धर्म : प्रासंगिकता से जुड़े कुछ सवाल—दो

विकल्पहीन नहीं है धर्म


 

अब हम इस आलेख की मुख्य विषयवस्तु की ओर बढ़ते हैं. वही जो इसका केंद्रीय विषय है. क्या दुनिया को धर्म की सचमुच जरूरत है? क्या उसके बिना दुनिया का कारोबार एकदम थम जाएगा? धर्म के आलोचक आज भी कम नहीं हैं. धर्मानुयायी मानते हैं कि उनके आलोचक धर्म के मर्म को समझ ही नहीं पाते. यह बात अलग है कि स्वयं धर्म के अनुयायी भी उसे पूरी तरह समझने का दावा नहीं करते. धर्म की आलोचना, अन्वीक्षा से वे प्रायः यह कहकर पीछे हट जाते हैं कि उसे समझना आसान नहीं है. इसके पीछे उनकी मंशा धर्म के नाम पर गुरुडम को थोपने तथा उसे ‘नेतिनेति कहते हुए इतना महान बना देने की होती है कि सामान्य आलोचनासमीक्षा को भी समाज और राष्ट्रीय भावना के विरुद्ध विरुद्ध मान लिया जाता है. असल में वे तयशुदा सीमाओं से, उन सीमाओं से जो उन्होंने धर्म से बंधकर अपने लिए सहर्ष चुनी हैं, बाहर आना ही नहीं चाहते. न ही वे चाहते हैं कि उनका कोई अनुयायी उस सीमा रेखा से बाहर कदम रखने की कोशिश करे. हम धर्म को ऐसा कमरा मान सकते हैं, जो हजारों वर्षों से बंद है, जिसमें ताजा हवा का प्रवेश निषिद्ध है तथा जिसके भीतर झांकने की इजाजत किसी को भी नहीं है. जिसका सारा कारोबार कमरे की बाहरी टीमटाम, चमकदमक तथा रहस्यपूर्ण बनाए रखने की खातिर चलता है. उसकी कीमत जनसाधारण को अपने विवेक के रूप में चुकानी पड़ती है. इस बीच यदि कोई भीतर ताकझांक करना भी चाहे तो उसे दंडित करने की व्यवस्थाएं कमोबेश प्रत्येक धर्म में होती हैं. कई बार तो इतनी कुटिल और रहस्यमयी कि उनके आगे बड़ेबड़े प्रतिभाशाली घुटने टेकते रहे हैं. मध्यकाल में इसका सटीक उदाहरण कुमारिल भट्ट हैं. उन्हें केवल इसलिए कि उन्होंने गुरु की इच्छा के विरुद्ध जाकर बौद्धमत का अध्ययन किया था—स्वयं को अग्निसमर्पित करना पड़ा था. यहां इस प्रसंग की चर्चा, धर्म के जड़त्व तथा उसके द्वारा समकालीनता एवं मौलिक ज्ञानविज्ञान से जानबूझकर बनाई गई दूरी को समझने के लिए प्रासंगिक है.

शंकराचार्य से एक पीढ़ी लगभग 650 ईस्वी पूर्व जन्मे कुमारिल भट्ट वैदिक परंपरा में विश्वास रखते थे. तिब्बतीय बौद्ध ग्रंथों के हवाले से यह भी बताया गया है कि कुमारिल भट्ट के पास धान का विशाल खेत था, जिसमें 500 पुरुष और इतनी ही स्त्रियां दास के रूप में काम करते थे. उन दिनों भारत में बौद्ध दर्शन का बोलबाला था. कुमारिल भट्ट मानते थे कि बिना बौद्ध धर्मदर्शन के पराभव के वैदिक परंपरा का पुनर्जीवन असंभव है. वैदिक धर्म को पुनःस्थापित करने की प्रेरणा उन्हें एक राजकुमारी से मिली थी. राजकुमारी बौद्ध दर्शन से घबराई हुई थी. बौद्ध दर्शन सनातन वर्णव्यवस्था और वंशगत अधिकारों का विरोध करता था. द्विज वर्ग की परंपरागत श्रेष्ठता के विचार को अस्वीकार करते हुए वह निर्वाण(मोक्ष) को सर्वसाधारण के लिए संभव बताता था. समानता आधारित दर्शन के कारण बौद्ध दर्शन का प्रभाव, भारत के अलावा आसपास के देशों पर भी था. राजकुमारी को डर था कि बौद्ध धर्म के प्रभाव के चलते उसके वंशगत अधिकार उससे छिन सकते हैं. अद्वितीय प्रतिभा के धनी कुमारिल भट्ट उन दिनों वैदिक परंपरा के ग्रंथों के अध्ययनअनुशीलन में लगे थे. गुरुजन उनकी मेधा से अत्यंत प्रभावित थे. वंशानुगत अधिकारों के छिन जाने की आशंका से बुरी तरह घबराई राजकुमारी कुमारिल भट्ट से मिलते ही रो पड़ी. उसने रोतेरोते ही अपनी व्यथा प्रकट की—

क्या करूं, कहां जाऊं, वेदों का उद्धार कौन करेगा?’

