धर्म का सत्तापक्ष

धर्म और अभिजन संस्कृति16

धर्मो यो बाधते धर्मं न स धर्मो कुधर्म तत्।

अविरोधी यु तो धर्मः सः धर्मो मुनिसत्तम।।1

महाभारत

धर्म की सत्ता को लेकर दुनियाभर के अधिकांश लोग एकमत दिखाई देंगे. अधिकांश मानते हैं कि धर्म है. धर्म की जरूरत दुनिया को है. वे यह दावा भी करेंगे कि धर्म ही दुनिया को चलाता है….कि धर्मविहीन जीवन अर्थहीन है. लेकिन दुनिया में तो छोटेबड़े सैकड़ों धर्म और हजारों संस्कृतियां हैं. ऐसे में लोगों से यदि पूछा जाए कि वे किस धर्म के पक्ष में हैं, अथवा कौनसा धर्म उन्हें अपने विवेक और भावनाओं के अनुकूल लगता हैतो वे तत्क्षण अलगअलग खानों में बंट जाएंगे. उन खानों के अनेक उपखाने होंगे और उपखानों में भिन्नभिन्न श्रेणियां. अंतहीन स्तरीकरण के बावजूद जो एक बात उन सभी में समान होगी, वह यह कि उनमें से प्रत्येक अपनेअपने ईश्वर, अपनेअपने आचारविचार तथा अपनेअपने कर्मकांड की सर्वश्रेष्ठता का बखान करेगा. प्रत्येक का दावा अपने पंथ की सर्वोच्चता का होगा. यहां पंथ माने केवल धर्मविशेष का आराध्य तथा उसे प्रसन्न रखने के लिए किए जाने वाले कर्मकांड है. मानो धर्म सिर्फ आस्था और विश्वास का पर्याय हो. इस तरह वे अनजाने ही इस हकीकत को बयान कर जाते हैं कि विभिन्न धर्मों के बीच मुख्य अंतर सामाजिक आचरण अथवा व्यवहार का न होकर, उन मान्यताओं और विश्वासों का रहा है, जो उन्हें विशिष्ट आध्यात्मिक पहचान देते हैं. इसे किन्हीं दो धर्मों की तुलना द्वारा आसानी से समझा जा सकता है. हिंदू धर्म और इस्लाम की पूजा पद्धति में जमीनआसमान का अंतर है. हिंदू मूर्तियों को पूजते हैं. यहां तक कि जो हिंदू निराकार ईश्वर की मानता रखते हैं, उसे भी दूसरों को मूर्ति पूजा करते देख कोई कष्ट नहीं होता. वे इसे व्यक्तिगत मामला मानकर चुप रहते हैं. इसके विपरीत इस्लाम में मूर्ति पूजा धर्मविरुद्ध आचरण है. इस अंतर के आधार पर दोनों धर्मों के बीच सांप्रदायिक तनातनी की खबरें आती रहती हैं. उस समय वे मुद्दे पूरी तरह छिप जाते; अथवा छिपा दिए जाते हैं, जो न केवल इन दोनों धर्मों, बल्कि दुनिया के सभी धर्मों के बीच बुनियादी एकता की बात करते हैं. उदाहरण के लिए हिंदुओं के परमात्मा की भांति इस्लाम में भी अल्लाह को निराकार और सर्वेसर्वा माना गया है. अवतारवाद वहां पैगंबर या नवी के रूप में सामने आता है. इसी तरह लोकव्यवहार के समय सभी धर्म संकट में जरूरतमंद की मदद करने, आचरण की शुद्धता बनाए रखने तथा सत्य पर समानरूप से जोर देते हुए नजर आते हैं, किंतु कर्मकांड और पूजा पद्धति के आधार पर उनके अंतर्विरोध स्पष्ट रूप से सामने आ जाते हैं. धर्म की इस विशेषता को लावेंथल ने भलीभांति स्पष्ट किया था. उसका मानना था कि धर्म का मुख्य दायित्व मानवीकरण की गति को तेज करते हुए समाज को नैतिकता की ओर उन्मुख रखना है, तदनुसार धर्म का अभिप्रेत है

  1. भौतिक/परामानवीय सत्ता में विश्वास करना.

  2. सदाचरण को जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाना. सामाजिक सामंजस्य, सद्भाव, मैत्री एवं भाईचारे को बढ़ावा देते हुए अच्छे कार्य करना, बुराई से बचना और यथासंभव दूसरों की मदद करना.

  3. इस विचार में आस्था रखना कि सृष्टि का सिरजनहार ही नैतिकता और सद्गुणों का आधार है.

  4. धार्मिक आस्था एवं मर्यादाओं का प्रचारप्रसार बिना सामाजिक संस्थाओं के समर्थन के असंभव है. इसलिए सभी धर्म सामाजिक संस्थाओं पर निर्भर होते आए हैं. अतएव सामाजिक संस्थाओं की मर्यादा की रक्षा करना तथा अनुशासित जीवन की प्रेरणा जगाना भी धार्मिक जीवन की अपेक्षाओं में आता है.

उल्लेखनीय है कि श्रद्धा और विश्वास, जिन्हें धर्म का सामान्य प्रतीक माना जाता है, श्रद्धालु का अपना चयन बहुत कम होते हैं. वे या तो परंपरानुगत होते हैं अथवा पुरोहित वर्ग द्वारा थोप दिए जाते हैं. कुल मिलाकर यह एक विडंबना ही है कि मनुष्य के सामाजिक जीवन, उसकी जीवनचर्या, रहनसहन आदि को तय करने वाले धार्मिक प्रतीकों के चयन में व्यक्ति के अपने विवेक का कोई योगदान नहीं होेता. जनसाधारण धार्मिक चर्चा में भाग तो ले सकता है, किंतु उसमें गुणात्मक संवर्धन का उसे कोई अधिकार नहीं होता. उसकी नियति सभी प्रकार की प्रश्नाकुलता से मुक्त अनुयायी की होती है. वहां सवाल अथवा किसी प्रकार की शंका उत्पन्न करना अच्छा नहीं माना जाता. यह स्थिति आर्थिक रूप से पिछड़े और विकासशील देशों में अत्यंत चिंताजनक है. आलोचना विमर्श की कोई गुंजाइश न होने पर व्यक्ति थोपे अथवा मजबूरी में अपनाए गए कर्मकांडों का अनुसरण मशीनवत करता है. परिणामस्वरूप वह कर्मकांडों के पीछे की वैचारिकी को समझने में भी असमर्थ रहता है. बावजूद इसके धर्म को विशिष्ट पहचान देने, उसको खास सीमारेखा में बांधे रखने, यहां तक कि उसे प्रबल संगठनकारी शक्ति बनाने में भी इसी पक्ष का योगदान सर्वाधिक होता है. यथार्थ में, धर्म के इस पक्ष का मनुष्य के सामाजिक जीवन से कोई संबंध नहीं होता. न ही यह मानव जीवन में किसी प्रकार के सुख की वृद्धि करता हैं. इसलिए हम उन्हें धर्म का बाह्यावरण, उसका मुखौटा भी मान सकते हैं. चूंकि रूढि़यों और धार्मिक कर्मकांडों को मनुष्य अपने विवेक के विरुद्ध जाकर अपनाता है, इस कारण वह उनका विवश अनुसरणकर्ता बना रहता है.

