनके अनुसार अहिरमान ने दुनिया पर कब्जे की लालसा से ‘काली ताकतों के योग से अनेक जादूगरनियां पैदा कीं.’ पंख होने के कारण वही परियां कहलाईं. अर्से तक उन्हीं की मदद से वह सम्राट अहुरमज्द से संघर्ष करता रहा. प्राचीन ईरानी ग्रंथों में परियों को सांप, चूहे, नागरानी आदि के रूप में जन्मता हुआ दिखाया गया है. सी. बाथला॓मी के हवाले से ‘पैरिका’ शब्द के मूल की ओर संकेत करते हुए सईदी पुनाय ताब्ताबई ने लिखा है कि Pairika शब्द Pariknaioi से निकला है. बाथला॓मी के अनुसार Pariknaioi पारसी लोगों के निकटवर्ती प्रदेश में रहनेवाले स्थानीय लोग थे, जिन्होंने पारसियों के युद्ध अभियानों में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था. इन जनजातियों ने इरानियों के Parikane नामक शहर, जिसकी अपनी स्थानीयता संद्धिग्ध है, पर अधिकार में पार्शियन की मदद की थी. यदि इस परिकल्पना पर विश्वास कर लिया जाए तो ‘परी’ के बारे में पार्शियन का आरंभिक नकारात्मक सोच उस जनजाति के संपर्क में आने से पहले का, उनका पूर्वाग्रह हो सकता है, जो आत्मव्यामोह की शिकार बड़ी जाति, सभ्यता के स्तर पर पिछड़ी जनजाति से स्वाभाविक रूप से रखती है. बाद में जब Parikane नाम की जनजाति उनकी मदद के लिए आगे आती है, युद्ध में पर्शियावासियों के साथ मिलकर संघर्ष करती है, तो उसके प्रति मैत्रीभाव उमड़ना स्वाभाविक था.

इलिया गारशेविच ने अवेस्ता में वैदिक देवता ‘मित्र’ की स्तुति में आए पदों को ‘दि अवेस्तन हाइम्स टू मित्र’ में संकलित तथा अनूदित किया है. उसके दो मंत्रों के अनुसार देवता ‘मित्र’ को परियों की मदद करते हुए दिखाया गया है. उसके अनुसार मित्र ‘असुरों, दानवों, जादूगरनियों, उत्पातियों तथा वैदिक मंत्रों का सौदा करनेवालों के विरुद्ध संघर्ष में परियों की सहायता करते हैं.’ अवेस्ता के ‘एंदिदाद’ यानी ‘राक्षसों के विरुद्ध विधान’ नामक अध्याय में परियों के विरुद्ध युद्ध का आवाह्न किया गया है, क्योंकि वे ‘पृथ्वी, अग्नि, बैल, जल तथा वनस्पति’ की दुश्मन हैं.’ 1907 में अवेस्ता के कुछ हिस्सों का संस्कृत अनुवाद किया गया, जिसे अर्वद शैरार्जी दादाभाई भरुच ने संपादित किया था. उस अनुवाद में ‘पैरिका’ का अनुवाद ‘महाराक्षसी’ किया गया है. धार्मिक विश्वास हावी होने पर लेखन प्रायः पूर्वाग्रहों का शिकार हो जाता है. जो अपने मत का नहीं, उससे सम्मति की आस नहीं. इसलिए समझौते या संवाद की संभावना कम ही बनती है. यहां जो ‘सुर’ नहीं हैं, वे ‘असुर’ हैं. उनका असुर होना ही उन्हें सुरों का दुश्मन सिद्ध कर देता है. अतः उनसे सावधान रहने की, अवसर मिलते ही मिटा देने की जरूरत हैधर्म को संगठित शक्ति में ढालने की कोशिश में लगे प्राचीन आचार्यों का कुछ ऐसा ही विश्वास रहा है. ‘परी’ का अनुवाद ‘महाराक्षसी’ करने के पीछे उनकी संभवतः ऐसी ही भावना रही होगी. वरना प्राचीन पुराणों में जिन्हें पूर्वाग्रहग्रस्त होकर राक्षसी कहा गया है, को देखते हुए पार्शियन धर्मग्रंथों में परियों को लेकर जिस प्रकार के उल्लेख मिलते हैं, भले ही कुछ स्थानों पर उन्हें अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महाव्याधि, सूखा, अकाल