हे सुकुमारे! रो मत. वेदों का उद्धार कुमारिल भट्ट करेगा.’1

राजकुमारी के आंसुओं से विगलित युवा कुमारिल भट्ट के मुख से सहसा निकला. कहते हैं कि कुमारिल भट्ट ने उसी दिन से बौद्ध धर्मदर्शन की प्रतिष्ठा को कम करना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया. उन दिनों बिना गुरु की अनुमति के किसी और धर्मदर्शन की शिक्षा लेना अपराध माना जाता था. लक्ष्यसिद्धि हेतु कुमारिल भट्ट ने पहले तो बौद्ध धर्म का गहरा अध्ययन किया. तदनंतर, राजकुमारी को दिए गए वचन का निर्वहन करते हुए उन्होंने बौद्ध धर्मदर्शन की जमकर आलोचना की. यहां तक कि नालंदा जाकर उस समय के प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों को शास्त्रार्थ में पराजित भी किया. लेकिन अपने गुरु से छिपकर बौद्ध दर्शन की शिक्षा लेने की ग्लानि उन्हें लगातार सालती रही. इसलिए प्रायश्चित स्वरूप उन्होंने खुद को धीमी अग्नि शिखाओं के समर्पित कर दिया. बौद्ध धर्मदर्शन के पराभव के लिए उन्होंने जो जमीन तैयार की, उसी पर चलते हुए वेदांती शंकराचार्य ने अपनी कीर्तिकथा लिखी. इस योगदान हेतु वैदिक परंपरा के अनुयायी कुमारिल भट्ट को पहला बलिदानी ब्राह्मण मानते हैं. यह प्रसंग हमें इस निष्कर्ष की ओर भी ले जाता है कि प्राचीन ऋषियों के लिए शारीरिक कुश्ती और बौद्धिक शास्त्रार्थ में कोई खास अंतर नहीं था. जैसे एक पहलवान किसी खास दाव से दूसरे पहलवान को पटकी देकर उसके शरीर और मन पर काबू पा लेता है, उसके बाद पराजित पहलवान को लोग भूलने लगते हैं, उसी प्रकार प्राचीन काल में एक विचारधारा का समर्थक, दूसरे को शास्त्रार्थ में पराजित कर, उसके ऊपर काबू पा लेता था. शास्त्रार्थ में पराजित व्यक्ति के साथ उसकी विचारधारा भी पराजित मान ली जाती थी. प्रकारांतर में केवल विजेता का धर्म रह जाता है. इस प्रक्रिया में वह अपनी मूल पहचान भी खो देता था. कुल मिलाकर विचार को भी अखाड़े में उतर कर प्रतिद्विंद्वी विचारधारा को चुनौती देनी पड़ती थी.

कहते हैं कि धर्म ध्वजा फहराने के लिए निकले शंकराचार्य काशीमार्ग में कुमारिल भट्ट से भी मिले थे. अपने मत को स्थापित करने के लिए वे उनसे शास्त्रार्थ करना चाहते थे. जिस समय शंकराचार्य कुमारिल के पास पहुंचे, वे स्वयं को धीमी अग्नि युक्त चिता को समर्पित कर चुके थे. उनकी टांगें और शरीर का निचला हिस्सा जल चुका था. उस अवस्था में वे शंकराचार्य से शास्त्रार्थ नहीं कर सकते थे. अतः उन्होंने अपने शिष्य मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ करने का सुझाव दिया. कुमारिल भट्ट को अग्निशैय्या पर झुलसता हुआ छोड़, शंकराचार्य वहां से चल दिए. धार्मिक दृष्टिकोण से वह भले ही कुमारिल भट्ट का प्रायश्चित रहा हो, लेकिन व्यापक अर्थों में क्या वह अवसादजनित आत्महत्या नहीं थी? यदि ऐसा है तो शंकराचार्य का कुमारिल भट्ट को अग्निचिता पर छोड़कर जाना क्या उचित था? क्या उनका यह कर्तव्य नहीं था कि वे कुमारिल भट्ट से आत्महत्या का इरादा त्याग देने का निवेदन करते? उन्हें उस आत्मग्लानि से बाहर लाने की कोशिश करते, जिसने आत्महत्या जैसा घृणित कदम उठाने को विवश किया था? सामान्य नैतिकता कहती है कि आत्महत्या को उद्यत व्यक्ति को, वह चाहे जिस कारण से प्राणांत चाहता हो, किसी भी प्रकार से रोका जाए. लेकिन जिस दौर की यह घटना है, उसमें धार्मिक आग्रह हठधर्मी की सीमा तक प्रभावी होते थे. धार्मिक वादविवाद प्रायः जीवनमरण का सवाल बन जाता था. ऐसे में व्यक्ति के साथ उसके विचार का अंत भी स्वाभाविक था. उदाहरण के लिए शंकराचार्य से हारकर मींमासक मंडन मिश्र सुरेश्वराचार्य बनकर वेदांत के प्रचारप्रसार में लग जाते हैं. वेदांत के आगे अपनी आभा खोते ही मीमांसा दर्शन बौद्धिक विमर्श और जीवन दोनों से गायब हो जाता है.

प्रसंगवशः जैन दर्शन की यहां प्रशंसा करनी होगी, जिसने ‘स्याद्वाद’ का सिद्धांत सामने रखा. वह दार्शनिक विचारधारा को आगे बढ़ाने की उदारतापूर्ण शैली थी. लेकिन ‘स्याद्वाद’ के नाम से प्रकटी वैचारिक लोकतंत्र की वह भावना आगे न बढ़ सकी. इस सैद्धांतिकी के अनुसार कोई भी विचार अंतिम सत्य नहीं है. प्रत्येक विचार अपने भीतर सत्य का कोई न कोई अंश छिपाए रखता है. वह पूरा सत्य हो ही नहीं सकता. चार अंधे एक ही बार में हाथी के पूर्ण रूप का बयान नहीं कर सकते, इसलिए उनमें से प्रत्येक द्वारा दिया गया विवरण, सत्य होने के बावजूद सत्य नहीं है. वह पूर्ण सत्य की एकांगी अथवा आंशिक अनुभूति है. जैन दर्शन के अनुसार कोई भी विचार न तो पूरी तरह सत्य होता है, न ही असत्य. स्याद्वाद’ का दर्शन वैचारिक हिंसा के विरोध में उपजा था. लेकिन राजाओं के साम्राज्यवादी मनसूबे साधने के लिए युद्ध आवश्यक थे और बगैर हिंसा के युद्ध लड़ना संभव ही नहीं था. ऐसे समाज में वैचारिक अहिंसा का कोई व्यावहारिक महत्त्व न था. अतः कालांतर में हिंसा को उसके स्थूल रूप; यानी केवल जैविक हिंसा तक सीमित मान लिया गया.

स्याद्वाद’ से सिद्ध होता है कि जैन दर्शन में अहिंसा का अर्थ कहीं व्यापक था.उसकी कामना थी कि समाज में विभिन्न मतांतर वाले लोग, एकदूसरे का सम्मान करते हुए जीवन जिएं. उनमें कोई द्वैष न हो. यदि वैचारिक लोकतंत्र होगा, तो लोग एकदूसरे की भावनाओं का ख्याल रखेंगे, तभी समाज में वैचारिकता के प्रति अनुराग होगा. मगर केवल अपने विचारों को सर्वोपरि समझने, बताने की जिद के चलते, ‘स्याद्वाद’ का विचार समाज में गहरी जड़ें न जमा सका. यह बात भुला दी गई कि अहिंसक समाज की स्थापना बिना वैचारिक अहिंसा के असंभव है. इस तरह जैन दर्शन का अहिंसा का संदेश केवल जीवहत्या की रोकथाम तक सिमट गया और ‘स्याद्वाद’ वैचारिक लोकतंत्र का वाहक बनतेबनते रह गया.