धर्म की इसी दुर्बलता का लाभ उठाकर पुरोहित वर्ग उसका स्वार्थानुरूप उपयोग करता है. वह स्थितियों की अपने हितों के अनुसार व्याख्या करता है, और धर्म के लोकव्यवहारी रूप के स्थान पर, उस रूप के जहां वह सामान्य नैतिकता का समर्थन करता हुआ नजर आता हैकेवल उसके आध्यात्मिक पहलू को महत्त्व देने लगता है. इससे धर्म का लोकप्रचलित रूप उन कर्मकांडों एवं रूढि़यों तक सिमट जाता है, जो मोक्ष की प्राप्ति अथवा तीसरी अज्ञात शक्ति को प्रसन्न रखने की कामना के साथ पुरोहित वर्ग द्वारा निहित स्वार्थवश थोप दिए जाते हैं. जिनकी आलोचना दार्शनिकों, बुद्धिजीवियों, के अलावा समयसमय पर सुधी धर्मवेत्ताओं द्वारा भी की जाती रही है. पुरोहित वर्ग के इस षड्यंत्र को समाज के शीर्षस्थ वर्गों का भी पूरा समर्थन होता है. उन्हीं के परोक्ष नेतृत्व में धर्म के नाम पर असमानताकारी व्यवस्था से अनुकूलीकरण का षड्यंत्र, पीढ़ीदरपीढ़ी चलता रहता है. पुरोहित वर्ग द्वारा की गई धार्मिक व्यवस्थाएं रूढ़ होती हैं, किंतु केवल साधारण जन के लिए. चूंकि शक्तिशाली यानी अभिजन समूह धर्म का उपयोग करता है, इसलिए सामाजिक संस्थाओं का जटिल अथवा सरल होना उसके लिए कोई मायने नहीं रखता. वे धर्म का समर्थन तभी तक करते हैं, जब तक वह उसकी स्वार्थसिद्धि के काम आता है. जैसे ही धर्म अथवा उसका कोई संस्कार शीर्षस्थ वर्ग के हितों के आडे़ आता है, वह तत्क्षण उसको तिलांजलि देकर मनमाने आचरण पर उतर आता है. उस समय वह पुरोहितवर्ग की चिंता नहीं करता. जो पुरोहित वर्ग धर्म की उपेक्षा या उसके द्वारा व्यवस्था में मामूली परिवर्तन को आपत्तिजनक मानता है, वह समाज के शक्तिशाली वर्ग द्वारा किए गए भारी फेरबदल को समरथ को नहिं दोष गुसाईंमानकर न केवल झेलता है, बल्कि अपनी व्याख्याओं में आवश्यकतानुसार संशोधन कर, खुद को सत्ता पक्ष के समर्थन में बनाए रखता है. साफ है, जनसाधारण धार्मिक निषेधों/व्यवस्थाओं का पालन करता है, जबकि पुरोहित समेत शक्तिशाली वर्ग उनका स्वार्थानुरूप उपयोग. इसके अनगिनत उदाहरण इतिहास से लेकर रोजमर्रा के जीवन में खोजे जा सकते हैं. एक उदाहरण औरंगजेब का है, जिसकी गिनती धर्मप्रवण बादशाहों में की जाती है. यह भी कहा जाता है कि उसने अपने जीवन को इस्लाम और शरीयत के आदर्शों के अनुरूप ढाल लिया था. उसी औरंगजेब द्वारा अपने गुरु मुल्ला साहे को लिखे गए एक पत्र का उल्लेख डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कलकत्ता विश्वविद्यालय में कमला व्याख्यानके दौरान किया था. पत्र में औरंगजेब लिखता है

तुमने मेरे पिता शहंशाह से कहा था कि तुम मुझे दर्शन पढ़ाओगे. यह ठीक है, मुझे भलीभांति याद है कि तुमने अनेक वर्षों तक मुझे वस्तुओं के संबंध में ऐसे अनेक अव्यक्त प्रश्न समझाए, जिनसे मन को कोई संतोष नहीं होता और जिनका मानव समाज के लिए कोई उपयोग नहीं है. ऐसी थोथी धारणाएं और खोखली कल्पनाएं, जिनकी केवल यह विशेषता थी कि उन्हें समझ पाना बहुत कठिन था और भूल पाना बहुत सरल….क्या तुमने कभी मुझे यह सिखाने की चेष्टा की कि शहर पर घेरा कैसे डाला जाता है या सेना को किस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है? इन वस्तुओं के लिए मैं अन्य लोगों का आभारी हूं, तुम्हारा बिलकुल नहीं.’’2

स्पष्ट है, आवश्यकता पड़ने पर धार्मिक मूल्यों के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया जाना चाहिए, यह उसके अनुयायी की सामाजिक हैसियत पर निर्भर करता है. जनसाधारण धार्मिक शक्तियों के आगे कमजोर होता है. अपनी हैयिसत के अनुसार वह धार्मिक परिपाटियों को अपनाता है तथा जरूरत पड़ने पर उनके लिए अपने हितों का बलिदान भी देता है. जबकि शक्तिशाली धर्म का उपयोग केवल अपने स्वार्थ के लिए करता है. जनसाधारण के बीच वह अपनी छवि उदार धर्मानुयायी की बनाए रखता है तथा अपने स्वार्थ के लिए धार्मिक स्थापनाओं को मनचाहा मोड़ देने में सफल हो जाता है. धर्म शक्तिशाली की ढाल और तलवार दोनों होता है. वह समाज को छोटेछोटे अनेक समूहों में बांट देता है, फिर उनके बीच व्याप्त असमानता को नियतिवादी तर्कों द्वारा सही सिद्ध करने की कोशिश करता है. उस व्यवस्था में लाभान्वित अभिजन तरहतरह से अपना बचाव करते हैं. चूंकि जनसाधारण धार्मिक व्यवस्थाओं को आस्थावादी दृष्टि से देखता है, इसलिए वह असमानता और अनाचार को पूर्वजन्मों के प्रसादके रूप में ग्रहण करता है. ऐसी व्यवस्था में कमजोर की नियति उसके प्रहार को सहने तथा जैसे भी हो, परिस्थितियों से सामंजस्य बनाए रखने की होती है. भले ही इसके लिए उसे कुछ भी क्यों न गंवाना पड़े. इस तरह धर्म की मूलभावना तथा उसके व्यवहार पक्ष में अनायास ही अंतर आ जाता है. क्योंकि जिस अधिष्ठाता शक्ति को, सर्वशक्तिमान और सर्वेसर्वा बताकर धर्म अपने कर्मकांडों के जरिये पोषित करता है, उसकी एकमात्र विशेषता अपनी ताकत के बल पर मनमाने फैसले थोपने की होती है. हर मामले में उसका निर्णय सर्वोपरि होता है. वैचारिक स्वतंत्रता अथवा संवाद का कोई अवसर उसके प्रतिवादी को नहीं मिल पाता. परोक्ष रूप में वह समाज के शासक वर्ग की मनोकामनाओं की निर्मिति होती है, जो शेष समाज पर छाये रखना चाहता है. स्वयं को सर्वशक्तिमानका प्रिय अथवा विशेष कृपापात्र घोषित करते हुए शीर्षस्थ वर्ग अपने हर निरंकुश आचरण को वैध ठहराने में लगा रहता है. इस काम में पुरोहित वर्ग उसकी मदद करता है. परिणामस्वरूप समाज में शासक और शासित का भेद स्थायी रूप ले लेता है.

धर्म का सकारात्मक पक्ष भी है. धर्माधारित समाजों में ऐसे अवसर प्रायः आते हैं, जब धर्म पराजित मन के संबल का काम करता है; अथवा हताशा में डूबे मनुष्य को प्राकृतिक न्याय का भरोसा देकर संसारसमर में डटे रहने की प्रेरणा देता है. लोकव्यवहार में धार्मिक नैतिकता प्रेरणादायी सिद्ध होती है. उससे अनेक प्रकार के कल्याण कार्यक्रम चलाए जाते हैं. अपने मूल, पारिभाषिक रूप में धर्म भी नैतिकता से आच्छादित होता है. फलस्वरूप वह सामाजिक जीवन का आदर्श बना रहता है. विवाह, सांस्कृतिक पर्व, त्योहार आदि के समय लोग एकदूसरे को अपना सहधर्मी मानते हुए एकजुटता दिखाते हैं. सामान्य लोकादर्शों का धारक, उनका समर्थक होने के कारण धर्म सामाजिकता की कसौटी के रूप में सामने आता है. धर्म का यही लक्षण उसके सामाजिक औचित्य की कसौटी बनता है. बताता है कि अधिकतम लोगों का अधिकतम हित साधने के लिए समाज को कैसा होना चाहिए. अपनी विशिष्ट संरचना के कारण धर्म यद्यपि वर्ग विभाजन की पुष्टि करता है. उसे बनाए रखने में मददगार होता है. बावजूद इसके वह समाज के प्रत्येक व्यक्ति को यह भरोसा दिलाता है कि धर्म के उच्चतम लक्ष्यों को मर्यादित आचरण द्वारा प्राप्त किया जा सकता है. चूंकि प्रत्येक धर्म कर्मकांडों पर टिका होता है, इसलिए धार्मिक कर्मकांडों को इस प्रकार बनाया जाता है कि वे समाज के सभी वर्गों की पहुंच में बने रहें.

