धर्म और नैतिकता

धर्म और अभिजन संस्कृति-17

धर्म द्वारा नैतिकता को कब्जा लेना, आधुनिक दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी है.1

आर्थर सी. क्लार्क

धर्म और समाज का संबंध बहुत गहरा है. साथ में पुराना भी. गहरा इतना कि कुछ लोग धर्म और समाज को परस्पर पूरक और पर्याय मान लेते हैं. इतना पुराना भी कि आस्थाप्रवण लोगों के लिए धर्म का उद्भव और समाजीकरण की शुरुआत, दोनों सहोदर घटनाएं हैं. उनकी मानें तो मनुष्य धर्म को धारण नहीं करता, बल्कि सर्वशक्तिमान की दैवी शक्तियों से युक्त धर्म स्वयं इस चराचर जगत को अपने भीतर समाए रहता है. वही इसे चलाता है. दुनिया धर्म पर टिकी हैऐसा वे दावा करते हैं. यह अलग है कि इस दावे के समर्थन में उनके तर्क आस्था की सीमाएं लांघ नहीं पाते. उनकी निगाह में धर्म और ईश्वर में आस्था विवेकशीलता का लक्षण है. विश्वास से बड़ा न तो कोई तर्क है न ही बोध.2 लेकिन यही विचारणा प्रगतिगामी बुद्धिजीवियों और विचारकों की निगाह में उनके पक्ष को कमजोर सिद्ध करती है. इसी के साथ अनेक सवाल भी खड़े हो जाते हैं. मसलन दुनिया जब धर्म पर टिकी है, वही इसे चलाता है तो संसार में घोर असमानता, रोग, शोक, जरामृत्यु, भूखअकाल जैसी घटनाएं क्यों हैं? यदि धर्म ही सबकुछ है तो मनुष्य के विवेक की भूमिका क्या होगी? उसका क्या औचित्य रह जाएगा? धर्म ईश्वर में है या ईश्वर ही धर्म है तो जो लोग धर्म को नहीं मानते उनका क्या? ये पुराने, मगर बेहद महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं. इसलिए जब से धर्म की अवधारणा का विकास हुआ, किसी न किसी रूप में तभी से उठाए जाते रहे हैं. धर्म के प्रति अंधानुरागी लोग इन प्रश्नों का तार्किक उत्तर दे नहीं पाते. उत्तर खोजने की वे कोशिश भी नहीं करते. विवेकीकरण की ओर जाने के बजाय वे अपनी मान्यताओं को आस्था और विश्वास के नाम पर थोपने की कोशिश बारबार करते हैं. बंद समाजों, ऐसे समाजों में जहां मनुष्य आज भी कबीलाई संस्कारों के प्रभाव में जीता है, वे कामयाब भी होते हैं.

ऐसे समाज यथार्थ से हमेशा कन्नी काटते रहते हैं. समस्या आ पड़े तो उसके निदान हेतु बारबार अतीत की शरण लेना. अंधेरे में समाधान खोजना और किसी चमत्कार की उम्मीद करना उनका स्वभाव होता है. आस्थावादी तर्कों के बीच जीने वाले समाज वास्तविकता का सामना करने से कतराते हैं. अतएव फंतासी में जीना उनका स्वभाव बन जाता है. ऐसे समाज आस्था और विश्वास के नाम पर अपनी चेतना में, काल्पनिक शक्तियों का ऐसा आभामंडल गढ़ लेते हैं कि जीवन की वास्तविक समस्याओं तथा उनके कारणों की पड़ताल संभव ही नहीं हो पाती. इस बीच यथार्थ से उसका संबंध कटसा जाता है. ऐसा समाज अपने सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में हमेशा चूक करता रहता है. चाहेअनचाहे वह ऐसे लक्ष्य की ओर अग्रसर रहता है, जो उसकी यथार्थ संबंधी परख को धुंधला कर देते हैं. नतीजा यह होता है कि समस्याओं के प्रति उसकी समझ भौंथरी पड़ जाती है. वह पूर्वाग्रहों से आगे बढ़कर फैसले कर ही नहीं पाता है. इस बीच धर्म अपनी भूमिका लगातार बढ़ाता रहता है. नागरिक जीवन में उसका हस्तक्षेप निरंतर बढ़ता जाता है. अपने अनुयायियों को वह दिशाहीन स्पर्धा की ओर ढकेल देता है, जिसमें प्रत्येक प्रतिभागी अकेला होता है तथा लक्ष्य काल्पनिक और रास्ता अनजाना होता है. बावजूद इसके अनिष्ट की संभावना उसे धर्म की शरण में बने रहने के लिए बाध्य करती है. तो धर्म क्या केवल भय की उत्पत्ति है? इसका उत्तर ‘हां’ में कहा जाएगा. धर्म न केवल भय की उत्पत्ति होता है, बल्कि भय को बढ़ाता भी है. कुछ लोग चमत्कारों के कारण देवीदेवताओं में श्रद्धा रखते हैं. फिर भी असली कारण भय होता है. अयाचित का भय मनुष्य को अदृश्य शक्तियों की अनुकंपा प्राप्त करने हेतु प्रेरित करता रहता है.