हम पुनः कुमारिल भट्ट की कहानी पर लौटते हैं. हमने जाना कि कुमारिल भट्ट को अग्निशिखाओं पर आसीन देखकर भी शंकराचार्य का हृदय मोम न हुआ. शायद उनकी उत्कृष्ट मेधा का भय शंकराचार्य को रहा हो; यह आशंका कि कुमारिल भट्ट जैसे विद्वान को पराजित करना शायद उनके लिए संभव न हो! तीसरा कारण यह भी संभव है कि वेदोक्त धर्मदर्शन के शीर्षपुरुष बनने की महत्त्वाकांक्षा से निकले शंकराचार्य, ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहते थे, जिससे उनपर वैदिक परंपरा का दोषी होने का आरोप लगाया जा सके. इसलिए उन्होंने कुमारिल भट्ट को बचाने की कोई कोशिश न की. आज शंकराचार्य के समर्थक उस प्रसंग को गोलमोल इसलिए कर जाते हैं कि परंपरानुगामी भारतीय मेधा घटनाओं के निष्पक्ष विवेचन के बजाय श्रद्धा को महत्त्व देती है. उसकी कोशिश व्यक्तिगत श्रद्धा को सामूहिक श्रद्धा में बदल देने की रहती है. उस समय यदि शंकराचार्य कुमारिल भट्ट को चिता से उबार लेते तो वेदांत भले ही न जीतता, लेकिन इंसानियत अमर हो जाती. यहां एक किस्सा याद आ रहा है. बताते हैं कि रामानुजाचार्य को उनके गुरु ने एक मंत्र दिया था. मंत्र देते समय उन्होंने शिष्य रामानुज के कान में कहा—

बहुत पवित्र मंत्र है. जिसे बताओगे वह तर जाएगा.’

जी….गुरु जी.’ रामानुज ने गुरु का धन्यबाद किया.

लेकिन एक शर्त है. इस मंत्र को किसी अपात्र के समक्ष कभी प्रकट मत करना.’

अपात्र कौन?’

शूद्र, अछूत, स्त्री….शास्त्रों में उनका उल्लेख है.’

यदि मैं ऐसा करूं तो….’

घोर पाप….घोर पाप. सीधे रौरव नर्क में जाओगे.’

गुरुजी को दंडवत कर रामानुज वहां से चल दिए. रास्ते में उन्हें जो भी पात्र व्यक्ति दिखाई दिया, सभी को मंत्र दिया. गुरु को जब पता चला कि रामानुजाचार्य पात्रअपात्र का ध्यान रखे बिना ही दीक्षा दे रहे हैं तो उन्होंने उन्हें बुलवाया, बरजा. गुरु के आदेश का उल्लंघन करने का आरोप लगाया. तब रामानुजाचार्य ने कहा—

आप ही ने कहा था कि जो भी व्यक्ति इस मंत्र का पाठ करेगा, उसका उद्धार होगा?’

मैंने यह भी कहा था कि अपात्र को इस मंत्र की दीक्षा दी तो तुम सीधे रौरव नर्क में जाओगे.’

यदि मुझ अकेले के नर्क में जाने से इतने सारे लोगों को मुक्ति मिलती है तो मुझे सौसौ जन्मों तक नर्क स्वीकार्य है.’ रामानुज का उत्तर था.

इसकी प्रतिक्रिया में रामानुज के गुरु ने क्या कहा होगा, मालूम नहीं. यह जानना हमारा उद्देश्य भी नहीं है. असल में न तो स्वर्ग होता है न ही नर्क. मुक्ति स्वयं एक मिथक है. अतएव ऊपर दी गई कहानी को प्रतीकात्मक ढंग से दार्शनिक के बजाय सामाजिक संदर्भों में समझना आवश्यक है. कहानी बताती है कि किसी काम से यदि एक व्यक्ति को नुकसान, मगर अनेक को लाभ पहुंचता है तो वह कार्य करणीय है और व्यावहारिक नैतिकता के दायरे में आता है. काश! अपने मानअपमान और आलोचनाओं की चिंता किए बिना शंकराचार्य कुमारिल भट्ट जैसे सुविज्ञ की प्राण रक्षा को आगे आते; तो वे मनुष्यता के लिए आदर्श उदाहरण पेश करते. मगर परंपरा से बंधे शंकराचार्य उस अवसर की जानबूझकर उपेक्षा कर जाते हैं.

बहरहाल, बौद्ध दर्शन के अध्ययन हेतु प्रस्थान करते समय कुमारिल भट्ट की मनःस्थिति को लेखक यशपाल ने खूब समझा है. वे लिखते हैं—

कुमारिल भट्ट दो बातें खूब समझते थे. पहली बात यह कि बौद्ध दर्शन उनकी प्रतिपालक और रक्षक द्विज श्रेणी के हित और अधिकारों पर आघात कर रहा है; और दूसरी बात, द्विज श्रेणी के सामाजिक और आर्थिक शासन की वेदोक्त व्यवस्था शाश्वत सत्य स्. समता के प्रचार द्वारा द्विज श्रेणी के शासन के अधिकारों का विरोध करने वाली बौद्ध दर्शन के सत्य, अहिंसा और न्याय की मांग द्विज श्रेणी के अधिकारों की हिंसा करती है, अतः बौद्ध दर्शन से फाइट करना आवश्यक है.’(यशपाल के निबंध, अपने संपर्कों के प्रति मेरे देय, पृष्ठ 431).

उपर्युक्त घटना के बीजतत्व कुमारिल भट्ट की परंपरानुप्रेत मनोरचना में पहले ही निहित थे. उसकी समीक्षा द्वारा उन दिनों धर्म की समाज में पैठ तथा उसके आधार पर समाज के व्यवस्था से अनुकूलन को समझने में मदद मिल सकती है. उन दिनों धर्म, दर्शन और विचार की प्रामाणिकता को परखने के उपाय कभीकभी इतने विचित्र, अविचारी और अस्वाभाविक होते थे कि आज उनपर विश्वास करना कठिन जान पड़ता है. कुमारिल भट्ट जैसे विद्वान जब आस्था को तर्क के नाम पर परोसते हैं तो पढ़कर हंसी आना स्वाभाविक है. बताते हैं कि नालंदा में बौद्ध दर्शन के अध्ययन के लिए कुमारिल भट्ट ने छद्म नाम से प्रवेश लिया था. वहां के विद्यार्थियों को जब पता चला तो वे बहुत कुपित हुए. उन्होंने कुमारिल को सबक सिखाने की ठान ली. कुछ शरारती लड़कों ने उन्हें विश्वविद्यालय की छत से फैंकने का निश्चय किया. जब वे कुमारिल को ढकेलने जा रहे थे तब कुमारिल ने सभी को सुनाते हुए कहा था—‘यदि वेद प्रामाण्य हैं तो मुझे कोई भी चोट नहीं पहुंचेगी.’

