सलाम दिल्ली

चाहता हूं कि आपकी याददाश्त को थोड़ा पीछे ले चलूं. याद करें, रामलीला मैदान की रैली में प्रधानमंत्री मोदी का जादूगर की तरह लहराता हुआ हाथ. चेहरे पर दर्प—‘भाइयो और बहनो! हमें यहां विकास चाहिए, अराजकता नहीं. उनकी मास्टरी धरना करने में है. उन्हें वह काम करने दीजिए. हमारी मास्टरी सरकार चलाने में है. हमें वो काम दीजिए.’ केजरीवाल को अराजक कहने वाले प्रधानमंत्री भूल गए थे कि धरना, प्रदर्शन, आंदोलन, बायकाट आदि लोकतंत्र के मुख्य औजार हैं. इन्हीं औजारों की मदद से गांधी जी ने पूरे स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया था. इन्हीं के भरोसे अंततः यह देश आजाद भी हुआ था. जिस राज्य में जनता को ये अधिकार प्राप्त न हों, वहां लोकतंत्र असंभव है. ऐसा राज्य निरंकुश कहलाएगा. प्रधानमंत्री जी को कदाचित यह भी स्मरण नहीं हुआ था कि अ-राजकता प्रबुद्ध समाज का विधान है, जिसमें सरकार का आकार सिकुड़कर न्यूनतम रह जाता है. उसका प्रबंधन पूरी तरह से जन-संगठनों के अधीन होता है. दूसरे शब्दों में वह लोकतंत्र की समुन्नत अवस्था, उसका परिष्कृत रूप है, जिसमें बाहरी शासन औचित्यहीन हो जाता है. इसके बावजूद केजरीवाल को नक्सली कहकर उन्हें जंगल में जाने की सलाह देना, सस्ती राजनीति ही माना जाएगा, जिसकी प्रधानमंत्री जैसे गरिमामय पद को संभालने वाले व्यक्ति से अपेक्षा नहीं की जा सकती.

प्रबुद्ध नागरिक आत्म-नियंत्रित होता है; या होना चाहिए. ऐसे व्यक्ति को सरकार या बाहरी अनुशासन की आवश्यकता ही नहीं पड़ती. इसलिए अच्छी सरकार वह मानी जाती है, जो न्यूनतम शासन करे. इसलिए लोकतंत्र में जो भी नेता या दल, सरकार चलाने में अपनी मास्टरी का दावा करता है, उसके बारे में कहा जाना चाहिए कि वह लोकतंत्र की भावना को आत्मसात करने में असफल रहा है. लोकतंत्र में सरकार चलाना कला नहीं है. बल्कि बहुजन की सपनों और आकांक्षाओं को, सर्वजन के सपनों एवं आकांक्षाओं में बदल देना कला है. लोकतांत्रिक सरकारें जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं. जागरूक जनता कभी यह नहीं चाहती कि सरकार चलाने के नाम पर कोई उसके सिर पर सवार हो जाए. समय आने पर इस तरह का विचार रखनेवाले नेताओं को वह सबक भी सिखा देती है. दिल्ली में कदाचित यही हुआ है. मोदी जी कैसी सरकार देना चाहते थे यह द्वारका रैली दिए गए उनके भाषण से स्पष्ट हो जाता है. चुनावी रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था—‘दिल्ली में ऐसी सरकार चाहिए, जो मोदी से डरे. भारत सरकार से डरे. जिसको केंद्र की परवाह नहीं, वह क्या सरकार चलाएगा.’ रैली में मोदीजी ने जो कहा वह लोकतंत्र और भारतीय संघीय राज्य की गरिमा के विरुद्ध जाता है. दिल्ली की जनता इतनी नासमझ नहीं कि इसके निहितार्थ समझ न सके. इसलिए उसने सरकार चलाने में एक्सपर्ट लोगों को सत्ता सौंपने के बजाय उस दल का चयन किया, जो अपनी कामयाबी को लगातार जनता की कामयाबी घोषित करता आया है. जो जनता की जीत में अपनी जीत का दावा करता है. लोगों ने सरकार चुनने के बजाय अपने प्रतिनिधि चुनने को प्राथमिकता दी है.

कसूर मोदी जी का भी नहीं है. वस्तुतः जिस राजनीतिक दल का वे प्रतिनिधित्व करते हैं, वह स्वयं लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखता. ऐसे संगठन की वैचारिकी को आदर्श मानते हुए, मोदी जी ने अपने जीवन के चालीस बहुमूल्य उसके प्रचार-प्रसार को समर्पित किए हैं. उस वैचारिकी का प्रभाव उनके सोच और आचरण दोनों पर है. यही कारण है कि एक लोकतांत्रिक देश का प्रधानमंत्री होने के बावजूद वे कई बार लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध जाकर काम करने लगते हैं. कोई व्यक्ति किस प्रकार के वस्त्र पहने यह उसका अपना चयन है. लोकतंत्र व्यक्ति स्वातंत्र्य का सम्मान करता है. उसे ऐसा करना भी चाहिए. लेकिन सार्वजनिक पद पर आसीन व्यक्ति को अपने समाज और संस्कृति को ध्यान में रखते हुए कुछ मर्यादाओं का पालन करना पड़ता है. जिस गुजरात से मोदी जी आते हैं, वहीं के गांधी जी ने देश की जनता को अधनंगा देख अपने वस्त्र त्याग दिए थे. उसके बाद एक लंगोटी आजीवन उनका अंग-वस्त्र बनी रही. मोदी जी नौ लाख का सूट पहनते हैं. अपने कपड़े विदेश से मंगवाते हैं. 125 करोड़ जनसंख्या यह घर-परिवार के प्रति अनासक्त मोदी की वैभव लिप्सा है या कोई कुंठा!

