लखनऊ : तहजीब-पसंदों का जिंदादिल शहर

यात्रा संस्मरण

दिल्ली-लखनऊ राजधानी का सफर. गाड़ी अपनी तेजी से भाग रही है. रात्रि-भर का सफर पूरा कर पड़ाव पर पहुंचने को उत्सुक. करीब डेढ़ घंटे बाद अपने गंतव्य पर होगी. करीब सवा सौ किलोमीटर का सफर बाकी. अंधियारा छंटने के साथ साथ ही हरियाले खेत और पेड़-पौधे नजर आने लगे हैं. सभी तेजी से पीछे की ओर भागते; या भागने का एहसास कराते हुए. धरती का हरियालापन ही वह गुण है जिससे यह देश दुनिया-भर में जाना जाता है. इससे आकर्षित होकर न जाने कितने हमलावर इस धरा की ओर आकर्पित हुए और जाति-धर्म के आधार पर बुरी तरह बंटे, अलसाए यहां के बाशिंदों को रौंदकर अपना प्रभुत्व स्थापित किया. आए लूटने के लिए थे लेकिन यहां कि उर्वरा धरती, हरी-भरी वादियां, नदियांे और तालाबों से अभिसिंचित धरा उन्हें इतनी पसंद आई कि यहीं के होकर रह गए. आर्यों से लेकर अंग्रेजों तक—यह देश सबका बना. यह भारत में नहीं दुनिया-भर के अनेक देशों में हुआ. जिन देशों की धरती उर्वरा थी, मगर नागरिक अनपढ़ या बंटे हुए, वहां यह लगभग स्थायी रूप में शताब्दियों तक कायम रहा. धरती का उर्वरा-सामर्थ्य और खनिज संपदा भी औपनिवेशीकरण का कारण बन सकती है, यह यूरोपीय देशों में औद्योगिकीकरण की सफलता के बाद पूरी दुनिया ने देखा. फिर भी अनेक देश खुद को पराधीनता से जल्दी ही मुक्त कराने में सफल हुए. लेकिन जाति-प्रथा के आधार पर बुरी तरह बंटा भारतीय समाज, कभी इसकी तो कभी उसकी अधीनता में जाता रहा.

अभी-अभी कोई छोटा-सा स्टेशन गुजरा है. नाम पढ़ नहीं पाया. पटरियों के बराबर आते-जाते लोग बता रहे हैं कि अपने शहर से चार सौ किलोमीटर दूर आ जाने पर भी बहुत-कुछ बदला नहीं है. और बदले भी क्यों? शहर के मुट्टी-भर बाशिंदों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश की रोजी-रोटी इस धरती की कोख से फलती है. यहां मुट्ठी-भर शहरियों से आशय उन चार-पांच प्रतिशत लोगों से है जो तीन-चार पीढ़ियों से शहर में रह रहे हैं और गांव से नाता टूटा हुआ है. वरना हम जैसों के जीवन का दो तिहाई हिस्सा शहर में बीतने के बावजूद मन में गांव ही बसता है. जहां आय का मुख्य साधन खेती है. मन हल-बैल, खेत-खलिहान और नदी-तालाब में बसता है. जब वही लोकगीत, वही हल-बैल, वही समस्याएं और वैसे ही एक समान सपने होंगे तो व्यवहार की समानता भी रहेगी ही.

मध्य रात्रि से उजाला होने तक अधिकांश समय अंधेरे में कटा. ट्रैन भागती रही और यात्री स्वयं को गाड़ी-हवाले कर वक्त गुजार देने की कोशिश में ऊंघने लगे. पहले सफर काटने का मुख्य जरिया पुस्तकें हुआ करती थीं. आजकल मोबाइल हैं. अधिकांश लोग मोबाइल पर व्यस्त हैं. पुस्तकें मनुष्य के बोध को समुन्नत करती थीं. मोबाइल पर जो साधन हैं, वे मनुष्य के स्वतंत्र चयन के अधिकार में हस्तक्षेप करने को उत्सुक रहते हैं. एक अच्छा-खासा पढ़ा-लिखा मनुष्य कब विज्ञापन की भाषा बोलने लगता है, यह क्रिकेट का खेल देखनेवालों की आपसी बातचीत को सुन-देखकर समझा जा सकता है, जो मैच के स्कोर के साथ मोबाइल की खूबियां, उसमें प्रयुक्त तकनीक के कमाल पर भी लगतार चर्चा करते जाते हैं. ‘अपनी कमीज को पड़ोसी की कमीज से ज्यादा सफेद’ दिखाने की प्रतियोगिता ‘अपने मोबाइल को दूसरे के मोबाइल से ज्यादा एडवांस’ सिद्ध करने की प्रतियोगिता में ढल चुकी है. बहरहाल सफर में जो लोग निश्चिंत मन थे, उन्होंने रेलगाड़ी छूटने के थोड़ी देर बाद ही खुद को नींद के हवाले कर दिया था. बराबर से आती खर्राटों की तेज आवाज एकाग्रता भंग कर रही है. मैं उससे सहज हो लेना चाहता हूं. आखिर खर्राटे भी लोगों की सेहत तथा उनके मनोविज्ञान को समझने का एक जरिया है.