कुछ भौगोलिक एवं परिस्थितिगत प्रभावों को छोड़ दिया जाए तो दुनियाभर के मनुष्यों के स्वभाव में एकरूपता होती है. सभी समाजीकरण को महत्त्व देते हैं. सभी उसे बनाए रखने को तत्पर होते हैं तथा सभी आचरण की पवित्रता को महत्त्व देते हैं. इसलिए धर्म का वह पक्ष जो सामाजिक व्यवहार का नियमन करता है, लोगों कों सहयोग एवं सहअस्तित्व का पाठ पढ़ाता है, सभी धर्मों में मिलताजुलता होता है. उसे धर्म का नियामक पक्ष भी कह सकते हैं, जिसे समाजीकरण की अनिवार्यता के रूप में अपनाया जाता है. हालांकि वास्तविकता पारिभाषिक आदर्श से पर्याप्त भिन्न होती है. जैसा पहले भी कहा गया है, सामाजिक उद्देश्यों को लेकर विभिन्न धर्मों में खास अंतर नहीं होता, लेकिन जैसे ही मामला आराध्य और उसे प्रसन्न रखने के लिए किए जाने वाले कर्मकांड पर आता हैतब विभिन्न धार्मिक समूह अपनीअपनी मान्यताओं के साथ अड़कर प्रतिद्वंद्वियों की भांति व्यवहार करने लगते हैं. उस समय वे बिसरा देते हैं कि जिस आध्यात्मिक विशिष्टता के नाम पर वे जिद ठाने हुए हैं, वह धार्मिक उपलब्धियों की आरंभिक स्थिति, उनका पहला चरण है. धर्म के भीतर उसके अनुयायियों में भी वर्ग के आधार पर स्तरीकरण पनपता है. धार्मिक कर्मकांड में लगे लोग स्तरीकरण को कम करने या उसके विरोध में आवाज उठाने के बजाय किसी न किसी रूप में उसका समर्थन करते रहते हैं. परिणामस्वरूप समाजार्थिक असमानता बढ़ती है. धर्म के उच्चतम स्तर पर हालांकि समस्त भेदों का समाहार हो जाता है, लेकिन उसे समझने के लिए जिस विवेक की आवश्यकता होती है, धर्म को अपना मार्गदर्शक मानकर जीने वाला, असल में रूढि़यों और कर्मकांडों के संजाल में फंसा आम आदमी, उस ऊंचाई तक पहुंच ही नहीं पाता है. न ही उसके प्रबोधीकरण की कोशिश की जाती है. विवेकीकरण के अभाव में धर्म केवल कर्मकांड में सिमटकर, भीड़ का आचरण बन जाता है.

आगे बढ़ने से पहले हम धर्म की कुछ मान्य परिभाषाओं की चर्चा करेंगे. विद्वान धर्म की उत्पत्ति धृधातु से मानते हैं. ऋग्वेद में इस शब्द का प्रयोग संज्ञाऔर विशेषणदोनों रूपों में किया गया है. जिसका आशय−‘धारण करना, ‘विश्वास लाना, ‘अपना लेना, ‘अंगीकार करना, ‘आलंबन देनाआदि से है. यहां धारण करनाव्यापक पद है. इसमें संस्कृति, विश्वास, आध्यात्मिक चेतना, कर्मकांडों की शृंखला, संस्कार आदि सभी समाहित हैं. धर्म का रूढ़ अर्थ, यानी केवल आध्यात्मिक शक्ति पर विश्वासले आनाइससे सिद्ध नहीं होता. धर्म के अंग्रेजी पर्याय रिलीजनके साथ यह बात नहीं है. धर्म की अपेक्षा वह सीमित अर्थ में प्रयुक्त होता आया है. Religion शब्द लेटिन मूल के अनेकार्थी शब्द Religio से लिया गया, जिसे कभी ईश्वर के प्रति सम्मान दर्शानेतो कभी ईश्वर को याद करनेके लिए लिया जाता था. सिसरो ने Religio को मनन करने, ‘ध्यान धरने, ‘अनुकरण करनेके संदर्भ में लिया है. इस तरह आध्यात्मिक विश्वास और विश्वास के प्रस्तुतीकरण की प्रक्रिया रिलीजन. सामाजिक मर्यादा, आचारव्यवहार आदि का जैसा नियमन धर्म करता है, ‘रिलीजनसे वैसी अपेक्षा नहीं की जाती. लेकिन पारिभाषिक स्थिति जो भी हो, यथार्थ में धर्मऔर रिलीजनदोनों ही बदली भूमिकाओं में दिखाई पड़ते हैं. हम आगे देखेंगे कि रिलीजनसे प्रेरणा लेते हुए धर्म ने किस तरह अपने दायरे को निरंतर संकुचित किया है. किस तरह उसके आधुनिक व्याख्याकार धार्मिक आचारसंहिता को कर्मकांड और आडंबर तक सीमित करते रहे हैं. दूसरी ओर कांट और दुर्खीम जैसे विचारक हैं, जिन्होंने रिलीजनको उसकी पारंपरिक परिभाषा की कोटि से उठाकर जीवनादर्श के रूप में परिभाषित किया है.

फ्रांसिसी विचारक इमाइल दुर्खीम ने धर्म को पवित्र शक्ति से संबंधित विश्वास एवं लोकाचारों में एकीकृत आस्थाकी संज्ञा दी है. विलियम जेम्स, संत आगस्टाइन, फ्रैड्रिक फ्रेरे, पा॓ल तिलीच आदि की परिभाषाएं भी कहीं न कहीं दुर्खीम की परिभाषा से मेल खाती है. बावजूद इसके धर्म की सर्वमान्य परिभाषा की खोज विद्वानों के लिए आज भी चुनौती है. यह उलझन को जेम्स बिसेट प्रेट ने अपनी पुस्तक दि रिलीजियस कांसियसनेसके आरंभ में ही व्यक्त किया है−‘यह यत्किंचित बेतुका तथ्य प्रतीत होता है कि धर्म नामक लोक प्रचलित शब्द जो मानवजाति के होठों से बारबार निःसृत होता है; और जिससे मानवजीवन के सबसे पहले व्यापार का बोध होता है, इतना जटिल है कि इसे परिभाषित करना अत्यंत दुष्कर है.3 इस तथ्य से अधिकांश विद्वानों की सहमति हैं कि धर्म का व्यावहारिक योगदान मनुष्य की भौतिक एवं परामानवीय जिज्ञासाओं, इच्छाआकांक्षाओं और कर्तव्यों में तालमेल बनाए रखने में है. हाफडिंग यह कहकर कि मूल्यों के संरक्षण में विश्वास ही धर्म है, ‘रिलीजनको नैतिकता के समानांतर खड़ा कर देता है. हाॅफडिंग द्वारा दी गई परिभाषा धर्म की पारंपरिक परिभाषाओं से हटकर है. सामान्य प्रक्रिया के रूप में प्रत्येक धर्म खुद को नैतिकता के ढांचे में प्रस्तुत करने की चेष्ठा करता रहता है. यह बात अलग है कि व्यवहार में वह इतना जटिल और दिखावटी हो जाता है कि केवल आडंबर प्रतीत होने लगता है. उस अवस्था में वह केवल कर्मकांडों का पिष्ट प्रेषण बनकर रह जाता है.

इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि मानव मन में आध्यात्मिक चेतना का उदय आदि जिज्ञासा से जुड़ा है. संभवतः हिम युग के तुरंत बाद. जब मनुष्य अपने अस्तित्व के लिए पगपग पर संघर्ष कर रहा था. उस समय हवा, पानी, प्रकाश, पक्षी, जानवर यानी जो भी मनुष्य को जीवन में सहायक नजर आता, उसी को अपना ईष्ट मानकर खुश रखने में लग जाता था. चूंकि सूरज सबसे चमकीला गोला था, हिमाच्छादित धरा पर उसकी गरमी जीवनऊर्जा प्रदान करनेवाली थी, इसलिए अधिकांश आरंभिक सभ्यताओं में प्रकाश को जीवनस्रोत के रूप में मान्यता मिली और सूर्य को प्रथम देवता स्वीकारा गया. इखनातून ने भी प्रकाश को जीवन माना और सूर्य को समस्त सृष्टि का आधार. इस आधार पर वह पहला धर्म बना; या यूं कहें कि सत्ता का पहला धर्म. इससे सत्तासमर्थित धर्म की अवधारणा का विकास हुआ. बल या प्रभुत्व के आधार पर अपनी आस्थाएं दूसरों पर थोपने की कोशिश की जाने लगी. जैसेजैसे समाज में समाजार्थिक असमानता बढ़ती, उसमें सफलता का अनुपात भी बढ़ता गया.