आदि का कारण बताया गया होवे भारतीय धर्मग्रंथों में वर्णित राक्षसियों के मुकाबले बहुत कम आतंकी हैं. अतः ‘पैरिका’ शब्द को ‘महाराक्षसी’ के रूप में अनूदित करना अनुचित है. परियों का सामान्य उल्लेख दूसरे ग्रह, नक्षत्र आदि से आए प्राणी के रूप में होता है. अपने पंखों के बल पर वे कहीं भी आजा सकती हैं. इसी को आधार मानकर ‘पैरिका’ शब्द का अनुवाद ‘दूसरे ग्रह से आई स्त्री’ के रूप में भी किया जाता है. अरबी में ‘पर’ को पंख का पर्याय माना गया है. इसी से पंखयुक्त प्राणी के रूप में परियों की कल्पना की गई है. अवेस्ता में अनेक शब्द संस्कृत से आए हैं. चूंकि भारतीय एवं ईरानी संस्कृति के बीच काफी साम्य है. दोनों के बीच आदानप्रदान का पुराना संबंध भी रहा है, अतएव कुछ विद्वान ‘परी’ शब्द को ‘परकाया’ से भी जोड़ते हैं, जो संस्कृत का शब्द है. जादुई ताकत से संपन्न परियां परकाया प्रवेश में दक्ष होती हैं. वे आसानी से रूप बदल सकती हैं. खुद को तत्क्षण दूसरों के रूपाकार में ढाल सकती है, इसलिए वह परी है. दारा शिकोह ने कुछ भारतीय उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया था. चांद और नाइमी ने उनका संपादन किया है. उन्होंने भारतीय परंपरा में आए ‘यक्ष’ को, यह मानते हुए कि वे किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते, परियों की भांति उड़ सकते हैं, रूप बदल सकते हैंᅳ‘परी’ की श्रेणी में रखा है.

प्राचीन मनुष्य ज्ञान की सामग्री सीधे अपने परिवेश और प्रकृति से प्राप्त करता था. उसकी कल्पनाओं पर उसके नैमत्तिक अनुभवों का खासा योगदान रहता था. प्रकाश, जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु आदि उसके जीवन के सहायक थे. अतः कालांतर में जब प्रकृति की मूल शक्तियों के संरक्षकस्वामी के रूप में देवताओं की कल्पना की गई तो उनका नामकरण भी संबंधित प्राकृतिक शक्ति के नाम पर किया गया. तदनुसार सूर्य, चंद्र, वरुण, अग्नि, मरुत्, इंद्र आदि देवता कल्पित हुए. परी स्वयं एक ‘मिथ’ है. उसकी कल्पना में भी स्थानीय लोगों के प्राकृतिक अनुभवों के प्रभाव की पर्याप्त संभावना है. परीकथाओं में परी को सजासंवरा दिखाया जाता है. वे सामान्यतः श्वेत परिधान धारण करती हैं, बहुत कोमल होती हैं. उनकी ताकत शारीरिक बल में न होकर जादू में होती हैं. वे नाचगा भी सकती हैं. अपने पंखों के बल पर वे तितली की भांति उड़कर कहीं भी आजा सकती हैं. इस प्रेरणा का आधार ईरान, आर्मेनिया, तुर्की, इराक के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जानेवाली एक खूबसूरत तितली भी हो सकती है. ‘हिप्पार्शिया पेरिसतिस’ (Hipparchia parisatis) नाम की उस तितली का धड़ धूसर, रंग चट्टान से मेल खाता हुआ होता हैपंख झक सफेद, सुंदरता की पराकाष्ठा तक पहुंचे हुए. पर्वतों पर भेड़ चराने निकले पर्शियावासी इस तितली के अविकल सौंदर्य से प्रभावित थे. इसकी भी पर्याप्त संभावना है कि कालांतर में परी का जो रूपक बना अथवा धर्मग्रंथों से बाहर लाकर उसके उदार और कोमल रूपाकार की जैसी कल्पना की गई, उसके पीछे ‘हिप्पार्शिया पेरिसतिस’ नामक तितली के अविकल सौंदर्य की कुछ न कुछ प्रेरणा अवश्य रही होगी.