 मैं सोचता हूं. ये राजधानियां रात में ही क्यों चलती हैं? क्यों अपना अधिकांश सफर अंधियारे में पूरा करने का मन बनाए रहती हैं? इसके लिए यदि यह जान लिया जाए कि कौन लोग हैं जो इन गाड़ियों में सफर करते हैं, तो उत्तर समझना एकदम आसान हो जाएगा. तब हम इस देश के अभिजात की मानसिकता को भली-भांति परख सकेंगे. सरकारी खर्चे पर आने-जाने वालों के अलावा राजधानियों में प्रायः वही लोग सफर करते हैं, जिनका वास्ता एक राजधानी से दूसरी राजधानी या एक मुख्य शहर से दूसरे मुख्य शहर से होता है. यानी जो विभिन्न शक्ति-केंद्रों के बीत आते-जाते हैं. ये शक्ति-केंद्र धार्मिक अथवा राजनीतिक सत्ता के केंद्र हो सकते हैं. राजधानियों के चरित्र में खास अंतर नहीं होता. कुछ सांस्कृतिक विशेषताओं और इस तथ्य को कि राजधानियों में वे लोग रहते हैं, जितना काम शासन-प्रशासन चलाना होता है, जो इस देश के लिए नीतियां बनाते हैं—को यदि भुला दिया जाए तो एक वर्ग और भी राजधानी में रहता है. वही असल में संस्कृति से लेकर राजनीति और अर्थव्यवस्था सभी का संचालक होता है. राजधानियों में सफर करनेवाले लोग या तो इस वर्ग के सीधे सदस्य होते हैं, अथवा किसी न किसी प्रकार उससे जुड़े, लाभान्वित होने वाले लोग. तो जो वर्ग अर्थव्यवस्था का वास्तविक संचालक होता है, वह नहीं चाहता कि उससे जुड़े लोगों के अपने देश और देशवासियों से, यहां की मिट्टी, उसकी उर्वरा शक्ति से किसी प्रकार के संबंध बनें. यदि संबंध पीछे से चले आए हैं तो यह वर्ग चाहता है कि उसके निकट आने से पहले कर्मचारी अपने अतीत को बिसरा दें. अपने अतीत को साथ लेकर चलनेवाले, विगत से अपनापा रखनेवाले लोग इसके लिए किसी काम के नहीं होते. ‘सर्वधर्मान परितत्यं मामेकं शरणं ब्रजः—कहकर भक्त को आमंत्रित करने वाले ईश्वर की तरह यह वर्ग भी चाहता है कि लोग उसे अपना भगवान मानें और इसके पास आने से पहले लोग अपनी संस्कृति और अतीत को बिसराकर मुनाफे की उस आचार संहिता को अपना लें, जिसमें पूंजीपति का लाभ ही मूल-मंत्र होता है. परिणामस्वरूप कर्मचारी के विवेक का आकलन उसके प्रयासों के सामाजिक लाभों से नहीं, बल्कि मालिक के मुनाफे की कसौटी द्वारा तय किया जाता है.

अंधेरे का सफर ‘सबकुछ छोड़कर आने में मददगार बनता है. चूंकि यह वर्ग बेहद महत्त्वाकांक्षी भी होता है इसलिए अपनी प्रसार-नीति के तहत इसे भूमि और दूसरे संसाधनों यानी पानी, सस्ता श्रम, धातु-अयस्क आदि की जरूरत भी पड़ती है. जनाक्रोश से बचने के लिए पूंजी-स्वामी स्वयं कभी आगे नहीं आता. सरकार और समाज के प्रत्येक फैसले से वह पूर्णतः निर्लिप्त दिखाई पड़ता है. लेकिन पर्दे के पीछे का असली कर्ता-धर्ता वही होता है. अपनी योजनाओं को वह खरीदे गए राजनेताओं, बुद्धिजीवियांे, कर्मचारियों आदि के जरिए बनाता है. अब यदि आदमी उजाले में सफर करेगा तो वह रास्तों में पड़नेवाले जीवन की धड़कन को महसूस करेगा. उसकी भाव-प्रवणता संसाधनों के अधिग्रहण के समय पूंजीपति के हितों के विपरीत जा सकती है. कुछ धर्मों में मांस खाने की इजाजत इस शर्त पर दी जाती है कि जानवर की गर्दन एक झटके में कलम कर दी जाए. मनुष्य इस काम को यदि धीरे-धीरे, ज्यादा सोच-विचार कर करेगा तो निरीह जानवर की आंखों में समायी मौत उसको विचलित कर सकती है. दूसरे इससे जानवर को पीड़ा भी कम होती है. ‘राजधानी’ का सफर असल में ‘झटके’ का सफर है. आदमी को अपने आसपास को जानने-समझने का अवसर ही नहीं देता. इसलिए ‘राजधानी’ कही जानेवाली गाड़ियां इस देश के जीवन को समझने, सांस्कृतिक विविधताओं के आदान-प्रदान का वाहक बनने से ज्यादा व्यावसायिक उद्यम का हिस्सा बन जाती हैं. ‘राजधानियों’ के यात्रियों की आत्ममुग्धता, अपने आप में लिप्त रहने की कलाकारी, जिसमें तकनीक उनकी मददगार बनती है—से भी इसे समझा जा सकता है.

शहर की आहट आने लगी है. शुरुआत बागों से होती है. लखनऊ नवाबों की नगरी है. बाग उनके लिए आय और ताजा फल उपलब्ध कराने का माध्यम थे. इन बागों के रसीले फल जब बादशाह और उनकी बेगमों के हरम तक पहुंचते होंगे तो फलों की मिठास से अधिक खुशी उन्हें चापलूसी की मिठास में मिलती होगी. इसी से उन्हें और उनकी मनमानियों को अभयदान मिल जाता होगा. यही बाग नवाबों और जमींदारों की ऐशगाह भी रहें होंगे. जहां ऊंची से ऊंची चीख दम तोड़ लेती होगी. दिल्ली और उसके उपनगरों में ऐसे बाग नहीं दिखते. विकास की आंधी और आंतरिक उपनिवेशीकरण की पूंजीवादी जिद के कारण वे कभी का उजड़ चुके हैं. लखनऊ वाले अपनी पुरानी तहजीब के साथ इन बागों पर भी गर्व कर सकते हैं. पर ज्यादा दिनों तक नहीं…

बाग के किनारे-किनारे कुछ झाड़ियां दिखीं. फूलों से लदी हुईं. वसंत की आहट सुन मदन-रस से आतृप्त. बागवान को छोड़कर वे मनुष्य के लिए किसी काम की नहीं. फलदार वृक्षों से बचे खाद-पानी पर ये वैसे ही जिंदा रहती हैं, जैसे शहर में जूठन खाकर सड़क-छाप बच्चे, जिनपर कथित सभ्य लोग ‘आवारा’ का टैग चिपकाए रखते हैं. इन झाड़ियों के फूल भी उन ‘आवारा’ बच्चों की मुस्कान की भांति हैं, जिन्हें यह महानगर कभी अपना नहीं मानता. हालांकि वे उसके वजूद का अभिन्न हिस्सा होते हैं. जैसे वे ‘आवारा’ शहरवासियों के कचरे की सफाई कर उनकी बीमारियों को अपने ऊपर झेलते रहते हैं, उसी प्रकार ये झाड़ियां बाग में आने वाले हर अनावश्यक जीव को उससे दूर रखती हैं. कुपित पशुओं के सींग के वार अपने सीने पर सहती हैं. लेकिन बाग के पेड़ों की चर्चा के दौरान इन झाड़ियों को कहीं नहीं गिना जाता. आने वालों की उपेक्षा दृष्टि सहना ही इनकी नियति है.