धर्म खुद को समाजीकरण की अनिवार्यता के रूप में पेश करता है. असल में वह न तो समाजीकरण की अनिवार्यता है न ही उसका पर्याय. तथापि उसकी समाजीकरण में सहायक एवं उत्प्रेरक वाली भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता. उन दिनों जब मनुष्य विवेकीकरण की आरंभिक अवस्था में था, छोटेछोटे कबीले परस्पर संघर्षरत रहते थे—तब सामाजिक फैलाव, एकता और अनुशासन के लिए लिए धर्म की मदद ली गई. अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय, करुणा, परोपकार जैसे नैतिक मूल्यों को उससे जोड़ा गया. चूंकि मनुष्य प्रकृति के वरदान और कोप दोनों से परिचित था, इसलिए सर्वप्रथम उसने प्राकृतिक उपादानों को खुश रखने के लिए उन्हें अपने आस्थाक्षेत्र में जगह दी. सबसे पहला धर्म प्रकृति, मनुष्य के आसपास के जीवजंतु बने. उन दिनों जानवर मनुष्य के सहायक थे और दुश्मन भी. इसलिए किस जानवर से प्रेम करना है, किसकी ओर से सावधान रहना है—उनके प्रति उसी प्रकार का व्यवहार आरंभिक धर्म माना गया. चाहें तो हम उसे धर्म का स्थूल संस्करण भी मान सकते हैं, परंतु सचाई यही है. इस तरह जानवरों को मनुष्य के आस्थाकेंद्र में प्रवेश का गौरव मिला. यह तथ्य पुरापाषाणकाल की उन चित्रमालाओं से सिद्ध होता है, जो भारत के अलावा फ्रांस, स्पेन आदि देशों में प्राप्त भित्तिचित्रें से सिद्ध हो जाती है. भारत में मध्यप्रदेश के रायसीना जिले के भीमबेटका की पहाडि़यों के बीच मिली चित्रमालाओं से भी प्राचीन मनुष्य की सामाजिक चेतना को समझा जा सकता है. इन चित्रमालाओं में से कुछ 30,000 वर्ष से अधिक पुरानी हैं. उनमें चीता, गैंडा, जंगली भैंसा आदि के चित्र मिले हैं. कुछ चित्रें में सामूहिक नृत्य का चित्रण किया गया है, जो तत्कालीन मनुष्य की सामाजिक चेतना को दर्शाता है. इसी प्रकार की चित्रमालाएं स्पेन और फ्रांस से भी प्राप्त हुई हैं. उनसे तत्कालीन मनुष्य की परिवेश चेतना, सामाजिक चेतना का बोध होता है. चित्रमालाओं में देवीदेवता का कोई उल्लेख न होना दर्शाता है कि धार्मिक भावनाओं का उदय, सामाजिक चेतना के बहुत बाद की घटना है.

धर्म को मिली लोकप्रियता के पीछे सरलीकरण का सिद्धांत भी था. मनुष्य स्वभावतः आलसी होता है. उसकी सामान्य प्रवृत्ति होती है कि वह न्यूनतम श्रम द्वारा अधिकतम प्रसन्नता अर्जित कर सके. बिना किसी परिश्रम के प्राप्त होने वाली खुशी उसको प्रिय होती है. मानवस्वभाव के हिस्से के रूप में यह प्रवृत्ति खूब फलीफूली. जो धार्मिक शक्तियां थीं, विशेषकर पुरोहित ने दानप्रथा का जो उससे सर्वाधिक लाभान्वित था, खूब महिमा मंडन किया. वैसे भी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए दार्शनिकों और वैज्ञानिकों की भांति ज्ञानसाधना में जुटे रहना, प्रत्येक मनुष्य के लिए संभव नही होता. न ही इस काम में सबकी रुचि होती है. अधिकांश लोग सहज जीवन जीने के पक्षधर होते हैं. बजाय कुछ नया करने या परंपराओं को चुनौती देने के लिए वे स्थापित मान्यताओं के अनुसरण को प्राथमिकता देते हैं. कदाचित ऐसे लोगों के लिए ही महाभारत में विदुर महाराज ने कहा है—‘महाजनो येन गतः सः पंथा.’ निपट अनुयायी का यह मूल स्वभाव उसकी बौद्धिक शिथिलता को दर्शाता है. इसका अगला चरण प्रतिकूल परिस्थितियों से अनुकूलन एवं बौद्धिक दासता के रूप में सामने आता है. यदि इसे ज्यों की त्यों मान भी लिया गया, तो समाज अनजाने ही दो हिस्सों में बंट जाता है. एक ओर वे लोग जो तथाकथित बौद्धिक ‘महाजन’ यानी पुरोहित वर्ग से थे, दूसरी ओर साधारण जन. धार्मिक अभिजन के विकास के पीछे यही परिस्थितियां थीं, जो आगे चलकर लगातार पुष्ट होती गईं. सामाजिक असमानताओं को मानवसमाज की स्वाभाविक नियति मान लिया गया. परिणामस्वरूप अभिजन संस्कृति को पनपने का अवसर मिला. इस काम में धर्म की भूमिका उत्प्रेरक, सहायक और संवर्धक की रही है.