परीकथाओं का जन्मदाता होने का दावा अरब देश भी करते हैं. अच्छी और बुरी ताकत के रूप में पार्शियन सभ्यता में यदि ‘परी’ और ‘दैत्य’ लोकप्रचलित हैं तो अरब देशों में इन प्रकल्पित जीवों को क्रमशः ‘फरिश्ता’ और ‘जिन्न’ कहने की परंपरा है. अरब परीकथा साहित्य में जिनिस्थान का उल्लेख आता है. वह परियों तथा उनके सहायक ‘जिन’ अथवा ‘जिन्न’ यानी फरिश्तों का ठिकाना है. उनके अनुसार जिनिस्थान पृथ्वी से करीब 3200 किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष में अवस्थित है. उनका साम्राज्य छोटेछोटे अनेक राज्यों में बंटा हुआ है. उनके शहर सुंदर, आलीशान तथा बस्तियां सुखीसंपन्न और सजीसंवरी हैं. वहां खुशियों का ठिकाना है. जिनिस्थान की राजधानी जुहेरबाद(आभूषणों की नगरी) है. वहां शहद की नदियां हैं और हिल्लोर लेती खुशियां. जिन्न के अलावा ‘दीव’ भी परियों के समकक्ष अरबियन ‘मिथ’ है. एक मिथ के रूप में उसकी कल्पना अनेक धर्मग्रंथों एवं लोकश्रुति में प्राप्त होती है. कुछ स्थानों पर दोनों को एकदूसरे के पर्याय के रूप में प्रस्तुत किया गया है. ‘दीव’ को हम भूत अथवा प्रेत के समकक्ष भी मान सकते हैं. अरबी परंपरा के अनुसार दीव और परियों के बीच निरंतर युद्ध होता रहता है.

कुछ कहानियों में जिन्नों को बुरी आदतों के प्रतीक तथा मनुष्यता के दुश्मन के रूप में चित्रित किया गया है. अरबवासी मानते हैं कि किसी समय जिन्नों पर महान बादशाह सुलेमान का शासन था. उनकी बुरी आदत से तंग आकर परियों की मदद से प्रतापी सुलेमान ने उन्हें कैद कर लिया था. बाद में जिन्नों के दयायाचना करने तथा मदद का भरोसा दिलाने पर उनमें से उदार प्रवृत्ति के जिन्नों को आजाद कर दिया गया. परियों और ‘जिन्न’ के बीच संघर्ष का जिक्र लोकश्रुति में भी आता है. उसके अनुसार परियों ने जिन्नों को परास्त करने के बाद उन्हें वृक्षों पर टंगवा दिया था. इस मान्यता के अनुसार दुष्ट किस्म के जिन्न आज भी पिंजरे में बंद हैं. उन्हें दुर्गंध भाती है. खुशबू से वे दूर भागते हैं. एक मान्यता यह भी है कि सभी जिन्न बुरे नहीं होते. अच्छे और उदार प्रवृत्ति वाले जिन्नों को इस्लाम में ‘पिरी’(तुर्की में ‘परी’ या ‘पेरी’) कहा गया है. एक जगह परियों को ‘जिन्न’ के समान बताया गया है. ‘बिस्मिल्लाह’(अल्लाह के नाम पर) नामक अरब की एक प्रसिद्ध लोककथा है. उसमें बताया गया है कि जरथ्रुस्त द्वारा अवेस्ता का मंत्र उच्चारित करने से ‘पैरिका’ भाग जाती हैं. इस मान्यता में परी का प्राचीनतम चुड़ैल या जादूगरनी वाला रूप जिसे इस्लाम में ‘जिन्न’ कहा गया है, साफ नजर आता है. कुछ इस्लामी लोककथाओं में परियों को जादूगरनी और चुड़ैल बताया गया है. अरब में हातिमताई का किस्सा बहुत लोकप्रिय है. कहानी में जिस प्रकार चमत्कारों का सिलसिला है, उसके आधार पर यह एक लंबी और रोचक परीकथा है. इसके अलावा सिंदबाज जिहाजी, अरेबियन नाइट्स आदि ग्रंथ मोहक परीकथाओं से भरे पड़े हैं. आशय यही है कि परियों की लोकप्रियता को देखते हुए चतुर किस्सागो उनका उपयोग अपने रचनात्मक कौशल और लोकरुचि को देखते हुए, स्वतंत्रतापूर्वक करते रहे हैं.