लखनऊ के बारे में कहा जाता है कि इसे राम के भाई लक्ष्मण ने बसाया था. लेकिन रामायण के लक्ष्मण का भ्रातृ प्रेम तो दुनिया-भर में मशहूर है. न जाने कितनी कहानियां और गाथाएं उसके ऊपर लिखी गई हैं. बार-बार दावा किया जाता है कि लक्ष्मण अपने अस्तित्व की खोज के लिए भी राम की ओर देखने लगते थे. ऐसा भ्रातृ-वत्सल व्यक्ति अपने नाम से स्वतंत्र नगर बसाता? उन्हें यदि नगर बसाना ही होता तो उसका नाम ‘रामपुर’, ‘रामदुर्ग’ या ‘रामगढ़’ जैसा कोई नाम देते. तो क्या बड़े भाई को अयोध्या का सुख भोगते देख छोटे भाई का मन भी सत्ता-सुख के लिए ललचाने लगा था! सिवाय किंवदंतियों के लिए लखनऊ को ‘लक्ष्मणपुर’, ‘लाखनपुर’ अथवा ‘लखनावती’ से जोड़ने का कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है. यदि ध्वनि-साम्य के आधार पर नगर के इतिहास को खोजने की जिद हो तो लखनऊ को लवणासुर या ऐसे ही किसी मिलते-जुलते राक्षस-राज के नाम से भी जोड़ सकते हैं. परंतु ऐसा हो नहीं पाता. इससे विजेता संस्कृति की इतिहास की समझ का भी अंदाजा होता है. जो न केवल इतिहास के महत्त्व को समझती है, बल्कि उसका अपने हित में प्रयोग करना भी जानती है. इतिहास में बने रहने के लिए वह उसमें आवश्यक दखल भी देती है. विजेता संस्कृति के स्वार्थ विजेता पक्ष के लक्ष्मण से जुड़े थे, लवणासुर से नहीं. आज वही संस्कृतियां जीवित हैं, जिन्होंने अपने इतिहासबोध को बनाए रखा, बल्कि आवश्यकतानुसार उसको अपने स्वार्थ के अनुरूप मोड़ा भी.

भारतियों में इतिहास दृष्टि का अभाव रहा है. इसके समानांतर उनकी धर्म-दृष्टि प्रबल थी. कुछ कम या ज्यादा, प्रत्येक धर्म अपने मूल में सामंती संस्कार लिए होता है, इसलिए यहां का समाज ऊंच-नीच के अनेक खानों में बंटता चला गया. बाद में जब समाजों में राजनीतिक चेतना का विकास हुआ, तो धार्मिक चेतना के प्रभाव में बुरी तरह से बंट चुके समाज, राजनीतिक रास्ता का शिकार होते चले गए. चूंकि राजनीति शासन की भाषा बोलती है, वह लोगों को अपनी इच्छा के अनुसार सोचने के लिए विवश कर सकती है, इसलिए धार्मिक चेतना के आधार पर संचालित लोगों को अपनी दासता में ढालते चले गए. इस कोशिश के चलते कभी शहर को रामायण से जोड़ा गया तो सत्ता परिवर्तन के साथ ही शहर का नाम बदलकर तत्कालीन शासकों की भाषा और रुचि के अनुकूल ढलता गया. कह सकते हैं कि कथित ‘लक्षमणपुर’ का ‘लखनऊ’ बनना ऐतिहासिक घटना न होकर, सांस्कृतिक त्रासदी है.

‘राजधानी’ यानी ‘निशाचारी’ रेलगाड़ियों की एक विशेषता यह भी है कि वे समय से चलती हैं. इसलिए गाड़ी ने जब लखनऊ स्टेशन से गलबहियां की तो आठ बजने में कुछ मिनट बाकी थे. बाहर निकले तो धूप कुछ ज्यादा ही चमकीली थी. संभव है यह केवल मेरी भ्रांति रही हो. राजधानी दिल्ली के उपनगरों की त्रासदी, जिनके लिए चटकीली धूप, शुद्ध हवा और स्वच्छ पानी बीते जमाने की बात हो चुकी है. प्रदूषण के मामले में लखनऊ देश की राजधानी और उसके उपनगरों के मुकाबले काफी पीछे है. दूसरा कारण शायद यह कि आपने यदि रात की स्याही को नजदीकी से भोगा हो तो दिन का उजियारा कुछ ज्यादा ही जादुई दिखाई पड़ता है. उस क्षण मुझे दूसरी बात ही सही लग रही थी. मेरे सहयात्री जहां भारी-भरकम खर्राटे लेने में मशरूफ थे, मैं अंधेरे में आंख बंद करके लेटा रहा था. ताकि अपने भीतर कुछ झांक सकूं. रात-भर जागने के कारण सुबह की धूप कुछ ज्यादा ही ताजा, कुछ ज्यादा ही ऊर्जावंत दिख रही थी. अपने मातृ प्रदेश की राजधानी में प्रवेश करते समय मैं जिस एहसास को अपने भीतर उभरते देखना चाहता था, ठीक वैसी ही अनुभूति मुझे हो रही थी.

जिस होटल में ठहराने की व्यवस्था की गई थी, वह स्टेशन के काफी करीब था. टहलते हुए वहां तक पहुंचा जा सकता था. पहुंचा भी. परंतु मन लखनऊ की सुबह की पड़ताल करने का था, सो जानबूझकर भीड़ का रास्ता चुना. लखनऊ की चिकन के अलावा जो चीज सर्वाधिक प्रसिद्ध है, वह है वहां की रेबड़ियां. सो जिधर से गुजरा उसके दोनों और रेबड़ियों और तिलगड्डों की दुकानें थीं. आवश्यकता न केवल अपना रास्ता स्वयं चुनती है, बल्कि दूसरों को भी उस रास्ते की ओर आने के लिए आमंत्रित करती है. लखनऊ यात्रा से लौटनेवाले लोगों को यादगार के तौर पर परिवार के लिए वहां की रेबड़ियां लेने का मन हो सकता है. इसी जरूरत ने उस बाजार को जन्म दिया था. रेबड़ियों की दुकानों के बीच-बीच में कुछ ठेले बिरयानी और नाश्ते की चीजों से लदे थे. वहां मजदूर, रिक्शाचालक किस्म के लोग गपशप करते हुए दिखाई पड़े. दिन भर की भागम-भाग और कमर-तोड़ स्पर्धा के बीच आदमियत के एहसास को बचाए रखने का यही समय होता है. जब वे लोग खुल कर हंस सकते हैं. अपने पलों को अपनी तरह जी सकते हैं. बाकी समय तो उन्हें मालिक का आदेश ही मानना होता है.