इखनातून का विश्वास जड़ नहीं था. प्रकाश मनुष्य का मार्गदर्शन करता था. लोगों को एकदूसरे से जुड़े रहने का संस्कार देता था. प्रकाश प्रकृति के आंगन में मनुष्य की आरंभिक अनुभूति थी. वही रास्ता दिखाती थी. अपने दावे के अनुसार धर्म भी ऊहापोह के क्षणों में क्या करना चाहिए, क्या नहींका संस्कार देता है. इसलिए धर्म और प्रकाश दोनों को एकदूसरे का पर्याय मान लेना पूर्णतः अनुभवसिद्ध था. इखनातून से पहले धर्म आस्था का विषय था. तब तक उसका सांस्थानीकरण नहीं हुआ था. कालांतर में जैसेजैसे धर्म के सांस्थानीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ी, दूसरों से अलग और विशिष्ट दिखने की होड़ में मनुष्य अपनी कल्पना के ईश्वर गढ़ता गया. धीरेधीरे धर्म उन शक्तियों में विश्वास का पर्याय बनता गया, जिनका अस्तित्व अप्रामाणिक और कदाचित असंभव भी था. ऐसा सृष्टि से इतर, उसके कारणों की खोज के कारण हुआ. परिणामस्वरूप लोगों की धर्मसंबंधी संकल्पना में अंतर आता गया. इसके पीछे पुरोहित वर्ग का योगदान भी कम न था, जो अपना उल्लू सीधा करने के लिए मनुष्य के दिल में पैठे डर को धर्म के कवचकुंडल में प्रस्तुत कर रहा था.

भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार धर्म का आशय सामान्य नैतिकता, जीवन जीने के ढंग एवं उन मर्यादाओं के अनुपालन से है, जिन्हें समाज अपनी निरंतर गतिशीलता के लिए चुनता है. दूसरी ओर रिलीजनशब्द का अर्थ आध्यात्मिक सत्ता में विश्वास और उसके प्रस्तुतीकरण हेतु किए जानेवाले कर्मकांडों से जुड़ा है. लेकिन यह अंतर सैद्धांतिक है. व्यवहार में धर्मभी आस्था और कर्मकांड के पक्ष में तर्क देता हुआ नजर आता है. वैचारिकता से ढलाव उसे रिलीजनके बराबर में ले आता है. धर्म की आधुनिक व्याख्याएं तो रिलीजनसे ही अनुप्रेत दिखाई पड़ती हैं, हालांकि उनके बीजतत्व प्राचीन धर्मग्रंथों में भी देखे जा सकते हैं. काणे के अनुसार ऋग्वेद में धर्म का सामान्य उल्लेख धार्मिक विधियोंअथवा धार्मिक क्रिया संस्कारोंके रूप में किया गया है−‘ऋग्वेद में धर्म का प्रयोग अनेक स्थानों पर हुआ है. कुछ जगह पुर्लिंग के रूप में तो अधिकांश जगह यह नपुंसक लिंग की तरह. कई स्थानों पर उसका आशय व्यवहार के रूप में हुआ है. कुछ ऋचाओं में धर्म को निश्चित नियमया आचरण नियमतक सीमित दिया गया है.’4 ऐतरेय ब्राह्मण को छोड़कर बाकी सभी परिभाषाओं में धर्म विशिष्ट गुण है, जिसे मर्यादित आचरण, लोकोपकार, कर्मकांड तथा विभिन्न पूजा पद्वतियों के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है. इन परिभाषाओं से धर्म या तो विशिष्ट पूजाप्रणाली सिद्ध होता है अथवा समाजअनुमन्य विशिष्ट व्यवहार. इसमें देवता का नाम कहीं भी नहीं आता. केवल जीवन की कारण शक्ति का उल्लेख होता है. हालांकि आराधक को अमूत्र्त देवता के स्थान पर मूत्र्त देवता लाने की पूरी छूट रहती है. वैदिक साहित्य का अवलोकन करें तो वहां हम बहुदेववाद को पाते हैं. जिनमें अनेक देवता है. उनको प्रसन्न करने के लिए अलगअलग मंत्र हैं, लेकिन पूजा पद्धति सामान्यतः एक समान है. यज्ञ में अपनाअपना हविष्य लेकर देवता संतुष्ट हो जाते हैं. बहुदेववाद के दौर में धर्म के साथ किसी एक देवता का नाम जुड़ना वैसे भी अव्यावहारिक था. इसलिए अर्थववेद में धर्म का आशय धार्मिक क्रियासंस्कार द्वारा अर्जित गुणसे लिया गया है. यहां क्रिया अथवा संस्कार धर्म नहीं है. उसके अनुसार धर्म ऐसा गुण है जिसकी सिद्धि धार्मिक क्रियाएं करने से होती है. ऐतरेय ब्राह्मण में धर्म का आशय सकल कर्तव्यों से है. वैशेषिकसूत्रकार के अनुसार, ‘धर्म वही है जिससे निःश्रेयस और आनंद की सृष्टि हो.जाहिर है, धर्म का संबंध आरंभ में आचरण अथवा विशिष्ट सामाजिक व्यवहार से था. धार्मिक क्रियाएं समाजीकरण के आवश्यक अंग के रूप में पहचानी जाती थीं. जगतकल्याण की भावना उसका निहित उद्देश्य था. उपनिषदों तक आतेआते धर्म जीवन में गहरी पैठ बना चुका था. छांदोग्योपनिषद में धर्म का अभिप्राय गृहस्थ धर्म, तापस धर्म और ब्रह्मचारित्व अर्थात आचार्य के गृह में अंत तक रहना है. ऐतरेय ब्राह्मण में धर्म के अर्थ को सीमित करते हुए उसे सकल धार्मिक प्रक्रियाओं का निष्पादनबताया गया है. लेकिन इसे अपवाद ही कहा जाना चाहिए. अधिकांश परिभाषाओं में धर्म विशिष्ट जीवन पद्धति है, जिसका मुख्य कर्तव्य लोकव्यवहार का नियमन करना है. तैत्तिरीयोपनिषद में भी सत्यं वदधर्मं चरकहकर धर्म को जीवनमर्यादित करने वाले उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है. उपनिषदों का प्रभाव गीता पर भी पड़ा है. गीता के कर्मयोग की चर्चा अकसर की जाती है, हालांकि वह मायावाद से प्रभावित है. स्वधर्म निधनं श्रेयःयानी अपने धर्म के पालन में ही श्रेष्ठत्वहैकहकर गीता भी धर्म को आश्रमधारणा से जोड़ देती है.

इस प्रकार की अस्पष्ट और उलझावभरी परिभाषाओं से साधारण व्यक्ति के लिए धर्म के बारे में सही निष्कर्ष निकालना भले कठिन हो, लेकिन उससे परिभाषाओं का महत्त्व कम नहीं हो जाता. प्रकारांतर में ये परिभाषाएं दर्शाती हैं कि धर्म का प्रमुख लक्ष्य मनुष्य के सामाजिक जीवन को मर्यादित करना है. इस रूप में धर्म समाजीकरण के उपकरण के रूप में काम करता है. वैसे भी धर्म के माध्यम से प्राचीन मनीषियों का मूल उद्देश्य सामाजिक अनुशासन और लोककल्याण दोनों को एक साथ साधने का रहा है. उन दिनों जब कानून नहीं था, राज्य की अवधारणा का जन्म तक नहीं हुआ था. अधिकांश लोग पढ़ेलिखे नहीं थेतब धर्म ही लोगों को नैतिकता और सामाजिकता का पाठ पढ़ाता था. वह जीवनप्रदाता शक्तियों के प्रति मनुष्य का आभार प्रदर्शन था. मानवीय चेतना के विकास के उस दौर में तत्कालीन जिज्ञासुओं को जीवन का जो कारणरूप नजर आया, उन्होंने उसी की अभ्यर्थना की. फलस्वरूप जल, वायु, आकाश, पृथ्वी, पर्जन्य, प्रकृति आदि समयसमय पर सृष्टि के कारण रूप में पहचाने गए. बौद्धिक चेतना के उभार के दौरान मनुष्य की समझ में आने लगा कि जीवन के लिए जल, वायु, आकाश, आदि सभी आवश्यक हैं. इनमें से किसी एक के बिना भी जीवन असंभव है. इससे समन्वय की प्रक्रिया पुनः आरंभ हुई. बहुदेववाद एकेश्वरवाद में ढलने लगा. ऐसे ईश्वर की परिकल्पना को बल मिला जो प्रकृति की अलगअलग शक्तियों के अधिष्ठाता देवताओं से ऊपर था. फलस्वरूप अग्नि, मित्र, वरुण, मरुत जैसे देवता जो बहुदेववाद के दिनों की कल्पना थे, और जिनका स्थान वैदिक युग में लगभग बराबर था, उनकी महत्ता घटने लगी. नए देवताओं के मुकाबले वे दूसरे या तीसरे स्थान पर खिसकने लगे. आस्थाओं के समन्वयीकरण ने सामाजिक समन्वय की प्रक्रिया को गति प्रदान की. विभिन्न आस्थाओं वाले कबीले जुड़कर बड़े समाज में ढलने लगे. कृषि और तकनीक के विकास ने भी बड़े समाजों के गठन को प्रोत्साहित किया. उत्तरवर्ती ग्रंथों में इस प्रभाव को आसानी से देखा जा सकता है. प्रबोधीकरण के दौरान सामाजिक गठन और नियमन के क्षेत्र में धर्म की भूमिका को सीमित हो जाना चाहिए था. मगर लंबे अंतराल में धर्म के आधार पर समाज में एक वर्ग ऐसा पनप चुका था जिसके स्वार्थ धर्म से बंधे थे. वह वर्ग शक्तिशाली था. उसके हित शीर्षस्थ शक्तियों से बंधे थे. निहित स्वार्थ के चलते वे शक्तियां एकदूसरे का समर्थन करती थीं. परिणामस्वरूप सामाजिक स्तरीकरण स्थायी रूप लेता गया.