प्रश्न उठता है कि ‘परी’ के मूल स्थान से लेकर पार्शियन और अरबवासियों में स्पद्र्धा हो तो उसकी प्रथम कल्पना का श्रेय किसे दिया जाए? लोकरुचि के अनुसार दोनों ही संस्कृतियों में परियों की एकसमान उपस्थिति है. लोककथाओं में भी लगभग बराबर का दखल है. दोनों ही जगह उन्हें अच्छाई और बुराई के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है. इसके बावजूद ध्यानपूर्वक देखा जाए तो परीकथाओं के मूलदेश की दावेदारी को लेकर बाजी पार्शियन के हाथ ही लगेगी. उनकी संस्कृति अरब संस्कृति से ज्यादा पुरानी है. था॓मस कीटले के अनुसार अरबवासियों की परीकथा संबंधी विचारधारा, उनपर सुदूर यहूदियों तथा पर्शियावासियों के तत्संबंधी विचारों के सम्मिलित प्रभाव से बनी थी, जिसे उन्होंने अपनी प्रतिभा और लगन के माध्यम से स्वतंत्र और मौलिक शैली का रूप दिया. कह सकते हैं कि परीकथाएं पहलेपहले पर्शियावासियों की कल्पना में उतरी थीं. चूंकि यह कल्पना अत्यंत चित्ताकर्षक, रुचिपूर्ण और मनोरंजक थी, इसलिए ईरान से जिनजिन देशों में वे कहानियां गईं, वहां लोगों ने अपनी रुचि एवं परिस्थितियों के अनुसार परियों को गढ़ा. यह भी संभव है कि आरंभ में ये सब कहानियां लोकसाहित्य का हिस्सा रही हों तथा कालांतर में परी नामक पात्र की उपस्थिति के आधार पर दूसरों से अलग, ‘परीकथा’ कही जाने लगी हो. फिर जब लगा कि एक सम्मोहक कल्पना से परे परी का कोई अस्तित्व नहीं है, और जिस अद्भुतरस की उत्पत्ति कहानी में परियों की उपस्थिति से संभव होती है, वैसी ही उत्पत्ति पशुपक्षियों के मानवीकरण द्वारा भी संभव है तो, भारत, यूनान, रोम आदि देशों में अर्से से लिखी जा रही पशुपक्षी कथाओं को भी परीकथाओं की श्रेणी में सम्मिलित कर लिया गया. इसके बावजूद ‘परी’ के उद्गम की खोज का सिलसिला यहीं नहीं थमता. दरअसल, भारत के साथसाथ दूसरी प्राचीनतम संस्कृतियों में भी परीकथाएं मौजूद हैं. उनको लेकर लोकसाहित्य रचा जाता रहा है. वह श्रुति के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक अंतरित होता रहा है. यूनान की संस्कृति पर्शिया की संस्कृति जितनी ही पुरानी है. कुछ मामलों में उससे भी विकसित. ‘परी’ और ‘परीकथा’ को लेकर यूनानी लोगों का क्या सोचना था? क्या वहां भी परीकथाएं पढ़ीसुनी जाती हैं? यदि हां तो उनका स्वरूप कैसा है? अंतिम धारणा बनाने से पूर्व इन प्रश्नों पर विमर्श भी आवश्यक है.

यूनानी संस्कृति में ‘परी’ के पर्याय अथवा उनके समकक्ष ‘निंफ’ आती हैं. ग्रीक धर्मशास्त्र के अनुसार वे देवताओं के सम्राट जीयस की बेटियां हैं. वे पहाड़ों में जहां झरने फूटते हैं, घने जंगलों में तथा घाटियों में जहां प्राकृतिक वैभव बिखरा पड़ा होरहना पसंद करती हैं. निंफ के ठिकाने के अनुसार उन्हें पांच श्रेणियों में बांटा जा सकता हैआकाशचारी निंफ, जो पक्षियों की भांति विचरण करती रहती हैं. वृक्षों, लताओं पर घने जंगल में रहने वाली निंफ. फूलों की घाटियों में विचरण करने वाली निंफ. समुद्री वनस्पतियों के बीच जल में बसने वाली निंफ तथा अंडरवर्ल्ड निंफ, जो केवल अपने काम से काम रखती हैं. निंफ को ईश्वरीय प्रतिनिधि माना जाता है. परियों की भांति निंफ भी नृत्यगायन, संगीतादि में निपुण होती हैं. विशेषकर युवा निंफ नाच, गाना और जादू दिखाना पसंद करती हैं. लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि उन्हें उसकी आजादी हो. वे जरामरण से मुक्त हो सकती हैं. परियों की भांति ‘निंफ’ भी रूप बदलने की कला में निपुण होती हैं. वे अच्छी यानी मनुष्यता की हितरक्षक हो सकती हैं तथा बुरी भी. उन्हें अच्छाई से बुराई अथवा बुराई से अच्छाई की ओर प्रयाण करते हुए भी देखा जा सकता है. जल में बसने वाली निंफ को जलीय दैत्य कहकर उसकी पूजा भी की जाती है. वे वनवनस्पतियों की संरक्षक तथा पृथ्वी की उर्वराशक्ति की स्वामी कही जाती है. दयालु निंफ किसानों की मददगार बनकर उनकी उपज को बढ़ाती हैं. ‘ओडिसी’ में निंफ का उल्लेख ऐसी स्त्री के रूप में हुआ है, जिसका हाल में विवाह हुआ हो. ग्रीक परंपरा में ही ‘केरीबडिस’ तथा उसका प्रतिद्विंद्वी ‘साइला’ पहली ‘निंफ थीं, जो आगे चलकर राक्षस के रूप में अंतरित हुईं. ग्रीक धर्मशास्त्रों में निंफ को सामान्यतः परियों के समानार्थी के रूप में लिया जाता है, तथापि दोनों के बीच काफी अंतर है. परियां सामान्यतः देवदूत या राक्षस की संतति हैं. पंखों की मदद से उड़कर वे कहीं भी आजा सकती हैं. उनके विचार खतरनाक हो सकते हैं. इसके बावजूद वे राक्षस की अपेक्षा काफी उदार होती हैं. आवश्यकता पड़ने पर मनुष्य की भरोसेमंद मददगार भी सिद्ध होती हैं. उत्तरी यूरोप के तथा आइरिश देशों के लोकसाहित्य और धर्मग्रंथों में परियों का जमकर उल्लेख हुआ है. कुछ विद्वानों के अनुसार निंफ तत्वविशेष से बनी होती हैं. जैसे पानी से बनी जलीय निंफ, प्रस्तर निंफ आदि.

प्राचीन ग्रीक परंपरा में ‘पैरिका’ अथवा ‘परी’ नहीं आता. लेकिन प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी अलोइस वाल्ड तथा जूलिस पोकोर्नी ‘पैरिका’ शब्द को ग्रीक शब्द ‘पैलेकिस’(Pallakis) अथवा ‘पैलेक्स’(Pallax) से जोड़ते हैं, जिनका अर्थ हैᅳ‘कुंवारी’ अथवा ‘युवती’ से है. पैरिका को ग्रीक शब्द ‘पेलास’ (Pallas) से भी जोड़ा जाता है, जो यूनान की ज्ञान की देवी एथेना का उपनाम है. ‘दि फाउंडेशन आ॓फ दि ईरानियन रिलीजन्स’ में लुइस हर्बट ग्रे ने पैरिका को ‘चारों ओर चक्कर काटकर लुभानेवाली’, ‘नाचनेगाने वाली जादूगरनी’ बताया है. संस्कृत में इस क्रिया को अभिसार कहा गया है. अप्सराएं इस कार्य में दक्ष मानी गई हैं. ‘निंफ’ का अभिप्राय कुंवारी युवतियों से भी लिया जाता है. जिस प्रकार अप्सराएं देवताओं के सान्निध्य में रहती हैं, ‘निंफ’ पैगंबर की सेवा करती हैं. यह शायद उस समय की परिकल्पना है जब वीर पुरुष द्वारा एकाधिक पत्नियां या उपपत्नियां रखना सम्मान की बात थी. अप्सराएं देवताओं का मनोरंजन करती थीं. निंफ की परिकल्पना भी उनसे मिलतीजुलती है. ग्रीक साहित्य में ‘निंफ’ हालांकि पुरानी संज्ञा है. लेकिन इसकी खूबी है कि आधुनिक समाज में भी निंफ की लोकप्रियता पूर्ववत कायम है. यह थियोडोर पी. जाइनाकुलिश द्वारा ‘फेयरी टेल्स आ॓फ मा॓डर्न ग्रीक’ के आरंभ में उठाए गए प्रश्न से स्पष्ट हो जाती है. पुस्तक के आरंभ में ही वे प्रश्न करते हैंᅳ‘क्या ग्रीक धर्मशास्त्रों का कोई अंश आज भी बचा हुआ है?’ अगले ही चरण में वे स्वयं इसका उत्तर सुना देते हैंᅳ‘बिलकुल है, और वह हैंनिंफ.’ वे आगे लिखते हैं कि ग्रीस के मैदानों, समुद्रों, पहाड़ों, नदियों और झरनों के बीच ईश्वर का जन्म हुआ था. वहीं उसका ठिकाना बना था. अब वहां परियां नांचतीगाती, खेलतीकूदती और हर प्रकार की खुशियां बिखेरती हैं. उनके अनुसार ‘परियां कुछ और नहीं, ग्रीक धर्मशास्त्रों में आए ड्रायड(वृक्षों पर रहनेवाली निंफ), नेआड, ओरीड, नेयाड्स(पर्वतशिखर पर रहनेवाली निंफ) आदि हैं. ये निंफ के ही उपनाम हैं. थियोडोर गायनाकुलिश के अनुसार यूनानी सभ्यता में परी की अवधारणा प्रकृति पूजा से जुड़ी है. स्थानीय प्रकृति में अंतर्निहित सौंदर्य ही यूनानी परीकथाओं में मौजूद सौंदर्यतत्व का आधार था. नदियों, महासागरों, सीपियों और मूंगों से भरे टापुओं और चांदी की खानों में रहनेवाले यूनानवासियों के लिए निंफ, नेआड, ड्रायड, ओरीड जैसी कल्पनाएं असंभव न थीं. कालांतर में पुराकथाओं के समान परीकथाएं भी मनोरंजन के वृहद उद्देश्य को साधने के साथसाथ, महानायकों की छविनिर्माण तथा उन्हें सहेजने में भी सहायक सिद्ध हुईं.

दरअसल अठारहवीं शताब्दी के बाद परीकथाओं की बढ़ती लोकप्रियता देख परंपरागत मिथकों को परियों की तरह पेश करने का चलन बढ़ा था, जिनमें परियों को नायक और खलनायक दोनों रूपों में पेश किया जाता था. किंतु समय बदल रहा था. साहित्य के स्वार्थानुकूल प्रयोग, उससे व्यापारिक और राजनीतिक हित साधने की प्रवृत्ति जोर पकड़ चुकी थी. औपनिवेशीकरण को गति देने के लिए अंगे्रज, जिनमें फ्रांसिसी, पुर्तगाली, डच आदि यूरोपीय देशों के व्यापारी भी सम्मिलित थे, नए बाजारों की खोज में अलगअलग देशों की ओर बढ़ चुके थे. लेकिन एशियाई, अफ्रीकी देशों में जहां उनके लिए पर्याप्त संभावनाएं थीभिन्न प्रजातियां निवास करती थीं. वहां नए लोगों के दिलों में जगह बनाने के लिए जरूरी था कि गोरी चमड़ी वाले अंगे्रज स्वयं को उदार, श्रेष्ठ, परोपकारी एवं न्यायप्रिय शासक के रूप में प्रस्तुत करें. संभवतः इसलिए गोरे रंगवाली सौंदर्यमूर्ति परियों के चरित्र में बदलाव का सिलसिला आरंभ हुआ. उससे पहले बुरे या अच्छे; अथवा अच्छे और बुरे दोनों रूप में परियों का चित्रण होता था. बाद में नकारात्मक चरित्र वाली परियों का उल्लेख घटने लगा. फलस्वरूप साहित्य में उदार, सहिष्णु, दयावान, मददगार एवं न्यायप्रिय परीकथाओं की संख्या बढ़ने लगी. जो काम बुरी परियां करा करती थीं, वह काले चमड़ी वाले जिन्न, राक्षस, असुर, दैत्यादि के नाम से कल्पित किया जाने लगा, ताकि गोरी चमड़ी का प्रतिनिधित्व करनेवाले अंगे्रज उन कहानियों के माध्यम से अपनी उदार एवं कानून के समर्थक शासक की छवि बना सकें. साथ में रंगभेदी, साम्राज्यवादी मंसूबों को छिपाते हुए ऐसी परियों की परिकल्पना भी की गई जो न केवल उदार और मददगार हों, बल्कि अपने आचरण से लोकतांत्रिक प्रतीत हों. जो ‘राजामहाराजा, साहूकारव्यापारी से लेकर मछुआरे, शिकारी, गड़ेरिया जैसे साधारण लोगों के साथ भी खेलखा सकें. उनके सौंदर्य को लेकर भी किस्से गढ़े जाने लगे, ताकि बड़ेबड़े खेतों में कार्यरत मजूदर, जिनकी संख्या औपनिवेशीकरण के साथ तेजी से बढ़ रही थी, उनके सहारे अपना मन बहला सकें. संभव है इसका उल्टा भी हुआ हो. अर्थात औद्योगिकीकरण की मार से अपने ठिकानों से उखड़े, घरपरिवार से दूर श्रमिकसर्वहाराओं ने, अपनी दमित यौनाकांक्षाओं की पूर्ति हेतु अनुपम सौंदर्य की स्वामिनी तथा चामत्कारिक शक्तियों से संपन्न परियों की कहानियों को, चमत्कार की आस में सहज ही अपना लिया हो. यह रोमांटिसिज्म की नई धारा थी, जो राजमहलों और अपने चिरपरिचित अभिजात ठिकानों को छोड़कर खेतों, खलिहानों से लेकर मजदूरठिकानों की ओर प्रयाण कर रही थी. उससे पहले परीकथाओं के चरित्र मुख्यतः रानी, राजकुमार, महान योद्धा, चामत्कारिक शक्तियों से युक्त व्यक्ति हुआ करते थे. बदले परिवेश में परीकथाओं में किसान, मजदूर, नौकरानी जैसे पात्रों की संख्या बढ़ने लगी.