मैं एक चाय लेना चाहता था. होटल एकदम सामने था, फिर भी वहां जाने से पहले मैंने अपनी सुस्ती को अंगूठा दिखाने का फैसला किया. मैंने चायवाले को ‘अच्छी’ चाय बनाने का आग्रह किया. चाय पीकर चला तो निराश था. दरअसल चाय बनाना भी एक हुनर है. जबतक उसमें अपनेपन की गंध न हो, तब तक वह जुबान नहीं चढ़ती. चाय बेचने वाले के लिए चाय बनाना एक व्यवसाय है. और व्यवसाय मालिक के मुनाफे पर चलता है, जो अपनेपन की गंध के नाम पर अपने मुनाफे को कम नहीं करना चाहता. अब आप शायद उस गरीब चायवाले की व्यावसायिक दृष्टि को दोष देने लगें. लेकिन श्रीमान, उस गुमटी पर आठ रुपये की चाय पीकर जो निराशा हासिल हुई वैसी ही निराशा होटल की चाय पीने के बाद महसूस हुई जो शायद अस्सी रुपये या उससे भी महंगी थी. होटल की चाय इसलिए भी ज्यादा बेस्वाद नहीं लगी, क्यों की उसकी कीमत का भुगतान मुझे नहीं, संस्थान को करना था.

होटल खासा बड़ा था. घोषित रूप से ‘तीन तारे’ वाला. ‘स्वागत कक्ष’ पर नाम-पता आदि लिख देने के साथ ही मुझे ख्याल आया, उन लेखक बंधुओं से मिल लेने का, जिन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी प्रतिष्ठान ने बालसाहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए सम्मानित करने का फैसला किया था. इसलिए होटल पहुंच चुके साहित्यकारों के बारे में जाते ही पता चल गया. उनमें राजीव सक्सेना हमारे ही गृह जनपद में अधिकारी हैं. आदमी की आम कमजोरी. वह अवसर मिलते ही नीड़ की ओर लौटना चाहता है, अथवा उन वस्तुओं और प्राणियों से जुड़ना चाहता है, जो उसको नीड़ से निकटता की अनुभूति कराती हों. इस कमजोरी कोे मेरे बहनोई जंगपाल सिंह लोकोक्ति के माध्यम से स्पष्ट करते हैं. जब भी ऐसी स्थिति उत्पन्न हो, उनका सीधा कटाक्ष होता है—‘घुटने तो पेट को ही पचते हैं.’ यह शब्दों की ताकत है. जिस सत्य को बताने में बड़े-बड़े कलमबाजों को बडे़-बड़े वाक्य अथवा पैराग्राफ खर्च करने पड़ सकते हैं, उसे लोकोक्तियां सूत्र रूप में हमारे सामने ले आती हैं. शब्दों की इस ताकत को अच्छे और बुरे दोनों की किस्म के लोगों ने साधा है. पुरोहितों ने देवताओं का नख-शिख वर्णन को मंत्र का नाम दिया और उसे जादुई ताकत से संपन्न बताकर, लोगों को शताब्दी-दर-शताब्दी उल्लू बनाते रहे. भले ही व्यक्ति उनके भावार्थ से अपरिचित हो. यहां तक कि उन्हें देखा तक न हो और गले में ताबीज की तरह लटकाकर खुश होता हो.
कमरे में पहुंचकर बैग रखा और बगैर नहाए-धोए, शेव किए, राजीव सक्सेन से मिलने चला आया. उन्हीं के साथ साझा करते हुए चाय पी. पहली नजर में वे सहज-सरल इंसान लगे. कभी-कभार आत्ममुग्धता के शिकार भी. पर ऐसी आत्ममुग्धता तो हम सभी ढोते रहते हैं. राजीव विज्ञान की कहानियां लिखते हैं. पता चला कि करीब साढ़े पांच सौ विज्ञान कहानियां वे लिख चुके हैं. वह भी केवल दस वर्ष के विज्ञान लेखन काल में. ये कहानियां कथासम्राट प्रेमचंद की कहानियों की संख्या से लगभग दो गुनी हैं. सम्मान समारोह में उन्होंने अपनी विज्ञान फंतासी का पाठ किया था. मैं ‘विज्ञान कथा’ और ‘विज्ञान फंतासी’ को अलग-अलग करके देखता हूं. जो स्थितियां विज्ञान फंतासी में क्षम्य हो सकती हैं, उनसे विज्ञान कथा में बचा जाना चाहिए—ऐसा मेरा मानना है. बावजूद इसके अधिकांश लेखक ‘विज्ञान फंतासी’ और ‘विज्ञान कथा’ का अंतर नहीं समझ पाते. हालांकि कुछ पत्रिकाएं विज्ञान फंतासी को ‘विज्ञान गल्प’ अवश्य लिखती हैं, बाजवूद इसके तकनीक के स्तर पर दोनों के बीच जो अंतर है, वह कथा-प्रस्तुति के समय कहीं विलीन हो जाता है, परिणामस्वरूप ‘विज्ञान फंतासी’ को ‘विज्ञान कथा’ के रूप प्रस्तुत करने की गलती अकसर होती रहती है.

अच्छी विज्ञान कथा लिखने के लिए लेखक का विज्ञान प्रवीण होना आवश्यक नहीं है. एक साधारण पढ़ा-लिखा लेखक भी बेहतरीन विज्ञान लेखक बन सकता है, बशर्ते उसमें पर्याप्त विज्ञानबोध और इस क्षेत्र में होने वाले नवीनतम अनुसंधानों की सामान्य जानकारी हो. उन्नत तकनीक का वर्णन लेखक के अध्ययनशील और अपने आसपास की घटनाओं के प्रति जागरूक होने का प्रतीक हो सकता है, अच्छी विज्ञान कथा की कसौटी वह भी नहीं है. मेरी राय में अच्छे विज्ञान कथा लेखक की विशेषता उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान के प्रति संदेह भाव और उसकी सूक्ष्म अन्वीक्षण प्रवृत्ति हो सकती है. मैं पीटर अबेलार्ड के इन शब्दों को विज्ञानकथा लेखक के लिए आदर्श मानता हूं—‘संदेह से हम जांच-पड़ताल तक पहुंचते हैं, और जांच-पड़ताल हमें सत्य तक पहुंचाती है.’ दूसरे शब्दों में कहें तो जो आस्थावान हैं, जिसकी आस्था पौराणिक प्रतीकों में है, जिसकी दृष्टि ‘मिथक’ और ‘यथार्थ’ का भेद करने में अक्षम रहती है, वह अच्छा विज्ञान लेखक हो ही सकता. यह मेरी मान्यता है. हिंदी विज्ञान लेखकों की यही कमजोरी है. इसलिए वे आस्था और सत्य में अंतर नहीं कर पाते. चूंकि अधिकांश के लिए आस्था के सवाल ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं, इसलिए उनकी रचनाएं तकनीक, कल्पना और आस्था के मिश्रण से ‘चूं-चूं का मुरब्बा’ बनकर रह जाती हैं. उस हालात में वे बाजार का ‘हित-साधन’ तो कर सकती हैं, पाठक का नहीं. इसलिए पूरी विनम्रता के साथ मैं उन्हें साहित्य की श्रेणी से खारिज करना चाहता हूं.