जैसा उस युग का चलन था, यह अंधश्रद्धा को तर्क के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश थी. संयोग से वे सकुशल बच गए. उसी दिन से कुमारिल ने मान लिया कि वेद स्वतः प्रामाण्य हैं. बौद्ध विचारक वेदों को अप्रामाण्य और मानवकृत मानते थे. बौद्ध दर्शन को मिटाने के कुमारिल भट्ट के संकल्प के पीछे यह मुख्य वजह थी. आगे चलकर उन्होंने विपुल वाङ्मय की रचना की. अनुकूल परिस्थितियों के कारण उन्हें सफलता भी मिली. यह बात अलग है कि दर्शन में विचार को जो सम्मान मिलना चाहिए, वह लगातार कम होता गया. उसके स्थान पर कर्मकांड और रूढ़ियों अपनी पकड़ बनाते गए.

विचार की कसौटी केवल विचार बन सकता है. लेकिन चमत्कारों और संयोगों के माध्यम से विचार को प्रामाण्य सिद्ध करने की प्रवृत्ति बहुत पुरानी है. विचार को विचारधारा में बदलने तथा विरोधी विचारों से सीख लेने के बजाय उन्हें मिटा देने के उदाहरण और भी कई हैं. कहीं पढ़ा था कि उज्जैन नगरी में एक ऐसा तालाब था, जिसका उपयोग शास्त्रीय ग्रंथों की जांच के लिए कहा जाता था. तरकीब निराली थी. यदि ग्रंथ तैर जाए तो उसको मौलिक और महत्त्वपूर्ण मानकर सम्मान मिलता था. अगर डूब जाए तो उसे स्थायी जलसमाधि के लिए छोड़ दिया जाता था. समझ सकते हैं कि वह गुणवत्ता जांच के नाम पर ग्रंथ को ही मिटा देने की बौद्धिक वर्ग की साजिश थी. लोकश्रुति के अनुसार उस तालाब में पांच हजार से अधिक ग्रंथों को इसी तरह डुबोया गया था. बाद में उस तालाब को पाट दिया गया. इस तरह न जाने कितनी बहुमूल्य पांडुलिपियां, केवल इसलिए कि उनमें व्यक्त विचार शासन और उसके चहेते बुद्धिजीवी वर्ग की विचारधारा से मेल नहीं खाते थे, हमेशाहमेशा के लिए दफन कर दिए गए. बौद्ध काल में चार्वाक, लोकायत और आजीवक धर्म जैसी भौतिकवादी विचारधाराएं विमर्श में थीं. अजित केशकंबलि, मक्खलि घोषाल जैसे विचारक उनके पोषण में लगे थे. वैदिक परंपरा के पुरोहितों और आचार्यों से उनका शास्त्रार्थ चलता रहता था. इसके बावजूद इन विचारधाराओं से संबंधित स्वतंत्र गं्रथ हमें प्राप्त नहीं होता. इसके पीछे तत्कालीन आचार्यों की विरोधी विचारधारा के प्रति असहिष्णुता रही है.

धर्म से अपेक्षा की जानी चाहिए कि राजनीतिक और आर्थिक कार्यकलापों से दूर, नैतिक व्यवस्था बने. लेकिन व्यवहार में वह ऐसा धंधा है जो बिना निवेश के स्थायी लाभ देता है. अमीर जनसाधारण की धार्मिक भावनाओं के दोहन के लिए मंदिर बनवाता है. नियमित पूजनअर्चन के लिए पुजारी स्वयं हाजिर हो जाता है. जो कुछ ज्यादा अमीर है, वह पुजारी और पूजा का खर्च भी उठा लेता है. ऐसे धनाढ्य को मंदिर की ओर देखने की जरूरत नहीं पड़ती. इसके बावजूद पुजारी उसे धर्मरक्षक, ईश्वर प्रेमी, भक्त शिरोमणि, ईश्वरानुरागी जैसी पदवियां सौंपता है. इससे उसको व्यापार करने, व्यापार के नाम पर मनमाना लाभ कमाने की छूट मिल जाती है. अपने बनाए मंदिर में व्यापारी स्वयं पूजा करे, आवश्यक नहीं है. इसके लिए वह मंदिर बनवाता ही नहीं. पूजापाठ उसके लिए तीसरेचैथे दर्जे या बैठेठाले का काम होता है. अवसर विशेष को छोड़कर वह उस ओर झांकता तक नहीं है. केवल पुजारी को दी गई तनख्वाह और यदाकदा की दानदक्षिणा से उसका ‘धर्म’ सधता रहता है. पुराने जमाने में इसलिए प्राचीन राजामहाराजा, जमींदार, सेठ आदि का धर्मालय प्रवेश भी खास घटना हुआ करती थी. आज भी व्यापारी वर्ग मोटे दानदक्षिणा द्वारा वह पुरोहितों को प्रसन्न रखता है. बदले में पुजारी वर्ग उसके मुनाफा कमाने के तरीकों, व्यापारिक अनाचार और भ्रष्टाचार की ओर से आंख मूंद लेता है. गलती के लिए आर्थिक शक्तियों को जिम्मेदार ठहराने की तो मानो उस युग में परंपरा ही नहीं थी. इसलिए भारतीय और विश्व वाङ्मय में राजनीतिकों के अनाचार और दुराचार के किस्से तो अनगिनत हैं, यहां तक कि देवताओं को भी नहीं छोड़ा गया है, मगर आर्थिक दुराचार के बारे में चर्चाएं नगण्य हैं. यहां कुबेर के खजाने का बखान हुआ है. राजामहाराजाओं, सेठसाहूकारों के खजाने को भी कुबेर का खजाना कहकर महिमामंडित किया जाता रहा है. उस खजाने में धन कैसे आता है, कहां से आता है, धनार्जन के रास्ते नैतिक हैं या अनैतिक—इस पर चर्चा कम ही हो पाती है. हालांकि कौटिल्य, कात्यायन, याज्ञवल्क्य आदि ने कराधान और राज्य के वित्त प्रबंधन संबंधी आवश्यक निर्देश दिए गए हैं, लेकिन उनका वास्तव में कितना पालन होता था, उल्लंघन करने पर कब, किसे, कितना दंड दिया गया था, इस तरह का कोई उदाहरण धर्मग्रंथों में नहीं मिलता.