यहां कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है. वे कह सकते हैं कि धर्म यदि आचरण का हिस्सा है, उसकी संस्तुतियां सभी के लिए बराबर होती हैं, और वह मानवमात्र के कल्याण की बात करता है—तब उसपर अभिजन संस्कृति का वाहकसंवाहक होने का आरोप कैसे लगाया जा सकता है. इसका कारण धर्म की मूल प्रवृत्ति में निहित है. उन कारणों में निहित है, जो धर्म के नाम पर समाज में थोप दिए जाते हैं. यह ठीक है कि धर्म की अपनी आचारसंहिता होती है. प्रत्येक धर्म जरूरत के समय कमजोर की मदद करने, पड़ोसी के साथ सद्व्यवहार करने, आवश्यकता से अधिक संचय न करने के साथसाथ सत्य और अहिंसा पर जोर देता है. यह धर्म का नैतिकतावादी पक्ष है, जिसे मानवी आदर्श का वाहक कहा जा सकता है. और अपने आप में वह है भी. लेकिन धर्म की मूल प्रवृत्ति अलोकतांत्रिक होती है. क्योंकि धार्मिक आचारसंहिता मानवमात्र के कल्याण को ध्यान में रखकर तय नहीं होती. बल्कि ईश्वर के नाम पर उसको खुश करने अथवा मोक्ष जैसे अदृश्य लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए की जाती है. परमात्मा को एकमात्र अधिष्ठाता और परमशुभ मानते हुए, सर्वोच्च शक्ति के रूप में उसकी कल्पना, प्रकारांतर में मनुष्य की क्षमताओं पर संदेह तथा उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली थी. इससे मनुष्यत्व को दोयम दर्जे का मान लिया जाता है. कुल मिलाकर धर्म एक छाया के निमित्त जीवन की संभावनाओं को नकारने का काम करता. धार्मिक कर्मकांड पुरोहित के माध्यम से संपन्न कराए जाते हैं. इस तरह शुभता के प्रतीक ईश्वर और जनसाधारण के बीच तीसरी शक्ति के रूप में पुरोहित वर्ग आ धमकता है. वह स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि और विशेष कृपापात्र घोषित करते हुए अपने लिए विशेष मानसम्मान और सुविधाओं की अपेक्षा रखता है. इससे मनुष्यों में ही वर्ग बनने लगते हैं. सिवाय आस्था और विश्वास के ईश्वर की सत्ता का कोई तर्क उसके अनुयायियों के पास नहीं होता. बावजूद इसके उसके आधार पर समाज में स्तरीकरण की भावना जन्म ले लेती है. इस तरह जनसाधारण की स्थिति तीसरे दर्जे के प्राणी जैसी हो जाती है. पुरोहिताई प्रलोभनों एवं ईश्वरीय अनुकंपा की भ्रांति में जीना उसकी नियति बन जाता है.

हाल के कुछ दशकों को अपवाद मान लिया जाए तो जीवन में धर्म की भूमिका निरंतर विकासमान रही है. विशेषकर भारत जैसे देशों में, जहां समाज ‘धार्मिक’ होने को शुभता का प्रतीक माने रहता है. गत पांचछह हजार वर्षों के दौरान धर्म ने अपनी पैठ को निरंतर व्यापक किया है. मनुष्य उसके प्रति इतना सम्मोहित है कि धर्माचरण के नाम पर विवेक से किनारा किए रहता है. वास्तविकता और भ्रांति में अंतर वह कर ही नहीं पाता. जिन मूल्यों की सामाजिक महत्ता है, जिनका सीधा संबंध मानवीय विकास से है, उनका प्रभाव निरंतर क्षीण होता चला जाता है. नतीजा यह होता है कि जो विशुद्ध सामाजिक घटनाएं हैं, जो मनुष्य की विकास की इच्छा और उस दिशा में किए जा रहे प्रयासों को दर्शाती हैं, भ्रांतिवश उन्हें भी धार्मिक घटना अथवा उसका लक्षण मान लिया जाता है. उदाहरण के लिए विवाह सामाजिक घटना है. उसका संबंध समाज के बीच कामसंबंधों के नियमन और संतानोत्पत्ति से है, ताकि सामाजिक अनुशासन एवं उत्तरजीविता बनी रहे. बावजूद इसके विवाह का आयोजन इस प्रकार किया जाता है कि परंपरा और रीतिरिवाज के नाम पर, कुल कार्यक्रम छोटीछोटी अनेक धार्मिक घटनाओं अथवा कर्मकांडों में सिमट जाता है. कुछ अपवादों या कानूनी प्रक्रिया के तहत होने वाले विवाहों को छोड़ दिया जाए तो बिना पंडित, मौलवी या पादरी की उपस्थिति के, अधिकांश विवाह अमान्य घोषित कर दिए जाते हैं. कई बार तो कोर्टमैरिज कर चुके दंपति को भी विवाह के पारंपरिक अनुष्ठानों से गुजारा जाता है तथा उनके पूरा होने के पश्चात ही विवाह संपन्न माना जाता है. नामकरण और यज्ञोपवीत जैसे अनेक संस्कार हैं, जिन्हें सामाजिक होने के बावजूद धार्मिक आयोजन का दर्जा प्राप्त है. जिन्हें पुरोहित की उपस्थिति में ही करना श्रेयस्कर माना जाता है. सामान्य जीवन में धार्मिक गतिविधियां और समाजीकरण इतने गड्डमड्ड नजर आते हैं कि उनमें अंतर करना कठिन हो जाता है. आशय है कि धर्म चाहेअनचाहे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हस्तक्षेप करता है, तथापि उसे समाजीकरण का आधार मान लेना भी अनुचित होगा.