इन्हीं बातों को लेकर होटल लौटने पर राजीव जी से बात हुई थी. अच्छा लगा कि वे संवाद को उत्सुक थे. उस बैठक में सुप्रतिष्ठित बालसाहित्यकार उषा यादव और संस्थान की ओर से सम्मानित होकर लौटीं उनकी लेखिका बेटी कामना सिंह भी थीं. बातचीत के दौर उषा यादव एक श्रेष्ठ श्रोता प्रतीत हो रही थीं, तो कामना सिंह की भूमिका बातचीत में सुधी हिस्सेदार और सजग मध्यस्थ की थी. जब भी बात-चीत में गर्माहट उभरती वे समन्वय की जलधारा से उसकी उष्णता को हर लेतीं. ऐसे अवसरों को सार्थक बनाने के लिए इस तरह के व्यक्तियों की उपस्थिति अत्यावश्यक है. वे प्रतिपक्षी वक्ताओं में धैर्य बनाए रखने, तथा एक-दूसरे के प्रति सौम्य बने रहने के लिए प्रेरित करते रहते हैं. यदि वे न हों तो प्रतिपक्षी वक्ता उठकर जा सकते हैं; और बातचीत का जो ध्येय है वह पीछे छूट सकता है.

आस्था-मंडित लेखकों की दुर्बलता है कि वे भारतीय परंपरा और संस्कृति को लेकर कुछ ज्यादा ही आत्ममुग्ध रहते हैं. जबकि विज्ञान लेखक के लिए इसे में कमजोरी मानता हूं. सृष्टि के उद्भव का प्रश्न जितना दार्शनिक है, उतना ही वैज्ञानिक भी. चूंकि इस सत्य को सीधे-सीधे दिखला पाना संभव नहीं है, इसलिए दार्शनिक और वैज्ञानिक दोनों ही अपनी बात को समझाने के लिए प्रतीकों और मिथकों का सहारा लेते हैं. मिथक यदि त्रिविमीय हों तो पाठक को तथ्य के बिंबांकन की सुविधा रहती है. ऐसे प्रतीकों का प्रभाव और भी असरकारी होता है. लेकिन रचना में मिथकों और प्रतीकों का योगदान रास्ते किनारे लगे दिशासूचक या मील के पत्थर जैसा होता है जो दूसरी को स्पष्ट करने के लिए नियत स्थान पर गढ़वा दिए जाता है. वे लक्ष्य न होकर केवल उसका संकेतक होते हैं. धार्मिक व्यक्ति चूंकि आस्थामंडित होता है, इसलिए वह मिथकों से आगे बढ़ ही नहीं पाता और उन्हीं को यात्रा मान लेने की चूक अकसर कर बैठता है. ‘शिव लिंग’, अपनी पूंछ को मुंह में दबाए सर्व की चक्राकार आकृति, शिव लिंग के सिर पर फन ताने नागराज असल में मिथक हैं. निराकार शिव ब्रह्मांड के प्रतीक और मिथक दोनों रूप में इस्तेमाल किए जा सकते हैं. लेकिन जब कोई शिव का मानवीकरण अथवा दैवीकरण करता है, यह बताता है कि वे धरती पर अवतरित हुए थे और उन्होंने ही इस कोटिक कोटि किलोमीटर में व्याप्त ब्रह्मांड की रचना की थी, तब वह मिथक का वास्तवीकरण करने लगता है. ज्ञानार्जन की राह की यह सबसे बड़ी बाधा है. जनसाधारण के लिए यह उसकी आस्था का विषय हो सकता है, लेकिन एक विज्ञान कथालेखक जब मिथक को वैज्ञानिक सत्य के रूप में प्रस्तुत करता है तो मामला बहुत नाजुक हो जाता है. इससे न केवल मौलिक प्रतिभा का हृास होता है, बल्कि एक गलत तथ्य पाठक के समक्ष जाता है, जो जीवन-भर उसके सोच और व्यवहार पर प्रतिगामी असर डालता है. हो सकता है यह मेरा पूर्वाग्रह हो. हो सकता है जो राजीव समझाना चाहते थे, वह मैं न समझ सका हूं, लेकिन उस चर्चा के बाद मैं इस निष्कर्ष पहुंचा था कि यह अत्यंत ऊर्जावंत और बहु-लिख्खागो विज्ञान-कथाकार, मिथकों को ही वास्तविक तथ्य मानने की भूल कर बैठा है. इसलिए उसकी विज्ञान कथाओं में जहां जबरदस्त फंतासी होती है, आधुनिकतम तकनीक और विज्ञान की दुनिया का जिक्र भी किसी न किसी रूप में आता है, वहीं विज्ञानबोध के अभाव में वे कहानियां साहित्यत्व के उस शिखर को नहीं छू पातीं, जो किसी भी साहित्यकार का लक्ष्य होता है. वे एक अच्छे लेखक हैं, लेखक से साहित्यकार बनने की अपनी यात्रा पर आगे बढ़ें, यह मेरी कामना है और अपेक्षा भी.