यूनान का इतिहास रणबांकुरे योद्धाओं का इतिहास भी है. वहां की संस्कृति में युद्ध निरंतर चलनेवाली घटना है. इसका प्रभाव वहां के साहित्य, जिसमें परीकथाएं भी सम्मिलित हैंपर, व्यापक रूप से पड़ा है. तदनुसार चर्चित यूनानी परीकथाओं पर वहां की योद्धासंस्कृति का प्रभाव साफ तौर पर नजर आता है. वहां ऐसे मिथकीय चरित्र गढे़ गए जो वीर और दुस्साहसी थे. राष्ट्रराज्य की आन के लिए प्राणों पर खेल जाना जिनका शौक था. ‘परसियस’, ‘आरगोना॓ट्स’, ‘थीसियस’, ‘का॓डमस, ‘हेराक्लीस’ यूनान के आरंभिक योद्धाओं के नाम हैं. ये सब ऐतिहासिक चरित्र थे, लेकिन बाद में जब वे लोककथाओं और किंवदंतियों का हिस्सा बने तो उनकी वीरता, रूपाकार आदि को लेकर तरहतरह के प्रयोग किए जाने लगे. उनके साथ कुछ ऐसे प्रसंग भी जोड़ दिए गए जिनका उनके जीवन से कोई संबंध न था. पुराकथाओं पर विश्वास करने तथा मिथकों के सहारे फैसला लेने वाले समाजों में यह अनहोनी घटना न थी. परिणामस्वरूप इतिहास के लोकप्रिय महानायक चलतेफिरते इंसान के बजाय मिथकीय पात्र में बदलने लगे. उनका बदला हुआ रूप मानवीय सीमाओं का अतिक्रमण करता था. इतिहास से अधिक वह पुराकथाओं एवं परीकथाओं के करीब था. बावजूद इसके यूनानी, भारतीय, मिस्री, पार्शियन आदि प्राचीन सभ्यताओं वाले समाज बिना यह जाने की उन गाथाओं में कितना सच है और कितना गल्प, उन्हें अपने गौरवशाली अतीत के निर्माताओं के रूप में याद करते हैं.

बहरहाल, यूनानी लोक विश्वास के अनुसार परियां साधारण इंसान से ऊपर होती हैं. उनपर प्रकृति के नियम वैसे लागू नहीं होते जैसे साधारण मनुष्यों पर होते हैं. बावजूद इसके वे न तो देवियां हैं न ही उनके पास असीमित शक्तियां होती हैं. उनका धैर्यपूर्वक सामना किया जा सकता है तथा आग और बंदूक से डराकर भगाया भी जा सकता है. वे खुशबुओं के थैले से घबराती हैं, अतः ऐसे व्यक्ति से वे दूर ही रहती हैं, जो खुशबुओं को अपने साथ रखता है. हालांकि बहुत से यूनानवासियों का मानना है कि परियों की नाक होती ही नहीं है. उनकी शक्तियां उनके कपड़ों, रूमाल, दुपट्टा आदि में सीमित होती हैं, यदि कोई मनुष्य उसकी निजी वस्तुओं पर कब्जा कर ले तो परियों को आसानी से बंदी बनाया जा जा सकता है. निंफ अथवा परियों को लेकर ये धारणाएं विरोधाभासी लग सकती हैं. लेकिन हमें याद रखना होगा कि ये धारणाएं अलगअलग समय में भिन्नभिन्न लोगों द्वारा गढ़ी गई हैं. इनमें से अनेक लोककथाओं की देन हैं, जो समाज के बीच रहकर लोकविश्वास या मनोरंजन की चाहत में अनाम लोगों द्वारा गढ़ी जाती रही हैं तथा लोकश्रुति के सहारे लंबी यात्रा के उपरांत समाज में स्थायी रूप ले चुकी हैं. बहरहाल, भौगोलिक परिवर्तन के साथ परियों के नाम और चरित्रादि में बदलाव आया था. हर संस्कृति ने उन्हें अपनी रुचि के अनुसार गढ़ा था. मगर अनेकानेक परिवर्तनों, मनमानी कल्पनाओं एवं प्रयोगों के बावजूद परीकथाओं का मूल चरित्र अर्थात अच्छाई और बुराई के संघर्ष में अच्छाई के समर्थन में उतरना, ज्यों का त्यों बना रहा. अपने इसी गुण के कारण परीकथाओं को चहुंदिश प्रशंसा मिली. जिनजिन देशों में वे गईं वहां के लोगों ने उन्हें खुलकर अपनाया. अपनी तरह से तराशा और जितना जरूरी लगा, उतना परिवर्तन भी किया.