‘दिल्ली में ऐसी सरकार चाहिए, जो मोदी से डरे. भारत सरकार से डरे.’—मोदीजी का यह वक्तव्य न केवल उनके अहं का परिचायक है, बल्कि लोकतंत्र की मूल भावना से खिलबाड़ भी है. मोदी जी यह बात किसी राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में कहते तो भी गनीमत थी. उन्होंने सब कुछ देश के प्रधानमंत्री के रूप में, भरी सभा में कहा. एक तानाशाह की भाषा बोल रहे मोदी जी भूल गए थे कि लोकतंत्र में नेता की समस्त शक्तियां जनता की ओर से प्राप्त होती हैं. संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री की हैसियत प्रधान सलाहकार की है, शासक की नहीं. एक ‘चायवाले’ का प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचना इस देश में लोकतंत्र के कारण ही संभव हो पाया है. वे यह सोचकर भूल करते हैं कि भाजपा और संघ ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर, उनकी चालीस वर्ष की अनथक सेवा का पारितोषिक दिया था. यह बात किसी से भी छिपी नहीं है कि संघ, गुजरात दंगों के द्वारा मोदी की जो छवि वहां बनी थी, उसके माध्यम से हिंदुत्व के संदेश को पूरे देश तक ले जाना चाहता था. हालांकि प्रधानमंत्री का उम्मीदवार मनोनीत किए जाने के पीछे यही एक कारण नहीं था. क्योंकि संघ को समर्पित व्यक्तित्वों की तो लंबी कतार है. अनेक नेता ऐसे हैं जिन्होंने उनसे भी ज्यादा सेवा की है. मोदी को आगे लाने की असली वजह थी, उनकी जाति. उनका पिछड़े वर्ग से होना. आजादी के अड़सठवें वर्ष में भी इस देश की जनता अपने राजनीतिक निर्णय जाति और धर्म को केंद्र में रखकर लेती है. मोदी को ताज इसलिए पहनाया गया ताकि पिछड़ों के वोट-बैंक में सेंध लगाई जा सके, जो देश की कुल जनसंख्या के लगभग 50 प्रतिशत हैं. अपने उद्देश्य में संघ को कामयाबी भी मिली. मायावती से नाराज दलित, मुलायम सिंह के यादव प्रेम से उकताए अतिपिछड़े और हिंदुत्व का नारा लगाने वाले जुनूनी, मोदी के पीछे होते गए. इसलिए मोदी जी सत्ता को यदि केवल अपने पुरुषार्थ का फल मानते हैं, यदि वे सोचते हैं कि प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने के लिए उन्होंने संघ को अपनी सीढ़ी बनाया है, तब वे गलत हैं. असल में चारों ओर से निराश हो चुके संघ ने मोदी का केवल उपयोग किया है. उन्हें अपना मुखौटा बनाया है.

मोदी जी इस हकीकत से अपरिचित हों, यह असंभव है. भाजपा के नेताओं को वे चाहे जितने अनुशासन में रख लें, संघ के नेताओं या उनकी भावनाओं को आगे बढ़ानेवाले भाजपा नेताओं पर उनका कोई जोर नहीं चलता. इसलिए चाहे धर्मांतरण का मुद्दा हो, साधु-साध्वियों द्वारा हिंदुओं को अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने की सलाह, किसी पर भी मोदी जी का जोर नहीं चलता. सरकार के निर्णय कहीं और ले लिए जाते हैं और उनपर अमल भी अलग तरीके से किया जाता है. यही कारण है कि विकास के नाम पर बनी सरकार की असल उपलब्धियां नौ महीने बाद भी शून्य हैं. जिस ‘जन-धन-योजना’ की शुरुआत के लिए भाजपा सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है, वह भी पिछली यूपीए सरकार की देन है और ‘जीरो बैलेंस खाता’ के नाम से लगभग 25 करोड़ बैंक खाते पिछली सरकार के कार्यकाल में ही खुल चुके थे. तमाम नारेबाजी के बीच यह सरकार अभी तक केवल साढ़े बारह करोड़ बैंक खाते ही खोल पाई है. सरकार के समर्थक दावा करते हैं कि आमूल परिवर्तन के लिए, थोड़े समय तो लगता ही है. वे गलत भी नहीं हैं. लेकिन विकास के माडल और उसके लक्ष्य समूह के बारे में सरकार के पास जो स्पष्टता होनी चाहिए, वह भी मोदी सरकार में नजर नहीं आ रही है.