यह बात भी ध्यान में रखनेवाली है कि ऐसे प्रतीक और मिथक प्रायः सभी संस्कृतियों में रहे हैं. आस्था-मंडित समाज दावा करता है कि एकमात्र उसी का विचार श्रेष्ठतम है. लिंग और योनि को सृष्टि के उद्भव का प्रतीक प्रायः प्रत्येक संस्कृति में माना गया है. तुर्की में गोबेक्ला टेप नामक टीले के उत्खनन के दौरान लगभग आठ हजार वर्ष पुरानी प्रस्तर रचनाएं प्राप्त हुई हैं, जो एक मंदिरनुमा स्थान पर स्थापित हैं. दोनों ही मूर्तियां नग्नावस्था में, आमने-सामने चित्रित की गई हैं, जिसमें पुरुष के जननांग को उत्तेजित अवस्था में, स्त्री की ओर तने दर्शाया गया है. ये मूर्तिशिल्प हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त मातृदेवी की प्रतिमा से लगभग तीन हजार वर्ष पुराने हैं. दरअसल जिन दिनों ये मूर्तिशिल्प ढाले गए उन दिनों जीवन बहुत कठिन था. जनसंख्या स्तर बनाए रखना बड़ी चुनौती थी. मनुष्य के लिए आत्मरक्षा का मामला ही इतना बड़ा था कि काम-संबंधों के लिए रुचि और समय का अभाव बना ही रहता था. काम-संबंधों को बढ़ावा देने के लिए उन्हें संस्कृति का हिस्सा बनाया गया. वसंतोत्सव, अग्नि के चारों और चक्कर लगाते हुए यौनिक संकेत करना जैसी प्रथाएं प्राचीन सभी समाजों में रही हैं. यदि जनजातियों में इस तरह प्रथाएं पूर्णतः अथवा आंशिक रूप से आज भी विद्यमान हैं तो इसका कारण है कि औद्योगिकीकरण से दूर रहने के कारण उनके लिए जीवन की चुनौतियां आज भी कमोबेश वैसी ही हैं. शिवलिंग के प्रतीक को इसी रूप में देखा जाना चाहिए. न कि उसको ब्रह्मांड की उत्पत्ति का आधार बनाकर अपने विवेक को जड़ बना लेने में कोई श्रेय है.

बहरहाल, हमारी लंबी चर्चा यदा-कदा उत्तेजक मगर शालीन बनी रही. वैसे भी एकाध बार तीखी बात कह देने के बाद मैं सतर्क हो चुका था और खुद को बेहतरीन श्रोता सिद्ध करने में लगा रहा. इसका लाभ भी हुआ, चर्चा के बीच आधुनिक अंग्रेजी साहित्य के बारे में अच्छी जानकारी मिली. जो अन्यत्र दुर्लभ थी. राजीव उन अनेक विज्ञान लेखकों में से हैं जो ‘यूएफओ’ को वास्तविक मानते हैं. जिन्हें भरोसा है कि दूसरे ग्रहों पर अब भी जीवन है. हालांकि बारे में उनकी लेखकीय आस्था चाहे जो कहती हो, वैज्ञानिक प्रामाणिकता अब भी संदेह के घेरे में है. ऐसे तथ्य को जो अभी केवल एक संभावना है, विज्ञान कथाकार संभावना ही माने रहे, यह उनका विज्ञानबोध है. विज्ञान साहित्य में रुचि विज्ञानबोध का प्रतीक भले न हो, लेकिन एक विज्ञान लेखक में विज्ञानबोध का अक्षुण्ण रहना, मौलिकता को बनाए रखना है. बहरहाल, बैठक समाप्त हुई तो हम पहले की तरह सामान्य थे. वैसे ही संबंध अगले दिन भी बने रहे.

राजीव को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से श्रेष्ठ विज्ञान लेखन के लिए पुरस्कृत किया गया था. हमारी चर्चा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली तथा उसे जब-तब दर्शन की ओर मोड़ देने वाली कामना सिंह भी सम्मानित हुई थीं. समारोह की अध्यक्षता संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह ने की थी. उदय प्रताप जी कवि रह चुके हैं. एक समय में कवि सम्मेलनों और मुशायरों में उनकी उपस्थिति उसकी सफलता की गारंटी मान ली जाती थी. मुझे वे सहृदय और सच्चे इसान लगे, सांप्रदायिकता से कोसों दूर. उनके प्रभाव में संस्थान ने काफी तरक्की की है. कई रुकी हुई योजनाएं फिर से आरंभ हुई हैं. अधिकारीगण उनके रहते संस्थान की गतिविधियों के आगे बढ़ने के प्रति आशान्वित हैं. यही भरोसा था जो जाकिर अली रजनीश उन्हें बालसाहित्यकारों की ओर से एक प्रतिवेदन की तैयारी करने में अभिनंदन समारोह के दौरान भी लगे थे. लेकिन उदय प्रताप सिंह जी को कहीं जाना था. इसलिए उस दिन वह कार्य संपन्न न हो सका. हमने अगले दिन प्रतिवेदन सौंपने का निर्णय लेते हुए, एक-दूसरे से विदा ली थी.

अगला दिन वापसी का था. जाकिर प्रतिवेदन सौंपने की तैयारी में लगे थे. साहित्यकारों को जोड़ते हुए. कार्यालय की ओर से उदयप्रताप सिंह जी के कार्यालय पहुंचने का समय एक बजे बताया गया था. लेकिन यह सोचते हुए कि साहित्यकार बाहर से आए हैं और उनकी रेलगाड़ी का समय हो सकता है, वे आध घंटे पहले ही कार्यालय पहुंच चुके थे. मुलाकात बड़े ही सौहार्दपूर्ण परिवेश में हुई. एक साहित्यकार को जैसा मानवीय होना चाहिए, वैसे ही मानवीय और सहृदय वे सिद्ध थे. मुलाकात के दौरान धार्मिक कठमुल्लापन पर उन्होंने बाइबिल की एक कहानी का जिक्र भी किया. कहानी के अनुसार स्वर्ग से निष्कासित होने के पश्चात आदमी बहुत व्यथित था. अपराधबोध से ग्रसित और डरा-डरा वह परमात्मा के पास पहुंचा—