कारण स्पष्ट है कि सभ्यता के इतिहास का बड़ा हिस्सा ऐसा है जो मनुष्य ने बिना किसी धार्मिक आस्था या विश्वास के जिया है. हिम युग के दौरान, यानी 1,18,000 वर्ष पहले से लेकर प्रस्तर काल तक का लंबा समय पूर्वऐतिहासिक होने के साथसाथ पूर्व सांस्कृतिक भी है. समाजीकरण की प्रक्रिया उससे काफी पहले आरंभ हो चुकी थी. फ्रांस, भारत, इटली आदि में 15000 वर्ष से 45000 ईसा पूर्व तक के भित्ति चित्र प्राप्त हुए हैं. उनमें मनुष्यों को कहानी कहते, शिकार का अभ्यास तथा सामाजिक आयोजनों में हिस्सेदारी करते हुए दिखाया गया है. एक दम शुरुआती चित्रों में मनुष्य के साथीसहयोगी के रूप में पशुपक्षी आदि तो हैं, देवता नहीं हैं. मनुष्य के आस्थाकेंद्र में देवताओं की घुसपैठ तो मात्र पांचछह हजार वर्ष पुरानी घटना है. उससे पहले तक मनुष्य के लिए प्रकृति ही सबकुछ थी. मनुष्य प्रकृति के साथ, उससे सहयोग और संघर्ष करते हुए जीवन जीता था.

मनुष्य की समाजीकरण की चाहत, धर्म से कहीं अधिक पुरानी है. उसके पीछे कहीं पर मनुष्य की महत्त्वाकांक्षाएं थीं, कहीं जैविक आवश्यकताएं तो कहीं पर प्राकृतिक वैराट्य के दबाव में उपजा शून्यता बोध. इन सबने मनुष्य को एक दूसरे से मिलने, संगठित होकर रहने, सुखदुख में हिस्सेदारी निभाने के लिए प्रेरित किया. प्रकृति के प्रति श्रद्धाभाव के साथ उसे समझने की जिज्ञासा और कौतूहल भी मनुष्य को एकदूसरे के निकट आने को विवश कर देता था. आशय है कि पांचछह हजार वर्ष पहले तक जब धर्म नहीं था, तब भी मनुष्य में समाजीकरण की इच्छा थी, जो उसके मन में अस्तित्व की चिंता के समाधान की खोज में विकसित हुई थी. उस समय तक मनुष्य के लिए विराट प्रकृति ही सबकुछ थी. इसलिए जीवन के कारण की खोज के रूप में आरंभ में जो भी दार्शनिक संकल्पनाएं सामने आईं, उनमें सूर्य, जल, वायु, अग्नि आदि को अलगअलग उसका कारणरूप माना गया. ऋग्वेद की अधिकांश ऋचाएं अग्नि की प्रशंसा को समर्पित हैं. यूनानी ग्रंथों सहित जिंद अवेस्ता में भी सूर्य को प्रमुख देवता का दर्जा दिया गया. तुर्की के बादशाह इख्नातून ने भी सूर्य को प्रथम देवता मानते हुए धर्म का सूत्रपात किया था. दूसरी ओर वायू, जल आदि को जीवन का मुख्य आधार माननेवाले विचारक भी साथसाथ रहे हैं. वैदिक ऋषि रैक्व हवा को ही जीवन का मूलाधार मानते थे. प्रकाश से अंधकार छंटता था, वनवनस्पति नई ऊर्जा से सराबोर हो जाते थे. इसलिए मगर कुल मिलाकर प्रकाशदाता सूर्य को सभी में उच्चतम स्थान मिला. कालांतर में जैसेजैसे मनुष्य का बोध बढ़ा, उसको लगने लगा कि किसी एक गुण के आधार पर जीवन के कारणरूप की व्याख्या कर पाना असंभव है. इसी से आगे चलकर सृष्टि से परे किसी शक्ति की परिकल्पना को बल मिला. उस घटना को धार्मिक सांस्थानिकीकरण की नींव कहा जा सकता है. वस्तुतः जब मनुष्य को लगा कि अलगअलग प्राकृतिक शक्तियों के आधार पर जीवनरहस्य की व्याख्या संभव है….कि जीवन को संभव बनाने में जितना योगदान अग्नि का है उतना ही वायु का और उतना ही प्रकाश, जल, पृथ्वी और आकाश का भी है. इसलिए विभिन्न शक्तियों के बीच समन्वय की खोज की जाने लगी. यही समझौतावादी कोशिश अंततः एकेश्वरवाद के रूप में विकसित हुई, जिसके आदिव्याख्याता ज्ञानसाधना में लीन रहनेवाले अपने समय के जानेमाने दार्शनिक विचारक थे, जिनकी भौतिक आकांक्षाएं शून्य थीं. लेकिन जनता के बीच उनका बड़ा मानसम्मान था. उनके विचारों को समाज में सम्मानपूर्वक अपनाया गया.