धर्म के नाम पर जीवन के जरूरी सवालों से बच निकलने के प्रसंग इतिहास में अनगिनत हैं. धर्मानुयायी आस्थावादी दृष्टि से उनका महिमामंडन करते हैं. लेकिन विमर्श से बच निकलते हैं. यदि कहीं फंसते हुए दिखें तो ‘नेतिनेति’ कहकर तत्काल पीछा छुड़ा लेते हैं. कहने की आवश्यकता नहीं कि धर्म आज भी समाज के बहुसंख्यक वर्ग के लिए मानवीय कम, आस्था का विषय ज्यादा है. हालांकि अपनी नैतिक प्रेरणाओं के लिए करोड़ों लोग धर्म पर आज भी आश्रित हैं. धर्म उनके लिए अस्मिता का मसला है. धर्मविहीन जीवन के बारे में वे सोच भी नहीं सकते. हरिद्वार के कुंभ और गढ़मुक्तेश्वर के गंगा मेले को देखिए, श्रद्धालुओं का चारों ओर से उमड़ता हुआ हुजूमकड़कड़ाती ठंड और वर्फसे हाड़ जमा देने वाले पानी में, आपको सत्तरअस्सी वर्ष तक के बूढ़ेबूढ़ियां गोते लगाते हुए नजर आएंगे. अनगिनत कष्ट सहकर भी वे खुद को धन्य मानते हैं; या यूं कहो कि श्रद्धातिरेक में कायाकष्ट को भूल जाते हैं. माक्र्स इसे अफीम कहता है. कदाचित धर्म एक नशा है भी. वाल्तेयर, फायरबाख, ब्रूनो बायर, मिखाइल बकुनिन, बट्र्रेंड रसेल जैसे विचारकों ने भी अलगअलग अंदाज में धर्म को नशा और शोषण का जरिया माना है. लेकिन जब कोई नशा ही समाज के अधिसंख्यक लोगों को प्रिय हो, लोग उसको अपनी पहचान से जुड़ा हुआ मानते हों, और जो पूरी दुनिया के तीनचैथाई से भी ज्यादा लोगों की जीवनचर्या को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता हो, तब उसके प्रति एकाएक उपेक्षा या तिरस्कारभाव क्या संभव है? क्या ऐसा करना लोगों की नैसर्गिक स्वतंत्रता का अपमान नहीं है? अवश्य होता; बशर्ते मनुष्य अपना धर्म स्वयं तय करता. उसको अपना ईश्वर चुनने का अधिकार होता और जन्म के साथ ही धर्म उसपर थोप नहीं दिया जाता. यह किसी से छिपा नहीं कि जन्म के समय शिशु का मस्तिष्क कोरी सलेट जैसा होता है. कम से कम ईश्वर और धर्म को लेकर तो वह कुछ भी नहीं जानता. ऐसे में जन्म के साथ ही शिशु के धर्म और ईश्वर का निर्धारण कैसे संभव है! क्या यह खुली हवा में पहली सांस के साथ ही मनुष्य के विवेक को बांध देने की साजिश नहीं है? असल में यह धर्म के आधार पर संगठित होने वाले समाजों का मूक समझौता है, जिसके आधार पर वे अपने अनुयायी बांटते रहते हैं.

धर्म की प्रमुख विशेषता उसका लचीलापन, परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की ताकत है. लेकिन परिस्थितियों के अनुसार कैसे बदलना है, यह तय करने का अधिकार जनसाधारण को नहीं होता. तय करता है पुरोहित वर्ग. इस काम को वह शास्त्रों की दुहाई देकर करता है. यहां शास्त्र व्यापक पद है. उसमें ग्रंथों के अलावा श्रुति, परंपरा, यहां तक की शास्त्र के नाम पर मनमानी और अपने मत को ही प्रामाण्य मानने के दुराग्रह के साथ, एकाएक गढ़ ली गई संकल्पनाएं भी शामिल होती हैं. शास्त्रीय पैमाने पुरोहित वर्ग पर भी ज्यों की त्यों लागू हों, यह आवश्यक नहीं है. उनके लिए आपद् धर्म की व्यवस्था हर समय रहती है. जीवन महत्त्वपूर्ण है इसलिए क्षुधा पीड़ित विश्वामित्र की जीवन रक्षा हेतु मृत पशु का मांस खाने की अनुमति शास्त्र देते हैं. यह इजाजत सभी को; और हमेशा नहीं थी. जो धर्म भूखे विश्वामित्र के प्राण बचाने के लिए लचीलापन दिखाता है, वह महाभारत में राजनीति के साथ जुड़कर बेहद आक्रामक हो जाता है. वहां पांच पांडव बंधुओं को न्याय दिलाने के नाम पर महाभारतकार अठारह अक्षौहिणी सेना को युद्ध की आग में झोंक देने की घटना को धर्म युद्ध की संज्ञा देता है, जिसमें सब कुछ ऊपर से तय होता है और तथाकथित धर्म के नाम पर 19,68,300 सैनिक, 3,93,660 हाथी तथा 11,80,980 घोड़े युद्ध की बलि चढ़ा दिए जाते हैं.