‘हे ईश्वर, आपसे दूर रहकर मैं कैसे जी पाऊंगा. वहां कौन मेरा मार्गदर्शन करेगा.’
एक आदर्श पिता की भांति परमात्मा ने आदमी की व्यथा को समझा. फिर उसने आदमी से अपनी हथेली आगे करने को कहा. आदमी ने वैसा ही किया. परमात्मा ने उसकी एक हथेली पर सामान्यबोध(कॉमनसेंस) को रखा और अच्छी तरह समझाया—
‘अपनी बुद्धि पर भरोसा करते हुए सभी काम ‘कॉमनसेंस’ से करना. अक्ल का साथ कभी मत छोड़ना.’ आदमी डरा हुआ था. सही मायने में तो वह स्वर्ग से जाना ही नहीं चाहता था. इसलिए उसने आगे कहा—
‘हे प्रभु, मैंने तो सुना है कि धरती बहुत बड़ी है. उसे समझने के लिए मेरा जीवन बहुत छोटा होगा. ऐसे में सामान्य-बोध से कैसे काम चलेगा?’ तब परमात्मा ने उससे दूसरी हथेली भी आगे करने को कहा और इस बार उसकी हथेली पर विश्वास(फेथ) को रखा और कहा—‘जब तुम्हारी बुद्धि कोई काम न करे, तब आस्था और विश्वास से काम चलाना और जो व्यक्ति तुम्हें सर्वाधिक भरोसेमंद दिखे, उसका कहा मानना. जरूरत पड़े तो उपयुक्त समय तक उसका अनुसरण भी करना.’ आदमी खुश होकर धरती की ओर चल दिया. थोड़ी देर पहले जो आदमी बहुत विचलित था, अब वह संतुष्ट नजर आ रहा था—
‘एक तरह से अच्छा ही हुआ. यहां स्वर्ग में तो पूरी तरह से ईश्वर के अधीन था. धरती पर जाने के बाद कम से कम अपने विवेक का इस्तेमाल तो कर सकूंगा. अब मैं स्वतंत्र हूं.’ खुशी के एहसास से वह इतना भर गया कि कब ‘आस्था’ और ‘सामान्य-बोध’ की हथेलियां बदल गईं, उसको पता ही नहीं चला. उस गफलत का दंड यह मिला कि अब वह आस्था और विश्वास को ही सबकुछ मानता है. उसी में मुक्ति की खोज करता है. और अपनी विवेक-बुद्धि का उपयोग बहुत कम अवसरों पर करता है. यही उसकी मुश्किलों की असली वजह है.

बातों-बातों में यह बात भी निकलकर आई कि बच्चों को धर्म की शिक्षा एक अवधि के बाद, उनकी बुद्धि परिपक्व होने के बाद दी जानी चाहिए. यदि प्रदेश सरकार में मुस्लिमों का अभी भी सबसे ज्यादा भरोसा है तो इसके पीछे उदयप्रताप सिंह जैसे साहित्यकारों का उससे जुड़ा होना भी है.

संस्थान द्वारा दिए गए सम्मानों में एक सम्मान ‘कृष्ण विनायक फड़के बाल साहित्य समीक्षा सम्मान’ भी था. मैं बालसाहित्य का अध्येता अपने आप को नहीं मानता. लेकिन जब-तब जितनी भी पुस्तकें आंखों के आगे से गुजरीं हैं, उनमें फड़के साहब के नाम पर नजर नहीं पड़ी. यह मेरी अल्पज्ञता हो सकती है; अथवा हिंदी प्रदेश की अपने दिवंगत बालसाहित्यकारों के जीवन और रचनाकर्म को समेटने के प्रति उदासीनता भी. ऐसे अनेक साहित्यकर्मी रहे होंगे जिन्होंने बालसाहित्य के आरंभिक दौर में इस विधा को समृद्ध किया. इनमें से कुछ लेखक तो शहरों में रहे होंगे और अनेक गांव में भी, जिनका नाम भी आज कोई न जानता हो. यह प्रत्येक समाज का कर्तव्य है कि वह अपने सर्जकों को, जो समाज के नवनिर्माण हेतु निरंतर प्रयासरत हैं और कुछ तो अपने अल्प संसाधनों को भी साहित्य-सेवा की भेंट चढ़ा देते हैं—याद रखे. एक कृतघ्न समाज ही अपने रचनाकारों को अतीत के अंधियारे में विलीन होते देख सकता है. ऐसा समाज स्वयं भी बहुत जल्दी अपने लक्ष्य से भटक जाता है.

कृष्ण विनायक फड़के के बारे में पता चला कि वे कानपुर के थे. बच्चों को पढ़ाते थे. बच्चे भी उन्हें बहुत प्यार करते थे. लेकिन उनके साहित्यिक अवदान, विशेष रूप से समीक्षा के क्षेत्र में उनके मौलिक अवदान पर जानकारी कहीं से भी प्राप्त नहीं हो सकी. बस कुछ छिटपुट संकेत प्राप्त होते हैं. उदाहरण के लिए अपनी पुस्तक ‘भारतीय प्रतिभाएं’ में डॉ. राष्ट्रबंधु, भगवती प्रसाद गुप्त के बारे में बताते हुए लिखते हैं कि गुप्तजी ने ‘बाल आंदोलन के जनक कृष्ण विनायक फड़के की कहानियों, कविताओं के कई संग्रह, ‘फड़के जी के कंपट’, ‘बच्चों का समाजवाद’ आदि पुस्तकें भी प्रकाशित कराईं’(पृष्ठ—180). एक जगह उल्लेख है कि अपनी अंतिम इच्छा के रूप में फड़के जी ने आग्रह किया था कि उनके मृत्योपरांत उनकी शवयात्रा में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी के बालगीत, ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ का गायन-वादन किया जाए. वे मानते थे कि अंतिम समय भी सांप्रदायिक एकता का संदेश दिया जाना चाहिए. अन्यत्र संकेत मिलता है कि फड़के साहब की बालनाटक के क्षेत्र में भी सक्रिय योगदान था. फड़के जी के ऊपर एक जानकारी ‘शोध-गंगा’ में प्रकाशित एक लेख ‘दि रोड टू दि फाइनल विकट्री(1940—47)’ में भी मिलती है, जिसके अनुसार फड़के साहब मारबाड़ी इंटर कॉलिज, कानपुर के प्रधानाचार्य थे. बड़े ही सिद्धांत निष्ट और बच्चों से हित का ध्यान रखने वाले. एक बार एक टेंडर को लेकर उनकी कालेज प्रबंधन से अनबन हो गई. उन्हें कालेज से सस्पेंड कर दिया गया. कॉलिज के विद्यार्थी फड़के साहब के समर्थन में थे. उन्होंने अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने का फैसला किया और 21 अगस्त 1941 को वे बेमियादी हड़ताल पर निकल पड़े. प्रबंधक मंडल ने पुलिस की मदद मांगी. पुलिस ने दबाव डाला. प्रबंधकों की ओर से भी खूब धमकियां मिलीं. अंततः पुलिस ने विद्यार्थियों और स्कूल प्रबंधक मंडल के बीच हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया. इसके फलस्वरूप प्रबंधक मंडल को निलंबन का आदेश वापस लेना पड़ा.