प्रत्यय मानसिक आभास हैं, छवियां हैं जो हमारे लिए आभासी दुनिया का निर्माण करती हैं. प्रत्ययों की दुनिया में सर्वसाधारण के लिए हस्तक्षेप कर पाना मुश्किल था. अतः आगे जो हुआ वह परिस्थितिजन्य भी था. क्योंकि सूर्य, वायु, पृथ्वी, आकाश अथवा जल से मानवमात्र का सीधा संपर्क था. उन्हें सृष्टि का कारण माना जाए या नहीं, इस बारे में वह अपने बुद्धिविवेक के अनुसार सीधे निर्णय ले सकता था. आवश्यकतानुसार उसपर वादसंवाद भी कर सकता था. मानवेंद्रियां उनका सीधा साक्षात कर सकती थीं. इसलिए साधारण से साधारण व्यक्ति भी उनपर तर्क कर सकता था. जबकि एकेश्वरवाद बुद्धिवादी व्यवस्था, मानसिक अवधारणा है. यह ईश्वर अथवा सर्वशक्तिमान के प्रत्यय अथवा आभास के बारे में बताती है. यथार्थ से ज्यादा दिमाग का खेल. प्रत्ययों और मानसिक प्रतीतियों की दुनिया में, सर्वसाधारण का दखल असंभव था. अतएव धर्मदर्शन को समझने/ समझाने के लिए विशेषज्ञ के रूप पुरोहितों को समाज में मान्यता मिलने लगी. जिसने खुद को ईश्वर और मनुष्य के बीच के दलाल के रूप में प्रस्तुत किया. पुरोहित वर्ग स्वयं सांसारिक प्रलोभनों से घिरा था, इसलिए उसकी प्रतिबद्धताएं निरंतर बदलती गईं. ज्ञान को सरल भाषा में जनजन तक पहुंचाने के बजाय वह लोकरुचि के अनुसार मंतव्य गढ़ने लगा. जनसाधारण को प्रसन्न रखने की कोशिश में पुरोहित वर्ग ने उसकी रुचि के अनुसार तरहतरह के आख्यान रचे. आख्यानों को रोचक और सरलीकृत बनाए रखने के लिए उनमें चमत्कारों के साथसाथ बहुदेववाद की आवृत्ति भिन्नभिन्न रूपों में हुई. परिणाम यह हुआ कि एकेश्वरवाद केवल धार्मिकदार्शनिक ग्रंथों तक सिमटने लगा और एकेश्वरवाद के तर्क, मिथकीय आख्यानों के साथ गड्डमड्ड होते चले गए. धर्म को सत्ता में ढालने तथा उसे अपने वर्चस्व का आधार बनाने वालों के लिए वह अनकूल स्थिति थी. समाज में तेजी से उभर रहा अभिजन वर्ग अपनी भिन्नभिन्न भूमिका को इन प्रतीकों के माध्यम से आसानी से जनता के बीच स्थापित कर सकता था.

उस व्यवस्था में ईश्वर बड़ा सामंत था. हर मामले में उसकी इच्छा सर्वोपरि थी. अपनी मर्जी से वह कुछ भी कर सकता था. घटिया सामंत की तरह उसे अपनी प्रशंसा सुनकर खुशी मिलती थी और जिसकी मनमानी की शिकायत के विरुद्ध सुनवाई किसी भी अदालत में संभव न थी. एक प्रकार से वर्चस्वकारी व्यवस्था को समर्थन था. ईश्वर नामक उस काल्पनिक संरचना की खूबी थी कि उसे बिना कुछ किए ही सर्वस्व कर्ता होने का गौरव प्राप्त कर सकता था. उस समय तक राजशाही पनपने लगी थी. पुरोहितवर्ग सम्राट को ईश्वर का प्रतिनिधि घोषित कर चुका था. स्पष्ट है, ईश्वर को निरंकुशता का प्रतीक घोषित करने उसकी मंशा सम्राट को असीमित अधिकार सौंपने की थी. राजसत्ता और धर्मसत्ता के गठजोड़ के बल पर वह इस उद्देश्य में कामयाब भी रहा. आगे चलकर अर्थसत्ता भी उनके साथ आ मिली और तीनों की तिकड़ी शेष जनसमाज का अपनीअपनी तरह से शोषण करती रही. चूंकि ऊपर के स्तर पर श्रम की आवश्यकता न थी, और वह वर्ग बिना किसी श्रम के बेहतर जीवनशैली अपनाए हुए था. अतः इससे श्रम को हेय मानने वाली प्रवृत्ति का जन्म हुआ. धीरेधीरे एक परजीवी पुरोहित कौम धर्म के सहारे समाज पर छाने लगी. चूंकि ‘ईश्वर’ एक कल्पना से परे कुछ न था, अतएव उसके नाम पर पुरोहित वर्ग की मनमानी चलने लगी. स्वार्थ की खातिर वह अपनी कल्पना को ईश्वर के रूप में स्थापित करने लगा. यही नहीं, जनसाधारण को उलझाए रखने के लिए उसने तरहतरह के आडंबरों का तानाबाना तैयार किया. इससे समाज में ऊंचनीच को स्थायित्व मिलने लगा.

धर्म यद्यपि प्रतिकामी व्यवस्था है. वह यथास्थितिवाद का समर्थन करता है, व्यवस्था के प्रति अनुकूलन को बढ़ाता है. दुरावस्था के विरोध में जन्में आक्रोश का शमन कर वह मनुष्य को समझौतावादी बनाता है. उसमें जबरदस्त अनुकूलन क्षमता होती है. प्रतिकूल परिस्थितियों में चालाक धार्मिक शक्तियां समर्पण की नीति को अपनाती हैं, उस समय वे कछुए की भांति अपने अंगप्रत्यंग को समेट, अपने अस्तित्व को भीड़ का हिस्सा बना लेती हैं. स्थितियां अनुकूल होते ही वे पुनः सक्रिय हो जाती हैं. अपने वर्चस्व को पुनः प्राप्त करने के लिए वे एकजुट होने लगती हैं. परिस्थितियों के अनुसार कभी वे शिखरस्थ अभिजात का महिमा मंडन करती हैं. यदि लोग इसपर भी न मानें तो नए युग का सपना देख रहे लोगों को सुखवादी, भोगी, लालची आदि कहकर उनका मनोबल तोड़ने की कोशिश करने लगती हैं. यदि फिर भी सफलता न मिले तो लोगों को बरगलाने के लिए प्रलोभनकारी नीतियों पर उतर आती हैं. जार्ज आरवेल के उपन्यास ‘एनीमल फार्म: ए फेयरी स्टोरी’ में पशुबाड़े में भड़कते आक्रोश को ठंडा करने के लिए मालिक का मुंहलगा कौआ मौसेक विद्रोही पशुओं को बरगलाता है—

मौसेस….का दावा था कि वह एक ऐसे रहस्यमय पहाड़ के बारे में जानता है, जिसका नाम मिसरी पर्वत है और मरने के बाद सभी जानवर वहीं पहुंचते हैं. यह पर्वत और बादलों से ऊपर आकाश में कहीं स्थित है. मौसेस का कहना था कि मिसरी पर्वत पर सप्ताह के सातों दिन रविवार रहता है और तिपतिया घास तो वहां साल के हर मौसम में उगती है. दूध की भेली और अलसी की खली तो वहां बाड़ों पर उगती है.’