धर्म को भले ही आस्था का पर्याय मान लिया गया हो, लेकिन बड़े समाजों में केवल आस्था के भरोसे काम चलने वाला नहीं था. समाज को संगठित एवं विकासोन्मुखी बनाए रखने के लिए ऐसी आचारसंहिता की आवश्यकता थी, जो मनुष्य और शेष समाज के बीच तालमेल कायम कर सके. इस जिम्मेदारी को धर्म ने संभाला. चूंकि धर्म के प्रचारप्रसार में लगी शक्तियों का रुझान सर्वसत्तावादी था, इसलिए कालांतर में धर्मआधारित समाजों में नियतिवाद में ढलने लगा. धर्म यह दावा भी करता है कि उसका नियमन स्वयं परमात्मा द्वारा किया गया है. परमात्मा जो उसकी निगाह में ज्ञानविज्ञान के सर्वोच्च शिखर पर आसीन और परमविवेकी है, जो कथित रूप से सृष्टि की समस्त शुभताओं का आदिस्रोत है. माना जाता है कि वह जो है, जैसा है, वही सर्वोत्तम है. इसके लिए जो नैतिक नियम बने, उन्हें धर्म के माध्यम से समाज में प्रचलित किया जाने लगा. धर्म के प्रचारप्रसार में लगी शक्तियों ने परमात्मा को समस्त सदगुणों का आदिस्रोत घोषित किया. उन्होंने धर्म को इस तरह प्रस्तुत किया मानो समस्त नैतिकताएं उनसे ही उद्भूत हों. वस्तुस्थिति इसके ठीक विपरीत थी. अपनी परिभाषा में धर्म सामाजिक आचारविचार और कर्मकांडों का प्रतीक था. लेकिन उनकी कसौटी क्या हो? यह निश्चिंत नहीं था. धार्मिक आचारसंहिता पूरी तरह ईश्वर के नाम पर टिकी थी. जिसमें मोक्ष को अंतिम लक्ष्य माना जाता है. धर्म को अपने मकसद में कामयाबी भी मिली. मगर उसको शुभता का पर्याय मान लेने का परिणाम यह हुआ कि कालांतर में धर्म के नाम पर प्रभु वर्ग की समस्त चालाकियां, धूत्र्तताएं, विलासिता पूरी तरह सामने आने लगीं, लेकिन तब तक धर्म मनुष्य की पूरी जीवनचर्या को अपनी जकड़ में ले चुका था. विभिन्न धर्मानुयायी आज भी उसी लीक पर अड़े हैं. उल्लेखनीय है कि धर्म न केवल आदमी पर बाहरी असर डालता है, बल्कि भीतर से भी प्रभावित करता है. मनुष्य के आत्मविश्वास को हिलाने के लिए केवल इतना कहना पर्याप्त होता है कि धार्मिक दृष्टि से जो कार्य वह कर रहा है, या करना चाहता है वह भी असल में उसका अपना कार्य नहीं है. इससे जो आत्मविश्वास का क्षरण होता है, उसकी भरपाई होना आसान नहीं होता.

धर्म को जीवन के लिए अपरिहार्य माननेवालों की संख्या आज भी कम नहीं है. मैक्स मूलर धर्म को शक्ति मानता है. ऐसी शक्ति जो अजेय है. जिसको जीत पाना असंभव है−‘हम चाहे बौद्धिक विकास के नीचे से नीचे स्तर पर आ जाएं, चाहे आधुनिक अनुमान की ऊंची से ऊंची उड़ान लें. सब जगह हमें यह मिलता है कि धर्म एक शक्ति है, जिसने विजय प्राप्त की है. इतना ही नहीं धर्म ने उनपर भी विजय प्राप्त की है, जो सोचते हैं कि उन्होंने धर्म पर विजय प्राप्त की है.धर्म की प्रशस्ति करते हुए मैक्स मूलर इस तथ्य को बिसरा देता है कि धर्म उन संस्थाओं की भांति ही एक संस्था है, जो मनुष्य ने सामाजिक शांति, सद्भाव और विकास की निरंतरता के लिए गठित की है और संस्थाओं की प्रासंगिकता समय के अनुसार बदलती रहती है. अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रत्येक समाज समयसमय पर नई संस्थाएं गढ़ता है और पुरानी संस्थाओं से पीछा छुड़ाता जाता है. उदाहरण के लिए किसी जमाने में राजशाही स्वयं एक सत्ता थी. समय के साथ उसमें बदलाव हुआ. आज अधिकांश देश राजशाही से पीछा छुड़ा चुके हैं. जिन देशों में वह कायम वहां भी उसका स्वरूप पहले जैसा नहीं है.

वस्तुतः धर्म उस दौर की रचना है जब राजनीति, अर्थनीति, नीतिशास्त्र का जन्म ही नहीं हुआ था. धर्म के साथ शक्ति का जुड़ाव व्यक्ति की मानसिक दुर्बलता का संकेतक है. आधुनिक समाज में ऐसी कोई भी संस्था जो मनुष्य को कमजोर समझे, कमजोर बनाए या किसी भी तरह से उसके स्वाभिमान को चोट पहुंचाएउपयुक्त नहीं मानी जा सकती. हीगेल की एक प्रसिद्ध उक्ति है−‘यदि निर्भरता की भावना ही धर्म है तो कुत्ता सबसे अधिक धार्मिक है.’−

यदि धर्म अनुभूति केंद्रित है, तो उस अनुभूति का सिवाय परजीविता के कोई और आयाम नहीं हो सकताउस हालत में एक कुत्ता ज्यादा धार्मिक होगा….5

मैक्स मूलर इस हीगेल का मजाक कहकर इस कटाक्ष को हल्का आंकना चाहता है; या हल्केपन के साथ महसूस करना चाहता है. क्या हीगेल ने सचमुच मजाक किया था? इस पर फैसला करने से पहले हमें सोचना पड़ेगा कि हीगेल ने उक्त शब्द कहे किस संदर्भ में थे. हीगेल की उपर्युक्त टिप्पणी हरमन हेनरिख की 1822 में प्रकाशित एक पुस्तक Religion in the internal affairs to science की भूमिका में थी. अगर यह हीगेल का कटाक्षा था तो मानना पड़ेगा कि बहुत गहरा कटाक्ष था. उसका कोई न कोई आधार अवश्य होना चाहिए. धर्म जिस प्रकार मानवसंस्कारों में परजीविता का भाव पैदा करता है, बातबात में ईश्वर की दुहाई देने लगता है, उससे हीगेल की उक्ति पर विश्वास स्वतः होने लगता है. हीगेल यहीं नहीं रुकता, उसी भूमिका में वह लिखता है

एक कुत्ता भी उस समय निवृत्ति का अनुभव करने लगता है, जब उसकी आत्मा हड्डी को चूसने से तृप्त हो जाती है.5

 

हीगेल के अनुसार धर्म का अर्थ है या होना चाहिएपूर्ण स्वतंत्रता. जो धर्म किसी भी प्रकार से व्यक्ति की स्वतंत्रता को आघात पहुंचता है, वह वस्तुतः अधर्म है. क्योंकि व्यक्ति किसी भी ऐसी वस्तु या विचार को मन से नहीं स्वीकार सकता, जो उसकी स्वतंत्रता को खतरे में डालता या उसे नुकसान पहुंचाता हो. धर्म के साथ शक्ति का जुड़ाव उसको सामंती संस्कार देता है. चूंकि व्यक्ति मूलतः स्वाधीनतापसंद होता है, वह ऐसी किसी शक्ति के अधीन नहीं रहना चाहता जो उसको कमजोर बनाती हो. अतः समाज में खुद को स्थापित करने के लिए धर्म लगातार यह दिखाता रहा कि उसकी शक्तियां मानवकल्याण के लिए है. इसके लिए उसने नैतिकता का आश्रय भी लिया. यहां शंका हो सकती है कि धर्म हमेशा तो दबाव की स्थिति में नहीं होता. बल्कि कई ऐसे विषय हैं जहां धर्म अपने लोकतांत्रिक चेहरे के साथ हासिल होता है. उदाहरण के लिए मंदिर के दरवाजे गरीबअमीर, सेठफकीर सभी के लिए खुले होते हैं. यह बात अलग है कि धर्म जिस प्रकार की संस्थाएं खड़ी करता है; अथवा जिन संस्थाओं को वह अपना समर्थन देता है, वे सर्वकल्याण का दावा भले ही करें, वास्तविक हितसाधन अल्पसंख्यक अभिजन का ही करती हैं.