डॉ. राष्ट्रबंधु की पुस्तक और शोध-गंगा के आलेख दोनों मैं, एक ही फड़के साहब का उल्लेख हुआ है, यह मैं दावे के साथ नहीं कह सकता. हालांकि दोनों घटनाएं कानपुर से संबद्ध हैं. उपलब्ध जानकारी से यह अंदाजा नहीं होता कि फड़के साहब का बालसाहित्य समीक्षा के क्षेत्र में बालकल्याण के लिए लिखे गए छिटपुट आलेखों को छोड़कर, उल्लेखनीय योगदान था. पुरस्कार का नामकरण किसी भी महापुरुष के नाम पर किया जा सकता है. लेकिन जब विधागत पुरस्कार-सम्मानों की घोषणा होती है तो यह अपेक्षा की जाती है कि पुरस्कृत व्यक्ति ने अपने पूर्वपुरुष की परंपरा का निर्वाह और परिष्करण किया है. इस पुरस्कार के संदर्भ में परंपरा ही विलुप्त-प्रायः है. मुख्य अतिथि और संस्थान में पूर्वाधिकारी रह चुके विनोद चंद्र पांडेय ‘विनोद’ ने अपने वक्तव्य में बताया कि फड़के साहब का बालसाहित्य समीक्षा के क्षेत्र में योगदान था, लेकिन बालसाहित्य के अधिकांश विद्वान बालसाहित्य समीक्षा की शुरुआत निरंकार देव सेवक द्वारा हिंदी बालकविता पर लिखे एक आलोचनात्मक लेख से मानते हैं. ऐसे में फड़के साहब का बालसाहित्य समीक्षा के क्षेत्र में क्या योगदान था, यह बताना उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की जिम्मेदारी है. यदि यह संभव नहीं है तो उचित होगा कि इस पुरस्कार का नामकरण डॉ. राष्ट्रबंधु, जो 37 वर्षों तक ‘बाल साहित्य समीक्षा’ निकालते रहे—के नाम पर कर दिया जाना चाहिए. डॉ. हरिकृष्ण देवसरे इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त पात्र हैं, जो हिंदी बालसाहित्य समीक्षा के प्रतिमान माने जाते हैं. तीसरा नाम डॉ. श्री प्रसाद का भी हो सकता है, जिन्होंने आलोचनात्मक और सर्जनात्मक दोनों ही प्रकार का भरपूर लेखन किया.

वस्तुतः आज से तीस-चालीस वर्ष पहले तक ऐसे साहित्य को बालोपयोगी माना जाता था, जो बच्चों को ‘अच्छे संस्कार’ देता हो. अच्छे संस्कार का आशय धार्मिक शिक्षा से था. इसलिए ऐसा साहित्य जो देवी-देवताओं की जानकारी देता हो, उपदेशात्मक हो वही आदर्श बालसाहित्य माना जाता था. लगभग दो शताब्दी पहले तक यही स्थिति यूरोपीय साहित्य में भी थी. वहां बाइबिल की शिक्षाओं से भरपूर साहित्य को बालोपयोगी मानते हुए संस्तुति की जाती थी. यूरोप में उनीसवीं शताब्दी के मध्य तक बालसाहित्य के प्रति समझ बदलने लगी थी. वहां मार्क ट्वेन, हैंस एंडरसन जैसे लेखक पैदा हुए. उन्होंने नए मूल्य बोध से भरपूर मौलिक रचनाएं लिखीं. कुछ ने परंपरागत कहानियों का बालमनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए रूपांतरण किया. इसका सुफल यह हुआ कि समर्पण, मूक आज्ञाकारिता, अतीतानुराग के स्थान पर बच्चों को ऐसा साहित्य पढ़ने को मिलना चाहिए जिससे वे साहसी, विवेकवान, तार्किक और नैतिक मूल्यों की प्रेरणा मिल सके. इसका लाभ उन्हें औद्योगिक क्रांति की सफलता के रूप में मिला. मेरी अत्यल्प जानकारी के अनुसार फड़के साहब आदर्श निर्भीक, निडर, सिद्धांतनिष्ट प्रधानाचार्य थे. लेकिन ऐसे तो अनेक अध्यापक और भी रहे होंगे. जहां तक समीक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान की बात है, उसके बारे में कोई जानकारी बालसाहित्य-मर्मज्ञों को नहीं है. इस बारे में पर्याप्त जानकारी समेटने के पश्चात उपयुक्त निर्णय लिया जाना चाहिए.

लखनऊ की इस यात्रा में जाकिर अली रजनीश मिले, बंधु कुशावर्ती से भेंट हुई. हेमंत कुमार के लेखन और नाटकों के क्षेत्र में किए गए कार्य के बारे में पर्याप्त जानकारी मिलती ही रहती थी. संस्थान ने उन्हें बालसाहित्य के क्षेत्र में नाटक विधा में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया है. मुलाकात संजीव जायसवाल ‘संजय’ से भी हुई जिन्हें बालकहानी के लिए पुरस्कृत किया गया है. जाकिर मुझे सबसे उत्साही बालसाहित्यकार लगे. बालसाहित्य सम्मानों के दुबारा आरंभ होने में जिन साहित्यकारों का योगदान है, उनमें से एक वे भी हैं. डॉ. हेमंत बहुत ही सरलवृत्ति के भले इंसान महसूस हुए.

सरकारी खर्च पर होने वाली यात्राओं की कमजोरी होती है कि आप वहां बहुत ज्यादा भ्रमण नहीं कर सकते. आपका जाना, रहना सब कुछ पहले से तय होता है. मार्च महीने में तो वैसे भी कार्यक्रम बहुत सीमित समय के बनाने पड़ते हैं. फिर भी इस यात्रा में संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष उदयप्रताप सिंह, संस्थान सचिव सुधाकर अदीब, ‘बालवाणी’ के संपादक अनिल मिश्र, से भेंट भी यादगार रही. परंतु लखनऊ अनदेखा ही रह गया. हर यात्रा की, चाहे वह बहुत लंबी हो या छोटी, यही नियति है. हर बार कुछ न कुछ छूट ही जाता है. यही जीवन के साथ होता है. आखिर वह भी तो एक यात्रा है. चरैवेति….चरैवेति…..

— ओमप्रकाश कश्यप

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