धर्म और धार्मिक शक्तियां ऐसे ही प्रलोभन अपने समर्थकों में लुटाती रहती हैं. कोई भी धर्म इससे बचा हुआ नहीं है. कुरआन में बहिश्त का बखान करते हुए लिखा गया है—‘जो लोग ईमान लाए और जिन्होंने अच्छे काम किए, उनको यह मंगल समाचार सुना दो कि उनके लिए स्वर्ग के बाग है, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी. जब उनमें का कोई फल (मेवा) खाने को दिया जायेगा, तो वे कहेंगे कि यह तो हमको पहले ही मिल चुका है. उनको एक ही तरह के फल मिला करेंगे. वहां उनके लिए पाकसाफ बीवियाँ होंगी, और उसमें सदैव रहेंगी.’3 बहिश्त में शहद की नदियां हैं. शहद के ही समंदर. वहां कभी बूढ़ी न होनेवाली अप्सराएं हैं. ईसाई धर्म का प्रधान ग्रन्थ बाइबिल है. इस ग्रन्थ में भी प्रलोभनकारी स्वर्ग का महिमामंडन किया गया है—‘स्वर्ग का राज्य खेत में दिए हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया और मारे आनंद के जाकर और अपना सब कुछ बेंच कर उसे मोल ले लिया.’4 जनसाधारण को उलझाए रखने के लिए स्वर्ग का प्रलोभन सभी धर्मों और समाजों में किसी न किसी रूप में मौजूद हैं. हिंदुओं में पुराण वेद संबंधी उपलब्धियों से भरे पड़े हैं. ईसाइयों के विचारानुसार स्वर्ग ईश्वर का निवास स्थान है. वहां फरिश्ते तथा धर्मात्मा लोग अनंत सुख का भोग करते हैं. यहूदियों के यहां तीन स्वर्गों की कल्पना की गयी है.

बावजूद इसके धर्म न तो समाजीकरण की शर्त है, न ही उसकी अनिवार्यता. अतः धर्म को समाजीकरण का मुख्य आधार मानना अथवा दोनों की उत्पत्ति को परस्पर संबद्ध करते हुए, एक ही घटना से जोड़ना असंगत एवं अतार्किक कहा जाएगा. हालांकि धार्मिक रूप से आस्थावान, धर्म और ईश्वर की बारबार दुहाई देनेवाले लोग शायद ही स्वीकार करेंगे कि धर्म अतार्किक एवं अनावश्यक संरचना है, इसलिए उसकी प्रतीतियां, और उसके प्रभाव भी अतार्किक और अनावश्यक कहे जाते हैं. और यह भी कि अशिक्षित और अविकसित समाजों में धर्म की चाहे जो भूमिका रही हो, आधुनिक ज्ञानविज्ञान, उच्च शिक्षा, प्रौद्योगिकीय एवं वैज्ञानिकता से युक्त समाजों में उसको बहुत पहले खत्म हो जाना चाहिए था. लेकिन यदि आज भी उसका वर्चस्व कायम है तो उसका एकमात्र कारण यह है कि सामाजिक विभेदों का समर्थन करने के कारण धर्म अभिजन हितों का रक्षण और समर्थन करता है. बदले में सामाजिक अभिजन उसको पालतापोसता है. धर्म के प्रचारप्रसार में लगी शक्तियां प्रायः दावा करती हैं कि सबकुछ धर्म के कारण ही व्यवस्थित है. धर्म के संगठन सामथ्र्य से इन्कार नहीं किया जा सकता. समयसमय पर उसका लाभ भी हुआ है. लेकिन ऊंचनीच और सामाजिक स्तरीकरण को मान्यता देकर धर्म ने मनुष्यता को जो नुकसान पहुंचाया है, इसके कारण दुनिया में जो खूनखराबा हुआ है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि धर्म से होनेवाले लाभों की तुलना में उसके द्वारा मनुष्यता को पहुंचे आघातों की फेहरिश्त बहुत लंबी है.