साफ है, सामान्य व्यवहार में धर्म केवल आध्यात्मिक विषय नहीं रह जाता. उसमें शीर्षस्थ वर्ग की स्वार्थपूर्ण राजनीति, उसके मनसूबों और महत्त्वाकांक्षाओं को साधने का पूरा व्यवहारशास्त्र होता है. नैतिकता का आवरण तो लोगों को लुभाने के लिए होता है. समाज में अपनी पैठ बनाने के लिए कुछ प्रावधान आवश्यक हैं, जैसे—‘अपने पड़ोसी से प्यार करो, सत्यभाषी बनो, आवश्यकता से अधिक संचय मत करो, सभी जीवों पर दया, क्षमा, धृत्ति, करुणा, परोपकार आदि. धर्म की ये व्यवस्थाएं उसके चेहरे को मानवीय बनाती हैं. उसके लिए लोगों के दिल में जगह पैदा करती हैं. जनसाधारण उनसे यथोचित प्रेरणाएं भी लेता है. लेकिन यदि किसी क्षण पुरोहित वर्ग की मदद या व्याख्या की जरूरत आ पड़े तब वह धार्मिक प्रावधानों का उपयोग निहित स्वार्थ के लिए करता है. स्थितियां प्रतिकूल हों तो धर्म तत्क्षण अपने दिखावटी रूप को सामने लाकर उदार सामाजिक मूल्यों का हवाला देने लगता है. चूंकि नैतिकता के स्तर पर सभी धर्मों में अनूठी समानता है, इसलिए उस स्तर पर वे सभी विद्वेष एकाएक मिट जाते हैं, जिन्हें धर्म से जुड़ा सांप्रदायिक सोच जन्म देता हैं. सच तो यह है कि उस समय सिवाय कर्मकांडों और मिथकीय कल्पनाओं के धर्म का अपना कुछ रह ही नहीं जाता, बल्कि दबाव मंे धर्म स्वयं उन्हें दूसरे दर्जे का मानने लगता है. लेकिन दबाव हटते ही धार्मिक दुराग्रह फिर प्रबल होने लगते हैं. वर्गीय सोच के कारण प्रत्येक धर्म किसी न किसी रूप में सामाजिक स्तरीकरण का समर्थन करता है. ऊंचनीच को स्थायी बनाता है.

ऐसे धर्म की जरूरत आखिर किसे है? पूंजीपति को या जनसाधारण उपभोक्ता को? मेरा उत्तर होगा, दोनों के लिए. पूंजीपति की धार्मिक प्रतीकों में कोई आस्था न हो तो भी वह स्वयं को धार्मिक इसलिए दर्शाता है, क्योंकि उसको अपना सर्वस्व समझने वाले गरीब, मेहनतकश यह मानते हुए कि उसकी संपन्नता के पीछे उसकी चालाकियां, अंधाधुंध मुनाफाखोरी, लालच, झूठ और बेईमानी न होकर ईश्वर की विशेष अनुकंपा है, उसकी ओर से उदासीन हो जाते हैं. इससे केवल अपने लाभ के लिए उत्पादन करनेवाली पूंजीपति कंपनियों को बढ़ावा मिलता है. इस तरह धर्म सचाई पर पर्दा डालने का काम करता है. उल्लेखनीय है कि अमीर के लिए धर्म का अभिप्राय धार्मिक प्रतीकों, रीतिरिवाजों में आस्था तक सीमित नहीं होता, न वह केवल स्वर्ग के सुखों तक फैला होता है, बल्कि वह उसकी सीधीसादी व्यापारिक रणनीति का हिस्सा होता है. धर्म की शरण में जाकर अमीर अपने इस जन्म की समृद्धि को पक्का करता है. जबकि गरीब अपने लिए सहनशीलता की मांग करता है, ताकि वर्तमान दुखअभाव, उत्पीड़न की मार से बच सके. इसी खातिर वह अपने दुखों से खेलता तथा गरीबी और दुश्वारियों को गले लगाता है. वह ताकतवर के अत्याचार को नतभाव से सह लेता है. केवल इस उम्मीद में कि सब कुछ ईश्वर के नाम कर देने से या उसके नाम पर अपने दुखों की ओर से उदासीन हो जाने पर वह प्रसन्न होगा. बदले में उसका भविष्य बेहतर होगा. दूसरे शब्दों में धर्म धनवान और शक्तिशाली के हितों की तात्कालिक सिद्धि करता है, जबकि कमजोर को भरमाता है. उसे प्रलोभन से बांधे रखता है. उल्लेखनीय है कि धर्म और ईश्वर का महिमामंडन केवल आस्थाप्रदर्शन तक सीमित नहीं रहता. उसके सामाजिकसांस्कृतिक संदर्भ भी होते हैं. जो मनुष्य को अपनी सीमाओं में बांधते हुए सामाजिक असमानता में उत्तरोत्तर वृद्धि करते हैं.

ईश्वर नामक काल्पनिक और गढ़ी गई सत्ता का प्रयोग प्रायः दो प्रकार के लोग करते हैं. एक जो उसे चाहते या उससे डरते हैं; तथा डर और चाहत के चलते यथासामर्थ्य वह सबकुछ करते हैं, जैसा उनसे पुरोहितवर्ग द्वारा कराया जाता है. दूसरे वे जो लोगों पर उसके प्रभाव का उपयोग निहित स्वार्थ हेतु करते हैं. जो लोग ईश्वर को चाहते या उससे डरते हैं—वे इस भ्रम के नाम पर लगातार छले जाते हैं. ईश्वरत्व की वास्तविकता कि वह केवल मनुष्य की मनोरचना है, को समझने वाले ईश्वर की काल्पनिक तस्वीर गढ़ते हैं. निहित स्वार्थ के लिए वे उसके चारों ओर झूठे किस्सेकहानियों और गाथाओं का पूरा शास्त्र खड़ा कर लेते हैं. फिर उसके माध्यम से उस वर्ग का जो अपने भोलेपन के कारण ईश्वर के अस्तित्व पर भरोसा करता है, को बरगलाते तथा उसका तरहतरह से शोषण करते हैं.