स्थान परिवर्तन के बाद पार्शियन ‘परी’ या ‘पैरिका’ यूरोप पहुंचकर ‘फेयरी’ बन जाती है. भाषाशास्त्र की दृष्टि से ‘फेयरी’ शब्द की भिन्न व्याख्याएं संभव हैं. उसपर हम यथास्थान चर्चा करेंगे. यहां इतना उल्लेख पर्याप्त होगा कि यूरोपीय साहित्य में ‘परी’ शब्द भी यत्रतत्र मौजूद है. नवजागरण के दौर के यूरोपीय साहित्य में ‘परी’ शब्द हमें विलियम था॓मस वेकफोर्ड द्वारा फ्रांसिसी भाषा में लिखे उपन्यास ‘खलीफा वाथिक’ या ‘वाथिक(1782)’ में मिलता है. यह पार्शियन चरित्र को लेकर यूरोपीय भाषा में लिखा गया अत्यंत रोचक उपन्यास है. था॓मस मूर की ख्याति समाजवादी चिंतक के रूप में है. उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘लालारूख’ में लंबी बहुप्रसिद्ध कविता का शीर्षक हैᅳ‘पेरेडाइज और परी’(1817). कविता में एक परी निरंतर तीन प्रयासों के उपरांत अंततः स्वर्ग में प्रवेश करने में सफल हो जाती है. इस कविता का विश्व की अनेक भाषाओं में रूपांतर हुआ है. उनीसवीं शताब्दी में परीकथाओं की लोकप्रियता तथा उनकी चामत्कारिक किस्सागोई को आधार बनाकर, गिल्बर्ट और सलीवन ने एक संगीतनाटिका लिखी थी, शीर्षक रखा थाᅳ‘लोलांथे: अमीर और परी’ (Lolanthe, The Peer and the Peri, 1882). इस व्यंग्यात्मक नाटिका के माध्यम से गिल्बर्ट ने नौकरशाही पर कटाक्ष किया था. इसके अलावा रूस, चीन, स्पेन, डेनमार्क, रोमानिया, जर्मन, अफ्रीका आदि देशों में भी ‘परी’ और परीकथाएं भिन्न नामों के साथ उपस्थित हैं. वहां उनका नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही प्रकार का चित्रण मिलता है. भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार परियों के कल्पित पहनावे और चरित्रचित्रण में थोड़ाबहुत अंतर भले हो, लेकिन उनमें लोकतत्व की मात्रा सभी देशों में प्रायः एक जैसी है. कारण स्पष्ट है. विश्वसभ्यताओं के सम्मिलन के दौरान ये कहानियां देशदेशांतर तक पहुंची और लोगों ने उनके कथानक में अपनी रुचि और परिस्थितियों के अनुसार मनचाहे बदलाव किए. लेकिन परियों का उदार, मानवीय चरित्र समाज को इतना भाया कि उसमें बदलाव की संभावना ही खत्म हो गई. बाद में गढ़ी जानेवाली परीकथाओं में उनके चरित्र का खूब उदात्तीकरण हुआ. फलस्वरूप उन्हें बालसाहित्य का अभिन्न हिस्सा मान लिया गया.

© ओमप्रकाश कश्यप

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