इस तरह के निष्कर्ष से हालांकि आस्थावान लोगों का जी दुख सकता है. मगर तटस्थभाव से सोचने पर वे मानने लगेंगे कि जीवन में अपने हस्तक्षेप को अनावश्यक रूप से बढ़ाकर धर्म ने ये समस्याएं स्वयं ही पैदा की हैं. इस हकीकत को जानते हुए भी कि सभ्यता के लंबे जीवनकाल में मनुष्य ने बड़ा समय बिना किसी धर्म और आध्यात्मिक विश्वास के गुजारा है, वे धर्म को मानवीकरण की कसौटी मानने के अपने निर्णय पर पुनर्विचार अवश्य करेंगे. हो सकता है, सभ्यताकरण के आरंभिक दौर में मानव मात्र की अध्यात्मिक जिज्ञासा, दार्शनिक दृष्टि से जीवन को समझने की ललक धर्म की प्रतिष्ठा का मुख्य आधार रही हो. बावजूद इसके धार्मिकीकरण और समाजीकरण स्वतंत्र घटनाएं हैं. दूसरे शब्दों में समाज धार्मिक संस्थान न होकर मानवीय संबंधों का विधान है. समाजीकरण के मुख्य कारक मनुष्य की जैविक आवश्यकताएं, अन्योन्याश्रितता, कामसंबंध आदि हैं. धर्म समाजीकरण की प्रक्रिया से बहुत बाद में जुड़ा है. हालांकि अपनी लोकप्रियता के दम पर वह शीघ्र ही सामाजिक संबंधों का प्रमुख निर्धारक मान लिया गया. समाज में कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं, जो धार्मिक रूप से आस्थावान न हों. वे अपने नास्तिक होने की घोषणा भी कर सकते हैं. बावजूद इसके यह भी सच है कि जीवन और प्रकृति संबंधी अनिश्चितताओं के चलते समाज में आस्थावान लोग प्रत्येक अवस्था में बने रहेंगे

आस्थावादी कह सकते हैं कि धर्म का कार्य दर्शन की तह में जाना नहीं है. न ही आध्यात्मिक शंकाओं का समाधान करना है. बल्कि चीजों को समझने की खास दृष्टि पर ध्यान केंद्रित करना है. इसलिए धर्म और दर्शन में इतना अंतर तो रहेगा ही. वे गलत नहीं कह रहे. धर्म का काम किसी नई दार्शनिक विचारधारा को जन्म देना नहीं है. बल्कि पूर्वस्थापित दर्शनों से किसी एक अथवा एकाधिक पर विश्वास लाकर, उनकी परिधि में सामाजिकराजनीतिक संबंधों का निर्वाह करना है. अगर ऐसा है धर्म स्वयं को दर्शन से पृथक मान चुका है. दूसरे शब्दों में धर्म एक छाया पर विश्वास लाने, विचारधारा के किसी बिंदू विशेष पर ठहर जाने से अधिक कुछ नहीं है. चूंकि अधिकांश धार्मिक अनुयायी अपने मत को ही अंतिम मानकर दूसरे धर्माबलंबियों के विश्वास की उपेक्षा करते हैं, अतः ऐसे स्थूल विश्वासियों के लिए कहा जा सकता है कि धर्म बौद्धिक जड़ता अथवा भ्रांति से बढ़कर कुछ भी नहीं है. प्रबुद्ध और चेतनशील समाज के लिए ऐसा धर्म अनावश्यक है. धर्म प्रायः उन लोगों को व्यावहारिक अनुशासन में ढालने की कोशिश करता है, जिन्हें असल में उसकी आचारसंहिता का जरा भी बोध नहीं होता.

धर्म के सबसे अतार्किक रूप आर्थिक रूप पिछड़े समाजों में देखने को मिलते हैं. वहां व्यक्ति अपने सामाजिक पिछड़ेपन और व्यवस्था पर बस न चलने के विकल्प के रूप में अलौकिक सत्ता जिसका रूप केवल उसकी कल्पना में होता है, की शरणागत होने का दावा करने लगता है. परिणामस्वरूप उसका ध्यान वर्तमान की समस्याओं की ओर से या तो पूरी तरह हट जाता है अथवा वह उसके साथ जीने का अभ्यस्त होने लगता है. दोनों ही स्थितियां सामाजिक अनाचार को बढ़ावा देने वाली होती हैं. इस बीच धर्म अपना मूल उद्देश्य अध्यात्म की खोज अथवा उसकी साधना को भूल जाता है. उल्लेखनीय है कि आस्थावान लोग धर्म को केवल इसलिए नहीं अपनाते कि उसके साथ आध्यात्मिक विश्वास जुड़े होते हैं; न ही इसलिए कि धर्म जीवन की अधिष्ठाता शक्तियों को प्रसन्न रखने का मार्ग सुझाता है. कुछ आस्थावादी धर्म को नैतिकता के स्रोत के रूप में अपनाते हैं. तदनुसार ‘दुनिया धर्म पर टिकी है’ जैसा प्रचार भी करते रहते हैं. नैतिकता मानवीकरण का लक्ष्य उसका परमबिंदू है. उसके लक्ष्य मनुष्य और समाज के सर्वोत्तम हितों को ध्यान में रखकर निर्धारित किए जाते हैं. जो पूरी तरह नैतिकता पर आलंबित हों. धर्म के साथ वस्तुस्थिति ठीक विपरीत कही जा सकती है. वहां संपूर्ण आयोजन तीसरी शक्ति जिसका कोई प्रमाण नहीं है, को केंद्र में रखकर किया जाता है. इससे अनावश्यक रूप से भ्रम बढ़ता है. जिसका लाभ उठाकर धार्मिक शक्तियां लोगों को बरगलाती लगती हैं. नैतिकता मानवीकरण का उच्चतम लक्ष्य उसकी पवित्रतम कसौटी है. पितापुत्र, पतिपत्नी, मातापिता तथा विभिन्न संबंधों की मर्यादाओं और छूटों का निर्धारण करना समाज का कार्य है. यदि वह मानवमात्र के कल्याण को केंद्र में रखकर किया जाए तो धार्मिक दबाव और कुछ पूर्वाग्रहों के चलते समाज इस दायित्व की पूर्ति सामाजिक कर्तव्य के नाते करने के बजाय धर्म की भाषा में करता है. इससे सामाजिकता का हृास होता है. सामाजिक दायित्वों के निर्वहन में धर्म का आयाचित हस्तक्षेप मनुष्य और समाज के बीच में तीसरी शक्ति को अनायास ले आता है.