धर्मशास्त्रों में बारबार बताया जाता है कि दुनिया धर्म पर टिकी है. धर्म के न होने से सामाजिक व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी. इंसान इंसान को खाने लगेगा. चारों ओर अराजकता छा जाएगी. असल में यह डर ही धर्म की नींव, उसकी प्राणवायु है. यह डर मनुष्यों में एकदूसरे के प्रति अविश्वास पैदा करता है, जिसे पैदा करने में धर्म की बड़ी भूमिका होती है. एकदूसरे के प्रति डर और अविश्वास उन्हें अनावश्यक स्पर्धा में उलझाए रखता है. यह धर्म के संबंध में परस्पर विरोधाभासी मान्यताओं को सामने लगाता है. क्योंकि एक ओर तो वह मानवीय स्नेहानुराग को बनावटी, दुनिया को नकली और मोहमाया ग्रस्त, भवप्रपंच आदि बताकर जीवनसंघर्ष से पलायन को उकसाता है, दूसरी ओर वह देवताओं की ऐसी कृपालु और महिमामयी तस्वीर गढ़ता है, जो पलक झपकते ही भक्त को उसके समस्त दुखों, अभावों, कमजोरियों और दुश्वारियों से मुक्ति दिला सकते हैं. हालांकि जैसा कि माना जाता है, देवताओं की ‘कृपा’ विनीत बने रहने पर ही संभव हो पाती है. सचाई और साफगोई किसी देवता को पसंद नहीं है. न ही आंख से आंख मिलाकर बात करने वाले भक्त उन्हें रास आते हैं. देवता उन भक्तों को पसंद करते हैं, जो हमेशा गिड़गिड़ाते हुए नजर आएं. खुद सत्तु खाकर उन्हें पकवानों का भोग लगाएं. इस तरह पुरोहितों द्वारा गढ़े गए देवता और तानाशाह में कोई अंतर नहीं रह जाता. बल्कि कई बार तो देवता तानाशाह से भी कहीं अधिक क्रूर और सनकी नजर आते हैं. तानाशाह नाराज होने पर अधिक से अधिक कैद कर लेता है अथवा मनुष्य को मौत के घाट उतार देता है. देवता नाराज हों तो मृत्युदंड के बाद आत्मा युगोंयुगों तक दंड की भागी बनती है. बल्कि तानाशाह की अपेक्षा देवताओं के नाराज होने की संभावना अधिक होती है. क्यांकि वहां मानवीय भूलों के लिए कोई स्थान नहीं होता. मानो गुस्सा और नाराजगी देवताओं की नाक पर रखी रहती है. भक्तों से सुबहशाम नाम लिवाना देवताओं को सर्वाधिक प्रिय है. इस काम यदि भूल से भी चूक हो जाए तो देवताओं का कोपभाजन बनना पड़ता है. नाराजगी मानो उनकी नाक पर रखी रखती है. दावा किया जाता है कि देवताओं की मर्जी के बिना सृष्टि में पत्ता तक नहीं हिलता, बावजूद इसके यदि कोई चूक हो जाए तो दंड का भागी केवल इंसान को बनना पड़ता है. धर्म की माने तो माया का भरमाया मनुष्य कोई न कोई चूक हर घड़ी करता ही रहता है. इसलिए हर किएअनकिए की जिम्मेदारी मनुष्य पर आ पड़ती है. माया या माया बनाने वाले का कोई दोष नहीं मानता. प्रत्येक कार्य के पीछे दैवीविधान मान लेने का नुकसान यह है कि इससे जीवन में सामान्य सुख, यहां तक कि नैसर्गिक स्वतंत्रता भी मनुष्य का अधिकार होने के बावजूद, ‘दैवीकृपा’ मान लिए जाते हैं. जो लोग किसी कारणवश इन सुविधाओं तथा मौलिक अधिकारों से वंचित हैं, उन्हें देवी कृपा से भी वंचित और ‘अभागा’ कहा जाता है.

धर्म का यह चरित्र तभी से है जब से साम्राज्यवादी चेतना का उदय हुआ. तभी से राजामहाराजाओं, जमींदारों के इर्दगिर्द चाटुकारों का वर्ग बनने लगा था. चाटुकार वर्ग में पुरोहित भी सम्मिलित थे. वे राजा की सहानुभूति प्राप्त करने तथा जनता पर अपने प्रभाव को स्थायी बनाने के लिए धार्मिक अनुशंसाओं की मनमानी व्याख्याएं करते थे. राजाओं और सामंतों को भोगविलास प्रिय था. इसलिए पुरोहितों ने देवताओं को भी स्वार्थी, विलासी, स्वर्णाभूषणों से मंडित दिखाया है. परिणाम यह हुआ कि धर्म की नैतिक और सामाजिक व्यवस्थाएं केवल दिखावे की चीज बनती गईं. धार्मिक मान्यताएं जैसेजैसे फैलीं, सामाजिक असहिसुष्णता लगातार बढ़ती गई. कालांतर में यही दिखावा देवताओं के चरित्रचित्रण में भी समा गया. परिणामस्वरूप जो देवता चित्रित किए गए, आदमी की तरह वे भी अपनी आत्मप्रशंसा के भूखे थे. गुस्सा उन्हें भी आता था. साधारण इंसान की भांति मनमानी करने से उनका अहं भी ठंडा होता था. यहां तक कि षड्यंत्र रचने, भोगविलास और वैभव प्रदर्शन करने में भी वे कम नहीं हैं.

प्रमाण के लिए लक्ष्मी से लेकर विष्णु या किसी और हिंदू देवीदेवता का चित्र देख लीजिए, सभी स्वर्णाभरण से सज्जित हैं. उनके मुकुट हीरे के जड़े हैं. वे चढ़ावे की कीमत देखकर आनुपातिक रूप से प्रसन्न होते हैं. केवल पाशुपति इसके अपवाद हैं. वे देवताओं में सबसे पुराने भी हैं. उनके बारे में प्रस्तर शिल्प से लेकर लिखित साहित्य में इतना कुछ मौजूद था कि पुरोहितों द्वारा उसमें फेरबदल कर पाना, आसान नहीं था. उपलब्ध साक्ष्य यह भी बताते हैं कि शिव अवैदिक देवता हैं. त्रिदेवों में ब्रह्मा को सृजन और विष्णु को पालन का दायित्व सौंपा गया है. थोड़ासा विचार करने पर इस रूपक के अभिप्राय को आसानी से समझा जा सकता है. ब्रह्मा के हाथ में वेद हैं, जिसके पीछे असली मंशा वेदों को अपौरुषेय दिखाने की है. विष्णु को पालक देवता का दर्जा प्राप्त है. उन्हें अवतार लेकर बारबार सृष्टि में आना पड़ता है. यह क्षत्रियों के बीच पीढ़ीदरपीढ़ी सत्ता हस्तांतरण का संकेतक है. शिव को संहार का देवता बताया जाता है.