यह ठीक है कि असुरक्षा की भावना ने समाज के गठन की नींव रखी होगी, इसलिए समाज अपने आप में बड़ी शक्ति है. सामाजिक संबंध वास्तविक होते हैं. इसलिए केवल शक्ति के लिए धर्म का वरण करना, मनुष्य के लिए आवश्यक न था. यह तभी संभव था जब धर्म सामाजिक नियमों की सर्वोच्चता को स्वीकार करते हुए खुद को उनके सहायक और प्रवत्र्तक के रूप में प्रस्तुत करे. यह कार्य शक्ति के बूते नहीं, बल्कि सहयोगात्मक तरीके से ही हो सकता था. इसके लिए धर्म ने नैतिकता का सहारा लिया और मानवीय आदर्शों से स्वयं को जोेड़ा. यह जुड़ाव इतना गहरा और करीबी बना कि अनेक धर्मों ने परलोक, आत्मा और परमात्मा जैसी धारणाओं से स्वयं को दूर रखा. यह बात अलग है कि धार्मिक संस्थानों पर कब्जा होने के बाद कुछ धार्मिक संस्थान स्वयं को धर्म से ऊपर मानते रहे. तथा समाज प्रदत्त शक्तियों का उपयोग समाज के दूसरे वर्गों को दबाने के लिए किया जाता रहा. ऐसे लोग हर युग, प्रत्येक समाज में रहे. स्थापित व्याख्याओं में अनुकूल फेरबदल कर, वे अपनी स्वार्थसिद्धि करते रहे. जबकि नैतिकता मानवीय विवेक और सामाजिकता का समन्वित रूप है. वह हमेशा एक लक्ष्य होती है. नैतिक मूल्यों का निर्धारण मनुष्यत्व के सर्वोच्च लक्ष्यों को ध्यान में रखकर कया जाता है. नैतिकता का एकमात्र लक्ष्य मानवकल्याण होता है. जबकि धर्म तीसरी शक्ति को बीच में लाए बिना सामाजिक आदर्श की बात कर ही नहीं पाता. ऐसे समाजों में वास्तविक मानवकल्याण का लक्ष्य हवाई हो जाता है. जैसे ही धर्म तीसरी शक्ति को बीच में लाता है, मानवीय अस्मिता अवमूल्यित होने जाती है. उस समय तीसरी शक्ति का निर्णय प्रत्येक मामले में अधिक महत्त्वपूर्ण मान लिया जाता है. इससे विवेकीकरण की प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

नैतिकतावादी इमानुएल कांट की परिभाषा रिलीजनऔर धर्मदोनों की परंपरागत परिभाषाओं से हटकर है. उसने धर्म को सदाचार की संज्ञा दी है. काॅट के लिए नैतिकता के सवाल बड़े थे. उसके अनुसार धार्मिक सदाचार को तभी संपूर्ण सदगुण माना जा सकता है, जब नैतिकता को आगे रखकर उसका निरपेक्ष आकलन किया जाए. तभी मानवीय विश्वासों की सहीसही अन्वीक्षा संभव है. यानी धर्म प्रथमतः यह स्वीकार करे कि उसका ध्येय नैतिकता का पोषण करना है. आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास केवल उसका आलंबन है. लेकिन व्यवहार में ऐसा हो नहीं पाता. धर्म आस्था और चुनींदा कर्मकांडों तक सीमित होकर रह जाता है. कांट को धर्म के ऐसे रूप से आपत्ति है. इसलिए वह आदर्श के कारण रूप में किसी तीसरी शक्ति के अस्तित्व को स्वीकारने से इन्कार करता है. उसके अनुसार, ‘हम तभी तक धर्ममार्ग पर है, जब तक नैतिक कर्तव्यों को दैवी आज्ञा मानते हैं. जब तक हममें अपने कर्तव्य के प्रति स्वतः चेतनाभाव है.कर्तव्य के प्रति चेतनाभाव ही हमें नैतिकता से आबद्ध रखता है. यहां गीता के कर्मसिद्धांत का उल्लेख प्रासंगिक है. गीता भी कर्तव्यपरायणता पर जोर देती है. योग कर्मसु कौशलः’−कहते हुए वह निष्काम कर्म का संदेश दे जाती है. लेकिन वह पुराणों और स्मृतिग्रंथों की भांति मोक्ष के बहाने, काल्पनिक सुख का सपना दिखाकर मनुष्य को शेष समाज की ओर से उदासीन बना देती है. परिणामतःकथित निष्काम कर्म ठेठ स्वार्थवादी आयोजन बन जाता है. गीता का कर्ममार्ग इहलोक की सिद्धि नहीं है. उसके अनुसार मोक्ष जीवन का पवित्रतम लक्ष्य है. यदि वह धर्म त्याग द्वारा संभव हो तो, गीता के अनुसार उसमें भी कोई बुराई नहीं हैसर्व धर्मान परितज्यं मामेकं शरणम् ब्रज. कांट के लिए मनुष्य और मनुष्यता से जुड़े प्रश्न महत्त्वपूर्ण थे. अतएव धर्म उसके लिए तभी तक स्वीकार्य है, जब तक वह नैतिकता का पोषण करता हो.

कांट नैतिकता के दर्शन को धर्म से आगे ले जाता है. उसके अनुसार अपने कर्तव्य को ईश्वरार्पण कर देने अथवा उसका बताने से मनुष्य की क्षमताओं पर संदेह होने लगता है. अतिरिक्त रूप से उदार व्यक्ति अपनी इस उपलब्धि को ईश्वर के नाम किए रहता है. उसी के आधार पर वह लोक ऋण से मुक्त हो जाने का दावा करते हैंइस तरह कांट के लिए धर्म और नैतिकता केवल उस समय तक पर्यायवाची हैं, जब तक धर्म मानवमात्र के कल्याण को अपना ध्येय माने रहता है. ऐसा करने के लिए वह किसी तीसरी सत्ता को बीच में लाना जरूरी नहीं मानता. उसका माना है कि मनुष्य मूल रूप में अच्छा होता है, लेकिन उसे अपनी अच्छाई पर भरोसा नहीं होता. इसलिए वह अच्छाई के आलंबन के रूप में तीसरी शक्ति की कल्पना करता है. अंततः वह कल्पना को सही सबकुछ मान लेता है और जो वास्तविक है, जो उसके आसपास घट रहा है, जिसका उसके जीवन सीधा संबंध हैउसकी ओर से पूरी तरह मुंह मोड़ लेता है. कभीकभी तो काल्पनिक लक्ष्यों को ही सर्वस्व मानते हुए जीवन के वास्तविक लक्ष्यों की ओर से उदासीन हो जाता है. कांट के अनुसार तीसरी शक्ति के अस्तित्व को स्वीकारना मानवीय नैतिकता में अविश्वास और उसकी क्षमताओं पर संदेह कर लेना है.