हाल के दिल्ली चुनावों में आआप के हाथों मोदी सरकार को मिली करारी शिकस्त इसी का नतीजा है. मेरा मानना है कि इन चुनावों में न तो भाजपा पराजित हुई है, न ही उसके नेता. इन चुनावों में मोदी जी का अहंकार पराजित हुआ है. मीडिया और भाजपा नेताओं की वह चाटुकारिता भी पराजित हुई है, जो मोदी को एक मिथक के रूप में जनता के बीच पेश कर रही थी. इन चुनावों ने यह भी दिखा दिया है कि देश में सांप्रदायिक सौहार्द्र की जड़ें आज भी बहुत गहरी हैं. उन्हें कोई शाखाधारी या मुल्ला-मौलवी आसानी से नहीं उखाड़ सकता. इन चुनावों में भाजपा को मिलने वाले कुल मतों में बहुत थोड़ी गिरावट आई है, लेकिन उसे केवल तीन सीटों से संतोष करना पड़ा है. इतनी बड़ी हार भाजपा विरोधी मतों के विभाजन न होने के कारण भी संभव हुई है. पहले लोग भाजपा की काट आआप और कांग्रेस में अलग-अलग करके देखते थे. इस बार भाजपा विरोधी मतदाताओं के बड़े वर्ग ने बंटने के बजाय एकजुट रहने का निर्णय लिया. नतीजा आम आदमी की सफलता.

इसलिए आआप को मिले भारी बहुमत की घड़ी में मैं दिल्ली की जनता को सलाम करता हूं जिसने कारपोरेट मीडिया के षड्यंत्र को समझा और उसको पूरी तरह फेल कर दिखाया. मैं उसे इसलिए भी सलाम करता हूं कि देश के डेढ़ सौ सांसदों, दर्जनों केंद्रीय मंत्रियों और स्वयं प्रधानमंत्री के दिल्ली में होते हुए, चुनाव के दिन उसने केवल अपने विवेक पर भरोसा किया. मैं केजरीवाल, उनके साथियों तथा आम आदमी पार्टी कार्यकत्ताओं के संघर्ष को भी नमन करता हूं, जिन्होंने पूंजी और मीडिया के बड़े सिंडीकेट को अपने आत्मविश्वास, संगठन और अनथक संघर्ष के बल पर विफल कर दिया. इन चुनावों में केवल भाजपा को लगभग पांच प्रतिशत सीटें प्राप्त हुई हैं. देश में इतनी ही संख्या इलीट वर्ग की है. यदि आम आदमी के उम्मीदवारों को कुछ देर के लिए सचमुच आम आदमी का प्रतिनिधि मान लिया जाए तो भाजपा के तीन सदस्य, इस देश की जनसंख्या के कुल 5 प्रतिशत अभिजन समाज का आनुपातिक प्रतिनिधित्व करते हैं. इस तरह से देखा जाए तो आप के रूप में बड़ी सामाजिक क्रांति का भी आगाज हुआ है. जनता इस तथ्य को समझे, अपनी एकता और सूझबूझ को आगे भी बनाए रखे, इसी में उसकी असली जीत है. वरना आम आदमी के ये प्रतिनिधि कब खास आदमी का प्रतिनिधित्व करने लगेंगे, पता भी नहीं चलेगा.

© ओमप्रकाश कश्यप

2 टिप्पणियाँ

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2 responses to “सलाम दिल्ली

  1. आम आदमी पार्टी की विलक्षण जीत से बीजेपी,संघ, कांग्रेस, मायावती, मुलायम एंड पार्टी-सभी सदमे में हैं. धर्म, जातिवाद , नसलवाद के सभी दावं खुलकर खेले गए. साधू-संतो के राजनीतिकरण और इनके अनर्गल बयानों ने जनता को सोचने पर मजबूर किया की हमारी समस्या “बिजली, पानी, भ्रष्टाचार, रोज़गार,कानून-व्यस्था वगैरा ही है” और नौ महीने पुरानी केंद्रीय-सरकार ने बहुमत होते हुए अभी तक कुछ भी अच्छे संकेत नहीं दिये हैं.
    प्रधानमंत्री की चार-चार रैलिओं में घमण्ड और दुसरे को नीचा दिखाने वाले बयान , अखबारों के विज्ञापनों में अंधाधुन्द बहाया गया पैसा , वो इन पार्टिओं के पास कहाँ से आया? जनता सब समझती है – जब मौका मिला तो इन बातों का जवाब वोट से दिया गया. नतीजे: विपक्ष का नामोनिशान नहीं बचा.
    उम्मीद है राजनैतिक दल इससें कुछ सबक लेंगे.

  2. मोदी से लेकर अरविन्द केजरीवाल तक सभी के सभी भ्रष्ट हैं!

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