द्रबिड़ों या अनार्यों का देवता ही संहार का देवता क्यों? इसके पीछे की मानसिकता का आकलन कठिन भले हो, असंभव नहीं है. आर्यों के आगमन से पहले इस देश में शिव की प्रतिष्ठा थी. इसके भी प्रमाण हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में पांव जमाने से पहले आर्यों को न केवल यहां के मूल निवासियों से संघर्ष करना पड़ा था, बल्कि अनेक समझौते भी उन्हें करने पड़े थे. आर्यों के साथ निरंतर चलने वाले युद्धों में अंततः अनार्यों को पराजित होना पड़ा पड़ा था, तथापि अनार्यों का डर आर्याें के मन से गया नहीं था. शिव के चिर संगी के रूप में भूत, प्रेत, वैताल आदि हैं, जो अलगअलग कबीलों का प्रतिनिधित्व करते हैं. यही गणशक्ति शिव को संहार का देवता मानने के लिए विवश करती है. शासक वर्ग के मन में जनता का डर, यह डर कि शिव के एक संकेत पर कबीलाई समूह आर्यों के श्रेष्ठ योद्धा होने के सपने को चकनाचूर कर सकते है, शिव को देवताओं का देवता, महादेव और संहार का देवता बनाता है. शिव की भांति गणेश भी गणप्रमुख यानी कबिलाई संगठनों के नेता हैं. लंबे समय तक उन्हें अनार्यों के मुखिया के रूप में मान्यता मिलती रही. गणेश को उनका वर्तमान रूप आर्यों की गणतंत्र के प्रति अनास्था के कारण, उसके उपहास के कारण मिला है.

विभिन्न धर्मावलंबियों की कोशिश होती है, अपने धर्म को पुराने से पुराना दिखाने की. इसके पीछे उनकी कोशिश अपनेअपने धर्म के रीतिरिवाज, कर्मकांड आदि को ज्यों की त्यों, चलाते जाने की होती है. यह बात अलग है कि उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर दुनिया में धर्म की आमद को 5000 वर्ष से पहले नहीं ले जाया जा सकता. यह वही समय है जब इंसान ने संगठित होकर रहना सीखा. नगर राज्यों की नींव रखी गई. उन्हीं दिनों धर्म की सांगठनिक शक्ति को पहचाना गया और उसके आधार पर लोगों को जोड़ने की शुरुआत की गई. हालांकि सभ्यता का इतिहास इससे भी काफी पुराना है. यदि प्रबोधीकरण के युग को ही लें तो करीब 12000 वर्ष बीत चुके हैं. यानी प्रबोधीकरण का दोतिहाई हिस्सा मनुष्य ने बगैर किसी धार्मिक विश्वास के बिताया है. लेकिन एक बार धर्म के अस्तित्व में आने के बाद उससे पीछा छुटा पाना मनुष्य के लिए असंभव रहा है. इस बीच राजसत्ताएं बदलीं. सत्ताओं के रूप और मायने बदले. साथसाथ धर्म के मायने तथा उसके अभीष्ट भी बदलते रहे हैं. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि धर्म गायब हुआ हो. संगठित राजसत्ता के दौर में धर्म सत्ता और भी फलीफूली और मजबूत हुई है. ऐसे में धर्म से मुक्ति, उसके कर्मकांडों से मुक्ति क्या संभव है? खासकर गत दो हजार वर्षों से धर्म दुनियाभर के समाजों, लोकपरंपराओं में जितनी गहराई से अंतर्गुंफित हुआ है. उससे मनुष्य की धर्म से मुक्ति आसान नहीं लगती. खासकर तब जब धर्मसत्ता और राजसत्ता दोनों के स्वार्थ एक समान हों. दोनों एकदूसरे को समर्थन और बल प्रदान करती हों. यह धर्म की ही माया है कि कंप्यूटर अपने ईजाद होने के साथ ही भविष्यवाणी करने लगता है.

यह ठीक है कि आधुनिक युग में धर्म से मुक्ति आसान नहीं दिखती. लेकिन जो कठिन दिखती हो, वह असंभव भी हो, यह बात जमती नहीं. बल्कि इतिहास ने दर्शा दिया है कि कठिनता का जीवनकाल बस कुछ वर्ष का होता है. उसके बाद वह व्यवहार का हिस्सा बन जाती है. आज से सत्तरअस्सी वर्ष पहले एवरेस्ट की गगनचुंबी चोटी पर पहुंचना असंभव बात थी. बाद में हिलेरी, शेरपा तेनसिंह के साथ गए. असंभव संभव हुआ. आज तो यह स्थिति है कि वहां अपेक्षाकृत आसानी से जाया जाता है. ऐवरेस्ट यात्रा खबरें कोई खास रोमांच नहीं बना पातीं. यही हाल धर्म का है. आज भले ही लोग मानते हों कि सृष्टि धर्म के बल पर टिकी है. पर कल हालात बदल भी सकते हैं. कोई भी दो सत्ताएं जिनके अपनेअपने स्वार्थ हों, लंबे समय तक एकदूसरे के समर्थन में नहीं रह सकतीं. खासकर तब जब शक्ति के केंद्र बदल रहे हों. पहले भूसंपदा पूंजी का प्रतीक थी. उससे पहले कुछ और था. इसलिए वह दिन दूर नहीं कि जब धर्म की असलियत भी लोगों के सामने होगी. वे उन चेहरों को देख सकेंगे, जो उसकी महिमा मंडन के पीछे हैं.

दूसरी ओर यह भी सही है कि आदमी के मन से आगतअनागत का डर निकल जाए, धर्म अपने आप ‘फालतू’ मान लिया जाएगा. यह भ्रम भी जाता रहेगा कि धर्म मनुष्य को जोड़ता है. भ्रम टूटते ही मनुष्य समझने लगेगा कि जीवन के जो लक्ष्य हैं, उन्हें प्राप्त करने के लिए किसी तीसरी शक्ति की आवश्यकता नहीं है. मनुष्य आपसी सहयोग, समर्पण और विश्वास द्वारा भी जीवनलक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है. इससे उसका दैन्य घटेगा. आत्मविश्वास में वृद्धि होगी. भटकाव में कमी आएगी. जीवन के लक्ष्य जब तीसरी अदृश्य सत्ता को बीच में रखकर लेने के बजाय समाज और सामाजिकता को ध्यान में रखकर तय होने लगेंगे तो सामाजिक अंतद्र्वंद्वों का हृास होगा. तनाव में कमी आएगी. समाज की ऊर्जा सामाजिक कार्यों में विकास के लिए खर्च होने लगेगी. अपने पुरुषार्थ पर भरोसा मनुष्य को जीवन और एकदूसरे के करीब लाएगा. हमें उस दिन की प्रतीक्षा तो कर ही सकते हैं.

– ओमप्रकाश कश्यप

1. किं करोमि क्वगच्छामि को वेदानुधरिष्यति.

    मा रुदसि बाले, कुमारिलभट्टोवेदानुद्धारिष्यति. – यशपाल द्वारा ‘अपने संपर्कों के प्रति मेरे देय’ में उद्धृत, यशपाल के निबंध, पृष्ठ 431.

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