धर्म को केवल आध्यामिक विश्वास तक सीमित कर देने की कोशिश की आलोचना भारतीय विचारकों ने भी की है. बुद्ध तो हर बात में ईश्वरऔर आत्माको कारण देखने से इतने क्षुब्ध थे कि उन्होंने उन प्रश्नों पर विचार करना ही निरर्थक माना था. चार्वाक, आजीवक, जैन, बौद्ध आदि दर्शन ईश्वरीय सत्ता का निषेध करते हैं. बुद्ध के समकालीन यूनानी विचारक हेराक्लीज के अनुसार धर्म एक बीमारी है. हालांकि वह बहुत पवित्र बीमारी है. इसके बावजूद अधिकांश धर्मानुयायी धर्म के नैतिकतावादी पक्ष को उपेक्षित कर, कर्मकांड तथा विभिन्न धर्माडंबरों को बढ़ाने में लगे रहते हैं. जिसके लिए धर्म की आलोचना होती रही है. कांट की भांति फिटशे भी धर्म को नैतिकता से ऊपर स्वीकारने को तैयार नहीं है. उसके अनुसार, मनुष्य धार्मिक होने के कारण नैतिक नहीं है, बल्कि वह नैतिक होने के कारण धार्मिक है. मनुष्य को उसका कर्तव्य समझाने, के लिए धर्म नहीं, नैतिकता की आवश्यकता पड़ती है. उसके अनुसार, ‘बीमार और भ्रष्ट समाज ही धर्म को नैतिकता का आलंबन मानकर उसके अनुसार व्यवस्थित होने का समर्थन करता है.अपनी आस्था के आधार पर वह धर्म को ऐसे गुरुडम में ढाल देता है कि मनुष्य के लिए बिना बिचैलिए की मदद के धर्म को उसे समझना मुश्किल हो जाता है. चूंकि नैतिकता सदैव एक लक्ष्य है. इसलिए सिरजनहार को यदि नैतिक स्तर पर सर्वोच्च दर्शाया जाए, तो वह मनुष्य के लिए प्रेरणादायी सिद्ध हो सकता है. मगर यह मान लेना कि सृष्टि का सिरजनहार ही नैतिक गुणों का एकमात्र आधार हैमनुष्य की आंतरिक अच्छाइयों पर संदेह करना है. यह मान लेना है कि मनुष्य की अंतिम नियति परावलंबन है. बावजूद इसके जब कोई आस्थावादी सिरजनहार का चरित्र गढ़ता है, तो अनचाहे ही उसके चरित्र को निरंकुशता से जोड़ देता है. उसके फैसलों और प्रावधानों पर सवाल खड़े करना, पाप मान लिया जाता है. व्यवहार में ऐसा नहीं हो पाता. आस्था के सहारे गढ़ा गए आराध्य के चरित्र में कब कब निरंकुशता प्र्रवेश कर जाती है. यह पता ही नहीं चलता. इससे बचने के लिए फिटशे नैतिकता को धर्म से ऊपर रखते हुए और ज्ञान को धर्म का लक्ष्य मानने का सुझाव देता है

धर्म कभी भी व्यावहारिक नहीं होता था. धर्म का उद्देश्य कभी यह नहीं था कि हमारे जीवन को प्रभावित करे. इसके लिए शुद्ध नैतिकता पर्याप्त है. एक भ्रष्ट समाज ही नैतिक कार्य के लिए धर्म की दुहाई देता है. ज्ञान ही धर्म हैऐसा सोच मनुष्य को स्पष्ट आत्म विवेचन का अवसर देता है. सामाजिक सामंजस्य को बढ़ाता है और मानस को पवित्र बनाए रखता है.6

धर्म की प्रमुख परिभाषाओं की कमजोरी है कि वे व्यक्ति को मुक्त करने के नाम पर बांधती है. इसी के चलते जो धर्म ऋग्वेद में महज धार्मिक क्रियाओं के समुच्चय अथवा उनके गुणत्व के रूप में देखा जाता था, उपनिषदों में वह आश्रम धर्म का रूप लेने लगा था. यदि हम वैदिक समाज को देखें तो वहां चातुवण्र्य विभाजन के संकेत तो हैं. स्वयं ऋग्वेद का पुरुष सूक्त इसका प्रमाण है. बावजूद इसके वहां जन्मना वर्ग भेद नहीं था. सत्यकाम जाबालि, विश्वामित्र आदि ऐसे कई वैदिक ऋषि हैं जो अपनी प्रतिभा के बल पर निचले वर्ग का उत्क्रमण कर शीर्ष वर्ग में मान लिए जाते हैं. लेकिन उपनिषद काल तक आतेआते यह छूट समाप्त हो जाती है. वर्णाश्रम धर्म लगभग स्थायी रूप ले लेता है. तदनंतर धर्म की संकल्पना में भी अनुकूल परिवर्तन स्वाभाविक था. धर्म और नैतिकता के संबंधों को लेकर पश्चिम में निरंतर बहसें चली हैं. हीगेल, बू्रनो बायर, फायरबाख, माक्र्स, फिटशे आदि अनेक ऐसे विचारक हैं, जिन्होंने धर्म को कठघरे में खड़ा रखा. धर्म और नैतिकता में से किसे वरीयता दी जाए, इसे लेकर कुछ बहसें आज भी जारी हैं. इन बहसों का इतना अंतर अवश्य पड़ा है कि नैतिकता के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकारा जाने लगा है. जबकि भारत में आज भी नैतिकता को धर्म के उपादान के रूप में देखने का चलन है. धर्माचार्य धर्म को समस्त नैतिकता का स्रोत मानते हैं, हालांकि उसके पक्ष में वे एक भी उपयुक्त तर्क देखने में असमर्थ रहते हैं.

पूर्व मीमांसाकार के लिए धर्म वेद विहित प्रेरकलक्षण है. इसी तरह महाभारत में कई स्थानों पर आया है कि नास्ति सत्यात्परो धर्मःयानी सत्य के अतिरिक्त कोई धर्म नहीं है. महाभारत में ही एक अन्य स्थान पर सत्य का पुनः महिमामंडन किया गया है. वहां सत्यानुशीलन के प्रताप को सहस्रों अश्वमेधों के सम्मिलित पुण्य से बड़ा माना गया है.हजार अश्वमेध यज्ञ और सत्य की यदि तुलना की जाए तो सत्यानुशीलन हजार अश्वमेध यज्ञों भी बढ़कर है. यहां किसी ईश्वर को सत्य से नहीं जोड़ा गया है. यदि सत्य को सदाचरण का पर्याय मान लें तो सत्य यहां भी व्यवहार की चीज है, भले ही उसका ध्येय किसी उच्चतर लक्ष्य की सिद्धि रहा हो. पुराणों मेें धर्म की परिभाषा में सदाचरण अथवा व्यवहार हो ईश्वर से स्थानापन्न करने की कोशिश दिखाई पड़ती है. इससे गांधी समेत कई आधुनिक लेखकविचारक प्रभावित हैं. किंतु हर चीज के पीछे ईश्वर खोजने वाली दृष्टि गांधी से सत्य ही ईश्वर हैकहलवाती है तो तिलक महोदय उपर्युक्त मंत्र की व्याख्या, ‘सत्य के सिवा और धर्म नहीं है, सत्य ही परंब्रह्म हैकहते हुए सत्य ही परंब्रह्म है8 अपनी ओर से जोड़ देते हैं. यह एक प्रकार से बौद्धिक दासता है तो व्यक्ति को धर्म के बहाने बांधे रखती है. देखा जाए तो यही नुकसान देह भी है, क्योंकि अपनी मूल परिभाषा में धर्म जहां आचरण का हिस्सा है, वहीं नए रूप में वह किसी तीसरी शक्ति की मौजूदगी का पर्याय अथवा उसका समर्थक बनकर रह जाता है.

जब तक धर्म व्यवहार का हिस्सा था, उस समय तक उसपर मुक्त विमर्श असंभव न रहा होगा. इसलिए कि धार्मिक क्रियाओं का आवश्यकता एवं परिस्थितियों के अनुसार फेरबदल किया जा सकता था. आधुनिक समाजों में भी दो व्यक्ति शायद ही ऐसे मिलेंगे, जिनकी धर्म को लेकर एक अवधारणा एकदम स्पष्ट हो. शायद इसीलिए धर्म और ईश्वर की व्याख्या को लेकर एक समान परिस्थितियों में रह रहे लोगों में से प्रत्येक का दावा होगा कि वह उन्हें सर्वाधिक जानता है. यहां मतवैभिन्नय को मनुष्य का स्वभाव माना जा सकता है−‘न एको मुर्निस्य मर्तिभिन्ना.लेकिन नैतिकता और सदाचार को लेकर उनमें कोई भेद नहीं होता. प्रत्येक व्यक्ति दूसरों की मदद करने को अच्छा मानता है. झूठ की सब आलोचना करते हैं. धर्म को यदि समाज का वरण मान लिया जाए तो एक सवाल स्वतः खड़ा हो जाता है कि कोई समाज आखिर ऐसी चीज या विचार को क्यों अपनाएगा जिसे लेकर उनमें गहरे मतभेद हों. जाहिर है धर्म को व्यापक रूप में अपनाने का एक मात्र कारण यही हो सकता है कि उससे समाज के अधिकतम लोगों की हितसिद्धि संभव हो. कुल मिलाकर अवधारणा के रूप में धर्म आरंभ से ही आलोचनाओं से घिरा रहा है. आलोचनाप्रत्यालोचना के दौर में धर्म को लेकर लोग मुख्यतः दो भागों में बंटे हुए नजर आएंगे. पहले वे जो धर्म और ईश्वर की सत्ता पर विश्वास रखते हैं. दूसरे वे जो नहीं देखते. जो ईश्वर पर विश्वास लेकिन आराध्य के रूप में सर्वशक्तिमानकी परिकल्पना परोक्ष में मनुष्य को अत्यंत दीन और कमजोर सिद्ध कर देती है. इसका प्रभाव समाज में जनऔर अभिजनके रूप में सामने आता है. एक बंटा हुआ बेमेल समाज. जो अभिजन हैं, माना जाता है कि उनपर पूर्व जन्म के संचित पुण्यों के चलते सर्वशक्तिमान की विशेष कृपा मानी जाती है. बाकी जन किसी न किसी गलती की सजा भोग रहे होते हैं.