अशिक्षित और अविकसित समाजों में धर्म की चाहे जो भूमिका रही हो, आधुनिक ज्ञानविज्ञान, उच्च शिक्षा, प्रौद्योगिकीय एवं वैज्ञानिकता से युक्त समाजों में उसको बहुत पहले खत्म हो जाना चाहिए था. यदि आज भी उसका वर्चस्व कायम है तो उसका एकमात्र कारण यह है कि सामाजिक विभेदों का समर्थन करने के कारण धर्म, अभिजन हितों का रक्षण और समर्थन करता है. बदले में सामाजिक अभिजन उसको पालतापोसता है. तब क्या धर्म का विकल्प संभव है? इसका उत्तर ‘हां’ में हो सकता है. खुद को आस्तिक कहने वाले लोग चाहे मानें या न मा्नें, मगर धर्म के विकल्प की सबसे ज्यादा जरूरत उन्हीं को है. ताकि वे अपने मन के उस डर से मुक्त हो सकें, उस भय से मुक्त हो सकें जो किसी अदृश्य शक्ति के कोप के रूप में उनके पीछे लगा रहता है, जो धार्मिक विश्वासों का प्रमुख जनक है. यदि वे जीवन के कारणरूप को जानना चाहते हैं, तो धर्म के विकल्प की जरूरत उन्हें और भी ज्यादा है. क्योंकि दर्शन और अध्यात्म के माध्यम से परमात्मा को कहीं गहराई और तर्कसम्मत ढंग से समझा या नकारा जा सकता है. आधुनिक शिक्षा के साथ समाज में तार्किकता बढ़ी है. इस कारण नास्तिकों की संख्या भी बढ़ती जा रही है. अपवाद स्वरूप कुछ देशों को छोड़ दें तो विकसित देशों में नास्तिकों की संख्या में वृद्धिदर अपेक्षाकृत अधिक है. धार्मिक कर्मकांड में भी आनुपातिक रूप में कमी आई है. पूरी दुनिया में लगभग पचास करोड़ ऐसे लोग हैं, जिन्होंने नास्तिक होने का दावा किया है. दूसरी और जो छोटे धर्म थे, वे सिमट रहे हैं, उनके अनुयायियों की संख्या में तेजी से कमी आ रही है. बजाय इसके संगठित धर्मों में लोगों का विश्वास बढ़ रहा है. यह मनुष्य के मन में धर्म और राजनीति के कारण पैठे डर को दिखाता है. यही कारण है कि लगभग छियासी प्रतिशत लोग किसी न किसी प्रकार से देवता और ईश्वर में विश्वास रखते हैं.

धर्म को संस्कृति का हिस्सा माननेवाले अधिकांश वे लोग हैं, जिनके वह आचरण का हिस्सा है. वे धर्म का अनुसरण इसलिए करते हैं क्योंकि उनका पूरा समाज उसका अनुसरण करता है. धर्म उन्हें समाजीकरण की प्रक्रिया की धुरी लगता है. वे मानते हैं कि धर्माचरण अत्यावश्यक है. दूसरे शब्दों में धर्म लोगों की व्यावहारिक आवश्यकता न हो तो भी वह उनकी सामाजिक जरूरत महसूस होता है. जाहिर है धर्म के विकल्प की खोज धर्म के सरासर नकार से शुरू नहीं हो सकती है. यह लोगों से उनकी आस्था छीनने जैसा होगा. जरूरत लोगों के विवेकीकरण की है. उसके अभाव में वे पत्थर को देवता समझने जैसा धत्कर्म करने लगते हैं. इसलिए बहुत आवश्यक है कि आस्था को विवेक से, धर्म को अध्यात्म से स्थानापन्न कर दिया जाए.

© ओमप्रकाश कश्यप

ंदर्भ :

1. One of the greatest tragedies in mankind’s entire history may be that morality was hijacked by religion.” – Arthur C. Clarke

2. यह अनायास नहीं है. हम आगे देखेंगे कि अभिजन संस्कृति के विकास में धर्म का कितना बड़ा योगदान है. किसी बात को बिना किसी युक्तियुक्त कारण के ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेना, मानवीकरण की कोशिश के विपरीत आचरण है. इसकी कीमत मनुष्य को पीढि़यों तक चुकानी पड़ सकती है. उदाहरण के लिए संत कवियों द्वारा शुरू किया गया निर्गुण भक्ति आंदोलन सामाजिक ऊंचनीच, जातिवाद और असमानता के विरुद्ध बड़ा क्रांतिकारी आंदोलन था. वह समाज के उपेक्षित तबकों में अर्से बाद उभरी अधिकार चेतना थी, जो धर्म के नाम पर व्याप्त पाखंड और गुरुडम को चुनौती देती थी. बाद में सूरदास, तुलसीदास, मीरा जैसे सगुण कवियों ने उस पूरी ज्ञानमार्गी चेतना के परिणामों को धूल में मिलाने का काम किया. अनपढ़ गोपियां ऊधव की ज्ञानमार्गी चेतना का जैसा मजाक उड़ाती हैं, यह केवल ऐसे समाज में संभव था जो ज्ञान से छुटकारा पाकर केवल कल्पनाओं में जीने का फैसला कर चुका हो.

3. सूरा सफर पहला पारा आयतन 81, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की आत्मकथा ‘इतिवृत्त’ से उद्धृत, स्रोहिंदी समय).

4. मत्ती नम्बर 13, संख्या 44, स्रोत वही

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