यदि व्यावहारिक नैतिकता को तुलना का आधार बनाया जाए तो विशेष दार्शनिक पृष्ठभूमि न होने के बावजूद विश्व के दो बड़े यानी ईसाई और इस्लाम धर्म, हिंदू धर्म से आगे निकल जाते हैं. यही क्यों संगठन और सामाजिकता के आधार पर हिंदू धर्म के बीच से उभरा सिख धर्म भी आगे है. उनके प्रवत्र्तकों के लिए अपनेअपने समाज के मसले अधिक महत्त्वपूर्ण थे. धर्म के माध्यम से वे समाज में न्यूनतम नैतिकता को स्थापित करना चाहते थे. जहां हिंदू धर्म के मूल में देवताओं की भीड़ थे, वहीं इस्लाम, ईसाई, सिख जैसे धर्मों के प्रवत्र्तक साधारण इंसान के रूप में जन्मे थे. श्रेष्ठ कार्यों के बल पर वे समाज में पैगंबर या मसीहा के रूप में स्थापित हुए थे. मुहम्मद साहब ने हालांकि मक्का पर आक्रमण कर फतह हासिल की थी. लेकिन इस्लाम में उनकी वीरता का वैसा महत्त्व नहीं है, जैसा उनके उपदेशों का. उन्होंने कालांतर में आए कबीलों को संगठित होने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की. इसी प्रकार ईसाई धर्म में भी ईसा मसीह को नैतिक शक्ति और परमात्मा के दूत के रूप में याद करता है. जबकि भारत के देवताओं को नैतिकता के बजाय उनके अदुभुत रणकौशल अथवा शक्तियों के अधिष्ठाता देवता के रूप में पहचाना जाता है. अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश आदि जीवन के लिए जितनी भी अनिवार्य वस्तुएं हैं, देवता उनके अधिष्ठाता, स्वामी हैं. अपनी अनुकंपा द्वारा वे किसी को भी एक झटके में धनवान बना सकते हैं. शास्त्रों में इस प्रकार के अनेक प्रसंग हैं, जो असल मे देवताओं और ऋषिमुनियों के महिमामंडन के हेतु गढ़ लिए गए हैं. एक फंतासी अथवा कपोलकल्पना से आगे इनका महत्त्व शून्य है. कृष्णसुदामा की कहानी में कृष्ण का मैत्री प्रदर्शन सुदामा की गरीबी भले ही दूर करता हो, उसके चरित्र का उदात्तीकरण नहीं कर पाता. आर्थिक रूप से दीन सुदामा बौद्धिक दीन के रूप में भी सामने आता है. हालांकि उसकी सामाजिक हैसियत पर गरीबी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. द्वारकाधीश यदुवंशी कृष्ण ब्राह्मण सुदामा का पदप्रक्षालन करके धन्य होता है. साफ है कि धर्म जाति प्रथा को समर्थन देता है. समाजार्थिक विषमता को बढ़ाता है. बावजूद इसके वह आज भी सबसे बड़ी संगठक शक्ति है. दुनिया के लगभग दोतिहाई लोग आज भी किसी न किसी धर्म में विश्वास रखते हैं. हालांकि नास्तिकों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है. आंकड़े बताते हैं कि 2005 से अब तक यानी करीब एक दशक में आस्तिकों की संख्या दस प्रतिशत तक गिरी है.

धर्म स्वयं अध्यात्म की मू़र्त्तन अवस्था है. व्यक्ति जब अध्यात्म की प्रखरता को संभाल नहीं पाता, तभी वह धर्म की शरण में जाता है. जो मूत्र्त के आराधन का मार्ग सुझाता है. यहां कुछ विद्वान कह सकते हैं कि धर्म में भी निराकार, तत्ववादी, स्थापनाओं का अंतर है. होगा पर यह अंतर मूत्र्तन की सीमाओं से बाहर नहीं जा पाता. अध्यात्म की तह में जाने के लिए धर्म की यह सबसे बड़ी बाधा है. यही कारण है कि दर्शन ने जहां अनेकानेक धर्मों को जन्म दिया है, वहीं दुनियाभर में प्रचलित धर्मों से, सिवाय कर्मकांड और दिखावे की संस्कृति के और कुछ बेहतर निकाल ही नहीं पाया.

धर्म इन दिनों सबसे उत्तेजक मसला है. उससे जुड़ी बहसों को देखा जाए तो लोग सीधेसीधे दो हिस्सों में बंटे मिलेंगे. एक वे जो धर्म को अपनी पहचान से जोड़ते हैं, जिन्हें यह जीवन का जरूरी मसला नजर आता है. जो मानते हैं कि धर्म बेहद जरूरी है. दूसरे वे जिन्हें धर्म मनुष्य की दासता का कारण नजर आता है. पहले वर्ग के लोग जैसे ही धर्म के समर्थन में आवाज उठाते हैं. दूसरे वर्ग को अपनी अस्मिता पर संकट नजर आने लगता है. धर्म के प्रति आग्रह दुनिया के सभी समाजों में रहा है. आंकड़ों के अनुसार दुनिया की दोतिहाई जनसंख्या आज भी आस्थावान है, जो किसी न किसी रूप से धर्म में विश्वास रखती है. शेष लगभग 37 प्रतिशत लोग नास्तिक हैं. नास्तिकों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है. आंकड़ों के अनुसार सन 2005 से अब तक आस्तिकों की संख्या में लगभग 10 प्रति की गिरावट दर्ज की गई है. बावजूद इसके धर्म के समर्थकों, उसके लिए काम करनेवाले वालों की संख्या आज भी कम नहीं है. धर्म आज भी सत्ता का प्रतीक है.

© ओमप्रकाश कश्यप

­संदर्भ

  1. जो धर्म दूसरे धर्म को बाधित करता है, वह धर्म नहीं है. कुधर्म है. सच्चा धर्म अविरोधी होता है….ऐसे ही धर्म मुनिगण हमें बताते आए हैं.महाभारत.

  2. A Treasury of the World’s Great Letters, cd. by M. Lincoln Schuster (1941), pp. 90-91, as quoted by Dr. S. Radhakrishan, in Society and Religion.

  3. It is a rather odd fact that a word so repeatedly on the lips of men and connoting, apparently, one of the most obvious phenomena of human life should be so notoriously difficult of definition as is the word Religion.-THE RELIGIOUS CONSCIOUSNESS: A PSYCHOLOGICAL STUDY by J. B. Pratt, Page 1.

  4. आ प्रा रजांसि विंध्यानि पार्थिवा श्लोकं देवः कृणुते स्वाय धर्मणे. ऋग्वेद5/53/3

  5. If religion in man is based only on a feeling, then such a feeling rightly has no further determination than to be the feeling of his dependence, and the dog would then be the best Christian…..the dog also has feeling of redemption, whenever his hunger is satisfied by a bone.- Hegal quoted from Schleiermacher on Religion and the Natural Order – Andrew Dole.

  6. मैक्स मूलर, ‘धर्म की उत्पत्ति एवं विकास, बृह्मदत्त दीक्षित ललामद्वारा अनूदित, पृष्ठ 16.

  7. सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं है. गीता रहस्य, 32 इस उक्ति का सीधा सा अर्थ सत्य और मनुष्य के व्यवहार को सत्यानुसरण द्वारा मर्यादित करना है.

  8. अश्वमेधंसहस्र च सत्यं च तुलया धृतम्।

अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते।। महाभारतअध्याय 74/102

  1. गीता रहस्य, तिलक, पृष्ठ 32’

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